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गुरुवार, 14 जनवरी 2010

ब्राँड संस्कृति और ग्लोबल शोषण चक्र

   ग्लोबलाइजेशन का युग ब्रॉण्ड का युग है।आप चारों ओर लोगोज देखते हैं। यहां तक कि आपकी निजी जीवन की अवस्था में भी लोगोज देखते रहते हैं।सार्वजनिक स्थानों से लेकर व्यक्तिगत बाथरुम तक सभी जगह लोगोज का साम्राज्य है।यह ऐसी दुनिया है जिसे ब्रॉण्ड दुनिया कह सकते हैं।यह हमारी अभिरुचि,सांस्कृतिक स्टैण्डर्ड और व्यक्तिवादिता परिभाषित कर रहे हैं।


ब्रॉण्ड संस्कृति का नारा है '' जस्ट डू इट'' । ब्रॉण्ड के युग में प्रोडयूसर और प्रोडक्ट के बीच नए किस्म का संबंध बनते हैं। ब्रॉण्ड मूलत: एक गुणवत्तापूर्ण माल की गारंटी है।ब्रॉण्ड अपने को मूल प्रोडक्ट से पृथक कर लेता है और बिक्री की वस्तु बन जाता है।


 अनेक बहुराष्ट्रीय ब्रॉण्ड नाम रूपान्तरण की प्रक्रिया में हैं, वे भूमंडलीय ब्राँण्ड के रुप में पहचान बना रहे हैं, ब्राँण्ड में गंभीर आंतरिक अर्थ सपने की तरह पेश करते हैं।वे क्यों व्यक्तिवादिता,खेलकूद की भावना ,अलमस्त भाव अथवा सामुदायिक स्प्रिट पेश करते हैं ?यही वह बिंदु है जिसके आधार पर वस्तु के ऊपर विचार को पेश किया जाता हैं, मार्केटिंग विभाग के पास ब्राँण्ड की पहचान बनाने का जिम्मा होता है और वे उस वस्तु को देखते हैं जिसके साथ प्रतिस्पर्धा है,हम ' जानते हैं कि माल फैक्ट्री में तैयार होता है।'' 


 वाल्टर लेण्डर ,प्रेसीडेण्ट लेण्डर ब्रॉण्डिंग एजेंसी ,ने कहा ''किंतु ब्रॉण्ड मन में तैयार किया जाता है।''  जे.वाल्टर थामसन एजेंसी के प्रेसीडेंट पीटर शुटजर ने कहा '' प्रोडक्ट और ब्रॉण्ड में बुनियादी फर्क है ,प्रोडक्ट वह है जो फैक्ट्री में तैयार होता है,ब्रॉण्ड वह है जो उपभोक्ता को पेश किया जाता है।'' 


ब्रॉण्ड में विचार,जीवनशैली,एटीट्यूट आदि मूल्यों को शामिल किया जाता है,ब्रॉण्ड निर्माता ही तथाकथित ज्ञान अर्थव्यवस्था के प्रस्तोता हैं। ब्राँण्ड की खूबी है कि वह जिस वस्तु के साथ जुड़ा होता है उससे अलग अस्तित्व के अन्य क्षेत्रों में स्वयं ही सक्रिय हो जाता है।


मसलन् नीकी ब्राँण्ड को ही लें,वह आरंभ में उच्च तकनीकी का स्नीकर हुआ करता था,अमेरिका में साठ और सातवें के दशक में जॉगिंग का जोर था, जब आठवें दशक में जॉगिंग का उन्माद ठंडा पड़ गया तब उस समय रीवुक ने नीकी को जीवनशैली के रुप में पेश किया।उसे ''एसेंस ऑफ एथलेटिसिज्म' के रुप में पेश किया। इसके लिए नीकी ने अनेक नामी खिलाडियों को मॉडल के रुप में उतारा।बाद में नीकी को ब्रॉण्ड के रुप में ट्रैकसूट,टी-शर्ट, बाथिंग सूट,मोजा,आदि के साथ पेश किया। आज वह सिर्फ जूता ही नहीं है,बल्कि उसने अन्य वस्तुओं में भी अपना प्रसार कर लिया है। 


ब्राँण्ड सिर्फ एक वस्तु तक सीमित नहीं रहता बल्कि अस्तित्व की अन्य वस्तुओं में अपना प्रसार कर लेता है। यही बात अन्य ब्राँण्ड पर भी लागू होती है। सफल ब्राँण्ड की विशेषता है कि वह 'सिनर्जी' अथवा सहक्रिया पैदा करता है।वही उसके मुनाफे का स्रोत है। 


उद्योग में वर्चस्व ही सब कुछ नहीं होता,ब्राँण्ड के लिए है कि वह अन्य क्षेत्र में भी प्रसार करे।मसलन् खेल से मनोरंजन अथवा स्कूल से संस्कृति की ओर प्रसार करे। ब्राँण्ड का लक्ष्य होता है उपभोक्ता की इच्छाओं के साथ एकीकृत करना।उपभोक्ता की इच्छाओं को ब्राँण्ड में उतारना।


 जब ब्राँण्ड में जीवनशैली को आरोपित कर दिया जाता है तो फिर वह ग्राहक को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करता है कि तुम सारी जिन्दगी इसमें रह सकते हो।अब जंग वस्तुओं के बीच में नहीं बल्कि ब्राँण्डों के बीच शुरू हो जाती है। वह निरंतर अपनी सीमाओं को निर्मित और पुनर्निमित करते रहते हैं।वे अपनी सीमाओं का विस्तार करते हैं और ज्यादा से ज्यादा जीवनशैली अपने में समाहित करने की कोशिश करते हैं। अब जंग वस्तु को बेचने के लिए नहीं बल्कि जीवनशैली को बेचने के लिए होने लगती है। इस जंग का सामाजिक आधार है युवावर्ग। 


मसलन् नीकी ब्रॉण्ड ने 'कूल' पर बहुत जोर दिया,इसकी बाद में खोज की गई कि आखिरकार 'कूल' पर इतना जोर क्यों ?टॉमी हेलीफिगर ने उद्धाटित किया कि काले लोगों की बस्तियों में जाकर उसका रहस्य छिपा है। अमरीका के काले गरीब युवाओं में जो जीवनशैली प्रचलन में थी उसे गोरे युवाओं के बाजार में लाकर खड़ा कर दिया गया। इसके लिए जो विज्ञापन तैयार किए गए उनमें परजीवी जीवन संबंधों को केन्द्र में रखा गया। नीको के ब्राँण्ड ने युवाओं के अलगाव और बागी सांस्कृतिक रुपों को अभिव्यक्ति दी,ये वे युवा थे जो पंक संस्कृति,हिप-हॉप संस्कृति आदि से आते थे।यही स्थिति उन्होंने स्त्रीवाद,समलैंगिक मुक्ति और बहुसांस्कृतिकवाद के संदर्भ में भी की। ये सारी थीम प्रतिष्ठान विरोधी,सत्ता विरोधी थीं और यही वह बुनियादी वजह है कि नीकी ब्राँण्ड हिट कर गया।


किसी माल का मार्केटिंग के दौरान ब्राँण्ड में रुपान्तरण सामयिक पूंजीवाद की गुलामी के फिनोमिना की आदर्श अभिव्यक्ति है। इसमें सारा उत्पादन कांट्रेक्ट पर होता है,इसी में मेगा ब्राँण्ड की नई चीजें जन्म लेती हैं,इससे जहां एक ओर लागत में बचत होती है वहीं दूसरी ओर ब्रॉण्ड को मार्केटिंग के जरिए उतारने में सहूलियत होती है। यहां एक एशियाई एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन से माल दूसरे प्रोसेसिंग जोन में भेजा जाता है।


मसलन् नीकी को ही लें, उसका ताइवान से कोरिया के प्रोसेसिंग जोन में स्थानान्तरण किया जाता है। इसी क्रम में हमें यह भी पता चलता है कि आखिरकार ब्राँण्ड किस तरह की श्रम-संस्कृति को पैदा कर रहे हैं।ब्राँण्ड के लिए काम करने वालों को यूनियन बनाने का अधिकार नहीं है,इन्हें श्रम की पगार कम दी जाती है,हमेशा अस्थायी कर्मचारी के रुप में काम करना होता है,खासकर एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन में औरतें अस्थायी रुप में काम करती हैं। यह स्थिति फिलीपींस में नीको के कारखानों में दर्ज की गई। यही वह बिंदु है जहां विकासशील देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का हमारा भ्रम टूटता है।


 युवा लोगों की वास्तव जिंदगी देखकर ग्लोबलाइजेशन की बर्बरता के प्रति घृणा पैदा होती है,इन इलाकों में जो युवा मजदूर काम कर रहे हैं उनके हालात कैदी जैसे हैं। वे जो पगार पाते हैं वह उनके श्रम की बदले जितनी मिलनी चाहिए उसकी तुलना में बहुत कम होती है।अधिकतर मजदूरों की पगार का बड़ा हिस्सा कमरे ,परिवहन, और बुनियादी खर्चों पर ही व्यय हो जाता है।


वियतनाम और चीन के सरकारी अधिकारी इस बात को लेकर हमेशा परेशान रहते हैं कि कहीं निवेशक भाग न जाए,इसलिए निवेशकों के लिए वे सभी किस्म के करों में छूट देते हैं,साथ ही मजदूरों को यूनियन नहीं बनाने देते। हमारे यहां भी ग्लोबलाइजेशन के नाम पर आईटी क्षेत्र से लेकर एसईजेड तक यही सरकारी प्रस्ताव है। इन इलाकों में कोई यूनियन नहीं होगी।


 जब भी मजदूरों के शोषण का सवाल सामने आता है तो ये कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से हाथ झाड़ लेती हैं। वह ठेकेदार पर जिम्मेदारी डाल देती हैं,सब-कांट्रेक्टर पर जिम्मेदारी डाल देती हैं।वे कहती हैं कि यह विवाद मजदूरों और सब-कांट्रेक्टर के बीच का है,उनका इससे कोई लेना-देना नहीं है। मजदूरों ने जब नीकी,रीवुक,आदिदास आदि कंपनियों के कारखानों में मजदूरों के शोषण,कम पगार और श्रम की भयावी अवस्था के सवाल उठाए तो यही बात कही गयी। 


इन सभी कंपनियों की रणनीति ह होती है कि इनके यहां कोई स्थायी कर्मचारी नहीं होता,वे उन्हें कम से कम पगार देते हैं, हमेशा अंशकालिक कर्मचारी के रुप में रखते हैं, साथ उन्हें किसी अन्य एजेंसी के जरिए अथवा अन्य के नाम पर नौकरी देते हैं। पहले जो काम किसी कंपनी के स्थायी कर्मचारी किया करते थे अब वही काम ठेका पर काम करने वाली एजेंसियों के मजदूर करते हैं। ऐसी स्थिति में कंपनी के पास संपूर्ण मानव संसाधन तो होते हैं किंतु उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं होती। अब कंपनी मालिकों का नया मजदूर मंत्र है '' तुम मूर्ख हो यदि उनके मालिक हो।'' पहले कंपनी मजदूरों की मालिक कहलाना पसंद करती थीं अब मालिक कहलाने वाले मूर्ख कहे जाते हैं। इस समूची प्रक्रिया का परिणाम यह निकला है कि कारपोरेट घरानों की सामाजिक बढत स्थापित हुई है।मजदूर हाशिए पर पहुँच गया है, उसके अब तक के अर्जित अधिकार भी दांव पर लग चुके हैं। उसकी सारी उपलब्धियों के सामने खतरा खड़ा हो गया है। 

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

पियरे बोर्दिओ और नव्य-उदारतावाद - 1-

          पियरे बोर्दिओ की समाजशास्त्रीय और मीडिया दृष्टि पर परवर्ती मार्क्सवाद, समाजशास्त्र, चिन्हशास्त्र और मीडिया संरचना सैध्दान्तिकी का गहरा असर है। हिन्दी में अभी तक बोर्दिओ के बारे में चर्चा नहीं हो रही है,कभी-कभार एक दो उध्दरण मात्र दिखाई दे जाते हैं।बोर्दिओ फ्रांस की माक्र्सवादी-समाजशास्त्रीय परंपरा के प्रमुख स्तम्भ थे।


    पूंजीवाद और परवर्ती पूंजीवाद के दौर में किस तरह की सामाजिक,सांस्कृतिक और आर्थिक संरचनाएं निर्मित हो रही हैं और समाजशास्त्रीय सैध्दान्तिकी की नयी बदली हुई परिस्थितियों में किस तरह की संरचनाएं बन रही हैं और उन्हें किस तरह विश्लेषित करें। विश्लेषण के नए मॉडल क्या हो सकते हैं ? खासकर ऐसे दौर में जब सार्वभौमत्व की विदाई की घोषणा हो चुकी हो।बोर्द्रिओ का यहां नव्य-उदारतावाद यानी ग्लोबलाइजेशन के संदर्भ में विशेष रुप से मूल्यांकन किया गया है।
     
    बोर्दिओ के नजरिए का ग्लोबलाईजेशन के संदर्भ और परवर्ती पूंजीवाद के द्वारा पैदा की गई सांस्कृतिक और आर्थिक तबाही के संदर्भ में महत्व है। हमारे समाज में मध्यवर्ग के एक बड़े तबके में फैशन की तरह ग्लोबलाईजेशन का प्रभाव बढ़ा है,सरकार की नीतियों में ग्लोबलाइजेशन का अंधानुकरण चल रहा है,यहां तक कि अब तो वे लोग भी ग्लोबलाइजेशन के पक्ष में बोलने लगे हैं जो कल तक उसका विरोध करते थे,ऐसे विचारकों और राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं की तादाद तेजी से बढ़ रही है, वे यह कह रहे हैं कि पूंजीवाद का अब कोई विकल्प नहीं है,ग्लोबलाईजेशन के तर्कों को मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं हैं। 


    यही स्थिति ग्लोबल मीडिया चैनलों की है, उनके उपभोक्ताओं में किसी भी किस्म का प्रतिवाद का स्वर दिखाई नहीं देता बल्कि उल्टे राजनीतिक हल्कों में ज्यादा से ज्यादा चैनल और अखबार समूहों को अपने राजनीतिक रुझान के पक्ष में करने की होड़ चल निकली है। ग्लोबल मीडिया और ग्लोबलाइजेशन के प्रति इस तरह के रुझान इस बात के संकेत हैं कि भारत में ग्लोबलाइजेशन का वैचारिक असर रंग दिखाने लगा है।
        
    ग्लोबलाइजेशन की वैचारिक आंधी में हम भूल गए कि मीडिया विचारधारा मीडिया के बाहर अन्यत्र निर्मित होती है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि मीडिया का आम जनता पर सुनिश्चित प्रभाव होता है। हकीकत यह है कि मीडिया सामाजिक यथार्थ के दायरे में काम करता है। ग्लोबलाईजेशन और बहुराष्ट्रीय मीडिया की आंधी के विश्वव्यापी प्रतिरोधी स्वर को वैचारिक नेतृत्व देने वालों में बोर्द्रिओ अग्रणी कतार में रहे हैं। उनके विचारों में नए बदले हुए यथार्थ का सटीक मूल्यांकन मिलता है।उनके विचार भारतीय समाज के लिए भी प्रासंगिक हैं खासकर उन लोगों के लिए जो मौजूदा हालातों को बदलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
       
  बोर्दिओ का जन्म एक अगस्त 1930 को हुआ और 23 जनवरी 2002 को मृत्य हुई। शिक्षा के दौरान बोर्द्रिओ एक असाधारण विद्यार्थी थे, लगन और साधना के धनी थे।सन् 1955 में उन्हें अल्जीरिया में सेना में काम करने के लिए भेजा गया,जिसके दौरान उन्होंने अल्जीयर्स विश्वविद्यालय में अपना कुछ समय बिताया, इस दौरान के अनुभवों और चिन्तन को उन्होंने 'थ्योरी ऑफ प्रैक्टिस' (1972) और ' दि लॉजिक ऑफ प्रैक्टिस' (1980)में लिपिबध्द किया। इन दोनों कृतियों पर लेवीस्त्रास का गहरा असर है। इन दोनों कृतियों में संरचनावाद के दायरे को तोड़कर आगे जाने की कोशिश दिखाई देती है। लेवीस्त्रास के अलावा समाजशास्त्रियों और माक्सवादी चिन्तन का भी उनके समूचे लेखन पर गहरा असर है।
   
     बोद्रिओ की गहरी दिलचस्पी सैध्दान्तिकी के निर्माण में रही है। उनके अंदर मूलत: एक दार्शनिक सक्रिय रहा है। किंतु दर्शन की क्षुधा को उन्होंने समाजशास्त्र की पध्दतियों के जरिए फील्ड अनुभवों के जरिए तृप्त किया। बोर्दिओ स्वभाव और व्यवहार में पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष थे। सामाजिक संरचनाओं का समाजशास्त्रीय नजरिए से अध्ययन करते समय उनकी दिलचस्पी का प्रधान क्षेत्र सामाजिक विषमता रहा है।
      
  बोर्दिओ ने बौध्दिक जगत में हीरो की भूमिका की तीखी आलोचना की है। बौध्दिक जगत में नायक खोजने अथवा नायक बनाने की बजाय वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिए सामाजिक हस्तक्षेप को महत्वपूर्ण माना। बोर्द्रिओ ने सारी जिन्दगी बेघर,बेसहारा, शरणार्थी, नस्लवाद से पीड़ित लोगों की हिमायत की। इसके अलावा फ्रांस में शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया। मजदूर संगठनों,सत्ता से जुड़े राजनीतिज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक ही साझा मंच पर लाने का काम किया। मीडिया के क्षेत्र में उनकी चर्चित किताब है ,' ऑन टेलीविजन' (1996) इस किताब में उन्होंने रेखांकित किया है कि किस तरह टेलीविजन सारवान मुद्दों को हाशिए पर डाल रहा है और सांस्कृतिक फास्ट फूड तैयार कर रहा है। 


    बोर्दिओ की मूल चिन्ता यह थी कि किस तरह बीसवीं शताब्दी के संघर्षों की उपलब्धियों को बचाकर रखा जाय। ये पहलू उनकी निम्न तीन किताबों -'एक्टस ऑफ रेजिस्टेंस'(1998), 'फायरिंग बैक'(2002) और 'इंटरवेंशन' में देखे जा सकते हैं। ये तीनों किताबें एक नए किस्म के अंतर्राष्ट्रीयतावाद की हिमायत करती हैं। बोर्दिओ स्वभाव से शर्मीले और संकोची व्यक्ति थे।सरकारी सम्मान और पद की उन्हें आकांक्षा नहीं थी, बल्कि इसे उन्होंने ठुकराया।यहां तक कि वे कभी टीवी पर भी नहीं जाते थे। एक मर्तबा अमेरिकी टीवी पर व्यक्तिगत जीवन की अनेक बातों को अमेरिकी जनता के साथ शेयर करने के लिए वह टीवी पर आए तो आम लोगों को अचरज हुआ। यहां तक कि एक अर्से के बाद उन्होंने परिवार और लेखन के अलावा सामाजिक जीवन में शिरकत करनी बंद कर दी थी। बोर्द्रिओ ने अपने को दर्शन में दीक्षित किया,अल्जीरिया के युध्द में अपने विचारों को तपाया और कालान्तर में समाजविज्ञानी बने। बोर्दिओ उन चंद विचारकों में हैं जिनके यहां फ्रांस के 1968 के छात्र विद्रोह के पहले से ही फ्रांसीसी समाज का आलोचनात्मक विश्लेषण पेश किया जा रहा था। राजनीति में वे हमेशा वामपंथी रहे।
       
   बोर्दिओ का मानना है कि नव्य-उदारतावाद का मूल लक्ष्य है सामुदायिक संरचनाओं का क्षय और बाजार के तर्क की प्रतिष्ठा। इस तरह के आधार पर जो विमर्श तैयार किया जा रहा है वह वर्चस्ववादी है। विश्वबैंक ,इकोनामिक कारपोरेशन एंड डवलपमेंट और आईएमएफ जैसी संस्थाओं के द्वारा जो नीतियां थोपी जा रही हैं उनका लक्ष्य है श्रम मूल्य घटाना, सरकारी खर्च घटाना,  काम को और भी लोचदार बनाना। यही मौजूदा दौर का प्रधान विमर्श है। यथार्थ में आर्थिक व्यवस्था नव्य-उदारतावाद के यूटोपिया को लागू करने का विमर्श है। इसके कारण राजनीतिक समस्याएं पैदा हो रही हैं। 


    नव्य-उदारतावादी विमर्श, विमर्शों में से एक विमर्श नहीं है,बल्कि यह 'ताकतवर विमर्श' है। ताकतवर विमर्श इस अर्थ में, यह कठोर है,आक्रामक है,यह अपने साथ सारी दुनिया की ताकतें एकीकृत कर लेना चाहता है।यह आर्थिक निर्णय और चयन को अपने अनुकूल ढाल रहा है। वर्चस्ववादी आर्थिक संबंधों को निर्मित कर रहा है।नए किस्म के चिन्हशास्त्र को बना रहा है। 'थ्योरी ' के नाम पर ऐसी सैध्दान्तिकी बना रहा है जो सामूहिकता की भूमिका को नष्ट कर रही है। वित्तीय विनियमन पर इसका अर्थसंसार टिका है। इसके तहत राज्य का आधार सिकुड़ रहा है,बाजार का आधार व्यापक बन रहा है। सामूहिक हितों के सवालों को अप्रासंगिक बना रहा है। इसने व्यक्तिवादिता ,व्यक्तिगत तनख्वाह और सुविधाओं को केन्द्र में ला खड़ा किया है। तनख्वाह का व्यक्तिकरण मूलत: सामूहिक तनख्वाह की विदाई की सूचना है। नव्य -उदारतावाद मूलत: बाजार के तर्क से चलने वाला दर्शन है। इसमें बाजार ही महान है। इसके लिए परिवार,राष्ट्र,मजदूर संगठन,पार्टी, क्षेत्र आदि किसी भी चीज का महत्व नहीं है,यदि किसी चीज का  महत्व है तो वह है उपभोग का। उपभोग को बाजार के तर्क ने परम पद पर प्रतिष्ठित कर दिया है।


बोर्दिओ का मानना है भूमंडलीकरण ने जब सूचना तकनीकी के साथ नत्थी कर लिया तो उसने पूंजी की गति को अकल्पनीय रुप से बढ़ा दिया। इसके कारण छोटे निवेशकों के मुनाफों में तात्कालिक इजाफा हुआ,वे अपने मुनाफों के साथ स्थायी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफों की तुलना करने लगे हैं। बड़े कारपोरेशन बाजार के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर रहे हैं।नव्य उदारीकरण के दौर में संरचनात्मक हिंसाचार में इजाफा हुआ है। असुरक्षा बढ़ी है। मुक्त व्यापार गुरूमंत्र बन गया है।मीडिया के द्वारा साधारण जनता की अभिरुचि के निर्माण की प्रक्रिया में व्यक्तिवादिता, प्रतिस्पर्धा और विशिष्टता इन तीन तत्वों का खासकर ख्याल रखा जाता है।बोर्दिओ का मानना है  अभिरुचि वर्गीकृत होती है और यह वर्गीकरण क्लासीफायर की व्यंजना है। इस स्थिति को हासिल करने की संभावना सिर्फ उन लोगों के पास है जिन्हें शिक्षा मिली है और जिनके पास पैसा है। इन लोगों की अभिरुचि उन लोगों से भिन्न होती है जो इनसे भिन्न हैं।
( लेखक- जगदीश्वर चतुर्वेदी,सुधा सिंह) 

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