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सोमवार, 8 अगस्त 2016

मनोहरा देवी प्रेरक थीं निराला की

हिन्दी में सूर्यकान्त त्रिपाठी ´निराला´ पर जब भी बातें होती हैं तो उनकी पत्नी की भूमिका का कभी जिक्र नहीं होता। सच यह है निराला को हिन्दीसेवा के लिए प्रेरित उनकी पत्नी ने किया।निराला की ´कुल्लीभाट´रचना बेहद दिलचस्प है।रामविलास शर्मा ने ´निराला की साहित्य साधना´में बहुत ही रोचक ढ़ंग से समूचे प्रसंग को उद्घाटित किया है।निराला की पत्नी के कथासूत्र को ´कुल्लीभाट´ में देखें तो चीजों को बेहतर ढ़ंग से समझ सकते हैं।मनोहरा देवी की समझ में निराला उस समय हिन्दी के पूरे गँवार थे, ´बिलकुल ठोस मूर्ख´।हिन्दी को लेकर पति-पत्नी की बातचीत इस प्रकार हुई है-

पति-तुम हिन्दी- हिन्दी करती हो ,हिन्दी में क्या है ॽ

पत्नी-जब तुम्हें आती ही नहीं,तब कुछ नहीं है।

पति-मुझे हिन्दी नहीं आती ॽ

पत्नी-वह तो तुम्हारी ज़बान बतलाती है।बैसवाड़ी बोल लेते हो,तुलसीकृत रामायण पढ़ी है,बस तुम खड़ीबोली का तुम क्या जानते हो ॽ

संवाद के बाद पूरी बात बतलाते हुए निराला ने लिखा है कि उनकी पत्नी ने खड़ीबोली के बहुत-से महारथियों के नाम गिना दिये।पर मनोहरादेवी ने भजन गाया तो तुलसीदास का।उस समय मनोहरादेवी की उम्र 13-14साल रही होगी। उपरोक्त संवाद में यह देखें कि निरालाकी पत्नी की कितनी विकसित चेतना थी कि वह खड़ीबोली हिन्दी के पक्ष में बोल रही थीं,लेकिन उस समय निराला के पास वह चेतना नहीं थी।उनकी पत्नी गांव में रहते हुए भी खड़ीबोली हिन्दी के नए कवियों से वाकिफ थीं,निराला नहीं।निराला ने जब अपनी पत्नी से यह सवाल किया कि हिन्दी में क्या है ॽ तो वे नहीं जानते थे कि उनको सटीक उत्तर भी मिलेगा।यह संवाद जिस समय हो रहा था निराला 16साल के रहे होंगे।निराला का मुँह बंद करने के लिए मनोहरादेवी ने उसी समय निराला को खड़ीबोली हिन्दी के दो गीत गाकर सुनाए। यह उस समय गांव में रहने वाली 13-14 साल की लड़की की चेतना थी।निराला के अनुसार जो दो गीत सुनाए वे हैं-

पहला- अगर है चाह मिलने की तो हरदम लौ लगाता जा।

दूसरा- सासुजी का छोकड़ा ,मेरी ठोड़ी पर रख दिया हाथ।

बहुत गम खा गई नहीं चाँटे लगाती दो-चार।।



रामविलास शर्मा ने इस समूचे प्रसंग पर लिखा है ´निराला को जिस बात ने प्रभावित किया,वह था मनोहरा देवी का मधुर कण्ठ-स्वर।श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन-सुनकर पहलीबार निराला के ज्ञान नेत्र खुले;उन्हें संगीत के साथ काव्य के अमित प्रकाश का ज्ञान हुआ।यह भजन निराला जीवन भर गाते रहे; इससे अधिक उनके हृदय को प्रभावित करनेवाला दूसरा गीत संसार में न था।मनोहरा देवी गढ़ाकोला में रामायण पढ़ा करती थीं।निराला के चाचा दरवाजे पर बैठे सुनते थे। मनोहरा देवी ने निराला का परिचय खड़ीबोली से नहीं,तुलसीदास से कराया।तुलसीदास को ज्ञान मिला,पत्नी के उपदेश से;निराला को हिन्दीसेवा के लिए प्रवृत्त किया मनोहरादेवी ने !´

रविवार, 29 जून 2014

अस्मिता,आम्बेडकर और रामविलास शर्मा


        रामविलास शर्मा के लेखन में अस्मिता विमर्श को मार्क्सवादी नजरिए से देखा गया है। वे वर्गीय नजरिए से जातिप्रथा पर विचार करते हैं। आमतौर पर अस्मिता साहित्य पर जब भी बात होती है तो उस पर हमें बार-बार बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर के विचारों का स्मरण आता है। दलित लेखक अपने तरीके से दलित अस्मिता की रक्षा के नाम पर बाबा साहेब के विचारों का प्रयोग करते हैं। दलित लेखकों ने जिन सवालों को उठाया है उन पर बड़ी ही शिद्दत के साथ विचार करने की आवश्यकता है। आम्बेडकर-ज्योतिबा फुले का महान योगदान है कि उन्होंने दलित को सामाजिक विमर्श और सामाजिक मुक्ति का प्रधान विषय बनाया।
अस्मिता विमर्श का एक छोर महाराष्ट्र के दलित आंदोलन और उसकी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से जुड़ा है ,दूसरा छोर यू.पी-बिहार की दलित राजनीति और सांस्कृतिक प्रक्रिया से जुड़ा है। अस्मिता विमर्श का तीसरा आयाम मासमीडिया और मासकल्चर के राष्ट्रव्यापी उभार से जुड़ा है। इन तीनों आयामों को मद्देनजर रखते हुए अस्मिता की राजनीति और अस्मिता साहित्य पर बहस करने की जरूरत है।
अस्मिता के सवाल आधुनिकयुग की देन हैं। आधुनिक युग के पहले अस्मिता की धारणा का जन्म नहीं होता। आधुनिककाल आने के साथ व्यक्तिगत को सामाजिक करने और अपने अतीत को जानने-खोजने का जो सिलसिला आरंभ हुआ उसने अस्मिता विमर्श को संभव बनाया।
अस्मिता राजनीति में विगत 150 सालों में व्यापक परिवर्तन हुए हैं।खासकर नव्य आर्थिक उदारीकरण और उपग्रह मीडिया प्रसारण के आने के बाद परिवर्तनों का सिलसिला तेज हुआ है। खासकर उत्तर आधुनिकतावाद आने के साथ सारी दुनिया में उत्तर आधुनिक अस्मिता की धारणा का तो बबंडर ही चल निकला।मसलन् अस्मिता निर्माण के उपकरणों के रूप में मोबाइल,आई पोड,मर्दानगी आदि पर जमकर चर्चाएं हुई हैं।
उत्तर आधुनिकता के साथ आई अस्मिता ने सेल्फ (निज ) के तरल, विखंडित, विश्रृंखलित,अ-केन्द्रित,अवसादमय, वर्णशंकर, रूपों को जन्म दिया। उत्तर आधुनिक अस्मिता का अर्थ है तर्क,सत्य,प्रगति और सार्वभौम स्वतंत्रता वाले आधुनिक आख्यान का अंत। इन दिनों अस्मिता के छोटे छोटे आख्यान केन्द्र में आ गए हैं। स्त्री से लेकर दलित तक,भाषा से लेकर संस्कृति तक, साम्प्रदायिकता, पृथकतावाद, राष्ट्रवाद आदि तक अस्मिता की राजनीति का विमर्श फैला हुआ है।
आखिरकार आधुनिक युग में अछूत कैसे जीएंगे हम नहीं जानते थे। हम कबीर को जानते थे,रैदास को जानते थे। ये हमारे लिए कवि थे। साहित्यकार थे। संत थे। किंतु ये अछूत थे और इसके कारण इनका संसार भिन्न किस्म का था यह सब हम नहीं जानते थे। अछूत की खोज आधुनिकयुग की महानतम सामाजिक उपलब्धि है।
अछूत के उद्धाटन के बाद पहलीबार देश के विचारकों को पता चला वे भारत को कितना कम जानते हैं। भारत एक खोज को अछूत की खोज ने ढंक दिया। आज भारत एक खोज सिर्फ किताब है, सीरियल है,एक प्रधानमंत्री के द्वारा लिखी मूल्यवान किताब है। इस किताब में भी अछूत गायब है। उसका इतिहास और अस्तित्व गायब है। आंबेडकर ने भारत को सभ्यता की मीनारों पर चढ़कर नहीं देखा बल्कि शूद्र के आधार पर देखा। शूद्र के नजरिए से भारत के इतिहास को देखा, शूद्र की संस्कृतिहीन अवस्था के आधार पर खड़े होकर देखा। इसी अर्थ में आंबेडकर की अछूत की खोज आधुनिक भारत की सबसे मूल्यवान खोज है।
भारत की खोज से सभ्यता विमर्श सामने आया,अछूत खोज ने परंपरा और इतिहास की असभ्य और बर्बरता की परतों को खोला। आंबेडकर इस अर्थ में सचमुच में बाबासाहेब हैं कि उन्होंने भारत के आधुनिक एजेण्डे के रूप में अछूत को प्रतिष्ठित किया। आधुनिक युग की सबसे जटिल समस्या के रूप में अछूत समस्या को पेश किया।
आधुनिकाल में किसी के लिए स्वाधीनता,किसी के लिए समाजसुधार, किसी के लिए औद्योगिक विकास , किसी के लिए क्रांति और साम्यवादी समाज से जुड़ी समस्याएं प्रधान समस्या थीं किंतु आंबेडकर ने इन सबसे अलग अछूत समस्या को प्रधान समस्या बनाया।
अछूत समस्या पर बातें करने ,पोजीशन लेने का अर्थ था अपने बंद विचारधारात्मक कैदघरों से बाहर आना। जो कुछ सोचा और समझा था उसे त्यागना। अछूत और उसकी समस्याओं पर संघर्ष का अर्थ है पहले के तयशुदा विचारधारात्मक आधार को त्यागना और अपने को नए रूप में तैयार करना। अछूत समस्या से संघर्ष किसी क्रांति के लिए किए गए संघर्ष से भी ज्यादा दुष्कर है। आधुनिककाल में क्रांति संभव है,आधुनिकता संभव है,औद्योगिक क्रांति संभव है किंतु आधुनिक काल में अछूत समस्या का समाधान तब ही संभव है जब मानवाधिकार के प्रकल्प को आधार बनाया जाय।
बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के बारे में रामविलास शर्मा ने जिस नजरिए से विचार किया है उसके आधार पर अस्मिता की राजनीति को समझने में हमें मदद मिल सकती है। इस प्रसंग में रामविलास शर्मा की'गाँधी,आम्बेडकर ,लोहिया और इतिहास की समस्याएँ' (2000) किताब बेहद महत्वपूर्ण है।
सामंतवाद,साम्राज्यवाद ,क्रांति,आधुनिकता,औद्योगिक क्रांति इन सबका आधार मानवाधिकार नहीं हैं। बल्कि किसी न किसी रूप में इनमें मानवाधिकारों का हनन होता है। अछूत समस्या मानवीय समस्या है इसके खिलाफ संघर्ष करने का अर्थ है स्वयं के खिलाफ संघर्ष करना और इससे हमारा बौध्दिकवर्ग, राजनीतिज्ञ और मध्यवर्ग भागता रहा है। ये वर्ग किसी भी चीज के लिए संघर्ष कर सकते हैं किंतु अछूत समस्या के लिए संघर्ष नहीं कर सकते। अछूत समस्या अभी भी मध्यवर्ग और पूंजीपतिवर्ग के चिन्तन को स्पर्श नहीं करती। अछूत समस्या को वे महज घटना के रूप में दर्शकीय भाव से देखते हैं। अछूत समस्या न तो घटना है और न परिघटना और न संवृत्ति ही है। बल्कि मानवीय समस्या है मानवाधिकार की समस्या है। मानवाधिकारों के विकास की समस्या है। हमारे समाज में मानवाधिकारों के विकास को लेकर जितनी जागृति पैदा होगी अछूत समस्या उतनी ही कम होती जाएगी। जिस समाज में मानवाधिकारों का अभाव होगा वहां पर अछूत समस्या,बहिष्कार की समस्या उतनी प्रबल रूप में नजर आएगी।
रामविलास शर्मा ने लिखा है '' भारत में वर्ग हैं, जाति बिरादरी हैं।दोनों यथार्थ हैं। परंतु वर्ग ऐसा य़थार्थ है जो जीवंत है,जो आगे बढ़ रहा है और जाति बिरादरी ऐसा यथार्थ है जो मर रहा है और पिछड़ रहा है। आम्बेडकर ने कहा थाः जब परिवर्तन आरंभ होता है,तब सदा पुराने पुराने और नए के बीच संघर्ष होता है। नए का समर्थन न किया जाए तो यह खतरा बना रहता है कि वह इस संघर्ष में निरस्त कर दिया जाएगा।"
रामविलास शर्मा ने आम्बेडकर की विश्वदृष्टि की खोज करते हुए रेखांकित किया कि उनके दृष्टिकोण का आधार वर्ग हैं।मजदूरवर्ग है। न कि जाति। उन्होंने लिखा है, " यदि इस समय अभ्युदयशील वर्गों का समर्थन न किया गया, जाति-बिरादरी का समर्थन किया गया, तो यह संभव है,जाति-बिरादरी बनी रहे और वर्गों की भूमिका पीछे छूट जाए। जाति-बिरादरी के भेद वर्गों के संगठन और वर्ग संघर्ष द्वारा ही संभव किए जा सकते हैं।आम्बेडकर ने कहा था,मजदूरवर्ग को मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा थाःमजदूरों को केवल अपने संघ कायम करने से संतोष नहीं करना चाहिए उन्हें घोषित करना चाहिए कि उनका उद्देश्य शासन-तंत्र पर अधिकार करना है।" दुखद बात यह है कि आम्बेडकर की वर्गीय दृष्टि की बजाय अस्मिता की राजनीति करने वालों ने जाति और वर्ण के बारे में लिखी बातों को अपना लिया है और बाकी सारी बातों को त्याग दिया है।
भारतीय समाज में शूद्र सिर्फ अछूत नहीं है। बल्कि गुमशुदा भी है। हम उसे कम से कम जानते हैं। हम उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं। उसका कम से कम वर्णन करते हैं। अछूतों के जीवन के व्यापक ब्यौरे तब ही आए जब हमें आधुनिककाल में ज्योतिबा फुले और आंबेडकर जैसे प्रतिभाशाली विचारक मिले। यह सोचने वाली चीज है कि आंबेडकर ने जाति व्यवस्था के मर्म का उद्धाटन करते हुए जितने विस्तार के साथ अछूतों की पीड़ा को सामने रखा और उससे मुक्त होने के लिए सामाजिक-राजनीतिक प्रयास आरंभ किए वैसे प्रयास पहले कभी नहीं हुए।
आधुनिककाल के पहले शूद्र हैं किंतु अनुपस्थित और अदृश्य हैं। जातिव्यवस्था है किंतु जातिव्यवस्था के अनुभव गायब हैं। जाति सिर्फ मनोवैज्ञानिक चीज नहीं है। उसका ठोस आर्थिक आधार है। जाति के ठोस आर्थिक आधार को बदले बगैर जाति की संरचनाओं को बदलना संभव नहीं है। संत और भक्त कवियों के यहां जाति एक मनोदशा के रूप में दाखिल होती है। मनोदशा के धरातल पर ही ईश्वर सबका था और सब ईश्वर के थे। भक्ति में भेदभाव नहीं था। भक्ति का सर्वोच्च रूप वह था जो मनसा भक्ति से जुड़ा था। वास्तविकता इसके एकदम विपरीत थी। ईश्वर और धर्म की सत्ता के वर्चस्व के कारण भेद और वैषम्य के सभी समाधान मनोदशा के धरातल पर ही तलाशे गए। मन में ही सामाजिक समस्याओं के समाधान तलाशे गए। सामाजिक यथार्थ से भक्त कवियों का लगाव एकदम नहीं था। यही वजह है कि वे जातिभेद के सामाजिक रूपों को देखने में असमर्थ रहे। इस कमजोरी के बावजूद भक्तकवियों ने जातिभेद के खिलाफ मनोदशा के स्तर पर संघर्ष करके कम से कम सामंजस्य का वातावरण तो बनाया। यह दीगर बात है कि सामंजस्य के पीछे वर्चस्वशाली वर्गों की हजम कर जाने की मंशा काम कर रही थी। उल्लेखनीय है सामंजस्य की बात तब उठती है जब अन्तर्विरोध हों, टकराव हो,तनाव हो। वरना सामंजस्य पर इतना जोर क्यों ?
अनेक विचारक वर्णभेद को नस्लभेद के रूप में चित्रित करते हैं। इस चित्रण को बड़े ही चलताऊ ढ़ंग से साहित्य में इस्तेंमाल किया जा रहा है। आम्बेडकर के नजरिए की पहली विशेषता है कि वे वर्णव्यवस्था को नस्लभेद के पैमाने से नहीं देखते।दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि आम्बेडकर की चिंतन-प्रक्रिया स्थिर या जड़ नहीं थी ,वे लगातार अपने विचारों का विकास करते हैं। विचारों की विकासशाल प्रक्रिया के दौरान ही हमें उस विकासशील सत्य के भी दर्शन होंगे जो वे बताना चाहते थे। आम्बेडकर के विचारों को निरंतरता या गतिशीलता के आधार पर पढ़ना चाहिए। आमतौर पर हम यह मानते हैं कि आर्य एक जाति थी,नस्ल थी। आमेहेडकर ने इस धारणा का खंडन किया है। आर्य एक समुदाय था। "आम्बेडकर ने लिखाः आर्य एक जन समुदाय का नाम है। जो चीज उन्हें आपस में बैंधे हुए थी,वह एक विशेष संस्कृति,जो आर्य संस्कृति कहलाती थी,को सुरक्षित रखने में उनकी दिलचस्पी थी। जो भी आर्य संस्कृति स्वीकार करता था,वह आर्य था।आर्य नाम की कोई नस्ल नहीं थी।" आम्बेडकर ने यह भी लिखा है कि " आर्यों में रंग संबंधी द्वेषभाव था जिससे उनकी समाज व्यवस्था निर्धारित हुई,यह बात निहायत बेसिर-पैर की है।यदि कोई ऐसा जन-समुदाय था जिसमें रंग सम्बन्धी द्वेषभाव का अभाव था तो वह आर्यों का समुदाय था और ऐसा इसलिए कि उनमें कोई ऐसा रंग प्रधान नहीं था जिससे वे अलग पहचाने जाते।"
भीमराव आम्बेडकर ने इस धारणा का भी खंडन किया है कि दस्यु लोग अनार्य थे।वे यह भी नहीं मानते कि आर्य भारत के बाहर से आए थे। वे यह भी मानते हैं कि शूद्र भी आर्य हुआ करते थे।
भीमराव आम्बेडकर ने सन् 1946 में 'शूद्र कौन थे ?' ( हू वेयर द शूद्राज ) नामक किताब लिखी। इस किताब में पश्चिमी विद्वानों की तमाम धारणाओं का उन्होंने खंडन किया। " आम्बेडकर ने इन विद्वानों की 7 मुख्य स्थापनाएँ प्रसुत की हैः 1. जिन लोगों ने वैदिक साहित्य रचा था, वे आर्य नस्ल के थे। 2. यह आर्य नस्ल बाहर से आई थी और उसने भारत पर आक्रमण किया था ।3. भारत के निवासी दास और दस्यु के रूप में जाने जाते थे और ये आर्यों से नस्ल के विचार से भिन्न थे।4. आर्य श्वेत नस्ल के थे, दास और दस्यु काली नस्ल के थे।5. आर्यों ने दासों और दस्युओं पर विजय प्राप्त की।6.दास और दस्यु विजित होने के बाद दास बना लिए गए और शूद्र कहलाए।7. आर्यों में रंगभेद की भावना थी और इसलिए उन्होंने चातुर्वर्ण्य का निर्माण किया। इसके द्वारा उन्होंने श्वेत नस्ल को काली नस्ल से, यथा दासों और दस्युओं से अलग किया। आगे आम्बेडकर ने इन सातों स्थापनाओं का खंडन किया।" इन सभी मतों का इन दिनों प्राच्यवादी पश्चिमी विचारक खूब प्रचार कर रहे हैं।इन विचारों से हिंदी लेखकों का एक तबका भी प्रभावित है।
रामविलास शर्मा ने सवाल उठाया है कि शूद्र अनार्य नहीं थे तो वे कौन थे ? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने आम्बेडकर के विचारों का निचोड़ पेश करते हुए लिखा है, " इस प्रश्न के उत्तर में आम्बेडकर की तीन स्थापनाएँ हैः (1) शूद्र आर्य थे।(2) शूद्र क्षत्रिय थे। (3) क्षत्रियों में शूद्र ऐसे महत्वपूर्ण वर्ग के थे कि प्राचीन आर्य समुदायों के कुछ सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली राजा शूद्र हुए थे।"
रामविलास शर्मा ने आम्बेडकर का मूल्यांकन करते हुए अनेक महत्वपूर्ण धारणाएं दी हैं। ये अवधारणाएं अनेक मामलों में आम्बेडकर के चिंतन से भिन्न मार्क्सवादी नजरिए को व्यक्त करती हैं। रामविलास शर्मा ने लिखा है, "आम्बेडकर के विचार से हिंदुओं का जो साहित्य पवित्र या धार्मक कहलाता है,वह प्रायःसबका सब ब्राह्मणों का रचा हुआ है।ब्राह्मण विद्वान् उसका आदर करें, यह स्वाभाविक है।उसी तरह अब्राह्मण विद्वान उसके प्रति आदर प्रकट न करें, यह भी स्वाभाविक है। यहाँ ब्राह्मण और अब्राह्मण का भेद करने के बदले पुरोहित और अपुरोहित का भेद करना उचित होगा। बहुत से ब्राह्मणों ने पुरोहित वर्ग के विरुद्ध साहित्य रचा है।इसके सिवा प्राचीन साहित्य का कुछ अंश क्षत्रियों का रचा हुआ भी है।और जो सबसे पवित्र ग्रंथ ऋग्वेद है,उसे रचने वाले सामंती व्यवस्था के ब्राह्मण थे,इसका कोई प्रमाण नहीं है। ब्राह्मण और क्षत्रिय जब अवकाशभोगी वर्ग बनते हैं,तब उत्पादन से उनका संबंध टूट जाता है। अपने से भिन्न श्रमिक वर्ग के बिना वे अवकाश में जीवन बिता नहीं सकते। ऋग्वेद में शूद्र शब्द केवल एक बार पुरूष सूक्त में आया है और वह सूक्त बाद में जोडा गया है,यह बहुत से लोगों की मान्यता है।यदि ऋग्वेद में शूद्र नहीं हैं, तो उस में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी नहीं हैं।"
रामविलास शर्मा इस धारणा का भी खंडन किया है कि साहित्य का उदभव किसी धार्मिक पाठ से हुआ है। वे मानते हैं कि साहित्य का उदभव लौकिक या सेक्युलर होता है। इस मिथ का भी खंडन किया है कि प्राचीनकाल में ब्राह्णणों की प्रधानता थी। उनका मानना है कि " भारयीय समाज में पहले क्षत्रियों की प्रधानता थी,ब्राह्मणों की नहीं,यह उस साहित्य से प्रमाणित होता है जिसे ब्राह्मणों का रचा हुआ माना जाता है।"
रामविलास शर्मा ने यह भी लिखा है कि रामायण,महाभारत के नायक क्षत्रिय माने गए हैं।किसी भी प्राचीन महाकाव्य का नायक ब्राह्मण नहीं है। यही नहीं, महाभारत में धर्म और ज्ञान का उपदेश देने वाले अब्राह्मण ही हैं। युधिष्ठिर को धर्म और राजनीति की बातें भीष्म समझाते हैं और अर्जुन को दर्शन और धर्म का ज्ञान कृष्ण देते हैं। महाभारत में एक प्रसिद्ध ब्राह्मण है द्रोणाचार्य। वह राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते हैं और युद्ध में सेनापति का कार्य करते हैं।इन कथाओं में शस्त्रयुक्त क्षत्रिय और शस्त्रविहीन ब्राह्मण वर्गों का अस्तित्व नहीं है।"
बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने शूद्रों के बारे में प्रचलित मतों का खंडन करते हुए लिखा "शूद्रों के लिए कहा जाता है कि वे अनार्य थे,आर्यों के शत्रु थे।आर्यों ने उन्हें जीता था और दास बना लिया। ऐसा था तो यजुर्वेद और अथर्ववेद के ऋषि शूद्रों के लिए गौरव की कामना क्यों करते हैं ? शूद्रों का अनुग्रह पाने की इच्छा प्रकट क्यों करते हैं ?शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो शूद्र सुदास् ऋग्वेद के मंत्रों के रचनाकार कैसे हुए ? शूद्रों के लिए कहा जाता है, उन्हें यज्ञ करने का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो सुदास् ने अश्वमेध कैसे किया ?शतपथ ब्राह्मण शूद्र को यज्ञकर्ता के रूप में कैसे प्रस्तुत करता है ? और उसे कैसे सम्बोधन करना चाहिए,इसके लिए शब्द भी बताता है।शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें उपनयन संस्कार का अधिकार नहीं है।यदि आरंभ में ऐसा था तो इस बारे में विवाद क्यों उठा ? बदरि और संस्कार गणपति क्यों कहते हैं कि उसे उपनयन का अधिकार है? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह संपत्ति संग्रह नहीं कर सकता।ऐसा था तो मैत्रायणी और कठक संहिताओं में धनी और समृद्ध शूद्रों उल्लेख कैसे है ? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह राज्य का पदाधिकारी नहीं हो सकता। ऐसा था तो महाभारत के राजाओं के मंत्री शूद्र थे,ऐसा क्यों कहा गया ? शूद्र के लिए कहा जाता है कि सेवक के रूप में तीनों वर्णों की सेवा करना उसका काम है। यदि ऐसा था तो शूद्र राजा कैसे हुए जैसा कि सुदास् के उदाहरण से,तथा सायण द्वारा दिए गए अन्य उदाहरणों से मालूम होता है।"
आधुनिकाल आने के बाद पहलीबार ईश्वर की विदाई होती है। धर्म के वैचारिक आवरण के बाहर पहलीबार मनुष्य झांकता है। उसे सारी दुनिया और अपनी परंपराएं, सामाजिक यथार्थ वास्तव रूप में दिखाई देता है और उसकी वास्तव रूप में ही अभिव्यक्ति भी करता है। आधुनिककाल में दुख पहले गद्य में अभिव्यक्त होता है। मध्यकाल में दुख पद्य में अभिव्यक्त होता है। दुख और अन्तर्विरोध की अभिव्यक्ति गद्य में हुई या पद्य में इससे भी दुख के संप्रेषण की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। मध्यकाल में मनुष्य अपने दुख और पिछडेपन के लिए भाग्य को दोष देता था,पुनर्जन्म के कर्मों को दोष देता था,ईश्वर की कृपा को दोषी ठहराता था। किंतु आधुनिक युग में मनुष्य को पहलीबार अपने दुख और कष्ट के कारण के तौर पर शिक्षा का अभाव सबसे बड़ी चीज नजर आती है। यही वजह है कि शूद्रों में सामाजिक समानता,उन्नति के मंत्र के तौर पर शिक्षा को प्राथमिक महत्व पहलीबार ज्योतिबा फुले ने दिया। सन् 1948 में पुणे में फुले ने एक पाठशाला खोली, यह शूद्रों की पहली पाठशाला थी। भारत के ढाई हजार साल के इतिहास में शूद्रों की यह पहली पाठशाला थी। असल में पाठशाला तो प्रतीकमात्र है उस आने वाले तूफान का जो ज्योतिबा फुले महसूस कर रहे थे।

सन् 1848 में शूद्रों की शिक्षा का आरंभ करके कितना बड़ा क्रांतिकारी कार्य किया था यह बात आज कोई नहीं समझ सकता। उस समय शूद्रों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिलते थे अत: ज्योतिबा फुले ने अपनी अशिक्षित पत्नी को सुशिक्षित कर अध्यापिका बना दिया। इस उदाहरण में अनेक अर्थ छिपे हैं। पहला अर्थ यह कि शूद्रों के साथ अतीत में सबकुछ अच्छा नहीं होता रहा है। भारत का अतीत जाति सामंजस्य की बजाय जातीय घृणा के आधार पर टिका हुआ था। जातीय घृणा के कारण शूद्रों के लिए स्वतंत्र शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ी। दूसरा अर्थ यह संप्रेषित होता है कि शूद्र सामाजिक तौर पर अति पिछडे थे। तीसरा अर्थ यह कि भारत में शूद्रों के पठन-पाठन की परंपरा ही नहीं थी। सामंजस्य और भक्ति के नाम पर सामाजिकभेदों से जुड़ी सभी चीजों को छिपाया हुआ था। यही वजह है कि शूद्रों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की शुरूआत की गई तो चारों ओर जबर्दस्त हंगामा हुआ।

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

अस्मिता,आम्बेडकर और रामविलास शर्मा


रामविलास शर्मा के लेखन में अस्मिता विमर्श को मार्क्सवादी नजरिए से देखा गया है। वे वर्गीय नजरिए से जातिप्रथा पर विचार करते हैं। आमतौर पर अस्मिता साहित्य पर जब भी बात होती है तो उस पर हमें बार-बार बाबासाहेब के विचारों का स्मरण आता है। दलित लेखक अपने तरीके से दलित अस्मिता की रक्षा के नाम बाबा साहेब के विचारों का प्रयोग करते हैं। दलित लेखकों ने जिन सवालों को उठाया है उन पर बड़ी ही शिद्दत के साथ विचार करने की आवश्यकता है। आम्बेडकर-ज्योतिबा फुले का महान योगदान है कि उन्होंने दलित को सामाजिक विमर्श और सामाजिक मुक्ति का प्रधान विषय बनाया।

अस्मिता विमर्श का एक छोर महाराष्ट्र के दलित आंदोलन और उसकी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से जुड़ा है ,दूसरा छोर यू.पी-बिहार की दलित राजनीति और सांस्कृतिक प्रक्रिया से जुड़ा है। अस्मिता विमर्श का तीसरा आयाम मासमीडिया और मासकल्चर के राष्ट्रव्यापी उभार से जुड़ा है। इन तीनों आयामों को मद्देनजर रखते हुए अस्मिता की राजनीति और अस्मिता साहित्य पर बहस करने की जरूरत है।

अस्मिता के सवाल आधुनिकयुग की देन हैं। आधुनिक युग के पहले अस्मिता की धारणा का जन्म नहीं होता। आधुनिककाल आने के साथ व्यक्तिगत को सामाजिक करने और अपने अतीत को जानने-खोजने का जो सिलसिला आरंभ हुआ उसने अस्मिता विमर्श को संभव बनाया।

अस्मिता राजनीति में विगत 150 सालों में व्यापक परिवर्तन हुए हैं।खासकर नव्य आर्थिक उदारीकरण और उपग्रह मीडिया प्रसारण आने बाद परिवर्तनों का सिलसिला तेज हुआ है। खासकर उत्तर आधुनिकतावाद आने के साथ सारी दुनिया में उत्तर आधुनिक अस्मिता की धारणा का तो बबंडर ही चल निकला।मसलन् अस्मिता निर्माण के उपरकरणों के रूप में मोबाइल,आई पोड,मर्दानगी आदि पर जमकर चर्चाएं हुई हैं।

उत्तर आधुनिकता के साथ आई अस्मिता ने सेल्फ (निज ) के तरल, विखंडित, विश्रृंखलित,अ-केन्द्रित, अवसादमय, वर्णशंकर, रूपों को जन्म दिया। उत्तर आधुनिक अस्मिता का अर्थ है तर्क,सत्य,प्रगति और सार्वभौम स्वतंत्रता वाले आधुनिक आख्यान का अंत। इन दिनों अस्मिता के छोटे छोटे आख्यान केन्द्र में आ गए हैं। स्त्री से लेकर दलित तक,भाषा से लेकर संस्कृति तक, साम्प्रदायिकता, पृथकतावाद, राष्ट्रवाद आदि तक अस्मिता की राजनीति का विमर्श फैला हुआ है।

आखिरकार आधुनिक युग में अछूत कैसे जीएंगे हम नहीं जानते थे। हम कबीर को जानते थे,रैदास को जानते थे। ये हमारे लिए कवि थे। साहित्यकार थे। संत थे। किंतु ये अछूत थे और इसके कारण इनका संसार भिन्न किस्म का था यह सब हम नहीं जानते थे। अछूत की खोज आधुनिकयुग की महानतम सामाजिक उपलब्धि है।

अछूत के उद्धाटन के बाद पहलीबार देश के विचारकों को पता चला वे भारत को कितना कम जानते हैं। भारत एक खोज को अछूत की खोज ने ढंक दिया। आज भारत एक खोज सिर्फ किताब है, सीरियल है,एक प्रधानमंत्री के द्वारा लिखी मूल्यवान किताब है। इस किताब में भी अछूत गायब है। उसका इतिहास और अस्तित्व गायब है। आंबेडकर ने भारत को सभ्यता की मीनारों पर चढ़कर नहीं देखा बल्कि शूद्र के आधार पर देखा। शूद्र के नजरिए से भारत के इतिहास को देखा, शूद्र की संस्कृतिहीन अवस्था के आधार पर खड़े होकर देखा। इसी अर्थ में आंबेडकर की अछूत की खोज आधुनिक भारत की सबसे मूल्यवान खोज है।

भारत एक खोज से सभ्यता विमर्श सामने आया,अछूत खोज ने परंपरा और इतिहास की असभ्य और बर्बरता की परतों को खोला। आंबेडकर इस अर्थ में सचमुच में बाबासाहेब हैं कि उन्होंने भारत के आधुनिक एजेण्डे के रूप में अछूत को प्रतिष्ठित किया। आधुनिक युग की सबसे जटिल समस्या के रूप में अछूत समस्या को पेश किया।

आधुनिकाल में किसी के लिए स्वाधीनता,किसी के लिए समाजसुधार, किसी के लिए औद्योगिक विकास , किसी के लिए क्रांति और साम्यवादी समाज से जुड़ी समस्याएं प्रधान समस्या थीं किंतु आंबेडकर ने इन सबसे अलग अछूत समस्या को प्रधान समस्या बनाया।

अछूत समस्या पर बातें करने ,पोजीशन लेने का अर्थ था अपने बंद विचारधारात्मक कैदघरों से बाहर आना। जो कुछ सोचा और समझा था उसे त्यागना। अछूत और उसकी समस्याओं पर संघर्ष का अर्थ है पहले के तयशुदा विचारधारात्मक आधार को त्यागना और अपने को नए रूप में तैयार करना। अछूत समस्या से संघर्ष किसी क्रांति के लिए किए गए संघर्ष से भी ज्यादा दुष्कर है। आधुनिककाल में क्रांति संभव है,आधुनिकता संभव है,औद्योगिक क्रांति संभव है किंतु आधुनिक काल में अछूत समस्या का समाधान तब ही संभव है जब मानवाधिकार के प्रकल्प को आधार बनाया जाए।

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के बारे में रामविलास शर्मा ने जिस नजरिए से विचार किया है उसके आधार पर अस्मिता की राजनीति को समझने में हमें मदद मिल सकती है। इस प्रसंग में रामविलास शर्मा की 'गाँधी,आम्बेडकर ,लोहिया और इतिहास की समस्याएँ' (2000) किताब बेहद महत्वपूर्ण है।

सामंतवाद,साम्राज्यवाद ,क्रांति,आधुनिकता,औद्योगिक क्रांति इन सबका आधार मानवाधिकार नहीं हैं। बल्कि किसी न किसी रूप में इनमें मानवाधिकारों का हनन होता है। अछूत समस्या मानवीय समस्या है इसके खिलाफ संघर्ष करने का अर्थ है स्वयं के खिलाफ संघर्ष करना और इससे हमारा बौध्दिकवर्ग, राजनीतिज्ञ और मध्यवर्ग भागता रहा है। ये वर्ग किसी भी चीज के लिए संघर्ष कर सकते हैं किंतु अछूत समस्या के लिए संघर्ष नहीं कर सकते। अछूत समस्या अभी भी मध्यवर्ग और पूंजीपतिवर्ग के चिन्तन को स्पर्श नहीं करती। अछूत समस्या को वे महज घटना के रूप में दर्शकीय भाव से देखते हैं। अछूत समस्या न तो घटना है और न परिघटना और न संवृत्ति ही है। बल्कि मानवीय समस्या है मानवाधिकार की समस्या है। मानवाधिकारों के विकास की समस्या है। हमारे समाज में मानवाधिकारों के विकास को लेकर जितनी जागृति पैदा होगी अछूत समस्या उतनी ही कम होती जाएगी। जिस समाज में मानवाधिकारों का अभाव होगा वहां पर अछूत समस्या,बहिष्कार की समस्या उतनी प्रबल रूप में नजर आएगी।

रामविलास शर्मा ने लिखा है '' भारत में वर्ग हैं, जाति बिरादरी हैं।दोनों यथार्थ हैं। परंतु वर्ग ऐसा य़थार्थ है जो जीवंत है,जो आगे बढ़ रहा है और जाति बिरादरी ऐसा यथार्थ है जो मर रहा है और पिछड़ रहा है। आम्बेडकर ने कहा थाः जब परिवर्तन आरंभ होता है,तब सदा पुराने पुराने और नए के बीच संघर्ष होता है। नए का समर्थन न किया जाए तो यह खतरा बना रहता है कि वह इस संघर्ष में निरस्त कर दिया जाएगा।"[1]

रामविलास शर्मा ने आम्बेडकर की विश्वदृष्टि की खोज करते हुए रेखांकित किया कि उनके दृष्टिकोण का आधार वर्ग हैं।मजदूरवर्ग है। न कि जाति। उन्होंने लिखा है, " यदि इस समय अभ्युदयशील वर्गों का समर्थन न किया गया, जाति-बिरादरी का समर्थन किया गया, तो यह संभव है,जाति-बिरादरी बनी रहे और वर्गों की भूमिका पीछे छूट जाए। जाति-बिरादरी के भेद वर्गों के संगठन और वर्ग संघर्ष द्वारा ही संभव किए जा सकते हैं।आम्बेडकर ने कहा था,मजदूरवर्ग को मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा थाःमजदूरों को केवल अपने संघ कायम करने से संतोष नहीं करना चाहिए उन्हें घोषित करना चाहिए कि उनका उद्देश्य शासन-तंत्र पर अधिकार करना है।"[2] दुखद बात यह है कि आम्बेडकर की वर्गीय दृष्टि की बजाय अस्मिता की राजनीति करने वालों ने जाति और वर्ण के बारे में लिखी बातों को अपना लिया है और बाकी सारी बातों को त्याग दिया है।

भारतीय समाज में शूद्र सिर्फ अछूत नहीं है। बल्कि गुमशुदा भी है। हम उसे कम से कम जानते हैं। हम उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं। उसका कम से कम वर्णन करते हैं। अछूतों के जीवन के व्यापक ब्यौरे तब ही आए जब हमें आधुनिककाल में ज्योतिबा फुले और आंबेडकर जैसे प्रतिभाशाली विचारक मिले। यह सोचने वाली चीज है कि आंबेडकर ने जाति व्यवस्था के मर्म का उद्धाटन करते हुए जितने विस्तार के साथ अछूतों की पीड़ा को सामने रखा और उससे मुक्त होने के लिए सामाजिक-राजनीतिक प्रयास आरंभ किए वैसे प्रयास पहले कभी नहीं हुए।

आधुनिककाल के पहले शूद्र हैं किंतु अनुपस्थित और अदृश्य हैं। जातिव्यवस्था है किंतु जातिव्यवस्था के अनुभव गायब हैं। जाति सिर्फ मनोवैज्ञानिक चीज नहीं है। उसका ठोस आर्थिक आधार है। जाति के ठोस आर्थिक आधार को बदले बगैर जाति की संरचनाओं को बदलना संभव नहीं है। संत और भक्त कवियों के यहां जाति एक मनोदशा के रूप में दाखिल होती है। मनोदशा के धरातल पर ही ईश्वर सबका था और सब ईश्वर के थे। भक्ति में भेदभाव नहीं था। भक्ति का सर्वोच्च रूप वह था जो मनसा भक्ति से जुड़ा था। वास्तविकता इसके एकदम विपरीत थी। ईश्वर और धर्म की सत्ता के वर्चस्व के कारण भेद और वैषम्य के सभी समाधान मनोदशा के धरातल पर ही तलाशे गए। मन में ही सामाजिक समस्याओं के समाधान तलाशे गए। सामाजिक यथार्थ से भक्त कवियों का लगाव एकदम नहीं था। यही वजह है कि वे जातिभेद के सामाजिक रूपों को देखने में असमर्थ रहे। इस कमजोरी के बावजूद भक्तकवियों ने जातिभेद के खिलाफ मनोदशा के स्तर पर संघर्ष करके कम से कम सामंजस्य का वातावरण तो बनाया। यह दीगर बात है कि सामंजस्य के पीछे वर्चस्वशाली वर्गों की हजम कर जाने की मंशा काम कर रही थी। उल्लेखनीय है सामंजस्य की बात तब उठती है जब अन्तर्विरोध हों, टकराव हो,तनाव हो। वरना सामंजस्य पर इतना जोर क्यों ?

अनेक विचारक वर्णभेद को नस्लभेद के रूप में चित्रित करते हैं। इस चित्रण को बड़े ही चलताऊ ढ़ंग से साहित्य में इस्तेंमाल किया जा रहा है। आम्बेडकर के नजरिए की पहली विशेषता है कि वे वर्णव्यवस्था को नस्लभेद के पैमाने से नहीं देखते।[3] दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि आम्बेडकर की चिंतन-प्रक्रिया स्थिर या जड़ नहीं थी ,वे लगातार अपने विचारों का विकास करते हैं। विचारों की विकासशाल प्रक्रिया के दौरान ही हमें उस विकासशील सत्य के भी दर्शन होंगे जो वे बताना चाहते थे। आम्बेडकर के विचारों को निरंतरता या गतिशीलता के आधार पर पढ़ना चाहिए। आमतौर पर हम यह मानते हैं कि आर्य एक जाति थी,नस्ल थी। आमेहेडकर ने इस धारणा का खंडन किया है। आर्य एक समुदाय था। "आम्बेडकर ने लिखाः आर्य एक जन समुदाय का नाम है। जो चीज उन्हें आपस में बैंधे हुए थी,वह एक विशेष संस्कृति,जो आर्य संस्कृति कहलाती थी,को सुरक्षित रखने में उनकी दिलचस्पी थी। जो भी आर्य संस्कृति स्वीकार करता था,वह आर्य था।आर्य नाम की कोई नस्ल नहीं थी।"[4] आम्बेडकर ने यह भी लिखा है कि " आर्यों में रंग संबंधी द्वेषभाव था जिससे उनकी समाज व्यवस्था निर्धारित हुई,यह बात निहायत बेसिर-पैर की है।यदि कोई ऐसा जन-समुदाय था जिसमें रंग सम्बन्धी द्वेषभाव का अभाव था तो वह आर्यों का समुदाय था और ऐसा इसलिए कि उनमें कोई ऐसा रंग प्रधान नहीं था जिससे वे अलग पहचाने जाते।"[5]

भीमराव आम्बेडकर ने इस धारणा का भी खंडन किया है कि दस्यु लोग अनार्य थे।[6] वे यह भी नहीं मानते कि आर्य भारत के बाहर से आए थे। वे यह भी मानते हैं कि शूद्र भी आर्य हुआ करते थे।

भीमराव आम्बेडकर ने सन् 1946 में 'शूद्र कौन थे ?' ( हू वेयर द शूद्राज ) नामक किताब लिखी। इस किताब में पश्चिमी विद्वानों की तमाम धारणाओं का उन्होंने खंडन किया। " आम्बेडकर ने इन विद्वानों की 7 मुख्य स्थापनाएँ प्रसुत की हैः 1. जिन लोगों ने वैदिक साहित्य रचा था, वे आर्य नस्ल के थे। 2. यह आर्य नस्ल बाहर से आई थी और उसने भारत पर आक्रमण किया था ।3. भारत के निवासी दास और दस्यु के रूप में जाने जाते थे और ये आर्यों से नस्ल के विचार से भिन्न थे।4. आर्य श्वेत नस्ल के थे, दास और दस्यु काली नस्ल के थे।5. आर्यों ने दासों और दस्युओं पर विजय प्राप्त की।6.दास और दस्यु विजित होने के बाद दास बना लिए गए और शूद्र कहलाए।7. आर्यों में रंगभेद की भावना थी और इसलिए उन्होंने चातुर्वर्ण्य का निर्माण किया। इसके द्वारा उन्होंने श्वेत नस्ल को काली नस्ल से, यथा दासों और दस्युओं से अलग किया। आगे आम्बेडकर ने इन सातों स्थापनाओं का खंडन किया।"[7] इन सभी मतों का इन दिनों प्राच्यवादी पश्चिमी विचारक खूब प्रचार कर रहे हैं।इन विचारों से हिंदी लेखकों का एक तबका भी प्रभावित है।

रामविलास शर्मा ने सवाल उठाया है कि शूद्र अनार्य नहीं थे तो वे कौन थे ? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने आम्बेडकर के विचारों का निचोड़ पेश करते हुए लिखा है, " इस प्रश्न के उत्तर में आम्बेडकर की तीन स्थापनाएँ हैः (1) शूद्र आर्य थे।(2) शूद्र क्षत्रिय थे। (3) क्षत्रियों में शूद्र ऐसे महत्वपूर्ण वर्ग के थे कि प्राचीन आर्य समुदायों के कुछ सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली राजा शूद्र हुए थे।"[8]

रामविलास शर्मा ने आम्बेडकर का मूल्यांकन करते हुए अनेक महत्वपूर्ण धारणाएं दी हैं। ये अवधारणाएं अनेक मामलों में आम्बेडकर के चिंतन से भिन्न मार्क्सवादी नजरिए को व्यक्त करती हैं। रामविलास शर्मा ने लिखा है, " आम्बेडकर के विचार से हिंदुओं का जो साहित्य पवित्र या धार्मक कहलाता है,वह प्रायःसबका सब ब्राह्मणों का रचा हुआ है।ब्राह्मण विद्वान् उसका आदर करें, यह स्वाभाविक है।उसी तरह अब्राह्मण विद्वान उसके प्रति आदर प्रकट न करें, यह भी स्वाभाविक है। यहाँ ब्राह्मण और अब्राह्मण का भेद करने के बदले पुरोहित और अपुरोहित का भेद करना उचित होगा। बहुत से ब्राह्मणों ने पुरोहित वर्ग के विरुद्ध साहित्य रचा है।इसके सिवा प्राचीन साहित्य का कुछ अंश क्षत्रियों का रचा हुआ भी है।और जो सबसे पवित्र ग्रंथ ऋग्वेद है,उसे रचने वाले सामंती व्यवस्था के ब्राह्मण थे,इसका कोई प्रमाण नहीं है। ब्राह्मण और क्षत्रिय जब अवकाशभोगी वर्ग बनते हैं,तब उत्पादन से उनका संबंध टूट जाता है। अपने से भिन्न श्रमिक वर्ग के बिना वे अवकाश में जीवन बिता नहीं सकते। ऋग्वेद में शूद्र शब्द केवल एक बार पुरूष सूक्त में आया है और वह सूक्त बाद में जोडा गया है,यह बहुत से लोगों की मान्यता है।यदि ऋग्वेद में शूद्र नहीं हैं, तो उस में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी नहीं हैं।"[9]

रामविलास शर्मा इस धारणा का भी खंडन किया है कि साहित्य का उदभव किसी धार्मिक पाठ से हुआ है। वे मानते हैं कि साहित्य का उदभव लौकिक या सेक्युलर होता है। इस मिथ का भी खंडन किया है कि प्राचीनकाल में ब्राह्णणों की प्रधानता थी। उनका मानना है कि " भारयीय समाज में पहले क्षत्रियों की प्रधानता थी,ब्राह्मणों की नहीं,यह उस साहित्य से प्रमाणित होता है जिसे ब्राह्मणों का रचा हुआ माना जाता है।" [10]

रामविलास शर्मा ने यह भी लिखा है कि रामायण,महाभारत के नायक क्षत्रिय माने गए हैं।किसी भी प्राचीन महाकाव्य का नायक ब्राह्मण नहीं है। यही नहीं, महाभारत में धर्म और ज्ञान का उपदेश देने वाले अब्राह्मण ही हैं। युधिष्ठिर को धर्म और राजनीति की बातें भीष्म समझाते हैं और अर्जुन को दर्शन और धर्म का ज्ञान कृष्ण देते हैं। महाभारत में एक प्रसिद्ध ब्राह्मण है द्रोणाचार्य। वह राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते हैं और युद्ध में सेनापति का कार्य करते हैं।इन कथाओं में शस्त्रयुक्त क्षत्रिय और शस्त्रविहीन ब्राह्मण वर्गों का अस्तित्व नहीं है।"[11]

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने शूद्रों के बारे में प्रचलित मतों का खंडन करते हुए लिखा "शूद्रों के लिए कहा जाता है कि वे अनार्य थे,आर्यों के शत्रु थे।आर्यों ने उन्हें जीता था और दास बना लिया। ऐसा था तो यजुर्वेद और अथर्ववेद के ऋषि शूद्रों के लिए गौरव की कामना क्यों करते हैं ? शूद्रों का अनुग्रह पाने की इच्छा प्रकट क्यों करते हैं ?शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो शूद्र सुदास् ऋग्वेद के मंत्रों के रचनाकार कैसे हुए ? शूद्रों के लिए कहा जाता है, उन्हें यज्ञ करने का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो सुदास् ने अश्वमेध कैसे किया ?शतपथ ब्राह्मण शूद्र को यज्ञकर्ता के रूप में कैसे प्रस्तुत करता है ? और उसे कैसे सम्बोधन करना चाहिए,इसके लिए शब्द भी बताता है।शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें उपनयन संस्कार का अधिकार नहीं है।यदि आरंभ में ऐसा था तो इस बारे में विवाद क्यों उठा ? बदरि और संस्कार गणपति क्यों कहते हैं कि उसे उपनयन का अधिकार है? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह संपत्ति संग्रह नहीं कर सकता।ऐसा था तो मैत्रायणी और कठक संहिताओं में धनी और समृद्ध शूद्रों उल्लेख कैसे है ? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह राज्य का पदाधिकारी नहीं हो सकता। ऐसा था तो महाभारत के राजाओं के मंत्री शूद्र थे,ऐसा क्यों कहा गया ? शूद्र के लिए कहा जाता है कि सेवक के रूप में तीनों वर्णों की सेवा करना उसका काम है। यदि ऐसा था तो शूद्र राजा कैसे हुए जैसा कि सुदास् के उदाहरण से,तथा सायण द्वारा दिए गए अन्य उदाहरणों से मालूम होता है।"[12]

आधुनिकाल आने के बाद पहलीबार ईश्वर की विदाई होती है। धर्म के वैचारिक आवरण के बाहर पहलीबार मनुष्य झांकता है। उसे सारी दुनिया और अपनी परंपराएं, सामाजिक यथार्थ वास्तव रूप में दिखाई देता है और उसकी वास्तव रूप में ही अभिव्यक्ति भी करता है। आधुनिककाल में दुख पहले गद्य में अभिव्यक्त होता है। मध्यकाल में दुख पद्य में अभिव्यक्त होता है। दुख और अन्तर्विरोध की अभिव्यक्ति गद्य में हुई या पद्य में इससे भी दुख के संप्रेषण की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। मध्यकाल में मनुष्य अपने दुख और पिछडेपन के लिए भाग्य को दोष देता था,पुनर्जन्म के कर्मों को दोष देता था,ईश्वर की कृपा को दोषी ठहराता था। किंतु आधुनिक युग में मनुष्य को पहलीबार अपने दुख और कष्ट के कारण के तौर पर शिक्षा का अभाव सबसे बड़ी चीज नजर आती है। यही वजह है कि शूद्रों में सामाजिक समानता,उन्नति के मंत्र के तौर पर शिक्षा को प्राथमिक महत्व पहलीबार ज्योतिबा फुले ने दिया। सन् 1948 में पुणे में फुले ने एक पाठशाला खोली, यह शूद्रों की पहली पाठशाला थी। भारत के ढाई हजार साल के इतिहास में शूद्रों की यह पहली पाठशाला थी। असल में पाठशाला तो प्रतीकमात्र है उस आने वाले तूफान का जो ज्योतिबा फुले महसूस कर रहे थे।

सन् 1848 में शूद्रों की शिक्षा का आरंभ करके कितना बड़ा क्रांतिकारी कार्य किया था यह बात आज कोई नहीं समझ सकता। उस समय शूद्रों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिलते थे अत: ज्योतिबा फुले ने अपनी अशिक्षित पत्नी को सुशिक्षित कर अध्यापिका बना दिया। इस उदाहरण में अनेक अर्थ छिपे हैं। पहला अर्थ यह कि शूद्रों के साथ अतीत में सबकुछ अच्छा नहीं होता रहा है। भारत का अतीत जाति सामंजस्य की बजाय जातीय घृणा के आधार पर टिका हुआ था। जातीय घृणा के कारण शूद्रों के लिए स्वतंत्र शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ी। दूसरा अर्थ यह संप्रेषित होता है कि शूद्र सामाजिक तौर पर अति पिछडे थे। तीसरा अर्थ यह कि भारत में शूद्रों के पठन-पाठन की परंपरा ही नहीं थी। सामंजस्य और भक्ति के नाम पर सामाजिकभेदों से जुड़ी सभी चीजों को छिपाया हुआ था। यही वजह है कि शूद्रों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की शुरूआत की गई तो चारों ओर जबर्दस्त हंगामा हुआ।

आधुनिककाल में पहलीबार शूद्रों को यह बात समझाने में ज्योतिबा फुले को सफलता मिली कि मनुष्य के अस्तित्व की पहचान शिक्षा से होती है। शिक्षा के अभाव में मनुष्य पशु समान होता है। शूद्रों के लिए शिक्षा का अर्थ वही नहीं था जो सवर्णों के लिए था। शूद्रों के लिए शिक्षा अस्तित्वरक्षा, स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और आत्मोध्दार के साथ अस्मिता की स्थापना का उपकरण भी थी। यही वजह है कि शिक्षा का शूद्रों में जितना प्रसार हुआ है अस्मिता की राजनीति का भी उतना ही प्रसार हुआ है।

ज्योतिबाफुले -आंबेडकर के द्वारा शुरू की गई अस्मिता की राजनीति विदेश से लायी गई चीज नहीं है। साम्राज्यवादी साजिश का अंग नहीं है। बल्कि यह तो भारत के संतुलित विकास के परिप्रेक्ष्य के गर्भ से उपजी राजनीति है। इसका आयातित अस्मिता की मौजूदा राजनीति के साथ तुलना करना सही नहीं होगा। शूद्रों की शिक्षा का लक्ष्य था, सामाजिक भेदभाव को खत्म करना, मानवाधिकारों के प्रति सचेतनता पैदा करना और समानता को व्यापक मूल्य के रूप में स्थापित करना।

आम्बेडकर ने अछूत के रूप में जिन जातियों को रखा उनका चयन अंग्रेजों ने किया था।सन् 1935 के कानून में उन जातियों की सूची बना दी गयी जिनको अनुसूचित जातियां कहा जाता है। इस तरह के वर्गीकरण पर रामविलास शर्मा ने लिखा है "अछूत हमेसा अचूत बने रहें,यह स्थिति अंग्रेज पक्की कर रहे थे।"[13] अछूतप्रथा से हिंदुओं को आर्थिक लाभ था और यह धर्म पर आधारित थी। आम्बेडकर का मानना था कि हिंदू सामाजिक गठन की विशेषता है और वह अन्य सभी जन समुदायों से हिन्दुओं को अलग करती है।[14]

अछूत समस्या हमारे देश में कई हजार सालों से है। किंतु इसके खिलाफ कभी सामाजिक आंदोलन नहीं हुए। आखिरकार क्या कारण है कि भारत में विगत ढाई हजार सालों में कभी क्रांति नहीं हुई ? क्या अछूत समस्या को खत्म किए बगैर क्रांति संभव है ? क्या वजह है कि आधुनिककाल में ही अछूत समस्या के खिलाफ सामाजिक आंदोलन संभव हो पाया ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में जातिभेद खत्म हो सकता है ? इन सभी सवालों का एक-दूसरे के साथ गहरा संबंध है।

भारत में जातिव्यवस्था के खिलाफ क्रांति अथवा सामाजिक क्रांति न हो पाने के तीन प्रधान कारण हैं , पहला ,अंधविश्वासों में आस्था,दूसरा ,पुनर्जन्म की धारणा में विश्वास और तीसरा ,कर्मफल के सिध्दान्त के प्रति विश्वास। इन तीन विचारधारात्मक बाधाओं के कारण भारत में सामाजिक क्रांति नहीं हो पायी। अंधविश्वासों में आस्था के कारण हमने कभी जातिभेद क्यों है ? गरीब गरीब क्यों है और अमीर अमीर क्यों है ? क्या पीपल के पेड़ को पूजने से मनोकामना पूरी होती है ? क्या साहित्य में जो रूढ़ियां चलन में हैं वे वास्तव में भी हैं ? इत्यादि चीजों को यथार्थ में कभी परखा नहीं। हम यही मानकर चलते रहे हैं कि मनुष्य गरीब इसलिए है क्योंकि पहले जन्म में कभी बुरे कर्म किए थे। उसका ही फल है कि इस जन्म में गरीब है। अमीर इसलिए अमीर है क्योंकि वह पहले जन्म में पुण्य करके आया है।

अच्छे कर्म करोगे अच्छे घर में जन्म लोगे। बुरे कर्म करोगे नीच कुल में जन्म होगा। निचली जाति में उन्हीं लोगों का जन्म होता है जिन्होंने पहले बुरे कर्म किए थे। निचली जातियों को नरक के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया और एक नए किस्म के प्रचार अभियान की शुरूआत हुई। इससे जातिभेद को वैधता मिली। कर्मफल के सिध्दान्त की सबसे बड़ी किताब है श्रीमद्भगवतगीता इसके आधार पर कर्मफल के सिध्दान्त को खूब प्रचारित किया गया। कर्म किए जा फल की चिन्ता मत कर। उल्लेखनीय है गीता को आदर्श दार्शनिक किताब के रूप में तिलक से लेकर गांधी तक सभी ने प्रधानदर्जा दिया था। गीता आज भी मध्यवर्ग की आदर्श किताब है।

उल्लेखनीय है कि बाबासाहेब आंबेडकर ने जातिप्रथा को इन तीनों विचारधारात्मक बाधाओं के दायरे बाहर निकालकर पेश किया। संभवत: बाबासाहेब अकेले बड़े स्वाधीनतासेनानी थे जिनकी कर्मफल के सिध्दान्त,पुनर्जन्म और अंधविश्वासों में आस्था नहीं थी। यदि इन तीनों चीजों में आस्था रही होती तो अछूत समस्या को राष्ट्रीय समस्या बनाना संभव ही न होता। कहने का तात्पर्य यह है अछूत समस्या से मुक्ति के लिए, जातिप्रथा से मुक्ति के लिए चार प्रमुख कार्य किए जाने चाहिए।

पहला- अंधविश्वासों के खिलाफ जंग।

दूसरा- पुनर्जन्म की धारणा के खिलाफ जनजागरण।

तीसरा- कर्मफल के सिध्दान्त के खिलाफ सचेतनता।

चौथा- अछूत जातियों के साथ रोटी-बेटी के संबंध और पक्की दोस्ती।

ये चारों कार्यभार एक-दूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। इनमें से किसी एक को भी त्यागना संभव नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है शिक्षा ,नौकरी अथवा आरक्षण मात्र से अछूत समस्या का समाधान संभव नहीं है। अछूत समस्या को खत्म करने के लिए आमलोगों में खासकर दलितों में विज्ञानसम्मत चेतना का प्रसार करना बेहद जरूरी है। विज्ञानसम्मतचेतना के अभाव में दलित हमेशा दलित रहेगा। उसकी दलितचेतना से मुक्ति नहीं होगी। जातिभेद कभी खत्म नहीं होगा। हमें इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि हमारी शिक्षा हमें कितना विज्ञानसम्मत विवेक देती है ? सच यही है कि हमारी शिक्षा में कूपमंडूकता कूटकूटकर भरी पड़ी है। पैंतीस साल के शासन के वाबजूद पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था में से कूपमंडूकता को पूरी तरह विदा नहीं कर पाए हैं।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जातिप्रथा एक तरह का पुराने किस्म का सामाजिक अलगाव है। जातिप्रथा को आज नष्ट करने के लिए सामाजिक अलगाव को नष्ट करना बेहद जरूरी है। सामाजिक अलगाव आज के दौर में व्यापक शक्ल में सामने आया है। हम एक-दूसरे के दुख-सुख में साझीदार नहीं बनते। कभी एक-दूसरे के बारे में खबर-सुध नहीं लेते। यही सामाजिक अलगाव पहले जातियों में भी था। खासकर निचली कही जाने वाली जातियों के प्रति सामाजिक अलगाव यकायक पैदा नहीं हुआ। बल्कि इसे पैदा होने में सैंकड़ों साल लगे। सामाजिक अलगाव को अब हमने वैधता प्रदान कर दी है। सामाजिक अलगाव को हम स्वाभाविक मानने लगे हैं। नए युग की विशेषता मानने लगे हैं। नए आधुनिक जीवन संबंधों की अनिवार्य परिणति मानने लगे हैं। सामाजिक अलगाव की अवस्था में जातिभेद और जातिघृणा बढ़ेगी। क्योंकि सामाजिक अलगाव से जातिघृणा को ऊर्जा मिलती है। यह अचानक नहीं है कि सन् 1970 के बाद के वर्षों में पूंजीवादी विकास जितना तेज गति से हुआ है। सामाजिक अलगाव में भी इजाफा हुआ है। जाति संगठनों में भी इजाफा हुआ है। जातिघृणा और जाति संघर्ष बढ़े हैं। जातिघृणा,जातिसंघर्ष और जातिगत तनाव तब ही पैदा होते हैं जब हम अलगाव की अवस्था में होते हैं।

सामाजिक अलगाव पूंजीवादी विकास की स्वाभाविक परिणति है ,इसका सचेत रूप से प्रतिवाद किया जाना चाहिए। अचेत रूप से सामाजिक अलगाव को स्वीकार लेने का अर्थ है आपसी अलगाव में इजाफा। अलगाव खत्म होगा तो संगठन की महत्ताा भी समझ में आती है। सामाजिक शिरकत,सामाजिक साझेदारी, व्यक्तिगत और सामाजिक भावनात्मक विनिमय और आर्थिक सहयोग ये चीजें जितनी बढ़ेंगी उतनी ही भेद की दीवार गिरेगी।

हमें सोचना चाहिए आरक्षण किया,संविधान में संरक्षण दिया, तमाम किस्म के कानून बनाए,सभी दल इन कानूनों के प्रति वचनबध्द हैं,इसके बावजूद जाति उत्पीड़न थमने का नाम नहीं लेरहा। एससी,एसटी का अलगाव कम नहीं हो रहा। उनकी असुरक्षा की भावना कम नहीं हो रही। इस प्रसंग में पश्चिम बंगाल के उदाहरण से समझाना चाहूँगा।यहां पर जातियाँ हैं। जातिभेद भी है। किंतु निचले स्तर पर कम्युनिस्ट पार्टियों के संगठनों का तंत्र इस कदर फैला हुआ है कि आप उसकी परिधि के बाहर जा नहीं सकते। यह तंत्र सामाजिक संपर्क,सामाजिक संबंध और आपसी भाईचारा बनाए रखने और विनिमय का काम करता है। इसका सुफल यह निकला है कि आमलोगों में अभी शिरकत और सहयोग का भाव बचा हुआ है। वे एक-दूसरे के सुख-दुख में सहयोग करते हैं। यही वजह है पश्चिम बंगाल में जातिगत तनाव और जाति संघर्ष नहीं हैं।

जबकि सच यह है आरक्षण यहां कम लागू हुआ है। राजनीति में दलितों का नहीं सवर्णों का बोलवाला है। इसके बावजूद जातिसंघर्ष नहीं हैं। यथासंभव निचली जातियों को जमीन का हिस्सा भी मिला है। संगठन के कारण उनकी आवाज सुनी भी जाती है। इसके कारण उत्पीडन करने की हिम्मत नहीं होती। आंबेडकर ने स्वयं संगठन को महत्ता दी थी, संगठन के तौर पर आदर्श सांगठनिक संरचना कम्युनिस्टों के पास है। मुश्किल यहां से शुरू होती है। कम्युनिस्ट कतारें अभी भी उपरोक्त तीन विचारधारात्मक बाधाओं को नष्ट नहीं कर पायी हैं। अभी भी कम्युनिस्ट कतारों में अंधविश्वासों में आस्था रखने वाले, पुनर्जन्म में विश्वास करने वाले,कर्मफल के सिध्दान्त में विश्वास करने वाले बचे हुए हैं। किंतु इनकी संख्या में तुलनात्मक तौर पर गिरावट आयी है।

किंतु एक चीज जरूर हुई है कि जातिभेद का जितना प्रत्यक्ष तांडव देश के अन्य इलाकों में नजर आता है वैसा यहां नजर नहीं आता। इसका प्रधान कारण है सामाजिक रूप से कम्युनिस्ट संगठनों का सामाजिक संरचनाओं में घुलामिला रहना। आंबेडकर के इस विचार को कि जातिप्रथा को नष्ट करने के लिए जरूरी है कि शूद्रों और गैर शूद्रों में रोटी-बेटी के संबंध हों। यही चीज कमोबेश पश्चिम बंगाल में लागू करने में वामपंथियों को सफलता मिली है। इस अर्थ में वे इस राज्य में सामाजिक क्रांति में एककदम आगे जा पाए हैं। दूसरी बात यह है कि दलितों पर उत्पीडन की घटनाएं इस राज्य में कम से कम होती हैं। यदि कभी दलित उत्पीड़न की कोई घटना प्रकाश में आती है तो प्रशासन से लेकर राजनीतिक स्तर तक ,यहां तक कि मध्यवर्गीय कतारों में भी उसके खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया होती है। यह इस बात का संकेत है कि सामाजिक संवेदनशीलता अभी बची हुई है। अन्य राज्यों में स्थिति बेहद खराब है।

जिस राज्य में दलित मुख्यमंत्री हो,दलित पार्टी का शासन हो,वहां दलित उत्पीडन की घटनाएं रोजमर्रा की बात हो गयी हैं। इन घटनाओं के प्रति आम जनता में संवेदनशीलता कहीं पर भी नजर नहीं आती। क्योंकि उन राज्यों में सामाजिक अलगाव को कम करने का कोई भी प्रयास राजनीतिक दल नहीं करते। बल्कि राजनीतिक लाभ और क्षुद्र सांगठनिक लाभ हेतु सामाजिक अलगाव का इस्तेमाल करते हैं।

एक वाक्य में कहें तो उत्तरप्रदेश,बिहार आदि राज्यों में जातिदलों ने सामाजिक अलगाव को अपनी राजनीतिक पूंजी में तब्दील कर दिया है। वे सामाजिक अलगाव का निहितस्वार्थी लक्ष्यों को अर्जित करने के लिए दुरूपयोग कर रहे हैं। इससे जातिसंघर्ष बढ़े हैं। सामाजिक असुरक्षा बढ़ी है। सामाजिक अस्थिरता बढ़ी है। अछूत समस्या बढ़ी है। अछूत समस्या को खत्म करने के लिए सामाजिक अलगाव को खत्म करना बेहद जरूरी है। सामाजिक अलगाव का राजनीतिक दुरूपयोग बंद करना जरूरी है।

दलित का राजनीतिक दुरूपयोग सामाजिक टकराव और तनावों को बनाए रखता है और विगत साठ सालों में हमारे विभिन्न राजनीतिक दलों ने दलित समस्या के समाधान के नाम पर यही किया है। उनके लिए दलित मनुष्य नहीं है बल्कि वोट है। एक अमूर्त पहचान है। बेजान चीज है। सत्ताा का स्रोत है। यही दलित की आयरनी भी है। अब हम दलित को मनुष्य के तौर पर नहीं वोटबैंक के तौर पर जानते हैं। आरक्षण के नाम से जानते हैं। वोटबैंक और आरक्षण में दलित की पहचान का रूपान्तरण दलित को वर्चुअल बना देता है। दलित का वर्चुअल बनना मूलत: मध्यकाल में लौटना है। वर्चुअल बनने के बाद दलित और भी दुर्लभ हो गया है। हमें दलित को वर्चुअल होने से बचाना होगा। दलित के वर्चुअल बनने का अर्थ है वह है भी और नहीं भी। वर्चुअल दलित मायावती जैसे नेताओं की पूंजी है। ये दोनों एक-दूसरे के चौखटे में फिट बैठते हैं। मायावती के यहां दलित वर्चुअल है। ठोस हाड़मांस का इन्सान नहीं है। यही वजह है दलित की किसी भी समस्या को ठोस रूप में मायावती अपने चुनावी घोषणापत्र में व्यक्त नहीं करती। बल्कि यह कहना सही होगा कि मायावती स्वयं वर्चुअल है। उसने कोई भी ठोस चुनावी घोषणापत्र भी जारी नहीं किया। यही हाल दलितों के मसीहा लालू-मुलायम का है। ये दलितों के हैं और दलितों के नहीं भी हैं। दलित इनके यहां वर्चुअल है और दलित के लिए ये वर्चुअल हैं। कहने का तात्पर्य यह है दलित को वर्चुअल होने से बचाना होगा। दलित के वर्चुअल होने का अर्थ है दलित का लोप । यह एक तरह से बेहद त्रासद और भयावह है।





































मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

10 अक्टूबर रामविलास शर्मा के जन्मदिन पर विशेष - अस्मिता,आत्मकथा , हिन्दी जाति और रामविलास शर्मा (3 ) समापन किश्त



जीवनी –“ निराला की साहित्य साधना” तीन खण्डों में है। पहले खंड़ में व्यक्तित्व विवेचन है। दूसरे में उनकी विचारधारा और कला का विवेचन है और तीसरे खंड में उनके जीवन और साहित्य से संबंधित सामग्री और पत्र हैं। प्रकाशन वर्ष है सन् 1969। रामविलास शर्मा ने पहले खंड में लिखा है, “ यह पुस्तक मुख्यतः उनके साहित्य की आलोचना नहीं है। निराला के पारिवारिक,सामाजिक परिवेश से ,उस युग की सांस्कृतिक परिस्थितियों से, उनके जीवन के बाह्य रूपों के साथ उनके अन्तर्जगत् से पाठकों को परिचित कराना मेरा उद्देश्य है।”

समूची जीवनी धारावाहिक रूप में विकसित होती है और रामविलास शर्मा ने बड़े ही कौशल के साथ व्यक्तिगत को सामाजिक और सामाजिक को व्यक्तिगत में रूपान्तरित होते हुए दिखाया है। लेखक के अंतर्मन और सामाजिक अभिव्यक्ति के रूपों में सामंजस्य बिठाने की कोशिश की है। इस क्रम वे निराला को निज जगत से बाहर निकालते हैं। देसी ठाट, अनुभूतियां, गुण-अवगुण, मनोदशा,वातावरण,जनसमुदाय के बीच में रखकर निराला के व्यक्तित्व का वर्णन करते हैं।



निराला की जीवनी को पाठक आराम से नहीं पढ़ सकता। यह जीवनी विचलित, उद्वेलित और उत्तेजित करती है। इसमें समाज,राजनीति,आचरण और मूल्य आदि के क्षेत्र में चल रहे संघर्षों और अन्तर्विरोधों का चित्रण है। इससे निराला का भी अन्तर्विरोधी व्यक्तित्व उभरकर सामने आया है। साथ ही स्वयं रामविलास शर्मा का व्यक्तित्व और नजरिया भी इसमें घुलमिलकर सामने आया है। इसमें “मंशा” की अवधारणा का इस्तेमाल किया गया है और “ईमानदार मंशा” पर ध्यान दिया है। इसके अलावा निराला के “प्रेरक” तत्वों को भी रेखांकित किया है।

रामविलास शर्मा ने जीवनी के प्रधान चारों तत्वों स्वायत्तता,आत्मानुभूति,प्रामाणिकता और व्यक्तित्वान्तरण का इस्तेमाल किया है। यह किताब आख्यान शैली में लिखी है। इस क्रम में निराला के बारे में प्रचलित किस्से, कहानियों और वृत्तान्तों का व्यापक रूप में इस्तेमाल किया है। इससे उनके जीवन में पाठक की दिलचस्पी बनी रहती है। असल में किसी के बहाने व्यक्तित्व को प्रस्तुत करने की कला रोमैंटिक आत्म उदघाटन की कला है। फलतःनिराला के इर्द-गिर्द का वैविध्य भी जीवनी में चला आया है।

जीवनीकार जब किसी व्यक्ति का उदघाटन किसी घटना अथवा अन्य के बहाने करता है तो जीवनीकार स्वयं को घटना से दूर कर लेता है,साथ ही लेखक की वस्तुगत भूमिका को भी सामने लाता है। इस क्रम में लेखक के व्यक्तित्व निर्माण में ‘चंद’ लोगों की भूमिका और उसके चारों ओर के वैविध्यमय संसार को पेश करते हुए विभिन्न साहित्य संबंधी अवधारणाओं,सामाजिक व्यवस्था और आंदोलनों की सटीक व्याख्या पेश करता है इससे अनेक धारणाएं बनतीं हैं। जब व्यक्तित्व विवेचन के बहाने अवधारणाओं का निर्माण किया जाता है तो जाने-अनजाने परिस्थितियों और अवधारणाओं की सीमाएं भी व्यक्त हो जाती हैं। यह भी तय हो जाता है कि आप सच बोल रहे हैं। फलतःआप कल्पना से सत्य को अलगाने में सफल हो जाते हैं।

रामविलास शर्मा ने निराला पर लिखते समय व्यक्तिवाद और मानवतावाद को कॉमनसेंस के आधार पर उभारा है। इसके कारण वे निराला की जीवनी को अन्तहीन विस्तार देते हैं। कॉमनसेंस के आधार पर जीवनी लिखी जाएगी तो उसे अंतहीन विस्तार दिया जा सकता है।

“निराला की साहित्य साधना” का आरंभ 1857 के जिक्र के साथ होता है। उस समय बैसवाड़ा के लोग कैसे थे, उस इलाके के लोगों का स्वभाव कैसा था,निराला के पूर्वज कैसे थे,कैसे ये लोग माइग्रेट करके पश्चिम बंगाल आए,निराला का जन्म कैसे हुआ और किस तरह उनके बहाने बंगाल,भारत,बैसवाड़ा,हिन्द साहित्य,समाजवादीचेतना, किसान आंदोलन, स्वाधीनता आंदोलन,गांधी, नेहरू,निराला के आसपास के लोग,रिश्तेदार-नातेदार, छायावाद, निराला के समकालीन छायावादी कवि,प्रगतिवाद,कविता का शिल्प,सौंदर्य, स्थापत्य, कहानीकला, वेदान्त,अवचेतन आदि अनेक विषयों को विस्तार के साथ व्याख्यायित किया है।

व्यक्तित्व विवेचन का यह अंतहीन रूप है। जो व्यक्तित्व विवेचन को असहज बनाता है। इस क्रम में निराला का व्यक्तित्व विवेचन कम और अन्यचीजों का विवेचन ज्यादा हुआ है। इससे यह भी पता चलता है कि जीवनीकार की निराला के व्यक्तित्व से ज्यादा अन्य चीजों के बारे में ज्यादा दिलचस्पी है। रामविलास शर्मा ने यह भी बताने की कोशिश की है वे संबंधित विषयों के प्रामाणिक जानकार हैं। उन्हें निराला के बारे में प्रामाणिक और वस्तुगत जानकारी है। इस समूची प्रक्रिया में निराला की जीवनी के अंशों पर कम और उनके वातावरण संबंधित विवादों और साहित्य संबंधी नजरिए पर ज्यादा ध्यान गया है। निराला के युग विवेचन को ज्यादा स्थान मिला है। निराला के जीवन के निजी ब्यौरे कम स्थान घेरते हैं और अन्य के ब्यौरे और विवरण ज्यादा स्थान घेरते हैं।अनेक स्थानों पर रामविलास शर्मा स्वयं की समझ को सही और निराला की समझ को गलत ठहराते हैं।

निराला पर लिखते समय वे घटनाओं का वर्णन करते जाते हैं,घटनाओं के वर्णन के दौरान उनके द्वारा जो विवरण और ब्यौरे दिए गए हैं वह लेखक के ऐतिहासिक क्षण,उससे जुड़े व्यक्तियों,विवाद,किंवदन्तियों आदि के सहारे निराला का आख्यान निर्मित करते हैं। इस क्रम में अनेक स्थानों पर रामविलास शर्मा अपने नजरिए का इजहार करने लगते हैं।वे स्वयं समस्या को किस तरह देखते हैं उसको प्रस्तुत करते हैं।

“निराला की साहित्य साधना” के बहाने रामविलास शर्मा ने निराला की खोज के साथ अपने नजरिए की खोज की है। वह जो पद्धति अपनाते हैं वह दो रूपों में सामने आती है , इसमें एक ओर निराला है और वे हैं ,तो दूसरी ओर अन्य लोग हैं। अनेक स्थानों पर निराला और अन्य एक साथ हैं और निराला दूसरी ओर हैं। आमतौर पर यह सारी प्रक्रिया किसी न किसी मसले पर विवाद के दौरान घटित होती है।

रामविलास शर्मा ने निराला के व्यक्तित्व विवेचन के दौरान उन्हें हमेशा ऐतिहासिकता के पैमाने से बांधकर रखा है। वह निराला का ऐतिहासिक पैराडाइम से विचलन नहीं होने देते। निराला के आत्म को ऐतिहासिकता के खूंटे से बांधकर रखते हैं। इसके कारण कई जगहों पर चीजों की पुनरावृत्ति हुई है।

निराला की बातों को रामविलास शर्मा जब उद्धृत करते हैं तो निराला के पक्ष को मजबूत करने के इरादे से ऐसा करते हैं साथ ही जो लोग निराला पर हमला कर रहे थे उनकी काट पेश करते हैं।इस प्रक्रिया में पुरानी घटनाओं और साहित्यिक-राजनीतिक प्रवृत्तियों की नई व्याख्याओं को जन्म देते हैं।

हिंदी संस्कृति और जाति -

रामविलास शर्मा ने रैनेसां का जो महाख्यान निर्मित किया है उसमें दो चीजें प्रमुख हैं पहला है 'अनुमानाधारित ज्ञान 'और दूसरा है 'तर्क की एकता'। अनुमानाधारित तर्कशास्त्र के आधार पर निर्मित हिन्दी जाति का सारा तर्कशास्त्र रचा है।यह उत्तर आधुनिक तर्कप्रणाली है। उत्तर आधुनिक तर्कप्रणाली अनुमानाधारित ज्ञान पर आधारित है। वे अपने अनुमानों को स्थापित करने के लिए हिंदी जाति के महाख्यान को निर्मित करते हैं। इस चक्कर में वे उसे 'सत्य' बनाकर पेश करते हैं। हिंदी जाति का स्वायत्त विमर्श निर्मित करते हैं। इसमें 1960 के आसपास पैदा हुई भाषावार राज्यों के गठन की राजनीतिक तात्कालिकता अभिव्यंजित होती है। इसमें हिन्दी जाति की वैधता सिद्ध करने का भावबोध भी काम कर रहा है जो अनेक नए विवादास्पद संदर्भों को खोलता है। इस क्रम में रामविलास शर्मा भाषा और समाज,हिन्दीभाषा-भाषीक्षेत्र की बोलियों और भाषाओं के बारे में एक सुंदर काल्पनिक भाषायीखेल तैयार करते हैं और इस भाषाखेल के जरिए हिंदी जाति की धारणा को वैध ठहराने की कोशिश करते हैं। वे भाषा के साथ वस्तुओं,संस्कृति आदि को जोड़कर पेश करते हैं। भाषा के साथ ऑब्जेक्ट को पेश करने का यह उत्तर आधुनिक तरीका है, इसे बहुत सारे लोग मार्क्सवादी तरीका समझने की भूल करते हैं।

रामविलास शर्मा इसके बहाने राज्यों के गठन के बारे में अनेक ऐसी बातें भी उठाते हैं जो अव्यावहारिक हैं। उनके हिंदी विमर्श ने असल में हिंदी में 'स्पेकुलेटिव' आदर्शवाद की नींव रखी जिस पर खड़े होकर हिंदी के अधिकांश आलोचकों ने जो कुछ भी लिखा वो अंततः उत्तर आधुनिक विमर्श की कोटि में आता है।

मजेदार बात है कि रामविलास शर्मा और उनके अनुयायी यह मानने को तैयार नहीं है कि वे उत्तर आधुनिक हो गए हैं या हिंदी जाति का विमर्श उत्तर आधुनिक विमर्श है। उलटे रामविलास शर्मा और उनके अनुयायियों ने उत्तर आधुनिकता पर अतार्किक हमले किए हैं। असल में आलोचकों का एक समूह हिंदी जाति के विमर्श के नाम पर आलोचना में अपनी जगह बनाने का प्रयास करता रहा है। इस क्रम में रामविलास शर्मा यांत्रिक ढ़ंग से स्टालिन के भाषा पर आधारित जाति और जातीयता की अवधारणा का अनुकरण करते हैं और हिंदी जाति के प्रकल्प को एक मार्क्सवादी प्रकल्प के रूप में पेश करते हैं जो कम से कम और कुछ हो मार्क्सवादी प्रकल्प नहीं है। यह विशुद्ध भाववादी प्रकल्प है। इस क्रम में रामविलास शर्मा ने जो पद्धति अपनायी है वह बेहद खतरनाक और आकर्षक है। वे भाषा और विचार के अन्तस्संबंध को तो मानते हैं लेकिन विचार और उसके तर्कशास्त्र के विकास की ऐतिहासिकता को नहीं देखते। मसलन् जाति का विचार या चेतना बंगाल में जैसी है वैसी ही हिंदीभाषीक्षेत्र में नहीं है। अथवा यों भी कह सकते हैं कि विचार के सामाजिक आधार के साथ उसे जोड़कर ही नहीं देखते। समाजवाद का अर्थ सारे देश के लिए एक ही नहीं सारे विश्व के लिए किताबी तौर पर एक है ,लेकिन वास्तव अर्थों में विचार और यथार्थ के बीच के अन्तस्संबंध को देखना चाहिए।

मसलन कोई विचार कब आता है, किस प्रक्रिया में आता है,किन सामाजिक वर्गों और किस संदर्भ में अपना विकास करता है। एक ही विचार विभिन्न संदर्भ में अपनी सत्ता और महत्ता एक जैसी नहीं बनाए रख सकता। वे विचार के साथ जुड़े ऐतिहासिक-सांस्कृतिक भेद पैदा करने वाले कारकों को नोटिस ही नहीं लेते। वे हेगेल की तरह महज 'तर्क'(रीजन) का सहारा लेते हैं और हिंदी जाति को सिद्ध करते हैं। यहां तक कि भाषाभेद में भी ऐतिहासिक- सांस्कृतिक कारणों के कारण भेद या अंतर आता है उसे भी नहीं देखते और हर चीज 'तर्क ' से सिद्ध करते हैं। इस चक्कर में हिंदी जाति के विचार को महाविचार,महाख्यान और साहित्य की महाप्रस्तुति बना देते हैं। उसे एबसोल्युट की हद तक विकसित करते हैं और बाकी काम उनके भक्तों ने कर दिया है। यानी हिंदी जाति का विचार परमविचार बन जाता है। इसमें सभी किस्म के कल्पनाजीवी हिंदीसाधक शामिल हो सकते हैं।

हिन्दी में वाम से लेकर दक्षिण तक 'संस्कृति' एक विषय के रूप में बड़ा परिदृश्य घेरे हुए है। व्यक्ति को समग्र संस्कृति के आवयविक अंग के रूप में देखा गया है।इसी क्रम में हिन्दी संस्कृति के विशिष्ट रूपों और अधिकारों की ओर भी ध्यान खींचने की कोशिश की गयी है। फलतः वाम से लेकर हिन्दुत्व तक संस्कृति एक राजनीतिक विचारधारा की शक्ल अख्तियार कर लेती है। हिन्दुत्ववादी हिन्दू संस्कृति के श्रेष्ठत्व पर जोर दे रहे हैं तो वाम विचारक जातीय संस्कृति पर जोर दे रहे हैं और उदारवादी लेखक, सांस्कृतिक बहुलतावाद पर जोर दे रहे हैं।

सांस्कृतिक बहुलतावाद को वाम से लेकर दक्षिण तक सभी रंगत के लेखक मानते हैं और अपनी अपनी संस्कृति का जयगान करते हैं। बहुलतावादी संस्कृति के नजरिए से एकमत लोग यह भी कह रहे हैं कि जहां तक कोई भी संस्कृति अपने क्षेत्र में सक्रिय रहती है उसकी स्वायत्तता की रक्षा की जानी चाहिए। इस प्रक्रिया में जो इमिग्रेंट हैं उनसे कहा जा रहा है कि वे इलाके की संस्कृति में घुलमिल जाएं। अपनी संस्कृति को भूल जाएं। अथवा लौटकर अपनी जन्मभूमि की ओर चले जाएं। मूलबात यह है संस्कृति की इस राजनीति में किसी न किसी रूप में राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता शामिल रहती है । मजेदार बात यह है कि देशज या जातीयसंस्कृति पर जोर देने के कारण जाने-अनजाने हम संस्कृतिवाद की कैद में चले गए हैं।

संस्कृति के राजनीति के केन्द्र में आने के कारण हिन्दू संस्कृति बनाम बहुलतावादी संस्कृति, बहुलतावाद बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, इस्लामिक संस्कृति बनाम बोलने-लिखने की आजादी,मराठी बनाम हिन्दीभाषी आदि के सवाल विवाद में आते रहे हैं। मकबूल फिदा हुसैन और सलमान रूशदी के संदर्भ में चली बहसों में यह भी कहा गया है कि अभिव्यक्ति की आजादी से ज्यादा महत्वपूर्ण है हिन्दू संस्कृति और इस्लामिक संस्कृति । इस क्रम में संस्कृति और धर्म को स्थानीय और अभिव्यक्ति की आजादी को विजातीय अवधारणा कहा गया।इस तरह की धारणाओं को सत्ता का भी सहयोग मिला है। यहां तक कि उन लोगों को कानूनी संरक्षण तक दिया गया है। इसके समानान्तर वामदलों ने स्थानीयतावादी संस्कृति के पल्लवन के नाम पर सबसे पिछड़ी मान्यताओं और मूल्यों को स्थापित करने या स्वीकृत करने की मांग की है। हिन्दी संस्कृति और हिन्दी जातीयता इसी अर्थ में एक खतरनाक प्रस्थान बिंदु है।

वाम के सांस्कृतिक दबाब का आलम यह है कि कलकत्ता का नाम बदलकर कोलकाता कर दिया गया। यह मूलतः संस्कृतिवाद है इसका ही एक अन्य रूप है जिसके तहत तस्लीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल से तत्कालीन राज्य सरकार ने निकाल दिया बाद में कांग्रेस ने उसे दिल्ली से भगा दिया।दुख की बात यह है कि सलमान रूशदी के सैटेनिक वर्शेज से लेकर तस्लीमा के निष्कासन तक मौटे तौर पर वाम और उदार दोनों ही किस्म के राजनीतिकदलों की नीति को संस्कृति हांक रही है। यह मूलतः संस्कृतिवाद है और संस्कृतिवाद सामाजिक विभाजन को और भी बढ़ाता है।

इसी तरह जब आप हिन्दी जाति की बात करते हैं और उसकी पहचान को स्थापित करने की कोशिश करते हैं तो इससे मूलतः राज्यविभाजन की वैचारिक प्रक्रियाओं को मदद मिलती है। हिन्दी में हिन्दीजाति,हिन्दी संस्कृति और हिन्दी जातीयता की बहस जितनी ज्यादा हुई उसने हिन्दीभाषी राज्यों में विभाजन को वैचारिक मदद प्रदान की है। विभाजन का आधार बनाया है। यह भी कह सकते हैं इस बहस का बाई-प्रोडक्ट है सामाजिक विभाजन और हिन्दी राज्यों का विभाजन।

हिंदीजाति की धारणा मूलतःएक प्रतिक्रियावादी अवधारणा है। हिंदी समीक्षकों का बड़ा हिस्सा इसकी प्रगतिशील व्याख्याएं करता रहा है। हिंदी में इस धारणा का सांस्कृतिक श्रेष्ठत्व को स्थापित करने के भावबोध के साथ इस्तेमाल होता रहा है। संस्कृति का आधार जब राष्ट्रीयता,राष्ट्रवाद और धर्म को बनाएंगे तो इससे विभाजन बढ़ेगा और ये तीनों एक-दूसरे के साथ अंतर्क्रियाएं करते हैं। मसलन् जो हिंदी जाति के पक्षधर हैं वे जाति(नेशनेलिटी) के श्रेष्ठत्व पर जोर देते हैं।

जातीयता का श्रेष्ठत्व सबसे खतरनाक राजनीतिक तत्व है। हिंदीजाति के विचार को रामविलास शर्मा साहित्य के सुपीरियर विचार के रूप में प्रचारित करते हैं। सतह पर हिन्दीजाति का विचार बड़ा ही हार्मलेस लगता है लेकिन बुनियादी तौर पर बेहद खतरनाक और विभाजनकारी विचार है। नेशनेलटी को आधार बनाकर जब भी बात की जाएगी उसकी वैचारिक परिणति संस्कृतिवाद और सामाजिक विभाजन की ओर ले जाएगी। यह एक खास भाषा(खड़ी बोली हिन्दी) की उन्नति, क्षमता,सामाजिक दायरे और श्रेष्ठत्व के दर्प में डूबा विचार है। यह आधुनिक राजनीति की एंटीथीसिस है। साहित्य में इस विचार में सभी को अपने अंदर समाहित कर लेने और खड़ीबोली हिंदी के मातहत कर लेने का विचार काम करता रहा है। हिंदीजाति के विचार के तहत हमारी समीक्षा के एक बड़े हिस्से ने रैनेसां से लेकर सार्वभौमवाद तक के सभी विषयों को समाहित करके आधुनिक विमर्श में एक विलक्षण अवरोध पैदा किया है जिसमें से तब ही निकल सकते हैं जब हिंदी जाति और हिंदी संस्कृति को मानें। इनको माने बिना कोई आलोचना नहीं लिखी जा रही। इससे आलोचना में लोकतंत्र खत्म हो गया है। आलोचना में हिंदीजाति और हिंदी संस्कृति की बात करने वाले श्रेष्ठ और इससे बाहर के लोग निकृष्ट मान लिए गए हैं।

हिंदीजाति और हिंदी संस्कृति की अवधारणा का मूलतः स्त्री,दलित और भाषायी वैविध्य और समानता का विरोध है। इसमें वर्चस्व का भाव है। हाशिए के लोगों और विषयों के लिए इसमें कोई जगह नहीं है। यह अचानक नहीं है कि हिंदीजाति की अवधारणा पर जिनलोगों ने सबसे ज्यादा काम किया है उन्होंने स्त्रीसाहित्य और दलित साहित्य की अवधारणाओं के प्रति दोयमदर्जे का व्यवहार किया है या उसकी उपेक्षा की है। हिन्दीजाति के पक्षधरों के द्वारा बार बार हिन्दीजाति की मुक्ति में ही सामाजिक मुक्ति को खोजने की कोशिश की गयी है। सभी सांस्कृतिक समस्याओं के समाधान उसमें खोजने की कोशिश की गई है। इस प्रक्रिया में खड़ीबोली हिंदी के साथ हिन्दीभाषी क्षेत्र की अन्य भाषाओं और बोलियों का साहित्य र इन भाषाओं के साथ समान व्यवहार के सवाल हाशिए पर भी नजर नहीं आते। हिन्दीभाषीक्षेत्र की बोलियों भाषाओं का खड़ीबोली हिंदी के साथ अन्तर्विरोध तेज हुआ है। हिन्दीभाषी प्रान्तों का विभाजन हुआ है और इसके कारण नए प्रांतों में खड़ीबोली हिंदी की जगह स्थानीय भाषा और बोलियों को प्राथमिकता दी जा रही है।नए बने राज्यों उत्तराखंड,झारखंड और छत्तीससगढ़ में प्रधान सरकारी भाषा के रूप में खड़ीबोली की जगह लोकल भाषाओं को वरीयता मिली है।

दूसरी ओर हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति के नाम पर संस्कृति के पुराने और पिछड़े रूपों को बनाए रखने की कोशिशें भी हुई हैं। इसके लिए परंपरा और पुरानी संस्कृति की प्रामाणिकता को खासतौर पर उभारा गया है। यह अजीब संयोग है वाम समीक्षकों के एक समूह ने विगत 40-45 सालों में हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति को उभारा, वहीं दूसरी ओर समाज की सबसे प्रतिक्रियावादी विचारधारा के रूप में हिन्दुत्ववादी और जातिवादी राजनीति और संस्कृति का उभार पैदा हुआ। वामपंथी हिंदीजातिधर्मी आलोचकों ने हिंदीजाति की अवधारणा से हिन्दुत्व और जातिवाद को धोने की काफी कोशिश की लेकिन वे असफल रहे। इसका प्रधान कारण है कि वे समझने में असमर्थ रहे कि हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति जिस विचारधारा के आधार पर खड़ी है वह आधार हिन्दुत्व और जातिवादी राजनीति का भी है। वे एकही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों ने अपने अपने तरीके से संस्कृति के अंधलोकवाद की हिमायत की है। दोनों ही अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा करते हैं।दोनों में लोकतंत्र और समानता के लिए कोई जगह नहीं है। दोनों ही भाषायी और सांस्कृतिक समानता के विरोधी हैं। दोनों ही अपने राजनतिक वैचारिक बंधनों में बंधे हैं और दोनों में विकास की कोई संभावना नहीं है। दोनों ने जिस तरह की राजनीति,संस्कृति,धर्म,विचारधारा आदि की हिमायत की है उसके कारण इनकी कोई प्रसंगिकता नहीं है। ये चीजें वोट की राजनीति के कारण उठती रही हैं।

हिंदीजाति और हिदी संस्कृति के सवालों को आलोचना में जिन लोगों ने प्रतिष्ठित किया है वे आलोचना में राजनीतिक विचारधारात्मक वैविध्य या यों कहें वैविध्यपूर्ण समीक्षा के विषय पेश करने में असमर्थ रहे हैं। मसलन् रैनेसां पर जितना लिखा गया है उतना अन्य किसी विषय पर नहीं लिखा गया। नवजागरण,हिन्दीजाति,हिंदी संस्कृति,हिंदी जातीयता,साम्प्रदायिकता,क्षेत्रवाद आदि एक ही विषयक्षेत्र है जिस पर अधिकांश आलोचना लिखी गयी है। इस समूची प्रक्रिया में विभिन्न किस्म की राजनीतिक अवधारणाओं और यूटोपियाओं की ओर कभी ध्यान ही नहीं गया।

हिंदीजाति और हिंदी संस्कृतिपंथी आलोचकों की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वे अन्य साहित्यरूपों और साहित्यांदोलनों के बारे में आज तक कोई नया विवेचन पेश नहीं कर पाए हैं। कुंजी और नोट्स मार्का विवेचनों के जरिए हमने अन्य प्रवृत्तियों को सिलटाने की कोशिश की है। मसलन् प्रयोगवाद से लेकर स्त्रीसाहित्य,दलित साहित्य से लेकर दलित राजनीति तक का सारा क्षेत्र अछूता पड़ा है। इन सभी क्षेत्रों के बारे में वामपंथी आलोचना चुप है।

हम अगर गंभीरता से सोचें तो आज हमारे सामने संस्कृति और साहित्य के गंभीर सवाल आ खड़े हुए हैं लेकिन हमारे पास उनका कोई संतोषजनक विश्लेषण तक नहीं है। साहित्यिक-राजनीतिक समस्याओं का समाधान हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति के फ्रेमवर्क में खोजने की कोशिशें की जा रही हैं। हिंदीजाति की अवधारणा हमारी सामयिक राजनीतिक,सांस्कृतिक समस्याओं का समाधान पेश नहीं करती बल्कि यह तो आलोचना की पलायनवादी प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति है।

हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति वस्तुतः फेक या कृत्रिम धारणा है। इसका वास्तव जगत से कोई संबंध नहीं है। यह एक ऐसे यूटोपिया पर आधारित है जिसका भौतिक आधार नहीं है। यह एक ऐसी आइडेंटिटी की हिमायत करती है जो विभाजनकारी है। यह संस्कृति को क्षेत्रविशेष से जोड़कर देखती है।

संस्कृति को राजनीतिकक्षेत्र के साथ बांधकर नहीं देखा जा सकता।इसके आधार पर हिंदीजाति और हिंदीभाषाभाषी राज्यों के बीच के अन्तस्संबंध पर अतिरिक्त जोर दिया गया। उन्हें हिंदीसंस्कृति की वायवीय अवधारणा से बांधने की असफल कोशिश की गयी है। हिंदी को एक सांस्कृतिक अस्मिता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। इस क्रम में देश के विभिन्न इलाकों में जातिवाद ,क्षेत्रवाद और धर्म के नाम सामाजिक समूहों को संगठित करने के प्रयासों की अनदेखी की गयी। संस्कृति के नाम पर संगठित हो रहे समूहों की अनदेखी की गयी।

वाम आलोचना ने बहुलतावादी संस्कृतिवाद को खूब हवा दी है और रामविलास शर्मा भी हवा देने वालों में प्रमुख हैं। ब्रिटिश दार्शनिक ब्रायन बेरी ने लिखा है कि बहुलतावादी संस्कृतिवाद ने खास सामाजिक हितों के प्रसार को हवा दी है। यह एक तरह से सामाजिक विभाजन की फूट डालो और राज करो की यथास्थितिवादी राजनीति है। यह वंचितों को और भी वंचित बनाने वाली राजनीति है। यह वंचितों की साझा समस्याओं जैसे बेकारी, गरीब,निम्नस्तरीय जीवनशैली,रोटी,कपड़ा,मकान,शिक्षा,स्वास्थ्य,चिकित्सा आदि से ध्यान हटाती है।

हम गंभीरता से विचार करें और सोचें कि राज्यों के विभाजन या पुनर्गठन की मांग क्या सचमुच में यथार्थवादी मांग है ? क्या इस तरह की मांगें समाज की बुनियादी साझा समस्याओं के समाधान की ओर ले जाती हैं ? आखिरकार इनदिनों ही राज्यों के विभाजन या पुनर्गठन की मांगों पर ध्यान क्यों दिया जा रहा है ? इसी तरह इनदिनों जातियों की दशा सुधारने या दलितों और अल्पसंख्यकों की दशा सुधारने के कार्यक्रमों पर ढिंढोरची तरह हल्ला क्यों बोला जा रहा है। यह सारा खेल बहुलतावादी संस्कृतिवाद के फ्रेमवर्क में चल रहा है। वोटरों को भी इन्हीं आधारों पर वाम से लेकर दक्षिणपंथी दलों तक भरमाने की कोशिश कर रहे हैं।

देश में इनदिनों वंचितों और अभावग्रस्तों को धर्म,संस्कृति और अस्मिता के सवालों के आधार पर संगठित किया जा रहा है। जाहिरा तौर पर इससे सामाजिक विभाजन और बढ़ेगा और ठोस राजनीतिक सवालों की अनदेखी भी बढ़ेगी।

हिंदी में संस्कृतिवाद का रूप है हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति । इसके प्रचारक खासकिस्म के सरलीकरण से काम लेते रहे हैं। पहलीबात इन दो धारणाओं के संदर्भ में यह कि ये दोनों धारणाएं सार्वभौम मानवाधिकारों को नहीं मानतीं। सार्वभौम मानवाधिकार की धारणा मानने का अर्थ है संस्कृति विशेष की हिमायत को छोड़ना होगा। क्योंकि सार्वभौम मानवाधिकार की धारणा वस्तुतःसंस्कृतिविशेष के आधार से परे ले जाती है। हिंदीवाला किंतु हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति को त्यागने के लिए तैयार नहीं है। यह अचानक नहीं है कि रामविलासशर्मा ने हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति पर खूब लिखा है कि लेकिन सार्वभौम मानवाधिकारों की धारणा को वे नहीं उठाते और यह सारी दुनिया में वामपंथी बुद्धिजीवियों की समस्या है।

हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति की अवधारणा के नाम पर प्रचलित संस्कृतिवाद और मार्क्सवाद में एक चीज साझा हैं। दोनों का मानना है वंचित-पीड़ित हमेशा सही होते हैं। इस आधार पर वे कहते हैं कि वंचित-पीड़ित को अपने दमन-उत्पीड़न से मुक्त होने का अधिकार है। अतः इनकी सांस्कृतिक मान्यताएं भी सही हैं। वे कभी ठंड़े दिमाग से यह सोचने की कोशिश नहीं करते कि वे जिन सांस्कृतिक मान्यताओं को उठा रहे हैं वे सही और न्यायपूर्ण हैं ? वे जिन सांस्कृतिक रूपों को मानते हैं वे क्या सही हैं ? इस तरह वे ‘मजदूरवर्ग’ को ‘वंचित’ , ‘उत्पीडित’ या ‘दलित’ के नाम से अपदस्थ करना चाहते हैं। मुक्ति या मूलगामी सामाजिक परिवर्तन को संस्कृतिवाद,हिंदजाति और हिंद संस्कृति के जरिए अपदस्थ करना चाहते हैं। यह असलमें मार्क्सवाद का एकदम विलोम है, यह वाम राजनीति का भी विलोम है।

हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति के प्रचारक एक ओर अधिनायकवादी राजनीति का विरोध करते हैं वहीं दूसरी ओर साम्राज्यवाद विरोध और वि-उपनिवेशीकरण की तेजी से वकालत करते हैं। यह फिनोमिना रामविलास शर्मा के लेखन में भी है। लंबे समय से इस थ्योरी के आधार पर लिखा जा रहा है। संकट उसके बाद आरंभ होता है जब फंडामेंटलिस्ट हिन्दुत्ववादी और इस्लामिस्ट भी इसी एजेण्डे पर सक्रिय होते हैं। वे भी साम्राज्यवादविरोधी वि-उपनिवेशीकरण को अपना लक्ष्य बनाते हैं। दोनों में साझा तत्व है संस्कृति। दोनों संस्कृति के आधार पर ही विरोध करते हैं। रोचक बात यह है वाम ने बहुलतावादी संस्कृतिवाद को तरजीह दी और फंडामेंटलिस्टों ने संस्कृति विशेष को तरजीह दी।

इन दोनों के नजरिए में वाम के यहां संस्कृति ज्यादा है ,जबकि फंडामेंटलिस्टों के यहां संस्कृति कम है। ये दोनों ही व्यक्ति को इस आधार पर अस्मिता प्रदान करते हैं। इसके आधार पर व्यक्ति के अधिकारों को परिभाषित करते हैं और उन अधिकारों के संरक्षण के बारे में बात करते हैं। मजेदार पहलू यह है कि फंडामेंटलिस्टों के लिए संस्कृति निर्धारक तत्व है ,जबकि वाम के लिए संस्कृति निर्धारक नहीं आर्थिक-सामाजिक कारण निर्धारक तत्व हैं। वाम के लिए संस्कृति फालतू चीज है। वाम के लिए सांस्कृतिक संगठन गौण और वर्गीय संगठन प्रधान हैं।








10 अक्टूबर रामविलास शर्मा के जन्मदिन पर विशेष - अस्मिता,आत्मकथा , हिन्दी जाति और रामविलास शर्मा (2)

आत्मकथा का पद्धतिशास्त्र- 

इन दिनों अस्मिता साहित्य के कई रूप प्रचलन में इन तमाम प्रवृत्तियों का बहुराष्ट्रीय बुर्जुआ विचारधारा से गहरा संबंध है। नई अस्मिता संस्कृति आमलोगों में 'निजी संतुष्टि' की भावना पैदा कर रही है। आम लोगों से कहा जा रहा है 'निजी संतुष्टि' पर ध्यान दें। 'निजी संतुष्टि' की भावना ने नागरिकबोध और नागरिकचेतना को कमजोर बनाया है।' निजी संतुष्टि' के नाम पर उपभोक्ता की स्वतंत्रता की बातें कही जा रही हैं। 

'निजी संतुष्टि' पर आधारित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर साहित्य में इनदिनों आत्मकथाओं की बाढ़ आ गयी है। 'निजी संतुष्टि' का सामाजिक मूल्यों के तानेबाने के साथ गहरा अन्तर्विरोध है। अनेक मामलों में आत्मकथाओं के विवरण और ब्यौरे नैतिक तौर पर अपमानजनक चीजों को पेश करते हैं। खासकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी संतुष्टि की धारणा की आड़ में व्यक्ति के एकाकी भावबोध को खूब बढ़ावा दिया जा रहा है। यह ग्लोबलाइजेशन का ग्लोबल फिनोमिना है। यह ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा है जो निजी तौर पर किसी विचार या विचारधारा से बंधा नहीं है। इसके पास किसी विचार या विचारधारा की परंपरा नहीं है। इसका प्रत्येक चीज और व्यक्ति के साथ बिनाशर्त संबंध है।

रामविलास शर्मा ने अपनी आत्मकथा 'अपनी धरती अपने लोग' में व्यक्ति और विचारधारा के अनतस्संबंध को उभारा है। लेखक की नागरिकचेतना और वर्गीयचेतना को उभारा है। लेकिन इन दिनों आने वाली स्त्री और दलित लेखकों की आत्मकथाओं में इसके विपरीत लक्षण देखने में आए हैं। वे ऐसे व्यक्ति का चित्रण करते हैं जो अंतर्वैयक्तिक (इंटरपर्सनल) संबंधों और नागरिक शिरकत के लिए किसी विचारधारा से जुड़ा नहीं है। उस पर उसकी मास्टरी नहीं है।

इस पूरी प्रक्रिया में सार्वजनिक मनुष्य की अवधारणा का क्षय हुआ है। इससे यह भी पता चलता है कि सार्वजनिक जीवन का क्षय हो रहा है। सार्वजनिक राजनीतिक स्पेस का क्षय हुआ है। वस्तुकरण और नौकरशाही की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसके अलावा सामाजिक बंधनों की कीमत पर आत्म-संतुष्टि, संवेदनात्मक अभिव्यक्ति और आत्म-क्षय की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह सामाजिक नार्सीज्म है। इसमें दैनंदिन जीवन की छोटी –छोटी आपातकालीन कथाएं हैं । इसमें सामाजिक प्रतिबद्धता और निजी लगाव का अन्तस्संबंध बड़े पैमाने पर टूटा है। अनेक स्थानों पर आत्मकथाओं में निजी लगाव की बातों पर जोर है और सामाजिक वचनवद्धता की उपेक्षा की गयी है।

यह नए किस्म का व्यक्तिवाद है। जिसका लक्ष्य है भौतिक लाभ पाना और निजी सफलता पाना। इसके पास छद्म प्रतिबद्धता है। इसके अन्य के सरोकार से बेखबर है। कहीं कहीं यह व्यक्तिवाद, सांस्कृतिक परंपरा,राजनीतिक संस्कृति और सामाजिक इतिहास के रूप में भी आया है।

कई आत्मकथाओं में ऐसी भाषा का इस्तेमाल हुआ है जिससे भाषा की मानवीयक्षमता का क्षय हुआ है। भाषा का काम है मानवीयक्षमता में इजाफा करना।साहित्य और सामाजिक जीवन में गाली-गलौज की भाषा मानवीयक्षक्षमता के क्षय का संकेत है।गाली-गलौज की भाषा या भाषा के असभ्य प्रयोग अंततः मानवीय क्षमता और व्यक्ति की निजी क्षमता को विकृत करते हैं। इस तरह के भाषिक प्रयोग इस बात का संकेत है कि निजी जीवन का ह्रास हो रहा है।

अस्मिता साहित्य के तहत जो आत्मककथाएं आई हैं उनमें एक अन्य फिनोमिना भी दिखाई दे रहा है और वह है निजी जीवन के सारतत्व और उसके ताने-बाने को पूंजीवादी-सामंती व्यवस्था खाए जा रही है। यहां अनेक मामलों में वह अपने को सामाजिक प्राणी के रूप में नहीं देखता । आत्मकथाओं में सेल्फ ऑब्शेसन और अबाधित आत्ममोह मुख्य चिंता की बात है। लेखक अपने निजी आंसुओं,कर्म और कष्टों का अतिरंजित वर्णन कर रहे हैं। इससे उन्हें 'सांस्कृतिक शांति' मिलती है। इसे समीक्षा में 'कल्चरल कूलिंग' या 'सांस्कृतिक शांति ' कहते हैं।

'सांस्कृतिक शांति' के फ्रेमवर्क में जब चीजें पेश की जाती हैं तो वे दलित और स्त्री दोनों का ही अपहरण करती हैं। वे आत्मकथाओं में ऐसा समाज रच रहे हैं जो अपने ही घेरे में बंद हैं। सेल्फ ऑब्शेसन और बाजार निर्मित अस्मिता के तत्वों को अपने अंदर समेटे है। यहां एक तरह से मानवीय व्यवहार का निजीकरण मिलेगा। यह सामयिक सांस्कृतिक अवस्था का लक्षण है। यहां निजी जीवन के अ-राजनीतिक और व्यक्तिगत विवरण और ब्यौरे छाए हुए हैं। इन कथाओं में सार्वजनिक और निजी के बीच में अंतर की दीवार भी धराशायी हो गई है। आत्मककथाओं में जो राजनीति आ रही है वह बाहरी राजनीतिक मसलों के संदर्भ में आ रही है। पहले निजी मसलों और राजनीति का संबंध मिलता है। खासकर रामविलास शर्मा की आत्मकथा में यह फिनोमिना नजर आता है। लेकिन इनदिनों आने वाली आत्मकथाओं में निजी को राजनीति से अलग एक भिन्न सामाजिक केटेगरी में रख दिया गया है। इस चक्कर में संस्कृति और राजनीति के बीच में फांक पैदा हो गयी है। इसके कारण लेखक का निजी जीवन अलग और राजनीतिक प्रसंग अलग नजर आते हैं।

आत्मकथा लेखन में एक और फिनोमिना नजर आता है वह है 'सांस्थानिक व्यक्तिवाद'। इसमें व्यक्ति अपनी आत्मकथा का आख्यान रचते हुए निज के द्वारा तय की गयी परिभाषाओं को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं। इस तरह की प्रस्तुतियां दलितलेखकों ने खूब लिखी हैं। यह आज के भूमंडलीकरण का प्रतिगामी बुनियादी लक्षण है।

इस धारणा के मानने वाले कहते हैं मौजूदा कनेक्टविटी के दौर में मनुष्य अपनी बार बार यात्रा करता है।नए सिरे से काम करता है।पुनर्पाठ करता है।व्यक्तिगत आदतों और अस्मिताओं की रोशनी में राज्य को देखता है। समाज को देखता है और बताने की कोशिश करता है कि यह विश्व किस दिशा में जा रहा है। यह पद्धति रामविलास शर्मा की आत्मकथा में भी इस्तेमाल की गयी है। इस पद्धति का प्रयोग करते हुए लेखक परंपरा से आधुनिकता की ओर प्रयाण करता नजर आता है। आत्म-निर्माण की प्रक्रिया नजर आती है लेकिन सांस्कृतिक वैविध्य या क्षेत्रीय सांस्कृतिक भिन्नताएं नजर नहीं आतीं।

पश्चिम और भारत में आत्मकथा लेखन में एक अंतर है, पश्चिम में आत्मकथा लेखक को इतिहास बहुत कम परेशान करता है। लेखक आसानी से अपने को इतिहास से मुक्त होकर लिखता है। लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। भारत में आत्मकथा या जीवनी में इतिहास आसानी से पीछा नहीं छोड़ता। पश्चिम के लेखक की अस्मिता ,इतिहास से अपने को अलग कर लेती है। भारत में लेखक की अस्मिता ,इतिहास से अपने को अलग नहीं कर पाती। परंपरागत समाज में व्यक्ति के पास न्यूनतम स्वायत्तता भी नहीं होती। जबकि आधुनिक धर्मनिरपेक्ष समाज उसे पूरी स्वायत्तता देता है।

पश्चिम में लेखक को परंपरा और सामाजिक इतिहास के ज्ञान के आधार पर समझने में मुश्किल से मदद मिलती है।जबकि भारत में उसके बिना समझना मुश्किल है। मसलन् ,रामविलास शर्मा की आत्मकथा या उनके द्वारा लिखी 'निराला की साहित्य साधना" में 1857 और परंपराएं व्यक्तित्व निर्माण के प्रमुख तत्वों में हैं। इसी तरह ओमप्रकाश बाल्मीकि की आत्मकथा में जातिप्रथा ऐतिहासिकता के साथ दाखिल होती है।

आधुनिकता के आने के साथ आधुनिकीकरण की अपार संभावनाएं पैदा होती हैं। व्यक्तिवादी ढ़ंग से विकास के अवसर पैदा होते हैं। आधुनिक संगठनों का उदय होता है। ये संगठन व्यक्ति के आत्म को नए सिरे से निर्मित करते हैं। उसके जीवन में अभिव्यंजित होते हैं। इनमें खासतौर पर शिक्षा और राजनीति के संगठनों के द्वारा व्यक्तित्व के नए रूपों के निर्माण में खाससतौर पर मदद मिलती है। इनसे विगत जीवन की अनिश्चितता और असुरक्षा से मुक्ति मिलती है।आत्मनिर्भर व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसी क्रम में कैरियर,परिवार,मित्र,कार्यक्षेत्र,प्रेम आदि के अंतर्विरोधों को हल करने में मदद मिलती है। यानी व्यक्ति एक नए किस्म के आधुनिक व्यक्तिवाद के जरिए अपना विकास करता है। इससे आत्म संचालित संस्कृति और आत्म निर्धारित आत्मकथा के रूपों का निर्माण होता है।

एक मर्तबा फ्रांसीसी लेखक जॉन पाल सार्त्र ने कहा था कि बुर्जुआ की तरह जन्म लेना ही काफी नहीं है ,बल्कि बुर्जुआजी की तरह जीना भी आवश्यक है। इसी नजरिए को आधार बनाकर रामविलास शर्मा और ओमप्रकाश बाल्मीकि अपनी आत्मकथाओं में यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि उनका व्यक्तित्व सेल्फमेड है। वे यह भी दर्शाते हैं कि उन्होंने अपना ही नहीं अपने परिवार,मित्र और संबंधियों के भी निर्माण में मदद की है। साथ ही यह भी संदेश देते हैं कि व्यक्तित्व निर्माण के प्रमाण समाज और आत्मकथा में चारों ओर पारदर्शी रूप में फैले हैं। इन दोनों लेखकों की आत्मकथाओं में जीवन के बारे में पुरानी निश्चितता नष्ट होती है और ये दोनों ही लेखक नए किस्म की निश्चित जिंदगी जीने के विकल्पों की ओर मुखातिब होते हैं।

रामविलास शर्मा और ओमप्रकाश बाल्मीकि की आत्मकथा वस्तुतःआत्मनिर्माण या सेल्फमेड व्यक्ति की आत्मकथा है। इस तरह की आत्मकथा में एक जोखिम है ,इसमें जो चीजें चुनी जा रही हैं उनमें जोखिम भी है। मसलन् रामविलास शर्मा कम्युनिस्ट पार्टी के होल टाइमर थे । लेकिन भयानक असुविधाओं का सामना करना पड़ा। फलतः उन्हें होलटाइमरशिप छोड़नी पड़ी।

लेखक जो कैरियर या जीवनशैली चुनना चाहता है।वह वैसा नहीं बन पाता । अतःजिस आत्मकथा को वह सेल्फमेड रूप में पेश करना चाहता है उसी आत्मकथा में वह ब्रेकडाउन जीवनी को भी पेश करता है।ब्रेकडाउन जीवनी के अनेक पहलुओं को बड़ी खूबी के साथ रामविलास शर्मा ने 'निराला की साहित्य साधना' में भी दरशाया है। निराला के सपने किस कदर टूटते हैं और वे जो बनना चाहते हैं वह नहीं बन पाते।जैसे जीना चाहते हैं वैसे जी नहीं पाते। जीवनी लेखन की यह पद्धति पूरी तरह उत्तर आधुनिक पद्धति है।मसलन् निराला चाहते थे कि महिषादल का राजा उनको गोद ले और वे राजकुमार की तरह जिंदगी व्यतीत करें। यह नहीं हो पाता और यह उनके जीवन की बड़ी पीड़ा बनती है।

लेखकद्वय ( रामविलास शर्मा-ओमप्रकाश बाल्मीकि) की आत्मकथाओं में परिवार बना रहता है और इन दोनों के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की भूमिका साफ नजर आती है। आधुनिक समाज में व्यक्तित्व निर्माण में राज्य की बड़ी भूमिका होती है लेकिन इन लेखकों के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की बड़ी भूमिका सामने आती है। दूसरा बड़ा संस्थान है शिक्षा व्यवस्था। शिक्षा की इनके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका नजर आती है। वहीं निराला का परिवार बिखर जाता है और परिवार उनके विकास में बहुत बड़ी बाधा बन जाता है।ठीक यही पहलू नामवरसिंह की आत्मकथा के अंशों में है। वहां परिवार नदारत है।परिवार के नाम पर विस्तारित परिवार के लोग भूमिका में नजर आते हैं। यही स्थिति अनेक लेखिकाओं की आत्मकथाओं में भी नजर आती है।

निराला-नामवरसिंह-मन्नूभंडारी आदि की जीवनी-आत्मकथाओं में सामाजिक परिस्थितियां,खासकर पारिवारिक परिस्थितियां ऐसी हैं जो इन व्यक्तियों को दंडित करती हैं। इन सभी लेखकों का व्यक्तिवाद इनको आगे ठेलता है और इसके कारण इनके सामाजिक अंतर्विरोध और भी गहराने लगते हैं।

रामविलास शर्मा,नामवरसिंह,ओमप्रकाश बाल्मीकि,मन्नू भंडारी आदि की आत्मकथाओं में व्यक्त तथ्य इस बात को पुष्ट करते हैं कि इन लेखकों के जीवन में व्यक्तिवादी दबाब इनको भविष्य की ओर ठेलते रहे हैं। व्यक्तिवादीकरण एक अपरिहार्य अवस्था है। इससे बचा नहीं जा सकता। लेखक के नाते ये लोग उसे नियोजित करके पेश करते हैं। ये अपने व्यक्तिवाद का विभिन्न बदली परिस्थितियों में इस्तेमाल करते हैं।

इन लोगों ने निजी तौर पर व्यक्तिवाद की आलोचना की लेकिन व्यक्तिवादीकरण इनकी मजबूरी है।यहीं पर इस प्रवृत्ति की बिडम्वना सामने आती है। इस क्रम में जहां एक ओर वे अपनी जीवनी बनाते हैं ,साथ ही अपने आसपास नेटवर्क भी बनाते हैं। यह नेटवर्क शिक्षा संस्थान,राजनीतिक दल,सांस्कृतिक संगठन आदि से बन रहा है। मसलन् ,रामविलास शर्मा,ओमप्रकाश बाल्मीकि, निराला आदि की आत्मकथा-जीवनी में परिवार और गांव के सामुदायिक जीवन या कॉमरेडशिप वाले दौर की अनिश्चितता सामने आती है। यह अनिश्चितता इनके आख्यान का सबसे बड़ा संसाधन है।

इन लेखकों के यहां एक चीज साझा है कि वे आधुनिक जीवन जीना चाहते हैं लेकिन आधुनिक जीवन जीना इनके लिए असंभव हो जाता है।ये रूटिन के बाहर रहकर जीना चाहते हैं लेकिन दैनंदिन रूटिन जीवन इनको अपनी ओर खींचता है। रूटिन चीजें इनके विचार और कर्म दोनों को प्रभावित करती हैं।

'रुटिन' की अमूमन आत्मकथा-जीवनी पढ़ते हुए हम उपेक्षा करते हैं। दैनंदिन रूटिन को व्यक्ति किस तरह आत्मसात करता है और आगे बढ़ता है इन सब बातों की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। 'रुटिन' के कारण व्यक्ति में सामुदायिक आदतों-संस्कारों आदि का निर्माण होता है। मसलन् प्रगतिशीलों में रहना, उनकी बातें करना,उनकी आदतों और व्यवहार को जीवन में उतारना आदि रूटिन सामूहिक आदतें हैं, इन्हें हम लेखक के प्रतिवादी कर्म के रूप में देखते हैं।

सामयिक भूमंडलीकरण के ग्लोबल फिनोमिना के अंग के रूप में आत्मकथाओं में नए किस्म का व्यक्तिवाद नजर आ रहा है। यहां लेखक नए रूप में अपनी खोज करता है। वह लिखता है अपने अतीत को बताने के लिए,लेकिन बताता है अपने व्यक्तित्व के रूपान्तरण को । वह यह भी दरशाता है कि वह ग्लोबल परिवर्तनों के साथ खुद भी बदल रहा है। लेखक अपनी जीवनी को नया रूप देने और दिशा देने में सक्षम है। यह ऐसा लेखक है जो अपने सांस्कृतिक प्रतीकों की स्वयं खोज करता है। नए भूमंडलीकरण में व्यक्ति की अस्मिता और सांस्कृतिक रूपों का वो सर्जक है।

दलितों की आत्मकथाओं में जीवनशैली का खूब चित्रण मिलता है। इसके विपरीत रामविलास शर्मा के यहां जीवनशैली के चित्रण पर जोर नहीं है। जीवनशैली वाला तत्व ग्लोबलाईजेशन का हिस्सा है। दलित की जीवनशैली के साथ एक बागी व्यक्तित्व सामने आता है। लाइफस्टाइल और रिवेल या बागी ये दोनों भूमंडलीकरण के फिनोमिना हैं। वे ऐसे व्यक्ति का चित्रण करते हैं जिसे यथास्थितिवाद पसंद नहीं है।

यथास्थितिवाद का बागी तेवरों के साथ निषेध करने वाले तत्व मासकल्चर में खूब मिलेंगे। जिस तरह मासकल्चर को बागी हीरो पसंद आते हैं. उनके संवादों को हम उद्धृत करते हैं। ठीक वैसे ही दलितसाहित्य और स्त्री साहित्य में भी बागी लेखक को पसंद किया जाता है। उनके चुभते संवाद पसंद आते हैं। उनका अविश्वास पसंद आता है। उनका इन चीजों का महिमामंडन पसंद आता है। इस तरह की प्रस्तुतियों की खूबी है कि आप उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते। चूंकि ये बदले हुए समय की तस्वीरें हैं,इनमें चीजें बदलती नजर आती हैं। वे अपनी अस्मिता को खोजते हैं,नया रूप देते हैं। ये तस्वीरें प्रेरक का काम भी करती है।

दलित आत्मकथाओं में मासकल्चर के बागी नायकों की तरह एक तरह का सांस्कृतिक अंतर्विरोध अंतर्ग्रथित है। वे सब कुछ अभी चाहते हैं। इनमें समाज,जाति,जीवनशैली आदि को तत्काल बदलने की आकांक्षा जमकर व्यक्त हुई है। वे अपने पाठक को 'ट्रांसफार्म' और 'इंप्रूब' करने की ओर ध्यान खींचते हैं।

आत्मकथाओं की हाल ही में जो बाढ़ आई है उसका एक और मकसद है सेल्फ थेरेपी करना। यह उपभोक्तावाद से जुड़ा फिनोमिना है। इसमें अस्मिता की इंस्टेंट इमेजों का खूब प्रक्षेपण हो रहा है। इस तरह की अस्मिता की एक ही मुश्किल है कि इसमें प्रभावित करने की क्षमता नहीं है। यह मीडिया में चल रहे अस्मिता के इंस्टेंट फ्लो से प्रभावित है इसमें तत्काल संप्रेषित करने और तत्काल परिणाम पाने की मंशा काम कर रही है। ये आत्मकथाएं मासकल्चर के फार्मूलों के आधार पर लिखी जा रही हैं।

मासकल्चर का फार्मूला है कि आप अपने अंदर कुछ भी इन्वेंट कर सकते हैं। इस काम से आपको कोई नहीं रोक सकता। सिर्फ तुमको चुनना है कि क्या इन्वेंट करना चाहते हो। जिस तरह माउस का बटन दबाते ही आप शिफ्ट कर जाते हैं। उसी तरह अस्मिता पर लिखी एक किताब से दूसरी किताब की ओर शिफ्ट कर जाते हैं। इसमें आपकी कोई विचारधारात्मक प्रतिबद्धता नहीं होती।

इन आत्मकथाओं में एक खास किस्म की जीवनशैली की ओर रूझान नजर आ रहा है और उसकी ब्रॉण्डिंग भी हो रही है। दलित अस्मिता का आधुनिक जीवनशैली में रूपान्तरण उसके व्यक्तित्व के छोटे –छोटे विवरण और ब्यौरों से भरा है। इन सभी आत्मकथाओं में व्यक्तित्व की लोचदार इमेज सामने आ रही है। इस इमेज का दलित की उपलब्धि और संभावनाओं के आधार पर निर्णय नहीं किया जा सकता। बल्कि इन आत्मकथाओं के बारे में हमें व्यक्तित्व के रूपान्तरण और लोच के आधार पर देखना चाहिए।

दलित आत्मकथाओं में दलित को शोषण और जाति उत्पीड़न के वैविध्यपूर्ण चित्रों के जरिए सजाने की कोशिश की जा रही है। इनमें चार फिनोमिना हैं। पहला फिनोमिना है नकारात्मक-सकारात्मक चीजों का। दूसरा है ,अलगाव और स्वाधीनता का। इसका सांस्कृतिक महत्व है। इसके अलावा इकसार सामाजिक संदर्भ बार बार सामने आया है। इसके कारण सामाजिक संदर्भ अप्रासंगिक हो गया है।सामाजिक संदर्भ को परंपरा और जातिप्रथा के इकसार या स्टीरियोटाइप संदर्भ ने अपदस्थ कर दिया है। सामाजिक संदर्भ की विभिन्न सीमारेखाओं को इनके जरिए अप्रासंगिक बनाया गया है।

दलित आत्मकथाओं में भूमंडलीकरण की तीन संवृत्तियां नजर आती हैं। प्रथम, परंपरा को कम करके देखा गया है। खासकर परंपरागत जीवनशैली की उपेक्षा की गयी है। इसी क्रम में वि-परंपरावाद का विकास हुआ है। पहले से चली आरही चीजें अब दलित आत्मकथाओं में सुरक्षाबोध पैदा नहीं करती।

दूसरी संवृत्ति है ,व्यक्ति की सामाजिकरेखाएं और परंपराएं टूट रही हैं। मसलन् ,शादी एक संस्थान है जो आत्मकथाओं में टूट रहा है या शादी पर पर्दा पड़ा है। तीसरा फिनोमिना है ,व्यक्ति के जीवन में बदलाव आ रहे हैं, उनकी व्याख्या विचारधारात्मक आधार पर होनी चाहिए।

व्यक्ति में आए बदलाव इनदिनों जितने ज्यादा आज नजर आ रहे हैं ,उतने पहले नजर नहीं आते थे। इसका प्रधान कारण है नव्य आर्थिक उदारीकरण। इसने निजीकरण की प्रक्रिया तेज की है। फलत आत्मकथाओं में निजी जीवन के दैनंदिन पहलू सामने आए हैं। निजी गुस्सा,भय,असंतोष ,संशय और अविश्वास ,सामाजिक अव्यवस्था और हिंसाचार के विवरण और ब्यौरे भी चले आए हैं।

दलित आत्मकथाओं के विवरण यह भी बताते हैं कि भारत में सामाजिक असमानता कम हो रही है। यह कम होती असमानता उनमें ज्यादा दिख रही है जो दलितवर्ग की निम्न अवस्था से रूपान्तरित होते हुए मध्यवर्ग या निम्न-मध्यवर्ग में आ गए हैं। इस क्रम में ये लोग अपने वर्ग से भिन्न वर्ग में रूपान्तरित हो गए हैं।

इन दिनों आत्मकथा विधा का दायरा लगातार विकसित हो रहा है। रामविलास शर्मा ने निराला के निजी पत्रों को शामिल करके पत्रों को साहित्य में शामिल करा दिया,लेकिन इसके दायरे में यात्रा संस्मरण,निजी डायरी और भाषण भी आते हैं। इस प्रसंग में मुख्य सवाल यह है कि हिन्दी में आत्मकथा को जनप्रिय होने में इतना समय क्यों लगा ? अंग्रेजी में आत्मकथा लंबे समय से विधा के रूप में लोकप्रिय रही है। हिंदी में यह 1990 के बाद ही लोकप्रिय हो पायी है और उस पर विभिन्न कोणों से बहसें हो रही हैं। इन बहसों में विधा और अंतर्वस्तु को जोड़कर नहीं देखा जा रहा। अधिकांश समय अंतर्वस्तु की विवेचना में ही आलोचकगण व्यस्त हैं।

यह भी देखने में आया है कि हिंदी में अनुदित होकर विदेशी लेखकों की आत्मकथाएं आ रही हैं और ये आत्मकथाएं बड़ी मात्रा में बिक रही हैं। आत्मकथा का पाठकवर्ग तैयार करने में इन अनुदित किताबों की बड़ी भूमिका है। हिंदी के साहित्यकारों की आत्मकथा और जीवनियां सिर्फ साहित्य के विद्यार्थियों के एक छोटे समूह में बिकती हैं। लेकिन अनुदित आत्मकथा की किताबें व्यापक जनसमूह में अपना पाठकवर्ग तैयार करने में सफल रही हैं।

आत्मकथा या जीवनी को हमें अस्मितासाहित्य की कोटि में रखकर विचार करना चाहिए। अभी तक हम इसे अस्मिता के दायरे में रखकर नहीं सोच रहे। किस दलितलेखक की आत्मकथा को हम अस्मिता के आधार पर देखने को तैयार हो जाते हैं लेकिन किसी गैर-दलित लेखक की आत्मकथा को अस्मिता के आधार पर देखने में असमर्थ रहे हैं। मसलन् ओमप्रकाश बाल्मीकि और रामविलास शर्मा की आत्मकथाएं अस्मिता की केटेगरी में रखकर पढ़ जानी चाहिए।

आत्मकथा या जीवनी मूलतः अस्मितासाहित्य है।इसके साथ ही जनजाति,अनुसूचित जाति,लिंग और वर्ग का साहित्य अस्मितासाहित्य है। किसी आदिवासी या स्त्री या दलितलेखकों की आत्मकथाओं में साझा सांस्कृतिक रूप,साझा सामाजिक परिस्थितियां और संघर्ष के साझा मुद्दों के दर्शन होते हैं। ये मुद्दे हैं- छूत-अछूत,शिक्षा में भेदभाव,श्रमविभाजन में भेदभाव, कृषिशोषण, जमीन के अधिकार, ऊँच-नीच के सवाल,वर्ण और जातिप्रथा, सेक्स, शारीरिक शोषण, पति-पत्नी में असमानता, स्त्री की अधिकारहीनता, मातहत भावबोध आदि। इन सभी में एक साझा तत्व है कि ये सभी स्वयं की पहचान को बनाने के लिए संघर्ष करती नजर आती हैं।

इनमें दूसरा साझा तत्व है कि लेखक जैसा महसूस करता है वैसा लिखता है। अन्य क्या महसूस करते हैं उस पर उसकी नजर नहीं है। कहानी-उपन्यास लिखते समय लेखक अन्य कैसे सोचता है इसके बारे में भी सोचता है लेकिन आत्मकथा में खासकर दलित और स्त्री की आत्मकथा में वह अपनी भाषा में ही सोचता है। निजी और सामाजिक जीवन के अछूते पक्षों को बताते समय उसकी नजर स्वयं पर होती है। वह स्वयं कैसे देखता है उसका ही चित्रण करता है। ऐसा करके लेखक दो काम करता है ,जहां वह अपनी बात कहता है वहीं पाठक के सामने यह स्थितियां पैदा करता है कि वह अन्य के साथ उसकी तुलना करे। अन्य हो सकता है समान हो ,भिन्न हो या उसके साथ अन्तर्विरोध हों।

एक और फिनोमिना है जिस पर ध्यान देना चाहिए कि आत्मकथाओं में अभी हम लेखक या लेखिकाओं की आत्मकथाओं पर ही ध्यान दे रहे हैं,लेकिन जो लेखक और लेखिका नहीं हैं,सामान्य लोग हैं उनकी आत्मकथा की ओर हम ध्यान नहीं दे रहे।

आत्मकथा मूलतः लेखक की सांस्कृतिक क्षति पूर्ति करती है। आत्मकथा के बहाने लेखक-लेखिका ने अपने सामाजिक जीवन में जो सांस्कृतिक क्षति उठायी है उसको वे हासिल करती हैं। वे उन बाधाओं की ओर ध्यान खींचते हैं जिनके कारण उनका विकास बाधित हुआ। मसलन्, दलितों या स्त्रियों या आदिवासी के जीवन में जिन बातों को छिपाया गया, जिस शोषण को छिपाया गया, जिस उत्पीड़न को छिपाया गया उससे उनकी सांस्कृतिक क्षति हुई और वे अपनी आत्मकथा लिखकर इस सांस्कृतिक नुकसान की भर पायी करते हैं।

आज जिस तरह आत्मकथा को सम्मान की नजर से देखा जाता है वह एक तरह से इन लेखकों की सांस्कृतिक क्षति की सामाजिक स्वीकृति है। उनका जो सांस्कृतिक स्थान समाज में छीना गया था उसे वे इसके जरिए हासिल करते हैं। वे अदृश्य थे और अदृश्य होना उनकी क्षति थी, आत्मकथा उनको दृश्य बनाती है, उनकी उपस्थिति का एहसास कराती है और इस तरह वे अपना खोया हुआ स्थान हासिल करते हैं। दलित या स्त्री या आदिवासी का दिखना स्वयं में बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि है। इसके अलावा आत्मकथा से साहित्य की प्रचलित विधागत मान्यताएं भी टूटती हैं। मसलन् लिंग,भाषा,जातिवाद,धर्म आदि के पूर्वाग्रह टूटते हैं।

आत्मकथा में व्यक्ति के विवरण ही नहीं होते बल्कि उसमें इस धरती या भूगोल का भी ब्यौरा चला आता है। मसलन् एक आदिवासी या दलित जब आत्मकथा लिखता है तो उसके लेखन में निजी जीवन के साथ उसका स्थानीय संसार भी चला आता है। जमीन या कृषि संबंध भी चले आते हैं। हमें देखना चाहिए कि जमीन और घर से लेखक का क्या संबंध है ? आत्मकथा में समय (टाइम) भी चला आता है। यह भी अंदाजा लगा सकते हैं कि उसके कानूनी अधिकार क्या हैं ?

स्त्री और दलित आत्मकथाओं से यह भी पता चलता है कि ये लोग अपने अतीत से कैसे मुक्त हो रहे हैं। इनका अतीत में जाना तीन काम करता है,पहला, स्त्री और दलित के अतीत के यथार्थ को सामने लाता है ,दूसरा, इस यथार्थ से मुक्त करता है।तीसरा, वे जिन चीजों को सबसे ज्यादा प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त करते हैं वह है श्रम,श्रम के विविध रूपों के चित्रण के जरिए वे श्रम को जीवन लाइफ लाइन के रूप में चित्रित करते हैं। साथ ही लाइफलाइन के अन्य रूप हैं खेत,कसाईघर,घरेलू काम,बच्चे पालना आदि। इनका चित्रण अंततः प्रतीकात्मक रूप में साहित्य में लाइनलाइन की अभिव्यक्ति है। इसमें जीवन के प्राचीनरूपों से लेकर मध्यकालीन रूपों को सहज ही देखा जा सकता है। इसके कारण आत्मकथा में प्रामाणिकता आती है।

आदिवासी,स्त्री और दलित की आत्मकथाओं में अनेक स्थानों पर इस तरह की लोकल भाषा मिलती है जो आमजीवन में सुनाई नहीं देती ,लेकिन आत्मकथा में है ,वह उनके जीवन में भी है। वहां ऐसे भाषिक प्रयोग मिल जाएंगे जो सामान्य भाषा में इस्तेमाल नहीं किए जाते। इनका विशिष्ट अर्थ है जो दलित या स्त्री के संदर्भ में ही इस्तेमाल किया जाता है। गिली देलुत्ज एवं फेलिक्स गुइतारी ने इसे “ मीनार लैग्वेज” यानी वर्चस्ववादी भाषा कहा है। इसकी इन दोनों आलोचकों ने काफ्का की भाषा के संदर्भ में “ काफ्काः टुवर्ड ए मीनार लिटरेचर ” (1975) में इस अवधारणा की चर्चा की है। यह ऐसी भाषा है जो इडियम की अस्मिता के वर्चस्ववादी रूप को सामने लाती है। इसके आमफहम अर्थ को सामान्य जीवन में खोजना मुश्किल है।फलतः यह मुख्यधारा के विमर्श को पटरी से उतार देती है।

स्त्री ,दलित और आदिवासी अल्पसंख्यक हैं और इसी नाते वे हाशिए पर हैं। ये लोग जब आत्मकथा लिखते हैं तो वे हाशिए की संस्कृति बनाते हैं। आमतौर पर हाशिए के लोगों को गैर-महत्वपूर्ण माना जाता है। यह बार बार कहा गया है कि हाशिए के लोगों का साहित्य मुख्यधारा के साहित्य की कोटि में नहीं आता। साहित्य की कोटि में स्त्रीसाहित्य और दलितसाहित्य नहीं आता। यह ऐसा साहित्य है जिसका अपना क्षेत्र नहीं था, साहित्य में कोई स्थान नहीं था।समाज में कोई स्थान नहीं था। लेकिन यह सीधे राजनीतिक साहित्य है। सवाल यह नहीं है कि स्त्रीसाहित्य या दलित साहित्य को साहित्य में जगह मिली या नहीं ? सवाल यह है कि यह साहित्य पाठक को साहित्य और राजनीति के बारे में सोचने के लिए मजबूर करता है या नहीं ? दलित और स्त्रीसाहित्य की भाषा इसी अर्थ में प्रचलित वर्चस्ववादी भाषा से भिन्न होती है। भिन्न भाषा में ही वे भिन्नसंसार पेश करते हैं। इसे वैकल्पिक भाषा भी कह सकते हैं इसकी समूची रणनीति इस बात से तय होगी कि लेखक, स्त्री और दलित के यथार्थ का कितनी गहराई में जाकर चित्रण करना चाहता है।

रामविलास शर्मा ने “घर की बात” किताब संपादित की है उसमें उनके परिवार के लोगों के बयान हैं। इसे आत्मकथा की कोटि में नहीं रख सकते। इसका प्रधान कारण है कि आत्मकथा वस्तुतः साझा लेखन नहीं है। आत्मकथा व्यक्तिगत लेखन है। एकल लेखन है।

आत्मकथा के अनेकरूप मिलते हैं जो भिन्न भी हैं, जैसे आत्मकथा, आत्मकथात्मक आख्यान, जीवन इतिहास,जीवनी,जीवन परिचय,आत्मकथ्य,इतिहास, स्थानीय इतिहास,वाचिक इतिहास,जनजातीय आत्मकथा और उपन्यास। ये सभी विधारूप स्वतंत्र हैं और किसी न किसी रूप में जुड़े हुए भी हैं।क्योंकि इन सबमें साझा तत्व है निजी जीवनानुभव। इनमें जो भेद है वो प्रच्छन्न और अंतर्वस्तु के स्तर पर है।

मसलन् किसी लेखक की आत्मकथा लिखने के लिए लेखन,भाषण और वाचिक संस्मरणों,जीवनानुभवों का महत्व है। इसमें जीवन के आरंभिक छोटे पक्ष से लेकर बड़े पहलुओं तक सारा संसार फैला हुआ है। एक सवर्ण लेखक की आत्मकथा में व्यक्तिगत जीवन विशिष्ट रूप में आता है,लेकिन स्त्री और दलित की आत्मकथा में निजी अनुभव विशिष्ट हैं और सामुदायिक भी हैं। इसमें वाचिक पृष्ठभूमि और तथ्यों की बड़ी भूमिका होती है।आत्मकथा को लेखक स्वयं लिखता है,जीवनी को अन्य कोई लिखता है। फलतः इनके उत्पादन और श्रवण में अंतर भी है। आत्मकथा क्या है यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी आत्मकथा की अवधारणा क्या है ? किस तरह उसे परिभाषित करते हैं ?

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मादाम द स्तेल के शब्दों में आत्मकथा में फ्रेंगमेंटेड यथार्थ विमर्श है। लेकिन रामविलास शर्मा ने आत्मकथा लिखते समय इस नियम का पालन नहीं किया बल्कि जीवनी लेखन के नियमों और संस्मरणशैली का पालन किया है। आत्मकथा में निष्कर्षों से बचा जाता है और पाठ खुला रहता है लेकिन “अपनी धरती अपने लोग” में वे ऐसा नहीं करते। जीवनकथा में लेखक के लिए तथ्य और सत्य की क्रमबद्ध प्रस्तुति महत्वपूर्ण होती है,जबकि आत्मकथा के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है। रामविलास शर्मा अपनी आत्मकथा में कहे हुए को लेकर बेहद सजग हैं, वे समस्त चीजों को एक ही नजरिए से पेश करते हैं।चीजों को एक ही नजरिए से पेश करना आत्मकथा का तत्व है।

एक शिक्षक और एक कम्युनिस्ट के रूप में रामविलास शर्मा के जो अनुभव रहे हैं उनको आत्मकथा में बहुत कम स्थान मिला है।इसका प्रधान कारण है कि एक शिक्षक के बहुत सारे व्यक्तिगत आचरण और अनुभव को कॉलेज-विश्वविद्यालय के लोग शेयर करते हैं अतःउनको बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती। दूसरी बात यह भी है अकादमिक जीवन में आम पाठकों की कम दिलचस्पी रहती है इसलिए भी कम लिखा है।

रामविलास शर्मा ने अपनी आत्मकथा को लिखते समय यह बताने की कोशिश की है कि उनके व्यक्तित्व का निर्माण कैसे हुआ? साथ ही प्रगतिशील साहित्य और संस्कृति का हिंदी में सृजन कैसे हुआ ? हिन्दी साहित्य और हिन्दीजाति के विकास की प्रक्रिया क्या है ? ये तीन बातें हैं जिनको वे आत्मकथा के बहाने संप्रेषित करना चाहते हैं। इसमें संस्मरण बिखरे पड़े हैं। वे संस्मरण की शैली में लिखते हैं और सजगता के साथ क्रमबद्धता को बनाए रखते हैं।

हिंदीसमाज,हिंदीजाति और रामविलास शर्मा का 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से गहरा संबंध सामने आता है। 1857 का संदर्भ प्रमुख संदर्भ है। जिसका वे व्यापक इस्तेमाल करते हैं। खासकर अवध का इलाका इन सबकी धुरी है। अवध की संस्कृति और उसका नॉस्टेल्जिया बार बार क्रांति तक के विचार और यूटोपिया को अपदस्थ कर देता है।

आत्मकथा में अनेक लोग हैं जो लेखक के जीवन की सफलताएं पढ़ना चाहते हैं। उनकी सफलताएं एक लेखक की सफलताओं के रूप में आती हैं। इसमें लेखन,साहित्य और राजनीति के व्यापक अनुभवों को पेश किया जाता है। रामविलास शर्मा ने इसी परिप्रेक्ष्य में व्यक्तित्व निर्माण में सफलताओं की कम और कला,राजनीति,दर्शन आदि की बड़ी भूमिका का व्यापक स्तर पर जिक्र किया है। साथ ही एक मार्क्सवादी के स्वप्न व्यक्त हुए हैं। लेखक के रूप में एक आंदोलनकारी लेखक,एक ऐसा लेखक जो विवाद पैदा करे।आलोचना के नए प्रश्नों को उठाए और अपनी जाति पर गर्व करे।

रामविलास शर्मा की आत्मकथा को पढ़कर यह लगता है कि वे मिलते थे सबसे लेकिन प्रभावित वे अपने मन से होते थे। वे अन्य को प्रभावित करते थे। उनकी आत्मकथा में यह तत्व उभरकर कम आया है कि वे किससे प्रभावित हुए अथवा उन पर प्रच्छन्नतः किसका प्रभाव था।

रामविलास शर्मा ने अपनी आत्मकथा को ’टाइप ’ के आधार पर लिखा है। यह इकरंगा टाइप है। रैनेसां के सद गुणों से युक्त व्यक्तित्व इसमें उभरकर सामने आता है। उन्होंने अपने लेखन के जरिए बताया कि हिंदी नवजागरण का साम्राज्यवाद के साथ अंन्तर्विरोध था। हिंदी में प्रतिवादी साहित्य का आरंभ नवजागरण से होता है। यह प्रतिवादी स्वर जितना नवजागरण में नहीं है उससे ज्यादा रामविलास शर्मा के व्यक्तित्व में है। आलोचना में उन्होंने नवजागरण को प्रतिवादी नजरिए से देखने की परंपरा डाली।

रामविलास शर्मा की आत्मकथा और नवजागरण विमर्श में गहरा संबंध है। मसलन् , हिंदी नवजागरण का आरंभ 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से होता है और आत्मकथा में भी 1857 का संदर्भ लाकर वे अपने को इसी परंपरा से जोड़ते हैं। निराला पर जीवनी लिखते समय भी वे यही पद्धति अपनाते हैं। यानी सन् 1857 का संग्राम किसी न किसी रूप में उनके आत्मकथा और जीवनी लेखन में संदर्भ के रूप में प्रस्थान बिंदु बना रहता है। इसका समग्र मॉडल पुंसवादी है।

पुंसवादी मॉडल अपनाते हुए रामविलास शर्मा ने स्वयं को निष्पाप,निष्कलंक और भूलों से रहित मर्द के रूप में पेश किया है। इसमें निजी कम है और सामाजिक ज्यादा है और सब कुछ व्यवस्थित और सुनिश्चित दिशा में पाठक को ले जाने वाला है। तकरीबन इसी शैली में नामवर सिंह ने भी लिखा है। इन दोनों में आत्म की वैधता की पुष्टि का भाव प्रबल है। इन दोनों से सवाल किया जाना चाहिए कि उनके जीवन में किसी स्त्री का प्रभाव पड़ा या नहीं ? उसके विवरण और ब्यौरे कहां हैं ? क्या मर्द लेखक के लिए स्त्री सिर्फ जन्म देने,ब्याह करने अथवा बेटी मात्र के संदर्भ के रूप में जिंदा है ? आश्चर्य की बात है इन दोनों के यहां मैँ,पत्नी और बेटी पर भी न्यूनतम लिखा गया है। औरत की आत्मकथा से एकसिरे से अनुपस्थिति सामाजिक सत्य के साथ पर्दादारी है।

आत्म की अभिव्यक्ति के लिए आत्मकथा लिखी जाती है और अंतमें आत्म पर ही सवाल खड़े करती है। इसे ही पाल दे मान ने ‘डिफेसमेंट’ की संज्ञा दी है। यह व्यक्ति विशेष के सरोकारों का ‘डिफेसमेंट’ है। लेकिन रामविलास शर्मा की आत्मकथा में ऐसा कुछ भी नहीं घटता, बल्कि सब कुछ नियोजित,तर्कपूर्ण और वैध दिशा में घटित होता है। हिंदीसमाज में ‘आत्मगोपन’ का महत्व है। ‘आत्मगोपन’ और ‘गोपन’ से समूचा समाज घिरा हुआ है। यह भाव रामविलास शर्मा और नामवर सिंह तोड़ नहीं पाए हैं।

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