फिल्मी संगीत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
फिल्मी संगीत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 16 अगस्त 2010

लोकप्रिय संगीत का बदला हुआ रूप



     आज परंपरागत संगीत के विरुद्ध लोकप्रिय संगीत का औपचारिक रूप अपनी उत्पादक भूमिका त्याग चुका है। पुराने संगीत का मिथकीय रूप वस्तुत: स्वतंत्रता को बाधित करता है। भौतिक तौर पर यह संगीत पराया हो चुका है। पुराने संगीत की अप्रासंगिकता का प्रत्यक्ष प्रमाण है लोकप्रिय संगीत की व्यावसायिक सफलता। लोकप्रिय संगीत का श्रोता ऐसा श्रोता है जिसका संगीत के समग्र विचार से अलगाव हो चुका है। इसमें कम-से-कम प्रतिरोध भाव है। यह अच्छा खरीदार है जिसने संगीत के आलोचक की भूमिका त्याग दी है।
लोकप्रिय संगीत या फिल्मी संगीत में निहित आनंद का कला में निहित आनंद से कोई संबंध नहीं है। कलारूपों और लोकप्रिय कलारूपों में अंतर होता है। इनकी निर्माण प्रक्रिया भिन्न होती है। इनके श्रोतावर्ग में भी अंतर होता है। यही वजह है कि लोकप्रिय संगीत के आनंद को कला आनंद के साथ एकमेक नहीं करना चाहिए। आज संगीत के लिए त्याग भाव का पूरी तरह लोप हो चुका है। लोकप्रिय संगीत 'सबऑर्डिनेट' चरित्रा को अस्वीकार करता है। वह योजना बनाता है कि प्रत्येक चीज पृथक्कृत क्षणों के साथ जुड़ सके। इसी क्रम में वह एकाकी व्यक्ति से जुड़ता है। अब श्रोता सिर्फ सुनता है, उत्तर नहीं देता। अब सिर्फ ध्वनि विस्तारक एवं प्रसार यंत्रों की आवाज होती है, कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। वह उत्पादक मनुष्य को ज्यादा से ज्यादा निष्क्रिय अंग के रूप में सक्रिय करता है। परिणामत: संगीत के एप्रिसियेशन की क्षमता का क्षय हुआ है। जो लोग सारी जिंदगी रेडियो सुनते हैं उनके अंदर वायलिन, सरोद, पियानो आदि के जादू के प्रति आकर्षण खत्म हो गया है। इसी अर्थ में आनेवाली पीढ़ियां जीवितों में ज्यादा संगीतहीन हैं।
यह ऐसे युग का संगीत है जिसे रेडियो ने सबसे ज्यादा लोकप्रिय बनाया और ऑडियो उद्योग एवं टेलीविजन ने नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। रेडियो के कारण संगीत के प्रति समग्र रवैया ही बदल गया। अब संगीत का संगीतकार की मौजूदगी के बगैर अनुभव किया जाने लगा। यह शून्य से पैदा हुआ संगीत है। जब उपकरण तैयार हुए थे तब सामने कोई बैठा नहीं था। रेडियो संगीत के उदय के साथ ही, जो कुछ भी जड़ था वह गायब हो चुका था। जो वाद्य बजा नहीं सकते थे वे पूरी तरह गायब हो गए। इसकी प्रस्तुति के दौरान उठने, बैठने या व्यवधान पैदा करनेवाला कोई नहीं था। अब जितने ऐक्शन थे वह सब मूवमेंट के ऐक्शन थे। यह सब शून्य में पैदा हो रहा था। इस प्रक्रिया में ध्वनि तरंगों की स्पष्टता बढ़ गई। जड़ीभूत प्रवृत्तिायां क्षतिग्रस्त हुईं। इससे चीजों की ऊर्ध्वगामी गति की शुरुआत हुई। गायक की भाव-भंगिमाओं का उच्च-मंद, आरोह-अवरोह पर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता था। इनमें कोई संवाद नहीं था बल्कि द्वंद्व था। रेडियो संगीत की पूरी क्षमता तब उभरी जब गायक का पूरी तरह लोप हो गया। स्वर के आरोह-अवरोह में भी वैपरीत्य पैदा हो गया। अब आरोह-अवरोह की गति की जगह को ध्वनि तरंगों के माध्यम से भरा जा सकता था। अगले ही क्षण शून्य की अनुभूति पैदा होती थी। इसी प्रक्रिया में 'साउंड स्पेस' और 'रीयल स्पेस' के बीच अंतर्विरोध पैदा हुआ।
रेडियो और ऑडियो ने संगीत को सांस्कृतिक एकरूपता पैदा करनेवाले उपकरण के तौर पर विकसित किया। प्रसिध्द जर्मन सिध्दांतकार अर्नहाइम ने इसे सांस्कृतिक पतन का सूचक माना। सांस्कृतिक पतन इस अर्थ में कि इसने नियोजित ढंग से एकरूपता पैदा करने के बजाय विविधता में एकता पैदा करने की कोशिश की। अब एक ही समस्या रह गई कि इस विविधता को कैसे सुरक्षित रख जाए। परिणामत: सांस्कृतिक क्षय हुआ। रेडियो या ऑडियो से उपजी संस्कृति ऐसी संस्कृति है जिसका सृजन श्रोता या उपभोक्ता ने नहीं किया अपितु वह दर्शक या श्रोता मात्रा होकर रह गया। 'खाली समय' को कैसे भरा जाए इसके बारे में सोचने का मौका ही नहीं देता। त्राासदी यह है कि 'खाली समय' को लोकप्रिय संगीत से भरने की कोशिश में श्रोता 'प्लेजर' समझने लगा। हकीकत में लोकप्रिय संगीत में प्लेजर देने की क्षमता नहीं है। 'प्लेजर' ने प्रसन्नता का जो वायदा किया था उसका स्वरूप आज उजागर हो चुका है। आज खुशी संभव नहीं है। जनता को नई संगीत चेतना नाखुशी के आनंद को सामने लाती है।
नई समाज व्यवस्था के उदय के साथ शास्त्रीय संगीत और लोकप्रिय संगीत के बीच सामंजस्य बिठाने की कोशिश करते हुए अंतर्विरोधों को अनसुलझा छोड़ा जा रहा है। आज घटिया (फिल्म) संगीत श्रेष्ठ संगीत (शास्त्रीय संगीत) को हजम कर रहा है। इसका कारण यह है कि श्रेष्ठ संगीत जिस सामाजिक ऊर्जा के गर्भ से पैदा हुआ था आज वह खत्म हो चुकी है। अत: श्रेष्ठ संगीत को घटिया-संगीत से ऊर्जा ग्रहण करनी पड़ी। श्रेष्ठ संगीत को संगीत के घटिया स्तर पर उतरना पड़ता। संगीत का स्टेंडराइजेशन हुआ। ्रूकतु घटिया या निम्नस्तरीय संगीत की यह सफलता पुरानी संगीत शैली के बगैर संभव नहीं, पुरानी शैली का यह अनुकरण है। यह सुसंगतता और अक्षमता के बीच का
संबंध है। ये दो छोर पर स्थित परिस्थितियां हैं जो एक-दूसरे से मुकाबला करती हैं। यहां व्यक्तिगत का कोई स्थान नहीं है। व्यक्ति का बहिष्कार इस नए संगीत का वास्तविक संकेत है। मौजूदा दौर में प्रगतिशीलों का एक तबका ऐसा भी है जो शास्त्राीय संगीत एवं लोकप्रिय संगीत में अंतर करने की कोशिश करता है। जबकि ये दोनों रूप वस्तुत: सांस्कृतिक माल हैं। माल से ज्यादा इनका कोई महत्व नहीं है। जो सबसे ज्यादा लोकप्रिय गीत होता है वह उत्साहित करता है साथ ही, रेखांकित करता है यह 'इडियम' अभी जनता से कटा नहीं है।
आज संगीत के श्रोता के पास मात्र संदर्भ सूचनाएं होती हैं। उसकी प्रतिक्रिया का संगीत के खेल से कोई संबंध नहीं होता। वह संगीत से स्वत:स्फूर्त ढंग से जुड़ता है। पुराने शास्त्रीय संगीत में से वह गुणवत्ता के आधार पर चयन नहीं करता। जो रचना ज्यादा परिचित या लोकप्रिय होती है उसके आधार पर चयन करता है, उसे प्रस्तुत करता है। इसमें मुख्य गायक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।


शनिवार, 27 मार्च 2010

फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 1-

 (फिल्म अभिनेता शाहरुख खान)                         
 संचार तकनीक के द्वारा निर्मित वातावरण स्वभावत: ग्लोबल-लोकल होता है। यह धारणा फिल्मों के ऊपर भी लागू होती है। भारतीय फिल्मों का चरित्र और हॉलीवुड फिल्मों का चरित्र अनेक मामलों में भिन्न है। भारतीय सिनेमा का मूलाधार है वैविध्य और बहुलतावाद। जबकि हॉलीवुड सिनेमा की धुरी है इकसारता।   
     भारतीय सिनेमा में संस्कृति और लोकसंस्कृति के तत्वों का फिल्म के कथानक के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जबकि हॉलीवुड सिनेमा के कथानक की धुरी है मासकल्चर। हॉलीवुड सिनेमा विश्वव्यापी अमरीकी ग्लोबल कल्चर के प्रचारक-प्रसारक की अग्रणी भूमिका अदा करता रहा है। जबकि भारतीय सिनेमा में पापुलरकल्चर के व्यापक प्रयोग मिलते हैं।
    हॉलीवुड-बॉलीवुड उद्योग की इस प्रकिया में भारतीय सिनेमा ने खिचड़ी फिल्मी संस्कृति का निर्माण किया है। उसने भारतीय फैंटेसी का व्यापक प्रचार-प्रसार किया है। भारतीय फिल्मी फैंटेसी के चार प्रमुख क्षेत्र हैं, प्रेम, परिवार -समुदाय, राष्ट्र और गरीब। इन चारों के कथानक,विवाद और नज़ारे सबसे ज्यादा रचे गए हैं। भारतीय सिनेमा में भाषायी वैविध्य है साथ ही इसे अपने लिए देश और विदेश दोनों में स्थान बनाना होता है। इसके कारण सिनेमा में भाषायी -सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण का भाव भी होता है। भाषायी और लोकल संस्कृति का अतिक्रमण करने के लिए भारतीय सिनेमा ,खासकर हिन्दी सिनेमा को अनेक चीजों का अतिक्रमण करना होता है।
     हिन्दी सिनेमा मूलत: समग्रता में ‘महा- आख्यान’ नहीं बनाता। वह ऐसा कोई कथानक नहीं बनाता जो सब कुछ अपने अंदर समेटे हो। भारतीय सिनेमा में संस्कृति,इतिहास, व्यक्तित्वअभिनय और कथानक की इकसार अवस्था नहीं मिलती। इससे राष्ट्रीय विविधता को रुपायित करने और बनाए रखने में मदद मिली है। इस बिखरे फिल्मी संसार में सेतु का काम किया है पापुलर कल्चर ने (मासकल्चर नहीं) ।
      पापुलरकल्चर के सेतु से गुजरने के कारण ही मुम्बईया सिनेमा की ‘फ्रेगमेंटरी ’और संवादमूलक प्रकृति है। भारतीय सिनेमा सांस्कृतिक विमर्शों को पैदा करता है।
      हॉलीवुड का सिनेमा सुसंबद्ध ढ़ंग से पाठक को सम्बोधित करता है जबकि भारतीय सिनेमा दर्शक के अलावा सांस्कृतिक समूहों को सम्बोधित करता है। यही वजह है कि भारतीय सिनेमा जितना देश में देखा जाता है वैसे ही विदेश में भी देखा जाता है। देशी-विदेशी दर्शकों को आकर्षित करने में जिस तत्व का सबसे बड़ा रोल है वह है‘भारतीयता’, इस ‘भारतीयता’ का आधार राजनीतिक न होकर सांस्कृतिक है।इसे साम्प्रदायिक राजनीतिक कैटेगरी के रुप में सांस्कृतिक आधार से संवाद करने के कारण ही हिन्दी सिनेमा और भारतीय सिनेमा विदेशों में सभी को अपील करता है। यह ऐसे आप्रवासी की भारतीयता है जो नागरिकता के प्रपंचों से मुक्त है। इस भारतीयता की अपील उन लोगों में जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटे हुए हैं। इस भारतीयता का आधार है जीवनशैली और संस्कार।
 
  फिल्म की कहानी का विधा रुप में उद्योग,बाजार और राजनीति से गहरा संबंध होता है। विधा के साथ उद्योग और बाजार की शक्तियों की सक्रियता का जो रुप यहां मिलता है वह अन्यत्र कम देखने को मिलता है।  हमें विधा की अवधारणा के फिल्म में रुपान्तरण को आलोचनात्मक नजरिए से देखने की जरुरत है। विधा यहां अमूर्त्त कोटि नहीं है। बल्कि विधा की सांस्कृतिक एजेण्ट के रुप में महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय समाज में अस्मिता के रुपों को परिभाषित करने वाली कोटि भी यही है। फिल्मी कहानी  सांस्कृतिक उत्पादन पर चलने वाली सामयिक बहसों का केन्द्र बिंदु है। यह समाज में सक्रिय सांस्कृतिक-सामाजिक संवृत्तियों को अप्रत्यक्ष रुप से प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण विधा रुप है।
      फिल्मी कहानी सांस्कृतिक मार्ग है। हम जब भी किसी फिल्मी कहानी देखें तो पहले उसके पैराडाइम को देखें। फिल्मी कहानी का पैराडाइम उसके अंदर से खोजना चाहिए ऊपर से फिल्मी कहानी गैर-समस्यामूलक संदर्भ में तैयार की गई होती है। लेकिन उसकी हमेशा कोई मंशा होती है जिसे तयशुदा मानकों के आधार पर ही पढ़ा जा सकता है। मसलन् हाल ही में रिलीज की गई फिल्म ‘माई नेम इज खान’ को ही ले सकते हैं, यह अमेरिकी विदेश नीति के फ्रेमवर्क में निर्मित फिल्म है। शाहरुख खान का बयान ‘माई नेम इज खान आई एम नॉट ए टेररिस्ट’,यह वक्तव्य बार-बार भिन्न संदर्भ में शाहरुख खान देता है और बड़े ही कौशल के साथ भारत के साम्प्रदायिक संदर्भ को भी इसमें शामिल कर लिया गया है।
   शाहरुख खान का बयान असाधारण ढ़ंग से रुपक मडरॉक के ‘न्यूज कारपोरेशन’ के 9 / 11 के संदर्भ में किए गए व्यापक मुस्लिम विरोधी प्रचार अभियान के फ्रेमवर्क का हिस्सा है। इस बयान की तमाम विचारधारात्मक जटिलताएं तब ही खुलेंगी जब हम अमेरिकी विदेश नीति के सामयिक मुस्लिम विरोधी पैराडाइम से वाकिफ हों।
       उल्लेखनीय है कि हिन्दी सिनेमा में ‘तेजाब’ फिल्म के साथ मुस्लिम विरोधी नजरिए का प्रवेश होता है। इस फिल्म के साथ ही मुसलमान को विलन के रुप में व्यापक कवरेड मिलता है। मुसलमान के नकारात्मक कवरेज को ‘गदर’ फिल्म वे नयी ऊँचाईयों पर पहुँचाया, शाहरुख कान की नयी फिल्म ‘माई नेम इज खान’ इसी सिलसिले की ओबामा प्रशासन की विदेशी नीति के फ्रेमवर्क में तैयार की गई फिल्म है।  
    इसी प्रसंग में दर्शकों के साम्प्रदायिकीकरण की प्रक्रिया पर भी हमें ध्यान देने की जरुरत है। वे फिल्में दर्शक जुगाड़ नहीं कर पातीं जो धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक फिल्में हैं, इसके विपरीत साम्प्रदायिक और राष्ट्रवादी नजरिए की फिल्में हिट जाती हैं। फिल्में स्वतः ही दर्शक नहीं बनातीं बल्कि उनके दर्शक सचेत ढ़ंग से बनाए जाते हैं। हमें देखना चाहिए कि हिन्दी सिनेमा ने किस तरह का दर्शकवर्ग तैयार किया है।साथ ही यह भी देखना चाहिए कि टेलीविजन के द्वारा किस तरह का दर्शकवर्ग तैयार किया जा रहा है। कहीं दर्शकवर्ग के चरित्र को टेलीविजन ने तो प्रभावित नहीं किया है ?   
 ( हैदराबाद स्थित अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के द्वारा 24 और25 मार्च 2010 को  आयोजित सेमीनार में सिनेमा और संस्कृति विषय पर दिए भाषण पर आधारित संशोधित आलेख)     



गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

फिल्मी गीत और पैरोडी के विचारधारात्मक खेल


 फिल्मी गीत 'पैरोडी' है। पैरोडी का अर्थ यह नहीं है कि इसे गंभीरता से न लिया जाए। पैरोडी गंभीर विधा है। इसकी साहित्यिक परंपरा है। पैरोडी की विधागत विशेषता है कि वह पराश्रित या परजीवी, व्युत्पन्न, स्वचेतन, प्रबोधात्मक और आत्म-प्रतिबिंबात्मक विधा है। इसमें आलोचनात्मक अंतराल बनाए रखकर पुनरावृत्ति होती है। यह विडंबनापूर्ण है, इससे खेला जा सकता है।

कुछ चिंतक यह भी मानते हैं कि 'पैरोडी' की सृजनात्मक भूमिका होती है। खासकर फिल्मी संगीत की दुनिया में पुराने संगीत रूपों की नकल करके उन्हें नए रूप में पेश करके आधुनिक संगीत चेतना बनाने में इससे मदद मिलती है। पैरोडी के द्वारा ही संगीत चेतना का रूपांतरण, समावेशन और गहराई में प्रवेश संभव हुआ है।

पैरोडी में 'अंतरवर्ती संदर्भगतता' (इंटरटैक्स्चुएलिटी) का प्रयोग होता है। इसी के कारण वह नए को समाहित और पुनरुत्पादित करने में सफल हो जाती है। प्रभावशैली पैरोडी में लेखकीय भावबोध और रूप (फॉर्म) का इच्छित दिशा में पूरी तरह विकृतीकरण कर दिया जाता है। उसमें विशिष्ट क्षण को उभारा जाता है। इसमें परंपरा से विच्छिन्नता होती है। पाठ के मूल संदर्भ और उससे जुड़ी चीजों के संदर्भ से काटकर उसका निर्माण किया जाता है। इसके लिए पाठगत अंतस्संबंधों का विश्लेषण करना चाहिए।

इसमें निष्क्रिय, वैविध्यपूर्ण एवं द्विअर्थी प्रयोग मिलते हैं। 'पैरोडी' को समझने का अर्थ है संप्रेषण की प्रक्रिया को समझना। इसके संदर्भगत उत्पादन, पाठ के साथ युग के संबंध को समझना चाहिए।

'पैरोडी' की खूबी है कि वह वास्तव से सुंदर होती है। इसमें वास्तविक समस्याओं और वास्तविक परिस्थितियों का गंभीर वर्णन मिलता है। उसके पाठ की प्रस्तुति प्रभावशाली होती है, पाठ भी प्रभावशाली होता है। यह पुराने रूप (फॉर्म) के साथ संवाद है।

पैरोडी स्वभावत: वर्णसंकर और द्विअर्थी होती है। वह पुराने रूप के साथ ऐसा संवाद है जो अविस्मरणीय रूप में सामने आता है। वह स्व-संतुष्ट और नाशवादी रूप की अभिव्यक्ति है। पैरोडी की लोकप्रियता का इसी से अंदाज लगा सकते हैं कि वह आज कल्पनाशीलता और संवेदनात्मकता का निर्माण करने का बड़ा स्रोत है। आमलोगों के दृष्टिकोण, संवेदनशीलता, मानवीय संबंधों, संस्कारों और मूल्यबोध को निर्मित करने में इसकी गंभीर भूमिका है।

इस परिप्रेक्ष्य में हमें फिल्मी गीत-संगीत या लोकप्रिय गीत-संगीत की सामाजिक भूमिका के बारे में विचार करना चाहिए। हिंदी फिल्मों के गीतों में निम्नलिखित प्रवृत्तियां पाई जाती हैं : (1) उल्लास, (2) प्रेम, (3) एकता, (4) सुंदर अतीत और सुंदर भविष्य की परिकल्पना, (5) प्रकृति वर्णन एवं सामाजिक भावनाएं, (6) अर्थहीनता, (7) स्व-पीड़न और पर-पीड़न, (8) धार्मिक आस्था।

इन आठों प्रवृत्तियों के गीत प्रत्यक्ष या प्रकारांतर से व्यक्ति के सामाजिक अलगाव या जड़ों से दूर चले जाने या जीवन से पृथकता या भावात्मक तौर पर संबंधों में आई दरार या बेगाने भावों के जीवन में जड़ें जमा लेने के भाव को व्यक्त करते हैं। उल्लास की प्रवृत्ति जिन गानों में व्यक्त होती है उनमें यह तथ्य उभारा जाता है कि जीवन में धक्का लगना अनिवार्य है, यह अपरिहार्य किंतु अस्थायी अवस्था है। इन गानों का अंत सुखांत होता है।

इसी तरह एकता की प्रवृत्ति को जिन गानों में अभिव्यक्ति मिलती है, वहां राष्ट्रीय एकता, सामाजिक एकता, बंधुत्व एवं समानता के भावबोध की अभिव्यक्ति मिलती है। उल्लास और एकता की प्रवृत्ति के गीत जनता के मन को उद्वेलित करते हैं, मन को उत्प्रेरित करते हैं। इन दोनों प्रवृत्तियों से मन को हल्का आनंद और आत्मसंतोष मिलता है।

प्रच्छन्नत: ये दोनों प्रवृत्तियां किसी न किसी तरह के सामाजिक असंतोष को व्यक्त करती हैं। इनमें अपने ही हाथों अपनी पीठ थपथपाने या जो सहमत है उसे ही सहमत करने या संबोधित करने की दृष्टि मिलती है। सामाजिक असंतोष की कारक शक्तियां इसमें शामिल नहीं होतीं। परिणामत: उल्लास और एकता की प्रवृत्तियां सकारात्मक दिशा में ले जाने के बजाय प्रतिगामी दिशा में ले जाती हैं।

जिन गीतों में समूह का आह्नान होता है वहां व्यक्तित्व केंद्रित दृष्टिकोण मिलता है। व्यक्तित्वों में भी अभिजन के व्यक्तित्व को हीरो या त्राणकर्ता के रूप में उभारा जाता है। ये गीत समूह या गिरोह में शामिल होने का भाव पैदा करते हैं। जब तक आप समूह या गिरोह में शामिल हैं तब तक चिंता करने की कुछ भी जरूरत नहीं।

समूह और गिरोह अमूर्त होते हैं। शक्लहीन होते हैं। शक्ल या पहचान के अभाव के कारण ही इनकी फासिज्म की दिशा में विकास की संभावना होती है। इससे समूह के दबाव की चेतना का निर्माण होता है। परिणामत: श्रोताओं में दबाव ग्रुप की राजनीति और अंधसमूहवाद की राजनीति के प्रति रुझान बढ़ता है।

फिल्मी गीतों की शैली में अमूमन 'आंतरिकता' या 'हार्दिकता' का तत्व हावी रहता है जिसके आधार पर सामान्य संवेदना निर्मित की जाती है। यही सामान्य संवेदना करोड़ों श्रोताओं के दृष्टिकोण में गीतों की विचारधारा के प्रति अनुकूल रवैया पैदा करती है।

गीत सुनते हुए यह महसूस होता है कि गायक सिर्फ श्रोता से मिल रहा है, तुमसे मिल रहा है। यह गायक का श्रोता से व्यक्तिगत मिलन है। यह सामुदायिक संवेदना का गंभीर विकृतीकरण है। गीतों में गायन शैली वैयक्तिक होती है। सुनने के क्रम में हमें वैयक्तिकता के बजाय यह महसूस होता है कि यह जीवन से कई गुना ज्यादा बड़ी है। वस्तुत: यह ऐसी शैली है जो अपने सामूहिक दायित्व को भूल चुकी है। यह लोकप्रिय गीतों का वैयक्तिकीकरण है।





बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

फिल्मी संगीत का नया पैराडाइम


 संगीत और समाज का द्वंद्वात्मक संबंध होता है। यह रिश्ता प्रभुत्व की शक्तियों और आम जनता के अंतर्विरोधों को व्यक्त करता है। प्रभुत्वशाली तबकों और वंचितों के बीच के अंतर्विरोधों का इस संबंध के विकास पर गहरा प्रभाव देखा जाता है। सामाजिक विकास की शक्तियों को किस तह नियंत्रित किया जाए ? वंचितों में दासत्वबोध और हारे हुए की भावना को कैसे निर्मित जाए ? सांस्कृतिक रूप में किस परिकल्पना के अनुकूल ढाला जाए, यही केंद्रीय चिंता लोकप्रिय संगीत में सक्रिय रहती है।
लोकप्रिय संगीत मूलत: बुर्जुआ संगीत है। आभिजात्य संगीत है। इसमें हमें फिल्मी संगीत, भक्ति संगीत, गैर-फिल्मी संगीत और पाश्चात्य संगीत ये चार तरह के संगीत
रूप मिलते हैं। संगीत के रूप जटिल और विलक्षण होते हैं। उनके बारे में सरलता का दृष्टिकोण असुविधा पैदा करता है। अंर्स्ट फिशर के शब्दों में कहें तो 'समस्त कलाओं में संगीत सबसे ज्यादा अमूर्त और रूपात्मक कला है।' संगीत पर विचार करते समय उसके रूप और किस तरह की सामाजिक अंतर्वस्तु से इसका अंतस्संबंध है, इसका विश्लेषण करना चाहिए। संगीत को संगीत के रूप में देखना रूपपरक दृष्टिकोण की ओर ले जाता है वहीं संगीत और उसकी सामाजिक अंतर्वस्तु के साथ जोड़कर देखने से संगीत के जटिल रूपों को उद्धाटित करने में मदद मिलती है।
हेगेल के शब्दों में सोचें तो 'संगीत की अंतर्वस्तु का अर्थ वही नहीं होता, जो हम दृश्यकलाओं या कविता की बात करते समझते हैं। इसमें जिस चीज का अभाव होता है, वह यही वस्तुपरक बाह्य वस्तु है, चाहे हम इसे कोई वास्तविक प्रपंच मानें, अबौध्दिक विचारों और बिंबों की वस्तुपरकता मानें।'
संगीत की अंतर्वस्तु वह अनुभव है जो व्यक्तिगत (संगीतकार का) होने के साथ-साथ सामाजिक भी होता है। वह संगीतकार के संदर्भ से जुड़ा होता है। संगीत की भूमिका समष्टिगत भावनाओं को उभारने की रही है। इसमें रचनाकार स्वचालित साहचर्यों का इस्तेमाल करता है।
लोकप्रिय फिल्मी संगीत मूलत: शहरी अर्द्धशिक्षित जनता के लोकप्रिय दृष्टिकोण को व्यक्त करता है। यह पेशेवर संगीतकारों की देन है। इसी तरह फिल्मी गीत भी पेशेवर गीतकारों की देन है। ये दोनों ही पेशेवर तबके मूलत: उच्चवर्गों पर निर्भर हैं। ये दोनों अभिजन की जन-कला के अंग हैं। यह जनता के लिए निर्मित कलारूप है। इसकी इकसार संगीतबोध पैदा करने में, माल के रूप में संगीत का बाजार तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

लोकप्रिय संगीत अत्याधुनिक माध्यम तकनीकी से निर्मित संगीत है। प्रविधि एवं प्रौद्योगिकी प्रगति से इसका गहरा संबंध है। यह संगीत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्रोत है। यह ऐसा कलारूप है जिसमें रचनाकार का प्रत्यक्ष स्पर्श महसूस नहीं होता। प्रत्यक्ष स्पर्श का यहां लोप हो जाता है। ध्यान रहे,  तकनीकी विकास का इतिहास जाने बगैर कला के इतिहास को समझना मुश्किल है। तकनीकी प्रक्रियाएं हमेशा से कलात्मक विचारों का अंतर्ग्रंथित हिस्सा ही हैं।

तकनीकी प्रगति सिर्फ आर्थिक रूप से ही लाभप्रद नहीं होती अपितु वह जनता के दैनिक जीवन, अभिरुचियों और मूल्यों का अंग रही है। अत: सामाजिक विकास के लिए तकनीकी विकास अनिवार्य शर्त है। तकनीकी विकास सामाजिक सांस्कृतिक विकास का उपकरण बने इसके लिए तकनीकी पर मास्टरी होना बेहद जरूरी है। जन-कला (मास आर्ट) के नियम कठोर, सुनिश्चित एवं अननुमेय होते हैं। लोकप्रिय संगीत-गीत पर भी यह बात लागू होती है। लोकप्रिय गीत और संगीत का निर्माता फॉर्मूलाबध्द सृजन करता है। उसके लिए जो लोकप्रिय है वह प्रासंगिक है। अगर कोई फॉर्मूला पिट चुका है तो वह कोई दूसरा फॉर्मूला खोज लेता है।

औद्योगिक जन-उत्पादन की यह विशेषता है कि उसका उत्पादक मानकीकृत और अंतर-विनिमय के तत्वों को एक जगह इकट्ठा करके वस्तु का निर्माण करता है। इसमें कम श्रम लगता है। यही स्थिति लोकप्रिय संगीत-गीत की भी है। तैयारशुदा हिस्सों या तत्वों का कम श्रम और लागत से संयोजन करके गीत या संगीत का निर्माण किया जाता है।

लोकप्रिय संगीत में फॉर्मूले से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होती है फॉर्मूले की पुनरावृत्ति की प्रभावशाली प्रस्तुति। पुनरावृत्ति के कारण संगीत का प्रभामंडल खंडित होता है। संगीत लोकतांत्रिाक, सहज, बोधगम्य और स्टीरियोटाइप हो जाता है। इसी क्रम में संगीत का विसंदर्भीकरण भी हो जाता है। पुनरावृत्ति के बार-बार अनुभव से गुजरने के कारण ही हमें विसंदर्भीकरण अब परेशान नहीं करता। धीरे-धीरे संदर्भरहित चिंतन के हम आदी हो जाते हैं और चीजों को अनैतिहासिक ढंग से देखने और सोचने के आदी हो जाते हैं। लोकप्रिय संगीत इस प्रक्रिया में तेजी से फैलता है, व्यवसाय करता है, अतिरिक्त मांग पैदा करता है और उन्माद की हद तक श्रोताओं में लगाव पैदा करता है।

अतिरिक्त मांग का संबंध संगीत की नई तर्ज के साथ है। अतिरिक्त मांग जितनी ज्यादा और तीव्रता के साथ पैदा होगी उतनी ही गति के साथ नई तर्ज एवं धुन निर्मित की जाती है। इस प्रक्रिया में पुनरावृत्ति का तत्व बना रहता है। नई तर्ज के कारण ही पुनरावृत्तिा के द्वारा सृजित इकसार प्रभाव को तोड़ने में मदद मिलती है। इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि सिनेमा संगीत गतिशील होता है। इसके विपरीत अगतिशीलता और निर्वैयक्तिक कारीगरी यहां हावी रहती है। बौध्दिक रूप से यह जड़ एवं स्वतंत्रतारहित होता है। यह तयशुदा परिवेश के साथ संवाद करता है। इसी अर्थ में इसमें शिक्षित
करने की क्षमता नहीं है। व्यक्तित्व रूपांतरण करने में सफल नहीं होता।

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...