कश्मीर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कश्मीर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 23 अप्रैल 2017

कश्मीर पर नल्लागिरी कर रही है मोदी सरकार

        ´भाबी जी घर पर हैं ´सीरियल में एक पात्र है विभूतिनारायण मिश्रा, उनकी खूबी है वे नल्ले हैं ,यानी बेरोजगार हैं।इसी तरह कश्मीर मामले पर हमारे पीएम नल्ले हैं,बेरोजगार हैं, उनके पास कश्मीर को लेकर कोई काम नहीं है।उनका समूचा मंत्रीमंडल नल्लागिरी का शिकार है,इसके कारण कश्मीर के संदर्भ में नीतिहीनता-दिशाहीनता की स्थिति पैदा हो गयी है।
मोदी की कार्यशैली में अक्लमंदों-नीतिविशारदों की न्यूनतम भूमिका है,वे हर काम कॉमनसेंस और नौकरशाही के बल पर करने के अभ्यस्त हैं,वे भूल गए हैं कि वे अब गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं भारत के पीएम हैं।उनको अनेक ऐसे क्षेत्र देखने होते हैं जहां नीति,दूरदृष्टि और विश्वदृष्टि की जरूरत होती है।हर चीज नौकरशाही-कॉमनसेंस और गुजरातदृष्टि या एप बनाने से हल नहीं होती। मोदी का एप बनाने पर जोर मूलतः उनके तकनीकी कॉमनसेंस की देन है इसका किसी नीतिगत विवेकवाद से कोई संबंध नहीं है।
मोदी के सामने मुश्किलें तब आती हैं जब कोई जटिल नीतिगत मसला आकर फंस जाता है और यहीं पर मोदी का व्यक्तित्व एकदम बौना हो जाता है। कल वे जब मंत्रीमंडल के कुछ सहयोगियों,ढोभाल,थल सेनाध्यक्ष आदि को लेकर कश्मीर की स्थिति पर बातें कर रहे थे तो लोग इंतजार में थे कि कोई बड़ा नीतिगत बयान आ सकता है लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय ने कोई नीतिगत बयान नहीं दिया बल्कि जो बयान दिया वह पीएम और उनकी सरकार की कश्मीर पर नल्लागिरी को सामने लाता है।
पीएम यह मानकर चल रहे हैं कश्मीर में स्थिति अपने आप जब सामान्य होगी तब वे कोई कदम उठाएंगे,अब पीएम को कौन समझाए कि कश्मीर में सामान्य हालात तब बनेंगे जब मोदी सरकार झुकेगी,सेना के हस्तक्षेप को रोकेगी,पीडीपी-भाजपा चुनाव घोषणापत्र में जो वायदे किए गए थे उनको पूरा करने के लिए पहल करेगी,कश्मीर पर सभी संबंधित पक्षों को बुलाकर बातचीत करेगी।आश्चर्य की बात है कश्मीर पर सभी से बातचीत करने का चुनावी वायदा करके,हुर्रियत के वोट पाकर भाजपा नेता अब हुर्रियत से बातचीत करने को तैयार नहीं हैं।हुर्रियत से जब बात नहीं करनी थी तो संयुक्त चुनाव घोषणापत्र में हुर्रियत सहित सभी पक्षों से बातचीत आरंभ करने का वायदा क्यों किया था ॽ विधानसभा चुनाव पहले श्रीनगर बाढ़ में डूब गया था उस समय मोदी ने पीड़ितों को आर्थिक मदद देने का वायदा किया था,पैकेज घोषित किया था लेकिन आज तक मदद आम लोगों तक नहीं पहुँची।अभी भी समय है कश्मीर मसले पर निकम्मेपन को त्यागकर मोदीजी स्वयं पहल करके सभी विवाद में शामिल पक्षों को दिल्ली प्रधानमंत्री कार्यालय बुलाएं और कश्मीर में सामान्य हालात बनाने के उपायों पर खुलेमन से चर्चा करें और लोगों के देशसम्मत सुझावों को ईमानदारी से लागू करें।ध्यान रहे कश्मीर में अब छात्र मैदान में निकल पड़े हैं,इस समय हर जिले में आतंकवादी नहीं ,छात्र-युवा निकल पड़े हैं सड़कों पर,वे हर स्तर पर प्रतिवाद कर रहे हैं।

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

राष्ट्रवादी नंगई के प्रतिवाद में

        कल से मोदी के अंधभक्तों ने फेसबुक से लेकर टीवी चैनलों तक जो राष्ट्रवादी नंगई दिखाई है वह शर्मनाक है।ये सारी चीजें हम सबके लिए बार-बार आगाह कर रही हैं कि देश को हमारी जनता ने कितने खतरनाक लोगों के हाथों में सौंप दिया है.इससे एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि टीवी न्यूज चैनल समाचार देने के लक्ष्य से काफी दूर जा चुके हैं।जो लोग मोदी के हाथों में देश को सुरक्षित देख रहे थे ,वे भी चिन्तित हैं कि किस कम-अक्ल नेता के पल्ले पड़े हैं !

सवाल किए जा रहे है आप सर्जीकल स्ट्राइक के पक्ष में हैं ॽआप इसका स्वागत करते हैं ॽमेरा मानना है ये दोनों ही सवाल बेतुके और गलत मंशा से प्रेरित हैं। लेखकों-बुद्धिजीवियों और अमनपसंद जनता कभी भी इस तरह के सवालों को पसंद नहीं करती।लेखक के नाते हम सब समय जनता के साथ हैं और शांति के पक्ष में हैं।हमारे लिए राष्ट्र,राष्ट्रवाद,सेना आदि से शांति का दर्जा बहुत ऊपर हैं।जेनुइन लेखक कभी भी सेना ,सरकार और युद्ध के साथ नहीं रहे।जेनुइन लेखकों ने हर अवस्था में आतंकियों और साम्प्रदायिक ताकतों का जमकर विरोध किया।सिर्फ भाड़े के कलमघिस्सु ही युद्ध और उन्माद के पक्ष में हैं ।

जेनुइन लेखक की चिन्ताएं सत्य और शांति के साथ जुड़ी हैं,इस सत्य को फेसबुक और मीडिया में सक्रिय मतांधों की भीड़ नहीं समझ सकती। दिलचस्प पहलू यह है टीवी मीडिया इन मतांधों को व्यापक और अहर्निश कवरेज दे रहा है इसने देश में शांति के वातावरण को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त किया है। टीवी न्यूज चैनल और मोदी के अंधभक्त,जिनमें पेड नेटदल भी शामिल है,उनकी विगत तीन साल से यह कोशिश है कि हर हालत में अशान्ति बनाए रखी जाय,दुखद बात यह है केन्द्र सरकार भी इन मतांधों के इशारों पर हरकतें कर रही है। केन्द्र सरकार के मंत्री भी मतांधों की तरह बोल रहे हैं।

भारत-पाक के बीच के तनाव में हम सब यही चाहते हैं कि शान्ति हर हाल में बहाल हो।लेकिन संघ परिवार यह चाहता है कि अशान्ति बनाए रखी जाय।इसके लिए पाक विरोधी घृणा पैदा करने के लिए संघ के प्रचारतंत्र के जरिए रोज नए मुद्दे छोड़े जा रहे हैं ,इन मुद्दों को नियोजित ढ़ंग से टीवी न्यूज चैनलों से प्राइम टाइम में प्रक्षेपित किया जा रहा है,अधिकांश टीवी चैनलों के टॉक टाइम की ठेके पर खरीददारी हो चुकी है,हर चैनल संघी झूठ का बेहतरीन प्रस्तोता बनने की होड़ में लगा है।संघी प्रचारतंत्र का इस तरह इलैक्ट्रोनिकतंत्र खड़ा कर दिया गया है ।हम सबके लिए यह गंभीर चुनौती है।हमने कभी सोचा ही नहीं था कि टीवी न्यूज चैनल इस तरह संघी प्रचारतंत्र का अंग बनकर अहर्निश आम जनता के ऊपर हमले करेंगे,शांति के पक्षधरो पर हमले करेंगे.जनता के ऊपर ये हमले सभी किस्म के संचार के नियमों और संहिताओं को तोड़कर किए जा रहे हैं।कायदे से टीवी न्यूज चैनलों के इस तरह के रवैय्ये के खिलाफ संयुक्त भाव से लेखकों-बुद्धिजीवियों और मीडियाकर्मियों को एकजुट होकर प्रतिवाद करना चाहिए।आम जनता में रोज इन चैनलों को बेनकाब करना चाहिए।राज्यों से लेकर जिलों तक न्यूज चैनलों के खिलाफ कन्वेंशन और सभाएं आयोजित की जानी चाहिए।आम जमता को इन न्यूज चैनलों की हरकतों के खिलाफ सचेत करने और गोलबंद करने की सख्त जरूरत है।आज माध्यम साक्षरता को प्रधान एजेण्डा बनाने की जरूरत है।

भारत-पाक में सामान्य संबंध कैसे बहाल हों इस पर सरकार सोचे,लेकिन दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही देशों में सरकारें उन्मादियों,आतंकियों और साम्प्रदायिक ताकतों के हाथों में हैं।ये लोग अमेरिका के पिछलग्गू हैं।अमेरिका चाहता है भारत और उसके आसपास के मुल्कों में मित्रतापूर्ण वातावरण खत्म हो जाय।संयोग से दोनों सरकारें सचेत रूप से भारतीय उपमहाद्वीप का माहौल बिगाडने में लगी हैं।



लेखकों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे मोदी सरकार और सेना के साथ खड़े हों।लेखकों की जिम्मेदारी है वे आम जनता के साथ खड़े हों।भारतीय उपमहाद्वीप की जनता के साथ खड़े हों।उन तमाम प्रयासों का समर्थन करें जिनसे इस उपमहाद्वीप में शांति बहाल करने में मदद मिले।सेना आतंकियों को मारे,देश की सीमाओं की रक्षा करे,यह उसका नियमित काम है।इसके लिए सेना की जय हो जय हो करने की जरूरत नहीं है।मसलन्,मैं एक शिक्षक हूँ,नियमित कक्षा में जाकर पढाना मेरी नौकरी का हिस्सा है,मैं यह काम करके कोई महान् कार्य नहीं करता,इसके लिए मेरी प्रशंसा नहीं होनी चाहिए।इसी तरह सेना का काम है सीमाओं की चौकसी करना,शांति बहाल रखना,आतंकियों के हमलों को विफल करना,सेना यह काम करती रही है।सेना ने पहले भी अनेक बार सर्जीकल स्ट्राइक की हैं।यह विशिष्ट किस्म की हमलावर कार्रवाई है,लेकिन इसके लिए युद्धोन्माद की कोई जरूरत नहीं है।भारत की शांतिपसंद जनता,धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों,जेएनयू,जादवपुर,हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्रों पर वैचारिक हमले करने की कोई जरूरत नहीं है।कल मैं जब टाइम्स नाउ देख रहा था तो अर्णव गोस्वामी को मैंने देश के शांतिपसंद लोगों पर हमले करते पाया,जेएनयू आदि पर हमले करते हुए पाया,इस तरह के हमले बताते हैं कि आरएसएस के लोग अंदर तक कितने बर्बर हो चुके हैं और दिमागी तौर पर दिवालिया हो चुके हैं,अर्णव गोस्वमी जब मतांधों की तरह बोलता है तो वह वस्तुतःवही कह रहा होता है जो आरएसएस के लोग उसे बोलने के लिए कहते हैं,वह तो बेचारा संघ का भोंपू है,उसके जरिए आप संघ की प्रचार प्रणाली,राष्ट्रविरोधी प्रचार सामग्री को सहज ही देख सकते हैं।हो सकता है इतने दिनों तक संघ के इशारों पर नाचते-नाचते वह स्वाभाविक तौर पर मतांध हो गया हो !

रविवार, 25 सितंबर 2016

युद्ध का मतलब है राजनीतिक पराभव !

      कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब कोझीकोड में बोल रहे थे तो उनके चेहरे पर चिन्ताएं साफ नजर आ रही थीं,उनकी स्वाभाविक मुस्कान गायब थी,उनके ऊपर मीडिया का उन्मादी दवाब है।यह उन्मादी दवाब और किसी ने नहीं उनकी ढोल पार्टी ने ही पैदा किया है।इसे स्वनिर्मित मीडिया कैद भी कह सकते हैं। यह सच है कि भारत ने आतंकियों के उडी में हुए हमले में अपने 18बेहतरीन सैनिकों को खोया है।ये सैनिक न मारे जाते तब भी मीडिया उन्माद रहता।क्योंकि मोदी सरकार के पास विकास की कोई योजना नहीं है,उनकी सरकार को ढाई साल होने को आए वे अभी तक आम जनता को यह विश्वास नहीं दिला पाए हैं कि वे अच्छे प्रशासक हैं।अच्छे प्रशासक का मतलब अपने मंत्रियों में आतंक पैदा करना नहीं है,उनके अधिकार छीनकर पंगु बनाना नहीं है।मोदी ने सत्ता संभालते ही सभी मंत्रियों को अधिकारहीन बनाकर सबसे घटिया प्रशासक का परिचय दिया और आरंभ में ही साफ कर दिया कि वे एक बदनाम प्रधानमंत्री के रूप में ही सत्ता के गलियारों में जाने जाएंगे।

मैंने आज तक एक भी ऐसा अफसर नहीं देखा जो उनकी कार्यशैली की प्रशंसा करता हो।उनकी कार्यशैली ने चमचाशाही पैदा की है।नौकरशाहों में वफादारों की भीड़ पैदा की है लेकिन ईमानदार नौकरशाह मोदीजी से दूर रहना ही पसंद करते हैं। बाबा नागार्जुन के शब्दों को उधार लेकर कहूँ तो मोदी जी की विशेषता है ´तानाशाही तामझाम है लोकतंत्र का नारा।´यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें हमें कश्मीर समस्या और पाक तनाव को देखने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जानते हैं कि युद्ध के बाद कोई प्रधानमंत्री भारतीय राजनीति में साबुत नहीं बचा है।सन् 1962 के बाद नेहरू की वह इमेज नहीं रही जो पहले थी,सन्1965 के युद्ध के बाद लाल बहादुर शास्त्रीजी टूट गए,कांग्रेस पूरी तरह कमजोर हो गयी,सन् 1971 में पाक को पराजित करके बंगलादेश बनाकर श्रीमती इंदिरा गांधी की आम जनता में सारी इमेज चंद सालों में ही भ्रष्टनेता की होकर रह गयी और बाबू जयप्रकाशनारायण,मोरारजी देसाई के हाथों उनको बिहार और गुजरात के साथ देश में मुँह की खानी पड़ी,स्थिति यहां तक बदतर हो गयी कि उनको अपनी रक्षा के लिए आपातकाल लगाना पड़ा।सन् 1971 की विजय के बाद इंदिरा गांधी और कांग्रेस वही नहीं रहे जो 1971 के पहले थे।कांग्रेस बुरी तरह टूटी ,देशभर में हारी।यही हाल कारगिल युद्ध में जीत के बाद भाजपा का हुआ,अटलजी को इस विजय के बाद हम देख नहीं पाए हैं।भाजपा के सारे ढोल-नगाड़े पराजय में बदल गए मनमोहन सिंह नए प्रधानमंत्री के रूप में सामने आए।कहने का अर्थ यह है कि युद्ध के बाद कोई भी पार्टी विजेता नहीं रही,सन् 1971 जैसी जीत किसी को नहीं मिली,लेकिन आपातकाल जैसा बदनाम कदम भी किसी और ने नहीं इंदिरा गांधी ने ही उठाया,आम जनता से सबसे ज्यादा कांग्रेस 1971 के बाद ही कटनी शुरू हुई है उसके बाद वह कभी टिकाऊ ढ़ंग से आम जनता में अपनी जड़ें नहीं बना पायी।

कहने का आशय यह कि युद्ध किसी का मित्र नहीं होता।युद्ध में कोई विजेता नहीं होता,युद्ध में कोई नायक नहीं होता।अमेरिका में देखें,इराक को तहस-नहस करने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश के बारे में सोचें उनकी पार्टी इराक युद्ध के बाद लौट नहीं पाई जबकि इराक को वे जीत लिए,अफगानिस्तान को रौंद दिए।इन दो युद्धों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह कंगाल कर दिया।इराक युद्ध के बाद अमेरिका में सबसे ज्यादा किसी से जनता यदि घृणा करती थी तो वे थे राष्ट्रपति जार्ज बुश।

चूंकि आरएसएस के लोगों का नायक हिटलर है तो देखें द्वितीय विश्वयुद्ध ने हिटलर की सारी दुनिया में किस तरह की इमेज बनायी ॽसबसे ज्यादा घृणा किए जाने वाले नेता के रूप में सारी दुनिया हिटलर को याद करती है ।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संभवतःयह सब जानते हैं कि सन् 1962,1965,1971 और अंत में कारगिल युद्ध ने तत्कालीन नेताओं को खैरात में जनाक्रोश दिया।कम से कम जनाक्रोश की कीमत पर पाक से युद्ध करना मोदीजी पसंद नहीं करेंगे।महत्वपूर्ण यह नहीं है कि युद्ध में कौन जीतेगा,महत्वपूर्ण यह है कि युद्ध के बाद नेता ,देश और भाजपा का क्या होगा ॽ युद्ध यदि होता है तो यह तय है भारत जीतेगा,लेकिन मोदी-भाजपा आम जनता में हार जाएंगे।

मैं हाल ही में कारगिल गया था वहां लोगों से मिला,बड़ी संख्या में कारगिल युद्ध के चश्मदीद गवाहों से भी मिला,कारगिल की गरीबी और बदहाल अवस्था से सब लोग परेशान हैं।कारगिल युद्ध जीतकर भी वहां की आम जनता के दिलों में हमारे नेता अपने लिए वह स्थान नहीं बना पाए जो होना चाहिए। कारगिल का इलाका बेहद गरीब है।विगत 76दिनों से कश्मीर में कर्फ्यू लगे होने के कारण वहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो गयी है। पर्यटन ही वहां रोटी-रोजी का एकमात्र सहारा है।जो लोग कश्मीर में कर्फ्यू लगाकर खुश हैं वे कश्मीर की जनता को तो कष्ट दे ही रहे हैं,कारगिल और लद्दाख की जनता को भी तकलीफ दे रहे हैं।

आज की स्थिति में यदि युद्ध होता है तो कश्मीर-कारगिल-लेह-लद्दाख की जनता हमारी सेना के साथ खड़ी होगी इसमें संदेह है।हम सब जानते हैं कि हमने कारगिल युद्ध सिर्फ अपनी सेना के बल पर नहीं जीता,बल्कि कारगिल-लद्धाख की जनता की मदद से वह युद्ध जीता गया।



मीडिया में जो लोग युद्ध करो,पाक पर हमला करो,आतंकी ठिकानों पर हमले करो आदि सुझाव दे रहे हैं वे नहीं जानते या फिर जान-बूझकर सच्चाई को छिपा रहे हैं।कश्मीर का इलाका अशांत रखकर ,आम जनता को घरों में कैद करके भारतीय सेना के बलबूते पर कभी भी सफलता नहीं मिल सकती।हमें ध्यान रखना होगा कि कारगिल युद्ध के समय कारगिल की खास जनजातियों की मदद के बाद ही हम कारगिल युद्ध में विजय हासिल कर पाए थे।उस समय कारगिल में जनता हमारे साथ थी।आज स्थिति एकदम विपरीत है।विगत76दिनों से कश्मीर-कारगिल-लेह-लद्दाख की जनता बेहद परेशान है और उसके मन में केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के खिलाफ जबर्दस्त गुस्सा है।जनता को विरोध में करके कोई देश युद्ध नहीं जीत पाया है।

शनिवार, 17 सितंबर 2016

कश्मीर पर मैनस्ट्रीम मीडिया और बुद्धिजीवी चुप क्यों हैं ॽ


        कश्मीर में कर्फ्यू लगे 70 दिन हो गए। अब 85 लोग मारे जा चुके हैं।लेकिन हमें नहीं मालूम कि वहां क्या हो रहा है,हमारे देश के बुद्धिजीवियों को भी इससे कोई परेशानी नजर नहीं आ रही,किसी भी लेखक संघ ने प्रतिवाद करते हुए आवाज बुलंद नहीं की है,समझ में नहीं आ रहा कि प्रगतिशील लेखक संघ ,जनवादी लेखक संघ आदि संगठनों में कश्मीर को लेकर चुप्पी क्यों है ॽ कश्मीर की पीड़ा हमें तकलीफ क्यों नहीं देती ॽक्या उत्तर प्रदेश या बिहार में दो महिने तक कर्फ्यू लगा रहे तो हम सब इसी तरह चुप बैठे रहते ॽ मुझे बेहद झल्लाहट हो रही है कि हमारे तमाम बेहतरीन बुद्धिजीवी और मानवाधिकार संगठन कश्मीर के मसले पर राष्ट्रीय स्तर पर कोई मुहिम अभी तक क्यों नहीं छेड़ पाए ॽ
          मैं जब कश्मीर में कुछ समय पहले वहां घूमते हुए कश्मीर के बुद्धिजीवियों-लेखकों-रंगकर्मियों और आम लोगों से बातें कर रहा था तो एक बात सबने कही कि आरएसएस और मीडिया के कश्मीर विरोधी अभियान ने कश्मीर को लंबे समय से मुख्यधारा से अलग-थलग कर रखा है।आम कश्मीरी के सुख-दुख को देस के बाकी हिस्से में रहने वाले लोग नहीं जानते ,और न मीडिया बताना चाहता है।सबसे पीड़ादायक रूख केन्द्र सरकार का है,वह एक कदम आगे बढ़कर पृथकतावादियों को बातचीत के लिए अभी तक राजी नहीं कर पायी है।इसका दुष्परिणाम यह निकला है कि आम जनता बुरी तरह से परेशान होकर रह गयी है। आम कश्मीरी अमन-चैन की जिन्दगी जीना चाहता है,लेकिन मोदी सरकार और पृथकतावादी मिलकर आम जनता को अमन के साथ रहने नहीं देना चाहते।
             हम जानना चाहते हैं कि कश्मीर के पृथकतावादी नेता और हुर्रियत (जी) के अध्यक्ष सईद अली जिलानी ने 26अगस्त2016 को जो पत्र सेना के अधिकारियों को लिखा था उस पर केन्द्र सरकार ने कोई जवाब दिया कि नहीं ॽमीडिया में उस पत्र को लेकर मोदी सरकार के रूख का कहीं कोई जिक्र नजर नहीं आता।जिलानी ने अपने पत्र में आरोप लगाया है कि सेना की कार्रवाई से अब तक कश्मीर में एक लाख लोग मारे गए हैं,दस हजार लोग गायब हैं और साठ हजार बच्चे अनाथ हो गए हैं।कम से कम इन आंकड़ों के बारे में तथ्यपूर्ण खंडन केन्द्र सरकार को जरूर देना चाहिए।वरना यही समझा जाएगा कि जिलानी सही कह रहे हैं। जिलानी का यह पत्र अनेक मामलों में बेहद खतरनाक मंशाओं से भरा हुआ है।इन मंशाओं में सबसे खतरनाक मंशा है आम कश्मीरी को दिमागी तौर पर भारत से मुक्त कर देना।
                    केन्द्र सरकार की हरकतों और पृथकतावादियों की चालों में विलक्षण साम्य है,वे जाने-अनजाने एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम कर रहे हैं।कश्मीर में इतने लंबे समय से कर्फ्यू के लगे रहने से पृथकतावादियों को अपने मंसूबे पूरे करने में मदद मिली है।विगत कई सालों में आम कश्मीरी मुख्यधारा में लौटा था,राज्य में शांति लौटी थी लेकिन मोदी सरकार ने बुरहान वानी की हत्या करके समूची कश्मीरी जनता को पृथकतावादियों और सेना के रहमो-करम पर जीने के लिए छोड़ दिया।दो साल पहले कश्मीर में लोकतंत्र था,शांति थी,चुनाव हुए थे,सामान्य जीवन चल रहा था,लेकिन विगत दो महिने में सबकुछ बुनियादी तौर पर बदल गया ।आज आम कश्मीरी जहां एक ओर आतंकियों-पृथकतावादियों से नफरत करता है वहीं वह भारत सरकार से भी नफरत करने लगा है।मोदी सरकार ने राजनीतिक पहल न करके कश्मीर की जनता को पूरी तरह हुर्रियत और दूसरे पृथकतावादी संगठनों के हवाले कर दिया है।जबकि जरूरत यह है कि आम जनता को आतंकियों-पृथकतावादियों से अलग-थलग किया जाए।हजारों करोड़ रूपये का आर्थिक नुकसान झेलने के बाद जम्मू-कश्मीर बहुत जल्दी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाएगा। हमारे नीति निर्माता कहीं न कहीं यह सोचकर चल रहे हैं कि कश्मीरी जनता की आर्थिक तौर पर कमर तोड़ देंगे तो वह सीधे रास्ते पर आ जाएगी।यह धारणा गलत है।यह सोचना भी गलत है कि कश्मीरियों को उत्पीडित करके वहां शांति स्थापित हो जाएगी,पाक का असर कम हो जाएगा,आतंकियों का असर कम हो जाएगा।
           मोदी सरकार मूलतःकश्मीरी जनता के प्रति हृदयहीन भाव से पेश आ रही है।यह हृदयहीनता उनको विरासत में आरएसएस और अमेरिका से मिली है।इस हृदयहीनता का लक्ष्य है आमलोगों के दिलों में दरारें पैदा करना।आम लोगों के अंदर लोकतंत्र के प्रति नफरत गहरी करना।







शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

कश्मीर में युवाओं के हाथ में पत्थर क्यों हैं ॽ

       
श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में जाइए और आम लोगों से बातें कीजिए,अधिकतर लोग आतंकियों के खिलाफ हैं,वे बार -बार एक ही सवाल कर रहे हैं कश्मीर में इतनी सेना –सीमा सुरक्षा बलों की टुकड़ियां चप्पे-चप्पे पर क्यों तैनात हैं ॽ हमने क्या अपराध किया है ॽवे यह भी कहते हैं अधिकांश जनता आतंकियों की विरोधी है,पृथकतावादियों के साथ नहीं है।सामान्य लोगों से बातें करते हुए आपको यही लगेगा कि कश्मीर के लोग सामान्य जिन्दगी जीना चाहते हैं।वे यह भी कहते हैं निहित स्वार्थी लोगों ने कश्मीर का मसला बनाकर रखा हुआ है,ज्योंही सामान्य स्थिति होने को आती है कोई छोटी सी घटना होती है और आम लोगों के घरों पर सेना-पुलिस के छापे पड़ने शुरू हो जाते हैं।

मैं जब डाउनटाउन की प्रसिद्ध हमदान मसजिद को देखने पहुँचा तो वहां पर एकदम भिन्न माहौल था, लोग वहां प्रार्थना करने आ-जा रहे थे। बहुत ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी।हमदान मसजिद इस शहर की सबसे बेहतरीन मसजिद है।इसका इतिहास भी है,उसे लेकर अनेक विवाद भी हैं।इस मसजिद में बैठे रहने वाले लोगों से जब बातें कीं तो पता चला कि वे विकास पर बातें करना चाहते हैं।उनका मानना है कश्मीर को अमन-चैन चाहिए।जो भी विवाद हो,वो बातचीत से हल हो,वे खून-खराबे के खिलाफ हैं।मसजिद के अहाते में केन्द्रीय सुरक्षाबल के कमांडो एके47 के साथ पहरा दे रहे थे.हमने इन जवानों से पूछा क्या मसजिद में कोई खतरा है ॽ वे बोले कोई खतरा नहीं है।मसजिद के पास ही एक छोटा सा घाट है जिस पर जाना इन दिनों प्रतिबन्धित है।वहां एक जगह दीवार पर सिन्दूर के पूजा के निशान बने हुए हैं,एक जमाने में उस स्थान पर लोग पूजा करने जाते थे।यह वह जगह है जहां कभी पुराने जमाने में हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराकर जनेऊ जलाए गए ,मैंने बहुत कोशिश की जनेऊ जलाने की बात के प्रमाण जुटा सकूँ लेकिन मैं प्रमाण नहीं जुटा पाया।लेकिन यह तो सच है कि बड़ी संख्या में हिन्दुओं ने धर्म परिवर्तन करके एक जमाने में इस्लाम धर्म स्वीकार किया था,यह मध्यकाल में हुआ था।

मध्यकाल के धर्म परिवर्तन के सवालों और घटनाओं को आधुनिककाल में उठाकर साम्प्रदायिक घृणा फैलाने का काम संघ के संगठन करता रहा है।यह सच है आज भी कश्मीर में ऐसे मुसलमानों की संख्या बहुत बड़ी है जो पहले हिन्दू थे और बाद में धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बन गए,इन मुसलमानों के नाम का पहला नाम मुसलिम है और अंत में हिन्दू जाति लिखी मिलती है,जैसे ,मुश्ताक रैना।

हमदान मसजिद के ठीक सामने सफेद मसजिद है,जो सफेद संगमरमर के पत्थरों की बनी है।इन दोनों के बीच में झेलम वह रही है।दोनों ही मसजिदों का इतिहास और उनके साथ जुड़ी राजनीतिक कहानियां अलग अलग हैं। मैं दोनों मसजिदों में गया।हमदान मसजिद में तुलनात्मक तौर ज्यादा लोग आ जा रहे थे,सफेद मसजिद में सन्नाटा पसरा हुआ था।इस सन्नाटे का कारण मैं अभी तक समझ नहीं पाया। दोनों ऐतिहासिक मसजिद हैं लेकिन एक में आने-जाने वाले लोगों का प्रवाह बना हुआ है,दूसरे में इक्का-दुक्का लोग दिखे।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से हमें स्थानीय मुसलिम समाज की कई परतें नजर आती हैं।हमदान मसजिद में आने वाले तुलनात्मक तौर परंपरागत,रूढ़िवादी मान्यताओं में विश्वास करने वाले लोग हैं वहीं सफेद मसजिद में आने वाले उदार-धर्मनिरपेक्ष मुसलमान हैं।यह संख्या उस मनोदशा में बदलाव का संकेत है जो कश्मीर में जमीनी स्तर पर दिख रही है।

कश्मीर में आतंकियों-पृथकतावादियों का व्यापक दवाब है कि मुसलिम युवा फंडामेंटलिज्म की ओर आएं लेकिन अधिकतर युवाओं में इस्लाम के रूढ़िगत रूपों,मूल्यों और संस्कारों को लेकर अरूचि साफ नजर आई। इस अरूचि को मुसलिम युवाओं के आधुनिक ड्रेससेंस,बालों की कटिंग आदि में सहज ही देख सकते हैं। मैं कईबार हमदान मसजिद गया,सफेद मसजिद भी गया।लेकिन वहां युवा नजर नहीं आए।वयस्क औरतें ज्यादा दिखाई दीं।सफेद मसजिद में तो सन्नाटा पसरा हुआ था।इससे एक बात का अंदाजा जरूर लगता है युवाओं में इस्लाम धर्म के प्रति रूझान कम हुआ है।शिक्षित मुसलिम युवाओं में उदार पूंजीवादी मूल्यों के प्रति आकर्षण बढा है। वे कश्मीर की आजादी के सवाल पर कम और अपनी बेकारी की समस्या,कैरियर की समस्याओं पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

अधिकांश कश्मीरी युवाओं में मुख्यधारा के मीडिया के प्रति गहरी नफरत है,उनका मानना है कश्मीरी युवाओं को सुनियोजित ढ़ंग से आतंकी और पत्थरबाज के रूप में पेश किया जा रहा है।कुछ सौ पत्थरबाजों या पृथकतावाद समर्थकों को सभी कश्मीरी युवाओं के प्रतिनिधि या आवाज के रूप में पेश किया जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि मैं कश्मीर विश्वविद्यालय में अनेक छात्रों से मिला,डाउनटाउन में भी अनेक युवाओं से अचानक रूककर बातें कीं,सभी ने कहा कि पत्थर चलाने वालों में वे कभी शामिल नहीं रहे।सभी उम्र के युवा कश्मीर में चल रहे मौजूदा तनावपूर्ण माहौल के कारण शिक्षा संस्थानों,खासकर स्कूल-कॉलेजों में फैल रही अव्यवस्था और अकादमिक क्षति को लेकर सबसे ज्यादा चिन्तित मिले।

युवाओं का मानना है कश्मीर के मौजूदा हालात ने समूचे शिक्षातंत्र को तोड़ दिया है।ज्यों ही कोई घटना होती है तो इलाके में बीएसएफ,सीआरपीएफ और सेना की टुकड़ियां आ जाती हैं और वे तुरंत स्कूलों-कॉलेजों की इमारतों पर कब्जा कर लेती हैं।इससे लंबे समय तक पढ़ाई-लिखाई बंद हो जाती है। सन् 1990-91 में जिस तरह के हालात पैदा हुए उससे समूचा शिक्षातंत्र टूट गया ।

फिलहाल श्रीनगर में अर्द्ध सैन्यबलों ने 20 स्कूलों की इमारतों को कब्जे में लिया हुआ है।स्कूलों पर कब्जा करके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ढ़ंग से बच्चों को आतंकित करने की कोशिश की जाती है।इसका बच्चों की मनोदशा पर बुरा असर पड़ रहा है।बच्चों में सैन्यबलों के प्रति घृणा बढ़ने का यह बहुत बड़ा कारण है। कायदे से सरकार को स्कूलों की इमारतों का इस तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मुश्किल यह है कि सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद भी लंबे समय तक स्कूल की इमारतों पर अर्द्ध सैन्यबलों का कब्जा बना रहता है,शहर में सामान्य हालात पैदा हो जाते हैं लेकिन स्कूल नहीं खुलते।इस क्रम में जहां एक ओर स्कूल का फर्नीचर आदि नष्ट हो जाता है वहीं दूसरी ओर छात्र पढाई में पिछड़ जाते हैं और पुलिस वाले उनको आतंकित करते रहते हैं। स्कूलों में सैन्य बलों की मौजूदगी से वहां काम करने वाले कर्मचारियों को भी अनगिनत परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इस समय हम सबकी आंखों में कश्मीर के जिस युवा की इमेज है यह वह युवा है जिसे मुंबईया सिनेमा और न्यूज टीवी चैनलों ने बनाया है।इसका जमीनी हकीकत से कोई संबंध नहीं है।जेएनयू के 9फरवरी के प्रसंग के बाद टीवी चैनलों ने कश्मीरी युवाओं के बारे में जिस तरह की घृणित इमेज वर्षा की है और जिस तरह सोशल मीडिया के जरिए प्रचार अभियान चलाया गया उसने असली कश्मीरी युवावर्ग को हम सबकी चेतना से खदेड़कर बाहर कर दिया है। इस इमेज वर्षा ने जहां एक ओर कश्मीरी युवाओं के प्रति पूर्वाग्रह बनाए हैं वहीं उनको आतंकी-पृथकतावादी और भारत विरोधी बनाकर पेश किया है।

कश्मीर से आ रही इमेजों में कश्मीरी जनता और युवाओं का दुख-दर्द एकसिरे से गायब है।इसमें इस्लामिक उन्माद,भारत विरोधी उन्माद,सेना की कुर्बानी आदि का स्टीरियोटाइप अहर्निश प्रक्षेपित किया गया है,इस तरह की टीवी प्रस्तुतियां शुद्ध निर्मित यथार्थ का अंग हैं।कश्मीर की इमेजों में सैन्यबलों को भारत के रक्षक,भारत विरोधी ताकतों को कुचलने वाले के रूप में पेश किया गया है वहीं दूसरी ओर कश्मीर की जनता को आतंकी,देशविरोधी,राष्ट्रविरोधी करार दे दिया गया है। जो लोग प्रतिवाद कर रहे हैं उनको टीवी तुरंत आतंकी-समर्थक घोषित कर रहा है,टीवी वाले जानना नहीं चाहते कि आखिर कश्मीर में जनता किस मसले पर प्रतिवाद कर रही है।वे जनता के पास नहीं जा रहे,वे कश्मीर के मुहल्लों-गांवों और शहरों में नहीं जा रहे,वे सीधे फोटो लगा रहे हैं और स्टूडियो में बैठे बैठे जनता को आतंकियों का हमदर्द घोषित कर रहे हैं। सबसे त्रासद पहलू यह है कि कोई भी व्यक्ति यदि टीवी टॉक शो में कश्मीरी जनता की समस्यों की ओर ध्यान खींचने की कोशिश करे या फिर कश्मीर में विभिन्न तबके के द्वारा उठायी जा रही राजनीतिक मांगों में से किसी मांग का ज्योंही जिक्र करता है तुरंत उस पर हमले शुरू हो जाते हैं,यह वस्तुतः टीवी फासिज्म है।

हाल ही में मंगलवार को श्रीनगर प्रशासन ने पांच टीवी न्यूज चैनलों का प्रसारण कश्मीर में बंद करने का आदेश दिया है,प्रशासन का मानना है इन चैनलों के प्रसारण से कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही है।ये चैनल हैं- केबीसी, गुलिस्तां टीवी, मुंसिफ टीवी, जेके चैनल,इंसाफ टीवी। केबल ऑपरेटरों को इन चैनलों का प्रसारण रोकने के लिए कहा गया है।



गुरुवार, 1 सितंबर 2016

मिथ और अफवाहों में कश्मीर नहीं दिखेगा

           
             कश्मीर को लेकर सारी बहस अफवाहों से चल रही है, कश्मीरियों और कश्मीरी समाज को हम कम जानते हैं,कश्मीर की राजनीति को कम जानते हैं। हमारी कश्मीर संबंधी अज्ञानता का इन दिनों सबसे ज्यादा दुरूपयोग हो रहा है। कम जानकारी का सबसे ज्यादा दुरूपयोग मीडिया और सोशलमीडिया कर रहा है।खासकर साम्प्रदायिक-आतंकी ताकतें आम जनता की कम जानकारी का खुलकर दुरूपयोग कर रही हैं।कश्मीरी लोग कैसे होते हैं ॽउनका मिजाज कैसा होता है ॽकश्मीर में आमतौर पर स्त्री-पुरूष किस तरह से बातें करते हैं,किस तरह जीवन-यापन करते हैं,उनकी संस्कृति क्या है ॽइत्यादि सवालों पर हमने कभी गौर ही नहीं किया।वे अपनी सामान्य भाषा में,राजनीतिक विमर्श में जिन पदबंधों का इस्तेमाल करते हैं,उन पदबंधों को हम सही अर्थ और स्प्रिट में ग्रहण ही नहीं करते।यह बात वहां लोगों से मिलते हुए बार-बार महसूस हुई।

मैं जब श्रीनगर के पुराने शहर यानी डाउनटाउन इलाके के अंदर के मुहल्लों में दाखिल हुआ तो नजारा एकदम वैसा था जैसा मथुरा के पुराने बाजार और मुहल्लों का हुआ करता है।पुराने मकान,पुराने दरवाजे,पुरानी गलियां,पुराने बिना प्रेस किए कपडे पहने हुए लोग,चूंकि गर्मियों में वहां घूम रहे थे तो सामान्यतौर पर लोग-बाग सूती ड्रेस में ही मिले।पुराने शहर के बाजारों में वही मथुरा जैसी अनौपचारिकता, उसी तरह आवाज देकर बोलने ,टिप्पणी करने की आदत,औरतें बाजारों में खरीददारी करते हुए,जो लड़का मेरा गाइड था,वह बेहद सुंदर,मधुरभाषी,स्मार्ट,शिक्षित स्नातक था,दिल से बातें करने वाला,किस्सा-गो,हंसमुख।कश्मीर के जन-जीवन से करीब से वाकिफ।वह लेह-लद्दाख से ही हमारे साथ था। अहर्निश बोलने वाला,तरह-तरह की बातें करने में माहिर,जिंदादिल ! उसके समूचे आचरण और बात करने की शैली ने हमें गहरे प्रभावित किया।वह सुबह से शाम तक हमारी मदद के लिए हर समय तैयार रहता,कभी अपनी निजी गाड़ी के साथ कभी टैक्सी के साथ,सुबह आता और रात को डिनर कराकर वापस लौटता।हमने उसे कोई पैसा नहीं दिया उसके व्यवहार और आचरण ने इस कदर प्रभावित किया कि हम भूल ही गए कि वह गाइड है।उसको एकबार कुछ भी पूछते थे तो वो लगातार विभिन्न तरीकों से हमें समझाता रहता ,बताता रहता। कश्मीर के लोग कैसे हैं और उनका दिल कैसा है यह मैंने गाइड की आंखों से ही सबसे पहले जाना।

एक दिन मैंने उससे कहा गुलमर्ग जाएंगे,बोला कल चलते हैं,सुबह वह गाड़ी लेकर हाजिर हो गया।मैंने पूछा किसकी गाड़ी है यह,बोला मेरी है।मैंने कहा तब मैं नहीं जाऊँगा।बोला क्यों ॽ मैंने कहा तुम गाड़ी का भाड़ा नहीं लेते ,भाड़ा लोगे तो हम इस गाड़ी में जाएंगे ॽकुछ देर बातें करने के बाद वो राजी हो गया, मैंने भाड़ा तय नहीं किया, वह खुद ड्राइव करके हमें गुलमर्ग ले गया,गुलमर्ग ले जाने के पहले वह गुलमर्ग में राइड की टिकट खुद ही बुक कराकर ले आया।दिलचस्प बात थी कि वह भी नहीं जानता था कि वहां राइड में क्या मुसीबत आ सकती है। हम गुलमर्ग में अंत में उस स्थान पर पहुंचे जहां से राइड के लिए उड़न खटोले (गंडोला) में बैठकर ऊँची पर्वतीय चोटी पर जाना था,अंदर गए तो देखा बहुत लंबी लाइन है,उडन खटोले में सवार होने में कम से कम तीन घंटे लग सकते हैं, गाइड हमें उडन खटोले के लिए लाइन में लगाकर कहीं गायब हो गया, मैं लाइन खड़े हुए परेशान हो रहा था,मेरे आगे-पीछे बड़ी संख्या गुजराती मध्यवर्गीय पर्यटक लाइन लगाकर खड़े थे,इनमें औरतों की संख्या बहुत थी,उनमें मुसलिम औरतें भी थीं और गुजराती औरतें भी थीं,मेरे ठीक आगे एक गुजराती औरत खड़ी थी उसके साथ पूरा परिवार था,उसका पति और देवर कहीं बाहर लाइन तोड़कर उडन खटोले में नियमभंग करके चढ़ने की जुगाड़ में व्यस्त था।बीच-बीच में दलाल किस्म के लोग आकर टिकटें बेच रहे थे और लाइन तोड़कर उडन खटोले में चढ़ाने की व्यवस्था करा रहे थे, वहां खुला करप्शन चल रहा था,दलालों को पैसा दो वे तुरंत उड़ने खटोले में चढ़ा देते थे,उन्हीं दलालों में किली दलाल को गुजराती परिवार के पुरूष ने पटाया और सौदा हो गया,मेरे ठीक आगे खड़ी महिला बोली भाई साहब मैं जा रही हूँ,मैंने मुसकराकर इशारे से ही कहा जाओ।मेरे पीछे मुसलिम महिला थी,उसका परिवार था।गुजराती महिला गयी और 10 मिनट बाद झल्लाती हुई लौट आयी,संभवतः दलाल से उनका सौदा नहीं पटा,दलाल पैसे कुछ ज्यादा मांग रहा था।गुजराती महिला ने मेरे आगे लाइन में खड़े होने की अनुमति मांगी मैंने उसे खड़े होने दिया,मेरे पीछे जो मुसलिम महिला खड़ी थी उसने आपत्ति प्रकट की और उससे कहा कि वह लाइन में पीछे जाकर खड़ी हो जाय,गुजराती महिला नहीं मानी और उसने तड़ातड़ गंदी गंदी भाषा में बोलना शुरू कर दिया।मैं परेशान था,आगे-पीछे से दो औरतें खुलकर भाषा में भदेस होती जा रही थीं,मैंने पीछे खड़ी मुसलिम महिला से कहा कि ये महिला मेरे आगे ही खड़ी थीं आप काहे को नाराज हो रही हैं,लेकिन मामला थमकर नहीं दिया। खैर दो महिलाओं की तू-तू मैं -मैं में यह भी एहसास हुआ कि मध्यवर्ग की औरतें किस तरह भदेस भाषा में जमकर यथार्य़वादी शैली का इस्तेमाल करती हैं और भाषा में एक-दूसरे को बेनकाब करती हैं।

इधर मैं अपने गाइड को फोन लगाने की कोशिश कर रहा था ,फोन लग नहीं रहा था।15-20 मिनट के बाद उसका फोन आया कि आप ऊपर चले आएं।मैं ऊपर चला गया,वहां पर गंडोला यान उड़न खटोले में लोग सवार होकर गुलमर्ग की ऊँची पहाडी पर सैर करने जा रहे थे,सैंकड़ों लोगों की लम्बी लाइन लगी थी,मेरे ऊपर पहुँचते ही उसने लाइन तोड़कर मुझे उडन खटोले में सवार करा दिया,हम लोग कुछ देर में ऊपर पहुंच चुके थे, मैंने गाइड से पूछा तुमने यह सब जुगाड़ कैसे किया,बोला 100 रूपये में लाइन तोड़कर ले जा रहा हूँ आपको,मैंने पूछा क्या यहां पर भी घूस लेते हैं ॽ बोला हां,ईमानदीरी से आप लाइन में खड़े रहते और दो-तीन घंटे बाद आपका नम्बर आता।यह मेरा कश्मीर में घूस देने का पहला अनुभव था ।

मैं मानकर चल रहा था सेना के नियंत्रण में कश्मीर में घूस का क्या काम ! लेकिन एक ही झटके में मेरा अनुमान धराशायी हो चुका था।खैर,हम गुलमर्ग पर ऊपर पहुँच गए,वहां कुछ देर बैठे फोटोग्राफी की,फिर वही समस्या थी,कि नीचे कैसे उतरें,कोई समाधान नजर नहीं आ रहा था,ऊपर कोई घूसखोर भी नहीं मिला ,जो पैसा लेकर लाइन तोड़कर हमें चढ़ा दे,लंबी लाइन लगी थी नीचे आने के लिए,मैं चिन्तित था और पहाड़ी पर ऐसे ही टहल रहा था,मैंने गाइड से कहा देखो सामने यह कोई पुलिस का आदमी लगता है जाकर बात करो,कोई रास्ता निकल आए,गाइड गया,उसने कश्मीरी में बातें की,मेरा परिचय दिया और मदद मांगी और कहा कि वह किसी तरह हमें नीचे गंडोले से ले जाय।वह व्यक्ति राजी हो गया।वह व्यक्ति और कोई नहीं ब्लैककेट कमांडो का सीनियर अफसर था। उसने कहा चुपचाप मेरे पीछे चले आओ। हमलोग तेजी से उसके पीछे हो लिए।हमने एक-दूसरे से परिचय किया और तेजी से साथ-साथ चलने लगे, वह अफसर सादा ड्रेस में था,वह कश्मीरी मुसलिम था,मैंने पूछा आप क्या यहां घूमने आए थे ॽ वह बोला नहीं मैं ड्यूटी पर हूँ सुबह से।मैंने पूछा क्या कोई वीआईपी आने वाला था यहां ! बोला हां, गुलाम नबी आजाद साहब के आने का कार्यक्रम था लेकिन अब वे नहीं आ रहे,वे नीचे शहर से ही लंच करके वापस चले गए हैं ,इसलिए मैं वापस जा रहा हूँ। उल्लेखनीय है अनंतनाग विधानसभा उपचुनाव के लिए महबूबा मुफ्ती ने अपना नामांकनपत्र उसी दिन भरा था और गुलाम नबी आजाद विपक्ष की रणनीति ठीक करने लिए वहां आए थे।उनको गुलमर्ग आना था,लेकिन तेज बरसात शुरू होने के कारण वे गुलमर्ग की पहाडियों पर नहीं गए,नीचे शहर से ही घूमकर वापस श्रीनगर चले गए।खैर, ज्योंही हम उड़नखटोले की ओर पहुँचे ,उस अफसर को तो गंडोला के संचालक ने चढ़ने दिया हमें रोक लिया,हमने कहा हम भी इस अफसर के साथ हैं तो उसने हमें चढ़ने दिया।रास्तेभर हम उस अफसर से बातें करते आए, सका शुक्रिया अदा किया,वह भी हमसे बातें करके बेहद खुश था,बोला मेरी थकान और भूख मिट गयी आपलोगों से बातें करके।































बुधवार, 31 अगस्त 2016

पीएम मोदी के कश्मीर मिशन का लक्ष्य -

       बुरहान वानी की हत्या के बाद इंटरनेट से लेकर न्यूज टीवी चैनलों तक,फेसबुक से लेकर ट्विटर तक आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों और उनके सदस्यों ने कश्मीर के बारे में जिस तरह का प्रचार किया है वह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।कश्मीरी जनता को सीधे इस प्रचार अभियान के जरिए निशाना बनाया गया। जबकि सच यह है कश्मीर की जनता आतंकियों के साथ नहीं है।जो लोग बुरहान वानी के अंतिम कृत्य में आई बेशुमार भीड़ को देखकर कह रहे हैं कि वहां की जनता आतंकी है,वे गलत कह रहे हैं।बुरहान वानी की मुर्दनी में लोग दुख के कारण शामिल हुए थे,वे आतंकियों के समर्थन में शामिल नहीं हुए।आज भी कश्मीर में चुनाव होगा तो आतंकी जीत नहीं सकते।
         
समस्या यह है आतंकियों के हथकंडों को राज्य और केन्द्र सरकार सही ढ़ंग से समझने में असमर्थ रही है।उसने आतंकियों-पृथकतावादियों के प्रति आरंभ से ही नरम रूख अपनाया।पचास दिन कर्फ्यू लगने के बाद पृथकतावादी नेताओं की गिरफ्तारियां आरंभ हुईं ,जबकि यह काम बुरहान वानी की हत्या के पहले ही करना चाहिए था।

सवाल यह है वे कौन लोग हैं जिन्होंने पृथकतावादी नेताओं की गिरफ्तारियां नहीं होने दीं ॽ केन्द्र या राज्य में कौन से नेता और अधिकारी हैं जो यह रेखांकित करने में असमर्थ रहे कि कौन-कौन से नेता वहां पर उपद्रव मचा सकते हैं।फिर यह कैसे हो गया कि अचानक 48दिन बाद राज्य सरकार ने 1000लोगों की सूची बना ली,जिसमें 168 खास बड़े नेता हैं जो जनता को भड़काने में लगे हैं,इन नेताओं को पकड़ने के आदेश 50दिन बाद क्यों आए ॽ

बुरहान वानी की हत्या के तत्काल बाद पृथकतावादी नेताओं को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया ॽ क्या मोदीजी-राजनाथ सिंह नहीं जानते थे कि बुरहान वानी की हत्या के बाद स्थिति तनावपूर्ण होगी ! मोदीजी अच्छी तरह जानते थे लेकिन उन्होंने गिरफ्तारी के आदेश नहीं दिए।सब जानते हैं कि केन्द्र में सब कुछ पीएमओ से संचालित हो रहा है,ऐसे में पीएमओ का 50दिन तक सोए रहना,कश्मीर के हालात को लगातार बिगड़ने देना,मोदीजी का चुप रहना,फिर 50दिन बाद मन की बात में बोलना,एक सुनियोजित स्क्रिप्ट के तहत खेला गया नाटक है।

सवाल यह है 50दिन बाद जो बात मोदीजी ने ´मन की बात´में कश्मीर के बारे में कही वही बात उन्होंने बुरहान वानी की हत्या के तत्काल बाद क्यों नहीं कही ॽमोदीजी की 50दिन तक चुप्पी,पृथकतावादी नेताओं की गिरफ्तारी का न होना और निरंतर झगड़े,फायरिंग,पत्थरबाजी आदि का जारी रहना अपने आपमें केन्द्र सरकार को संदेह के दायरे में लाकर खड़ा कर देता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यदि पहले ही दिन बयान दिया होता और सभी नेताओं को पकडकर जेलों में डाल दिया होता तो कश्मीर में जितने बड़े पैमाने पर हिंसा हुई है उससे बचा जा सकता था।लेकिन मोदीजी मूकदर्शक बने,सारी चीजों को सेना के विवेक पर छोड़ दिया।इससे स्थिति बिगड़ी।

आज स्थिति यह है कि कश्मीर घाटी में पृथकतावादियों के साथ आम जनता की सहानुभूति है और इसे पैदा किया है मोदी सरकार की निष्क्रियता ने।यह निष्क्रियता बहुत ही सोची समझी रणनीति के तहत पैदा की गयी है.इसका लक्ष्य है हुर्रियत की मदद करना और नेशनल कॉफ्रेस को जनता से काटना। नेशनल कॉफ्रेस की तुलना में पृथकतावादियों की अप्रत्यक्ष ढ़ंग से मदद करके मोदीजी ने वही काम किया जो पाकिस्तान में बैठे आतंकी कर रहे हैं या पाक शासक कर रहे हैं।अंतर ऊपर के नारों में हैं।लेकिन आचरण में पाक के शासक और मोदी सरकार पृथकतावादियों के साथ है।

बुरहान वानी की हत्या के बाद विगत 52 दिनों में सबसे ज्यादा नुकसान उदार राजनीति,देशभक्त राजनीति और उदार कश्मीरी समाज का हुआ है।समूचे कश्मीरी समाज को अरबों की क्षति उठानी पड़ी है।अकेले कश्मीरी उद्योग जगत को 9000 करोड़ रूपये की अब तक क्षति उठानी पड़ी है।कश्मीर के उद्योग को पामाल करके अंततःकश्मीरी मद्यवर्ग को कमजोर बनाया गया है,आम जनता की आर्थिक कमर तोडी गयी है।हम सब जानते हैं कि कश्मीर की अधिकांश जनता मुसलमान है और जो नौ हजार करोड़ की क्षति हुई है वह मुसलमानों की हुई है,आम कश्मीरी की हुई है।इससे कश्मीर कमजोर हुआ है,कश्मीर का मुसलमान कमजोर हुआ है।

मोदी सरकार की कश्मीर मसले को लेकर जो नीति रही है उसका लक्ष्य है कश्मीर को कमजोर करो,वहां की जनता की आर्थिक कमर तोड़ो।यह एक तरह का जनविरोधी नजरिया है।उल्लेखनीय है 2002 के गुजरात दंगों का लक्ष्य जनहानि के अलावा मुसलमानों की आर्थिक हानि ही था।ठीक यही मॉडल कश्मीर में लागू किया गया है।

बुरहान वानी की हत्या के बाद सबसे ज्यादा लाभ पृथकतावादियों को हुआ है,जैसे 2002 के दंगे के बाद आरएसएस को लाभ हुआ था,गुजरात की तरह ही कश्मीर का राज्य प्रशासन वानी की हत्या के बाद वैसे ही कमजोर हुआ है जैसे गुजरात में 2002 के बाद कमजोर हुआ था।गुजरात में 2002 के दंगों के बाद आरएसएस ताकतवर बना, वानी की हत्या के बाद कश्मीर में पृथकतावादी संगठन हुर्रियत ताकतवर बना है।इससे कश्मीर में लोकतंत्र कमजोर हुआ है,जनता कमजोर हुई है।







घृणा के सौदागर


         मैं इसी साल जब कश्मीर में घूम रहा था,लोगों से मिल रहा था,बातें कर रहा था,तो एक बात साफ नजर आ रही थी कि कश्मीर तेजी से बदल रहा है.इस बदले हुए कश्मीर से कश्मीरी पृथकतावादी और हिन्दू फंडामेंटलिस्ट बेहद परेशान थे।मैं पुराने श्रीनगर इलाके में कई बार गया,वहां विभिन्न किस्म के लोगों से मिला,उनसे लंबी बातचीत की,खासकर युवाओं का बदलता हुआ रूप करीब से देखने के लिए कश्मीर विश्वविद्यालय में भी गया वहां युवाओं की आपसी बातचीत के मसले देखे,उनके चेहरे पर एक खास किस्म का चैन देखा,युवाओं में पैदा हुए लिबरल भावों और उनकी आपसी संगतों में उठने वाले सवालों और विचार-विमर्श के विषयों को सुनकर लगा कि कश्मीर के युवाओं में पृथकतावाद-आतंकवाद या धार्मिक फंडामेंटलिज्म को लेकर एकसिरे से घृणा का भाव है।
         
कश्मीर विश्वविद्यालय में एक जगह दीवार पर पृथकतावादी नारा भी लिखा देखा,जिसमें लिखा था ´भारत कश्मीर छोड़ो´,मेरी आंखों के सामने एक घटना घटी जिसने मुझे यह समझने में मदद की कि आखिर युवाओं में क्या चल रहा है। हुआ यह कि मैं जब साढ़े तीन बजे करीब हजरतबल मस्जिद से घूमते हुए कश्मीर विश्वविद्यालय पहुंचा तो देखा दो लड़कियां एक बैनर लिए कैंपस में प्रचार कर रही हैं, वे विभिन्न छात्र-छात्राओं के बीच में जाकर बता रही थीं कि एक जगह बलात्कार की घटना घटी है और उसमें कौन लोग शामिल हैं,मैं उनका बैनर नहीं पढ़ पाया क्योंकि वह कश्मीरी में लिखा था।लेकिन बैनर लेकर प्रचार कर रही दोनों लड़कियों की बात को कैंपस में विभिन्न स्थानों पर बैठे नौजवान सुनने को राजी नहीं थे,वे बिना सुने ही मुँह फेर ले रहे थे।इस घटना से मुझे आश्चर्य लगा,मैंने एक छात्र से पूछा कि बैनर लेकर चल रही लड़कियां किस संगठन की हैं ,तो वो बोला ,मैं सही -सही नहीं कह सकता लेकिन ये पृथकतावादी संगठनों के लोग हैं और आए दिन इसी तरह बैनर ले कैम्पस में घूमते रहते हैं,कोई इन संगठनों की बातें नहीं सुनता,क्योंकि कश्मीरी छात्र अमन-चैन चाहते हैं।

दिलचस्प बात यह थी मेरी आँखों के सामने तकरीबन 30मिनट तक वे बैनर लेकर घूम-घूमकर छात्रों को बताने की कोशिश करते रहे लेकिन हर बार उनको छात्रों के छोटे छोटे समूहों में निराशा हाथ लग रही थी कोई उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था,अंत में बैनर लिए युवाओं ने निराशा भरे शब्दों में अंग्रेजी में धिक्कारभरी भाषा में अपने गुस्से का इजहार किया,इस पर कुछ लड़कियों ने मुँह बनाकर उनको चिढ़ाने की कोशिश की,थोड़ी दूर चला तो देखा लड़के-लड़कियां बड़े आनंद से एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए टहल रहे हैं,बाहर निकलकर मुख्य सड़क से जब कार से घूमते हुए मैं पुराने शहर की ओर आया तो देखा कई युवा युगल मोटर साइकिल पर एक-दूसरे से चिपके हुए दौड़े चले जा रहे हैं,यह भी देखा कि बड़ी संख्या में मुसलिम लड़कियां और लड़के आधुनिक सामान्य सुंदर ड्रेस पहने हुए घूम रहे हैं,बाजार में खरीददारी कर रहे हैं,मुख्य बाजार में अधिकतर मुसलिम औरतें बिना बुर्के के जमकर खरीददारी कर रही हैं।रात को 11बजे एक रेस्तरां में डिनर करने गया तो वहां पर पाया कि कश्मीरी प्रेमी युगल और युवाजन आराम से प्रेमभरी बातें कर रहे हैं,कहीं पर कोई आतंक का माहौल नहीं,किसी की भाषा में घृणा के शब्द नहीं,मैंने अपने टैक्सी ड्राइवर और होटल के मालिक से पूछा इस समय कश्मीर में लड़कियां किस तरह शादी कर रही हैं ॽ सभी ने एकस्वर में कहा इस समय कश्मीरी लड़कियां गैर-परंपरागत ढ़ंग से,प्रेम विवाह कर रही हैं,वे स्वयं तय कर रही हैं,यह 1990-91 के बाद पैदा हुआ एकदम नया फिनोमिना है।

कश्मीरी युवाओं में उदातावादी रूझानों को देखकर मन को भय भी लग रहा था कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि कश्मीर में फिर से अशांति लौट आए ॽक्योंकि फंडामेंटलिस्ट ताकतें नहीं चाहतीं कि कश्मीर में उदारतावादी भावनाएं लौटें,मुझे यह भी लग रहा था कि जल्द ही टकराव हो सकता है।मैंने इस तनाव को बार बार वहां महसूस किया ,मुझे लगा वहां आम जनता में उदारतावादी राजनीति और जीवन मूल्यों के प्रति जबर्दस्त आग्रह है और आतंकी-पृथकतावादी और हिन्दू फंडामेंटलिस्ट नहीं चाहते कि कश्मीर में उदारतावाद की बयार बहे,वे हर हालत में आम जनता के मन में से उदारतावाद के मनोभावों को मिटाने की कोशिश करेंगे।मैंने कश्मीर से लौटकर वहां के उदार माहौल पर फेसबुक में लिखा भी था,दुर्भाग्यजनक है कि मेरे लिखे जाने के कुछ दिन बाद ही बुरहान वानी की हत्या होती है और अचानक कश्मीर में उदारतावादी माहौल को एक ही झटके में आतंकी-पृथकतावादी माहौल में तब्दील कर दिया गया।

जिसने भी बुरहान वानी की हत्या का फैसला लिया ,वह एकदम बहुत ही सुलझा दिमाग है उसके मन में बुरहान वानी नहीं बल्कि कश्मीर का यह उदार माहौल था जिसकी उसने हत्या की है।ये वे लाखों कश्मीरी युवा हैं जिनके उदार मूल्यों में जीने की आकांक्षाओं को एक ही झटके में रौंद दिया गया।मैं इस तरह की आशंकाओं को लेकर लगातार सोच रहा था कि मोदीजी-महबूबा के सरकार में रहते कश्मीर में शांति का बने रहना संभव नहीं है,मैं जब सोच रहा था तो उस समय सतह पर शांति थी,लेकिन मैं आने वाले संकट को महसूस कर रहा था,अफसोस की बात है कि मोदी-महबूबा की मिलीभगत ने कश्मीर की जनता के अमन-चैन में खलल डाला,शांति से जी रहे कश्मीर को फिर से अशांत कर दिया,नए सिरे से आतंकियों और सेना की गिरफ्त में कश्मीर के युवाओं को कैद कर दिया।









सोमवार, 29 अगस्त 2016

लोकतंत्र में ´भारतीय अवसरवाद´बनाम ´पाक अवसरवाद´का घिनौना खेल

           कश्मीर के राजनेताओं में ´भारतीय अवसरवाद´ और ´पाक अवसरवाद´ये दो फिनोमिना पाए जाते हैं। इन दोनों का समय-समय पर सभी स्थानीय दल और बड़े नेता इस्तेमाल करते रहे हैं।कश्मीर के पूर्व राजा से लेकर शेख अब्दुल्ला तक,फारूख अब्दुल्ला से लेकर महबूबा मुफ्ती तक इन दोनों फिनोमिना को वहां की जनता और इतिहास ने देखा है।पूर्व मुख्यमंत्री मोहम्मद मुफ्ती सईद की मृत्यु के बाद महबूबा मुफ्ती को मुखयमंत्री बनाने में भाजपा ने जो देरी की उसका बड़ा कारण था उनके मन में छिपा ´पाक अवसरवाद´,जिसे भाजपा और स्वयं पीएम नरेन्द्र मोदी नापसंद करते थे।

महबूबा को मुख्यमंत्री बनाने के पहले उनसे भारत के प्रति निष्ठा के राजनीतिक वचन लिए गए उसके बाद उनको मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गयी। ये राजनीतिक वचन क्या थे,मीडिया उनके बारे में अनभिज्ञ है।लेकिन भारत के प्रति निष्ठा की शपथ तो लेनी थी ,लेकिन महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपना वास्तविक रंग दिखाना शुरू कर दिया।

सच यह है कि हुर्रियत के विभिन्न संगठनों और विभिन्न नामों से सक्रिय पृथकतावादी संगठनों की गतिविधियों में विगत दो सालों में तेजी आई है । भारत विरोधी माहौल सघन हुआ है। भारत विरोधी माहौल को सघन बनाने में पीएम नरेन्द्र मोदी की नीतियों राजनीतिक कलाकारी की केन्द्रीय भूमिका रही है।

आज से दो साल पहले का जो कश्मीर था और आज जो कश्मीर है वह एकदम भिन्न है।नेताओं की भाषा और भंगिमा के साथ पाक समर्थित आंदोलनकारियों की भाषा और भंगिमा भी बदली हुई है। यहां तक कि आम जनता का रूख भी बदला हुआ है।पहले की तुलना में पाक समर्थित संगठन आज आम जनता में ज्यादा सक्रिय हैं और उनका कश्मीर की जनता के एक वर्ग के अंदर के अंदर प्रभाव विस्तार नजर आ रहा है।

भाजपा-पीडीपी का संयुक्त मोर्चा जम्मू-कश्मीर में किस तरह चुनाव जीतकर आया है इसे कश्मीर का बच्चा-बच्चा जानता है।यदि अनभिज्ञ हैं तो इस राज्य के बाहर के लोग।मैंने हाल ही मई में कश्मीर में 15 दिनों तक कई जिलों का व्यापक दौरा किया और विभिन्न तबके के लोगों से मुलाकात की,इनमें विभिन्न रंगत के राजनीतिकदलों के जमीनी कार्यकर्ता भी थे।लेह से कश्मीर तक एक ही बात सबने कही कि भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पानी की तरह पैसा बहाकर लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ा। इतना पैसा भाजपा ने पहले कभी नहीं बहाया। विभिन्न दलों के द्वारा बड़े पैमाने पर वोट खरीदे गए और स्थानीय स्तर पर सक्रिय पृथकतावादी नेताओं को लाखों रूपये खिलाकर वोट जुगाड़ किए गए। भाजपा-पीडीपी ने प्रति वोट 1500रूपये बांटा।जबकि कांग्रेस-नेशनल कॉफ्रेस ने प्रति वोट 1000रूपये बांटे। जनता को भ्रष्ट करके वोट हासिल करने की इस प्रक्रिया को चुनाव आयोग भी रोक नहीं पाया,राष्ट्रीय मीडिया उद्घाटित नहीं कर पाया।हम मुगालते में रहे कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र जीत गया। पैसों के वितरण के खेल में एक मुश्त मोटी रकम पृथकतावादी नेताओं की जेब में भी गयी। आम जनता की इस घिनौनी साजिश के हम सब मूक-दर्शक बने रहे।खरीद-फरोख्त के आधार पर जुटायी गयी इस जनता के बल पर राष्ट्रीय एकता और अखंड़ता को बचाने की कोशिश की कल्पना करना दिवा-स्वप्न देखने के बराबर है। आम जनता को पैसों के बल पर गोलबंद करके लोकतंत्र को बचाने का यह काम भाजपा-पीडीपी-कांग्रेस-नेशनल कॉफ्रेंस आदि ने मिलकर किया।यह बड़े पैमाने पर जनता को भ्रष्ट बनाने,उसकी गरीबी और राजनीतिकचेतना के अभाव के दुरूपयोग की ऐसी खतरनाक कहानी है जिसकी स्क्रिप्ट और किसी ने नहीं बल्कि प्रमुख चारों राजनीतिक दलों ने लिखी,लेकिन इसके असल सूत्रधार हैं पीएम नरेन्द्र मोदी।पैसों के बल पर चुनाव जीतने की कला में वे अव्वल हैं। घाटी में उन्होंने जो खतरनाक खेल शुरू किया उसने आम जनता में उनकी लोकतांत्रिक निष्ठाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आज घाटी में पीएम नरेन्द्र मोदी की साख सबसे निचले स्तर पर है। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से भारत की राजनीति के शिखर पुरूष और कश्मीरी जनता के बीच के मौजूदा अलगाव को सहज ही देख सकते हैं।यही वह प्रस्थान बिंदु है जिसे आधार बनाकर कश्मीर की जनता में भारत के नेतृत्व की मूल्यहीन राजनीति का पृथकतावादियों ने जमकर प्रचार किया और अपनी साख बढ़ाने में कामयाबी हासिल की। बुरहान वानी की सैन्यबलों के हाथों हत्या के बाद पैदा हुए आक्रोश की यही वह पृष्ठभूमि भी है। जम्मू-कश्मीर के चुनावों में पैसों के खेल को हमने कभी गंभीरता से नहीं लिया।यही पैसों का खेल आज देश की एकता और अखंड़ता के लिए सबसे बड़ा संकट है।एकबार जब वहां की आम जनता को पैसे खिलाकर भ्रष्टाचार का चस्का लगा दिया गया तो फिर इसका पाक समर्थित संगठनों ने अपने तरीकों से इस्तेमाल किया है।बड़े पैमाने पर पाक से पैसा वहां पहुँचा है।अब वहां पैसा प्रमुख है, देश गौण है। इस काम में पृथकतावादियों के द्वारा संचालित मसजिदों,स्कूलों-कॉलेजों आदि के संचालन में लगे विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के नेटवर्क ने भी सक्रिय भूमिका निभायी है।

दिलचस्प बात यह है कि मोदी सरकार आने के बाद कश्मीर में सक्रिय किसी भी स्वयंसेवी संगठन को भाजपा-आरएसएस ने निशाने पर नहीं लिया है।इनमें ऐसे भी संगठन हैं जिनको लाखों-करोड़ों रूपयों की विभिन्न तरीकों से मदद देश-विदेश से मिल रही है और जिनका संचालन प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से पृथकतावादी नेताओं के हाथ में है। सवाल यह है कश्मीर में सक्रिय स्वयंसेवी संगठनों और पूंजी के खिलाडियों की भूमिका पर मोदी सरकार एकदम निष्क्रिय क्यों है ॽ यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसके तहत पाक अधिकृत कश्मीरी शरणार्थियों की मदद के नाम पर मोदी सरकार ने हाल ही में दो हजार करोड़ रूपये का फंड आवंटित किया है।यह फंड आवंटित नहीं किया जाता तो बेहतर होता।यह तो पैसे से खरीदने की घटिया योजना है,जो अंततःमुसीबतों को लेकर आएगी।







रविवार, 28 अगस्त 2016

श्रीश्री और बुरहान वानी के पिता की मुलाकात के मायने ॽ

दिल्ली में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और पीडीपी-भाजपा सरकार के जम्मू-कश्मीर में सत्तारूढ़ होने के बाद कश्मीर के परिदृश्य में बुनियादी बदलाव आया है।मोदी के सत्तारूढ़ होने के पहले तक केन्द्र और राज्य सरकार का कश्मीर के आतंकवाद-पृथकतावाद को लेकर यह नजरिया था कि पृथकतावादी मांग करने वालों में कुछ कश्मीरी हैं लेकिन आतंकी तो पाक के भेजे लोग ही हैं।लेकिन बुरहान वानी की हत्या के बाद जुलाई से मीडिया में इस तरह की इमेज बनायी गयी कि कश्मीर की जनता में ही आतंकी तत्व छिपे हैं,पहले कश्मीर की जनता और आतंकी के बीच,आतंकी और पृथकतावादी के बीच में केन्द्र अंतर करके चलता था,स्वयं अटलजी की सरकार ने यह अंतर किया था,लेकिन इसबार बुरहान वानी की सैन्यबलों के हाथों हत्या होने के बाद समूचा परिदृश्य बदल चुका है।अब मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती तक कह रही हैं कि पांच प्रतिशत लोग हैं जो अमन-चैन नहीं चाहते।सवाल यह है इस तरह का बयान देकर अप्रत्यक्ष तौर पर केन्द्र और राज्य सरकार ने यह मान लिया है कि ´पत्थरबाज आतंकी´ हैं और ´उनके साथ की जनता है आतंकी´ है,बतर्ज महबूबा कुल मिलाकर ये लोग कश्मीर की जनसंख्या के पांच फीसदी हैं।इस तरह की धारणाओं के प्रचार ने कश्मीर में जल रही आग में घी का काम किया है।अब यदि कश्मीर में पांच फीसदी जनता अशांति में शामिल है तो पहले तो यह बयान ही गलत है,जनविरोधी है।यह कश्मीर की जनता का अपमान करने वाला बयान है।इस तरह के बयान सामान्य स्थिति को बहाल करने में सबसे बड़ी बाधा हैं।

कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने में दूसरी सबसे बड़ी बाधा है राज्य प्रशासन के द्वारा उपद्वियों को जनहित में गिरफ्तार न करना। मसलन् राज्य सरकार ने 1000लोगों की सूची बनायी है,जिसमें सबसे खतरनाक 169 लोग हैं, इन लोगों को अशांति पैदा करने वाला,जनता को भड़काने वाले के तौर पर रेखांकित किया गया है। सवाल यह है इस तरह के लोगों की पहले से ही गिरफ्तारी क्यों नहीं की गयी ॽविगत 50दिनों में इनमें किसी भी नेता को क्यों नहीं पकड़ा गया ॽ इन लोगों की गिरफ्तारी न हो पाने का प्रधान कारण है उपद्रवियों के प्रति मोदी सरकार का नरम रूख।

केन्द्र सरकार और उसकी एजेंसियां जानती हैं कश्मीर में कौन लोग हैं जो जनता को भड़का रहे हैं ,उनको यदि समय रहते गिरफ्तार कर लिया गया होता तो परिस्थितियां इतनी खराब न होतीं।केन्द्र सरकार के द्वारा सबसे बड़ी चूक हुई है बुरहान वानी को लेकर।बुरहान वानी के बारे में यह सच है कि वह आतंकी संगठन का सदस्य था लेकिन उसने कोई हिंसक वारदात में हिस्सा नहीं लिया था।वह स्थानीय पुलिस का एजेंट भी था,वह सोशलमीडिया के जरिए प्रचार करता था।उसकी गतिविधि में कहीं पर कोई हिंसा का तत्व पुलिस-सेना किसी को भी नहीं मिला,अचानक उसको मार देने का फैसला करके शांत कश्मीर को नियोजित ढ़ंग से अशान्त किया गया।यह फैसला किसी पुलिस अफसर या सेना के अधिकारी नहीं हो सकता। अब सारी बातें बुरहान पर आकर रूक गयी हैं।

कल बुरहान वानी के पिता से आरएसएस के समर्थक संत श्रीश्री रविशंकर मिले हैं,यह अपने आपमें विलक्षण घटना है।उल्लेखनीय है श्रीश्री रविशंकर का मोदी की पिछबाड़े की कूटनीति में सबसे महत्वपूर्ण स्थान है।श्रीश्री से बुरहान के पिता का मिलना और उसी दिन महबूबा मुफ्ती का पीएम नरेन्द्र मोदी से मिलना, बताता है कि केन्द्र सरकार अन्दर से मान चुकी है बुरहान वानी की हत्या करना भूल थी,मुश्किल यह है कि इससे बाहर कैसे निकला जाय,आतंकी-पृथकतावादी बुरहान वानी को शहीद मान रहे हैं,स्वयं महबूबा मुफ्ती उसकी हत्या पर अफसोस का इजहार कर चुकी हैं,लेकिन राजनाथ सिंह ने अफसोस जाहिर नहीं किया है।

इसके विपरीत समूची मोदी सरकार,उनका समर्थक भोंपू मीडिया और आरएसएस के लोग इंटरनेट पर बुरहान वानी को आतंकी करार दे चुके हैं,बार-बार उसकी हत्या को जायज ठहरा चुके हैं,अब अचानक बुरहान वानी के पिता से मुलाकात के जरिए कश्मीरी जनता के आक्रोश को शांत करने की कोशिश की जा रही है।जिस तरह घटनाएं घट रही हैं उसमें लग यही रहा है कि हुर्रियत के नेतागण बुरहान वानी की हत्या के लिए केन्द्र सरकार को घेरना बंद नहीं करेंगे,वे चाहते हैं केन्द्र सरकार बुरहान वानी की हत्या के मामले में अपनी गलती माने,केन्द्र मन भी बना चुका है लेकिन कैसे कहे ,समस्या यहां आकर अटक गयी है।

सवाल यह है कल तक मोदी सरकार बुरहान वानी के परिवार को आतंकी मानकर चल रहे थे,अब अचानक बुरहान के पिता से श्रीश्री रविशंकर मिले हैं,उन्होंने अपनी मीटिंग के बाद बुरहान के पिता के साथ फोटो ट्विट भी किया है।यह सीधे घोषणा है बुरहान का परिवार आतंकी नहीं है,बुरहान आतंकी नहीं था,यह कूटनीति की नई भाषा है जिसे संघ परिवार संतों के इमेज संसार के जरिए रच रहा है।



श्रीश्री रविशंकर और बुरहान के पिता का फोटो स्वयं श्रीश्री द्वारा ट्विटर पर जारी करना महत्वपूर्ण है। उल्लेखनीय है बुरहान को सोशलमीडिया के पोस्ट के जरिए ही आतंकी की परिभाषा में डाला गया,अब सोशलमीडिया के फोटो इमेजों और संदेशों के जरिए ही बुरहान की हत्या के पाप से मोदी –महबूबा सरकार मुक्त होना चाहते हैं।सवाल यह है कर्फ्यू ग्रस्त कश्मीर में से बुरहान के पिता श्रीश्री रविशंकर से मिलने बंगलौर कैसे पहुँचे ॽकिसने उनके आने-जाने की व्यवस्था की ॽकौन हैं वे लोग जो राजनाथ सिंह या मोदी से मुलाकात न कराकर सीधे श्रीश्री के पास बुरहान के पिता को ले गए ॽक्या बुरहान के पिता की श्रीश्री के साथ बैठक राजनाथ सिंह की कश्मीर यात्रा के दौरान तय हुई ॽ हाल ही में राजनाथ सिंह श्रीनगर में किनसे मिले ॽ उनके नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए ॽये कुछ सवाल है जो लगातार कश्मीर की समस्या को और भी जटिल बना रहे हैं।

शनिवार, 27 अगस्त 2016

कश्मीरी पंडितों से क्यों नहीं मिले राजनाथ सिंह

        हाल ही में केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर की दो दिवसीय यात्रा खत्म करके लौटे हैं।इस यात्रा की शुरूआत के साथ ही उन्होंने यह घोषणा की थी उनसे जो भी मिलना चाहे मिल सकता है,वे निजी तौर पर भी कश्मीर के विभिन्न समुदायों,संगठनों,राजनीतिक दलों आदि से मिलने का मन बनाकर श्रीनगर पहुँचे थे।वे किस तरह के लोगों से मिले और उनकी क्या बातें हुईं इसका कोई विवरण अभी तक अखबारों में नहीं आया है।लेकिन जो खबरें अखबारों में आई हैं उनसे साफ पता चलता है कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के साथ तनाव बना हुआ है।महबूबा स्वयं राजनाथ सिंह से मिलने गेस्ट हाउस नहीं गयीं अंत में मजबूरन राजनाथ सिंह उनके घर जाकर उनसे मिले,प्रेस कॉंफ्रेंस के दौरान में भी दोनों नेताओं की भाव-भंगिमा तनावपूर्ण थी,महबूबा मुफ्ती तो एस कदर परेशान थीं कि प्रेस काँफ्रेस बीच में ही अचानक खत्म करके उठ खड़ी हुईं,जबकि राजनाथ सिंह बैठे हुए थे।इससे इन दोनों नेताओं के बीच का तनाव सामने आ गया।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अब तक दो कश्मीर यात्राएं हुई हैं और दोनों असफल रही हैं।यहां तक कि व्यापारिक संगठनों ने दोनों बार उनसे मुलाकात करने से साफ मना कर दिया। वहीं दूसरी ओर कश्मीरी पंडितों के सरकारी कर्मचारियों के संगठन के प्रतिनिधि राजनाथ सिंह से मिलने के लिए समय मांगते रहे,मिलने के लिए चक्कर काटते रहे ,लेकिन कश्मीरी पंडितों के संगठन को मिलने का समय नहीं दिया गया।जबकि मौजूदा अशांति की अवस्था में कश्मीरी पंडित बहुत परेशान हैं।इन परेशान पंडितों के बारे में किसी भी भाजपानेता या अनुपम खेर टाइप फिल्म अभिनेता तक ने अभी तक बयान नहीं दिया।



उल्लेखनीय है सन् 2010 के प्रधानमंत्री पुनर्रोजगार कार्यक्रम के तहत दो हजार कश्मीरी युवा कश्मीर घाटी में अपने घर वापस लौटे और काम-धंधा कर रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनको 1990 में कश्मीर छोड़ना पड़ा था,लेकिन बुरहान वानी कांड के बाद उत्पन्न परिस्थितियों के कारण इन लोगों को फिर से अपना घर-द्वार छोड़ना पड़ा ,और वे जम्मू में शरण लेकर रह रहे हैं।ये लोग राजनाथ सिंह से मिलना चाहते थे लेकिन राजनाथ सिंह ने इन लोगों से मिलने से मना कर दिया।इन लोगों के घर अनंतनाग और पुलवामा में हैं,वहां पर वे ट्रांजिट कैंपों में छह साल से रह रहे थे,हाल के घटनाक्रम के दौरान उपद्रवियों की भीड़ ने उनके कैंपों पर हमले किए जिसके कारण ये लोग जान बचाकर भागने को मजबूर हुए।ये लोग 2010 से इन इलाकों में शांति से रह रहे थे। उल्लेखनीय है कश्मीरी पंडितों के सवाल पर सभी टीवी चैनल फिलहाल चुप है,जबकि एक साल पहले कश्मीरी पंडितों के लिए ये ही चैनल घडियाली आँसू बहा रहे थे। स्थिति यह है कि स्थानीय कश्मीरी अखबारों को छोड़कर इन पीड़ितों की खबर कहीं पर नजर नहीं आएगी,यहां तक कि फेसबुक आदि पर सक्रिय मोदीभक्तों ने भी इन कश्मीरी पंडितों के बारे में कुछ भी नहीं लिखा। इससे कश्मीरी पंडितों के प्रति आरएसएस के पाखंड की पोल खुलती है।

राष्ट्रवाद के अन्तर्विरोधों में फंसा अशांत कश्मीर

         कश्मीर को देखने के लिए राष्ट्रवाद की नहीं लोकतांत्रिक नजरिए की जरूरत है।भाजपा ऊपर से नाम संविधान का ले रही है लेकिन कश्मीर की समस्या को राष्ट्रवादी नजरिए से हल करना चाहती है। राष्ट्रवाद के पास जातीय समस्या का कोई समाधान नहीं है।दिलचस्प बात यह है कि भाजपा-आरएसएस हिन्दू राष्ट्रवाद के पैमाने से समाधान खोज रहे हैं वहीं आतंकी संगठन कश्मीरी राष्ट्रवाद के जरिए समाधान खोज रहे हैं लेकिन ये दोनों ही नजरिए अंततःहिंसा और अशांति की ओर जाते हैं। सारी दुनिया का अनुभव है कि उत्तर –औपनिवेशिक दौर में राष्ट्रवाद आत्मघाती मार्ग है।

कश्मीर की जनता के इस समय दो शत्रु हैं पहला है कश्मीरी राष्ट्रवाद और दूसरा है हिन्दू राष्ट्रवाद।राष्ट्रवाद बुनियादी तौर पर हिंसा और घृणा की विचारधारा है।इसका चाहे जो इस्तेमाल करे उसे अंततःहिंसा की गोद में उसे शरण लेनी पड़ती है। राष्ट्रवाद को उन्मादी नारे और हथियारों के अलावा और कोई चीज नजर नहीं आती।कश्मीर की आजादी के नाम पर जो लोग लड़ रहे हैं वे आजादी के नाम पर कश्मीर को जहन्नुम के हवाले कर देना चाहते हैं।जमीनी हकीकत यह है कि अधिकतर युवाओं को कश्मीरी की आजादी का सही अर्थ तक नहीं मालूम ,यही हाल नेताओं का है।

विगत 70 सालों में हजारों मीटिंगें हुई हैं लेकिन कश्मीर की आजादी का अर्थ समझाते हुए कभी किसी दल ने कोई दस्तावेज आज तक भारत की जनता के सामने,संसद में पेश नहीं किया।कश्मीर की आजादी को कश्मीरी राष्ट्रवाद के हिंसक और अंतर्विरोधी फ्रेमवर्क में रखकर ही हमेशा पेश किया गया, इसके बहाने कश्मीर के अंदर जो धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ताकते हैं उनके खिलाफ माहौल बनाने की लगातार कोशिशें हुई हैं।दिलचस्प बात यह है कि कश्मीरी राष्ट्रवादियों और हिन्दू राष्ट्रवादियों का संयुक्त मोर्चा मौजूदा राज्य सरकार को संचालित कर रहा है और सारी समस्या की जड़ यही मोर्चा है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी के नारे ´जम्हूरियत कश्मीरियत और इंसानियत´में भी कश्मीरी राष्ट्रवाद को कश्मीरियत के नाम पर शामिल कर लिया गया है और मौजूदा प्रधानमंत्री उस नारे को बार-बार दोहरा रहे हैं,जबकि समस्या इसी समझ में है।कश्मीर की समस्या को यदि मोदीजी राष्ट्रवाद के फ्रेमवर्क से देखेंगे तो समाधान कम और टकराव ज्यादा पैदा होंगे, अटलजी के फ्रेमवर्क से देखेंगे तो वहां से भी हिंसक रास्ते ही खुलते हैं।इस दौर में जब भी जातीयता और राष्ट्रवाद को आधार बनाकर राजनीतिक समस्याओं के समाधान खोजे गए हिंसा और टकराव ही पैदा हुआ।खालिस्तान के दौर में ´पंजाबियत´का हश्र हम हिंसा में रूपान्तरित होते देख चुके हैं।

कश्मीर को लोकतंत्र चाहिए ´कश्मीरियत´नहीं।कश्मीर को ´नागरिक´ भावबोध चाहिए ´कश्मीरी´भावबोध नहीं।जो लोग´कश्मीरियत´के परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं वे पुराने अ-प्रासंगिक परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं।कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है,इसमें वह इलाका भी आता है जो पाक अधिकृत कश्मीर के नाम से जाना जाता है। कश्मीर की स्थानीय राजनीति में धर्मनिरपेक्ष ताकतें भी कश्मीरियत को भुनाती रही हैं,इससे भी समस्याएं पैदा हुई हैं।

मूल प्रश्न यह है कि कश्मीर को लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य से देखें या राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य से ।राष्ट्रवाद का परिप्रेक्ष्य ,चाहे वह देशभक्त हो या विभाजनकारी,अंततःजनता को अंधी भीड़ में तब्दील करता है। लोकतंत्र का परिप्रेक्ष्य कश्मीरी जनता के स्वायत्त और आत्मनिर्भर संसार को सृजित करता है।कश्मीर की समस्या पर संविधान के दायरे में कोई भी बातचीत होगी तो लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में ही होगी।हमारा संविधान राष्ट्रवाद को मंजूरी नहीं देता।राष्ट्रवाद का परिप्रेक्ष्य अ-संवैधानिक है।

कश्मीर पर जब भी बातें होती हैं तो हिन्दू बनाम मुसलमान,पाक बनाम भारत,आतंकी बनाम राष्ट्रवादी,मुसलिम बहुसंख्यक बनाम हिन्दू अल्पसंख्यक या कश्मीरी पंडित आदि वर्गीकरण में रखकर देखते हैं।फलतः कश्मीर के बाशिंदों को हम नागरिक के रूप में देख ही नहीं पाते।बार-बार यही कहा जाता है कश्मीर में तो बहुसंख्यक मुसलमान हैं ,फलतः वहां आतंकी-पृथकतावादी संगठनों का राजनीतिक रूतबा है। कायदे से हमें इस तरह के विभाजनकारी वर्गीकरण में रखकर कश्मीर को,वहां की जनता को नहीं देखना चाहिए.कश्मीर में भी भारत के अन्य इलाके की तरह मनुष्य रहते हैं,वे हमारे देश के नागरिक हैं,उनको धर्म ,जातीयता और राष्ट्रवाद के नाम पर वर्गीकृत करके नहीं देखें।

कश्मीर की जनता को भीड़ में तब्दील करने में राष्ट्रवादी नजरिए की बड़ी भूमिका है।राष्ट्रवादी-आतंकी नजरिए का परिणाम है कि वहां पर आज जनता भीड़ की तरह आगे चल रही है और नेता उसके पीछे चल रहे हैं।लोकतंत्र में नेता जनता का नेतृत्व करते हैं लेकिन राष्ट्रवादी फ्रेमवर्क में भीड़ नेताओं का नेतृत्व करती है।यही वह आयरनी है जिससे निकलने की जरूरत है।



कश्मीर के निवासियों को हम अपने ही देश का नागरिक समझें,उनके दुख-दर्द को अपना दुख-दर्द समझें,पराए के रूप में देखना बंद करें।कश्मीर को पराए के रूप में देखने के कारण ही आज हालात यह हैं कि हमारी संसद भी ठीक से नहीं जानती कि कश्मीरियों की फिलहाल असल समस्याएं क्या हैं।हाल ही में संसद में कश्मीर के मौजूदा हालत पर जो बहस हुई उसमें विभिन्न दलों के नेताओं ने भाषण दिए,उन भाषणों में कश्मीरी जनता की अनुभूतियां,दुख-दर्द गायब थे,सिर्फ नारे थे,रेटोरिक था,लेकिन मर्मस्पर्शी भावबोध गायब था।इससे पता चलता है राजनीतिक नेतृत्व कश्मीर की जमीनी हकीकत से एकदम अनभिज्ञ है।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

मुस्लिम विद्वेष के खतरे-

मुस्लिम विद्वेष देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है,हमारे देश में मुस्लिम विद्वेष हिन्दुत्ववादियों में रहा है तो मुसलमानों के हितों के पक्षधर मुसलिम लीग-पीडीपी टाइप दलों में भी है।यह विलक्षण संयोग है कि भाजपा-पीडीपी दोनों जम्मू-कश्मीर में संयुक्त सरकार चला रहे हैं,क्योंकि दोनों की विचारधारा है मुस्लिम विद्वेष।भाजपा अपने कारणों से मुसलिम विरोधी आचरण कर रही है, पीडीपी अपने पृथकतावादी-आतंकी प्रेम के कारण मुस्लिम विद्वेष का प्रदर्शन कर रही है।इस मुस्लिम विद्वेष के कारण ही लंबे समय से कश्मीर का मुसलिम समाज तबाह पड़ा हुआ है।
देश के अन्य इलाकों में विभिन्न बहाने बनाकर मुसलमानों पर ही हमले हो रहे हैं और इन हमलों के आयोजक और हमलावर हिन्दुत्व ब्रिगेड है।भारत को एक रखना है तो मुसलिम विद्वेष को खत्म करना जरूरी है।मुसलमानों के प्रति विद्वेष जहां एक ओर हिन्दुत्ववादी नेताओं के जरिए आ रहा है वहीं पर मुसलिम फंडामेंटलिस्ट भी यही काम कर रहे हैं।वे मुसलिमप्रेम की आड़ में मुसलमानों के लोकतांत्रिक हकों पर हमले कर रहे हैं।
देश में अमन-चैन कायम करने लिए मुसलिम विद्वेष को आम जनता के मन में से निकालने की जरूरत है।मुसलमानों को किसी भी तरह की मदद नहीं चाहिए,वे अपना विकास कर लेंगे,लेकिन कम से कम कृपा करके मुसलमानों के खिलाफ विद्वेष फैलाना बंद करो।
मुसलिम विद्वेष को वैचारिक खाद-पानी हिन्दी का सिनेमा देता है,उसमें मुसलमानों का स्टीरियोटाइप चित्रण सबसे बड़ा वैचारिक शत्रु है । इसने मुसलमानों की सामान्य मनष्य की इमेज को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। हिन्दी फिल्मों ने मुसलमानों की जो इमेज हमारे जे़हन में उतारी है उसके कारण ही हम मुसलमानों से सहज ही नफरत करने लगते हैं,उनसे दूरी रखते हैं,संदेह करते हैं।
हमें मुसलमानों के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा,उनको स्टीरियोटाइप ढ़ंग से,मीडियादृष्टि से देखना बंद करना होगा। हम याद रखें मुसलमानों को अशांत रखकर,उत्पीड़िित करके देश को शांत नहीं रखा जा सकता।मुसलमान के दर्द होगा तो सारे देश के दर्द होगा।मुसलमान हमारे देश का अभिन्न अंग हैं।हम उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह देखें और उनके साथ सामान्य आचरण करें।

बुधवार, 20 जुलाई 2016

मोदीजी का कश्मीरी खेल



मोदी सरकार का कश्मीर को लेकर रवैय्या साफ है वे कानून-व्यवस्था का मसला मानकर चल रहे हैं इसीलिए वहां सेनाध्यक्ष को परिस्थिति का जायजा लेने भेजा है,यदि राजनीतिक समस्या मानते तो गृहमंत्री राजनाथ सिंह को भेजते।दुर्भाग्यजनक है मोदी मंत्रीमंडल के किसी सदस्य का,यहां तक कि मोदीजी का कश्मीर के हालात पर ट्विट मूवमेंट नजर नहीं आ रहा,सवाल यह है संकट की अवस्था में इन सबके मुँह पर ताला क्यों लग जाता है? आतंकियों के खिलाफ और आम जनता के पक्ष में बोलने के लिए इनके पास कोई वाक्य तक नहीं है,इतने गूंगे तो नहीं हो ट्विटर नरेश मोदीजी!

कश्मीर के बिगड़े हुए हालात पर सर्वदलीय बैठक बुलाने से पीएम मोदी भाग क्यों रहे हैं,यह देश आऱएसएस के इशारे पर चलेगा तो हर राज्य में संकट पैदा होगा।कश्मीर पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग एक सप्ताह से विपक्ष कर रहा है लेकिन मोदीजी के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही।देश को चलाने का यह तरीका अंततःदेश का नुकसान करेगा,गरीब कश्मीरियों के लिए और संकट पैदा करेगा।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कश्मीर की घटना का संज्ञान लिया,केन्द्र -राज्य सरकारों को 15 दिन में जबाव देने का आदेश दिया। हमने भी फेसबुक पर यह मांग रखी थी कि मानवाधिकार आयोग संज्ञान ले। आयोग का शुक्रिया।

कश्मीर की निहत्थी जनता पर पुलिसबलों की कार्रवाई के परिणाम सामने आने लगे लगे हैं विभिन्न अस्पतालों में पेलेटगन और गन से घायल हुए मरीजों में से 93मरीज हमेशा के लिए अपाहिज हो सकते हैं,ये गंभीर रूप से घायल हैं,इनके इलाज का खर्चा न तो राज्य सरकार दे रही है और केन्द्र सरकार दे रही है बल्कि अस्पताल अपनी ओर से मुफ्त इलाज कर रहे हैं और खर्चा उठा रहे हैं। Bone & Joint Hospital में इसतरह के 60 मरीजों का इलाज चल रहा है बाकी 30मरीजों का दूसरे अस्पतालों में इलाज चल रहा है। इन मरीजों को देखने अभी तक कोई नेता नहीं पहुँचा,किसी ने सहायता कोष नहीं बनाया,कमाल है 40 से ज्यादा निर्दोष लोग मारे गए हैं लेकिन अभी तक इन मौतों पर सुप्रीमकोर्ट ने भी संज्ञान नहीं लिया। कहां सो गया भारत का मानवतावाद ।



जम्मू-कश्मीर उच्चन्यायालय ने हाल के घटनाक्रम में घायल लोगो को मुफ्त इलाज की सुविधा दिए जाने का आदेश दिया है ।

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने आम जनता को सरकारी दुकानो से राशन तुरंत मुहैय्या कराने के आदेश दिए हैं,साथ में यह भी कहा है कि नागरिकों को उधार राशन दिया जाय।

जम्मू-कश्मीर उच्चन्यायालय ने राज्य सरकार की इस बात के लिए आज तीखी आलोचना की कि उसने कर्फ्र्यू ग्रस्त इलाकों में जरूरत की अनिवार्य वस्तुओं की सप्लाई नहीं की।न्यायालय की यह टिप्पणी केन्द्र सरकार के मुँह पर भी करारा तमाचा है।अदालत ने राज्य के हालात में अदालत में पेश की गयी रिपोर्ट पर असंतोष व्यक्त किया है। रिपोर्ट के अनुसार अकेले श्रीनगर में 400 सरकारी दुकानें हैं जिनमें बमुश्किल 50दुकानें खुली रही हैं।



कश्मीर के हाल के घटनाक्रम में 2115लोग घायल हुए थे इनमें से 1924 को अस्पताल से इलाज के बाद घर भेज दिया गया है।लेकिन191लोग अभी भी गंभीर रूप से घायल हैं जिनका इलाज चल रहा है,इनमें 70 की आंखों में पेलेट गन के छर्रे लगे हैं।

कल (18जुलाईR 2016)अनंतनाग जिले के गाजीगुंड इलाके में सेना के ऑपरेशन के दौरान तीन लोग मारे गए,इनमें दो औरतें भी हैं,सेना ने इस घटना के जांच के आदेश दिए हैं।यह सही दिशा में उठाया कदम है,उल्लेखनीय है सेना के वाहन पर लोग पत्थर फेंक रहे थे जिसके जबाव में सेना ने गोली चलायी।कायदे से सेना को बुरहान वानी की मौत और उसके बाद के समूचे घटनाक्रम पर जांच का आदेश देना चाहिए।

सवाल यह घायलों को देखने अभी तक जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री अस्पताल और उनके घर क्यों नहीं गयीं,किसके आदेश का इंतजार है मैडम।

हमारे पुराने जेएनयू के मित्र अमिताभ मट्टू इन दिनों जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री के सलाहकार हैं ,दिलचस्प बात यह है कि कोई नहीं जानता कि बुरहान वानी को मारने का आदेश किसने दिया। जबकि महबूबा मुख्यमंत्री होने के साथ राज्य की गृहमंत्री भी हैं।कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है,फिर वानी के बारे में आदेश किसने दिए ?

भाजपा ने पीडीपी के साथ जो साझा कार्यक्रम बनाया था उसमें हुर्रियत से बात करने का वायदा किया था, आज टीवी पर भाजपा नेता कह रहे हैं हुर्रियत से बात नहीं करेंगे क्योंकि वह पृथकतावादी संगठन है। सवाल यह है जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के समय भी वह पृथकतावादी संगठन था , उस समय उससे समझौता करके चुनाव में वोट क्यों लिए ? बातचीत करने का वायदा क्यों किया ?

कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत का मोदीजी ने जम्मू-कश्मीर के चुनाव में वोट के लिए दिया नारा है, आज यही नारा मोदीजी और महबूबा ने अंगारों की भेंट चढ़ा दिया है।

यह है भाजपा पीडीपी समझौते का आधारभूत कार्यक्रम जिसमें १५ सूत्र रखे गए हैं आज इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम को मोदीजी ने अंगारों के हवाले कर दिया है,जम्मू-कश्मीर की जनता के साथ यह धोखाधडी है-

The PDP and the BJP on Sunday released their common minimum programme (CMP) for running the coalition government in Jammu and Kashmir.

Here are the 15 highlights of the CMP:

1) To meet the political and economic objectives of the alliance, it is important to create an environment of peace, certainty and stability.

2) The government will be transformed into a 'smart government' which will be pro-active, transparent and accountable.

3) It shall be the mission of the government to be the most ethical state in the country from the present day position of being the most corrupt state.

4) The overall economic policy will align the economic structure of Jammu and Kashmir with its own resources, skills and society.

5) The government will ensure genuine autonomy of institutions of probity which include the state accountability commission, vigilance commission, which will be re-designated as transparency commission and an organisation which deals with the Right to Information Act.

6) Following the principles of "Insaniyat, Kashmiriyat and Jamhooriyat" of the earlier NDA government led by Atal Bihari Vajpayee, the state government will facilitate and help initiate a sustained and meaningful dialogue with all internal stakeholders which include political groups irrespective of their ideological views and predilections.

The dialogue will seek to build a broad based consensus on resolution of all outstanding issues of the state.

7) The government will examine the need for de-notifying disturbed areas which will as a consequence enable the union government to take a final view on the continuation of the Armed Forces Special Powers Act (AFSPA) in these areas.

8) Article 370: The present position will be maintained on all constitutional provisions including special status.

9) Dialogue with Hurriyat Conference: The coalition government will facilitate sustained dialogue with all stakeholders irrespective of their ideological views.

10) All the land other than those given to the security forces on the basis of lease, licenses and acquisition under the provision of the land acquisition act shall be returned to the rightful owners except in a situation where retaining the land is absolutely imperative in view of a specific security requirement.

11) The government will work out a one-time settlement for refugees from Pakistan occupied Kashmir of 1947, 1965 and 1971.

12) The government will take measures for sustenance and livelihood of the West Pakistan refugees.

13) It will extend all benefits accruing to the people living on the Line of Control (LoC) to the people living on the international border.

14) It will secure a share in the profits of NHPC emanating from Jammu and Kashmir's waters to the state government.

15) It will reverse all royalty agreements with NHPC.

हुर्रियत नेता सैय्यद अली शाह जिलानी ने कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए विश्वसमुदाय को जो पत्र लिखा है वह निंदनीय है।यह पत्र भारत की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ है।

जो संगठन समाज में हिन्दू बनाम मुसलमान ,भारत बनाम पाक का गंदा खेल खेल रहे हैं वे स्टीरियोटाइप विचारों,इमेजों और तर्कों के आधार पर बातें कर रहे हैं।किसी भी किस्म का स्टीरियोटाइप विमर्श अंततःज्ञानहीन बनाता है,सही समझ नष्ट करता है।

आरएसएस और आतंकियों में राष्ट्रवाद महान है,एक को हिन्दू राष्ट्र चाहिए,दूसरे को मुस्लिम राष्ट्र चाहिए,दोनों कश्मीरमें राष्ट्रवाद का ढोल पीटते रहते हैं,आतंकी बंदूक और बारूद के जरिए राष्ट्रवाद लाना चाहते हैं, मोदी सरकार को सेना के जरिए राष्ट्रवाद की रक्षा करनी पड़ रही है,सच्चाई यह है कश्मीर को किसी भी रंगत का राष्ट्रवाद नहीं चाहिए,वहां की जनता मानवतावाद चाहती है।जो संगठन राष्ट्रवाद को महान बनाने में लगे हैं वे वस्तुतःमानवता और कश्मीरी जनता के दुश्मन हैं।कश्मीर की जनता को राष्ट्रवाद नहीं मानवतावाद चाहिए।सेना नहीं सहयोग चाहिए।

कश्मीर के सभी अखबारों के संपादकों ने अखबारों के प्रकाशन पर लगी पाबंदी को अनुचित बताया है और उसकी कड़े शब्दों निंदा की है और मांग की है कि राज्य सरकार यह पाबंदी तुरंत हटाए। दिलचस्प बात यह है कि राज्य सरकार खुलेआम पृथकतावादी संगठनों के प्रति हमदर्दी दिखाती रही है,उनको नियंत्रित करने के लिए उसने कोई कदम नहीं उठाए,लेकिन प्रेस पर हमला करने के लिए तुरंत कदम उठा लिए,यदि राज्य सरकार को किसी अखबार की किसी रिपोर्ट,तथ्य आदि को लेकर आपत्ति थी तो उसे संपादक को बुलाकर पूछना चाहिए,बात करनी चाहिए,कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए,लेकिन यह सब न करके सीधे सभी अखबारों के प्रकाशन पर पाबंदी लगाकर यह संदेश दिया है कि कश्मीर का प्रेस आग भड़का रहा था।वास्तविकता यह है कि आग भड़काने का काम किसी और ने किया,आग भड़काने वाले को राज्य सरकार कुछ नहीं बोल रही।

कश्मीर की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं।जो लोग सोच रहे हैं कि मीडिया को बंद करके हालात सुधारे जा सकते हैं,वे गलतफहमी के शिकार हैं।इस समय कश्मीर में अघोषित आपातकाल है।राज्य सरकार ने सभी अखबारों पर पाबंदी लगा दी है।मोबाइल बंद हैं,इंटरनेट बंद है।सड़कों पर कर्फ्यू है।आम नागरिक किस तरह गुजर बसर कर रहा होगा,रोज खाने-कमाने वाले कैसे जी रहे होंगे,इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है।जम्मू-कश्मीर सरकार तुरंत अखबारों पर लगी पाबंदी हटाए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहाल करे।

कश्मीर को शांति नहीं सहानुभूति और सही समझ की जरूरत है। जो लोग कश्मीर को भारत के साथ देखना चाहते हैं वे शांति स्थापित करने तक न देखें। इससे समस्या सुलझने वाली नहीं है। कश्मीर को सहानुभूति और सही समझदारी के साथ देखो।


सोमवार, 18 जुलाई 2016

मुझे भारत चाहिए-

          कश्मीर में तनाव इसलिए है क्योकि हम सबकी कश्मीर को लेकर समझ साफ नहीं है,पूरे देश में हिन्दू-मुसलमान संबंधों को लेकर तनाव इसलिए है क्योंकि हमारे देश में एक बहुत बड़ा अंश है जिसकी हिन्दू-मुसलमानो के संबंधों को लेकर सही और साफ समझ नहीं है।

मुसलमान भी भारतीय हैं,कश्मीरी भी भारतीय हैं,हम इस सामान्य किंतु बहुत महत्वपूर्ण बात को समझने से कन्नी क्यो काट रहे हैं ?मुसलमानो को कष्ट मिले या हिन्दुओं को कष्ट मिले,अंततःयह भारतीय समाज का कष्ट है।

हमने गलत किस्म का सामाजिक विभाजन मन में बिठा लिया है।हम भारतीय को भूल गए और अपने -अपने धर्म की पहचान में व्यस्त कर दिए गए हैं।आरएसएस और मुस्लिम तत्ववादी संगठन अपने-अपने तरीके से यह काम खुलकर कर रहे हैं और हम सब उनकी इन हरकतों की उपेक्षा करते रहे हैं,आज स्थिति यह है कि ये दोनों ही किस्म के संगठन आम जनता और मीडिया में हिन्दू-मुसलमान के जहर को सतह पर ले आए हैं।हम भारतीय समाज की बातें नहीं कर रहे हिन्दू समाज,मुस्लिम समाज आदि कोटियों में बांटकर बातें कर रहे हैं,एक-दूसरे को जलील करके तीसमार खाँ बनने की कोशिश करके अंततःदेश को बांट रहे हैं।

आज जो कश्मीर में सुलगता अंगारा दिखाई दे रहा है,वह कभी भी पूरे देश में सुलगता नजर आ सकता है।इसका प्रधान कारण है हमारे प्रमुख राजनीतिकदलों ने गंभीरता के साथ देश को धर्म के आधार पर हमारे दिलों में बांट दिया है।दिलचस्प बात यह है ये सभी दल खासकर कांग्रेस,भाजपा,आरएसएस आदि ऊपर से सद्भाव का नाटक करते रहे हैं लेकिन वैचारिक प्रचार में हिन्दू-मुसलमान की कोटियों में बांटकर अपने नजरिए को परोसते रहे हैं।कांग्रेस ने यह काम बारीकी से किया है,धर्मनिरपेक्षता की आड़ में किया है,आरएसएस के लोग बिना किसी आड़ के सीधे कर रहे हैं।एक कमरे में नंगा घूम रहा है,दूसरा सड़कों पर नंगा घूम रहा है,लेकिन हैं दोनों नंगे।इन दोनों के इस विभाजनकारी खेल से बचने की जरूरत है।

भारतवासी होने के नाते हमें धार्मिक पहचान के आधार पर सोचने से बचना चाहिए।धार्मिक पहचान के आधार पर सोचना अंततःभारत को सामाजिक तौर पर विभाजित करता है।



इस समय सारा मीडिया ,पुलिस, सरकारी तंत्र और सोशलमीडिया का बड़ा हिस्सा धार्मिक पहचान के आधार पर ही सोच रहा है और यह खतरनाक स्थिति है इससे बचने की जरूरत है।इन दिनों हिन्दू-मुसलमानों के भेद बताने पर जोर दिया जा रहा है,जबकि होना यह चाहिए कि हम समानताएं खोजें।हिन्दू-मुसलमानों के प्रति उन्मादी भाषण देने,बयान देने.फेसबुक पोस्ट लिखने से बचें।हमें भारत को बचाना है,हम यह हिन्दू-मुसलमान बचाने के नाम पर चल रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से बाहर निकलकर सोचें,मनुष्य को पहचान का आधार बनाएं,मनुष्य के रूप में भारतवासियों के साझा सुख-दुख रेखांकित करें।

रविवार, 17 जुलाई 2016

खान ड्रेस ,पेंट शर्ट और सेना

            पाक समर्थित आतंकियों की कश्मीर में भूमिका को कम करके नहीं देखना चाहिए।खासकर पीडीपी-भाजपा सरकार आने के बाद नए सिरे से आतंकियों को जनता में फैलने का मौका मिला है, इनमें से अनेक ग्रुपों ने पीडीपी-भाजपा के लिए चुनावों में काम किया है।ऐसी स्थिति में वहां सामान्य स्थिति बहाल करने में सेना को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। आतंकियों के जनाधार बनाने के नए नए तरीके सामने आ रहे हैं,उनमें से एक है साइबर मंच।साइबर मंचों के जरिए युवाओं को आतंकी विभिन्न रूपों में गोलबंद कर रहे हैं,लेकिन सरकार ने इसको रोकने के लिए कोई मैकेनिज्म विकसित नहीं किया। उल्लेखनीय है आतंकी –साम्प्रदायिक –पृथकतावादी संगठन सब समय हथियारबंद जंग ही नहीं लड़ते,वे विभिन्न छद्म रूपों में युवाओं को अपने इर्द-गिर्द गोलबंद करते हैं। यहां एक पुराना वाकया याद आ रहा।

सन् 1989-90 के बाद कश्मीर में जो आतंकी उभार आया था उसमें एक बार आतंकियों ने सारे पुरूषों को खान ड्रेस पहनने का आदेश दे दिया,उन दिनों घाटी में आतंकियो का भय इस कदर व्याप्त था कि कोई व्यक्ति उनके आदेस की अवहेलना नहीं कर सकता था।

खान ड्रेस (पठान ड्रेस) पहनने का आदेश निकलते ही देखते ही देखते एक सप्ताह में सभी पुरूषों ने पठान ड्रेस बनवाए और फिर पहनने लगे,यहां तक कि पुरूष पठान ड्रेस पहनकर ऑफिस भी जाते थे,यह सिलसिला दो महिने तक चला।एक दिन सेना ने तय किया कि पठान ड्रेस के खिलाफ मुहिम चलायी जाय। सेना को तुरंत एक्शन में जाने के आदेश दिए गए,सेना ने सड़कों-गलियों-मुहल्लों में खान ड्रेस पहने पुरूषों को पकडकर उनके चूतड़ पर कसकर आठ-दस डंडे लगाने शुरू किए,जो भी खान ड्रेस पहने दिखता उसकी खबर ली जाती,लोग घरों में जाकर अपने चूतडो की सिकाई कर रहे थे और परेशान होकर दर्द से कराह रहे थे,कुछ सप्ताह चले इस अभियान के कारण समूची घाटी में पुरूषों ने पठान ड्रेस पहननी बंद कर दी।सेना जिसे भी पठान ड्रेस पहने देखती सीधे सवाल करती ,चूतड पर डंडे लगाती और कहती कि कल से पैंट-शर्ट में दिखाई दो,इस तरह पठान ड्रेस से कश्मीर को मुक्ति मिली।जबकि आतंकियों ने दो माह तक सारे कश्मीर के पुरूषों को पठान ड्रेस बंदूक की नोंक पर पहनाकर अपना वैचारिक-सामाजिक वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश की जिसे सेना ने नाकाम कर दिया।



इस कहानी को कहने का आशय यह है कि आतंकी-साम्प्रदायिक संगठन आम जनता की जीवनशैली पर हमला बोलते हैं और अपना ड्रेसकोड थोपते हैं।इसलिए इन संगठनों से सिर्फ राजनीतिक संघर्ष ही नहीं जीवनशैली के स्तर पर भी संघर्ष करना पड़ता है।

आतंकी टीपू सुल्तान की मौत और हमारी सेना

         यह वाकया 1992-93 का जब कश्मीर में संकट गहरा था।आतंकी-पृथकतावादी संगठनों का उभार चरम पर था,घर –घर तलाशी हो रही थी।हर आदमी पर पुलिस नजर रखे हुए थी,ऐसे हालात में पाक स्थित आतंकियों ने कश्मीर के क इलाके के सरगना के तौर पर टीपू सुल्तान का नाम मीडिया में उछाल दिया,टीपू सुल्तान ने भी खुशी-खुशी इलाके के कमांडर की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। यह वाकया कश्मीर के किसी छोटे इलाके का है, आतंकी कमांडर बनाए जाने की घोषणा के बाद टीपू सुल्तान बड़े अहंकारी भाव में रहने लगा,दिन में एक-दोबार बाजार में एके47 लेकर घूम आता था।इलाके के लोग घरे रहते लेकिन जानते थे कि वह आतंकी नहीं है गरीबी का मारा चिरकुट किस्म का आदमी है।

टीपू सुल्तान खुश था कि उसको आतंकियों ने इलाके का कमांडर बना दिया, वास्तविकता यह थी कि टीपू सुल्तान ढाई पसली का आदमी था,एकदम सूखा हुआ शरीर, लेकिन साढ़े छह फुट लंबा। खाने और सोने का कोई ठिकाना नहीं ,उसके परिवार में कोई नहीं था,वह एक छोटे से कमरे के घर में रहता था। मीडिया में ज्योंही टीपू सुल्तान का नाम आतंकियों ने उछाला उस मुहल्ले को पुलिस ने कुछ ही दिन बाद आकर उसे घेर लिया।उसके नाम की घोषणा के बाद उस पर इनाम भी घोषित कर दिया गया।लेकिन मुश्किल यह थी पुलिस और सेना के पास उसका कोई फोटो नहीं था,यहां तक कि आतंकियों के पास भी फोटो नहीं था। दस-पन्द्रह दिन बाद कश्मीर के डाउन टाउन इलाके को तकरीबन 11सौ सैनिकों ने घेर लिया,मुहल्ले के सारे लोगों को कहा गया कि वे टीपू सुल्तान को सेना को सौंप दें,दिल्लगी यह कि टीपू सुल्तान की सेना में फोटो किसी ने देखी नहीं थी,मुहल्ले के लोगों के अलावा उसे कोई जानता नहीं था,सेना के पास उसकी कोई फोटो नहीं थी, ऊपर के अफसरों का आदेश था जाओ और टीपू को पकड़कर लाओ, लेकिन 1500सैनिकों में से कोई भी उसे पहचानता नहीं था।



टीपू आतंकियों का इलाका कमांडर था इसलिए मुहल्ले के लोग उससे डरने लगे थे,मजेदार बात यह कि कमांडर घोषित होने के पहले टीपू सुल्तान को किसी ने किसी भी किस्म की बदमाशी,शरारत,गुंडागर्दी आदि करते नहीं देखा,लेकिन अचानक एक रात वह कमांडर बन गया,उसके हाथ में एके 47 बंदूक आ गयी और उसने भी बंदूक के साथ मुहल्ले में प्रदर्शन करके सूचना देदी कि वह आतंकी संगठन का इलाके का कमांडर है। लेकिन ज्योंही सेना ने मुहल्ले को घेरा तो बाहर जीप से लाउडस्पीकर लगाकर सेना का कमांडर टीपू सुल्तान को समर्पण करने की अपील कर रहा था, घरों में तलाशी शुरू हो गयी,लेकिन टीपू सुल्तान तो अपने कमरे से निकलकर सीधे कमांडर के पास कर खड़ा हो गया,कमांडर को उसकी कद-काठी देखकर नहीं लगा कि यह कोई आतंकी है।वह कमांडर के पास सहज भाव से खड़ा,घरों में दहशत थी,कई घंटे तलाशी अभियान चला ,सेना को टीपू नहीं मिला,जबकि टीपू तो बाहर सेना के कमांडर के पास ही खड़ा था। सेना के जाने के बाद टीपू ने मुहल्ले के लोगों में बढ़-चढ़कर बातें कहीं और अपनी वीरता के किस्से सुनाए,लोगों को आश्चर्य था कि टीपू तो सेना के कमांडर के पास ही खड़ा था फिर सेना ने उसको पकड़ा क्यों नहीं। कुछ दिन तक टीपू के किस्से चलते रहे, अंत में एक दिन टीपू को अपनी बंदूक से पुलिस पर गोली चलाने का शौक चर्राया और उसने सीधे बंदूक करके फायरिंग शुरू कर दी,वह जानता नहीं था कि एक47 गन से फायरिंग के साथ ही पीछे तेजी से झटका लगता है,वह बेहद दुबला-पतला था, उसने ज्योंही फायरिंग शुरू की बंदूक की दिशा पलटकर उसकी ओर हो गयी और वह अपनी ही गोली से ढेर हो गया,बाद में आतंकियों ने खबर फैला दी कि एरिया कमांडर टीपू सुल्तान सेना से मुठभेड़ करते मारा गया।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

कश्मीर को यहां से देखो-

                  आतंकवादी वहां की जनता की आवाज नहीं हैं, वहां की लोकतांत्रिक ताकतें हैं जो सही आवाज हैं।मुश्किल यह है पीडीपी को महत्ता देकर सिरबिठा दिया है मोदी ने,वे ही उनको महत्व दे रहे हैं।राज्य और केन्द्र सरकार तुरंत निचले स्तर पर सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं बुला रहे,किसने रोका है।पीडीपी चाहती है आतंकी विपक्ष में रहें।जबकि सब जानते हैं नेशनल कांफ्रेस के बिना कश्मीर में लोकतंत्र बचाने वाला और कोई दल नहीं है। उल्लेखनीय है विधानसभा –लोकसभा चुनाव में भाजपा- पीडीपी ने प्रति वोट एक हजार रूपया नीचे सप्लाई देकर बड़े पैमाने पर पैसा खर्च किया है,पता करो यह पैसा किसने दिया। करोडों रूपया बांटा गया था,हर वोट पर एक हजार रूपया दिया गया है, लेकिन मीडिया में खबर तक नहीं है।हमारा अनुमान है भाजपा को यह पैसा बहुराष्ट्रीय शस्त्र निर्माता कंपनियों ने दिया था उसके बाद मोदीजी ने बड़े पैमाने शस्त्र समझौते ही किए हैं।

कश्मीर की जनता आजादी नहीं विकास और शांति चाहती है,आजादी तो आतंकी चाहते हैं।भाजपा वाले उसे हवा दे रहे हैं।मोदीजी के साथ पीडीपी ने विकास पर चुनाव लडा है वे जीते हैं विकास पर,हुर्रियत चुनाव नहीं जीती है।इसलिए हुर्रियत को न उछालें।विधानसभा चुनाव कौन जीता है इस पर सोचो,जीतने वाले ने क्या वायदे किए हैं,हुर्रियत ने चुनाव नहीं लड़ा,इसके अलावा आम जनता और आतंकियों में अंतर करो, जनता का एजेण्डा वह नहीं है जो आतंकियों का है। जनता ने कभी वोट का बहिष्कार नहीं किया,इससे समझ लो कि जनता लोकतंत्र और भारत चाहती है।

पृथकतावाद अपने एक्शन से खुद को तो नंगा करता है अन्य को भी खासकर साम्प्रदायिक ताकतों को भी नंगा कर देता है।कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने के दिन से हम भाजपा की आलोचना कर रहे हैं।भाजपा का मानना है कि वे अपनी साम्प्रदायिक नीतियों के प्रभाव से पीडीपी को बदल देंगे, लेकिन हो उलटा रहा है,भाजपा लगातार पीडीपी के प्रभाव में काम कर रही है,उसके इशारों पर मोदी नाच रहे हैं।साम्प्रदायिकता और पृथकतावाद के इस संयुक्त मोर्चे का कुफल कश्मीर की जनता भोग रही है।36निर्दोष मारे गए हैं,1500से ज्यादा घायल पड़े हैं।150 से ज्यादा की आँखें खतरे में हैं।समूचा पर्यटन का धंधा चौपट हो गया है।

मीडिया में लंबे समय से सेना को लेकर परम पवित्र भाव की आंधी चलायी जा रही है,यह बेहद खतरनाक चीज है। लोकतंत्र में सेना की भी समीक्षा होती है,आलोचना होती है,सेना को भी दण्डित किया जा सकता है। संघी मीडिया आंधी के बहाने सेना को विचारधारा विशेष की सेवा करने के लिए मानसिक तौर पर तैयार किया जा रहा है।

सेना की लोकतंत्र में राजनीतिक भूमिका जीरो होती है।सेना की भूमिका देश की सरहदों पर है या विशेष अशांति की स्थिति में है,लेकिन इन सभी हालातों में सेना को राजनीतिक विचारधारा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।यह दुखद है कि सेना का किसी न किसी रूप में राजनीतिक असफलताओं को छिपाने या राजनीतिक समाधानों को स्थगित करने के लिए सत्ताधारीदलों ने निहित स्वार्थी ढ़ंग से हमेशा इस्तेमाल किया है।

इधर मीडिया में सेना को हिन्दू राष्ट्रवाद से जोड़कर पेश करने की प्रतिस्पर्धा छिड़ी हुई है।सेना पूर्व अधिकारी और इन दिनों संघ के संघी फाउंडेशन से जुडे बड़े पूर्व सैन्य अधिकारी सबसे घटिया ढ़ंग से राष्ट्रोन्माद पैदा कर रहे हैं,सेना को राष्ट्रवाद से जोड़कर पेश कर रहे हैं और यह बेहद खतरनाक काम है,खासकर टीवी टॉक शो में सेना के पूर्व अफसरों के जरिए सेना को वैचारिक कवच पहनाने की ये गंदी हरकतें बंद होनी चाहिए।

सेना के पूर्व अधिकारियों का इराक-अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप को वैध ठहराने के लिए मीडिया के जरिए अमेरिका-ब्रिटेन और नाटो ने जमकर दुरूपयोग किया,ये पूर्व सैन्य अधिकारी अमूमन सफेद झूठ बोलते रहते हैं जिनको इन सैन्य अधिकारियों में सत्य दिखता है उनको इराक हमले पर हाल ही में आई ब्रिटिश जांच रिपोर्ट को पढ़ना चाहिए।पूर्व संघी सैन्य अधिकारी आमतौर पर मीडिया में उत्तेजक भाषा बोलते हैं,अशांति और झूठ के वक्ता के रूप में पेश आते हैं।इन सबको कायदे से बेनकाब करने की जरूरत है।

कश्मीर के सच को आतंकियों ,संघियों और बहुराष्ट्रीय शस्त्र निर्माता कंपनियों और कारपोरेट मीडिया की नजर से देखना बंद करें।ये चारों तत्व मिलकर इस इलाके में अशांति बनाए रखना चाहते हैं।आतंकियों की सबसे ज्यादा मदद कौन कर रहा है ? पाक तो बहाना है ,असल में शस्त्र निर्माता कंपनियां कश्मीर को सुलगाए रखना चाहती हैं जिससे भारत में हथियारों की अबाध सप्लाई बनी रहे।इन कंपनियों के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों के गहरे संबंध हैं।इन दोनों दलों को इन कंपनियों से गुपचुप पैसा मिलता रहा है।कश्मीर में विगत विधानसभा-लोकसभा चुनाव में इन दोनों दलों ने वोटरों को खरीदने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया था,यह पैसा कंपनियों ने शांति स्थापित करने के लिए नहीं दिया है।कश्मीर पर हो रही सारी बहस शस्त्र निर्माता कंपनियों की भूमिका की अनदेखी करके चल रही है,दिलचस्प बात है इन कंपनियों का पैसा अनेक स्तरों पर बंट रहा है।





मंगलवार, 12 जुलाई 2016

कश्मीर में बुरहान वानी कैसे बनता है !

            कश्मीर पर ठंडे दिमाग से सोचने की जरूरत है,उग्रभाषा,मैं-तुम में विभाजित करके देखने से बचें। इकतरफा प्रचार ,निहितस्वार्थ और झूठ से बचें। इससे तनाव में इजाफा हुआ है। समस्या यह है कि पुलिसबल या खुफियातंत्र किसी भी झूठी खबर पर कार्रवाई करके जब किसी निर्दोष को मार दे तब जनता क्या करे ॽ मारे गए निर्दोष व्यक्ति के रिश्तेदार क्या करें ॽ राज्य में इस तरह की प्रशासनिक संरचनाएं नहीं हैं जो इन शिकायतों पर ध्यान दें। आज भी कश्मीर में सैंकड़ों निर्दोष नौजवानों की मौत को लेकर संदेह है जिनको पुलिस ने आतंकवादी होने के संदेह में मार दिया। राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार तक,यहां तक कि अदालतों तक से इस तरह के लोगों को न तो न्याय मिला और न मुआवजा। मसलन्,हाल की हिंसा में मारे गए 31लोग कम से कम आतंकवादी नहीं हैं।इस तरह के कश्मीर में बड़ी संख्या में और भी लोग मारे गए हैं।

कश्मीर पर जब भी बात हो तो कश्मीर के नजरिए से हो,मानवीय नजरिए से हो।उस तरह की प्रशासनिक संरचनाओं का निर्माण किया जाय जहां पीड़ित लोग निर्भय होकर अपनी तकलीफों को कह सकें और उस पर राज्य प्रशासन गंभीरता से कार्रवाई करे।पिछले दिनों राज्य सरकार ने पत्थरबाजी की घटनाओं में शामिल युवाओं के ऊपर चल रहे मुकदमों के बारे में फैसला लिया था,यह एक सही फैसला था।इसी तरह अन्य केसों पर भी सहानुभूति के साथ विचार करके युवाओं पर चल रहे मुकदमे तुरंत खत्म करने की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है।वहां के युवा तेजी से सामाजिक विकास में सक्रिय भूमिका निभाएं और आतंकी समूहों से अलग रहें इसके लिए जरूरी है कि युवाओं को विभिन्न किस्म की विकास योजनाओं में शामिल करने के बारे में पहल की जाय ,सस्ते ब्याज पर नए कारोबार शुरू करने के लिए राष्ट्रीयकृत बैंकों से कर्ज मुहैय्या कराया जाय.

बुरहान वानी फिनोमिना से सबक लेने की जरूरत है। इन दिनों कश्मीर के युवाओं में आतंकी-पृथकतावादी संगठन हथियारों के जरिए नहीं विचारों और सामाजिकीकरण के जरिए स्वीकृति बनाने में लगे हैं।स्थानीय स्तर पर वे साइबर तकनीक और सामाजिक संबंधों के सहमेल के जरिए अपना जनाधार बना रहे हैं। दिलचस्प बात यह है पुलिस और सेना चप्पे -चप्पे पर लगी है लेकिन युवाओं में काम कर रहे आतंकी उनको नजर नहीं आ रहे। बुरहान वानी के चरित्र का चिन्ताजनक पहलू यह है कि वह हथियार से नहीं साइबर संपर्क के जरिए युवाओं को बांधे था। कश्मीर के युवाओं में लोकतांत्रिक आकांक्षाएं हैं और वे बड़े पैमाने पर उसे सोशलमीडिया आदि के जरिए व्यक्त कर रहे हैं,उनके स्थानीय स्तर पर समूह बने हुए हैं जो एक-दूसरे से जोड़ते हैं।कश्मीर के इन युवाओं का दिल जीतने के लिए आरएसएस मार्का साइबर प्रचार अपील नहीं कर सकता।उलटे उनके मन में भय-आशंका और अनास्था पैदा करता है। आरएसएस के लोग साइबर जगत में अपने साम्प्रदायिक लेखन के दूरगामी प्रभावों से अनजान हैं यह तो नहीं कह सकते।लेकिन उनके साइबर प्रचार अल्पसंख्यक,आदिवासी युवक आतंकित और चिन्तित हैं।मोदीजी कश्मीर को लेकर कितने फिक्रमंद हैं इसका अंदाजा उनके कश्मीर प्रचार से कर सकते हैं। मोदीजी के साइबर समूह की ओर से विगत दो सालों में कश्मीर के संदर्भ में कोई भी सकारात्मक प्रचार अभियान साइबर जगत में नहीं चलाया गया। इसके विपरीत आरएसएस के लोग बेगानों की तरह कश्मीर पर अ-यथार्थपरक टिप्पणियां करते रहते हैं,भाजपा और आरएसएस के जो लोग मीडिया से लेकर साइबर तक लिख रहे हैं वे जरा गंभीरता से सोचें कि बुरहान जैसा नौजवान स्थानीय स्तर पर साइबर के जरिए अपील बना लेता लेकिन मोदीजी या आरएसएस के किसी नेता की कश्मीर के युवाओं में कोई साइबर अपील नहीं है।जबकि सच यह है आरएसएस सबसे संगठित साइबर संगठन है।उसके प्रचार में कश्मीर कहीं पर भी नहीं है यदि चुनाव के मौके पर साइबर प्रचार नजर भी आया तो वह सिर्फ वोटों तक सीमित था।

इसके विपरीत बुरहान वानी ने मात्र साइबर प्रचार के जरिए अपने को युवाओं में जनप्रिय बना लिया,उसने स्थानीय स्तर पर इस तरह का संगठन खड़ा कर लिया जो उसके विचारों से सहमत युवाओं से भरा है ,यानी बिना बंदूक चलाए विचारों के जरिए उसने युवाओं को आतंकी संगठन के पीछे अपने सामान्य कम्युनिकेशन के जरिए जोड़ लिया। यह सच है बुरहान का आतंकी संगठन से संबंध था,मीडिया रिपोर्ट और स्थानीय पुलिस के बयान बताते हैं कि उसने कभी कोई एक्शन में भाग नहीं लिया,उसका नाम था,इसी बिना पर उसके ऊपर दस लाख का इनाम पुलिस ने घोषित कर दिया।



पहलीबार एक ऐसा आतंकी सामने आया है जिसने गोली नहीं चलाई लेकिन इलाके के लोगों का दिल जीत लिया,उसने बंदूक के भय के बिना,मात्र विचारों और संचार के जरिए अपने लिए स्थानीय जनता के दिलों में जगह बना ली।इससे हम साफ समझें कि विचारों की ताकत बंदूक की ताकत से ज्यादा प्रभावशाली होती है।यही वह बिंदु है जिसे समझने की जरूरत है। कश्मीर बदलने के लिए जरूरी है कश्मीर के बारे में पहले विचार बदलो।

सोमवार, 11 जुलाई 2016

कश्मीर के फायरब्राँण्ड आतंकी


   कश्मीर में आप मुहल्लों में जाएं और आम लोगों से बात करें तो पाएंगे कि वहां जितने आतंकी आऱंभिक दिनों में आतंकी टोलियों में शामिल हुए उनमें से अधिकांश जानते तक नहीं थे कि वे आतंकी टोली में क्यों शामिल हो रहे हैं।अनेक मर्तबा ऐसे युवा भी आतंकी टोली में शामिल हुए जो किसी न किसी रूप में सैन्यबलों के उत्पीड़न के शिकार रहे हैं।अनेक इस तरह के युवा भी थे जो बंदूक या पिस्तौल चलाना जानते तक नहीं थे और आतंकियों की बंदूक-पिस्तौल लेकर घूमते रहते थे,हथियार चमकाकर इलाके में दादागिरी करते थे। किस तरह मूर्खताएं करते थे और पाकप्रेरित आतंकी संगठनों के जाने-अनजाने एजेंट बन गए।एक सच्चा किस्सा पढ़ें-एक कश्मीरी युवा देखने में सुंदर और छरछरे किस्म का था, नाम था उस्मान।एक दिन उसको आतंकियों ने एक ग्रेनेड दे दिया और उसको कहा कि जाकर नशाने पर फेंक दो।वह जानता नहीं था उसका किस तरह इस्तेमाल करें।ग्रेनेड में एक पिन होता है,उस पिन को निकालते ही उसे सात सैकिण्ड में निशाने पर फेंक देना होता है लेकिन वह युवा पिन निकालकर देख रहा था कि कहां फेंकूँ,वह जानता ही नहीं था कि उसे कितनी देर में फेंकना है,वह युवक सोचता रह गया सात सैकिण्ड के बाद ग्रेनेड उसी युवक के हाथ में फट गया।फलतःवह उसी क्षण मर गया।लेकिन आतंकियों ने प्रचारित कर दिया कि सैन्यबलों ने मार दिया।यह श्रीनगर के डाउन टाउन की सच्ची कहानी है।





विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...