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सोमवार, 19 सितंबर 2016

कम्प्यूटर युग में हिन्दी

          

सरकार की आदत है वह कोई काम जलसे के बिना नहीं करती। सरकार की नजर प्रचार पर होती है वह जितना हिन्दीभाषा में काम करती है उससे ज्यादा ढोल पीटती है।
सवाल यह है दफ्तरी हिन्दी को प्रचार की जरूरत क्यों है ॽ जलसे की जरूरत क्यों है ॽ भाषा हमारे जीवन में रची-बसी होती है।अंग्रेजी पूरे शासनतंत्र में रची-बसी है,उसको कभी प्रचार की या हिन्दी दिवस की तरह अंग्रेजी दिवस मनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। भाषा को जब हम जलसे का अंग बनाते हैं तो राजनीतिक बनाते हैं।हिन्दी दिवस की सारी मुसीबत यहीं पर है।यही वह बिन्दु है जहां से भाषा और राजनीति का खेल शुरू होता है।भाषा में भाषा रहे,जन-जीवन रहे,लेकिन अब उलटा हो गया है। भाषा से जन-जीवन गायब होता जा रहा है।हम सबके जन-जीवन में हिन्दी भाषा धीरे धीरे गायब होती जा रही है,दैनंदिन लिखित आचरण से हिन्दी कम होती जा रही है।भाषा का लिखित आचरण से कम होना चिन्ता की बात है।हमारे लिखित आचरण में हिन्दी कैसे व्यापक स्थान घेरे यह हमने नहीं सोचा,उलटे हम यह सोच रहे हैं कि सरकारी कामकाज में हिन्दी कैसे जगह बनाए।यानी हम हिन्दी को दफ्तरी भाषा के रूप में देखना चाहते हैं !

हिन्दी सरकारी भाषा या दफ्तरी भाषा नहीं है। हिन्दी हमारी जीवनभाषा है,वैसे ही जैसे बंगला हमारी जीवनभाषा है।हम जिस संकट से गुजर रहे हैं ,बंगाली भी उसी संकट से गुजर रहे हैं।अंग्रेजी वाले भी संभवतः उसी संकट से गुजर रहे हैं।आज सभी भाषाएं संकटग्रस्त हैं।हमने विलक्षण खाँचे बनाए हुए हैं हम हिन्दी का दर्द तो महसूस करते हैं लेकिन बंगला का दर्द महसूस नहीं करते।भाषा और जीवन में अलगाव बढ़ा है।इसने समूचे समाज और व्यक्ति के जीवन में व्याप्त तनावों और टकरावों को और भी सघन बना दिया है।

इन दिनों हम सब अपनी -अपनी भाषा के दुखों में फंसे हुए हैं। यह सड़े हुए आदमी का दुख है।नकली दुख है।यह भाषाप्रेम नहीं ,भाषायी ढ़ोंग है।यह भाषायी पिछड़ापन है।इसके कारण हम समग्रता में भाषा के सामने उपस्थित संकट को देख ही नहीं पा रहे।हमारे लिए आज महत्वपूर्ण यह नहीं है कि भाषा और समाज का अलगाव कैसे दूर करें,हमारे लिए जरूरी हो गया है कि सरकारी भाषा की सूची में अपनी भाषा को कैसे बिठाएं।सरकारी भाषा का पद जीवन की भाषा के पद से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है और यही वह बुनियादी घटिया समझ है जिसने हमें अंधभाषा प्रेमी बना दिया है।हिन्दीवाला बना दिया है।यह भावबोध सबसे घटिया भावबोध है।यह भावबोध भाषा विशेष के श्रेष्ठत्व पर टिका है।हम जब हिन्दी को या किसी भी भाषा को सरकारी भाषा बनाने की बात करते हैं तो भाषाय़ी असमानता की हिमायत कर रहे होते हैं।हमारे लिए सभी भाषाएं और बोलियां समान हैं और सबके हक समान हैं।लेकिन हो उलटा रहा है।तेरी भाषा-मेरी भाषा के क्रम में हमने भाषायी विद्वेष को पाला-पोसा है।बेहतर यही होगा कि हम भाषायी विद्वेष से बाहर निकलें। जीवन में भाषाप्रेम पैदा करें।सभी भाषाओं और बोलियों को समान दर्जा दें।किसी भी भाषा की निंदा न करें,किसी भी भाषा के प्रति विद्वेष पैदा न करें।दुख की बात है हमने भाषा विद्वेष को अपनी संपदा बना लिया है,हम सारी जिन्दगी अंग्रेजी भाषा से विद्वेष करते हैं और अंग्रेजी का ही जीवन में आचरण करते हैं।हमने कभी सोचा नहीं कि विद्वेष के कारण भाषा समाज में आगे नहीं बढ़ी है। प्रतिस्पर्धा के आधार पर कोई भी भाषा अपना विकास नहीं कर सकती।

मेरे लिए हिन्दी जीवन की भाषा है।इसके बिना मैं जी नहीं सकता।मैं सब भाषाओं और बोलियों से वैसे ही प्यार करता हूँ जिस तरह हिन्दी से प्यार करता हूँ।हिन्दी मेरे लिए रोजी-रोटी की और विचारों की भाषा है।भाषा का संबंध आपके आचरण और लेखन से है।राजनीति से नहीं।भाषा में विचारधारा नहीं होती।भाषा किसी एक समुदाय,एक वर्ग,एक राष्ट्र की नहीं होती वह तो पूरे समाज की सृष्टि होती है।



जब बाजार में कम्प्यूटर आया तो मैंने सबसे पहले उसे खरीदा,संभवतःबहुत कम हिन्दी शिक्षक और हिन्दी अधिकारी थे जो उस समय कम्प्यूटर इस्तेमाल करते थे।मैंने कम्प्यूटर की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली।मैं कम्प्यूटर के तंत्र को नहीं जानता,लेकिन मैंने अभ्यास करके कम्प्यूटर पर लिखना सीखा ,अपनी लिखने की आदत बदली,कम्प्यूटर पर पढ़ने का अभ्यास डाला।कम्प्यूटर आने के बाद से मैंने कभी हाथ से नहीं लिखा,अधिकांश समय किताबें भी डिजिटल में ही पढ़ता हूँ।जब आरंभ में लिखना शुरू किया तो उस समय यूनीकोड फॉण्ट नहीं था,कृति फॉण्ट था,उसमें ही लिखता था।बाद में जब पहलीबार ब्लॉग बनाया तो पता चला कि इंटरनेट पर यूनीकोड फॉण्ट में ही लिख सकते हैं और फिर मंगल फॉण्ट लिया,फिर लिखने की आदत बदली,और आज मंगल ही मंगल है।कहने का आशय यह कि हिन्दी या किसी भी भाषा को विकसित होना है तो उसे लेखन के विकसित तंत्र का इस्तेमाल करना चाहिए। भाषा लेखन से बदलती है,समृद्ध होती है।भाषा बोलने मात्र से समृद्ध नहीं होती।

हमारे एक मित्र हैं ,प्रोफेसर हैं,जब भी कोई उनसे पूछता है भाईसाहब आपकी विचारधारा क्या है तुरंत कहते हैं हम तो मार्क्सवादी हैं! लेकिन ज्यों ही भाषा की समस्या पर सवाल दाग दो तो उनका मार्क्सवाद मुरझा जाता है! वे उस समय आरएसएस वालों की तरह हिन्दीवादी हो जाते हैं।मार्क्सवाद और संघी विचारधारा के इस खेल ने ही हिन्दी को कमजोर बनाया है।हिन्दी को कमजोर संवैधानिक भाषादृष्टि ने भी बनाया है।हम संविधान में अपनी भाषा के अलावा और किसी भाषा को देखना नहीं चाहते।हम भूल जाते हैं कि हिन्दी संविधान या राष्ट्रवाद या राष्ट्र की नहीं जनता की भाषा है।वह भाषायी मित्रता और समानता में जी रही है,संविधान में नहीं।





गुरुवार, 21 जुलाई 2016

ग्राम्य -बर्बरता और गाली


फेसबुक पर कुछ लोग गजब तर्क दे रहे हैं,कह रहे हैं गालियों को धर्म के साथ न जोड़ें,हम यही कहेंगे धर्म के साथ जाति,रोटी,बेटी,नौकरी,हैसियत सब जुडी है फिर गाली ने ऐसा खास क्या किया है कि धर्म से काटकर गालियों को देखा जाए !
गाली देने वाले किस धर्म को मानते और जानते हैं,इससे स्वभावतःधर्म के साथ गालियां भी जुड़ेंगी।इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब राजनीति में गालियों के बिना संप्रेषण संभव है तो गालियां क्यों दी गयीं ?
फेसबुक पर बिना गालियों के बातें कह सकते हैं तो मोदीभक्त गंदी-गंदी गालियां क्यों लिखते हैं ?निश्चित तौर पर उनके संघ प्रतिपादित हिन्दू धर्म में गालियां परिशिष्ट के रूप में सिखाई जाती हों !
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में सबसे पिछड़े इलाके में भी आम लोग अशिक्षित लोग गालियां देकर बातें नहीं करते।गालियां समाज में से कैसे जाएं इस पर हमने सोचा ही नहीं।
हिन्दी के पब्लिक कम्युनिकेशन में गालियां जिस पर तरह प्रचलन में हैं कम से कम बंगला में यह सब नहीं है।बंगाली कभी आपस में बातें करते हुए गालियां नहीं देते,कलकत्ते में बात करते लोग देखें वे आमतौर पर गालियां नहीं बोलते,फिर हिन्दी में ही गालियां क्यों हैं ?
मैं नहीं जानता सच्चाई क्या है लेकिन लगता है हिन्दीभाषी मोदीभक्त फेसबुक पर गालियां ज्यादा देते हैं,उसी तरह आरएसएस से जुड़े संगठनों के हिन्दीभाषी नेता भी सार्वजनिकतौर पर आए दिन गालियां देते रहते हैं।
जंगली बुद्धि में गालियां रहती हैं,बुद्धि का यह रूप कहीं पर भी हो सकता है,लेकिन वहां पर इसका विकास ज्यादा होता है जहां पर ग्राम्य-बर्बरता बची हुई है।हिन्दीभाषी क्षेत्र में ग्राम्य-बर्बरता के खिलाफ हमने कोई जंग नहीं लड़ी,इसके विपरीत रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का सबसे बड़ा योगदान था कि उन्होंने ग्राम्य-बर्बरता के खिलाफ जंग लड़ी और उसे ध्वस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी,हिन्दीभाषी क्षेत्र में ऐसा कुछ भी न हो सका।बंगाल गालियों से मुक्त हो गया,लेकिन हिन्दीभाषी मुक्त न हो सके।हिन्दीभाषी क्षेत्र में गाली वाला नायक है,बंगला में एकदम नापसंद किया जाता है,उससे लोग नफरत करते हैं।ममता के खिलाफ माकपा के कई नेताओं ने गंदी गालियों का प्रयोग किया था वे नेता और माकपा आज कूड़े के ढ़ेर पर पड़े हैं।


सोमवार, 4 जुलाई 2016

प्रमोशन और साहित्य का संकट

       कोलकाता में एक दशक से हिन्दी सेमीनार के प्रमाणपत्र जुटाने की संक्रामक बीमारी कॉलेज शिक्षकों में फैल गयी है। सेमीनार में वे इसलिए सुनने जाते हैं जिससे उन्हें सेमीनार में भाग लेने का सर्टीफिकेट मिल जाए। यह साहित्य के चरम पतन की सूचना है। ये वे लोग हैं जो हिन्दी साहित्य से रोटी-रोजी कमा रहे हैं। ये लोग सेमीनार में बोले बिना सेमीनार में भाग लेने का प्रमाणपत्र पाकर अपने को धन्य कर रहे हैं। आयोजक यह कहकर शिक्षकों को बुलाते हैं कि प्रमोशन कराना है तो सेमीनार सर्टीफिकेट लगेगा, आ जाओ सुनने, सर्टीफिकेट मिल जाएगा। फलतः ज्यादातर शिक्षक सेमीनार को सुनने आते हैं। सेमीनार का सर्टीफिकेट पाने के लिए वे डेलीगेट फीस भी देते हैं। इस प्रक्रिया में दो किस्म का साहित्यिक भ्रष्टाचार हो रहा है. पहला नौकरी में प्रमोशन के स्तर पर हो रहा है। श्रोता के सर्टीफिकेट को वक्ता के सर्टीफिकेट के रूप में पेश करके तरक्की के पॉइण्ट प्राप्त किए जा रहे हैं। दूसरा , साहित्य विमर्श के नाम पर कूपमंडूकता बढ़ रही है। सेमीनारों में वक्ताओं के भाषण साधारण पाठक की चेतना से भी निचले स्तर के होते हैं और सेमीनार के बाद सभी लोग एक-दूसरे की पीठ ठोंकते हैं, गैर शिक्षक श्रोता फ्रस्टेट होते हैं,वे मन ही मन धिक्कारते हैं और कहते हैं और कहते हैं कि वे सुनने क्यों आए। वक्तागण आशीर्वाद देते हैं,पैर छुआते हैं। इस समूची प्रक्रिया में कई लोग तो इस कदर नशे में आ गए हैं कि उन्हें यह बीमारी हो गयी है कि शहर में कोई भी साहित्यिक कार्यक्रम हो उनको अध्यक्षता के लिए बुलाओ,ये लोग अध्यक्ष न बनाए जाने पर कार्यक्रम में जाते नहीं है। नहीं बुलाने पर नाराज हो जाते हैं। इन पंडितों का मानना है वे जिस सेमीनार में जाते हैं उस सेमीनार को सार्थक करके आते हैं। इस प्रसंग में मुझे कई लेखकों की रचनाएं याद आ रही हैं। इनमें सबसे पहले में मुक्तिबोध को उद्धृत करना चाहूँगा। बहुत पहले मुक्तिबोध ने हिन्दी के प्रोफेसरों के बारे में लिखा, ''बटनहोल में प्रति‍नि‍धि पुष्‍प लगाए एक प्रोफ़ेसर साहि‍त्‍यि‍क से रास्‍ते में मुलाकात होने पर पता चला कि हि‍न्‍दी का हर प्रोफेसर साहि‍त्‍यि‍क होता है। अपने इस अनुसन्‍धान पर मैं मन ही मन बड़ा खुश हुआ। खुश होने का पहला कारण था अध्‍यापक महोदय का पेशेवर सैद्धान्‍ति‍क आत्‍मवि‍श्‍वास। ऐसा आत्‍मवि‍श्‍वास महान् बुद्धि‍मानों का तेजस्‍वी लक्षण है या महान् मूर्खों का दैदीप्‍यमान प्रतीक ! मैं नि‍श्‍चय नहीं कर सका कि वे सज्‍जन बुद्धि‍मान हैं या मूर्ख ! अनुमान है कि वे बुद्धि‍मान तो नहीं, धूर्त और मूर्ख दोनों एक साथ हैं।''
मुक्‍ति‍बोध ने यह भी लि‍खा है '' चूँकि प्रोफेसर महोदय साहि‍त्‍यि‍क हैं इसलि‍ए शायद वे यह कुरबानी नहीं कर सकते। नाम- कमाई के काम में चुस्‍त होने के सबब वे उन सभी जगहों में जाएंगे जहॉं उन्‍हें फायदा हो-चाहे वह नरक ही क्‍यों न हो।''
कोलकाता के शिक्षकों की अवस्था इससे बेहतर नहीं बन पायी है। हिन्दी के इस तरह के आयोजनों में किस तरह के भाषण होते हैं और चेले-चेलियां किस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं इस पर कवि -कहानीकार उदयप्रकाश की बड़ी शानदार कविता है 'पाँडेजी' उसका अंश देखें-
"छोटी-सी काया पाँडेजी की/छोटी-छोटी इच्छाएँ/ छोटे-छोटे क्रोध/और छोटा दिमाग।
गोष्ठी में दिया भाषण,कहा- 'नागार्जुन हिन्दी का जनकवि है '/फिर हँसे कि ' मैंने देखो
कितनी गोपनीय/चीज को खोल दिया यों।यह तीखी मेधा और/वैज्ञानिक आलोचना का कमाल है। '/एक स-गोत्र शिष्य ने कहा-' भाषण लाजबाब था /अत्यन्त धीर-गंभीर/
तथ्यपरक और विश्लेषणात्मक/हिन्दी आलोचना के खच्चर/ अस्तबल में/आप ही हैं /एकमात्र/काबुली बछेड़े/ 'तो गोल हुए पाँडे जी/मंदिर के ढ़ोल जैसे/ठुनुक -ठुनुक हँसे और/फिर बुलबुल हो गए/फूलकर मगन !"
मैं 20 सालों से कोलकाता में रह रहा हूँ और आए दिन हिन्दी सेमीनारों की दुर्दशापूर्ण अवस्था के किस्से अपने दोस्तों और विद्यार्थियों से सुनता रहा हूँ। मैं आमतौर पर इन सेमीनारों से दूर रहता हूँ। इसके कारण लोग यह मानने लगे हैं कि मैं साहित्य के बारे में नहीं जानता। कई मित्र हैं जो सेमीनार के कार्ड में वक्ता के रूप में मेरा नाम न देखकर दुखी होकर फोन करते हैं कि यहां तो आपको होना ही चाहिए था। मेरी स्थिति इस कदर खराब है कि एकबार कोलकाता की सबसे समर्थ साहित्यिक संस्था की कर्ताधर्ता साहित्यकार नेत्री ने चाय पर अपने घर बुलाया और कहा कि हम इतने कार्यक्रम करते हैं और आपस में बातें भी करते हैं कि स्थानीय स्तर पर कौन विद्वान हैं जिन्हें बुलाया जाए तो लोग आपका नाम कभी नहीं बताते, मैं स्वयं भी नहीं जानती कि आप विद्वान हैं। मैंने कहा मैं विद्वान नहीं हूँ। इसी प्रसंग में मैंने उन्हें त्रिलोचन की एक कविता ' प्रगतिशील कवियों की नयी लिस्ट निकली है' सुनायी, कविवर त्रिलोचन ने लिखा- " प्रगतिशील कवियों की नयी लिस्ट निकली है/उसमें कहीं त्रिलोचन का नाम नहीं था/आँख फाड़कर देखा/दोष नहीं था/पर आँखों का/सब कहते हैं कि प्रेस छली है/शुद्धिपत्र देखा ,उसमें नामों की माला छोटी न थी/ यहाँ भी देखा ,कहीं त्रिलोचन नहीं/तुम्हारा सुन सुनकर सपक्ष आलोचन कान पक गए थे/मैं ऐसा बैठा ठाला नहीं,तुम्हारी बकबक सुना करूँ/किसी जगह उल्लेख नहीं है,तुम्हीं एक हो,क्या अन्यत्र विवेक नहीं है/ तुम सागर लाँघोगे ? -डरते हो चहले से/बड़े-बड़े जो बात कहेंगे-सुनी जायगी/व्याख्याओं में उनकी व्याख्या चुनी जाएगी/"
कोलकाता हिन्दी के क्षयिष्णु वातावरण का एक अन्य पक्ष है हिन्दी के पठन-पाठन की ह्रासशील अवस्था। यह स्थिति कमोबेश पूरे राज्य में है। मसलन जो आज छात्र है वह कल शिक्षक होगा।जो विद्यार्थी एम.ए. में आते हैं उनमें अधिकांश ठीक से हिन्दी लिखना तक नहीं जानते । अब आप ही सोचिए कि जो विद्यार्थी एम.ए. तक आ गया वह हिन्दी लिखना नहीं जानता। इस तरह के विद्यार्थियों की संख्या हर साल बढ़ रही है। उच्च शिक्षाकी सुविधाओं का निचलेस्तर पर विस्तार हुआ है। बड़े पैमाने पर छात्र हिन्दी ऑनर्स कर रहे हैं , वे जब ठीक से हिन्दी लिखना नहीं जानते,ठीक से प्रश्नों का उत्तर तक नहीं देते तब वे कैसे एम.ए. तक अच्छे अंक प्राप्त करके आ जाते हैं, इसका रहस्य कोई भी आसानी से समझ सकता है कि कोलकाता में हिन्दी में अंक कैसे दिए जाते होंगे। हिन्दी प्रमोशन के नाम पर बड़े पैमाने पर ऐसे छात्रों की पीढ़ी तैयारहुई है जो येन-केन प्रकारेण अंक हासिल करके पास हुए हैं। पढ़ने,समझने और सीखने की आदत बहुत कम विद्यार्थियों में है। जिनमें यह आदत है उन्हें पग-पग पर छींटाकशी, अपमान और अकल्पनीय असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। कोलकाता में सारे विद्यार्थी जानते हैं कि हिन्दी में नौकरी पाने के नियम क्या हैं ? किसके हाथ में नौकरियां हैं ? किस नेता और प्रोफेसर को पटाना है और कैसे पटाना है । इस समस्या की जड़ें गहरी हैं,गहराई में जाकर देखें तो हिन्दी के शिक्षक नए से डरते हैं,विचारों का जोखिम उठाने से डरते हैं। अन्य से सीखने और स्वयं को उससे समृध्द करने मेंअपनी हेटी समझते हैं। साहित्य को अनुशासन के रूप में पढ़ने पढ़ाने में इनकी एकदम दिलचस्पी नहीं है।
आज वास्तविकता यह है कि ज्यादातर शिक्षक और समीक्षक आजीविका और थोथी प्रशंसा पाने लिए अपनेपेशे में हैं।वे किसी भी चीज को लेकर बेचैन नहीं होते। उनके अंदर कोई सवाल पैदा नहीं होते। एक नागरिक के नातेउनके अंदर वर्तमान की विभीषिकाओं को देखकर उन्हें गहराई में जाकर जानने की इच्छा पैदा नहीं होती।वे पूरी तरहअतीत के रेतीले टीले में सिर गडाए बैठे हैं।
हिन्दी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शिक्षक और आलोचक अपने नियमित अभ्यास और ज्ञान विनिमय को अनुसंधान का जरिया नहीं बना पाए है। विद्यार्थियों में मासूमियत और अज्ञानता बनाए रखने में इस तरह के शिक्षकोंकी बड़ी भूमिका है।ये ऐसे शिक्षक हैं जो ज्ञान के आदान-प्रदान में एकदम विश्वास नहीं करते। कायदे से शिक्षक कोपारदर्शी, निर्भीक और ज्ञानपिपासु होना चाहिए।किन्तु हिन्दी विभागों में मामला एकदम उल्टा है।हिन्दी के शिक्षक कम ज्ञान में संतुष्ट,आरामतलब,और दैनन्दिन जीवन की जोड़तोड़ में मशगूल रहते हैं।
इसके विपरीत यदि कोई शिक्षक निरंतर शोध करतााहै या निरंतर लिख रहा है तो उसका उपहास उडाने और केरीकेचर बनाने में हमारे शिक्षकगण सबसे आगे होते हैं। और कहते हैं कि बड़ा कचरा लिख रहे हैं।हल्का लिख रहे हैं। यानी हमारे शिक्षकों को निरंतर लिखने वाले से खास तरह की एलर्जी है।वे यह भी कहते हैं कि फलां का लिखा अभीतक इसलिए नहीं पढ़ा गया या विवेचित नहीं हुआ क्योंकि जब तक उनकी एक किताब पढकर खत्म भी नहीं हो पातीहै तब तक दूसरी आ जाती है।इस तरह के अनपढों के तर्क उसी समाज में स्वीकार किए जाते हैं जहां लिखना अच्छानहीं माना जाता। कहीं न कहीं गंभीर लेखन के प्रति एक खास तरह की एलर्जी या उपेक्षा जिस समाज में होती है वहींपर ऐसी प्रतिक्रियाएं आती हैं। इस तरह की मनोदशा के प्रतिवादस्वरूप त्रिलोचन ने लिखा है- "शब्द/ मालूम है/व्यर्थ नहीं जाते हैं/पहले मैं सोचता था/उत्तर यदि नहीं मिले /तो फिर क्या लिखा जाय/किन्तु मेरे अन्तरनिवासी ने मुझसे कहा- लिखाकर/तेरा आत्म-विश्लेषण क्या जाने कभी तुझे/एक साथ सत्य शिव और सुंदर को दिखा जाय/अब मैं लिखा करता हूँ/अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने/कागज पर बस उतार देता हूँ/"
हिन्दी से जुड़े अधिकांश जटिल सवालों की हमारी समीक्षा ने उपेक्षा की है। वे किसी भी साहित्यिक और सांस्कृतिकबहस को मुकम्मल नहीं बना पाए हैं। हिन्दी में साहित्यिक बहसें विमर्श एवं संवाद के लिए नहीं होतीं,बल्कि यह तोएक तरह का दंगल है,जिसमें डब्ल्यू डब्ल्यू फाइट चलती रहती है।हमने संवाद,विवाद और आलोचना के भी इच्छितमानक बना लिए हैं। इसे भी हम अनुशासन के रूप में नहीं चलाते।
परंपरा का मूल्यांकन करते हुए हमने सरलीकरण से काम लिया है।परंपरा की इच्छित इमेज बनाई है परंपरा की जटिलताओं को खोलने की बजाय परंपरा के वकील की तरह आलोचना का विकास किया है। परंपरा का मूल्यांकनकरते हुए जो लेखक-शिक्षक परंपरा के पास गया वह परंपरा का ही होकर रह गया। परंपरा के बारे में हमारे यहां तीनतरह के नजरिए प्रचलन में हैं। पहला नजरिया परंपरावादियों का है जो परंपरा की पूजा करते हैं।परंपरा में सब कुछ कोस्वीकार करते हैं। दूसरा नजरिया प्रगतिशील आलोचकों का है जो परंपरा में अपने अनुकूल की खोज करते हैं और बाकीपर पर्दा डालते हैं।तीसरा नजरिया आधुनिकतावादियों का है जो परंपरा को एकसिरे से खारिज करते हैं। इन तीनों हीदृष्टियों में अधूरापन है और स्टीरियोटाईप है।
परंपरा को इकहरे,एकरेखीय क्रम में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।परंपरा का समग्रता में जटिलता के साथ मूल्यांकन कियाजाना चाहिए।परंपरा में त्यागने और चुनने का भाव उत्तर आधुनिक भाव है। यह भाव प्रगतिशील आलोचकों में खूबपाया जाता है। परंपरा में किसी चीज को चुनकर आधुनिक नहीं बनाया जा सकता। नया नहीं बनाया जा सकता। परंपराके पास हम इसलिए जाते हैं कि अपने वर्तमान को समझ सकें वर्तमान की पृष्ठभूमि को जान सकें।हम यहां तक कैसेपहुँचे यह जान सकें।परंपरा के पास हम परंपरा को जिन्दा करने के लिए नहीं जाते। परंपरा को यदि हम प्रासंगिकबनाएंगे तो परंपरा को जिन्दा कर रहे होंगे। परंपरा को प्रासंगिक नहीं बनाया जा सकता।परंपरा के जो लक्षण हमें आजकिसी भी चीज में दिखाई दे रहे हैं तो वे मूलत: आधुनिक के लक्षण हैं, नए के लक्षण हैं।नया तब ही पैदा होता है जबपुराना नष्ट हो जाता है। परंपरा में निरंतरता होती है जो वर्तमान में समाहित होकर प्रवाहित होती है वह आधुनिक काअंग है।
हिन्दी में सबसे ज्यादा अनुसंधान होते हैं।आजादी के बाद से लेकर अब तक कई लाख शोध प्रबंध हिन्दी मेंलिखे जा चुके हैं।सालाना 7 हजार से ज्यादा शोध प्रबंध हिन्दी में जमा होते हैं। लेकिन इनमें एक फीसद शोध प्रबंधों में भी सामयिक समाज की धड़कन सुनाई नहीं देगी। हमें विचार करना चाहिए कि रामविलास शर्मा, नगेन्द्र,नामवरसिंह, विद्यानिवास मिश्र, मैनेजर पांडेय, शिवकुमार मिश्र, कुंवरपाल सिंह , चन्द्रबलीसिंह , परमानन्द श्रीवास्तव, नन्दकिशोरनवल आदि आलोचकों ने कितना वर्तमान पर लिखा और कितना अतीत पर लिखा है ? इसका यदि हिसाब फैलायाजाएगा तो अतीत का पलड़ा ही भारी नजर आएगा। ऐसे में हिन्दी के वर्तमान जगत की समस्याओं पर कौन गौर करेगा? खासकर स्वातंत्र्योत्तर भारत की जटिलताओं का मूल्यांकन तो हमने कभी किया ही नहीं है।

शुक्रवार, 20 मई 2016

बंगाल और हिन्दी के बुद्धिजीवी-लेखक

      मुझे पश्चिम बंगाल में रहते हुए 27साल गुजर गए।इसबीच यहां बहुत कुछ बदला है लेकिन अफसोस यह है हिन्दी के बुद्धिजीवियों-लेखकों का संस्कार नहीं बदला।पश्चिम बंगाल में हिन्दी के बुद्धिजीवी देश के विभिन्न कोनों से आते रहे हैं।भाषण करते रहे हैं,सम्मान लेते रहे हैं।लेकिन कभी इन बुद्धिजीवियों ने आँखें खोलकर बंगाल के यथार्थ पर नहीं लिखा,जो कुछ लिखा वह किताबी विषयों पर लिखा,मसलन् रैनेसां पर लिखा,लेकिन उसकी जमीनी हकीकत को कभी जानने की कोशिश नहीं की।चूंकि अधिकांश बुद्धिजीवी प्रगतिशील थे अतःवे यहां के जमीनी यथार्थ से आँखें चुराकर भागते रहे हैं।यही हालत पश्चिम बंगाल के बंगाली बुद्धिजीवियों की है।वे नंदीग्राम के बहाने उठे और फिर सो गए।

सवाल यह है पश्चिम बंगाल के यथार्थ को जानने और समझने के लिए जिस जोखिम को उठाने की जरूरत है वह जोखिम लेखक उठाने से क्यों कतराते रहे हैं ॽ जो भी थोडा-बहुत लेखन है वह वाम के पक्ष और विपक्ष में है।वाम की आलोचना पर है। लेकिन वाम के अलावा बंगाल का सामाजिक यथार्थ भी है जिसकी ओर आलोचनात्मक नजरिए से देखने की जरूरत है।यह काम पहले नहीं हुआ अभी भी नहीं हो रहा।सारी समस्याएं यहीं पर हैं। हमारे सरोकार राजनीतिक हार -जीत तक आकर सिमटकर रह गए हैं, कुछ पद-पुरस्कार पाने तक सीमित रह गए हैं।इससे बंगाल के यथार्थ के साथ अलगाव और भी गहरा हुआ है।

मैं निजी तौर पर यथाशक्ति इस दिशा में लिखता रहा हूँ और इसकी मुझे राजनीतिक –सामाजिक कीमत भी चुकानी पड़ी है। एक लेखक के नाते मैंने बंगाल के यथार्थ को नहीं छोड़ा,पार्टी छूटी,पद छूटे,मित्र छूटे ,लेकिन मैंने निडर होकर लिखना नहीं छोड़ा। सवाल यह है बंगाल जब हिन्दीभाषियों को प्रभावित करता है तो यह भी तो देखें कि हिन्दीभाषी लोग और राज्य किस तरह बंगाल को प्रभावित कर रहे हैंॽ बंगाल में किन वर्गों का ह्रास हुआ ॽ किन क्षेत्रों में ह्रास हुआ ॽऔर इस ह्रास के कारण जो समाज पैदा हुआ वह कैसा है ॽ



आज का बंगाल पहले के बंगाल से भिन्न है।आज बंगाल में हिन्दीभाषी क्षेत्र की तमाम विकृतियां और अमानवीय मूल्य पैर पसार चुके हैं।बंगाली जाति पूरी तरह हिन्दीभाषियों की कु-सभ्यता के रूपों से सीख रही है,उनका अनुकरण कर रही है।यह बहुत बड़ा विपर्यय है।इसे बुद्धिजीवी देखना नहीं चाहते।

मंगलवार, 17 मई 2016

हिन्दी की कब्र पर खड़ा है आरएसएस


     
आरएसएस के हिन्दी बटुक अहर्निश हिन्दी-हिन्दी कहते नहीं अघाते। वे हिन्दी –हिन्दी क्यों करते हैं ॽ यह मैं आज तक नहीं समझ पाया। इन लोगों के हिन्दीप्रेम का आलम है कि ये अभी तक इंटरनेट पर रोमनलिपि में हिन्दी लिखते हैं,मेरे अनेक दोस्त हैं जो रोमनलिपि में हिन्दी लिखते हैं,मेरी उनसे कोई तकरार नहीं है,मेरी आरएसएस भक्तों के अंग्रेजी लिपि या फॉण्ट में हिन्दी लेखन को लेकर भी कोई आपत्ति नहीं है।भाषा को मैं स्वैच्छिक मानता हूँ,जिसकी जैसी रूचि हो,जिस तरह लिखना चाहे लिखे,भाषा में मन का स्वभाव या लिखने की आदत या बोलने की आदत की बहुत बड़ी भूमिका होती है।इसके अलावा मिश्रण का भी भाषा पर असर होता है।

फासिज्म के भाषाई जंजाल में जीने वाले आरएसएसवाले हिन्दी को शुद्ध करने की जब मुहिम चलाते हैं तो हंसी आती है,वे शुद्धभाषा,शुद्ध हिन्दी के प्रयोग पर बल देते हैं।लेकिन खुद कम से कम लिखते हैं। पर उपदेश का यह आदर्श नमूना है।हिन्दी को जनप्रिय बनाना है तो खूब लिखो,लेकिन ट्विटर पोस्ट से अधिक तो संघी लोग लिखते नहीं हैं ! इतने कम शब्दों से हिन्दी बचने से रही !

हिन्दी या कोई भी भाषा लेखन और शिक्षा से बचती है,नारेबाजी से नहीं।हिन्दी को जनप्रिय बनाना है तो सबसे पहले आरएसएस वालों को अपने अनुयायी दुकानदारों को बोलना होगा कि माल की बिक्री करते समय जो बिल बनाएं वह हिन्दी में बनाएं।बाजार में भाषा का प्रयोग नहीं होगा तो भाषा में ताकत नहीं आएगी।इस समय बाजार की खरीद-फरोख्त अंग्रेजी में होती है।कम से कम हिन्दीभाषी दुकानदारों और खासकर आरएसएस से जुड़े दुकानदारों को हिन्दी को बचाने के लिए इसकी पहल करनी चाहिए।

फेसबुक –ट्विटर पर हिन्दी पारायण करने से हिन्दी बचने वाली नहीं है। खड़ी बोली हिन्दी दिल्ली के खत्री व्यापारियों की भाषा थी और उसका बाजार से गहरा संबंध था जिसके कारण वह आधुनिककाल में तेजी से साझा संचार की भाषा के रूप में फैली।लेकिन इन दिनों हिन्दीभाषी दुकानदारों ने अपने बही खाते की भाषा हिन्दी नहीं रखी,वस्तु के क्रय-विक्रय की भाषा हिन्दी नहीं रखी।मात्र विज्ञापनों और मुंबईया फिल्मों के जरिए हिन्दी को नहीं बचा सकते।

भाषा मीडियम है और मीडियम से मीडियम नहीं बचता।मीडियम का प्रसार होता है।मीडियम बचता है पठन-पाठन और आचरण से। आरएसएस वालों के लिए हिन्दी कभी आचरण की भाषा नहीं रही है।बल्कि सामाजिक टकराव और वर्चस्व का औजार रही है। इससे भाषा कमजोर हुई है।हिन्दीभाषा बढ़े इसके लिए जरूरी है इसके साथ जुड़ी धर्मनिरपेक्ष भाषिक-सांस्कृतिक परंपराओं को आरएसएस वाले आचरण में लाएं।यह संभव नहीं है कि हिन्दी और उसकी विचारधारा हिन्दुत्व हो।हिन्दी की धर्मनिरपेक्ष विचारधारा परंपरा है।हिन्दी साझे सामाजिक संघर्ष का परिणाम है।हिन्दी बचानी है तो धर्मनिरपेक्ष परंपराओं और आदतों को बचाना होगा।

भाषा कोई शाब्दिक कार्य-व्यापार नहीं है,वह एक वैचारिक कार्य-व्यापार भी है।आरएसएस के लोग जब धर्मनिरपेक्षता पर हमला करते हैं तो वे देश को कमजोर करते हैं,साथ ही हिन्दी को भी असहाय बनाते हैं।यह विलक्षण सच्चाई है कि विगत तीस सालों में आरएसएस ताकतवर बना दूसरी ओर और हिन्दी कमजोर हुई। भाषा को समृद्ध करने के लिए धर्मनिपेक्षता के सामने बिना शर्त आरएसएस को समर्पण करना होगा।उसे धर्मनिरपेक्षता के साथ तदर्थवादी-अवसरवादी रवैय्या त्यागना होगा। मसलन्, आरएसएस के लोग जब भाजपा के मंच से चुनाव लड़ेंगे तो धर्मनिरपेक्षता की औपचारिक शपथ लेंगे लेकिन आचरण और विचारधारा के रूप में धर्मनिरपेक्षता की बजाय हिन्दुत्व पर जोर देंगे।यह असल में हिन्दी की कब्र खोदने वाला काम है।





मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

10 अक्टूबर रामविलास शर्मा के जन्मदिन पर विशेष - अस्मिता,आत्मकथा , हिन्दी जाति और रामविलास शर्मा (3 ) समापन किश्त



जीवनी –“ निराला की साहित्य साधना” तीन खण्डों में है। पहले खंड़ में व्यक्तित्व विवेचन है। दूसरे में उनकी विचारधारा और कला का विवेचन है और तीसरे खंड में उनके जीवन और साहित्य से संबंधित सामग्री और पत्र हैं। प्रकाशन वर्ष है सन् 1969। रामविलास शर्मा ने पहले खंड में लिखा है, “ यह पुस्तक मुख्यतः उनके साहित्य की आलोचना नहीं है। निराला के पारिवारिक,सामाजिक परिवेश से ,उस युग की सांस्कृतिक परिस्थितियों से, उनके जीवन के बाह्य रूपों के साथ उनके अन्तर्जगत् से पाठकों को परिचित कराना मेरा उद्देश्य है।”

समूची जीवनी धारावाहिक रूप में विकसित होती है और रामविलास शर्मा ने बड़े ही कौशल के साथ व्यक्तिगत को सामाजिक और सामाजिक को व्यक्तिगत में रूपान्तरित होते हुए दिखाया है। लेखक के अंतर्मन और सामाजिक अभिव्यक्ति के रूपों में सामंजस्य बिठाने की कोशिश की है। इस क्रम वे निराला को निज जगत से बाहर निकालते हैं। देसी ठाट, अनुभूतियां, गुण-अवगुण, मनोदशा,वातावरण,जनसमुदाय के बीच में रखकर निराला के व्यक्तित्व का वर्णन करते हैं।



निराला की जीवनी को पाठक आराम से नहीं पढ़ सकता। यह जीवनी विचलित, उद्वेलित और उत्तेजित करती है। इसमें समाज,राजनीति,आचरण और मूल्य आदि के क्षेत्र में चल रहे संघर्षों और अन्तर्विरोधों का चित्रण है। इससे निराला का भी अन्तर्विरोधी व्यक्तित्व उभरकर सामने आया है। साथ ही स्वयं रामविलास शर्मा का व्यक्तित्व और नजरिया भी इसमें घुलमिलकर सामने आया है। इसमें “मंशा” की अवधारणा का इस्तेमाल किया गया है और “ईमानदार मंशा” पर ध्यान दिया है। इसके अलावा निराला के “प्रेरक” तत्वों को भी रेखांकित किया है।

रामविलास शर्मा ने जीवनी के प्रधान चारों तत्वों स्वायत्तता,आत्मानुभूति,प्रामाणिकता और व्यक्तित्वान्तरण का इस्तेमाल किया है। यह किताब आख्यान शैली में लिखी है। इस क्रम में निराला के बारे में प्रचलित किस्से, कहानियों और वृत्तान्तों का व्यापक रूप में इस्तेमाल किया है। इससे उनके जीवन में पाठक की दिलचस्पी बनी रहती है। असल में किसी के बहाने व्यक्तित्व को प्रस्तुत करने की कला रोमैंटिक आत्म उदघाटन की कला है। फलतःनिराला के इर्द-गिर्द का वैविध्य भी जीवनी में चला आया है।

जीवनीकार जब किसी व्यक्ति का उदघाटन किसी घटना अथवा अन्य के बहाने करता है तो जीवनीकार स्वयं को घटना से दूर कर लेता है,साथ ही लेखक की वस्तुगत भूमिका को भी सामने लाता है। इस क्रम में लेखक के व्यक्तित्व निर्माण में ‘चंद’ लोगों की भूमिका और उसके चारों ओर के वैविध्यमय संसार को पेश करते हुए विभिन्न साहित्य संबंधी अवधारणाओं,सामाजिक व्यवस्था और आंदोलनों की सटीक व्याख्या पेश करता है इससे अनेक धारणाएं बनतीं हैं। जब व्यक्तित्व विवेचन के बहाने अवधारणाओं का निर्माण किया जाता है तो जाने-अनजाने परिस्थितियों और अवधारणाओं की सीमाएं भी व्यक्त हो जाती हैं। यह भी तय हो जाता है कि आप सच बोल रहे हैं। फलतःआप कल्पना से सत्य को अलगाने में सफल हो जाते हैं।

रामविलास शर्मा ने निराला पर लिखते समय व्यक्तिवाद और मानवतावाद को कॉमनसेंस के आधार पर उभारा है। इसके कारण वे निराला की जीवनी को अन्तहीन विस्तार देते हैं। कॉमनसेंस के आधार पर जीवनी लिखी जाएगी तो उसे अंतहीन विस्तार दिया जा सकता है।

“निराला की साहित्य साधना” का आरंभ 1857 के जिक्र के साथ होता है। उस समय बैसवाड़ा के लोग कैसे थे, उस इलाके के लोगों का स्वभाव कैसा था,निराला के पूर्वज कैसे थे,कैसे ये लोग माइग्रेट करके पश्चिम बंगाल आए,निराला का जन्म कैसे हुआ और किस तरह उनके बहाने बंगाल,भारत,बैसवाड़ा,हिन्द साहित्य,समाजवादीचेतना, किसान आंदोलन, स्वाधीनता आंदोलन,गांधी, नेहरू,निराला के आसपास के लोग,रिश्तेदार-नातेदार, छायावाद, निराला के समकालीन छायावादी कवि,प्रगतिवाद,कविता का शिल्प,सौंदर्य, स्थापत्य, कहानीकला, वेदान्त,अवचेतन आदि अनेक विषयों को विस्तार के साथ व्याख्यायित किया है।

व्यक्तित्व विवेचन का यह अंतहीन रूप है। जो व्यक्तित्व विवेचन को असहज बनाता है। इस क्रम में निराला का व्यक्तित्व विवेचन कम और अन्यचीजों का विवेचन ज्यादा हुआ है। इससे यह भी पता चलता है कि जीवनीकार की निराला के व्यक्तित्व से ज्यादा अन्य चीजों के बारे में ज्यादा दिलचस्पी है। रामविलास शर्मा ने यह भी बताने की कोशिश की है वे संबंधित विषयों के प्रामाणिक जानकार हैं। उन्हें निराला के बारे में प्रामाणिक और वस्तुगत जानकारी है। इस समूची प्रक्रिया में निराला की जीवनी के अंशों पर कम और उनके वातावरण संबंधित विवादों और साहित्य संबंधी नजरिए पर ज्यादा ध्यान गया है। निराला के युग विवेचन को ज्यादा स्थान मिला है। निराला के जीवन के निजी ब्यौरे कम स्थान घेरते हैं और अन्य के ब्यौरे और विवरण ज्यादा स्थान घेरते हैं।अनेक स्थानों पर रामविलास शर्मा स्वयं की समझ को सही और निराला की समझ को गलत ठहराते हैं।

निराला पर लिखते समय वे घटनाओं का वर्णन करते जाते हैं,घटनाओं के वर्णन के दौरान उनके द्वारा जो विवरण और ब्यौरे दिए गए हैं वह लेखक के ऐतिहासिक क्षण,उससे जुड़े व्यक्तियों,विवाद,किंवदन्तियों आदि के सहारे निराला का आख्यान निर्मित करते हैं। इस क्रम में अनेक स्थानों पर रामविलास शर्मा अपने नजरिए का इजहार करने लगते हैं।वे स्वयं समस्या को किस तरह देखते हैं उसको प्रस्तुत करते हैं।

“निराला की साहित्य साधना” के बहाने रामविलास शर्मा ने निराला की खोज के साथ अपने नजरिए की खोज की है। वह जो पद्धति अपनाते हैं वह दो रूपों में सामने आती है , इसमें एक ओर निराला है और वे हैं ,तो दूसरी ओर अन्य लोग हैं। अनेक स्थानों पर निराला और अन्य एक साथ हैं और निराला दूसरी ओर हैं। आमतौर पर यह सारी प्रक्रिया किसी न किसी मसले पर विवाद के दौरान घटित होती है।

रामविलास शर्मा ने निराला के व्यक्तित्व विवेचन के दौरान उन्हें हमेशा ऐतिहासिकता के पैमाने से बांधकर रखा है। वह निराला का ऐतिहासिक पैराडाइम से विचलन नहीं होने देते। निराला के आत्म को ऐतिहासिकता के खूंटे से बांधकर रखते हैं। इसके कारण कई जगहों पर चीजों की पुनरावृत्ति हुई है।

निराला की बातों को रामविलास शर्मा जब उद्धृत करते हैं तो निराला के पक्ष को मजबूत करने के इरादे से ऐसा करते हैं साथ ही जो लोग निराला पर हमला कर रहे थे उनकी काट पेश करते हैं।इस प्रक्रिया में पुरानी घटनाओं और साहित्यिक-राजनीतिक प्रवृत्तियों की नई व्याख्याओं को जन्म देते हैं।

हिंदी संस्कृति और जाति -

रामविलास शर्मा ने रैनेसां का जो महाख्यान निर्मित किया है उसमें दो चीजें प्रमुख हैं पहला है 'अनुमानाधारित ज्ञान 'और दूसरा है 'तर्क की एकता'। अनुमानाधारित तर्कशास्त्र के आधार पर निर्मित हिन्दी जाति का सारा तर्कशास्त्र रचा है।यह उत्तर आधुनिक तर्कप्रणाली है। उत्तर आधुनिक तर्कप्रणाली अनुमानाधारित ज्ञान पर आधारित है। वे अपने अनुमानों को स्थापित करने के लिए हिंदी जाति के महाख्यान को निर्मित करते हैं। इस चक्कर में वे उसे 'सत्य' बनाकर पेश करते हैं। हिंदी जाति का स्वायत्त विमर्श निर्मित करते हैं। इसमें 1960 के आसपास पैदा हुई भाषावार राज्यों के गठन की राजनीतिक तात्कालिकता अभिव्यंजित होती है। इसमें हिन्दी जाति की वैधता सिद्ध करने का भावबोध भी काम कर रहा है जो अनेक नए विवादास्पद संदर्भों को खोलता है। इस क्रम में रामविलास शर्मा भाषा और समाज,हिन्दीभाषा-भाषीक्षेत्र की बोलियों और भाषाओं के बारे में एक सुंदर काल्पनिक भाषायीखेल तैयार करते हैं और इस भाषाखेल के जरिए हिंदी जाति की धारणा को वैध ठहराने की कोशिश करते हैं। वे भाषा के साथ वस्तुओं,संस्कृति आदि को जोड़कर पेश करते हैं। भाषा के साथ ऑब्जेक्ट को पेश करने का यह उत्तर आधुनिक तरीका है, इसे बहुत सारे लोग मार्क्सवादी तरीका समझने की भूल करते हैं।

रामविलास शर्मा इसके बहाने राज्यों के गठन के बारे में अनेक ऐसी बातें भी उठाते हैं जो अव्यावहारिक हैं। उनके हिंदी विमर्श ने असल में हिंदी में 'स्पेकुलेटिव' आदर्शवाद की नींव रखी जिस पर खड़े होकर हिंदी के अधिकांश आलोचकों ने जो कुछ भी लिखा वो अंततः उत्तर आधुनिक विमर्श की कोटि में आता है।

मजेदार बात है कि रामविलास शर्मा और उनके अनुयायी यह मानने को तैयार नहीं है कि वे उत्तर आधुनिक हो गए हैं या हिंदी जाति का विमर्श उत्तर आधुनिक विमर्श है। उलटे रामविलास शर्मा और उनके अनुयायियों ने उत्तर आधुनिकता पर अतार्किक हमले किए हैं। असल में आलोचकों का एक समूह हिंदी जाति के विमर्श के नाम पर आलोचना में अपनी जगह बनाने का प्रयास करता रहा है। इस क्रम में रामविलास शर्मा यांत्रिक ढ़ंग से स्टालिन के भाषा पर आधारित जाति और जातीयता की अवधारणा का अनुकरण करते हैं और हिंदी जाति के प्रकल्प को एक मार्क्सवादी प्रकल्प के रूप में पेश करते हैं जो कम से कम और कुछ हो मार्क्सवादी प्रकल्प नहीं है। यह विशुद्ध भाववादी प्रकल्प है। इस क्रम में रामविलास शर्मा ने जो पद्धति अपनायी है वह बेहद खतरनाक और आकर्षक है। वे भाषा और विचार के अन्तस्संबंध को तो मानते हैं लेकिन विचार और उसके तर्कशास्त्र के विकास की ऐतिहासिकता को नहीं देखते। मसलन् जाति का विचार या चेतना बंगाल में जैसी है वैसी ही हिंदीभाषीक्षेत्र में नहीं है। अथवा यों भी कह सकते हैं कि विचार के सामाजिक आधार के साथ उसे जोड़कर ही नहीं देखते। समाजवाद का अर्थ सारे देश के लिए एक ही नहीं सारे विश्व के लिए किताबी तौर पर एक है ,लेकिन वास्तव अर्थों में विचार और यथार्थ के बीच के अन्तस्संबंध को देखना चाहिए।

मसलन कोई विचार कब आता है, किस प्रक्रिया में आता है,किन सामाजिक वर्गों और किस संदर्भ में अपना विकास करता है। एक ही विचार विभिन्न संदर्भ में अपनी सत्ता और महत्ता एक जैसी नहीं बनाए रख सकता। वे विचार के साथ जुड़े ऐतिहासिक-सांस्कृतिक भेद पैदा करने वाले कारकों को नोटिस ही नहीं लेते। वे हेगेल की तरह महज 'तर्क'(रीजन) का सहारा लेते हैं और हिंदी जाति को सिद्ध करते हैं। यहां तक कि भाषाभेद में भी ऐतिहासिक- सांस्कृतिक कारणों के कारण भेद या अंतर आता है उसे भी नहीं देखते और हर चीज 'तर्क ' से सिद्ध करते हैं। इस चक्कर में हिंदी जाति के विचार को महाविचार,महाख्यान और साहित्य की महाप्रस्तुति बना देते हैं। उसे एबसोल्युट की हद तक विकसित करते हैं और बाकी काम उनके भक्तों ने कर दिया है। यानी हिंदी जाति का विचार परमविचार बन जाता है। इसमें सभी किस्म के कल्पनाजीवी हिंदीसाधक शामिल हो सकते हैं।

हिन्दी में वाम से लेकर दक्षिण तक 'संस्कृति' एक विषय के रूप में बड़ा परिदृश्य घेरे हुए है। व्यक्ति को समग्र संस्कृति के आवयविक अंग के रूप में देखा गया है।इसी क्रम में हिन्दी संस्कृति के विशिष्ट रूपों और अधिकारों की ओर भी ध्यान खींचने की कोशिश की गयी है। फलतः वाम से लेकर हिन्दुत्व तक संस्कृति एक राजनीतिक विचारधारा की शक्ल अख्तियार कर लेती है। हिन्दुत्ववादी हिन्दू संस्कृति के श्रेष्ठत्व पर जोर दे रहे हैं तो वाम विचारक जातीय संस्कृति पर जोर दे रहे हैं और उदारवादी लेखक, सांस्कृतिक बहुलतावाद पर जोर दे रहे हैं।

सांस्कृतिक बहुलतावाद को वाम से लेकर दक्षिण तक सभी रंगत के लेखक मानते हैं और अपनी अपनी संस्कृति का जयगान करते हैं। बहुलतावादी संस्कृति के नजरिए से एकमत लोग यह भी कह रहे हैं कि जहां तक कोई भी संस्कृति अपने क्षेत्र में सक्रिय रहती है उसकी स्वायत्तता की रक्षा की जानी चाहिए। इस प्रक्रिया में जो इमिग्रेंट हैं उनसे कहा जा रहा है कि वे इलाके की संस्कृति में घुलमिल जाएं। अपनी संस्कृति को भूल जाएं। अथवा लौटकर अपनी जन्मभूमि की ओर चले जाएं। मूलबात यह है संस्कृति की इस राजनीति में किसी न किसी रूप में राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता शामिल रहती है । मजेदार बात यह है कि देशज या जातीयसंस्कृति पर जोर देने के कारण जाने-अनजाने हम संस्कृतिवाद की कैद में चले गए हैं।

संस्कृति के राजनीति के केन्द्र में आने के कारण हिन्दू संस्कृति बनाम बहुलतावादी संस्कृति, बहुलतावाद बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, इस्लामिक संस्कृति बनाम बोलने-लिखने की आजादी,मराठी बनाम हिन्दीभाषी आदि के सवाल विवाद में आते रहे हैं। मकबूल फिदा हुसैन और सलमान रूशदी के संदर्भ में चली बहसों में यह भी कहा गया है कि अभिव्यक्ति की आजादी से ज्यादा महत्वपूर्ण है हिन्दू संस्कृति और इस्लामिक संस्कृति । इस क्रम में संस्कृति और धर्म को स्थानीय और अभिव्यक्ति की आजादी को विजातीय अवधारणा कहा गया।इस तरह की धारणाओं को सत्ता का भी सहयोग मिला है। यहां तक कि उन लोगों को कानूनी संरक्षण तक दिया गया है। इसके समानान्तर वामदलों ने स्थानीयतावादी संस्कृति के पल्लवन के नाम पर सबसे पिछड़ी मान्यताओं और मूल्यों को स्थापित करने या स्वीकृत करने की मांग की है। हिन्दी संस्कृति और हिन्दी जातीयता इसी अर्थ में एक खतरनाक प्रस्थान बिंदु है।

वाम के सांस्कृतिक दबाब का आलम यह है कि कलकत्ता का नाम बदलकर कोलकाता कर दिया गया। यह मूलतः संस्कृतिवाद है इसका ही एक अन्य रूप है जिसके तहत तस्लीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल से तत्कालीन राज्य सरकार ने निकाल दिया बाद में कांग्रेस ने उसे दिल्ली से भगा दिया।दुख की बात यह है कि सलमान रूशदी के सैटेनिक वर्शेज से लेकर तस्लीमा के निष्कासन तक मौटे तौर पर वाम और उदार दोनों ही किस्म के राजनीतिकदलों की नीति को संस्कृति हांक रही है। यह मूलतः संस्कृतिवाद है और संस्कृतिवाद सामाजिक विभाजन को और भी बढ़ाता है।

इसी तरह जब आप हिन्दी जाति की बात करते हैं और उसकी पहचान को स्थापित करने की कोशिश करते हैं तो इससे मूलतः राज्यविभाजन की वैचारिक प्रक्रियाओं को मदद मिलती है। हिन्दी में हिन्दीजाति,हिन्दी संस्कृति और हिन्दी जातीयता की बहस जितनी ज्यादा हुई उसने हिन्दीभाषी राज्यों में विभाजन को वैचारिक मदद प्रदान की है। विभाजन का आधार बनाया है। यह भी कह सकते हैं इस बहस का बाई-प्रोडक्ट है सामाजिक विभाजन और हिन्दी राज्यों का विभाजन।

हिंदीजाति की धारणा मूलतःएक प्रतिक्रियावादी अवधारणा है। हिंदी समीक्षकों का बड़ा हिस्सा इसकी प्रगतिशील व्याख्याएं करता रहा है। हिंदी में इस धारणा का सांस्कृतिक श्रेष्ठत्व को स्थापित करने के भावबोध के साथ इस्तेमाल होता रहा है। संस्कृति का आधार जब राष्ट्रीयता,राष्ट्रवाद और धर्म को बनाएंगे तो इससे विभाजन बढ़ेगा और ये तीनों एक-दूसरे के साथ अंतर्क्रियाएं करते हैं। मसलन् जो हिंदी जाति के पक्षधर हैं वे जाति(नेशनेलिटी) के श्रेष्ठत्व पर जोर देते हैं।

जातीयता का श्रेष्ठत्व सबसे खतरनाक राजनीतिक तत्व है। हिंदीजाति के विचार को रामविलास शर्मा साहित्य के सुपीरियर विचार के रूप में प्रचारित करते हैं। सतह पर हिन्दीजाति का विचार बड़ा ही हार्मलेस लगता है लेकिन बुनियादी तौर पर बेहद खतरनाक और विभाजनकारी विचार है। नेशनेलटी को आधार बनाकर जब भी बात की जाएगी उसकी वैचारिक परिणति संस्कृतिवाद और सामाजिक विभाजन की ओर ले जाएगी। यह एक खास भाषा(खड़ी बोली हिन्दी) की उन्नति, क्षमता,सामाजिक दायरे और श्रेष्ठत्व के दर्प में डूबा विचार है। यह आधुनिक राजनीति की एंटीथीसिस है। साहित्य में इस विचार में सभी को अपने अंदर समाहित कर लेने और खड़ीबोली हिंदी के मातहत कर लेने का विचार काम करता रहा है। हिंदीजाति के विचार के तहत हमारी समीक्षा के एक बड़े हिस्से ने रैनेसां से लेकर सार्वभौमवाद तक के सभी विषयों को समाहित करके आधुनिक विमर्श में एक विलक्षण अवरोध पैदा किया है जिसमें से तब ही निकल सकते हैं जब हिंदी जाति और हिंदी संस्कृति को मानें। इनको माने बिना कोई आलोचना नहीं लिखी जा रही। इससे आलोचना में लोकतंत्र खत्म हो गया है। आलोचना में हिंदीजाति और हिंदी संस्कृति की बात करने वाले श्रेष्ठ और इससे बाहर के लोग निकृष्ट मान लिए गए हैं।

हिंदीजाति और हिंदी संस्कृति की अवधारणा का मूलतः स्त्री,दलित और भाषायी वैविध्य और समानता का विरोध है। इसमें वर्चस्व का भाव है। हाशिए के लोगों और विषयों के लिए इसमें कोई जगह नहीं है। यह अचानक नहीं है कि हिंदीजाति की अवधारणा पर जिनलोगों ने सबसे ज्यादा काम किया है उन्होंने स्त्रीसाहित्य और दलित साहित्य की अवधारणाओं के प्रति दोयमदर्जे का व्यवहार किया है या उसकी उपेक्षा की है। हिन्दीजाति के पक्षधरों के द्वारा बार बार हिन्दीजाति की मुक्ति में ही सामाजिक मुक्ति को खोजने की कोशिश की गयी है। सभी सांस्कृतिक समस्याओं के समाधान उसमें खोजने की कोशिश की गई है। इस प्रक्रिया में खड़ीबोली हिंदी के साथ हिन्दीभाषी क्षेत्र की अन्य भाषाओं और बोलियों का साहित्य र इन भाषाओं के साथ समान व्यवहार के सवाल हाशिए पर भी नजर नहीं आते। हिन्दीभाषीक्षेत्र की बोलियों भाषाओं का खड़ीबोली हिंदी के साथ अन्तर्विरोध तेज हुआ है। हिन्दीभाषी प्रान्तों का विभाजन हुआ है और इसके कारण नए प्रांतों में खड़ीबोली हिंदी की जगह स्थानीय भाषा और बोलियों को प्राथमिकता दी जा रही है।नए बने राज्यों उत्तराखंड,झारखंड और छत्तीससगढ़ में प्रधान सरकारी भाषा के रूप में खड़ीबोली की जगह लोकल भाषाओं को वरीयता मिली है।

दूसरी ओर हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति के नाम पर संस्कृति के पुराने और पिछड़े रूपों को बनाए रखने की कोशिशें भी हुई हैं। इसके लिए परंपरा और पुरानी संस्कृति की प्रामाणिकता को खासतौर पर उभारा गया है। यह अजीब संयोग है वाम समीक्षकों के एक समूह ने विगत 40-45 सालों में हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति को उभारा, वहीं दूसरी ओर समाज की सबसे प्रतिक्रियावादी विचारधारा के रूप में हिन्दुत्ववादी और जातिवादी राजनीति और संस्कृति का उभार पैदा हुआ। वामपंथी हिंदीजातिधर्मी आलोचकों ने हिंदीजाति की अवधारणा से हिन्दुत्व और जातिवाद को धोने की काफी कोशिश की लेकिन वे असफल रहे। इसका प्रधान कारण है कि वे समझने में असमर्थ रहे कि हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति जिस विचारधारा के आधार पर खड़ी है वह आधार हिन्दुत्व और जातिवादी राजनीति का भी है। वे एकही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों ने अपने अपने तरीके से संस्कृति के अंधलोकवाद की हिमायत की है। दोनों ही अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा करते हैं।दोनों में लोकतंत्र और समानता के लिए कोई जगह नहीं है। दोनों ही भाषायी और सांस्कृतिक समानता के विरोधी हैं। दोनों ही अपने राजनतिक वैचारिक बंधनों में बंधे हैं और दोनों में विकास की कोई संभावना नहीं है। दोनों ने जिस तरह की राजनीति,संस्कृति,धर्म,विचारधारा आदि की हिमायत की है उसके कारण इनकी कोई प्रसंगिकता नहीं है। ये चीजें वोट की राजनीति के कारण उठती रही हैं।

हिंदीजाति और हिदी संस्कृति के सवालों को आलोचना में जिन लोगों ने प्रतिष्ठित किया है वे आलोचना में राजनीतिक विचारधारात्मक वैविध्य या यों कहें वैविध्यपूर्ण समीक्षा के विषय पेश करने में असमर्थ रहे हैं। मसलन् रैनेसां पर जितना लिखा गया है उतना अन्य किसी विषय पर नहीं लिखा गया। नवजागरण,हिन्दीजाति,हिंदी संस्कृति,हिंदी जातीयता,साम्प्रदायिकता,क्षेत्रवाद आदि एक ही विषयक्षेत्र है जिस पर अधिकांश आलोचना लिखी गयी है। इस समूची प्रक्रिया में विभिन्न किस्म की राजनीतिक अवधारणाओं और यूटोपियाओं की ओर कभी ध्यान ही नहीं गया।

हिंदीजाति और हिंदी संस्कृतिपंथी आलोचकों की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वे अन्य साहित्यरूपों और साहित्यांदोलनों के बारे में आज तक कोई नया विवेचन पेश नहीं कर पाए हैं। कुंजी और नोट्स मार्का विवेचनों के जरिए हमने अन्य प्रवृत्तियों को सिलटाने की कोशिश की है। मसलन् प्रयोगवाद से लेकर स्त्रीसाहित्य,दलित साहित्य से लेकर दलित राजनीति तक का सारा क्षेत्र अछूता पड़ा है। इन सभी क्षेत्रों के बारे में वामपंथी आलोचना चुप है।

हम अगर गंभीरता से सोचें तो आज हमारे सामने संस्कृति और साहित्य के गंभीर सवाल आ खड़े हुए हैं लेकिन हमारे पास उनका कोई संतोषजनक विश्लेषण तक नहीं है। साहित्यिक-राजनीतिक समस्याओं का समाधान हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति के फ्रेमवर्क में खोजने की कोशिशें की जा रही हैं। हिंदीजाति की अवधारणा हमारी सामयिक राजनीतिक,सांस्कृतिक समस्याओं का समाधान पेश नहीं करती बल्कि यह तो आलोचना की पलायनवादी प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति है।

हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति वस्तुतः फेक या कृत्रिम धारणा है। इसका वास्तव जगत से कोई संबंध नहीं है। यह एक ऐसे यूटोपिया पर आधारित है जिसका भौतिक आधार नहीं है। यह एक ऐसी आइडेंटिटी की हिमायत करती है जो विभाजनकारी है। यह संस्कृति को क्षेत्रविशेष से जोड़कर देखती है।

संस्कृति को राजनीतिकक्षेत्र के साथ बांधकर नहीं देखा जा सकता।इसके आधार पर हिंदीजाति और हिंदीभाषाभाषी राज्यों के बीच के अन्तस्संबंध पर अतिरिक्त जोर दिया गया। उन्हें हिंदीसंस्कृति की वायवीय अवधारणा से बांधने की असफल कोशिश की गयी है। हिंदी को एक सांस्कृतिक अस्मिता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। इस क्रम में देश के विभिन्न इलाकों में जातिवाद ,क्षेत्रवाद और धर्म के नाम सामाजिक समूहों को संगठित करने के प्रयासों की अनदेखी की गयी। संस्कृति के नाम पर संगठित हो रहे समूहों की अनदेखी की गयी।

वाम आलोचना ने बहुलतावादी संस्कृतिवाद को खूब हवा दी है और रामविलास शर्मा भी हवा देने वालों में प्रमुख हैं। ब्रिटिश दार्शनिक ब्रायन बेरी ने लिखा है कि बहुलतावादी संस्कृतिवाद ने खास सामाजिक हितों के प्रसार को हवा दी है। यह एक तरह से सामाजिक विभाजन की फूट डालो और राज करो की यथास्थितिवादी राजनीति है। यह वंचितों को और भी वंचित बनाने वाली राजनीति है। यह वंचितों की साझा समस्याओं जैसे बेकारी, गरीब,निम्नस्तरीय जीवनशैली,रोटी,कपड़ा,मकान,शिक्षा,स्वास्थ्य,चिकित्सा आदि से ध्यान हटाती है।

हम गंभीरता से विचार करें और सोचें कि राज्यों के विभाजन या पुनर्गठन की मांग क्या सचमुच में यथार्थवादी मांग है ? क्या इस तरह की मांगें समाज की बुनियादी साझा समस्याओं के समाधान की ओर ले जाती हैं ? आखिरकार इनदिनों ही राज्यों के विभाजन या पुनर्गठन की मांगों पर ध्यान क्यों दिया जा रहा है ? इसी तरह इनदिनों जातियों की दशा सुधारने या दलितों और अल्पसंख्यकों की दशा सुधारने के कार्यक्रमों पर ढिंढोरची तरह हल्ला क्यों बोला जा रहा है। यह सारा खेल बहुलतावादी संस्कृतिवाद के फ्रेमवर्क में चल रहा है। वोटरों को भी इन्हीं आधारों पर वाम से लेकर दक्षिणपंथी दलों तक भरमाने की कोशिश कर रहे हैं।

देश में इनदिनों वंचितों और अभावग्रस्तों को धर्म,संस्कृति और अस्मिता के सवालों के आधार पर संगठित किया जा रहा है। जाहिरा तौर पर इससे सामाजिक विभाजन और बढ़ेगा और ठोस राजनीतिक सवालों की अनदेखी भी बढ़ेगी।

हिंदी में संस्कृतिवाद का रूप है हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति । इसके प्रचारक खासकिस्म के सरलीकरण से काम लेते रहे हैं। पहलीबात इन दो धारणाओं के संदर्भ में यह कि ये दोनों धारणाएं सार्वभौम मानवाधिकारों को नहीं मानतीं। सार्वभौम मानवाधिकार की धारणा मानने का अर्थ है संस्कृति विशेष की हिमायत को छोड़ना होगा। क्योंकि सार्वभौम मानवाधिकार की धारणा वस्तुतःसंस्कृतिविशेष के आधार से परे ले जाती है। हिंदीवाला किंतु हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति को त्यागने के लिए तैयार नहीं है। यह अचानक नहीं है कि रामविलासशर्मा ने हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति पर खूब लिखा है कि लेकिन सार्वभौम मानवाधिकारों की धारणा को वे नहीं उठाते और यह सारी दुनिया में वामपंथी बुद्धिजीवियों की समस्या है।

हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति की अवधारणा के नाम पर प्रचलित संस्कृतिवाद और मार्क्सवाद में एक चीज साझा हैं। दोनों का मानना है वंचित-पीड़ित हमेशा सही होते हैं। इस आधार पर वे कहते हैं कि वंचित-पीड़ित को अपने दमन-उत्पीड़न से मुक्त होने का अधिकार है। अतः इनकी सांस्कृतिक मान्यताएं भी सही हैं। वे कभी ठंड़े दिमाग से यह सोचने की कोशिश नहीं करते कि वे जिन सांस्कृतिक मान्यताओं को उठा रहे हैं वे सही और न्यायपूर्ण हैं ? वे जिन सांस्कृतिक रूपों को मानते हैं वे क्या सही हैं ? इस तरह वे ‘मजदूरवर्ग’ को ‘वंचित’ , ‘उत्पीडित’ या ‘दलित’ के नाम से अपदस्थ करना चाहते हैं। मुक्ति या मूलगामी सामाजिक परिवर्तन को संस्कृतिवाद,हिंदजाति और हिंद संस्कृति के जरिए अपदस्थ करना चाहते हैं। यह असलमें मार्क्सवाद का एकदम विलोम है, यह वाम राजनीति का भी विलोम है।

हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति के प्रचारक एक ओर अधिनायकवादी राजनीति का विरोध करते हैं वहीं दूसरी ओर साम्राज्यवाद विरोध और वि-उपनिवेशीकरण की तेजी से वकालत करते हैं। यह फिनोमिना रामविलास शर्मा के लेखन में भी है। लंबे समय से इस थ्योरी के आधार पर लिखा जा रहा है। संकट उसके बाद आरंभ होता है जब फंडामेंटलिस्ट हिन्दुत्ववादी और इस्लामिस्ट भी इसी एजेण्डे पर सक्रिय होते हैं। वे भी साम्राज्यवादविरोधी वि-उपनिवेशीकरण को अपना लक्ष्य बनाते हैं। दोनों में साझा तत्व है संस्कृति। दोनों संस्कृति के आधार पर ही विरोध करते हैं। रोचक बात यह है वाम ने बहुलतावादी संस्कृतिवाद को तरजीह दी और फंडामेंटलिस्टों ने संस्कृति विशेष को तरजीह दी।

इन दोनों के नजरिए में वाम के यहां संस्कृति ज्यादा है ,जबकि फंडामेंटलिस्टों के यहां संस्कृति कम है। ये दोनों ही व्यक्ति को इस आधार पर अस्मिता प्रदान करते हैं। इसके आधार पर व्यक्ति के अधिकारों को परिभाषित करते हैं और उन अधिकारों के संरक्षण के बारे में बात करते हैं। मजेदार पहलू यह है कि फंडामेंटलिस्टों के लिए संस्कृति निर्धारक तत्व है ,जबकि वाम के लिए संस्कृति निर्धारक नहीं आर्थिक-सामाजिक कारण निर्धारक तत्व हैं। वाम के लिए संस्कृति फालतू चीज है। वाम के लिए सांस्कृतिक संगठन गौण और वर्गीय संगठन प्रधान हैं।








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