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शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

रामकृष्ण परमहंस और फेसबुक



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रामकृष्ण परमहंस ने प्रेम की जो परिभाषा दी है वो शानदार है। लिखा है- "पहला जो 'साधारण' प्रेम है उसमें प्रेमी केवल अपना ही सुख देखता है। वह इस बात की चिन्ता नहीं करता कि दूसरे व्यक्ति को भी उससे सुख है अथवा नहीं। इस प्रकार का प्रेम चन्द्रावली का श्रीकृष्ण के प्रति था।

दूसरा प्रेम जो 'सामंजस्य' रूप होता है उसमें दोनों एक-दूसरे के सुख के इच्छुक होते हैं।यह एक ऊँचे दर्जे का प्रेम है।

परन्तु तीसरा प्रेम सबसे उच्च है। इस समर्थ प्रेम में प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहता है तुम सुखी रहो ,मुझे चाहे कुछ भी हो। राधा में यह प्रेम विद्यमान था। श्रीकृष्ण के सुख में उन्हें सुख था।गोपियों ने भी यह उच्चावस्था प्राप्त की थी।

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भीष्मदेव देह छोड़ना चाहते हैं,शरों की शय्या पर लेटे हुए हैं ,सब पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ खड़े हैं.सब ने देखा, भीष्म की आंखों में आंसू बह रहे हैं।अर्जुन

श्रीकृष्ण से बोले , भाई यह तो बड़े आश्चर्य की बात है कि पितामह -जो स्वयं भीष्मदेव ही हैं,सत्यवादी है,जितेन्द्रिय,ज्ञानी,आठों वसुओं में से एक हैं- वेभी देह छोड़ते समय माया में पड़े रो रहे हैं। यही बात भीष्मदेव से जब श्रीकृष्ण ने कही तो भीष्मदेव ने कहा ,कृष्ण ,तुम तो खूब जानते हो कि मैं इसलिए नहीं रो रहा हूँ। जब सोचता हूँ कि जब स्वयं भगवान पाण्डवों के सारथि हैं ,फिर भी उनके दुःख और विपत्तियों का अंत नहीं होता तब यही सोचकर आंसू बहाता हूँ कि परमात्मा के कार्यों का कुछ भी भेद न पाया।

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रामकृष्ण परमहंस ने लिखा है," जिसका मन जिस पर रमता है वह उसी को चाहता है;कहां रहता है,उसकी कितनी कोठियां हैं, कितने बगीचे हैं,कितना धन है ,परिवार में कौन-कौन हैं,नौकर कितने हैं -इसकी खबर कौन लेता है ?"

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फेसबुकप्रेम तो ईश्वरप्रेम की तरह है।इसके रास्ते में जितने बढोगे उतने ही कर्म छूटे चले जाएंगे।

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जैसे ब्रह्मभोज में पहले खूब शोरगुल मचता है ।जब सभी के आगे पत्तल पड़ जाती है तब गुलगपाड़ा कुछ घट जाता है।केवल 'पूड़ी लाओ,पूड़ी लाओ' की आवाज होती रहती है। फिर जब लोग पूड़ी-तरकारी खाना शुरू करते हैं तब बारह आना शब्द घट जाता है। जब दही आया तब सप्-सप् -शब्द मानो होता ही नहीं। और भोजन के बाद निद्रा।तब सब चुप !

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रामकृष्ण परमहंस ने अपने भक्त शिवनाथ को देखकर कहा ,"क्या शिवनाथ तुम आए हो ,देखो तुम लोग भक्त हो,तुम लोगों को देखकर बड़ा आनंद होता है। गंजेड़ी का स्वभाव होता है कि दूसरे गंजेड़ी को देखते ही वह खुश हो जाता है,कभी तो उसे गले ही लगा लेता है।"

फेसबुकिए की दशा भी क्या गंजेडी जैसी है ?

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रामकृष्ण परमहंस ने जातिप्रथा को समाप्त करने के लिए एक सुंदर सुझाव दिया है, उन्होंने कहा- "एक उपाय से जातिभेद उठ सकता है।वह उपाय है -भक्ति।भक्तों के जाति नहीं है।"

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रामकृष्ण परमहंस ने एक जगह लिखा है ''कलकत्ते के लोग हुल्लड़बाज हैं। '' यह बात सौ फीसद आज भी सत्य है।

शुक्रवार, 14 मई 2010

प्रेम पाने का नहीं देने का नाम है

       प्रेम पर इन दिनों अनेक कोनों से हमले हो रहे हैं। प्रेम आज विवाद और हिंसा का विषय बना हुआ है। अतःप्रेम के सवाल पर गंभीरता के साथ विचार करना समीचीन होगा। सवाल यह है प्रेमीयुगल प्रेम के अलावा क्या करते हैं ?  प्रेम का जितना महत्व है उससे ज्यादा प्रेमेतर कार्य-व्यापार का महत्व है।
   प्रेम में निवेश वही कर सकता है जो सामाजिक उत्पादन भी करता हो, प्रेम सामाजिक होता है, व्यक्तिगत नहीं। प्रेम के सामाजिक भाव में निवेश के लिए सामाजिक उत्पादन अथवा सामाजिक क्षमता बढ़ाने की जरूरत होती है।
       प्रेम में जिसका सामाजिक उत्पादन ज्यादा होगा उसका ही वर्चस्व होगा। प्रेम करने वालों को सामाजिक तौर पर सक्षम,सक्रिय,उत्पादक होना चाहिए। सक्षम का प्रेम सामाजिक तौर पर उत्पादक होता है। ऐसा प्रेम परंपरागत दायरों को तोड़कर आगे चला जाता है।
      पुरानी नायिकाएं प्रेम करती थीं, और उसके अलावा उनकी कोई भूमिका नहीं होती थी। प्रेम तब ही पुख्ता बनता है, अतिक्रमण करता है जब उसमें सामाजिक निवेश बढ़ाते हैं। व्यक्ति को सामाजिक उत्पादक बनाते हैं। प्रेम में सामाजिक निवेश बढ़ाने का अर्थ है प्रेम करने वाले की सामाजिक भूमिकाओं का विस्तार और विकास।
    प्रेम पैदा करता है, पैदा करने के लिए निवेश जरूरी है, आप निवेश तब ही कर पाएंगे जब पैदा करेंगे। प्रेम में उत्पादन तब ही होता है जब व्यक्ति सामाजिक तौर पर उत्पादन करे। सामाजिक उत्पादन के अभाव में प्रेम बचता नहीं है, प्रेम सूख जाता है। संवेदना और भावों के स्तर पर प्रेम में निवेश तब ही गाढ़ा बनता है जब  आप सामाजिक उत्पादन की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से उत्पादक की भूमिका अदा करें ।
         प्रेम के जिस रूप से हम परिचित हैं उसमें समर्पण को हमने महान बनाया है। यह प्रेम की पुंसवादी धारणा है। प्रेम को समर्पण नहीं शिरकत की जरूरत होती है। प्रेम पाने का नहीं देने का नाम है। समर्पण और लेने के भाव पर टिका प्रेम इकतरफा होता है। इसमें शोषण का भाव है। यह  प्रेम की मालिक और गुलाम वाली अवस्था है। इसमें शोषक-शोषित का संबंध निहित है।

      प्रेम का मतलब कैरियर  बना देना, रोजगार दिला देना,व्यापार करा देना नहीं है। बल्कि ये तो ध्यान हटाने वाली रणनीतियां हैं,प्रेम से पलायन करने वाली चालबाजियां हैं। प्रेम गहना,कैरियर ,आत्मनिर्भरता आदि नहीं है।
     प्रेम सहयोग भी नहीं है। प्रेम सामाजिक संबंध है, उसे सामाजिक तौर पर कहा जाना चाहिए, जिया जाना चाहिए। प्रेम संपर्क है, संवाद है और संवेदनात्मक शिरकत है। प्रेम में शेयरिंग केन्द्रीय तत्व है। इसी अर्थ में प्रेम साझा होता है,एकाकी नहीं होता। सामाजिक होता है ,व्यक्तिगत नहीं होता।
     प्रेम का संबंध दो प्राणियों से नहीं है बल्कि इसका संबंध इन दो के सामाजिक अस्तित्व से है। प्रेम को देह सुख के रूप में सिर्फ देखने में असुविधा हो सकती है। प्रेम का मार्ग देह से गुजरता जरूर है किंतु प्रेम को मन की अथाह गहराईयों में जाकर ही शांति मिलती है, प्रेमी युगल इस गहराई में कितना जाना चाहते हैं उस पर प्रेम का समूचा कार्य -व्यापार टिका है। प्रेम का तन और मन से गहरा संबंध है, इसके बावजूद भी प्रेम का गहरा संबंध तब ही बनता है जब आप इसे व्यक्त करें, इसका प्रदर्शन करें। प्रेम बगैर प्रदर्शन के स्वीकृति नहीं पाता। प्रेम में स्टैंण्ड लेना जरूरी है।

शनिवार, 1 मई 2010

फिल्मी गीतों में प्रेम और बांसुरी




    फिल्मी गीतों और फिल्म में प्रेम की संरचना का आधार है राधा-मीरा और कृष्ण की त्रयी। प्रेम का रूप राधा-कृष्ण के मिथ का रूपक की तरह उपयोग मिलता है। जब कृष्ण की बांसुरी बजती थी तब राधा और गोपियों को प्रेम की अनुभूति होती थी। बांसुरी के माध्यम से वे कृष्ण की मौजूदगी महसूस करती थीं। यह कृष्ण और बांसुरी के संवेदनात्मक भटकावों को दर्शाता था। सतह पर यह निर्दोष प्रेम था। यह उनके बीच कामुक एवं अविस्मरणीय रूपांतरण को दर्शाता था। बांसुरी के बगैर कृष्ण और राधा के प्रेम की परिकल्पना असंभव थी। बांसुरी उत्प्रेरक थी।
     बांसुरी हमारे ग्राम्य जीवन के रोमांस का प्रतीक है। यह व्यक्तिगत उपकरण है। यह राधा-कृष्ण के मिथ का महत्वपूर्ण प्रतीक चिद्द भी है। राधा-कृष्ण का प्रेम स्त्री-पुरुष का प्रेम है जबकि मीरा और कृष्ण के प्रेम में भक्ति का तत्व प्रमुख है। 
    मीरा ने कृष्ण को त्याग के माध्यम से अर्जित किया है। यह अकामुक, आध्यात्मिक संबंध है। मीरा के यहां शारीरिक एवं संवेदनात्मक संतुष्टि सैकेंडरी है। प्रेम के इन दो मिथकीय रूपों ने ्रूहदी सिनेमा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मीरा का प्रेम दासी का प्रेम है। राधा का प्रेम संवेदनात्मक है किंतु अतिरंजित नहीं है। प्रेम के ये दो रूप दो तरह की औरत के रूप हैं। 
    हिंदी फिल्मों में औरत को मां, प्रेमिका और पत्नी इन तीन रूपों में रूपायित किया गया है। इन तीन संबंधों में औरत को आदर्शीकृत किया गया है। औरत की त्यागमयी मूर्ति का आदर्श नमूना नरगिस (मदर इंडिया) है। यह ऐसी औरत का चरित्र है जो अपने बेटे के लिए जान तक देने को तैयार है (अच्छी औरत आमतौर पर हीरो की मां होती है)। बेटे के अलावा उसके पास कोई काम नहीं है। वह उसकी शादी की चिंता में मगन है। शादी के बाद वह शांति से मरना चाहती है। 
   दूसरी तरफ हीरो है। वह जिस लड़की के पीछे पड़ा है उसे सेक्स के माल से अधिक कुछ नहीं समझता। प्रेम की अस्पष्ट धारणा के बावजूद हिंदी सिनेमा 'शुद्ध प्रेम' के थोड़े-बहुत प्रयत्न करता रहता है।
 मसलन, बुरे आदमी और बुरी औरत का कभी-कभी अच्छे व्यक्ति के रूप में रूपांतरण दिखाया जाता है। यह तब होता है जब उनमें सच्चा प्यार हो। इस तरह की अस्वाभाविक प्रस्तुति प्रेम की शक्ति को दर्शाती है। यानी प्रेम के कारण बुराइयों से मुक्ति संभव। यह अवस्था प्रेमी की या मां के प्यार की भी हो सकती है।
इस तरह की प्रेम संरचनाओं में राधा-कृष्ण और मीरा-कृष्ण का मिथकीय तत्व प्रत्यक्षत: सक्रिय नजर आता है।
     मसलन, 'स्ट्रीट सिंगर' में 'शुद्ध प्रेम' की धारणा का प्रतिपादन है। समूची कहानी में हीरो प्रत्यक्षत: कोई भी ऐसा हाव-भाव पेश नहीं करता जो प्रेम को व्यक्त करे। इस फिल्म ने प्रेम और संगीत के अंतस्संबंध को स्थापित किया था वह आज भी बरकरार है। मसलन, कोई हीरो हवाई जहाज में गाना गा रहा है जबकि हीरोइन अपने कमरे की खिड़की के सहारे खड़ी गाने की पंक्तियां गुनगुना रही है। इस तरह की अर्थहीनता भारतीय मानस सहज ही हजम कर जाता है क्योंकि संगीत एवं प्रेम के बीच में सक्रिय अर्थहीनता की हमारे साहित्य में सुदीर्घ परंपरा रही है और इस परंपरा के प्रति आस्था भी रही है। यही वजह है कि प्रेम की संरचना पर बनी फिल्में ज्यादा लोकप्रिय और प्रेमगीत ज्यादा हिट हुए। 
     भारतीय सिनेमा ने प्रेम के अनेक कोड बनाए। इनमें सबसे प्रभावी कोड है दो प्रेमियों के प्रेम के बीच में संगीत का संप्रेषण। संगीत के माध्यम से प्रेम का कोड राधा-कृष्ण एवं बांसुरी की रूढ़ि से आया है। हकीकत में राधा-कृष्ण की मिथकीय संरचना पर बनी फिल्मों में वास्तविक जगत से प्रेम के नाम पर पलायन है। यह आंतरिक प्रेम है। यह शारीरिक प्रेम का अतिक्रमण कर जाता है। यह पूर्व-औद्योगिक समाज का आदर्श प्रेम है।
     सन् 1950 में बनी 'जोगन' फिल्म में मीरा की तरह का भक्ति एवं त्याग है। यहां तक कि मीरा के भजन भी हैं। फिल्म की कमजोरी यह है कि राधा और मीरा में कौन सी इमेज औरत के लिए सही होगी इसे लेकर निर्देशक केदार शर्मा अनिर्णय की स्थिति में हैं।सन् 1977 में बनी 'स्वामी' (बासु चटर्जी) और 'दुल्हन वही जो पिया मन भाए' (ताराचंद बड़जात्या) में पूर्व-औद्योगिक समाज का प्रेम व्यक्त हुआ है।
     हिंदी सिनेमा की यह विशेषता है कि इसमें जहां एक ओर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के गर्भ से उपजे मूल्यों की अभिव्यक्ति दिखाई देती है वहीं दूसरी ओर 'अतीत प्रेम' का महिमामंडन है। 'स्वामी' फिल्म में वस्तुत: देवदास शैली का प्रेम है।
      इसी तरह प्रेम की संरचना के साथ पुनर्जन्म के मूल्य का रूपायन भी मिलता है। इस तरह के रूपायन की आदर्श फिल्म है 'महल'। हिंदी फिल्मों में प्रेम की धारणा में अगर कोई संशोधन आया है तो वह राजकपूर एवं गुरुदत्त की फिल्मों के द्वारा आया। राजकपूर की पचास के दशक की फिल्मों में प्रेम की कामुक अभिव्यक्तियों को सामाजिक मर्यादाएं रोकती हैं। हीरो जानता नहीं है कि हीरोइन उस पर जान देती है।
    हीरोइन का इकतरफा प्यार जब चरम पर पहुंच जाता है और अपरिहार्य हो उठता है तब हीरो को पता चलता है। हीरो सरल एवं सहज है।
   राजकपूर की फिल्मों में प्रेमसंबंध धन- दौलत के प्रति तिरस्कार भाव लेकर आता है। यहां सच्चे प्यार पर बल है और हीरो अपने लक्ष्य के प्रति वफादार है। यहां प्रेम के कामुक पहलू का ज्ञान है पर कभी-कभी उसका अस्वीकार भी है। राजकपूर-नरगिस की प्रेमी-युगल जोड़ी आदर्श मानी गई है। इन दोनों में रोमांस का प्रारंभ आंखों से आंखें मिलने से होता है। वे दोनों इसी के माध्यम से प्यार की अग्नि का अहसास करते हैं। एक-दूसरे के करीब आते हैं। मिलन की बेला आते ही निश्चित 'कोड' का इस्तेमाल कर लिया जाता है।
   मसलन, चुंबन के दृश्य के लिए फूलों का एक-दूसरे से मिलना या दो पक्षियों का चुंबन दिखाया जाता है। राजकपूर ने इस तरह के अनेक 'कोड' लागू किए हैं जो हमारी साहित्यिक परंपरा में हैं। इस तरह के 'कोड' प्रेम की शारीरिक अनिवार्यता को उदघाटित करते हैं, साथ ही, उसे अभिव्यक्त करने की अक्षमता को दर्शाते हैं। 'आग', 'आवारा', 'जागते रहो' आदि फिल्मों में देवदास फिल्म की परंपरा जारी रहती है। किंतु प्रच्छन्नत: उस परंपरा पर प्रश्नचिह्न भी लगाए गए हैं।
        राजकपूर की फिल्मों में परंपरागत मूल्यों एवं उदीयमान औद्योगिक समाज के मूल्यों की टकराहट भी मिलती है। मसलन, 'आग' और 'आवारा' में बेटे ने पिता के खिलाफ विद्रोह किया। बेटा समाजवादी एवं इगेलिटेरियन दार्शनिक भावों को व्यक्त करता है। गुरुदत्त की फिल्मों में सामाजिक विषमता के प्रश्नों को उठाया गया है। इनकी फिल्मों में औद्योगिक समाज के भौतिकवादी दृष्टिकोण के प्रति प्रतिक्रियाएं मिलती हैं।
   वे 'देवदास' के विजन के दायरे में ही सीमित रहते हैं। नए मूल्यों का विरोध करते हैं। प्रेम के आदर्श रूप के तौर पर 'प्यासा' को लिया जा सकता है। फिल्म का हीरो सच्चे प्यार एवं त्याग के लिए प्रतिबध्द है जबकि मीना ऐसे विश्व का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें औद्योगिक समाज के भौतिक मूल्यों का दृष्टिकोण अभिव्यक्त होता है। सन 1956 में गुरुदत्ता की फिल्म 'सीआईडी' में देवानंद की जो इमेज पेश की गई वह राजकपूर, दिलीपकुमार की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती है।
   देवानंद ऐसा हीरो है जो इगेलिटेरियन और कामुक संबंधों को स्वीकार करता है। वह कामुक उत्तोजनाओं को पैदा करता है। स्वयं भी कामुक प्रतीक के रूप में उभरकर आता है। यह कामुक हीरो आज तक फिल्मों के केंद्र में है। कामुक उद्दीपन के लिए ऐसी नायिका की जरूरत महसूस की गई जो पुरुष-प्रधान ईगो को उभारे, कामुक उत्तेजना पैदा करे। अब नायिका कामुक प्रतीक बन गई। अब उसे दो तरह की भूमिकाएं अदा करनी थीं, एक ओर आदर्श हीरोइन की भूमिका थी तो दूसरी ओर काम देवी की भूमिका अदा करनी थी। मसलन, 'सीआईडी' में वहीदा रहमान ने पहले 'वेंप' और बाद में अच्छी औरत की भूमिका अदा की। वह दोनों भूमिकाएं बखूबी निभाती है। 
     इसी तरह 'गाइड' में वहीदा रहमान ने अच्छी औरत की भूमिका अदा की जो कामोत्तेजना पैदा करनेवाले नृत्य भी पेश करती है। यह एक नए किस्म की औरत है। उसमें आधुनिकतावाद एवं परंपरा का मिश्रण है। शिक्षा एवं मुक्त प्रेम की हिमायती, प्रेम के साथ शारीरिक लगाव, मानसिक तौर पर कामुक आकांक्षाओं, पहनावे, फैशन आदि में पश्चिमी। यह औरत ऐसे समय में परंपरा की ओर मुड़ती थी जब कहानी का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु आता था। तब वह अपनी आधुनिकतावादी खूबियों को छिपा लेती है। उस समय वह सदियों पुराने पिता, भाई, पति-भगवान वाले एटीटयूड को व्यक्त करती है। इस तरह का स्टीरियोटाइप दर्शकों में सहज स्वीकार्य रहा है। क्योंकि वह बुनियादी समस्या कामुक असमर्थता का समाधान देता था।

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

प्रेम की सामाजिक अलगाव से जंग


       
      
 प्रेम से लड़ने के लिए अलगाव से लड़ना बेहद जरूरी है। हमें इस प्रेम से उबरने का प्रयास करना चाहिए। एरिक फ्रॉम ने लिखा है इस लक्ष्य को प्राप्त करने में पूर्ण असफलता को पागलपन कहा जाता है क्योंकि इसमें पूर्ण अलगाव के कारण भय बना रहता है। इससे बचने का एक ही रास्ता है विश्व के साथ अलगाव की समाप्ति। विश्व के साथ लगाव के कारण भय से मुक्त हो पाते हैं। वह अलगाव खत्म हो जाता है।

सच यह है कि हम अपने घर में कैद होकर भी खुश नहीं होते, बल्कि खुशी का नाटक करते रहते हैं। परफेक्ट ड्रीम लाइफ का दावा करते रहते हैं। हम असल में डिजनी के उन कृत्रिम चरित्रों की तरह होकर रह गए हैं जो हंसते रहते हैं और रंगीन हैं, बाहरी जीवन में वे असल रूप से भी विराट नजर आते हैं। किंतु अंदर ही अंदर वे घुटते रहते हैं, रोते रहते हैं, और अपनी जिंदगी से मुक्त होने की कामना करते हैं।

असली प्रेम वह है जो घर की कैद के बाहर ले जाय, यह बाहर जाना अंतहीन स्पेस में जाना है। शहरी बंद और गंदी तंग बस्तियों की मुक्ति के प्रयासों में शामिल होना है, गरीबी से मुक्ति के प्रयासों में शामिल होना है। इराक और सूडान में चल रहे अर्थहीन खूनखराबे के परे जाना है।
      
प्रेम का असली अर्थ है हम अपनी फैंटेसी की दुनिया के बाहर आएं,यथार्थ का सामना करें। यथार्थ जिंदगी के कष्टों को जानें,उसका हिस्सा बनें। जिससे इस दुनिया को प्रत्येक के लिए बेहतर बना सकें।  हम लोगों में इस तरह के प्रेम का अभाव है, इस अभाव का प्रधान कारण है हमारा स्वयं से अलगाव। अन्य से अलगाव, भगवान से अलगाव। इसके गर्भ से मानव सभ्यता की शर्मिदगी, कुंठा और दर्द व्यक्त हो रहा है। आज की सबसे बड़ी मानवीय जरूरत है इस अलगाव को कम करना,अपने अकेलेपन की कैद से मुक्त होना। दुख की बात यह है कि अपने जीवन के अलगाव को कम करने के लिए हम कहीं ज्यादा बड़े अलगाव को चुन लेते हैं। यह तब होता है जब हम अपनी पहचान का परिवार या समुदाय या गिरोह या पड़ोसी या चर्च या देश के साथ व्यापार करने लगते हैं। हम उसे ही प्यार करने लगते हैं।
आज समानता का अर्थ समता है न कि निजता है। पुरानी रहस्यवादी परंपरा में ''एकत्व'' पर जोर है। इसमें सब एक में समाहित हैं। इस एकत्व को हम समता के साथ भ्रमित करते है। एकत्व का अर्थ समत्व नहीं है।

हमारा मीडिया एकत्व का संदेश देता है समत्व का संदेश नहीं देता। सामाजिक विकास के लिए एकत्व की नहीं समत्व की जरूरत है। समत्व के लिए न्याय की जरूरत भी होगी। क्योंकि वे समान नहीं है। एकत्व में न्यायबोध की जरूरत नहीं होती। एकत्व अन्य को एकाकार कर लेता है।

जबकि समत्व का लक्ष्य है भिन्नता और असमानता को खत्म करना। यह कार्य न्याय के आधार पर ही संभव है। सच्चा प्रेम ,परिपक्व प्रेम एकता (यूनिटी) की मांग करता है , कनफर्मिटी या वैधता की मांग नहीं करता। इसे खुलेपन की जरूरत है समत्व की नहीं, खुलेपन की जरूरत है ,अकेलेपन की नहीं, सहजीवन की जरूरत है अलगाव की नहीं, एक्टिविटी अथवा गतिविधि की जरूरत है पेसिविटी या निष्क्रियता की नहीं।

         प्रेम मूलत: गतिविधि है। प्रेम का पेसिव प्रभाव नहीं होता। बल्कि यह तो रास्ते में खड़ा रहता है,यह समर्पण नहीं है। सामान्यतौर पर प्रेम के सक्रिय चरित्र वे हैं जो प्रेम में देते हैं। लेते नहीं।
लोग व्यक्तिगत कारणों से रोमैटिंक लव करते हैं। उसके अनुभव के आधार पर विवाह करते हैं।  प्रेम के इस रूप को बढ़ावा देना चाहिए। ऑब्जेक्ट के रूप में इसका महत्व है। इसकी भूमिका महत्वपूर्ण नहीं है।

रोमैंटिक प्रेम का चारित्रिक वैशिष्टय भी है , उसका सामयिक संस्कृति के लिए प्रासंगिकता है, मौजूदा संस्कृति खरीद पर टिकी है। समान रूप से पसंदीदा वस्तुओं के विनिमय पर टिकी है। आधुनिक मर्द की खुशी दुकान में रखी चमकती चीजों पर टिकी है। वह उन्हें खरीदना चाहता है, किश्तों में उनका भुगतान करना चाहता है। यही स्थिति लड़की की भी है, मर्द ऐसी लड़की पर आकर्षित होते हैं जो आकर्षक हो। यानी जिसकी सुंदर पैकेजिंग हो। इस पैकेजिंग का संबंध बाजार की उन गुणवत्तापूर्ण चीजों से जुड़ा है जिसे व्यक्तित्व बाजार ने पेश किया है।
        व्यक्ति आकर्षक तब लगता है जब वह सामयिक फैशन का प्रयोग करे। आज के जमाने में मद सेवन करने वाली,सिगरेट पीने वाली लड़की टफ और सेक्सी मानी जाती है। वही आकर्षक भी है। आज फैशन ज्यादा से ज्यादा घरेलूपन और शर्मीलेपन की मांग करता है। 19वीं शताब्दी के अंत में आक्रामक और महत्वाकांक्षी मर्द पैदा हुआ। आज किंतु सामाजिक और सहिष्णु मर्द की मांग की जा रही है। यही आकर्षक पैकेंजिंग का हिस्सा है। एरिक कहता है किसी भी रूप में प्रेम की अनुभूति वैसी ही मानवीय कमोडिटी के विनिमय के जरिए ही पैदा हो पाती है, विनिमय वही करना चाहिए जो शक्ति में हो। उन्हीं वस्तुओं का विनिमय करना करना चाहिए जिनका सामाजिक मूल्य हो। साथ ही जिनकी तुम्हें जरूरत हो।
जब दो व्यक्ति प्रेम करते हैं तो वे बाजार में उपलब्ध बेहतर वस्तु के आधार पर सौदा करते हैं। संस्कृति भी बाजार की अवस्था पर निर्भर करती है। मानवीय प्रेम असल में वस्तु विनिमय और श्रम बाजार के पैटर्न पर टिका है। एक अन्य भ्रम यह है कि प्रेम में पड़क़र कुछ सीखा नहीं जाता । जो लोग हमेशा प्रेम की अवस्था में रहते हैं, प्रेम के स्थायी भाव में रहते हैं ,ऐसे लोगों के बारे में यही कह सकते हैं कि ऐसे दो लोग जब मिलते हैं तो प्रेम के बीच की दीवार अचानक गिर जाती है और वे एक-दूसरे के करीब पहुँच जाते हैं। एकाकार हो जाते हैं। इस तरह का एकत्व बेहद उत्तोजक होता है। खासकर उन लोगों के लिए ज्यादा आकर्षक होता है जो अकेलेपन के शिकार होते हैं। बिना प्रेम के रह रहे होते हैं। इस तरह के लोगों में अचानक पैदा हुआ प्रेम जादू की तरह होता है। इसमें अचानक शारीरिक आकर्षण एवं उपभोग का भाव भी होता है। इस तरह का प्रेम टिकाऊ नहीं होता।  प्रेम का वही रूप टिकाऊ होता है जिसमें अन्य के प्रति आकर्षण है, देने का भाव है। पाने के भाव से प्रेम मिलता नहीं है बल्कि प्रेम का लोप हो जाता है।








आओ प्रेम का मुहावरा बदलें



      
प्रेम आज भी सबसे बड़ा जनप्रिय विषय है, इसकी रेटिंग आज भी अन्य विषयों से ज्यादा है। तमाम तबाही के बावजूद प्रेम महान है तो कोई न कोई कारण जरूर रहा होगा। प्रेम खास लोगों के साथ खास संबंध का नाम नहीं है। यह एटीट्यूट है। व्यक्ति के चरित्र की प्रकृति निर्धारित करती है कि उसका विश्व के साथ कैसा संबंध होगा। यदि कोई व्यक्ति किसी एक से प्रेम करता है और दूसरे व्यक्ति से प्रेम नहीं कर पाता या उसकी उपेक्षा करता है तो इसे प्रतीकात्मक लगाव कहेंगे। अथवा अहंकार का विस्तार कहेंगे।

बुनियादी किस्म का प्रेम भातृप्रेम के रूप में व्यक्त होता है। इसका अर्थ है जिम्मेदारी, देखभाल,सम्मान, अन्य मनुष्य का ज्ञान, उसके भविष्य के लिए शुभकामनाएं देना। इस तरह के प्रेम के बारे में बाइबिल में कहा गया है। भातृप्रेम सभी मनुष्यों के बीच प्रेम का आधार है। इसमें एक्सक्लुसिवनेस का अभाव है। जब हम ज्ञान की शिक्षा देते हैं तो हम उस शिक्षा को खो देते हैं जो मनुष्य के विकास के लिए जरूरी है।
     
       इन दिनों होना ही व्यक्ति के लिए महत्व का हो गया है, कोई चीज है तो महत्व है। होने के कारण ही व्यक्ति जिंदा होता है। यदि जिंदा रहना है तो अपने होने के अस्तित्व को चुनौती देने का जोखिम भी होना चाहिए,जिससे अपने अस्तित्व को ही चुनौती दी जा सके। ऐसे व्यक्ति का जिंदा रहना अन्य को प्रदूषित करता है। उनके प्रदूषण से ही अन्य लोग अपना अतिक्रमण कर पाते हैं। ऐसे लोगों का संवाद करना,बातचीत करना ज्यादा उपयोगी होता है,क्योंकि इसमें आप वस्तुओं का विनिमय नहीं करते। जब आप संवाद करते हैं तो उसमें यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कौन सही है।
एरिक फ्रॉम ने '' दि आर्ट ऑफ लविंग'' में लिखा ''भावना प्रेम नहीं है, जो किसी के भी साथ शामिल हो जाए।''  प्रेम के अधिकांश प्रयास असफल होते हैं, चाहे कितने ही परिपक्व ढ़ंग से क्यों न किए गए हों। इसके बावजूद हमें प्रेम आशान्वित करता है, प्रेम की ओर बढ़ावा देता है।  प्रेम को सेंटिमेंट के रूप में नहीं देखना चाहिए।

प्रेम कला है। प्रेम का कोई निर्देशात्मक शास्त्र नहीं बनाया जा सकता। कोई मेनुअल नहीं बना सकते। प्रेम का अर्थ चांस नहीं है। यह चांस की चीज नहीं है। जैसाकि अमूमन लोग बोलते हैं मैं बड़ा लकी हूँ कि मुझे तुम मिली या मिले। अथवा तुमसे प्यार हो गया।

प्रेम चांस नहीं है। प्रेम भाग्य भी नहीं है। प्रेम में व्यापक असफलता के बावजूद प्रेम के प्रति आज भी आकर्षण बना हुआ है, प्रेम की मांग बनी हुई है। आज भी प्रेम कहानी सबसे ज्यादा बिकती है। प्रेम एक ऐसी चीज है जिसके बारे में शायद ही कभी कोई यह कहे कि उसके लिए शिक्षा की जरूरत है। ये सारी बातें एरिक फ्रॉम ने उठायी हैं और उनसे असहमत होना असंभव है।
       आधुनिक मीडिया बता रहा है कि प्रेम दो के बीच का रसात्मक आकर्षण है। इससे ज्यादा कुछ भी नहीं है। प्रेमकथाएं अमूमन दो व्यक्तियों की प्रेम कहानी के रूप में ही होती हैं और अंत में प्रेम के बाद खत्म हो जाती हैं। इन कहानियों में दिखाया जाता है कि किस तरह प्रेमी युगल तमाम मुसीबतों का सामना करके अंत में प्रेम करते हैं। अंत में सुखी जीवन जीते हैं। हमें सोचना चाहिए कि इस तरह की प्रस्तुतियां हमें अंत में कहां ले जाती हैं ? क्या इस तरह की प्रस्तुतियां हमें बाकी संसार से काट देती हैं ?

हमारे रेडियो स्टेशनों से रूढ़िबद्ध प्रेमगीत लगातार बजते रहते हैं। ये गीत भी रोमांस उपन्यासों और प्रेम फिल्मों से बेहतर नहीं होते। इन सबमें एक ही बात होती है कि दो व्यक्तियों के बीच के संबंध का नाम है प्रेम । आप ज्योंही मिलते हैं और मैच मिल जाता है तो बस एक-दूसरे में घुल-मिल जाना चाहते हैं।

किंतु एरिक फ्रॉम जिस प्रेम को पेश कर रहे हैं उसका इससे साम्य नहीं है। एरिक ने जीजस की प्रेम की धारणा को आधार बनाया है, जीजस ने कहा था अन्य से प्रेम करो, पड़ोसी से प्रेम करो। हमारी फिल्मों में जिस तरह दो व्यक्तियों के बीच में सेंटीमेंटल लव दिखाया जाता है उससे इसका कोई संबंध नहीं है।

 प्रेम का अर्थ घर बनाना अथवा घर में कैद हो जाना नहीं है। बल्कि प्रेम का अर्थ है घर के बाहर निकलकर प्रेम करना। उस जगह से बाहर निकलना जहां आप रह रहे हैं। उन आदतों से बाहर निकलना जिनमें कैद हैं। आप उनसे प्यार करें जो आपसे अलग हैं, व्यक्तिगत संबंधों के परे जाकर प्रेम करें।

    मौजूदा उपभोक्ता समाज में मीडिया लगातार हमें अन्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी के भाव से दूर ले जा रहा है। अन्य के प्रति जिम्मेदारी के भाव से दूर जाने के कारण ही आत्मकेन्द्रित होते जा रहे हैं।  ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि स्वयं ज्यादा से ज्यादा उपभोग कर रहे हैं। हम नहीं सोचते कि इससे किसे क्षति पहुँच रही है। कौन इस प्रक्रिया से पीड़ित है। हम सिर्फ एक ही विचार में कैद होकर रह गए हैं कि हमें कोई एक व्यक्ति चाहिए जो हमें प्यार करे। उसके साथ जी सकें। इसके लिए सिर्फ एक काम और करना है ज्यादा से ज्यादा धन कमाना है,एक साथ काम करना है। हम जिस व्यक्ति को प्यार करते हैं उसके लिए ज्यादा से ज्यादा चीजें खरीदनी हैं। 
      हमारी हिन्दी फिल्मों के गाने कितना ही ज्यादा प्रेम का राग अलापें, कितना ही दुनिया से प्रेम का कोलाहल करें। किंतु सच्चाई यह है कि प्रेम के इस कोलाहल में हमने अपने अंदर के दरवाजे बंद कर लिए हैं। हमने अपने पड़ोसी की जिंदगी से आंखें बंद कर ली हैं। बल्कि इनदिनों उलटा हो रहा है हम पड़ोसी से प्रेम की बजाय उस पर संदेह करने लगे हैं। पड़ोसी को जानने की बजाय उसके प्रति अनजानापन ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति हो गया है। प्रेम का मीडिया ने ऐसा वातावरण बनाया है कि हम अपनी ही दुनिया में कैद होकर रह गए हैं। घर की चारदीवारी में ही अपने जीवन के यथार्थ को कैद करके रख दिया है। घर में ही हमारे सबसे घनिष्ठ आंतरिक संबंध कैद होकर रह गए हैं। विश्व के साथ पैदा हुए इस अलगाव को हम प्रेम कहते हैं !
    




शनिवार, 11 जुलाई 2009

देरि‍दा: प्रेम,मि‍त्रता और वि‍खंडन

देरि‍दा दार्शनिक नहीं बनना चाहता था।वह पेशेवर फुटबाल खिलाड़ी बनना चाहता था। औपचारिक स्कूली शिक्षा में देरि‍दा फिसड्डी था।बार-बार परीक्षा में फेल होता था। इसके बावजूद उसे 'इकोल नॉरमाले सुपीरियर इन पेरिस' में दाखिला मिला। आधुनिक युग का दर्शन का सबसे बड़ा दार्शनिक सब समय टीवी ,फिल्में और खबरें देखना पसंद करता था।वह एक दार्शनिक ही नहीं बल्कि आला दर्जे का इंसान था। उसने सबको 'डिकंस्ट्रक्शन' या विखंडन का सिध्दान्त दिया। इसका वह स्वयं भी व्यवहार में पालन करता था।वह जो कुछ भी देखता था उसके प्रति आलोचनात्मक रवैयया रखता था।यह कार्य वह सचेत रूप से करता था।
देरि‍दा ने एक बार एक साक्षात्कार में कहा कि मैं सब समय विखंडन करता रहता हूँ। साक्षात्कार में जब पूछा गया कि आपने आखिरी फिल्म कौन सी देखी ?क्या उसका भी विखंडन किया ?इसके जबाव में देरि‍दा ने गुस्से में कहा कि मैं विखंडन पदबंध के इस तरह के इस्तेमाल से बहुत दुखी हूँ। मैं सोचता हूँ कि यह इस पदबंध का शोषण हो रहा है। स्नातक स्तर के छात्र विखंडन पदबंध का स्टीरियोटाईप की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। उसे विकृत कर रहे हैं।
देरि‍दा के चिन्तन की केन्द्रीय विशेषता है कि उन्होंने दर्शनशास्त्र को नए सिरे से गरिमा दिलायी।यह काम उन्होंने ऐसे समय मे किया जब दर्शन के अंत की दुंदंभी बज रही थी।आधुनिक काल में दर्शनशास्त्र पेशेवर दार्शनिकों का क्षेत्र बनकर रह गया था।सामान्य बौध्दिक जगत की हलचलों में दर्शन की उपेक्षा हो रही थी।कला,साहित्य,संस्कृति, राजनीति,न्याय आदि सभी क्षेत्रों से दर्शनशास्त्र का संवाद तकरीबन टूट गया था।यह सारी परिघटना बीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही शुरू हुई।दर्शन का ज्ञान,विज्ञान,समाजविज्ञान आदि से सामान्य तौर पर रिश्ता क्यों और कैसे टूटा इस सवाल पर गंभीरता विचार करने की जरूरत है।
देरि‍दा के चिन्तन की दूसरी केन्द्रीय विशेषता है कि वे दर्शन, साहित्य, राजनीति, न्याय,भाषा आदि के समूचे विमर्श को नए सिरे से विश्लेषित करते हैं। सभी धारणाओं, मॉडल, पध्दतियों और विचारधाराओं को विश्लेषित करते हैं, उनकी मान्यताओं को चुनौती देते हैं। इस क्रम में लेखकों, दार्शनिकों, विचारकों के बन-बनाए साँचे टूट जाते हैं। फलत: समूचे विमर्श का पैराडाइम ही बदल जाता है।
देरि‍दा की तीसरी महत्वपूर्ण खूबी है कि उनका कोई पाठक उनसे प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकता।दोस्त हो या दुश्मन वे सभी को प्रभावित करते हैं। सभी को विश्लेषण के औजार बदलने के लिए प्रेरित करते हैं।देरि‍दा को पढ़ने के बाद नजरिए में परिवर्तन अनिवार्य है।इस तरह की वैचारिक ताकत शायद मार्क्‍स के बाद किसी भी विचारक ने हासिल नहीं की थी।
देरि‍दा के नजरिए की चौथी विशेषता यह है कि वे परंपरा पर नए सिरे से समग्रता में विचार करते हैं। खासकर आधुनिक काल के विकास के नजरिए से सोचते हैं। वे उन तमाम दार्शनिक परंपराओं पर समग्रता में विचार करते हैं जिनके बारे में हमने सोचना बंद कर दिया था,यह मान लिया गया था कि अब तो या कुछ भी विवेचन लायक नहीं है।
असल में देरि‍दा का विखंडन स्वयं को चुनौती देता है।वह उस समूचे जगत को चुनौती देता है जिसमें हम जीते हैं।विखंडन प्रतिगामी वैचारिक औजार नहीं है। बल्कि वह वैध-अवैध, विवेक - अविवेक, तथ्य,कहानी,आब्जर्वेन,इमेजीनेशन आदि सभी को चुनौती देता है।विखंडन में दर्शन से लेकर जनमाध्यम, साइबरजगत तक की समस्याओं पर विचार किया गया है।
''देरि‍दा का मानना है कि उनका काम मौजूदा विमर्श में बेहद हाशियाकृत है।उनके अनुसार विखंडन दार्शनिक आशयों,विषयों,निष्कर्षों, तत्व मीमांसाओं, कविताओं,धर्मशास्त्रों, विचारधारा शास्त्रों से संबंधित नहीं है,बल्कि विभिन्न रूप में सार्थक संरचानाओं,सांस्थानिक संरचनाओं,शिक्षणात्मक या अलंकारशास्त्रीय नियमों,कानून सत्ता,और उनके बाजार की प्रातिनिधिकता से संबंधित है।स्पष्ट है कि देरि‍दा अपने इस कथन से विखंडन के नाम पर चल रहे तमाम तरह के प्रवादों की सीमा रेखा खींच देते है।वे विखंडन को सांस्थानिक बनाए जाने के प्रयत्नों को नकार देते है जो अमरीकी विश्वविद्यालयों के अंग्रेजी विभागों तथा तुलनात्मक साहित्य के विभागों में इन दिनों हो रहे हैं।''(सुधीश पचौरी,देरिदा का विखंडन और साहित्य,1997,पृ.20)
विखंडन सन् 60 के दशक में सामने आया।यह पश्चिम की 'मेटाफिजिकल परंपरा' का सिध्दान्त है।इसमें बीसवीं शताब्दी के सभी प्रमुख विचारकों के नजरिए का कनवर्जन है।यह उपग्रह युग की कनवर्जन तकनीकी का साहित्यशास्त्र, दर्शनशास्त्र है।इसमें हुसेर्लियन फिनोमिनोलॉजी, मार्क्‍स,सोस्यूर,फ्रांसीसी संरचनावाद,मनोशास्त्र और भारतीय दर्शनशास्त्र का समावेश है।
विखंडन खास तरह की रीडिंग के अभ्यास,आलोचना की पध्दति, विश्लेषणात्मक खोज की पध्दति का नाम है।बारबरा जॉनसन ने 'दि क्रिटिकल डिफरेंस'(1981) में लिखा 'विखंडन' को 'विध्वंस' के पर्यायवाची के रूप में नहीं देखना चाहिए। बल्कि यह 'विश्लेषण' के ज्यादा करीब है। विश्लेषण में त्यागना अनिवार्य शर्त है। बिना त्यागे विश्लेषण संभव नहीं है। बारबरा ने लिखा है कि विखंडन वास्तव अर्थों में 'पुनर्निर्माण' का पर्यायवाची है। यदि कोई चीज विध्वंसक रीडिंग में नष्ट होती है तो वह पाठ नहीं है बल्कि उसका वर्चस्वशाली रूप नष्ट होता है। यह ऐसी रीडिंग है जो पाठ के विश्लेषण के दौरान उसमें निहित आलोचनात्मक फर्क को सहज ही उजागर कर देती है।
पाल द मान ने लिखा है विखंडन रीडिंग की सैध्दान्तिकी है।जो पाठ में निहित विपरीत अर्थ के तर्क की उपेक्षा करने वाले नजरिए का विखंडन करती है। विखंडन के बारे में एक अमेरिकी पत्रिका ने अप्रैल 1993 में लिखा कि विखंडन संभवत: यूरोप के लिए सबसे प्यारी चीज है। किंतु अमेरिका के साथ उसका 'लव-हेट' (प्रेम-घृणा) का संबंध है। सुधीश पचौरी के मुताबिक ''विखंडन मानता है कि आलोचना लेखन का एक तरीका है,जो किसी चीज में से किसी चीज को खोजता नहीं है बल्कि उस टैक्स्ट मे अर्थ का निर्माण भर करता है जिससे वह संलग्न होती है।इसलिए वह रचना की तरह ही रचनात्मक है।जिस तरह रचना टैक्स्ट में अर्थ का निर्माण करती है,उसी तरह आलोचना टैक्स्ट में 'अर्थ का निर्माण' करती है।इसलिए रचना और आलोचना 'अर्थ निर्माण के दो तरीके हैं'बड़े-छोटे नहीं हैं।इस अवधारणा ने सिध्दान्तिकी के परंपरावादियों की नींद हराम कर दी है।''(उपरोक्त,पृ.21-22)
''विखंडन की दूसरी रणनीति यह है कि वह किसी भी 'टैक्स्ट' में मौजूद अर्थ को निश्चित,पक्का और पूरा नहीं मानता।वह नहीं मानता कि किसी टैक्स्ट या पाठ की पूरी तरह और अंतिमत: व्याख्या की जा सकती है।उसका मानना है कि हर पाठ कुपाठ होता है।'मिस रीडिंग' है।''(उपरोक्त,पृ.22)
सामान्य तौर पर बुध्दिजीवी यह आरोप लगाते हैं कि देरि‍दा की किताबें बेहद जटिल हैं। वह कठिन गद्य लिखता है।उसे समझने में मुश्किल होती है। पाठकों को हतोत्साहित करता है। लेखन में सरलतापंथी पेटू लोग हिन्दी में जिस तरह व्यापक पैमाने पर पाए जाते हैं वैसे ही पश्चिम में भी पाए जाते हैं।इस तरह के सरलतापंथी पेटू लोगों को ध्यान में रखकर देरि‍दा ने कहा था कि यह सच है कि इससे मेरा नुकसान होता है।इससे बचने के लिए जो भी संभव है मैं करता हूँ। असल में जो लोग कहते हैं कि उन्हें मेरी बात समझने में कष्ट होता है। मेरी बात उनकी समझ में नहीं आती। असल में वे लोग समझना ही नहीं चाहते। जो समझना नहीं चाहते उन्हें मेरी पुस्तकें समझ में नहीं आएंगी। हमें उनकी रीडिंग और विश्लेषण की पध्दति के बारे में सवाल उठाने चाहिए।असल में वे लोग आरामदायक और सरल तरीके से पढ़ना चाहते हैं।
देरिदा ने कहा जब कोई गणितज्ञ या फिजिसिस्ट लिखता है, उसके लिखे को जब कोई नहीं समझता तो उसके लिखे के बारे में कोई नहीं कहता कि समझ में नहीं आता। कोई विदेशीभाषा बोले,तब भी नहीं कहते कि समझ में नहीं आता अथवा लोग कुछ नहीं बोलते। कोई जब आपकी भाषा की टांग तोड़ दे, तब ही कहते हैं कि समझ में नहीं आता। अथवा वे लोग कुछ नहीं बोलेंगे। असल में सवाल संबंध का है।आप कैसा संबंध बनाना चाहते हैं। मैं जटिल बनाने के लिए जटिल नहीं लिखता। ऐसा करना हास्यापद होगा। लोग यह मानकर क्यों चल रहे हैं कि दार्शनिक को सरल होना चाहिए। वे किसी वैज्ञानिक के बारे में ऐसा क्यों नहीं सोचते। जबकि वैज्ञानिक तो बहुत सारे पाठकों की पहुँच से बाहर होता है। जटिलता के सवाल को साहित्य के संदर्भ या लेखक के संबंध में ही क्यों उठाया जाता है। लेखक के संदर्भ में ही अपठनीयता का सवाल क्यों उठाया जाता है ? जबकि वह नए की खोज करता है। नया रास्ता सुझाता है। वह भाषा की व्याख्या करता है। भाषा का अर्थशास्त्र बनाता है।कोड बनाता है।ग्रहण करने के चैनल बनाता है।
देरि‍दा पर विचार करते समय अनेक विचारकों ने लिखा है कि विखंडन एक पध्दति है। देरि‍दा ने इस धारणा का बार-बार खण्डन किया है।उन्होंने यहां तक कहा है कि यह कोई 'देरीदियन मैथड' नहीं है।देरि‍दा पर विचार करते समय यह ध्यान रखें कि वह बोलने और लिखने की इच्छा को सर्वोच्च स्थान देता है।उसे इडियम में लिखना,इडियम बनाना पसंद है, किंतु यह भी मानता है कि इडियम प्योर नहीं होता।प्रत्येक इडियम की अपनी पध्दति होती है।प्रत्येक विमर्श,काव्य,वाक्य आदि के अपने नियम होते हैं।यह भी कहा कि मैं इडियम में विश्वास नहीं करता।इसके बावजूद सच यह है कि लेखक की लिखने की अपनी इच्छा होती है।वह कुछ भी लिखे या बोले।उसे किसी न किसी इडियम के जरिए अपनी बात कहनी होती है।यह कार्य वह गैर-अपदस्थीकृत रूप में करता है।किंतु अपने कार्य को ज्यों ही निश्चित रूप देता है अपदस्थ हो जाने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसमें पुनरावृत्ति की संभावना भी है।वह ज्यों ही भाषा के माध्यम से इडियम में प्रवेश करता है उसे इडियम से बाहर के तत्वों से समझौता करना पड़ता है। वह कॉमनभाषा,अवधारणा,कानून,सामान्य नियमों आदि से समझौता करता है। इस क्रम में वह इडियम को सुरक्षित रखने की कोशिश भी करता है।नियमों की व्यवस्था को सुरक्षित रखता है। साथ ही इडियम के मैथड को भी मानता है। मैं यह भी कहना चाहता हँ कि रचनात्मक सवालों के बहाने मैथड के सवाल हीं उठाए जाने चाहिए।उसकी तकनीकी प्रक्रिया है।वहां एक संदर्भ से दूसरे संदर्भ तक पुनरावृत्ति होती रहती है।मसलन् मैं जो कुछ लिखता हूँ उसके भी सामान्य नियम हैं।कुछ प्रक्रिया है।इसका मैं विश्लेषण के लिए इस्तेमाल करता हूँ।इसी को मैं टीचिंग,नॉलेज और एप्लीकेशन कहता हूँ। किंतु ये सारे नियम पाठ से लिए जाते हैं। प्रत्येक पाठ विलक्षण होता है। उसमें विलक्षण तत्व होते हैं। उसे स्वयं में संपूर्णता के हवाले नहीं किया जा सकता है।इसी तरह लिखे हुए के प्रभाव के बारे में भी सोचना चाहिए। कोई चाहे या न चाहे इडियम का अन्य पर असर होता है। यह फोटोग्राफी के प्रभाव की तरह है।आप चाहे जिस रूप में फोटो खिंचवा लें।चाहे जितनी सावधानी बरतें।चाहे जैसे दिखने की कोशिश करें।इसके बावजूद ऐसे क्षण आएंगे जब फोटो आपको आश्चर्यचकित करेगा।
देरि‍दा के व्यक्तित्व की यह विशेषता थी कि उन्होंने हमेशा अपने को बहुत ही सामान्य ढंग से पेश किया।किंतु उनके लेखन को लेकर जबर्दस्त विवाद उठे हैं। उन पर अभूतपूर्व हिंसक हमले भी हुए हैं। उनकी जमकर निन्दा भी हुई है। इसके कारणों की खोज करते हुए देरि‍दा ने कहा कि मेरा कार्य सक्रिय प्रक्रिया का हिस्सा है। वहां अभी बहुत कुछ अनखुला है। खासकर प्रतिरोध अनखुला है जो कभी भी उभरकर सामने आ सकता है।प्रतिरोध उभरेगा तो वह व्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहेगा। अनुशासन तक ही सीमित नहीं रहेगा।शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित नहीं रहेगा।इस प्रतिरोध में छात्र,युवा एवं शिक्षक बार-बार शामिल हो रहे हैं। यदि मेरे सहकर्मी मेरे ऊपर हमले कर रहे हैं तो इसका कारण शैक्षणिक नहीं है, पागलपन नहीं है, बल्कि सच यह है कि कहीं न कहीं अपने लिए खतरा महसूस कर रहे हैं। मुझे उम्मीद और विश्वास है कि वे अनेक सिध्दान्तों का मूल्यांकन कर रहे हैं,अनेक प्रभुत्वशाली विमर्शों की पुन:परीक्षा कर रहे हैं। शैक्षणिक संस्थानों का मूल्यांकन कर रहे हैं। प्रभुत्वशाली विमर्शों में संशोधन कर रहे हैं। उनका राजनीतिकरण कर रहे हैं। यदि ये सिर्फ व्यक्तिगत हमले होते तो बात कुछ और थी। यह व्यक्तिगत मामला नहीं है। विखंडन की अनेक जिज्ञासाएं सवाल खड़े कर रही है। उन तमाम वर्गीकरणों,तटस्थ रूपों के प्रति सवाल खड़े कर रही हैं जो दर्शन में मौजूद हैं।
कायदे से इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि देरि‍दा के समसायिक राजनीतिक मसलों पर लिए गए स्टैंड ने कोई हंगामा खड़ा नहीं किया बल्कि व्यवहार में उसकी उपेक्षा ही ज्यादा हुई है।ऐसा क्यों हुआ ?इसके बारे में देरि‍दा का कहना है कि यह सच है राजनीति में चुप्पी है।अनेक मामलों में मेरी वापसी भी हुई है।किंतु चीजों को अतिरंजित रूप में पेश नहीं करना चाहिए।इस संदर्भ में यदि किसी को रूचि है तो वह देख सकता है कि मेरी रूचियां क्या हैं ?चयन क्या है ?वगैर किसी दुविधा के कुछ चीजें अभिव्यक्त हुई हैं।मैंने सामान्य तौर पर खास और आम बातों पर ही बोला है।ऐसी स्थिति में मैं अन्य की राय या वोट में शामिल हो गया हूँ।मैंने कभी अधिकारी विद्वान् होने का दावा नही किया।कोई यश लेने की कोशिश नहीं की। अपने लिए दार्शनिक या बुध्दिजीवी जैसा विशेष दर्जा नहीं मांगा।बल्कि सच यह है कि मुझे उसी समय ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ा है जब मैंने अपने को दार्शनिक, बुध्दिजीवी या प्रोफेसर के रूप में देखने की कोशिश की है।मैं सोचता हूँ कि खास परिस्थितियों में, क्लासिक भूमिका एवं जिम्मेदारी निभाने की जरूरत होती है। उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।मैं रूपान्तरण करने की कोशिश करता हूँ और अच्छे भावों को अपील करने की राजनीतिक जिम्मेदारी निभाता रहा हूँ।
देरि‍दा के चिन्तन की धुरी है ग्रीक दर्शन और उसकी धुरी है 'लव ऑफ विजडम'। बतर्ज देरि‍दा फ्रांस में दर्शन को 'इटीमोलॉजी' यानी 'व्युत्पत्तिविज्ञान' कहते हैं। 'व्युत्पत्ति' यानी मालूम करना।संस्कृत में इसे निरूक्त कहते हैं।ग्रीक में दर्शन को प्रेम अथवा सोफिया के प्रति मित्रता कहा जाता है।इसमें 'विजडम' भी शामिल है।इसे ज्ञान का कौशल भी कह सकते हैं।देरि‍दा ने कहा कि हमें सवाल करना चाहिए कि 'फिलिया'क्या है ? प्रेम क्या है ? इच्छा क्या है ?इन सवालों से टकराते हुए हमने दर्शन को परिभाषित करना शुरू किया।इन सबको परिभाषित करने के लिए हमने व्युत्पत्तिविज्ञान को आधार बनाया।यही वजह है कि प्रेम और मित्रता की व्याख्या करने वाले अनेक पाठ प्रचलन में आए हैं।मैंने भी एक पुस्तक 'पॉलिटिक्स ऑफ फ्रेण्डशिप' नाम से लिखी है।तकरीबन सभी बड़े फ्रांसीसी विचारकों ने मित्रता और प्रेम के सवाल पर विस्तार से विचार किया है।देरि‍दा ने कहा कि मैं इस प्रसंग में इस बात से सहमत हूँ कि चीजों को इस तरह देखने से दर्शन की ज्ञानमीमांसापरक व्याख्या से हम भटक जाते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक दार्शनिक ने दर्शन की अपनी परिभाषा बनायी है। इसी को लेकर दार्शनिकों में जबर्दस्त विवाद है।वे दर्शन पर विचार करते रहे हैं कि यह कब और कैसे पैदा हुआ ?दर्शन की उत्पत्ति का आधार क्या है ?इस संदर्भ में यह ध्यान रखें कि आप दर्शन क्या है ?इसकी अवधारणात्मक व्याख्या तक ही सीमित नहीं रह सकते।यहां दर्शन शब्द का अर्थभर बता देना ही पर्याप्त नहीं है। 'फिलॉसफी' पदबंध ग्रीक का है।इसकी अनेक व्याख्याएं हैं।इन व्याख्याओं में बदलाव आता रहा है।
विखंडन नकारात्मक धारणा नहीं है।बल्कि हो यह रहा है कि विखण्डन को अधूरे रूप में पेश किया जा रहा है।सन् 1980 में देरीदा ने इस तरह के रूझानों को मद्देनजर रखकर ही कहा था कि विखण्डन के साथ प्रेम की धारणा को रखकर पढ़ा जाना चाहिए। देरि‍दा ने कहा था कि प्रेम का मतलब है अन्य की इच्छा-आकांक्षाओं के प्रति दृढ़ निश्चयीभाव।अन्य का सम्मान करना।अन्य की तरफ ध्यान देना।न कि अन्य के अन्यत्व को नष्ट करना।यह मेरी बुनियादी समझ है। इसके बावजूद यह सवाल किया जा सकता है कि विखण्डन में नकारात्मक क्या है ? मैं कहना चाहता हूँ कि विखण्डन में कुछ भी नकारात्मक नहीं है।तुम इसकी आलोचना कर सकते हो।सवाल खड़े कर सकते हो।चुनौती दे सकते हो। कभी-कभी विरोध भी कर सकते हो।इसके बावजूद विखण्डन में नकारात्मक कुछ भी नहीं है। विखण्डन नकारात्मक होकर कार्य नहीं करता।नकारात्मकता के आधार पर आप कोई कार्य नहीं कर सकते।यदि आलोचना करना चाहते हैं,इसे अस्वीकार करना चाहते हैं,खारिज करना चाहते हैं,चाहे अन्य का विरोध करने के लिए ही सही,तो इसके साथ आपको एक छोटा सा समझौता करना पड़ेगा सबसे पहले आप उसकी मौजूदगी को मानें।
देरि‍दा ने कहा कि जब आप अन्य को सम्बोधित करना चाहते हैं,चाहे अन्य का विरोध करने के लिए ही सही,तो आप अन्य की उपस्थिति को मानें।अन्य को अन्य की तरह सम्बोधित करें। अन्य को हजम करने के लिए सम्बोधित नहीं किया जा सकता।यहीं पर हमें अन्य की विशिष्टता को स्वीकार करना है। इस स्थिति को किसी भी तरह बदला नहीं जा सकता। यही इसका मूल नैतिक तत्व भी है।इस दृष्टि से देखें तो विखंडन एक एथिक्स है।यह सामान्य अर्थ में एथिक्स नहीं है।
देरि‍दा ने अपने लेखन में 'यस' पदबंध का काफी प्रयोग किया है।देरीदा कहते हैं कि 'यस' पदबंध 'अन्य' की तरह नहीं है।तुम 'यस' का प्रयोग नहीं भी करो तब भी यह ध्यान रखो कि प्रत्येक भाषा में 'यस' पदबंध है।यह प्रत्येक दार्शनिक के यहां हैं। हाइडेगर के यहां भी है। हाइडेगर कहा करता था कि चिन्तन की शुरूआत सवाल से होती है।सवाल करने का अर्थ है चिन्तन के सम्मान के प्रति सवाल खड़े करना।एक दिन ऐसा भी आएगा कि हम यह कहें कि 'उसके बयान का खण्डन करते हुए कह रहा हूँ 'यस'।उल्लेखनीय है 'यस' का दार्शनिकों की भारतीय परंपरा में मौनम् सम्मति लक्षणम् के अर्थ में प्रयोग होता रहा है।अथवा भारतीय दार्शनिक यों कहते हैं कि अब तक जो कहा गया वह फलां का है। इसके आगे मैं कहता हूँ।देरीदा ने कहा कि 'यस' कहने से बात खत्म नहीं हो जाती।बल्कि इसके बाद जो सिलसिला शुरू होता है।वह यह रेखांकित करता है कि चिन्तन के पहले भी कुछ मौजूद है।इसी को जूसेज ने चुपचाप स्वीकार करना कहा है।संस्कृत में इसी को मौनम् सम्मति लक्षणम् है।स्वीकार करने का अर्थ है दृढतापूर्वक कहना।'यस' कहने का अर्थ है कि तुम अन्य को पहले मानो और कहो कि मैं तुमसे सवाल करना चाहता हूँ।अन्य से कहो कि मैं तुमसे बातें करना चाहता हूँ।अन्य को चुनौती देने,विरोध करने से पहले यह कहना जरूरी है कि मैं तुमसे बातें करना चाहता हूँ।तुम्हारा अस्तित्व मानता हूँ।ज्योंही आप यह कहते हैं आप अपने और अन्य में जो कॉमन है उसे बता रहे हैं तो इसी को 'लव' या प्रेम कहते हैं।इसी को कहते हैं दृढ़ निश्चयपूर्वक कहना।
देरि‍दा के चिन्तन की मुश्किल यह है कि उसे पढ़ते समय आप उसके दायरे के बाहर नहीं जा सकते।उससे बाहर राय नहीं बना सकते।यह आंतरिक तौर पर उसकी भाषिक संरचना में निहित है।असल में इस समस्या का संबंध उसके परंपरा संबंधी मूल्यांकन से है।विरासत के सवाल से है।देरीदा ने कहा कि मेरा सब कुछ 'इनहेरिटेड' नामक धारणा पर टिका है।जब आप भाषा को विरासत में पाते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं है कि आप पूरी तरह इसके अंदर हैं।अथवा ठंडे रूप में इसके कार्यक्रम का हिस्सा हैं।'इनहेरिटेड' का मतलब है भाषा को आप पूरी तरह आत्मसात् करें।रूपान्तरित करें।उसमें से कुछ का चयन करें। व्याख्या करें। प्रतिक्रिया दें।जबाव दें।दायित्व लें।जब दायित्व लेते हैं तो आप विरासत के बंदी नहीं होते।'हेरीटेज' का अर्थ यह नहीं है कि आप उसे समूचा पा लें। या दे दें।आप हेरीटज के बंदी नहीं हैं।आप उसे सिर्फ संरक्षित नहीं रख सकते जिससे वह सिर्फ बची रहे। तुम्हें जीना है और विकास करना है।इसमें चयन और व्याख्या की प्रक्रिया भी शामिल है।मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि इसमें दोहराने या कंजरवेटिव पोजीशन लेने की बेचैनी या उद्विग्नता भी होती है।किंतु जरूरी नहीं है कि यह प्रक्रिया घटित हो। मैं कहना चाहता हूँ कि कुछ भी नया करने के लिए विरासत को आत्मसात् करना जरूरी है।तुम्हें भाषा के अंदर जाना होगा। परंपरा के अंदर जाना होगा।तुम जब तक अंदर नहीं जाओगे रूपान्तरित नहीं कर सकते।किसी चीज को तब तक अपदस्थ नहीं कर सकते जब तक उसके अंदर न जाओ।
देरि‍दा को परंपरा की पुनरावृत्ति से कोई एतराज नहीं है।इस संदर्भ में हमें पुनरावृत्ति और इन्नोवेशन (खोज)में चयन नहीं करना है।बल्कि दो तरह की परंपराओं और इन्नोवेशनों में से चयन करना है।इसके अलावा कुछ और भी सक्रिय रूप भी हो सकते हैं।मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि कुछ नया खोजने की व्यवस्था बनानी है।अथवा कुछ नया घटित हो इसका प्रयास करना है।यह संभव है कि परंपरा के साथ धोखा करो या उसे भूल जाओ।तुम यदि किसी से बात करते हो तो यह सुनो कि अन्य क्या कहते हैं।संभवत: तुम उसकी पुनरावृत्ति करो।इसका तुम्हें जबाव देना होगा।प्रतिक्रिया व्यक्त करनी होगी।देरि‍दा ने कह कि मैं परंपरा पर बात करते समय प्रतिक्रिया और जिम्मेदारी दोनों को शामिल करता हूँ।देरि‍दा सामान्य तौर पर जब भाषा पर बात करता है तो उसे पुनरूक्ति कहता है।वह नए और संभावित अर्थ में व्यक्त होती है।इस प्रसंग में देरीदा ने कहा कि मुझे संस्कृत के व्युत्पत्तिशास्त्र की अस्पष्ट समझ है।वहां 'इटिरा' का अर्थ है और फिर एकबार।वही पुनरावृत्ति है।अथवा कुछ अन्य है,कुछ बदलाव के साथ है।इसका अर्थ है कि भाषा स्वयं को नए संदर्भ में पुन: प्रस्तुत करती है।नए फॉर्म में पेश करती है। उसके संभावित अर्थों के बारे में बताना असभव है।उसकी सीमा तय करना असंभव है।इसका अर्थ यह भी है कि पाठ से अर्थ को अलग नहीं कर सकते।खासकर लेखक की मंशा से पाठ को अलग नहीं कर सकते।इसका अर्थ यह भी है कि लेखक अपनी पुस्तक के भविष्य के लिए जिम्मेदार है।किंतु यह बात यांत्रिक तौर पर लागू नहीं होती।लेखक,दार्शनिक आदि को अपने लिखे के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। मसलन् लिखते समय राजनीतिक आयाम के प्रति सतर्क रहना चाहिए। कोशिश करो कि ज्यादा नियंत्रण स्थापित न किया जाए।लेखन के सभी संभावित परिणामों के मद्देनजर कहना चाहता हँ कि जनता आपके लेखन से कुछ न कुछ अर्थ निकाल लेगी।इसी को ओवलीगेशन कहते हैं।प्रत्येक चीज को देखने एवं विश्लेषित करने का दबाव कहते हैं। लेखन को नियंत्रित करना असंभव है।तुम चीजों को नियंत्रित नहीं कर सकते।अथवा खास तरह के विमर्श या वाक्यों को प्रकाशित होने से रोक नहीं सकते।ध्यान रहे जब कोई चीज खोजी जा रही है तो खोजी जा रही है।खोज हमेशा आपकी पकड़ के बाहर होती है।आपके नियंत्रण के बाहर होती है।वह भिन्न संदर्भ में होती है।उसका शोषण या अपदस्थीकरण संभव है।इसका लेखक के लक्ष्य से भिन्न इस्तेमाल संभव है।
यही सवाल मैंने नीत्शे के संदर्भ में उठाया था।यह सच है कि नीत्शे का नाजियों ने इस्तेमाल किया। दुरूपयोग किया।इसी वजह है नीत्शे को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसमें संदेह नहीं है कि वह यह सब नहीं चाहता था। किंतु हम यह कैसे भूल सकते हैं कि नाजी उसे अपना उत्तराधिकारी मानते थे।यही वजह है कि उसके साथ विमर्श होना चाहिए। उसके नाजी संबंधों के बारे में विमर्श होना चाहिए।मैंने यह कार्य अपने तरीके से किया है। फिर भी उसके दुरूपयोग रोक नहीं सकते। मैं चाहता हूँ कि भाषा के वर्चस्व के प्रति प्रतिरोध किया जाए। किंतु इसके साथ यह भी कहना चाहता हूँ कि राष्ट्रवाद का भी विरोध किया जाए।भाषा के वर्चस्व के प्रति विरोध को कुछ प्रतिक्रियावादी तत्वों ने आत्मसात् कर लिया है।कुछ लोगों ने कहा कि तुम डिफरेंस या भिन्नता के नाम पर सार्वभौम भाषा में दरार पैदा कर रहे हो।अत: हम तुम्हारे विमर्श को राष्ट्रवाद या प्रतिक्रियावादी भाषायी हिंसा के पक्ष में इस्तेमाल करते हैं।मैं इस तरह के चिन्तन को नियंत्रित नहीं कर सकता।तुम सब कुछ नियंत्रित नहीं कर सकते।इसका अर्थ यह है कि तुम चुके हुए इंसान हो,सीमित इंसान हो।इसका संबंध भाषा की संरचना से है।खोज की संरचना से है।ज्यों ही तुम कोई चीज खोजने जाते हो तो खोज का कार्य मूल से स्वतंत्र हो जाता है।ज्यों ही तुम कोई चीज खोज लेते हो तो तुरंत पलायन कर जाते हो।मैंने इसी अर्थ में कहा था कि तुम किताब को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकते।मेरे इस साक्षात्कार का भविष्य भी मैं नियंत्रित नहीं कर सकता।अभी यह टेप हो रहा है।बाद में इसे लिखोगे।पुन: लिखोगे।पुन: नए फ्रेम में डालोगे।नए संदर्भ में विकसित करोगे।फलत: मेरे वाक्य नई ध्वनि व्यक्त करने लगेंगे।यह असल में आस्था और विश्वास का मामला है।आपको अपने कहे या लिखे पर विश्वास करना होगा।
एक दार्शनिक के नाते देरि‍दा से अमेरिका में घटित 'सितम्बर 11' की घटनाओं के बारे में सवाल किए गए। ' 9/ 11 ' की भाषा के बारे में पूछा गया। उसकी परिणतियों के बारे में पूछा गया तो देरि‍दा ने कई महत्वपूर्ण पक्षों पर रोशनी डाली। देरि‍दा ने कहा कि ' 9/ 11' की घटना के बारे में जैसा कि तुमने सवाल किया है। इससे यह बात उभरती है कि इसमें तिथि का महत्व है।वही इसका नाम है। ज्यों ही तुमने 'सेप्टेम्बर इलेवन' कहा,तो पहले ही बता दिया कि अब तुम मुझसे इस घटना को याद करते हुए बात कर रहे हो।तुम्हारे सवाल में ही निहित है कि हमारे सार्वजनिक जीवन से 'डेट' और 'डेटिंग' को,पांच सप्ताह हो गए, उठा लिया गया है।(यह साक्षात्कार 22 अक्टूबर 2001 को लिया गया) ।
अब हम 'तिथि' में नहीं 'अनुभूति की तिथि' में जी रहे हैं। फ्रेंच में इसे तारीख निर्माण कहते हैं। इतिहास में दिन का निर्माण है।इसके प्रभाव को आप महसूस कर सकते हैं। यह अभूतपूर्व एकायामी घटना है। इसकी अनुभूति उतनी स्वर्त:स्फूत्त नहीं है जितनी ऊपर से लग रही है।असल में व्यापक स्तर पर इस अनुभूति का अभ्यस्त बनाया गया है। इस अनुभूति को निर्मित किया गया है। यदि यह वास्तव में निर्मिति नहीं है तब भी मीडिया के जरिए,तकनीकी-सामाजिक- राजनीतिक मशीन के जरिए इसे प्रसारित किया गया है।जिससे इस तारीख को इतिहास बनाया जा सके।इसका समूचा वर्णन संभावना और पूर्व संभावना में आ रहा है। अपरिष्कृत और कठमुल्ले रूप में आ रहा है।अथवा यह भी कह सकते हैं कि सुचिंतित,संगठित, सुनियोजित रणनीति के तहत इसका प्रचार हो रहा है।
देरि‍दा ने कहा कि ' 9/ 11' का संबंध 'अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद' की धारणा से है। जब हम ' 9 / 11 '' कहते हैं तो इस नाम और नम्बर के जरिए क्या कहना चाहते हैं हम नहीं जानते ? इस नामकरण का अविवादास्पद असर हुआ है।इस असर के बारे में हमने सोचा ही नहीं है।इस तरह के नामकरण का अर्थ क्या है ? जब हम 'सेप्टेम्बर इलेवन' कह रहे होते हैं।इसे दोहरा रहे होते हैं।जब हम पुनरावृत्ति करते हैं तो ध्यान रहे पुनरावृत्ति तटस्थ बनाती है।समापन की ओर ले जाती है।संवेदना से दूरी बनाती है।यही बात टेलीविजन प्रसारित इमेज पर भी लागू होती है। इस नाम का या किसी भी नाम का बार-बार उच्चारण अंतत: उस नाम को शक्तिहीन बनाता है।अर्थहीन बनाता है।हमें इस घटना को भाषा के परे जाकर देखना चाहिए।उस दिन भयानक घटना हुई।इसका अंत क्या होगा,हम नहीं जानते।यह हिंसा है।इसकी निन्दा करनी चाहिए।इसमें अनेक लोग मारे गए हैं।कोई नहीं मानेगा कि यही इसका अंत है।असल में यह घटना हमें कुछ कहने के लिए बाध्य करती है।
देरि‍दा ने कहा कि इस घटना का एक 'इम्प्रेशन' है दूसरा 'इंटरप्रिटेशन' है।अभी इंटरप्रिटेशन असंभव है।इसी तरह हमें ध्यान रखना होगा कि इसके बारे में 'कुछ ठोस तथ्यों' की व्यवस्था कर दी गई है।अत: हमें 'सूचनाओं' में अंतर करना चाहिए।जहां तक संभव हो हम व्याख्या करें।जिससे इस बड़ी घटना को समझा जा सके।जब देरि‍दा से कहा गया कि यह ऐसा हिंसाचार है जो विश्वयुध्द में भी नहीं देखा गया तो देरि‍दा ने कहा कि इस तरह के अनेक उदाहरण हैं।ऐसे अनेक जनसंहार हुए हैं।किंतु उन्हें दर्ज नहीं किया गया है।उनकी व्याख्या नहीं हुई है।उन्हें हम महसूस नहीं करते।उन्हें बड़ी घटना के रूप में पेश नहीं करते।इसलिए वे घटनाएं प्रभाव नहीं छोड़तीं।कम से कम सभी पर अपना प्रभाव नहीं छोड़तीं।खासकर विस्मृत न की जाने वाली विनाशलीला के रूप में प्रभाव नहीं छोड़तीं।हमें सवाल करना चाहिए कि हमारे ऊपर ये दो तरह के प्रभाव कैसे पड़ रहे हैं।एक तरफ हम इस घटना के पीड़ितों के प्रति सहानुभूति व्यक्त कर रहे हैं,दुख व्यक्त कर रहे हैं,निंदा कर रहे हैं,किंतु दूसरी तरफ हमें जनसंहारों पर कुछ भी कहने की जरूरत महसूस नहीं होती।मेरा मानना है कि हमें बगैर किसी सीमा के,बगैर किसीर् शत्त के सभी किस्म की बर्बरता,हिंसाचार की निन्दा करनी चाहिए।हमें बर्बरतापूर्ण घटनाओं के प्रति अंदर से आंतरिक प्रतिरोध व्यक्त करना चाहिए।उसकी व्याख्या करनी चाहिए।उन परिस्थितियों को बताना चाहिए कि ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं।
इसी तरह 'विश्वास' का फिनोमिना, साख एवं संबंध पर निर्भर करता है।इसी पर इसकी व्याख्या निर्भर करती है।देरि‍दा ने कहा कि ' 9 /11 ' की घटना को 'आतंकवाद के खिलाफ जंग' कहना भ्रमित करना है।(उल्लेखनीय है अमेरिका ने इसी थीम पर सारा प्रचार किया है।)हमें इस भ्रम को विश्लेषित करना चाहिए।बुश ने कहा कि यह 'युध्द' है किंतु असलियत में वह इसे परिभाषित करने में असमर्थ रहा।जबकि यह घोषित युध्द था।यह भी बार-बार कहा गया कि यह अफगानिस्तान के नागरिकों के खिलाफ जंग नहीं है।यह भी कहा गया कि अफगानिस्तान की जनता और सेना अमेरिका की शत्रु नहीं है।यह मानकर चला गया कि विन लादेन वहीं है।वह स्वायत्त रूप से फैसले लेता है।जबकि प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि वह अफगान नहीं है।उसे उसके देश ने ही ठुकरा दिया है।बहिष्कृत कर दिया है। यह भी कह सकते हैं कि उसे प्रत्येक देश और राज्य ने अस्वीकार कर दिया है।यह सच है कि उसे प्रशिक्षण अमेरिका ने ही दिया था।अत: वह अकेला नहीं है।उसे कोई भी राज्य खुले तौर पर समर्थन भी नहीं करता।जहां तक आतंकवादियों को शरण देने वाले राष्ट्रों का मामला है तो इस बारे में यही कह सकते हैं कि उनकी पहचान नहीं हो सकती। अमेरिका,यूरोप,लंदन, बर्लिन इनके अभयारण्य हैं।ये वे देश हैं जहां दुनियाभर के सभी आतंकवादियों के प्रशिक्षण,निर्माण अदि की सभी सूचनाएं उपलब्ध हैं।इनके बारे में किसी भूगोल,सीमा क्षेत्र को आधार नहीं बना सकते।आज हमें किसी देश में गड़बड़ी फैलाने के लिए भाड़े के सैनिक या आतंकवादी भेजने की जरूरत नहीं है।बल्कि सिर्फ कम्प्यूटर वायरस भेजने की जरूरत है।वायरस के प्रसार से ही उस देश की समूची अर्थव्यवस्था,सैन्य और राजनीतिक संसाधनों को नष्ट किया जा सकता है।चाहें तो किसी देश या महाद्वीप को धराशायी कर सकते हैं।आज दुनिया में आतंक,आतंकवाद और क्षेत्र का रिश्ता बदल गया है।यह संभव हुआ है तकनीकी विज्ञान के जरिए।यह तकनीकी विज्ञान ही है जो 'युध्द' और 'आतंक' के अर्थ को बदल रहा है।आज जिन लोगों ने ' 9/ 11 ' की घटना की है वे कल इससे भी भयानक घटना को अंजाम दे सकते हैं।यह कार्य वे बगैर खून-खराबे के भी कर सकते हैं।यह 'युध्द' दो राष्ट्रों के बीच भी नहीं है।यह 'सिविलवार' भी नहीं है।न यह 'पार्टीजान युध्द' है।इसका लक्ष्य कुछ भी हो।यह मुक्ति युध्द भी नहीं है।लेकिन यह सच है कि विन लादेन के नेटवर्क ने सऊदी अरब को अस्थिर कर दिया है।उसकी जगह नए राष्ट्र को प्रतिष्ठित कर दिया है।
देरि‍दा के समूचे चिन्तन की धुरी है वंचित समाज,स्त्री,काले, हाशिए के लोग, अनाथ,शरणार्थी लोग,सांस्कृतिक -सामाजिक तौर पर बेदखल कर दिए गए लोग। वंचितों की अस्मिता,शास्त्र,संस्कार और मूल्यों की चिन्ता को लेकर सारा देरीदाशास्त्र निर्मित किया गया है। आधुनिक काल में चिन्तकों में वंचितों की मुक्ति की इस कदर बेचैनी कार्ल मार्क्‍स के बाद पहलीबार देरि‍दा में दिखाई देती है।देरि‍दा की केन्द्रीय समस्या यह है कि वे वंचितों की मुक्ति चाहते हैं किंतु जनतंत्र के अंदर।वे अपने समूचे लेखन में पूंजीवादी व्यवस्था की तीखी आलोचना पेश करते हैं किंतु इसके विकल्प का सपना उनके पास नही है। घूम-फिरकर वे पुन: पूंजीवादी विकल्पों में ही वापस जाते हैं।गैर-पूंजीवादी सामाजिक विकल्प की कोई तस्वीर उनके पास नहीं है।वे एक साफ-सुथरा,दोषरहित पूंजीवाद चाहते हैं। देरि‍दा के चिन्तन की यह सबसे बड़ी सीमा है। वे मौलिक इस मायने में हैं कि चिन्तन के बन-बनाए ढांचों को यथातथ्य स्वीकार नहीं करते।सन् साठ के बाद के फ्रांसीसी समाज के परिवर्तनों को वे अभिव्यक्ति देते हैं।विखंडन का सारा तामझाम अपनी पूरी शक्ति के साथ पुन: एकबार केन्द्र में आता है।ऐसा नहीं है कि देरि‍दा विखंडन की धारणा का इस्तेमाल करने वाले पहले दार्शनिक हैं।बल्कि यों कहें तो ज्यादा सही होगा कि पूंजीवादी विकास के क्रम में सैध्दान्तिकी की भीड़ ने जो भ्रम का वातावरण बनाया था।दिशाहीनता पैदा की थी।चिन्तन के क्षेत्र में जो हताशा छायी हुई थी।सामान्य तौर पर बुध्दिजीवियों को समझ में नहीं आ रहा था कि उनके लिए कौन सा रास्ता या दृष्टिकोण सही है।
द्वितीय विश्व युध्द के बाद पूंजीवादी दार्शनिकों की साख एकसिरे से खत्म हो चुकी थी। उसमें प्राणवायु का संचार करने में अस्तित्ववाद भी असमर्थ रहा।यहां तक मार्क्‍सवाद के बारे में संदेह और प्रश्नाकुलता इसी दौर में सबसे ज्यादा मार्क्‍सवादी खेमों में पैदा हुई।द्वितीय विश्वयुध्द के समापन के समय सारा जगत गहरे वैचारिक मंथन से गुजर रहा था।सभी विचाधाराओं को बुध्दिजीवी संदेह की नजर से देख रहे थे।मार्क्‍सवाद की कतारों में भी विचलन नजर आ रहे थे। बुर्जुआ विचारधाराओं में नित नए प्रयोग हो रहे थे।युध्दोत्तर दौर की नई तकनीकी-वैज्ञानिक एवं राजनीतिक कतारबंदी ने वैचारिक उथल-पुथल को तेज कर दिया था।पूंजीवादी और मार्क्‍सवादी दोनों ही खेमों में गहरा मंथन चल रहा था।परवर्ती पूंजीवाद और समाजवाद के परिवर्तनों को लेकर नई वैचारिक रणनीति क्या हो ?इसे लेकर सभी स्कूल सक्रिय थे।यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें देरि‍दा सक्रिय होते हैं।वे सारे चिन्तन को जो स्वयं ही विखण्डित हो रहा था।एक नई विखंडन सैध्दान्तिकी देते हैं।वे सहमति के माहौल में असहमति का मंत्र लेकर आते हैं।वे ऐसे रूढिवादी माहौल में असहमति और विखंडन की बात करते हैं। जब मार्क्‍सवाद अपने को सत्य का पर्याय बना चुका था।समाजवादी व्यवस्था स्थिर हो चुकी थी।समाजवादी शिविर सामने आ चुका था।समाजवादी खेमे और मार्क्‍सवादियों की ओर से यह मान लिया गया कि जनतंत्र एक चुकी हुई व्यवस्था है। जनतंत्र का सर्वोच्च विकास समाजवादी जनतंत्र है। ऐसे में देरि‍दा का प्रवेश बेहद महत्वपूर्ण है।देरि‍दा ने मार्क्‍सवाद और पूंजीवाद के अब तक के प्रचलित सभी भावों,विचारों,विचारों,मूल्यों,नियमों, संहिताओं आदि को गंभीर चुनौती दी।यह चुनौती वे एकदम नई जमीन से देते हैं। उल्लेखनीय है कि मार्क्‍सवाद और पूंजीवाद ये दोनों ही मानवाधिकारों की बात नहीं करते। इनकी जितनी भी सिध्दान्त चर्चा है वह मानवाधिकार के दृष्टिकोण की उपेक्षा करती है।
देरि‍दा का सबसे बड़ा एकमात्र अवदान यह है कि वे युध्दोत्तर दौर में मानवाधिकारों का जो चार्टर संयुक्त राष्ट्रसंघ ने बनाया था।जिसे समाजवादी और पूंजीवादी व्यवस्था के पक्षधर मानने को तैयार नहीं थे।इस मानवाधिकार के दृष्टिकोण को अपने समूचे चिन्तन की बुनियाद बनाया।वे विखंडन के जरिए मानवाधिकारों की खोज करते हैं।जिस तरह कार्ल मार्क्‍स ने सामाजिक परिवर्तन का मंत्र बताया था। उसी परंपरा में सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में मानवाधिकारों और मानवाधिकारों के पक्ष में खड़ी सैध्दान्तिकी के रूप में देरिदा सामने आते हैं। देरि‍दा को अभी यह चिन्ता नहीं है कि क्रांति कब होगी ? समाजवादी व्यवस्था को बचाया जाए या गिराया जाए ? देरि‍दा की मूल चिन्ता यह है कि अब तक के आधुनिक विकास के क्रम में मानवाधिकारों का सारी दुनिया में विकास नहीं हुआ है। मानवाधिकारों के पक्ष में दर्शन का कोई स्कूल खड़ा नहीं है। यहां तक कि कोई दार्शनिक भी मुस्तैदी के साथ खड़ा नहीं है। देरि‍दा के दर्शन,साहित्य,भाषा,संस्कृति,जनमाध्यम, न्याय,कानून,नैतिकता, लिंगभेद, नस्लवाद विरोध, शरणार्थी समस्या,फिलिस्तीन समस्या आदि का मूलाधार मानवाधिकार का परिप्रेक्ष्य है। उनकी बुनियादी समझ यही है कि मानवाधिकारों का उनकी सर्वोच्च अवस्था तक विकास किया जाए। मानवाधिकारों की हर हालत में रक्षा की जाए।
शीतयुध्द के दौरान मानवाधिकारों के सवाल को सोवियत संघ के माक्र्सवादियों ने सीआईए का राजनीतिक प्रपंच बना दिया था।इसके चलते बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों के प्रति परिवर्तनकामी शक्तियों में गलत समझ बन गई।मानवाधिकारों की चिन्ता को बड़े कौशल के साथ देरीदा दर्शन,साहित्य,भाषा, आदि के क्षेत्र में विखण्डन के बहाने ले आते हैं।कायदे से मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में देरि‍दा को पढ़ा जाना चाहिए।मानवाधिकार और विखण्डन का गहरा संबंध है। मानवाधिकार के सवालों ने पूंजीवाद और समाजवाद के समूचे तानेबाने को अस्त-व्यस्त किया है।वही कार्य विखण्डन ने किया है।असल में विखण्डन मानवाधिकार की दार्शनिक रणनीति है।जिस तरह मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में सभी क्षेत्र में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हुई है।यही कार्य विखण्डन ने चिन्तन के क्षेत्र में किया है।विखण्डन की रणनीति गैर-राजनीतिक नहीं है।बल्कि पूरी तरह राजनीतिक है।सम-सामयिक है।मजेदार बात यह है कि जिस जमाने में मानवाधिकारों की चेतना नहीं थी।उस दौर के चिन्तन को भी देरीदा मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में खोलकर देखते हैं।मानवाधिकार की राजनीति और देरीदा और उनके अनुयायियों का गहरा रिश्ता है।आम तौर पर आलोचकों ने इस पहलू की उपेक्षा की है।देरि‍दा पूंजीवाद या समाजवाद या माक्र्सवाद की आलोचना करते समय कोई निश्चित व्यवस्था का खाका पेश नहीं करते।सिर्फ मनुष्य और उसके अधिकारों के पक्ष में जनतंत्र को सबसे बडा तत्व मानते हैं। देरि‍दा के चिन्तन के आने के बाद सारी दुनिया में समानता, जनतंत्र,अस्मिता, स्त्री अस्मिता,दलित अस्मिता,काले लोगों के अधिकार,वंचितों के अधिकार का मामला एकदम नए स्पेस में चला गया है।
उल्लेखनीय है कि देरि‍दा ऐसे समय में अपनी समस्त वैचारिक ऊर्जा के साथ दाखिल होते हैं जब सांस्कृतिक-सैध्दान्तिक चिन्तन पतन की ओर जा रहा था।इस पतन से बचने का कोई मार्ग नजर नही आ रहा था।बड़े-बड़े विचारक,आलोचक,लेखक इस संकट की अवस्था में अध्यात्म में लौट चुके थे।अथवा अपनी-अपनी सैध्दान्तिक रूढ़ियों में कैद थे। देरीदा इन सबसे मुक्ति दिलाते हैं। जब हिन्दी से लेकर अंग्रेजी तक थियरी को अप्रासंगिक ठहराया जा रहा था। जब युवाओं में मानवाधिकारों और मध्य-पूर्व के संकट और नस्लवाद पर बातें करने की बजाय अप्राकृतिक मैथुन पर ज्यादा चर्चाएं हो रही थीं।समाजवाद के प्रति आकर्षण घट रहा था।जब 'शरीर' और सिर्फ कामुक शरीर चर्चा के केन्द्र में था।ऐसे में देरीदा ने अपनी विखण्डन रणनीति के जरिए वंचितों और उपेक्षितों को सारी दुनिया में केन्द्रीय एजेण्डा बनाया।जो काम इस दौर में मार्क्‍सवाद नहीं कर पाया उसे देरि‍दा के चिन्तन ने कर दिखाया।जिस समय आलोचना के नाम पर साहित्य में कचरा जमा हो रहा था।आलोचना रूढियों के मार्ग पर चली गई थी।छात्रों,शिक्षकों,आलोचकों और विचारकों के पास कोई प्रेरक व्यक्तित्व नहीं था।ऐसे में देरीदा ने प्रेरक के रूप में सारी दुनिया के बौध्दिक विमर्श को नई बुलंदियों तक पहुँचाया।देरि‍दा ऐसे दौर में दाखिल होते हैं जब बौध्दिकों को भविष्य को देखने के औजार नहीं मिल रहे थे।देरीदा के चिन्तन की केन्द्रीय उपलब्धि यह है कि वह बुध्दिजीवियों को सभी किस्म के रूढिगत चिन्तन से मुक्त करता है।भविष्य में आस्था पैदा करता है।भावी सपनों को आलोचनात्मक विवेक की रणनीति के जरिए खोलता है। देरीदा को पढ़ना एक राजनीतिक अभ्यास भी है।
सवाल पैदा होता है कि विखंडन में बुनियादी चीज क्या है ?इसमें दो बुनियादी चीजें हैं।पहला,देरीदा ने 'वायनरी अपोजीशन' में जो संबंध होते हैं।उन्हें विखंडन की रणनीति के तहत उलट दिया है।वह वायनरी अपोजीशन के उलट का मसीहा है।इसी के आधार पर उसने सोचने की दिशा को बदला है।मसलन् वायनरी अपोजीशन में मर्द / औरत, अच्छा /बुरा, वाक् / लेखन आदि के जो प्रचलित संबंध थे।उन्हें उलट दिया।मसलन् मर्द और औरत के संबंध में मर्द केन्द्र में था। किंतु देरीदा ने स्त्री को केन्द्र में स्थापित कर दिया।अच्छे और बुरे में अच्छा केन्द्र में था उसकी जगह बुरे को बिठा दिया।वाक् केन्द्र में था उसकी जगह लेखन को रख दिया।वायनरी अपोजीशन में यह उलट सारी दुनिया के लिए वरदान साबित हुआ है।यहां तक कि अब वे भी इस रणनीति का पालन कर रहे हैं जो कभी इसकी निन्दा करते थे।
विखंडन की रणनीति का दूसरा बड़ा अवदान यह है कि उसने समस्त भेदों को अस्थिर कर दिया है।विखंडन रीडिंग का दार्शनिक अस्त्र है यह अन्य के पाठ की व्याख्या का औजार है।इस औजार का विकास जनतंत्र में ही संभव है।जनतंत्र में ही अन्य की मुक्ति संभव है।जनतंत्र की धुरी है समानता और समानता पर आधारित न्याय का शासन।निष्पक्ष न्यायपालिका और न्याय के बिना जनतंत्र का काम करना संभव नहीं है।इस तथ्य को देरि‍दा ने बार-बार अपने कानून और न्याय संबंधी व्याख्यानों और लेखों में रेखांकित किया है।अपने पहले कानून-संबंधी व्याख्यान 'विफोर द लॉ' में देरि‍दा ने कानून के सामान्य और विशिष्ट अर्थ की विस्तार से व्याख्या करते हुए कहा कि आज कानून बेहद महत्वपूर्ण हो उठा है। न्यायाधिकारी की महत्ता बढ़ी है।वे कभी-कभी राजनीतिज्ञों द्वारा सत्ता के दुरूपयोग को रोकते हैं। जनतंत्र के स्वस्थ विकास के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका का होना बेहद जरूरी है। स्वतंत्र न्यायपालिका हो यह जनतंत्र के लिए भी परीक्षा की घड़ी है।जो दार्शनिक एथिक्स और राजनीति में रूचि लेते हैं उन्हें कानून पर लौटना ही होगा।यदि जनतंत्र सही मायने में ग्लोबल बनता है तो दार्शनिक,कानून और न्याय से भाग नहीं सकते।उल्लेखनीय है कि देरि‍दा ने कानून की औपचारिक पढ़ाई नहीं की थी।किंतु कानून के सवालों पर उनकी दार्शनिक मीमांसा को सारी दुनिया के कानूनविदों में वही सम्मान और शोहरत मिली जो साहित्य या दर्शन में मिली।सामान्य तौर पर कानून पढ़ने की जरूरत उन्हें तब पड़ी जब वे एकबार लेखक के अधिकारों और कापीराइट के मसले पर कानूनी नुक्तों का अध्ययन करने के लिए मुखातिब हुए।उन्होंने साहित्य के संदर्भ में ही सबसे पहले कानून का अध्ययन आरंभ किया।लेखक के अधिकारों और कापीराइट के सवाल पर अंग्रेजी और फ्रांसीसी कानून में वर्णित प्रावधानों का अध्ययन करने के बाद येल में एक सेमीनार में पर्चा पढ़ा।देरि‍दा ने कानून संबधी लेखन में केन्द्रीय रूप में जिस बात को आधार बनाया है वह है एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के प्रति दायित्व।इसी के आधार पर उन्होंने सीक्रेट, टेस्टीमॉनी,होस्पीटेलिटी, फोरगिवनेस आदि विषयों पर व्याख्यान दिए।
देरि‍दा के चिन्तन की बुनियादी धुरी है कि कुछ भी अंतिम नहीं है।कोई चीज अपने अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँची है।सब कुछ बदल सकता है।सब चीजों,विचारों,मूल्यों,तकनीकी आदि को उलट- पुलटकर देखा जाना चाहिए। वस्तुओं,विचार,मूल्य,मान्यता आदि के प्रति देवत्वभाव से मुक्त होकर आलोचनात्मक नजरिए से देखा जाना चाहिए।विश्लेषण,व्याख्या, और परिवर्तन से परे कुछ भी नहीं है।यहां तक कि हमारी आस्थाएं और विश्वास भी विश्लेषण के दायरे में आते हैं।वे भी बदल सकते हैं।बदल रहे हैं।कोई चीज अंतिम नहीं है।यही वह प्रस्थान बिंदु है जो मानव सभ्यता के विकास के अनंत पथ खोलता है।इसी अर्थ में देरि‍दा और उनके अनुयायियों की पहल बढ़ी है।वे ज्यादा प्रासंगिक सवाल उठा रहे हैं। प्रश्नाकुलता पैदा कर रहे हैं।असहमति का शास्त्र रच रहे हैं। सहमति की दुनिया में असहमति का शास्त्र विकास का लक्षण है,पतन कर नहीं।इसी अर्थ में विखण्डन एक सकारात्मक रणनीति है। यह खोए हुए यथार्थ,पराए लोगों,वंचित लोगों और जनतंत्रप्रेमी जनता का अस्त्र है।
हमारे देश में कुछ लोग चाहते हैं कि एकायामी हिन्दुत्ववादी शिक्षा दी जाए।इस तरह की शिक्षा का देरीदा ने अपने देश में भी विरोध किया था।वहां पर भी कुछ लोग ऐसी शिक्षा के पक्ष में थे कि जो एकायामी हो,विविधता की विरोधी हो।जिसमें बहुलतावाद,विज्ञान, धार्मिक विविधता आदि की कोई जगह न हो।इस तरह की शिक्षा को देरीदा ने 'प्रभुत्ववादी केन्द्रीयता' की संज्ञा दी।
देरि‍दा नहीं चाहते थे कि सारी दुनिया का एकीकरण हो जाए।एक ही केन्द्र के इर्द-गिर्द सारे देश जमा हों।'नई विश्व व्यवस्था' के बारे में जो तर्क दिए गए उन्हें यूरोप की सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में खोलते हुए देरीदा ने लिखा कि यह दुधारी तलवार है। यूरोप की सांस्कृतिक अस्मिता को आप नई विश्व व्यवस्था के नाम पर रफा-दफा नहीं कर सकते। जब मैं कहता हूँ कि किसी भी तरह नहीं,तो इसके दो अर्थ हैं,पहला ऐसा करना हार्दिक तौर पर मुश्किल है।दूसरी बात यह कि हम किसी केन्द्रीय ऑथरिटी की पूंजी स्वीकार नहीं कर सकते।खासकर ऐसी पूंजी जो नियंत्रित करे और स्टैण्डर्डाइज करे।स्थान के आधार पर लोगों की चेतना का निर्माण बहुत सहज है।उस चेतना की बिक्री सहज कार्य है।इस तरह का सामान्यीकरण किसी भी जगह सब समय सांस्कृतिक पूंजी बनाता है।यही कार्य वर्चस्ववादी केन्द्र भी करता है।ब्रूनर ने लिखा था कि आत्म या निज को अन्य के संदर्भ में परिभाषित करो।'देरि‍दा ने भी कहा कि ''अस्मिता में वस्तुत:अन्य भी होता है।'' ''यह कह सकते हैं, आंतरिक और बाह्य तौर पर अस्मिता के सभी रूपों के निर्धारण में कम से कम कोई आत्म संबंध नहीं होता।स्वयं से कोई संबंध नहीं होता।आप स्वयं के आधार पर कोई पहचान नहीं बनाते।संस्कृति के बगैर अस्मिता की पहचान संभव नहीं है और संस्कृति स्वयं में अन्य की संस्कृति होती है।संस्कृति में दुहरा रूप छिपा होता है।वह स्वयं से फ़र्क खत्म करती है।'' इसका अर्थ यह है कि बौध्दिक क्षमता बढ़ाने के लिए अन्यत्व, बहुस्तरीयता और अन्तर्विरोधी स्वरों भी को शामिल किया जाए।जिससे भाषा को आलोचनात्मक अभिव्यक्ति मिले। इन स्वरों के बहिष्कार का अर्थ है कि शिक्षा का तटस्थीकरण।इसका अर्थ यह भी है कि राजनीतिक तौर पर हम यह फैसला लेने जा रहे हैं कि हमें शिक्षित नहीं करना है। देरि‍दा ने भिन्नता और अन्यत्व की अभिव्यक्ति को स्वीकार किया है।'नई विश्व व्यवस्था' की आलोचना करते हुए लिखा कि ''आज हमारे सामने बहुस्तरीय वैविध्य के प्रति दोहरी जिम्मेदारी है।''देरि‍दा ने लिखा कि इसके कई बिन्दु हैं जिन्हें ध्यान रखें।संक्षेप में देरीदा की बातों को निम्नलिखित रूप में समझ सकते हैं।
1.यह जरूरी है कि परंपरा को याद करें।साथ ही 'भिन्नता' के प्रति खुले रहें।
2.यह जरूरी है कि 'विदेशियों' का स्वागत करें।उन्हें अपने अंदर समाहित करने के लिए नहीं।बल्कि उन्हें मानें,स्वीकार करें,सम्मान दें।
3.यह जरूरी है कि सर्वसत्तावादी कठमुल्लावाद की सिध्दान्त और व्यवहार में आलोचना करें। साथ ही धर्म की पूंजी को जिसे कठमुल्ले पैदा कर रहे हैं,जो नए रूप में आ रही है,उससे सीखें और रेखांकित करें।उसकी आलोचना करें।
4.यह जरूरी है कि आलोचनात्मक विचारों और आलोचनात्मक परंपरा पैदा करें।उसे विखंडन की रणनीति के हवाले करें।उसे आलोचक और सवालों के परे ले जाएं।
5.यह जरूरी है कि हम मानकर चलें कि यूरोपीय परंपरा में लोकतंत्र का विचार एक विलक्षण विचार है।यह भी मानकर चलें कि इस विचार को कभी छोड़ा नहीं गया।यह भी कह सकते हैं कि इस पर कभी -कभी यह विचार किया गया कि यह जरूर लागू होगा।
6.यह जरूरी है कि भिन्नता,इडियम,अल्पसंख्यकों,विश्ष्टिता,कानून का सार्वभौमत्व,समझौते और असहमति की इच्छा व्यक्त करें।साथ ही बहुसंख्यकों के कानून का विरोध करें।नस्लवाद का विरोध करें।राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी उन्माद का विरोध करें।
7.सहिष्णु बनें।सम्मान करें।ये सभी बातें तर्क के शासन में नहीं आतीं।ये आस्था के भिन्न रूप हैं।साथ ही यदि तर्क के बारे में लगातार सोचें ,तर्क के इतिहास के बारे में सोचें,अनिवार्यत: उसकी व्याख्या का उल्लंघन करें। अतार्किक हुए वगैर अज्ञान की सीमा को जानें।
8.दुहरी जिम्मेदारी का अर्थ है जिम्मेदारी।''यानी सोचने,बोलने और लागू करने की जिम्मेदारी।''समुचित परिस्थितियों और दोहरे अन्तर्विरोधों के स्तर पर उन सभी का सम्मान करते हुए यह काम उन्हें भी सम्मानित करते हुए करें जो किसी भी किस्म की जिम्मेदारी नहीं निभाते।
देरीदा का सबसे चर्चित अवदान विखंडन है इसके विखंडन के मूल बिन्दु इस प्रकार हैं-
1.यह पाठ की रणनीति है।इसका उपयोग मूल्य है।इसका उत्तर व्युत्पत्तिशास्त्र में छिपा है।यह किसी भी किस्म की संदर्भगत रणनीति के बाहर है।
2.विखंडन साहित्य और दर्शन के पाठ पर निर्भर है।उसकी क्षमता है नए पाठ और नए पाठक को आत्मसात् करने की।विखंडन को 'पध्दति' में संकुचित नहीं किया जा सकता।यह खोज है।विश्लेषण है।नए तनावों की खोज है।पाठ में अन्तर्निहित अस्थिरता की खोज है।वह सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है।बल्कि पाठ में निहित चीजों को उभारने,सामने लाने,उजागर करने,उन पर बल देने का नाम है।यह स्वयं और अन्य की खोज भी है।
3.विखंडन चीजों की तय प्राथमिकताओं के बारे में सवाल खड़े करता है।खासकर मूल,स्वाभाविक अथवा जो स्व-प्रमाणित है उसके प्रति सवाल खड़े करता है।कौन से मुख्य पदबंध हैं।मंशाएं हैं।चरित्र हैं।उन्हें पाठ के अंदर वायनरी अपोजीशन या युग्मी-युक्ति के रूप में परिभाषित करना।अपोजीशन कैसे क्रमानुवर्ती है ? यह अपोजीशन अस्थिर है।इसके संबंध को बदला जा सकता है।यह एक-दूसरे पर निर्भर है,अन्य पर निर्भर है।यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि पाठ कैसे उलटता है।लेखक की मंशा से परे चला जाता है।अतिक्रमण कर जाता है।
4.आज के साहित्यिक परिदृश्य में विखंडनात्मक रीडिंग व्यापक तौर पर व्याख्यात्मक रणनीति का हिस्सा है।इसका बार-बार हायरार्कीकल अपोजीशन को अस्थिर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।(जैसे मर्द/ औरत, अभिजन/ पापुलर कल्चर, आदि)।देरीदा ने विखंडन को अपना केन्द्रीय कार्य कभी नहीं माना।यही वजह है कि उसने इसे एक व्यवस्था,आंदोलन या स्कूल बनाने की कोशिश नहीं की।अभी तक हमारी जानकारी में कहीं 'डिकंस्ट्रक्टनिज्म' पदबंध का प्रयोग सामने नहीं आया है।हिन्दी में सिर्फ गोपीचंद नारंग ने इसे विरचनावाद कहा है।जो गलत है।उन्होंने ही इसे 'वाद' बनाया है।
5.यह भी भूल होगी कि हम विखंडन को उत्तर-संरचनावाद का पर्याय बना दें।या उस रूप में समझें।उत्तर -संरचनावाद दर्शन है।इससे देरि‍दा जुड़े रहे हैं।जबकि इस कार्य के अंदर विखंडन एक पदबंध है।
देरि‍दा पर जब भी चर्चा होती है तो हाइडेगर और नीत्शे का जिक्र जरूर आता है।इस संदर्भ में यह तथ्य ध्यान रहे कि देरि‍दा ने इनके सकारात्मक तत्वों को आत्मसात् किया था।इनका अंधानुकरण नहीं किया था।इन दोनों के परिप्रेक्ष्य से भिन्न परिप्रेक्ष्य में देरीदा सोचते थे।इन दोनों से भिन्न देरीदा की समसामयिक राजनीतिक सवालों पर राय थी।
देरि‍दा के विखंडन की मुश्किल यह है कि वह अकल्पनीय मुश्किलों से ग्रस्त है।मसलन् जब भी कोई व्यक्ति बोलता है तो तर्क की भाषा में बोलता है।ऐसे में विखंडन की रणनीति के तहत ऐसे व्यक्ति के वक्तव्य में हमें उन छिपे हुए क्षेत्रों की खोज करनी चाहिए जो तयशुदा अर्थ से भिन्न है।तर्क के नियमों से परे हैं।यहीं पर दुहरा खेल शुरू होता है।यह उभयभाविता की मांग करता है।दर्शन की भाषा में इसे दुरंगापन कहते हैं।
हाइडेगर के लिए दर्शन का अंत मेटाफिजिक्स में निहित था।हाइडेगर का मानना था कि अनुभवनिरपेक्ष के बारे में सवाल करना अर्थहीन है।वह मानता था कि दर्शन का अंत हो चुका है।दर्शन और कुछ नहीं पश्चिमी विचारधारा है।जो स्वयं सुपीरियर मानती है।देरि‍दा ने हाइडेगर के तर्कों से भिन्न बात कही है।देरि‍दा मानता है कि अनुभवनिरपेक्षता के सवालों से आप बच नहीं सकते।विचारधारा के खिलाफ जो आरोप लगाए गए हैं यदि वे सच हैं तो ये आरोप तो दर्शन की भाषा के प्रति हुए।कायदे से पूछा जाना चाहिए कि क्या प्रभुत्वशाली विचारधारा को किसी अन्य विचारधारा ने अपदस्थ किया है।जैसे मार्क्‍सवाद,फ्रायडवाद वगैरह ने।देरि‍दा ने कहा कि मैं तर्क करना चाहता हूँ कि तर्क पुराना या रूढ़ हो गया है।वह स्वयं को ही अपील करता है।वह जिसका विरोध करता है उसके खिलाफ स्वयं को ही अपील करता है।अपने क्षेत्र को ही सम्बोधित करता है।इसी अर्थ देरि‍दा ने कहा कि तर्क रूढ़ हो गया है।अप्रासंगिक हो गया है।
देरि‍दा ने हाइडेगर की इतिहास को लेकर जो समझ है उसे लेकर कोई झगड़ा नहीं किया।मसलन् जब हाइडेगर कहता है कि दर्शन के इतिहास का अंत हो गया तो देरि‍दा सवाल उठाता है कि ऐसा क्या हुआ है कि अंत हो गया ?अपने समूचे चिन्तन में देरि‍दा ने जो रणनीति चुनी है वह दुरंगी है।वह दुहरा खेल खेलती है।वह तर्क की भाषा के जरिए सक्रिय होती है।चूँकि अन्य कोई भाषा नहीं है।वह ऐसे क्षेत्र में भी जाती है जहां समस्याओं के कोई उत्तर नहीं हैं।वह तार्किक स्थितियों के अन्तर्विरोधों को दिखाती है।देरि‍दा इस रणनीति को ही विखंडन कहता है।हाइडेगर के यहां यह 'विध्वंस' है।हाइडेगर के लिए 'डिस्ट्रक्शन' या विध्वंस 'इतिहास के इतिहास' की जांच या खोज है।इसमें वर्तमान की नकारात्मक व्याख्या शामिल है।हाइडेगर मानता है कि व्यक्ति इस संसार में अकेला है।वह साधारण जिन्दगी जीता है।साधारण जिन्दगी जीते हुए वह संसार सागर से मुक्त नहीं हो पाता बल्कि उलटे फंसता चला जाता है।ऐसे में दुखी होकर मोक्ष की कामना करने लगता है।इस क्रम मे वह संसार सागर की व्याख्या करता है।विरासत में प्राप्त परंपरा की व्याख्या करता है।निरंतर मृत्यु की कामना करता है।मृत्यु के भय में जीता है।इस क्रम में वर्तमान की नकारात्मक और इतिहास की सकारात्मक व्याख्या करते हुए प्रामाणिकता हासिल करता है।वह कठिन सवालों को उठाता है।जिससे वह अपनी ऑथरिटी को मनवा सके।इसके लिए वह जगत की टुकड़ों में व्याख्या करता है।उसे इतिहास में खोजता है।हाइडेगर का मानना था कि अस्तित्व के अंतर्य को समझने के लिए जरूरी है कि मनुष्य सभी किस्म की व्यावहारिक मान्यताओं को त्याग दे।अपनी नश्वरता,क्षणभंगुरता को पहचाने।सतत रूप से मृत्यु के आमने-सामने होने की अनुभूति से ही मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षण की अर्थवत्ता तथा भरपूरता को देखने की स्थिति में होता है और अपने को लक्ष्यों,आदर्शों और वैज्ञानिक अपकर्षणों से मुक्त कर सकता है।
देरि‍दा के यहां एक अन्य धारणा है भिन्नता ।वे इसे भेद से अलग करते हैं।उनके यहां भिन्नता और भेद दो अलग-अलग धारणाएं हैं।भिन्नता यानी अस्मिता का पृथक् रूप।भेद यानी समय का पृथक रूप।इस धारणा पर देरीदा हुसेर्ल को पढ़ते हुए पहुँचे।खासकर 'फिनोमिनोलॉजी ऑफ हिस्ट्री' के विखंडन के जरिए पहुँचे।देरीदा ने कहा कि यह हमारे सारे सवालों का उत्तर देता है।यह बताता है कि सत्य को कैसे पाया जा सकता है।यदि सत्य को सत्य बनना है तो उसे रूढ़ बनना होगा।परमत्व को प्राप्त करना होगा।उसे सभी किस्म के नजरिए से स्वतंत्र करना होगा।फिनोमिनोलॉजी सत्य के उदय की खोज करती है। फिनोमिनोजिस्ट तर्क देते हैं कि सिर्फ वर्तमान ही मौजूद है।वर्तमान में अतीत का रहना एक तरह से सभ्यता की अनुपस्थिति का सूचक है।भविष्य का आप अनुमान लगा सकते हैं किंतु यह कार्य वर्तमान में रहकर ही संभव है।अतीत को वर्तमान में बचाए रखने के लिए जरूरी है कि भविष्य की भी वर्तमान में भविष्यवाणी की जाए।वर्तमान को सिर्फ वर्तमान में नहीं होना चाहिए बल्कि वर्तमान ऐसा होना चाहिए जो अभी आना बाकी है।साथ ही वर्तमान ऐसा जो अतीत हो चुका है।यही वह बिन्दु है जहां 'डिफरेंस' की धारणा में देरीदा दाखिल होते हैं।वह कहते हैं कि वर्तमान की स्वयं के साथ एकरूपता नहीं है।यह भिन्नता ही आरंभिक तथ्य की समस्या को सामने लाती है।मान लीजिए हमने किसी आरंभिक तथ्य के जरिए किसी घटना के आरंभ की खोज की ऐसी अवस्था में हम यह कैसे कह सकते हैं कि इसके निर्माताओं के दिमाग में यही अर्थ था।हम अपने अर्थ को उनके अर्थ के बराबर नहीं रख सकते।यदि हम 'फिनोमिनोलॉजी' बनाते हैं तो हमें हुर्सेल के 'सिध्दान्त का सिध्दान्त' की धारणा का इस्तेमाल करना होगा।सिध्दान्त यह है कि इतिहास अर्थपूर्ण रहा है।किंतु भ्रमित करनेवाला रहा है।उसे बताने के लिए किसी की जरूरत है।उसे पीढ़ी-दर पीढ़ी संचारित कर सकते हैं।उसमें कई स्वर हैं।उसे किसी भी समय लिपिबध्द नहीं किया गया।व्यक्ति और अर्थ एक नहीं हो सकता।अर्थ हमेशा भिन्न होता है। सही क्या है ? और तथ्य क्या है ?ये दोनों एक नहीं हैं।इसका कारण यह है कि तथ्य और सही में सामान्य फर्क होता है।इसी तरह देरीदा कहते हैं कि प्रथम तो प्रथम है,वह प्रथम इसलिए है क्योंकि उसके पीछे द्वितीय है।प्रथम को आप अकेले नहीं पहचानते बल्कि प्रथम के लिए द्वितीय का होना जरूरी है।पूर्वर् शत्त है।दूसरे को मानने का अर्थ है तीसरे का आना।इसी अर्थ में ओरिजन एक तरह का पूर्वाभ्यास है।पुनरावृत्ति का पूर्वाभ्यास है।मौलिक की नकल है।

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