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रविवार, 1 मई 2016

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू-4-

        जेएनयू के प्रतीक पुरूषों में तीन कॉमरेडों का नाम आता है ये हैं देवीप्रसाद त्रिपाठी, प्रकाश कारात और सीताराम येचुरी। इनमें से एकमात्र देवी प्रसाद त्रिपाठी ने सबसे ज्यादा कुर्बानियां दीं। आपातकाल में 18 महीनों तक जेल में रहे। जबकि बाकी दोनों का किसी भी किस्म की कुर्बानी देने का रिकॉर्ड नहीं है। यह बात दीगर है कि प्रकाशकारात और सीताराम येचुरी को माकपा के शीर्ष नेतृत्व में जगह मिली। इन दोनों नेताओं के व्यक्तित्व की अपनी-अपनी निजी विशेषताएं हैं। किंतु कुछ साझा विशेषताएं भी हैं। दोनों माक्र्सवाद की किताबी भाषा से अच्छी तरह वाकिफ हैं। दोनों का माक्र्सवाद और हिंदुस्तान के प्रति दर्शकीय संबंध है। प्रकाश कारात ने जेएनयू में सन् 1980 में भास्कर वेंकटरमन के अध्यक्ष पद हेतु आखिरी चुनाव प्रचार सभा की। तब से प्रकाशकारात ने कभी छात्र चुनाव सभाओं में हिस्सा नहीं लिया।इसी साल से चुनाव के मुख्य वक्ताओं में मेरा नाम शामिल हुआ जो 1987तक बना रहा। प्रकाश कारात का भाषण पार्टी प्रेस विज्ञप्ति, पार्टी कक्षा और पार्टी के संपादकीय शैली का मिश्रित रूप था ,उसके भाषणों में जिंदगी की धड़कनों का अभाव खटकता था, चाहकर भी वह अंत तक इस कमजोरी से मुक्त हो पाया। प्रकाश के इस स्वभाव का जीवन और पार्टी के प्रति यांत्रिक और संवेदनाहीन समझ से गहरा संबंध है। कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर जो लोग स्टालिन टाइप व्यक्तित्व से प्रभावित हैं उन्हें प्रकाश अपील करता है। साधारण छात्रों में उसके भाषण्ाों की न्यूनतम अपील होती थी, सिर्फ एसएफआई के सदस्यों का एक हिस्सा ही उसे आदर्श वक्ता के रूप में पसंद करता था। इसके विपरीत सीताराम येचुरी के भाषणों में पब्लिक स्कूल के डिबेटरों की शैली थी, यह शैली जेएनयू के पब्लिक स्कूल मार्का छात्रों को अपील करती थी, इसी शैली के कारण सीताराम को मीडिया में भी ज्यादा पसंद किया जाता है। पब्लिक स्कूल मार्का वक्तृता शैली मूलत: आभिजात्य पापुलिज्म को संबोधित करती है। आभिजात्य पृष्ठभूमि के छात्रों में सीताराम की जनप्रियता जबर्दस्त थी । उल्लेखनीय है आभिजात्य की जनप्रियता खोखली और अस्थायी होती है। यही वजह है सीता के भाषणों का क्षणिक प्रभाव होता था। वह जिस क्षण बोलता है तत्काल ही प्रभावहीन हो जाता है। आप जब तक भाषण सुनते हैं अच्छा लगता है, भाषण बंद और प्रभाव भी खत्म। इसके विपरीत डीपीटी के भाषणों में आख्यान और विचार की सम्मिश्रित पध्दति का प्रयोग था। डीपीटी का भाषण सुनते हुए छात्र आनंद लेते थे बाद में उसे स्मरण करके बहस करते थे। बहस अंतर्वस्तु और भाषणकला दोनों को लेकर होती थी। जेएनयू की वामपंथी छात्र संस्कृति को बनाने में जिन छात्रों की भूमिका महत्वपूर्ण थी और जो आइकॉन नहीं थे किंतु अपने जमाने के जेएनयू के बेहतरीन छात्र होने के साथ बेहतरीन संगठनकर्ता थे इनमें सर्वप्रथम दो नाम आते हैं पहला रमेश दीक्षित का और दूसरा है सुनीत चोपड़ा का। इन दोनों ने अपने-अपने तरीके से जेएनयू के छात्र आंदोलन की बुनियाद का निर्माण किया।ये दोनों देश में एसएफआई जैसे विशाल छात्र संगठन के संस्थापक सदस्यों में भी हैं। सुनीत इन दिनों माकपा में हैं,खेतमजदूर यूनियन के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं,वर्षों माकपा की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य रहे हैं जबकि रमेश दीक्षित राष्ट्रवादी कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व का अंग हैं। इन दोनों छात्रनेताओं ने लंबे समय तक जेएनयू के उदात्त मानवीय चरित्र को अपने दैनन्दिन व्यवहार और विचारधारात्मक कार्यों से आगे बढ़ाया। इनके अलावा उस जमाने में छात्र आंदोलन के अग्रणी नेताओं में दिनेश अवरोल, प्रबीर पुरकायस्थ, अशोकलता जैन, इंदु अग्निहोत्री,सुहैल हाशमी, दिलीप उपाध्याय ,सीताराम प्रसाद सिंह, कैशर शमीम, रमेश दधीचि ,मनमोहन ,अनिल चौधरी ,डी.रघुनंदन आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

श्रद्धा के बिना माकपा


                                              
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की 21वीं पार्टी कॉग्रेस हाल ही में खत्म हुई है। यह कॉग्रेस एक मायने में महत्वपूर्ण है कि इसने माकपा में श्रद्धा के नायक को अपदस्थ किया है।श्रद्धा को नहीं। प्रकाश कारात के जमाने में माकपा श्रद्धालुओं और भक्तों का दल होकर रह गया था। माकपा के नेतागण श्रद्धालुओं की तरह बातें करते थे और श्रद्धालुओं की तरह ही अविवेकवादी आचरण कर रहे थे। प्रकाश कारात को यह श्रेय जाता है उसने प्रतिबद्ध माकपा को श्रद्धालु माकपा में तब्दील किया । कहने के लिए सीताराम येचुरी महासचिव हुए हैं,लेकिन पोलिट ब्यूरो अभी श्रद्धालुओं से भरा है। इस कमजोरी के बावजूद प्रकाश कारात की श्रद्धा की नीति को कॉग्रेस ने पूरी तरह ठुकरा दिया है।साथ ही श्रद्धा के नायक को विदा किया है ,यह सकारात्मक पक्ष है। 
उल्लेखनीय है विगत दस सालों में माकपा में प्रतिबद्धता घटी, श्रद्धा और अंध-श्रद्धा बढ़ी है। इस श्रद्धा और अंध-श्रद्धा की धुरी है पार्टी का संघात्मक ढ़ांचा और अभिजात्य भावबोध। इसके कारण पार्टी में छोटे-बड़े का भेद बढ़ा है। यह माकपा की अभी भी मूल समस्या है। संघात्मक ढ़ांचे को माकपा किसी भी तरह तोड़ नहीं पाई है। इसबार की पार्टी कॉग्रेस में भी यह ढ़ांचा ज्यों का त्यों बना रहा । सिर्फ महासचिव किसी तरह इस ढ़ांचे की पकड़ के बाहर से ऊपर आ गया है। सीताराम कैसे महासचिव बने हैं यह तो पार्टी के अंदर के लोग जानें लेकिन हम बाहर से माकपा को जिस तरह देख पा रहे हैं उसके आधार पर कह सकते हैं कि सीताराम येचुरी की महासचिव के पद पर प्रतिष्ठा के साथ यदि प्रकाश कारात के श्रद्धालु कॉमरेडों की प्रकाश सहित पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय समिति से विदाई हो जाती तो बेहतर होता। अब मुश्किल यह है कि सीताराम को श्रद्धालुओं के साथ मिलकर फैसले लेने होंगे। 
माकपा को श्रद्धालुओं ने पोलिट ब्यूरो से लेकर निचले स्तर तक प्रदूषित किया है। कायदे से प्रकाश कारात के जमाने में जो श्रद्धातंत्र माकपा में निर्मित हुआ था उसको सर्वोच्च कमेटी से ही तोड़े जाने की जरुरत है, प्रकाश कारात सहित उन तमाम पोलिट ब्यूरो सदस्यों को पार्टीतंत्र से बाहर किया जाना चाहिए,अथवा उनको निरस्त्र किया जाय, जिन लोगों ने माकपा को श्रद्धालुओं,दलालों,प्रमोटरों और तमाम किस्म निहित स्वार्थी तत्वों की पार्टी बनाया। मसलन् ,पश्चिम बंगाल माकपा में प्रमोटर,दलाल और असामाजिक तत्वों की पकड़ संगठन पर इतनी मजबूत रही है कि पार्टी का सचिव भी उनके सामने फैसले लेने में शर्माता था। 
विगत एक दशक से माकपा की समस्या उसकी नीतियां कम और कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं खासकर महासचिव का राजनीतिक व्यवहार सबसे बड़ी समस्या रहा है। वह स्थानीयतावाद और प्रांतीयतावाद को किसी भी तरह कम नहीं कर पाया। प्रांतीयतावाद के आगे महासचिव बौना बना रहा और समूची पार्टी कभी अखिल भारतीय दल की तरह काम ही नहीं कर पाई। यहां तक कि पोलिट ब्यूरो में भी इसकी अभिव्यंजना साफतौर पर देखी जा सकती है। 
श्रद्धातंत्र ने पार्टी को रोबोट दल में तब्दील कर दिया। कॉमरेडों का रोबोट आचरण आज भी दहशत और थरथराहट पैदा करता है, उनका अहंकार आज भी मन में घृणा पैदा करता है। कॉमरेड भूल ही गए कि मौजूदा दौर पूजावाद और श्रद्धा का नहीं है। यह अविश्वास और बहस का युग है। शक दूर करने का युग है। श्रद्धा के पक्षधर पुराने ख्यालों और दस्तूरों में जी रहे हैं। उनकी समझ का यथार्थ से कोई मेल नहीं है। उनकी यथार्थ जीवन में कोई दिलचस्पी नहीं है । जबकि आज के कॉमरेड मार्क्सवाद का यथार्थ के साथ मेल देखना चाहते हैं। वे उन तमाम चीजों के बारे में सवाल खड़े करना चाहते हैं जिनको माकपा ने गढ़ा है। वे सार्वजनिक तौर पर बहस-मुबाहिशे करके चीजों के बारे में समझना चाहता है। पार्टी का माहौल बदलना चाहते हैं। उनको अ-न्याय,निजी रंजिशों और कॉमरेडों की हैवानियत से सख्त नफरत है। लेकिन श्रद्धेयनेता इन चीजों पर ध्यान देना नही देना चाहते। वे उन मसलों पर बातें करना नहीं चाहते जिनसे माकपा के कॉमरेडों का मन और सामाजिक जीवन बदरुप हुआ है। 
श्रद्धेय नेताओं ने बदरंगी रुपों को पार्टी अनुशासन और ऊपर के नेता की राय के नाम पर हमेशा ढ़ंकने की कोशिश की है। इन लोगों ने यह भावना पैदा की है कि पाटी में नेता के बिना हमारा कोई नहीं है। नेता नहीं तो तुम नहीं । 21वीं पार्टी कॉग्रेस में हो सकता है पार्टी के बदरंग भावबोध की जमकर चर्चा हुई हो, लेकिन हम नहीं कह सकते कि वहां इस पर गौर किया गया था । यदि गंभीरता से श्रद्धा और अंध-श्रद्धा के दौर की समीक्षा की जाती तो प्रकाश कारात और उनके बासी श्रद्धासुमन बाहर फेंके क्यों नहीं गए ? जिन नेताओं के आचरण के कारण पार्टी आज रसातल के मुहाने पर खड़ी है वे सभी पोलिट ब्यूरो में बरकरार क्यों हैं ? पार्टी के जिन दोषों की 21वीं कॉग्रेस में चर्चा हुई है, वे दोष, व्यक्तिविहीन नहीं हैं। उनके साथ कोई न कोई नेता जुडा रहा है, ऐसे मं सामूहिक फैसले और निजी जिम्मेदारी के सिद्धांत का पालन करते हुए दोषयुक्त कार्यकलापों को प्रश्रय देने वाले नेताओं को पार्टी की सर्वोच्च कमेटी से निकाला क्यों नहीं गया ? 
सवाल यह भी है कि प्रकाश कारात के दौर में पार्टी सांगठनिक तौर पर कमजोर हुई है या ताकतवर बनी है ? सब जानते है कि पार्टी का राष्ट्रीय स्तर से लेकर निचले स्तर तक ह्रास हुआ है, लेकिन इस ह्रास के लिए महासचिव को दण्डित क्यों नहीं किया गया ? यह कैसे संभव है कि पश्चिम बंगाल में जो नेतागण तबाही के नायक हैं वे अभी भी पोलिट ब्यूरो में बने हुए हैं , क्या पार्टी में ईमानदार लोगों की कमी है ? पार्टी के पोलिट ब्यूरो में उन लोगों को बरकरार रखा गया है जो समूची पार्टी को दलदल,कीचड़ और बदनामी में छोड़ गए हैं। 
इसका अर्थ यह भी है कि माकपा में अभी भी नेताओं के बीच में श्रद्धा की गाँठ बंधी हुई है यही वजह है संगठन में कोई उनको टस से मस नहीं कर पाया। कायदे से श्रद्धा की गांठ को तोड़ा जाना चाहिए। श्रद्धा से देवता बनाए जा सकते हैं, बुर्जुआ नेता बनाए जा सकते हैं,कम्युनिस्ट नेता नहीं बनाए जा सकते। कम्युनिस्ट नेता, श्रद्धा से नहीं बनते, वे तो प्रतिबद्धता से बनते हैं। माकपा में फिलहाल तो हमें श्रद्धा के फूल खिलते नजर आ रहे हैं। देखते हैं नया माली (सीता) पूरे बगीचे को कैसे श्रद्धासुमनों से मुक्त करता है।

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

मीडिया की पेज थ्री संस्कृति में कैद माकपा


   मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद राजनीतिक तौर पर सबको लाभ हुआ है। भाजपा से लेकर नीतीश कुमार तक सभी जाने-अनजाने लाभान्वित हुए हैं। लेकिन माकपा को मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मानो ग्रहण ही लग गया है। खासकर यूपीए-2 के शासन में आने के बाद से वामदलों की राजनीतिक पहलकदमी में तेजी से गिरावट आई है। आज संसदीय क्षितिज से लेकर सड़कों तक माकपा की आवाज कहीं पर भी सुनाई नहीं देती। माकपा और वामदलों की इस तरह राजनीतिक अनुपस्थिति भय पैदा कर रही है। यह विचार करने लायक बात है कि एक जमाने में वामदलों का सभी राष्ट्रीय सवालों पर विपक्ष में महत्वपूर्ण योगदान था और सारा देश देखता था कि आखिरकार फलां मसले पर वामदल क्या कहते हैं ? लेकिन इनदिनों वामदलों को जैसे लगवा मार गया है। 

यूपीए-2 के शासन में आने के साथ वामदलों की निष्क्रियता क्यों बढ़ी है ? और वामदलों में इस निष्क्रियता को तोड़ने में कोई सरगर्मी नजर क्यों नहीं आती इसके बारे में कहीं पर कोई हलचल नजर नहीं आती। इसके कारणों की गंभीरता से तलाश की जानी चाहिए।

माकपा में आई राजनीतिक पस्ती का प्रधान कारण है माकपा का पेज 3 मार्का मार्क्सवादी नेतृत्व । पेज 3थ्री कल्चर से प्रभावित होकर जिस लीडरशिप को शीर्षपदों पर बिठाया गया है उस लीडरशिप को हिन्दुस्तान की धड़कनों का ज्ञान नहीं है। ये वे लोग हैं जो राष्ट्र को ठीक से नहीं जानते। ये अपने अपने इलाके क्षत्रप हैं। इनमें कुछ की लोकल जड़ें हैं। लेकिन देश इनके लिए आज भी बेगाना है। देश के प्रति बेगानापन और देश की जनता के यथार्थ अलगाव के कारण माकपा ने अपनी राजनीतिक पहलकदमी खो दी है।

टीवी पर आपको सभी दल राजनीतिक एक्शन करते नजर आएंगे लेकिन माकपा के नेता नजर नहीं आएंगे। विगत तीन सालों में माकपा नेताओं ने संसदीय गतिविधियों में भाजपा के साथ जिस तरह का फ्लोर मैनेजमेंट किया है उससे उनका राजनीतिक अवमूल्यन हुआ है। संसद में निजी पहल को छोड़कर भाजपा की राजनीतिक पहल का हिस्सा बनकर माकपा ने सत्ताधारी वर्गों की सेवा की है।

माकपा में राजनीतिक निष्क्रियता का एक बड़ा कारण है राज्यस्तर पर माकपा का बूढ़ा नेतृत्व। खासकर केरल और पश्चिम बंगाल में स्थितियां बेहद खराब हैं। पश्चिम बंगाल में जो नेतागण थक गए थे उनको पार्टी के कामों से मुक्ति नहीं दी गयी, जिन नेताओं को राज्य की आम जनता एकदम नापसंद करती है उनको जनसंगठनों से लेकर पार्टी पदों तक से मुक्त नहीं किया गया।

मसलन् ,पश्चिम बंगाल में राज्य विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद कम से कम बुद्धदेव भट्टाचार्य,विमान बसु को पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय समिति से निकाल देना चाहिए था लेकिन माकपा का केन्द्रीय नेतृत्व ऐसा नहीं कर पाया। बुद्धदेव भट्टाचार्य के व्यक्तिगत तौर पर जितने भी गुण हों लेकिन उनकी राजनीतिक असफलताएं उससे बड़ी हैं। इसी तरह सांगठनिक स्तर पर विमान बसु की सांगठनिक असफलताएं भी जबावदेही की मांग करती हैं। विमान बसु के कार्यकाल में पार्टी में बड़े पैमाने पर अ-मार्क्सवादी संस्कृति का विकास हुआ है और फलतः पूरी कम्युनिस्ट पार्टी पेजथ्री कल्चर और गुटबाजी में फंसकर रह गयी है।

माकपा के नेता विपक्ष की जंग टीवी चैनलों और मीडिया प्रबंधन के जरिए लडना चाहते हैं। पार्टी नेताओं ने संघर्ष और कुर्बानी का रास्ता त्यागकर टीवी टॉकशो और प्रेस कॉफ्रेस का रास्ता अपना लिया है और वे यह मानकर चल रहे हैं कि अपने तर्कशास्त्र के जरिए ममता बनर्जी और उनके दल तृणमूल कांग्रेस को आम जनता से अलग-थलग कर देंगे।

टीवी चैनलों से प्रचार किया जा सकता है लेकिन संगठन नहीं बना सकते। टीवी चैनलों के जरिए विज्ञापन जुटाकर पार्टी कोष में बढ़ोत्तरी की जा सकती है लेकिन इससे आम जनता से संपर्क-संबंध बहाल नहीं किए जा सकते। माकपा की बुनियादी कमजोरी है कि वह मीडिया इमेज की शिकार है।

माकपा अब आंदोलन नहीं करती बल्कि टीवी बाइटस बनाने के लिए एक्शन करती है। किसी भी एक्शन का बाइटस तक सीमित रहना और फिर नई बाइट्स के लिए टॉकशो या टीवी कैमरामैन की तलाश ही इनदिनों माकपा नेताओं की बड़ी गतिविधि है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि बैंकों में 10 लाख कर्मचारी हड़ताल पर चले गए लेकिन उनके लिए कोई दीर्,कालिक संघर्ष का मार्ग वामदल नहीं सुझा पाए हैं। वामदलों की राजनीतिक असफलता देखें कि वे संसद में बैंकिंग संशोधन बिल के विरोध में अन्य राजनीतिक दलों को अपने साथ नहीं ला पाए ,यहां तक कि जिस भाजपा का वे विगत तीन सालों से संसद में हर मसले पर साथ दे रहे थे उसने भी बैंकिंग संशोधन बिल पर माकपा के साथ जाने की बजाय मनमोहन सरकार का समर्थन करना जरूरी समझा। बैंक कर्मचारियों की मांगों पर वामदलों के साथ अन्य दलों का न आना वामदलों की अब तक सबसे बड़ी असफलता है। पहले कभी इस तरह बैंक कर्मचारियों की मांगों पर वामदल अलग-थलग नहीं पड़े थे जिस तरह इसबार अलग-थलग पड़े हैं। इसके अलावा प्रमोशन में आरक्षण के सवाल पर वामदलों का रूख चिंता पैदा करने वाला है।

वामदलों और खासकर माकपा को यदि एक जंगजू कम्युनिस्ट पार्टी की इमेज पुनःअर्जित करनी है तो उसे पेजथ्री कल्चर के बाहर आना होगा वरना कम्युनिस्ट पार्टी का अन्यदलों से भेद ही खत्म हो जाएगा।











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