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सोमवार, 4 जुलाई 2016

प्रमोशन और साहित्य का संकट

       कोलकाता में एक दशक से हिन्दी सेमीनार के प्रमाणपत्र जुटाने की संक्रामक बीमारी कॉलेज शिक्षकों में फैल गयी है। सेमीनार में वे इसलिए सुनने जाते हैं जिससे उन्हें सेमीनार में भाग लेने का सर्टीफिकेट मिल जाए। यह साहित्य के चरम पतन की सूचना है। ये वे लोग हैं जो हिन्दी साहित्य से रोटी-रोजी कमा रहे हैं। ये लोग सेमीनार में बोले बिना सेमीनार में भाग लेने का प्रमाणपत्र पाकर अपने को धन्य कर रहे हैं। आयोजक यह कहकर शिक्षकों को बुलाते हैं कि प्रमोशन कराना है तो सेमीनार सर्टीफिकेट लगेगा, आ जाओ सुनने, सर्टीफिकेट मिल जाएगा। फलतः ज्यादातर शिक्षक सेमीनार को सुनने आते हैं। सेमीनार का सर्टीफिकेट पाने के लिए वे डेलीगेट फीस भी देते हैं। इस प्रक्रिया में दो किस्म का साहित्यिक भ्रष्टाचार हो रहा है. पहला नौकरी में प्रमोशन के स्तर पर हो रहा है। श्रोता के सर्टीफिकेट को वक्ता के सर्टीफिकेट के रूप में पेश करके तरक्की के पॉइण्ट प्राप्त किए जा रहे हैं। दूसरा , साहित्य विमर्श के नाम पर कूपमंडूकता बढ़ रही है। सेमीनारों में वक्ताओं के भाषण साधारण पाठक की चेतना से भी निचले स्तर के होते हैं और सेमीनार के बाद सभी लोग एक-दूसरे की पीठ ठोंकते हैं, गैर शिक्षक श्रोता फ्रस्टेट होते हैं,वे मन ही मन धिक्कारते हैं और कहते हैं और कहते हैं कि वे सुनने क्यों आए। वक्तागण आशीर्वाद देते हैं,पैर छुआते हैं। इस समूची प्रक्रिया में कई लोग तो इस कदर नशे में आ गए हैं कि उन्हें यह बीमारी हो गयी है कि शहर में कोई भी साहित्यिक कार्यक्रम हो उनको अध्यक्षता के लिए बुलाओ,ये लोग अध्यक्ष न बनाए जाने पर कार्यक्रम में जाते नहीं है। नहीं बुलाने पर नाराज हो जाते हैं। इन पंडितों का मानना है वे जिस सेमीनार में जाते हैं उस सेमीनार को सार्थक करके आते हैं। इस प्रसंग में मुझे कई लेखकों की रचनाएं याद आ रही हैं। इनमें सबसे पहले में मुक्तिबोध को उद्धृत करना चाहूँगा। बहुत पहले मुक्तिबोध ने हिन्दी के प्रोफेसरों के बारे में लिखा, ''बटनहोल में प्रति‍नि‍धि पुष्‍प लगाए एक प्रोफ़ेसर साहि‍त्‍यि‍क से रास्‍ते में मुलाकात होने पर पता चला कि हि‍न्‍दी का हर प्रोफेसर साहि‍त्‍यि‍क होता है। अपने इस अनुसन्‍धान पर मैं मन ही मन बड़ा खुश हुआ। खुश होने का पहला कारण था अध्‍यापक महोदय का पेशेवर सैद्धान्‍ति‍क आत्‍मवि‍श्‍वास। ऐसा आत्‍मवि‍श्‍वास महान् बुद्धि‍मानों का तेजस्‍वी लक्षण है या महान् मूर्खों का दैदीप्‍यमान प्रतीक ! मैं नि‍श्‍चय नहीं कर सका कि वे सज्‍जन बुद्धि‍मान हैं या मूर्ख ! अनुमान है कि वे बुद्धि‍मान तो नहीं, धूर्त और मूर्ख दोनों एक साथ हैं।''
मुक्‍ति‍बोध ने यह भी लि‍खा है '' चूँकि प्रोफेसर महोदय साहि‍त्‍यि‍क हैं इसलि‍ए शायद वे यह कुरबानी नहीं कर सकते। नाम- कमाई के काम में चुस्‍त होने के सबब वे उन सभी जगहों में जाएंगे जहॉं उन्‍हें फायदा हो-चाहे वह नरक ही क्‍यों न हो।''
कोलकाता के शिक्षकों की अवस्था इससे बेहतर नहीं बन पायी है। हिन्दी के इस तरह के आयोजनों में किस तरह के भाषण होते हैं और चेले-चेलियां किस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं इस पर कवि -कहानीकार उदयप्रकाश की बड़ी शानदार कविता है 'पाँडेजी' उसका अंश देखें-
"छोटी-सी काया पाँडेजी की/छोटी-छोटी इच्छाएँ/ छोटे-छोटे क्रोध/और छोटा दिमाग।
गोष्ठी में दिया भाषण,कहा- 'नागार्जुन हिन्दी का जनकवि है '/फिर हँसे कि ' मैंने देखो
कितनी गोपनीय/चीज को खोल दिया यों।यह तीखी मेधा और/वैज्ञानिक आलोचना का कमाल है। '/एक स-गोत्र शिष्य ने कहा-' भाषण लाजबाब था /अत्यन्त धीर-गंभीर/
तथ्यपरक और विश्लेषणात्मक/हिन्दी आलोचना के खच्चर/ अस्तबल में/आप ही हैं /एकमात्र/काबुली बछेड़े/ 'तो गोल हुए पाँडे जी/मंदिर के ढ़ोल जैसे/ठुनुक -ठुनुक हँसे और/फिर बुलबुल हो गए/फूलकर मगन !"
मैं 20 सालों से कोलकाता में रह रहा हूँ और आए दिन हिन्दी सेमीनारों की दुर्दशापूर्ण अवस्था के किस्से अपने दोस्तों और विद्यार्थियों से सुनता रहा हूँ। मैं आमतौर पर इन सेमीनारों से दूर रहता हूँ। इसके कारण लोग यह मानने लगे हैं कि मैं साहित्य के बारे में नहीं जानता। कई मित्र हैं जो सेमीनार के कार्ड में वक्ता के रूप में मेरा नाम न देखकर दुखी होकर फोन करते हैं कि यहां तो आपको होना ही चाहिए था। मेरी स्थिति इस कदर खराब है कि एकबार कोलकाता की सबसे समर्थ साहित्यिक संस्था की कर्ताधर्ता साहित्यकार नेत्री ने चाय पर अपने घर बुलाया और कहा कि हम इतने कार्यक्रम करते हैं और आपस में बातें भी करते हैं कि स्थानीय स्तर पर कौन विद्वान हैं जिन्हें बुलाया जाए तो लोग आपका नाम कभी नहीं बताते, मैं स्वयं भी नहीं जानती कि आप विद्वान हैं। मैंने कहा मैं विद्वान नहीं हूँ। इसी प्रसंग में मैंने उन्हें त्रिलोचन की एक कविता ' प्रगतिशील कवियों की नयी लिस्ट निकली है' सुनायी, कविवर त्रिलोचन ने लिखा- " प्रगतिशील कवियों की नयी लिस्ट निकली है/उसमें कहीं त्रिलोचन का नाम नहीं था/आँख फाड़कर देखा/दोष नहीं था/पर आँखों का/सब कहते हैं कि प्रेस छली है/शुद्धिपत्र देखा ,उसमें नामों की माला छोटी न थी/ यहाँ भी देखा ,कहीं त्रिलोचन नहीं/तुम्हारा सुन सुनकर सपक्ष आलोचन कान पक गए थे/मैं ऐसा बैठा ठाला नहीं,तुम्हारी बकबक सुना करूँ/किसी जगह उल्लेख नहीं है,तुम्हीं एक हो,क्या अन्यत्र विवेक नहीं है/ तुम सागर लाँघोगे ? -डरते हो चहले से/बड़े-बड़े जो बात कहेंगे-सुनी जायगी/व्याख्याओं में उनकी व्याख्या चुनी जाएगी/"
कोलकाता हिन्दी के क्षयिष्णु वातावरण का एक अन्य पक्ष है हिन्दी के पठन-पाठन की ह्रासशील अवस्था। यह स्थिति कमोबेश पूरे राज्य में है। मसलन जो आज छात्र है वह कल शिक्षक होगा।जो विद्यार्थी एम.ए. में आते हैं उनमें अधिकांश ठीक से हिन्दी लिखना तक नहीं जानते । अब आप ही सोचिए कि जो विद्यार्थी एम.ए. तक आ गया वह हिन्दी लिखना नहीं जानता। इस तरह के विद्यार्थियों की संख्या हर साल बढ़ रही है। उच्च शिक्षाकी सुविधाओं का निचलेस्तर पर विस्तार हुआ है। बड़े पैमाने पर छात्र हिन्दी ऑनर्स कर रहे हैं , वे जब ठीक से हिन्दी लिखना नहीं जानते,ठीक से प्रश्नों का उत्तर तक नहीं देते तब वे कैसे एम.ए. तक अच्छे अंक प्राप्त करके आ जाते हैं, इसका रहस्य कोई भी आसानी से समझ सकता है कि कोलकाता में हिन्दी में अंक कैसे दिए जाते होंगे। हिन्दी प्रमोशन के नाम पर बड़े पैमाने पर ऐसे छात्रों की पीढ़ी तैयारहुई है जो येन-केन प्रकारेण अंक हासिल करके पास हुए हैं। पढ़ने,समझने और सीखने की आदत बहुत कम विद्यार्थियों में है। जिनमें यह आदत है उन्हें पग-पग पर छींटाकशी, अपमान और अकल्पनीय असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। कोलकाता में सारे विद्यार्थी जानते हैं कि हिन्दी में नौकरी पाने के नियम क्या हैं ? किसके हाथ में नौकरियां हैं ? किस नेता और प्रोफेसर को पटाना है और कैसे पटाना है । इस समस्या की जड़ें गहरी हैं,गहराई में जाकर देखें तो हिन्दी के शिक्षक नए से डरते हैं,विचारों का जोखिम उठाने से डरते हैं। अन्य से सीखने और स्वयं को उससे समृध्द करने मेंअपनी हेटी समझते हैं। साहित्य को अनुशासन के रूप में पढ़ने पढ़ाने में इनकी एकदम दिलचस्पी नहीं है।
आज वास्तविकता यह है कि ज्यादातर शिक्षक और समीक्षक आजीविका और थोथी प्रशंसा पाने लिए अपनेपेशे में हैं।वे किसी भी चीज को लेकर बेचैन नहीं होते। उनके अंदर कोई सवाल पैदा नहीं होते। एक नागरिक के नातेउनके अंदर वर्तमान की विभीषिकाओं को देखकर उन्हें गहराई में जाकर जानने की इच्छा पैदा नहीं होती।वे पूरी तरहअतीत के रेतीले टीले में सिर गडाए बैठे हैं।
हिन्दी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शिक्षक और आलोचक अपने नियमित अभ्यास और ज्ञान विनिमय को अनुसंधान का जरिया नहीं बना पाए है। विद्यार्थियों में मासूमियत और अज्ञानता बनाए रखने में इस तरह के शिक्षकोंकी बड़ी भूमिका है।ये ऐसे शिक्षक हैं जो ज्ञान के आदान-प्रदान में एकदम विश्वास नहीं करते। कायदे से शिक्षक कोपारदर्शी, निर्भीक और ज्ञानपिपासु होना चाहिए।किन्तु हिन्दी विभागों में मामला एकदम उल्टा है।हिन्दी के शिक्षक कम ज्ञान में संतुष्ट,आरामतलब,और दैनन्दिन जीवन की जोड़तोड़ में मशगूल रहते हैं।
इसके विपरीत यदि कोई शिक्षक निरंतर शोध करतााहै या निरंतर लिख रहा है तो उसका उपहास उडाने और केरीकेचर बनाने में हमारे शिक्षकगण सबसे आगे होते हैं। और कहते हैं कि बड़ा कचरा लिख रहे हैं।हल्का लिख रहे हैं। यानी हमारे शिक्षकों को निरंतर लिखने वाले से खास तरह की एलर्जी है।वे यह भी कहते हैं कि फलां का लिखा अभीतक इसलिए नहीं पढ़ा गया या विवेचित नहीं हुआ क्योंकि जब तक उनकी एक किताब पढकर खत्म भी नहीं हो पातीहै तब तक दूसरी आ जाती है।इस तरह के अनपढों के तर्क उसी समाज में स्वीकार किए जाते हैं जहां लिखना अच्छानहीं माना जाता। कहीं न कहीं गंभीर लेखन के प्रति एक खास तरह की एलर्जी या उपेक्षा जिस समाज में होती है वहींपर ऐसी प्रतिक्रियाएं आती हैं। इस तरह की मनोदशा के प्रतिवादस्वरूप त्रिलोचन ने लिखा है- "शब्द/ मालूम है/व्यर्थ नहीं जाते हैं/पहले मैं सोचता था/उत्तर यदि नहीं मिले /तो फिर क्या लिखा जाय/किन्तु मेरे अन्तरनिवासी ने मुझसे कहा- लिखाकर/तेरा आत्म-विश्लेषण क्या जाने कभी तुझे/एक साथ सत्य शिव और सुंदर को दिखा जाय/अब मैं लिखा करता हूँ/अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने/कागज पर बस उतार देता हूँ/"
हिन्दी से जुड़े अधिकांश जटिल सवालों की हमारी समीक्षा ने उपेक्षा की है। वे किसी भी साहित्यिक और सांस्कृतिकबहस को मुकम्मल नहीं बना पाए हैं। हिन्दी में साहित्यिक बहसें विमर्श एवं संवाद के लिए नहीं होतीं,बल्कि यह तोएक तरह का दंगल है,जिसमें डब्ल्यू डब्ल्यू फाइट चलती रहती है।हमने संवाद,विवाद और आलोचना के भी इच्छितमानक बना लिए हैं। इसे भी हम अनुशासन के रूप में नहीं चलाते।
परंपरा का मूल्यांकन करते हुए हमने सरलीकरण से काम लिया है।परंपरा की इच्छित इमेज बनाई है परंपरा की जटिलताओं को खोलने की बजाय परंपरा के वकील की तरह आलोचना का विकास किया है। परंपरा का मूल्यांकनकरते हुए जो लेखक-शिक्षक परंपरा के पास गया वह परंपरा का ही होकर रह गया। परंपरा के बारे में हमारे यहां तीनतरह के नजरिए प्रचलन में हैं। पहला नजरिया परंपरावादियों का है जो परंपरा की पूजा करते हैं।परंपरा में सब कुछ कोस्वीकार करते हैं। दूसरा नजरिया प्रगतिशील आलोचकों का है जो परंपरा में अपने अनुकूल की खोज करते हैं और बाकीपर पर्दा डालते हैं।तीसरा नजरिया आधुनिकतावादियों का है जो परंपरा को एकसिरे से खारिज करते हैं। इन तीनों हीदृष्टियों में अधूरापन है और स्टीरियोटाईप है।
परंपरा को इकहरे,एकरेखीय क्रम में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।परंपरा का समग्रता में जटिलता के साथ मूल्यांकन कियाजाना चाहिए।परंपरा में त्यागने और चुनने का भाव उत्तर आधुनिक भाव है। यह भाव प्रगतिशील आलोचकों में खूबपाया जाता है। परंपरा में किसी चीज को चुनकर आधुनिक नहीं बनाया जा सकता। नया नहीं बनाया जा सकता। परंपराके पास हम इसलिए जाते हैं कि अपने वर्तमान को समझ सकें वर्तमान की पृष्ठभूमि को जान सकें।हम यहां तक कैसेपहुँचे यह जान सकें।परंपरा के पास हम परंपरा को जिन्दा करने के लिए नहीं जाते। परंपरा को यदि हम प्रासंगिकबनाएंगे तो परंपरा को जिन्दा कर रहे होंगे। परंपरा को प्रासंगिक नहीं बनाया जा सकता।परंपरा के जो लक्षण हमें आजकिसी भी चीज में दिखाई दे रहे हैं तो वे मूलत: आधुनिक के लक्षण हैं, नए के लक्षण हैं।नया तब ही पैदा होता है जबपुराना नष्ट हो जाता है। परंपरा में निरंतरता होती है जो वर्तमान में समाहित होकर प्रवाहित होती है वह आधुनिक काअंग है।
हिन्दी में सबसे ज्यादा अनुसंधान होते हैं।आजादी के बाद से लेकर अब तक कई लाख शोध प्रबंध हिन्दी मेंलिखे जा चुके हैं।सालाना 7 हजार से ज्यादा शोध प्रबंध हिन्दी में जमा होते हैं। लेकिन इनमें एक फीसद शोध प्रबंधों में भी सामयिक समाज की धड़कन सुनाई नहीं देगी। हमें विचार करना चाहिए कि रामविलास शर्मा, नगेन्द्र,नामवरसिंह, विद्यानिवास मिश्र, मैनेजर पांडेय, शिवकुमार मिश्र, कुंवरपाल सिंह , चन्द्रबलीसिंह , परमानन्द श्रीवास्तव, नन्दकिशोरनवल आदि आलोचकों ने कितना वर्तमान पर लिखा और कितना अतीत पर लिखा है ? इसका यदि हिसाब फैलायाजाएगा तो अतीत का पलड़ा ही भारी नजर आएगा। ऐसे में हिन्दी के वर्तमान जगत की समस्याओं पर कौन गौर करेगा? खासकर स्वातंत्र्योत्तर भारत की जटिलताओं का मूल्यांकन तो हमने कभी किया ही नहीं है।

शुक्रवार, 17 जून 2016

आलोचना की समस्याएँ -



हिन्दी में रचनाएँ हैं, रचनाकार भी हैं।लेकिन कोई बहस नहीं है।एक ज़माना था हमारे पास नामवर सिंह ,रामविलास शर्मा थे, लेकिन आज आलोचक नहीं है। आज के लेखक के पास जीवन के व्यापक अनुभव हैं और उन पर वह जमकर लिख रहा है।वह अपनी अनुभूतियों से इस तरह चिपका हुआ है कि वह निजी अनुभूतियों के परे कुछ भी देख नहीं पा रहा। इस पूरे परिदृश्य में यह सवाल उठा है कि क्या साहित्य के लिए अनुभूतियों का होना ही ज़रूरी है ? क्या दुख या उत्पीड़न के अनुभवों के आधार पर ही महान रचना बन सकती ? ग़ौर से सोचें नामवरजी ने भी दुख देखा है, ग़रीबी भी देखी है, लेकिन क्या ग़रीबी और दुख की अनुभूति या उसे देखने मात्र से बेहतरीन साहित्य रचा जा सकता है ? कहने का आशय यह कि लिखने के लिए अनुभूति के अलावा भी चीज़ें चाहिए। अनुभूतियों अलावा सबसे बड़ी चीज़ है विचारधारा , लेकिन लेखक के पास जब तक एक सुसंगत वैचारिक दृष्टि न हो वह चीज़ों को देख ही नहीं सकता।दूसरी चीज़ चाहिए अकादमिक अनुशासन।अनुभूति, वैचारिकदष्टि और अकादमिक अनुशासन इन तीनों चीज़ों के सहमेल से साहित्य का सर्जनात्मक फलक बनता है।
अभी जितने बडे पैमाने पर लेखन आ रहा है वैसा लेखन प्रवाह पहले कभी नहीं देखा गया, इस प्रवाह में बहुत कुछ "लेखन के लिए लेखन"की तर्ज़ पर लिखा हुआ है।

आलोचना के अनुपलब्ध क्षेत्र-

भारत में चार बडे पैराडाइम शिफ़्ट हुए हैं, पहला है लोकतंत्र का उदय,दूसरा,भारत विभाजन,तीसरा है आपातकाल और चौथा है इंटरनेट -डिजिटल क्रांति । सवाल यह है कि हिन्दी साहित्य और आलोचना इन चारों पैराडाइम को कैसे अभिव्यंजित करती है ।
पहले हिंसा थी इन दिनों डिजिटल हिंसा है।पहले कम्युनिकेशन था आज नेट कम्युनिकेशन है।अहिंसा का व्यापक चित्रण है लेकिन मानवतावाद ग़ायब है। पहले अभिव्यक्ति थी अब कोलाहल है।अब चुप रहनेवालों की निंदा ख़ूब होती है। पहले किताब आती थी अब किताब का इवेंट्स होता है। किताब पर बातें कम और इवेंट्स पर बातें ज़्यादा होती हैं।इन दिनों हिंसा पर टीवी या नेट पर आलोचना ज़्यादा दिखती है नीचे ज़मीनी स्तर पर आलोचना नज़र नहीं आती।यह एक तरह से हाइपर वायरलेंस है।उसी तरह स्त्री भी हाइपर सैक्सुअलिटी में रूपान्तरित हो गयी है। अब हम स्त्री के नहीं हाइपर स्त्री के रूपों और विमर्शों में उलझे हैं।फलत: रीयल औरत और रीयल हिंसा को लेकर यथार्थजीवन में चुप्पी साधे हैं। इसी तरह आजाद भारत में दंगे कभी आलोचना का मूल विषय नहीं बन पाए।साम्प्रदायिकता के वैचारिक स्वरूप पर तो लिखा गया लेकिन दंगा पीड़ितों पर कुछ भी नहीं लिखा गया।दंगाई संगठनों की सांगठनिक और वैचारिक सारणियों को हमने कभी खोला तक नहीं। भारत विभाजन हमारे समाज का सबसे भयानक पहलू है लेकिन आलोचना उस पर चुप है, यह चुप्पी क्यों? इस सवाल को बहसयोग्य क्यों नहीं माना गया ? इससे भी भयानक पहलू है दोनों विश्वयुद्ध का समीक्षा से ग़ायब रहना, अकाल का मुख्य एजेंडा न बन पाना ।

यथार्थहीन समीक्षा -

सवाल यह है क्या अकाल, दो विश्वयुद्ध और भारत विभाजन के बिना आधुनिककाल और आधुनिक समीक्षा पर बातें करना संभव है। आलोचना का काम है अनुपब्ध को उपलब्ध कराना। लेकिन अधिकतर मामलों में आलोचना उपलब्ध को ही उपलब्ध कराती रही है। युद्ध और भारत विभाजन ने अमानवीकरण के सवालों को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया लेकिन हमने अमानवीकरण पर बातें ही नहीं कीं।साहित्य और मानवीयता के अंतस्संबंधपर विचार करने की बजाय अन्य मसलों पर बहस करते रहे।अत:इसे "यथार्थहीन समीक्षा" कहना समीचीन होगा। "यथार्थहीन समीक्षा" वह है जिसमें समसामयिक सामाजिक जीवन नदारत है। यह जीवंत यथार्थ से संवाद नहीं करती।यह ऐसी आलोचना है जो पब्लिक ओपिनियन नहीं बनाती ।यह लोकतांत्रिक संस्थानों की समस्याओं को नहीं उठाती।
हिन्दी आलोचकों ने स्थिर यथार्थ पर ख़ूब लिखा है, लेकिन रूपान्तरित यथार्थ पर कम लिखा है।रूपान्तरित यथार्थ के सवालों का वर्तमान से संबंध है जबकि स्थिर यथार्थ का अतीत से संबंध है।टीवी इमेजों से प्रभावित आक्रामकता का अभिव्यक्ति के रूपों के साथ गहरा संबंध है।टीवी से प्रभावित समीक्षा और इमेज स्वभक्षक है।यह लेखक और आलोचक के स्थान को छीन रही है।
मज़ेदार बात है कि साहित्य और समीक्षा की किताबें आ रही हैं, तरह तरह के विषयोंपर प्रस्तुतियाँ आ रही हैं, लेखकों के जमघट लग रहे हैं , साहित्यमेले हो रहे हैं लेकिन हार्दिकता और संवेदनाएँ ग़ायब हैं। साहित्य की इस तरह की हृदयहीन प्रस्तुतियाँ ने व्यापक फलक को घेर लिया है।आज आलोचना और साहित्य की यह सबसे बड़ी चुनौती है कि वह वर्तमान के ज्वलंत सवालों पर बोले। वह उन विषयों पर समर्पण न करे जो मीडिया या सत्ता निर्मित हैं या फिर तात्कालिकता के दबाव में हैं। वह सवालों से भी बचे जो कुछ क्षण बाद ख़त्म हो जाते हैं। आलोचना और कला में रीयल सवाल ग़ायब हुए हैं उसके दो बडे कारण हैं, पहला, भूमण्डलीकरण और दूसरा है तकनीकी-वैज्ञानिक प्रौपेगैण्डा ।इन दोनों ने मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण किया है जो वास्तविकता से नहीं मिलता।इन दोनों के कारण यथार्थ की बजाय निर्मित यथार्थ सामने आया , मनुष्य ग़ायब हो गया है।

यहाँ उदाहरण के लिए निर्मल वर्मा के लिखे आलोचना निबंधों को लें, जब यह भाषण दिया गया तो देश को आजाद हुए ५० साल हो गए थे। उस मौक़े पर उन्होंने विषय चुना " मेरे लिए भारतीय होने का अर्थ " सतह पर देखने पर यह विषय सुंदर है लेकिन , निर्मल वर्मा के यहाँ भारत और भारतीयता की धारणा स्थिर और सामयिक सच से कोसों दूर है, " भारतीय" और " भारतीयता " या किसी भी अवधारणा का सामयिकता और प्रक्रियाओं से संबंध होता है ? यदि हाँ तो निर्मल वर्मा ने इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया ? भारतीयता या देशप्रेम या राष्ट्र राज्य आदि की धारणाएँ प्रक्रिया में ही समझी जा सकती हैं ।
(जामिया मिलिया में आज रिफ्रेशर कोर्स में दिए व्याख्यान का अंश)


शनिवार, 1 नवंबर 2014

नामवर सिंह और साहित्य की कसौटियाँ


 

मार्क्स से एकबार एक पत्रकार ने पूछा था कि मार्क्सवाद क्या है ? तो मार्क्स ने कहा कि यह स्वयं के ख़िलाफ़ संघर्ष है। तक़रीबन इससे मिलती - जुलती बात देरिदा ने अपने अंतिम साक्षात्कार में कहीं कि ' मैं स्वयं के ख़िलाफ़ युद्धरत हूँ ।'यह बात उन्होंने जिस समय कहीं उस समय वे गंभीर शारीरिक कष्टों और बीमारियों से जूझ रहे थे । तक़रीबन यही नज़रिया हिन्दी आलोचक नामवर सिंह का रहा है। वे निरंतर अपने कहे से संघर्ष करते रहे हैं।

   पिछले दिनों उनको दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सुनने का मौक़ा मिला । ज्ञानपीठ द्वारा आयोजित 'वाक्' नामक कार्यक्रम में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं जिनसे उनके अंदर की छटपटाहट का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। उनकी पहली गंभीर आलोचना तो यह थी कि उनसे लोग तीखे आलोचनात्मक सवाल नहीं पूछते,विश्वनाथ त्रिपाठी ने बातचीत की जो पृष्ठभूमि तैयार की थी उसकी आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि आपने जिस तरह से पूछा है उससे तो सारी बातचीत संस्मरणात्मक होकर रह जाएगी, जबकि मैं चाहता हूँ कि लोग आलोचनात्मक सवाल करे। लेकिन जैसाकि होता रहा है उनसे किसी ने आलोचनात्मक सवाल नहीं पूछा ।

 आमतौर पर नामवर सिंह स्वयं के प्रति बेहद क्रिटिकल रहते हैं और श्रोता लोग भक्ति भाव में डूबे रहते हैं। यह जटिल स्थिति है कि आलोचक तो क्रिटिकल है लेकिन जनता नहीं। इससे एकबात का अंदाज़ा लगता है कि आलोचना परिवेश का क्षय हुआ है । 

   आलोचना परिवेश के क्षय में आलोचकों और लेखकों और हिन्दी विभागों के पठन- पाठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नामवरजी ने इसी कार्यक्रम में कहा कि हमने विभागों सर्जना निर्माण के लिए विकास नहीं किया । कविता, कहानी आदि रचनात्मक विधाओं के लेखक तैयार नहीं किए। पीएचडी के पोथे लिखने वाले तैयार किए। इससे सर्जनात्मकता का विकास नहीं हुआ। 

 समस्या यह है कि स्वयं नामवरजी जब पढ़ाते थे तो उनका सर्जनात्मक प्रतिभाओं के प्रति द्वेषपूर्ण राजनीतिक रुख़ क्यों था ? वे निजी तौर पर सर्जनात्मक क़िस्म के मेधावी छात्रों को बढ़ावा देने की बजाय ग़ैर- सर्जनात्मक छात्रों को बढ़ावा क्यों देते रहे ? मसलन मनमोहन, असदजैदी,उदयप्रकाश,  कुलदीप कुमार आदि को बढ़ावा देने की बजाय उनका ग़ैर- रचनात्मक क़िस्म के छात्रों की ओर झुकाव क्यों रहा ? यह बात मैं इसलिए रेखांकित कर रहा हूँ जिससे नामवरजी के ग़ैर- सर्जनात्मक मन की थाह ले सकूँ। 

   नामवरजी के कई मन हैं। कई नज़रिए हैं। सवाल यह है कि एक आलोचक को क्या कई मन रखने चाहिए ? यदि किसी आलोचक के पास कई मन हैं तो इसका अर्थ है कि वह उनका मन अवसरवादी है। नामवरजी कभी गंभीर आत्मालोचना क्यों नहीं करते कि उनके आलोचनात्मक विवेक और जीवन विवेक में गहरे अंतराल हैं जिनके ज़रिए अवसरवाद ने आलोचना में गहरी पैठ बना ली है। 

 नामवरजी की ख़ूबी है कि वे अपने निजी जीवन को निजी रखते हैं और उसको कभी सार्वजनिक बहस में नहीं आने देते । निजी के वे ही पहलू सामने आते हैं जो सार्वजनिक कर्म का हिस्सा रहे हैं । निजी और पब्लिक में नामवरजी का यह संतुलन देखने योग्य है। 

   नामवरजी ने बड़े ही तरीक़े से इस कार्यक्रम में बताया कि वे कैसे पढे , उन्होंने किससे भाषा सीखी , किनका उनके ऊपर असर था, साथ ही बेबाकी के साथ यह भी बताया कि किस तरह उन्होंने तीन सप्ताह के अंदर भारत भूषण अग्रवाल के कहने पर ' कविता के नए प्रतिमान' किताब लिखी , जिसे बाद में साहित्य अकादमी से पुरस्कृत किया गया। उन्होंने साफ़ कहा कि यह किताब तो मैंने साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए लिखी थी । यह किताब पांडित्यपूर्ण ज़्यादा है और इसमें आलोचना कम है। 

 नामवरजी की इस घटना से मुझे यह सवाल उठाने की इच्छा हो रही है कि हम कैसे जीएँ ? और किस तरह जीते रहे हैं ? हर लेखक को इन दोनों सवालों को अपने तरीक़े से खोलना चाहिए । नामवरजी ने कैसे जीएँ ? सवाल का हल कैसे निकाला इसका उत्तर उनके लंबे दैनन्दिन जीवन में फैला हुआ है जिसमें अनेक बातें हैं जिनको सीखने की ज़रुरत है मसलन् भाषा पर उनका जो अधिकार है वह चीज़ सीखने की है। वे बेहतर हिन्दी गद्य लिखते और बोलते हैं। उदात्त ,उत्तेजक और मधुर काव्यात्मक गद्य के उन्होंने बेहतरीन मानक बनाए हैं । इसके अलावा व्यक्तिगत जीवन में वे भ्रष्ट नहीं रहे हैं। उनके ऊपर पक्षपात और आत्मगत फ़ैसले लेने के आरोप लगते रहे हैं और हो सकता है इनमें से कई फ़ैसले ग़लत रहे हों लेकिन वे निजी तौर पर भ्रष्ट नहीं हैं। बौद्धिक ईमानदारी का उन्होंने भरसक पालन किया है। 

   ज्ञान को पढ़कर हासिल करना और अपडेट रखना उनकी महत्वपूर्ण विशेषता है। इसके अलावा उनकी जीवनशैली संगठित और सुनियोजित रही है। इसमें सुबह चार बजे उठना , पढ़ना और टहलना नियमित कार्य हैं । कोई भी घर आए तो आने देना कोई भी बुलाए तो उसके कार्यक्रम में जाना यह उनकी मिलनसारिता के गुण हैं। वे निजीतौर पर कभी किसी से ख़राब नहीं बोलते चाहे वो जितना ही ख़राब बोलता रहा हो। व्यवहार में उदात्तता को नामवरजी ने जिस तरह ढाला है वह सीखने लायक चीज़ है। नामवरजी के जीवन की धुरी उदात्त व्यवहार और उदार मूल्यों से बनी है। 

इसमें गाँव के किसान का बोध है , इसमें महानगरीय जीवन की ध्वनियाँ हैं और बातें करेंगे तो इसमें ग्लोबल नागरिक का विश्वबोध भी है। वे लोकल और ग्लोबल एक ही साथ नज़र आते हैं। पहनावे और जीवनशैली में लोकल और नज़रिए में ग्लोबल या यों कहें खाँटी मार्क्सवादी की तरह विश्वदृष्टि से ओतप्रोत नज़र आते हैं ।

   नामवरजी के आसपास या दूर रहने वाले लोग यह सोचते हैं कि वे अपने छात्रों को रचते रहे हैं, बनाते रहे हैं, लेकिन सच यह नहीं है। नामवरजी ने किसी को नहीं बनाया। निर्मित करना उनकी पद्धति और नज़रिए का अंग कभी नहीं है। यह बात मैं इसलिए उठा रहा हूँ क्योंकि अनेक लोग यह सवाल उठाते रहे हैं कि नामवरजी ने क्या निर्मित करके दिया ? कैसा विभाग दिया ? कितने मेधावी तैयार किए? 

 असलमें , नामवरजी ने हमें यह बताया कि कैसे जिएँ । इससे यह निष्कर्ष न निकालें कि वे निर्मित करते रहे हैं।किताब कैसे पढें? किताबों और जीवन के विविध आयामों से जुड़े सवालों को कैसे देखें ? यह उनकी अकादमिक शिक्षा का हिस्सा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे बंदे तैयार करते रहे हैं। एक अच्छे शिक्षक का काम है बताना , समझाना न कि निर्मित करना। परिवार, परंपरा,साहित्य, कला, राज्य, पति-पत्नी संबंध, प्रेम, राजनीति आदि के विभिन्न जटिल पक्षों को वे विभिन्न बहानों के ज़रिए छात्रों के सामने रखते रहे हैं। इसमें ही जीवन जीने की कला के सूत्र भी देते रहे हैं यानी कैसे जीएँ के मंत्र बताते रहे हैं।

   इस समूची प्रक्रिया में सवाल यह भी उठा कि हम ज्ञान के लिए जी रहे हैं या सामाजिक ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के लिए जी रहे हैं? किसके लिए पढ़ रहे हैं ? ज्ञानार्जन के लिए या समाज को बदलने के लिए ?  नामवरजी का एक ही उत्तर होता था कि शिक्षा का लक्ष्य है सामाजिक परिवर्तन न कि ज्ञानार्जन। कैसे जिएँ और कैसे मरें , यह कला हमें सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल होकर सीखनी चाहिए।

   नामवरजी पर बातें करते समय उनके आलोचक और बाग़ी भाव की ख़ूब बातें होती हैं लेकिन जो बात उनकी रचना से लेकर व्यवहार तक फैली है और जिसका ज़िक्र नहीं होता वह है उनका मानवाधिकारवादी नज़रिया। 

 नामवरजी स्वभाव से मानवाधिकारों के कट्टर पक्षधर हैं और मैंने अनेकबार उनको बहुत क़रीब से जानने और समझने की कोशिश की है तो पाया है कि मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में रहने के कारण वे अनेकबार अपनी विचारधारा का , मार्क्सवाद का भी अतिक्रमण कर जाते हैं। आपातकाल की चूक केअलावा वे समूचे जीवनकाल मानवाधिकारों के पक्ष में बोलते और लिखते रहे । उनकी समीक्षा को मार्क्सवाद की कसौटी पर कसने की बजाय मानवाधिकार के पैमानों पर देखा जाए तो ज़्यादा बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं। 

 वे जीवन की निरंतरता को साहित्य की निरंतरता में खोजते हैं ,जिसे वे परंपराओं की खोज कहते हैं। उनका मानना है कि भारत में एक नहीं अनेक परंपराएँ हैं। परंपरा की खोज का अर्थ मृत तत्वों की खोज करना नहीं है बल्कि जीवंत तत्वों की खोज करना है यही वह बिंदु है जहाँ से वे जीवंत के साथ जुड़ने का नज़रिया देते हैं। जीवन जीने की कला का एक नया मंत्र देते हैं कि जीना है तो जीवंत रहो और जीवंत से जुड़ो।यही जीवंतता असल में आलोचना में मानवाधिकार है ।

   हमने कभी गंभीरता के साथ मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य के आधार पर धारणाएँ बनाने या समीक्षा का मूल्याँकन करने का प्रयास नहीं किया । हम हमेशा तयशुदा धारणाओं में सोचते रहे हैं इससे आलोचना की क्षति हुई है।

   नामवरजी का बाग़ी भाव मंच पर बहुत अपील करता है और इस बाग़ी भाव को अनेक लोग मार्क्सवादी भाव समझते रहे हैं। नामवरजी के मंचीय बाग़ी भाव का मार्क्सवाद से कोई लेना देना नहीं है। यह अनेकबार नाॅस्टेल्जिया के रुप में आता रहा है। 

   नामवरजी की वक्तृता शैली में नाॅस्टेल्जिया जब भी आता है तो बाग़ी होकर ही आता है। बाग़ी भाव में वे जब भी बोलते हैं तो भिन्न रंग में नज़र आते हैं क्योंकि कोई न कोई समस्या उनको अंदर से उद्वेलित करती है और इसके समाधान को वे बाग़ी भावबोध में खोजने की कोशिश करते हैं।इसके चलते वे अपने ही नज़रिए से मुठभेड़ करते नज़र आते हैं। सभी लोग यही शिकायत करते हैं इसबार नामवरजी ने अपनी पुरानी बात का खंडन कर डाला या जो लिखा है उसकी ही आलोचना कर दी। 

 नामवरजी के बाग़ी का नाॅस्टेल्जिया अंततः स्वयं उनके ही ख़िलाफ़ ले जाता है क्योंकि वे समस्या विशेष से परेशान रहते हैं और यही परेशानी उनको बार -बार बाग़ी बनाती है, नास्टेल्जिक  बनाती है, परंपरा की ओर ले जाती है। वे जीवंत तत्वों की खोज करते हैं और इस क्रम में अपने को प्रासंगिक बनाते हैं, मंचों पर अपनी माँग बनाए रखते हैं, हर खेमे में माँग बनाए रखते हैं। यह उनके मंचीय तौर पर ज़िन्दा बने रहने का मंत्र है। 

नामवरजी जब मंच पर होते हैं तो मंच पर होने से ज़्यादा मंच के बाद याद किए जाएँ इसमें उनकी दिलचस्पी ज़्यादा होती है। अनेक वक़्ता मंच पर ही अप्रासंगिक हो जाते हैं लेकिन नामवरजी के साथ ऐसा नहीं है वे मंच पर बोलते हुए तो प्रासंगिक रहते हैं उनके भाषणों को लोग बाद में भी याद रखते हैं, उद्धृत करते हैं और अब तो अनेक किताबें बाज़ार में हैं ,जिनमें उनके भाषण हैं। इनमें प्रासंगिक विचार भरे पड़े हैं। इन विचारों की बुनियाद है जीवंतता ।

 नामवरजी के विचारों को हमें परंपरागत प्रतिबद्धता के दायरे के बाहर रखकर देखना होगा। वे बहुलतावादी प्रतिबद्धता को अभिव्यंजित करते हैं। वे महज़ पार्टी प्रतिबद्धता या वर्गीय प्रतिबद्धता के आधार पर समझ में नहीं आ सकते। बहुलतावादी प्रतिबद्धता का दायरा व्यापक है और इसमें विभिन्न विचारधाराओं के लिए जगह है। नामवरजी ने वर्गीय प्रतिबद्धता से बहुलतावादी प्रतिबद्धता के दायरे में कब प्रवेश किया इसका सही से वर्ष बताना मुश्किल है लेकिन वे आज़ादी के बाद क्रमश: इस दिशा में सचेत रुप से शिफ़्ट करते हैं और यह बहुलतावाद उनके वैचारिक नज़रिए को भी प्रभावित करता है जिसके कारण वे कम्युनिस्ट पार्टी से बाहर निकल आते हैं। नामवरजी की प्रतिबद्धताएँ वर्ग से निकलकर बहुलतावादी संरचनाओं की ओर चली जाती हैं और वे विगत छह दशकों से इसे समृद्ध कर रहे हैं । 'कविता के नए प्रतिमान'असल में बहुलतावादी नज़रिए की ही अभिव्यक्ति है। वहाँ सलीक़े से अंतर्विषयवर्ती पद्धति का वे समीक्षा की धारणाओं लिए इस्तेमाल करते हैं । मज़ेदार बात है कि यह बहुलतावाद अकेले नामवरजी में ही नहीं है बल्कि हिन्दी के अधिकांश आलोचकों में है और इसकी शुरुआत मुक्तिबोध से होती है।

     नामवरजी के नज़रिए में ' मैं' और ' सामाजिक' का द्वंद्व है। इसमें उनका 'मैं' हारा है  ,और ' सामाजिक' जीता है।  नामवरजी ने' आत्म- संरक्षण' की कभी कोशिश नहीं की। उनका ' मैं' बार-बार पदों पर ठेलता है लेकिन ' सामाजिक' हमेशा बाहर खींचता है। इसमें कईबार उनका 'मैं' जीता है ,और ' सामाजिक' हारा है।

   नामवरजी के लिए भाषण अंतहीन क्रांति है। वे लगातार भाषण देते रहे हैं। भाषण देने को न मिले तो बेचैन रहते  हैं, दो दिन के बाद यदि उनके बयान पर चर्चा बंद हो जाए तो उद्विग्न हो जाते हैं , नए मंच की तलाश में वे अपनी अंतहीन भाषण क्रांति को साकार करते रहे हैं। नामवरजी के लिए तो भाषण ही क्रांति है।वे मंच के अनुकूल और दर्शकों के अनुकूल बोलने की कला में दक्ष हैं। वे बोलते समय किसी एक घटना विशेष को आधार बनाकर नई से नई धारणा का प्रतिपादन करने में समर्थ हैं। इसके आधार पर वे हर क़िस्म के दर्शकों का मन जीतने में सफल रहे हैं। वे इस तरह दर्शकों को तो आकर्षित कर लेते हैं लेकिन शिक्षित नहीं कर पाते। क्योंकि श्रोता जानते हैं कि नामवरजी किस स्कीम के तहत बोल रहे हैं।फलत: औसत श्रोता को वे  अपील करते हैं लेकिन गंभीर श्रोताओं को निराश करते हैं। 

   नामवरजी के लिए साहित्य की कसौटियों के  सवाल हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं अत: कसौटियों पर बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में विचार करने की ज़रुरत है। 

 

 ग़ौर करें तो इनदिनों हर लेखक अपनी विचारधारा को वैध मानकर चल रहा है। वैधता की कसौटी पर हर लेखक की विचारधारा ज़रुरी नहीं है कि खरी उतरे। जिस तरह प्रत्येक लेखक वैध नहीं हो सकता उसी तरह प्रत्येक विचारधारा भी वैध नहीं हो सकती । क़ायदे से हमें वैधता की कसौटियाँ खोजनी होंगी । 

   साहित्य में वैधता की कसौटियाँ बदलती रही हैं। कल तक समाजवाद की कसौटी वैध थी लेकिन आज वैध नहीं लगती।  १३वीं सदी से लेकर १८वीं सदी तक अनेक सामंती कसौटियाँ वैध लगती थीं लेकिन १९वीं सदी आने के साथ सामंती कसौटियाँ वैध नहीं रह गयीं। १९वीं सदी में पूँजीवादी कसौटियाँ वैध लगने लगीं। 

   यही हाल समाजवादी कसौटियों का है बीसवीं सदी के आठवें दशक तक समाजवादी कसौटियां वैध थीं , कालांतर में वे ही कसौटियाँ अवैध लगने लगीं। इसी तरह साहित्य में हमने लंबे समय तक भारतेन्दु साहित्य के आधार पर साहित्यिक कसौटियाँ बनायीं लेकिन छायावाद के दौर में वे अप्रासंगिक लगने लगीं। यहाँ तक कि साहित्य की अवधारणा भी बदल गयी। 

 इसी तरह प्रगतिवाद के दौर में साहित्य की नयी कसौटियाँ सामने आईं और स्वयं छायावादी लेखकों ने अपनी बनायी कसौटियों को छोड़ दिया और प्रगतिवाद की कसौटियों को अपना लिया। जिन लेखकों ने प्रगतिशील आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी उनको चंद वर्षों में प्रगतिवाद की कसौटियाँ अप्रासंगिक लगने लगीं और आधुनिकतावादी कसौटियाँ वैध लगने लगीं। कसौटियों में निरंतर आए बदलाव बताते हैं कि कसौटियाँ बदलती रही हैं। कसौटियाँ जड़ नहीं होतीं। लेकिन लेखकों का एकवर्ग ऐसा भी है जो कसौटियों को बदलना नहीं चाहता। मसलन् अनेक प्रगतिशील लेखक आज भी समाज और साहित्य को समाजवाद की कसौटियों के आधार पर देख रहे हैं। जबकि जिन देशों के समाजवादी प्रयोगों से ये लेखक प्रभावित हैं उन देशों में समाजवाद का अंत हो चुका है। यही हाल भूमंडलीकरण के गर्भ से उपजी साहित्यिक कसौटियों की है। भूमंडलीकरण के गर्भ से उपजी कसौटियाँ हाशिए पर जा चुकी हैं। 

     कसौटियों को शाश्वत मानना रीतिवाद है। हमारे लेखक की मनोदशा यह है कि वह एकबार किसी कसौटी को अपना लेता है तो उससे सारी ज़िन्दगी बँधा रहता है। लेखक की मनोदशा ऐसी क्यों है कि वह कसौटियाँ नहीं बदलता ? कसौटियों का पुनर्मूल्यांकन नहीं करता ? 

 साहित्य में कसौटियों का बार- बार मूल्याँकन करने की ज़रुरत है। हमने अंतर्वस्तु से लेकर रुप -तत्व तक के सभी मानकों का पुनर्मूल्यांकन क्यों नहीं किया ? कुछ ख़ास लेखकों के पसंदीदा मूल्यांकनों के ज़रिए हम कसौटियों के बदलने की प्रक्रिया को समझ ही नहीं सकते। 

 

   प्रत्येक कसौटी और विचार के पुनर्मूल्यांकन की ज़रुरत हमेशा बनी रहती है। पुनर्मूल्यांकन ही कसौटियों को वैध बनाता है। कसौटी की वैधता पर विचार करते समय हमें रुपान्तरण के बिन्दुओं पर नजर रखनी होगी । स्थिर मूल्यबोध के दायरे के बाहर निकलना होगा । 

     वैधता के सवालों पर बात करते समय हमें मूल्यों के विवेकवादी विमर्श को सामने लाने की ज़रुरत है । हमने इन दिनों आमफहम बातचीत या स्टीरियोटाइप विमर्श या तर्कों को ही ज्ञान विमर्श बना लिया है और विचारों की गतिशीलता और विवेकवाद को ठंडे बस्ते में डाल दिया है । 

 मूल्यों के नाम पर जो भी विमर्श आ रहा है राजनीतिक अर्थशास्त्र के साथ यांत्रिक संबंध बनाकर आ रहा है। चूँकि यह दौर नव्य आर्थिक नीतियों का है तो बिना विवेकवादी पड़ताल किए यांत्रिक ढंग से भूमंडलीकरण पर सरलीकरणों के ज़रिए बातें हो रही हैं। ख़ूब लिखा जा रहा है। 

   इस समूची प्रक्रिया में लेखक का सामयिक राजनीति  और मूल्य व्यवस्था से अलगाव बढा है । लेखकों के मन में पूँजीवाद के तर्क को जाने बिना उसके प्रति घृणा पुख़्ता हुई है या लगाव बढ़ा है। यह फंडामेंटलिज्म है जो पुराने समाजवादियों , उपभोक्तावादियों और नए धार्मिक कठमुल्लों में देखने को मिलता है। 

 

   आयरनी यह है कि लेखक को विकास चाहिए लेकिन भूमंडलीकरण के बिना, माॅल चाहिए या नई जीवनशैली चाहिए नए मूल्यबोध के बिना। अनेक इलाक़ों में ड्रेसकोड ,मोबाइल आदि के साथ लड़कियों के संबंधों को लेकर तनाव पैदा हुआ है। प्राइवेसी के सवाल उठे हैं।इस क्रम में परंपरागत कम्युनिकेशन और जनसंचार के बीच में तनाव पैदा हुआ है । 

   परंपरागत कम्युनिकेशन पुरानी नैतिकता के आधार पर प्रसारित हो रहा है जबकि जनसंचार नई पूँजीवादी अबाध संचार के आधार पर सम्प्रेषण कर रहा है ।इन दोनों दृष्टियों में विवेकवादीदृष्टि नदारत है। यह दोनों अतिवादी छोर हैं।  इस तरह के संचार रुपों के ज़रिए हम जनता की इच्छाओं की सही ढंग से पड़ताल नहीं कर सकते। 

     इसी तरह पुरानी नैतिकता या सामंती हेकड़ियों के आधार पर नैतिकता के सम्प्रेषण को वैध नहीं माना जा सकता । उसी तरह अबाध कम्युनिकेशन भी इस तनाव को दूर करने का समाधान नहीं है । कम्युनिकेशन के इन दोनों रुपों के बीच तनाव पैदा हुआ है ।

 

   इस दौर में  लेखकों के एक बड़े समुदाय में 'गतिहीन अ-राजनीतिक चेतना 'ने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। वे लेखक  या उसकी रचना का विचारधारारहित मूल्याँकन कर रहे हैं। संयोग से यह काम वे लोग कर रहे हैं जो प्रगतिशील समीक्षक कहलाते हैं । 

 आज के दौर की  पहली चुनौती है कि लेखन और लेखक के जीवन में 'अ-राजनीतिक 'माहौल ख़त्म किया जाय। 'अ-राजनीतिक 'माहौल के कारण सांस्कृतिक क्षय की ओर हम ध्यान ही नहीं दे पा रहे हैं । 'अ-राजनीति 'की सीमाओं को गिराए बिना कोई भी बड़ा परिवर्तन समाज में लाना संभव नहीं है । ऐसी अवस्था में हमेशा राज्य के हस्तक्षेप की माँग उठती है  या फिर न्यायालयों से हस्तक्षेप की माँग करते हैं । 

   साहित्य में व्याप्त  अ-राजनीतिक माहौल में दलगत प्रतिबद्धता ने बड़ी भूमिका अदा की है। 

     लेखक की मंशा की साहित्य की अभिव्यक्तियाँ विश्लेषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है । समस्या यह है कि हमने लेखक की मंशाओं के निर्माण की प्रक्रियाओं की ओर ध्यान नहीं दिया। 

 लेखक की मंशा को वे चीज़ें प्रभावित करती हैं जिनको लेखक जानता है वे चीज़ें और प्रक्रियाएँ भी प्रभावित करती हैं जिनको वह नहीं जानता!  मंशा के ज्ञात -अज्ञात स्रोतों की खोज करना आलोचना का काम है । मंशा को निर्मित करने में लेखक का समसामयिक समय तो प्रभावित करता ही है अतीत का समय भी अनेक मामलों में पीछा करता है। अभिव्यक्ति के रुपों में अतीत के साथ कहीं कशमकश मिलती है तो कहीं अतीत से मुक्त होने की छटपटाहट मिलती है । 

     इसी तरह लेखक के प्रेरक स्रोतों की भी खोज की जानी चाहिए । प्रेरक स्रोतों में हम अमूमन उसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता को ही मुख्य रुप में विवेचित करते रहे हैं। उसके परिवार , मित्र, बचपन आदि को कभी न तो कृति के साथ जोड़कर देखा और नहीं आत्मकथाओं में दिखाई दिया। 

   यह विलक्षण बात है कि बचपन का अधिकांश लेखकों की आत्मकथाओं में वर्णन नहीं मिलता। बचपन के साथियों और पड़ोसियों का ज़िक्र नहीं मिलता। बचपन के बिना लेखक की आत्मकथा कैसे बन सकती है? पड़ोसियों के वर्णन और ब्यौरों के बिना कैसे कोई लेखक बड़ा हो सकता है ? 

 कभी हमने राजनीतिक विचारधारा से इतर कारकों जैसे बाज़ार की शक्तियों और मीडिया के प्रेरक तत्वों की भूमिका पर सकारात्मक ढंग से विचार ही नहीं किया । पूँजीवाद या परवर्ती पूँजीवाद के स्टीरियोटाइप रुपों की कभी मीमांसा नहीं की। पूँजीवाद और परवर्ती पूँजीवाद में सर्जनात्मक सक्रियता बनाने वाले तत्वों को हमने कभी खोलकर विश्लेषित नहीं किया। 

लेखक को पूँजीवादी व्यवस्था के कौन से तत्व या मूल्य प्रेरित करते हैं ?या उसे लिखने के लिए उदबुद्ध करते हैं? इसी तरह राज्य के कौन से तत्व हैं जो लेखक को उदबुद्ध करते हैं ?  इत्यादि सवालों पर हमने कभी गंभीर बहस नहीं चलायी। 

   लेखक के सामने संकट यह है कि वह नहीं जानता कि वह जिन मूल्यों को जीता है वे राज्य निर्मित हैं। राज्य निर्मित मूल्यों और नैतिकता के मानकों के दायरे में रहकर ही वह अपना सृजन करता है। राज्य निर्मित मूल्य लेखक को जब अप्रासंगिक लगते हैं तो उसके पहले वे राज्य को भी अप्रासंगिक लगने लगते हैं। वास्तव में यही लगता है कि लेखक पुराने मूल्यों को चुनौती दे रहा है लेकिन वस्तुत: वह राज्यनिर्मित मूल्यों में आए तनावों और अन्तर्विरोधों को अभिव्यंजना देता है। जो अंतर्विरोध लेखक की रचना में नज़र आते हैं वे असल में पहले राज्य महसूस करता है।राज्य सिर्फ़ अर्थव्यवस्था को ही नियमित नहीं करता बल्कि संस्कृति को भी नियमित करता है। राज्य जब प्रेरक बनकर आता है तो लेखक के  प्रेरणास्रोतों में तनाव, बेचैनी और टकराव पैदा कर देता है। 

   राज्य ने जीवनशैली में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। ड्रेस बदली है,खान-पान बदला है, मित्रता के मानक बदले हैं। वर्गसंघर्ष को और भी मुश्किल बना दिया है। राज्य स्वयं अपने बनाए मानकों को बनाए रखने में असमर्थ साबित हुआ है। मसलन अनेक इलाक़ों में जातीय सहिष्णुता का ह्रास हुआ है। बहुलतावादी नज़रिए की बजाय एक ही नज़रिए से चीज़ों को देखने पर ज़ोर दिया जा है। यहाँ तक कि राज्यसत्ता के विभिन्न संस्थानों को अनुदारवादी हमलों में सक्रिय भूमिका अदा करते देखा गया है। 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

हिन्दी साहित्य के जुगनूओं की बोगस दुनिया



हिन्दी लेखकों पर दलितलेखकों ने बहुत सही जगह आलोचनात्मक हमला किया है और इसके कारण हिन्दी के आलोचक दलितलेखकों से घबडाए हुए बात करते हैं। प्रार्थनाशैली में बात करते हैं,झूठी प्रशंसाभाव करते हैं। इस आलोचना का सामाजिक परिणाम यह निकला कि हिन्दी के एक नामी कथाकार को 60साल बाद पता चला कि वह आरक्षित जाति में आता है। अब समझ जाइए इस शर्मनाक चालाकी को कि ये 60साल तक साहित्य की मलाई खाते रहे। जबकि साहित्य को कोटि को ही दलित लेखक नहीं मानते। वे कहते हैं यह वर्णवादी कोटि है। वे दलितसाहित्य की नई कोटि की हिमायत करते हैं। अब सवर्णलेखक अपने पूर्वजों में दलितजाति खोज रहे हैं और बेशर्मी से कह रहे हैं मेरे पूर्वज दलित थे। असल में साहित्य की यह नई बीमारी है। वर्ण बीमारी।
-2-
हिन्दी में लेखक-प्रोफेसर आए दिन गरीबीभरा अतीत, सत्ता के दबाब, ह्रासमेंट, विक्टमाइजेशन आदि के आए दिन किस्से सुनाते हैं और सहानुभूति जुगाड़ करने की कोशिश करते हैं। ये साहित्य के थोथे किस्से हैं। थोथे किस्सों से लेखक- प्रोफेसर समझ में नहीं आता।
-3-
यह दौर अमीरों पर भी तबाही लेकर आया है किंगफिशर और सहारा के मालिकों पर जिस तरह कानून की गाज गिरी है उसने कारपोरेट ईमानदारी को नंगा कर दिया है।
-4-
हिन्दी में जो लोग कहते हैं साहित्य की गोष्ठियां और धड़ेबंदी महान बनाती है वे जरा रामविलास शर्मा से सीखें कि किस तरह साहित्य साधना महान बनाती है. हिन्दी के ज्ञानी गुणी और पुरस्कार प्राप्त लेखक शोहरत के नशे में इस कदर डूबे हैं कि वे रामविलास शर्मा की पूजा करना जानते हैं लेकिन उनसे कोई बात सीखना नहीं चाहते। यह बीमारी बड़े लेखक -आलोचक से लेकर नए लेखकों तक फैली हुई है।
जो लेखक अपनी भाषा के साहित्यकार की मूल्यवान बातों को ग्रहण नहीं करते वे जल्द ही अंतर्ध्यान हो जाते हैं। वे साहित्य में जुगनू की तरह हैं।
-5-
हिन्दी में चुगद किस्म के लेखकों की भीड़ पैदा हो गयी है,इनमें कुछ नामी लेखक भी हैं , अकादमी पुरस्कार प्राप्त हैं , ये लोग अहर्निश आत्मप्रशंसा में लीन रहते हैं, आत्मप्रशंसा कोसाहित्य का चुगद भाव कह सकते हैं।ये लोग कम से कम लिखते हैं, हेकड़ी,शोहरत और दौलत के शुरूर में डूबे रहते हैं। इन लेखकों को मंन्नू भंडारी,मृदुलागर्ग,मैत्रेयी पुष्पा जैसी लेखिकाओं से अभी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। इन लेखिकाओं ने बिना किसी अंहकार, हेकड़ी, चमचागिरी के किस तरह हिन्दी साहित्य को श्रेष्ठतम रचनाएं दी हैं। खासकर मैत्रेयी पुष्पा ने तो कमाल किया है उसने बहुत कम समय में अनेक श्रेष्ठ उपन्यास दिए हैं।
-6-
जब पाठक लेखक के सामने हां -हां करता रहता है और लेखक की महानता का जयगान करता रहता है तो इस तरह के पाठक को हिन्दी का लेखक सुधीपाठक - जागरूकपाठक कहता है।
-7-
कोलकाता से दिल्ली,दिल्ली से मद्रास तक हिन्दी के जो लेखक सनसनाते चमचों के साथ मस्ती लेते नजर आते हैं और यह दावा करते हैं वे बेहद जनप्रिय हैं। वे एक सामान्य तथ्य की उपेक्षा करते हैं.वह यह कि हिन्दी के अधिकांश लेखकों से हिन्दीभाषी लड़कियां मिल नहीं पातीं या मिलना तक नहीं चाहतीं।
मसलन् आपको लेखक के इर्दगिर्द 3-4चार चमचे मिल जाएंगे, लेकिन चमचागिरी करते लड़की नजर नहीं आएगी।
कहने का अर्थ है कि लेखक को चमचाकल्चर को साहित्यसंस्कृति समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।
-8-
आप यात्री की तरह कोलकाता को देखेंगे तो आपको यह शहर कभी समझ में नहीं आएगा।आज के दिन यही लगेगा कि यह शहर सरस्वती पूजा में डूबा है ,लेकिन यथार्थ एकदम विलोम है और भयावह है।
देश में बलात्कार के मामलों में यह राज्य विगत आठ सालों में टॉप पर है। अभी कुछदिन पहले ही एक शिक्षित परिवार के लोगों ने अपनी वृद्धा माँ को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और बाद में उसकी मौत हो गया। मुहल्ले के लोगों के दबाब में पूरे परिवार,जिसमें उस औरत का पति,बेटा,बहू आदि को गिरफ्तार करना पड़ा। पता चला वृद्धा को विगत दो सालों से अहर्निश यातनाएं दी जा रही थीं। इस तरह की औरतों को यातना की घटनाएं यहां आम हो गयी हैं। इसके बावजूद आप यदि सरस्वती पूजा के रस में निमग्न हैं तो रहें लेकिन इससे स्त्री के सम्मान और सुख का पता नहीं चलता। कोलकाता आज स्त्री के लिए सबसे त्रासद शहर में तब्दील हो चुका है। यदि आपके पास साहित्यिक नजरिया है तो आपको औरत की बदहाल अवस्था नजर क्यों नहीं आती ?
-9-
हिन्दी आलोचक का ईंधन है ईर्ष्या ! ये बेचारे नहीं जानते इससे निजी ब्लडप्रेशर हाइ रहता है।
-10-
हरिशंकर परसाई ने लिखा है - "श्रद्धेय, बड़े बौड़म लगते हैं। "
ये पंक्तियां हमारे उन तमाम लेखकों को अपने सीने पर लगानी चाहिए जो नगरी-नगरी श्रद्धालु खोजते फिर रहे हैं।
-11-
हरिशंकर परसाई ने लिखा है -" देश में जो मौसम चल रहा है उसमें श्रद्धा की टांग टूट चुकी है। " क्या हिन्दीलेखक गण सुन रहे हैं ?
-12-
हिन्दी में महानता का ढ़ोंग वे ज्यादा कर रहे हैं जो आत्ममुग्ध हैं और आत्मप्रशंसा में लीन हैं। ये लोग पढ़ते कम हैं हांकते ज्यादा हैं। भक्ति ( चाटुकारिता) करने वालों को ज्ञानी मानते हैं।
सवाल यह है कि यदि इस तरह के लोग ज्ञानी हैं तो लिखकर आम पाठकों को अपने ज्ञान से लाभान्वित क्यों नहीं करते ? ज्ञान पेट में रखने की चीज नहीं है अन्य को बताने की चीज है।
-13-
हरिशंकर परसाई ने विकलांग श्रद्धा का दौर निबंध में लिखा है- "यह चरण छूने का मौसम नहीं ,लात मारने का मौसम है।मारो एक लात और क्रांतिकारी बन जाओ।"
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शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

मुक्तिबोध और फेसबुक

-1- 

लाभ-लोभ से प्रेरित समझदारी ने मौजूदा संकट पैदा किया है। इस संकट को हम राजनीति से लेकर साहित्य तक सुरसा की तरह विराटरूप में देख रहे हैं। लाभ-लोभ से प्रेरित समझदारी के आप जितने गुलाम होते जाएंगे आप उतने टुच्चे,कमीने,भ्रष्ट और ओछे होते चले जाएंगे।

-2-

भीड़ और जुलूस में शामिल होने का अर्थ है आंतरिक व्यक्तित्व का संहार। जिन लोगों ने जुलूस को महान बनाया वे सोचें कि जुलूस महान कर्म है तो भीड़ का हमला भी महानता का डंका बजाएगा।

-3-

जो फटेहाल है,सामान्य है, उसे मान्यता देने के लिए कोई हिन्दीवाला विद्वान तैयार नहीं है। वे रावण की दासता स्वीकार करने की नेक सलाह देते हैं। वे समझदारी को पागलपन कहते हैं। व्यवहारवादी को दुनियादार कहते हैं। यदि उनके गुट में है तो समझदार है, और अन्य के गुट में हैं या किसी गुट में नहीं हैं तो बेबकूफ है,घटिया है,बोगस है। इस तरह की मनोदशावाले हिन्दीवाले वस्तुतःनैतिक और दैहिक तौर पर मृतवत् हैं। उनके यहां नैतिकता का अर्थ सौदेबाजी और अवसरवादिता है।

-4-

गधे को काका कहो। शैतान से समझौता करो। बड़ों की हाँ में हाँ मिलाओ ।यह बुर्जुर्गों ने सिखाया। सारी प्रगतिशीलता इस बीमारी से ग्रस्त है।

-5-

भ्रष्टाचार,अवसरवादिता और अनाचार वस्तुतःबुजुर्गों की देन हैं.यही बुनियादी कारण युवाओं की बुर्जुर्गों के प्रति कोई आस्था नहीं बची है।

-6-

कोर्स के लिए गेसपेपर लेखन वेश्यावृत्ति है।

-7-

हिंदी के शिक्षितों और खासकर लेखक-बुद्धिजीवियों की यह बीमारी है कि ये अपनों से ऐंठना और अपनों की उपेक्षा करना जानते हैं।वे अपनों को गले पड़ी चीज समझते हैं।

-8-

इस दौर में धुन का पक्का होना जरूरी है,इसके बिना आप कुछ भी नया रच नहीं सकते और नहीं नया सोच सकते हैं। यह दौर मनुष्य को उसकी धुन से वंचित करके बोरा बनाने में लगा है। जो धुन हो वो करो।

-9-

हिंदी की चरणस्पर्श संस्कृति की विशेषता है जब एकबार इसके चक्कर में फंसे तो फिर इससे बाहर कभी नहीं निकल सकते।

-10-

हिन्दीवाले की मनोदशा पर जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में सही लिखा था-

' सब मत्त लालसा घूँट पिये '.

-11-

महिला के ये रूप बड़े खतरनाक हैं- डॉन,(अनुसूया,म.प्र. की शराब डॉन और संतोषी), महिला डकैत, अधिनायकवादी राजनेत्री।

-12-

हिन्दी के प्रोफेसरों ने आत्म-श्रेयवाद और प्रतिष्ठावाद के नाम पर सारे नियम तोड़े हैं और साहित्यिक भ्रष्टाचार फैलाया है। वह अपने सुख की आराधना को साहित्य का महाधर्म मानता है। बल्कि यह साहित्य का भ्रष्टाचार है।

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कोलकाता में बंगाली बच्चे सीधे चरण छूते हैं और लड़कियां खासतौर पर बड़े कायदे से सचमुच में चरणों को स्पर्श करके माथे से लगाती हैं।यह सारा खेल निस्वार्थ भाव से करती हैं। लेकिन हिन्दीवाला चरणस्पर्श नहीं करता घुटना स्पर्श करता है ,झुकता है लेकिन चरणों तक नहीं जाता। बड़ा चतुर है हिंदीवाला !!

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हिन्दी का प्रोफेसर चरण छुओ संस्कृति को निजी परिस्थितियों को सुधारने का वैध उपाय मानता है। इसे वह चारित्रिक संकट नहीं ,बल्कि समझदारी कहता है।

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सुबह फोन करके कई हिंदी प्रोफेसर गरिया चुके हैं। कह रहे हैं तुम बड़े बुरे हो । पेशे के कौशल का मखौल उड़ाते हो। मैंने कहा मैं जब पढ़ाता हूँ तब तक मास्टर हूँ ,बाद में नागरिक हूँ। मैं 24 घंटे प्रोफेसरभाव में नहीं रहता। वे बोले हम तो सारी जिंदगी प्रोफेसरभाव में रहते हैं। मैंने कहा आप धन्य हैं और महान हैं ! मैं तो सारी जिंदगी नागरिकभाव में रहना चाहता हूँ।

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हिंदी के प्रोफेसर में ज्ञान और कर्म के अनुष्ठान में विश्वास नहीं है। वह तिकड़मबाजी को कर्म और ज्ञान मानता है।

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मैं हिंदी का प्रोफेसर हूँ लेकिन चरण स्पर्श के अनुपम सुख से वंचित हूँ। मेरे पास सबकुछ है लेकिन नौकरी दिलाने का हुनर नहीं है। मित्र लोग कहते हैं नौकरी लेनी है तो जगदीश्वर के पास मत जाओ। यानी नौकरी दिलाने वाले शिक्षक अलग और पढ़ानेवाले अलग। मैंने दिल्ली में मित्रों से पूछा बोले हमारे यहां भी यह परंपरा है और मजबूत परंपरा है। जब दिल्ली-कलकत्ते में यह हाल है तो बनारस-प्रयाग-मुंबई में भी चरणस्पर्श की बयार जरूर बह रही होगी। काश! हिन्दीवाले के चरण न होते !!नौकरियां न होतीं !!

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हिन्दी शिक्षकों में चरणस्पर्श और चरणरज की महिमा अपरम्पार है। जो काम नियम,तर्क और ज्ञान से नहीं होता वह यहां चरणरज के स्पर्श से हो जाता है। चरणस्पर्श करो और मनवांछित फल पाओ।

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पुराने लोग कहते हैं गायदर्शन से पुण्य मिलता है लेकिन भैंस दर्शन होने पर क्या गाँठ का पुण्य भी चला जाता है ?

( उपरोक्त विचारों के प्रेक मुक्तिबोध हैं) 

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

10 अक्टूबर रामविलास शर्मा के जन्मदिन पर विशेष - अस्मिता,आत्मकथा , हिन्दी जाति और रामविलास शर्मा (2)

आत्मकथा का पद्धतिशास्त्र- 

इन दिनों अस्मिता साहित्य के कई रूप प्रचलन में इन तमाम प्रवृत्तियों का बहुराष्ट्रीय बुर्जुआ विचारधारा से गहरा संबंध है। नई अस्मिता संस्कृति आमलोगों में 'निजी संतुष्टि' की भावना पैदा कर रही है। आम लोगों से कहा जा रहा है 'निजी संतुष्टि' पर ध्यान दें। 'निजी संतुष्टि' की भावना ने नागरिकबोध और नागरिकचेतना को कमजोर बनाया है।' निजी संतुष्टि' के नाम पर उपभोक्ता की स्वतंत्रता की बातें कही जा रही हैं। 

'निजी संतुष्टि' पर आधारित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर साहित्य में इनदिनों आत्मकथाओं की बाढ़ आ गयी है। 'निजी संतुष्टि' का सामाजिक मूल्यों के तानेबाने के साथ गहरा अन्तर्विरोध है। अनेक मामलों में आत्मकथाओं के विवरण और ब्यौरे नैतिक तौर पर अपमानजनक चीजों को पेश करते हैं। खासकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी संतुष्टि की धारणा की आड़ में व्यक्ति के एकाकी भावबोध को खूब बढ़ावा दिया जा रहा है। यह ग्लोबलाइजेशन का ग्लोबल फिनोमिना है। यह ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा है जो निजी तौर पर किसी विचार या विचारधारा से बंधा नहीं है। इसके पास किसी विचार या विचारधारा की परंपरा नहीं है। इसका प्रत्येक चीज और व्यक्ति के साथ बिनाशर्त संबंध है।

रामविलास शर्मा ने अपनी आत्मकथा 'अपनी धरती अपने लोग' में व्यक्ति और विचारधारा के अनतस्संबंध को उभारा है। लेखक की नागरिकचेतना और वर्गीयचेतना को उभारा है। लेकिन इन दिनों आने वाली स्त्री और दलित लेखकों की आत्मकथाओं में इसके विपरीत लक्षण देखने में आए हैं। वे ऐसे व्यक्ति का चित्रण करते हैं जो अंतर्वैयक्तिक (इंटरपर्सनल) संबंधों और नागरिक शिरकत के लिए किसी विचारधारा से जुड़ा नहीं है। उस पर उसकी मास्टरी नहीं है।

इस पूरी प्रक्रिया में सार्वजनिक मनुष्य की अवधारणा का क्षय हुआ है। इससे यह भी पता चलता है कि सार्वजनिक जीवन का क्षय हो रहा है। सार्वजनिक राजनीतिक स्पेस का क्षय हुआ है। वस्तुकरण और नौकरशाही की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसके अलावा सामाजिक बंधनों की कीमत पर आत्म-संतुष्टि, संवेदनात्मक अभिव्यक्ति और आत्म-क्षय की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह सामाजिक नार्सीज्म है। इसमें दैनंदिन जीवन की छोटी –छोटी आपातकालीन कथाएं हैं । इसमें सामाजिक प्रतिबद्धता और निजी लगाव का अन्तस्संबंध बड़े पैमाने पर टूटा है। अनेक स्थानों पर आत्मकथाओं में निजी लगाव की बातों पर जोर है और सामाजिक वचनवद्धता की उपेक्षा की गयी है।

यह नए किस्म का व्यक्तिवाद है। जिसका लक्ष्य है भौतिक लाभ पाना और निजी सफलता पाना। इसके पास छद्म प्रतिबद्धता है। इसके अन्य के सरोकार से बेखबर है। कहीं कहीं यह व्यक्तिवाद, सांस्कृतिक परंपरा,राजनीतिक संस्कृति और सामाजिक इतिहास के रूप में भी आया है।

कई आत्मकथाओं में ऐसी भाषा का इस्तेमाल हुआ है जिससे भाषा की मानवीयक्षमता का क्षय हुआ है। भाषा का काम है मानवीयक्षमता में इजाफा करना।साहित्य और सामाजिक जीवन में गाली-गलौज की भाषा मानवीयक्षक्षमता के क्षय का संकेत है।गाली-गलौज की भाषा या भाषा के असभ्य प्रयोग अंततः मानवीय क्षमता और व्यक्ति की निजी क्षमता को विकृत करते हैं। इस तरह के भाषिक प्रयोग इस बात का संकेत है कि निजी जीवन का ह्रास हो रहा है।

अस्मिता साहित्य के तहत जो आत्मककथाएं आई हैं उनमें एक अन्य फिनोमिना भी दिखाई दे रहा है और वह है निजी जीवन के सारतत्व और उसके ताने-बाने को पूंजीवादी-सामंती व्यवस्था खाए जा रही है। यहां अनेक मामलों में वह अपने को सामाजिक प्राणी के रूप में नहीं देखता । आत्मकथाओं में सेल्फ ऑब्शेसन और अबाधित आत्ममोह मुख्य चिंता की बात है। लेखक अपने निजी आंसुओं,कर्म और कष्टों का अतिरंजित वर्णन कर रहे हैं। इससे उन्हें 'सांस्कृतिक शांति' मिलती है। इसे समीक्षा में 'कल्चरल कूलिंग' या 'सांस्कृतिक शांति ' कहते हैं।

'सांस्कृतिक शांति' के फ्रेमवर्क में जब चीजें पेश की जाती हैं तो वे दलित और स्त्री दोनों का ही अपहरण करती हैं। वे आत्मकथाओं में ऐसा समाज रच रहे हैं जो अपने ही घेरे में बंद हैं। सेल्फ ऑब्शेसन और बाजार निर्मित अस्मिता के तत्वों को अपने अंदर समेटे है। यहां एक तरह से मानवीय व्यवहार का निजीकरण मिलेगा। यह सामयिक सांस्कृतिक अवस्था का लक्षण है। यहां निजी जीवन के अ-राजनीतिक और व्यक्तिगत विवरण और ब्यौरे छाए हुए हैं। इन कथाओं में सार्वजनिक और निजी के बीच में अंतर की दीवार भी धराशायी हो गई है। आत्मककथाओं में जो राजनीति आ रही है वह बाहरी राजनीतिक मसलों के संदर्भ में आ रही है। पहले निजी मसलों और राजनीति का संबंध मिलता है। खासकर रामविलास शर्मा की आत्मकथा में यह फिनोमिना नजर आता है। लेकिन इनदिनों आने वाली आत्मकथाओं में निजी को राजनीति से अलग एक भिन्न सामाजिक केटेगरी में रख दिया गया है। इस चक्कर में संस्कृति और राजनीति के बीच में फांक पैदा हो गयी है। इसके कारण लेखक का निजी जीवन अलग और राजनीतिक प्रसंग अलग नजर आते हैं।

आत्मकथा लेखन में एक और फिनोमिना नजर आता है वह है 'सांस्थानिक व्यक्तिवाद'। इसमें व्यक्ति अपनी आत्मकथा का आख्यान रचते हुए निज के द्वारा तय की गयी परिभाषाओं को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं। इस तरह की प्रस्तुतियां दलितलेखकों ने खूब लिखी हैं। यह आज के भूमंडलीकरण का प्रतिगामी बुनियादी लक्षण है।

इस धारणा के मानने वाले कहते हैं मौजूदा कनेक्टविटी के दौर में मनुष्य अपनी बार बार यात्रा करता है।नए सिरे से काम करता है।पुनर्पाठ करता है।व्यक्तिगत आदतों और अस्मिताओं की रोशनी में राज्य को देखता है। समाज को देखता है और बताने की कोशिश करता है कि यह विश्व किस दिशा में जा रहा है। यह पद्धति रामविलास शर्मा की आत्मकथा में भी इस्तेमाल की गयी है। इस पद्धति का प्रयोग करते हुए लेखक परंपरा से आधुनिकता की ओर प्रयाण करता नजर आता है। आत्म-निर्माण की प्रक्रिया नजर आती है लेकिन सांस्कृतिक वैविध्य या क्षेत्रीय सांस्कृतिक भिन्नताएं नजर नहीं आतीं।

पश्चिम और भारत में आत्मकथा लेखन में एक अंतर है, पश्चिम में आत्मकथा लेखक को इतिहास बहुत कम परेशान करता है। लेखक आसानी से अपने को इतिहास से मुक्त होकर लिखता है। लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। भारत में आत्मकथा या जीवनी में इतिहास आसानी से पीछा नहीं छोड़ता। पश्चिम के लेखक की अस्मिता ,इतिहास से अपने को अलग कर लेती है। भारत में लेखक की अस्मिता ,इतिहास से अपने को अलग नहीं कर पाती। परंपरागत समाज में व्यक्ति के पास न्यूनतम स्वायत्तता भी नहीं होती। जबकि आधुनिक धर्मनिरपेक्ष समाज उसे पूरी स्वायत्तता देता है।

पश्चिम में लेखक को परंपरा और सामाजिक इतिहास के ज्ञान के आधार पर समझने में मुश्किल से मदद मिलती है।जबकि भारत में उसके बिना समझना मुश्किल है। मसलन् ,रामविलास शर्मा की आत्मकथा या उनके द्वारा लिखी 'निराला की साहित्य साधना" में 1857 और परंपराएं व्यक्तित्व निर्माण के प्रमुख तत्वों में हैं। इसी तरह ओमप्रकाश बाल्मीकि की आत्मकथा में जातिप्रथा ऐतिहासिकता के साथ दाखिल होती है।

आधुनिकता के आने के साथ आधुनिकीकरण की अपार संभावनाएं पैदा होती हैं। व्यक्तिवादी ढ़ंग से विकास के अवसर पैदा होते हैं। आधुनिक संगठनों का उदय होता है। ये संगठन व्यक्ति के आत्म को नए सिरे से निर्मित करते हैं। उसके जीवन में अभिव्यंजित होते हैं। इनमें खासतौर पर शिक्षा और राजनीति के संगठनों के द्वारा व्यक्तित्व के नए रूपों के निर्माण में खाससतौर पर मदद मिलती है। इनसे विगत जीवन की अनिश्चितता और असुरक्षा से मुक्ति मिलती है।आत्मनिर्भर व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसी क्रम में कैरियर,परिवार,मित्र,कार्यक्षेत्र,प्रेम आदि के अंतर्विरोधों को हल करने में मदद मिलती है। यानी व्यक्ति एक नए किस्म के आधुनिक व्यक्तिवाद के जरिए अपना विकास करता है। इससे आत्म संचालित संस्कृति और आत्म निर्धारित आत्मकथा के रूपों का निर्माण होता है।

एक मर्तबा फ्रांसीसी लेखक जॉन पाल सार्त्र ने कहा था कि बुर्जुआ की तरह जन्म लेना ही काफी नहीं है ,बल्कि बुर्जुआजी की तरह जीना भी आवश्यक है। इसी नजरिए को आधार बनाकर रामविलास शर्मा और ओमप्रकाश बाल्मीकि अपनी आत्मकथाओं में यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि उनका व्यक्तित्व सेल्फमेड है। वे यह भी दर्शाते हैं कि उन्होंने अपना ही नहीं अपने परिवार,मित्र और संबंधियों के भी निर्माण में मदद की है। साथ ही यह भी संदेश देते हैं कि व्यक्तित्व निर्माण के प्रमाण समाज और आत्मकथा में चारों ओर पारदर्शी रूप में फैले हैं। इन दोनों लेखकों की आत्मकथाओं में जीवन के बारे में पुरानी निश्चितता नष्ट होती है और ये दोनों ही लेखक नए किस्म की निश्चित जिंदगी जीने के विकल्पों की ओर मुखातिब होते हैं।

रामविलास शर्मा और ओमप्रकाश बाल्मीकि की आत्मकथा वस्तुतःआत्मनिर्माण या सेल्फमेड व्यक्ति की आत्मकथा है। इस तरह की आत्मकथा में एक जोखिम है ,इसमें जो चीजें चुनी जा रही हैं उनमें जोखिम भी है। मसलन् रामविलास शर्मा कम्युनिस्ट पार्टी के होल टाइमर थे । लेकिन भयानक असुविधाओं का सामना करना पड़ा। फलतः उन्हें होलटाइमरशिप छोड़नी पड़ी।

लेखक जो कैरियर या जीवनशैली चुनना चाहता है।वह वैसा नहीं बन पाता । अतःजिस आत्मकथा को वह सेल्फमेड रूप में पेश करना चाहता है उसी आत्मकथा में वह ब्रेकडाउन जीवनी को भी पेश करता है।ब्रेकडाउन जीवनी के अनेक पहलुओं को बड़ी खूबी के साथ रामविलास शर्मा ने 'निराला की साहित्य साधना' में भी दरशाया है। निराला के सपने किस कदर टूटते हैं और वे जो बनना चाहते हैं वह नहीं बन पाते।जैसे जीना चाहते हैं वैसे जी नहीं पाते। जीवनी लेखन की यह पद्धति पूरी तरह उत्तर आधुनिक पद्धति है।मसलन् निराला चाहते थे कि महिषादल का राजा उनको गोद ले और वे राजकुमार की तरह जिंदगी व्यतीत करें। यह नहीं हो पाता और यह उनके जीवन की बड़ी पीड़ा बनती है।

लेखकद्वय ( रामविलास शर्मा-ओमप्रकाश बाल्मीकि) की आत्मकथाओं में परिवार बना रहता है और इन दोनों के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की भूमिका साफ नजर आती है। आधुनिक समाज में व्यक्तित्व निर्माण में राज्य की बड़ी भूमिका होती है लेकिन इन लेखकों के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की बड़ी भूमिका सामने आती है। दूसरा बड़ा संस्थान है शिक्षा व्यवस्था। शिक्षा की इनके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका नजर आती है। वहीं निराला का परिवार बिखर जाता है और परिवार उनके विकास में बहुत बड़ी बाधा बन जाता है।ठीक यही पहलू नामवरसिंह की आत्मकथा के अंशों में है। वहां परिवार नदारत है।परिवार के नाम पर विस्तारित परिवार के लोग भूमिका में नजर आते हैं। यही स्थिति अनेक लेखिकाओं की आत्मकथाओं में भी नजर आती है।

निराला-नामवरसिंह-मन्नूभंडारी आदि की जीवनी-आत्मकथाओं में सामाजिक परिस्थितियां,खासकर पारिवारिक परिस्थितियां ऐसी हैं जो इन व्यक्तियों को दंडित करती हैं। इन सभी लेखकों का व्यक्तिवाद इनको आगे ठेलता है और इसके कारण इनके सामाजिक अंतर्विरोध और भी गहराने लगते हैं।

रामविलास शर्मा,नामवरसिंह,ओमप्रकाश बाल्मीकि,मन्नू भंडारी आदि की आत्मकथाओं में व्यक्त तथ्य इस बात को पुष्ट करते हैं कि इन लेखकों के जीवन में व्यक्तिवादी दबाब इनको भविष्य की ओर ठेलते रहे हैं। व्यक्तिवादीकरण एक अपरिहार्य अवस्था है। इससे बचा नहीं जा सकता। लेखक के नाते ये लोग उसे नियोजित करके पेश करते हैं। ये अपने व्यक्तिवाद का विभिन्न बदली परिस्थितियों में इस्तेमाल करते हैं।

इन लोगों ने निजी तौर पर व्यक्तिवाद की आलोचना की लेकिन व्यक्तिवादीकरण इनकी मजबूरी है।यहीं पर इस प्रवृत्ति की बिडम्वना सामने आती है। इस क्रम में जहां एक ओर वे अपनी जीवनी बनाते हैं ,साथ ही अपने आसपास नेटवर्क भी बनाते हैं। यह नेटवर्क शिक्षा संस्थान,राजनीतिक दल,सांस्कृतिक संगठन आदि से बन रहा है। मसलन् ,रामविलास शर्मा,ओमप्रकाश बाल्मीकि, निराला आदि की आत्मकथा-जीवनी में परिवार और गांव के सामुदायिक जीवन या कॉमरेडशिप वाले दौर की अनिश्चितता सामने आती है। यह अनिश्चितता इनके आख्यान का सबसे बड़ा संसाधन है।

इन लेखकों के यहां एक चीज साझा है कि वे आधुनिक जीवन जीना चाहते हैं लेकिन आधुनिक जीवन जीना इनके लिए असंभव हो जाता है।ये रूटिन के बाहर रहकर जीना चाहते हैं लेकिन दैनंदिन रूटिन जीवन इनको अपनी ओर खींचता है। रूटिन चीजें इनके विचार और कर्म दोनों को प्रभावित करती हैं।

'रुटिन' की अमूमन आत्मकथा-जीवनी पढ़ते हुए हम उपेक्षा करते हैं। दैनंदिन रूटिन को व्यक्ति किस तरह आत्मसात करता है और आगे बढ़ता है इन सब बातों की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। 'रुटिन' के कारण व्यक्ति में सामुदायिक आदतों-संस्कारों आदि का निर्माण होता है। मसलन् प्रगतिशीलों में रहना, उनकी बातें करना,उनकी आदतों और व्यवहार को जीवन में उतारना आदि रूटिन सामूहिक आदतें हैं, इन्हें हम लेखक के प्रतिवादी कर्म के रूप में देखते हैं।

सामयिक भूमंडलीकरण के ग्लोबल फिनोमिना के अंग के रूप में आत्मकथाओं में नए किस्म का व्यक्तिवाद नजर आ रहा है। यहां लेखक नए रूप में अपनी खोज करता है। वह लिखता है अपने अतीत को बताने के लिए,लेकिन बताता है अपने व्यक्तित्व के रूपान्तरण को । वह यह भी दरशाता है कि वह ग्लोबल परिवर्तनों के साथ खुद भी बदल रहा है। लेखक अपनी जीवनी को नया रूप देने और दिशा देने में सक्षम है। यह ऐसा लेखक है जो अपने सांस्कृतिक प्रतीकों की स्वयं खोज करता है। नए भूमंडलीकरण में व्यक्ति की अस्मिता और सांस्कृतिक रूपों का वो सर्जक है।

दलितों की आत्मकथाओं में जीवनशैली का खूब चित्रण मिलता है। इसके विपरीत रामविलास शर्मा के यहां जीवनशैली के चित्रण पर जोर नहीं है। जीवनशैली वाला तत्व ग्लोबलाईजेशन का हिस्सा है। दलित की जीवनशैली के साथ एक बागी व्यक्तित्व सामने आता है। लाइफस्टाइल और रिवेल या बागी ये दोनों भूमंडलीकरण के फिनोमिना हैं। वे ऐसे व्यक्ति का चित्रण करते हैं जिसे यथास्थितिवाद पसंद नहीं है।

यथास्थितिवाद का बागी तेवरों के साथ निषेध करने वाले तत्व मासकल्चर में खूब मिलेंगे। जिस तरह मासकल्चर को बागी हीरो पसंद आते हैं. उनके संवादों को हम उद्धृत करते हैं। ठीक वैसे ही दलितसाहित्य और स्त्री साहित्य में भी बागी लेखक को पसंद किया जाता है। उनके चुभते संवाद पसंद आते हैं। उनका अविश्वास पसंद आता है। उनका इन चीजों का महिमामंडन पसंद आता है। इस तरह की प्रस्तुतियों की खूबी है कि आप उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते। चूंकि ये बदले हुए समय की तस्वीरें हैं,इनमें चीजें बदलती नजर आती हैं। वे अपनी अस्मिता को खोजते हैं,नया रूप देते हैं। ये तस्वीरें प्रेरक का काम भी करती है।

दलित आत्मकथाओं में मासकल्चर के बागी नायकों की तरह एक तरह का सांस्कृतिक अंतर्विरोध अंतर्ग्रथित है। वे सब कुछ अभी चाहते हैं। इनमें समाज,जाति,जीवनशैली आदि को तत्काल बदलने की आकांक्षा जमकर व्यक्त हुई है। वे अपने पाठक को 'ट्रांसफार्म' और 'इंप्रूब' करने की ओर ध्यान खींचते हैं।

आत्मकथाओं की हाल ही में जो बाढ़ आई है उसका एक और मकसद है सेल्फ थेरेपी करना। यह उपभोक्तावाद से जुड़ा फिनोमिना है। इसमें अस्मिता की इंस्टेंट इमेजों का खूब प्रक्षेपण हो रहा है। इस तरह की अस्मिता की एक ही मुश्किल है कि इसमें प्रभावित करने की क्षमता नहीं है। यह मीडिया में चल रहे अस्मिता के इंस्टेंट फ्लो से प्रभावित है इसमें तत्काल संप्रेषित करने और तत्काल परिणाम पाने की मंशा काम कर रही है। ये आत्मकथाएं मासकल्चर के फार्मूलों के आधार पर लिखी जा रही हैं।

मासकल्चर का फार्मूला है कि आप अपने अंदर कुछ भी इन्वेंट कर सकते हैं। इस काम से आपको कोई नहीं रोक सकता। सिर्फ तुमको चुनना है कि क्या इन्वेंट करना चाहते हो। जिस तरह माउस का बटन दबाते ही आप शिफ्ट कर जाते हैं। उसी तरह अस्मिता पर लिखी एक किताब से दूसरी किताब की ओर शिफ्ट कर जाते हैं। इसमें आपकी कोई विचारधारात्मक प्रतिबद्धता नहीं होती।

इन आत्मकथाओं में एक खास किस्म की जीवनशैली की ओर रूझान नजर आ रहा है और उसकी ब्रॉण्डिंग भी हो रही है। दलित अस्मिता का आधुनिक जीवनशैली में रूपान्तरण उसके व्यक्तित्व के छोटे –छोटे विवरण और ब्यौरों से भरा है। इन सभी आत्मकथाओं में व्यक्तित्व की लोचदार इमेज सामने आ रही है। इस इमेज का दलित की उपलब्धि और संभावनाओं के आधार पर निर्णय नहीं किया जा सकता। बल्कि इन आत्मकथाओं के बारे में हमें व्यक्तित्व के रूपान्तरण और लोच के आधार पर देखना चाहिए।

दलित आत्मकथाओं में दलित को शोषण और जाति उत्पीड़न के वैविध्यपूर्ण चित्रों के जरिए सजाने की कोशिश की जा रही है। इनमें चार फिनोमिना हैं। पहला फिनोमिना है नकारात्मक-सकारात्मक चीजों का। दूसरा है ,अलगाव और स्वाधीनता का। इसका सांस्कृतिक महत्व है। इसके अलावा इकसार सामाजिक संदर्भ बार बार सामने आया है। इसके कारण सामाजिक संदर्भ अप्रासंगिक हो गया है।सामाजिक संदर्भ को परंपरा और जातिप्रथा के इकसार या स्टीरियोटाइप संदर्भ ने अपदस्थ कर दिया है। सामाजिक संदर्भ की विभिन्न सीमारेखाओं को इनके जरिए अप्रासंगिक बनाया गया है।

दलित आत्मकथाओं में भूमंडलीकरण की तीन संवृत्तियां नजर आती हैं। प्रथम, परंपरा को कम करके देखा गया है। खासकर परंपरागत जीवनशैली की उपेक्षा की गयी है। इसी क्रम में वि-परंपरावाद का विकास हुआ है। पहले से चली आरही चीजें अब दलित आत्मकथाओं में सुरक्षाबोध पैदा नहीं करती।

दूसरी संवृत्ति है ,व्यक्ति की सामाजिकरेखाएं और परंपराएं टूट रही हैं। मसलन् ,शादी एक संस्थान है जो आत्मकथाओं में टूट रहा है या शादी पर पर्दा पड़ा है। तीसरा फिनोमिना है ,व्यक्ति के जीवन में बदलाव आ रहे हैं, उनकी व्याख्या विचारधारात्मक आधार पर होनी चाहिए।

व्यक्ति में आए बदलाव इनदिनों जितने ज्यादा आज नजर आ रहे हैं ,उतने पहले नजर नहीं आते थे। इसका प्रधान कारण है नव्य आर्थिक उदारीकरण। इसने निजीकरण की प्रक्रिया तेज की है। फलत आत्मकथाओं में निजी जीवन के दैनंदिन पहलू सामने आए हैं। निजी गुस्सा,भय,असंतोष ,संशय और अविश्वास ,सामाजिक अव्यवस्था और हिंसाचार के विवरण और ब्यौरे भी चले आए हैं।

दलित आत्मकथाओं के विवरण यह भी बताते हैं कि भारत में सामाजिक असमानता कम हो रही है। यह कम होती असमानता उनमें ज्यादा दिख रही है जो दलितवर्ग की निम्न अवस्था से रूपान्तरित होते हुए मध्यवर्ग या निम्न-मध्यवर्ग में आ गए हैं। इस क्रम में ये लोग अपने वर्ग से भिन्न वर्ग में रूपान्तरित हो गए हैं।

इन दिनों आत्मकथा विधा का दायरा लगातार विकसित हो रहा है। रामविलास शर्मा ने निराला के निजी पत्रों को शामिल करके पत्रों को साहित्य में शामिल करा दिया,लेकिन इसके दायरे में यात्रा संस्मरण,निजी डायरी और भाषण भी आते हैं। इस प्रसंग में मुख्य सवाल यह है कि हिन्दी में आत्मकथा को जनप्रिय होने में इतना समय क्यों लगा ? अंग्रेजी में आत्मकथा लंबे समय से विधा के रूप में लोकप्रिय रही है। हिंदी में यह 1990 के बाद ही लोकप्रिय हो पायी है और उस पर विभिन्न कोणों से बहसें हो रही हैं। इन बहसों में विधा और अंतर्वस्तु को जोड़कर नहीं देखा जा रहा। अधिकांश समय अंतर्वस्तु की विवेचना में ही आलोचकगण व्यस्त हैं।

यह भी देखने में आया है कि हिंदी में अनुदित होकर विदेशी लेखकों की आत्मकथाएं आ रही हैं और ये आत्मकथाएं बड़ी मात्रा में बिक रही हैं। आत्मकथा का पाठकवर्ग तैयार करने में इन अनुदित किताबों की बड़ी भूमिका है। हिंदी के साहित्यकारों की आत्मकथा और जीवनियां सिर्फ साहित्य के विद्यार्थियों के एक छोटे समूह में बिकती हैं। लेकिन अनुदित आत्मकथा की किताबें व्यापक जनसमूह में अपना पाठकवर्ग तैयार करने में सफल रही हैं।

आत्मकथा या जीवनी को हमें अस्मितासाहित्य की कोटि में रखकर विचार करना चाहिए। अभी तक हम इसे अस्मिता के दायरे में रखकर नहीं सोच रहे। किस दलितलेखक की आत्मकथा को हम अस्मिता के आधार पर देखने को तैयार हो जाते हैं लेकिन किसी गैर-दलित लेखक की आत्मकथा को अस्मिता के आधार पर देखने में असमर्थ रहे हैं। मसलन् ओमप्रकाश बाल्मीकि और रामविलास शर्मा की आत्मकथाएं अस्मिता की केटेगरी में रखकर पढ़ जानी चाहिए।

आत्मकथा या जीवनी मूलतः अस्मितासाहित्य है।इसके साथ ही जनजाति,अनुसूचित जाति,लिंग और वर्ग का साहित्य अस्मितासाहित्य है। किसी आदिवासी या स्त्री या दलितलेखकों की आत्मकथाओं में साझा सांस्कृतिक रूप,साझा सामाजिक परिस्थितियां और संघर्ष के साझा मुद्दों के दर्शन होते हैं। ये मुद्दे हैं- छूत-अछूत,शिक्षा में भेदभाव,श्रमविभाजन में भेदभाव, कृषिशोषण, जमीन के अधिकार, ऊँच-नीच के सवाल,वर्ण और जातिप्रथा, सेक्स, शारीरिक शोषण, पति-पत्नी में असमानता, स्त्री की अधिकारहीनता, मातहत भावबोध आदि। इन सभी में एक साझा तत्व है कि ये सभी स्वयं की पहचान को बनाने के लिए संघर्ष करती नजर आती हैं।

इनमें दूसरा साझा तत्व है कि लेखक जैसा महसूस करता है वैसा लिखता है। अन्य क्या महसूस करते हैं उस पर उसकी नजर नहीं है। कहानी-उपन्यास लिखते समय लेखक अन्य कैसे सोचता है इसके बारे में भी सोचता है लेकिन आत्मकथा में खासकर दलित और स्त्री की आत्मकथा में वह अपनी भाषा में ही सोचता है। निजी और सामाजिक जीवन के अछूते पक्षों को बताते समय उसकी नजर स्वयं पर होती है। वह स्वयं कैसे देखता है उसका ही चित्रण करता है। ऐसा करके लेखक दो काम करता है ,जहां वह अपनी बात कहता है वहीं पाठक के सामने यह स्थितियां पैदा करता है कि वह अन्य के साथ उसकी तुलना करे। अन्य हो सकता है समान हो ,भिन्न हो या उसके साथ अन्तर्विरोध हों।

एक और फिनोमिना है जिस पर ध्यान देना चाहिए कि आत्मकथाओं में अभी हम लेखक या लेखिकाओं की आत्मकथाओं पर ही ध्यान दे रहे हैं,लेकिन जो लेखक और लेखिका नहीं हैं,सामान्य लोग हैं उनकी आत्मकथा की ओर हम ध्यान नहीं दे रहे।

आत्मकथा मूलतः लेखक की सांस्कृतिक क्षति पूर्ति करती है। आत्मकथा के बहाने लेखक-लेखिका ने अपने सामाजिक जीवन में जो सांस्कृतिक क्षति उठायी है उसको वे हासिल करती हैं। वे उन बाधाओं की ओर ध्यान खींचते हैं जिनके कारण उनका विकास बाधित हुआ। मसलन्, दलितों या स्त्रियों या आदिवासी के जीवन में जिन बातों को छिपाया गया, जिस शोषण को छिपाया गया, जिस उत्पीड़न को छिपाया गया उससे उनकी सांस्कृतिक क्षति हुई और वे अपनी आत्मकथा लिखकर इस सांस्कृतिक नुकसान की भर पायी करते हैं।

आज जिस तरह आत्मकथा को सम्मान की नजर से देखा जाता है वह एक तरह से इन लेखकों की सांस्कृतिक क्षति की सामाजिक स्वीकृति है। उनका जो सांस्कृतिक स्थान समाज में छीना गया था उसे वे इसके जरिए हासिल करते हैं। वे अदृश्य थे और अदृश्य होना उनकी क्षति थी, आत्मकथा उनको दृश्य बनाती है, उनकी उपस्थिति का एहसास कराती है और इस तरह वे अपना खोया हुआ स्थान हासिल करते हैं। दलित या स्त्री या आदिवासी का दिखना स्वयं में बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि है। इसके अलावा आत्मकथा से साहित्य की प्रचलित विधागत मान्यताएं भी टूटती हैं। मसलन् लिंग,भाषा,जातिवाद,धर्म आदि के पूर्वाग्रह टूटते हैं।

आत्मकथा में व्यक्ति के विवरण ही नहीं होते बल्कि उसमें इस धरती या भूगोल का भी ब्यौरा चला आता है। मसलन् एक आदिवासी या दलित जब आत्मकथा लिखता है तो उसके लेखन में निजी जीवन के साथ उसका स्थानीय संसार भी चला आता है। जमीन या कृषि संबंध भी चले आते हैं। हमें देखना चाहिए कि जमीन और घर से लेखक का क्या संबंध है ? आत्मकथा में समय (टाइम) भी चला आता है। यह भी अंदाजा लगा सकते हैं कि उसके कानूनी अधिकार क्या हैं ?

स्त्री और दलित आत्मकथाओं से यह भी पता चलता है कि ये लोग अपने अतीत से कैसे मुक्त हो रहे हैं। इनका अतीत में जाना तीन काम करता है,पहला, स्त्री और दलित के अतीत के यथार्थ को सामने लाता है ,दूसरा, इस यथार्थ से मुक्त करता है।तीसरा, वे जिन चीजों को सबसे ज्यादा प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त करते हैं वह है श्रम,श्रम के विविध रूपों के चित्रण के जरिए वे श्रम को जीवन लाइफ लाइन के रूप में चित्रित करते हैं। साथ ही लाइफलाइन के अन्य रूप हैं खेत,कसाईघर,घरेलू काम,बच्चे पालना आदि। इनका चित्रण अंततः प्रतीकात्मक रूप में साहित्य में लाइनलाइन की अभिव्यक्ति है। इसमें जीवन के प्राचीनरूपों से लेकर मध्यकालीन रूपों को सहज ही देखा जा सकता है। इसके कारण आत्मकथा में प्रामाणिकता आती है।

आदिवासी,स्त्री और दलित की आत्मकथाओं में अनेक स्थानों पर इस तरह की लोकल भाषा मिलती है जो आमजीवन में सुनाई नहीं देती ,लेकिन आत्मकथा में है ,वह उनके जीवन में भी है। वहां ऐसे भाषिक प्रयोग मिल जाएंगे जो सामान्य भाषा में इस्तेमाल नहीं किए जाते। इनका विशिष्ट अर्थ है जो दलित या स्त्री के संदर्भ में ही इस्तेमाल किया जाता है। गिली देलुत्ज एवं फेलिक्स गुइतारी ने इसे “ मीनार लैग्वेज” यानी वर्चस्ववादी भाषा कहा है। इसकी इन दोनों आलोचकों ने काफ्का की भाषा के संदर्भ में “ काफ्काः टुवर्ड ए मीनार लिटरेचर ” (1975) में इस अवधारणा की चर्चा की है। यह ऐसी भाषा है जो इडियम की अस्मिता के वर्चस्ववादी रूप को सामने लाती है। इसके आमफहम अर्थ को सामान्य जीवन में खोजना मुश्किल है।फलतः यह मुख्यधारा के विमर्श को पटरी से उतार देती है।

स्त्री ,दलित और आदिवासी अल्पसंख्यक हैं और इसी नाते वे हाशिए पर हैं। ये लोग जब आत्मकथा लिखते हैं तो वे हाशिए की संस्कृति बनाते हैं। आमतौर पर हाशिए के लोगों को गैर-महत्वपूर्ण माना जाता है। यह बार बार कहा गया है कि हाशिए के लोगों का साहित्य मुख्यधारा के साहित्य की कोटि में नहीं आता। साहित्य की कोटि में स्त्रीसाहित्य और दलितसाहित्य नहीं आता। यह ऐसा साहित्य है जिसका अपना क्षेत्र नहीं था, साहित्य में कोई स्थान नहीं था।समाज में कोई स्थान नहीं था। लेकिन यह सीधे राजनीतिक साहित्य है। सवाल यह नहीं है कि स्त्रीसाहित्य या दलित साहित्य को साहित्य में जगह मिली या नहीं ? सवाल यह है कि यह साहित्य पाठक को साहित्य और राजनीति के बारे में सोचने के लिए मजबूर करता है या नहीं ? दलित और स्त्रीसाहित्य की भाषा इसी अर्थ में प्रचलित वर्चस्ववादी भाषा से भिन्न होती है। भिन्न भाषा में ही वे भिन्नसंसार पेश करते हैं। इसे वैकल्पिक भाषा भी कह सकते हैं इसकी समूची रणनीति इस बात से तय होगी कि लेखक, स्त्री और दलित के यथार्थ का कितनी गहराई में जाकर चित्रण करना चाहता है।

रामविलास शर्मा ने “घर की बात” किताब संपादित की है उसमें उनके परिवार के लोगों के बयान हैं। इसे आत्मकथा की कोटि में नहीं रख सकते। इसका प्रधान कारण है कि आत्मकथा वस्तुतः साझा लेखन नहीं है। आत्मकथा व्यक्तिगत लेखन है। एकल लेखन है।

आत्मकथा के अनेकरूप मिलते हैं जो भिन्न भी हैं, जैसे आत्मकथा, आत्मकथात्मक आख्यान, जीवन इतिहास,जीवनी,जीवन परिचय,आत्मकथ्य,इतिहास, स्थानीय इतिहास,वाचिक इतिहास,जनजातीय आत्मकथा और उपन्यास। ये सभी विधारूप स्वतंत्र हैं और किसी न किसी रूप में जुड़े हुए भी हैं।क्योंकि इन सबमें साझा तत्व है निजी जीवनानुभव। इनमें जो भेद है वो प्रच्छन्न और अंतर्वस्तु के स्तर पर है।

मसलन् किसी लेखक की आत्मकथा लिखने के लिए लेखन,भाषण और वाचिक संस्मरणों,जीवनानुभवों का महत्व है। इसमें जीवन के आरंभिक छोटे पक्ष से लेकर बड़े पहलुओं तक सारा संसार फैला हुआ है। एक सवर्ण लेखक की आत्मकथा में व्यक्तिगत जीवन विशिष्ट रूप में आता है,लेकिन स्त्री और दलित की आत्मकथा में निजी अनुभव विशिष्ट हैं और सामुदायिक भी हैं। इसमें वाचिक पृष्ठभूमि और तथ्यों की बड़ी भूमिका होती है।आत्मकथा को लेखक स्वयं लिखता है,जीवनी को अन्य कोई लिखता है। फलतः इनके उत्पादन और श्रवण में अंतर भी है। आत्मकथा क्या है यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी आत्मकथा की अवधारणा क्या है ? किस तरह उसे परिभाषित करते हैं ?

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मादाम द स्तेल के शब्दों में आत्मकथा में फ्रेंगमेंटेड यथार्थ विमर्श है। लेकिन रामविलास शर्मा ने आत्मकथा लिखते समय इस नियम का पालन नहीं किया बल्कि जीवनी लेखन के नियमों और संस्मरणशैली का पालन किया है। आत्मकथा में निष्कर्षों से बचा जाता है और पाठ खुला रहता है लेकिन “अपनी धरती अपने लोग” में वे ऐसा नहीं करते। जीवनकथा में लेखक के लिए तथ्य और सत्य की क्रमबद्ध प्रस्तुति महत्वपूर्ण होती है,जबकि आत्मकथा के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है। रामविलास शर्मा अपनी आत्मकथा में कहे हुए को लेकर बेहद सजग हैं, वे समस्त चीजों को एक ही नजरिए से पेश करते हैं।चीजों को एक ही नजरिए से पेश करना आत्मकथा का तत्व है।

एक शिक्षक और एक कम्युनिस्ट के रूप में रामविलास शर्मा के जो अनुभव रहे हैं उनको आत्मकथा में बहुत कम स्थान मिला है।इसका प्रधान कारण है कि एक शिक्षक के बहुत सारे व्यक्तिगत आचरण और अनुभव को कॉलेज-विश्वविद्यालय के लोग शेयर करते हैं अतःउनको बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती। दूसरी बात यह भी है अकादमिक जीवन में आम पाठकों की कम दिलचस्पी रहती है इसलिए भी कम लिखा है।

रामविलास शर्मा ने अपनी आत्मकथा को लिखते समय यह बताने की कोशिश की है कि उनके व्यक्तित्व का निर्माण कैसे हुआ? साथ ही प्रगतिशील साहित्य और संस्कृति का हिंदी में सृजन कैसे हुआ ? हिन्दी साहित्य और हिन्दीजाति के विकास की प्रक्रिया क्या है ? ये तीन बातें हैं जिनको वे आत्मकथा के बहाने संप्रेषित करना चाहते हैं। इसमें संस्मरण बिखरे पड़े हैं। वे संस्मरण की शैली में लिखते हैं और सजगता के साथ क्रमबद्धता को बनाए रखते हैं।

हिंदीसमाज,हिंदीजाति और रामविलास शर्मा का 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से गहरा संबंध सामने आता है। 1857 का संदर्भ प्रमुख संदर्भ है। जिसका वे व्यापक इस्तेमाल करते हैं। खासकर अवध का इलाका इन सबकी धुरी है। अवध की संस्कृति और उसका नॉस्टेल्जिया बार बार क्रांति तक के विचार और यूटोपिया को अपदस्थ कर देता है।

आत्मकथा में अनेक लोग हैं जो लेखक के जीवन की सफलताएं पढ़ना चाहते हैं। उनकी सफलताएं एक लेखक की सफलताओं के रूप में आती हैं। इसमें लेखन,साहित्य और राजनीति के व्यापक अनुभवों को पेश किया जाता है। रामविलास शर्मा ने इसी परिप्रेक्ष्य में व्यक्तित्व निर्माण में सफलताओं की कम और कला,राजनीति,दर्शन आदि की बड़ी भूमिका का व्यापक स्तर पर जिक्र किया है। साथ ही एक मार्क्सवादी के स्वप्न व्यक्त हुए हैं। लेखक के रूप में एक आंदोलनकारी लेखक,एक ऐसा लेखक जो विवाद पैदा करे।आलोचना के नए प्रश्नों को उठाए और अपनी जाति पर गर्व करे।

रामविलास शर्मा की आत्मकथा को पढ़कर यह लगता है कि वे मिलते थे सबसे लेकिन प्रभावित वे अपने मन से होते थे। वे अन्य को प्रभावित करते थे। उनकी आत्मकथा में यह तत्व उभरकर कम आया है कि वे किससे प्रभावित हुए अथवा उन पर प्रच्छन्नतः किसका प्रभाव था।

रामविलास शर्मा ने अपनी आत्मकथा को ’टाइप ’ के आधार पर लिखा है। यह इकरंगा टाइप है। रैनेसां के सद गुणों से युक्त व्यक्तित्व इसमें उभरकर सामने आता है। उन्होंने अपने लेखन के जरिए बताया कि हिंदी नवजागरण का साम्राज्यवाद के साथ अंन्तर्विरोध था। हिंदी में प्रतिवादी साहित्य का आरंभ नवजागरण से होता है। यह प्रतिवादी स्वर जितना नवजागरण में नहीं है उससे ज्यादा रामविलास शर्मा के व्यक्तित्व में है। आलोचना में उन्होंने नवजागरण को प्रतिवादी नजरिए से देखने की परंपरा डाली।

रामविलास शर्मा की आत्मकथा और नवजागरण विमर्श में गहरा संबंध है। मसलन् , हिंदी नवजागरण का आरंभ 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से होता है और आत्मकथा में भी 1857 का संदर्भ लाकर वे अपने को इसी परंपरा से जोड़ते हैं। निराला पर जीवनी लिखते समय भी वे यही पद्धति अपनाते हैं। यानी सन् 1857 का संग्राम किसी न किसी रूप में उनके आत्मकथा और जीवनी लेखन में संदर्भ के रूप में प्रस्थान बिंदु बना रहता है। इसका समग्र मॉडल पुंसवादी है।

पुंसवादी मॉडल अपनाते हुए रामविलास शर्मा ने स्वयं को निष्पाप,निष्कलंक और भूलों से रहित मर्द के रूप में पेश किया है। इसमें निजी कम है और सामाजिक ज्यादा है और सब कुछ व्यवस्थित और सुनिश्चित दिशा में पाठक को ले जाने वाला है। तकरीबन इसी शैली में नामवर सिंह ने भी लिखा है। इन दोनों में आत्म की वैधता की पुष्टि का भाव प्रबल है। इन दोनों से सवाल किया जाना चाहिए कि उनके जीवन में किसी स्त्री का प्रभाव पड़ा या नहीं ? उसके विवरण और ब्यौरे कहां हैं ? क्या मर्द लेखक के लिए स्त्री सिर्फ जन्म देने,ब्याह करने अथवा बेटी मात्र के संदर्भ के रूप में जिंदा है ? आश्चर्य की बात है इन दोनों के यहां मैँ,पत्नी और बेटी पर भी न्यूनतम लिखा गया है। औरत की आत्मकथा से एकसिरे से अनुपस्थिति सामाजिक सत्य के साथ पर्दादारी है।

आत्म की अभिव्यक्ति के लिए आत्मकथा लिखी जाती है और अंतमें आत्म पर ही सवाल खड़े करती है। इसे ही पाल दे मान ने ‘डिफेसमेंट’ की संज्ञा दी है। यह व्यक्ति विशेष के सरोकारों का ‘डिफेसमेंट’ है। लेकिन रामविलास शर्मा की आत्मकथा में ऐसा कुछ भी नहीं घटता, बल्कि सब कुछ नियोजित,तर्कपूर्ण और वैध दिशा में घटित होता है। हिंदीसमाज में ‘आत्मगोपन’ का महत्व है। ‘आत्मगोपन’ और ‘गोपन’ से समूचा समाज घिरा हुआ है। यह भाव रामविलास शर्मा और नामवर सिंह तोड़ नहीं पाए हैं।

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