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शुक्रवार, 8 मई 2015

न्याय का अन्यायमुख


            कानून के खिलाफ बोलना या न्याय का विरोध करना अपने आपमें जोखिम का काम है,  आमतौर पर भारत में जो कानून के जानकार या विशेषज्ञ हैं वे कानून के दार्शनिक-वैचारिक पहलुओं पर कम  बोलते हैं । सामान्य तौर पर पूंजीवादी समाज में कानून के पास फरियाद लेकर जाओ तब कानून हस्तक्षेप करता है, अपनी पहल पर वह कभी हस्तक्षेप नहीं करता। इससे यह भी पता चलता है कि कानून में निजी पहलकदमी का अभाव है। कानून की धुरी न्याय नहीं है, बल्कि युक्तियां और फैसले हैं,न्याय की परंपरा है, फैसलों की परंपरा है।फलतःकानून किताबों और दलीलों का विशाल जंजाल है।
      न्यायालयों में वही नियम लागू होता है जो समाज में लागू होता है। समाज  जिस तरह बल प्रयोग के आधार पर चलता है, वैसे ही बल के आधार पर लोकतंत्र भी चलता है,उसी तरह न्यायालयों में भी बल के आधार पर ही फैसले होते हैं।  अदालत के अंदर बली होने के लिए जरुरी है कि आप जमकर पैसा फेंकें और अदालत में बल का प्रदर्शन करें। बड़े से बड़े वकील को खड़ा करें। बड़े वकील का मतलब ज्यादा फीस और मुकदमा लड़ने वाले की ताकत । इसीलिए यह कहते हैं कि कानून का समूचा दारोमदार न्यायिक बल -संतुलन पर टिका है। जिस तरह हिंसा में बल की भूमिका होती है ,उसी तरह कानून में भी बल की भूमिका होती है।
     कहने के लिए लोकतंत्र आम आदमी के ऊपर टिका है लेकिन वस्तुगत तौर पर देखें तो लोकतंत्र सामाजिक-आर्थिक शक्ति संतुलन पर टिका है। लोकतंत्र में वही सफल है जो अपने पक्ष में सामाजिक-आर्थिक शक्ति संतुलन एकत्रित करने में सफल हो जाता है। मसलन् नरेन्द्र मोदी की जीत के पीछे मात्र 31फीसदी वोटरों की भूमिका है 69फीसदी वोटर उनके खिलाफ हैं ,लेकिन आर्थिक शक्तियों का संतुलन वे अपने पक्ष में लामबंद करने में सफल हो गए और पीएम बन गए।

      समग्रता में अदालतों में वही सफल होता है जिसके पास ताकत है,संसाधनों की शक्ति है। न्याय के आधार पर अदालतों में फैसले नहीं होते, अदालतों में फैसले तो न्यायबल के आधार पर होते हैं, न्यायबल में महत्वपूर्ण न्याय नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण है 'बल' । पूंजीवादी न्याय में असमानता अन्तर्निहत है, वह सतह पर समानता का लाख जयगान करे लेकिन व्यवहार में वह असमानता को ही तरजीह देता है। असमानता का आचरण करता है। यह असमान व्यवहार चौतरफा सहज ही देख सकते हैं। भारतीय न्याय प्रणाली की मूलभूत अनुभवजन्य विशेषता है कि कानून स्वयं जिन बातों का दावा करता है उन बातों का पालन नहीं करता। मसलन् कानू यह दावा करता है कि वह करप्ट नहीं है लेकिन यह पाया गया कि भारत के सुप्रीमकोर्ट के 9 में से 7मुख्यन्यायाधीश करप्ट थे जिनके बारे में प्रसिद्ध कानूनविद शांतिभूषण ने सीधे आरोप लगाया था। कानून में करप्शन का स्रोत है नियमहीनता का सिद्धांत। मसलन्, न्यायालयों में वकीलों की फीस का कोई नियम नहीं है, वकील लोग मनमानी फीस लेते हैं,सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अलत तक हमें करप्शन के दर्शन सहज ही मिल जाएंगे। अदालत से यह तो पूछा ही जाना चाहिए कि वकीलों की फीस का मानक क्यों नहीं बनाया गया ? क्यों किसी वकील की फीस करोडों में होती है और किसी की हजारों में होती है ? क्या न्यायालय को पता नहीं है कि आम आदमी की आमदनी कितनी है ? सारी दुनिया को ईमानदारी,नियम,पारदर्शिता का उपदेश देने वाली न्यायपालिका में इतनी अंधेरगर्दी क्यों है ? प्रमाण और फैसलों के जंजाल में न्याय पाना आज सबसे मुश्किल काम है। कानून की किताबें सहज,सरल और छोटी क्यों नहीं होती ?       

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

गुड फ़्राइडे पर अ-न्याय खेल



गुड फ़्राइडे हो या दीपावली  ये हमारे सद्भाव के पर्व हैं। दुखद है कि अब निहित स्वार्थी ताक़तें इन त्यौहारों पर भी राजनीति की रोटियाँ सेंकने से बाज़ नहीं आ रही हैं। हमें संस्थागत हित बनाम व्यक्तिगत हित का सवाल उठाते समय यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि संस्थान के हित कभी उसमें काम करने वालों के हितों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। संयोग की बात है कि संस्थान के हित को लोकतांत्रिक हक़ों से ऊपर तरजीह देने की बात कही जा रही है। यह भाषा सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्याधीश ने कही है , इसके पहले कभी गुडफ्राइडे या दीपावली के दिन जजों कीकोई सरकारी कॉंफ़्रेंस नहीं रखी गयी। 
  सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायाधीश का तर्क है कि संस्थान के कर्तव्य प्रधान हैं और निजी चीज़ें गौण हैं तो इस तर्क के भयानक अ-लोकतांत्रिक परिणाम हो सकते हैं।
       धर्म हमारी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का हिस्सा है। वह सरकारी तौर -तरीक़ों और मान्यताओं से नियमित नहीं होता। जजों के सम्मेलन  की तिथि तय करते समय तिथि की धार्मिक महत्ता का ख़्याल रखना चाहिए। सवाल यह है कि जजों का यह सम्मेलन अन्य किसी दिन क्यों नहीं रखा गया ? क्या ३६५ दिन में यही एक दिन ख़ाली बचा था ? यदि ऐसा है तो हमें गंभीरता से हिसाब माँगना होगा कि हमारे जज सारे साल क्या करते हैं? कितने दिन अवकाश पर रहते हैं ? 
      उल्लेखनीय है जजों की समाज के प्रति ज़िम्मेदारी जितनी महत्वपूर्ण है उसका वे यदि ईमानदारी के साथ पालन कर रहे होते तो न्याय प्रणाली में इतनी सडांध न होती ! न्यायपालिका आज राजनीति से ज़्यादा भ्रष्ट हो चुकी है, ऐसे में जजों का हठात् गुडफ्राइडे के दिन सम्मेलन हमें तो किसी अन्य मंशा की भनक दे रहा है। क्या अब आने वाले समय में न्यायपालिका भी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की दिशा में जाने वाली है  ? 
         न्यायपालिका में न्याय कम और ग़ैर- न्याय ज़्यादा व्यक्त होता रहा है। ऐसे में न्यायपालिका को और भी ज़्यादा लोकतांत्रिक बनाने की ज़रूरत है। जजों को लोकतांत्रिक बनाने की ज़रूरत है। वह न्याय किसी काम का नहीं जो लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान न करे। हमारी न्यायप्रणाली में न्याय और लोकतंत्र के अन्तस्संबंध पर ज़ोर कम रहा है। वहाँ तो न्यायप्रणाली और न्याय के संतुलन पर ही ज़ोर रहा है, इससे भारत का आम आदमी लाभान्वित नहीं हुआ है। यह असल में " न्याय के लिए न्याय " की प्रणाली है। जिसमें न्याय कम और न्याय के नाम पर उत्पीड़न और पैसे की विभिन्न स्तरों पर लूट बहुत होती है। 
     " गुड फ़्राइडे" पर जजों की कॉंफ़्रेंस न होती तो न्यायप्रणाली छोटी नहीं हो जाती! जिन लोगों ने यह फ़ैसला लिया उन्होंने अपने राजनीतिक स्वार्थों का ख़्याल रखा  । इससे न्याय की मर्यादा सम्मानित नहीं होती। उलटे इससे  न्यायप्रणाली में निहित राजनीतिक स्वार्थ की मनोदशा व्यक्त हुई है। 

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         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...