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बुधवार, 30 नवंबर 2016

फिदेल की माँ , धर्म और गरीबी

        फिदेल कास्त्रो को स्पष्टवादिता का संस्कार क्रांति से मिला। क्रांतिकारी होने के नाते वे हर बात को स्पष्ट ढ़ंग से कहते थे।फिदेल का मानना था ´क्रांतिकारी राजनीतिज्ञ हर चीज के बारे में स्पष्ट और बेबाक बोलते हैं।´ यही स्पष्टवादिता क्रांतिकारियों को अभिव्यक्ति के मामले में अन्य विचारधारा के नेताओ से अलग करती है।मार्क्सवादियों में धर्मसंबंधी निजी सवालों के उत्तर देते समय अनेक किस्म के विभ्रम नजर आते हैं।लेकिन फिदेल के अंदर कोई विभ्रम नजर नहीं आते।

जब एफ.बिट्टो ने फिदेल से सवाल पूछा कि आपका जन्म धार्मिक परिवार में हुआ है ॽ तो फिदेल ने कहा इस सवाल का मैं किस तरह जवाब दूँ ॽ मैं इस सवाल का इस तरह उत्तर देना चाहूँगा,पहली बात यह कि मैं एक धार्मिक राष्ट्र से आता हूँ,दूसरी बात यह कि मैं एक धार्मिक परिवार में जन्मा,मेरी माँ लीना धार्मिक महिला थीं।मेरे पिता भी धार्मिक व्यक्ति थे।गांव में मेरा जन्म हुआ और मेरी माँ भी गांव की ही रहने वाली थीं।वह क्यूबा की रहने वाली थी।जबकि पिता गलीशिया,स्पेन के अत्यंत गरीब किसान थे।

फिदेल की माँ को किसी ईसाई मिशनरी ने धर्म की शिक्षा नहीं दी थी,वह एकदम अनपढ़ थीं। लेकिन उनकी गहरी धार्मिक आस्थाएं थीं।उन्होंने वयस्क होने के बाद अपने आप लिखना-पढ़ना सीखा। फिदेल के पिता का नाम एंजेल था। फिदेल ने कहा ´मेरी माँ एकदम निरक्षर थीं,उसने अपने आप लिखना-पढ़ना सीखा,मुझे याद नहीं है कि उसको लिखना-पढना सिखाने के लिए कोई शिक्षक मिला था,क्योंकि उसने किसी भी शिक्षक का कभी कोई जिक्र नहीं किया।उसने बहुत परिश्रम करके लिखना-पढ़ना सीखा,मैंने कभी नहीं सुना कि वह कभी पढ़ने के लिए स्कूल गयी ,वह स्व-शिक्षित थी,उसने कभी किसी स्कूल और चर्च में जाकर कोई शिक्षा ग्रहण नहीं की।मेरा मानना है उसके धार्मिक विश्वासों का स्रोत उसके परिवार की धार्मिक परंपराएं थीं।खासकर उसकी माँ (फिदेल की नानी) और माँ की माँ बड़ी धार्मिक थीं।´

बिट्टो ने फिदेल से पूछा कि क्या आपकी माँ नियमित चर्च जाती थी तो फिदेल ने कहा ´ वे नियमित चर्च नहीं जाती थीं,क्योंकि मेरा जहाँ जन्म हुआ था वह इलाका शहर से बहुत दूर गांव में पड़ता था,वहां कोई चर्च नहीं था।´

फिदेल का जहां जन्म हुआ उस गांव का नाम था बीरान,इस गांव में कुछ बड़ी इमारतें थी,कुछ रिहायशी घर थे,इन सबका स्पेनिश स्थापत्य था.चूंकि फिदेल के पिता स्पेनिश थे,अतः घर का स्थापत्य स्पेनिश था।उनके पास गांव में एक टुकड़ा जमीन का प्लॉट था,जिसमें खेती होती थी और लकड़ी का घर भी था,साथ ही पशुपालन भी करते थे।जाड़ों में पशुओं को घर के अंदर रखना होता था।घर में सूअर और गाएं थीं जिनका परिवार पालन-पोषण करता था।

दिलचस्प बात है फिदेल कास्त्रो के यहां तकरीबन बीस-तीस गाएं भी थीं, वे जब छह साल की उम्र के थे तो जाडों में घर में गायों के साथ सोते थे। फिदेल का बचपन का यह दौर गाय के गोबर और दूध के बीच गुजरा।

फिदेल की माँ की मृत्यु 6अगस्त1963 को हुई,यानी क्यूबा की क्रांति के छह महिने बाद।जबकि पिता की मृत्यु पहले ही 21अक्टूबर1956 को हो चुकी थी।उस समय फिदेल 30साल और दो महिने के थे।फिदेल ने अपनी आत्मकथा ´माई लाइफः फिदेल कास्त्रो´ में लिखा है कि वे अपनी मां के धार्मिक विश्वासों और आस्थाओं का हमेशा सम्मान करते थे।उनको एक क्रांतिकारी की माँ होने के नाते बहुत कष्ट उठाने पड़े।वे अत्यंत गरीब और सहिष्णु थीं।







धर्म और फिदेल कास्त्रो

फिदेल कास्त्रो के बारे में यह सब जानते हैं कि वे क्रांतिकारी थे,मार्क्सवादी थे,लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि फिदेल बेहतरीन धार्मिक समझ वाले व्यक्ति भी थे।फिदेल ने धर्म को लेकर जिस नजरिए को व्यक्त किया उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।यह सच है धर्म का जो रूप हम आज देखते हैं वह बहुत कुछ मूल रूप से भिन्न है।एक बेहतरीन मार्क्सवादी वह है जो धर्म को उसके सही रूप में समझे और धर्म की सही सामाजिक भूमिका पर जोर दे।
          हमारे यहां राजसत्ता और उसके संचालक धर्म के प्रचलित रूपों के सामने समर्पण करके रहते हैं, धर्म की विकृतियों के खिलाफ कभी जनता को सचेत नहीं करते,धर्म की गलत मान्यताओं को कभी चुनौती नहीं देते हैं ,धर्म का अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए दुरूपयोग करते हैं और इसके लिए सर्वधर्म समभाव की संवैधानिक समझ की आड़ लेते हैं।संविधान की आड़ लेकर धर्म की ह्रासशील प्रवृत्तियों को संरक्षण देने के कारण ही आज हमारे समाज में धर्म,संत-महंत,पंडे,पुजारी,तांत्रिक ,ढोंगी आदि का समाज में तेजी से जनाधार बढ़ा है,इन लोगों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है।इसके कारण समाज में अ-सामाजिकता बढ़ी है, लोकतंत्र विरोधी ताकतें मजबूत हुई हैं।

यह सच है हम पैदा होते हैं धर्मकी छाया में और सारी जिंदगी उसकी छाया में ही पड़े रहते हैं।धर्म की छाया में रहने की बजाय उसके बाहर निकलकर समाज की छाया में रहना ज्यादा सार्थक होता है। धर्म की छाया यानी झूठ की छाया । हम सारी जिंदगी झूठ के साथ शादी करके रहते हैं,झूठ में जीवन जीते हैं,झूठ से इस कदर घिरे रहते हैं कि सत्य की आवाज हमको बहुत मुश्किल से सुनाई देती है।झूठ के साथ रहते-रहते झूठ के अभ्यस्त हो जाते हैं और फिर झूठ को ही सच मानने लगते हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि सत्य से हम कोसों दूर चले जाते हैं।

धर्म पर बातें करते समय उसके मूल स्वरूप पर हमेशा बातें करने की जरूरत है।धर्म को झूठ से मुक्त करने की जरूरत है।धर्म को झूठ से मुक्त करने का अर्थ है धर्म को धार्मिक प्रपंचों से बाहर ले जाकर गरीब के मुक्ति प्रयासों से जोड़ना। इन दिनों धर्म को संतों-पंडितों ने अपहृत कर लिया है।अब हम धर्म के मूल स्वरूप और मूल भूमिका के बारे में एकदम नहीं जानते लेकिन उन तमाम किस्म की भूमिकाओं को जरूर जानते हैं जिनको कालांतर में धर्म के धंधेबाजों ने पैदा किया है। सवाल यह है धर्म यदि गरीब का संबल है तो राजनीति में धर्म को गरीबों की राजनीति से रणनीतिक तौर पर जुड़ना चाहिए।लेकिन होता उलटा है गरीबों की राजनीति करने वालों की बजाय धर्म और धार्मिक संस्थानों का अमीरों की राजनीति करने वालों की राजनीति से गहरा संबंध नजर आता है।

धर्म गरीब के दुखों की अभिव्यक्ति है।मार्क्सवाद भी गरीबों के दुखों की अभिव्यक्ति है।इसलिए धर्म और मार्क्सवाद में गहरा संबंध बनता है।लेकिन धर्म और मार्क्सवाद के मानने वालों में इसे लेकर विभ्रम सहज ही देख सकते हैं। फिदेल कास्त्रो इस प्रसंग में खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। वे धर्म की व्याख्या करते हुए गरीब को मूलाधार बनाते हैं और कहते हैं कि ईसाईयत और मार्क्सवाद दोनों के मूल में है गरीब की हिमायत करना,गरीब की रक्षा करना,गरीब को गरीबी से मुक्त करना। इसलिए ईसाईयत और मार्क्सवाद में स्थायी रणनीतिक संबंध है।इसी आधार पर वे पुख्ता नैतिक,राजनैतिकऔर सामाजिक आधार का निर्माण करते हैं।

फिदेल के धर्म संबंधी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली शानदार किताब है ´फिदेल एंड रिलीजन´,यह किताब FREI BETTO ने लिखी है।इसमें फिदेल से उनकी 23घंटे तक चली बातचीत का विस्तृत लेखाजोखा है।यह किताब मूलतःक्यूबा और लैटिन अमेरिका में धर्म और मार्क्सवाद,धर्म और क्रांतिकारियों के अंतस्संबंधों पर विस्तार से रोशनी डालती है।इस बातचीत में फिदेल से 9 घंटे तक सिर्फ धर्म संबंधी सवालों को पूछा गया।धर्म और मार्क्सवाद के अन्तस्संबंध को समझने के लिए यह पुस्तक मददगार साबित हो सकती है।इस किताब को भारत में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने 1987 में अंग्रेजी में छापा था। इस किताब में लिए गए इंटरव्यू कई बैठकों में संपन्न हुए।ये इंटरव्यू 1985 में लिए गए थे।ये किसी समाजवादी राष्ट्र राष्ट्राध्यक्ष के द्वारा धर्म पर दिए गए पहले विस्तृत साक्षात्कार हैं। आमतौर पर मार्क्सवादी शासकों ने धर्म पर इस तरह के इंटरव्यू नहीं दिए हैं।













रविवार, 27 नवंबर 2016

फिदेल की औरतें और चंडूखाने के चंडूबाज


            हिन्दू फंडामेंटलिस्टों और समाजवाद विरोधियों का जनप्रिय धंधा है चरित्र-हनन अभियान चलाना। पहले ये लोग स्वायत्त ढ़ंग से यह काम करते थे, लोकल थे,लेकिन मोदी के उभार के बाद हिन्दू फंडामेंटलिस्टों ने भी तालिबानियों की तरह साइबर तरक्की की है, वे अब लोकल नहीं रहे,साइबर में आते ही ग्लोबल हो गए हैं। हिन्दू फंडामेंटलिस्टों का फेसबुक पर प्रिय धंधा है कम्युनिस्टों के खिलाफ मिथ्या प्रचार करना,समाजवाद के बारे में,समाजवादी नेताओं और विचारकों के बारे में कपोल-कल्पित कहानियां प्रचारित-प्रसारित करना।ये सल में चंडूबाज हैं।

फिदेल कास्त्रो की मौत के बाद सारी दुनिया में फिदेल के चरित्र-हनन की आंधी चल रही है।इस आंधी में अनेक रंगत के लोग शामिल हैं,इनमें जेएनयू के पुराने प्रतिक्रियावादी और मोदीभक्त भी शामिल हैं।ये लोग जब जेएनयू में पढ़ते थे,तब भी इनको समाजवाद और साम्यवाद से एलर्जी थी,आज भी है,कहने को ये शिक्षित हैं,लेकिन साम्यवाद को लेकर ये लोग किताब,विचार,विमर्श,तथ्य और सत्य किसी से संबंध नहीं रखते,सिर्फ चंडूबाजों की तरह फेसबुक पर लिख रहे हैं।इनके अलावा अनेक आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं जो आए दिन अपनी साम्यवाद विरोधी चंडू आवाजें सुनाते रहते हैं। हाल में इन लोगों ने फिदेल कास्त्रो के निजी जीवन को लेकर घटिया किस्म की चंडूखाने की खबरें प्रसारित की हैं।इनमें कोई सच्चाई नहीं है।

यह सच है फिदेल कास्त्रो की निजी जिंदगी के बारे में दुनिया बहुत कम जानती है।स्वयं जिन परिस्थितियों में कास्त्रो जैसे क्रांतिकारी काम करते रहे हैं उसमें सब कुछ सार्वजनिक करके रखकर सत्ता चलाना बहुत ही मुश्किल काम है,खासकर जब सामने सीआईए और बहुराष्ट्रीय मीडिया घराने जहर उगलने के लिए खड़े हों। इस स्थिति से निबटने का सबसे बेहतर तरीका यही होता कि स्वयं कास्त्रो अपने परिवार,पत्नी,बच्चे,माँ-बाप,भाई आदि के बारे में स्वयं ही कुछ लिखते,इससे विभ्रम पैदा नहीं होता।

मेरा मानना है क्रांतिकारियों को अपने परिवार और परिवारीजनों के बारे में स्वयं लिखना चाहिए,इससे तथ्य और सत्य के बीच किसी तरह के विभ्रम की संभावनाएं नहीं रहतीं।इसके बावजूद यह सच है कि फिदेल कास्त्रो अनुशासित क्रांतिकारी थे।निजी और सार्वजनिक जीवन में औरतों के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान था और समानता का भाव था।इस नजरिए को क्यूबा के सामाजिक यथार्थ की रोशनी में देखना चाहिए,न कि सीआईए के प्रचार अभियान के नजरिए से।

सवाल यह है क्यूबा में क्रांति के पहले औरतों का जीवन स्तर क्या था और आज क्या है ॽ अथवा फिदेल कास्त्रो के जमाने में क्या था ॽ जो फिदेल की 25हजार रखैलों का फेसबुक पर बार-बार जिक्र कर रहे हैं वे यह नहीं बताते कि उनकी सूचना का स्रोत क्या है ॽ उलेखनीय है सीआईए के फिदेल के खिलाफ जब सारे मिथ्या प्रचार अभियान धराशायी हो गए तब अंतिम अस्त्र के रूप में 25हजार रखैलों की खबर को चंडूबाजों ने मीडिया में प्रसारित किया।

क्यूबा और फिदेल पर बातें करते समय यह ध्यान रखें कि अमेरिका में एक बहुत बड़ा तंत्र है जिसको फिदेल और क्यूबा के खिलाफ मनगढ़ंत कहानियां गढ़ने के लिए ही अरबों रूपये दिए जाते हैं। इन मनगढ़ंत कहानियों को सबसे पहले सीआईए के चंडूबाज तैयार करते हैं और उसके बाद सारी दुनिया में मीडिया एक ही झटके में प्रचारित-प्रसारित कर देता है। फिदेल की 25 हजार रखैलों की कहानी इसी सीआईए के कारखाने की देन है।इस कहानी का जन्मस्थान है मियामी।

ध्यान रहे फिदेल की मौत के बाद फिदेल के किलाफ सबसे ज्यादा घृणाभरे जुलूस और नारे मियामी में लगे हैं।मियामी उन तमाम क्यूबाईयों का बसेरा है जो क्यूबा को छोड़कर चले आए या फिर जिनके क्यूबा के प्रशासन से मतैक्य नहीं था या फिर जिनको क्यूबा में मानवाधिकार हनन नजर आ रहा था,इस तरह के लोगों को अमेरिका ने क्रांति के बाद के समय से ही हर स्तर पर प्रलोभन देकर प्रोत्साहित किया और उनको फिदेल और क्यूबा की क्रांति के खिलाफ प्रचार के औजार की तरह इस्तेमाल किया। सीआईए किस मनगढ़ंत कहानियां बनाता रहा है इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे।





फिदेल और सीआईए के मेढ़क -

       कल फिदेल कास्त्रो की मौत हुई,क्रांति के हमदर्दों को इससे दुख पहुंचा,वे फेसबुक पर उन पर लिख रहे हैं, सारी दुनिया में फिदेल की मौत की खबर प्रमुख खबर बनी,लेकिन हमारे देश में क्रांति विरोधी,समाजवाद विरोधी और मोदीपंथी लोग फिदेल के खिलाफ जहर उगलते हुए सक्रिय हो गए।

अरे भाई,जब फिदेल से कोई लेना-देना नहीं है तो फिर उनकी मौत पर यह मेढ़कों की तरह टर्र-टर्र क्यों ? मरे फिदेल हैं लेकिन आप लोगों के दिमाग का कैंसर क्यों फट पड़ा?

हिन्दू सभ्यता की परंपरा मान्यता है जब भी कोई व्यक्ति मरता है तो उसके गुण बताए जाते हैं,लेकिन इन दिनों मोदीपंथी जंगलियों की एक नई पौध पैदा हुई है जो उनकी मौत पर घृणा अभियान चला रहे हैं।लगता है इन लोगों के अंदर हिन्दुस्तान और हिन्दू धर्म की सभ्यता का कोई असर ही नहीं है !

कल से जिन लोगों ने फिदेल के बारे गंदा,जहरीला प्रचार किया है ,वे वस्तुतःन तो क्यूबा को जानते हैं और फिदेल को जानते हैं।उनको यदि जानकारी है तो सीआईए द्वारा पेश की गयी सूचनाओं की,वे सीआईए गुलामों की तरह फेसबुक से लेकर मीडिया तक फिदेल के बारे में सफेद झूठ की वर्षा कर रहे हैं। इस तरह के लोग क्यूबा के बारे में भारत की सर्वमान्य नीति की मुखालफत कर रहे हैं और सीआईए के एजेंट का काम कर रहे हैं।मोदीपंथियों की यह देशभक्ति नहीं बल्कि देशद्रोही हरकत है।

फिदेल कास्त्रो क्या थे और क्या बन गए ,क्यूबा क्या था और आज किस रूप में सारी दुनिया के सामने खड़ा है,वह अकल्पनीय मिसाल है सामाजिक परिवर्तन की।

क्यूबा की अमेरिका द्वारा पांच दशक तक की गयी लंबी आर्थिक नाकेबंदी ,सीआईएके षडयंत्र ,भाड़े के सैनिकों और बुद्धिजीवियों की विश्वव्यापी फौज और बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों के संगठित अभियान के बाद भी फिदेल और क्यूबा का सामाजिक परिवर्तन के रास्ते पर आगे बढ़ते जाना और दुनिया में क्यूबा का एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़े रहना अपने आपमें प्रशासनिक -कूटनीतिक कौशल की शानदार मिसाल है।

फिदेल का भारत के साथ खास संबंध था,जेएनयू के साथ खास संबंध था, जेएनयू के छात्र आंदोलन के प्रेरकों में फिदेल अग्रणी थे,देश में क्यूबा को लेकर जितने अभियान चले हैं उनमें भारत के नौजवानों की केन्द्रीय भूमिका रही है।

क्यूबा के कष्ट के दिनों में भारत की जनता और सरकार फिदेल कास्त्रो और क्यूबा की जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही है।लाखों नौजवानों ने चंदा देकर,किसानों ने गेंहूँ देकर,मजदूरों ने अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से चंदा देकर क्यूबा की क्रांतिकारी सरकार की कठिन समय में रक्षा की है।समाजवाद और क्रांति के पक्ष में इस तरह की पक्षधरता विरल है।

खासकर सोवियत संघ के विघटन के बाद क्यूबा की क्रांतिकारी सत्ता को बचाने में भारत की सरकार और जनता की शानदार भूमिका रही है।



भारत - क्यूबा मित्रता का मूलाधार है फिदेल कास्त्रो और उनका नजरिया।फिदेल के नजरिए और भारत के नजरिए में अनेक स्तरों पर नीतिगत साम्य रहा है,भारत के कम्युनिस्टों और उदारवादियों के साथ क्यूबा की गहरी मित्रता रही है,यह ऐसी मित्रता है जो कठिन चुनौतीपूर्ण समय में खरी उतरी है।इस मित्रता को अमेरिकी दवाब तक तोड़ नहीं पाया।

बुधवार, 9 मार्च 2011

चे ग्वेरा की मौत पर फिदेल कास्त्रो-समापन किश्त

7 अक्टूबर को लिखे चे डायरी के पन्नों के अनुसार : 'आज का दिन अविस्मरणीय है क्योंकि बिना किसी बाधा या परेशानी या संकट के आज गुरिल्ला संघर्ष के 11 महीने पूरे हो गए।' 'बिना किसी संकट के गुरिल्ला संघर्ष के 11 महीने पूरे होना', यह तथ्य गुरिल्ला फौजों की रणनीतिक स्थिति के बारे में बताता है। उनके अनुसार इस दौर में कोई परेशानी नहीं आई। इस विषय पर विचार करना चाहिए कि चे यह मानते थे कि कोई गंभीर परिस्थिति विद्यमान है।
डायरी के अनुसार : 'लगभग 12 बजकर 20 मिनट पर जहां हम लोग रह रहे थे, वहां एक बूढ़ी महिला अपनी बकरियों के साथ दर्रे में आई और उसे बंदी बना लिया गया। उसने हमें सिपाहियों के बारे में कोई संतोषजनक सूचना नहीं दी। उसने सामान्य रूप से यही दोहराया कि वह कुछ नहीं जानती है। और यह कि वह इस क्षेत्र में भटक गई है। उसने हमें केवल सड़कों के बारे में बताया। जिस तरह से उस बूढ़ी महिला ने हम लोगों को कुछ बातें बताईं, उसके अनुसार हम लोग हिग्यूरा से एक लीग (3.5 मील), जेग्यूई से भी एक लीग और पूसरे से 6 लीग की दूरी पर हैं। और एक बजकर बीस मिनट पर....' उन्होंने यहां एक नाम दिया है 'एंसिटो और....बूढ़ी महिला के घर गए। उसकी एक बेटी बिस्तर पर पड़ी (शय्याग्रस्त) थी। उन लोगों ने उसे 50 पैसे दिए और उससे कहा कि वह चुप रहे। लेकिन उन लोगों को थोड़ी सी यह आशंका जरूर हुई कि वह अपने वादे से मुकर जाएगी। ऐसे में हम 17 व्यक्ति चंद्रमा की रोशनी में ही चल पड़े। यह जाना बहुत खतरनाक था। और हम जहां ठहरे थे वहां हमारी उपस्थिति के ढेरों चिह्न छूट गए थे। इधर-उधर कोई घर नहीं था, लेकिन दो पारानोस के बीच के रास्ते पर कुछ आलू जरूर गिर पड़े थे।' पारानोस के बीच यह पंक्ति कहती प्रतीत होती है कि यह कोई वनस्पतियों से भरी दो पहाड़ियां होंगी, '...इसलिए हम उसी दिशा में आगे बढ़ते चले गए।'
कुछ चीजें यहां अच्छी तरह अथवा स्पष्ट रूप में नहीं समझी जा रही हैं। डायरी के अनुसार : 'सेना को यह प्रभावकारी सूचना है कि यहां लगभग 250 क्रांतिकारी उपस्थित हैं।' इस पंक्ति के साथ ही डायरी का यह पृष्ठ खतम होता है।
चे एक ऐसे क्षेत्र के बारे में ठीक-ठीक बता रहे हैं। बिलकुल इसी के समान स्थिति का उन्होंने उस क्षेत्र की पहले व्याख्या की, जिसे उन्होंने रात में पार किया था। उन्होंने इस बात की ओर इशारा किया कि यह घाटी ऊंची चोटियों वाली और वनस्पतियों से ढकी है। उन्होंने जो अंतिम चीज लिखी है, उसमें कहते हैं : 'हममें से 17 लोगों ने चांद की मध्दिम रोशनी में...ऐसी स्थिति में एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर जाना खतरनाक था, और इससे भी खतरनाक कि हमने अपने पीछे कई पदचिह्नों को छोड़ दिया...'हम इन सभी गूढ़ार्थों को छोड़ देते हैं। कभी-कभी अर्थों की क्रमानुसार शब्दों के अर्थों का अंदाजा करना होता है।
डायरी में उसी समान क्षेत्र को इंगित किया गया है, जिसे हमने पहले29 सितंबर के डिस्पैच और 8 अक्टूबर को न्यूयार्क टाइम्स के लेख में इंगित किया है। इसके बाद के भी कई डिस्पैच हैं और उन सभी डिस्पैचों में समान क्षेत्र का विवरण दर्ज है।
29 सितंबर को उन्होंने केवल एक ही घाटी के विषय में चर्चा की थी, जो पहाड़ियों द्वारा विभाजित है। पहाड़ियां वनस्पतियों से ढकी हुई हैं, और उन्हें पार करना बहुत ही मुश्किल है। वे लोग जंगल के रास्ते में होंगे या ऊंची जमीन पर आ गए होंगे। यह एक ऐसी स्थिति थी जहां प्रत्यक्ष हुए (दृष्टव्य हुए) कोई भी गतिविधि करना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभाव्य थी।
गुरिल्ला इस समय इसी क्षेत्र विशेष में थे। यह डायरी की एक इंदराज से भी स्पष्ट होता है। इसी डायरी के 7 अक्टूबर का नोट सूचना देता है कि वे किसी भू-भाग की खोज में थे। चे वहां 16 अन्य आदमियों के साथ थे, क्योंकि वह कहते हैं, 'हमने 17 व्यक्तियों के साथ जगह छोड़ी' और किसी स्थान की तलाश में आगे बढ़े। इसके साथ वह यह भी बताते हैं कि 'हम यहां से एक लीग की, दूसरी जगह से एक लीग की दूरी पर और तीसरी जगह से छह लीग की दूरी पर थे।' तात्पर्य यह है कि वे अपनी वास्तविक स्थिति का आकलन करने का प्रयास कर रहे थे। और जैसे ही अपनी स्थिति का निर्धारण किया, उन्होंने अपने आगे बढ़ने की दिशा तय कर ली।
पहले और बाद की सूचनाओं में स्पष्ट रूप से साम्यता विद्यमान है। इसके अलावा डायरी भी कम-ज्यादा मात्रा में उन परिस्थितियों के बारे में स्पष्ट रूप से बताती है, जो वहां विद्यमान थीं : भेदिए की भूमिका, अपने साथ के लोगों की ठीक-ठीक संख्या, और जहां वे लोग थे उस स्थान का स्पष्ट विवरण।
यह बात बिलकुल स्पष्ट हो गई है कि वे बिलकुल ही नए इलाके में थे। कोई भी गुरिल्ला दस्ता या कोई फौजी टुकड़ी किसी क्षेत्र में तभी जाती है जब उस क्षेत्र के बारे में पूरी सूचना हो, विस्तृत नक्शे आदि हों, यहां तक कि उन स्थानों के चित्र आदि भी हों। लेकिन वे लोग इस नए क्षेत्र में एकाएक गए, या ढंग से कहा जाए तो वे लोग उस क्षेत्र में अलग-थलग पड़ गए थे। वे लोग पहले से ही पहाड़ी क्षेत्र में थे और अब अचानक उन सबको वनस्पतियों से भरे हुए निष्क्रिय जीवन वाले भूभाग का सामना करना पड़ा। साफ अर्थों में गुरिल्ला बल उस क्षेत्र से वंचित हो चुके थे, जो गुरिल्ला युध्द के लिए बेहतरीन थी। ऐसे में गुरिल्लाओं के लिए जरूरी हो गया था कि वे एक ऐसे क्षेत्र में जाएं, जो उनके लिए रणनीतिक रूप से बेहतर और सुरक्षित हो। इसके लिए जरूरी था कि निरंतर चलते रहा जाए। हममें भी ऐसी ही स्थिति का सामना सिएरा मिस्ट्रा में शुरुआती दिनों में करना पड़ा था। ऐसी स्थिति में हम पहले एक खोजी दल को आगे भेजते थे, और पूर्ण रूप में संतुष्ट होने पर आगे बढ़ते थे।
हम बिलकुल नहीं जानते कि वास्तव में वह क्षेत्र किस तरह से अन्य स्थानों से अलग-थलग हो गया था या उस क्षेत्र का किस तरह अन्य स्थानों से संपर्क कट गया था। हमें यह भी नहीं पता कि जिस क्षेत्र में वह लोग पहुंचे, वह क्षेत्र एक घाटी में स्थित था, या वहां घाटियों की एक लंबी शृंखला विद्यमान थी। इसके साथ-साथ वह इलाका कैसा था, जिसे उन लोगों ने पार किया था। यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पूर्वोक्त किस्म के क्षेत्र को एक रात की यात्रा में नहीं पार किया जा सकता। वह भी यह जानते हुए कि शत्रुओं के हौसले बुलंद हैं। ऐसे वक्त पर हमें उस स्थान के विषय में पूर्ण जानकारी रखनी होती है। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि दमनकारी फौजों की इस तरह की आशाएं व्यर्थ साबित होती हैं, और अधिकतर ये आशाएं पूरी नहीं होती हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि ऐसी स्थिति में संघर्ष जो भी शक्ल अख्तियार करता, उसके परिणाम के बारे में कोई भी भविष्यवाणी निश्चित तौर पर नहीं की जा सकती। स्पष्ट रूप से वहां भारी पैमाने पर सैन्य टुकड़ियों की आवाजाही थी। और ये फौजी टुकड़ियां उधर की गईं, जिसके विषय में पूर्व में सूचना दी गई थी।
जाहिर तौर पर उस क्षेत्र में भारी पैमाने पर फौजों का आगमन हुआ। फौजें चिह्नित स्थान की ओर ही बढ़ीं। इस क्षेत्र की स्थिति के कारण ही दमनकारी फौजों की आशाओं में बढ़ोतरी हुई, क्योंकि यहां गुरिल्ला दस्तों का दमनकारी फौज से अचानक ही आमना-सामना हुआ। यदि गुरिल्ला बलों और फौजों के बीच अचानक से आमना-सामना हुआ है, तो इस बात की संभावना है कि चे मारे गए होंगे, क्योंकि इस तरह की धूर्तताओं के बारे में मैं पहले ही बता चुका हूं।
यह स्पष्ट है कि न तो गुरिल्लाओं ने और न ही दमनकारी शक्तियों ने पहले आक्रमण किया। यह भी स्पष्ट है कि एक संघर्षपूर्ण स्थिति ने जन्म ले लिया था। और सभी संकेतकों के अनुसार, जब संघर्ष हुआ, चे ने कार्रवाई की। जैसा पहले कहा गया, सभी किस्म के प्राप्त संकेतकों के आधार पर हम आगे की कार्रवाइयों का मूल्यांकन करेंगे। गुरिल्ला उसी भाग में आगे बढ़ते गए या उस स्थान से हटने का प्रयास किया, और कोशिश की कि उस स्थान पर जाया जाए जहां बाकी लड़ाके थे। यह सारी स्थिति चे के चारित्रिक संघर्ष के विषय में बताता है, साथ ही पता यह भी चलता है कि वह पहले से ही घायल थे और बाकी लोगों की स्थिति भी 'व्यक्तिविहीन भूमि' जैसी स्थिति थी। यह भी स्पष्ट है कि जब उनके साथियों ने चे को घायल देखा और पाया कि वे खतरे की स्थिति में हैं, इस तथ्य के बाद ही उन लोगों ने वहां से जाने का निश्चिय किया, क्योंकि अब यह संघर्ष किसी सामान्य परिस्थिति में लड़ जाने वाले गुरिल्ला युध्द से भिन्न स्थिति में पहुंच गया था। यह संघर्ष 4 घंटे चला, और कुछ अन्य लोगों के मुताबिक यह संघर्ष 5 से 6 घंटे चला।
सामान्य तौर पर कोई भी गुरिल्ला दस्ता इस तरह के युध्दों को नहीं लड़ना चाहता, जिसमें शत्रुओं की संख्या ज्यादा हो। यदि शत्रुओं को भी समय दे दिया जाए तो वह हमेशा ही गुरिल्लाओं को घेर लेते हैं। गुरिल्ला यदि इस तरह की असामान्य परिस्थितियों में फंसते हैं, तो ज्यादा से ज्यादा चार, पांच या छह घंटे ही संघर्ष करने में सक्षम होते हैं। कई अन्य कारणों से भी गुरिल्ला दस्तों के पास हथियारों की संख्या के आधार पर भी इतनी ही देर संघर्ष कर सकते हैं। यह एक अन्य मामला है जिसका हमने मूल्यांकन किया और जिसे समझने का प्रयास किया।
जब आप कोई न्यूज डिस्पैच पढ़ते हैं, गुरिल्ला संघर्ष का अनुभव रखने वाले व्यक्ति आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि वास्तव में क्या घटनाक्रम हुआ होगा। वह भी तब जब गुरिल्लाओं का सामना किसी दमनकारी शक्ति के साथ आमने-सामने की स्थिति में होता है। इसमें गलतियां नहीं होतीं, बल्कि सामान्य तौर पर इस तरह के मामले में दमनकारी फौज अपने अग्रभाग के सुरक्षा दस्ते और कई आदमियों को खो देती है। इसमें हथियारों का नुकसान हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। यह गुरिल्लाओं की संख्या और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसी तरह, जब गुरिल्ला शक्तियां किसी दमनकारी फौज पर आक्रमण करती हैं, ऐसे समय पर गुरिल्ला शक्तियों की संख्या कम ही होती है। जाहिर बात है कि इस तरह की स्थिति में आक्रमणकरियों का अधिक नुकसान नहीं होता है। यह युध्द का एक सामान्य नियम है। इस दिए गए उदाहरण में, यदि इस मामले में दोनों ही पक्षों की ओर से आक्रमण नहीं किया गया होता, तो यह मामला साफ होता और वास्तविक लंबी लड़ाई का संकेतक होता। यह संकतेक कुछ अप्रत्याशित घटित होने का भी सूचक है।
तथ्यात्मक रूप से सैन्य सूचनाएं बताती हैं कि इस संघर्ष में कई सारे सैनिक घायल हुए और मारे गए। जबकि गुरिल्लाओं की ओर से घायल होने वालों की संख्या मात्र 10 थी। पहला पक्ष उन्हें 5 ही बताता है, यह अपेक्षाकृत अविश्वसनीय है, लेकिन इससे भी हमारा एक सरोकार जुड़ता है। शुरुआती सूचनाओं से पता चलता है कि घायल होने वालों में चे पहले व्यक्ति थे और वह एक मनुष्यविहीन भूमि (नो मैन्स लैंड) जैसी स्थिति में थे। ये केवल वे परिस्थितियां हैं, जिनके अंतर्गत गुरिल्लाओं ने लंबा संघर्ष किया। अंतिम व्यक्ति तक ने रात घिरने तक संघर्ष किया। यानी ऐसी स्थिति में निर्णायक तथ्य केवल परिस्थितियां हैंकेवल परिस्थितियां! विशेष रूप से इसी पक्ष से हमारा सबसे अधिक सरोकार है। सामान्य मामलों में जब एक या कई समूह आक्रमण में व्यस्त होते हैं, उस समय परिस्थितियों का चरित्र ज्यादा स्पष्ट होता है। लेकिन कोई भी गुरिल्ला दस्ता उन फौजी टुकड़ियों से अपना संघर्ष 5 या 6 घंटे नहीं चलाता है, वह भी तब जबकि शत्रुओं की संख्या ज्यादा हो, उनके पास ज्यादा शस्त्र हों, साथ ही साथ गुरिल्लाओं की संख्या कम हो।
जिस किसी को गुरिल्ला युध्द का अनुभव है, वह जानता है कि इस तरह में एक पक्ष का दूसरे पर आक्रमण नहीं होता। संघर्ष का यह तरीका गुरिल्ला संघर्ष का चरित्र नहीं है। इस मामले में अस्वाभाविक तथ्य यह है कि चे घायल हो गए थे। अपने साथियों में वे वह अति-मानवीय, निर्भीक, प्रयास करने वाले और हर परिस्थितियों में खतरा उठाने वाले व्यक्ति थे। चे इस स्थिति में भी लड़ते रहे और शत्रुओं में से 10 लोगों को क्षति पहुंचाई; यह संख्या तो शत्रुओं के हवाले से ही बताई गई है, यह उससे ज्यादा भी हो सकती है।
तथ्यों का यह हिस्सा वह है, जिसे मैंने पहले उध्दृत किया। और इन्हीं तथ्यों में दर्ज स्थितियों और अन्य चीजों ने हमें परिस्थितियों के बारे में कोई निर्णय लेने में सक्षम किया है।
जैसा कि मैंने पहले कहा कि विवाद इस प्रश्न से उत्पन्न होता है कि बाद में क्या हुआ। प्रश्न यह है कि चे की (संघर्ष के) तुरंत मृत्यु हो गई, या वे घायल रहे और दमनकारी फौज द्वारा कुछ घंटों बाद जीवित अवस्था में पकड़े गए। उन्हें तभी पकड़ना संभव था, जबकि वह बेहोश हों, या अपने जख्मों से पूरी तरह से अक्षम हो गए हों, या उनके पास हथियार न रहे हों और उनके पास कोई रास्ता न बचा हो, जिससे शत्रुओं की कैद में जाने से बचा जा सकता हो। स्थितियां यह स्पष्ट करती हैं कि हथियारों की अनुपस्थिति में चे आत्महत्या करने में भी अक्षम हो गए होंगे। यह एक ऐसा मामला है कि जो चे को अच्छी तरह से जानता है, उसे इस मामले में कोई भ्रम नहीं होगा।
इसके अलावा भी कई बातें हैं। शत्रु स्वयं, शत्रुओं की सेना के अधिकारी स्वयं चे के असाधारण साहस पर एकमत हैं, साथ ही उनके व्यवहार और खतरों का सामना करने की उनकी क्षमता पर भी वे मुग्ध थे। चे के व्यक्तित्व में निहित पूर्वोक्त गुणों से इनकार करने का साहस किसी को नहीं हुआ है। इसके अलावा इस पर विश्वास करना कठिन है कि शत्रुओं ने उनको पकड़ लिया होगा। यद्यपि ऐसा होना असंभाव्य नहीं, विशेषकर जब वे मनुष्यविहीन भूमि (नो मैन्स लैंड) में घायल, चलने-फिरने में अक्षम और संभवत: बेहोशी की स्थिति में हों। तात्पर्य यह कि यह बिलकुल नामुमकिन नहीं कि शत्रुओं ने जब उन्हें पकड़ा हो, वह जीवित हों। और इसी बिंदु पर भ्रमों की एक विस्तृत शृंखला निर्मित होती है और वे अंतर्विरोध सामने आते हैं, जो कि बाद में घटित घटनाक्रम के प्रति हमें एक दृष्टिकोण निर्मित करने में मदद करता है, साथ ही घटनाक्रमों के चरित्र को भी स्पष्ट
करता है। स्वाभाविक रूप से मैं अपने साथ सारे डिस्पैचों को नहीं लाया हूं, कारण साफ था कि वे बहुत अधिक थे। लेकिन बिलकुल ही शुरुआत में, जब एक भी आधिकारिक रिपोर्ट सामने नहीं आई थी, अफवाहें शुरू हो गई थीं। संवाददाताओं द्वारा आकलन किया जा रहा था (या बताया जा रहा था) कि चे की मृत्यु हो गई है, या वे घायल हैं, या उन्हें घायल अवस्था में पकड़ लिया गया है। पहली ही रिपोर्ट में चे को एक घायल कैदी के रूप में बताया गया था।
बाद में आधिकारिक बयान आने शुरू हुए। उदाहरण के लिए, 10 अक्टूबर को एक बेतार डिस्पैच से रिपोर्ट दी गई : आधिकारिक रूप से बोलेवियाई सेना के उच्चाधिकारियों ने इस बात की पूरी तरह से पुष्टि कर दी है कि अर्जेंटीनी-क्यूबाई गुरिल्ला नेता की कल यहां मृत्यु हो गई। दो दिन पूर्व वे गंभीर रूप से जख्मी हो गए थे। सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख जनरल अलफडो ओवेंडो ने सूचना दी है कि चे स्वयं की और अन्य बोलेवियाई गुरिल्लाओं की पहचान बता चुके हैं, जिनको पूरी तरह से खतम कर दिया गया था।
कोई भी व्यक्ति बयान के उस हिस्से पर यकीन नहीं करेगा, जिसमें चे ने पूर्वोक्त किस्म की बात कही है। यहां तक कि हम उनकी अतिशय स्पष्टता और अतुलनीय ईमानदारी से परिचित हैं। हमें कहना चाहिए कि यदि उन परिस्थितियों में वे बोलने में सक्षम होंगे, तब भी उन्होंने शत्रुओं से किसी किस्म की दया की मांग नहीं की होगी। वास्तव में शत्रु जिन परिस्थितियों के बारे में बता रहे हैं, वे यदि इस तरह की बातें नहीं बताएंगे, तो दुनिया के सामने क्रूर शत्रु साबित होंगे।
लेकिन समस्या यह है कि इस सज्जन व्यक्ति ने कहा कि चे की उसी दिन अपने घावों की ताब न लाकर मृत्यु हो गई। यही वह सब है जो उन्हाेंने कहा। उच्चाधिकारियों ने भी इस बात की पुष्टि की है। तब इस क्षेत्र में विद्यमान फौजी डिवीजन के संचालक प्रमुख परिदृश्य में आए। उन्होंने कहा कि 'संघर्ष एल यूरो नामक भूक्षेत्र में हुआ, जहां सैनिकों ने बहादुरी से संघर्ष किया। यह लगभग आमने-सामने का संघर्ष था, यहां तक दोनों पक्षों के बीच की दूरी मात्र 50 मीटर तक थी।'
जेंटेनों ने इसके आगे कहा कि 'ग्वेरा जीवित पकड़े गए। लेकिन उस वक्त से बहुत गंभीर रूप से जख्मी थे।''यह पूछने पर कि ग्वेरा ने पकड़ने वालों को कुछ बताया या कुछ कहा। यहीं पर जेंटेनों की बयान ओवेंडो के बयान से अंतर्विरोध को व्यक्त करता है; क्योंकि उनके अनुसार ग्वेरा के पास कहने के लिए वक्त नहीं था।'
ओवेंडो कहता है कि चे को गंभीर रूप से घायल अवस्था में जीवित पकड़ा गया था। दूसरे अधिकारी भी यही बात दोहराते हैं। लेकिन ओवेंडो कहता है कि चे ने उसे बताया कि वह कौन हैं, और अब वह असफल हो गए हैं। दूसरे अधिकारी बताते हैं कि चे ने कुछ भी नहीं कहा, यहां तक कि एक भी शब्द नहीं।बेहिचक, इस बयान ने कुछ ही समय बाद इन्हीं सज्जन पुरुष ने घोषणा की यहां उनका उनके प्रमुख के बयान के साथ विद्यमान अंतर्विरोध देखें कि हां वे जीवित थे, और ओवेंडो ने जिस सबका दावा किया, वह सब कुछ चे ने कहा। लेकिन दोनों के ही अनुसार चे जीवित थे।
स्वाभाविक रूप से यह दावा करना बहुत हद तक असंवेदनशीलता का ही परिचायक है कि चे ने इस तरह की कोई बात कहीं, क्योंकि इतने यांत्रिक तरीके से वे और कुछ नहीं कह सकते थे। उन्होंने स्वयं ही चे की पूर्णता, उनके साहस और अन्य गुणों को रेखांकित किया है। चे पराक्रमी ढंग से इस तरह ही कुछ कह सकते हैं : 'मेरा नाम यह, वह या कुछ और है।' यह कहने के साथ उनके चरित्र को ध्यान रखना चाहिए। लेकिन उन्होंने क्या कहा होगा और उक्त सज्जन ने क्या सुना?
लेकिन दोनों ही इस बात से सहमत हैं कि चे जीवित थे। और ये बयान तब और महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब हम बाद के घटनाक्रम की पूरी शृंखला को समझने का प्रयास कर रहे हैं। यह तब है जब कहा जा रहा है कि जब चे पकड़े गए, तब वे गंभीर रूप से घायल थे। लेकिन जीवित थे और बाद में उन्हें मार डाला गयाया कि उन्हें गोली मार दी गई। दूसरे शब्दों में उनकी घायलावस्था का कोई खयाल नहीं किया गया, न ही किसी किस्म का कोई उपचार ही उपलब्ध कराया गया। साफ शब्दों में उनके जीवन को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। इसके साथ घटनाक्रमों की पूरी शृंखला प्रमाणित करती है कि वास्तविकता में चे की हत्या करने के लिए क्या-क्या किया गया। इस बात को इसकी रोशनी में देखना चाहिए कि शुरुआती डिस्पैचों से हमेशा इस तरह की सूचनाएं प्राप्त हुईं कि आक्रमणघात-प्रतिघात की कार्रवाई में किस तरह से बोलेवियाई सैनिक घायलावस्था में पकड़े गए और क्रांतिकारियों ने उनकी देखभाल की, और उनके ठीक हो जाने पर उन्हें मुक्त कर दिया। लेकिन आप भाड़े के सैनिकों और सेना से क्या उम्मीद रख सकते हैं? क्या अपेक्षा रख सकते हैं भाड़े की सरकार और उसके अधिकारियों सेकोई भी इस बात का आश्वासन नहीं दे सकता कि चे अपने घावों का मुकाबला (ताव लाने) में सक्षम थे, क्योंकि जाहिरा तौर पर घाव बहुत खतरनाक थे। कोई भी ऐसी स्थिति में नहीं कह सकता कि वे जीवित रहेंगे कि नहीं। लेकिन क्या कोई इससे भी इनकार करेगा कि उनको बचाने के लिए कोई भी छोटा सा प्रयास भी नहीं किया गया। इससे स्पष्ट रूप से जाहिर होता है कि चे की जानबूझकर हत्या की गई है।
इस तरह के सारे अंतर्विरोध कैसे सामने आए? घटनाक्रम के मामले की एक पूरी शृंखला अब सामने स्पष्ट है, क्योंकि युध्द में डाक्टर, अपेक्षाकृत सैनिक घायल हुए, और उन्होंने बयान देना शुरू किया। उदाहरणस्वरूप हमने कल ही यहां एक बेतार संदेश को प्राप्त किया। इसके अनुसार : ग्रांडे से आने वाले शरीरों (शवों?) की देखभाल करने वाले डाक्टरों में से एक डॉ. मार्टिनेज कासो ने यहां साक्षात्कार दिया। उनसे पूछा गया कि क्या कोई भी व्यक्ति शव परीक्षण के दौरान जीवित मिला। चिकित्सक का जवाब था कि 'नहीं। हमने केवल एक सामान्य सा परीक्षण किया। मृत्यु पांच घंटे पहले हो चुकी थी, क्योंकि शव अभी तक गर्म थे।'
इसका मतलब है कि मृत शरीर वाले को ग्रांडे के अस्पताल में 9 अक्टूबर को शाम पांच बजे के करीब लाया गया और मृत्यु उसी दिन दोपहर के करीब हुई।
चिकित्सक का कहना था कि शरीर में गोलियों के लगने के घाव थे। पांच निशान पैरों पर थे, एक गले में और एक अन्य निशान छाती में बाईं ओर था। यह गोली हृदय और फेफड़ों को छेद कर पार कर गई। डाक्टर ने बताया कि 'यह सबसे घातक जख्म था।'
जब मृत शरीर को उनके सामने लाया गया, तो उन्होंने कहा कि प्रतीत होता है कि यह शरीर किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति का है। यह राय उस शरीर के पैरों की सही सलामत हालत को देखकर व्यक्त की गई थी। इससे यह संकेत मिलता है कि उस व्यक्ति को अधिक चलने-फिरने की आदत नहीं थी।
इसलिए शरीर चिकित्सक के सुपूर्द कर दिया गया, और उसने खोजबीन करके बताया कि मृत्यु मात्र कुछ घंटे पूर्व ही हुई है। यह राय इसलिए व्यक्त की गई क्योंकि शरीर के अकड़ने के कोई चिह्न नहीं विद्यमान थे। यह तथ्य अभी बरकरार है कि उच्चस्तरीय अधिकारी ओवेंडो, कर्नल जेंटेनों, सभी ने कहा कि उन्होंने चे को जीवित पकड़ा। वह जीवित थे, और जो व्यक्ति दवाओं आदि के विषय में थोड़ी सी भी जानकारी रखता है, सहमत होगा कि यदि हृदय गोलियों से छलनी हो जाए तो व्यक्ति कुछ मिनटों से ज्यादा नहीं जीवित रह सकता। इस तरह से एक अन्य संदेह पुन: जन्म लेता है।
इंटरप्रेस से भेजा गया एक संदेश इस प्रकार है : ला पांज, पिछले रविवार को हुए एक संघर्ष में मारे गए। अर्नेस्टो चे ग्वेरा की मृत्यु के दौरान विद्यमान परिस्थितियों की जांच को लेकर यहां एक नाटकीय मोड़ आ गया है। यह स्थिति बोलेवियन चिकित्सक जोसे मार्टिनेज के शव परीक्षण के बाद आई। सोमवार की दोपहर को शव परीक्षण के बाद चिकित्सक का निर्णय था कि चे की मृत्यु पांच घंटे पहले हुई है।
चिकित्सक की पुष्टि के बाद गुरिल्ला विरोधी बलों की कार्रवाइयों के बीच में उपस्थिति एक प्रतिष्ठित पत्रकार की इस राय का वजन बढ़ा देती है कि ग्वेरा को जीवित पकड़े जाने के बाद दो अन्य गुरिल्लाओं के साथ उनकी हत्या कर दी गई। कई अन्य अधिकारियों ने विद्रोही आंदोलन के इस आधारभूत सिध्दांतकार की इस तरह की मृत्यु पर संदेह व्यक्त किया है।
इसके साथ इस परिदृश्य में एक नई व्याख्या शामिल की जा सकती है। क्योंकि उच्च पदस्थ सैन्य सूत्रों की कुछ गुप्त जानकारियां भी सार्वजनिक हो गई हैं। इस स्रोत्र के अनुसार, चे की मृत्यु एल यूरो में सेना के साथ हुए संघर्ष में लगे घावों के कारण नहीं हुई, बल्कि इस गुरिल्ला नेता की मृत्यु हिंग्यूराल में शाम 1 बजकर 15 मिनट पर हुई, जहां उन्हें संघर्ष का अंत होने से पूर्व लाया गया।
इसी सैन्य सूत्र के अनुसार चे के केवल पैरों पर ही घाव हुए थे। अग्रलिखित एक वाक्य है, जिससे आप आसानी से अर्थ निकाल सकते हैं, क्योंकि इसे विकृत किया गया है। इसके अनुसार, 'केवल एक गोली ने उनकी रायफल को बेकाम कर दिया....।'
इससे प्रतीत होता है कि चे घायल होने के बाद अपना संघर्ष जारी रखे हुए थे। वे तब तक अपनी रायफल से फायरिंग करते रहे जब तक कि उनकी रायफल बेकाम नहीं हो गई। यह संभव है। चे के लिए यह कोई अप्रत्याशित बात नहीं थी कि वे घायल होने के बाद भी अपने शत्रुओं से संघर्षरत रहें। बाद में लड़ाकों ने उनकी नष्ट हो चुकी रायफल को प्राप्त किया।
समाचार संदेश आगे कहता है :
जब एक गोली ने उनकी एम-12 रायफल नष्ट कर दी, जिसे वह एक सब-मशीनगन की तरह प्रयोग करते थे। वह अन्य दो गुरिल्लाओं के साथ बंदी बना लिए गए। वे दोनों गुरिल्ला भी घायल थे। सोमवार को हुई पूछताछ के दौरान चे ने किसी प्रश्न का जवाब नहीं दिया।
हममें से जो लोग चे को अच्छी तरह से जानते हैं, वे जानते हैं कि यदि इस तरह की कोई घटना होती है, तो चे पूर्वोक्त रुख ही अपनाएंगे।
और यह आगे कहता है : 'उन्होंने एक भी प्रश्न का जवाब नहीं दिया। उन्होंने स्वयं को कैद करने वालों की ओर से मुंह फेर लिया।' आगे : 'अन्य दो गुरिल्लाओं को उसी दिन हिंग्यूराल में मार डाला गया।यह समाचार संस्था बताती है कि किस तरह से चे घायल हुए, किस तरह वे घायलावस्था में संघर्ष करते रहे। यह वह बात है जिस पर सभी विश्वास करेंगे।
मेरे पास एक अन्य समाचार संवाद है : डा. जोसे मार्टिनेज कासो ने एक साक्षात्कार के दौरान कहा कि सबसे घातक घाव उनके हृदय पर किया गया, अन्य घाव पैरों पर थे। इसी डाक्टर ने शव परीक्षण किया था। इतना समाचार संवाद तो एक समान ही है। लेकिन आगे के संवाद में कहना है कि 'मार्टिनेज का बयान चार अन्य गुरिल्लाओं के बारे में यही कहता है।'
आह! यह समाचार संवाद कहता है कि चिकित्सक के अनुसार सैनिकों ने उन्हें बताया कि जब उन लोगों ने ग्वेरा को देखा, तो उसकी ओर बढ़े और उन्हें चोट पहुंचाई।
इसके आगे : 'मार्टिनेज का बयान जाहिर करता है कि अन्य चार गुरिल्लाओं ने भी संघर्ष में भागीदारी की। उन चारों साथियों का कहना था कि उन्होंने भी संघर्ष खतम होने के बाद चे को जीवित देखा था।' इनमें से ताबोड़ा नाम के एक साथी ने बताया कि है कि जब चे को चोट पहुंचाई गई, वह उनके निकट था। साथ ही साथ उसका कहना था कि 'चे संघर्ष के दौरान घायल तो जरूर हुए थे, लेकिन जीवित थे।यह एक महत्वपूर्ण बयान इसलिए है क्योंकि यह पहली मान्यता को पूर्णरूप से पुष्ट करता है और बताता है कि चे को अत्यधिक घायल अवस्था में कैद किया गया था।
आगे रहते हुए और सैनिकों का नेतृत्व करते हुए घायल होना स्वाभाविक ही था। और घायल रहते हुए संघर्ष को जारी रखना चे की चरित्रगत विशेषता थी। उन्हें जीवित अवस्था में तभी बंदी बनाया जा सकता था जब वह अचेत (बेहोश) हों, या उनके हथियार नष्ट हो चुके हों या फिर वे इतने अधिक जख्मी हो चुके हों कि हिलने-डुलने में भी अक्षम हों। चे को प्रश्नांकित करना या यह मानना कि उन्होंने पीठ दिखाई, उनके बारे में बिलकुल विपरीत सोचना है। इस भिन्नता से दूर बंदी बनाने वाले का तिरस्कारयह उनके चारित्रिक गुण में शामिल था। और इसी चारित्रिक गौरव के साथ वह इस रणभूमि में मृत्यु को प्राप्त हुए।
महत्वपूर्ण तथ्य यह नहीं है कि उनकी मृत्यु रणक्षेत्र में हुई या खतरनाक घावों के चलते उनकी मृत्यु बाद में हुई। अपने आप में यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है। बल्कि महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वह घातक रूप से घायल हुए और करीब-करीब इन्हीं घातक घावों के कारण उनकी मृत्यु हुई।
लेकिन इसी बिंदु पर एक गहरा अंतर्विरोध जन्म लेता है और टुकड़ों-टुकड़ों में इसकी व्याख्या की जाती है। सवाल आंशिक रूप में यह है कि बाद में उनके शरीर के साथ क्या किया गया।इस मामले में समाचार संवादों की एक पूरी शृंखला ही सामने है।एक समाचार संस्था द्वारा 11 अक्टूबर को भेजा गया संवाद : 'गणराज्य के राष्ट्रपति जनरल रेने बेरिंटोस ने यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल को बताया कि अर्नेस्टो चे ग्वेरा की अंत्यष्टि इसी रात को बोलेवियन एंडेस के एक गुप्त स्थान पर कर दी गई और उन्हें ला पाज नहीं लाया जाएगा न ही उनको (शव को) अब प्रदर्शित ही किया जाएगा।'
राज्य प्रमुख ने आगे कहा कि 'एक अन्य बेहूदा बात और कहनी है कि यह (चे का) शव अब बोलेविया में ही रहेगा।'
इस बयान से बहुत सी बातें संप्रेषित हो जाती हैं। बोलेविया से प्राप्त संवाद के अनुसार चे ने अपनी डायरी में एक बात दर्ज की है कि बेरिंटोस मूर्ख है। इसलिए दोस्तो, यदि डायरी के इस हिस्से में चे उसे मूर्ख कहते हैं, तो इसका भी एक संदर्भ है।
11 अक्टूबर को दावा किया गया कि मृत शरीर को किसी गुप्त स्थान पर दफनाया गया। वहीं अगले दिन, यानी 12 अक्टूबर को एक अन्य डिस्पैच के अनुसार : वह पत्रकार, जिनका दावा है कि वे चे ग्वेरा का साक्षात्कार ले चुके हैं, उन्होंने बताया कि सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख अलफर्डो ओवेंडो ने उन्हें बताया कि क्यूबाई-अर्जेंटीनी क्रांतिकारी के शरीर की अंतिम क्रियाएं आज की जाएंगी। उनके इस मौकिंफ का सरकारी अधिकारियों द्वारा विरोध किया गए।
विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी का दावा है कि राष्ट्रपति रेने बैरिंटोस आज शाम 5 बजे तक वास्तव में कुछ नहीं जानते थे।
स्रोत के अनुसार, 'हमें बहुत अधिक विस्मय होगा यदि यह बात सच हो। क्योंकि सैन्य शक्तियों द्वारा यह निर्णय बिलकुल आखिरी क्षण पर लिया गया। यहां तक कि इस निर्णय से राष्ट्रपति को भी नहीं परिचित कराया गया था। इन सारी बातों पर विश्वास करना बहुत कठिन है।'प्राप्त होने वाले सभी समाचार संवाद संकेत देते हैं कि चे की अंत्येष्टि की जा चुकी थी। बाद में शरीर को पुन: खोदकर निकाला गया, जिससे उन्होंने एक हाथ या एक उंगली काटी। इस तरह से प्राप्त होने वाले समाचार संवादों में ढेरों अंतर्विरोध विद्यमान हैं और अविश्वसनीयता का घटाटोप है।कोई भी आसानी से कल्पना कर सकता है कि वे इस सबूत को छिपाना चाहते थे कि चे की कैद में हत्या की गई। उन लोगों को आशंका थी कि यदि सभी प्राप्त विवरणों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया जाएगा तो प्रशासन का झूठ खुल जाएगा। लेकिन मेरे खयाल से कुछ ऐसा भी है जिसे और अधिक महत्व देना चाहिए, जो इन सब गैर-परिचित चीजों के पीछे है, और यह बात है कि चे की मृत्यु के बाद भी उन लोगों के मन में उनके प्रति विद्यमान भय। जब चे जीवित थे तब भी वे लोग उनसे भयभीत रहते थे, और वे मृत्यु के बाद भी उनसे भयभीत हैं, शायद ज्यादा भयभीत हैं। सच मायनों में (चे) यह एक विचार है जिसे वे चे को समाप्त करके खतम नहीं कर सकते।
वे सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि इतिहास में उन सबकी भर्त्सना की जाएगी। वे लोग यह भी अच्छी तरह से जानते हैं कि यह भाग्य से भी ज्यादा है कि वे चे को भौतिक रूप से समाप्त कर पाए। इसलिए तार्किक तो यह है कि वे चे की स्मृतियों से भी भयभीत रहेंगे, जहां चे की अंत्येष्टि की गई वे उस स्थान से भी भयभीत रहेंगे। जाहिर बात है कि निकट भविष्य में यह स्थान किसी तर्क से कम नहीं होगा। वे क्रांतिकारी आंदोलन के प्रतीक, स्थान, और जमीन को मिटाना चाहते हैं। सारभूत रूप में वे चे की मृत्यु के बाद ज्यादा भयभीत हैं।
मेरी राय में, उनके व्यवहार का मुख्य उद्देश्य छिपाना नहीं है, न ही उन्होंने आखिरी गोली चलाई। महत्वपूर्ण बात यह है कि वे 'चे' से पीछा छुड़ाना चाहते हैं। वे डरते हैं कि चे का परिवार उनके मृत शरीर के लिए दावा करेगा, जिसे उन्होंने एक खास स्थान पर दफनाया है। और वहजैसा कि इसे बाद में पुकारेंगेएक तीर्थ, क्रांतिकारियों के लिए एक खास संरक्षित स्थान में तब्दील हो जाएगा, मेरे खयाल से पूर्वोक्त सारी बातों के पीछे असली बात यही है।
संक्षेप में पूर्वोक्त हमारी राय है कि कैसे घटनाक्रम हुआ। हमारा आकलन समाचार सूचनाओं के आधार पर है जिनमें चे की मृत्यु संबंधी सभी बातें अजनबी और परस्पर अंतर्विरोधी थीं।
यह सब बताना हम अपना दायित्व मानते हैं, तथ्यों को सामने रखना चाहते हैं। यह इस तथ्य के बावजूद कि इस मामले में अनिश्चय की स्थिति क्रांतिकारी आंदोलन के लिए उपयोगी होगी। हम मानते हैं कि यह एक नैतिक सवाल है, एक सैध्दांतिक प्रश्न है, लोगों के प्रति हमारा दायित्व है और हर कहीं उपस्थित क्रांतिकारी के प्रति भी हमारा दायित्व है। हमारी राय में अनिश्चितता और संशय की स्थिति का केवल एक ही लाभ होता है कि लोगों में झूठी आशाएं बनी रहती हैं जो कि साम्राज्यवाद ही है।
हम बोलेविया में विद्यमान साम्राज्यवाद की कठपुतलियों के विषय में ही नहीं, बल्कि वे भी, जो साम्राज्यवाद की कठपुतली बनने के लिए आपस में प्रतिस्पर्ध्दी हैं, वे भी चाहते हैं कि हम खबरों पर संशय करें। यह स्पष्ट है कि बोलेविया में विद्यमान साम्राज्यवादी कठपुतली चाहते हैं कि खबरों पर यकीन किया जाए, क्योंकि अग्रमुखी कठपुतली के रूप में वे अपनी यही भूमिका, यही हिस्सा अपने सामने चाहते हैं। लेकिन साम्राज्यवादियों की तरह, जो बहुत चालाक हैं, वहां कोई अंध संशय भी नहीं होना चाहिए कि चे को भौतिक रूप से समाप्त करके वे उनके व्यवहारभावनाओं के प्रभाव को भी खतम कर देंगे, उनके प्रयासों की क्रमिकता को मिटा देंगे, उनकी वीरता के उदाहरण की चमक को कम करने में सफल हो जाएंगे या उनके क्रांतिकारी दृष्टिकोण को खतम कर देंगे। वे चे जैसे उदाहरण को मिटाना चाहते हैं, उसके प्रभाव को खतम करना चाहते हैं और वे लोग यह भ्रमिक आशा, अनिश्चितता और रहस्य को जन्म देकर करना चाहते हैं। वे 5, 10, 15 या 20 वर्ष इसी तरह के रहस्यों के साथ बिताना चाहते हैं, यानी संशय या आशा को अनिश्चितता में रखना चाहते हैं। वास्तव में ऐसी आशा स्वाभाविक होती है, उन सभी के बीच तो और भी, जिनके लिए चे की मृत्यु पीड़ादायक और दुखद है। उन सभी के बीच इस तरह की आशा स्वाभाविक ही है जो चे से सहानूभति रखते थे, उनसे प्रभावित थे, और उन क्रांतिकारियों के बीच जो पूरे विश्व में फैले हुए हैं।
साम्राज्यवाद जानता है कि वह भौतिक रूप से चे से मुक्ति पा चुका है। अब उसकी कोशिश है कि वह इस विश्व को उनकी भावनाविचार से मुक्त कर दे। और वह यह कार्य भ्रम और कल्पनीय आशा को उत्पन्न करके करना चाहता हैएक ऐसी आशा जो कभी नहीं पूरी हो सकती है, और जुआरियों जैसे दावे और कल्पित कथाओं को जन्म देती है कि 'हमने उन्हें यहां देखा' या 'हमने उन्हें वहां देखा'
संबंधित चीजों के साथ जुड़ी हुई गढ़ी कहानी बाद में गलत साबित हो सकती है। हमें इसकी चिंता नहीं है। यहां तो काफी लंबे समय से सच्ची-झूठी व्याख्याएं, ढेरों बयानों द्वारा मिथ्यापवादों को फैलाया जा रहा है। इन सच्ची-झूठी व्याख्याओं, मिथ्यापवादों के विषय में हमें बिलकुल भी चिंता नहीं है। हमें तथ्य पता है, सच हमारे सामने है, भविष्य के लिए अच्छी-बुरी आशा संजोना मिथ्या बात साबित होगी और इससे हमारा कोई सरोकार नहीं है।
लेकिन इस विद्यमान संभावना से हमारा गहरा रिश्ता है कि भविष्य में अन्य तरह की झूठी आशाओं का जन्म हो सकता, जिसमें विद्यमान अंतर्विरोधों का कोई स्पष्टीकरण न हो। और इस तरह की झूठी आशाएंकई वर्षों तक और गहराई तक विद्यमान रहस्यों के बीचइतिहास के एक असाधारण उदाहरण के प्रभाव को कमजोर कर सकती हैं। वह उदाहरण जो इतिहास में क्रांतिकारी सिध्दांतों के प्रति प्रतिबध्दता, संघनित विचार, साहस, अद्वितीयता और नि:स्वार्स्थता का अद्वितीय उदाहरण है।
सामने आए तथ्य साम्राज्यवादियों के उन्माद को ठंडा कर देंगे, जिसमें उनका मानना है कि चे की मृत्यु से क्रांतिकारी संघर्ष की धार कम हो जाएगी। साम्राज्यवादी भी इस ताकत को जानते हैं, विशाल ताकत, अविश्वसनीय ताकत, क्रांतिकारी संघर्ष की ताकत, जो कि एक उदाहरण है। वे जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति को भौतिक रूप से खतम किया जा सकता है, लेकिन चे जैसे अद्वितीय उदाहरण को किसी तरह से नहीं उन्मूलित किया जा सकता है! वे इस विषय में बहुत ही समझदारी के साथ संबध्द हैं।
सभी विचारधाराओं के समाचारपत्र और विचारधाराओं से संबध्द व्यक्ति वैश्विक स्तर पर चे के गुणों को स्वीकार कर रहे हैं। इन सारे व्यक्त दृष्टिकोणों के बीच केवल एक ही अपवाद है, जो बदमाशी के साथ बेहूदी राय व्यक्त की गई है। चे के जीवन के गुणात्मक पहलू उनके सबसे बड़े विचारधारात्मक शत्रुओं को प्रभावित करने में सक्षम है, क्योंकि वे उनके लिए भी प्रशंसनीय थे। यह एक अद्वितीय उदाहरण है कि किस तरह एक व्यक्ति को अपने शत्रुओं के बीच स्वीकृति और आदर प्राप्त होता है, उसकी विचारधारा को समर्थन प्राप्त होता है। इसी कारण चे को सर्वसम्मति से आदर और उनके विचारों के प्रति सम्मान प्राप्त होता है। इसके बाद अच्छे से समझा जा सकता है कि साम्राज्यवादी चे से क्यों डरते हैं, और सही मायनों में उन्हें डरना भी चाहिए।
राजनीतिक हस्तियों के साथ अनेक लोगों का मानना है कि चे की मृत्यु के समाचार के प्रभाव से पूरा यूरोप स्तब्ध है, क्योंकि वहां भी चे के प्रति जबरदस्त लगाव था। सही मायनों में यह हमारे समय की वास्तविकताओं के प्रति जागरूकता का मामला है।
हम ईमानदारी पर विश्वास करते हैं, और इस राय पर सहमत हैं कि सभी अंतर्विरोधों और सुविधाजनक रास्तों पर खड़े होने की अपेक्षा ईमानदारी को बताना हमारी जिम्मेदारी है। हमें अपनी राय, हमारी सर्वोच्च निश्चयता और प्राप्त समाचारों के हमारे विश्लेषण को सभी क्रांतिकारियों को बताना चाहिए।
वैसे यह उम्मीद है कि तथ्यों पर कुछ क्रांतिकारी सहमत नहीं थे, या उन्हें प्राप्त समाचारों पर संशय था और इसलिए उन्होंने स्वयं को किसी भी प्रतिक्रिया से पृथक कर लिया। किसी भी क्रांतिकारी नेकिसी भी किस्म की आशातीत आशाइस तरह की खबरों को स्वीकार नहीं कर पाया। हम जानते हैं कि विश्व के क्रांतिकारियों का क्यूबाई क्रांतिकारियों के शब्दों पर अटूट विश्वास होता है। इस विश्वास में पुष्टि के लिए, क्रांति के प्रति सर्वोच्च ईमानदारी के प्रति विश्वास व्यक्त करने के लिए हम यहां कई बार आ चुके हैं। इस बात का कोई मतलब नहीं कि हम कितने कटु, कितने तिक्त अवसरों पर आए हैं। उन क्षणों में भी जिनके बारे में हम बात कर रहे हैं, गहरे संबंधियों के संशयों के बीच हम अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा करने में पीछे नहीं हट सकते हैं।
इसके अलावा प्रश्न है कि झूठी आशाएं बनाए रखने से स्थिति किस तरह से क्रांतिकारियों के लिए लाभप्रद होगी? इससे क्या प्राप्त होगा? क्या क्रांतिकारी वह व्यक्ति होते नहीं हैं जो स्वयं को किसी भी संभाव्य परिस्थिति में रखते हैं, जीवन के लिए सभी किस्म के सुख-दु:ख के लिए, यहां तक कि सभी किस्म के आघातों के लिए भी? क्या क्रांति और क्रांतिकारी व्यक्तियों के इतिहास को भीषण आघातों के बिना पूरा कर सकते हैं? क्या यह सच नहीं है कि सच्चे क्रांतिकारी किसी किस्म के आघात को सहने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली होते हैं, इन प्रत्याघातों के लिए, वह भी बिना हौसला खोए? क्या क्रांतिकारी उन व्यक्तियों में नहीं होते, जिनके भौतिक रूप से समाप्त हो जाने के बाद अपने कार्यों की गुणवत्ता और सिध्दांत के रूप में जीवित रहते हैं? क्या क्रांतिकारी दुनिया के पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिन्होंने मानव के भौतिक अस्तित्व की क्षणभंगुरता को सबसे पहले चिह्नित नहीं किया था और बताया कि किस तरह मानवीयता के विचार, आचार और उदाहरण दीर्घजीवित होते हैं? इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि किस तरह इतिहास में सब लोग उदाहरणों से प्रेरणा पाते रहे हैं।
यही वह रास्ता है, जिस पर हमें चलना चाहिए। कठिनतम आघातों, सर्वोच्च कठिनाइयों के बीच स्वतंत्रता के लिए हुई हमारी क्रांति के साथ मार्ते और मैकियो की मृत्यु संबध्द है। इस तरह के प्रत्याघातों का संबंध अनेक क्रांतिकारी आंदोलनों के साथ रहा है, और क्रांतिकारी आंदोलन हमेशा इस तरह के आघातों-प्रत्याघातों के बाहर निकल पाने में सफल रहे, इस बात का कोई मतलब ही नहीं कि कठिनाइयां कितनी कठोर और जटिल थीं।
इस बात से कौन इनकार करेगा कि चे की मृत्यु क्रांतिकारी आंदोलन के लिए आघात नहीं है। लेकिन क्यों लंबे समय तक उनका उदाहरण, उनकी प्रेरणा और उनकी विचारात्मक उपस्थिति विद्यमान नहीं रह पाएगी, जबकि इस उदाहरण ने प्रतिक्रियावादियों के मन में खौफ पैदा कर दिया है? यह हमारे लिए एक अग्निबध्द आघात है, एक कठिनतम आघात। लेकिन हम निश्चिंत हैं कि उस व्यक्ति की मान्यताओं के प्रति जो मानता है कि भौतिक अस्तित्व की अपेक्षा उसका आचरण ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। यह एक मात्र तरीका है जिसके माध्यम से यह समझ सकते हैं कि किस तरह चे की सर्वोच्च अवधारणा में अपने व्यक्ति के कार्यों के साथ खतरों को संबध्द कर रखा था।
हमें न तो समय गंवाना चाहिए न ही हमारी विचारधारा और हमारी क्रांति के शत्रुओं को अवसर ही देना चाहिए कि वे हमें विचारधारात्मक रूप से रक्षात्मक स्थिति में ला दें या क्रांतिकारी आंदोलन के विशृंखलन की कल्पना करके मनोवैज्ञानिक बढ़त प्राप्त कर लें। हम सभी को सचाई को आधार बनाकर और सत्य को स्वीकार करने के साथ चे के उदाहरण को और शक्ति संपन्न करके क्रांतिकारी आंदोलन को आगे ले जाना चाहिए, उसे और अधिक सुसंगत, सुगठित और अधिक निर्णायक बनाना चाहिए।
मैं इस कठिनतम कार्य को कर चुका हूं। इसके अलावा यह बताना जरूरी है कि यह कोई सर्वांगपूर्ण विश्लेषण नहीं है, बल्कि इस विश्लेषण का आशय यह है कि सभी चीजों का मूल्यांकनविश्लेषण करे, सर्वोच्च रूप में सभी चीजों का। हम क्रांति के सभी नेता, जो चे को बहुत अधिक गहराईआत्मीयता से जानते थे, हम सभी सर्वसम्मति से बिना किसी संशय के उस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं, जिसे मैंने अभी आप लोगों के समक्ष व्यक्त किया।
आज मंत्रियों की परिषद की एक बैठक हुई, और इस बैठक में निम्न प्रस्तावों को स्वीकार किया गया : 'जबकि : लैटिन अमरीका लोगों की मुक्ति के प्रति समर्पित नायक व्यक्तित्व के स्वामी अर्नेस्टो चे ग्वेरा की बोलेवियाई मुक्ति सेना के प्रमुख के रूप में मृत्यु हो गई है।
'जबकि : क्यूबा के लोग कमांडर अर्नेस्टो चे ग्वेरा को उनके द्वारा चलाए गए मुक्ति संग्राम और क्रांति के बाद उसकी सुदृढ़ता के लिए किए गए अप्रतिम योगदान के लिए हमेशा स्मरण में रखेंगे।
'जबकि : उनका व्यवहार और कार्य अंतर्राष्ट्रीयतावाद की भावना को समाहित किए हुए है, कि लोगों को साझा संघर्ष के लिए प्रेरित करता रहेगा।
'जबकि : उनकी अथक क्रांतिकारी गतिविधियां, जो हर किस्म की सीमाओं का भी अतिक्रमण करती हैं, उनकी कम्युनिस्ट विचार क्षमता, और लैटिन अमरीकी लोगों की राष्ट्रीय और सामाजिक मुक्ति की रक्षा में और साम्राज्यवाद के विरुध्द किए गए उनके संघर्ष की अविचलित क्षमता, जो विजय या मृत्यु तक निरंतर विद्यमान रहने वाली थी, ने क्रांतिकारी परंपरा और नायकत्व का एक ऐसा उदाहरण कायम किया है जिसकी चमक हमेशा विद्यमान रहेगी।'
इसके अलावा हम लोगों ने प्रस्ताव पारित किया है :
'पहला : इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के पहले तीस दिनों तक राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा; और इन तीस दिनों की शुरुआत आज रात 12 बजे से होती है, साथ ही इस अवधि में हर किस्म के सार्वजनिक मनोरंजन को प्रतिबंधित किया जाता है।
'दूसरा : युध्द में जिस दिन चे की नायकत्वपूर्ण मृत्यु हुई, उस दिन को राष्ट्रीय दिवस घोषित किया जाता है, यानी 8 अक्टूबर को गुरिल्ला नायक दिवस (डे आफ हिरोइक गुरिल्ला) घोषित किया जाता है।
'भावी पीढ़ियों की स्मृतियों में चे के जीवन और उनके अप्रतिम उदाहरण को जीवित रखने वाली गतिविधियों और कार्यों को लगातार किया जाएगा।
'इसी के साथ हमारी पार्टी की केंद्रीय समिति ने प्रस्ताव पारित किया है :
'पहला : कामरेड जुआन अमलेडिया, रामरों वालाडेस और अलफोंसो जाएस की सहभागिता में एक समिति बनाई गई है। इस समिति की अध्यक्षता जुआन अलमेडिया करेंगे। यह समिति कमांडर अर्नेस्टो चे ग्वेरा की स्मृतियों को विद्यमान रखने के उद्देश्य से वे कार्रवाइयां करेगी जिनकी आवश्यकता होगी।
'दूसरा : हमेशा स्मरणीय और नायक योध्दा, जिनकी संघर्ष में मृत्यु हुई, को श्रध्दांजलि अर्पित करने के लिए बुधवार, 18 अक्टूबर को शाम 8 बजे रिवोल्यूशन प्लाजा पर लोगों को एकत्र होने के लिए बुलाया जाए।'

सोमवार, 7 मार्च 2011

चे ग्वेरा की मौत पर फिदेल कास्त्रो-3-


      स्रोत के मुताबिक 'हमारे पास सबसे अच्छी खबर यह है कि ग्वेरा जीवित हैं और हम इससे सहमत हैं कि वे पूरी तरह से घिर चुके हैं।' वैसे इस स्रोत ने अपनी इस मान्यता के आधार को नहीं बताया है। इसी स्रोत के मुताबिक, सेनाओं द्वारा कम्युनिस्ट गुरिल्लाओं को एक छोटी सी घाटी में दो पहाड़ियों के बीच घेर लिया गया है।वैसे इस जानकारी की पुष्टि नहीं हो पाई है।
इस घाटी के दोनों निकासों को जंगल में युध्द के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित की गई बोलेवियाई सेना द्वारा अवरुध्द कर दिया गया है। इस सेना में अधिकतर सैनिकों को अमरीकी (यू.एस.) सैन्य प्रशिक्षकों द्वारा प्रशिक्षित किया गया है और फौज के कई लोग तो वियतनाम युध्द में भी भागीदारी कर चुके हैं। यहां दर्ज करने लायक बात यह है कि इस घाटी के पार्श्व और आधार दोनों ही बहुत घने हैं। लेकिन ऊंचाई वाले हिस्से किसी भी तरह के आसन्न युध्द के लिए अवरोध से मुक्त हैं।इसी स्रोत के अनुसार, 'सेना का खोजी दस्ता इस सप्ताह की शुरुआत से ही सकारात्मक ढंग से खोजबीन शुरू कर चुका है।'
यह 29 तारीख का डिस्पैच है, जो एक ऐसे कठिन क्षेत्र के बारे में बताता है जहां जंगली घाटीएक किस्म की तंग घाटी, दर्रा है और पहाड़ियों के बीच या ऊंचाई के स्थानों के बीच जहां बिलकुल भी वनस्पति नहीं है। यह एक ऐसी जगह है जहां से निकलने की अनिवार्यता है, वहीं दूसरी ओर इस घाटी से निकलने के सारे रास्ते बंद थे। क्योंकि घेराबंदी में फंसे हुए गुरिल्लाओं को निकलने या उनके किसी भी संचालन या भूस्थिति में बदलाव के लिए जंगलों या वनस्पतियों का होना अनिवार्य होता है।
यह डिस्पैच विशिष्ट भूमिका रखता है, क्योंकि यह एक भूक्षेत्र के बयान के साथ शुरू होता है। आगे प्राप्त हुए सभी डिस्पैचों में इसी भूक्षेत्र का जिक्र हुआ है। लेकिन इस डिस्पैच में जिन परिस्थितियों का जिक्र किया गया है, वह स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि गुरिल्ला बल का नेतृत्व कमांडर अर्नेस्टो चे ग्वेरा कर रहे थे।
एक खबर यह भी है कि गुरिल्लाओं में एक भगोड़ा भी था। एक दूसरे स्रोत से यह डिस्पैच 30 सितंबर को प्राप्त हुआ था। इसके अनुसार :इस तेल क्षेत्र से प्राप्त होने वाली खबरों के मुताबिक कास्त्रोवादी कम्युनिस्ट क्रांतिकारी नेता अर्नेस्टो 'चे' ग्वेरा गंभीर रूप से बीमार हैं और भारी सुरक्षा के बीच अन्य गुरिल्लाओं द्वारा स्टेचर पर ले जाए जा रहे थे।
यह खबर भूतपूर्व बोलेवियाई गुरिल्ला अंतोनियो रोड्रिग्ज फ्लोरोस से प्राप्त हुई है।अंतोनियो रियो ग्रांडा के फौजी शिविर में इस शर्त के बाद आधिकारिक रूप से आत्म समर्पण कर चुके हैं कि समर्पण के बाद उनके जीवन की रक्षा की जाएगी। इन सभी ने बोलेविया की सरकार के खिलाफ हथियार उठाए थे। 25 से 30 सितंबर के बीच एक भगोड़ा सामने आयाऔर शायद संकट एक समान तीव्रता के साथ ही आता है, भगोड़े ने शत्रुओं को सभी जानकारी उपलब्ध कराने का प्रस्ताव किया। स्वाभाविक रूप से इन सूचनाओं में शत्रुओं को रुचि हो सकती थी। बिना किसी नैतिक संकोच के, या बिना किसी संशय के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया होगा। शत्रुओं के साथ भगोड़े के सहयोग का प्रस्ताव तुरंत स्वीकार किया गया होगा क्योंकि एक भगोड़ा अनैतिक क्रांतिकारी या छद्म क्रांतिकारी की तरह ही होता है। वह क्रांति से खेलना चाहता है। यह बिलकुल विवादहीन है कि यदि गुरिल्लाओं के बीच कोई भगोड़ा हो तो यह कोई असामान्य बात नहीं होती। यहां तक कि हमारी ही क्रांति के दौरान भगोड़ों की ढेरों घटनाएं देखने में आईं। यह सामान्य घटना से भिन्न बात नहीं है।
एक ऐसा समय भी था, जब लोग गुरिल्ला संघर्ष में सहभागी होना चाहते थे, और उन लोगों ने गुरिल्ला संघर्ष में भाग भी लिया। वे गुरिल्ला शिविरों में संघर्ष में भागीदारी के लिए भारी संख्या में आए भी। वास्तव में उस समय स्थिति ऐसी थी कि जितने लोगों के पास हथियार थे, उससे भी अधिक लोग गुरिल्ला संघर्ष में भागीदार होना चाहते थे। इन सभी लोगों में जो लोग हमारे साथ शामिल हुए उनमें से कई लोगों ने बाद में बेहतरीन भूमिका निभाई। वे शानदार सिपाही हैं, शानदार क्रांतिकारी हैं। हमारी गुरिल्ला सेना के पास कोई 'भर्ती कार्यालय' या कोई इस तरह की चीज नहीं होती है। हमारी समस्या उन लोगों के प्रति होती है, जो हमारे संघर्ष में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन हमारे पास उनके लिए हथियार नहीं होते हैं। लेकिन हमारी विद्रोही सेना के 95 प्रतिशत से अधिक लड़ाके अपने हथियार अपने साथ ही लाए थे। दूसरों को भी हमारे पास व्यवस्थित तरीके से भेजा था। हमारी सेना आम लोगों से बनी थी, और यही लोग संघर्ष में शामिल हुए।
लेकिन, बेशक जो लोग हमसे प्रभावित होकर हमारे संघर्ष में शामिल हुए थे, उन्हें गुरिल्ला युध्द का न तो कोई पूर्व अनुभव था, न ही इस संघर्ष के साथ जुड़े हुए बलिदानों के प्रति उनकी स्पष्ट राय थी। और जब वे हमारे साथ लंबे समय तक रहे, पहाड़ों पर चढे अौर परेशानियों का सामना किया, तब वे इस संघर्ष के साथ जुड़ी तकलीफों के चलते उससे बड़े ही कायराना अंदाज में अलग हो गए। एक भगोड़ा हमेशा एक देशद्रोही ही होता है। यदि वह शत्रुओं के पास चला जाता है तो वह उन्हें न केवल सभी चीजों के बारे में सूचना देता है, बल्कि गुरिल्लाओं के विषय में भी सारे विवरणों को जाहिर कर देता है।
एक डिस्पैच चे की बीमारी के बारे में बताता है। इसका तात्पर्य यह होना चाहिए कि चे वहां अल्पकालिक रूप से बीमारी से ग्रस्त हो गए थे। प्रकाशित हो चुकी डायरी के एक हिस्से के मुताबिक (फोटोप्रतियों के द्वारा) पहली सितंबर को यह टिप्पणी दर्ज है : 'सितंबर के पतझड़ की बुरी स्थिति के अलावा कुछ दुर्घटनाओं के बाद हम खच्चरों पर सवार होकर जल्द ही नीचे उतरे। डाक्टर अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाया है, लेकिन मैं ठीक हो चुका हूं और अच्छी तरह से चल-फिर सकता हूं और खच्चरों को हांक सकता हूं।' इसके अलावा भी उन्होंने कई अन्य चीजों का उल्लेख किया है।
यह पहली सितंबर की बात है, जिसमें उन्होंने बताया है कि वह किस तरह ठीक हुए और उसके बाद वह अच्छा महसूस कर रहे हैं। अपनी मृत्यु से दो दिन पहले की तारीख में उन्होंने दर्ज किया है कि वह एक स्वस्थ व्यक्ति की भांति बातचीत करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो यह सच नहीं है कि वे उस समय बीमार थे।
लेकिन स्वाभाविक रूप से भगोड़े या भेदिए ने कई अन्य बातों के अलावा उनके बीमार होने से पहले की स्थिति के बारे में ही बताया। इस सबके अलावा शत्रु इस घात में था कि वह (भगोड़ा या भेदिया) क्षेत्र के उस स्थान को बिलकुल ठीक उस स्थान को चिह्नित करे, जहां गुरिल्ला दस्ता मौजूद हो। यह तथ्य ही इस बात का स्पष्टीकरण देता है कि 29 सितंबर को क्या इस क्षेत्र में शत्रुओं की फौजों का बाहुल्य हुआ।
भगोड़े के विषय में सार्वजनिक रूप से सूचना 30 सितंबर को प्रकाशित हुई। संभव यही है कि वह भेदिया तीन-चार दिन पहले से शत्रुओं के पास हो, और उसी समय से फौजों को रवाना करने की कार्रवाई शुरू हो चुकी हो। कोई भी दमनकारी फौज जब किसी किस्म की संभावनाओं का अवसर पाती है, अपनी फौजें ही रवाना करती है; बेशक, अकसर उन लोगों की यह कोशिश निष्फल ही साबित होती है, बिना किसी परिणाम के ही होती है। लेकिन गैर-प्रश्नांकित रूप से इस बार उनके लिए भारी संभावनाओं का अवसर था, क्योंकि वे बिलकुल उस क्षेत्र में पहुंच गए थे जहां गुरिल्ला दस्ते मौजूद थे। इसलिए शत्रुओं ने इस क्षेत्र में भारी संख्या में फौजों को ले जाना शुरू कर दिया था, और उन्होंने यह इस उच्च आशा के साथ किया था कि वे गुरिल्लाओं के विरुध्द भारी रणनीतिक विजय दर्ज करने में कामयाब हो जाएंगे।
9 अक्टूबर को न्यूयार्क टाइम्स में एक विचित्र लेख प्रकाशित हुआ यानी संघर्ष की पूर्व संध्या पर। यह लेख रविवार यानी 8 अक्टूबर के संस्करण में प्रकाशित हुआ यह संघर्ष की सुबह थी। इस लेख का शीर्षक था, 'चे ग्वेरा'स लास्ट स्टैंड?' इसके अनुसार :कामिरी, बोलेवियाब्लीक कुल दे साक जैसे स्थान, जहां इंडस नदी अमेजन की घाटी में गिरती है, वहां से चे ग्वेरा जैसे आदमी के लिए कहीं और जाना बहुत मुश्किल है।
इस धूल भरी घाटी में रोज सुबह सूरज धधकना शुरू होता है, कच्ची मिट्टी और भूरी-काली झाड़ियों को जलाता रहता है। यहां की स्थितियों में दीर्घजीवी पहाड़ी पतंगे और मच्छर, मकड़ियां, डंकदार मक्खियां विद्यमान हैं। यह एक ऐसी घाटी है, जहां हर वक्त मौत का सन्नाटा पसरा रहता है।
यह लेख इस क्षेत्र की भूस्थिति का भी कुछ-कुछ विवरण देता है :गर्मी, धूल-मिट्टी और यहां के कीट-पतंगों के काटने से यहां मानव शरीर की त्वचा की दुर्गति हो जाती है। खतरनाक वनस्पतियां और सूखी और कंटीली झाड़ियां मानव की गुप्त गतिविधियों के लिए आदर्श स्थान हो सकता है। लेकिन नदी, घाटी और हमलों के बीच यह असंभाव्य है।
सैन्य रिपोर्टों के अनुसार क्यूबाई मेजर और उनके साथ के अन्य थके हुए 16 गुरिल्ला साथी इस घाटी में फंस चुके हैं। पिछले दो सप्ताहों से सेना ने अपना घेरा बहुत अधिक कस दिया है। बोलेवियाई सेना का विश्वास है कि मेजर ग्वेरा यहां से जीवित नहीं निकल पाएंगे।
कामिरी के सैन्य अड्डे से 120 किलोमीटर दूर उत्तर-पश्चिम में स्थित इस घाटी में अनेक मायनों में मेजर ग्वेरा और उनके गुरिल्ला साथियों की स्थिति नारकीय हो चुकी है। ध्यान रहे कि कामिरी वह स्थान है, जो सशस्त्र क्रांति का प्रतीक बन चुका है।
इसके आगे भी बहुत कुछ लिखा गया है। दूसरे शब्दों में, फौजी टुकड़ियों के आगे बढ़ने की जानकारी देने वाले 29 सितंबर के डिस्पैच का विवरण इस बात को पुष्ट करता है कि इस सारे मामले की खबर एक भेदिए द्वारा ही पहुंची, यही डिस्पैच 30 सितंबर को समाचारपत्रों में प्रकाशित हुआ, और इसे ही विदेशी प्रेस में प्रातिनिधिक रूप से दोहराया गया। इन सबका गहरा गठबंधन सैन्य अधिकारियों (नेतृत्व) और उन सबसे था, जो घाटी, जंगलों और उन स्थानों से भलीभांति परिचित थे, साथ ही यह भी जानते थे कि घाटी में कहां छिपने के लिए स्थान नहीं है।
भविष्य की सफलता का पूर्वाभास, एक आशा वहां के वातावरण में विद्यमान थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अपेक्षित परिणाम हमेशा वास्तविकता में तब्दील ही होते हैं। किसी भूभाग की जानकारी हुए बिना, घाटी के आकार-प्रकार की जानकारी के बिना, इसकी लंबाई, चौड़ाई की जानकारी के बिना, घटनाक्रमों की पूरी शृंखला के बारे में कुछ भी कहना असंभव ही होता है। जाहिर है कि इन जानकारियों के बिना किसी वास्तविक उद्देश्य के बारे में पूर्ण विश्वास के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यह तो आशाओं के समुद्र में डुबकी लगाने के समान ही होगा। वैसे भी दमनकारी फौजों की ओर से हमेशा ही कहा जाता है कि गुरिल्ला फौजें पूरी तरह से घिर गई हैं।
उदाहरण के लिए, दमनकारी फौजें हमेशा ही कहती हैं कि गुरिल्ला फौजें पूरी तरह से घिर चुकी हैं। लेकिन इस बार सच यही था। हम अपने पीछे जहां समुद्र पा रहे थे, तो आगे मैदान और धान के खेत थे। हमारा मानना है कि हमारी गतिविधियों का क्षेत्र 10 किलोमीटर चौड़ा और लगभग 20 किलोमीटर लंबा था। साथ ही साथ बहुत ही अल्प दूरी से लोग हम पर छापामारी कर रहे थे। 1957 के पूरे साल से लेकर 1958 के मध्यमान तक, उनका प्रत्येक हमला हमारे विरुध्द ही होता था। यहां तक आखिरी हमले में भी भारी पैमाने पर फौजें शामिल थीं और कार्रवाई का क्षेत्र 10 किलोमीटर चौड़ा और 20 किलोमाटर लंबा ही था। लेकिन यह एक ऐसा क्षेत्र था जिसे हम बहुत अच्छी तरह से जानते थे। और उस वक्त हमारे साथ 300 आदमी थे।
लेकिन सामान्य तौर पर कहा जा रहा है कि गुरिल्ला फौजें पूरी तरह से घिरी प्रतीत होती थीं। गुरिल्ला दल को विभिन्न सैन्य फौजों द्वारा घेर लिया गया था। लेकिन रणनीतिक घेराबंदी बहुत खतरनाक होती है। इसमें गुरिल्ला इकाइयों को शत्रु सैनिकों द्वारा घेर लिया जाता है। लेकिन इन भयावह परिस्थितियों में भी कई बार पूर्वोक्त किस्म की घेराबंदी को तोड़ा भी गया है। इसी कारण घाटी की स्थिति, जिसके बारे में वे लोग बातचीत कर रहे हैं, के बारे में कोई नहीं कह सकता या अपनी राय नहीं व्यक्त कर सकता कि गुरिल्ला दल उस क्षेत्र में कितने खतरे में थे।
लेकिन समस्त परिस्थितियां स्पष्ट रूप से इंगित करती हैं क्योंकि बाद में उन्होंने फिर इस क्षेत्र के बारे में बताया है और इस विषय में उन लोगों की दृढ़ निश्चयता में वृध्दिकारक बेतार संदेशों को भी शामिल किया जा सकता है। जाहिर सी बात है कि शत्रुओं ने किसी स्थान पर अपनी सारी शक्ति का संकेद्रण कर लिया था। इसका यह मतलब कतई नहीं हो सकता कि इन परिस्थितियों में संघर्ष का जन्म होना अवश्यंभावी ही था, या गुरिल्लाओं द्वारा समर्पण किया ही जाता। इन सारे विवरण से मात्र उन परिस्थितियों के बारे में पता चलता है, जिसमें वह उस समय थे। साथ ही साथ फौजों के उस क्षेत्र की ओर संचालन का पता चलता है, जो अब युध्दक्षेत्र में तब्दील होने जा रहा था।
इसका मतलब है कि संघर्षयुध्द के लगभग दो सप्ताह पूर्व ही वहां एक किस्म का सुखाभास विद्यमान था और इसी भावना के अंतर्गत फौजों को उस क्षेत्र की ओर भेजा गया। वास्तव में यह क्षेत्र क्या है? हम नहीं जानते हैं। क्या अन्य दुर्गमताएं या प्राकृतिक अवरोध वहां विद्यमान हैं? हम नहीं जानते। क्या वहां वनस्पतियों से ढके हुए समानांतर मैदान हैं, या नहीं हैं या दुर्लंघ्य पहाड़ियां हैं कि नहीं? हम नहीं जानते। लेकिन यह स्पष्ट है कि फौजी टुकड़ियां उस क्षेत्र विशेष में भारी पैमाने पर पहुंचीं। भेदिए या भगोड़े की सूचना के अनुसार शत्रुओं की फौजों ने गुरिल्लाओं को बिलकुल ठीक उस स्थान पर घेरा था, जहां उनकी उपस्थिति थी। पुन: प्राप्त होने वाले डिस्पैचों की ओर आते हैं। ये डिस्पैच बताते हैं कि उस क्षेत्र में संघर्ष की शुरुआत हुई। इस क्षेत्र के बारे में बताया गया कि यह बहुत उबड़-खाबड़ भूभाग है, जहां चलना-फिरना भी बहुत मुश्किल है। घाटी में घने जंगल हैं, गहरे गङ्ढे हैं, गुफाएं हैं और जल-प्रपात हैं। 6 और 7 अक्टूबर को लिखे गए डायरी के पन्नों से भी इस क्षेत्र के बारे में कुछ सूचना प्राप्त होती है। उदाहरणस्वरूप, 6 अक्टूबर को लिखी गई इबारत के अनुसार : 'स्काउटिंग पेट्रोल (खोजी दस्ता) ने नजदीक ही एक घर खोजा है, लेकिन यह भी....' फोटोकापी किए हुए डायरी के ये पृष्ठ पठनीय नहीं हैं। चे का हस्तलेख छोटा और ऐसा होता है जिसे पढ़ना आसान नहीं होता है। फिर फोटो प्रतिलिपि तो बहुत हद तक अस्पष्ट है।
डायरी के अनुसार : '....तंग घाटी बहुत आगे तक प्रसारित है। इसके अंत में पानी है। हम....।' आगे का हिस्सा फिर अस्पष्ट है। '....और अंत में हम सबने खाना पकाया....।' फिर एक पंक्ति गायब है। इसके बाद, 'एक चट्टान के नीचे, जो एक छत की तरह थी....कि मैं....'
इसी के अनुसार : 'दिन की चमकीली रोशनी में तंग स्थानों, खोहों का सहारा लेते हुए इस स्थान को पार किया।' और फिर इसके बाद की कुछ पंक्तियां फिर गायब हैं।
आगे : 'खाना पकाने की तैयारियां करने में ही एक लंबा वक्त लग गया। हमने तय किया कि सुबह होते ही इस तंग स्थान (चट्टान) से चले जाएंगे और इसके बाद आगे के लिए खोजबीन करेंगे। तब....हम फैसला करेंगे कि आगे किस दिशा की ओर हम जाएंगे।'
आगे : 'क्रूज डेल सुर रेडियो ने एक साक्षात्कार में सूचना दी....आदमी.... ओरलांडों बहुत ही छोटा है।' यद्यपि यह बहुत बुध्दिमत्तापूर्वक कहा जा रहा है। इसके अलावा इसमें एक बोलेवियाई का जिक्र है कि उसने स्वयं को वहां की सत्ता के अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। इस (भगोड़े या भेदिए) के बारे में पहले ही कहा जा चुका है। बाद में कहा गया कि उन्होंने इस व्यक्ति को बंदी बताया था। बहुत कुछ है, जो स्पष्ट नहीं है। उस तरह तो बिलकुल ही नहीं जैसी स्थिति अन्य मामलों में है।
आगे : 'चिली के रेडियो पर भी एक खबर प्रसारित हुई....यह कि इस क्षेत्र में 1,800 सैन्य टुकड़ियां विद्यमान हैं।'(क्रमशः)
(अपराजेय योद्धा चे ग्वेरा, फिदेल कास्त्रो,अनुवाद-जितेन्द्र गुप्ता,2011,ग्रंथ शिल्पी,नई दिल्ली से साभार)


शनिवार, 5 मार्च 2011

चे ग्वेरा की मौत पर फिदेल कास्त्रो-2-


    मैं आपसे कह रहा था कि हम इस निर्णय पर पहुंच चुके हैं। हम अपने निष्कर्ष पर किन्हीं एकांगी तथ्यों, एकांगी शब्दों या एकांगी फोटोग्राफों के माध्यम से नहीं पहुंचे हैं। फोटोग्राफ कृत्रिम हो सकते हैं। लेकिन इन फोटोग्राफों को सरकार ने नहीं जारी किया है। ये चित्र बोलेविया में मौजूद पत्रकारों ने लिए हैं। उस जगह से ये चित्र लिए गए हैं, जहां शरीर रखा गया था। इसलिए इन फोटोग्राफों के कृत्रिम होने का सवाल ही नहीं उठता। यह मानना ठीक नहीं कि ये फोटोग्राफ झूठे हैं।
इसके अलावा भी कई अन्य मान्यताएं हैं, जैसे यह दरशाया गया शरीर मोम का पुतला हो सकता है, यह कहना अत्यधिक असंभाव्य है, और ऐसा करना संभव भी नहीं है।
इन सभी तथ्यों पर एक-एक करके गौर किया गया है, और सभी तथ्यों को स्वतंत्र रूप से पर्यवेक्षित भी किया गया है। पाया यह गया है कि व्यक्त की गई भिन्न-भिन्न संभावनाएं सर्वोच्च रूप से असंभाव्य हैं। इन सभी बातों पर, खबरों और अन्य माध्यमों से पाए गए तथ्यों की शृंखला से विद्यमान संबंधों के आधार पर जांचा गया है।
उदाहरणस्वरूप, हमने पाया कि दिखाई गई हस्तलिपि चे की हस्तलिपि है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह उनकी हस्तलिपि नहीं है, और मेरे खयाल से जिसका अनुकरण करना असंभाव्य है। इस सबसे अलग चे का व्यक्तित्व बहुत ही भिन्न किस्म का था, और उनकी शैली का अनुकरण करना तो बिलकुल ही असंभाव्य है। वास्तव में कहा जाए तो यह करना किसी भी व्यक्ति के लिए असंभव है। यहां तक उनके लिए भी, जो उन्हें बहुत अच्छी तरह से जानते थे, वर्षों तक साथ रहे, क्योंकि चे के हर वाक्य में उनकी 'पोजीशन' व्यक्त होती है। फिर उनके लिखने की शैली, अभिव्यक्ति का तरीका, प्रत्येक विवरण के प्रति उनकी प्रतिक्रिया, और भी ढेरों चीजें, और अंतत: उनके चारित्रिक गुणों की शृंखला, जो कि उनके हस्तलेख से नहीं, बल्कि लिखे गए मसौदे, शैली और प्रतिक्रिया से परिलक्षित होता है। इस सबकी अनुकृति करना तो अत्यधिक असंभाव्य है।
स्वाभाविक रूप से मात्र डायरी एक लड़ाके की मृत्यु को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। डायरी राह चलते खो सकती है, झोले से गिर सकती है या हो सकता है कि कहीं सुरक्षित रखने के लिए छोड़ी गई हो। यद्यपि यह डायरी 7 अक्टूबर तक की ही है, यानी उस अंतिम युध्द की पूर्व संध्या तक। उस युध्द की पूर्व संध्या तक, जिसके बारे में माना जाता है कि इसी युध्द में उनकी हत्या हुई। इस डायरी को चे ने अंतिम युध्द के कुछ घंटे पहले तक लिखा था। यह निर्विवाद सत्यहै। इसके अलावा यदि मान भी लिया जाए कि डायरी खो गई थी, तो यह 8 अक्टूबर के आसपास ही खोई जो युध्द का दिन था।
इसके अलावा तथ्यों की एक अन्य शृंखला भी सामने है। विश्व के विभिन्न समाचारपत्रों में इस तरह के चित्र प्रकाशित हुए हैं, जिनसे पता चलता है कि चे बोलेविया में थे। कुछ समाचारपत्रों में इस तरह के चित्रों को प्रकाशित किया गया है (फोटोग्राफ दिखाते हैं)। इसमें वे अपने साथ एक झोला लिए हुए हैं, रास्ते में उन्होंने स्वयं को सामान से लैस किया। इस सामान में एम-12 रायफल भी थी। इसके अलावा एक चित्र और है, जिसमें वह एक खच्चर पर बैठे हैं (चित्र दिखाते हैं)। और यह भी गैर प्रश्नांकित रूप से ऊर्ध्व मुद्रा का चित्र है। संभवत: चित्र में उपस्थित व्यक्ति से वह किसी विषय पर कुछ हंसी-मजाक कर रहे हैं। इसके अलावा कई अन्य चित्र भी प्राप्त हुए हैं। बहुत से चित्रों को तो शत्रुओं द्वारा 'सीज' कर दिया गया है। दूसरे शब्दों में, इस विषय में ढेरों संकेत हैं, जिनमें सामान्य तौर पर स्वीकार भी किया जाता है कि वे बोलेविया में थे।
तथ्य यह भी बताते हैं कि हालिया सप्ताहों में बोलेविया में गुरिल्लाओं की जोरदार सरगर्मी विद्यमान थीं, जिसके पीछे भारी संख्या में फौजी टुकड़ियां संघर्षरत थीं। इन टुकड़ियों में वे इकाइयां खास तौर पर शामिल थीं जिनको साम्राज्यवादियों ने गुरिल्लाओं के विरुध्द तैयार किया था। ये कुछ तथ्य हैं, जिनको चे की मृत्यु संबंधी सूचनाओं पर विचार करते समय विश्लेषित करना चाहिए।
हमारी अपनी राय में डायरी सबसे अधिक प्रमाणिक तथ्य है और वहां से प्राप्त चित्रों की प्रामाणिकता भी समान ही है। हमारे नजरिए से यह बिलकुल ही असंभाव्य है कि इन सारे तथ्यों को कृत्रिम रूप से गढ़ा गया हो या इनके साथ तकनीकी छेड़छाड़ की गई हो। सभी तथ्यों का विश्लेषण, सभी खबरें, सभी पहलू, डायरी, प्राप्त सूचनाएं, सूचनाओं (खबरों) के स्रोत और तथ्यों की एक विस्तृत शृंखला देखने के बाद हमारा निष्कर्ष है कि इन सबूतों को गढ़ना बिलकुल भी असंभाव्य है।
लेकिन थोड़ी और गहराई से छानबीन करें। बोलेवियाई सत्ता में भी कई अंतर्विराध विद्यमान हैं। कई प्रतिस्पर्ध्दी आमने-सामने हैं। ढेरों समस्याएं विद्यमान हैं। और ऐसी स्थिति में यह बिलकुल भी असंभाव्य है कि उक्त सत्ता और वहां विद्यमान विभिन्न गुटों के बीच इस झूठ पर आम सहमति या आम समझौता हो पाए। वे वैसे भी जारी की गई खबरों के माध्यम से, घटनाक्रम की जानकारी के विषय में, मारे गए गुरिल्लाओं के शवों को न प्रदर्शित करके, अब तक बहुत झूठ बोल चुके हैं। प्रतिक्रियावादी शासन तंत्र की आदत ही होती है कि वह झूठी खबरें
दे, और यह कोई बड़ी बात नहीं है। यह एक ऐसी बात है, जिस पर अब हमें विश्वास कर लेना चाहिए।
दूसरे, तकनीकी दृष्टि से (इस झूठ को गढ़ने के लिए) उन्हें जिन स्रोतों और अनुभव की आवश्यकता होती है, वह उनके पास नहीं हैं।
तीसरे, और वह बहुत ही स्वाभाविक प्रश्न है कि वह सत्ता तंत्र इस तरह की खबरों को क्यों गढ़ेगा? इस तरह की खबरों को गढ़कर उसे क्या हासिल हो जाने वाला है, जबकि दस, पंद्रह या बीस दिनों में यह सचाई सामने ही जाने वाली है?
इसके बजाए प्रतीत यह हो रहा है कि वे यह सब बहुत सावधानीपूर्वक कर रहे थे। केवल दस या बारह दिनों पूर्व ही उन्होंने इसी तरह की रिपोर्ट जारी की थी। लेकिन कुछ ही घंटों के बाद अगले दिन उन्होंने इससे तीव्रतापूर्वक इनकार किया। लेकिन यह ताजी खबर शीघ्रतापूर्वक फैल गई, और जिसे परिमार्जित करने के लिए उन लोगों ने वर्गीकृत बयान जारी किए। पहली अफवाह कई पत्रकारों की ओर से आई। इसके अलावा वे यह कोशिश कर रहे थे कि कुछ सबूतों को पाया जाए, तब वे बिना किसी डर के या गलती के आधिकारिक बयान जारी कर सकें। हमने इन सारी बातों पर गौर किया है।
हमको प्राप्त खबरों को विश्लेषित करने का कुछ अनुभव है। हम सभी रोज ढेरों 'डिस्पैचों' को पढ़ते हैं, और हमें लगभग हर सरकार की शैली और चरित्र को आकलित करने का कुछ अनुभव प्राप्त है, उन व्यक्तियों का भी जो सत्ता में हैं। इन सभी चीजों और तथ्यों ने हमें खबर की सत्यता आकलित करने में मदद दी है। वे बहुत सावधानीपूर्वक कार्य करते हुए प्रतीत होते हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि बोलेवियाई सरकार का व्यवहार अल्पबुध्दि और मूर्खतापूर्ण है। लेकिन इस पर भी केवल जड़ बुध्दि नहीं, बल्कि वर्तमान में मौजूद सभी जगहों की सरकारों में सबसे मूर्ख सरकार ही ऐसा करने की सोच सकती है और इसे प्रमाणित करने का प्रयास करेगी। ऐसा मानना बिलकुल ही असंवेदनशीलता ही होगी।
इसमें भी कोई शक नहीं कि बोलेविया में गुरिल्ला आंदोलन एक ऐसे दौर में था, जिस पर गुरिल्लाओं का अस्तित्व निर्भर करता था। आधारभूत रूप से उनकी क्षमताओं पर और उनके संसाधनों पर भी निर्भर करता था। यह कोई ऐसा अवसर नहीं था कि जहां संकट अवश्यंभावी ही था। ऐसी स्थिति में सरकार के झूठ ने आठ, दस दिन या एक सप्ताह ले लिया, ऐसी बात भी नहीं थी।
गुरिल्ला इस अवधि मेंइस अवधि के विषय में हम जानते हैं, आधारभूत रूप से अपनी निजी शक्तियों पर निर्भर थे। और गुरिल्ला लड़ाकों ने जब इन खबरों
को सुना, तो वे हंसे। तात्पर्य यह कि ये खबरें गुरिल्लाओं पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाईं। इसके विपरीत वही लोग प्रभावित हुए, तुरंत प्रभावित हुए। सच मायनों में तो इस तरह की सरकारों के विश्वास और प्रतिष्ठा पर ही गंभीर आंच आई।
मैंने स्वयं से ही तर्क किया कि इस तरह की खबरों को गढ़ना क्या कोई तार्किकता रखता है। मैंने यह मानने का प्रयास किया कि हो सकता है कि इस तरह की खबरों को गढ़ने के पीछे कोई उद्देश्य हो, लेकिन कोई उद्देश्य नहीं दिखलाई पड़ता है।
डायरी में दर्ज विवरण, डायरी में दर्ज भूस्थिति, फोटोग्राफ जो वहां की सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए थे, इन सभी के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकालने में सक्षम हो पाए कि प्राप्त खबरें सच हैं।
तार्किक रूप से यह किसी भी मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति होती है कि वह जिस व्यक्ति से गहराई से प्रेम करता है या उससे लगाव महसूस करता है, उसके विषय में बुरी खबरों को स्वीकार नहीं कर पाता है। सर्वोच्च स्तर पर यह हमारे साथ पहली बार हो रहा है। लोगों के मस्तिष्क में, विश्व के सारे क्रांतिकारियों के मस्तिष्क में भी, यही प्रवृत्ति विद्यमान है कि इस तरह की आने वाली खबरों को अस्वीकृत कर दे।
इसके अलावा सरकार की निम्नतम विश्वसनीयता, प्रतिष्ठा की अत्यधिक कमी ने खबरों की सत्यता के विषय में संदेह उत्पन्न किया। भावुकता की सर्वोच्चता ने भी इन खबरों को अस्वीकृत करने में योगदान दिया।
यह बोलेवियाई सरकार इतनी अविश्वसनीय है कि यांकी साम्राज्यवादियों के साथ इसकी सभी सहयोगी सरकारों ने खबरों के आने के बाद कहा कि वे इन खबरों के बारे में आश्वस्त नहीं हैं या वे इन पर विश्वास नहीं कर पा रही हैं, कहकर एक सावधानी भरा रुख अख्तियार किया। और बाद में स्वाभाविक रूप से उन लोगों ने भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों को अपनाना शुरू किया, वह भी तब जब उनके हाथ में इस तरह के कुछ सबूत आए जिससे वे खबरों की सत्यता के बारे में सुनिश्चित हो सकें। लेकिन ध्यान देने की बात है कि जब तक उनके हाथ सबूत नहीं आए, तब तक उन्होंने न तो बोलेविया से आने वाली खबरों पर विश्वास ही किया, न ही इस विषय में उन्होंने कुछ कहा ही।
लेकिन विवाद और संशय तो अभी भी विद्यमान हैखास तौर परइसका रिश्ता मृत्यु की तथ्यात्मकता से नहीं, बल्कि इस बात पर है कि उनकी मृत्यु कैसे हुई, उनकी मृत्यु के साथ जुड़ा घटनाक्रम क्या है।
हममें से जो लोग अर्नेस्टो चे ग्वेरा को अच्छी तरह से जानते हैं, और जानते हैं
कि मैंने अर्नेस्टो चे ग्वेरा के बारे में भूतकाल का इस्तेमाल क्यों नहीं किया, इसलिए क्योंकि उसके साथ भूतकाल का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। वह बहुत अनुभवी, चरित्रवान और धैर्यवान व्यक्ति थे। यद्यपि यह कल्पना करना बहुत ही कठिन है कि उनके जैसे कद, प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति को गुरिल्लाओं के दल और सैन्य टुकड़ी के बीच संघर्ष में मार दिया जाए। यह जितना असंभव दिखता है उतना ही अतार्किक भी है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। हम लोग जितना उन्हें जानते हैं, उतने ही परिचय में वह असाधारण साहस के धनी साबित हुए थे। कितना भी बड़ा खतरा सामने हो, उसका साहस के साथ मुकाबला करने के लिए उध्दत, किसी भी कठिनाई या खतरनाक स्थिति में बड़े से बड़ा खतरनाक या कठिनतम कार्य करने के लिए उध्दत। हमारे संघर्ष के दौरान उन्होंने अपने इन गुणों को बखूबी प्रदर्शित किया था। इसी तरह की शौर्यता के साथ उन्होंने सिएरा मस्चेरा और लास विलास में कार्य किया था।
कई बार तो उनकी सुरक्षा के लिए हमें कई तरह के कदम उठाने पड़ते थे। एक से अधिक बार ऐसा हुआ कि वह जो कार्रवाई करना चाहते थे, उनकी सुरक्षा के कारणों से हम यह कार्रवाई से असहमत होते थे। लेकिन बाद में उनकी संघर्ष क्षमता की तारीफ करनी पड़ती थी। क्रांति के दौरान उन्होंने ऐसे ही अनेक साहसिक कारनामों को अंजाम दिया था, और ये सारे मिशन गहरे रणनीतिक महत्व के थे। लेकिन इन सारी स्थितियों में हमारा पहला उद्देश्य यही होता था कि जहां क्षति होने की संभावना हो, या जो मिशन कम रणनीतिक महत्व के हों, हम उन्हें वहां खतरा उठाने से रोकें। यही वे थोड़े-बहुत क्षण हैं, जिनके बीच उनको एक हमलावर दस्ते का कमांडर बनाया गया और नेतृत्व सौंपा गया। लास विल्लास प्रांत को कब्जे में लेने के जैसा असंभाव्य कार्य उन्होंने असाधारण शौर्य के साथ किया। जो उनको जानते हैं, वे जानते हैं कि उन्होंने कितने असाधारण शौर्य के कार्यों को अंजाम दिया।
हमें कहना चाहिए कि हम उनकी ऊर्जा से सदैव चिंतित रहते थे, और अपनी इसी इच्छाशक्ति और संकल्प से वे मृत्यु के क्षणों को भी पीछे धकेलने में सक्षम रहे। कोई भी इस बात पर निश्चिंत नहीं हो सकता कि उन्होंने सावधानी के अल्पतम उपायों को भी स्वीकार किया हो। कई बार तो वे खोजी दल (स्काउटिंग पार्टिज) के मुखिया के तौर पर भी आगे बढ़ गए।
वहीं दूसरी ओर, वे अपने हाथ में लिए गए मिशन की महत्ता के विषय में भी अत्यधिकसर्वोच्च स्तर पर सावधान रहते थे। इसी कारण यह संभव था कि वे जिस मिशन को अपने हाथों में लेते थे, उसे पूरा ही करते थे। यह मानीयता का ऐसा गुण है जिसके समानांतर शायद ही कोई उदाहरण हो।
हम उन्हें किसी अग्रदूत की जगह या किसी अन्य रूप के बजाए, एक निर्माता के रूप में देखना चाहते हैं, लोगों की महान विजयों के निर्माता के रूप में। परिस्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया के कारण दुर्भाग्यवश ऐसे मिजाज, व्यक्तित्व और चरित्र के व्यक्ति को लोग विजयों के निर्माता के बजाए अग्रदूत बनाना ज्यादा पसंद करते हैं। वैसे अग्रदूत स्वभावत: विजयों का निर्माता भी होता है, विजयों का महान निर्माता!
चे इस सबसे बहुत अधिक व्यग्र होंगे। उनके प्रति अत्यधिक लगाव रखने वाले हम सभी व्यक्तियों के लिए यह समझना बहुत कठिन है कि स्वयं से त्यागपत्र देकर वे एक अग्रदूत बने। यह एक ऐसा उदाहरण है जिसकी हम सब पर अमिट छाप है, और बेहिचक यह एक बहुत महान उदाहरण है। उनके जैसे एक चरित्र, एक मस्तिष्क और पूर्ण मानवीय व्यक्तित्व के भौतिक रूप से नष्ट (मृत्यु) होने से कोई भी व्यक्ति दु:खी होगा। लेकिन जैसा मैंने पहले कहा कि किसी को इस बात पर विस्मय नहीं होना चाहिए कि उस गुरिल्ला संघर्ष में शहीद होने वालों में सबसे पहले वही होंगे। यह अपने आप में एक चमत्कार की भांति भले ही प्रतीत हो, लेकिन यदि सचाई में इसके विपरीत कुछ भी हुआ होता तो वह जरूर विस्मयजनक होता। उन्होंने अनेक बार खतरों का सामना किया। कई बार उन परिस्थितियों में भी जब संघर्ष में बिलकुल गणितीय नियम लागू होते हैं। यह ऐसा कुछ नहीं था, जिसके बारे में हम सोचते हों कि ऐसा कभी नहीं होगा। हमने इन सभी स्थितियों का सामान्य रूप से परीक्षण किया है।
इसलिए इस अवसर की पृष्ठभूमि क्या है, संघर्ष की कारक परिस्थितियां क्या थीं, जिनमें शत्रुओं को भारी पैमाने पर एकीकृत होने का अवसर मिला, और वे उनके (चे के) विरुध्द भारी संख्या में फौजों को तैनात कर सकें?
उदाहरण के लिए यहां, हमारे पास कुछ तथ्य हैं, जो इस स्थिति की पृष्ठभूमि की व्याख्या करने में कुछ मदद कर सकते हैं। हम उन प्रश्नों का कोई श्रेणीबध्द जवाब नहीं दे सकते हैं कि कब किसके द्वारा दी गई सूचना पर निर्णय कर सकते हैं कि हम कौन सी सूचनाओं को एकत्र करने, चयन करने और उनका परीक्षण करने में सक्षम हुए। सही मायनों में यह प्राप्त खबरों और डिस्पैचों के समुद्र से चयन करना था, और हम उसमें सफल हुए। उदाहरण के लिए 27 अक्टूबर का डिस्पैच यही है :
एक उच्च स्तरीय सैन्य सूत्र ने आज इस बात की पुष्टि की कि बोलेवियाई सेना पूर्णरूप से सहमत है कि उसने अर्जेंटीना-क्यूबाई क्रांतिकारी 'चे' ग्वेरा को यहां से 128 किलोमाटर दूर एक जंगल में घेर लिया है।
स्रोत ने इस विषय में और अधिक विवरण देने से इनकार कर दिया। लेकिन उन्होंने आज शाम एसोशिएट प्रेस के सामने यह रहस्योद्धाटन किया था कि पिछले कुछ दिनों से घने जंगलों में फौजें एक घातक और महत्वपूर्ण संघर्ष में मुब्लता हैं।
जबकि जंगल में अभियान चलाने में सक्षम यंत्रों से लैस दूसरी 800 टुकड़ियां भी इसी अभियान के लिए सांताक्रूज शहर से आगे बढ़ गई हैं।
इसी शहर में रीगिस डेब्रेए पर मुकदमा चलाया गया था, अब यह शहर सेना की चौथी बटालियन का मुख्यालय है, वहीं सांताक्रूज अब आठवीं बटालियन का मुख्यालय है।
सैन्य टुकड़ियों का एक दस्ता कामेरी से बुधवार को गया था, और एक दस्ते ने इस जगह को पिछली रात को छोड़ा। एक अन्य टुकड़ी इस दोपहर को रवाना होने वाली है।
विश्वसनीय सैन्य सूत्रों के मुताबिक ग्वेरा की खोज में 1,500 से ज्यादा की टुकड़ियां भाग ले रही हैं।
(क्रमशः)

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