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रविवार, 23 अप्रैल 2017

नव्य उदार आर्थिकयुगीन युवा की सच्चाईयां-


भूमंडलीकरण की केन्द्रीय विशेषता है आत्ममुग्धता ,आत्महनन और आत्म-व्यस्तता । सन् 1990-91 के बाद से युवाओं में यह प्रवृत्ति तेजी से पैदा हुई है। इसने उसे सामाजिक सरोकारों से काटा है। पहले यह प्रवृति उच्चवर्ग में थी लेकिन भूमंडलीकरण के बाद से इस प्रवृत्ति ने निचले वर्गों में पैर पसारने आरंभ कर दिए।
आत्ममुग्ध भाव की विशेषता है आप स्वयं को जानने की कोशिश नहीं करते। वे तमाम क्षमताएं त्याग देते हैं जिसके जरिए आत्म को जानने में मदद मिले। आत्म या खुद को न जानने के कारण व्यक्ति के अंदर अन्य को जानने की इच्छा भी खत्म हो जाती है।फलतः ये युवा अन्य की मदद नहीं कर पाते। वे निजी जीवन में व्यस्त रहते हैं। निज से परे कोई संसार है जिसे जानना चाहिए उसको ये युवा सम्बोधित ही नहीं करते। यह ऐसा युवा है जो अपने अलावा किसी में दिलचस्पी नहीं ले जाता। ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं यह सुनना बंद कर देता है, रुचि लेना बंद कर देता है।
नए युवा देखने में आकर्षक,नए भाव-भंगिमा वाले हैं वे देखने में सुंदर लगते हैं। आरंभ में ये अन्य को जल्दी प्रभावित भी कर लेते हैं लेकिन ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं ये अपने को समेटना आरंभ कर देते हैं। इन युवाओं में एक बड़ा अंश है जो अपने चारों ओर की दुनिया से एकदम बेखबर है।
अमेरिका में इस तरह के युवा की एक नागरिकता परीक्षा ली गयी। अमेरिका में अक्टूबर 2009 से अगस्त 2013 के दौरान ली गयी नागरिकता परीक्षा में 30लाख से ज्यादा आप्रवासी युवाओं ने हिस्सा लिया। इस परीक्षा को 92प्रतिशत युवाओं ने पास किया। इन उत्तीर्ण युवाओं में 29फीसदी को अमेरिका के उपराष्ट्रपति का नाम तक नहीं मालूम था। 43फीसदी नागरिक अधिकारों को परिभाषित करने में असमर्थ रहे,40 फीसदी नहीं जानते थे कि अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान और जर्मनी से युद्ध किया था। 73 फीसदी नहीं जानते थे कि शीतयुद्ध के दौरान साम्यवाद ही मुख्य समस्या थी। 67 प्रतिशत नहीं जानते थे कि वे जिस आर्थिक व्यवस्था में रहते हैं उसे पूंजीवाद कहते हैं।
एक अन्य सर्वे में पता चला कि चार में से एक अमेरिकन को संविधान प्रदत्त पांच स्वाधीनताओं का ज्ञान नहीं था। वे एक से अधिक स्वाधीनता का नाम नहीं जानते थे। जिन लोगों में सर्वे किया गया उनमें से आधे से अधिक लोग “सिम्पसन कार्टून फैमिली ” के दो चरित्रों के नाम तक नहीं जानते थे। इन सर्वेक्षणों पर विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों की इस दशा के लिए पब्लिक स्कूल सिस्टम जिम्मेदार है। क्योंकि वे ठीक से बच्चों को इतिहास,भूगोल और नागरिकशास्त्र नहीं पढ़ाते। इन लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि इंटरनेट ने ऐसी पीढ़ी पैदा की है जो आत्मलीन,एडिक्ट,चंचलमन और अचेत है। यह भी देखा गया अनेक लोग अमेरिका में निजी स्वार्थ को देखकर वोट देते हैं न कि देश के स्वार्थ को देखते हैं। अमेरिका के पतन का बड़ा कारण है कि अनेक अमेरिकन देश के बारे में नहीं सोचते ,सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं। एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा कि जब युवा हमारे संविधान को ही नहीं जानते तो उसकी रक्षा में या संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए वे खड़े कैसे होंगे ?

शनिवार, 9 जुलाई 2016

युवाओं में वैचारिक विभाजन




भारत का मध्यवर्ग आज विचारधारा के आधार पर जितना विभाजित है उतना पहले कभी नहीं था।पहले कुछ मसलों पर मध्यवर्ग में एकता थी,लेकिन इस समय हर विषय पर मोदी समर्थक,संघ समर्थक,कांग्रेस समर्थक,वाम समर्थक आदि के विचारधारात्मक विभाजन को सीधे देखा जा सकता है।मध्यवर्ग में राष्ट्र की अवधारणा और उसकी एकता की धुरी गायब है और उसकी जगह विचारधारा की धुरी आ गयी है।इससे देश के विकास में बाधा पहुँच रही है।विचारधारा के आधार पर समाज का विभाजन काफी पहले शुरू हो गया था,संभवतःआपातकाल के बाद इस तरह की प्रक्रिया के बीज पड़े जिनको 1990-91 के बाद जमकर फलने-फूलने का मौका मिला,इस समय तो विचारधारा के आधार पर सामाजिक विभाजन पूरे चरम पर है।यह सामाजिक कमजोरी का लक्षण है।
       
मजेदार बात यह है कि भारत के युवा जिनकी उम्र17 से 22 साल के बीच है वे सबसे ज्यादा विचारधारात्मक विभाजन के शिकार हैं,इनमें उदार मूल्यों के प्रति एकता कम और अनुदार और प्रतिगामी मूल्यों के प्रति आकर्षण बढ़ा है।इसकी तुलना में अशिक्षित समुदाय आज भी विचारधारात्मक विभाजन से मुक्त है।

मैंने अपने जीवन में वैचारिक विभाजन छात्रजीवन में नहीं देखा,जबकि जेएनयू में पढ़ता था,व्यापक स्तर पर सघन वैचारिक जंग होती थी लेकिन छात्रों में विचारधारात्मक विभाजन नहीं था,लेकिन मौजूदा दौर बेहद खतरनाक है,इसने युवाओं को बांट दिया है।इस समय पुराने जेएनयू वाले मित्र भी बंटे हैं। युवा आपस में बंटे हैं,युवाओं का अपने से बड़ों यानी अभिभावकों से विचारधारात्मक टकराव है।इस स्थिति में लगातार कंजरवेटिव और आक्रामक विचारों की ओर रूझान बढ़ रहा है।स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि गृहिणी किस्म की महिलाएं बड़ी संख्या में जो पहले उदारमना होती थीं उनमें राष्ट्रवाद,मोदीवाद टाइप संकीर्ण विचारधाराएं आ गयी हैं।वे राजनीति नहीं जानतीं,लेकिन राष्ट्रवाद के पक्ष में हैं।कहने का अर्थ है राजनीतिविहीन लोगों को विचारधारात्मक विभाजन तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रहा है।फलतः पृथकतावादी और साम्प्रदायिक ताकतें खुलकर घरेलू औरतों का दुरूपयोग कर रही हैं।

विश्वविद्यालयों में उदार मूल्यों को मूलाधार बनाकर जो व्यापक सामाजिक एकता या छात्र एकता विकसित हुई थी आज वह पूरी तरह से गायब है।विश्वविद्यालयों में विचारधारात्मक विभाजन सबसे ज्यादा है और उसमें कंजरवेटिव मूल्यों पर एकता बढी है।मूल्यहीन चीजों पर एकता बढ़ी है,इसने विश्वविद्यालय स्नातकों के सामाजिक स्तर का अवमूल्यन किया है।हमने इन छात्रों के अंदर मूल्यों के विघटन के सवालों पर बातें करना बंद कर दिया है।इन दिनों कैंपस का समूचा परिवेश स्थानीय राजनीति का अखाड़ा मात्र बनकर रह गया है।



शनिवार, 21 नवंबर 2015

सोया युवामन और कचड़ा संस्कृति


विगत कई दशकों से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का युवाओं के खिलाफ विश्वयुद्ध चल रहा है। अफसोस की बात यह है कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ने वाले अधिकांश युवा इस युद्ध से अनभिज्ञ हैं।कभी -कभी तो इस युद्ध के औजार के रुप में देश के मुखिया भी भाषण देते नजर आते हैं। मसलन्, अधिकांश युवाओं में श्रम - मूल्य में आ रही गिरावट को लेकर कोई गुस्सा या प्रतिवाद नजर नहीं आता। हम अपने दैनंदिन जीवन में देख रहे हैं कि श्रम का मूल्य लगातार गिरा है। दैनिक और मासिक पगार घटी है,लेकिन युवा चुप हैं। युवाओं में अपराधीकरण बढ़ रहा है लेकिन युवा चुप हैं। बच्चों और युवाओं में वस्तुओं की अनंत भूख जगा दी गयी है लेकिन युवा चुप हैं।सामाजिक स्पेस का निजीकरण कर दिया गया है लेकिन युवा चुप हैं।

अब युवा को टीवी खबरों,सोशलमीडिया,सिनेमा,रियलिटी शो,वीडियो शो आदि में मशगूल कर दिया गया है। वस्तुगत तौर पर देखें तो युवाओं का अधिकांश समय कचरा सांस्कृतिक उत्पादों में गुजरता है और युवाओं का एक बड़ा वर्ग इसको ही पाकर धन्य-धन्य घूम रहा है। इससे युवा एक तरह से बेकार-फालतू माल बन गया है जिसे कभी भी कहीं भी फेंका जा सकता है।युवाओं को बेकार-फालतू माल बना दिए जाने की इस प्रक्रिया के बारे में हमने तकरीबन बोलना ही बंद कर दिया है।

आज देश में दुर्दशापूर्ण स्थिति के लिए इस तरह के युवाओं की कचड़ाचेतना को एक हदतक जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। कायदे से होना यह चाहिए कि युवा के अंदर सामाजिक बर्बरता,असभ्यता,कुसंस्कृति आदि के प्रति तुरंत आक्रोश पैदा हो,वह अन्याय के खिलाफ तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त करे,लेकिन हो इसके उलट रहा है,युवाजन आँखों सामने अन्याय-बर्बरता देखते हैं,उसमें शामिल भी होते हैं,असभ्यता देखते हैं और उसका महिमामंडन भी करते हैं। खासकर फेसबुक जैसे माध्यम में यह चीज बहुत तेजी से नजर आई है।

मसलन्, हमारे अधिकांश युवाजन समूचे देश में युवाओं में बढ़ रही हिंसा और अपराध की प्रवृत्ति के खिलाफ कोई जोरदार टिकाऊ आंदोलन करना तो दूर एक बड़ी रैली तक नहीं कर पाए हैं।आज के युवा की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह अपने को अपने नजरिए से नहीं देख रहा बल्कि ऐसे व्यक्तियों और संगठनों के नजरिए से देख रहा है जो कहीं न कहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों की संस्कृति-राजनीति और सभ्यता के पैरोकार हैं। ये लोग युवा का जो खाका हमारे सामने खींच रहे हैं वही खाका आँखें बंद करके युवाजन मान रहे हैं।



मसलन्, पीएम मोदी( चाहें तो अभिजन एलीटकह सकते हैं) कह रहे हैं देश विकास कर रहा है,अधिकांश युवा मान चुका है कि देश विकास कर रहा है,वे कह रहे हैं डिजिटल इंडिया तो युवा कह रहा है डिजिटल इंडिया,वे कह रहे हैं देश के युवाओं में अपार क्षमताएं हैं,युवा मानकर चल रहे हैं अपार क्षमताएं हैं, मोदी कह रहे हैं स्कील डवलपमेंट जरुरी है,युवा भी मान चुके हैं कि जरुरी है। इस समूची प्रक्रिया में युवा के मन में यह बात बिठायी जा रही है कि उसके पास निजी दिमाग और विवेक नहीं होता,वह ठलुआ होता है,उसे जो बताया जाएगा वही मानेगा। मसलन् पीएम मोदी कहेंगे कि देश में महंगाई है तो महंगाई है ,यदि वे नहीं कहते तो देश में महंगाई नहीं है,चाहे अरहर की दाल 230रुपये किलो बिके। इस तरह की युवा मनोदशा के बारे में पीएम मोदी यह मानकर चल रहे हैं कि वे युवाओं को वे जब बताएंगे तब ही वह जानेगा। उसमें सामाजिक समस्याओं को जानने-समझने की क्षमता नहीं है। इसके कारण पीएम मोदी को यह भ्रम भी हो गया है कि वे ज्ञान के अवतार हैं और उनके जब ज्ञान चक्षु खुलेंगे तब ही युवाओं के भी ज्ञान चक्षु खुलेंगे। इस समूची प्रक्रिया ने युवाओं में “जय-हो” संस्कृति को जन्म दिया है। यह “जय हो” संस्कृति युवाओं को कचड़ा सांस्कृतिक रुपों , अनुत्पादक मूल्यों और कार्यों में बांधे रखती है।फलतःयुवा के अंदर समाज,संस्कृति,राजनीति आदि को लेकर आलोचनात्मक विवेक पैदा ही नहीं होता और युवामन अहर्निश कचड़ा संस्कृति में रस लेता रहता है। कायदे से युवाओं को कचड़ा संस्कृति के प्रति आलोचनात्मक विवेक पैदा करना चाहिए। जो कहा जा रहा है या दिखाया जा रहा है उस पर सवालिया निशान लगाकर विचारकरना चाहिए ।युवा यह सोचें कि जो कहा जा रहा है वह क्या यथार्थ से मेल खाता है ? जो चीज यथार्थ से मेल नहीं खाती उसे नहीं मानना चाहिए।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

नव्य उदार आर्थिकयुगीन युवा की सच्चाईयां

   
भूमंडलीकरण की केन्द्रीय विशेषता है आत्ममुग्धता ,आत्महनन और आत्म-व्यस्तता ।  सन् 1990-91 के बाद से युवाओं में यह प्रवृत्ति तेजी से पैदा हुई है। इसने उसे सामाजिक सरोकारों से काटा है। पहले यह प्रवृति उच्चवर्ग में थी लेकिन भूमंडलीकरण के बाद से इस प्रवृत्ति ने निचले वर्गों में पैर पसारने आरंभ कर दिए।
     आत्ममुग्ध भाव की विशेषता है आप स्वयं को जानने की कोशिश नहीं करते। वे तमाम क्षमताएं त्याग देते हैं जिसके जरिए आत्म को जानने में मदद मिले। आत्म या खुद को न जानने के कारण व्यक्ति के अंदर अन्य को जानने की इच्छा भी खत्म हो जाती है।फलतः ये युवा अन्य की मदद नहीं कर पाते। वे निजी जीवन में व्यस्त रहते हैं। निज से परे कोई संसार है जिसे जानना चाहिए उसको ये युवा सम्बोधित ही नहीं करते। यह ऐसा युवा है जो अपने अलावा किसी में दिलचस्पी नहीं ले जाता। ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं यह सुनना बंद कर देता है, रुचि लेना बंद कर देता है।
     नए युवा देखने में आकर्षक,नए भाव-भंगिमा वाले हैं वे देखने में सुंदर लगते हैं। आरंभ में ये अन्य को जल्दी प्रभावित भी कर लेते हैं लेकिन ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं ये अपने को समेटना आरंभ कर देते हैं। इन युवाओं में एक बड़ा अंश है जो अपने चारों ओर की दुनिया से एकदम बेखबर है।
    अमेरिका में इस तरह के युवा की एक नागरिकता परीक्षा ली गयी। अमेरिका में अक्टूबर 2009 से अगस्त 2013 के दौरान ली गयी नागरिकता परीक्षा में 30लाख से ज्यादा आप्रवासी युवाओं ने हिस्सा लिया।  इस परीक्षा को 92प्रतिशत युवाओं ने पास किया। इन उत्तीर्ण युवाओं में 29फीसदी को अमेरिका के उपराष्ट्रपति का नाम तक नहीं मालूम था। 43फीसदी नागरिक अधिकारों को परिभाषित करने में असमर्थ रहे,40 फीसदी नहीं जानते थे कि अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान और जर्मनी से युद्ध किया था। 73 फीसदी नहीं जानते थे कि शीतयुद्ध के दौरान साम्यवाद ही मुख्य समस्या थी। 67 प्रतिशत नहीं जानते थे कि वे जिस आर्थिक व्यवस्था में रहते हैं उसे पूंजीवाद कहते हैं।
एक अन्य सर्वे में पता चला कि चार में से एक अमेरिकन को संविधान प्रदत्त पांच स्वाधीनताओं का ज्ञान नहीं था। वे एक से अधिक स्वाधीनता का नाम नहीं जानते थे। जिन लोगों में सर्वे किया गया उनमें से आधे से अधिक लोग  सिम्पसन कार्टून फैमिलीके दो चरित्रों के नाम तक नहीं जानते थे। इन सर्वेक्षणों पर विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों की इस दशा के लिए पब्लिक स्कूल सिस्टम जिम्मेदार है। क्योंकि वे ठीक से बच्चों को इतिहास,भूगोल और नागरिकशास्त्र नहीं पढ़ाते। इन लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि इंटरनेट ने ऐसी पीढ़ी पैदा की है जो आत्मलीन,एडिक्ट,चंचलमन और अचेत है। यह भी देखा गया  अनेक लोग अमेरिका में निजी स्वार्थ को देखकर वोट देते हैं न कि देश के स्वार्थ को देखते हैं। अमेरिका के पतन का बड़ा कारण है कि अनेक अमेरिकन देश के बारे में नहीं सोचते ,सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं।  एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा कि जब युवा हमारे संविधान को ही नहीं जानते तो उसकी रक्षा में या संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए वे खड़े कैसे होंगे ?  



बुधवार, 18 जून 2014

नए मतवाले

        एक जमाना था नारा लगता था 'जीना है तो मरना सीखो ,कदम-कदम पर लडना सीखो। 'लेकिन अब यह नारा कहीं गुम हो गया है। अब तो एक ही नारा है 'जीना है तो तिकड़म सीखो।'

तिकड़म की कला में जो लोग पलकर बड़े हुए हैं वे इन दिनों मतवालों की तरह घूम रहे हैं। वे सारी दुनिया से बेखबर हैं। उनकी चिंता में फेसबुक है ,चैटिंग है,फिल्मों की गॉसिप है,लुभावने रसीले किस्से हैं। वे मोदी के दीवाने हैं,कारपोरेट कल्चर के फेन हैं।उनको अन्ना अच्छा लगता है क्योंकि वो हर आंदोलन को टीवी इवेंट बनाता है।

वे संघर्ष को टीवी इवेंट के रुप में देखना पसंद करते हैं। लेकिन आश्चर्यजनक बात है कि इन दीवानों को अफगानिस्तान,श्रीलंका,इराक आदि के कत्लेआम प्रभावित नहीं करते। वह तो यही मानकर चल रहे हैं कि इस्लामिक देशों में तो हिंसाचार आम बात है। मुसलमानों को तो लड़ लड़कर मर जाना चाहिए। उसे इससे भी कोई लेना देना नहीं है कि आर्थिकमंदी से कौन कितना प्रभावित हो रहा है। वह तो अपने कैरियर और कम्पटीशन की तैयारी के अंग के रुप में मंदी और अन्य सामयिक खबरों पर नजर रखे हुए है। क्योंकि उसे अपडेट रखना है, कहीं पेपर खराब न हो जाय। यानी सामाजिक-राजनीतिक सचेतनता अब उसके संघर्ष का नहीं कैरियर का हिस्सा है।

नए मतवालों के लिए स्वाधीनता संग्राम का किस्सागोई से ज्यादा कोई महत्व नहीं है। वे उस दौर के स्कैंडल में रस लेते हैं।इन मतवालों को स्वाधीनता संग्राम के मूल्य प्रभावित नहीं करते बल्कि इनकी रुचि तो स्वाधीनता आंदोलन के इतर प्रसंगों में है। वह स्वाधीनता संग्राम का मतलब नेहरु-गांधी के किस्से मानता है और भगतसिंह आदि उसे भटके हुए युवक नजर आते हैं।

यह ऐसा मतवाला है जिसे मूल्य नहीं, सड़कें,चमकदार भवन,मीडिया की सुर्खियां,सत्ता की कुर्सियां, कंपनी के टर्नओवर और नए नए गजट अपील करते हैं। वह नई फैशन पर फिदा है। उनकी चाल निराली है। वह पढ़ता है लेकिन किताबें कम और कम्पटीशन मास्टर टाइप चीजें ज्यादा पढ़ता है।बेस्टसेलर उसकी पहली पसंद है।

वह शिक्षित है लेकिन अन्य केलिए अपनी शिक्षा का कोई इस्तेमाल नहीं करना चाहता। उसको नौकरी चाहिए लेकिन गांवों में नहीं। इनमें से अनेक को टीचिंग में नौकरी चाहिए लेकिन शहरों में।यह ऐसा दीवाना है जो शहरों के अलावा अन्यत्र नहीं रहना चाहता। फैशन और स्टायल का यह वर्ग दीवाना है। इसमें से कुछ लोग हिन्दी साहित्य में भी आ रहे हैं। जमकर कविता-कहानी-उपन्यास भी लिख रहे हैं। लेकिन छोटे छोटे दायरों में मित्रमंडली बनाकर जीना इसकी नई प्रथा है। वह साहित्यिक हो या मतवाला हो, सब अपने छोटे समूहों में मगन होकर रह रहे हैं। बड़े मित्र समूहों और संघर्षशील संगठनों की चौपालें और हरकतें म्यूजियम की चीजें हो गयी हैं।



नए मतवाले धर्म से मुक्त हैं लेकिन साम्प्रदायिकचेतना से लैस हैं। ये साम्प्रदायिक प्रचार की कॉमनसेंस बातों को सच्चे विचार मानकर विश्वास करते हैं। साम्प्रदायिक कॉमनसेंस में आस्थावान होने के कारण वह अब हर चीज को इस कॉमनसेंस के आधार पर छानने-फटकने लगे हैं। शादी करने से लेकर वोट देने तक साम्प्रदायिकचेतना उसके स्वभाव को निर्धारित करती है। यह ऐसा व्यक्ति है जो स्वभाव से सरल है और विचार से साम्प्रदायिक है।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...