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रविवार, 10 जुलाई 2016

कश्मीर में मूल समस्या आतंकवाद नहीं आर्थिक गरीबी है

           कश्मीर इन दिनों फिर से चर्चा के केन्द्र में है।जिन लोगों ने 1989-90 से शुरू हुई तहरीक को देखा है वे जानते हैं आखिरकार कश्मीर में अशांति कैसे आई।वे यह भी जानते हैं कश्मीर की अशांति की जड़ें कहां हैं।कश्मीर पर बातें होती हैं तो सारी बहस आतंकवाद-पृथकतावाद और पाकिस्तान के रेगिस्तान में भटक जाती है।कोई कश्मीर की अर्थव्यवस्था और राजनीतिक अर्थशास्त्र पर बातें नहीं करता। कश्मीर की समस्या की मूल जड़ है बहस के केन्द्र से अर्थव्यवस्था का गायब हो जाना।जितने लोग फेसबुक पर कश्मीर के सुनहरे अतीत और आतंकी वर्तमान पर लिख रहे हैं वे यदि गंभीरता से एक-एक लेख जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर भी लिख दिए होते तो बहुत बड़ा उपकार कर दिए होते।

कश्मीर की त्रासदी है कि उसके वास्तव मुद्दे केन्द्र में नहीं हैं। आज भी कश्मीर पर बात होती है तो आतंकवादी ही प्रमुख रूप से चर्चा के केन्द्र में रहता है,कायदे से हमें कश्मीर विमर्श का मूलाधार वहां की अर्थव्यवस्था की समस्याओं को बनाना चाहिए।वहां पर प्राकृतिक संतुलन के जो संभावित खतरे हैं उनको बनाना चाहिए।मैंने कश्मीर को बहुत करीब से देखने-जानने और समझने की कोशिश की है। मुझे यही लगा कश्मीर वह नहीं है जो मीडिया में नजर आता है।कश्मीर का आतंकी चेहरा मीडिया ने बनाया है.इसमें हिन्दुत्ववादी ताकतों की बहुत बड़ी भूमिका है।आश्चर्य की बात है मैं वर्षों से नियमित टीवी टॉक शो देखता रहा हूँ लेकिन एक भी चैनल याद नहीं पड़ता जिसने कश्मीर की अर्थव्यवस्था की समस्याओं पर कभी बातें की हों।

कश्मीर में आतंकियों की समस्या से ज्यादा बड़ी बेकारी की समस्या है,लाखों युवाओं के पास कोई काम नहीं है।मीडिया कवरेज की आज परिणति यह हुई है कि हर कश्मीरी को कश्मीर के बाहर संदेह की नजर से देखा जाता है,यदि कश्मीर के बाहर कोई कश्मीरी नौकरी कर रहा है तो लोग हरह आतंकी घटना का कारण उस कश्मीरी से पूछते हैं,जबकि सच्चाई यह है उसे वास्तविकता में मालूम ही नहीं है कोई आतंकी घटना क्यों और कैसे हुई।मसलन्,जिस व्यक्ति को अभी पुलिसबलों ने मारा वह आतंकवादी था,लेकिन पुलिसबलों की पकड़ से कई सालों से बाहर था।उसका कोई कवरेज नहीं मिलेगा,अचानक पता चला वो बहुत बड़ा आतंकवादी था।

मीडिया की सूचनाओं को हम इस कदर पवित्र मानकर चल रहे हैं कि संदेह तक नहीं करते।सारी खबरें वही हैं जो पुलिसबल या सेना बता रही है। मैनस्ट्रीम मीडिया के जरिए कोई भी रिपोर्टर जमीनी हकीकत बताने की कोशिश नहीं कर रहा ।

आतंकवाद पर मैनस्ट्रीम मीडिया अमूमन झूठ बोलता है कम से कम यह विकीलीक के दस्तावेजों को देखकर तो हमलोगों को समझ लेना चाहिए।दूर क्यों जाएं हाल ही में चिलकोट साहब ने इराक पर जो जांच रिपोर्ट पेश की है उससे सीख लें।



कहने का अर्थ है कश्मीर के बारे में बातें करें तो वहां के बुनियादी आर्थिक सवालों पर बातें करें।आम कश्मीरी अपने को आतंकियों से बहुत पहले दूर कर चुका है।मीडिया के कवरेज से राय न बनाएं। कश्मीर पर मीडिया बहुत घटिया काम कर रहा है वह प्रत्येक कश्मीरी को आतंकवाद समर्थक बता रहा है।कल एक आतंकी की शवयात्रा का कवरेज और उस पर आए बयान इस बात को पुष्ट करते हैं कि आम कश्मीरी और आतंकी के बीच में अंतर करना मीडिया,नेता और भोंपुओं ने बंद कर दिया है। आज कश्मीर की मूल समस्या आतंकवाद या पृथकतावाद नहीं है बल्कि उसके विकास की आर्थिक समस्याएं जिन पर बातें करने से वहा के राजनीतिकदल और मीडिया दोनों परहेज कर रहे हैं।कायदे से मीडिया-नेता रचित यह कश्मीर एजेण्डा बदलना चाहिए।

मंगलवार, 1 मार्च 2011

नया बजट और नए खतरे

नव्य उदारीकरण में भारत के अधिकांश बुद्धिजीवियों ने अपने को पूंजीपरस्ती से बांध लिया है। युवा इस पूंजी के नारकीय खेल से पीड़ित हैं । औरतें इसमें पिस रही हैं। किसानों और मजदूरों के जीवन में तबाही मची हुई है।  इसके बाबजूद वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी और उनकी भक्तमंडली दावा कर रही है कि भारत विकास कर रहा है और केन्द्र सरकार विकासकार्यों पर सबसे ज्यादा खर्च कर रही है। वास्तविकता यह है  कि वित्तमंत्री ने एक भी बड़ा कारखाना खोलने का संकेत नहीं दिया है। बेकारी कम करने का एक भी नुस्खा नहीं बताया है। सवाल उठता है कि बेकारी कम नहीं होगी तो देश में सामाजिक असुरक्षा बढ़ेगी और ऐसी अवस्था में कानून और व्यवस्था की एजेंसियों की मदद की जरूरत ज्यादा पड़ेगी और इस संदर्भ में देखें तो बजट में सुरक्षा एजेंसियों का खास ख्याल रखा गया है। देश की वास्तविकता यह है कि भारत सरकार सुरक्षा एजेंसियों और सुरक्षा बलों के साथ- रक्षामद में ज्यादा खर्च करने जा रही है। यह इस बात का सबूत है कि देश में कानून-व्यवस्था के प्रबंधन पर ज्यादा व्यय होगा। मसलन वित्तमंत्री ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी,बाएसएफ,सीआरपीएफ आदि के लिए ज्यादा धन का आवंटन किया गया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के लिए बजट से 55.68 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। यानी पिछले साल की तुलना में 16.33 करोड़ रूपये ज्यादा आवंटित किए गए हैं। इस संस्था को गैर-योजनामद से 2009-10 में 11.91 करोड़ रूपये आवंटित  किए गए थे जिसमें इस साल के लिए गैर-योजनामद से 42.06 करोड़ रूपये दिए गए हैं। इस संस्था को आतंकवाद से संबंधित घटनाओं पर काम करने,जांच करने,रोकने और केस चलाने का अधिकार दिया गया है। सीबीआई को पिछले साल की तुलना में इस साल कम फंड आवंटित किया गया है। बीएसएफ के लिए 7628.79 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं।सीआरपीएफ के लिए 7827.32 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं वित वर्ष की तुलना में 300 करोड़ रूपये ज्यादा है। नेशनल इंटेलीजेंस ग्रिड को 33.81 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। इस संस्था का काम है काउंटर टेररिज्म के खतरे पर निगरानी रखना,उसके डाटा की जांच-पड़ताल करना। वहीं दूसरी ओर कारपोरेट घरानों के लिए प्रत्यक्ष करों में 11,500 करोड़ रूपये के कंशेसन दिए गए हैं। इसके विपरीत साधारण जनता पर 11,300 करोड़ रूपये के नए कर लगाए गए हैं। कारपोरेट घरानों से केन्द्र सरकार ने स्वेच्छा से 2010-11 में 1,38,921 करोड़ रूपये के कर वसूल नहीं किए। इसी तरह 2009-10 में कारपोरेट घरानों से 1,18,930 करोड़ रूपये के कर वसूल नहीं किए गए थे। केन्द्र सरकार ने इस तरह कारपोरेट घरानों को पिछले तीन सालों में 4लाख करोड़ रूपये दिए हैं। इसी तरह किसानों के मद में आने वाली विभिन्न योजनाओं के लिए आवंटित धन में कटौती की गई है। केन्द्र सरकार का समग्र खर्चा 3लाख करोड़ के करीब बैठता है इसके लिए वह कर वसूली पर जोर नहीं दे रही है बल्कि विभिन्न तरीकों से कर्ज लेकर चला रही है। केन्द्र सरकार ने आम आदमी को और ज्यादा कंगाल बनाने के लिए तकरीबन 20हजार करोड़ रूपये की सब्सीडी कटौतियां इस बजट में की हैं। इसके अलावा विभिन्न वित्तीय क्षेत्रों में विदेशी पूंजी निवेश को आमंत्रण देकर मनमोहन सिंह सरकार ने एकसिरे से देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी वित्तीय संस्थानों के रहमोकरम पर गिरवी रख दिया है।
   सैटेलाइट टीवी चैनलों के साथ प्रतिस्पर्धा में संचार माध्यमों को ,खासकर प्रसारभारती को खड़ा रखने की जरूरत है लेकिन मनमोहन सिंह सरकार अपने नव्य-उदार एजेण्डे पर आक्रामक ढ़ंग से बढ़ रही है और निजी चैनलों की मदद करते हुए उसने इसबार के बजट में प्रसारभारती के लिए आवंटित धन में कटौती कर दी है। पिछले साल की तुलना में इस साल प्रसारभारती को 300 करोड़ रूये कम आवंटित किए गए हैं। 2010-11 में 1,757.14 करोड़ रूपये दिए गए जो इस साल के बजट में घटाकर 1,484.01 करोड़ कर दिए गए हैं। इसबार के बजट की खूबी है 9प्रतिशत विकास दर ,भयानक बेकारी,मंहगाई में उछाल और देशी वित्तीय संस्थाओं में विदेशी पूंजीका अबाध प्रवेश यानी नए किस्म की आर्थिक गुलामी का आगमन।
   










रविवार, 11 अप्रैल 2010

आत्मलीनता के खिलाफ -अरुण माहेश्वरी


(प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक)

       आत्मलीनता (आटिज्म) के नाना रूप है। मनोविज्ञान के क्षेत्र में आत्मलीनता एक बड़ी बीमारी है। वास्तविक चिंतन से सर्वथा भिन्न एक ऐसी विचार प्रक्रिया जिसका घटनाओं और वस्तुओं की वास्तविक प्रकृति से कोई संबंध नहीं होता, पूरी तरह से व्यक्ति की अपनी इच्छाआकांक्षाओं द्वारा नियंत्रित होती है। इसमें कोई तर्क, कोई व्यवहारिक तकाजा नहीं होता। बीमारी होने के नाते ही यह किसी से भी करुणा की अपेक्षा रखती है। मजे की बात यह है कि साहित्य, संस्कृति और विचारधारा के क्षेत्र में, जहां पाठों से पाठों की, शास्त्रों से शास्त्रों की और विचारों से विचारों की श्रंखलाओं को तैयार करने का लंबा सिलसिला चला आरहा है, वहां यही आत्मलीनता पांडित्य, विद्वता और परम निष्ठा की मर्यादा पाती है। लेकिन गहराई से देखे तो साहित्य, संस्कृति और विचारधारा के पूरे क्षेत्र में पसरी हुई यह आत्मलीनता ही सांस्कृतिक जीवन की तमाम प्रकार की अहम्मन्यताओं, जड़ताओं और  क्रूरताओं के मूल में होती है और इसीलिये ऐसी आत्मलीनता करुणा की नहीं, समझौताविहीन निर्ममता की अपेक्षा रखती है। प्रश्नविहीन अंधआस्था आत्मलीनता का ही एक बड़ा लक्षण है।

           21वीं सदी के प्रारंभ के साथ ही सन् 2000 के जून महीने में फ्रांस के विश्वविद्यालयों के अर्थशास्त्र के कुछ छात्रों ने अर्थशास्त्र की चालू शिक्षा पद्धति के खिलाफ सरकार और शिक्षा अधिकारियों के पास एक अर्जी पेश की थी, जिसमें उन्होंने तत्कालीन शिक्षा पद्धति पर यह आरोप लगाया गया था कि यह कत्तई यथार्थपरक नहीं है। गणित के अनियंत्रित प्रयोग के चलते गणितीय आंकड़ें ही इसके लक्ष्य बन कर रह गये है, जिसने इसे एक आत्मलीन विज्ञान में तब्दील कर दिया है। यहां पढ़ाये जाने वाला अर्थशास्त्र अपनी काल्पनिक दुनियाओं में खोया हुआ है। विश्वविद्यालयों के अर्थशास्त्र के पाठ्यक्रम पर नवशास्त्रीय सिद्धांतों और उससे पैदा होने वाले दृष्टिकोणों की दमनकारी जकड़बंदी है। अर्थशास्त्र के पठनपाठन की इस जड़ीभूत पद्धति में आलोचनात्मक और वस्तुनिष्ठ चिंतन के लिये कोई स्थान नहीं है। इसीलिये इन फ्रांसि‍सी छात्रों की मांग थी कि अर्थशास्त्र ठोस यथार्थ के साथ शुद्ध अनुभववादी ढंग से टकरायें, विज्ञानवाद के बजाय विज्ञान को प्राथमिकता प्रदान करें, आर्थिक विषयों की जटिलता और अधिकांश बड़े आर्थिक सवालों और सिद्धांतों को घेर कर खड़ी अनिश्चयताओं के मद्देनजर बहुलतावादी दृष्टिकोण अपनायें। समग्रत:, उनके अध्यापक अर्थशास्त्र के पठनपाठन को उसकी आत्मलीनता और सामाजिक गैरजिम्मेदारी की दशा से निकालने के लिये जरूरी सुधार करें।

           फ्रांस के अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों की इस अर्जी को वहां के अनेक नामीगिरामी और स्थापित अर्थशास्त्रियों और अध्यापकों का समर्थन मिला।  इस अर्जी पर सहमति की मोहर लगाने वालों में अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों की तुलना में कहीं ज्यादा, भारी अकादमिक प्रतिष्ठा वाले फ्रांस के ग्रोन्द एकोलकी तरह के मंच भी शामिल थे। वहां के प्रमुख अखबार ल मोंदने कई दिनों तक इस विषय को सुर्खियों पर रखा और देखते ही देखते छात्रों की मांग ने पूरे फ्रांस में एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया। तभी से आत्मलीनोत्तर अर्थशास्त्रके नाम से एक पत्रिका के जरिये जो अभियान शुरू हुआ वह वहां आज भी समान रूप से जारी है और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में हर नयेपुराने सिद्धांत को यथार्थ की ठोस जमीन से विश्लेषित करके उसकी सत्यता को परखने की एक सृदृढ़ परंपरा बना रहा है।

आत्मलीनता और आत्मलीनोत्तर अर्थशास्त्र की ये तमाम बातें हमारे दिमाग में हमारे विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों की आम दुर्दशा के खयाल से पैदा नहीं हुई है। इन विभागों की सचाई लंबे काल से इतनी प्रकट है कि अब उनके प्रति असंतोष से किसी नयी बात के उद्रेक की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। दरअसल, हमारे दिमाग में यह समूची बहस तब कौंधी जब मात्र साल भर पहले प्रकाशित प्रभात पटनायक की किताब वैल्यू आफ मनी’ (द्रव्य का मूल्य) को पढ़ना शुरू किया। यह पुस्तक प्रभात पटनायक के उन चंद लेखों का संकलन है जिन्हें उन्होंने 1995 में लिखना शुरू किया था और तभी अर्थशास्त्र के अकादमिक क्षेत्र में ये लेख काफी लोकप्रिय हो गये थे। इनकी लोकप्रियता को देख कर प्रभात ने इस विषय पर अलग से एक पूरी किताब ही लिखने की योजना बनायी थी, लेकिन अंतत: सभी लेखों को जोड़ने वाली पृष्ठभूमि को एक भूमिका में लिख कर ही काम चला लेना उनके लिये संभव हुआ।

          सभी जानते हैं कि प्रभात पटनायक एक अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त मार्क्‍सवादी बुद्धिजीवी, अर्थशास्त्री और अध्यापक है। द्रव्य पूंजी, द्रव्य का मूल्य और समग्र सामाजिक तानेबाने में द्रव्य की भूमिका के बारे में मार्क्‍स ने पूंजीके तीसरे खंड में कुछ विस्तार से विवेचन किया है। एक ऐसे शास्त्रीय किस्म के विषय पर प्रभात पटनायक की तरह के प्रतिबद्ध मार्क्‍सवादी अर्थशास्त्री ने नया क्या लिखा होगा, इसे किस हद तक आज के समय के पूंजीवाद के विश्लेषण से जोड़ा होगा, यही जानने के लिये बड़े आग्रह के साथ हमने इस किताब को शुरू किया था। और, यह देख कर सचमुच एक सुखद आश्चर्य हुआ कि प्रभात द्रव्य पूंजी से जुड़े इस शास्त्रीय विषय पर माक्र्स की कही बातों की पुनरावृत्ति के लिये नहीं, बल्कि कई नये अभिप्रायों और प्रेरणाओं के साथ प्रवृत्त हुए हैं और इस उपक्रम में उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था के समग्र ढांचे के बारे में कुछ नयी उद्भावनाओं को भी पेश करने की कोशिश की है। 
        अपनी इस पुस्तक में उनका आह्वान है कि दुनिया में लंबे समय से चल रहे धीमे विकास, प्रमुख पूंजीवादी ताकतों पर लगातार बढ़ता हुआ कर्ज का बोझ, तेलडालर मानक तथा अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा व्यवस्था पर मंडराते हुए अनिश्चय के बादल और इसके साथ ही तीसरी दुनिया के बाजारों के खुलने, वैश्विक वित्त के अबाध प्रवाह, बहुराष्ट्रीय निगमों की निर्बंध क्रियाशीलता, तेल संपदा वाले देशों पर राजनीतिक अधिकार की कोशिशों, और साम्राज्यवादी लोलुपता से उत्पन्न तथा उसीको वैद्यता प्रदान करने वाले विनाशकारी आतंकवाद के आज के इस जटिल मुकाम की गुत्थी को सुलझाने के लिये जरूरी है कि हम अपनी आंखों पर पड़ी मुख्यधाराके अर्थशास्त्र के अंधेरे की पट़टी से खुद को मुक्त करें।
प्रभात शुरू करते हैं इस सवाल से कि आखिर वह कौन सा सामाजिक तानाबाना है जिसकी बदौलत रुपया (द्रव्य) कहलाने वाला कागज का टुकड़ा एक मूल्य ग्रहण करके उपयोगी सामग्रियों के विनिमय का माध्यम बन जाता है। जाहिर है कि यह तानाबाना पूंजीवादी व्यवस्था का तानाबाना है। और इसीलिये प्रभात का मानना है कि पूंजीके बजाय यदि हम द्रव्य के अध्ययन से इस व्यवस्था की पड़ताल शुरू करें तो इससे पूंजीवाद के जिस महत्वपूर्ण पहलू को और ज्यादा मूर्त और स्पष्ट किया जा सकेगा वह यह कि पूंजीवाद कभी भी एक बंद और आत्मकेंद्रित प्रणाली के तौर पर अलगथलग रूप में अस्तित्व में न रहा है और न रह सकता है, जैसा कि आम तौर पर आर्थिक विश्लेषणों की सुविधा के लिये मान लिया जाता है।

        इस सवाल पर कि कौन सी चीज द्रव्य का, वह भले कागज का हो या धातु का, मूल्य निर्धारित करती है, प्रभात बताते हैं कि अर्थशास्त्र के पास इसके दो प्रकार के बुनियादी जवाब हैं। एक द्रव्यवादी और दूसरा संपत्तिवादी। प्रभात मुख्यधारा के अर्थशास्त्र को द्रव्यवादी धारा की श्रेणी में रखते हैं और यह मानते हैं कि वह किसी भी चीज के मूल्य के कारक संबंधी विवेचन में बाजार के माध्यम से मांग और आपूर्ति के संतुलन की अपनी जिस अवधारणा से प्रतिबद्ध है, वह अवधारणा अन्य मामलों की तरह ही द्रव्य के मूल्य के मामले में भी तर्क की कसौटी पर जरा भी खरी नहीं उतरती। यह कुछ ऐसी खयाली अवधारणा है जिसमें माना जाता है कि कंपनियां ज्यादा से ज्यादा मुनाफा करती रहेगी और व्यक्ति अधिक से अधिक सुविधाएं पाते रहेंगे। मुख्यधारा की संतुलनकी अवधारणा तार्किक रूप में सिर्फ उस संसार में टिक सकती है जहां द्रव्य नाम की कोई चीज न हो। ऐसा द्रव्यविहीन समाज पूंजीवाद नहीं हो सकता। इसीलिये पूंजीवाद के संदर्भ में मुख्यधारा के अर्थशास्त्र के द्रव्य संबंधी विवेचन का कोई औचित्य नहीं रह जाता। यही वजह है कि वह अंतत: द्रव्य को मुख्य रूप से परिचलन का माध्यमभर मानने की जिद पर अड़ जाता है। जबकि सचाई यह है कि द्रव्य तभी परिचलन के माध्यमकी भूमिका अदा कर सकता है जब वह खुद संपत्ति का भी एक रूप होता है।

       द्रव्य के मूल्य के बारे में द्रव्यवादीसोच से भिन्न प्रभात माक्र्स को संपत्तिवादीधारा का एक प्रमुख प्रतिनिधि मानते हुए कहते हैं कि मार्क्‍स ने द्रव्य के संपत्ति को धारण करने के गुण को पहचाना था, इसीलिये वे पूंजीवादी समाज में अतिउत्पादन की संभावना की व्याख्या भी कर पाये थे। प्रभात के अनुसार मार्क्‍स के अनुयायियों ने उनके इस बुनियादी योगदान पर अधिक ध्यान नहीं दिया, वे अतिरिक्त मूल्यके सिद्धांत वाली खोज पर ही बल देते रहे। यह काम माक्र्स के बाद, लगभग 75 वर्ष गुजर जाने के उपरांत कालेस्की और केन्स के माध्यम से संपन्न हुआ। प्रभात कहते हैं कि माक्र्स ने द्रव्य के मूल्य के निर्धारण में मूल्य के श्रम सिद्धांतका प्रयोग किया और केन्स का भी मानना था कि तमाम जिंसों के बरक्स द्रव्य का मूल्य एक जिंस, श्रम शक्ति के बरक्स तय किये गये द्रव्य के मूल्य से निर्धारित होता है। 
      प्रभात द्रव्यवादियों की तुलना में संपत्तिवादियों की परंपरा को कहीं ज्यादा यथार्थपरक और तर्क के लिहाज से पुष्ट मानते हैं, तथापि अपनी प्रस्थापना के लिये इस संपत्तिवादी नजरिये को अधूरेपन का दोषी भी बताते हैं।
   इसी बिंदु पर जरा थम कर, हम यह कहना चाहेंगे कि प्रभात पटनायक मूल्य के श्रम सिद्धांतकी जिस बात को मार्क्‍स के मत्थे मढ़ कर उनके संपत्तिवादीनजरिये के अधूरेपन की बात करते हैं, दरअसल, वह नजरिया माक्र्स का नहीं, उस क्लासिकल अर्थशास्त्र का है जिसकी आलोचना के आधार पर ही माक्र्स के आ​‍र्थि‍क सिद्धांतों का पूरा महल खड़ा है।
    श्रम ही सारी संपदा का श्रोत है, क्लासिकल अर्थशास्त्र की इस बात का खंडन करते हुए जोरदार शब्दों में माक्र्स ने कहा था कि सारी संपदा का स्रोत श्रम ही नहीं है। प्रकृति को भी उपयोग मूल्यों का (भौतिक संपदा में और है भी क्या!) श्रम जितना ही स्रोत कहा जा सकता है।...और क्योंकि आदमी आरंभ से ही प्रकृति के प्रति, जो श्रम की सभी वस्तुओं और साधनों का आदिस्रोत है, स्वामी जैसा रवैया रखता है, उसके साथ अपनी संपत्ति जैसा व्यवहार करता है, इसलिये उसका श्रम उपयोग मूल्यों का, और इस कारण संपदा का भी सा्रेत बन जाता है। पूंजीपति अगर झूठे ही श्रम पर अलौकिक सृजन शक्ति का आरोप करते है तो वे ऐसा सकारण करते है, क्योंकि ठीक इसी बात से कि श्रम प्रकृति पर निर्भर करता है, यह बात पैदा होती है कि जिस मनुष्य के पास अपनी श्रमशक्ति के अलावा और कोई संपत्ति नहीं है, उसे समाज और संस्कृति की सभी अवस्थाओं में दूसरे मनुष्यों का दास होना पड़ेगा, जिन्होंने अपने को श्रम की भौतिक परिस्थितियों का मालिक बना लिया है। वह केवल उनकी आज्ञा से ही काम कर सकता है, इसलिये जी भी वह उनकी आज्ञा से ही सकता है।
फ्रेडरिक एंगेल्स ने अपने लेख वानर से नर बनने की प्रक्रिया में श्रम की भूमिकाका प्रारंभ इन पंक्तियों से किया है: अर्थशास्त्रियों का दावा है कि श्रम समस्त सम्पदा का स्रोत है। वास्तव में वह स्रोत ही है, लेकिन प्रकृति के बाद
     कहना न होगा कि मार्क्स श्रम पूजाकी किसी एकांगी दृष्टि के आधेअधूरेपन से मुक्त थे और तभी पूंजीवाद की एक समग्र आलोचना का मुकम्मल दृष्टिकोण विकसित कर पाये थे। मार्क्‍स को केन्स और कोलेस्की की श्रेणी में रखना वर्गीकरण के सरल अध्यापकीय रास्ते की फांद में फंसने का परिणाम है।
प्रभात ने पूंजीवाद को मांगसंकुचन वाली जो व्यवस्था कहा है, वह अतिउत्पादन की महामारी से एकबारगी बर्बरता के युग में पहुंचा दिये गये समाज के बारे में माक्र्स के विश्लेषण से अलग नहीं है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र कहता है कि पूंजीवाद अपने इन संकटों से उबरने के लिये उत्पादक शक्तियों के एक बड़े भाग को जबर्दस्ती नष्ट करता है और नयेनये बाजारों को अपने में समाविष्ट करता है। पूंजीवाद को जीवित रखने की ये चतुर्दिक कोशिशें ही इस बात को भी साबित करती है कि पूंजीवाद कभी किसी बंद, आत्मकेंद्रित प्रणाली के रूप में न कभी अस्तित्व में रहा है और न रह सकेगा

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