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सोमवार, 19 सितंबर 2016

कम्प्यूटर युग में हिन्दी

          

सरकार की आदत है वह कोई काम जलसे के बिना नहीं करती। सरकार की नजर प्रचार पर होती है वह जितना हिन्दीभाषा में काम करती है उससे ज्यादा ढोल पीटती है।
सवाल यह है दफ्तरी हिन्दी को प्रचार की जरूरत क्यों है ॽ जलसे की जरूरत क्यों है ॽ भाषा हमारे जीवन में रची-बसी होती है।अंग्रेजी पूरे शासनतंत्र में रची-बसी है,उसको कभी प्रचार की या हिन्दी दिवस की तरह अंग्रेजी दिवस मनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। भाषा को जब हम जलसे का अंग बनाते हैं तो राजनीतिक बनाते हैं।हिन्दी दिवस की सारी मुसीबत यहीं पर है।यही वह बिन्दु है जहां से भाषा और राजनीति का खेल शुरू होता है।भाषा में भाषा रहे,जन-जीवन रहे,लेकिन अब उलटा हो गया है। भाषा से जन-जीवन गायब होता जा रहा है।हम सबके जन-जीवन में हिन्दी भाषा धीरे धीरे गायब होती जा रही है,दैनंदिन लिखित आचरण से हिन्दी कम होती जा रही है।भाषा का लिखित आचरण से कम होना चिन्ता की बात है।हमारे लिखित आचरण में हिन्दी कैसे व्यापक स्थान घेरे यह हमने नहीं सोचा,उलटे हम यह सोच रहे हैं कि सरकारी कामकाज में हिन्दी कैसे जगह बनाए।यानी हम हिन्दी को दफ्तरी भाषा के रूप में देखना चाहते हैं !

हिन्दी सरकारी भाषा या दफ्तरी भाषा नहीं है। हिन्दी हमारी जीवनभाषा है,वैसे ही जैसे बंगला हमारी जीवनभाषा है।हम जिस संकट से गुजर रहे हैं ,बंगाली भी उसी संकट से गुजर रहे हैं।अंग्रेजी वाले भी संभवतः उसी संकट से गुजर रहे हैं।आज सभी भाषाएं संकटग्रस्त हैं।हमने विलक्षण खाँचे बनाए हुए हैं हम हिन्दी का दर्द तो महसूस करते हैं लेकिन बंगला का दर्द महसूस नहीं करते।भाषा और जीवन में अलगाव बढ़ा है।इसने समूचे समाज और व्यक्ति के जीवन में व्याप्त तनावों और टकरावों को और भी सघन बना दिया है।

इन दिनों हम सब अपनी -अपनी भाषा के दुखों में फंसे हुए हैं। यह सड़े हुए आदमी का दुख है।नकली दुख है।यह भाषाप्रेम नहीं ,भाषायी ढ़ोंग है।यह भाषायी पिछड़ापन है।इसके कारण हम समग्रता में भाषा के सामने उपस्थित संकट को देख ही नहीं पा रहे।हमारे लिए आज महत्वपूर्ण यह नहीं है कि भाषा और समाज का अलगाव कैसे दूर करें,हमारे लिए जरूरी हो गया है कि सरकारी भाषा की सूची में अपनी भाषा को कैसे बिठाएं।सरकारी भाषा का पद जीवन की भाषा के पद से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है और यही वह बुनियादी घटिया समझ है जिसने हमें अंधभाषा प्रेमी बना दिया है।हिन्दीवाला बना दिया है।यह भावबोध सबसे घटिया भावबोध है।यह भावबोध भाषा विशेष के श्रेष्ठत्व पर टिका है।हम जब हिन्दी को या किसी भी भाषा को सरकारी भाषा बनाने की बात करते हैं तो भाषाय़ी असमानता की हिमायत कर रहे होते हैं।हमारे लिए सभी भाषाएं और बोलियां समान हैं और सबके हक समान हैं।लेकिन हो उलटा रहा है।तेरी भाषा-मेरी भाषा के क्रम में हमने भाषायी विद्वेष को पाला-पोसा है।बेहतर यही होगा कि हम भाषायी विद्वेष से बाहर निकलें। जीवन में भाषाप्रेम पैदा करें।सभी भाषाओं और बोलियों को समान दर्जा दें।किसी भी भाषा की निंदा न करें,किसी भी भाषा के प्रति विद्वेष पैदा न करें।दुख की बात है हमने भाषा विद्वेष को अपनी संपदा बना लिया है,हम सारी जिन्दगी अंग्रेजी भाषा से विद्वेष करते हैं और अंग्रेजी का ही जीवन में आचरण करते हैं।हमने कभी सोचा नहीं कि विद्वेष के कारण भाषा समाज में आगे नहीं बढ़ी है। प्रतिस्पर्धा के आधार पर कोई भी भाषा अपना विकास नहीं कर सकती।

मेरे लिए हिन्दी जीवन की भाषा है।इसके बिना मैं जी नहीं सकता।मैं सब भाषाओं और बोलियों से वैसे ही प्यार करता हूँ जिस तरह हिन्दी से प्यार करता हूँ।हिन्दी मेरे लिए रोजी-रोटी की और विचारों की भाषा है।भाषा का संबंध आपके आचरण और लेखन से है।राजनीति से नहीं।भाषा में विचारधारा नहीं होती।भाषा किसी एक समुदाय,एक वर्ग,एक राष्ट्र की नहीं होती वह तो पूरे समाज की सृष्टि होती है।



जब बाजार में कम्प्यूटर आया तो मैंने सबसे पहले उसे खरीदा,संभवतःबहुत कम हिन्दी शिक्षक और हिन्दी अधिकारी थे जो उस समय कम्प्यूटर इस्तेमाल करते थे।मैंने कम्प्यूटर की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली।मैं कम्प्यूटर के तंत्र को नहीं जानता,लेकिन मैंने अभ्यास करके कम्प्यूटर पर लिखना सीखा ,अपनी लिखने की आदत बदली,कम्प्यूटर पर पढ़ने का अभ्यास डाला।कम्प्यूटर आने के बाद से मैंने कभी हाथ से नहीं लिखा,अधिकांश समय किताबें भी डिजिटल में ही पढ़ता हूँ।जब आरंभ में लिखना शुरू किया तो उस समय यूनीकोड फॉण्ट नहीं था,कृति फॉण्ट था,उसमें ही लिखता था।बाद में जब पहलीबार ब्लॉग बनाया तो पता चला कि इंटरनेट पर यूनीकोड फॉण्ट में ही लिख सकते हैं और फिर मंगल फॉण्ट लिया,फिर लिखने की आदत बदली,और आज मंगल ही मंगल है।कहने का आशय यह कि हिन्दी या किसी भी भाषा को विकसित होना है तो उसे लेखन के विकसित तंत्र का इस्तेमाल करना चाहिए। भाषा लेखन से बदलती है,समृद्ध होती है।भाषा बोलने मात्र से समृद्ध नहीं होती।

हमारे एक मित्र हैं ,प्रोफेसर हैं,जब भी कोई उनसे पूछता है भाईसाहब आपकी विचारधारा क्या है तुरंत कहते हैं हम तो मार्क्सवादी हैं! लेकिन ज्यों ही भाषा की समस्या पर सवाल दाग दो तो उनका मार्क्सवाद मुरझा जाता है! वे उस समय आरएसएस वालों की तरह हिन्दीवादी हो जाते हैं।मार्क्सवाद और संघी विचारधारा के इस खेल ने ही हिन्दी को कमजोर बनाया है।हिन्दी को कमजोर संवैधानिक भाषादृष्टि ने भी बनाया है।हम संविधान में अपनी भाषा के अलावा और किसी भाषा को देखना नहीं चाहते।हम भूल जाते हैं कि हिन्दी संविधान या राष्ट्रवाद या राष्ट्र की नहीं जनता की भाषा है।वह भाषायी मित्रता और समानता में जी रही है,संविधान में नहीं।





शनिवार, 26 सितंबर 2015

बैंकिंग सेवा और भाषा समस्या

भारत में राष्ट्रीयकृत बैंक मूलत मासबैंकिंग का अंग हैं। यहाँ पर जनता के व्यापकतम समूहों की सक्रियता सहज ही देखी जा सकती है। सामान्यतौर पर बैंकिंग में अंग्रेज़ी मूल भाषा है। लेकिन जनता के लिए बंगला,हिन्दी आदि के उपयोग की व्यवस्था है। यह सच है कि हिन्दी और लोकल भाषा का प्रयोग बढ़ा है। लेकिन सच यह है बैंकिंग में लोकल भाषाओं का क्षय हुआ है। हिन्दी का प्रतीकात्मक उपयोग बढ़ा है।
समस्या यह है कि बैंकिंग सिस्टम में लोकल भाषाओं का ह्रास कैसे रोका जाय ? बैंकिंग भाषा समस्या को हमने मानकीकरण के ज़रिए हल करने की कोशिश की है। मानकीकरण से संचार तो होता है लेकिन जातीय और लोकल बोली और भाषा का विकास बाधित होता है। इस तरह मानकीकरण के कारण जो भाषायी अन्तर्विरोध पैदा होता है वह अंतत: मानक भाषा को बढ़त दिलाता है और स्थानीय भाषा और बोलियों को क्षतिग्रस्त करता है।
सिस्टम में मानक भाषा के विकास के साइड इफ़ेक्ट के बारे में हमने कभी खोज ख़बर नहीं ली। बैंकिंग सिस्टम ने कभी भाषायी समृद्धि के विकल्पों की खोज नहीं की। मसलन्, बैंकों ने भाषा और साहित्य के विकास की मूलभूत संरचनाओं के निर्माण की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। बैंकों ने सामाजिक विकास की अन्य परियोजनाओं में सक्रिय भूमिका अदा की है, अनेक विश्वविद्यालयों में प्रोफ़ेसर चेयर भी हैं। लेकिन भाषा और बोलियों के विकास और शोध के लिए बैंकों ने कभी कोई फ़ंड आवंटित नहीं किया। क़ायदे से विभिन्न प्रान्तों में बैंकों के ज़रिए भाषा - साहित्य के विभाग स्थापित किए जाएँ और वहाँ से ही इसकी पेशेवर शिक्षा के विकास के बारे में प्रयास किए जाएँ।
बैंकिंग भाषा की अनेक समस्याएँ हैं इनको हम उपहार, प्रमोशन आदि के ज़रिए नज़रअन्दाज़ करते रहे हैं। मसलन्, हमने बैंक की भाषा समस्या को कभी विश्लेषित ही नहीं किया, बैंक की भाषा समस्या हिन्दी अधिकारी की नियुक्ति की समस्या नहीं है। पहली समस्या यह है कि कम्प्यूटरीकरण के कारण उत्पन्न स्तरीकरण से कैसे निबटें। मसलन् , डिजिटलीकरण ने मानवीय सहयोग को पूरी तरह अपदस्थ कर दिया है। अब कम्प्यूटर जो कहता है वह सही है । मसलन् आपके हस्ताक्षर में यदि कोई त्रुटि है तो मशीन तुरंत भुगतान रोक देगी। चैक क्लीयर नहीं होगा। बैंकों के द्वारा संचालित लाइब्रेरी नेटवर्क का होना जरुरी है जिसमें तमाम क़िस्म की ज़रूरत की किताबें सहज रुप में उपलब्ध हों ।
बैंकिंग सिस्टम वस्तुत: गुलाब के फूल की तरह है। जिस तरह गुलाब जहाँ खिलता है वहाँ न तो फूल लगाने वाला नज़र आता है और न बाहर का ही कोई व्यक्ति नज़र आता है। सिर्फ़ बैंक रुपी गुलाब नज़र आता है। बैंक अपनी ख़ुशी का गान स्वयं गाती रहती हैं जैसे गुलाब गाता है। कोई इनके न तो दुख में शामिल होता है और नहीं सुख में शामिल होता है। बैंक हमारे सामाजिक सिस्टम के नियम क़ायदे के दायरे में नहीं आतीं, मसलन् बैंक मैनेजर छुट्टी लेकर सहज ही अवकाश पर नहीं जा सकता। नौकरी के समय और तनाव की जो अवस्था मैनेजर को झेलनी होती है यह चीज वह नौकरी मिलने के पहले नहीं जानता था। तनाव के जितने रुप बैंक मैनेजरों को झेलने पड़ते हैं वह अपने आपमें संकेत है कि बैंक का सामाजिक नियमों और परंपराओं के साथ किस तरह का अंतर्विरोध है। बैंक मैनेजरों के अनुभवों को देखें तो पता चलेगा कि सामाजिक अनुभव, परंपराएँ आदि के साथ बैंकिंग सिस्टम का किस तरह का अंतर्विरोध है।
बैंक कर्मचारी को मैंने कभी हँसते हुए नहीं देखा। ख़ासकर बैंक में काम करते समय अधिकांश बैंक कर्मचारी हँसते नज़र नहीं आते। बैंक कर्मचारी की हँसी कहाँ ग़ायब हो गयी ? क्यों ग़ायब हो गयी ?
बैंक की सबसे बड़ी समाज सेवा यह है कि उसने सामाजिक विकास में बहुत बड़ी भूमिका अदा की और उसकी सबसे खराब कुसेवा है क़र्ज़ में डूबा हुआ धन। इसने बड़े पैमाने पर भ्रष्ट लोगों की मदद की। नॉन प्रिफार्मिंग एसिट के रुप में जो धन डूबा पड़ा है वह बैंकिंग सिस्टम का नकारात्मक तत्व है।
बैंकों में देशज भाषाएँ व्यवहार में तब आएँगी जब बैंकिंग सिस्टम देशज भाषा में संचार पहल करे। मसलन् एसएमएस से लेकर समस्त कम्युनिकेशन देशज भाषा में हो, भाषा के संरक्षण के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों में भाषा विभाग बनाए जाएँ जो बैंकों के लिए कुशल लोग तैयार करें और भाषा की स्थानीय स्तर पर जानकारियाँ एकत्रित करें।

रविवार, 16 सितंबर 2012

हिन्दी के 12 कटु सत्य


1.हिन्दीभाषी अभिजन की हिन्दी से दूरी बढ़ी है ।

2.राजभाषा हिन्दी के नाम पर केन्द्र सरकार करोड़ों रूपये खर्च करती है लेकिन उसका भाषायी,सांस्कृतिक,अकादमिक और प्रशासनिक रिटर्न बहुत कम है।

3.इस दिन केन्द्र सरकार के ऑफिसों में मेले-ठेले होते हैं और उनमें यह देखा जाता है कि कर्मचारियों ने साल में कितनी हिन्दी लिखी या उसका व्यवहार किया। हिन्दी अधिकारियों में अधिकतर की इसके विकास में कोई गति नजर नहीं आती।संबंधित ऑफिस के अधिकारी भी हिन्दी के प्रति सरकारी भाव से पेश आते हैं। गोया ,हिन्दी कोई विदेशी भाषा हो।

4.केन्द्र सरकार के ऑफिसों में आधुनिक कम्युनिकेशन सुविधाओं के बावजूद हिन्दी का हिन्दीभाषी राज्यों में भी न्यूनतम इस्तेमाल होता है।

5.हिन्दीभाषी राज्यों में और 10 वीं और 12वीं की परीक्षाओं में अधिकांश हिन्दीभाषी बच्चों के असंतोषजनक अंक आते हैं. हिन्दी भाषा अभी तक उनकी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे है।

6.ज्यादातर मोबाइल में हिन्दी का यूनीकोड़ फॉण्ट तक नहीं है।ज्यादातर शिक्षित हिन्दी भाषी यूनीकोड फॉण्ट मंगल का नाम तक नहीं जानते।ऐसी स्थिति में हिन्दी का विकास कैसे होगा ?

7.राजभाषा संसदीय समिति और उसके देश-विदेश में हिन्दी की निगरानी के लिए किए गए दौरे भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े अपव्ययों में से एक है.

8.विगत 62सालों में हिन्दी में पठन-पाठन,अनुसंधान और मीडिया में हिन्दी का स्तर गिरा है।

9.राजभाषा संसदीय समिति की सालाना रिपोर्ट अपठनीय और बोगस होती हैं।

10.भारत सरकार के किसी भी मंत्रालय में मूल बयान कभी हिन्दी में तैयार नहीं होता। सरकारी दफ्तरों में हिन्दी मूलतः अनुवाद की भाषा मात्र बनकर रह गयी है

11.हिन्दी दिवस के बहाने भाषायी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिला है इससे भाषायी समुदायों में तनाव पैदा हुआ है। हिन्दीभाषीक्षेत्र की अन्य बोलियों और भाषाओं की उपेक्षा हुई है।

12.सारी दुनिया में आधुनिकभाषाओं के विकास में भाषायी पूंजीपतिवर्ग या अभिजनवर्ग की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिन्दी की मुश्किल यह है कि हिन्दीभाषी पूंजीपतिवर्ग का अपनी भाषा से प्रेम ही नहीं है।जबकि यह स्थिति बंगला,मराठी,तमिल.मलयालम,तेलुगू आदि में नहीं है।वहां का पूंजीपति अपनी भाषा के साथ जोड़कर देखता है।हिन्दी में हिन्दीभाषी पूंजीपति का परायी संस्कृति और भाषा से याराना है।

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

हिन्दी दिवस पर विशेष- इंटरनेट के भाषाखेल का सामाजिक प्रभाव

     कम्प्यूटर युग में भाषायी असंतुष्ट हाशिए पर हैं। अब हम भाषा बोलते नहीं हैं बल्कि भाषा में खेलते हैं। ‘बोलने’ से ‘खेलने’ की अवस्था में प्रस्थान कब और कैसे हो गया हम समझ ही नहीं पाए। यह हिन्दी में पैराडाइम शिफ्ट का संकेत है। इसे भाषाखेल कहते हैं। इसमें भाषा के जरिए वैधता की तलाश पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। पहले भाषा वक्तृता और संवाद का हिस्सा थी अब वैधता का हिस्सा है। पहले सृजन कहते थे अब निर्मिति कहते हैं।
    आज किताब पढ़ते हैं लेकिन किताब पढ़ते समय उसके लेखक से संवाद नहीं करते। आज हम एसएमएस पढ़ते हैं, संवाद नहीं करते। आप उस समय सिर्फ संदेश पढ़ते हैं प्रेषक से संवाद नहीं करते। किताब पढ़ते हैं लेकिन लेखक से संवाद नहीं करते। आज किताबों से लेकर संदेश तक जो कुछ लिखा जा रहा हैं उसमें लेखक और पाठक न्यूट्रल हो गया है। इसका अर्थ नहीं है कि आप लिखे पर बहस नहीं कर सकते आप बहस कर सकते हैं। लेकिन कुछ संवाद ऐसे भी होते हैं जिनका समापन परेशानियों में होता है।
   मसलन् ज्योंही कोई किताब छपकर आती है तो यह तय है कि अब इस किताब पर कैसी प्रतिक्रियाएं आएंगी। ठीक उसी तरह की प्रतिक्रियाएं और समीक्षाएं धडाधड़ आने लगती हैं। ऐसी अवस्था में संवाद संभव नहीं है। इसे संवाद नहीं कहते। इस बात को थोड़ा आगे बढ़ाएं तो पाएंगे कि अब किताब पर चर्चा नहीं हो रही है बल्कि किताब को कुछ इस तरह लिखा ही गया है कि उस पर सनसनीखेज ढ़ंग से बातें होंगी। किताब पर जब सनसनीखेज ढ़ंग से आलोचकगण अपनी प्रतिक्रिया का इजहार रहे होते हैं तो वे अपनी राय जाहिर नहीं कर रहे होते बल्कि वे रेहटोरिक बोल रहे होते हैं। रूढिबद्धभाषा बोल रहे होते हैं। रेहटोरिक में बोलना राय जाहिर करना नहीं है। यह पर्सुएशन की भाषा है । फुसलाने वाली भाषा है। अनेक मामलों में आलोचक अनियंत्रित रेहटोरिक का इस्तेमाल करते हैं। जैसाकि इन दिनों नामवर सिंह और अशोक बाजपेयी अमूमन करते हैं। उनकी लिखी और बोली इन दिनों की अधिकांश समीक्षा और टिप्पणियों में जो भाषा इस्तेमाल हो रही है वह रेहटोरिक की भाषा है,संवाद की भाषा नहीं है। यह केलकुलेटेड भाषा है। यह काव्यात्मक और साहित्यिक भाषा है। इस भाषा का संवाद पर कोई असर नहीं पड़ता।
      अब लेखक जो लिखता है वह चाहता है उसके लिखे का पाठक पर प्रभाव पड़े लेकिन उस पर कोई प्रभाव न पड़े। यही वजह है कि किताब आने के बाद पलटकर लेखक से पाठक सवाल नहीं करता। बल्कि किताब में उठे सवालों से स्वयं जूझता रहता है। लेखक चाहता है कि उसकी किताब का अन्य पर प्रभाव पड़े और उसे नियंत्रित न किया जाए। यदि आप संवाद के परिप्रेक्ष्य में देखेंगे तो बात दूसरी होगी।तो पढ़ने वाले या संवाद में भाग लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपना कोई न कोई बयान देना होगा।
   मसलन जब आप इंटरनेट पर ब्लॉग या फेसबुक पर कुछ लिखते हैं या कोई एसएमएस प्राप्त करते हैं तो अधिकांश मामलों में कोई राय नहीं देते। वस्तु के एसएमएस तो इकतरफा संदेश का संचार करते हैं जबकि फेसबुक या ब्लॉग लेखन संवाद में शिरकत को बढ़ावा नहीं देता । अधिकतर लोग पढ़ते हैं और चलते बनते हैं अधिक से अधिक ‘पसंद है’ या ‘नापसंद है’ के संकेत को दबाया और बात खत्म। यह संवाद नहीं है। यह संवाद की मौत है। संवाद तब होता है जब आप बयान देते हैं और यह बयान पलटकर लेखक के पास जाता है बाद में उसका प्रत्युत्तर दिया जाए उसके बाद पता चलेगा कि सचमुच में क्या बयान दिया गया था ?
     इंटरनेट नियंत्रित अभिव्यक्ति का माध्यम है। आप चाहें तो किसी संदेश को खोलें या न खोलें,पढ़ें या न पढ़ें। यहां सब नियंत्रण में है। नियंत्रण में होने के कारण ही आप किसी भी संदेश के बारे में यह भी सोचते हैं कि क्या यह सही आदमी का संदेश है ? क्या सचमुच उसी ने भेजा है ? संदेश है तो जरूरी नहीं है कि जेनुइन व्यक्ति ने भेजा हो। इस पूरी प्रक्रिया में असल में संवाद का ही नियमन हो रहा है। संवाद का संचार क्रांति के द्वारा नियमन अब आम साहित्यिक विमर्श में चला आया है ,अब स्वतःस्फूर्त्त प्रतिक्रियाएं नहीं आतीं बल्कि नियोजित और प्रायोजित प्रतिक्रियाएं आती हैं। आप हमेशा एक ही दुविधा में रहते है कि जो कहा गया वह सत्य है या नहीं ?





हिन्दी दिवस पर विशेष- यूनीकोड भाषायी ठाट और ठसक

               साइबर युग में हिंदी दि‍वस का वही महत्‍व नहीं है जो आज से बीस साल पहले था। संचार क्रांति‍ ने पहलीबार भाषा वि‍शेष के वर्चस्‍व की वि‍दाई की घोषणा कर दी है। संचार क्रांति‍ के पहले भाषा वि‍शेष का वर्चस्‍व हुआ करता था, संचार क्रांति‍ के बाद भाषा वि‍शेष का वर्चस्‍व स्‍थापि‍त करना संभव नहीं है। अब कि‍सी भी भाषा को हाशि‍ए पर बहुत ज्‍यादा समय तक नहीं रखा जा सकता। अब भारत की सभी 22 राजकाज की भाषाओं का फॉण्‍ट मुफ्त में उपलब्‍ध है। भारतीय भाषाओं का साफ्टवेयर बनना स्‍वयं में भाषायी वर्चस्‍व की समाप्‍ति‍ की घोषणा है। संचार क्रांति‍ ने यह संदेश दि‍या है कि‍ भाषा अब लोकल अथवा स्‍थानीय नहीं ग्‍लोबल होगी। भाषा की स्‍थानीयता की जगह भाषा की ग्‍लोबल पहचान ने ले ली है। अब प्रत्‍येक भाषा ग्‍लोबल है। कोई भाषा राष्‍ट्रीय,क्षेत्रीय अथवा आंचलि‍क नहीं है।

उपग्रह क्राति‍ के साथ ही संचार क्रांति‍ हुई और हम सब नए भाषायी पैराडाइम में दाखि‍ल हुए हैं। भाषा की स्‍थानीयता खत्‍म हुई है। बहुभाषि‍कता का प्रसार हुआ है। अब वि‍भि‍न्‍न भाषाओं में लोग आसानी के साथ संवाद कर रहे हैं। एक- दूसरे को संदेश और सामग्री संप्रेषि‍त कर रहे हैं। अब हिंदी की स्‍थानीय अथवा राष्‍ट्रीय स्‍वीकृति‍ की समस्‍या नहीं है। बल्‍कि‍ संचार क्रांति‍ ने हिंदी और अन्‍य सभी भाषाओं को ग्‍लोबल स्‍वीकृति‍ दि‍लायी है। आज वे कंपनि‍यां और कारपोरेट घराने हिंदी का कारोबार करने के लि‍ए मजबूर हैं जो कभी यह मानते थे कि‍ वे सि‍र्फ अंग्रेजी का ही व्‍यवसाय करेंगे। इस प्रसंग में रूपक मडरॉक के स्‍वामि‍त्‍व वाले 'न्‍यूज कारपोरेशन' का उदाहरण देना समीचीन होगा। इस कंपनी की प्रति‍ज्ञा थी कि‍ वह समाचारों का सि‍र्फ अंग्रेजी में ही प्रसारण करेगा, और उसने सारी दुनि‍या में अंग्रेजी के ही न्‍यूज चैनल खोले,लेकि‍न भारत में आने के बाद पहलीबार उसे अपनी प्रति‍ज्ञा हिंदी के आगे तोड़नी पड़ी और स्‍टार न्‍यूज का हिंदी में पहलीबार प्रसारण शुरू हुआ। हिंदी सत्‍ता और महत्‍ता का लोहा एमटीवी संगीत चैनल ने भी माना। एमटीवी के सारी दुनि‍या में अंग्रेजी संगीत चैनल हैं,इस कंपनी ने भारत में जब संगीत चैनल खोलने का फैसला कि‍या तो हिंदी संगीत चैनल के रूप में एमटीवी आया। संचार क्रांति‍ के दबावों के कारण ही भारत सरकार ने तकरीबन 1300 करोड रूपया भारतीय भाषाओं के सॉफ्टवेयर के नि‍र्माण और मुफ्त सप्‍लाई पर खर्च कि‍या है। भाषाओं के उत्‍थान के लि‍ए इतना ज्‍यादा पैसा पहले कभी खर्च नहीं कि‍या गया। इसका सुफल जल्‍दी ही सामने आने वाला है। अब तेजी से हिंदी और भारतीय भाषाओं में भाषान्‍तरण हो रहा है भाषाओं का पहले की तुलना में आज भाषान्‍तरण और संवाद तेजी से हो रहा है। आप सहज ही अपनी भाषा में लि‍खी सामग्री को कि‍सी भी देशी वि‍देशी भाषा में रूपान्‍तरि‍त कर सकते हैं।सि‍र्फ कम्‍प्‍यूटर चलाना आता हो और इंटरनेट कनेक्‍शन हो। उपग्रह क्रांति‍ ने भाषाओं रीयल टाइम में संवाद और संचार को जन्‍म दि‍या है। भाषाओं में तत्‍क्षण संवाद की संभावना पहले कभी नहीं थीं। व्‍यक्‍ति‍ के मि‍लने के बाद ही संवाद होता था,अब तो व्‍यक्‍ति‍ नहीं भाषाएं मि‍ल रही हैं। भाषाओं के लि‍ए संचार क्रांति‍ रैनेसां लेकर आयी है।

उपग्रह क्रांति‍ के कारण यह संभव हो पाया है कि‍ आज भारतीय भाषाओं के टीवी और रेडि‍यो चैनल वि‍श्‍वभर में कहीं पर भी डीटीएच सेवाओं के जरि‍ए देखे और सुने जा सकते हैं।इंटरनेट के जरि‍ए भाषायी प्रेस सारी दुनि‍या में पढा जाता है। इस प्रक्रि‍या में भाषाओं की स्‍थानीयता खत्‍म हुई है। भाषाओं के रैनेसां का युग है। हिंदी आज स्‍वाभावि‍क तौर पर भारत की पहचान का मूलाधार बन गयी है। यह सब संचार क्रांति‍ के कारण संभव हुआ है।

नाइन इलेवन की घटना के बाद अमेरि‍का में जि‍स तरह के सुरक्षा उपाय कि‍ए गए हैं उसके कारण वहां पर सुपर कम्‍प्‍यूटर में सारी दुनि‍या के सभी भाषाओं के ईमेल और तमाम कि‍स्‍म की सामग्री की छानबीन अहर्निश चलती रहती है। इसके कारण अमेरि‍का ने तय कि‍या कि‍ वह अपने देश के स्‍कूलों में चीनी,हिंदी,रूसी आदि‍ भाषाओं के पठन-पाठन की खास व्‍यवस्‍था करेगा। सुरक्षा कारणों और सैन्‍य वर्चस्‍व को बनाए रखने के लि‍हाज से अमेरि‍का में हिंदी के अध्‍यापन की व्‍यापक व्‍यवस्‍था पर ध्‍यान दि‍या जा रहा है। न्‍यूज कारपोरेशन, डि‍जनी,सीएनएन,सोनी,एमटीवी आदि‍ कंपनि‍‍यां भारत के मीडि‍या बाजार में प्रवेश करने के लि‍ए सबसे पहले हिंदी में चैनल ,प्रेस और मीडि‍या प्रोडक्‍ट लेकर आई हैं। अब वे देशी समाचारपत्रों में पैसा लगा रहे हैं।

बांग्‍ला के आनंद बाजार प्रकाशन,जागरण प्रकाशन,अमर उजाला प्रकाशन ,हिंदुस्‍तान टाइम्‍स,टाइम्‍स ऑफ इंडि‍या आदि‍ में वि‍देशी कंपनि‍यों का पूंजी नि‍वेश इस बात का संकेत है कि‍ भाषायी मीडि‍या में बहुराष्‍ट्रीय मीडि‍या कंपनि‍यां नतमस्‍तक होकर पैसा लगाने आ रही हैं और अंग्रेजी की तुलना में देशज भाषाओं की महत्‍ता को स्‍वीकार कर रही हैं। इस क्रम में हिंदी को स्‍वाभावि‍क बढत मि‍ली है,अन्‍य भाषाएं भी इस प्रक्रि‍या में अपना वि‍कास करेंगी। इस अर्थ में यह भाषाओं के नवजागरण का दौर है। हिंदी में अनुवाद और डबिंग का इतना व्‍यापक बाजार पैदा हुआ है इसके बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं था। अनुवाद का ही तकरीबन 12 हजार करोड रूपये का भारत में बाजार है।कई हजार करोड रूपये का डबिंग का बाजार है,अभी तो कई बाल चैनल 24 घंटे हिंदी में डब कि‍ए गए कार्यक्रम दि‍खाते रहते हैं। वि‍ज्ञापनों में हिंदी वि‍ज्ञापन अकेले 7-8 हजार करोड के बाजार को घेरे हुए हैं। पहले अनूदि‍त वि‍ज्ञापन होते थे अब हिंदी के मौलि‍क वि‍ज्ञापन तैयार हो रहे हैं।

कोई भाषा कि‍तनी ताकतवर है यह इस बात से तय होता है कि‍ व्‍यापार और आर्थि‍क मीडि‍या उसमें है या नहीं। अंग्रेजी के बाद हिंदी अकेली भाषा है जि‍समें व्‍यापारि‍क चैनल और अखबार हैं, जैसे एनडीटीवी प्रोफि‍ट,जी बि‍जनेस, सीएनबीसी आवाज आदि‍। इसी तरह बि‍जनेस स्‍टैंडर्ड, इकोनॉमि‍क टाइम्‍स जैसे आर्थि‍क अखबार सस्‍ते दामों पर हिंदी में नि‍कल रहे हैं। आर्थि‍क अखबार और टीवी चैनलों का हिंदी में आना ,हिंदी में धडाधड इंटरनेट सामग्री का आना, तेजी से ब्‍लॉग संस्‍कृति‍ का वि‍कास इस बात का संकेत हैं कि‍ हिंदी अब ग्‍लोबल भाषा है सही अर्थों में देशी वि‍देशी नागरि‍कों की वि‍श्‍वभाषा है। सैटेलाइट हिंदी चैनलों के करोड़ों दर्शक भारत के बाहर हैं यह सब संभव हुआ है संचार क्रांति‍,उपग्रह क्रांति‍, कम्‍प्‍यूटर और डि‍जि‍टलाईजेशन के कारण।

कहने का तात्‍पर्य यह है हिंदी आज वास्‍तव अर्थों में ग्‍लोबल भाषा है । हिंदी मीडि‍या ग्‍लोबल स्‍तर पर संचार कर रहा है। यह हिंदी का नया पैराडाइम है। यह राज्‍य,कारपोरेट जगत और तकनीकी कैद से मुक्‍त एक नए रैनेसां की शुरूआत है। आओ हम संचार क्रांति‍ का स्‍वागत करें और अपने को हिंदी संस्‍कृति‍ के साथ 'ई' साक्षर भी बनाएं। 'ई' साक्षरता के बि‍ना हम और हमारी भाषाएं नहीं बचेगी। आज प्रत्‍येक हिंदीभाषी की यह जि‍म्‍मेदारी है कि‍ वह अपने को संचार क्रांति‍ से जोड़े और अपने को 'ई' साक्षर बनाए।

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