जगदीश्वर चतुर्वेदी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर। पता- jcramram@gmail.com
मदनमोहन मालवीय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मदनमोहन मालवीय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शनिवार, 3 जनवरी 2015
मदनमोहन मालवीय के नजरिए का मूलाधार है धर्म
मदनमोहन मालवीय के नजरिए पर समग्रता में विचार करें तो पाएंगे कि वे दुनिया की तमाम चीजों को धर्म के नजरिए से देखते थे और यही वह चीज है जो संघ परिवार और मोदी सरकार को सबसे ज्यादा अपील करती है। इसके कारण ही उनको मोदी सरकार ने ''भारत रत्न'' दिया है। आधुनिकसमाज के निर्माण के लिए धर्म का नजरिया विकास में कम फंडामेंटलिज्म और साम्प्रदायिकता के विकास में ज्यादा मदद करता है। यही वह नजरिया है जिसके कारण वे हिन्दुत्ववादी संगठऩों के मंचों तक चले गए । मालवीयजी के नजरिए को समझने के लिए उनका लिखा एक संपादकीय है ''देशभक्ति का धर्म'',यह संपादकीय उनके समूचे नजरिए पर व्यापक रोशनी डालता है।
मालवीयजी की मुश्किल यह है कि वे आधुनिक समाज की समस्त समस्याओं की जड़ धर्मविमुखता को मानते हैं। मालवीयजी ने लिखा है '' जो लोग शुद्ध मन से प्राणियों का परम कल्याण चाहते हैं,उनको उचित हैकि वे उनको धर्म का उपदेश दें और उन्हें धर्म के मार्ग में लगावें।सुख का मूल धर्मही है। मनुष्यों का परम धन धर्म ही है। संसार की समस्त सम्पत्ति और भोग-पदार्थ मिलकर मनुष्य को सुख नहीं दे सकते,जो धर्म देता है। '' वास्तविकता यह है कि धर्म के मार्ग पर चलकर विभ्रम पैदा होते हैं। दिशाहीनता ,अनालोचनात्मकता और अ-राजनीतिक नजरिया बनता है जिससे फासिस्ट राजनीति को बल मिलता है। अकर्मण्यताबोध पुख्ता होता है। अंधविश्वासों में आस्था बनी रहती है।जबकि सामाजिक विकास के लिए इन सबसे मुक्ति प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। मालवीयजी यह समझने मेंअसमर्थ रहे कि आधुनिक भारत को धर्म के आधार खड़ा नहीं कर सकते। आधुनिक समस्याओं के समाधान धर्म के पास नहीं है। धर्म की शरण में जाकर सामाजिक समस्याओं से ध्यान हटाया जा सकता है लेकिन समस्याओं के समाधान नहीं तलाशे जा सकते।
मालवीयजी का मानना था '' मनुष्यों पर,देश व समाज में,जितनी विपत्तियां आती हैं उनका मूल कारण धर्म से विमुख होना ही होता है। '' संघ परिवार के मालवीयजी के प्रति आकर्षित होने का मूलाधार यही नजरिया है, जिसके जरिए आजकल के युवाओं के बीच में मालवीयजी की आड़ में हिन्दुत्ववादी एजेण्डे का आसानी से प्रचार किया जा रहा है।
मालवीयजी की मुश्किल यह थी कि वे आधुनिक समाज को वैज्ञानिक या समाजवैज्ञानिक नजरिए से देखने में पूरी तरह असमर्थ थे। हमें गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए कि मालवीयजी को मोदी सरकार ने भारत रत्न आखिरकार क्यों दिया ? क्या इसलिए कि उनका स्वाधीनता संग्राम में योगदान था ?या उन्होंने काशी हिन्दू वि.वि. की स्थापना की ? जी नहीं, इस तरह के काम अनेक लोगों ने उस दौर में किए हैं और मालवीयजी से ज्यादा कुर्बानियां भी दी हैं, मालवीयजी को संघ का नायक बनाने में जो चीज मदद कर रही है वह है उनका धार्मिक नजरिया, हर समस्या की जड़ में धर्म को देखना और हर समस्या का धर्म में ही समाधान खोजना। यही वह बिंदु है जहां पर संघ और सरकार एकमत हैं।यही वह आधुनिक विचारों की लड़ाई की जगह है जहां पर हमें सोचना होगा कि देश का विकास कैसे करें और किनके विचारों की रोशनी में करें, कम से कम मालवीयजी के विचार आधुनिक शक्तिशाली भारत का निर्माण करने में हमारी मदद नहीं करते।अभी तक जितने भी लोगों को भारत रत्न दिया गया उनके नजरिए का आधार धर्म नहीं था।
मालवीयजी की मुश्किल यह है कि वे आधुनिक समाज की समस्त समस्याओं की जड़ धर्मविमुखता को मानते हैं। मालवीयजी ने लिखा है '' जो लोग शुद्ध मन से प्राणियों का परम कल्याण चाहते हैं,उनको उचित हैकि वे उनको धर्म का उपदेश दें और उन्हें धर्म के मार्ग में लगावें।सुख का मूल धर्मही है। मनुष्यों का परम धन धर्म ही है। संसार की समस्त सम्पत्ति और भोग-पदार्थ मिलकर मनुष्य को सुख नहीं दे सकते,जो धर्म देता है। '' वास्तविकता यह है कि धर्म के मार्ग पर चलकर विभ्रम पैदा होते हैं। दिशाहीनता ,अनालोचनात्मकता और अ-राजनीतिक नजरिया बनता है जिससे फासिस्ट राजनीति को बल मिलता है। अकर्मण्यताबोध पुख्ता होता है। अंधविश्वासों में आस्था बनी रहती है।जबकि सामाजिक विकास के लिए इन सबसे मुक्ति प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। मालवीयजी यह समझने मेंअसमर्थ रहे कि आधुनिक भारत को धर्म के आधार खड़ा नहीं कर सकते। आधुनिक समस्याओं के समाधान धर्म के पास नहीं है। धर्म की शरण में जाकर सामाजिक समस्याओं से ध्यान हटाया जा सकता है लेकिन समस्याओं के समाधान नहीं तलाशे जा सकते।
मालवीयजी का मानना था '' मनुष्यों पर,देश व समाज में,जितनी विपत्तियां आती हैं उनका मूल कारण धर्म से विमुख होना ही होता है। '' संघ परिवार के मालवीयजी के प्रति आकर्षित होने का मूलाधार यही नजरिया है, जिसके जरिए आजकल के युवाओं के बीच में मालवीयजी की आड़ में हिन्दुत्ववादी एजेण्डे का आसानी से प्रचार किया जा रहा है।
मालवीयजी की मुश्किल यह थी कि वे आधुनिक समाज को वैज्ञानिक या समाजवैज्ञानिक नजरिए से देखने में पूरी तरह असमर्थ थे। हमें गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए कि मालवीयजी को मोदी सरकार ने भारत रत्न आखिरकार क्यों दिया ? क्या इसलिए कि उनका स्वाधीनता संग्राम में योगदान था ?या उन्होंने काशी हिन्दू वि.वि. की स्थापना की ? जी नहीं, इस तरह के काम अनेक लोगों ने उस दौर में किए हैं और मालवीयजी से ज्यादा कुर्बानियां भी दी हैं, मालवीयजी को संघ का नायक बनाने में जो चीज मदद कर रही है वह है उनका धार्मिक नजरिया, हर समस्या की जड़ में धर्म को देखना और हर समस्या का धर्म में ही समाधान खोजना। यही वह बिंदु है जहां पर संघ और सरकार एकमत हैं।यही वह आधुनिक विचारों की लड़ाई की जगह है जहां पर हमें सोचना होगा कि देश का विकास कैसे करें और किनके विचारों की रोशनी में करें, कम से कम मालवीयजी के विचार आधुनिक शक्तिशाली भारत का निर्माण करने में हमारी मदद नहीं करते।अभी तक जितने भी लोगों को भारत रत्न दिया गया उनके नजरिए का आधार धर्म नहीं था।
शनिवार, 27 दिसंबर 2014
मदनमोहन मालवीय और हिन्दू -मुस्लिम एकता की समस्या
देश में साम्प्रदायिक माहौल बिगडा हुआ है ,संघ और उनके नायक मोदी द्वारा वोट की राजनीति को बहुसंख्यकवाद की राजनीति और धर्माधारित राजनीति की ओर मोड़ा जा चुका है। यह देश के लिए सबसे ख़तरनाक चीज है। देश में चारों ओर मुस्लिम विद्वेष की बर्षा हो रही है। साथ में मदनमोहन मालवीय जी को भारतरत्न देकर सम्मानित भी किया जा रहा है, दुर्भाग्य की बात है कि मालवीयजी के विचारों के साथ संघ और मोदी सरकार का तीन- तेरह का संबंध है । संघ और उसके संगठनों की विचारधारा की धुरी है हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष , जबकि मालवीयजी के विचारों की धुरी है हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव। मोदी नारा विकास का दे रहे हैं लेकिन ज़मीनीस्तर पर बहुसंख्यकवाद की ओर जा रहे हैं। हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष को बढ़ावा दे रहे हैं,फ़ंडामेंटलिस्ट संगठनों की हिमायत कर रहे हैं।संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा भारत को हिन्दुओं का देश कहकर दुष्प्रचार किया जा रहा है। जानें और पढें संघ वाले कि मालवीयजी ने क्या लिखा था।
मदन मोहन मालवीय ने लिखा " हिन्दुस्तान में अब केवल हिन्दू ही नहीं बसते हैं - हिन्दुस्तान अब केवल उन्हीं का देश नहीं है। हिन्दुस्तान जैसे हिन्दुओं का प्यारा जन्म-स्थान है, वैसा ही मुसलमानों का भी है। ये दोनों जातियाँ अब यहाँ बसती हैं और सदा बसी रहेंगी। जितना इन दोनों में परस्पर मेल और एकता बढ़ेगी , उतनी ही देश की उन्नति करने में हमारी शक्ति बढ़ेगी और जितना ही बैर या विरोध या अनेकता रहेगी , उतने ही हम दुर्बल रहेंगे।" यह भी लिखा " जो हमारी उन्नति नहीं चाहते , वे हमको एक- दूसरे से लड़ाने के लिए यत्न करते हैं और करेंगे। लेकिन हमारे आपस में एक - दूसरे के विचार और भाव शुद्ध रहें तो हमारे किसी बैरी को हमको लड़ाने का यत्न सफल नहीं होगा। यह दु:ख की बात है कि हम लोगों में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो एक जाति को दूसरे से लड़ाने का यत्न करते हैं। हमको इस बात के कहने में कोई संकोच नहीं कि जो हिन्दू या मुसलमान ऐसा करता है, वह देश का शत्रु है। इतना ही नहीं , बल्कि वह अपनी विशेष जाति का भी शत्रु है । हमको सबको उचित है कि सब एक- दूसरे के चित्त को संताप पहुँचाने वाली बीती बातों को भूल जावें,एक- दूसरे का हित और सुख यत्नों में सहायक हों।"
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
विशिष्ट पोस्ट
मेरा बचपन- माँ के दुख और हम
माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...
-
भगत सिंह जहां एक जोशीला इंकलाबी था वह एक बहुत अच्छा विद्यार्थी भी था। उसके अध्यापक होने के नाते मैं यह बात दावे से कह सकता हूं कि उसे पढ़ान...
-
फैज अहमद फैज और उनकी शायरी की जगह और उसका मूल्य ठीक-ठीक वही बता सकते हैं , जो उर्दू जुबान और अदब के अच्छ...
-
लेव तोलस्तोय के अनुसार जीवन के प्रत्येक चरण में कुछ निश्चित विशेषताएं होती हैं,जो केवल उस चरण में पायी जाती हैं।जैसे बचपन में भावानाओ...