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गुरुवार, 22 जनवरी 2015

जयपुर-बड़ौदा के साहित्य- कला उत्सव और वामलेखक संगठनों की चुनौतियाँ



   जयपुर साहित्य मेला आरंभ हो गया है और बड़ौदा का कला - संगीत उत्सव आरंभ होने वाला है। इन दोनों आयोजनों से भाजपा की राज्य सरकारें जुड़ी हैं। भारत के वामलेखकों को इस तरह के आयोजनों को ध्यान से देखना और सीखना चाहिए । वामलेखकों के संगठनों जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ और अन्य सांस्कृतिक संगठनों को भी इस तरह के आयोजनों के बारे में गंभीरता से लेखकों में संवाद चलाने की ज़रुरत है। इस तरह के आयोजन स्वागतयोग्य हैं। इस तरह के आयोजन जहाँ एक ओर साहित्य और कलाओं को लोकप्रिय बनाते हैं , वहीं मध्यवर्गीय युवाओं में साहित्य और कलाओं के प्रति नयी उमंग और कला संस्कार पैदा करने में मदद करते हैं। हमारे वाम लेखक संगठनों के आयोजन बंद दायरों में कैद होकर रह गए हैं और वे युवाओं के बृहत्तर तबक़ों और मीडिया को आकर्षित नहीं कर पाते हैं। वे गिनतीभर लोगों के आयोजनमात्र होकर रह गए हैं। 
       नए दौर की माँग है कि साहित्य और कलाओं को आम जनता के बृहत्तर मध्यवर्गीय युवा समूहों से जोड़ा जाय। साहित्य और कलाओं को सैलीब्रिटी बनाकर यह काम किया जा रहा है। इसमें साहित्य और कला के संस्कार या आदतों के निर्माण पर मुख्य रुप से ज़ोर दिया जा रहा है। हमारे वाम लेखक संगठनों के साहित्यिक आयोजनों को विचारधारात्मक मूल्याँकन  या वैचारिक मुठभेड़ के मंच के रुप में विकसित किया और इसका यह परिणाम निकला है कि साहित्य का दायरा सिकुड़कर चंद लेखकों तक सीमित होकर रह गया है। वामलेखक संगठनों की दूसरी मुश्किल यह रही है कि वे वाम राजनीति के पूरक के तौर पर काम करते रहे हैं इसने साहित्य के दायरे का विस्तार नहीं किया। बल्कि उलटे साहित्य और साहित्यकार तयशुदा समूहों में सीमित होकर रह गया , फलत:  हिन्दी की साहित्यिक किताबों का सर्कुलेशन गिरा और पाठकों की संख्या कम हुई। जयपुर साहित्य मेला में निरंतर पाठकों और श्रोताओं की संख्या बढ रही है, साहित्य की बिक्री भी बढ रही है। हम सोचें कि इस तरह का रेस्पांस किसी भी वाम लेखक संगठन के साहित्य सम्मेलन को क्यों नही मिला ? 
                   जयपुर-बड़ौदा जैसे उत्सवों का लक्ष्य है कलात्मक कम्युनिकेशन के जरिए कलाओं के आस्वाद और संस्कार पैदा करना। यह काम वे विशुद्ध रुप से पापुलर कल्चर प्रमोशन के फ़्रेमवर्क में कर रहे हैं। पापुलर कल्चर प्रमोशन का फ़्रेमवर्क मूलत: दर्शक को विभिन्न रणनीतियों , विज्ञापन,व्यापक प्रचार और मीडिया कवरेज के जरिए आकर्षित करता है। यह नायकों का संगम है,इसका लक्ष्य है मित्रभाव से कलात्मक इच्छाओं को जगाना। इस तरह के आयोजनों में प्रिफार्मेंस पर ज़ोर है। जो लेखक प्रिफार्म कर रहा है , वह चमक रहा है , जो चमक रहा है वह मीडिया में दिख रहा है,साहित्यकार और कलाकार इस तरह के आयोजनों में अपने बयानों और प्रस्तुतियों के जरिए कम्युनिकेट करते हैं और दर्शक के भावबोध को विभिन्न तरीक़ों से स्पर्श करने की कोशिश करते हैं। इससे कला, कलाकार और पाठकों के बीच टूटे संबंध और संपर्क को जोड़ने में मदद मिलती है। कलाएँ अनजान पाठकों से जुड़ती हैं। यह साहित्य और कलाओं के लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया भी है। इस तरह के आयोजनों में कारपोरेट घरानों का जुड़ना अच्छी बात है। इससे कला और साहित्य के व्यापक प्रसार में मदद मिलती है। इस तरह के आयोजन इवेंट की तरह होते हैं और सेंट की ख़ुशबू की तरह तब तक बातें होती हैं जब तक इवेंट चलता है इवेंट ख़त्म विचार का असर ख़त्म । लेकिन संस्कार रह जाता है। पाठक में आशाएँ रह जाती हैं। इसलिए इस तरह के कार्यक्रम ,मेले का रुप लेते जा रहे हैं। जिस तरह मेले मे लोग बिना बुलाए बड़ी संख्या आते हैं, वही रेस्पांस इस तरह के आयोजनों को मिल रहा है। 
              

रविवार, 7 दिसंबर 2014

वफादार प्रकाशन सम्बन्ध के प्रतिवाद में



     हिन्दी में पुस्तक प्रकाशन वफ़ादारी के युग में है। लेखक और प्रकाशक का रिश्ता "वफ़ादार उत्पादक प्रकाशन सम्बन्ध" पर टिका है। इस सम्बन्ध के दायरे में अधिकांश लेखक और प्रकाशक जीने के लिए अभिशप्त हैं।यह मूलत:वफ़ादारी का गैर-पूँजीवादी सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध में किसी क़िस्म की प्रकाशकीय आधुनिकता नहीं है। 
        "वफ़ादार उत्पादक सम्बन्ध" की लाक्षणिक विशेषता है "सब कुछ अनौपचारिक है",लेखक को नहीं मालूम कि उसकी पुस्तक कहाँ बिक रही है? कितनी बिक रही है और कितनी आय कर रही है ?अधिकांश प्रकाशक , लेखक के साथ कोई लिखित अनुबंध नहीं करता, कोई लिखित दस्तावेज़ लेखक को मुहैय्या नहीं कराता। मज़ेदार बात यह है कि यह हरकत वह लेखक संघ के धाकड नेताओं के साथ भी करता है। लेखक संघों के तक़रीबन सभी बडे नेता किसी न किसी प्रकाशक की वफ़ादार सूची में वरीयता से ऊपर स्थान बनाए हुए हैं। वे अपने अल्पहितों की तो सोचते हैं लेकिन लेखक के सामान्य हितों को लेकर कभी कोई प्रयत्न नहीं करते।
      इस वफ़ादार सम्बन्ध के कारण लेखक-प्रकाशक सम्बन्धों का पूँजीवादी सम्बन्ध विकसित नहीं हो पाया है। लेखक संघ वफ़ादारी के आगे देख ही नहीं पा रहे हैं। उनकी जो भूमिका हो सकती थी उसका पालन नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि "अनौपचारिकता" और "निजी वफ़ादारी " से आगे वे देख ही नहीं पा रहे हैं। यह लेखक संघ के क्षय की सूचना है और "निजी वफ़ादारी" के महान बनने का संकेत भी है!  
      "निजी वफ़ादारी" का साइड इफेक्ट है कि लेखक संघ के सभी बडे लेखकों की आँखों के नीचे हिन्दी के अधिकांश बडे प्रकाशक, लेखकों का खुलेआम शोषण कर रहे हैं ,लेकिन कभी किसी लेखक संघ को किसी प्रकाशक के दरवाज़े पर आंदोलन करते नहीं देखा गया । क्या हम यह मान लें कि हिन्दी के प्रकाशकों के द्वारा प्रकाशन के नियमों का पालन हो रहा है ?
       समस्या का सबसे दुर्भाग्यजनक पक्ष यह है कि हिन्दी के सबसे बडे प्रकाशक ने सभी आंदोलनकारी लेखक नेताओं को अपना वफ़ादार बनाकर बंधुआ बना लिया है !हमारे नामी लेखक बंधुओं को इस बंधुआभाव से कोई परहेज़ नहीं है ।  सवाल यह है कि लेखक- प्रकाशक सम्बन्ध को पेशेवर पूँजीवादी सम्बन्ध बनाने में 'प्रलेसं' ,'जसम'और 'जलेसं' की कोई भूमिका बनती है या नहीं ? क्या कभी इन संगठनों ने हिन्दी के एकमात्र बडे प्रकाशन समूह के खिलाफ कोई बयान तक जारी करके लेखक के हितों के लिए कोई प्रयास किया ? मैं निजी तौर पर कोलकाता के कई लेखकों को जानता हूं जिनको इस प्रकाशक ने एक भी पैसा रॉयल्टी का नहीं दिया , यहाँ तक कि वह कोई अनुबंध तक नहीं करता। इस बडे नामी प्रकाशक का वफादार बनाने का तरीक़ा यह है कि वह लेखक संगठन के लिए विज्ञापन दे देता है या उनकी पत्रिका को किताब के रुप में छाप देता है,वह लेखक संघ को १०-२०फीसदी रॉयल्टी देकर अपनी वफ़ादारी निभा देता है, वफादार लेखक ख़ुश हो जाता है कि यह क्या कम है कि प्रकाशक ने हमारी पत्रिका छाप दी या किताब छापकर रॉयल्टी दे दी! 
     वफादार लेखकनेता भूल जाते हैं कि प्रकाशक अपनी इस तथाकथित सदाशयता की आड़ में बारीकी से अपने सरप्लस कमाने के धंधे को चमका रहा है ! वे कभी प्रकाशक द्वारा की जा रही अनैतिक हरकतों पर नहीं बोलते। स्थिति इतनी भयावह है कि राज्य के स्तर पर , विभाग के स्तर पर, विश्वविद्यालय में पुस्तक ख़रीद के स्तर पर, सरकारी थोक खरीद के स्तर पर हिन्दी के सबसे बडे प्रकाशक ने सबसे घृणित हथकंडे अपनाए हैं और लेखक संगठनों की ओर से कभी कोई बयान तक नहीं आया! 
     हिन्दी के बडे प्रकाशक किस तरह काम करते हैं उसके नमूने हर राज्य में बिखरे पड़े हैं। अभी कुछ समय पहले तक बिहार में सरकारी स्तर पर होने वाली खरीद में एक हिन्दी के संघपरस्त प्रकाशक की इजारेदाराना भूमिका, जो कई सालों से चल रही थी , सारी किताबें उससे ही ख़रीदी जा रही थीं, उसके खिलाफ किसी संगठन ने चूँ तक नहीं की, बाद में नीतीश सरकार ने इस मामले का संज्ञान लिया और वह प्रकाशक काली सूची के हवाले कर दिया गया। सवाल यह है कि एकप्रकाशक विशेष को ही मोटे ठेके कैसे मिल रहे हैं ? एक प्रकाशक विशेष को हाल ही में छत्तीसगढ़ से बहुत मोटा ठेका मिला है। प्रकाशक विशेष को इजारेदाराना ढंग से खरीद का ठेका मिलना, क्या हम सब लेखकों के लिए चिन्ता की बात नहीं है ? लेकिन "जलेसं" या "जसमं" और "प्रलेसं" के सभी बडे नेताओं के मुँह बंद हैं ! यही वह बिन्दु है जहाँ पर हम सबको लोकतांत्रिक प्रकाशकीय दृष्टिकोण अपनाने की ज़रुरत है। वफ़ादारी  का संबंध अ-लोकतांत्रिक सम्बन्ध है और यह लेखक विरोधी सम्बन्ध है। 
                   मैं अब तक ५० किताबें लिख चुका हूँ और मैंने आरंभ में यह निर्णय लिया कि मैं किताब उसी प्रकाशक को दूँगा जो लेखक के साथ पारदर्शिता रखे, रॉयल्टी दे, संयोग की बात है कि मैंने जिस प्रकाशक को किताबें दीं वह सभी लेखकों को रॉयल्टी देता है , बाकी तथ्य भी लेखक के साथ शेयर करता है। लेकिन हिन्दी का सबसे बड़ा प्रकाशक यह काम नहीं करता, इसके मालिक कईबार मुझसे किताब माँग चुके हैं , बदले में मोटी रक़म पहले देने का वायदा भी कर चुके हैं ,लेकिन मैंने उनको विनम्रतापूर्वक मना कर दिया । कहने का आशय यह कि लेखक संघ कम से कम इस तरह के प्रकाशक को किताब न दे जो इजारेदाराना हरकत करता हो, बिक्री के लिए घूस देता हो,लेखक को रॉयल्टी न देता हो। कम से कम लेखक की मान मर्यादा की रक्षा का दायित्व "वफादार लेखक-प्रकाशक सम्बन्ध" से ऊपर है। 

शनिवार, 3 मई 2014

जलेसं के इलाहाबाद सम्मेलन पर - लोकतंत्र से भागकर लोकतंत्र नहीं मिलता काॅमरेड !

लोकतंत्र हमारे समाज की प्राणवायु है और इस प्राणवायु को अबाध और स्वच्छ होना चाहिए । लेकिन यह संभव नहीं लग रहा। इलाहाबाद में हाल ही में जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन से भी लोकतंत्र की स्वच्छ वायु प्रवाहित नहीं हुई है। नयी कमेटी बनी है । हम चाहेंगे कि यह संगठन और भी ज़्यादा बेहतर ढंग से काम करे। कुछ सवाल हैं जिन पर विचार करना बेहद ज़रुरी है।

देश में लोकतांत्रिक होने की पहली शर्त है सम्मान और समानता के नज़रिए से लेखक को देखना ,उसके नागरिक अधिकारों की रक्षा करना । इस मामले में जनवादी लेखकों को अभी कई किलोमीटर की यात्रा करनी होगी । वे अभी भी ' मैं' और 'तुम' में वर्गीकृत करके सोच रहे हैं ।
कल तक जो लेखक जनवादी लेखक संगठन का सदस्य था अपना था ।आज सदस्य नहीं है तो पराया है , वर्गशत्रु है, भ्रष्ट है, बाज़ारू है। इस नज़रिए से जलेसं जब तक लेखकों को देखेगा कभी भी 'मैं' और 'तुम' के पापबोध से निकल नहीं पाएगा।
दुखद है जलेसं में 'हम' का भाव ख़त्म हो गया है। लेखक पर निजी हमले घटिया क़िस्म की गुण्डागर्दी है ,इससे बचा जाना चाहिए। जलेसं कोई लेखकीय प्रमाणपत्र जारी करने वाला संगठन नहीं है।
जनवादी लेखक संगठन के कुछ पदाधिकारियों के व्यवहार को छोड़कर अधिकांश लेखक अभी भी सामंती मनोदशा में सोचते और व्यवहार करते हैं। यह बात उनके आचरण में भी झलकती है। जलेसं सबसे पहले इस दयनीय दशा को दुरुस्त करे।
सांगठनिक अहंकार घटिया क़िस्म की चीज़ है जिसका जलेसं के सदस्यों ने जमकर विकास किया है। सांगठनिक अहंकार के नाम पर साहित्यिक दादागिरी पैदा हुई है । इससे जलेसं में उदार परंपराएँ नष्ट हुई हैं।आंतरिक लोकतंत्र नष्ट हुआ है।
लोकतंत्र में विनम्रता ज़रुरी चीज़ है हेकडीबाज कभी लोकतांत्रिक नहीं हो सकता और न इस तरह के लेखक कभी समाज में वैचारिक नेतृत्व कर सकते हैं। सांगठनिक हेकड़ीबाजों ने मुखर होकर जलेसं में दबाव बना लिया है यह जलेसं के अंदर लोकतंत्र के हेकडीतंत्र में बदलने का संकेत है और यह जलेसं के हाशिए पर चले जाने की सूचना भी है। यह वह माहौल है जिसमें इलाहाबाद सम्मेलन सम्पन्न हुआ। बेहतर होता संगठन आंतरिक मसलों पर विचार करता लेकिन यह सब न करके औपचारिक ढंग से राष्ट्रीय सम्मेलन कर लिया गया।
इलाहाबाद सम्मेलन में कोई नया फ़ैसला नहीं हुआ और नहीं जलेसं के संविधान में मौजूद लोकतंत्रविरोधी चोर दरवाज़े बंद करने के बारे में कोई ठोस क़दम ही उठाए गए ।
यह सच है कि जनवादी लेखक संगठन स्वायत्त संगठन है लेकिन यह स्वायत्तता वहीं तक है जहाँ तक भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने रेडलाइन खींची हुई है। संगठन के आंतरिक गठन पर माकपा का नियंत्रण है। यह नियंत्रण ख़त्म हो तब ही सही मायने में जलेसं लोकतांत्रिक बन पाएगा।
उल्लेखनीय है माकपा के हिंदी उर्दू साहित्य शून्य नेताओं के नियंत्रण में इसका लंबे समय से संचालन होता रहा है । लंबे समय से माकपा के ऐसे नेतागण इस संगठन के कामकाज को देखते रहे हैं जो हिंदी -उर्दू साहित्य की साझा परंपरा से एकदम अनभिज्ञ हैं । इससे माकपा की इस संगठन को लेकर गंभीरता का पता चलता है।
जनवादी लेखक संघ यदि देश में अपना स्थान बनाना चाहता है तो उसे माकपा के चंगुल और निर्देशन से मुक्त करना होगा। फ़िलहाल इसके चांस नहीं हैं। माकपा के केन्द्रीय नेतृत्व से लेकर स्थानीय नेतृत्व का इस संगठन पर जिस तरह का नियंत्रण है उससे लेखक संगठन की पहलकदमी नष्ट हुई है, संगठन में लोकतंत्र नष्ट हुआ है।जलेसं में हर काम पार्टी के आदेश पर होता है। पार्टी के आदेश पर ही लेखक से संबंध तय किए जाते हैं। पार्टी के सचिव ने यदि किसी लेखक के बारे में कह दिया कि फ़लाँ लेखक माकपा में नहीं है या माकपा आलोचक है उससे दूर रहो तो संगठन के कर्त्ता ठीक तेजगति से उस दिशा में चल देते हैं। इससे संगठन में साहित्यिक भ्रष्टाचार फैला है । सचिव होने की प्रधान शर्त है माकपा का सदस्य होना। यह विचारणीय समस्या है कि जलेसं के गठन के बाद से महासचिव कोई ग़ैर माकपाई नहीं हुआ। यह फिनोमिना कमोबेश सारे राज्यों में है। यह संगठन के बंधक बनाए रखने की अलोकतांत्रिक समझ है।
जनवादी लेखक संघ की कार्यप्रणाली में माकपा नेतृत्व के हस्तक्षेप को नीचे तक देख सकते हैं। घटिया क़िस्म की गुटबाजियां संगठन में जारी हैं। जिनको कभी ख़त्म करने का केन्द्रीय नेतृत्व ने प्रयास नहीं किया । मूल बात यह कि माकपा के हस्तक्षेप से जलेसं किस तरह स्वायत्त बने यह समस्या अभी भी बनी हुई है। माकपा के मौजूदा नज़रिए को देखते हुए इस स्थिति में सुधार की संभावनाएँ नज़र नहीं आतीं। इसका दुष्परिणाम यह है कि लेखक संघ की स्वायत्त नीतिगत राय कहीं पर भी नज़र नहीं आती। इससे संगठन में राजनीतिक मसलों पर प्रस्तावों में माकपा से न तो भिन्न भाषा मिलती है और न भिन्न नज़रिया ही दिखाई देता है।
जनवादी लेखक संघ की नई चिंताएँ लेखकीय सवालों और समस्याओं पर सक्रिय होती नजर नहीं आ रहीं। यहाँ तक कि इलाहाबाद सम्मेलन में भी कोई नयी चीज़ सामने नहीं आयी है। स्टीरियोटाइप घिसी पिटी भाषा में प्रस्तावों में चीजें रखी गयी हैं।
इलाहाबाद सम्मेलन का एक ही संदेश है कि जलेसं का भारत की वास्तविकता से संबंध टूट चुका है।

साझा संस्कृति संगम के घोषणापत्र में कहा गया है ' भारतीय समाज इस समय फ़ासीवाद के मुहाने पर खड़ा है। सच तो यह है कि देश के अनेक हिस्सों में लोग अघोषित फ़ासीवाद की परिस्थिति में ही सांस ले रहे हैं। '
उपरोक्त भाषा और समझ दर्शाती है कि जलेसं समस्या को ठोस रुप में देखना नहीं चाहता । लेखक जब चीज़ें ठोस वास्तविक उदाहरणों के बिना पेश करने लगें तो इसे लेखकीय चालाकी कहा जाता है। यह ख़तरनाक स्थिति है।
जलेसं को उन इलाक़ों का विवेचन करना चाहिए जहाँ पर अघोषित फासीवाद है ,यह भी देखना चाहिए कि अघोषित फासीवाद में माकपा की भी कोई भूमिका है या नहीं ? मैं पश्चिम बंगाल के अनुभव से कह सकता हूँ कि माकपा ने वामशासन के दौरान अघोषित आतंक का जो तानाबाना बुना था आज वही माकपा के लिए गले की हड्डी बन गया है।
पश्चिम बंगाल में माकपा के शासन में जिस तरह आमलोगों के जीवन में हस्तक्षेप किया गया वह लोकतंत्र को कलंकित करने वाली चीज़ है और उसके कारण वहाँ पर पराजय हुई।
दुखद बात यह है कि जलेसं ने कभी माकपा रचित अलोकतांत्रिक माहौल और संरचनाओं की आलोचना नहीं की। एक वाक्य तक इस महान घोषणापत्र में नहीं लिखा गया।
लेखकों और नागरिकों का अपमान करना लोकतंत्र का अपहरण है और वामशासन में माकपा ने पश्चिम बंगाल में यह काम जमकर किया है। ज़रुरत इस बात की है कि जलेसं इस फिनोमिना पर आलोचनात्मक नज़रिए से विचार करे।
संघ परिवार के फासिज्म से लड़ने के लिए ज़रुरी है कि माकपा के अलोकतांत्रिक कार्यकलापों की भी आलोचना की जाय लेकिन जलेसं तो माकपा के सांस्कृतिक -सामाजिक अपराधों पर एकदम चुप है । वे चुप क्यों हैं? यह सवाल उठना स्वाभाविक है ? यही वह बिंदु है जहाँ पर हमें माकपा से जलेसं की स्वतंत्रता की और भी ज़्यादा ज़रुरत महसूस होती है । मैं जलेसं के केन्द्रीय नेतृत्व की असफलताओं की लिस्ट बताना नहीं चाहता । लेकिन यह माँग तो रहेगी कि लेखक संगठन में पदाधिकारी उसे बनाएँ जो हिंदी-उर्दू का लेखक हो ? हाल ही में पश्चिम बंगाल में जलेसं के अध्यक्ष हासिम अब्दुल हलीम चुने गए हैं। वे लेखक नहीं हैं । यह संकेतमात्र है उस समस्या का जिसमें माकपा प्रवेश करती है। वे बेहतर इंसान हैं माकपा के नेता हैं लेकिन लेखक नहीं हैं।
जलेसं के इलाहाबाद घोषणापत्र में नयी उदार आर्थिक नीतियों की जमकर आलोचना की गयी है। लेकिन मित्रलोग भूल गए कि अबपीछे मुड़कर लौट नहीं सकते और यह एकमात्र अपरिहार्य मार्ग है ।
विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने के बाद पीछे हटने या अन्य किसी मार्ग पर चलने का विकल्प नहीं बचा है।

इलाहाबाद घोषणापत्र में सही कहा गया है कि 'इसी दौर में राष्ट्रीय आंदोलन की उदारवादी और जनोन्मुखी प्रेरणाएं और मूल्य तेज़ी से टूटे बिखरे हैं और बांये बाजू़ की वैकल्पिक चुनौती और प्रतिरोध की परंपरा भी कमज़ोर पड़ी है।'
इसके कारणों का जलेसं आदि संगठन अभी तक मूल्याँकन क्यों नहीं कर पाए ? यदि कहीं किया है तो उसका ज़िक्र होना चाहिए।जनोन्मुखी प्रेरणाएँ और मूल्य क्यों टूटे ? अपने दायित्व से बचने का यह उपाय है कि दूसरों पर ज़िम्मेदारी डालो । देश में उदारवादी परंपराएँ कमज़ोर क्यों हुईं, सांगठनिक तौर पर इस पर सुसंगठित बहस के बिना राय देना सही नहीं है।सवाल यह है कि फंडामेटलिस्टों के दबाव के सामने पश्चिम बंगाल का वामशासन क्यों झुका ? तसलीमा नसरीन की किताब पर पाबंदी क्यों लगायी गयी ? और तसलीमा नसरीन को वोटबैंक राजनीति और फंडामेंटलिज्म के दबाव में वामशासन ने क्यों राज्य से बाहर निकाल दिया? आदि सवालों के उत्तर खोजने होंगे, यह नमूना मात्र है।
उदार परंपराओं के क्षय में वामपंथ की भूमिका को आलोचनात्मक नज़रिए से देखे बिना उस पतन की जड़ें नजर नहीं आएंगी जहाँ हम सब आजकल पहुँच गए हैं। बुर्जुआजी को गरियाना आसान है लेकिन माकपा की अनुदारदृष्टि पर बातें करना मुश्किल काम है । यह दायित्व तो जलेसं को लेना होगा कि वह मीमांसा करे और बताए कि उदार परंपराओं और मूल्यों का ह्रास क्यों हुआ और माकपा की इस प्रसंग में क्या भूमिका रही है?
माकपा के लोग जिस तरह की घृणा का प्रचार अपने से अलग हुए लेखकों और बुद्धिजीवियों के ख़िलाफ़ करते हैं वह निंदनीय है । अफ़सोस की बात है जलेसं के नेतृत्व में भी घृणा की यह बीमारी घर कर गयी है। इस प्रसंग में एकाधिक उदाहरण दिए जा सकते हैं । बेहतर यही है कि उदार मूल्यों के पतन के कारणों को समग्रता में विश्लेषित किया जाय और लेखकों के बीच में खुली बहस चलायी जाय। इलाहाबाद घोषणापत्र के बहाने बहस हो सकती है लेकिन जलेसं का रवैय्या बहस का कम नज़र आता है और मसलों को फ़र्श के नीचे छिपाने का ज़्यादा नज़र आता है। मसलों को फ़र्श के नीचे खिसकाना लोकतंत्र का अंत है।

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

हिन्दी साहित्य के जुगनूओं की बोगस दुनिया



हिन्दी लेखकों पर दलितलेखकों ने बहुत सही जगह आलोचनात्मक हमला किया है और इसके कारण हिन्दी के आलोचक दलितलेखकों से घबडाए हुए बात करते हैं। प्रार्थनाशैली में बात करते हैं,झूठी प्रशंसाभाव करते हैं। इस आलोचना का सामाजिक परिणाम यह निकला कि हिन्दी के एक नामी कथाकार को 60साल बाद पता चला कि वह आरक्षित जाति में आता है। अब समझ जाइए इस शर्मनाक चालाकी को कि ये 60साल तक साहित्य की मलाई खाते रहे। जबकि साहित्य को कोटि को ही दलित लेखक नहीं मानते। वे कहते हैं यह वर्णवादी कोटि है। वे दलितसाहित्य की नई कोटि की हिमायत करते हैं। अब सवर्णलेखक अपने पूर्वजों में दलितजाति खोज रहे हैं और बेशर्मी से कह रहे हैं मेरे पूर्वज दलित थे। असल में साहित्य की यह नई बीमारी है। वर्ण बीमारी।
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हिन्दी में लेखक-प्रोफेसर आए दिन गरीबीभरा अतीत, सत्ता के दबाब, ह्रासमेंट, विक्टमाइजेशन आदि के आए दिन किस्से सुनाते हैं और सहानुभूति जुगाड़ करने की कोशिश करते हैं। ये साहित्य के थोथे किस्से हैं। थोथे किस्सों से लेखक- प्रोफेसर समझ में नहीं आता।
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यह दौर अमीरों पर भी तबाही लेकर आया है किंगफिशर और सहारा के मालिकों पर जिस तरह कानून की गाज गिरी है उसने कारपोरेट ईमानदारी को नंगा कर दिया है।
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हिन्दी में जो लोग कहते हैं साहित्य की गोष्ठियां और धड़ेबंदी महान बनाती है वे जरा रामविलास शर्मा से सीखें कि किस तरह साहित्य साधना महान बनाती है. हिन्दी के ज्ञानी गुणी और पुरस्कार प्राप्त लेखक शोहरत के नशे में इस कदर डूबे हैं कि वे रामविलास शर्मा की पूजा करना जानते हैं लेकिन उनसे कोई बात सीखना नहीं चाहते। यह बीमारी बड़े लेखक -आलोचक से लेकर नए लेखकों तक फैली हुई है।
जो लेखक अपनी भाषा के साहित्यकार की मूल्यवान बातों को ग्रहण नहीं करते वे जल्द ही अंतर्ध्यान हो जाते हैं। वे साहित्य में जुगनू की तरह हैं।
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हिन्दी में चुगद किस्म के लेखकों की भीड़ पैदा हो गयी है,इनमें कुछ नामी लेखक भी हैं , अकादमी पुरस्कार प्राप्त हैं , ये लोग अहर्निश आत्मप्रशंसा में लीन रहते हैं, आत्मप्रशंसा कोसाहित्य का चुगद भाव कह सकते हैं।ये लोग कम से कम लिखते हैं, हेकड़ी,शोहरत और दौलत के शुरूर में डूबे रहते हैं। इन लेखकों को मंन्नू भंडारी,मृदुलागर्ग,मैत्रेयी पुष्पा जैसी लेखिकाओं से अभी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। इन लेखिकाओं ने बिना किसी अंहकार, हेकड़ी, चमचागिरी के किस तरह हिन्दी साहित्य को श्रेष्ठतम रचनाएं दी हैं। खासकर मैत्रेयी पुष्पा ने तो कमाल किया है उसने बहुत कम समय में अनेक श्रेष्ठ उपन्यास दिए हैं।
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जब पाठक लेखक के सामने हां -हां करता रहता है और लेखक की महानता का जयगान करता रहता है तो इस तरह के पाठक को हिन्दी का लेखक सुधीपाठक - जागरूकपाठक कहता है।
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कोलकाता से दिल्ली,दिल्ली से मद्रास तक हिन्दी के जो लेखक सनसनाते चमचों के साथ मस्ती लेते नजर आते हैं और यह दावा करते हैं वे बेहद जनप्रिय हैं। वे एक सामान्य तथ्य की उपेक्षा करते हैं.वह यह कि हिन्दी के अधिकांश लेखकों से हिन्दीभाषी लड़कियां मिल नहीं पातीं या मिलना तक नहीं चाहतीं।
मसलन् आपको लेखक के इर्दगिर्द 3-4चार चमचे मिल जाएंगे, लेकिन चमचागिरी करते लड़की नजर नहीं आएगी।
कहने का अर्थ है कि लेखक को चमचाकल्चर को साहित्यसंस्कृति समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।
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आप यात्री की तरह कोलकाता को देखेंगे तो आपको यह शहर कभी समझ में नहीं आएगा।आज के दिन यही लगेगा कि यह शहर सरस्वती पूजा में डूबा है ,लेकिन यथार्थ एकदम विलोम है और भयावह है।
देश में बलात्कार के मामलों में यह राज्य विगत आठ सालों में टॉप पर है। अभी कुछदिन पहले ही एक शिक्षित परिवार के लोगों ने अपनी वृद्धा माँ को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और बाद में उसकी मौत हो गया। मुहल्ले के लोगों के दबाब में पूरे परिवार,जिसमें उस औरत का पति,बेटा,बहू आदि को गिरफ्तार करना पड़ा। पता चला वृद्धा को विगत दो सालों से अहर्निश यातनाएं दी जा रही थीं। इस तरह की औरतों को यातना की घटनाएं यहां आम हो गयी हैं। इसके बावजूद आप यदि सरस्वती पूजा के रस में निमग्न हैं तो रहें लेकिन इससे स्त्री के सम्मान और सुख का पता नहीं चलता। कोलकाता आज स्त्री के लिए सबसे त्रासद शहर में तब्दील हो चुका है। यदि आपके पास साहित्यिक नजरिया है तो आपको औरत की बदहाल अवस्था नजर क्यों नहीं आती ?
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हिन्दी आलोचक का ईंधन है ईर्ष्या ! ये बेचारे नहीं जानते इससे निजी ब्लडप्रेशर हाइ रहता है।
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हरिशंकर परसाई ने लिखा है - "श्रद्धेय, बड़े बौड़म लगते हैं। "
ये पंक्तियां हमारे उन तमाम लेखकों को अपने सीने पर लगानी चाहिए जो नगरी-नगरी श्रद्धालु खोजते फिर रहे हैं।
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हरिशंकर परसाई ने लिखा है -" देश में जो मौसम चल रहा है उसमें श्रद्धा की टांग टूट चुकी है। " क्या हिन्दीलेखक गण सुन रहे हैं ?
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हिन्दी में महानता का ढ़ोंग वे ज्यादा कर रहे हैं जो आत्ममुग्ध हैं और आत्मप्रशंसा में लीन हैं। ये लोग पढ़ते कम हैं हांकते ज्यादा हैं। भक्ति ( चाटुकारिता) करने वालों को ज्ञानी मानते हैं।
सवाल यह है कि यदि इस तरह के लोग ज्ञानी हैं तो लिखकर आम पाठकों को अपने ज्ञान से लाभान्वित क्यों नहीं करते ? ज्ञान पेट में रखने की चीज नहीं है अन्य को बताने की चीज है।
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हरिशंकर परसाई ने विकलांग श्रद्धा का दौर निबंध में लिखा है- "यह चरण छूने का मौसम नहीं ,लात मारने का मौसम है।मारो एक लात और क्रांतिकारी बन जाओ।"
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मंगलवार, 17 अगस्त 2010

महान दलित साहित्यकार नारायण सुर्वे का निधन

                             (मराठी के महान कवि नारायण सुर्वे)
प्रसिद्ध कवि नारायण सुर्वे का लंबी बीमारी के बाद कल यहां निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे। श्री सुर्वे को ठाणे के हेल्थ केयर अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां रविवार को उनका निधन हो गया। श्री सुर्वे कवि के अलावा समाज सेवक भी थे। उन्होंने मुंबई में कामगार संगठन आंदोलन में भी काम किया। उनके निधन पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने कहा.. हमने आम आदमी का प्रतिनिधित्व करने वाले एक महान कवि एवं विचारक को खो दिया।. उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल ने कहा.. श्री सुर्वे दलितों की आवाज अपनी कविता के जरिए उठाते रहे।. श्री सुर्वे की कुछ प्रसिद्ध कृतियों में .माझे विद्यापीठ. जाहीरनामा. और .ऐसा गा मी ब्रह्मा. शामिल हैं।. श्री सुर्वे का जन्म 15 अक्तूबर 1926 में हुआ। उनका बचपन मुंबई की गलियों में बीता। मुंबई की गलियों में ही उनका रैन बसेरा हुआ करता था। जीविका चलाने के लिए वह सभी काम कर लेते थे। उन्होंने खुद ही पढ़ने और लिखने की जिम्मेदारी उठायी। उनकी कविता की पहली पुस्तक .माझे विद्यापीठ. 1966 में प्रकाशित हुयी। श्री सुर्वे को उनकी कविता के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने 1999 में स्वर्ण कमल पुरस्कार और कबीर सम्मान से पुरस्कृत किया था।   


कामगार कवि के नाम से प्रसिद्घ वरिष्ठ मराठी जनकवि नारायण सुर्वे (८३) का आज सुबह लंबी बीमारी के बाद ठाणे में देहांत हो गया। १५ अक्टूबर १९२६ को मुंबई के गिरणगाव में जन्मे अनाथ कामरेड़ सुर्वे का बचपन बड़ी मुफलीसी और गरीबी में फुटपाथ पर सोकर छोटे-मोटे काम करते हुए बीता, इसी बीच आपने कविता लिखना शुरू किया। १९६६ में कामगारों के जीवन पर आधारित आपका प्रथम काव्य संग्रह 'माझे विद्यापीठ' प्रकाशित हुआ जिसे बड़ी प्रसिद्घि मिली। इसके अलावा आपके द्घारा लिखित जाहीरनामा (१९७८), ऐसा गामी ब्रह्म, सनद, मानुष कलावंत, आणि समाज, सर्व सुर्वे (वसंत शिरवाडकर संपादीत) काव्य संग्रह भी प्रसिद्घ हुवे। अध्यापन कार्य के साथ-साथ आप मुंबई के श्रमिक आंदोलन के साथ निरंतर जुड़े रहे व आपको श्रमिको के हक के लिये लंबे संघर्ष करने वाले जुझारू साथी के रूप में जाना जाता है।
कामरेड सुर्वे को १९९८ में पद्मश्री व १९९९ में कबीर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। १९९५ में परभणी में संपन्न मराठी साहित्य सम्मेलन के आप अघ्यक्ष थे। कामगार नेता व कामगार कवी कामरेड़ नारायण सुर्वे को जनवादी लेखक संघ की श्रंद्घाजलि


शनिवार, 13 मार्च 2010

हिन्दी के लेखक संगठनों की दिमागी गुलामी का तानाबाना-8

       व्यक्ति की स्वायत्तता के लिए 'स्व' से प्रेम करना, 'स्व' की केयर करना, 'स्व' के हितों को सर्वोपरि स्थान देना और जिम्मेदार नागरिक के रूप में सामाजिक भूमिका अदा करना जरूरी है। 'स्व' पर जोर देने का अर्थ है परंपरा के प्रति आलोचनात्मक होना। आलोचनात्मक परंपरा का निर्माण करना। आलोचनात्मक परिवेश का निर्माण करना। 'स्व' का सौन्दर्यीकरण करना। स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ विवेकवादी या शुद्धतावादी और सार्वभौम नैतिकतापंथी होना नहीं है। स्वातंत्र्योत्तर भारत का स्वतंत्रता के अलावा दूसरा बड़ा पैराडाइम है भारत-विभाजन। तीसरा पैराडाइम है आपात्काल और चौथा पैराडाइम है भूमंडलीकरण और इंटरनेट संस्कृति।
    हिन्दी में स्वतंत्रताबोध के अभाव का आजादी के आन्दोलन की फैंटेसी और भारत-विभाजन की त्रासदी के साथ गहरा संबंध है। भारत विभाजन धर्म आधारित राजनीति की सबसे भयावह परिणति था। जिसमें लाखों निर्दोष लोग मारे गए। धर्मकेन्द्रित राजनीति के द्वारा स्वाधीनभाव का जिस तरह अपहरण किया गया और भारत विभाजन हुआ उसका सबसे गंभीर परिणाम यह निकला कि स्वतंत्रता को नकारात्मक और समस्यामूलक मान लिया गया। अराजकता का प्रतीक मान लिया गया।
    स्वाधीनता के गर्भ से पैदा हुआ भारत विभाजन सबसे बड़ा अविवेकपूर्ण राजनीतिक फैसला था। इसका चेतना पर यह असर हुआ कि धार्मिक और पश्चिमी ताकतों की शक्ति के बारे में आम लोगों के जेहन में डर बैठ गया। यह मान लिया गया कि धार्मिक और पश्चिमी ताकतें सब कुछ करने में सक्षम हैं और उनका ही वर्चस्व है।
       भारत विभाजन ने भारतीय जनमानस में धार्मिक तत्ववादी और पश्चिम परस्त चिन्तन का सामाजिक आधार तैयार किया। स्वतंत्रता और विज्ञान सम्मत चेतना का आधार कमजोर हुआ। यह मान लिया गया कि भारत विभाजन के बारे में तो लोग सब कुछ जानते हैं। अब बताने लायक क्या है अच्छा यही होगा कि भारत विभाजन को हम भूल जाएं। आगे की ओर देखें,अन्य चीजों की ओर देखें। 'आगे' और 'अन्य' चीजों की ओर देखने से समस्या का समाधान नहीं हुआ बल्कि समस्या और भी पेचीदा हो गयी।
आज देश में साम्प्रदायिकता से लोग घृणा नहीं करते बल्कि साम्प्रदायिकता की जय-जयकार करते हैं। पहले साम्प्रदायिकता के साथ जुड़ने में हीनताबोध पैदा होता था, साम्प्रदायिक ताकतों को कोई वोट देना पसंद नहीं करता था, आज ऐसा नहीं है। आज साम्प्रदायिक ताकतों का समाज और राजनीति में सम्मानजनक दर्जा है। अनेक राज्यों में उनकी सरकारें हैं। केन्द्र में भी उनके नेतृत्व में छह साल तक सरकार चली है। साम्प्रदायिकता आज अछूत नहीं है। हाशिए की शक्ति नहीं है बल्कि केन्द्र की शक्ति है।
      भारत विभाजन के विचारधारात्मक-मनोवैज्ञानिक प्रभावों की गहराई में छानबीन करने की बजाय हमने भारत विभाजन को इतिहास और कथा साहित्य का विषय बनाया। गल्प बनाया। उसके मनोजगत पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में विस्तार के साथ कभी चर्चा नहीं की।
      उल्लेखनीय है कि 15 अगस्त सन् 1947 में देश के आजाद होने के एक महीने बाद ही इलाहाबाद में हिन्दी-उर्दू के प्रगतिशील लेखकों का सम्मेलन हुआ था इसमें एक भी प्रस्ताव भारत-विभाजन पर नहीं था।
     यही स्थिति जनवादी लेखक संघ के घोषणापत्र की है। लेखक संगठनों में साम्प्रदायिकता पर जब भी चर्चा होती है तो उनके राजनीतिक नारों पर ही चर्चा होती है। जबकि साम्प्रदायिकता का बहुत गहरा संबंध पुनर्जन्म और अंधविश्वास के साथ है। पुनर्जन्म और अंधविश्वास की परतों को खोले बिना साम्प्रदायिकता को सामाजिक और राजनीतिक जीवन में अलग-थलग करना संभव नहीं है।
     हिन्दी लेखकों के सम्मेलनों से लेकर उनके साथ जुड़े लेखकों के द्वारा संपादित पत्रिकाओं में आपको सब कुछ मिलेगा यदि कोई चीज नहीं मिलेगी तो वह है अंधविश्वास और पुनर्जन्म की अवधारणा पर बहस। पुनर्जन्म और अंधविश्वास पर बहस का अभाव स्वतंत्रता के अभाव को जन्म देता है। रचनाकार में लोकतांत्रिक विजन के विकास को अवरूद्ध करता है।
    हिन्दी के अधिकांश आलोचकों के यहां भारत विभाजन के समय का कोई भी लिखा बयान,लेख आदि नहीं मिलता। इक्का-दुक्का कहानियां हैं जिन्हें देखकर खुश होते रहते हैं। कुछ उपन्यास हैं जिनमें भारत-विभाजन को विषयवस्तु के रूप में उठाया गया है। किंतु कथा साहित्य में जो चित्रण उपलब्ध है वह भारत विभाजन के बाद किस तरह की मनोदशा बनी है उसकी ओर ध्यान नहीं देता।
     भारत विभाजन केन्द्रित कथा साहित्य विभाजन की विभीषिका के चित्रण तक सीमित है। जबकि समस्या उसके बाद की है। भारत विभाजन के परवर्ती विचारधारात्मक प्रभावों को खोलने वाली एक भी किताब भारत में उपलब्ध नहीं है। कम से कम हिन्दी के किसी आलोचक ने इस पहलू की ओर ध्यान हीं नहीं दिया। लेखक संगठनों के घोषणापत्र इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं।
     बुनियादी तौर पर भारत विभाजन को रहस्यमय बनाया गया है। काल्पनिक बनाया गया है। भारत विभाजन को रहस्यमय बनाने में साहित्य और जनमाध्यमों की प्रधान भूमिका है। भारत विभाजन तब ही याद आता है जब कभी कोई साम्प्रदायिक दंगा हो जाता है। उसी समय हिन्दू और मुस्लिम साम्प्रदायिकता के बारे में उत्सवधर्मी चर्चाएं होती हैं,पत्रिकाओं में लेख छपते हैं। बाद में सब कुछ सामान्य हो जाता है। साम्प्रदायिकता अपने घर खुशी हम अपने घर खुशी। चंद दिनों के बाद ही भाईचारे के साथ साम्प्रदायिकता के साथ रहने लगते हैं।  
     साम्प्रदायिकता और भारत विभाजन की जब भी चर्चा होती है तो साम्प्रदायिक ताकतों की नकली धार्मिक अंतर्वस्तु को कभी उद्धाटित नहीं किया जाता। बल्कि उलटे यही कहा जाता है कि धर्म तो ठीक है, धर्म अच्छा है। प्रत्येक धर्म इंसानियत का पाठ सिखाता है।
    धर्म के प्रति अनालोचनात्मक रवैय्या अंतत: धार्मिकता में इजाफा करता है। धर्म को धार्मिकता से मुक्त किए बिना धर्मरिपेक्षता के भावबोध का निर्माण करना संभव नहीं है। धर्म को धार्मिकता से मुक्त करने के लिए धर्म को विज्ञान की तरह विवेचित किया जाना चाहिए। हमारे यहां धर्म है,धर्मशास्त्र है किंतु धर्मविज्ञान नहीं है। इसका अर्थ है धर्म को आलोचनात्मक ढ़ंग से खोलना,विवेचित करना। धर्मविज्ञान के बिना धर्म को धार्मिकता से बचाना संभव नहीं है। धर्म का दुरूपयोग रोकना संभव नहीं है।
    भारत विभाजन के पहले साथ रहते थे। भारत विभाजन के बाद हिन्दू-मुस्लिम पड़ोसी हो गए। एक साथ रहने वाले पड़ोसी में कैसे तब्दील हो गए ? और ये अगर पड़ोसी हैं तो फिर विभाजन क्यों ? लड़ते क्यों हैं ? आज पड़ोसी के नाते एक-दूसरे का थोड़ा सम्मान करते हैं। किंतु जब आप किसी को पड़ोसी कहते हैं तो उसे पराया बनाते हैं। उसके प्रति उपेक्षा व्यक्त करते हैं। धीरे-धीरे पड़ोसी के साथ विवाद उठने लगे, झगड़े होने लगे और कालान्तर में हिन्दू और मुसलमानों की बस्तियां अलग बसने लगीं। हिन्दू को मुसलमानों ने अपने इलाकों अथवा घर में किराए पर मकान तक देने से मना कर दिया। सतह पर धर्मनिरपेक्षता,भाईचारा और साम्प्रदायिक सद्भाव और वास्तव जीवन में व्यापक स्तर पर सामाजिक विभाजन सहज ही महसूस किया जा सकता है।
           



हिन्दी के लेखक संगठनों की दिमागी गुलामी का तानाबाना -7

    लेखक संगठनों के कार्यक्रमों और प्रकाशनों में मार्क्सवाद,जनवाद,समाजवाद, साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता पर गर्मागर्म बहसें होती रही हैं। किंतु पितृसत्ता को लेकर कोई बहस नहीं हुई है। तकरीबन यही स्थिति मार्क्सवादी नजरिए की भी है।
       मार्क्सवादी नजरिए का अर्थ हमारे प्रगतिशील संगठनों ने मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन -माओ के उद्धरणों के पारायण को मान लिया है। इन उद्धरणों की रोशनी में ही कृति की अंतर्वस्तु की समीक्षा होती रही है। कभी भी मार्क्सवादी चिन्तन के प्रति आलोचनात्मक नजरिए से विचार ही नहीं किया गया। मार्क्सवाद मूलत: उद्धरणशास्त्र बनकर रह गया। फलत: हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचक मार्क्सवादी सैद्धान्तिकी और आलोचना में न्यूनतम मौलिक योगदान कर पाए हैं।
    प्रसिध्द मार्क्सवादी आलोचक टेरी इगिलटन के अनुसार किसी कृति में सतह पर जो चीज नजर आती है उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण वह चीज है जो सतह पर नजर नहीं आती। व्यक्त से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है अव्यक्त की खोज। पाठ के साइलेंस या चुप्पी के क्षेत्रों ,अंतरालों और अनुपस्थित की खोज करना। इसके बिना आप विचारधारा को सकारात्मक रूप में महसूस नहीं कर सकते।
    मार्क्सवाद का इकहरापन तब सामने आता है जब सिर्फ 'संघर्ष' के ही मूल्यांकन और चित्रण को मार्क्सवाद मान लिया गया। 'संघर्ष' के अलावा अन्य विषयों पर लिखी रचनाओं को खारिज कर दिया गया। इसके अलावा 'परंपरा' को पुनर्व्याख्यायित करने के नाम पर परंपरा का इकहरा रूपायन सामने आया। परंपरा को आधुनिककाल के लिए प्रासंगिक बनाया गया। तुलसी,कबीर,जायसी आदि में आधुनिककाल के सभी तत्वों को खोज लिया। परंपरा के इच्छित सृजन ने परंपरा का एकायामी विमर्श पैदा किया।
     परंपरा का अर्थ यह नहीं है कि परंपरा को ज्यों का त्यों बरकरार रखा जाए। बल्कि ल्योतार के शब्दों में परंपरा में भिन्नता के साथ निरंतरता बनी रहती है। परंपरा के प्रति यह उत्तार आधुनिक भाव है। रामविलास शर्मा के परंपरा विमर्श में यह पद्धति लागू की गयी है। परंपरा का भाषा विशेष में विशिष्ट अर्थ होता है। परंपरा विशिष्ट और सार्वभौम दोनों ही होती है। हिन्दी में परंपरा के सार्वभौम रूप पर ज्यादा जोर है। विभिन्नताओं की उपेक्षा हुई है। परंपरा में तेजी से जाने का प्रधान कारण था उसे अन्य नाम देना, अपने लिए परंपरा में भूमिका तलाशना। परंपरा के सामाजिक बंधन होते हैं। क्योंकि परंपरा में हम अपनी भूमिका देखते हैं। अपने सामाजिक अस्तित्व की तलाश करते हैं।
हिन्दी लेखक संगठनों और आलोचकों में व्यक्तिकेन्द्रित और प्रवृत्ति केन्द्रित आलोचना का रिवाज है। हिन्दी में पैराडाइम केन्द्रित आलोचना कम लिखी गयी है। खासकर स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दुस्तान को केन्द्र में रखकर तो एकदम नहीं लिखी गयी। स्वतंत्र भारत का मूलाधार है लोकतंत्र। लोकतंत्र का स्वतंत्रता के बिना विकास संभव नहीं है। लेखक,नागरिक और समाज में स्वतंत्रता का जितना प्रसार होगा साहित्य और संस्कृति में लोकतांत्रिक भावबोध उतना ही समृद्ध होगा। एक ही वाक्य में कहें स्वातंत्र्योत्तर भारत का केन्द्रीय पैराडाइम स्वतंत्रता है।
     हिन्दी लेखक संगठन 'स्वतंत्रता' के बारे में कम 'तंत्र' के बारे में ज्यादा सोचते हैं। लेखकों में 'स्व' की बजाय 'तंत्र', 'मानवीय सत्ता’ की बजाय 'सत्ता' पर ज्यादा लिखा है। 'स्व' से पलायन मध्यकालीनबोध का लक्षण है। उसमें स्वतंत्रता के लिए मर मिटने की भावना अभी तक पैदा नहीं हुई है। उलटे जब किसी की स्वतंत्रता छीनी जा रही होती तो मूकदर्शक बना रहता है।
   स्वतंत्रता को वह दर्शकीयभाव से देखता है। यह उसके लिए देखने की चीज है। वह स्वतंत्रता में जीता नहीं है बल्कि मध्यकालीनबोध में जीता है। उसे नास्तिक नहीं आस्तिक पसंद हैं। असहमति नहीं सामंजस्य पसंद है। व्यक्ति की सत्ता और स्वायत्तता नहीं दूसरे के फटे में पैर फसाना पसंद है, हस्तक्षेप पसंद है।
    स्वतंत्रता जन्मना नहीं मिलती। उसे अर्जित करना पड़ता है। स्वतंत्रता मनुष्य का बुनियादी अधिकार है इसे बुर्जुआ फिनोमिना कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है। जिस समाज में स्वतंत्रता होगी वहां स्वाभाविक लोकतंत्र के पनपने की संभावनाएं भी होंगी। स्वतंत्रता के बिना लोकतंत्र की तरह समाजवाद भी बर्बरतावाद में बदल सकता है। भूतपूर्व समाजवादी देशों में स्वतंत्रता के अभाव के कारण ही समाजवादी व्यवस्था का लोप हुआ।
स्वतंत्रता की जटिलताओं को मानवीय विकास के बुनियादी आधारों में से एक तत्व के रूप में देखने की बजाय स्वतंत्रता का राजनीतिक पक्षधरता के आधार पर मूल्यांकन किया गया। यहां सिर्फ एक-दो उदाहरण ही देना पर्याप्त है ,मसलन् आपातकाल में प्रगतिशील लेखक संघ का आपातकाल समर्थन का फैसला और हाल के वर्षों में नंदीग्राम के मसले पर जनवादी लेखक संघ का मूकदर्शक बने रहना और तसलीमा नसरीन के मसले पर मौन रहना। ये उस गंभीर समस्या के लक्षण मात्र हैं जिनकी ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ।
स्वतंत्रता मात्र दलीय राजनीतिक तत्व नहीं है। बल्कि सृजन और विकास की बुनियादी शर्त है। स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ 'निज' के लिए अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है बल्कि 'सबके लिए' अभिव्यक्ति की आजादी है। हिन्दी लेखक संगठनों और साहित्यकारों ने स्वतंत्रता पर कभी बहस नहीं की। बल्कि स्वतंत्रता की हिमायत करने वालों को किसी न किसी का एजेण्ट बताकर ,आरोप लगाकर नीचा दिखाने की कोशिश की गई अथवा स्वतंत्रता का गाली के तौर पर भी इस्तेमाल हुआ है। हिन्दी लेखक के लिए स्वतंत्रता नजारे की चीज है। वह स्वतंत्रता के तमाशे देखता है और चुपरहता है।
हिन्दी का लेखक कहीं न कहीं यह मानता है कि स्वतंत्रता समस्यामूलक है अत: उससे दूर रहो। स्वतंत्रता के बारे में सोचो मत। कभी कभार स्वतंत्र अभिव्यक्ति का नाटक जरूर कर लेता है। स्वतंत्रता को वह नकारात्मक धारणा मानता है। व्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वायत्तता की बात उठते ही सीमा की जाती है। सीमा का आग्रह उसे स्वतंत्रता विरोधी तक बना डालता है। कायर बनाता है। नपुंसक बनाता है। प्रतिरोध से पलायन कराता है। व्यक्ति की स्वतंत्रता को यदि सकारात्मक अवधारणा के रूप में देखेंगे तो एकदम भिन्न अनुभूति होगी। भिन्न किस्म का नजरिया होगा और भिन्न किस्म का व्यवहार पैदा होगा। यदि व्यक्ति की स्वतंत्रता नकारात्मक अवधारणा के रूप में जेहन में बैठी है तो चीजें भिन्न नजर आएंगी।



शुक्रवार, 12 मार्च 2010

हिन्दी के लेखक संगठनों की दिमागी गुलामी का तानाबाना -6-

    लेखकों के सभी संगठन आज सामाजिक हाशिए के बाहर हैं। हाशिए पर जाना घटना है और हाशिए के बाहर चले जाना त्रासदी है। दुर्घटना है। लेखक और संस्कृति मंचों की जरूरत तब ही महसूस की जाती है तब आप शोषित महसूस करें। लेखक जब शोषित महसूस करना बंद कर देता है तो संगठन की प्रासंगिकता खत्म हो जाती है। संगठन प्रतीकात्मक रह जाते हैं। लेखक संगठनों को सत्ता से कभी शक्ति नहीं मिलती। मलाई जरूर मिलती है।
     इसी तरह लेखक संगठनों को राजनीति का अंग भी नहीं समझना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो लेखक संगठन हाशिए के बाहर जाने के लिए अभिशप्त हैं। विलक्षण आयरनी है कि लेखक संगठनों का काम करते हुए ह्रास हुआ है। सबसे ज्यादा सक्रिय लेखक संगठन आज सबसे ज्यादा निष्क्रिय हैं। कभी-कभार प्रतीकात्मक कार्यक्रम कर देते हैं,शोकसभा कर देते हैं,सम्मेलन कर लेते हैं, कभी कभार सेमीनार कर लेते हैं। लेकिन लेखकीय अधिकारों के लिए कभी संघर्ष नहीं करते।
    लेखक संगठन की सक्रियता प्रायोजक जैसी हो गयी है। सवाल यह है कि लेखक संगठन प्रायोजक कैसे हो गया ? प्रायोजक भाव में रहने के कारण ही उसकी प्रेरणा सीमित दायरे में सक्रिय है। जब किसी कार्यक्रम का आयोजन करता है तो प्रेरक और सक्रिय के भ्रम में रहता है। कार्यक्रम खत्म और प्रेरक का भ्रम भी खत्म। प्रायोजक का भाव मूलत: वहां नहीं होता जिसका दावा किया जाता है बल्कि वहां पर होता हे जिसको छिपाकर रखा जाता है।
     प्रायोजक बगैर निवेश के लाभ लेना चाहता है। यही स्थिति लेखक संगठनों की भी है वे भी बगैर निवेश के लाभ लेना चाहते हैं। नाम कमाना चाहते हैं। मंच देना निवेश नहीं है। बल्कि मंच तो लाभ का स्रोत है।
    लेखक संगठन का निवेश आलोचनात्मक वातावरण निर्माण पर निर्भर करता है। मंच मात्र देने से आलोचनात्मक वातावरण नहीं बनता। आलोचनात्मक वातावरण अनालोचनात्मक वातावरण को नष्ट करके बनता है। इसके लिए विचारधारात्मक और सर्जनात्मक योगदान की जरूरत होती है। विचारधारात्मक-सर्जनात्मक वातावरण सीमाओं का अतिक्रमण करके ही बनता है। सीमाओं में बांधकर मंच और बहसों का आयोजन अनालोचनात्मक वातावरण को बनाए रखता है।
     कल तक लेखक संगठन जिसे प्रेरणा,अपरिहार्य,अनिवार्य और स्वाभाविक मानते थे आज प्रेरणा लेने की बजाय उससे यांत्रिकतौर पर बंधे हैं। लेखक संगठन जितने बड़े उत्साह के साथ बनते हैं उतनी ही तेजी से उनका उत्साह ठंड़ा पड़ जाता है । कल तक जो लेखक संगठन की महत्ताा पर निबंध लिखता था आज वही लेखक संगठन को अप्रासंगिक मानता है। कोई बात जरूर है जो लेखक संगठन को तमाम सक्रियता के बावजूद अप्रासंगिक बनाती है। क्या लेखकीय निष्क्रियता को संगठन के बयानों के जरिए जान सकते हैं ? जी नहीं।
     लेखक संगठन की व्याख्याएं राजनीतिक कार्य-कारण संबंधों के आधार पर आती रही हैं। कभी हमने राजनीतिक कार्य-कारण संबंध के फार्मूले के परे जाकर सोचा ही नहीं है। सवाल यह है कि लेखक संगठन की वर्तमान दशा और दिशा की क्या 'विखंडनवादी' रीडिंग संभव है ? लेखक संगठन के द्वारा विलोम निर्माण की प्रक्रिया को कभी गैर विखंडनवादी पध्दति और नजरिए के जरिए नहीं समझा जा सकता। 'सही' और 'गलत' राजनीतिक लाइन के आधार पर नहीं समझा जा सकता। 'प्रासंगिकता' और 'अप्रासंगिकता' के आधार पर नहीं समझा जा सकता। 'श्रेष्ठ' और 'निकृष्ट' के आधार पर वर्गीकृत करके नहीं समझा जा सकता।
    मसलन् यह वर्गीकरण वैध नहीं है कि ''लेखक संगठन में काम करना 'श्रेष्ठ' है और जो लेखक, संगठन का काम नहीं करते वे निकृष्ट हैं।'' उसी तरह '' जो लेखक संगठन का काम करते हैं वे निकृष्ट हैं और जो बाहर हैं वे श्रेष्ठ हैं।'' इसी तरह '' लेखक संगठन का सोच सही है, व्यक्ति के रूप में लेखक का सोच गलत है।'' अथवा 'संगठन वैध है बाकी सब अवैध है।'' ''लेखक संगठन का सत्य प्रामाणिक है ,व्यक्ति लेखक का सत्य अप्रामाणिक है'', '' साहित्यिक विधा में लिखना लेखन है और गैर साहित्यिक विधाओं जैसे मीडिया में लिखना साहित्य नहीं है।'', ''लेखक संगठन में काम करना पुण्य है और गैर सांगठनिक लेखकीय कर्म पाप है।'', ''लेखक संगठन टिकाऊ है बाकी सब नश्वर है।'' इत्यादि वर्गीकरण बोगस हैं।
    'लेखक संगठन ही सर्वस्व है' का नारा देने वाले यह भूल गए कि रचना का मूल स्रोत तो जीवन है। रचना का मूल स्रोत संगठन नहीं होता। अत: नारा होना चाहिए '' जीवन ही सर्वस्व है।'' इस नारे को भूलकर हमारे लेखक संगठनों ने मूल्य, कृति,राजनीति,विचारधारा इत्यादि चीजों को सर्वस्व बना दिया।
     यही वह बिंदु है जहां से लेखक संगठन अपने को हाशिए पर ले जाते हैं और अंत में सिर्फ प्रतीकात्मक उपस्थिति मात्र बनकर रह जाते हैं। लेखक संगठनों का जीवन के प्रति वाचिक लगाव है, वे जीवन की महत्ताा और मर्म से पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं। जीवन की जटिलाओं को उन्होंने विश्वदृष्टि से देखा नहीं है। उन्होंने कभी परवर्ती पूंजीवाद ,इलैक्ट्रोनिक मीडिया,सैटलाइट के संदर्भ में लेखन को खोलकर नहीं देखा। साहित्य के दार्शनिक आयाम की कभी चर्चा तक नहीं की।
जीवन के साथ लगाव के नाम पर जीवन के इस या उस पक्ष की ही प्रतिष्ठा की गई। इस या उस पक्ष की हिमायत की गई। हिन्दी रचनाकार के लिए जीवनमूल्य महान और जीवन नश्वर रहा है।
     वह मानता है कि वह शाश्वत सत्य रच रहा है। अपने रचे को सत्य मानना, प्रामाणिक मानना,वैध मानना और उसी के आधार पर फतवे जारी करना मूलत: कर्मफल के सिध्दान्त का साधारणीकरण है। कर्मफल के सिध्दान्त का ही परिणाम है जो सही है वह सही है जो गलत है वह गलत है।
   कर्मफल का सिद्धान्त स्त्री और दलित की अनुभूति और सामाजिक अस्मिता को स्वीकार नहीं करता। यही वजह है कि लंबे समय से लेखक संगठनों की कार्यप्रणाली में पितृसत्ताात्मक विचारधारा हावी है। जो बड़ा है वह बड़ा है,जो छोटा है वह छोटा है। सांगठनिक हायरार्की का सब समय ख्याल रखा जाता है। ऊपर की शाखा की बातें निचली शाखा को मानना अनिवार्य है। सांगठनिक हायरार्की में चूंकि जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ में कम्युनिस्ट दलों की (क्रमश: माकपा और भाकपा) केन्द्रीय भूमिका है अत: पार्टी का आदेश अंतिम आदेश होता है और लेखक संगठनों के मुख्य पदाधिकारियों को तदनुरूप ही काम करना पड़ता है। आप कितने भी अच्छे संगठनकत्तर्ाा हों, कितने ही बड़े लेखक हों, यदि कम्युनिस्ट पार्टी की अनुकरणात्मक भावना आपके अंदर नहीं है तो आपको संगठन में जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती। कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से लेखक संगठन को देखने वाला नेता अमूमन चुगद किस्म का व्यक्ति होता है जिसे किसी भी भाषा के साहित्य की समझ नहीं होती ऐसी स्थिति में वह सिर्फ अपने अनुयायी और विश्वस्त के हाथों ही संगठन का नेतृत्व सौंपना पसंद करता है। चाहे वह व्यक्ति कितना ही निकम्मा क्यों न हो।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...