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मंगलवार, 1 मार्च 2011

नया बजट और नए खतरे

नव्य उदारीकरण में भारत के अधिकांश बुद्धिजीवियों ने अपने को पूंजीपरस्ती से बांध लिया है। युवा इस पूंजी के नारकीय खेल से पीड़ित हैं । औरतें इसमें पिस रही हैं। किसानों और मजदूरों के जीवन में तबाही मची हुई है।  इसके बाबजूद वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी और उनकी भक्तमंडली दावा कर रही है कि भारत विकास कर रहा है और केन्द्र सरकार विकासकार्यों पर सबसे ज्यादा खर्च कर रही है। वास्तविकता यह है  कि वित्तमंत्री ने एक भी बड़ा कारखाना खोलने का संकेत नहीं दिया है। बेकारी कम करने का एक भी नुस्खा नहीं बताया है। सवाल उठता है कि बेकारी कम नहीं होगी तो देश में सामाजिक असुरक्षा बढ़ेगी और ऐसी अवस्था में कानून और व्यवस्था की एजेंसियों की मदद की जरूरत ज्यादा पड़ेगी और इस संदर्भ में देखें तो बजट में सुरक्षा एजेंसियों का खास ख्याल रखा गया है। देश की वास्तविकता यह है कि भारत सरकार सुरक्षा एजेंसियों और सुरक्षा बलों के साथ- रक्षामद में ज्यादा खर्च करने जा रही है। यह इस बात का सबूत है कि देश में कानून-व्यवस्था के प्रबंधन पर ज्यादा व्यय होगा। मसलन वित्तमंत्री ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी,बाएसएफ,सीआरपीएफ आदि के लिए ज्यादा धन का आवंटन किया गया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के लिए बजट से 55.68 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। यानी पिछले साल की तुलना में 16.33 करोड़ रूपये ज्यादा आवंटित किए गए हैं। इस संस्था को गैर-योजनामद से 2009-10 में 11.91 करोड़ रूपये आवंटित  किए गए थे जिसमें इस साल के लिए गैर-योजनामद से 42.06 करोड़ रूपये दिए गए हैं। इस संस्था को आतंकवाद से संबंधित घटनाओं पर काम करने,जांच करने,रोकने और केस चलाने का अधिकार दिया गया है। सीबीआई को पिछले साल की तुलना में इस साल कम फंड आवंटित किया गया है। बीएसएफ के लिए 7628.79 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं।सीआरपीएफ के लिए 7827.32 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं वित वर्ष की तुलना में 300 करोड़ रूपये ज्यादा है। नेशनल इंटेलीजेंस ग्रिड को 33.81 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। इस संस्था का काम है काउंटर टेररिज्म के खतरे पर निगरानी रखना,उसके डाटा की जांच-पड़ताल करना। वहीं दूसरी ओर कारपोरेट घरानों के लिए प्रत्यक्ष करों में 11,500 करोड़ रूपये के कंशेसन दिए गए हैं। इसके विपरीत साधारण जनता पर 11,300 करोड़ रूपये के नए कर लगाए गए हैं। कारपोरेट घरानों से केन्द्र सरकार ने स्वेच्छा से 2010-11 में 1,38,921 करोड़ रूपये के कर वसूल नहीं किए। इसी तरह 2009-10 में कारपोरेट घरानों से 1,18,930 करोड़ रूपये के कर वसूल नहीं किए गए थे। केन्द्र सरकार ने इस तरह कारपोरेट घरानों को पिछले तीन सालों में 4लाख करोड़ रूपये दिए हैं। इसी तरह किसानों के मद में आने वाली विभिन्न योजनाओं के लिए आवंटित धन में कटौती की गई है। केन्द्र सरकार का समग्र खर्चा 3लाख करोड़ के करीब बैठता है इसके लिए वह कर वसूली पर जोर नहीं दे रही है बल्कि विभिन्न तरीकों से कर्ज लेकर चला रही है। केन्द्र सरकार ने आम आदमी को और ज्यादा कंगाल बनाने के लिए तकरीबन 20हजार करोड़ रूपये की सब्सीडी कटौतियां इस बजट में की हैं। इसके अलावा विभिन्न वित्तीय क्षेत्रों में विदेशी पूंजी निवेश को आमंत्रण देकर मनमोहन सिंह सरकार ने एकसिरे से देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी वित्तीय संस्थानों के रहमोकरम पर गिरवी रख दिया है।
   सैटेलाइट टीवी चैनलों के साथ प्रतिस्पर्धा में संचार माध्यमों को ,खासकर प्रसारभारती को खड़ा रखने की जरूरत है लेकिन मनमोहन सिंह सरकार अपने नव्य-उदार एजेण्डे पर आक्रामक ढ़ंग से बढ़ रही है और निजी चैनलों की मदद करते हुए उसने इसबार के बजट में प्रसारभारती के लिए आवंटित धन में कटौती कर दी है। पिछले साल की तुलना में इस साल प्रसारभारती को 300 करोड़ रूये कम आवंटित किए गए हैं। 2010-11 में 1,757.14 करोड़ रूपये दिए गए जो इस साल के बजट में घटाकर 1,484.01 करोड़ कर दिए गए हैं। इसबार के बजट की खूबी है 9प्रतिशत विकास दर ,भयानक बेकारी,मंहगाई में उछाल और देशी वित्तीय संस्थाओं में विदेशी पूंजीका अबाध प्रवेश यानी नए किस्म की आर्थिक गुलामी का आगमन।
   










मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

हिन्दी साहित्यालोचना का नीरा राडिया पंथ


       ‘आलोचना’पत्रिका ने हाल के बरसों में किसी गंभीर साहित्यिक बहस को जन्म नहीं दिया है। और न हिन्दी में किसी आलोचक को प्रतिष्ठित ही किया है सिवाय संपादक नामवर सिंह के। फिर भी हिन्दी में उसे आलोचना की महान पत्रिका कहते हैं। सोचने वाली बात यह है यह पत्रिका भी अब प्रायोजन और फिक्सिंग के नीरा राडिया मार्ग की पथिक हो गयी है। सवाल उठता है आलोचना में प्रकाशक की मार्केटिंग रणनीति के तहत चल रहा राडिया मार्ग आलोचना और साहित्य को आखिर कहां ले जाएगा ? इतने बड़े आलोचक के संपादन में निकलनी वाली पत्रिका ने किसी साहित्यिक आंदोलन को जन्म क्यों नहीं दिया ? किसी आलोचक या आलोचकों के समूह को हिन्दी में प्रतिष्ठित क्यों नहीं किया ?
   नामी-गिरामी समीक्षकों को संपादक बनाकर रखने वाली और महत्वपूर्ण कहलाने वाली इस पत्रिका ने साहित्य की श्रीवृद्धि की है । प्रकाशन समूह की प्रतिष्ठा बढ़ायी है। संपादक के नाम को रोशन किया है। लेकिन हिन्दी में किसी भी साहित्यांदोलन का नेतृत्व नहीं किया है।
     हाल के वर्षों में हिन्दी में नीरा राडिया पंथ (साहित्य में जन-संपर्क की रणनीति) कई मौकों पर अपने गुल खिला चुका है और साहित्य के अंदर तथाकथित प्रायोजित उत्तेजना भी पैदा कर चुका है। अलका सरावगी से लेकर धर्मवीर की किताबों को जनप्रिय बनाने और पुरस्कार दिलाने में राडिया मार्ग मददगार साबित हुआ है। इस मार्ग पर चलने से साहित्य को कम और प्रकाशक को ज्यादा लाभ हुआ है। बाजार की नव्य़ उदार तिकड़मों में माहिर हिन्दी के चंद प्रकाशक कैसे सरकारी रसद पर येन-केन प्रकारेण छापेमारी करते हैं, इसके किस्से किसी भी व्यक्ति से दरियागंज में सहज ही जाने जा सकते हैं। आप यह भी जान सकते हैं कि आखिरकार कौन सा प्रकाशक है जो सरकारी खरीद पर पल रहा है। मजेदार बात यह है कि हिन्दी प्रेस में उसके किस्से प्रकाशित नहीं होते।
     हिन्दी के एक सबसे बड़े प्रकाशन समूह की विशेषता है कि वह अधिकांश लेखकों को रॉयल्टी नहीं देता,पैसे लेकर किताबें छापता है। आश्चर्य की बात है कि इस पर कभी प्रगतिशील आलोचकों को गुस्सा नहीं आता। कभी किसी समीक्षक ने उस महान प्रकाशक को किताब देने से मना नहीं किया। किसी लेखक संगठन ने पारदर्शिता की मांग नहीं की।
    ‘नया ज्ञानोदय’ में एक घटिया प्रतिक्रिया पर बबाल करने वाले लेखकों की चेतना को इस प्रकाशन समूह की नव्य उदार तिकडमों और नीरा वाडिया टाइप हरकतों से कोई परेशानी क्यों नहीं होती  ? जबकि लेखक की रॉयल्टी खा जाना,किताब छापने के लिए पैसे मांगना ज्यादा गंभीर अपराध है और इसका प्रतिवाद किया जाना चाहिए। लेकिन मजाल है कि हमारे ज्ञानी-गुणी प्रगतिशील विद्वान कभी इस पर बोलें और बिलबिलाएं और कहें कि हम ऐसे प्रकाशक का एक लाख का इनाम नहीं लेंगे। उसे छापने के लिए किताब नहीं देंगे।  मजेदार बात यह है लेखकों के माल पर डाका डालने वाला ही लेखकों का रहबर बना हुआ है,इसी संदर्भ में हम देखें तो पाएंगे कि प्रकाशनजगत और समीक्षाजगत में हम नीरा राडिया के मार्ग पर चल पड़े हैं। यह बेहद दुखद और अपमानजनक स्थिति है।
     मैं निजी तौर पर ऐसे अनेक नामी लेखकों को जानता हूँ जिनकी पैसा लेकर किताबें छापने की जानकारी स्वयं मुझे उन्होंने दी । और यह भी कहा कि कभी भी एक पैसा रॉयल्टी का उस बड़े प्रकाशक ने नहीं दिया है । ऐसा नहीं है कि यह प्रकाशक सबका पैसा खा जाता है कुछ लेखकों-आलोचकों-प्रोफेसरों और नौकरशाहों को रॉयल्टी के बहाने पैसे खिलाता भी है। कुछ को रॉयल्टी भी देता होगा। लेकिन आमतौर पर इस बड़े प्रकाशक और उसके साथ जुड़ी साहित्य की नीरावाडिया (जन संपर्क टीम) टीम ने साहित्य में प्रायोजन और धंधे की महत्ता को स्थापित किया है। इस परंपरा का आरंभ बहुत पहले हो चुका था लेकिन आम लेखकों ने इसके खिलाफ कभी कुछ भी बोला नहीं है। ज्यादातर लेखक संगठन भी इस मामले में शांत हैं। वे ललचाई नजरों से देखते रहते हैं कि भाई हमें भी कुछ मिले, कुछ न सही हमारी पत्रिका का विशेषांक ही किताब के रूप में छापकर बेच दिया जाए इस प्रकाशक के जरिए। एक खास तरह की साहित्यिक फिक्सिंग कर दी गई है और इसमें अनेक नामी समीक्षक शामिल कर लिए गए हैं या वे स्वेच्छा से शामिल हो गए हैं।
    सुना है ‘आलोचना ’पत्रिका में कबीर पर लिखी पुरूषोत्तम अग्रवाल की आलोचना किताब पर कुछ खास प्रायोजित लेख आने वाले हैं। हमारी समस्या यह नहीं है कि कबीर पर जो किताब आयी है उस पर अनेक समीक्षकों को प्रायोजित ढ़ंग से क्यों लिखाया जा रहा है ,हमारी आपत्ति साहित्य के प्रायोजन पर है।
    साहित्य का प्रायोजन और फिर लक्ष्य को फिक्स करने की कला नीरा वाडिया कला है। इसका साहित्य की पहली और दूसरी परंपरा से कोई लेना-देना नहीं है। वैसे यह प्रकाशक प्रायोजित कला में माहिर है और उसके ही मेनीपुलेशन का खेल है कि दूरदर्शन के राष्ट्रीयचैनल से आने वाली समस्त पुस्तक समीक्षाओं में 80 प्रतिशत से ज्यादा इसी प्रकाशन ग्रुप के द्वारा प्रकाशित किताबों के रिव्यू नामवर सिंह करते हैं।
    नया खेल कबीर के नए अर्थ खोलने वाले पुरूषोत्तम अग्रवाल की किताब पर केन्द्रित प्रायोजित समीक्षाओं से जुड़ा है। कल मेरे एक साहित्यिक मित्र -शिक्षक और छात्र वेदरमण ने बताया आलोचना पत्रिका का पुरूषोत्तम अग्रवाल की किताब पर केन्द्रित अंक आने वाला है या आ गया है। खैर, जो भी हो, महत्वपूर्ण यह है कि अब समीक्षा की एक सामान्य किताब को महान किताब बनाने की मुहिम में हिन्दी के विद्वतजन जुट गए हैं। हम विनम्रता के साथ कहना चाहते हैं यह साहित्य में नीरा राडिया मार्ग पर जाना है,यह साहित्यालोचना के उत्थान की खबर नहीं है।
    इससे भी बड़ी समस्या है जिसका कायदे से नामवरसिंह जबाब दें कि कबीर जब इतने ही महान थे तो उन्होंने अपने जीवन में कबीर पर कोई शोधकार्य क्यों नहीं किया ? एक भी शोधपत्र क्यों नहीं लिखा ? स्वतंत्र भारत में बड़ी मुश्किलों से हिन्दी को मध्यकालीनता के जंजाल से हिन्दी के साहित्यकार छुड़ा पाए हैं अब अचानक कबीर पर लिखी  ‘अकथ कहानी प्रेम की’ किताब के बहाने वे हिन्दी को अतीत के अंधे कुए में ले जाना चाहते हैं। इससे वे किस महान लक्ष्य को हासिल करना चाहते हैं ?
   पुरूषोत्तम अग्रवाल बड़े हैं और सर्वोच्च सरकारी पद की शोभा बढ़ा रहे हैं ,वे चाहें तो उनकी सेवा में हिन्दी के अनेक बड़े लेखक कुछ भी लिख सकते हैं। वे जब तक इस पद पर हैं साहित्य के सारे बैल उनके खूंटे से बंधे रहेंगे।  लेकिन अचानक जिन आलोचकों और लेखकों को उनमें महान समीक्षक नजर आ रहा है उसके बारे में यही कहना है कि वह एक सामान्य अच्छी शोध है जो हर शोधार्थी करता है। इसमें महान जैसा कुछ नहीं है। कबीर उनके प्रिय हैं,उनकी पीएचडी के विषय भी हैं। यह सुंदर किताब है और इसमें कबीर पर सुंदर ढ़ंग से लिखा गया है।
     लेकिन विनम्रतापूर्वक कहना चाहेंगे इस किताब का भारत के,हिन्दी के सामयिक साहित्यिक सवालों,आलोचना की समस्याओं आदि से कोई लेना-देना नहीं है। यह किताब हिन्दी साहित्य में दलित साहित्य और स्त्री साहित्य को अपदस्थ करने और हाशिए पर डालने के बृहद प्रयास के तहत नीरा राडिया मार्गी तरीकों के जरिए प्रमोट की जा रही है।
    नामवर सिंह और उनकी भक्तमंडली एकबात का जबाब दे कि कबीर यदि इतने ही प्रासंगिक हैं तो जरा यह बताएं कि हिन्दी के आधुनिक कबीर नागार्जुन से लेकर केदारनाथ अग्रवाल,मुक्तिबोध, शमशेर,अज्ञेय आदि ने कभी कबीर पर क्यों नहीं लिखा ? स्वयं नामवर सिंह ने कोई किताब क्यों नहीं लिखी ? नव्य उदार दौर में मध्यकालीन कवियों की महत्ता का आख्यान क्या हमारे सामयिक साहित्यिक सवालों और समस्याओं का जबाब दे सकता है ? यदि ऐसा ही था तो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर निराला तक किसी ने भी मध्यकालीन लेखकों का मार्ग क्यों नहीं पकड़ा ? मध्यकालीन कवियों के पास ही सामयिक साहित्यिक समस्याओं के समाधान थे तो हमें आधुनिककाल में नए विषयों और नए साहित्यिक नजरिए की खोज की ओर मुखातिब क्यों होना पड़ा ? जिन चार बड़े कवियों का हिन्दी में इस साल जन्मशती वर्ष मनाया जा रहा है उनमें से कोई भी कवि कबीर के मार्ग पर जाने को तैयार नहीं है और अचानक हिन्दी का एक समीक्षक आधुनिककाल के समस्त आलोचना पदबंधों का खिलंदडभाव से उपयोग करते हुए आलोचना में मध्यकाल में आधुनिककाल खोज लाया है। आलोचना का यह प्रगतिशील दृष्टिकोण नहीं है बल्कि नव्य उदार नजरिया है। इसका सामयिक मध्यकालीन भावबोध के नव्य उदार धार्मिक वातावरण से गहरा संबंध है।
   यह सच है पुरूषोत्तम अग्रवाल ने कबीर का सुंदर पुनर्मूल्यांकन किया है। लेकिन इस मूल्यांकन का आलोचना और रचना की सामयिक समस्याओं से कोई संबंध नहीं है। कबीर ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनके बारे में दलित विमर्श होगा,आधुनिकता विमर्श होगा,स्त्री विमर्श होगा,उत्तर आधुनिक विमर्श होगा। नए विमर्शों को खींचकर मध्यकाल में ले जाने की अपनी मुश्किलें हैं और इनसे समीक्षा कहीं नहीं पहुँची है।
    आलोचना वर्तमान से भविष्य की ओर जाती है। पुरूषोत्तम अग्रवाल की मुश्किल यह है कि उनकी समीक्षा वर्तमान से अतीत की ओर जाती है। उनके पास आधुनिक समीक्षा के पदबंध हैं और उनके अर्थ और भूमिकाएं वे वे मध्यकाल में खोज रहे हैं। मध्यकालीन कविता को तत्कालीन साहित्य समीक्षा की अवधारणाओं में खोजा जाना चाहिए। इस तरह की आलोचना को नीरा वाडिया की पदावली में साहित्यिक फिक्सिंग कहते हैं।
     मुश्किल यह है कि पुरूषोत्तम अग्रवाल मध्यकालीन आलोचना के पदबंधों में कम जाते हैं और आधुनिक आलोचना के पदबंधों और अवधारणाओं का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। मसलन- आधुनिकता,देशज,औपनिवेशिक, स्त्रीत्व,फैंटेसी,यूटोपिया,लोकवृत्त, उत्तर आधुनिकता, नस्ल,यूरो केन्द्रिकता,ओरिएंट आदि आधुनिक अवधारणाएं हैं इनका उदय और अर्थ वर्तमान या आधुनिक समाज से जुड़ा है। इसे मध्यकाल में ले जाकर लागू करना सही नहीं है। लेकिन अपने खिलंदडभाव में पुरूषोत्तम अग्रवाल ने यह काम खूब किया है।   
पुरूषोत्तम अग्रवाल की दूसरी बड़ी मुश्किल यह है कि वे बातें आधुनिक अवधारणाओं पर करना चाहते हैं लेकिन संदर्भ मध्यकाल का ऱखना चाहते हैं। आधुनिक अवधारणाओं पर मध्यकालीनता के आधार पर बातें करना वैसे ही ही है जैसे उत्तर आधुनिक कट एंड पेस्ट की पद्धति का इस्तेमाल करना।
    तीसरी मुश्किल है वे जाना चाहते हैं आधुनिकककाल में लेकिन जाएंगे मध्यकाल में से होकर । आधुनिक से आधुनिक की ओर की यात्रा तो सुनी थी थी लेकिन आधुनिक से मध्यकाल और फिर आधुनिककाल में लौटने के अतार्किक मार्ग से गुजरी कार रेस हम पहली बार देख रहे हैं। कम से कम रामचन्द्र शुक्ल,हजारीप्रसादद्विवेदी,राहुल सांकृत्यायन, पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, नंददुलारे बाजपेयी आदि की मध्यकालीन कवियों पर केन्द्रित किताबों में यह समस्या तो नहीं है कि आधुनिककाल की अवधारणाओं की रोशनी में मध्यकाल को देखो। वे मध्यकालीन कवि को तत्कालीन परिप्रेक्ष्य और अवधारणाओं की रोशनी में देखते हैं,वे मध्यकाल में आधुनिककाल खोजने नहीं जाते। मध्यकाल में आधुनिककाल की खोज करना अवैज्ञानिक आलोचना है। यह आलोचना का सब-वर्जन है। इस सब-वर्जन को प्रायोजित समीक्षाओं के जरिए वैधता प्रदान करने की कोशिश की जा रही है।
    अंत में, एक बात और कहनी है कि प्रायोजित समीक्षाओं से न तो महान समीक्षक-लेखक पैदा होता है और न महान समीक्षा। पुरूषोत्तम अग्रवाल कोई गुमनाम लेखक नहीं है। वह विगत 30 सालों से ज्यादा समय से मीडिया से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं में धुंधाधार लिखते रहे हैं। उनकी इस किताब के पहले भी कई किताबें आ चुकी हैं। सवाल यह है कि उनके लोक संघ सेवा आयोग के सदस्य बनाए जाने के बाद ही नामवर सिंह से लेकर अन्य दूसरे प्रशंसक समीक्षकों को पुरूषोत्तम अग्रवाल महान क्यों दिखने लगे हैं ? इसके पहले उनके किसी भी विचारवान लेख में इन लोगों को उल्लेखनीय दम नजर क्यों नहीं आया ? इससे पहले कभी हिन्दी आलोचकों और स्वयं नामवर सिंह ने पुरूषोत्तम अग्रवाल के लिखे निबंध या किताब पर जमकर लिखा क्यों नहीं ? यह कैसा आलोचकभाव है जिसके कारण अब पुरूषोत्तम अग्रवाल अचानक लोक संघ सेवा आयोग के सदस्य बनने के बाद महान दिखने लगे ! इसे समीक्षक की महत्ता नहीं पद की महत्ता कहना सही होगा। यह साहित्य में नीरा वाडिया मार्का साहित्यिक फिक्सिंग हैं। यह साहित्य में पकड़ो और लिखाओ का मार्ग है।





रविवार, 12 दिसंबर 2010

साहित्य में नव्य उदारतावादी ग्लोबल दबाव

हमारे साहित्यकार यह मानकर चल रहे हैं अमरीकी नव्य उदार आर्थिक नीतियां बाजार,अर्थव्यवस्था, राजनीति आदि को प्रभावित कर रही हैं लेकिन हिन्दीसाहित्य और साहित्यकार उनसे अछूता है। असल में यह उनका भ्रम है। इन दिनों हिन्दीसाहित्य और साहित्यकार पूरी तरह नव्य उदार नीतियों की चपेट में आ गया है।  
    इन दिनों विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं,टीवी चैनलों आदि में जो साहित्य समीक्षा आ रही है उसका नव्य उदारतावाद से गहरा संबंध है।  वह मासकल्चर का हिस्सा है।यह अचानक नहीं है कि साहित्य के हिन्दी में सबसे बड़े आलोचक के रूप में नामवर सिंह जाने जाते हैं, वे ही मासकल्चरीय पुस्तक समीक्षा के भी प्रमुख समीक्षक हैं। वे अब टीवी पर समीक्षा करते हैं। वैसे उन्होंने पुस्तक समीक्षा नहीं लिखी है। यही कार्य अपने तरीके से अनेक साहित्यिक पत्रिकाएं भी कर रही हैं। इस समीक्षा का मूल लक्ष्य है किताब का बाजार तैयार करना,प्रकाशक का मुनाफा बढ़ाना,लेखक की प्रतिष्ठा में इजाफा करना। इसमें लेखक और किताब जनप्रिय बनाने,प्रशंसक पैदा करने का भाव प्रमुख है। इसका आलोचना के धर्मनिरपेक्ष ज्ञानकांड से कोई संबंध नहीं है। एडवर्ड सईद के शब्दों में आलोचना की भूमिका बुनियादी तौर पर मूलगामी, धर्मनिरपेक्ष,अन्वेषकीय और तुलनात्मक रूप से गतिशील होती है। आलोचना मूलत: बौद्धिक और विवेकपूर्ण (रेशनल) गतिविधि है। मासकल्चरजनित साहित्य समीक्षा ने आलोचना का विभ्रम पैदा किया है। यह इरेशनल गतिविधि है। यह आलोचना नहीं मासकल्चर है। इसने आलोचना में गतिरोध पैदा किया है।
          नव्य उदार समीक्षा फंडा है कम लिखो ज्यादा कमाओ। कम पढ़ो ज्यादा बोलो। कॉमनसेंस में सोचो और बोलो। कुछ लोग यह मानकर चल रहे हैं कि गंभीर आलोचना तो फलां-फलां आलोचक ही कर सकता है, हम तो बेहतर सोच ही नहीं सकते। वहीं दूसरी ओर सोचने वाले आलोचकों की हालत इस कदर पतली है कि वे कम सोच रहे हैं और कम पढ़ रहे हैं। वे दोहरा ज्यादा रहे हैं। दोहराने वालों अथवा वाचाल किस्म के आलोचकों में आलोचनात्मक विनम्रता नहीं है,वे अन्य को कम पढ़ते हैं,जिसे पढ़ते हैं उसका नाम ,संदर्भ छिपाते हैं, अन्य की बातों को अपने नाम से,मौलिक समीक्षा के नाम से चलाते हैं ।

आलोचना का कोई एक रूप,प्रकार,स्कूल आदि तय करना मुश्किल है,आलोचना अनेकरूपा है। आलोचना को किसी एक स्थान,एक विचारधारा आदि में सीमित करके देखना सही नहीं होगा। हम जब आलोचना का वर्गीकरण करते हैं तो यह एक स्वाभाविक कार्य है,क्योंकि प्रत्येक किस्म की आलोचना स्वयं की संरचनाओं की भी आलोचना होती है। अच्छी आलोचना वह है जो आत्म-चेतस हो। चूंकि हिन्दी में आलोचना की आकांक्षा अभी भी बची है,बिखरे हुए रूप में आलोचना लिखी जा रही है अत: वह मौजूदा ठहराव से भी मुक्त होगी। आलोचना का स्वरूप बदलेगा। आलोचना का नया बदला हुआ रूप बहुत कुछ सम-सामयिक विचार,संचार तकनीक,पद्धति और इण्टरडिसिपिलनरी एप्रोच पर निर्भर है। आलोचना जितना एकांगी दायरों की कैद से मुक्त होगी वह ज्यादा जनतांत्रिक होगी।  
     नए दौर में आलोचना अपने को वर्चुअल बना चुकी है। आलोचना के वर्चुअल होने का अर्थ है आलोचना का अकेलापन। पहले आलोचना साहित्य से जुड़ी थी,साहित्य के पाठक से जुड़ी थी,आलोचक,लेखक और कृति के बीच प्रत्यक्ष संबंध था,किंतु लंबे समय से यह संबंध टूट चुका है। लेखक और आलोचक के बीच अंतराल पैदा हो गया है।

       नव्य उदार दौर में आलोचक और लेखक दोनों में अपना अस्तित्व बनाए रखने की इच्छा तो है किंतु दोनों में एक साथ रहने,संवाद करने और एक-दूसरे से सीखने और सिखाने की आकांक्षा खत्म हो गयी है। फलत: लेखक अकेला है और आलोचक भी अकेला है। दोनों में अलगाव पैदा हो गया है। अब ये दोनों एक-दूसरे से सिर्फ प्रशंसा चाहते हैं,आलोचना नहीं चाहते। आलोचना रचना का स्पर्श करके निकल जाती है जिसे हम पुस्तक समीक्षा के नाम से जानते है। पुस्तक समीक्षा आलोचना का स्पर्श है, आलोचना नहीं है। रचना से बड़ा लेखक का अहं हो गया है। लेखक आलोचक की कंपनी पसंद करता है किंतु आलोचना पसंद नहीं करता,आलोचना करते ही नाराज हो जाता है। आलोचना वह है जिसमें विश्लेषण हो,व्याख्या हो,गहराई में जाकर विवेचन किया गया हो,शब्दों के बाहुल्य,शब्दों के अभाव को आलोचना नहीं कहते। रचना के मर्म का उद्धाटन किया जाय। आलोचना का काम यह भी है कि वह रचना को उसके व्यक्त लक्ष्य के परे ले जाए,पाठक को अनुशासित करने की बजाय खास किस्म की गतिविधि के लिए प्रेरित करे। आलोचना का बुनियादी कार्य है प्रतिरोध करना और धर्मनिरपेक्ष बनाना।जो आलोचना कठमुल्लापन अथवा पोंगापंथीभाव पैदा करती है उसे आलोचना नहीं कहते। आलोचना को जनतंत्र चाहिए। आलोचना और जनतंत्र की प्रक्रियाओं के गर्भ से धर्मनिरपेक्ष समीक्षा विमर्श पैदा होता है।
    नव्य उदार समीक्षा निष्पन्न यथार्थ या साहित्य में सच्चे की भक्त है। उसे साहित्य में सत्य के अलावा कुछ भी नजर नहीं आ रहा। यह आलोचना का भ्रष्टीकरण है। खासकर निष्पन्न अतीत के प्रति मोह बढ़ा है। अतीत कोई निष्पन्न या कम्प्लीट,अपरिवर्तनीय तत्व नहीं है।बल्कि उसे बार-बार निर्मित किया गया है। अतीत का जो भी बोध हमारे पास है उसका अतीत से कम वर्तमान के नजरिए से ज्यादा संबंध है। अतीत को अतीत के नजरिए से नहीं वर्तमान के नजरिए से देखा जाना चाहिए। वर्तमान के नजरिए से अतीत को देखने का अर्थ है अतीत को परिवर्तनीय,गतिशील और निरंतर अपडेटिंग की प्रक्रिया का हिस्सा बना देना। जिस तरह वर्तमान अपने को अपडेट करता है,अतीत भी मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन के जरिए अपने को अपडेट करता है।यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। अतीत को अपडेट करने का काम हिन्दी में बंद पड़ा है। अब हम अतीतपूजक मात्र होकर रह गए हैं।

     नव्य उदार विचारों की साहित्यव्यवहार और आदतों में बाढ़ आ गयी है वे बता रहे हैं सभ्यता और संस्कृति का प्रकाश भारत में तब आया जब अंग्रेजों का शासन आया था। वे बता रहे हैं लिंगभेद स्वाभाविक है। जो जैसा है उसे वैसा ही मानो। वैसा ही बनाए रखो। वे संस्कृति के विमर्श को लिंगभेद,राष्ट्रवाद,नस्ल,बॉयोलॉजी आदि के साथ जोड़कर पेश कर रहे हैं। इसके बहाने वे हमारे ज्ञान को ही प्रदूषित करने ,विकृत करने, साधारण जनता को ज्ञान से वंचित करने का प्रयास कर रहे हैं।  
    संस्कृति हमारे सांस्कृतिक रूपों का ही खजाना नहीं है,बल्कि ज्ञान का भी खजाना है, संस्कृति को जानने का अर्थ है नॉलेज सोसायटी में दाखिल होना।संस्कृति के जरिए अवधारणा,वस्तु,विचार,मूल्य आदि के निर्माण की प्रक्रिया का ज्ञान होता है। नव्यउदार विचारकों ने संस्कृति को नस्ल,साम्प्रदायिकता, धर्म, राष्ट्रवाद और जीवन शैली से जोड़ा है। हमें संस्कृति को ज्ञान और प्रतिरोध से जोड़ना चाहिए। ज्ञान और प्रतिरोध हमारी अस्मिता की धुरी हैं। नव्य उदार नजरिए में अस्मिता की धारणा में सब कुछ अनालोचनात्मक रूप से स्वीकार कर लेने पर जोर है। हमें इसके प्रति आलोचनात्मक नजरिए पर जोर देना चाहिए। अस्मिता के पीछे निहित निस्सारता का उदघाटन करना चाहिए। अनुमान की बजाय तर्क और प्रमाण पर जोर देना चाहिए।
      नव्य उदार नजरिया ‘भेद’ पर जोर देता है। ‘भिन्नता’ जोर दिया जा रहा है। कायदे से साहित्य को ‘भेद’ के बाहर ले जाने की जरूरत है। भारत में 'जातिभेद' सबसे बड़ा 'भेद' है। इस 'भेद' का उल्लेख करने से कोई नहीं बचा है। सवाल यह है क्या साहित्यिक कृति या इतिहास में 'जाति' का उल्लेख 'भेद' के औपनिवेशिक दायरे में ले जाता है ? यहां यह देखना रोचक होगा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अपने इतिहास में लेखक के संदर्भ में 'जाति' का इस्तेमाल करते हैं,जबकि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लेखक के संदर्भ में 'जाति' का इस्तेमाल नहीं करते। 'जाति' हमारे यहां 'भेद' का हिस्सा है, द्विवेदीजी अपनी रचनाओं में 'भेद' के परे जाते हैं। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में 'जाति' को 'भेद' से जोड़ा,'व्यवस्था' से जोड़ा,द्विवेदीजी इसके परे जाते हैं। भारत के इतिहासकारों ने इतिहास लिखते समय 'जाति' को इतिहास का हिस्सा बनाकर पेश किया,जाति के इतिहास का हिस्सा बन जाने से समस्या और भी जटिल हुई है। जाति का जनगणना का हिस्सा बन जाने से जाति व्यवस्था पहले से ज्यादा पुख्ता हुई है। औपनिवेशिकता ने 'जाति' को भारतीय संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बनाया ,संस्कृति का मर्म बताया,आचार्य द्विवेदीजी ने संस्कृति के विमर्श में जाति को कभी मर्म तो दूर की बात है, हाशिए पर भी जगह नहीं दी है।बल्कि उपन्यासों में एथनिक पहचान का इस्तेमाल जरूर किया है। द्विवेदीजी के यहां 'जाति' प्रमुख नहीं है,पेशा प्रमुख है, व्यक्ति के गुण प्रमुख हैं। जबकि प्रेमचंद के यहां जाति और गुण का चित्रण है साथ ही जाति वर्चस्व के रूपों का चित्रण है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रेमचंद 'जातिप्रथा' के समर्थक थे,बल्कि इसका अर्थ यह है कि प्रेमचंद औपनिवेशिक केटेगरी के परे जाकर सोच नहीं पाते,द्विवेदीजी इस दायरे का अतिक्रमण कर जाते हैं। इसी से जुड़ी एक और समस्या है वह है 'जातिभेद' का उद्धाटन क्या साम्राज्यवाद के पक्ष में जाता है या विपक्ष में ? रामचन्द्र शुक्ल और प्रेमचंद के पक्षधरों को इस सवाल के पेंच खोलने चाहिए। 'जातिभेद' के प्रश्नों को खोलने में देरिदा के 'डिफरेंस' से भी कोई मदद नहीं मिलेगी। इसका प्रधान कारण यह है कि 'डिफरेंस' में निरंतर स्थगन का भाव है। इसका अर्थ है ' डिफरेंस' का निरंतर बने रहना। 'अदर' की संरचनात्मक अनुपस्थिति। 'अदर' या 'डिफरेंस' की धारणा असंपूर्ण धारणा है। इससे 'अदर' की मुक्ति संभव नहीं है।
   नव्य उदारपंथी आलोचक 'सार्वभौम' की बजाय स्थानीयता पर जोर दे रहे हैं,सांस्कृतिक बहुलतावाद पर जोर दे रहे हैं। सच यह है  यथार्थ के जिस सार्वभौम रूप की हम अभी तक पूजा करते रहे हैं उसमें यथार्थ के वैविध्य का नकार छिपा है। सार्वभौम यथार्थ से भिन्न यथार्थ का कैनवास काफी बड़ा है।यथार्थ का एक रूप सार्वभौम हो सकता है किंतु यथार्थ का वही एकमात्र आदर्श मानक नहीं हो सकता। साहित्य में यथार्थ के उतने ही मानक होंगे जितने व्यक्ति समाज में हैं,अत: यथार्थ की सार्वभौम केटेगरी बेकार और संकुचित केटेगरी है। इसी तरह नैतिकता का कोई सार्वभौम मानक नहीं हो सकता, एक जैसी नैतिकता नहीं हो सकती है, सार्वभौम के बहाने हमारे साहित्य में औपनिवेशिकता ने जिस तरह स्वातंत्र्योत्तर आलोचना में प्रवेश किया है उससे मुक्त होने का रास्ता खोजने की जरूरत है। 'सार्वभौम' की खोज के आधार पर प्रेमचंद का टालस्टाय,लु शुन आदि के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया गया,जो गलत है।कालान्तर में यथार्थवाद संबंधी बहस के दौरान भी आलोचकों ने 'सार्वभौम' के तत्व के आधार पर साहित्य की आलोचना की। इसके कारण समूची बहस बहुत ही संकुचित दायरे में केन्द्रित होकर रह गयी। यथार्थ वही नहीं है जो किसी बड़े लेखक ने चुना है और बहस के केन्द्र मे है,साहित्य वह भी है जो सार्वभौम नहीं है ,अज्ञात है और बहस के दायरे के बाहर है।


                  



रविवार, 5 दिसंबर 2010

साहित्यिक मजमेबाजी के प्रतिवाद में

   
          एक जमाना था हिन्दी साहित्य में य़थार्थ का चित्रण होता था। विचारधारात्मक बहसें होती थीं। नए मानकों पर आलोचना लिखी जाती थी। इन दिनों हिन्दी साहित्य को तमाशबीनों और मेले-ठेले की संस्कृति ने घेर लिया है। पहले साहित्य में उत्सव गौण हुआ करते थे अब प्रधान हो गए हैं। यह साहित्य में तमाशबीन संस्कृति के आने का संकेत है। साहित्य में तमाशेखोरी ,मजमेबाजी को साहित्यकर्म समझना ठीक नहीं होगा। यह साहित्य का बदला हुआ पैराडाइम है। यह परवर्ती पूंजीवाद के गहरे असर का लक्षण है। परवर्ती पूंजीवाद ने हर चीज को तमाशेखोरी और नज़ारे में बदल दिया है।       
भारत तमाशबीनों का देश बनकर रह गया है। इसमें नागरिक नहीं तमाशबीन निवास करते हैं। तमाशबीनों की तरह आज हम सब एक-दूसरे को देख रहे हैं। पूरे समाज को देख रहे हैं।
      अब हम किसी के दोस्त नहीं रहे। रिश्तेदार-नातेदार नहीं रहे। परिचित मात्र हैं। तमाशबीन हैं। तमाशबीन की तरह एक-दूसरे के जीवन में तांक-झांक करते हैं। हम कब तमाशबीन में रूपान्तरित हो गए ? तमाशबीन होने से क्या होता है ? तमाशबीनों की बृहत्तर जमात में आज जो कुछ घटित हो रहा है उसे सामान्य बात कहकर टाला नहीं जा सकता ? तमाशबीन की तरह देखना परवर्ती पूंजीवादी समाज का लक्षण है। यह ऐसा समाज है जहां प्रतीक (साइन) की जगह हम व्यंजित को देखते हैं। मौलिक की नकल करते हैं। यथार्थ के प्रतिनिधि बनने का दावा कर रहे हैं।
       हम जो कुछ देख रहे हैं वह सब कल्पना है,विभ्रम है। कल्पना एक जमाने में आनंद देती थी इन दिनों भय पैदा करती है। सत्य दुर्लभ होता जा रहा है और कल्पना का विस्तार हो रहा है। पूंजीवादी समाज में जितना कल्पना का विस्तार होता है उसी मात्र में भय का विस्तार होता है। भय और कल्पना की इस अन्तर्क्रिया ने समूची सामाजिक चेतना को आच्छादित कर लिया है। फलतः सत्य छोटा हो गया है और कल्पना बड़ी हो गयी है।
      आज भारत में उत्पादन के आधुनिक साधनों का वर्चस्व है। यह सबको तमाशबीन बना रहा है। इसके कारण बड़े पैमाने पर नजारे देखने को मिलते हैं। अब हम जो कुछ देखते हैं वह सब इमेजों में देखते हैं,इमेजों के जरिए समाज को समझते और ग्रहण करते हैं। अब व्यक्ति का नहीं इमेजों का प्रतिनिधित्व सामने आता है। जिन इमेजों को देखते हैं उनका सामान्य जीवन से अब कोई संबंध नहीं होता,फलतःजीवन की एकीकृत धारणा भी नहीं बना पाते। जीवन में चीजों के बीच अन्तस्संबंध नहीं बना पाते। यथार्थ हमेशा अधखुला नजर आता है। यथार्थ अपनी आंतरिक एकता से कटा नजर आता है। जिस दुनिया को देखते हैं वह छद्म होती है। जिन वस्तुओं को देखते हैं वे उलझन पैदा करती हैं। जब इमेजों के संसार में विशिष्टिकृत इमेजों को रच लेते हैं तो इमेजों का स्वायत्त संसार पूर्णता प्राप्त कर लेता है। जिंदगीरहित चीजें स्वायत्त विचरण करने लगती हैं।
     मौजूदा समाज में इमेजों को देखना और उनमें ही जीना सामान्य बात हो गयी हो गयी है। नज़ारों ने प्रमुखता अर्जित कर ली है। इमेज और उनके नजारे ही एकता के सूत्र बन गए हैं। अब हम नज़ारों को देखते हैं,नज़ारे हमें देखते हैं। एक-दूसरे को देखना ही एकीकरण का मंत्र बन गया है। नज़ारे ही समाज को जोड़ने का उपकरण बन गए हैं। समाज में जहां जाओ सब एक-दूसरे को घूर रहे हैं। अब घूरना ही चेतना का निर्धारक तत्व बन गया है। घूरना छद्मचेतना का प्रभावशाली आधार है। वंचित और समर्थ सभी एक-दूसरे को घूर रहे इसके आधार पर ही हमारी चेतना बन रही है।
    हम जब इमेज देखते हैं तो सिर्फ इमेजों को ही नहीं देखते बल्कि इमेजों के जरिए जनता के बीच के सामाजिक संबंधों को भी देखते हैं। जनता के सामाजिक संबंधों के बीच में सेतु का काम इमेज करती हैं। इमेजों को विज़न के दुरूपयोग के जरिए नहीं समझा जा सकता। बल्कि इमेजों का उत्पादन जनोत्पादन की तकनीक के गर्भ से होता है। हम जिन इमेजों को मीडिया के विभिन्न रूपों के माध्यम से देखते हैं वे सभी सामाजिक वर्चस्व वाले मॉडल का प्रतिनिधित्व करती हैं। अब हमारे सामने तयशुदा चीजें पैदा करके रख दी गयी हैं और हमें इनमें से ही चुनना होता है। यह तय है किसमें से चुनना है ? कितना चुनना है ? और क्यों चुनना है ? यह सब निर्धारित है। हम जो चुनते हैं वह अवास्तविक होता है, काल्पनिक होता है। जो चुनते हैं  उससे सामाजिक यथार्थ में नया कुछ भी नहीं जोड़ते। हम उपलब्ध में से चुनते हैं। उपभोग करते हैं। फलतः सामाजिक वर्चस्व का हिस्सा मात्र बनकर रह गए हैं। हम जिन नज़ारों को देखते हैं वे रूप और अन्तर्वस्तु में मौजूदा व्यवस्था की वैधता को ही हमारे ज़ेहन में उतारते हैं। मौजूदा व्यवस्था के लक्ष्य और परिस्थितियों की वैधता को पुष्ट करते हैं। नज़ारे हमारे मन में व्यवस्था के लक्ष्य और परिस्थितियों के प्रति स्थायी वैधता पैदा करते हैं।
    नज़ारे के दर्शकों की भाषा शासकीय भाषा होती है। शासकों की भाषा में नज़ारों का उत्पादन हो रहा है। प्रतिवाद की भाषा का अपहरण कर लिया गया है। इस प्रक्रिया में साहित्य में यथार्थ की जगह निर्मित यथार्थ ने ले ली है और उसकी जय-जयकार में आलोचक व्यस्त हैं। अमेरिका का विरोध करने ,साम्राज्यवाद का विरोध करने वालों की भाषा का लोप हो गया है। पूंजीवाद,अमेरिका,साम्राज्यवाद आदि पदबंधों को लेकर अनुकूल भावबोध और अर्थ संप्रेषित पैदा किया जा रहा है। पूंजीवाद,नव्य-उदारतावाद आदि के प्रति जनता को सक्रिय करने वालों को प्रगतिशील कहा जा रहा है। पूंजीवाद को श्रेष्ठतम समाज के रूप में चित्रित किया जा रहा है। हमें बार-बार यही बताया जा रहा है कि हम पूंजीवाद का समर्थन करें। हमें सहनशील बनने की सीखें  दी जा रही हैं। कहा जा रहा है हम तटस्थ रहें, विवादों, संघर्षों,मांगों के लिए होने वाले सामूहिक संघर्षों से दूर रहें, सामूहिक संघर्ष बुरे होते हैं। आम आदमी को तकलीफ देते हैं। जो लोग समाज में तटस्थता का अहर्निश प्रचार कर रहे हैं ,वस्तुतः पूंजीवाद से तटस्थता का प्रचार कर रहे  हैं। मीडिया और साहित्य में जनसंघर्षों और मानवाधिकार हनन का विकृत प्रचार मूलतः पूंजीवाद की ही सेवा है। यह पूंजीवादी समाज के अन्यायपूर्ण चेहरे को ढंकने की कोशिश है।
   पूंजीवाद ने हमारे सामाजिक जीवन को किस तरह हजम कर लिया है उसका साक्षात प्रमाण है भीषण गर्मी का प्रकोप। अंधाधुंध ,विषम और अनियोजित पूंजीवादी विकास के कारण पर्यावरण संतुलन गड़बड़ा गया है। इस क्रम में हम गर्मी झेल रहे हैं लेकिन पूंजीवाद के बारे में हम कोई भी चर्चा नहीं कर रहे। बल्कि मीडिया निर्मित नजारे की संस्कृति ने मौसम को पूंजीवाद निरपेक्ष और भगवान की कृपा बना दिया है। गर्मी की भीषण तबाही हमारे अंदर किसी भी किस्म की सामाजिक बेचैनी पैदा नहीं कर रही है। मौसम में आए बदलाव हमें पूंजीवादरहित नजर आ रहे हैं। माओवादियों की खूंखार हरकतें गरीबी की देन नजर आ रही हैं। माओवाद के खिलाफ कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि हमें उनके खिलाफ राजनीतिक जंग लड़नी चाहिए। उन्हें जनता में अलग-थलग करना चाहिए। जब माओवादी हिंसा कर रहे हों ऐसे में जनता में राजनीतिक प्रचार किया जा सकता है ? क्या माओवाद का विकल्प जनता को समझाया जा सकता है ? राजनीतिक प्रचार के लिए शांति का माहौल प्राथमिक शर्त है और माओवादी अपने एक्शन से शांति के वातावरण को ही निशाना बनाते हैं,सामान्य वातावरण को ही निशाना बनाते हैं, वे जिस वातावरण की सृष्टि करते हैं उसमें राज्य मशीनरी के सख्त हस्तक्षेप के बिना कोई और विकल्प संभव नहीं है। जब एक बार शांति का वातावरण नष्ट हो जाता है तो उसे दुरूस्त करने में बड़ा समय लगता है।कारपोरेट पूंजी निवेश के विध्वंसात्मक  आयाम पर पर्दादारी की जा रही है। हर चीज का जबाव बाजार में खोजा जा रहा है,हमसे सिर्फ देखने और भोग करने की अपील की जा रही है। नव्य उदारतावाद और साम्राज्यवाद के विरोध को अंध अमेरिकी विरोध की बृहत्तर केटेगरी में बांध दिया गया है। जबकि सच यह है कि साम्राज्यवाद के विरोध का अर्थ अंध अमेरिकी विरोध नहीं है।साहित्य और कारपोरेट मीडिया में परवर्ती पूंजीवाद की आलोचना का लोप हो गया है।
     एक जमाना था रंगभेद को सबसे बड़ा भेदभाव का रूप माना जाता था नए किस्म का रंगभेद है झुग्गी-झोंपड़ी ,कच्ची बस्तियां और मुस्लिमों के प्रति घृणा। तमाम किस्म के उदारवादियों में झोंपडी वालों और मुसलमानों के प्रति भेददृष्टि को देख सकते हैं। समूचे देश में विगत तीन दशकों में कच्ची बस्तियों का व्यापक विस्तार हुआ है। महानगरों और शहरों में जितने लोग घरों में रहते हैं उतने ही या उससे ज्यादा लोग झोंपड़ पट्टियों में रह रहे हैं। क्या बस्ती वाले को हम सर्वहारा कह सकते हैं ? क्या यह समुदाय क्रांति कर सकता है? ये वे लोग हैं जिनके पास परंपरागत जाति-धार्मिक पहचान नहीं है, किसी भी किस्म की परंपरागत जीवन शैली नहीं है। स्लावोज जीजेक के शब्दों में इनके पास किसी भी किस्म की पहचान नहीं है। ये सभी किस्म के आधारभूत बंधनों से मुक्त हैं। ये मुक्त स्पेस में यहां से वहां ढ़ुलकते रहते हैं। ये राज्य और पुलिस के नियमन के पूरी तरह बाहर हैं। इन्हें  जबरिया ढ़ंग से समूह में बांध दिया गया है। ये जबरिया एक साथ रहने के लिए अभिशप्त हैं। इनकी परिस्थितियां ऐसी हैं कि अब इनके यहां कोई घटना घटित नहीं होती। आमतौर पर यह कहा जाता है समूचे समाज पर राज्य का नियंत्रण है। लेकिन कच्ची बस्तियों में रहने वालों पर राज्य का कोई नियंत्रण नहीं है।  ये राज्य नियंत्रण के बाहर हैं। इस जनता पर साहित्य में बहस नहीं हो रही। आलोचक नहीं लिख रहे। झोपड़पट्टियों में रहने वाली आबादी में से ही हिंसक गिरोह तैयार हो रहे हैं। हिंसा को जनप्रिय और वैध बनाने में इन वर्गों की बड़ी भूमिका है। हिंसा को झोंपड़पट्टी वालों ने साझा संस्कृति में तब्दील किया है। हिंसा का ज्ञान,राजनीति,मीडिया,साहित्य आदि के स्तर पर महिमामंड़न बढ़ा है। हिंसा का समाजीकरण हो रहा है। फलतःआम बोलचाल की भाषा में हिंसक भाषा आ बैठी है। आम आदमी के पास प्राइवेट वातावरण  का लोप हुआ है। प्राइवेट वातावरण में अहर्निश भय बना हुआ है।प्राइवेसी के सवाल मूलतः संपत्ति संचय के सवाल हैं। संपत्ति संचय के जिन रूपों को हम इन दिनों देख रहे हैं वे हैं बौद्धिक संपदा अधिकार, डिजिटल अधिकार, इंटरनेट से मुफ्त सामग्री संकलन का अधिकार,नेट से मुफ्त संगीत पाने का अधिकार आदि। ये सभी आधुनिक किस्म के संपदा संचय के स्रोत हैं।
   अब राजनीति में विचारधारा के आधार पर जनता को संगठित नहीं किया जा रहा है बल्कि विशेषज्ञों के द्वारा जनता के प्रबंधन और प्रशासन पर जोर दिया जा रहा है। अराजनीतिक ढ़ंग से समाज की सुरक्षा और विकास की बातें की जा रही हैं। समूचे वातावरण को भय में तब्दील कर दिया गया है। हमेशा भय,आशंका और तबाही के डर में कैद रहते हैं। आम जनता में धर्म का ह्रास हुआ है धर्म की जगह धार्मिक तत्ववाद ने ले ली है। धार्मिक फंड़ामेंटलिज्म के प्रभुत्व को आज कोई चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। जगह-जगह धार्मिक फंड़ामेंटलिज्म ने सामाजिक दायरों को संकुचित किया है। समाज में ‘पशु मनुष्य’ और ‘अमानवीय’ ये दो किस्म के लोग ज्यादा दिख रहे हैं। सामान्य जीवन में खाओ-पीओ-मौज करो का नारा देकर जो धारणा बनाई जा रही है उससे ‘पशु मनुष्य’ की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। खाओ-पाओ-मौज करो का सिद्धान्त पशु का सिद्धान्त है। आज आदमी आनंद और मनोरंजन के चक्कर में व्यस्त है और मौत आदि से डरता है। यह पशु की मनोदशा है। इसे मानवीय मनोदशा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। सत्य प्रेम ही मनुष्य को पशुता से मुक्ति दिलाता है।साहित्य और मीडिया में सत्य की बजाय कृत्रिम यथार्थ और भय का उत्पादन हो रहा है। यह सांस्कृतिक क्षय की सूचना है।                     

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

उत्तरआधुनिकतावाद का प्रधान फिनोमिना है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार


        उत्तर आधुनिकतावादी विकास का प्रधान लक्षण है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार,नेताओं में संपदा संचय की प्रवृत्ति, अबाधित पूंजीवादी विकास,उपभोक्तावाद की लंबी छलांग और संचार क्रांति। इन लक्षणों के कारण सोवियत अर्थव्यवस्था धराशायी हो गयी। सोवियत संघ और उसके अनुयायी समाजवादी गुट का पराभव एक ही साथ हुआ। सामान्य तौर इस पराभव को मीडिया में साम्यवाद की असफलता कहा गया। वास्तव में यह साम्यवाद की असफलता नहीं है। फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में यह ‘आधुनिकीकरण की छलयोजना’ है।
    अस्सी के दशक से सारी दुनिया में सत्ताधारी वर्गों और उनसे जुड़े शासकों में पूंजी एकत्रित करने,येन-केन प्रकारेण दौलत जमा करने की लालसा देखी गयी। इसे सारी दुनिया में व्यवस्थागत भ्रष्टाचार कहा जाता है और देखते ही देखते सारी दुनिया उसकी चपेट में आ गयी। आज व्यवस्थागत भ्रष्टाचार सारी दुनिया में सबसे बड़ी समस्या है। पश्चिम वाले जिसे रीगनवाद,थैचरवाद आदि के नाम से सुशोभित करते हैं यह मूलतः आधुनिकीकरण की छलयोजना है और इसकी धुरी है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार।
     ध्यान रहे रीगनवाद-थैचरवाद को हम नव्य आर्थिक उदारतावाद के नाम से भी जानते हैं और भारत में इसके जनक नरसिंहाराव-मनमोहन सिंह रहे हैं। जिसे मनमोहन अर्थशास्त्र कहा जा रहा है वह मूलतः आधुनिकीकरण की छलयोजना है और व्यवस्थागत भ्रष्टाचार का मूल स्रोत है। मनमोहन अर्थशास्त्र के लागू किए जाने साथ जितने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है वैसा पहल कभी नहीं देखा गया।
     भारत को महमूद गजनवी ने जितना लूटा था उससे सैंकड़ों गुना ज्यादा की लूट विभिन्न किस्म के भ्रष्टाचारों के जरिए नेताओं की मिलीभगत से हुई है। चीन और रूस में इसका असर हुआ है चीन में अरबपतियों में ज्यादातर वे हैं जो पार्टी मेंम्बर हैं या हमदर्द हैं,इनके रिश्तेदारसत्ता में सर्वोच्च पदों पर बैठे हैं। यही हाल सोवियत संघ का हुआ।
    भारत में नव्य उदारतावादी नीतियां लागू किए जाने के बाद नेताओं की सकल संपत्ति में तेजी से वृद्धि हुई है। सोवियत संघ में सीधे पार्टी नेताओं ने सरकारी संपत्ति की लूट की और रातों-रात अरबपति बन गए। सरकारी संसाधनों को अपने नाम करा लिया। यही फिनोमिना चीन में भी देखा गया। उत्तर आधुनिकतावाद पर जो फिदा हैं वे नहीं जानते कि वे व्यवस्थागत भ्रष्टाचार और नेताओं के द्वारा मचायी जा रही लूट के मददगार बन रहे हैं। मसलन गोर्बाचोव के नाम से जो संस्थान चलता है उसे अरबों-खरबों के फंड देकर गोर्बाचोव को रातों-रात अरबपति बना दिया गया। ये जनाव पैरेस्त्रोइका के कर्णधार बने। रीगन से लेकर क्लिंटन तक और गोर्बाचोब से लेकर चीनी राष्ट्रपति के दामाद तक पैदा हुई अरबपतियों की पीढ़ी की तुलना जरा हमारे देश के सांसदों-विधायकों की संपदा से करें। भारत में सांसदों-विधायकों के पास नव्य आर्थिक उदारतावाद के जमाने में जितनी तेजगति से व्यक्तिगत संपत्ति जमा हुई है वैसी पहले कभी जमा नहीं हुई थी। अरबपतियों-करोड़पतियों का बिहार की विधानसभा से लेकर लोकसभा तक जमघट लगा हुआ है। केन्द्रीयमंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक सबकी दौलत दिन -दूनी रात चौगुनी बढ़ी है। नेताओं के पास यह दौलत किसी कारोबार के जरिए कमाकर जमा नहीं हुई है बल्कि यह अनुत्पादक संपदा है जो विभिन्न किस्म के व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के जरिए जमा हुई है। कॉमनवेल्थ भ्रष्टाचार, 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला आदि तो उसकी सिर्फ झांकियां हैं। अमेरिका मे भयानक आर्थिकमंदी के बाबजूद नेताओं की परिसंपत्तियों में कोई गिरावट नहीं आयी है। कारपोरेट मुनाफों में गिरावट नहीं आयी है। भारत में भी यही हाल है।
 इसी संदर्भ में फ्रेडरिक जेम्सन ने मौजूदा दौर में मार्क्सवाद की चौथी थीसिस में लिखा है ‘‘इस संरचनात्मक भ्रष्टाचार का नैतिक मूल्यों के संदर्भ में कार्य-कारण संबंध के रूप में व्याख्या करना भ्रामक होगा क्योंकि यह समाज के शीर्ष वर्गों में अनुत्पादक ढंग से धन संग्रह की बिलकुल भौतिक सामाजिक प्रक्रिया में उत्पन्न होता है।’’      
‘‘इस बात पर बल देना अनिवार्य है कि कार्य-कुशलता, उत्पादकता और वित्तीय संपन्नता जैसे संवर्ग तुलनात्मक हैं। अभिप्राय यह है कि उनके परिणामों की भूमिका उस क्षेत्र में आती है जिसमें अनेक असमान परिघटनाएं प्रतिस्पर्धा कर रही हों। अधिक कार्यकुशल और उत्पादक तकनीकी पुरानी मशीनरी और पुराने संयंत्र को तभी विस्थापित करती हैं, जब पुरानी मशीनरी और संयंत्र अधिक कार्यकुशल तथा आधुनिक तकनीकी के कार्यक्षेत्र में प्रवेश करते हैं और उनके साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं।’’
    इसी बात को सोवियत संघ के संदर्भ में आगे बढ़ाते हुए जेम्सन ने लिखा ‘‘सोवियत संघ अकुशल हो गया और जब इसने अपने को 'विश्व-तंत्र' के साथ एकीकृत करने का प्रयास किया, तो यह विघटित हो गया क्योंकि विश्व-तंत्र आधुनिकता से उत्तरआधुनिकता की ओर अग्रसर था। यह एक ऐसा तंत्र था जो संचालन के नए नियमों के हिसाब से उत्पादकता की अतुलनीय द्रुत गति से दौड़ रहा था। वहीं सोवियत संघ में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसकी इससे तुलना की जा सके। सांस्कृतिक अभिप्रेरकों (उपभोक्तावाद, नई सूचना प्रौद्योगिकी आदि) द्वारा प्रेरित, सुविचारित सामरिक-तकनीकी प्रतिस्पर्धा में आकृष्ट होकर, ऋण तथा तीव्र होते वाणिज्यिक सह-अस्तित्व के रूपों के प्रलोभन में आकर रूस एक ऐसे तत्व में प्रवेश कर गया जहां इसका अस्तित्व समाप्त हो गया। यह दावा किया जा सकता है कि सोवियत संघ और इसके अनुषंगी देश, जो अब तक अपने ही विशिष्ट दबाव क्षेत्र में अलग-अलग थे मानो किसी विचारधारात्मक सामाजिक, आर्थिक, भूगणितीय उभार (गुंबज) के नीचे दबे हों, ने अविवेकपूर्ण ढंग से बिना अंतरिक्ष-पोशाक तैयार किए ही वायुबंध खोलना आरंभ कर दिया और इस प्रकार स्वयं को और अपने संस्थानों को बाह्य विश्व के तीव्र और अपरिमेय दबाव के हवाले कर दिया। इसके परिणाम की तुलना हम प्रथम परमाणु बम के विस्फोट से हुई उन तुच्छ ढांचों की हालत से कर सकते हैं जो इस बम विस्फोट के स्थल के सबसे नजदीक थे, या फिर उन असुरक्षित जीवों की हालत से कर सकते हैं जो समुद्र तल पर उपस्थित थे जब जल में उत्पन्न विकृत दबाव का भार उन पर पड़ा होगा, खासकर जब यह दबाव से ऊपर की ओर उठ रहा होगा। यह परिणाम वॉलरस्टीन की दूरदर्शितापूर्ण चेतावनी की पुष्टि करता है। उन्होंने कहा था कि सोवियत ब्लॉक ने अपनी महत्ता के बावजूद पूंजीवादी तंत्र के विकल्प के रूप में किसी तंत्र का निर्माण नहीं किया। बल्कि इसके भीतर एक तंत्र-विरोधी क्षेत्र या स्थान बनाया, जो अब स्पष्टतया समाप्त हो गया है। यदि शेष कुछ बचे हैं तो वे कुछ पॉकेट्स हैं जिनमें आज भी विविध समाजवादी प्रयोग किए जा रहे हैं।’’


मंगलवार, 16 नवंबर 2010

साइबरकल्चर का एशियाई परिप्रेक्ष्य

            परवर्ती पूंजीवाद ने एशिया में विकास की नयी राजनीतिक संभावनाओं को खोला है। उसके कारण एशिया इस समय सबसे समर्थ आर्थिक शक्ति बन गया है। शीतयुद्ध की समाप्ति और संचार क्रांति ने विश्व की अर्थनीति में एशिया को ताकतवर बनाया है। एशिया आज जितना ताकतवर है वैसा ताकतवर वह कभी नहीं था। नयी परिस्थितियों में तीन बड़े परिवर्तन हुए हैं पहला परिवर्तन यह हुआ है कि चीन में समूचा वातावरण बदला है। बंदिशें कम हुई हैं। चीन के बदले हुए वातावरण ने एशिया में मासकल्चर को नई बुलंदियों पर पहुँचा दिया है और सामाजिक-आर्थिक विश्व शक्ति संतुलन को भी इसने प्रभावित किया है। मासकल्चर,संचार उद्योग और संस्कृति उद्योग के मालों का चीन आज सबसे बड़ा उत्पादक देश है । चीन में मजदूरों का शोषण बढ़ा है। मालों की खपत बढ़ी है।   
    एशियाई देशों की साझा समस्या है कारपोरेट लूट, पृथकतावाद और फंडामेंटलिज्म ।इन तीन विराट दैत्यों से कैसे संघर्ष करें ? मजेदार बात यह है कि जिस समय सारी दुनिया में समाजवाद और शीतयुद्ध से मुक्ति का मार्ग खोजा जा रहा था ठीक उसी समय जातीयताओं और अल्पसंख्यकों पर हमले तेज हुए हैं। जातीयसंकट गहरा हुआ है। इससे एशिया में लोकतंत्र का रास्ता क्षतिग्रस्त हुआ है। एशिया में लोकतांत्रिक प्रणाली को सबसे बड़ी चुनौती इसी दौर में दी गई । समाजवाद टूटा।खासकर सोवियत संघ और चीन में गैर समाजवादी मार्ग का अनुसरण किया गया। लंपट लोकतंत्र का उदय हुआ। अबाध कारपोरेट लूट के पूंजीवादी मार्ग का विकास हुआ।
    इसके अलावा देशज स्तर पर भाषायी असहिष्णुता कम हुई । दूसरी ओर भाषाओं के भूमंडलीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई। संचार क्रांति के अनेक नकारात्मक लक्षण हो सकते हैं लेकिन एक सकारात्मक लक्षण है भाषाओं का भूमंडलीकरण।
      भाषा के भूमंडलीकरण ने अस्मिता के समूचे विमर्श को,समाजवाद और शीतयुद्ध के दौर में बनी धारणाओं को गंभीर चुनौती दी और उन्हें नष्ट किया। फलतःआज भाषा विवाद की नहीं संवाद और संपर्क का माध्यम है।        
     रूस और चीन में घटित परिवर्तनों ने नव्य-उदारतावाद की दिशा ही गड़बड़ा दी है। जिस तरह समाजवादी सोवियत संघ के उदय ने पूंजीवाद के छंद को बेसुरा बनाया था और उन्हें कल्याणकारी राज्य के निर्माण की दिशा में जाने या समाजवाद अपनाने के लिए मजबूर किया था। ठीक वैसे ही चीन ने नव्य उदारतावाद को अपनाकर अमरीकी नव्य उदारतावाद को नई ऊँचाईयों पर पहुँचा दिया। सोवियत संघ जैसे सारी दुनिया को समाजवाद और कल्याणकारी राज्य का पाठ पढ़ाते पढ़ाते समाजवाद का पाठ भूल गया यहीदशा अमेरिका की हुई है। वह नव्य उदारतावाद का पाठ पढ़ाते हुए उसकी स्वयं की गाड़ी नव्य उदारतावाद की पटरी से उतर गयी है। समाजवाद के पराभव के समय अमेरिका ने सोवियत कम्युनिस्टों की मदद की. ठीक उसी तरह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने आर्थिकमंदी में अमेरिका की मदद की। आज बिडम्बना यह है कि समाजवाद रूस सेचला गया और नव्य उदारतावाद अमेरिका से जाने के लिए छटपटा रहा है।और चीन समाजवाद और नव्य उदारतावाद के बीच में फंसा हुआ लोकतंत्र की राह का यात्री बन चुका है। 
    इस क्रम में संस्कृति हाशिए पर चली गयी है और मासकल्चर ,फंडामेंटलिज्म और शरणार्थी समस्या सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने हैं। हिन्दी के संदर्भ में पहली बात यह कहनी है कि हिन्दी का प्रसार हुआ है लेकिन हिन्दी की शिक्षा का ह्रास हुआ है। संस्कृति के रूप अपनी स्वायत्त स्थिति खो चुके हैं। हिन्दी का मीडिया बड़ा हुआ है, कारपोरेट मीडिया बना है। संस्कृति उद्योग की ताकतवर भाषा के रूप में हिन्दी का विस्तार हुआ है।  दूसरी ओर हिन्दी में आलोचनात्मक स्पेस कम हुआ है।
    नयी सांस्कृतिक दुनिया सरकारी विनिमय शर्तों के परे जाकर काम कर रही है। खासकर उपग्रह टेलीविजन,विज्ञापन और इंटरनेट की यूनीकोड भाषा ने हिन्दी को ग्लोबल संचार भाषा बना दिया है। इससे हिन्दी का आंतरिक संसार बुनियादी तौर पर बदला है। संचार क्रांति ने सांस्कृतिक विनिमय को बढ़ाया है। संस्कृति के उपभोग को बढ़ाया है। संस्कृति के ग्लोबल बाजार का निर्माण किया है।
        एशियाई देशों में समस्याओं का एक छोर आंतरिक है और दूसरा ग्लोबल है। आंतरिक समस्याएं लोकतंत्र के अभाव और अवरूद्ध विकास से जुड़ी हैं। अवरूद्ध विकास में सहयोगी हैंअंधजातीयतावाद,पृथकतावाद और धार्मिक टकराव। बाहरी समस्याओं की जड़ें नव्य उदारतावाद और युद्ध से संबंधित हैं। इन दोनों ही किस्म की समस्याओं ने अस्थिरता और विस्थापन और शरणार्थी समस्या को जन्म दिया है। यही वह परिदृश्य है जिसमें एशिया में संचार क्रांति हुई है, ग्लोबल मीडिया उद्योग का विकास हुआ है। हिन्दी में साइबरकल्चर का जन्म हुआ है।
      साइबर युग में हिन्दी की दुनिया तेजी से बदली है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के शब्दों में कहें तो हिन्दी अब नई चाल में ढ़ल रही है। नई चाल में हिन्दी कैसे ढ़ल रही है। इसके बारे में अभी हमने सोचना आरंभ नहीं किया है। हमें हिन्दी के बदले मानकीकरण को गौर से देखना चाहिए। हाल ही में भारत में ‘W3C ’ नामक कंपनी ने अपना मुख्यालय खोला है। इस कंपनी का काम होगा वेब पर भारत की संविधान स्वीकृत 22 राजभाषाओं के मानकीकरण के काम की निगरानी करना। यह काम भारत सरकार के सूचना तकनीकी विभाग के सहयोग से होगा।
     इसके पहले भारत सरकार ने आईसीएएनएन यानी ‘दि इंटरनेट कारपोरेशन फॉर एसाइननेम्स एंड नम्बर्स ’ में भारतीय भाषाओं में डोमेन नेम दर्ज करने का आवेदन किया है। भारत सरकार ने सात भाषाओं में डोमेन नेम दर्ज करने का अनुरोध किया है। ये भाषा हैं- हिन्दी,बांग्ला,पंजाबी,उर्दू,तमिल,तेलुगू और गुजराती। अभी स्थिति यह है कि हिन्दी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरे नम्बर की भाषा है। बांग्ला का आठवां स्थान है। लेकिन इंटरनेट पर इस्तेमाल होने वाली 10 सर्वोच्च भाषाओं में भारत की एक भी भाषा का नाम नहीं है।
     भाषावार स्थिति इस प्रकार है- अंग्रेजी 464 मिलियन,चीनी 321 मिलियन,स्पेनिस 131 मिलियन,जापानी 94 मिलियन ,फ्रेंच 74 मिलियन,पोर्तुगीज 73 मिलियन,जर्मन 65 मिलियन, अरबी 41 मिलियन ,रशियन 38 मिलियन और कोरियन भाषा  का 37 मिलियन यूजर इस्तेमाल करते हैं। कुल मिलाकर 10 भाषाओं के इंटरनेट पर 1,338 मिलियन यूजर हैं। बाकी भाषाओं के 259 मिलियन यूजर हैं। सारी दुनिया में 1,596 मिलियन भाषायी यूजर हैं।
    इसी तरह अनुवाद उद्योग पर नजर डालें तो व्यापक असंतुलन नजर आएगा। सबसे ज्यादा जिन 20 भाषाओं की रचनाओं का अनुवाद हो रहा है ,वे हैं-अंग्रेजी,फ्रेंच,जर्मन, रशियन, इटालियन,स्पेनिश,स्वीडिश,लैटिन,डेनिश,डच,चेक,एनशिएंट ग्रीक,जापानी,पोलिश, हंगेरियन, अरबी,नॉर्वेजियन, पोर्तुगीज,हिब्रू, चीनी।
       इन भाषाओं का जिन भाषाओं में अनुवाद हो रहा है वे हैं जर्मन,स्पेनिश, फ्रेंच,जापानी,अंग्रेजी,डच,पोर्तुगीज,पोलिस,रशियन,डेनिश,इटालियन,चेक,हंगेरियन,फिनिस, नॉर्वेजियन, स्वीडिश,मॉडर्न ग्रीक,बल्गेरियन,कोरियन और स्लोवाक।
   भारतीय भाषाओं के नेट पर अवरूद्ध विकास के कुछ कारण हैं। मसलन अभी भारत में पीसी साक्षरों की संख्या मात्र 62 मिलियन यानी कुल शहरी आबादी का यह मात्र 26 प्रतिशत है। सर्वोच्च चार बड़े महानगरों में इंटरनेट 21प्रतिशत आबादी तक ही पहुँच पाया है। इसके बाद के चार महानगरों में 21 प्रतिशत आबादी तक पहुँच पाया है। गैर महानगरों में 23 प्रतिशत आबादी तक पहुँच पाया है। पांच से एक लाख की आबादी  वाले इलाकों में 16 प्रतिशत तक ही पहुँच पाया है।  5 लाख की आबादी वाले टाउन में मात्र 4 प्रतिशत तक ही इंटरनेट पहुँच पाया है। स्थानीय भाषा के प्रयोग के लिहाज से चीन,जापान और कोरिया सबसे ऊपर आते हैं। भारत में अधिकांश लोग जानते ही नहीं हैं कि स्थानीय भाषा में सॉफ्टवेयर कहां मिलता है।
    एक सर्वे के अनुसार भारत के महानगरों के 35 प्रतिशत इंटरनेट यूजर नहीं जानते कि ऑनलाइन भारतीय भाषाओं का सॉफ्टवेयर कहां पर मिलता है। गैर महानगरीय यूजरों में यह संख्या 53 प्रतिशत तक बढ़ गयी है।
   भारत में आमतौर पर रोमन लिपि में लिखने की आदत बढ़ती जा रही है। इस समस्या से भी भारतीय भाषाओं को जल्दी ही मुक्ति मिल जाएगी। ‘दि वर्ल्ड वाइड वेब कंसोर्टियम ने 7 सितम्बर 2010 को यह फैसला लिया है कि नेट पर एशिय़ाई भाषाओं के बहुभाषी स्पीच सिस्टम को आरंभ कर दिया जाएगा। इस सिलसिले में चीन,भारत और ग्रीस में वर्कशॉप भी हो चुकी है।
    इसी क्रम में भारत में ‘स्पीच सिंथेसिस मार्कप लैंग्वेज ( एसएसएमएल 1.1) की व्यवस्था लागू होने जा रही है। इसके तहत आवाज के नियंत्रण,उच्चारण,ध्वनि के वोल्यूम और स्तर को नियंत्रित किया जा सकेगा। इससे भाषा के सटीक उच्चारण को समझने में मदद मिलेगी।
       साइबर संस्कृति के संदर्भ में यदि एशिया को देखें तो व्यापक भाषायी असंतुलन नजर आएगा। यह माना जा रहा है कि आने वाले एक बिलियन से ज्यादा इंटरनेट यूजर एशियाइ देशों से आएंगे। लेकिन इंटरनेट पर इस इलाके की भाषाओं का कंटेंट बहुत कम है। इंटरनेट के सकल कंटेंट का मात्र 13.83 प्रतिशत ही एशियाई भाषाओं में है। यह सामग्री सिर्फ चीन,कोरिया और जापान जैसे विकसित देशों की है। इनके अलावा सभी एशियाई देशों का इंटरनेट पर सन् 2011 तक मात्र 0.03 प्रतिशत रहेगा। उम्मीद है कि एशियाई भाषाओं का ऑनलाइन कंटेंट बढ़कर 14.69 प्रतिशत हो जाएगा। अभी दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की भाषाओं का कंटेंट कुल मिलाकर 10 मिलियन पन्ने है। जबकि सारी दुनिया के नेट यूजरों में एशिया की संख्या 41.3प्रतिशत है। यह संख्या सन् 2012 तक बढ़कर 50 प्रतिशत हो जाएगी। इसके बाबजूद सच यह है कि एशिया में इंटरनेट की पहुँच मात्र 17.2 प्रतिशत तक ही हो पायी है। इसके विपरीत पश्चिम देशों में इंटरनेट का विकास सर्वोच्च स्तर तक पहुँच गया है। पश्चिमी देशों में 73.1 प्रतिशत आबादी इंटरनेट के दायरे में है। अब इन देशों में इंटरनेट के विकास की बहुत कम संभावनाएं बची हैं। यही वह परिदृश्य है जो हमें आगे बढ़ने और ज्यादा से ज्यादा ईसाक्षर बनाने का एहसास पैदा करता है।        

रविवार, 14 नवंबर 2010

भूमंडलीकरण और विकास - 4- फिदेल कास्त्रो

28 जनवरी को जोसे मार्ती के जन्म की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर बोलते हुए मैंने अमरीका के राष्ट्रपति के कई भाषणों को उध्दृत किया था और उनका विश्लेषण किया था। अब मैं केवल कुछ पंक्तियां ही उध्दृत करूंगा जो स्वत: स्पष्ट है :
'हम युध्द के हर आवश्यक हथियार का प्रयोग करेंगे।'
'हर क्षेत्र में हर राष्ट्र को अब फैसला करना है। आप हमारे साथ हैं या आतंकवादियों के साथ।'
'यह सभ्यता का युध्द है।'
'हमारे समय की सबसे बड़ी उपलब्धि, हर समय की सबसे बड़ी आशाअब हमारा भरोसा करें।'
'और हम जानते हैं कि ईश्वर तटस्थ नहीं है।'
(20 सितंबर 2001)
'हमारी सुरक्षा के लिए आपकी सेना का रूप बदलना जरूरी हैएक ऐसी सेना जो एक क्षण की सूचना पर दुनिया के किसी भी अंधेरे कोने (...) पर आघात कर सके और अग्रिम कार्रवाई (...) के लिए तैयार हो।'
'हमें 60 या उससे अधिक देशों में आतंकवादी ठिकानों को उजागर करना है।'
'हम सही और गलत के संघर्ष में फंसे हैं।'
(वेस्ट प्वाइंट मिलिट्री एकेडमी भी 200वीं वर्षगांठ पर 1 जून 2002 को दिया गया भाषण)
'अमरीका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से कहेगा कि वह इराक द्वारा दुनिया की निरंतर
अवज्ञा के तथ्य पर विचार करने के लिए 5 फरवरी को बैठक बुलाए।'
'हम सलाह लेंगे लेकिन इस बारे में कोई गलतफहमी भी नहीं रहनी चाहिए। हमारे लोगों की सुरक्षा और दुनिया की शांति के लिए यदि सद्दाम हुसैन खुद को पूरी तरह निरस्त्र नहीं करता तो हमारे नेतृत्व वाला गठबंधन उसे निरस्त्र करेगा।'
'और यदि हम पर युध्द लादा गया तो हम अमरीकी सेना की पूरी ताकत और बल के साथ लड़ेंगे।'
(5 फरवरी 2003 को कांग्रेस को संबोधन)
राष्ट्रपति बुश को विश्वास है कि ईश्वर तटस्थ नहीं है लेकिन तथ्य यह है कि पोप जॉन पॉल द्वितीय तथा दुनिया के लगभग सभी धार्मिक नेता इस युध्द के खिलाफ हैं। ईश्वर के इरादों का वास्तव में कौन खुलासा कर सकता है?
दो दिन पहले हम यहां मानवता के भविष्य पर चर्चा कर रहे थे। कुछ सोच रहे थे कि भूमंडलीकरण के बाद क्या होगा, मौजूदा विश्व आर्थिक व्यवस्था लंबी चलेगी या थोड़े दिन चलेगी। बहुत बड़े जोखिम के साथ मैं इन सवालों का जवाब देने की कोशिश करूंगा। मैंने इन पर कई बार सोचा है।
मैं अपने कुछ निजी विश्वासों के आधार पर बात करूंगा। मनुष्य इतिहास नहीं रचते। व्यक्ति अपेक्षाकृत लंबी अवधियों तक बड़ी घटनाओं में तेजी ला सकते हैं या उनमें विलंब कर सकते हैं। लेकिन वे निर्णायक तत्व नहीं हैं और न ही वे अंतिम परिणाम को रोक सकते हैं। मानव या प्रकृति के कारण हुई अत्यधिक गंभीर दुर्घटनाएं, परमाणु युध्द, पर्यावरण का तेजी से विनाश तथा जलवायु में अपेक्षाकृत अचानक परिवर्तन हमारी जाति के अत्यधिक प्रतिभाशाली भविष्यद्रष्टा के अनुमानों और भविष्यवाणी को झुठला सकते हैं। इन चीजों से अभी भी बचा जा सकता है।मानव समाज की विकास प्रक्रिया से प्राप्त वस्तुपरक तत्व वास्तव में निर्णायक तत्व होते हैं।
अर्थशास्त्र प्राकृतिक विज्ञान नहीं है। यह पूरी तरह से सटीक नहीं हो सकता। यह समाज विज्ञान है। किसी विशिष्ट सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में किसी खास समय उभरी अवधारणाएं और विचार, प्रवृत्तियां और नियम उस व्यवस्था के अंतिम चरण तक पहुंच या उसके खत्म हो जाने के बाद भी बने रहते हैं। इससे अकसर घटनाओं का सही खुलासा नहीं हो पाता। समाज विज्ञान के बारे में बैठकों या सम्मेलनों में व्यक्त विचारों और सिध्दांतों में भारी अंतर इसका प्रमाण हैं। किसी गंभीर क्रांतिकारी प्रक्रिया में की गई भारी गलतियां इसका एक और अच्छा उदाहरण हैं। मेरा मानना है कि राजनीति विज्ञान और कला दोनों का संयोग है, हालांकि वह विज्ञान के मुकाबले कला अधिक है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दोनों ही मामलों में जिम्मेदारी मानवों पर आती है और वे इतने भिन्न और परिवर्तनीय हैं जितने कि उनकी जैविकीय बनावट में कण।
हम इतिहास से एक सबक सीख सकते हैं जिस पर मैं अकसर बल देता हूं। बड़े समाधान बड़े संकटों से ही निकल सकते हैं। इस नियम के बहुत कम अपवाद हैं।
आज हमारे सामने बहुत बड़ा आर्थिक और राजनीतिक संकट है। शायद यह सबसे पहला संपूर्ण भूमंडलीय संकट है। मौजूदा आर्थिक व्यवस्था असह्य है और टिक नहीं सकती। बड़े और मूलभूत परिवर्तनों के बगैर कोई समाधान संभव नहीं है। इस वास्तविकता को समझने के लिए यहां तथा अन्यत्र दिए गए प्रचुर आंकड़ों को दोहराने की आवश्यकता नहीं है। स्थानीय, क्षेत्रीय और गोलार्धीय संकट अब जल्दी-जल्दी आते हैं। यही इसका प्रमाण है। कोई भी अमीर या गरीब देश इस संकट से नहीं बचा है। बहुत से राजनीतिक दल पूरी से अविश्वसनीय हो चुके हैं। लोग लगातार अनियंत्रित होते जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय निकायों और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं या अत्यधिक धनी देशों के समूहों जैसे कि ग्रुप ऑफ 7 को बैठक के लिए जगह नहीं मिलती। दुनिया जिस त्रासदी में जी रही है इससे प्रभावित या उसके प्रति संवेदनशील सामाजिक आंदोलनों और संगठनों की संख्या हर जगह लगातार बढ़ रही है। आधुनिक तकनीक के कारण संदेशों को परंपरागत संचार माध्यमों की मदद के बगैर फैलाया जा सकता है।
80 करोड़ लोग अभी भी निरक्षर हैं। लेकिन अरबों लोगों को किसी न किसी माध्यम से एक निश्चित सूचना उपलब्ध है। वे बेरोजगारी, गरीबी में तेजी से वृध्दि, जमीन की कमी, खराब सेहत, असुरक्षा तथा न्यूनतम सफाई स्थितियों को तो झेल ही रहे हैं स्कूल, मकान, आत्मसम्मान और सामाजिक स्तर के अभाव से रोजाना परेशान हैं। यहां तक कि उपभोक्तावादी वाणिज्यिक विज्ञापन भी उन्हें अपनी अभावग्रस्तता और लाचारी से वाकिफ कराते हैं।
इस व्यवस्थित छलावे को जारी रखने का कोई कारण नहीं है। उन सबको मारा नहीं जा सकता। इस धरती की जनसंख्या पहले ही 6.2 अरब हो चुकी है। एक शताब्दी में उसमें चार गुना वृध्दि हुई है। तीसरी दुनिया के असंतुष्ट लोगों की जमात में विकसित देशों के पेशेवर और मध्य वर्ग से सैकड़ों शिक्षित मजदूर तथा स्त्री-पुरुष शामिल हो गए हैं जो अपने और अपने बच्चों के भविष्य के बारे में अधिकाधिक चिंतित होते जा रहे हैं क्योंकि वे प्राकृतिक साधनों के गैर जिम्मेदाराना और अंधाधुंध इस्तेमाल के फलस्वरूप हवा, पानी, पौधों को विषाक्त होते और हर सुंदर चीज को गायब होते हुए देख रहे हैं। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मानव अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है।
इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा कि मानवता को अपना रास्ता बदलना होगा। यह कैसे बदलेगा? राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन के नए रूपों को कैसे अंगीकार किया जाएगा? यह सबसे मुश्किल सवाल है। इससे मैं अंतिम विचार पर पहुंचा हूं जिसे मैं आपके सामने अभिव्यक्त करना चाहता हूं।
इस मामले में व्यक्ति पहले की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे।
इसलिए उनके पास सूचना होनी चाहिए और उन्हें सोचने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सूचना के प्रसार, वाद-विवाद को बढ़ावा देने और जागरूकता पैदा करने की जिम्मेदारी उन्नत लोगों पर होनी चाहिए। पोर्टो अलेग्रे में वर्ल्ड सोशल फोरम संघर्ष के नए तरीकों का उत्साहजनक उदाहरण है। वहां चिंतन तथा विचार-विमर्श के लिए जमा एक लाख लोग उभरती हुई ताकतों के बारे में झलक प्रस्तुत करेंगे और दुनिया में वस्तुपरक ढंग से लाए जाने वाले परिवर्तनों को आगे बढ़ाएंगे।

क्यूबा में हम इसे विचारों का संघर्ष कहते हैं। हम तीन साल और दो महीने से पूरी तरह से इस संघर्ष में लगे हैं। इसके परिणामस्वरूप 100 से अधिक सामाजिक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिनमें से अधिकांश शिक्षा, संस्कृति, ज्ञान के प्रसार, स्कूल व्यवस्था में क्रांति, व्यापक राजनीतिक और आर्थिक विषयों पर सूचना के प्रसार, सामाजिक कार्य, उच्च शिक्षा के लिए अधिक अवसर, हमारी सर्वाधिक जरूरी सामाजिक समस्याओं का गहराई से पता लगाने और उनके कारण तथा समाधान ढूंढ़ने के कार्य में लगे हैं। हमारा ध्येय है कि पूरी आबादी को व्यापक सामान्य ज्ञान और संस्कृति प्राप्त हो जाए जिसके अभाव में विश्वविद्यालय की डिग्री प्राप्त व्यक्ति को भी व्यावहारिक दृष्टि से निरक्षर ही कहा जाएगा।
हमारी योजनाएं बहुत महत्वाकांक्षी हैं लेकिन हम उनके परिणामों से बहुत प्रोत्साहित हुए हैं।
दुनिया में बहुत बड़े आर्थिक संकट के बावजूद हमारे देश में बेरोजगारी घटकर 3.3 प्रतिशत रह गई है। वर्ष के अंत तक इसके घटकर 3 प्रतिशत रह जाने का उम्मीद है। इससे हमें पूर्ण रोजगार वाला देश होने का दर्जा मिल जाएगा।
बेहतर दुनिया के लिए संघर्ष में संभवत: सर्वाधिक उपयोगी योगदान विनम्रतापूर्वक यह दिखाना होगा कि यदि समाज के सभी मानव और भौतिक संसाधन लोगों की सेवा में लगा दिए जाएं तो बहुत थोड़े से बहुत कुछ किया जा सकता है।
प्रकृति को नष्ट नहीं किया जा सकता तथा गले-सड़े, फिजूलखर्च उपभोक्ता समाजों को बचाया नहीं जा सकता। एक ऐसा क्षेत्र है जहां अनंत दौलत पैदा की जा सकती है वह है ज्ञान, संस्कृति और कला का क्षेत्र जिसमें शामिल हैं अध्यवसायी, नैतिक, सौंदर्यात्मक और भाईचारे पर आधारित शिक्षा, एक पूरा बौध्दिक जीवन जो सामाजिक तौर पर सुदृढ़ बौध्दिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ हो। इसके बगैर जीवन की गुणवत्ता की बात करना निरर्थक होगा।
क्या कोई हमें इन ध्येयों को प्राप्त करने से रोक सकता है?
हम अपनी इस घोषणा को सिध्द कर देना चाहते हैं कि बेहतर दुनिया संभव है!
मानवता द्वारा अपना इतिहास खुद लिखे जाने का समय आ गया है!




                         

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

सामूहिक सांस्कृतिक संपदा के निजीकरण के नायक बाबा रामदेव

    बाबा रामदेव को अभिताभ बच्चन के बाद सबसे बड़ा ब्रांड या मॉडल मान सकते हैं। वे योगी हैं और मॉडल भी। वे संत हैं लेकिन व्यापारी भी। वे गेरूआ वस्त्रधारी हैं लेकिन मासकल्चर के प्रभावशाली रत्न भी हैं। बाबा रामदेव ने योग की मार्केटिंग करते हुए जिस चीज पर सबसे ज्यादा जोर दिया है वह है योग का ‘प्रभाव’। वे अपने योग के सभी विवरण और ब्यौरों का प्रचार ‘प्रभाव’ को ध्यान में रखकर करते हैं। योग के ‘प्रभावों’ पर जोर देने का अर्थ है उनके वक्तव्य के विचारों की विदाई। वे बार-बार एक ही तरीके से विभिन्न आसनों को टीवी लाइव शो में प्रस्तुत करते हैं। उन्हें दोहराते हैं।
     बाबा रामदेव ने योग के उपभोक्ताओं को अपने डीवीडी,सीडी आदि की बिक्री करके, लाइव टीवी शो करके योग के साथ आधुनिक तकनीकोन्मुख भी बनाया है। वे योग को व्यक्तिगत उत्पादन के क्षेत्र से निकालकर मासप्रोडक्शन के क्षेत्र में ले गए हैं। पहले योग का लोग अकेले में अभ्यास करते थे,लेकिन बाबा रामदेव ने योग के मासप्रोडक्शन और जनअभ्यास को टेलीविजन के माध्यम से संप्रेषित किया है।
     योग का आज बाबा की वजह से मासप्रोडक्शन हो रहा है। यह वैसे ही मास प्रोडक्शन है जैसे अन्य वस्तुओं का पूंजीवादी बाजार के लिए होता है। मास प्रोडक्शन (जनोत्पादन) और जनोपभोग अन्तर्ग्रथित हैं।
    लोग सही ढ़ंग से योग सीखें ,इसके लिए  जरूरी है सही लोगों से प्रशिक्षण लें। सही लोगों को देशभर में आसानी से पा सकें इसके लिए जरूरी है मासस्केल पर योग शिक्षक तैयार किए जाएं। इसके लिए सभी इलाकों में योग प्रशिक्षण की सुविधाएं जुटायी जाएं और इसी परिप्रेक्ष्य के तहत बाबा ने योग के मासप्रोडक्शन और प्रशिक्षण की राष्ट्रीय स्तर पर शाखाएं बनायी हैं। बाबा के ट्रस्ट द्वारा निर्मित वस्तुओं के वितरण एजेंट हैं।और दुकानदारों की पूरी वितरण प्रणाली है । यह प्रणाली वैसे ही है जैसे कोई कारपोरेट घराना अपनी वस्तु की बिक्री के लिए वितरण और बिक्री केन्द्र बनाता है।
    बाबा रामदेव के प्रचार में व्यक्ति की क्षमता से ज्यादा योग की क्षमता के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया जा रहा है। यह मानकर चला जा रहा है कि योग है तो ऊर्जा है, शक्ति है। इसके आगे वे किसी तर्क को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। योग से शरीर प्रभावित होता है लेकिन कितना होता है ? कितने प्रतिशत लोगों को बीमारियों से मुक्त करने में इससे मदद मिली है इसके बारे में कोई स्वतंत्र वैज्ञानिक अनुसंधान अभी तक सामने नहीं आया है। कायदे से बाबा के सदस्यों में यह काम विभिन्न विज्ञान संस्थाओं को करना चाहिए जिससे सत्य को सामने लाने में मदद मिले।
   बाबा रामदेव का टेलीविजन से अहर्निश स्वास्थ्य लाभ का प्रचार अंततः विज्ञानसम्मतचेतना फैला रहा है या अवैज्ञानिक चेतना का निर्माण कर रहा है,इस पर भी गौर करने की जरूरत है। भारत जैसे देश में जहां अवैज्ञानिकचेतना प्रबल है ,वहां पर बाबा रामदेव का प्राचीनकालीन चिकित्साशास्त्र बहुत आसानी से बेचा जा सकता है। बाबा ने चिकित्सा विज्ञान को अस्वीकार करते हुए पुराने चिकित्सा मिथों का अतार्किक ढ़ंग से इस्तेमाल किया है। इस क्रम में बाबा ने चिकित्सा विज्ञान को ही निशाना बनाया है। उस पर तरह-तरह के हमले किए हैं।
    बाबा रामदेव ने मासकल्चर के फंड़े इस्तेमाल करते हुए योग और प्रणायाम के अंतहीन अभ्यास और इस्तेमाल पर जोर दिया है। योग करना,प्राणायाम करना जिस समय बंद कर देंगे। शारीरिक स्वास्थ्य गड़बड़ाने लगेगा। अंतहीन योग-प्राणायाम का वायदा अंततः कहीं नहीं ले जाता।
    बाबा रामदेव का फंडा है योग शिविर में शामिल हो,योग के पीछे चलो ,वरना पिछड़ जाओगे। इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पक्ष हैं। जो योग के लिए खर्च कर सकते हैं,प्रतिदिन योग कर सकते हैं,उनके लिए शारीरिक उपद्रवों से कुछ हद तक राहत मिलती है। जो खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं,जो रोज योग-प्राणायाम करने की स्थिति में नहीं हैं वे बेचारे देख-देखकर कुण्ठित होते रहते हैं।
     जो खर्च करने की स्थिति में हैं वे खाते-पीते घरों के थके-हारे लोग हैं। इन खाए-अघाए लोगों की सामाजिक भूमिका और ,श्रम क्षमता में बढ़ाने में मदद जरूर मिलती है। ये वे लोग हैं जिन्हें भारत की क्रीम कहते हैं। जिनके पास नव्य उदारीकरण के फायदे पहुँचे हैं। इन लोगों में नव धनाढ़यों का बड़ा हिस्ला है। बाबा रामदेव की योग मार्केटिंग में ये सबसे आगे हैं। इन्हें ही बाबा ने निशाना बनाया है।
       बाबा रामदेव ने अप्रत्यक्ष ढ़ंग से कारपोरेट घरानों की सेवा की है यह काम उन्होंने चिकित्सा विज्ञान पर हमला करके किया है। हम सब लोग जानते हैं कि कारपोरेट पूंजीवाद अपने हितों और मुनाफों के विस्तार के लिए मेडीकल साइंस तक को नष्ट करने की हद तक जा सकता है। और यह काम नव्य उदारतावाद के आने के बाद बड़े ही सुनियोजित ढ़ंग से किया जा रहा है। सरकार की तरफ से ऐसी नीतियां अपनायी जा रही हैं जिनके कारण सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं सिकुड़ती जा रही हैं। आज भी हिन्दुस्तान की गरीब जनता का एकमात्र सहारा सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं हैं,लेकिन केन्द्र सरकार सुनियोजित ढ़ंग इन्हें बर्बाद करने में लगी है।
      दूसरी ओर फार्मास्युटिकल कंपनियां बीमारियों के उपचार पर जोर दे रही हैं ,वे सरकार पर दबाब ड़ाल रही हैं कि सरकार इस दिशा में प्रयास न करे कि बीमारी क्यों पैदा हुई ? सरकार बीमारियों को जड़ से खत्म करने की दिशा में न तो नीति बनाए और नहीं पैसा खर्च करे।  वे चाहते हैं बीमारी को जड़ से खत्म न किया जाए। वे बार-बार बीमारी की थेरपी पर जोर दे रहे हैं। वे बीमारी को जड़ से खत्म करने पर जोर नहीं दे रहे हैं।
     बाबा रामदेव के योग का भी यही लक्ष्य है उनके पास प्राचीनकालीन थेरपी है जिसे वे जड़ी-बूटियों और प्राणायाम के जरिए देना चाहते हैं। फार्मास्युटिकल कंपनियां यह काम अपने तरीके से कर रही हैं और बाबा रामदेव उसी काम को अपने तरीके से कर रहे हैं। इस क्रम में बाबा रामदेव और फार्मास्युटिकल कंपनियां बड़ी ही चालाकी से एक जैसा प्रचार कर रहे हैं।
    मसलन फार्मास्युटिकल कंपनियां किसी बीमारी की दवा के आश्चर्यजनक परिणामों के बारे में बताती हैं तो बाबा रामदेव भी अपने योग के जादू से ठीक होने वाले व्यक्ति को मीडिया में पेश करते हैं। हमारे देश में अनेक बीमारियां हैं जो आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों के कारण पैदा होती हैं। बाबा के योग के पास उनका कोई समाधान नहीं है। मसलन बड़े पैमाने पर प्रदूषित जल के सेवन या स्पर्श के कारण जो बीमारियां पैदा होती हैं उनका योग में कोई समाधान नहीं है। शराब के सेवन या नशीले पदार्थों के सेवन से जो बीमारियां पैदा होती हैं ,उनका कोई समाधान नहीं है। शराब या नशे के कारण पैदा होने वाली समस्याओं को आप नशे की वस्तु की बिक्री बरकरार रखकर दूर नहीं कर सकते।
    थैरेपी के जरिए  सामाजिक क्रांति करने के सारी दुनिया में अन्तर्विरोधी परिणाम आए हैं। योग से संभवतः कुछ बीमारियों का सामान्य उपचार हो जाए। छोटी-मोटी दिक्कत कम भी हो जाए लेकिन इससे बीमारी रहित समाज तैयार नहीं होगा। सबल-स्वस्थ भारत तैयार नहीं होगा।
    बाबा के योग को पाने के लिए व्यक्ति को अपनी गांठ से पैसा देना होगा। आयुर्वेद का इलाज बाबा के अस्पताल में कराने के लिए निजी भुगतान करना होगा। बाबा मुफ्त में उपचार नहीं करते। यही चीज तो कारपोरेट घराने चाहते हैं कि आम आदमी अपनी इलाज पर स्वयं खर्चा करे और स्वास्थ्य लाभ करे,वे अपने तरीके से सरकारी चिकित्सा व्यवस्था पर मीडिया में हमले करते रहते हैं,बाबा रामदेव अपने तरीके से चिकित्सा विज्ञान की निरर्थकता का ढ़ोल बजाते रहते हैं। बाबा और कारपोरेट फार्मस्युटिकल कंपनियां इस मामले में एक हैं ,दोनों ही चिकित्सा को निजी खर्चे पर करने की वकालत कर रहे हैं।
   बाबा और कारपोरेट घरानों की स्वास्थ्य सेवाएं उनके काम की हैं जो इनमें इलाज कराने का पैसा अपनी गांठ से दे सकते हैं। जो नहीं दे सकते वे इस सेवा के दायरे के बाहर हैं। बाबा रामदेव और उनके अंधभक्त जानते हैं कि हिन्दुस्तान की 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी 20 रूपये पर गुजारा करती है उसके पास डाक्टर को देने के लिए सामान्य फीस तक नहीं होती।ऐसी स्थिति में बाबा का योग उद्योग किसकी सेवा करेगा ?
    फार्मास्युटिकल कंपनियों ने एंटीबायोटिक दवाओं का प्रचार करके समूचे चिकित्साविज्ञान को ही खतरे में डाल दिया है। दूसरी ओर बाबा रामदेव ने योग के पक्ष में वातावरण बनाने के लिए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को निशाना बनाया हुआ है। दोनों का लक्ष्य एक है आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियों को नष्ट करो। दोनों का दूसरा लक्ष्य है मुनाफा कमाओ। ये दोनों ही सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर आए दिन हमले बोलते रहते हैं।
   बाबा रामदेव और फार्मास्युटिकल कंपनियों के चिकित्साविज्ञान पर किए जा रहे हमलों के काऱण स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में असमानता और भी बढ़ेगी । हम पहले से ही आधी-अधूरी स्वास्थ्य सेवाओं के सहारे जी रहे थे लेकिन नव्य उदारतावादी हमलों ने इन सेवाओं को और भी महंगा और दुर्लभ बना दिया है।
    इस युग का महामंत्र है हर चीज को माल बनाओ। बाबा ने योग को भी माल बना दिया। बाबा की चिकित्सासेवाएं कमोडिटी हैं,पैसे दीजिए लाभ लीजिए। पैसा से खरीदने के लिए आपको निजी बाजार में जाना होगा। इसके कारण विगत कई दशकों से स्वास्थ्य सेवाओं को निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया गया है।
    मजेदार बात यह है निजी स्वास्थ्य सेवाओं का जनता भुगतान करती है लेकिन फायदा निजी क्षेत्र को होता है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भुगतान जनता करती है तो मुनाफा भी जनता के खाते में जाता है। लेकिन निजी कारपोरेट स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर बाबा रामदेव की योग स्वास्थ्य सेवाओं तक भुगतान जनता करती है मुनाफा निजी कंपनियां और बाबा रामदेव की पॉकेट में जाता है। इस अर्थ में बाबा रामदेव ने योग को कारपोरेट मुनाफाखोरी के धंधे में तब्दील कर दिया है।
   ध्यान रहे नव्य उदारीकरण का यह मूल मंत्र है पैसा जनता का मुनाफा निजी कंपनियों का। सारी नीतियां इसी मंत्र से संचालित हैं और बाबा रामदेव का योग-प्राणायाम का खेल भी इसके सहारे चल रहा है।
   जिस तरह का हमला सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर कारपोरेट घरानों और बाबा रामदेव ने किया है उसका लाभ किसे मिला है ? उसका लाभ निजी कंपनियों और बाबा रामदेव के ट्रस्ट को मिला है। इससे राष्ट्र खोखला हुआ है। बाबा रामदेव के ट्रस्ट और निजी स्वास्थ्य कंपनियों के हाथों अरबों -खरबों की संपदा के जाने का अर्थ यह भी है कि अब हम स्वास्थ्य के क्षेत्र में आगे नहीं पीछे जा रहे हैं। समाज के अधिकांश समुदायों को बेसहारा छोड़कर जा रहे हैं। इनको मिलने वाले लाभ से राष्ट्र को कोई लाभ नहीं होने वाला,यह पैसा किसी नेक काम में ,विकास के किसी काम में खर्च नहीं होगा। यह स्वास्थ्यसेवाओं का व्यक्तिकरण है ,व्यवसायीकरण है। यह देशभक्ति नहीं है। पूंजी और मुनाफा भक्ति है। यह कारपोरेट संस्कृति है। यह भारतीय संस्कृति नहीं है। यह खुल्लमखुल्ला जनता के हितों के साथ गद्दारी है। यह जनता के साथ एकजुटता नहीं है।   
    स्वास्थ्य और बीमारी माल या वस्तु नहीं हैं। इन्हें पूंजीपतिवर्ग ने अपने मुनाफे के लिए माल या वस्तु में तब्दील किया है। बाबा का समूचा योग -प्राणायाम का कार्य व्यापार मुनाफे और माल की धारणा पर आधारित है। बाजार के  सिद्धांतों पर आधारित है। योग हमारी विरासत का हिस्सा रहा है। यह बाबा रामदेव का बनाया नहीं है। इसे सैंकड़ो-हजारों सालों से भारत में लोग इस्तेमाल करते आ रहे हैं। यह अमूल्य धरोहर है बाबा रामदेव ने इसे अपनी संपदा और मुनाफे की खान बनाकर जनता की धरोहर को लूटा है। बाबा रामदेव को परंपरागत योग को माल बनाकर बेचने और उससे अबाध मुनाफा कमाने का कोई नैतिक हक नहीं है। योग निजी बौद्धिक उत्पादन या सृजन नहीं है। वह भारत की जनता की साझा सांस्कृतिक संपदा है उससे कमायी गयी दौलत को बाबा को निजी ट्रस्ट के हवाले करने की बजाय राष्ट्र के हवाले करना चाहिए। क्योंकि योग पर उनका पेटेंट राइट नहीं बनता। ऐसी अवस्था में वे इससे मुनाफा अपने ट्रस्ट के खाते में कैसे डाल सकते हैं ?          
(उपरोक्त चित्र का योग और बाबा रामदेव के साथ कोई संबंध नहीं है)


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