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रविवार, 23 अप्रैल 2017

कश्मीर से आई आवाज छात्र एकता जिंदाबाद

इस साल का नारा होगा-गर्व से कहो हम छात्र हैं ।छात्रों के हकों पर जिस तरह हमले बढ़ रहे हैं,छात्र राजनीति के ऊपर अंकुश लगाने की साजिशें चल रही हैं उनसे छात्र अपने को अपमानित महसूस कर रहे हैं।यूजीसी से लेकर केन्द्र का मानव संसाधन मंत्रालय,राज्य सरकारों से लेकर शिक्षा माफिया तक सब ओर से छात्रों के हकों पर हमले हो रहे हैं।छात्रों के अपने हक हैं जिनकी लंबे समय से अनदेखी होती रही है।कश्मीर में आतंकी समस्या को हल करने में केन्द्र सरकार नाकाम रही है और उसके प्रतिवाद में विगत पांच दिनों से कश्मीर के छात्र हड़ताल पर हैं।कश्मीर में छात्रों का समूचा कैरियर और शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से ठप्प पड़ी है।दुख की बात यह है कश्मीरी छात्रों का भविष्य किसी को नजर नहीं आ रहा,उनकी समस्याएं किसी को दिखाई नहीं दे रहीं।
यही स्थिति जेएनयू की है ,जिन छात्रों ने जेएनयू से एमए किया और आगे एमफिल-पीएचडी करना चाहते थे, उनके भविष्य को रोकने के लिए जेएनयू वीसी ने वहां की तयशुदा दाखिला नीति को यूजीसी सर्कुलर की आड़ में खत्म कर दिया और एमफिल्-पीएचडी के दाखिले के लिए तय सीटों में इस तरह कटौती की कि एमफिल्-पीएचडी में तकरीबन सभी सीटें बलिदान हो गयीं।वहीं दूसरी ओर पंजाब वि वि ने ट्यूशन फीस में बेशुमार बढोतरी करके पढ़ना ही मुश्किल कर दिया है।वहां ट्यूशन फीस दस गुना बढा दी गयी है। यूपी में वि वि और कॉलेजों में छह महिनों के लिए पाबंदी लगा दी गयी है।मोदी सरकार आने के बाद यूजीसी के बजट में कटौती की गयी है, केन्द्रीय वि वि से कहा गया है 30 फीसदी संसाधन वे स्वयं जुगाड़ करें।केन्द्र सरकार की नौकरियों की भर्ती मोदी सरकार आने के साथ ही बंद कर दी गयी है।ये सारे हालात बता रहे हैं कि विश्वविद्यालय और कॉलेज परिसर लगातार खराब होते जा रहे हैं।कश्मीर के छात्रों का विगत पांच दिनों से जिस तरह का आक्रोश सामने आया है वह कश्मीर के छात्र आंदोलन में हाल के वर्षों में नहीं देखा गया।

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

कश्मीर में युवाओं के हाथ में पत्थर क्यों हैं ॽ

       
श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में जाइए और आम लोगों से बातें कीजिए,अधिकतर लोग आतंकियों के खिलाफ हैं,वे बार -बार एक ही सवाल कर रहे हैं कश्मीर में इतनी सेना –सीमा सुरक्षा बलों की टुकड़ियां चप्पे-चप्पे पर क्यों तैनात हैं ॽ हमने क्या अपराध किया है ॽवे यह भी कहते हैं अधिकांश जनता आतंकियों की विरोधी है,पृथकतावादियों के साथ नहीं है।सामान्य लोगों से बातें करते हुए आपको यही लगेगा कि कश्मीर के लोग सामान्य जिन्दगी जीना चाहते हैं।वे यह भी कहते हैं निहित स्वार्थी लोगों ने कश्मीर का मसला बनाकर रखा हुआ है,ज्योंही सामान्य स्थिति होने को आती है कोई छोटी सी घटना होती है और आम लोगों के घरों पर सेना-पुलिस के छापे पड़ने शुरू हो जाते हैं।

मैं जब डाउनटाउन की प्रसिद्ध हमदान मसजिद को देखने पहुँचा तो वहां पर एकदम भिन्न माहौल था, लोग वहां प्रार्थना करने आ-जा रहे थे। बहुत ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी।हमदान मसजिद इस शहर की सबसे बेहतरीन मसजिद है।इसका इतिहास भी है,उसे लेकर अनेक विवाद भी हैं।इस मसजिद में बैठे रहने वाले लोगों से जब बातें कीं तो पता चला कि वे विकास पर बातें करना चाहते हैं।उनका मानना है कश्मीर को अमन-चैन चाहिए।जो भी विवाद हो,वो बातचीत से हल हो,वे खून-खराबे के खिलाफ हैं।मसजिद के अहाते में केन्द्रीय सुरक्षाबल के कमांडो एके47 के साथ पहरा दे रहे थे.हमने इन जवानों से पूछा क्या मसजिद में कोई खतरा है ॽ वे बोले कोई खतरा नहीं है।मसजिद के पास ही एक छोटा सा घाट है जिस पर जाना इन दिनों प्रतिबन्धित है।वहां एक जगह दीवार पर सिन्दूर के पूजा के निशान बने हुए हैं,एक जमाने में उस स्थान पर लोग पूजा करने जाते थे।यह वह जगह है जहां कभी पुराने जमाने में हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराकर जनेऊ जलाए गए ,मैंने बहुत कोशिश की जनेऊ जलाने की बात के प्रमाण जुटा सकूँ लेकिन मैं प्रमाण नहीं जुटा पाया।लेकिन यह तो सच है कि बड़ी संख्या में हिन्दुओं ने धर्म परिवर्तन करके एक जमाने में इस्लाम धर्म स्वीकार किया था,यह मध्यकाल में हुआ था।

मध्यकाल के धर्म परिवर्तन के सवालों और घटनाओं को आधुनिककाल में उठाकर साम्प्रदायिक घृणा फैलाने का काम संघ के संगठन करता रहा है।यह सच है आज भी कश्मीर में ऐसे मुसलमानों की संख्या बहुत बड़ी है जो पहले हिन्दू थे और बाद में धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बन गए,इन मुसलमानों के नाम का पहला नाम मुसलिम है और अंत में हिन्दू जाति लिखी मिलती है,जैसे ,मुश्ताक रैना।

हमदान मसजिद के ठीक सामने सफेद मसजिद है,जो सफेद संगमरमर के पत्थरों की बनी है।इन दोनों के बीच में झेलम वह रही है।दोनों ही मसजिदों का इतिहास और उनके साथ जुड़ी राजनीतिक कहानियां अलग अलग हैं। मैं दोनों मसजिदों में गया।हमदान मसजिद में तुलनात्मक तौर ज्यादा लोग आ जा रहे थे,सफेद मसजिद में सन्नाटा पसरा हुआ था।इस सन्नाटे का कारण मैं अभी तक समझ नहीं पाया। दोनों ऐतिहासिक मसजिद हैं लेकिन एक में आने-जाने वाले लोगों का प्रवाह बना हुआ है,दूसरे में इक्का-दुक्का लोग दिखे।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से हमें स्थानीय मुसलिम समाज की कई परतें नजर आती हैं।हमदान मसजिद में आने वाले तुलनात्मक तौर परंपरागत,रूढ़िवादी मान्यताओं में विश्वास करने वाले लोग हैं वहीं सफेद मसजिद में आने वाले उदार-धर्मनिरपेक्ष मुसलमान हैं।यह संख्या उस मनोदशा में बदलाव का संकेत है जो कश्मीर में जमीनी स्तर पर दिख रही है।

कश्मीर में आतंकियों-पृथकतावादियों का व्यापक दवाब है कि मुसलिम युवा फंडामेंटलिज्म की ओर आएं लेकिन अधिकतर युवाओं में इस्लाम के रूढ़िगत रूपों,मूल्यों और संस्कारों को लेकर अरूचि साफ नजर आई। इस अरूचि को मुसलिम युवाओं के आधुनिक ड्रेससेंस,बालों की कटिंग आदि में सहज ही देख सकते हैं। मैं कईबार हमदान मसजिद गया,सफेद मसजिद भी गया।लेकिन वहां युवा नजर नहीं आए।वयस्क औरतें ज्यादा दिखाई दीं।सफेद मसजिद में तो सन्नाटा पसरा हुआ था।इससे एक बात का अंदाजा जरूर लगता है युवाओं में इस्लाम धर्म के प्रति रूझान कम हुआ है।शिक्षित मुसलिम युवाओं में उदार पूंजीवादी मूल्यों के प्रति आकर्षण बढा है। वे कश्मीर की आजादी के सवाल पर कम और अपनी बेकारी की समस्या,कैरियर की समस्याओं पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

अधिकांश कश्मीरी युवाओं में मुख्यधारा के मीडिया के प्रति गहरी नफरत है,उनका मानना है कश्मीरी युवाओं को सुनियोजित ढ़ंग से आतंकी और पत्थरबाज के रूप में पेश किया जा रहा है।कुछ सौ पत्थरबाजों या पृथकतावाद समर्थकों को सभी कश्मीरी युवाओं के प्रतिनिधि या आवाज के रूप में पेश किया जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि मैं कश्मीर विश्वविद्यालय में अनेक छात्रों से मिला,डाउनटाउन में भी अनेक युवाओं से अचानक रूककर बातें कीं,सभी ने कहा कि पत्थर चलाने वालों में वे कभी शामिल नहीं रहे।सभी उम्र के युवा कश्मीर में चल रहे मौजूदा तनावपूर्ण माहौल के कारण शिक्षा संस्थानों,खासकर स्कूल-कॉलेजों में फैल रही अव्यवस्था और अकादमिक क्षति को लेकर सबसे ज्यादा चिन्तित मिले।

युवाओं का मानना है कश्मीर के मौजूदा हालात ने समूचे शिक्षातंत्र को तोड़ दिया है।ज्यों ही कोई घटना होती है तो इलाके में बीएसएफ,सीआरपीएफ और सेना की टुकड़ियां आ जाती हैं और वे तुरंत स्कूलों-कॉलेजों की इमारतों पर कब्जा कर लेती हैं।इससे लंबे समय तक पढ़ाई-लिखाई बंद हो जाती है। सन् 1990-91 में जिस तरह के हालात पैदा हुए उससे समूचा शिक्षातंत्र टूट गया ।

फिलहाल श्रीनगर में अर्द्ध सैन्यबलों ने 20 स्कूलों की इमारतों को कब्जे में लिया हुआ है।स्कूलों पर कब्जा करके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ढ़ंग से बच्चों को आतंकित करने की कोशिश की जाती है।इसका बच्चों की मनोदशा पर बुरा असर पड़ रहा है।बच्चों में सैन्यबलों के प्रति घृणा बढ़ने का यह बहुत बड़ा कारण है। कायदे से सरकार को स्कूलों की इमारतों का इस तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मुश्किल यह है कि सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद भी लंबे समय तक स्कूल की इमारतों पर अर्द्ध सैन्यबलों का कब्जा बना रहता है,शहर में सामान्य हालात पैदा हो जाते हैं लेकिन स्कूल नहीं खुलते।इस क्रम में जहां एक ओर स्कूल का फर्नीचर आदि नष्ट हो जाता है वहीं दूसरी ओर छात्र पढाई में पिछड़ जाते हैं और पुलिस वाले उनको आतंकित करते रहते हैं। स्कूलों में सैन्य बलों की मौजूदगी से वहां काम करने वाले कर्मचारियों को भी अनगिनत परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इस समय हम सबकी आंखों में कश्मीर के जिस युवा की इमेज है यह वह युवा है जिसे मुंबईया सिनेमा और न्यूज टीवी चैनलों ने बनाया है।इसका जमीनी हकीकत से कोई संबंध नहीं है।जेएनयू के 9फरवरी के प्रसंग के बाद टीवी चैनलों ने कश्मीरी युवाओं के बारे में जिस तरह की घृणित इमेज वर्षा की है और जिस तरह सोशल मीडिया के जरिए प्रचार अभियान चलाया गया उसने असली कश्मीरी युवावर्ग को हम सबकी चेतना से खदेड़कर बाहर कर दिया है। इस इमेज वर्षा ने जहां एक ओर कश्मीरी युवाओं के प्रति पूर्वाग्रह बनाए हैं वहीं उनको आतंकी-पृथकतावादी और भारत विरोधी बनाकर पेश किया है।

कश्मीर से आ रही इमेजों में कश्मीरी जनता और युवाओं का दुख-दर्द एकसिरे से गायब है।इसमें इस्लामिक उन्माद,भारत विरोधी उन्माद,सेना की कुर्बानी आदि का स्टीरियोटाइप अहर्निश प्रक्षेपित किया गया है,इस तरह की टीवी प्रस्तुतियां शुद्ध निर्मित यथार्थ का अंग हैं।कश्मीर की इमेजों में सैन्यबलों को भारत के रक्षक,भारत विरोधी ताकतों को कुचलने वाले के रूप में पेश किया गया है वहीं दूसरी ओर कश्मीर की जनता को आतंकी,देशविरोधी,राष्ट्रविरोधी करार दे दिया गया है। जो लोग प्रतिवाद कर रहे हैं उनको टीवी तुरंत आतंकी-समर्थक घोषित कर रहा है,टीवी वाले जानना नहीं चाहते कि आखिर कश्मीर में जनता किस मसले पर प्रतिवाद कर रही है।वे जनता के पास नहीं जा रहे,वे कश्मीर के मुहल्लों-गांवों और शहरों में नहीं जा रहे,वे सीधे फोटो लगा रहे हैं और स्टूडियो में बैठे बैठे जनता को आतंकियों का हमदर्द घोषित कर रहे हैं। सबसे त्रासद पहलू यह है कि कोई भी व्यक्ति यदि टीवी टॉक शो में कश्मीरी जनता की समस्यों की ओर ध्यान खींचने की कोशिश करे या फिर कश्मीर में विभिन्न तबके के द्वारा उठायी जा रही राजनीतिक मांगों में से किसी मांग का ज्योंही जिक्र करता है तुरंत उस पर हमले शुरू हो जाते हैं,यह वस्तुतः टीवी फासिज्म है।

हाल ही में मंगलवार को श्रीनगर प्रशासन ने पांच टीवी न्यूज चैनलों का प्रसारण कश्मीर में बंद करने का आदेश दिया है,प्रशासन का मानना है इन चैनलों के प्रसारण से कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही है।ये चैनल हैं- केबीसी, गुलिस्तां टीवी, मुंसिफ टीवी, जेके चैनल,इंसाफ टीवी। केबल ऑपरेटरों को इन चैनलों का प्रसारण रोकने के लिए कहा गया है।



गुरुवार, 1 सितंबर 2016

मिथ और अफवाहों में कश्मीर नहीं दिखेगा

           
             कश्मीर को लेकर सारी बहस अफवाहों से चल रही है, कश्मीरियों और कश्मीरी समाज को हम कम जानते हैं,कश्मीर की राजनीति को कम जानते हैं। हमारी कश्मीर संबंधी अज्ञानता का इन दिनों सबसे ज्यादा दुरूपयोग हो रहा है। कम जानकारी का सबसे ज्यादा दुरूपयोग मीडिया और सोशलमीडिया कर रहा है।खासकर साम्प्रदायिक-आतंकी ताकतें आम जनता की कम जानकारी का खुलकर दुरूपयोग कर रही हैं।कश्मीरी लोग कैसे होते हैं ॽउनका मिजाज कैसा होता है ॽकश्मीर में आमतौर पर स्त्री-पुरूष किस तरह से बातें करते हैं,किस तरह जीवन-यापन करते हैं,उनकी संस्कृति क्या है ॽइत्यादि सवालों पर हमने कभी गौर ही नहीं किया।वे अपनी सामान्य भाषा में,राजनीतिक विमर्श में जिन पदबंधों का इस्तेमाल करते हैं,उन पदबंधों को हम सही अर्थ और स्प्रिट में ग्रहण ही नहीं करते।यह बात वहां लोगों से मिलते हुए बार-बार महसूस हुई।

मैं जब श्रीनगर के पुराने शहर यानी डाउनटाउन इलाके के अंदर के मुहल्लों में दाखिल हुआ तो नजारा एकदम वैसा था जैसा मथुरा के पुराने बाजार और मुहल्लों का हुआ करता है।पुराने मकान,पुराने दरवाजे,पुरानी गलियां,पुराने बिना प्रेस किए कपडे पहने हुए लोग,चूंकि गर्मियों में वहां घूम रहे थे तो सामान्यतौर पर लोग-बाग सूती ड्रेस में ही मिले।पुराने शहर के बाजारों में वही मथुरा जैसी अनौपचारिकता, उसी तरह आवाज देकर बोलने ,टिप्पणी करने की आदत,औरतें बाजारों में खरीददारी करते हुए,जो लड़का मेरा गाइड था,वह बेहद सुंदर,मधुरभाषी,स्मार्ट,शिक्षित स्नातक था,दिल से बातें करने वाला,किस्सा-गो,हंसमुख।कश्मीर के जन-जीवन से करीब से वाकिफ।वह लेह-लद्दाख से ही हमारे साथ था। अहर्निश बोलने वाला,तरह-तरह की बातें करने में माहिर,जिंदादिल ! उसके समूचे आचरण और बात करने की शैली ने हमें गहरे प्रभावित किया।वह सुबह से शाम तक हमारी मदद के लिए हर समय तैयार रहता,कभी अपनी निजी गाड़ी के साथ कभी टैक्सी के साथ,सुबह आता और रात को डिनर कराकर वापस लौटता।हमने उसे कोई पैसा नहीं दिया उसके व्यवहार और आचरण ने इस कदर प्रभावित किया कि हम भूल ही गए कि वह गाइड है।उसको एकबार कुछ भी पूछते थे तो वो लगातार विभिन्न तरीकों से हमें समझाता रहता ,बताता रहता। कश्मीर के लोग कैसे हैं और उनका दिल कैसा है यह मैंने गाइड की आंखों से ही सबसे पहले जाना।

एक दिन मैंने उससे कहा गुलमर्ग जाएंगे,बोला कल चलते हैं,सुबह वह गाड़ी लेकर हाजिर हो गया।मैंने पूछा किसकी गाड़ी है यह,बोला मेरी है।मैंने कहा तब मैं नहीं जाऊँगा।बोला क्यों ॽ मैंने कहा तुम गाड़ी का भाड़ा नहीं लेते ,भाड़ा लोगे तो हम इस गाड़ी में जाएंगे ॽकुछ देर बातें करने के बाद वो राजी हो गया, मैंने भाड़ा तय नहीं किया, वह खुद ड्राइव करके हमें गुलमर्ग ले गया,गुलमर्ग ले जाने के पहले वह गुलमर्ग में राइड की टिकट खुद ही बुक कराकर ले आया।दिलचस्प बात थी कि वह भी नहीं जानता था कि वहां राइड में क्या मुसीबत आ सकती है। हम गुलमर्ग में अंत में उस स्थान पर पहुंचे जहां से राइड के लिए उड़न खटोले (गंडोला) में बैठकर ऊँची पर्वतीय चोटी पर जाना था,अंदर गए तो देखा बहुत लंबी लाइन है,उडन खटोले में सवार होने में कम से कम तीन घंटे लग सकते हैं, गाइड हमें उडन खटोले के लिए लाइन में लगाकर कहीं गायब हो गया, मैं लाइन खड़े हुए परेशान हो रहा था,मेरे आगे-पीछे बड़ी संख्या गुजराती मध्यवर्गीय पर्यटक लाइन लगाकर खड़े थे,इनमें औरतों की संख्या बहुत थी,उनमें मुसलिम औरतें भी थीं और गुजराती औरतें भी थीं,मेरे ठीक आगे एक गुजराती औरत खड़ी थी उसके साथ पूरा परिवार था,उसका पति और देवर कहीं बाहर लाइन तोड़कर उडन खटोले में नियमभंग करके चढ़ने की जुगाड़ में व्यस्त था।बीच-बीच में दलाल किस्म के लोग आकर टिकटें बेच रहे थे और लाइन तोड़कर उडन खटोले में चढ़ाने की व्यवस्था करा रहे थे, वहां खुला करप्शन चल रहा था,दलालों को पैसा दो वे तुरंत उड़ने खटोले में चढ़ा देते थे,उन्हीं दलालों में किली दलाल को गुजराती परिवार के पुरूष ने पटाया और सौदा हो गया,मेरे ठीक आगे खड़ी महिला बोली भाई साहब मैं जा रही हूँ,मैंने मुसकराकर इशारे से ही कहा जाओ।मेरे पीछे मुसलिम महिला थी,उसका परिवार था।गुजराती महिला गयी और 10 मिनट बाद झल्लाती हुई लौट आयी,संभवतः दलाल से उनका सौदा नहीं पटा,दलाल पैसे कुछ ज्यादा मांग रहा था।गुजराती महिला ने मेरे आगे लाइन में खड़े होने की अनुमति मांगी मैंने उसे खड़े होने दिया,मेरे पीछे जो मुसलिम महिला खड़ी थी उसने आपत्ति प्रकट की और उससे कहा कि वह लाइन में पीछे जाकर खड़ी हो जाय,गुजराती महिला नहीं मानी और उसने तड़ातड़ गंदी गंदी भाषा में बोलना शुरू कर दिया।मैं परेशान था,आगे-पीछे से दो औरतें खुलकर भाषा में भदेस होती जा रही थीं,मैंने पीछे खड़ी मुसलिम महिला से कहा कि ये महिला मेरे आगे ही खड़ी थीं आप काहे को नाराज हो रही हैं,लेकिन मामला थमकर नहीं दिया। खैर दो महिलाओं की तू-तू मैं -मैं में यह भी एहसास हुआ कि मध्यवर्ग की औरतें किस तरह भदेस भाषा में जमकर यथार्य़वादी शैली का इस्तेमाल करती हैं और भाषा में एक-दूसरे को बेनकाब करती हैं।

इधर मैं अपने गाइड को फोन लगाने की कोशिश कर रहा था ,फोन लग नहीं रहा था।15-20 मिनट के बाद उसका फोन आया कि आप ऊपर चले आएं।मैं ऊपर चला गया,वहां पर गंडोला यान उड़न खटोले में लोग सवार होकर गुलमर्ग की ऊँची पहाडी पर सैर करने जा रहे थे,सैंकड़ों लोगों की लम्बी लाइन लगी थी,मेरे ऊपर पहुँचते ही उसने लाइन तोड़कर मुझे उडन खटोले में सवार करा दिया,हम लोग कुछ देर में ऊपर पहुंच चुके थे, मैंने गाइड से पूछा तुमने यह सब जुगाड़ कैसे किया,बोला 100 रूपये में लाइन तोड़कर ले जा रहा हूँ आपको,मैंने पूछा क्या यहां पर भी घूस लेते हैं ॽ बोला हां,ईमानदीरी से आप लाइन में खड़े रहते और दो-तीन घंटे बाद आपका नम्बर आता।यह मेरा कश्मीर में घूस देने का पहला अनुभव था ।

मैं मानकर चल रहा था सेना के नियंत्रण में कश्मीर में घूस का क्या काम ! लेकिन एक ही झटके में मेरा अनुमान धराशायी हो चुका था।खैर,हम गुलमर्ग पर ऊपर पहुँच गए,वहां कुछ देर बैठे फोटोग्राफी की,फिर वही समस्या थी,कि नीचे कैसे उतरें,कोई समाधान नजर नहीं आ रहा था,ऊपर कोई घूसखोर भी नहीं मिला ,जो पैसा लेकर लाइन तोड़कर हमें चढ़ा दे,लंबी लाइन लगी थी नीचे आने के लिए,मैं चिन्तित था और पहाड़ी पर ऐसे ही टहल रहा था,मैंने गाइड से कहा देखो सामने यह कोई पुलिस का आदमी लगता है जाकर बात करो,कोई रास्ता निकल आए,गाइड गया,उसने कश्मीरी में बातें की,मेरा परिचय दिया और मदद मांगी और कहा कि वह किसी तरह हमें नीचे गंडोले से ले जाय।वह व्यक्ति राजी हो गया।वह व्यक्ति और कोई नहीं ब्लैककेट कमांडो का सीनियर अफसर था। उसने कहा चुपचाप मेरे पीछे चले आओ। हमलोग तेजी से उसके पीछे हो लिए।हमने एक-दूसरे से परिचय किया और तेजी से साथ-साथ चलने लगे, वह अफसर सादा ड्रेस में था,वह कश्मीरी मुसलिम था,मैंने पूछा आप क्या यहां घूमने आए थे ॽ वह बोला नहीं मैं ड्यूटी पर हूँ सुबह से।मैंने पूछा क्या कोई वीआईपी आने वाला था यहां ! बोला हां, गुलाम नबी आजाद साहब के आने का कार्यक्रम था लेकिन अब वे नहीं आ रहे,वे नीचे शहर से ही लंच करके वापस चले गए हैं ,इसलिए मैं वापस जा रहा हूँ। उल्लेखनीय है अनंतनाग विधानसभा उपचुनाव के लिए महबूबा मुफ्ती ने अपना नामांकनपत्र उसी दिन भरा था और गुलाम नबी आजाद विपक्ष की रणनीति ठीक करने लिए वहां आए थे।उनको गुलमर्ग आना था,लेकिन तेज बरसात शुरू होने के कारण वे गुलमर्ग की पहाडियों पर नहीं गए,नीचे शहर से ही घूमकर वापस श्रीनगर चले गए।खैर, ज्योंही हम उड़नखटोले की ओर पहुँचे ,उस अफसर को तो गंडोला के संचालक ने चढ़ने दिया हमें रोक लिया,हमने कहा हम भी इस अफसर के साथ हैं तो उसने हमें चढ़ने दिया।रास्तेभर हम उस अफसर से बातें करते आए, सका शुक्रिया अदा किया,वह भी हमसे बातें करके बेहद खुश था,बोला मेरी थकान और भूख मिट गयी आपलोगों से बातें करके।































बुधवार, 31 अगस्त 2016

घृणा के सौदागर


         मैं इसी साल जब कश्मीर में घूम रहा था,लोगों से मिल रहा था,बातें कर रहा था,तो एक बात साफ नजर आ रही थी कि कश्मीर तेजी से बदल रहा है.इस बदले हुए कश्मीर से कश्मीरी पृथकतावादी और हिन्दू फंडामेंटलिस्ट बेहद परेशान थे।मैं पुराने श्रीनगर इलाके में कई बार गया,वहां विभिन्न किस्म के लोगों से मिला,उनसे लंबी बातचीत की,खासकर युवाओं का बदलता हुआ रूप करीब से देखने के लिए कश्मीर विश्वविद्यालय में भी गया वहां युवाओं की आपसी बातचीत के मसले देखे,उनके चेहरे पर एक खास किस्म का चैन देखा,युवाओं में पैदा हुए लिबरल भावों और उनकी आपसी संगतों में उठने वाले सवालों और विचार-विमर्श के विषयों को सुनकर लगा कि कश्मीर के युवाओं में पृथकतावाद-आतंकवाद या धार्मिक फंडामेंटलिज्म को लेकर एकसिरे से घृणा का भाव है।
         
कश्मीर विश्वविद्यालय में एक जगह दीवार पर पृथकतावादी नारा भी लिखा देखा,जिसमें लिखा था ´भारत कश्मीर छोड़ो´,मेरी आंखों के सामने एक घटना घटी जिसने मुझे यह समझने में मदद की कि आखिर युवाओं में क्या चल रहा है। हुआ यह कि मैं जब साढ़े तीन बजे करीब हजरतबल मस्जिद से घूमते हुए कश्मीर विश्वविद्यालय पहुंचा तो देखा दो लड़कियां एक बैनर लिए कैंपस में प्रचार कर रही हैं, वे विभिन्न छात्र-छात्राओं के बीच में जाकर बता रही थीं कि एक जगह बलात्कार की घटना घटी है और उसमें कौन लोग शामिल हैं,मैं उनका बैनर नहीं पढ़ पाया क्योंकि वह कश्मीरी में लिखा था।लेकिन बैनर लेकर प्रचार कर रही दोनों लड़कियों की बात को कैंपस में विभिन्न स्थानों पर बैठे नौजवान सुनने को राजी नहीं थे,वे बिना सुने ही मुँह फेर ले रहे थे।इस घटना से मुझे आश्चर्य लगा,मैंने एक छात्र से पूछा कि बैनर लेकर चल रही लड़कियां किस संगठन की हैं ,तो वो बोला ,मैं सही -सही नहीं कह सकता लेकिन ये पृथकतावादी संगठनों के लोग हैं और आए दिन इसी तरह बैनर ले कैम्पस में घूमते रहते हैं,कोई इन संगठनों की बातें नहीं सुनता,क्योंकि कश्मीरी छात्र अमन-चैन चाहते हैं।

दिलचस्प बात यह थी मेरी आँखों के सामने तकरीबन 30मिनट तक वे बैनर लेकर घूम-घूमकर छात्रों को बताने की कोशिश करते रहे लेकिन हर बार उनको छात्रों के छोटे छोटे समूहों में निराशा हाथ लग रही थी कोई उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था,अंत में बैनर लिए युवाओं ने निराशा भरे शब्दों में अंग्रेजी में धिक्कारभरी भाषा में अपने गुस्से का इजहार किया,इस पर कुछ लड़कियों ने मुँह बनाकर उनको चिढ़ाने की कोशिश की,थोड़ी दूर चला तो देखा लड़के-लड़कियां बड़े आनंद से एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए टहल रहे हैं,बाहर निकलकर मुख्य सड़क से जब कार से घूमते हुए मैं पुराने शहर की ओर आया तो देखा कई युवा युगल मोटर साइकिल पर एक-दूसरे से चिपके हुए दौड़े चले जा रहे हैं,यह भी देखा कि बड़ी संख्या में मुसलिम लड़कियां और लड़के आधुनिक सामान्य सुंदर ड्रेस पहने हुए घूम रहे हैं,बाजार में खरीददारी कर रहे हैं,मुख्य बाजार में अधिकतर मुसलिम औरतें बिना बुर्के के जमकर खरीददारी कर रही हैं।रात को 11बजे एक रेस्तरां में डिनर करने गया तो वहां पर पाया कि कश्मीरी प्रेमी युगल और युवाजन आराम से प्रेमभरी बातें कर रहे हैं,कहीं पर कोई आतंक का माहौल नहीं,किसी की भाषा में घृणा के शब्द नहीं,मैंने अपने टैक्सी ड्राइवर और होटल के मालिक से पूछा इस समय कश्मीर में लड़कियां किस तरह शादी कर रही हैं ॽ सभी ने एकस्वर में कहा इस समय कश्मीरी लड़कियां गैर-परंपरागत ढ़ंग से,प्रेम विवाह कर रही हैं,वे स्वयं तय कर रही हैं,यह 1990-91 के बाद पैदा हुआ एकदम नया फिनोमिना है।

कश्मीरी युवाओं में उदातावादी रूझानों को देखकर मन को भय भी लग रहा था कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि कश्मीर में फिर से अशांति लौट आए ॽक्योंकि फंडामेंटलिस्ट ताकतें नहीं चाहतीं कि कश्मीर में उदारतावादी भावनाएं लौटें,मुझे यह भी लग रहा था कि जल्द ही टकराव हो सकता है।मैंने इस तनाव को बार बार वहां महसूस किया ,मुझे लगा वहां आम जनता में उदारतावादी राजनीति और जीवन मूल्यों के प्रति जबर्दस्त आग्रह है और आतंकी-पृथकतावादी और हिन्दू फंडामेंटलिस्ट नहीं चाहते कि कश्मीर में उदारतावाद की बयार बहे,वे हर हालत में आम जनता के मन में से उदारतावाद के मनोभावों को मिटाने की कोशिश करेंगे।मैंने कश्मीर से लौटकर वहां के उदार माहौल पर फेसबुक में लिखा भी था,दुर्भाग्यजनक है कि मेरे लिखे जाने के कुछ दिन बाद ही बुरहान वानी की हत्या होती है और अचानक कश्मीर में उदारतावादी माहौल को एक ही झटके में आतंकी-पृथकतावादी माहौल में तब्दील कर दिया गया।

जिसने भी बुरहान वानी की हत्या का फैसला लिया ,वह एकदम बहुत ही सुलझा दिमाग है उसके मन में बुरहान वानी नहीं बल्कि कश्मीर का यह उदार माहौल था जिसकी उसने हत्या की है।ये वे लाखों कश्मीरी युवा हैं जिनके उदार मूल्यों में जीने की आकांक्षाओं को एक ही झटके में रौंद दिया गया।मैं इस तरह की आशंकाओं को लेकर लगातार सोच रहा था कि मोदीजी-महबूबा के सरकार में रहते कश्मीर में शांति का बने रहना संभव नहीं है,मैं जब सोच रहा था तो उस समय सतह पर शांति थी,लेकिन मैं आने वाले संकट को महसूस कर रहा था,अफसोस की बात है कि मोदी-महबूबा की मिलीभगत ने कश्मीर की जनता के अमन-चैन में खलल डाला,शांति से जी रहे कश्मीर को फिर से अशांत कर दिया,नए सिरे से आतंकियों और सेना की गिरफ्त में कश्मीर के युवाओं को कैद कर दिया।









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