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गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

अमरीकी साम्राज्यवाद की धुरी है मीडिया साम्राज्यवाद



       भूमंडलीकरण एक विश्वव्यापी संवृत्ति है। इसका साम्राज्यवाद से गहरा सम्बन्ध है। यह नव- औपनिवेशिक शोषण और प्रभुत्व का प्रभावी अस्त्र है। इसके प्रचारक-प्रसारक हैं भूमंडलीय जनमाध्यम और बहुराष्ट्रीय शस्त्र निर्माता कम्पनियां एवं बहुराष्ट्रीय वित्तीय कम्पनियां। द्वितीय विश्व युध्द के बाद समूची दुनिया पर साम्राज्यवाद की पकड ढ़ीली पड़ी थी। अधिकांश गुलाम देश आजाद हुए। साम्राज्यवाद के शोषण एवं उत्पीडन का दायरा सिकुड़ा।समाजवादी शिविर का जन्म हुआ। 
        सोवियत संघ के नेतृत्व में उभरे समाजवादी शिविर ने नवोदित राष्ट्रों को आत्मनिर्भर विकास का रास्ता अख्तियार करने, बुनियादी उद्योग-धंधों का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस सबका विरोध और समाजवादी सत्ता का विरोध करने के लिए शीतयुध्द की राजनीति शुरु की गयी और शस्त्रास्त्रों की अंधी प्रतिस्पर्धा शुरु की गयी।'समाजवाद के खतरे' और 'मार्क्सवाद के भूत' के जरिये सारी दुनिया में,खासकर तीसरी दुनिया और पूर्वी यूरोप में वैचारिक हमला बोला गया। इसी संदर्भ में माध्यम साम्राज्यवाद का विकास हुआ। 
         साम्राज्यवादी हितों के विस्तार के लिए हथियारों के उत्पादन,सूचना तकनीकी के उत्पादन एवं माध्यम कार्यक्रमों के उत्पादन पर विशेष जोर दिया गया। इन तीन क्षेत्रों के जरिये अमरीकी साम्राज्यवाद ने विश्व भर में अपनी प्रभुता स्थापित की और अपनी शक्ति का विस्तार किया ।विगत पचास वर्षों में इन क्षेत्रों में बहुराष्ट्ीय कम्पनियों की परिसंपत्तियों में बेशुमार वृध्दि हुई ।वहीं दूसरी ओर समाजवादी व्यवस्था को गहरा आघात लगा।तीसरी दुनिया के देशों को नए सिरे से नव औपनिवे शिक शोषण की चक्की में पिसना पड़ रहा है ।गरीबी, भुखमरी, बेकारी, सामाजिक विखण्डन और कर्जों के दबाव से गुजरना पड़ रहा है। द्वितीय विश्वयुध्द के बाद साम्राज्यवादी देशों की समस्या थी कि संपत्ति,सत्ता और ताकत का कैसे विस्तार किया जाय ? जाहिरा तौर पर यह विस्तार शांतिपूर्ण विकास कार्यों से संभव नहीं था। सिर्फ युध्दों का माहौल बनाए रखकर ही साम्राज्यवादी हितों का विकास संभव था। युध्दों के लिए शस्त्रों की जरुरत थी और यही एकमात्र क्षेत्र था जो साम्राज्यवाद के विकास की गारंटी कर सकता था। यही वजह है कि शस्त्र उद्योग का बड़े पैमाने पर विकास किया गया।यही एकमात्र उद्योग था जहां बेशुमार मुनाफा था।
      सन्1978 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के विशेषज्ञों की ''हथियारों की होड़ और सैन्य खर्च के आर्थिक - सामाजिक परिणाम,महासचिव की अधुनातन रिपोर्ट '' में बताया गया कि ''लड़ाईयां दूसरे विश्व युध्द के बाद के दौर का एक स्थायी लक्षण रही हैं।हथियारों का प्रयोग काफी बडे पैमाने पर वास्तव में निरन्तर,अक्सर एक ही समय अनेक स्थानों पर किया जा रहा है।हताहतों की संख्या बढ़ती रही है। दूसरे विश्वयुध्द के बाद कई करोड़ तक पहुँच गयी है। बडी हद तक ये लड़ाई-झगड़े दुनिया के मुख्य औद्योगिक क्षेत्रों के बाहर हुए हैं,यद्यपि कुछ स्थितियों में कुछ मुख्य शक्तियाँ इनमें प्रत्यक्ष रुप से शामिल रही हैं,और युध्द का साजो-सामान तो बिना अपवाद इन्हीं शक्तियों ने मुहैया किया है। इन लडाईयों के हिंसात्मक स्वरुप ,उनकी व्यापकता तथा अत्यन्त विनाशकारिता का कारण यह है कि अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां दो हिस्सों में बंटी हुई हैं तथा आधुनिक शस्त्रास्त्र तत्काल सुलभ हैं। और ये दोनों बातें अस्त्रों की होड़ का मुख्य लक्षण हैं।
        ''सैन्य-औद्योगिक क्षेत्र में छह प्रमुख देश आते हैं जिनके खाते में संसार भर के सैन्य व्यय,सैनिक शोध एवं विकास व्यय का बहुत बड़ा हिस्सा आता है।ये देश हैं-अमरीका,सोवियत संघ,चीन, फ्रांस,ब्रिटेन, और जर्मनी। विश्व में शस्त्रों का 90 फीसदी निर्यात यही देश करते हैं। अन्य देशों को जाने वाले मुख्य प्रकार के हथियारों की कुल मात्रा का 95 फीसदी इन्हीं देशों से जाता है। आज शस्त्रास्त्र प्रतिस्पर्धा से कोई देश बचा नहीं है। हथियारों के सौदागर अपने माल की बिक्री बढाने के लिए यह प्रचार करते रहते हैं कि यदि इन हथियारों को प्राप्त कर लिया तो उनके देश की प्रतिष्ठा बढ़ेगी , बडी-बडी शक्तियों के दबाव और आदेश का मुकाबला करने की क्षमता बढेग़ी। लेकिन हथियार किसे बेचे जाएं यह एक राजनीतिक फैसला होता है। सैनिक सलाहकारों एवं प्रशिक्षकों को कहां भेजा जाये, किसे गोला -बारुद की सप्लाई की जाये,इत्यादि फैसले राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। इस संदर्भ में साम्राज्यवादी मुल्कों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है और छोटे-अविकसित देशों के हितों की अनदेखी की जाती है।

       संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेषज्ञों की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि'' हथियारों की होड़ दिनों दिन विश्वव्यापी परिघटना बनती जा रही है। यद्यपि इसकी तीव्रता विभिन्न क्षेत्रों में घटती बढ़ती रहती है;मगर शायद ही कोई देश और बड़ा क्षेत्र इससे बचा हो।'' विशेषज्ञों ने इसके आर्थिक दुष्परिणामों की ओर ध्यान खींचते हुए लिखा कि ''यह मामला अत्यन्त असमान विनिमय का होता है जिससे गरीब और धनी देशों के बीच दूरी को पाटने के प्रयासों पर विशेष चोट पड़ती है।शस्त्रों के आयार्तकत्ता के लिए यह अपव्यय मात्र है जिसे लाभप्रद ढंग़ से उपयोग में लाया जा सकता है। शस्त्र यदि दान में मिलें तब भी देखरेख,संचालन तथा अवसंरचना का खर्च घाटे के मद में ही जोड़ना पडेगा।स्टाकहोम अंतर्राष्ट्रीय शान्ति शोध संस्थान एक विश्लेषण के आधार पर इस ठोस निष्कर्ष पर पहुॅचा कि ''आखिरकार हथियारों का इस्तेमाल यदि युध्द में नहीं किया जाता तो भी वे संतुलित आहार ,स्वास्थ्य सेवा,आवास, और शिक्षा जैसी बुनियादी विकास आवश्यकताओं से आर्थिक संसाधन दूसरी ओर खींचकर अप्रत्यक्ष रुप से 'हत्या'करते हैं।''वस्तुत:शस्त्रों की दौड में शामिल होकर कोई भी देश ताकतवर नहीं बनता अपितु कमजोर बनता है।
      आन्द्रेई कोजीरेव ने ''शस्त्र व्यापार नये-नये खतरे'' कृति में लिखा है कि''शिकार और खेल को अलग कर दीजिए तो किसी अस्त्र का एकमात्र प्रयोग एवं एकमात्र सामाजिक आवश्यकता उत्पीड़कों की संस्थाबध्द हिंसा है-जो अन्यायपूर्ण इस्तेमाल है। इसके विपरीत उत्पीड़ितों की हिंसा -जो जबावी इस्तेमाल है और न्यायपूर्ण होती है। कुछ पूँजीवादी समाजशास्त्रियों का कहना है कि हिंसा मनुष्य की एक स्वाभाविक, मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है, उसके अस्तित्व का एक अनिवार्य पक्ष है।यह एक निराशावादी , मानवविरोधी निष्कर्ष है।'' फ्रेडरिक एंगेल्स के शब्दों में ''बल केवल साधन है;उद्देश्य आर्थिक लाभ है।''
       हिंसा की जरुरत उसी समाज को पडती है जहां इसका इस्तेमाल निजी संपत्ति की रक्षा के लिए किया जाता है जो मानव द्वारा मानव के उत्पीड़न का स्रोत है।पूंजीवादी जगत का लगभग सारा अनुसंधान और विकास कार्य औद्योगिक राष्ट्रों में संकेन्द्रित है।इस पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का एकाधिकार है। तकनीकी डिजायनों का 80फीसदी अंश उन्हीं के नियंत्रण में है। ये कम्पनियां संपत्ति का संचय उपभोग बढाने के लिए नहीं करतीं। अपितु संपदा का ज्यादा से ज्यादा संचय ही इनकी मूल प्रकृति है। संचय को विनिवेश में लगाने की कोशिश की जाती है और उससे हुई प्राप्तियों को बचत खातों में डाल दिया जाता है। साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण के कारण विषमता,असमानता एवं अलोकतान्त्रिक मानसिकता का तेजी से विकास हुआ है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में घुसपैठ बढ़ी है। 
       विश्व की200 सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का1960 में विश्व के सकल घरेलू उत्पादन के17प्रतिशत हिस्से पर कब्जा था जो 1982 में बढकर 24 फीसदी हो गया और 1995में32प्रतिशत हो गया। अ. ग्राचोव और नि.येर्मोश्किन ने''नयी सूचना व्यवस्था अथवा मनोवैज्ञानिक युध्द?'' कृति में सैन्य, सूचना, और संचार के अंतस्संबंधों को विश्लेषित करते हुए लिखा कि ''राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में निरंतर चढ़ाव आने और पूँजीवादी व्यवस्था में गंभीर संकटों के आने के साथ-साथ संघर्ष विचारधारा के क्षेत्र में भी अंतरित होता जा रहा है। आधुनिक साम्राज्यवाद अपनी विचारधारात्मक सेवाओं के संकेन्द्रण की तरफ विशेष ध्यान दे रहा है। ताकि एक ऐसे सशक्त हरावल का निर्माण किया जा सके;जो स्थानीय और विश्व के पैमाने पर सामाजिक परिवर्तनों का प्रतिरोध करने की क्षमता रखता हो। आर्थिक,सैनिक और विचारधारात्मक प्रसार एकाकार हो गया है।''

रविवार, 28 मार्च 2010

माध्यम और सामाजिक सरोकार - पीटर गोल्डिंग


       तकनीकी क्षेत्र में तेजी से आ रहे परिवर्तनों ने परंपरित जीवनशैली पर इनके प्रभावों को लेकर काफी आलोचना और आशंका पैदा की। कोई आश्चर्य नहीं कि सर्वाधिक नए माध्यम को भी उसी भर्त्सनामूलक आलोचना के नजरिए से देखा गया। टेलीविजन के एक आरंभिक आलोचक ने अपना अनुभव इन शब्दों में लिखा है-
     ''आणविक बमों के बुखार से पीड़ित इस दुनिया में जो बहुत भयावह ढंग से शांति और युद्ध के बीच संतुलन बनाए हुए है, एक नया ख़तरा पैदा हुआ है , टेलीविजन का ख़तरा-अणु के जेकिल और हाईड, एक ऐसी ताकत जो संस्कृति और मनोरंजन के क्षेत्र में क्रांति पैदा कर दे, जो एक ही साथ विनाश का दानव भी है और उसका निषेधक भी।''
      माध्यम के इस तकनीकी पक्ष के प्रति जागरुकता और भी ज्यादा गहराई से प्रसारण के साथ जुड़ी हुई है। यद्यपि तकनीक नएपन के प्रति लगाव सिनेमा के आरंभिक इतिहास का महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। शायद इसकी जड़ें और भी गहरी हैं, उदाहरण के लिए, औद्योगीकरण के विरुद्ध लोकप्रिय विद्रोहों के रूप में। नई तकनीक ने कार्य और अवकाश दोनों में बदलाव किया है लेकिन दोनों के बीच का संबंध बहुत महत्वपूर्ण है कम से कम दोनों में से किसी भी क्षेत्र में किसी भी प्रकार के वैज्ञानिक अन्वेषण के प्रभाव के संबंध में तो हैं ही।

सरोकार का दूसरा क्षेत्र जनमाध्यमों की विचारों और विश्वासों को प्रभावित करने और व्यवहार को अपनी तरफ मोड़ने की संभावित क्षमता है। जनसंचार का कर्नेल मॉडल जिसमें कुछ लोग बहुसंख्यक को असीम शक्ति और दण्डमुक्ति के भाव से भरकर संबोधित करते हैं, ने इस तरह के शोधों को जन्म दिया है जिसमें फुसलानेवाले संचार के खतरे और प्रभावों पर जोर है। केन्द्रीय समस्या के रूप में प्रोपैगैण्डा और विज्ञापन को रखा गया। युद्ध के दौरान के अधिकतर शोध आक्रामक प्रोपैगैण्डा के प्रभावों की खोज और इससे लड़ने के बेहतर तरीकों के अन्वेषण में लगे हुए थे। इस तरह के शोधों ने विशेष तौर पर अमेरिका में, बाद के कामों पर दूरगामी प्रभाव डाला जबकि इस देश में भगवान 'हॉ-हॉ' की लोकस्मृतियों और माहौल में व्यापत 'जरूरत के समय में दोस्त' बनाने के चलन ने जिसे बी बी सी ने अपने युद्धकालीन प्रसारणों की नीति बना रखी थी , ने बहुत आगे चलकर प्रसारण के प्रभाव और खतरों की व्याख्या करनेवाले विमर्शों के ढर्रे को बदला।

इसी तरह से विज्ञापन उद्योग के विकास और इसके द्वारा माध्यमों के प्रयोग ने लोकप्रिय रवैय्ये में संभावित परिवर्तन को लेकर एक तनाव की स्थिति पैदा की। इनमें छद्म जरूरतों का निर्माण और भौतिकवाद, धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा और आम जनता के बड़े हिस्से में तुलनात्मक रूप से वंचित होने का बोध शामिल था। डेनीस थॉम्सन जो इस दृष्टिकोण के आरंभिक व्याख्याकार थे और जिन्होंने हाल के वर्षों में इसे बिना किसी घालमेल के फिर जोर देकर दोहराया-''विज्ञापन उपभोक्ताओं की समनुरूप संख्या के बारे में आश्वस्त करता है। ऐसा वह प्रेस और टी वी के ऊपर नियंत्रण के जरिए करता है। इसकी आचार संहिता बहुत जोरदार ढंग से संचार के समूचे तंत्र को आवृत्त करती है। यथास्थिति के सिध्दान्त के अनुकूल इसका लक्ष्य हमारे जीवन को नियंत्रित करना और हमें उपभोक्ता दौड़मशीन (कंज्युमर ट्रेडमिल) पर लगाए रखना है।''

इस तरह की भावनाओं ने विज्ञापन ,उसकी आचार संहिता, उसकी कृत्रिमता पर किए जा रहे हमले को सीमित कर दिया। बजाए इसके कि माध्यमों में इसके बढ़ते प्रभाव को कम करके दिखाए। जहाँ तक प्रोपैगैण्डा का सवाल है इसके शोधों का उद्देश्य हमले का निशाना बन सकने वाले 'खलनायकों' पर से ध्यान हटाकर 'पीड़ित' पर ध्यान केन्द्रित करना है।

सांस्कृतिक आलोचना की लंबी परंपरा से निकलकर एक तीसरा बृहत्तर सरोकार उभरता है जिसका संबंध मैथ्यू अर्नाल्ड, टी एस इलियट और एफ आर लेविस के लेखन से जुड़ता है , जिनका भय यह था कि सांस्कृतिक मिलावट निश्चित रूप से स्तरहीनता को जन्म देगा, अवकाश के बढ़े अवसर तुच्छ जन मनोरंजन के द्वारा बर्बाद किए जा रहे हैं और अंग्रेजी संस्कृति के जरिए इन्हें रोका जा सकता था लेकिन नए माध्यम के द्वारा न केवल इनकी उपेक्षा की जा रही है बल्कि इनके लिए ख़तरा भी पैदा किया जा रहा है। शोध कार्यों का एक बड़ा हिस्सा इन प्रवृत्तियों से लड़ने के तरीके खोजने में लगा है जो इस बात की तसदीक करता है कि ये प्रवृत्तियाँ मौजूद रही हैं।

विश्वास की एक और बेचैन प्रक्रिया है जो माध्यमों के प्रभाव को लेकर सशंकित है। वैकल्पिक अवकाश के साधनों के अभाव में माध्यमों के समक्ष अधिकतम अरक्षण (एक्सपोजर) के कारण अथवा अज्ञानता या अपरिपक्वता के कारण या अस्वाभाविक असुरक्षा की वजह से इन समूहों को विशेष तौर पर संरक्षा की जरूरत है। बच्चे और कामगार वर्ग दोनों समूह इस भूमिका में आन्तरायिक भाव से अनूकूल बैठते हैं।

बच्चों के लिए सरोकारों की झलक अमेरिका के फ्रेडरिक वर्थैम्स की महत्वपूर्ण शोध कृति 'द सेडक्शन ऑफ द इनोसेन्ट'[1] में विस्तार क साथ दिखाई देती है। इन सरोकारों में नया कुछ नहीं है। जॉन टाबियस ने 19 वीं शती में बाल अपराधों के बारे में लिखते हुए कहा कि '' जैक शिफर्ड, डिक टर्पिन और अन्य अपराध नायकों का लोकप्रिय कल्पना पर प्रभाव ऐसा था कि वे लगभग 19 वीं शती तक अनुश्रुति का हिस्सा बन चुके थे। समसामयिकों ने पाया कि उनके नाम और दुस्साहसिक कारनामे अधिकतर बच्चों को मालूम थे जबकि उन्हें इ्रंगलैण्ड की महारानी विक्टोरिया का नाम नहीं पता था। ''

एक जेल का प्रशासक इन छोटे बच्चों के अपराध के बारे में बिना किसी हिचक के कहता है ''ये उनके सिक्के के नंबर हैं जिनकी मैं गिनती करता हूँ, महोदय।''

न केवल बच्चों की गतिविधियों पर जनमाध्यमों के बढ़ते प्रभाव , उनके आपराधिक व्यवहार, स्कूल के काम, उनके अवकाश के समय पर माध्यमों का एकाधिकार आदि की तरफ ध्यान गया बल्कि सामान्यतया उनकी आस्थाओं , सेक्स के प्रति उनका रवैय्या, नैतिकता पर भी चर्चा हुई। 1960 के मध्य में 'राष्ट्रीय दर्शक और श्रोता' नाम से स्थापित संस्था जो अपने उत्साही सचिव मेरी व्हाइटहाउस के आलोचनात्मक दृष्टिकोण से खासा प्रभावित थी, ने हमेशा प्रसारण के बच्चों पर तथाकथित घातक प्रभावों को अपने प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। श्रीमती व्हाइटहाउस ने बारंबार दोहराया कि कैसे टेलीविजन के बच्चों के कामुक व्यवहार पर पड़नेवाले असर के संबंध में उनकी खोज ने उन्हें 'वाला' जैसी संस्था शुरु करने के लिए उत्प्रेरित किया।

इसी तरह की चिंता भोले, कम पढ़े और सुसंस्कृत माध्यम उपभोक्ताओं को लेकर माध्यम के व्यवहार में और बाद के शोधों में दिखाई देती है। लॉर्ड रीथ, बी बी सी का पहला महानिदेशक, माध्यमों को लोकप्रिय शिक्षण और नैतिक उत्थान के औजार के रूप में ,कम से कम कला के क्षेत्र में नहीं देखे जाने का असली व्याख्याकार बन गया। रीथ ने 1924 में लिखा, '' वर्षों से, सड़क का आदमी ऐसे संगीत से संतुष्ट होता रहा है जो आसानी से और तुरंत घुलमिल जाता है और इसीलिए हमेशा बेहतर नहीं होता।'' सेंसरशिप की भूमिका को लेकर तर्क-वितर्क कई बार सांस्कृतिक सुसभ्यता और जनसंचार की दुर्बलता के विपरीत संबंधों पर जोर देते हैं, सेंसरशिप को कीमत के स्तर पर औचित्यपूर्ण ठहराने अथवा बड़े पैमाने पर निष्क्रिय कर दी गई सामग्री के लिए एक सावधान नियंत्रण को बरतने की आवश्यकता के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।
( पुस्तक अंश- पुस्तक का नाम- जनमाध्यम, लेखक पीटर गोल्डिंग,अनुवाद-सुधा सिंह,प्रकाशक, ग्रंथ शिल्पी,बी-7,सरस्वती कामप्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मीनगर,दिल्ली-110092,मूल्य-325रुपये)

फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 3-

     मासकल्चर के उत्पादन का सबसे बड़ा कारखाना है सिनेमा। सिनेमा का संस्कृति के उत्पादन से कम और मासकल्चर के उत्पादन से ज्यादा संबंध है। भारत में सिनेमा निर्माण के 5 केन्द्र है,ये हैं-मुम्बई,मद्रास,हैदराबाद,कोलकाता और बैंगलौर। ये पांचों केन्द्र धीरे-धीरे माध्यम साम्राज्यवाद के दायरे में कैद होते चले जा रहे हैं। हाल ही में जारी ‘माई नेम इज खान’फिल्म की सफलता और इसके पहले की सफल फिल्मों और फिल्म उद्योग में देशी-विदेशी इजारेदार और बहुराष्ट्रीय पूंजी के निवेश और निरंतर फैलते साम्राज्य को ध्यान से देखें तो हमें फिल्म उद्योग में आ रहे परिवर्तनों और संकट का सही ढ़ंग से आभास मिल सकता है।
    एक जमाना था हिन्दी सिनेमा में पूंजी निवेश देशी था,इसमें वैध-अवैध दोनों ही किस्म का पैसा लगा था। यह सारा पैसा गैरइजारेदार घरानों का था। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे लुंपन पूंजीपति या समानान्तर अर्थव्यवस्था कहते हैं या ब्लैकमनी भी कहते हैं। आज यह स्थिति नहीं है। आज सिनेमा उद्योग में अनिल अम्बानी से लेकर रुपक मडरॉक का पैसा लगा है। यह मूलत:ग्लोबलाइजेशन की विश्वव्यापी प्रक्रिया का हिस्सा है। देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों का फिल्म उद्योग में पूंजी निवेश भारतीय सिनेमा उद्योग की प्रकृति में आ रहे मूलगामी परिवर्तनों का द्योतक है।
        कारपोरेट घराने फिल्म निर्माण के साथ सिनेमाघरों की खरीद पर भी जोर दे रहे हैं। इस ग्रुप ने विदेशों में भी सिनेमाघर खरीदने पर जोर दिया है।अमेरिका,ब्रिटेन आदि देशों में इस ग्रुप ने कई सिनेमाघर खरीदे हैं। इसके अलावा स्पिलवर्ग की कंपनी ‘ड़्रीमवर्क’ के साथ समझौता किया है जिसके अनुसार अंबानी ग्रुप 825 मिलियन डॉलर निवेश करेगा। इससे स्पिलवर्ग 6 फिल्में बनाएंगे। अनिल अंबानी की कंपनी ने 2009-10 में 350 करोड़ रुपये फिल्म निर्माण पर खर्च करने का फैसला किया था। इसके तहत 15 फिल्में बननी थीं, जिनमें 8 हिंदी और बाकी क्षेत्रीय भाषाओं  -जैसे तमिल, भोजपुरी, बांग्ला,मलयालम,पंजाबी - की फिल्में बननी थी।
         विश्व विख्यात अमेरिकी वित्तीय संस्था जेपी मॉर्गन ने पीवीआर पिक्चर में 60 करोड़ रुपये निवेश करने का फैसला लिया है। भारत सरकार ने 250 करोड़ रुपये निवेश करने का फैसला लिया है। यह पैसा मूलतः एनीमेशन फिल्मों के निर्माण,गेमिंग और विजुअल प्रभाव के म्यूजियम के निर्माण पर खर्च किया जाएगा।   
     भारतीय रिजर्ब बैंक ने भी बैंकों से फिल्म निर्माण के लिए कर्ज मुहैय्या कराने का प्रावधान किया है,मजेदार बात यह है कि रिजर्ब बैंक ने कर्ज के नियम कारपोरेट घरानों के फिल्म उद्योग में आने के पहले नहीं बनाए। बैंकों में एक्सिम बैंक सबसे ज्यादा कर्जा दे रही है। इसके अलावा बीमा कंपनियां भी फिल्मों का बीमा कर रही हैं। इससे फिल्मों का सही समय पर निर्माण करने में मदद मिल रही है। साथ शेयर और बॉण्ड के जरिए भी फिल्म निर्माण के लिए बाजार से पैसा उठाया जा रहा है। इस तरह से पैसा जुगाड़ करने वाली कई वित्तीय संस्थाएं सामने आ गयी हैं। कहने का मतलब यह है कि हिन्दी सिनेमा का अर्थशास्त्र बुनियादी तौर पर बदल गया है। यह लुंपन अर्थशास्त्र से कारपोरेट पूंजी के राजनीतिक अर्थशास्त्र में रुपान्तरण की बेला है। इसका फिल्म के दर्शक,कहानी, नायक- नायिका और समाज के प्रति बदले नए नव्य-उदारतावादी ग्लोबल सरोकारों के साथ गहरा संबंध है।    
    भारत का फिल्म उद्योग बहुभाषी है। भारत की 20 भाषाओं में प्रतिवर्ष 1000 से ज्यादा फिल्में रिलीज होती हैं, सालाना इससे ज्यादा फिल्में तैयार होती हैं। भाषायी फिल्में अपने ही राज्यों में सीमित प्रचार-प्रसार पाती हैं, एकमात्र हिन्दी सिनेमा है जो गैर हिन्दी राज्यों और विदेशों में भी अपना प्रसार करने में सफल रहा है। इसके अलावा हॉलीवुड की फिल्मों का नव्य-उदारीकरण के दौर में व्यापक बाजार टेलीविजन से लेकर सिनेमा हॉल तक तैयार हुआ है।
     सारी दुनिया में 10 करोड़ लोग प्रति सप्ताह 13,000 सिनेमाघरों में मुम्बई सिनेमा देखते हैं।उल्लेखनीय है बॉम्बे को मुंबई नाम 1995 में दिया गया। फिक्की और केपीएमजी के द्वारा तैयार रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि बॉक्स ऑफिस और सिनेमा से होने वाली अन्य किस्म की आमदनी में बहुत ज्यादा उछाल आने की संभावना नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार सन् 2009 में फिल्म उद्योग 2.2 बिलियन डॉलर (109.2 करोड़ रुपये) का कारोबार करेगा। केबल और सैटेलाइट पर फिल्मों की बिक्री में भी गिरावट आएगी। इसके बावजूद फिल्म उद्योग की सालाना विकासदर सन् 2013 तक 9.1प्रतिशत रहने की संभावना है। इसका अधिकतम व्यापार 3.4 बिलियन डॉलर (168-6बिलियन रुपये) तक जाने की संभावना है। भारत में इस समय 50 से बड़ी फिल्म निर्माता कंपनियां हैं।
    फिल्म निर्माण के बारे में यह मिथ है कि बड़े बजट की फिल्म ज्यादा कारोबार करती है, यह सच नहीं है, बड़े बजट और बड़े स्टार की फिल्मों की फ्लॉप दर ड्यादा है। कम बजट और बड़े स्टार के बिना बनने वाली फिल्मों का सफलता दर बेहतर रही है।
    फिल्म उद्योंग में देशी-विदेशी इजारेदार घरानों के पूंजी निवेश के बाद भारतीय सिनेमा का चरित्र पूरी तरह बदल गया है। इसी तरह आइनॉक्स वगैरह में तैयार हुए नए टाइप के सिनेमाघरों में बड़ी पूंजी का निवेश हुआ है। पहलीबार फिल्म उद्योग का समग्रता में बड़ी पूंजी के पैराडाइम में रुपान्तरण हुआ है। नव्य-उदारीकरण के पहले तक भारतीय सिनेमा गैर कारपोरेट-लंपट पूंजी के खेल में फंसा हुआ था, फलत: सिनेमा तकनीक का विकास नहीं हो पाया, कारपोरेट पूंजी के पैराडाइम में जाने के कारण फिल्म निर्माण की उच्च तकनीक और हॉलीवुड के हुनरमंद निर्देशकों का भी उसे तजुर्बा हासिल होता। विचारणीय सवाल यह है कि भारतीय बैंकों ने फिल्म उद्योग की तरफ नव्य-उदारतावाद के पहले रुख क्यों नहीं किया ?
   एक अन्य फिनोमिना यह भी है कि हॉलीवुड में पूंजी का अभाव है, इसके कारण भी हॉलीवुड के निर्माता भारतीय पूंजी और मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों की ओर भाग रहे हैं। मध्य-पूर्व और भारत के बड़ी पूंजी के खिलाड़ी जिस गति से मीडिया उद्योग में पूंजी निवेश कर रहे हैं उससे माध्यमों की दुनिया में तीसरी दुनिया का वर्चस्व बढ़ेगा। हॉलीबुड कमजोर होगा और मीडिया मुगलों के कारोबार पर भी असर होगा, यह असर विश्वव्यापी होगा। बुनियादी तौर पर इससे माध्यम साम्राज्यवाद से तीसरी दुनिया के मीडिया अन्तर्विरोध तेज होंगे।          
      फिल्म उद्योग अब इजारेदार पूंजी के पैराडाइम में दाखिल हो चुका है। खासकर 1995-96 के बाद से इस दिशा में प्रयास तेज हुए हैं। अब तक का फिल्म उद्योग का सारा विमर्श ‘लुंपन पूंजी’ पर चल रहा था,भूमंडलीकरण के बाद देशी-विदेशी इजारेदार पूंजी का प्रवेश हुआ है। इस प्रक्रिया का आरंभ नरसिंहाराव के शासनकाल में हुआ था। उस समय हॉलीवुड की फिल्मों के अबाध प्रवेश की अनुमति दी गयी,बाद में प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति दी गयी।
    आमतौर पर पहले फिल्म उद्योग में भारत के पूंजीपतिवर्ग की कोई दिलचस्पी नहीं थी, किंतु दूरसंचार और इलैक्ट्रोनिक मीडिया को निजी क्षेत्र के लिए खोल देने के कारण इजारेदार पूंजी का मीडिया और दूरसंचार के क्षेत्र में जबर्दस्त निवेश हुआ है। इससे भारत का कई स्तरों पर सांस्कृतिक- राजनीतिक नुकसान हुआ है। मीडिया में इजारेदाराना केन्द्रीयकरण बढ़ा है। यह सारा खेल ज्यादा चैनल,ज्यादा खबरें,ज्यादा अभिव्यक्ति की आजादी, ज्यादा मनोरंजन के नाम पर हुआ है। हमें ठंड़े दिमाग से सोचना चाहिए कि क्या हमें इनमें से कोई भी चीज ज्यादा मिली है ? ज्यादा पाने के चक्कर में हम मीडिया के बुनियादी सवालों से कोसों दूर चले गए हैं। हमने अपनी सांस्कृतिक संप्रभुता को दांव पर लगा दिया है।
    आज हम खुश हैं कि ‘माई नेम इज खान’ ने बड़ा कारोबार किया, लेकिन हम भूल गए कि मुंबईया सिनेमा को इस प्रक्रिया में हमने हॉलीवुड के हवाले कर दिया है। आज हम मुंबईया सिनेमा की स्वायत्तता पर खतरे के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं। भारत की फिल्में फ्लॉप हो रही हैं और हॉलीवुड की हिन्दी फिल्में भारत और भारत के बाहर हिट हो रही हैं।जो बाजार कल तक भारतीय सिनेमा के पास था उसे हॉलीवुड उठाकर लिए जा रहा है। यह प्रक्रिया दो तरह से चल रही है,एक तरफ भारतीय पूंजीपति हॉलीवुड में पैसा लगा रहा है दूसरी ओर हॉलीवुड कंपनियां सिनेमा निर्माण के क्षेत्र में आ रही हैं, सिनेमा थियेटरों को खरीद रही हैं। इस पूरी प्रक्रिया के क्या परिणाम निकलेंगे और किस तरह के अन्तर्विरोध पैदा हो रहे हैं इस पर वाम और दक्षिण दोनों ही चुप्पी लगाए बैठे हैं। मुंबईया सिनेमा में हॉलीवुड का दखल  बढ़ना हमारे सिनेमा उद्योग के भविष्य पर सवालिया निशान लगाता है। यह मूलतः सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की दिशा में लंबी छलांग है।   
     






शनिवार, 27 मार्च 2010

फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 1-

 (फिल्म अभिनेता शाहरुख खान)                         
 संचार तकनीक के द्वारा निर्मित वातावरण स्वभावत: ग्लोबल-लोकल होता है। यह धारणा फिल्मों के ऊपर भी लागू होती है। भारतीय फिल्मों का चरित्र और हॉलीवुड फिल्मों का चरित्र अनेक मामलों में भिन्न है। भारतीय सिनेमा का मूलाधार है वैविध्य और बहुलतावाद। जबकि हॉलीवुड सिनेमा की धुरी है इकसारता।   
     भारतीय सिनेमा में संस्कृति और लोकसंस्कृति के तत्वों का फिल्म के कथानक के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जबकि हॉलीवुड सिनेमा के कथानक की धुरी है मासकल्चर। हॉलीवुड सिनेमा विश्वव्यापी अमरीकी ग्लोबल कल्चर के प्रचारक-प्रसारक की अग्रणी भूमिका अदा करता रहा है। जबकि भारतीय सिनेमा में पापुलरकल्चर के व्यापक प्रयोग मिलते हैं।
    हॉलीवुड-बॉलीवुड उद्योग की इस प्रकिया में भारतीय सिनेमा ने खिचड़ी फिल्मी संस्कृति का निर्माण किया है। उसने भारतीय फैंटेसी का व्यापक प्रचार-प्रसार किया है। भारतीय फिल्मी फैंटेसी के चार प्रमुख क्षेत्र हैं, प्रेम, परिवार -समुदाय, राष्ट्र और गरीब। इन चारों के कथानक,विवाद और नज़ारे सबसे ज्यादा रचे गए हैं। भारतीय सिनेमा में भाषायी वैविध्य है साथ ही इसे अपने लिए देश और विदेश दोनों में स्थान बनाना होता है। इसके कारण सिनेमा में भाषायी -सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण का भाव भी होता है। भाषायी और लोकल संस्कृति का अतिक्रमण करने के लिए भारतीय सिनेमा ,खासकर हिन्दी सिनेमा को अनेक चीजों का अतिक्रमण करना होता है।
     हिन्दी सिनेमा मूलत: समग्रता में ‘महा- आख्यान’ नहीं बनाता। वह ऐसा कोई कथानक नहीं बनाता जो सब कुछ अपने अंदर समेटे हो। भारतीय सिनेमा में संस्कृति,इतिहास, व्यक्तित्वअभिनय और कथानक की इकसार अवस्था नहीं मिलती। इससे राष्ट्रीय विविधता को रुपायित करने और बनाए रखने में मदद मिली है। इस बिखरे फिल्मी संसार में सेतु का काम किया है पापुलर कल्चर ने (मासकल्चर नहीं) ।
      पापुलरकल्चर के सेतु से गुजरने के कारण ही मुम्बईया सिनेमा की ‘फ्रेगमेंटरी ’और संवादमूलक प्रकृति है। भारतीय सिनेमा सांस्कृतिक विमर्शों को पैदा करता है।
      हॉलीवुड का सिनेमा सुसंबद्ध ढ़ंग से पाठक को सम्बोधित करता है जबकि भारतीय सिनेमा दर्शक के अलावा सांस्कृतिक समूहों को सम्बोधित करता है। यही वजह है कि भारतीय सिनेमा जितना देश में देखा जाता है वैसे ही विदेश में भी देखा जाता है। देशी-विदेशी दर्शकों को आकर्षित करने में जिस तत्व का सबसे बड़ा रोल है वह है‘भारतीयता’, इस ‘भारतीयता’ का आधार राजनीतिक न होकर सांस्कृतिक है।इसे साम्प्रदायिक राजनीतिक कैटेगरी के रुप में सांस्कृतिक आधार से संवाद करने के कारण ही हिन्दी सिनेमा और भारतीय सिनेमा विदेशों में सभी को अपील करता है। यह ऐसे आप्रवासी की भारतीयता है जो नागरिकता के प्रपंचों से मुक्त है। इस भारतीयता की अपील उन लोगों में जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटे हुए हैं। इस भारतीयता का आधार है जीवनशैली और संस्कार।
 
  फिल्म की कहानी का विधा रुप में उद्योग,बाजार और राजनीति से गहरा संबंध होता है। विधा के साथ उद्योग और बाजार की शक्तियों की सक्रियता का जो रुप यहां मिलता है वह अन्यत्र कम देखने को मिलता है।  हमें विधा की अवधारणा के फिल्म में रुपान्तरण को आलोचनात्मक नजरिए से देखने की जरुरत है। विधा यहां अमूर्त्त कोटि नहीं है। बल्कि विधा की सांस्कृतिक एजेण्ट के रुप में महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय समाज में अस्मिता के रुपों को परिभाषित करने वाली कोटि भी यही है। फिल्मी कहानी  सांस्कृतिक उत्पादन पर चलने वाली सामयिक बहसों का केन्द्र बिंदु है। यह समाज में सक्रिय सांस्कृतिक-सामाजिक संवृत्तियों को अप्रत्यक्ष रुप से प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण विधा रुप है।
      फिल्मी कहानी सांस्कृतिक मार्ग है। हम जब भी किसी फिल्मी कहानी देखें तो पहले उसके पैराडाइम को देखें। फिल्मी कहानी का पैराडाइम उसके अंदर से खोजना चाहिए ऊपर से फिल्मी कहानी गैर-समस्यामूलक संदर्भ में तैयार की गई होती है। लेकिन उसकी हमेशा कोई मंशा होती है जिसे तयशुदा मानकों के आधार पर ही पढ़ा जा सकता है। मसलन् हाल ही में रिलीज की गई फिल्म ‘माई नेम इज खान’ को ही ले सकते हैं, यह अमेरिकी विदेश नीति के फ्रेमवर्क में निर्मित फिल्म है। शाहरुख खान का बयान ‘माई नेम इज खान आई एम नॉट ए टेररिस्ट’,यह वक्तव्य बार-बार भिन्न संदर्भ में शाहरुख खान देता है और बड़े ही कौशल के साथ भारत के साम्प्रदायिक संदर्भ को भी इसमें शामिल कर लिया गया है।
   शाहरुख खान का बयान असाधारण ढ़ंग से रुपक मडरॉक के ‘न्यूज कारपोरेशन’ के 9 / 11 के संदर्भ में किए गए व्यापक मुस्लिम विरोधी प्रचार अभियान के फ्रेमवर्क का हिस्सा है। इस बयान की तमाम विचारधारात्मक जटिलताएं तब ही खुलेंगी जब हम अमेरिकी विदेश नीति के सामयिक मुस्लिम विरोधी पैराडाइम से वाकिफ हों।
       उल्लेखनीय है कि हिन्दी सिनेमा में ‘तेजाब’ फिल्म के साथ मुस्लिम विरोधी नजरिए का प्रवेश होता है। इस फिल्म के साथ ही मुसलमान को विलन के रुप में व्यापक कवरेड मिलता है। मुसलमान के नकारात्मक कवरेज को ‘गदर’ फिल्म वे नयी ऊँचाईयों पर पहुँचाया, शाहरुख कान की नयी फिल्म ‘माई नेम इज खान’ इसी सिलसिले की ओबामा प्रशासन की विदेशी नीति के फ्रेमवर्क में तैयार की गई फिल्म है।  
    इसी प्रसंग में दर्शकों के साम्प्रदायिकीकरण की प्रक्रिया पर भी हमें ध्यान देने की जरुरत है। वे फिल्में दर्शक जुगाड़ नहीं कर पातीं जो धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक फिल्में हैं, इसके विपरीत साम्प्रदायिक और राष्ट्रवादी नजरिए की फिल्में हिट जाती हैं। फिल्में स्वतः ही दर्शक नहीं बनातीं बल्कि उनके दर्शक सचेत ढ़ंग से बनाए जाते हैं। हमें देखना चाहिए कि हिन्दी सिनेमा ने किस तरह का दर्शकवर्ग तैयार किया है।साथ ही यह भी देखना चाहिए कि टेलीविजन के द्वारा किस तरह का दर्शकवर्ग तैयार किया जा रहा है। कहीं दर्शकवर्ग के चरित्र को टेलीविजन ने तो प्रभावित नहीं किया है ?   
 ( हैदराबाद स्थित अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के द्वारा 24 और25 मार्च 2010 को  आयोजित सेमीनार में सिनेमा और संस्कृति विषय पर दिए भाषण पर आधारित संशोधित आलेख)     



बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

माध्यम साम्राज्यवाद की नरकलीला -2-

  हिंसा की जरुरत उसी समाज को पडती है जहां इसका इस्तेमाल निजी संपत्ति की रक्षा के लिए किया जाता है जो मानव द्वारा मानव के उत्पीड़न का स्रोत है।पूंजीवादी जगत का लगभग सारा अनुसंधान और विकास कार्य औद्योगिक राष्ट्रों में संकेन्द्रित है।इस पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का एकाधिकार है। तकनीकी डिजायनों का 80फीसदी अंश उन्हीं के नियंत्रण में है। ये कम्पनियां संपत्ति का संचय उपभोग बढाने के लिए नहीं करतीं। अपितु संपदा का ज्यादा से ज्यादा संचय ही इनकी मूल प्रकृति है। संचय को विनिवेश में लगाने की कोशिश की जाती है और उससे हुई प्राप्तियों को बचत खातों में डाल दिया जाता है।

 साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण के कारण विषमता,असमानता एवं अलोकतान्त्रिक मानसिकता का तेजी से विकास हुआ है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में घुसपैठ बढ़ी है।विश्वकी200 सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का1960 में विश्व के सकल घरेलू उत्पादन के17प्रतिशत हिस्से पर कब्जा था जो 1982 में बढकर 24 फीसदी हो गया और 1995में32प्रतिशत हो गया।                                                                                                                         

अ. ग्राचोव और नि.येर्मोश्किन ने''नयी सूचना व्यवस्था अथवा मनोवैज्ञानिक युध्द?''कृति में सैन्य, सूचना, और संचार के अंतस्संबंधों को विश्लेषित करते हुए लिखा कि ''राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में निरंतर चढ़ाव आने और पूॅजीवादी व्यवस्था में गंभीर संकटों के आने के साथ-साथ संघर्ष विचारधारा के क्षेत्र में भी अंतरित होता जा रहा है। 

आधुनिक साम्राज्यवाद अपनी विचारधारात्मक सेवाओं के संकेन्द्रण की तरफ विशेष ध्यान दे रहा है। ताकि एक ऐसे सशक्त हरावल का निर्माण किया जा सके;जो स्थानीय और विश्व के पैमाने पर सामाजिक परिवर्तनों का प्रतिरोध करने की क्षमता रखता हो। आर्थिक,सैनिक और विचारधारात्मक प्रसार एकाकार हो गया है।''                                                                  

पचास और साठ के  दशक में उपजे पूंजीवादी संकट के कारण शस्त्र उद्योग में पूंजी निवेश ज्यादा  हुआ।सन्1947 से 1970 के दौरान 1,100विलियन डॉलर का सैन्य उदृदेश्यों पर निवेश किया गया। अमरीकी सैन्य उद्योग पर किए गए शोध कार्यों से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि जब-जब युध्द की शुरुआत हुई है तब-तब अमरीकी उद्योगों में हल्की सी विकास दर दर्ज की गयी है। आम तौर पर विकसित राष्ट्रों में सूचना तकनीकी के विकास की बढ़-चढ़कर प्रशंसा की जाती है। किन्तु हकीकत यह है कि उन समाजों में असमानता बढ़ी है।

''मानव विकास रिपोर्ट 1996''के अनुसार 'ओईसीडी' देशों में 100मिलियन से ज्यादा लोग गरीबी की रेखा के नीचे जिन्दगी बिता रहे थे।पांच मिलियन लोग गृहहीन थे।आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में 20 फीसदी समृध्दों ने इन देशों के 20फीसदी सबसे गरीब लोगों की तुलना में दस गुना ज्यादा कमाई की।इसी तरह अमरीका की कुल आबादी के एक फीसदी समृध्दों की संपत्ति में 20से 36प्रतिशत तक की वृध्दि हुई। 

दूसरी ओर बेकारों की संख्या में बेशुमार वृध्दि हुई।विश्वस्तर पर भूमंडलीकरण के नियमों एवं मांगों को लागू करने का यह दुष्परिणाम निकला है कि बडे पैमाने पर दरिद्रता,बेकारी,एवं असमानता का विकास हुआ है।आज दुनिया में1.3 विलियन लोगों के पास साफ पीने का पानी नहीं है।प्राइमरी स्कूल जाने योग्य सात बच्चों में से एक बच्चा स्कूल के बाहर ही रह जाता है। 840 मिलियन लोग कुपोषण के शिकार हैं।तकरीबन 1.3 विलियन लोग ऐसे हैं जिनकी प्रतिदिन एक डॉलर से भी कम आय है। इन आंकड़ों में हो रही वृध्दि की ओर कायदे से भूमंडलीकरण समर्थकों को ध्यान देना चाहिए कि आखिरकार ऐसा क्यों हो रहा है।                                                                                        
असल में, भूमंडलीकरण में अन्तर्विरोध निहित हैं।इसका संबंध पूंजीवाद के अन्तर्विरोधों से है। पूंजीवाद ने विश्व व्यवस्था के रुप में जब अपना विकास शुरु किया तो उसने सीमित रुप में सामन्तशाही के खिलाफ संघर्ष किया। पूंजीवादी सत्ता और औपनिवेशिक शासन व्यवस्था की स्थापना की। पुराने संबंधों को बरकरार रखा। इसके खिलाफ दुनिया के गुलाम मुल्कों में आजादी के लिए संघर्षों का सिलसिला चल निकला।

 आजादी के लिए संघर्ष पूंजीवादी भूमंडलीकरण के खिलाफ पहली सबसे बड़ी जंग हैं। तात्पर्य यह है कि भूमंडलीकरण मूलत: आजादी और आत्मनिर्भरता को छीनता है।यह परनिर्भरता और सैन्य-निर्भरता पैदा करता है। लोकतन्त्र को कमजोर बनाता है या उसे खत्म करता है।यह कार्य वह भूमंडलीय माध्यमों, भूमंडलीय संचारप्रणाली, भूमंडलीय नियमों,और निर्बाध प्रवेश के जरिये करता है। साम्राज्यवादी भूमंडली करण की विशेषता है पर-निर्भरता, सैन्य सहयोग और उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रचार- प्रसार।  इच्छा और आकांक्षाएं सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की बजाय वस्तु प्राप्ति से जुडने लगती हैं। फलत: इच्छाओं का वस्तुकरण होने लगता है। जीवनशैली, खान-पान, प्रतीकों एवं चिह्नों के जरिये साम्राज्यवादी संस्कृति को जनप्रिय बनाने की कोशिशें तेज हो जाती हैं।इस क्रम में जहां एक ओर बहुराष्ट्रीयनिगमों का विस्तार होता है। वहीं दूसरी ओर आम लोगों में भ्रम की सृष्टि  होती है। यही वजह है कि किससे लडना है और कैसे लडना है ,इन सवालों पर नये किस्म के चिन्तन की जरुरत महसूस की जा रही है।नयी समझ के अभाव में संघर्ष के पुराने अस्त्र बेकार हो गए हैं।


माध्यम साम्राज्यवाद की नरकलीला -1-

भूमंडलीकरण एक  विश्वव्यापी संवृत्ति है। इसका साम्राज्यवाद से गहरा सम्बन्ध है। यह नव- औपनिवेशिक शोषण और प्रभुत्व का प्रभावी अस्त्र है। इसके प्रचारक-प्रसारक हैं भूमंडलीय जनमाध्यम और बहुराष्ट्रीय शस्त्र निर्माता कम्पनियां एवं बहुराष्ट्रीय वित्तीय कम्पनियां।
  
द्वितीय विश्व युध्द के बाद समूची दुनिया पर साम्राज्यवाद की पकड ढ़ीली पड़ी थी। अधिकांश गुलाम देश आजाद हुए। साम्राज्यवाद के शोषण एवं उत्पीड़न का दायरा सिकुड़ा। समाजवादी शिविर का जन्म हुआ। सोवियत संघ के नेतृत्व में उभरे समाजवादी शिविर ने नवोदित राष्ट्रों को आत्मनिर्भर विकास का रास्ता अख्तियार करने, बुनियादी उद्योग-धंधों का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस सबका विरोध और समाजवादी सत्ता का विरोध करने के लिए शीतयुध्द की राजनीति शुरु की गयी और शस्त्रास्त्रों की अंधी प्रतिस्पर्धा शुरु की गयी। 'समाजवाद  के खतरे' और 'मार्क्सवाद के भूत' के जरिये सारी दुनिया में, खासकर तीसरी दुनिया और पूर्वी यूरोप में वैचारिक हमला बोला गया।इसी संदर्भ में माध्यम साम्राज्यवाद का विकास हुआ।                                                                                              
साम्राज्यवादी हितों के विस्तार के लिए हथियारों के उत्पादन,सूचना तकनीकी के उत्पादन एवं माध्यम कार्यक्रमों के उत्पादन पर विशेष जोर दिया गया। इन तीन क्षेत्रों के जरिये अमरीकी साम्राज्यवाद ने विश्व भर में अपनी प्रभुता स्थापित की और अपनी शक्ति का विस्तार किया ।विगत पचास वर्षों में इन क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की परिसंपत्तियों में बेशुमार वृध्दि हुई ।
वहीं दूसरी ओर समाजवादी व्यवस्था को गहरा आघात लगा।तीसरी दुनिया के देशों को नए सिरे से नव औपनिवेशिक शोषण की चक्की में पिसना पड़ रहा है ।गरीबी, भुखमरी, बेकारी, सामाजिक विखण्डन और कर्जों के दबाव से गुजरना पड़ रहा है।                                                                                         
द्वितीय विश्वयुध्द के बाद साम्राज्यवादी देशों की समस्या थी कि संपत्ति, सत्ता और ताकत का कैसे विस्तार किया जाय?जाहिरा तौर पर यह विस्तार शांतिपूर्ण विकास कार्यों से संभव नहीं था। सिर्फ युध्दों का माहौल बनाए रखकर ही साम्राज्यवादी हितों का विकास संभव था। युध्दों के लिए शस्त्रों की जरुरत थी और यही एकमात्र क्षेत्र था जो साम्राज्यवाद के विकास की गारंटी कर सकता था।  यही वजह है कि शस्त्र उद्योग का बड़े पैमाने पर विकास किया गया।यही एकमात्र उद्योग था जहां बेशुमार मुनाफा था।

सन्1978 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के विशेषज्ञों की ''हथियारों की होड़ और सैन्य खर्च के आर्थिक - सामाजिक परिणाम,महासचिव की अधुनातन रिपोर्ट '' में बताया गया कि ''लड़ाईयां दूसरे विश्व युध्द के बाद के दौर का एक स्थायी लक्षण रही हैं। हथियारों का प्रयोग काफी बडे पैमाने पर वास्तव में निरन्तर,अक्सर एक ही समय अनेक स्थानों पर किया जा रहा है।हताहतों की संख्या बढ़ती रही है।

दूसरे विश्वयुध्द के बाद कई करोड़ तक पहुँच गयी है। बडी हद तक ये लड़ाई-झगड़े दुनिया के मुख्य औद्योगिक क्षेत्रों के बाहर हुए हैं,यद्यपि कुछ स्थितियों में कुछ मुख्य शक्तियाँ इनमें प्रत्यक्ष रुप से शामिल रही हैं,और युध्द का साजो-सामान तो बिना अपवाद इन्हीं शक्तियों ने मुहैया किया है।   इन लडाईयों के हिंसात्मक स्वरुप ,उनकी व्यापकता तथा अत्यन्त विनाशकारिता का कारण यह है कि अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां दो हिस्सों में बंटी हुई हैं तथा आधुनिक शस्त्रास्त्र तत्काल सुलभ हैं। और ये दोनों बातें अस्त्रों की होड़ का मुख्य लक्षण हैं।''
सैन्य-औद्योगिक क्षेत्र में छह प्रमुख देश आते हैं जिनके खाते में संसार भर के सैन्य व्यय,सैनिक शोध एवं विकास व्यय का बहुत बड़ा हिस्सा आता है।ये देश हैं-अमरीका,सोवियत संघ,चीन, फ्रां,ब्रिटेन, और जर्मनी। विश्व में शस्त्रों का 90 फीसदी निर्यात यही देश करते हैं।अन्य देशों को जाने वाले मुख्य प्रकार के हथियारों की कुल मात्रा का 95 फीसदी इन्हीं देशों से जाता है। आज शस्त्रास्त्र प्रतिस्पर्धा से कोई देश बचा नहीं है। हथियारों के सौदागर अपने माल की बिक्री बढाने के लिए यह प्रचार करते रहते हैं कि यदि इन हथियारों को प्राप्त कर लिया तो उनके देश की प्रतिष्ठा बढ़ेगी , बडी-बडी शक्तियों के दबाव और आदेश का मुकाबला करने की क्षमता बढेग़ी।

लेकिन हथियार किसे बेचे जाएं यह एक राजनीतिक फैसला होता है। सैनिक सलाहकारों एवं प्रशिक्षकों को कहां भेजा जाये, किसे गोला -बारुद की सप्लाई की जाये,इत्यादि फैसले राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। इस संदर्भ में साम्राज्यवादी मुल्कों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है और छोटे-अविकसित देशों के हितों की अनदेखी की जाती है।                                                                                                                               

संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेषज्ञों की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि'' हथियारों की होड़ दिनोंदिन विश्वव्यापी परिघटना बनती जा रही है। यद्यपि इसकी तीव्रता विभिन्न क्षेत्रों में घटती बढ़ती रहती है;मगर शायद ही कोई देश और बड़ा क्षेत्र इससे बचा हो।''

विशेषज्ञों ने इसके आर्थिक दुष्परिणामों की ओर ध्यान खींचते हुए लिखा कि ''यह मामला अत्यन्त असमान विनिमय का होता है जिससे गरीब और धनी देशों के बीच दूरी को पाटने के प्रयासों पर विशेष चोट पड़ती है।शस्त्रों के आयार्तकत्ता के लिए यह अपव्यय मात्र है जिसे लाभप्रद ढंग़ से उपयोग में लाया जा सकता है। शस्त्र यदि दान में मिलें तब भी देखरेख,संचालन तथा अवसंरचना का खर्च घाटे के मद में ही जोड़ना पडेगा।
स्टाकहोम अंतर्राष्ट्रीय शान्ति शोध संस्थान  एक विश्लेषण के आधार पर इस ठोस निष्कर्ष पर पहुँचा कि ''आखिरकार हथियारों का इस्तेमाल यदि युध्द में नहीं किया जाता तो भी वे संतुलित आहार ,स्वास्थ्य सेवा,आवास, और शिक्षा जैसी बुनियादी विकास आवश्यकताओं से आर्थिक संसाधन दूसरी ओर खींचकर अप्रत्यक्ष रुप से 'हत्या'करते हैं।''वस्तुत:शस्त्रों की दौड में शामिल होकर कोई भी देश ताकतवर नहीं बनता अपितु कमजोर बनता है।                                             

आन्द्रेई कोजीरेव ने ''शस्त्व्यापार नये-नये खतरे'' कृति में लिखा है कि''शिकार और खेल को अलग कर दीजिए तो किसी अस्त्र का एकमात्र प्रयोग एवं एकमात्र सामाजिक आवश्यकता उत्पीड़कों की संस्थाबध्द हिंसा है-जो अन्यायपूर्ण इस्तेमाल है। इसके विपरीत उत्पीड़ितों की हिंसा -जो जबावी इस्तेमाल है और न्यायपूर्ण होती है।कुछ पूँजीवादी समाजशास्त्रियों का कहना है कि हिंसा मनुष्य की एक स्वाभाविक, मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है, उसके अस्तित्व का एक अनिवार्य पक्ष है।यह एक निराशावादी , मानवविरोधी निष्कर्ष है।''                                                                                                  
फ्रेडरिक एंगेल्स के शब्दों में''बल केवल साधन है;उद्देश्य आर्थिक लाभ है।''                                                                             


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