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सोमवार, 18 जुलाई 2011

हिन्दी में संवाद का अंत

                हिन्दी के इस देश में दो रूप हैं एक संवैधानिक है जिसके तहत हिन्दी कुछ राज्यों में प्रधानभाषा है तो कुछ राज्यों में अल्पसंख्यक भाषा है। जहां वह अल्पसंख्यकों की भाषा है वहां हिन्दीभाषी सांस्कृतिक अल्पसंख्यक हैं। इससे हमारे राष्ट्र-राज्य के ढ़ांचे को कोई चुनौती नहीं है। इस परिधि के बाहर दूसरी ओर हिन्दी और दूसरी भाषाओं का सर्जनात्मक संघर्ष भाषायी शक्ति अर्जित करने के लिए चल रहा है। इसमें तकनीकी- जगत आता है। इसमें कम्प्यूटर, व्यापार,डाटा बैंक,कम्प्यूटरीकरण,सॉफ्टवेयर, दूरसंचार,उद्योग, मासमीडिया आदि क्षेत्र आते हैं।  इस संघर्ष के परिणामों के बारे में अभी हमारे पास कोई सुचिंतित मूल्यांकन नहीं हैं। इसका प्रधान कारण है हिन्दी शिक्षकों की इस क्षेत्र में दिलचस्पी और जानकारी का अभाव।

    हिन्दी समीक्षक -शोधार्थी-प्रोफेसर आदि जब हिन्दी पर शोध करते हैं अथवा बातें करते हैं तो उनके विमर्श का मनवांछित विषय है 'राष्ट्रभाषा हिन्दी' ,' हिन्दी बनाम अंग्रेजी' , ' हिन्दी की उपेक्षा या दुर्दशा' ,' जातीय भाषा के रूप में हिन्दी ' ,' हिन्दी जाति ', ' हिन्दी संस्कृति' आदि। अधिकांश विमर्श इन विषयों पर है। इसी तरह साहित्य में उत्सवधर्मी विमर्श है।बमुश्किल एक दर्जन लेखक और विषय हैं जिन पर घूम-फिरकर गोष्ठियां ,लेखन और विमर्श होता रहा है।
       मसलन् किसी लेखक का जन्मदिन या शताब्दी वर्ष आ गया तो उस पर चर्चाएं कर लीं,कुछ नहीं मिला तो फैशन की तरह स्त्री साहित्य,दलित साहित्य,उत्तर आधुनिकतावाद, जनवादी साहित्य,प्रगतिशील साहित्य आदि पर गोष्ठी कर ली,विमर्श कर लिया अथवा किसी न्यूसेंस पर बहस कर ली। थोड़ा आगे गए तो हिन्दी भाषा और ब्रिटिशराज, नवजागरण और हिन्दी आदि पर विमर्श कर लिया। इस समूचे विमर्श की प्रकृति है "मैं यह सोचता हूँ"। हिन्दी  लेखक के यहां 'हम ' में भी 'मैं' की अभिव्यक्ति होती है। 'हम' में अनेक लेखकों-वक्ताओं के विमर्श में एक खास किस्म का अहं और अ-विनयी भाव है। वक्ता या लेखक संबंधित विषय पर जो सोचता है उसी को लिखता-बोलता रहा है। वह इस क्रम में प्रभुत्वशाली विचारों से टकराता है ।उनसे विवाद करता है। अनेकबार प्रभुत्वशाली विचारों के प्रति समर्पणभाव से पेश आता है। हिन्दी विमर्श में वह अपनी बुद्धि के कौशल तो दिखाता है लेकिन विषय के मर्म में प्रवेश नहीं कर पाता। विषय के अन्तःकरण का उदघाटन नहीं कर पाता।
        जो राष्ट्रभाषा बनाने में लगे हैं वे सत्ता के भाषायी कानूनों के सख्ती से पालन किए जाने की मांग कर रहे हैं। जो हिन्दी संस्कृति की खोज कर रहे हैं या हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते हैं वे मूलतः हिन्दीभाषा के संदर्भ क्षेत्र के बाहर नहीं देखते। वे भाषिक संदर्भ के बाहर हिन्दीराज्यों में घट रहे सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-मीडिया परिवर्तनों के संदर्भ को नहीं देखते। भाषिक परिवर्तन भाषा के बाहर समाज,संस्कृति,मीडिया आदि में चल रही प्रक्रियाओं से गहरे जुड़े हैं। इन प्रक्रियाओं के प्रति गंभीर अध्ययन-अध्यापन का भाव अभी तक पैदा नहीं हुआ है।
     हिन्दी विमर्श की मूल समस्या है धारणाओं-विचारों की पुनरावृत्ति की। आलोचना और विमर्श के नाम पर पुनरावृत्ति के नाम जो लिखा गया है उसमें नए नजरिए का अभाव है। अधिकांश हिन्दी विचारक दोहराते हैं ,वे नए दृष्टिकोण को अभिव्यक्त नहीं करते।
    इसी तरह हिन्दी में बड़े पैमाने पर अनुवाद हो रहा है। इससे हिन्दी में किस तरह के बदलाव आ रहे हैं ? किस तरह के नए शब्द आ रहे हैं ? नए शब्दों का अपना रोमांस होता है। हिन्दी में यह रोमांस किस रूप में चल रहा है और हिन्दी आलोचक किस तरह नए शब्दों के साथ खेल रहे हैं। इस प्रसंग में हमें उत्तर आधुनिकतावाद और आधुनिकतावाद पर चले विमर्शों को देखना चाहिए। साहित्य और आलोचना में नए शब्दों का रोमांस हमें आनंदित करता है। इस रोमांस में एक खास किस्म की घृणा भी विकसित हुई है शब्दों के प्रति।
      मसलन् ,हिन्दी में 'मनोविज्ञान' और 'मनोवैज्ञानिक ' 'साहित्य का समाजशास्त्र' , 'विमर्श ' ,'उत्तर आधुनिकतावाद' आदि को हिन्दी आलोचकों का व्यापक समूह हेयदृष्टि से देखता है। उल्लेखनीय है  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पर जब रामविलास शर्मा की आलोचना कृति 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना' आई तो उसकी आलोचना करते हुए शिवदानसिंह चौहान ने उसे 'समाजशास्त्रीय आलोचना' कहा था और साहित्य के समाजशास्त्र को गाली की तरह इस्तेमाल किया था,हिन्दी में यही दशा आधुनिकतावादियों,मनोवादियों और उत्तर आधुनिकतावादियों की भी हुई है। इन सब पर तिरस्कार और घृणा के नजरिए से बहस हुई है।
   हिन्दी में नए शब्दों को लेकर किस तरह का नॉनसेंस भाव है ,इसका एक अनुभव बताना चाहूँगा। कुछ अर्सा पहले भारतीय भाषा परिषद में हजारीप्रसाद द्विवेदी शताब्दी समारोह के मौके पर एक विशाल सेमीनार हुआ जिसमें मैंने हजारीप्रसाद द्विवेदी और हाइपरटेक्स्ट के बारे में एक पर्चा पढ़ा। इस सेमीनार में प्रतिभा अग्रवाल ने नामवरसिंह से पूछाकि हाइपरटेक्स्ट क्या है ?इस पर नामवरसिंह ने कहा यह 'हाइपरटेंशन' है। हिन्दी के प्रमुख आलोचक के इस विनोदप्रिय उत्तर में वे तमाम बीमारियां छिपी हैं जो नए शब्दों और नए साहित्य सिद्धांतों के प्रति हिन्दी में दिखती हैं। कहने का अर्थ यह है कि हिन्दी का आलोचक खासतौर पर नए शब्दों और धारणाओं के साथ रोमांस नहीं करता। वह उनसे घृणा करता है,उसके अर्थ को विकृत करता है।
      आप जब किसी भाषा का अनुवाद करते हैं तो उसकी प्रस्तुति और रूख के आधार पर उसमें अतिरिक्त अर्थ की सृष्टि करते हैं। साथ ही उस शब्द की नए सिरे से कोडिंग करते हैं ,संहिता बनाते हैं।
        हिन्दी आलोचकों में बड़ा हिस्सा प्रगतिशील है,कुछ हैं जो प्रगतिशीलता के दायरे में नहीं आते। ये सभी लोग किसी न किसी रूप में हिन्दी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं। उनकी इस प्रतिबद्धता का हिन्दी के प्रति उनके आचरण के साथ गहरा संबंध है। वे मानते हैं  उनकी सामाजिक परिवर्तन में भूमिका है। लेकिन इस रूपान्तरण का संबंध उनके आचरण से जुड़ा है। यह परिवर्तनकामी रूप तब ही प्रभावित करेगा जब उन संरचनाओं के बारे में सवाल करें जो उत्पीड़न का औजार हैं। उस यथार्थ का रूपान्तरण करें जो जनता को उत्पीडित करता है। हिन्दी आलोचक महज चिंतक हो और उत्पीडित लोग महज कार्यकर्ता हों,इससे दुनिया बदलने वाली नहीं है।
     हिन्दी आलोचना संवाद नहीं करती ,वहां उपदेशक के विचार होते हैं और वे अपने पाठक से अनुसरण करने की मांग करते हैं। उपदेशक और अनुसरणकर्ता का संबंध मूलतः मालिक-दास संबंध है।इस संबंध के आधार पर हिन्दी को सामाजिक परिवर्तन की भाषा नहीं बनाया जा सकता।साहित्य सामाजिक परिवर्तन का औजार बने इसके लिए जरूरी है कि लेखक-आलोचक-प्रोफेसर प्रभुत्वशाली अभिजनों के खिलाफ खड़े हों। उनके आचरण का विरोध करे।
     पाओलो फ्रेरे ने लिखा है चालबाजी करने,नारेबाजी करने,'जमा'करने ,निर्देश देने, और कठोर अनुशासन लागू करने से क्रांतिकारी आचरण नहीं बनता,क्योंकि इनसे तो प्रभु का आचरण बनता है। प्रभु वर्ग जनता पर शासन करने के लिए सच्चा आचरण नहीं करने देता। यह उसकी विशेषता होती है कि वह जनता को अपना शब्द न बोलने दे,उसे अपना चिंतन न करने दे।वह संवादात्मक ढ़ंग से काम नहीं कर सकता। इसका मतलब होगा कि या तो उसने शासन-सत्ता को त्याग दिया है और उत्पीडितों के उद्देश्य को उचित मानकर उनके साथ आ गया है।
    इन दिनों साहित्य और भाषा में वस्तुकरण की प्रक्रिया चरम पर है। भाषा के शब्द बिक चुके हैं,वे ट्रेडमार्क बनाए जा चुके हैं। नाम बिक चुके हैं। शब्दों के चीजों में बदले जाने के खिलाफ हमारी आलोचना ने कभी ध्यान नहीं दिया। दूसरी ओर हिन्दी में संवाद का माहौल खत्म हो गया है। शिक्षक-छात्र में संवाद नहीं है।पूंजीपति-मजदूर में संवाद नहीं है। नेता और जनता में संवाद नहीं है। संवाद के वातावरण के अंत से सत्ताधारी वर्गों को मदद मिली है।  सवाल उठता है हिन्दी आलोचना संवाद से क्यों भाग रही है ? क्या यह हिन्दी आलोचना के पराभव की सूचना है ? दूसरी ओर  कम्युनिस्टों और जनता में संवाद टूट चुका है।ऐसे में सामाजिक परिवर्तन कैसे होगा ?  
    संवाद टूटने से हम और भी अकेले हो गए हैं। घनिष्ठता खत्म हुई है। साहित्य, साहित्यकार, क्रांतिकारी ,जनता ,शिक्षक और छात्र आदि के बीच में संवाद हो ,इससे शासकवर्ग कमजोर बनेंगे। समस्या यथार्थ को बताने के साथ उसको बदलने की है। हमारे साहित्यकार यथार्थ बता रहे हैं लेकिन इस यथार्थ को कैसे मूलगामी तौर पर बदलें इस पर उनका ध्यान नहीं है। यथार्थ के रूपान्तरण के सवाल जब तक नहीं उठाए जाते तब तक साहित्य की परिवर्तनकामी भूमिका की ओर ध्यान नहीं जाएगा।
   हम टेलीविजन,रेडियो और दैनिक अखबारों में जो तथाकथित संवाद देखते हैं यह मूलतः उन्हीं विषयों पर होते हैं जिसे शासकों ने तय किया है।टीवी या मीडिया संवाद के विषय हैं- भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता,नव्य उदारतावाद,भूमंडलीकरण,पृथकतावाद, मासकल्चर के रूप, कामुकता आदि। ये आम जनता के नहीं शासकवर्गों के विषय हैं। ऊपर से यही लगता है ये जनता के विषय हैं लेकिन वास्तव में ये जनता के नहीं शासकवर्ग के विषय हैं। इन विषयों पर संवाद चलाकर मीडिया हमें सामाजिक परिवर्तन के सवालों से विमुख रखता है। इन पर चलने वाला संवाद मूलतः जनता की अंतर्वस्तु को पालतू बनाने की साजिश का हिस्सा है।
     पहले लेखक जब भाषा का इस्तेमाल करता था तो व्यक्तिगत आजादी और आत्मगतता को व्यक्त करते हुए स्पेस और टाइम का अतिक्रमण कर जाता था। आपातकाल के बाद लेखक ने 'स्व' और 'वर्तमानकेन्द्रित' भाषा पर व्यापक जोर दिया है। दैनन्दिन जीवन के अनुभव,दैनन्दिन विवाद, रोजमर्रा के राजनीतिक सवालों को वर्तमान की भाषा में रचा है। फलत: रचना की काल की सीमा के अतिक्रमण की क्षमता खत्म हो गयी है। अब जितनी जल्दी रचना जनप्रिय बनती है उतनी ही जल्दी लोग उसे भूल जाते हैं। रचना की जनप्रियता रचना से पैदा नहीं हो रही बल्कि उसे प्रायोजित करके पैदा किया जा रहा है। यह कृत्रिम जनप्रियता है। जन-संपर्क के फार्मूले से उपजी जनप्रियता है इसका साहित्य की गुणवत्ता से कोई संबंध नहीं है।
  आजादी के दौरान पैदा हुई प्रामाणिक अनुभूति ने 'स्व' की खोज, 'स्व' के साथ संवाद को जन्म दिया। उस दौर में लेखक मनुष्य के अलावा किसी भी विकल्प को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। लिंग,जाति,धर्म,अस्मिता आदि न जाने कितने विकल्प उसके सामने आए उन्हें 'स्व' के सामने खारिज करता चला गया। 'स्व' के सामने उसने सबको 'नकार' दिया। यही नकार का भाव उसकी सबसे बड़ी संपदा है। उसने यह जानने की कोशिश की कि नकार क्या है ? इस क्रम में लेखक अपने को चीजों के बाहर रखकर देखता था। फलत: मुक्त था। यही उसकी आजादी का आधार था। लेखक जब अपने को बाहर रखकर चीजों को चित्रित करता है तो उसकी चेतना स्वयं से भी आजाद होती है।











सोमवार, 20 जून 2011

सांस्कृतिक पराधीनता और हिन्दी संस्थान


इन दिनों हिन्दी हम हिन्दी वाले हिन्दी की सेवा नहीं कर रहे ।मालिकों की सेवा कर रहे हैं। विश्वविद्यालय-कॉलेज में पढ़ाने वाले या केन्द्र सरकार के संस्थानों के हिन्दी अधिकारी इस भ्रम में हैं कि वे हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, असल में वे मालिकों की सेवा कर रहे हैं और उनकी सेवा के लिए सुंदर सेवक तैयार कर रहे हैं। हिन्दी को मालिकों की भाषा मालिकों ने नहीं हम बुद्धिजीवियों-हिन्दीसेवियों ने बनाया है।  
रघुवीर सहाय ने एक कविता में लिखा है, "वही लड़ेगा अब भाषा का युद्ध/जो सिर्फ अपनी भाषा में बोलेगा/ मालिक की भाषा का एक शब्द भी नहीं/चाहे वह शास्त्रार्थ न करे जीतेगा/बल्कि शास्त्रार्थ वह नहीं करेगा/वह क्या करेगा अपने गूँगे गुस्से को वह /कैसे कहेगा ? तुमको शक है /गुस्सा करना ही/गुस्से की एक अभिव्यक्ति जानते हो तुम/वह और खोज रहा है/ तुम जानते नहीं।"यानी मालिक की भाषा से बचने का कोई शास्त्र है हमारे पास ?हम क्यों और कब से मालिक की भाषा बोल रहे हैं ? हिन्दी को मालिक की दासी कैसे बनाया गया ? अरबो-खरबों रूपये खर्च करने बाबजूद हिन्दी आज भी पिछड़ी क्यों है ? इत्यादि सवालों पर गंभीरता के साथ विचार करने री जरूरत है।
हिन्दी पर केन्द्र सरकार करोड़ों रूपये सालाना खर्च करती है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान,केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय और वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय से लेकर देश के विभिन्न विश्वविद्यालय और कॉलेजों में चल रहे हिन्दी विभागों के अकादमिक उत्पादन पर नजर डाली जाए तो बहुत ही असंतोषजनक तस्वीर सामने आती है। हिन्दी के समस्त कार्य व्यापार से जुड़े लोग हिन्दी के पठन-पाठन और अनुसंधान को यह मानकर करते हैं कि वे राष्ट्रभाषा का विकास कर रहे हैं और इस नाते हिन्दी तो सबकी है और उसे सबको सीखना चाहिए और हमें सिखाना चाहिए।
     हिन्दी शिक्षक कक्षाओं में हिन्दी को एक नेचुरल भाषा के रूप में पढ़ाते हैं। वे हिन्दी के उद्भव और विकास को गैसपेपर मार्काशैली में पढ़ाते हैं और उसके विकास के पीछे निहित ऐतिहासिकता की हत्या कर देते हैं। वे चाहते हैं हिन्दी भारत की सार्वभौम भाषा बन जाए। इसके विकास और प्रसार के लिए वे शुद्ध व्यवहारमूलक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं और उसके पीछे निहित ऐतिहासिकता को छिपाते हैं। वे उसे महाभाषा के रूप में भी प्रचारित करते हैं। सच यह है  मध्यकाल में हिन्दी कभी भी सत्ता और न्याय की भाषा नहीं रही और आज भी नहीं है। आज भी सरकार और अदालत के सभी दस्तावेज हिन्दी में नहीं अंग्रेजी में तैयार किए जाते हैं।
     इसके अलावा मध्यकाल से लेकर आधुनिककाल तक के जितने भी बड़े दार्शनिक विमर्श हैं उनमें में से कोई भी हिन्दी में नहीं हुआ। ऐसी अवस्था में हिन्दी को भारत की स्वाभाविक राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचारित-प्रसारित करना पाखंड है। देश की स्वाभाविक भाषा वो है जिसमें न्यायपालिका और सत्ता बातें करते हैं। दर्शन का विमर्श जिसमें तैयार होता है। हमारे भाषाविज्ञानी तरह-तरह से हिन्दी के उत्थान-पतन की गाथाएं बताते हैं लेकिन किसी ने भी इस पहलू को ध्यान में नहीं रखा कि भाषा के राष्ट्रीय भाषा बनने में कौन से पक्ष प्रधान होते हैं। वे मात्र साहित्य जगत के भाषिक प्रयोगों को केन्द्र में रखकर बातें करते हैं।
     वे कभी भाषा पर सत्ता,दर्शन,शास्त्रीय विमर्श और न्यायव्यवस्था की भाषा के संदर्भ में बात नहीं करते। इसके बिना भाषा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य नहीं बनता। मुश्किल यह है कि विमर्श जिस भाषा में हो रहा है और साहित्य जिस भाषा में लिखा जा रहा है उनमें किसी भी किस्म का आदान-प्रदान है कि नहीं ? विमर्श को सामाजिक-सांस्थानिक मानकर व्यक्ति के हवाले कर दिया गया और साहित्य को समाज के हवाले करके हमने विमर्श और भाषा के बीच में पैदा हुए अन्तर्विरोध की सृष्टि कर दी।
      हाल के वर्षों में हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचकों ने विमर्श पदबंध को उत्तर आधुनिक मानकर जिस तरह की खिल्लियां उड़ायी हैं उससे यही पता चलता है कि हिन्दी में भाषा और विमर्श में वे अतराल मानकर चल रहे थे। हिन्दी में जिसे आलोचना कहते हैं यह आधुनिक विधा है। मध्यकाल में हिन्दी में कोई आलोचना या विमर्श नहीं है। भाषाविज्ञानी और आलोचकों ने हिन्दी भाषा पर पाठकेन्द्रित होकर लिखा। विमर्श केन्द्रित होकर कुछ भी नहीं लिखा। भाषा के वाचिक और साहित्यिक प्रयोगों का विवेचन किया। वे इन रूपों के प्रभाव या रूपान्तरण की चर्चा कम करते हैं।  वे हिन्दी और अन्य भाषाओं के विकास को रेखांकित करते हैं। इस प्रक्रिया में भाषा स्वयं में एक संरचना और सिस्टम बनती चली गयी। उसके नियम बने। नियमों के आधार पर ही फैसले लिए गए। ऐसी अवस्था में भाषा में कोई भी बदलाव लाने के लिए नियमों में बदलाव जरूरी है ,नियमों में बदलाव के जरिए हम भाषा  और सिस्टम के संबंधों में भी बदलाव कर सकते हैं।
   मजेदार बात यह है कि हिन्दी भाषा को आधुनिककाल आते ही सभी रंगत के विचारक-समाज सुधारक और साहित्यकार राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे। इस चक्कर में अन्य भाषाओं और बोलियों के प्रति समानता के भाव को तिलांजलि देदी गयी और हिन्दी को विशेषाधिकार देने पर जोर दिया गया। हिन्दी की महत्ता,सत्ता और परंपरा पर अतिरिक्त बल देने के कारण भाषाविज्ञानियों और आलोचकों ने भाषा और विमर्श के क्षेत्र में जांच के काम को तिलांजलि दे दी। वे वहां सत्य की खोज में जुट गए। जबकि आलोचना का यह काम नहीं है कि वह सत्य खोजे या दावे के साथ बताए। आलोचना का काम हैं जांच करना।
     आधुनिक काल आने के साथ जगदीशचन्द्र बसु,सत्येन्द्र बसु आदि की विज्ञान रचनाएं बांग्लाभाषा में आईं। गिरीन्द्रशेखर बसु ने मनोविज्ञान पर काम किया. ये लोग अपने क्षेत्र के महारथी थे। गिरीन्द्रशेखर बसु की रचनाओं से फ्रॉयड ने बहुत कुछ सीखा और मनोशास्त्र की अनेक धारणाएं बनायीं और गिरीन्द्रशेखर बसु के योगदान को माना, फ्रॉयड का उनसे नियमित पत्र-व्यवहार भी होता था। यही स्थिति अन्य वैज्ञानिकों की थी वे भी अपनी मौलिक खोजों को पहले अपनी भाषा में लेकर आए। इससे बांग्ला भाषा में विमर्श का वातावरण बना।
     लेकिन हिन्दी में ऐसा अभी तक नहीं हो पाया है। दर्शन,विज्ञान,राजनीतिशास्त्र आदि में आज भी हिन्दी कम्युनिकेशन की भाषा नहीं बन पाई है। आज भी इन क्षेत्रों में पढ़ने-पढ़ाने के लिए अंग्रेजी की मदद लेनी होती है लेकिन हम मुगालते में हैं कि हिन्दी राष्ट्रभाषा है ,राष्ट्रीय विमर्श की भाषा है।
      सच यह है हिन्दी में एक भी ऐसा विमर्श नहीं हुआ जिसने भारत या उसके बाहर प्रभाव छोड़ा हो। जबकि संस्कृतभाषा के साथ ऐसा नहीं है। बांग्लाभाषा के साथ ऐसा नहीं है। संस्कृत के साहित्य,न्याय-दर्शन,नीतिशास्त्र,काव्यशास्त्र,नाट्यशास्त्र आदि तमाम क्षेत्रों का आज भी सारी दुनिया में अध्ययन-अध्यापन होता है। क्योंकि संस्कृत सिर्फ साहित्य की भाषा नहीं थी,वह विज्ञान,गणित,दर्शन,न्याय,कामशास्त्र आदि जटिततम विषयों के विमर्श की भाषा भी थी ।
      हिन्दी की स्थिति इसकी तुलना में बेहद खराब है। हिन्दी ने अपने को साहित्य, बातचीत,सरकारी कामकाज की भाषा और मीडिया की भाषा तक सीमित रखा है। इससे हिन्दी का रुका है। हिन्दी अभी तक विचार,विज्ञान,तकनीक आदि की भाषा क्यों नहीं बन पायी है ? हमारे हिन्दी संस्थानों की इसमें बड़ी भूमिका है। हिन्दी के बुद्धिजीवियों की ,खासकर प्रोफेसरों की बड़ी भूमिका है।
    हिन्दी के प्रोफेसरों और हिन्दी ऑफीसरों ने जो संसार रचा है वह भाषा का सीमित संसार है। हिन्दीवाले को हिन्दी के विकास के नाम पर कुछ भी करना होता है तो वे सेमीनार करते हैं और स्वयं मंच पर बैठ जाते हैं। यानी हिन्दी बुनियादी तौर पर सेल्फ -प्रमोशन स्कीम का हिस्सा है। निजी उत्थान और निजी महिमा को वे राष्ट्रीय उत्थान और हिन्दी महिमा समझते हैं। जबकि इसका हिन्दी विकास से कोई संबंध नहीं है।
हिन्दी आलोचकों-प्रोफेसरों और साहित्यकारों को साहित्य और कम्युनिकेशन माध्यमों में हिन्दी की सत्ता का विस्तार खूब आनंदित करता है। जबकि इस विस्तार से भाषा समृद्ध नहीं होती। पता करें कि मासमीडिया और सूचना तंत्र के व्यापक विकास के बाबजूद हिन्दी कितनी समृद्ध हुई है ? सच यह है कि हिन्दी के अनेक बड़े अखबार अभिव्यक्ति के लिए अंग्रेजी पदबंधों के अनिवार्य प्रयोग पर बल दे रहे हैं। हिन्दी की दयनीय अवस्था का अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि केन्द्र सरकार की कोई भी नीति या पत्र पहले हिन्दी में नहीं लिखा जाता। सारे सरकारी तंत्र के संप्रेषण की भाषा अंग्रेजी है। रघुवीर सहाय की कविता है 'हिन्दी '- ' पुरस्कारों के नाम हिंदी में हैं/ हथियारों के अंग्रेज़ी में /युद्ध की भाषा अंग्रेजी है /विजय की हिन्दी।"एक अन्य कविता में रघुवीर सहाय ने लिखा है, "अँग्रेजों ने अँग्रेजी पढ़ाकर प्रजा बनाई/ अँग्रेजी पढ़ाकर अब हम प्रजा को राजा बना रहे हैं।"
   आधुनिककाल में हिन्दी के विकास का जो रास्ता हमने चुना है वह बाजार , महानगर,विश्वविद्यालय और कम्युनिकेशन मीडियम केन्द्रित है। इन चारों का हमारे देश आर्थिक विकास के मॉडल से गहरा संबंध है। इसमें बुनियादी चीज है हिन्दी की "शर्तयुक्त परिस्थिति"। यह "शर्तयुक्त परिस्थिति" क्या है ? मसलन्, केन्द्र सरकार के ऑफिस में हिन्दी में काम करना होगा इसके लिए हिन्दी अधिकारी,हिन्दी टाइपिस्ट आदि रखो। काम नहीं करना है तो कोई जरूरत नहीं है। चूंकि हिन्दी राजकाज की भाषा या राष्ट्रभाषा है तो हिन्दी के विभाग तो होने चाहिए। ये "शर्तयुक्त परिस्थिति" अपने आपमें पराधीनता की द्योतक हैं। यानी शर्तयुक्त परिस्थिति को सांस्कृतिक पराधीनता कहते हैं। इसमें काम करने वाले के सामने दो ही संभावनाएं बचती हैं ,प्रथम, परिस्थिति के अंतर्गत स्पष्ट विकल्पों में चयन,दूसरा, इस शर्तयुक्त परिस्थितियों को बदलकर कार्य की अन्य संभावनाओं की खोज करना। हिन्दीवालों ने पहली स्थिति में अपने को ढ़ाल लिया है,इसका दुष्परिणाम है कि हिन्दी आज जनता की कम सरकार भाषा के रूप में ज्यादा जानी जाती है। इसी स्थिति को ध्यान में रखकर रघुवीर सहाय ने एक बड़ी ही शानदार कविता लिखी है 'हिन्दी'- लिखा,
"हम लड़ रहे थे/समाज को बदलने के लिए एक भाषा का युद्ध/ पर हिन्दी का प्रश्न अब हिन्दी /का प्रश्न नहीं रह गया/हम हार चुके हैं/अच्छे सैनिक/अपनी हार पहचान/अब वह सवाल जिसे भाषा की लड़ाई हम कहते थे/ इस तरह पूछः/हम सब जिनकी ख़ातिर लड़ते थे/ क्या हम वही थे ?/या उनके विरोधियों के हम दलाल थे/- सहृदय उपकारी शिक्षित दलाल ?/आज़ादी के मालिक जो हैं ग़ुलाम हैं/उनके गुलाम हैं जो वे आज़ाद नहीं/हिन्दी है मालिक की/तब आजादी के लिए लड़ने की भाषा फिर क्या होगी ?/ हिन्दी की माँग/ अब दलालों की अपने दास-मालिकों से/एक माँग है/बेहतर बर्ताव की/अधिकार की नहीं/वे हिन्दी का प्रयोग अंग्रेजी की जगह/करते हैं/जबकि तथ्य यह है कि अंग्रेजी का प्रयोग/उनके मालिक हिन्दी की जगह करते हैं/दोनों में यह रिश्ता तय हो गया है/जो इस पाखण्ड को मिटाएगा/हिन्दी की दासता मिटाएगा
/वह जन वही होगा जो हिन्दी बोलकर/रख देगा हिरदै निरक्षर का खोलकर।"






गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष-हिन्दी में कीर्त्ति फल के उपभोक्ता

                               (बाबा नागार्जुन)
        नागार्जुन पर जो लोग शताब्दी वर्ष में माला चढ़ा रहे हैं। व्याख्यान झाड़ रहे हैं। नागार्जुन के बारे में तरह-तरह का ज्ञान बांट रहे हैं ऐसे हिन्दी में 20 से ज्यादा लेखक नहीं हैं। ये लेखक कम साहित्य के कर्मकाण्डी ज्यादा लगते हैं। आप इनमें से किसी को भी फोन कीजिए ये लोग किसी भी कार्यक्रम और किसी भी विषय पर बोलने के लिए मना नहीं करते। वे जिस भावभंगिमा के साथ प्राचीन कवि स्वयंभू पर बोलते हैं उसी भावभंगिमा और विवेक के साथ नागार्जुन पर भी बोलते हैं। वे जिस भाव से अज्ञेय पर बोल रहे हैं उसी भाव से केदारनाथ अग्रवाल पर भी बोल रहे हैं। आप तय नहीं कर सकते कि इनका इस लेखक के बारे में क्या स्टैंड है ? आपको यह पता नहीं लगेगा कि ये इस लेखक के बारे में कितना जानते हैं और इन्होंने क्या लिखा है। असल में ये हिन्दी में कीर्तिफल के उपभोक्ता हैं।
       खासकर कवि चतुष्टयी के कवियों पर विगत दस सालों में नया क्या लिखा है ? आप पता करने जाएंगे तो निराशा हाथ लगेगी। हिन्दी के ज्ञान कांड की यह वास्तव तस्वीर है। इसमें लेखकों और आलोचकों का एक झुंड है जो पूरे देश में कवि चतुष्टयी पर बोलता घूम रहा है।
   मेरी अभी तक यह समझ में नहीं आता कि जब वक्ता ने संबंधित विषय पर विगत एक दशक में नया कुछ लिखा ही नहीं तो फिर आयोजक ऐसे वक्ताओं को क्यों बुलाते हैं ? ऐसा क्यों होता है कि ये 20 हिन्दी लेखक-आलोचकों में से सभी कार्यक्रमों में लेखक बुलाए जाते हैं ? सवाल उठता है कि वर्षों से जिसने उस लेखक या विषय पर कभी लिखा ही नहीं तो ऐसे व्यक्ति को आयोजक क्यों बुलाते हैं ? संबंधित विषय के बारे में ये विद्वान कितने गंभीर हैं यह बात तो इससे ही सिद्ध हो जाती है कि उन्होंने वर्षों से उस पर लिखा ही नहीं।
    असल में हिन्दी में आयोजनों का अधिकांश ठेका इन्हीं स्वनामधन्य विद्वानों के पास है। इन लोगों ने वातावरण ऐसा बनाया है कि आपको लगेगा कि नागार्जुन वाले कार्यक्रम में इन विद्वानों को नहीं बुलाएंगे तो कार्यक्रम बढ़िया नहीं हो पाएगा। बढ़िया कार्यक्रम के लिए बढ़िया अंतर्वस्तु और नई प्रस्तुति भी चाहिए। ये लेखक विगत 20 से भी ज्यादा सालों से सभी कार्यक्रमों में आ-जा रहे हैं शोभा बढ़ा रहे हैं और हिन्दी के ज्ञानकांड को कर्मकांड में तब्दील कर चुके हैं। हिन्दी आलोचना के वातावरण को नष्ट करने में इनकी टोली और इनके मुखियाओं की जो भूमिका रही है उस पर इस शताब्दी वर्ष में कड़ी समीक्षा करने की जरूरत है।
ऐसी ही अवस्था पर नागार्जुन ने "कीर्त्ति का फल" नामक कविता लिखी थी-पढ़ें और सोचें-
अगर कीर्त्ति का
फल चखना है
कलाकार ने फिर-फिर
सोचा-
आलोचक को खुश रखना है!
अगर कीर्त्ति का
फल चखना है
आलोचक ने फिर-फिर
सोचा
कवियों को नाथे रखना है!!




विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...