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बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

"आप" की जीत का सच



   दिल्ली विधानसभा चुनाव हो गए, चौदह फ़रवरी 2015 को नए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण करेंगे । वे रोड शो करते हुए सभा स्थल तक जाएँगे। यह नए क़िस्म का शक्ति प्रदर्शन और मीडिया इवेंट है । यह असल में मोदी के जलसेबाज फिनोमिना का जलसेबाजी से खोजा जा रहा विकल्प है । यह दुनिया के सामने लोकतंत्र को मजमे में तब्दील करने का शो भी है। अन्ना हज़ारे के सुझाव को केजरीवाल ने मान लिया होता तो बेहतर होता।   यह लोकतंत्र के नायक की पहली चूक गिनी जाएगी। सादगी से शपथग्रहण समारोह करने से केजरीवाल का क़द छोटा नहीं होता , जलसेबाजी से क़द बड़ा भी नहीं होता ! केजरीवाल का जलसा प्रेम अंततः मोदी के छंद में बँधने की शुरुआत है । मोदी को बेनक़ाब करने के लिए मोदी का छंद चुनाव तक प्रासंगिक है , सत्तारुढ़ होने के बाद जलसेबाजी करना लोकतंत्र और नेता की ताक़त कम और कमज़ोरी ज्यादा दिखाता है। बेहतर होता शपथग्रहण की जलसेबाजी न होती ! 
         केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को दिल्ली में अभूतपूर्व विजय हासिल हुई है । यह जीत क्यों और कैसे मिली ? किन शक्तियों की इस जीत में भूमिका थी ? कारपोरेट घरानों की प्रतिस्पर्धा की क्या भूमिका थी ? संघ और कांग्रेस की क्या भूमिका थी ? देश की भावी राजनीति का स्वरुप क्या होगा ? इत्यादि सवालों पर आने वाले समय में विस्तार से सूचनाएँ और विश्लेषण आएँगे । लेकिन एक बात तय है कि यह जीत अभूतपूर्व है। 
         ' आप' की जीत के बारे में जनमत सर्वेक्षण दूसरी बार एकसिरे से ग़लत साबित हुए हैं , इससे जनमत सर्वेक्षण की वैज्ञानिकता के सभी दावों पर सवालिया निशान लगा है । जनमत सर्वेक्षण लगातार दो बार ग़लत साबित होना, यहाँ तक तक कि 'आप' का सर्वे भी ग़लत साबित होना दर्शाता है कि आम जनता अॉंकड़ा नहीं है। आम जनता की राय को मीडिया इच्छित दिशा में नहीं मोड़ सकता ! मीडिया प्रचार की सीमाएँ हैं , लेकिन ज़मीनी प्रचार की कोई सीमा नहीं है,वह आज भी सबसे ज्यादा प्रभावशाली है। 
       दूसरा संदेश यह निकलता है कि धर्मनिरपेक्ष संगठन के निकास के आम जनता में व्यापक आसार हैं । धर्मनिरपेक्ष राजनीति को किसी भी तरह हाशिए पर रखकर लोकतंत्र का अपहरण नहीं किया जा सकता।  ' आप' किस वर्ग के विचारों का दल है इसके बारे में वे भी नहीं छिपाते। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है कि ' आप' धर्मनिरपेक्ष - लोकतांत्रिक  दल है और उसके पास लोकतंत्र का वैकल्पिक नजरिया है और संविधान में वर्णित मूल्यों के प्रति उसकी गहरी आस्थाएँ हैं। यही चीज उसे अन्य बुर्जुआदलों ( कांग्रेस-भाजपा-सपा-बसपा आदि) से भिन्न बनाती है । 
                       भारत में स्वस्थ बुर्जुआ राजनीति के लिए पर्याप्त स्थान है और यही चीज " आप" की प्रासंगिकता के साथ बुर्जुआ राजनीति की प्रासंगिकता को भी पुष्ट करती है । 
           केजरीवाल की 2015 की दिल्ली जीत का प्रधान कारण है दैनंदिन जन समस्याओं का समाधान न कर पाने में केन्द्र सरकार की असफलता । केन्द्र सरकार ने यदि जन समस्याओं के समाधान का प्रयास किया होता तो भाजपा को इतनी बुरी हार का सामना न करना पड़ता। कहने को दिल्ली राजधानी है लेकिन अराजक और जनविरोधी विकास के कांग्रेसी मॉडल का आदर्श नमूना है। मोदी सरकार ने विगत आठ महिनों में इस मॉडल में कोई बदलाव नहीं किया। बिजली के बिल, बिजली की सप्लाई , पानी की सप्लाई और क़ानून और व्यवस्था , प्रदूषण आदि समस्याओं के साथ झुग्गी- झोंपड़ियों के अबाधित प्रसार और नागरिक सुविधाविहीन संसार ने आम जनता को भयानक क्रोध से भर दिया है ।
   " आप" ने आमजनता को उपरोक्त सवालों पर परंपरागत कम्युनिकेशन के आधार पर संगठित किया । जन समर्थन जुटाने के परंपरागत तरीक़ों के जरिए ताक़तवर संगठन का निर्माण किया ।साथ ही आम जनता को मतदान पेटियों तक पहुँचाया। इस प्रक्रिया में "आप" का जनाधार क्रमश: बढा और उसका प्रचार भी सबसे ज्यादा प्रभावशाली रहा। 
         यह कहना ग़लत है कि संघ की फूट का या कांग्रेस के मतों की "आप" की जीत में कोई निर्णायक भूमिका है। कांग्रेस और संघ ने यथाशक्ति संघर्ष किया लेकिन आम जनता के व्यापकतम तबक़ों को अपने साथ जोड़ने में ये दोनों ही दल असफल रहे हैं। जो दल चुनाव लड़ते हैं वे हारने के लिए नहीं लड़ते । संघ-भाजपा - कांग्रेस ने चुनाव ताक़त के साथ लड़ा अत: उनके वोट "आप" को नहीं मिले । 
    भाजपा को एक साल पहले विधानसभा चुनाव में जितने मत मिले थे तक़रीबन उतने ही वोट उसे इसबार भी मिले हैं। यह बात दीगर है कि लोकसभा चुनाव की तुलना में उसे कम वोट मिले हैं। लेकिन लोकसभा चुनावों के वोटों के साथ तुलना करना सही नहीं होगा। 
       केजरीवाल की जीत में "आप" की मीडिया और प्रौपेगैण्डा रणनीति बेहद आकर्षक और प्रभावशाली रही है। उसके सभी शीर्ष नेताओं का सोशल मीडिया से लेकर जनसभाओं और रोड शो तक सक्रिय रहना, टीवी से लेकर नुक्कड़ सभाओं तक बोलना बेहद प्रभावशाली रहा है। इस समूची प्रक्रिया में " आप" ने लोकतंत्र का राजनीतिक चरित्र निखारा है और राजनीति के प्रति आम लोगों की आस्था को पुख़्ता बनाया है। 
                  भाजपा आरंभ से मोदी और टीवी उन्माद पर केन्द्रित रही और ये दोनों ही पहलू ज़मीनीस्तर पर आम जनता को प्रभावित करने में असमर्थ रहे। आश्चर्यजनक बात यह रही कि विकास की बातें करने वाले मोदी ने निजी हमले किए, निम्नस्तरीय राजनीतिक जुमलेबाजी और नारेबाज़ी की भाषा का प्रचार में इस्तेमाल किया। वे एक भी सकारात्मक बात आम जनता के सामने नहीं रख पाए । किरनबेदी को भाजपा ने आख़िरी समय में केजरीवाल के दबाव में मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रुप में पेश किया । 
    असल में  किरनबेदी की टीवी इमेज से प्रभावित होकर ही मोदी ने उनको मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया। सच यह है कि किरन बेदी की टीवी इमेज का संबंध अन्ना के आंदोलन से था , उस इमेज का भाजपा की राजनीति से कोई संबंध नहीं था । अत: भाजपा की राजनीति में किरनबेदी की इमेज एकदम मिसफ़िट लग रही थी और इसने भाजपा की समूची व्यूह रचना को पंगु बनाकर रख दिया । भाजपा की सबसे बड़ी असफलता यह रही कि उसके पास कोई भाजपाई इमेज मैदान में पेश करने लायक नहीं थी। वैसी स्थिति में भाजपा को कम से कम इमेज संकट का सामना नहीं करना पड़ता । लेकिन परिणाम में कोई गुणात्मक अंतर नहीं पड़ता । इमेज की प्रचार में भूमिका होती है, वोट लाने में संगठन की भूमिका होती है। दिल्ली में भाजपा का संगठन लोकसभा विजय के बाद सत्तादास होकर रह गया । 
      कांग्रेस की स्थिति यह है कि वह लोकसभा और दिल्ली विधानसभा की चुनावी हार से अभी तक बाहर नहीं निकल पायी है। यही वो अनुकूल परिवेश था जिसमें केजरीवाल के नेतृत्व में "आप" को 67 सीटों पर जीत मिली और तीन सीटों पर भाजपा विजयी रही।  
            
                

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

मोदी का सपनों का पुल

         नेता वही अपील करता है जो सपनों का पुल बनाए। सपनों के पुल पर सरपट दौड़े। इसबार नेता के सपनों में झोंपड़ी को जगह मिली है। जबसे झोंपड़ी को जगह मिली है, झोंपड़ीवालों को नींद नहीं आ रही। वे पक्केघर के सपने से बेचैन हैं ! डरे हैं! वे हजम नहीं कर पा रहे हैं कि उन्होंने ऐसा कौन सा पुण्यकार्य किया है जो झोंपड़ी को सभी नेता पक्के मकान में तब्दील करने में लगे हैं ! रामलाल कल कड़कड़दूमा से मोदीजी की मीटिंग से लौटा तो सारी रात सो नहीं पाया ! वह डरा हुआ था । उसे इस सपने से ही दहशत हो रही थी कि उसे घर बैठे पक्का घर मिल जाएगा! वह परेशान था कि कोई भी नेता उसकी पगार बढ़ाने की बात क्यों नहीं कर रहा ? महंगाई कम करने की बात क्यों नहीं कर रहा ? झोंपड़ी में रहनेवाले विगत दो महिने से बहुत परेशान हैं। वे सपनों के कारण सो नहीं पा रहे हैं ! 

दिल्ली के झोंपड़ीवालों ने इतने सपने पहले कभी नहीं देखे। वे पहले गुण्डों के सपने देखते थे,पुलिसवाले के सपने देखते थे, कभी –कभी फिल्मी सपने देखते थे।लेकिन घर का सपना कभी नहीं देखते थे। मजेदार बात यह है कि गुण्डे-पुलिस के सपने से उनको मुक्ति आज तक नहीं मिली । वे अपनी मजूरी के बढ़ने का सपना देखते थे लेकिन आजतक बढ़ी नहीं है,जितना कमाते हैं सब खर्च हो जाता है। वे सोच नहीं पा रहे हैं कि कमरतोड़ मेहनत करने बावजूद वे एक भी पैसा बचा क्यों नहीं पाते ? वे सोच रहे हैं कोई नेता उनको पैसे की बचत का सपना क्यों नहीं दिखाता ?

कल नरेन्द्र मोदी जब कडकडडूमा में बोल रहे थे तो सपनों का पुल बना रहे थे, सवाल यह है वे सपनों का पुल क्यों बना रहे थे ? वे तो 9 महिने से दिल्ली के प्रशासन को देख रहे हैं, वे तो बिना विधानसभा चुनाव जीते ही दिल्ली के लिए सब कुछ कर सकते हैं, उनके पास सारे अधिकार हैं,उनको किसने रोका सपनों को साकार करने से ? वे दिल्ली के ज्ञात-अज्ञात को जानते हैं वे अब दिल्ली की हर फाइल के मालिक हैं।

मोदी और उनके दल के नेता कहते रहे हैं शीला दीक्षित भ्रष्ट थीं ,सोनिया भ्रष्ट थीं लेकिन उन्होंने अभी तक कोई जांच आयोग क्यों नहीं बिठाया ? हमारे नेतागण दूसरे नेता को हेय दिखाने के लिए जमकर भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार का हंगामा करते हैं, लेकिन कभी कार्रवाई नहीं करते,स्थिति यह है कि किरन बेदी कल तक भाजपा को भ्रष्ट दल मानती थीं आज उसी दल का अंग हैं। कहने का अर्थ है दिल्ली में भ्रष्टाचार पहले की तुलना में और भी पुख्ता हुआ है। सपनों के पुल पर भ्रष्टाचार सवार होकर आएगा तो यही होगा !

सपने की खूबी है कि वह हर चीज को अपने रंग में रंग लेता है। ठोस को भी वायवीय बना देता है। उसकी अज्ञात सोपानों की अबाधित यात्रा में रुचि होती है। सपनों के रंग मनुष्य को हमेशा अपील करते हैं। दिल्ली में भी सपना जगा है कि अब दिल्ली में झोंपड़ी नहीं रहेंगी, उसकी जगह पक्के घर होंगे ! दिल्ली में झोपड़ी गायब हो जाएगी यह सोचकर मन खुश है। एक सवाल उठता है कि क्या गुजरात में झोंपड़ी वाले नहीं हैं ? क्या सभी झोंपड़ीवालों को मोदीजी ने अपने शासन में पक्के मकान दिए ? जी नहीं, मोदी जब गुजरात में अपार बहुमत देने के बावजूद झोंपडीवालों के लिए पक्के मकान नहीं बना पाए तो दिल्ली में तो वे एकदम नहीं बनाएंगे ।



मोदी का नसीब और अभागा लोकतंत्र

               
       नसीब का तर्कशास्त्र परजीवियों को भाता है। लोकतंत्र नसीब तंत्र नहीं है। लोकतंत्र में भाग्य को श्रेय देना जनता का अपमान करना है। जनता से किए गए वायदों से मुँह मोड़ना है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल जब दिल्ली में एक आमसभा में बोल रहे थे तो अपने नसीब यानी भाग्य को श्रेय दे रहे थे। लोकतंत्र को भाग्यतंत्र कहना सही नहीं है। राजसत्ता यदि भाग्य का ही खेल होता,कुंडली के ग्रहों का ही खेल होता तो राजाओं का पराभव कभी नहीं होता। राजतंत्र की विदाई नहीं होती।

मोदी वोट की राजनीति में भाग्य का सिक्का उछालकर असल में आम जनता की पिछड़ीचेतना का दोहन करना चाहते हैं। वे यह भी चाहते हैं कि आम जनता अब भाग्य के भरोसे रहे !उनकी सरकार अब वायदे पूरे करने नहीं जा रही !

लोकतंत्र में भाग्य की हिमायत के कई आयाम हैं जिन पर गौर करने की जरुरत है। लोकतंत्र को भाग्य का खेल मानने का अर्थ है संविधान का अपमान करना। संविधान हमारे नागरिक और शासकों को अंधविश्वास फैलाने की अनुमति नहीं देता।नसीब तो अंधविश्वास का हिस्सा है। मोदी पीएम इसलिए नहीं बने कि उनका भाग्य अच्छा था बल्कि इसलिए बने कि जनता ने उनको वोट दिया। तेल के दाम इसलिए कम नहीं हुए कि मोदी का भाग्य अच्छा है बल्कि विश्व राजनीति के उतार-चढ़ाब के कारण कम हुए। विकसित पूंजीवादी मुल्कों और ओपेक के अंतर्विरोधों के कारण तेल के दाम सारी दुनिया में कम हुए हैं।

दुनिया में कोई भी घटना इसलिए नहीं घटती कि भगवान चाहता है या भाग्य या ग्रह चाहते हैं ,बल्कि हर घटना का अपना कार्य-कारण संबंघ होता है,प्रक्रिया होती है।नसीब की इसमें कोई भूमिका नहीं होती। मोदी के पीएम बनने में नसीब की कोई भूमिका नहीं है। आम जनता के वोट ,कारपोरेट लॉबी की मदद,आक्रामक मीडिया रणनीति और वायदों के अम्बार ने उनको प्रघानमंत्री बनाया है। मोदी यदि अपने वायदों को पूरा नहीं करेंगे तो आम जनता उनके खिलाफ जा सकती है।

लोकतंत्र यदि भाग्य का खेल होता तो मोदी ने इतने बड़े पैमाने पर मीडियाप्रचार क्यों किया ? अरबों रुपये खर्च करके प्रौपेगैण्डा क्यों किया ? नसीब ही महान होता तो वे किरनबेदी के लिए वोट मांगने क्यों निकले हैं ? क्यों उनके 200सांसद और 22केन्द्रीय मंत्री और वे स्वयं दिल्ली की जनता के घर -घर जाकर वोट मांग रहे हैं ? इससे पता चलता है कि लोकतंत्र भाग्यतंत्र नहीं है, ग्रहतंत्र नहीं है। ग्रहतंत्र होता तो फिर प्रचार की जरुरत ही न होती, ईश्वर या संतों के आशीर्वाद से ही लोकतंत्र में जीत मिल जाती तो राजनीतिक वायदे न करने पड़ते,प्रचार न करना पड़ता,महाभाग्यवान संत हारते नहीं ,रामराज्य पार्टी का तो चारों ओर जय-जयकार होता, क्योंकि करपात्रीजी महाराज जैसे संत उसके नेता थे।

लोकतंत्र में हुई हार-जीत का नसीब और बदनसीब के वर्गीकरण से कोई लेना-देना नहीं है। लोकतंत्र तो राजनीति है ,इसके राजनीतिक तर्क और प्रक्रियाएं है। लोकतंत्र में नसीब,भगवान,संत-महंत आदि की राजनीति अंततः परजीवीपन को बढ़ावा देगी। इससे मोदी के 'मेक इन इंडिया' के नारे का अंतर्विरोध है। इस नारे को या आम नागरिक को अपने जीवन में सफलता हासिल करनी है तो यह काम नसीब के भरोसे नहीं कर्म के आधार पर ही हो सकता है। नसीब पर जोर देने का अर्थ है कर्म का निषेध करना। कर्म का निषेध करके मोदी भारत के युवाओं में अंधविश्वास फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।

लोकतंत्र में नसीब-बदनसीब की बातें करने का अर्थ है गरीबों और स्त्रियों का अपमान करना। बहुरंगी, बहुस्तरीय भेदभाव को अपरिवर्तनीय मानना। मोदी जी जब आप नसीब-बदनसीब के मुहावरे में बोल रहे थे तो सीधे कह रहे थे अमीर इसलिए अमीर है क्यों कि वह नसीब में लिखाकर लाया है, गरीब इसलिए गरीब है क्योंकि नसीब में लिखाकर लाया है। यानी अमीर हमेशा अमीर रहेंगे क्योंकि पूर्वजन्म में पुण्य करके आए हैं, गरीब हमेशा गरीब रहेंगे क्योंकि पूर्वजन्म में पाप करके आए हैं। इसका अर्थ यह भी है कि अमीर-गरीब की स्थिति को बदला नहीं जा सकता है, जो जैसा है वैसा ही रहेगा,क्योंकि यह तो नसीब में लिखा है!

नसीब –बदनसीब का समूचा तर्कशास्त्र स्वभावतः लोकतंत्र विरोधी और अविवेकवादी है। इसमें सामाजिक जिम्मेदारी से भागने की भावना निहित है।

मोदीजी आपने नसीब-बदनसीब की बहस को उठाकर अपने राजनीतिक लक्ष्य को साफ कर दिया है,इस अर्थ में आप ईमानदार भी हैं। आप ईमानदार हैं इसलिए मन की बात साफ शब्दों कह देते हैं। नसीब-बदनसीब की अवधारणा में आपने ईमानदारी के साथ कह दिया है कि आप अपना चुनाव घोषणापत्र या जनता से किए गए वायदे लागू करने नहीं जा रहे। मैं आपकी इसी साफगोई का कायल हूं!



शनिवार, 31 जनवरी 2015

लोकतंत्र के कु-संवादी और पाँच सवाल का झुनझुना

        आज (30जनवरी ) गांधी की हत्या की गयी थी।यह हत्या उस विचार ने की जिसके हिमायती इन दिनों दिल्ली में घर –घर जाकर वोट मांग रहे हैं। गांधी से बड़ा कोई संवादी नहीं था,लेकिन संवाद करने की बजाय हत्यारे ने उनकी ह्त्या कर दी। गांधी की हत्या में जिस संगठन के विचारों की भूमिका थी उसे सारा देश जानता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि गांधी के हत्यारे को नायक बनाकर पेश किया जा रहा है। हत्यारे के पूजकों के खिलाफ मोदी सरकार के किसी भी मंत्री या प्रधानमंत्री ने एक बयान तक जारी नहीं किया। सवाल यह है गांधी के हत्यारे का महिमामंडन करने वालों की संघ प्रमुख और प्रधानमंत्री ने अभी तक निंदा क्यों नहीं की ? यह क्यों नहीं कहा कि देश में हम कहीं पर भी गोडसे की मूर्ति नहीं लगने देंगे।

दिल्ली में गांधी मारे गए और दिल्ली में ही गांधी के हत्यारे का मंदिर बनाने की तैयारियां हो रही हैं। किरनबेदी साफतौर पर जबाव दें कि यदि वे मुख्यमंत्री बनती हैं तो गांधी के हत्यारे का मंदिर बनेगा या नहीं ? मंदिर बनाने वालों की उन्होंने अभी तक निंदा क्यों नहीं की ? क्या इस उत्तर से काम चलेगा कि कानून अपना काम करेगा ! संघ के नेताओं-सांसदों-मंत्रियों और किरनबेदी से दिल्ली की हर गली में गोड़से के मंदिर बनाए जाने पर सवाल किया जाना चाहिए। संघ परिवार दो-टूक ढ़ंग से गोड़से पूजकों की निंदा करने में असफल रहा है,संघ की चुप्पी का अर्थ यह भी हो सकता है कि संघ उनका समर्थन कर रहा हो ? क्या गोड़से समर्थकों को लोकतंत्र की चौखट(दिल्ली सरकार) में प्रवेश करने की अनुमति दी जा सकती है ?

लोकतंत्र संवाद से समृद्ध होता है। नेता-मंत्री-सांसद या पीएम के भाषण से नहीं। नेता के शामिल होने से दलबल समृद्ध होता है,मीडिया समृद्ध होता है। संवाद के लिए लोकतांत्रिक विवेक और लोकतांत्रिक आचरण का होना पहली शर्त्त है। जिस नेता को संवाद करना है उसके पास लोकतांत्रिक विवेक न हो तो संवाद संभव ही नहीं है।यही वह परिप्रेक्ष्य है जहां से लोकतंत्र में संवाद-विवाद और विचारधारात्मक संघर्षों को देखा जाना चाहिए। संवाद की दूसरी शर्त है सहिष्णुता और जिम्मेदारी। संवाद करने वाला या सवाल करने वाला कितनी जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभाता है ? अपने विचारों के प्रति वह कितना गंभीर है। कितना हास्यास्पद है कि मोदी सरकार एक तरह कारपोरेट घरानों की मदद लेकर अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने में लगी है,लेखकों –कलाकारों को संघी बंदे निशाना बना रहे हैं,ऐसे में भाजपा सवाल पूछने का नाटक कर रही है !

भाजपा और संघ का समूचा आचरण कु-संवादी का है। वे संवाद में विश्वास नहीं करते,संसद में विश्वास नहीं करते, संवाद के नाम पर नॉनसेंस या कु-संवाद करते हैं। यह हास्यास्पद है कि वे सत्ता पाने के बाद सवाल कर रहे हैं ! देश की समस्याओं के समाधान और उन पर संवाद का सिलसिला आरंभ करने की बजाय एक ऐसी पार्टी से सवाल कर रहे हैं जिसका जन्म कुछ साल पहले हुआ है।

सवाल यह है मोदी सरकार-भाजपा ने उन सवालों के समाधान क्यों नहीं खोजे या सुझाए जिनसे दिल्ली की जनता परेशान है? दिल्ली की जनता के प्रति भाजपा और मोदी सरकार जिम्मेदार भाव से पेश आती तो दिल्ली की जनता को एक साल बाद तमाम फजीहत के बाद चुनाव की बजाय तत्काल चुनाव कराके सरकार दी जा सकती थी ! मोदी-भाजपा-संघ जानते थे कि उनके पास सरकार बनाने का बहुमंत नहीं था इसके बावजूद वे एक साल तक जोड़तोड़ में लगे रहे।अंत में झकमारकर उनको चुनाव कराना पड़ा। लोकतंत्र में झकमारकर काम करने वाले नेता या दल को जनविरोधी कहा जाता है। मोदी इस अर्थ में जनविरोधी हैं कि वे दिल्ली की जनता के लिए आठ महिने में कोई कदम नहीं उठा पाए।

भाजपा संभवतः देश का पहला बड़ा दल है जो समग्रता में अविवेकवादी या इरेशनल है। इरेशनल से क्या संवाद संभव है ? भाजपा और मोदी के इरेशनल नजरिए का आदर्श उदाहरण है भाजपा का परमाणु संधि पर यू-टर्न। भाजपा और उसके सभी नेता एकसिरे से संसद के मंच पर परमाणु संधि का विरोध करते रहे और हठात सत्ता में आते ही परमाणु संधि के पक्ष में बयान देने लगे,सबसे बड़ा उपहास तो यह है कि वे उसे अपनी उपलब्धि बता रहे हैं ! संभवतः भारत में इससे बड़ा इरेशनल रुप किसी दल का देश ने नहीं देखा। जिस दल के नेता ने संसद में साफ कहा हो कि वे सत्ता में आएंगे तो परमाणु संधि पर पुनर्विचार करेंगे, लेकिन वे तो उसी विचार की गोद में चले गए जिसका वे विरोध कर रहे थे। इस तरह के इरेशनल दल के साथ संवाद कैसे संभव है ? क्या भाजपानेता दिल्ली चुनाव में जो वायदे कर रहे हैं उनको पूरा करेंगे? विगत लोकसभा चुनाव में उन्होंने जो वायदे किए थे उनमें से एक भी वायदा अभी तक पूरा नहीं किया है। संवाद की मांग है कि संवादी असत्यवादी न हो।

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तेजी से साम्प्रदायिक हमले हो रहे हैं,संघ के संगठनों के नेताओं के घटिया-जनविरोधी-असामाजिक बयानों की मीडिया में बाढ़ आई हुई है। प्रशासन को साम्प्रदायिक संगठनों के प्रति नरम बर्ताब करने,मित्रवत व्यवहार करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्थिति उस कदर खराब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा सरेआम भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर संघ द्वारा किए जा रहे हमलों के खिलाफ बोलकर गए हैं। वे एक तरह से इन हमलों की निंदा करके गए हैं। लेकिन संघ अपने नजरिए पर अड़ा हुआ है। संघ का इस तरह का रुख देश को विभाजित करने वाला है। देश में और दिल्ली में गिरिजाघरों पर हमले बढ़े हैं लेकिन मोदी सरकार ने इन हमलों की कभी निंदा नहीं की। किरनबेदी ने इन हमलों के खिलाफ कोई बयान तक नहीं दिया। सवाल यह है दिल्ली की जनता क्या ऐसे नेता और दल को वोट देगी जो सरेआम धार्मिक स्थलों पर हो रहे हमलों की निन्दा तक न करे।

मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह है कि सीबीआई जैसी संस्था का दंगाईयों को बचाने के लिए खुला दुरुपयोग किया जा रहा है। अमितशाह के मामले में सीबीआई दुरपयोग करती नजर आई है। यह लोकतंत्र के लिए बुरा संकेत है। इस दुरुपयोग के खिलाफ किरनबेदी ने कोई राय व्यक्त नहीं की। जबकि वे सीबीआई को निष्पक्ष बनाने की मांग करती रही हैं लेकिन अवसरवादी नजरिए के चलते ऐसे दल में शामिल हो गयी हैं जिसका नाम सीबीआई के दुरुपयोग में शामिल है।



सच्चाई यह है लोकतंत्र में सु-संवाद आने बंद हो गए हैं। लोकतंत्र के लिए यह कु-संवाद है कितने सांसद या मंत्री प्रचार करने आ रहे हैं, पीएम प्रचार करने आ रहे हैं। सांसदों-मंत्रियों और प्रधानमंत्री की भूमिका सु-संवाद की रही होती तो उनको जनता में आने की जरुरत ही नहीं पड़ती।जनता के पास कान हैं,आँखें हैं और बहुत बड़ा दिल है। जनता जिस उदारता के साथ नेताओं के साथ पेश आती है हमारे नेता उस उदारता के साथ पेश नहीं आते। अंतमें, सवाल पूछने का हक उसको है जो सत्य के पक्ष में खड़ा है। कम से कम भाजपा इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

किरनबेदी जी ! पुंसवाद का हिमालय है आरएसएस !!

  
    कल भाजपानेत्री-मंत्री और पूर्व जेएनयू छात्रा निर्मला सीतारामन प्रेस को सम्बोधित करके औरतों के सवाल पर अरविंद केजरीवाल को कोस रही थीं तो अजीब और बेतुका लग रहा था। अरविंद केजरीवाल की औरतों के सवालों पर आलोचना आधारहीन है। यह भाजपा के राजनीतिक दिवालिएपन का प्रमाण है। मैं निजी तौर पर निर्मला सीतारामन को छात्र जीवन से जानता हूँ वे भी किरनबेदी की तरह अ-राजनीति की राजनीति किया करती थीं और मुक्तचिंतकों (फ्रीथिंकर संगठन) के दल में थीं,यह बताने की जरुरत नहीं है कि वे क्या नजरिया रखती थीं। उस दौर के सभी जेएनयू मित्र जानते हैं कि उनकी राजनीति में कोई खास रुचि नहीं होती थी। आमतौर पर महिलाओं के सवालों से जुड़े संघर्षों से वे दूर रहती थीं । इस व्यक्तिगत अवगुण के अलावा हम उस समस्या की ओर आएं जिसकी ओर उन्होंने ध्यान खींचा है।

दिल्ली में भाजपा नया दल नहीं है।संघ का सबसे ताकतवर संगठन इस शहर में है ,इसके बावजूद दिल्ली में औरतों के प्रति सामान्य शिष्ट संस्कृति नहीं बची है। संघ के अलावा कांग्रेस का व्यापक जनाधार है। सवाल यह है दिल्ली में औरत के लिए असुरक्षित माहौल बनाने में इन दोनों दलों की कोई भूमिका है या नहीं ? वे कौन से कारण हैं जिसकी वजह से दिल्ली में औरतें सुरक्षित महसूस नहीं करतीं ? दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा की ही सरकारें रही हैं, केजरीवाल की तो मात्र49दिन सरकार रही है। आम आदमी पार्टी की उम्र भी बहुत ज्यादा नहीं है। केजरीवाल को राजनीति में आए कुछ साल ही हुए हैं। इसके अलावा यह भी देखें कि दिल्ली की पुलिस व्यवस्था केन्द्र के तहत रही है। दिल्ली में महिला आंदोलन बेहद कमजोर है। लेकिन दिल्ली राजनीति का केन्द्र है।

निर्मला सीतारामन का राजनीतिक अनुभव भी बहुत ज्यादा नहीं है,भाजपा में आने के बाद ही वे राजनीति में सक्रिय हुई हैं, यही हाल किरनबेदी का है, वे चार दशकों से दिल्ली में रह रही हैं,लेकिन राजनीति में आने की उनकी कभी इच्छा नहीं हुई ,वे राजनीति में क्यों नहीं आईं ? भाजपा तो पहले भी थी ,संघ भी था फिर वे राजनीति में शामिल क्यों नहीं हुईं ? आज जब राजनीति में शामिल हुई हैं तो उनको इसका स्पष्टीकरण देना ही चाहिए कि वे राजनीतिक दलों से और खासकर भाजपा से दूर क्यों थीं ? किरनबेदी को भाजपा में शामिल होने में इतना समय क्यों लगा ? किसने रोका था ?

राजनीति में कोई औरत क्यों शामिल होती है यह वही बेहतर ढ़ंग से बता सकती है। लेकिन एक बात सच है किरनबेदी अबोध और अज्ञानी नहीं हैं । वे जब भाजपा में शामिल हुई हैं तो उनके ज़ेहन में साफ लक्ष्य है कि वे मुख्यमंत्री बनने के लिए शामिल हुई हैं, एक साल पहले भाजपा उनको इस पद का प्रस्ताव देती तो वे भाजपा में चली जातीं,खैर,भाजपा को एक साल लगा तय करने में ! भाजपा भी मजेदार दल है वे किरनबेदी की ईमानदार -कर्मठ छवि को इतने लंबे समय के बाद पहचान पाए ! किरनबेदी और भाजपा के मेल-मुलाकात-संबंध बनाने में हुई देरी से एक बात साफ है कि भाजपा किसी पवित्र लक्ष्य के तहत किरनबेदी को चुनाव नहीं लड़ा रही है और किरनबेदी भी किसी पुण्य कार्य के लिए चुनाव नहीं लड़ रही हैं वे अवसरवादी राजनीति के कारण मिले फायदे का लाभ उठाने के लिए चुनाव लड़ रही हैं। चूँकि मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव मिला है इसलिए लड़ रही हैं, औरतों के हितों की रक्षा का सवाल तो कहीं पर भी सामने नहीं है। बुर्जुआदलों में अधिकतर औरतें अवसर के कारण,पद के कारण या पारिवारिक कारणों से शामिल होती हैं। औरतों के हकों के संघर्ष के लिए वे शामिल नहीं होतीं।

औरतों के हितों के लिए संघर्ष करने का न तो किरनबेदी और न निर्मला सीतारामन का कोई इतिहास है।संघ में औरतों के हितों के लिए लड़ने वाली कोई नेत्री नहीं है। इससे भी बड़ा सवाल यह है औरतों के लिए कौन सी राजनीति करनी चाहिए ? क्या औरतों को ग्लैमर या नेतापद की राजनीति करनी चाहिए? औरतों को वह राजनीति करनी चाहिए जिससे पुंसवाद कमजोर हो और स्त्री ताकतवर बने। भाजपा और संघ तो पुंसवाद के हिमालय पर्वत हैं ।किरनबेदी उसकी पुत्री हैं !

स्त्री की चुनौती है पुंसवाद और पुंसवादी राजनीतिक नजरिया। स्त्री तब तक दिल्ली में या देश में असुरक्षित है जब तक वह पुंसवाद से लड़ने को अपना प्रधान लक्ष्य नहीं बनाती । भाजपा या कांग्रेस में शामिल होने से कोई भी औरत ताकतवर और सुरक्षित नहीं बनती। तंदूरकांड से लेकर सोनिया गांधी तक औरत की अवस्था काफी शोचनीय है। इंदिरा गांधी से ज्यादातर ताकतवर कोई महिला नहीं हो सकती। लेकिन वे भी पुंसवाद से जंग को मुख्य़ जंग नहीं बना पायीं। औरतों पर हमले नहीं रोक पायीं। गुजरात में दंगों में हजारों औरतें ही विधवा हुई हैं या यातना की शिकार हुई हैं,1984 के दंगों में भी औरतें ही हमले के केन्द्र में रही हैं। हत्यारे औरतों को ही विधवा बनाकर गए हैं। औरतों के लिए सुरक्षित विकल्प कम से कम भाजपा और कांग्रेस तो नहीं हो सकते। आपातकालीन अनुभव औरतों के लिए नारकीय अनुभव रहा है, उस दौर में संघ ने आपातकाल का समर्थन किया और संघ प्रमुख ने औरतों पर हो रहे जुल्मों के खिलाफ कोई बयान तक नहीं दिया। यहां तक कि देवराला सतीकांड के समय संघ और उसके संगठनों ने खुलेआम सतीप्रथा की हिमायत की। हम नहीं जानते किरनबेदी ने उस समय क्या किया था ? क्या संघ की निंदा की थी ? वे थीं लेकिन संघ के खिलाफ कुछ नहीं बोलीं ! एक जागरुक औरत वह है जो औरतों के हकों के लिए हमेशा सचेत रहे। किरनबेदी-निर्मला सीतारामन आदि पदासीन औरतें पुंसवाद का औजार हैं वैसे ही जैसे संघ के दुर्गावाहिनी टाइप संगठनों में काम करने वाली औरतें पुंसवाद की औजार हैं।पुंसवाद का औजार बनकर औरत बेहद खतरनाक भूमिका अदा करती है वह अधिनायकवाद की हद तक जा सकती है । इंदिरा गांधी इसका साक्षात प्रमाण है। दुनिया में और भी उदाहरण हैं।

औरतों के हकों को वे ही संगठन सुरक्षित रख सकते हैं जो उसके लिए समझौताहीन वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष करते रहे हों। औरतों को इसी तरह के संगठनों में शामिल होकर सक्रिय राजनीति करनी चाहिए। इसी प्रसंग में यह भी ध्यान रहे कि भाजपा आदि दलों के लिए औरतें सिर्फ मतदाता हैं और इससे ज्यादा उनका कोई महत्व नहीं है। हां, इस प्रसंग मे कांग्रेस को यह श्रेय जाता है कि उसने औरतों की रक्षा के तमाम बेहतरीन कानून बनाने में पहल की, औरतों के संगठनों की मांगों पर समय-समय पर सकारात्मक कदम उठाए, हाल ही में निर्भयाकांड के समय भी कांग्रेस ने बलात्कार विरोधी कानून में सही परिवर्तन किया। कांग्रेस को भाजपा की तुलना में स्त्री पक्षधर दल कह सकते हैं, कम से कम औरतों के लिए इसने लिबरल स्पेस,लिबरल शिक्षा और लिबरल माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। औरतों की रक्षा के जितने भी कानून बने हैं वे सब कांग्रेस ने बनाए हैं। कांग्रेस का यह गुण है कि वह जन-आंदोलन,महिला आंदोलन की आवाज को सुनती रही है और उससे उठे सवालों के ईमानदारी के साथ समाधान खोजती रही है। गर्भपात के अधिकार से लेकर, छेड़खानी,दहेजप्रथा विरोधी तमाम कानूनों को कांग्रेस ने महिला आंदोलन के दबाव में बनाया। इसके विपरीत संघ और भाजपा ने हमेशा औरतों के लिबरल स्पेस और माहौल का विरोध किया है औरतों पर हमले किए हैं। गुजरात से लेकर दिल्ली तक इसके सैंकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं।

अरविंद केजरीवाल का महत्व यह नहीं है कि उसके पास कोई नई बातें हैं,नया विचार है, नया नजरिया है । केजरीवाल का महत्व इसमें है कि उसने ईमानदारी को मूल्यवान बनाया है। वह निर्विवाद रुप से ईमानदार है। वह ईमानदारी के साथ औरतों की रक्षा में खड़ा है,औरतों के ऊपर जुल्म के खिलाफ खडे होने के कारण ही उसको आलोचनाएं झेलनी पड़ रही हैं । यह भी सच है केजरीवाल के जीतने से दिल्ली से औरतों के पक्ष में सजगता बढ़ेगी,भाजपा जीतती है तो औरतों पर हमले बढ़ेगे। औरतों को बचाना है तो हमें दिल्ली के लिबरल स्पेस को बचाना है। भाजपा खुलकर लिबरल स्पेस खत्म कर रही है। इससे औरत और भी कमजोर बनेगी।

औरतें दिल्ली में जमकर वोट करें ,हर उम्मीदवार से औरतों के सवालों पर सवाल करें और देखें कि वो औरतों के बारे में कितना जानता है। औरतों के सवाल मात्र बलात्कार के सवाल नहीं हैं, विकास और सांस्कृतिक सुरक्षा के सवाल भी हैं जिन पर औरतें ,स्त्री पक्षधरता की मांग कर रही हैं । अफसोस की बात है सभी राजनीतिक दल इस पहलू पर चुप हैं , सबने मिलकर औरतों के सवालों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। कायदे से कांग्रेस,भाजपा और आप तीनों से औरतों के सवालों पर लिखित में आश्वासन देने के लिए दबाव पैदा करने की जरुरत है ।





बुधवार, 28 जनवरी 2015

कैमरा और जनतंत्र


       कैमरे ने नेताओं के होश उडाए हुए हैं। कैमरे की खूबी है आप उसके बिना रह भी नहीं सकते,राजनीतिज्ञ की मुश्किल है वे कैमरे में जी नहीं सकते। कैमरे के प्रबंधन के कौशल में जो माहिर हैं उनको राजनीति प्रबंधन सीखने की जरुरत है। हमारे अधिकांश नेता न तो ठीक से कैमरा प्रबंधन जानते हैं और नहीं राजनीति प्रबंधन कला के उस्ताद हैं। वे कैमरे के सामने खड़ा होना भर जानते हैं। नेताओं के लिए कैमरे के तदर्थ है, जबकि राजनीति के वे होलटाइमर का रवैय्या है। राजनीति में वे पेशेवर नहीं हैं। राजनीति में होलटाइमर बहुत खराब होता है। यह राजनीति का निष्क्रिय तत्व है।राजनीति और कैमरा दोनों ही राजनेताओं से पेशेवर और नाटकीय रवैय्ये की मांग करते हैं।

किरनबेदी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वे कैमरा और राजनीति दोनों में तदर्थभाव से काम कर रही हैं। पहले वे स्वयंसेवी राजनीति करती थीं,फिलहाल भाजपा की होलटाइमर हैं। राजनीति और कैमरे के लिहाज से ये दोनों रुप निरर्थक हैं। अप्रासंगिक हैं। कैमरा तब अपील करता है जब आप नाटकीय हों और जनता में हों। कैमरा तब अपील नहीं करता जब आप कैमरे के फ्रेम में हों। किरनबेदी की सारी मुश्किलें यहीं पर हैं। वे पहले कैमरे के फ्रेम में थी,फ्रेम से फ्रेम में उनरा रुपान्तरण निष्क्रिय इमेज का रुपान्तरण है। किरनहेदी तब अपील कर रही थीं, जब वे लोकपाल बिल के समय नाटक कर रही थीं। नाटकीयता ने उनको जनप्रिय बनाया,आंदोलन ने नहीं। लालू को देखें और सीखें। लालू नाटकीयता और भाषिकखेल में मास्टर है,इसलिए कैमरे में वह सबसे सुंदर लगता है। राहुल गांधी-सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह अपील नहीं करते,क्योंकि ये न तो नाटकीय हैं और न ही भाषिकखेल खेलते हैं। इनकी तुलना में मोदी ने नाटकीयता और भाषिकखेल का जमकर इस्तेमाल किया और कैमरे में जगह बना ली।

नरेन्द्र मोदी ने लंबी राजनीतिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद कैमरे के फ्रेम में अपने को फिट किया।मोदी ने इस अवस्था तक पहुँचने के लिए आरएसएस की सालों होलटाइमरी की,झूठ बोलने की कला सीखी,परिवार छोड़ा,पत्नी के बारे में झूठ कहा,फिर पेशवर राजनीति आरंभ की,बादमें पेशेवर राजनेता की तरह राजनीति और कैमरे के प्रबंधन में दक्षता प्राप्त की। पेशेवर होने की पूर्व शर्त्त है वैचारिक ,नाटकीयता,भाषायी कौशल और प्रतिबद्धता।कैमरे को ये चीजें पसंद हैं। जो प्रतिबद्ध है कैमरा उसके साथ खेलने में मजा लेता है खेल ही खेल में खलनायक को नायक और नायक को खलनायक बनाता है।

कैमरे में नायक-खलनायक का खेल थमता नहीं है,बल्कि यह खेल तब ही थमता है जब नेता को कैमरा ,नायक-खलनायक की अवस्था से निकालकर डिजिटल फोटो कब्रिस्तान में ले जाकर महज एक फोटो में रुपान्तरित कर देता है। इस प्रक्रिया में कितना समय लगेगा कोई नहीं कह सकता। यही वह परिप्रेक्ष्य जिसमें केजरीवाल-किरनबेदी के कैमराखेल को देखें।

दिल्ली विधान चुनाव में विगत एक साल में दो चुनाव हुए हैं, एक हो चुका है ,दूसरा होने जा रहा है। कैमरे की मुश्किल यह है कि पुलिस आइकॉन उसमें मृत होते हैं।निष्प्रभावी होते हैं। किरनबेदी कितनी सख्त अफसर रही हैं इससे कैमरा आश्चर्य या रोमांच पैदा नहीं कर सकता। कैमरे के रोमांच के लिए किरनबेदी के पास कोई नौटंकी या नाटकीयता नहीं है। कैमरे का दिल जीतने के लिए नाटकीयता का होना जरुरी है । कैमरे के सामने नए कौशल, नयी भाव-भंगिमा और नए नारे के साथ जब तक आप नहीं जाएंगे कैमरा अपना खेल आरंभ नहीं करता। असल में तो कैमरे के सामने नेता को ही खेलना होता है, मोदी को नायक से महानायक बनाने में नाटकीयता और भाषिकखेल की बड़ी भूमिका रही है। तकरीबन यही पद्धति केजरीवाल की भी है।

केजरीवाल ने अपने फोटो के साथ पहले जगदीशमुखी का फोटो लगाकर प्रचार किया और इमेज युद्ध में जगदीशमुखी को आउट कर दिया। यह स्टायल उसने किरनबेदी के फोटो पर लागू की है। अब दिल्ली में प्रत्येक ऑटो पर केजरीवाल-किरनबेदी का फोटो एक साथ लगा है। आम जनता देख रही है और संदेश ग्रहण कर रही है। इमेज युद्ध की यह कला बेहद आकर्षक और मारक है। इस कला में केजरीवाल ने पहल करके दो काम किए पहला अपना प्रतिद्वंद्वी तय किया दूसरा अपना और विरोधी का वनलाइनर प्रचार आरंभ किया, राजनीति में वनलाइनर जल्दी कम्युनिकेट करता है। सड़क पर चलते वाहन में वनलाइनर नारा यदि फोटो के साथ हो तो वह किसी भी टीवी कवरेज से ज्यादा मारक होता है।

किरन बेदी की दूसरी बड़ी मुश्किल है कि वह टीवी कैमरा देखते ही अपना मुखारबिंद ठीक नहीं रख पाती है। उसकी अति-सजगता उसका विलोम बनाती है। इसके विपरीत केजरीवाल सामान्य बने रहते हैं,व्यंग्यात्मक बने रहते हैं,नाटकीय बने रहते हैं। यही वजह है केजरीवाल का हर फोटो कुछ नया कहता है। राजनेता की नाटकीयता कैमरे को जीवंत बनाती है।

बुधवार, 21 जनवरी 2015

टीवी डिबेट:लोकतंत्र में टीवी संपन्न और सूचना विपन्न



राजनीति के लिए टीवी युग कलियुग है। जो टीवी में गया वह वहीं का होकर रह गया। टीवी में दाखिल होना जितना मुश्किल है उससे जान बचाकर निकलना उससे भी ज्यादा मुश्किल है। सामान्य दर्शक ,टीवी ज्ञान का भूखा होता है। यह वह दर्शक है जो ज्ञान और सूचना से वंचित है और टीवी के जरिए अपने दिमाग़ के स्तर को "ऊँचा "उठाना चाहता है। समाचार टीवी चैनल यह भ्रम पैदा करते हैं कि वे सूचना संपन्न बनाते हैं ,टीवी दर्शक सूचना संपन्न नागरिक है, वे सच के रखवाले हैं! 
    भारत में टीवी ने लोकतंत्र को ताक़तवर बनाया है लेकिन लोकतांत्रिक मनुष्य को न्यूज़ कंगाल बनाया है। टीवी के टॉकशो हों या धर्म शो हों या इवेंट शो हों वे मन को संतोष देने का , तुरंता प्रचार का काम करते हैं। टीवी शो वस्तुत: "सेल-सेल"की रणनीति की साझा परिणति है। आमतौर पर नेतागण टीवी का इमेज निर्माण के लिए इस्तेमाल करते हैं लेकिन टीवी टॉकशो इमेज नहीं बनाते बल्कि इमेज बिगाड़ते हैं, यही वजह है टीवी टॉकशो में दलीय प्रतिनिधि के तौर पर वे नेता या प्रवक्ता बैठे रहते हैं जिनका कोई जनाधार नहीं है, मसलन् जिनकी संगठन में फ़ोटो से ज्यादा हैसियत नहीं है। ये लोग बुनियादी तौर पर दलीय डमी नेता हैं। जो पिटते और पीटते हैं। लेकिन इनकी वास्तविक हैसियत " सेल- सेल" के बैनर से जैसी होती है।  टीवी बहसों में आमतौर पर रीयल दलीयनेता ग़ायब रहता है। क्योंकि वह रीयल है और वह यदि टॉक शो में पिट गया तो बस जनता के हाथों उसके धुने जाने का भी चांस है।
              कल से टीवी पर बहस हो रही है केजरीवाल और किरनबेदी एक ही मंच पर आएँ बहस करें, कांग्रेस के अजय माकन भी साथ में आने को तैयार हैं। क्या इस तरह की बहस लोकतंत्र के लिए शुभ होगी ?रेटिंग और राजनीतिक गर्मी पैदा करने के लिहाज़ से ऐसी बहस उपयोगी होती है। इसकी मुश्किल यही है कि इसमें वक़्ता का अहंकार बहुत जल्दी नष्ट होता है। इस तरह का कम्युनिकेशन  अशिक्षितों की तुलना में शिक्षित मध्यवर्ग को जल्दी अपील करता है। दुविधाग्रस्त और तटस्थ शिक्षित मतदाताओं को इस तरह की बहस तेज़ी से नेता विशेष के प्रति आकृष्ट करने में सफल रहती है। 
      दिलचस्प बात यह है कि टीवी पर बहस हो रही है लेकिन रीयल मसलों पर नहीं । रीयल मसलों पर बहस करने में न तो टीवीएंकर की और न नेताओं की दिलचस्पी है। बहस में गैर- जरुरी सवाल वर्चस्व बनाए हुए हैं। मसलन् ,भाजपा में बग़ावत, किरनबेदी को क्यों लाया गया, केजरीवाल ने बनिया क्यों कहा?,इसे टिकट मिला और उसका टिकट कटा, इस नेता ने दल बदला, वह नेता छोड़कर गया, इसका रोड शो या उसका रोड शो। यह सच है कि इस तरह की ख़बरों का समाचार मूल्य है लेकिन चुनाव के असली मुद्दों पर भी तो  बातें हों ! 
     मसलन् , दिल्ली में विगत एक साल में क़ानून - व्यवस्था के हालात क्या थे ? , कितने कारख़ाने खुले या बंद हुए ? कितने नए रोज़गारों का जन्म हुआ ? बिजली उत्पादन और सप्लाई में सुधार आया कि गिरावट आई ?दिल्ली के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कितनी नई नियुक्तियाँ हुईं और दाख़िले में कितनी नई सीटें बढी ? दिल्ली में सड़कों की दशा क्या है और कितनी नई सड़कें बनीं ? नए स्वास्थ्य केन्द्र, स्कूल, कॉलेज कितने खुले ? प्रत्येक क्षेत्र के विधायक के विधायक फंड  की क्या स्थिति है ? कहाँ और किन क्षेत्रों में विधायक निधि से धन खर्च किया गया ?महंगाई की अवस्था क्या ? दिल्ली पुलिस में नई भर्तियाँ कितनी हुईं ? दिल्ली के पर्यावरण में गिरावट आई या सुधार हुआ ? बिजली और पानी का बिल तो बहस में है लेकिन विगत एक साल की तथ्यपूर्ण सूचनाएँ और आंकडे कहाँ हैं? उन पर बहस होनी चाहिए। दिल्ली की अदालतों की दशा पर बहस हो, उनके इंफ़्रास्ट्रक्चर की समस्याओं पर बहस हो तब ही दिल्ली का असली चेहरा सामने आएगा। 
           दिल्ली राजधानी है और सारे बडे चैनलों का गढ़ है लेकिन दिल्ली की जनता सबसे ज्यादा सूचना विपन्न है। यह स्थिति कैसे बदले इस दिशा में कौन से कदम जरुरी हैं ? क्या मीडिया घरानों की पेडन्यूज और राजनीतिक विज्ञापनों को लेकर कोई नीति  है? 
      हम दिल्ली में रहते हैं , नेताओं और मीडिया से घिरे रहते हैं, सचेतनता के विभ्रम में रहते हैं लेकिन न्यूनतम सत्य भी नहीं जानते ऐसे मे हम सोचें हम सूचना विपन्न क्यों हैं ? सूचना विपन्नता टीवी सम्पन्नता से दूर नहीं होगी, सूचना संपन्न हम तब बनेंगे जब परंपरागत कम्युनिकेशन पुख़्ता बनाएँगे। परंपरागत कम्युनिकेशन बंद करके हम कभी भी सूचना संपन्न नहीं बन सकते। हम सोचें कि कैसे बिना विज्ञापन के आम लोग लाखों की संख्या में किसी तिथि विशेष पर गंगा स्नान करने चले जाते हैं? करोड़ों लोग कुंभ में चले जाते हैं! लेकिन मतदान केन्द्रों तक हम इतने व्यापक प्रचार के बावजूद कुंभ मेले जैसी लामबंदी नहीं कर पाते ! 
कहने का आशय यह है कि परंपरागत कम्युनिकेशन जितना ज्यादा होगा लोकतंत्र उतना ही सूचना संपन्न होगा। अमेरिका में देखें वहाँ मीडिया कम्युनिकेशन ख़ूब है, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार टीवी बहसें करते हैं लेकिन आम जनता में आधी आबादी वोट डालने तक नहीं जाती । आमलोगों को विभिन्न मसलों पर कोई जानकारी नहीं होती। समग्रता मे देखें तो पाएँगे कि मीडिया कम्युनिकेशन तब ही प्रभावशाली होता है जब परंपरागत कम्युनिकेशन पुख़्ता हो। परंपरागत कम्युनिकेशन के अभाव में मीडिया कम्युनिकेशन प्रभावहीन होता है। 

रविवार, 18 जनवरी 2015

दिल्ली विधानसभा चुनावः तीन दिशाएं क्रेजी,लेजी और भोगी

               
      दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम जनता के सामने तीन रास्ते हैं क्रेजी (आम आदमी पार्टी),लेजी(कांग्रेस) और भोगी (भाजपा) । अरविंद केजरीवाल ने आम जनता को क्रेजी बनाया है यही उसका लोकतंत्र में सबसे बड़ा योगदान है। वह इस अर्थ में मूल्यवान है कि उसने ईमानदारी को फिर से मूल्यवान बनाया है। आमलोग ईमानदार की इज्जत करने लगे हैं,जबकि केजरीवाल के राजनीति में आने के पहले ईमानदारी को राजनीति में सबसे बोगस प्रवृत्ति के रुप में देखा जाता था। कांग्रेस की नीतियों का यह सबसे बुरा साइड इफेक्ट था। लोकतंत्र में ईमानदार नेता की आवाज हो,जनता उस पर विश्वास करे और आम जनता में ईमानदारी के प्रति कुर्बानी का जज्बा हो,यह प्रवृत्ति नए सिरे पैदा करने में केजरीवाल ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

केजरीवाल की पहचान अराजकतावादी के रुप में नहीं एक ईमानदार नेता के रुप में होनी चाहिए। उसने ईमानदारी को आम जनता का नए सिरे से मूल्य और आदत बनाने का काम किया, ईमानदारी उसकी सबसे बड़ी ताकत है।केजरीवाल की ईमानदार मुहिम ने लोकतंत्र के सभी रंगत के दलों पर गहरा असर छोड़ा है। सारे दल किसी न किसी रुप में उसकी इस उपलब्धि और जनप्रभाव से ईर्ष्या करते हैं। साथ ही उसके खिलाफ किसी भी दल का साहस नहीं है कि बेईमान नेता पेश करे। इससे केजरीवाल ने जो राजनीतिक परिदृश्य बनाया है वह लोकतंत्र के लिए शुभ कहा जा सकता है। इसकी तुलना में नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी मूल्यहीन नेता नजर आते हैं।

असली बात यह है कि समाज में एक बड़ा तबका है जो ईमानदार है लेकिन इन तबके की राजनीतिक भूमिका खत्म हो गयी थी। राजनीति में ईमानदारी बोगस कब और कैसे हुई इस पर हमें गंभीरता से सोचना चाहिए। यह कैसे हुआ कि समाज में ईमानदार हैं लेकिन ईमानदारी बोगस हो गयी, कौन हैं इसके लिए जिम्मेदार ? इसी अर्थ में केजरीवाल महत्वपूर्ण नेता है कि उसने ईमानदारी के प्रति क्रेजी भाव पैदा किया। केजरीवाल इसलिए भी मूल्यवान है कि उसने नेताओं को कथनी-करनी में साम्य रखने पर जोर दिया और इस चीज को परीक्षण का आधार बना दिया कि नेता बोलता क्या है और करता क्या है ? आज सभी दल परेशान हैं और कथनी-करनी में साम्य खोज रहे हैं।

केजरीवाल का एक अन्य मूल्यवान पक्ष है दैनंदिन जनसमस्याओं को केन्द्रीय मुद्दा बनाना और उनके समाधान की दिशा में अनवरत सक्रिय रहना। बिजली,पानी के सवाल पर वोट मांगना और इन सवालों को सचमुच में विवाद के विषय बनाना,जनता को जागरुक बनाना और गोलबंद करना,यह बड़ी उपबल्धि है। दिल्ली में सभी दलों ने इन दोनों सवालों को लेकर आम जनता को जागरुक बनाने का काम बंद कर दिया था, आम जनता के जेहन में ये दोनों मुद्दे थे ,नेतागण आते थे ,आश्वासन देते थे और चले जाते थे, इसके आगे कोई राजनीतिक गतिविधि नहीं होती थी, केजरीवाल ने इन दोनों मुद्दों को ज्वलंत मुद्दे बनाकर सभी राजनीतिकदलों की नींद हराम कर दी है,वह इससे एकदम आगे गया है उसने आम जनता को गोलबंद करके इस पर जिस तरह की जागरुकता और राजनीतिक सक्रियता पैदा की है वह विरल घटना है। कम से कम दिल्ली में उसने इन दो मसलों को टाइमबम बना दिया है। कोई भी सरकार आए उसे इस टाइमबम को डिफ्यूज करना ही होगा।वरना भविष्य खराब है।

आम जनता से वोट मांगना और चुनाव जीतना अलग बात है और आम जनता को उसकी समस्याओं को लेकर जागरुक बनाना और राजनीतिक तौर पर गोलबंद करना एकदम भिन्न चीज है। इससे लोकतंत्र मजबूत बनता है।

केजरीवाल आज सारे देश में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का निर्विवाद नायक है। यह नायकत्व उसने संघर्षों के जरिए हासिल किया है। सत्ता से मुठभेड़ें करते हुए हासिल किया है। भ्रष्ट अफसर और नेता उसके नाम से थर्राते हैं। यह खूबी आज न तो मोदी में है न शीला दीक्षित में है और न अजय माकन में है। नाम से ही भ्रष्ट अफसर थर्राएं यह चीज आम जनता के लिए चैन देने वाली है। इसलिए केजरीवाल बेहतर विकल्प है।

यह सच है कांग्रेस ने 15साल में दिल्ली के इंफ्रास्ट्रक्चर का कायाकल्प किया है लेकिन इसकी बहुत बड़ी कीमत दिल्ली को चुकानी पड़ी है। दिल्ली का सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह टूट गया है। दिल्ली में मूल्यहानि,पर्यावरणहानि,धनहानि,अधिकारहानि और सामाजिक असुरक्षा आम बात हो गयी है और कांग्रेस ने आलसियों की तरह यह सब देखा है। उसके अंदर इन सबसे लड़ने की कोई बेचैनी नहीं बची है।



दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी के मैदान में आने के बाद भाजपा बेहूदे तर्कों के आधार पर चुनाव लड़ रही है। दिल्ली में सबसे भ्रष्ट नगरनिगम प्रशासन देने का वे भारतकेसरी खिताब जीत चुके हैं। उनका तर्क है चूंकि मोदी केन्द्र में जीते हैं अतः उनको दिल्ली में भी जिताओ। यह भोगी का राग है। दिल्ली में भाजपा ने विगत 15 सालों में राजनीतिक –सामाजिक क्षय में सक्रिय भूमिका अदा की है। वह कांग्रेस के लूटतंत्र का अंग बनकर काम करती रही है। उसने लोकतंत्र के स्वस्थ मूल्यों को खोखला बनाया है। लोकतंत्र को हर स्तर पर धोखा दिया है और सिर्फ लोकतंत्र के भोगियों के मन में अपील पैदा की है। मोदी का सबसे बड़ा योगदान है कि उसने लोकतंत्र को भोगियों का तंत्र बनाया है। लोकतंत्र के उपभोग की भावना पैदा की है।मोदी के सारे एक्शन भोगी के एक्शन है। लोकतंत्र में भोगी होना वस्तुतः कैंसर है।लोकतंत्र बचता तब है जब इसमें भोग और आलस्य से लड़ने वाले जज्बाती और कुर्बानी के जज्बे वाले मूल्य पैदा किए जाएं, मोदी के मूल्य भोगी के मूल्य हैं। लोकतंत्र का भोगी अकर्मण्य होता है वह संचित पूंजी खाता है। मोदी अकर्मण्य भोगी नेता है ,जिसका लक्ष्य है लोकतंत्र की एफडी (फिक्स डिपोजिट) खाना। इस परिप्रेक्ष्य में आम आदमी पार्टी एकमात्र विकल्प है जिसको कायदे से वोट दिया जाना चाहिए।

शनिवार, 17 जनवरी 2015

किरनबेदी का भगवा स्वप्नलोक



दिल्ली विधानसभा चुनाव में किरनबेदी क्या करेंगी यह वे नहीं मोदी तय करेंगे ! इसलिए मोदी के परिप्रेक्ष्य में किरन बेदी को देखा जाय तो बेहतर होगा। मोदी बुनियादी तौर पर लोकतंत्र का विलोम है । वे लोकतंत्र की नकारात्मक प्रवृत्तियों के पुंज पुरुष हैं। 

   लोकतंत्र की नकारात्मक प्रवृत्तियाँ हैं दल-बदल , अनाप-शनाप ख़र्चा करना, नियमों और क़ानूनों को न मानना, अपराधीकरण को संरक्षण देना, हर क़िस्म की स्वायत्तता का निषेध करना,सिस्टम को अंदर से तोड़ना। संयोग से इन सभी प्रवृत्तियों का संगम नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली में देखने को मिलता है । केन्द्र सरकार में ऐसे लोग मंत्री पद की शोभा बढा रहे हैं जिनके ऊपर विभिन्न क़िस्म के आपराधिक मामले चल रहे हैं, सजाएं बोली जा चुकी हैं। देश में इस तरह के मंत्रियों की कल्पना किसी ने नहीं की थी। इसी तरह निर्लज्जता के साथ बैंकों के काम में पीएम आफिस सीधे हस्तक्षेप कर रहा है। भाजपा और मोदी के दबाव के चलते मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पंगु बना दिया गया है ! मनमाने ढंग से योजना आयोग को ख़त्म किया गया है, योजना बनाना बंद कर दिया है।सेंसरबोर्ड और दूसरी स्वायत्त संस्थाओं को तोड़ा जा रहा है। तमाम क़िस्म के अपराधी और माफ़िया गिरोहों को केन्द्र का खुला समर्थन है। स्वयं मोदी माफ़िया किंग दाऊद इब्राहीम के भाई के साथ पब्लिक मीटिंग कर चुके हैं। खुलेआम अदानी-अम्बानी के विमानों का चुनाव में इस्तेमाल कर चुके हैं। 
     मोदी के आने के बाद विभिन्न तरीक़ों से दल-बदल को बढ़ावा दिया गया है और विभिन्न दलों के नेताओं को भाजपा में लाने की कोशिश की जा रही है। भाजपा के इतिहास में सबसे ज्यादा दलबदलू नेता मोदीयुग में ही भाजपा में दाखिल हुए हैं ।केन्द्र के सभी मंत्रालयों की स्वायत्तता ख़त्म करके सभी मंत्रालयों को नीतिगत फ़ैसलों के मामले में पीएम कार्यालय के मातहत कर दिया गया है। करप्शन के सवाल पर बोलना प्रतिबंधित है। यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसमें किरनबेदी ने मुख्यमंत्री पद की डील के तहत भाजपा की सदस्यता ली है। 
           किरनबेदी ने नवभारत टाइम्स को दिए पहले साक्षात्कार में भ्रष्टाचार के मसले को अपने प्रमुख पाँच भावी कार्यों में शामिल न करके यह साफ़ कर दिया है कि वे भविष्य में भ्रष्टाचार के सवाल पर संघर्ष नहीं करेंगी। उनके पाँच लक्ष्यों में बिजली,महँगाई , पानी,बेकारी और शिक्षा की समस्याएँ भी नहीं आतीं, यहाँ तक कि दिल्ली की जनता की झुग्गी झोंपड़ी की समस्याएँ भी उनके निशाने पर नहीं हैं। 
       किरनबेदी ने कहा है -
"अगर मैं सीएम बनती हूं तो 5 पी पर काम करूंगी। पहला पी यानी पीपल, इसमें पैरंट्स अपने बच्चों को अच्छी नैतिक बातें सिखाएं, स्कूल बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकें। दूसरा पी यानी पॉलिटिक्स, अगर अच्छे नेता होंगे तो लोगों को अच्छा प्रशासन और कानून मिल सकेगा। नेताओं का काम ही नीति, नियम और रेगुलेशन बनाने का है। तीसरा पी यानी पुलिस, दिल्ली पुलिस अच्छा काम कर रही है लेकिन उसमें सुधार की जरूरत है। अगर दिल्ली में 1 लाख पुलिस वाले हैं तो उसके आधे सिविल डिफेंस वाले लोग भी जुड़े होने चाहिए। सिविल डिफेंस को सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय के तहत लाया जाएगा। अभी सब बिखरा है उसे एक मुट्ठी में बांधा जाएगा। एक मुट्ठी में पुलिस तो दूसरी मुट्ठी में सिविल डिफेंस होगी।"

"चौथी पी यानी प्रोसिक्यूशन, इसमें लोगों को शीघ्र न्याय मिल सके इसके लिए फास्ट ट्रायल होगा। पांचवां पी प्रिजन होगा। जेलों में सुधार के कार्यक्रम चलाए जाएंगे। जेलों में रेप के आरोपी बढ़ते जा रहे हैं। उनमें सुधार लाने के लिए जरूरी है कि इस तरह के सुधार के कार्यक्रम जेल में चलाए जाएं ताकि वे फिर से अपराध की दुनिया में ना जाएं।"
       कहने का आशय यह है कि किरनबेदी के निशाने पर अब वे काम हैं जो इन दिनों दिल्ली की बृहत्तर आम जनता के मसले नहीं हैं ये तो सिस्टम के मसले हैं । इसका अर्थ यह भी है कि भाजपा खुले तौर पर कह रही है कि वह दिल्ली में सरकार में आती है तो बिजली, पानी, महँगाई, बेकारी, गंदगी, शिक्षा आदि जन समस्याएँ उसकी प्राथमिकता में नहीं होंगी। 
               किरनबेदी जो कह रही हैं वह मोदी की भी राय है क्योंकि वे मोदी से आशीर्वाद लेकर आई हैं और उनके ही इशारों पर सब कुछ कह रही हैं। किरनबेदी की भाषा और बयान अब भाजपा और मोदी के बयान माने जाएँगे। वे साफ़गोई के साथ कह रही हैं कि भाजपा वे अपना अतीत सुधारने आई हैं। यानी वे अतीत को लेकर जिस कष्ट में रही हैं उससे मुक्त होना चाहती हैं । अतीत से मुक्ति के लिए एक धाकड अफ़सर को संघ से बेहतर कोई आश्रम कहीं और मिल भी नहीं सकता! 
         

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