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बुधवार, 10 अगस्त 2016

साहित्य में गालियों के प्रतिवाद में

      कबीर से लेकर अष्टछाप के कई दलित लेखकों तक कहीं पर भी कविता में गाली नहीं मिलेगी।लेकिन अफसोस है इन दिनों कविता में गाली को महिमामंडित किया जा रहा है।कविता में सभ्यता रहती है, कविता सभ्यता निर्माण का काम करती है।सवाल यह है कवि अपने लिए कच्चा माल गाली को बनाता है या सभ्यता को।यदि वह गाली को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल करता है तो इस तरह की कविता सभ्यता निर्माण का अंग नहीं होगी,वह कहीं और काम में आएगी।

कबीर ने गालियां लिखी होतीं तो उनकी कविता महान कविता नहीं बन पाती।प्रेमचंद को पढ़ें कहीं पर भी गाली नहीं मिलेगी।लेकिन अफसोस है हिन्दी के अनेक नामी गिरामी लोग गाली को साहित्य का अविभाज्य अंग बनाकर पेश कर रहे हैं।नाथ-सिद्ध निचली जातियों से ही आते थे,उन्होंने बड़े पैमाने पर साहित्य को प्रभावित किया और बदला,लेकिन गालियां लिखकर कविता नहीं रची,उनके यहां गालियां कविता का कच्चा माल नहीं है। सवाल यह है हम लेखकों को क्या सिखा रहे हैं या लेखकों क्या ग्रहण करना चाहिए ?

प्रेमचंद का एक अप्रसिद्ध निबंध है ´गालियाँ´ वह जरूर पढें, लिखा है-
"हर एक जाति का बोल-चाल का ढंग उसकी नैतिक स्थिति का पता देता है।अगर इस दृष्टि से देखा जाये तो हिन्दुस्तान सारी दुनिया की तमाम जातियों में सबसे नीचे नजर आयेगा।बोलचाल की गम्भीरता और सुथरापन जाति की महानता और उसकी नैतिक पवित्रता को व्यक्त करती है और बदज़बानी नैतिक अन्धकार और जाति के पतन का पक्का प्रमाण है।"

-" गुस्से की हालत में ज़बान की यह रवानी औरतों में ज्यादा रंग दिखाती है।दो हिन्दुस्तानी औरतों की तू-तू मैं-मैं देखिए और फिर सोचिए कि जो लोग हमको अर्ध-बर्बर कहते हैं वे किस हद तक ठीक कहते हैं।"

प्रेमचंद ने यह भी लिखा बेगैरत और बेशर्म बना देती है गाली। स्वाभिमान और इज्जत नष्ट करती है। गाली तो बासी कढी का उबाल है। गालियां जातीय पतन की देन हैं।

कविता में दी गई गालियां हों या अ-कविता में दी गयी गालियां हों ,वे प्रेमचंद के मुताबिक पाक रिश्तों को नापाक करती हैं।वल्गरसेंस का वही स्थान है जो समाज में कीचड़ का ।दुख कबीर के पास भी थे , अनंत दुख थे,लेकिन कविता थी उनके पास,कीचड़ नहीं थी।कबीर ने गाली सुनी थीं,योनि आदि के बारे में भी जानते थे लेकिन कभी कविता में उसे घुसने नहीं दिया। यह सामान्य सी बात यदि फेसबुक लेखक समझ नहीं पा रहे हैं तो निश्चय ही बहुत खतरनाक समय में जी रहे हैं।रंडी,बलात्कार,रेप,योनि,पेटीकोट, कुतिया,साला पदबंधों के अलावा संसार में बहुत कुछ है लिखने के लिए। कमाल है कविता अचानक सामुद्रिकशास्त्र की ओर मुड़ गयी। फूहड़ता,पोर्न भाषा,गाली से कविता कब महान हुई है भाई!



गुरुवार, 21 जुलाई 2016

ग्राम्य -बर्बरता और गाली


फेसबुक पर कुछ लोग गजब तर्क दे रहे हैं,कह रहे हैं गालियों को धर्म के साथ न जोड़ें,हम यही कहेंगे धर्म के साथ जाति,रोटी,बेटी,नौकरी,हैसियत सब जुडी है फिर गाली ने ऐसा खास क्या किया है कि धर्म से काटकर गालियों को देखा जाए !
गाली देने वाले किस धर्म को मानते और जानते हैं,इससे स्वभावतःधर्म के साथ गालियां भी जुड़ेंगी।इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब राजनीति में गालियों के बिना संप्रेषण संभव है तो गालियां क्यों दी गयीं ?
फेसबुक पर बिना गालियों के बातें कह सकते हैं तो मोदीभक्त गंदी-गंदी गालियां क्यों लिखते हैं ?निश्चित तौर पर उनके संघ प्रतिपादित हिन्दू धर्म में गालियां परिशिष्ट के रूप में सिखाई जाती हों !
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में सबसे पिछड़े इलाके में भी आम लोग अशिक्षित लोग गालियां देकर बातें नहीं करते।गालियां समाज में से कैसे जाएं इस पर हमने सोचा ही नहीं।
हिन्दी के पब्लिक कम्युनिकेशन में गालियां जिस पर तरह प्रचलन में हैं कम से कम बंगला में यह सब नहीं है।बंगाली कभी आपस में बातें करते हुए गालियां नहीं देते,कलकत्ते में बात करते लोग देखें वे आमतौर पर गालियां नहीं बोलते,फिर हिन्दी में ही गालियां क्यों हैं ?
मैं नहीं जानता सच्चाई क्या है लेकिन लगता है हिन्दीभाषी मोदीभक्त फेसबुक पर गालियां ज्यादा देते हैं,उसी तरह आरएसएस से जुड़े संगठनों के हिन्दीभाषी नेता भी सार्वजनिकतौर पर आए दिन गालियां देते रहते हैं।
जंगली बुद्धि में गालियां रहती हैं,बुद्धि का यह रूप कहीं पर भी हो सकता है,लेकिन वहां पर इसका विकास ज्यादा होता है जहां पर ग्राम्य-बर्बरता बची हुई है।हिन्दीभाषी क्षेत्र में ग्राम्य-बर्बरता के खिलाफ हमने कोई जंग नहीं लड़ी,इसके विपरीत रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का सबसे बड़ा योगदान था कि उन्होंने ग्राम्य-बर्बरता के खिलाफ जंग लड़ी और उसे ध्वस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी,हिन्दीभाषी क्षेत्र में ऐसा कुछ भी न हो सका।बंगाल गालियों से मुक्त हो गया,लेकिन हिन्दीभाषी मुक्त न हो सके।हिन्दीभाषी क्षेत्र में गाली वाला नायक है,बंगला में एकदम नापसंद किया जाता है,उससे लोग नफरत करते हैं।ममता के खिलाफ माकपा के कई नेताओं ने गंदी गालियों का प्रयोग किया था वे नेता और माकपा आज कूड़े के ढ़ेर पर पड़े हैं।


रविवार, 8 मार्च 2015

गालियाँ और कु-संस्कृति

       पुनरुत्थानवाद की खूबी है कि वह पुराने असभ्य सामाजिक रुपों ,भाषिक प्रयोगों ,आदतों या संस्कारों को बनाए रखता है।गालियां उनमें से एक हैं। पुनरुत्थानवाद के असर के कारण हिन्दीभाषी राज्यों में गालियां आज भी असभ्यता के बर्बर रुप के तौर पर बची हुई हैं और आम सम्प्रेषण का अंग हैं। हिन्दी में रैनेसां का शोर मचाने वाले नहीं जानते कि हिन्दी में रैनेसां असफल क्यों हुआ ? रैनेसां सफल रहता तो हिन्दी समाज गालियों का धडल्ले से प्रयोग नहीं करता। बांग्ला ,मराठी ,तमिल,गुजराती में रैनेसां हुआ था और वहां जीवन और साहित्य से गालियां गायब हो गयीं। लेकिन हिन्दी में गालियां फलफूल रही हैं। गालियां असभ्यता की सूचक हैं। जिस साहित्य और समाज में अभिव्यक्ति का औजार गाली हो वह समाज पिछडा माना जाएगा। गालियां इस बात का संकेत हैं कि हमारे समाज में सभ्यता का विकास धीमी गति से हो रहा है। यथार्थ की भाषिक चमक यदि गाली के रास्ते होकर आती है तो यह सांस्कृतिक पतन की सूचना है। 
हिन्दी में अनेक लेखक हैं जो साहित्य में गालियों का प्रयोग करते हैं। अकविता से लेकर काशीनाथ सिंह तक के साहित्य में गालियां सम्मान पा रही हैं। गाली अभिव्यक्ति नहीं है। यथार्थ कभी गालियों के जरिए व्यक्त नहीं होता। अधिकांश बड़े साहित्यकारों ने यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए कभी गालियों का प्रयोग नहीं किया। गालियों का किसी भी तर्क के आधार पर महिमामंडन करना गलत है। हिन्दी में कई लेखक हैं जो अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए गालियों का प्रयोग करना जरूरी समझते हैं। युवाओं में गालियों का सहज प्रयोग मिलता है। इन दिनों इलैक्ट्रोनिक मीडिया में भी गालियों का प्रयोग बढ़ गया है।सवाल उठता है हिन्दी समाज इतना गाली क्यों देता है ? क्या हम गालियों से मुक्त समाज नहीं बना सकते ? वे कौन सी सांस्कृतिक बाधाएं हैं जो हमें गालियों से मुक्त नहीं होने देतीं ? प्रेमचंद ने लिखा है '‘हर जाति का बोलचाल का ढ़ंग उसकी नैतिक स्थिति का पता देता है। अगर इस दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दुस्तान सारी दुनिया की तमाम जातियों में सबसे नीचे नजर आएगा। बोलचाल की गंभीरता और सुथरापन जाति की महानता और उसकी नैतिक पवित्रता को व्यक्त करती है और बदजवानी नैतिक अंधकार और जाति के पतन का पक्का प्रमाण है। जितने गन्दे शब्द हमारी जबान से निकलते हैं शायद ही किसी सभ्य जाति की ज़बान से निकलते हों।'’
आम तौर पर हिन्दी में पढ़े लिखे लोगों से लेकर अनपढ़ लोगों तक गालियों का खूब चलन है। कुछ के लिए आदत है। कुछ के लिए धाक जमाने,रौब गांठने का औजार हैं गालियां। पुलिस वाले तो सरेआम गालियों में ही संप्रेषित करते हैं। गालियों के इस असभ्य संसार को हम तरह-तरह से वैध बनाने की कोशिश भी करते हैं। कायदे से हमें अश्लील भाषा के खिलाफ दृढ़ और अनवरत संघर्ष करना चाहिए। यह काम सौंदर्यबोध के साथ -साथ शैक्षिक दृष्टि से भी जरूरी है। इससे हम भावी पीढ़ी को बचा सकेंगे।गालियों के प्रयोग के खिलाफ हमें खुली निर्मम बहस चलानी चाहिए। बगैर बहस के गालियां पीछा छोड़ने वाली नहीं हैं। बहस से ही दिमागी परतों की धुलाई होती है।गालियां मिथ्या साहस की अभिव्यक्ति हैं। गालियां एक सस्ती,घृणित और नीच अश्लीलता है। गालियां महज यांत्रिक आघात नहीं करतीं। इनसे न तो सेक्सी बिम्ब उभरते हैं और न कामुक अनुभूतियां ही पैदा होती हैं। सेक्सी गालियां हमारी अरूचिकर और अस्वास्थ्यकर संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति हैं। अश्लील गालियां और अश्लील मजाक के जरिए परपीड़न होता है। गंदे किस्से, चुटकुले,चालू अश्लील शब्द मानवीय सौंदर्य की गरिमा को कम करते हैं। मानव इतिहास आदिम शरीरक्रियात्मक मानकों को कूड़े के ढ़ेर पर फेंक चुका है। लेकिन अभी भी हमारे अनेक मित्र गालियों की हिमायत कर रहे हैं। इस प्रसंग में प्रसिद्ध रूसी शिक्षाशास्त्री अन्तोन माकारेंको याद आ रहे हैं उन्होंने लिखा है- '‘पुराने जमाने में शायद गाली-गलौज की गंदी भाषा कमजोर शब्दावली तथा मूक-निरक्षरता के लिए सहायक की तरह अपने ही ढ़ंग से काम आती थी। स्टैंडर्ड गाली की सहायता से आदिम- भावों को अभिव्यक्त किया जा सकता था, जैसे क्रोध,प्रसन्नता, आश्चर्य, निंदा और ईर्ष्या । लेकिन अधिकांशतः यह किसी भी भावना को व्यक्त नहीं करती थी, बल्कि असम्बद्ध ,मुहावरों और विचारों को जोड़ने के साधन का काम देती थी।'’
हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि हिन्दी में गालियां कहां से आ रही हैं? गालियों के मामले में हम लोकल और ग्लोबल एक ही साथ होते जा रहे हैं। जाने-अनजाने असभ्यता का विनिमय कर रहे हैं। कुछ लोग भाषा को उग्र या आक्रामक बनाने के लिए गालियों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि हमारी जनता उग्र और आक्रामक भाषा पसंद नहीं करती। वह इसे असभ्यता मानती है। गालियों से अभिव्यक्ति में पैनापन नहीं आता बल्कि असभ्यता का संचार होता है। तीक्ष्णता और अभद्रता में हमें अंतर करना चाहिए। हमें बहस-मुबाहिसों में असभ्यता से बचना चाहिए। बहस मुबाहिसे में यदि असभ्यता आ जाती है तो फिर गालियां स्वतः ही चली आती हैं। हिन्दी में स्थिति इतनी बदतर है कि एक नामी साहित्यिक पत्रिका के संपादक आए दिन अपने संपादकीय तेवरों को आक्रामक बनाने के लिए असभ्य भाषा का प्रयोग करते थे। वे भाषा में तीक्ष्णता पैदा करने के लिए ऐसा करते थेलेकिन यह मूलतः असभ्यता है। हमें अभिव्यक्ति के लिए तीक्ष्णता का इस्तेमाल करना चाहिए ,असभ्य भाषिक प्रयोगों का नहीं। इन जनाब के संपादकीय अनेक मामलों में अधकचरी विद्वता और अक्षम तर्कपूर्ण शैली से भरे होतेथे।
हमें विचारों की तीक्ष्णता और साहित्यिक अभिव्यंजना की अभद्रता के बीच अंतर करना चाहिए। लेखन में गाली का प्रयोग एक ही साथ गलत और सही दिखता है। एक जमाने में महान रूसी लेखक पुश्किन ने तीक्ष्णता और अभद्रता के अंतर का विवेचन करते हुए लिखा था, ‘ 'गाली कभी-कभी ,निश्चय ही,बिल्कुल अनुचित है। जैसे कि आपको नहीं लिखना चाहिएः ‘‘यह हांफता हुआ बूढ़ा,चश्मा लगाए हुए एक बकरा है,एक कमीना झूठा है,बदकार है,बदजात है।’’- ये व्यक्ति को दी गयी गालियां हैं। किन्तु अगर आप चाहें ,तो लिख और छाप सकते हैं कि ‘‘यह साहित्यिक पुराना उपासक(अपने लेखों में) एक निरर्थक बकवासी है,हमेशा दुर्बल,हमेशा उकताने वाला,कष्टकर और बिल्कुल अहमक़ तक है।’,'’क्योंकि यहां पर कोई व्यक्ति नहीं एक लेखक है।’'
इसी प्रसंग में अन्तोन माकारेंको ने लिखा है, ‘'हमारे देश में गाली-गलौज के शब्दों का ‘‘तकनीकी’’ महत्व खत्म हो गया है, लेकिन भाषा में वे अभी भी मौजूद हैं। अब वे मिथ्या साहस को, ‘‘लौह चरित्र’’ को,निर्णायकत्व,सरलता ,सुरूचि के प्रति तिरस्कार को अभिव्यक्त करते हैं। अब वे एक किस्म के ऐसे नखरे हैं,जिनका मकसद सुनने को खुश करना ,उनको जीवन के प्रति सुनानेवाले के साहसिक रवैय्ये और पूर्वाग्रहहीनता को दर्शाना है।'’
साहित्य में गाली के पक्षधरों का मानना है पात्र यदि गाली देते हैं तो हमारे लिए उससे बचना संभव नहीं है। इस प्रसंग में यही कहना है कि गालियां साहित्य नहीं हैं। गालियां जीवन का यथार्थ भी नहीं हैं। गालियां महिलाओं का अपमान हैं और बच्चों के लिए हानिकारक हैं। गालियों के प्रति हमें लापरवाह नहीं होना चाहिए। गालियों को साहित्य में रखकर हम उन्हें दीर्घजीवी बना रहे हैं। उन्हें मूल्यबोध प्रदान कर रहे हैं। विरासत के रूप में गालियां हमारे समाज और संस्कृति की गंभीर क्षति कर रही हैं। प्रेमचंद ने लिखा है '‘ गाली हमारा जातीय स्वभाव हो गयी है।’','‘गालियों का असर हमारे आचरण पर बहुत खराब पड़ता है। गालियाँ हमारी बुरी भावनाओं को उभारती है और स्वाभिमान व लाज-संकोच की चेतना को दिलों से कम करती हैं जो दूसरी क़ौमों की निगाहों में ऊँचा उठाने के लिए जरूरी है।’'
जब कोई व्यक्ति गालियों का इस्तेमाल करता है तो पढ़ने या सुनने वाला किसी सापेक्ष शब्द को नहीं सुनता बल्कि वह गाली के जरिए उसमें अन्तर्निहित सेक्स के अर्थ तक पहुँचता है। इस दुर्भाग्य का मूल सार यह नहीं है कि सेक्स का राज पाठक या श्रोता के सामने खुल जाता है, बल्कि यह कि वह राज अपने सबसे ज्यादा कुरूप,मानवद्वेषी तथा अनैतिक रूप में उदघाटित होता है। ऐसे शब्दों का बारम्बार होने वाला उच्चारण या लिखित प्रयोग पाठक या श्रोता को सेक्सी मामलों पर अत्यधिक ध्यान देने की,विरूपित दिवास्वप्न देखने की आदत पैदा करता है। इससे लोगों में अस्वास्थ्यकर रूचियों का विकास होता है।
अधिकांश गालियां स्त्रीकेन्द्रित हैं और उनके गुप्तांगों को लेकर हैं या उसके विद्रूपों को लेकर हैं। इससे सामाजिक हिंसा में बढ़ोतरी होती है। साथ ही यह भावना पैदा होती है कि औरत इस्तेमाल की चीज है। अपमानित है। मादा है। आश्चर्यजनक बात है कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रमों से लेकर बड़ी कक्षाओं तक गालियों के खिलाफ कोई पाठ नहीं है। सारे देश के बुद्धिजीवी आराम से आए दिन सिलेबस बनाते हैं और पढ़ाते हैं। लेकिन गालियों के बारे में कभी क्लास नहीं लेते। कभी बोलते नहीं हैं। उलटे यह देखा गया है कि जिस बच्चे को डांटना होता है उस पर गालियों की बौछार कर देते हैं।
गालियों का प्रयोग सत्य को स्थगित कर देता है। हम जब गाली देते हैं या गाली लिखते हैं तो उस समय हमारी नजर गाली पर होती है सत्य पर नहीं,हम गाली में उलझे होते हैं। गालियों के प्रयोग से वर्तमान साफ नजर नहीं आता। गालियों का प्रयोग विचारों और यथार्थ को एक नई भंगिमा में तब्दील कर देता है। एक विलक्षण किस्म के पाठ की सृष्टि करता है। वह अवधारणाओं के अर्थ और यथार्थ के अर्थ को संकुचित करता है। अर्थ संकुचन गालियों की पूर्वशर्त है। यह य़थार्थ को उसके स्रोत से काट देता है । जबकि लेखक यही दावा करता है कि वह वास्तविकता दरशाने के लिए गालियों का प्रयोग कर रहा है। गालियों के साहित्यिक प्रयोग को स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में ही पेश किया जाता है। जबकि सच इसके एकदम विपरीत है।गालियों का प्रयोग अर्थविस्तार नहीं करता उलटे अर्थसंकोच करता है। जब कोई लेखक यथार्थ को गालियों में खींच लाता है तो वह यथार्थ के साथ जुड़े बुनियादी तर्कों से उसे अलग कर देता है। यथार्थ के सत्य और असत्य विकल्पों की संभावनाएं खत्म कर देता है। गालियों का प्रयोग यथार्थ की बहस को वर्तमान काल में ले आता है। अब उसके लिए वर्तमान का जीवंत यथार्थ बेमानी होता है। गालियों का प्रयोग वर्तमान यथार्थ को शरणार्थी बना देता है।
वैसे अधिकांश रचनाओं में एकाधिक अर्थ की संभावनाएं होती हैं लेकिन गाली के प्रयोग वाले अंशों में एक ही अर्थ होता है। एकाधिक अर्थ या भिन्न अर्थ की संभावनाओं को गालियां नष्ट कर देती हैं। गालियों का प्रयोग सामाजिक गैर -बराबरी को बनाए रखता है। सामाजिक हायरार्की को आप इसके प्रयोगों के जरिए अपदस्थ नहीं कर सकते। गालियों में परिवर्द्धन और सम्बर्द्धन संभव नहीं है वे जैसी बनी थीं वैसी ही चली आ रही हैं। यह सिलसिला सैंकड़ों सालों से चला आ रहा है। गालियों के जरिए युगीन विचारों को नहीं पकड़ सकते। हिन्दी में जिसे दिल्लगी कहते हैं वह भी गालियाँ है। प्रेमचंद ने दिल्लगी को गालियों से कुछ कम घृणित माना है। गालियों को उन्होंने ‘जातीय कमीनेपन’ और ‘नामर्दी’ का सबूत कहा है। साथ ही इसे ‘जातीय पतन की देन’ माना है। उनके ही शब्दों में गालियां‘' जातीय पतन दिलों की इज़्ज़त और स्वाभिमान की चेतना को मिटाकर लोगों को बेग़ैरत और बेशर्म बना देती है।’'गालियां अनुभूति की शक्ति मिटा देती हैं।

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

फेसबुक पर गालियों पर ऐसे चली बहस

 जगदीश्वर चतुर्वेदी-आम तौर पर हिन्दी में पढ़े लिखे लोग गालियों का खूब प्रयोग करते हैं। हम उसे तरह-तरह से वैध बनाने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन कायदे से हमें अश्लील भाषा के खिलाफ दृढ़ और अनवरत संघर्ष आरंभ करना चाहिए। यह काम सौंदर्यबोध के साथ शैक्षिक दृष्टि से भी जरूरी है।इससे हम भावी पीढ़ी को बचा सकेंगे। आपकी क्या राय है ।
9 hours ago ·  · 
    • Deepak Bajpai bilkul sahi kaha. pryas to aaj say hi karna chiya.
      9 hours ago · 
    • Jagadishwar Chaturvedi देखिए हमें इन सवालों पर खुली बहस चलानी चाहिए। बगैर बहस के गालियां पीछा नहीं छोड़ने वालीं।
      9 hours ago · 
    • Deepak Bajpai par bahas hi galiyo ki vajah hai. isliya apnay app ko sudarna hoga. har vykti ko ya baat socni chiya.
      9 hours ago · 
    • Jagadishwar Chaturvedi बहस करके करो यह काम। बहस से दिमाग की विभिन्न परतों की धुलाई करने की जरूरत है।
      9 hours ago ·  ·  1 person
    • Deepak Bajpai sahi baat khi apnay.
      9 hours ago · 
    • Jagadishwar Chaturvedi एक बात और वह यह कि गालियां मिथ्या साहस की अभिव्यक्ति हैं।
      9 hours ago ·  ·  3 people
    • Ajay Gathala baat sahi hai...vaise angrezi mein apshabdon ka prayog hindi se jyada hota hai(bolchal mein)
      9 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi गाली एक सस्ती,घृणित और नीच अश्लीलता है।
      9 hours ago ·  ·  1 person
    • Abinash 'Kafir' Mishra आपके इस बात से मैं पूर्णत; सहमत हूँ।
      9 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jai Prakash Pathak नमस्कार!
      गालियाँ हिन्दी वाले भी देते हैं और अंग्रेजी वालेभी . काश हमारे नौजवान भाषा संस्कार कापालन करते और अपने प्रिय मित्रों को प्रिय संबोधन करते. नमस्कार.
      9 hours ago · 
    • Vijay Sharma 
      भाषा बहुत जटिल पद्धति से हमारे पास आती है। इसमें पाठ्यपुस्तक-स्कूल -कॉलेज का योगदान कुछ खास नहीं,उलटे यह भाषा को नुकसान ही पहुंचाती है।किसी शब्द का कोई पर्यायवाची नहीं हो सकता,इसी लिये अंग्रेजी में सिनॉनमस कहते हैं। जो जिस शब्दावली दे परिचि...See More
      8 hours ago ·  ·  2 people
    • Jagadishwar Chaturvedi विजय जी,गालियां देकर और लिखकर आपने ठीक नहीं किया।
      8 hours ago · 
    • Jaikumar Jha गाली एक विरोध के भावना को दर्शाता है जो भ्रष्ट मंत्रियों और कुकर्मी उद्योगपतियों के खिलाप हर घर के दरवाजे पे आज लिखे जाने की जरूरत है.......जैसे रतन टाटा हरामी तथा इस देश व समाज का गद्दार है.....शरद पवार जैसा कुत्ता एक सौ हरामी के मरने के बाद पैदा होता है....ऐ रजा जैसे साले हरामियों को सरे आम फांसी दिया जाना चाहिए.....
      8 hours ago ·  ·  1 person
    • Abinash 'Kafir' Mishra ‎@झा जी: गाली कमजोरों का अप्रभावी अस्त्र है। अगर आप हार चुके हैं तो अपनी संतुष्टि के लिये इसका प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं कर सकता है वर्‌न बढाने के।
      8 hours ago via Facebook Mobile ·  ·  1 person
    • Abinash 'Kafir' Mishra बुद्धिजीवियों के लिये गाली का प्रयोग करना उनके अधूरे ज्ञान को दर्शाता है।
      8 hours ago via Facebook Mobile ·  ·  1 person
    • Vijay Sharma जयकुमार जी मैं ऐसी गालियों के पक्ष में नहीं हूं,जगदीश्वर जी से ज्यादा मुत्तासिर हूं। मैंने तो रसभरी,खिलवाड़ी,कर्णप्रिय,काव्यात्मक कूट भाषा के बारे में लिखा है। जगदीश्वर जी ,आप मुझे टपोरी भाषा का समर्थक न मानें,। यह तो लेखक की कमजोरी दिखाती है। मैं गुलेरी जी ,बिज्जी की भाषा सामर्थ्य का कायल हूं।
      8 hours ago ·  ·  1 person
    • Jaikumar Jha 
      ‎@Abinash 'Kafir' Mishra जी
      मैं भारत का आम नागरिक हूँ और ईमानदारी तथा इंसानियत की भयंकर बीमारी से पीड़ित भी हूँ.......और भारत में मेरे जैसा व्यक्ति कभी मजबूत और कामयाब नहीं रहा ...इस देश में हमेशा गद्दार,चोर,उचक्के और गिरगिट की तरह रंग बदलने...See More
      8 hours ago ·  ·  1 person
    • Parshuram Tiwari मैं जगदीश्वर जी से सहमत हूँ ...!
      8 hours ago · 
    • Jagadishwar Chaturvedi विजय जी की बहसशैली मुझे अपील करती है। वे सुलझे बुद्धिजीवी भी हैं। मैं एक अन्य पहलू की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ गालियां महज यांत्रिक आघात नहीं करतीं। इनसे न तो सेक्सी बिम्ब उभरते हैं और न कामुक अनुभूतियां ही पैदा होती हैं।
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Jagadishwar Chaturvedi सेक्सी गालियां हमारी अरूचिकर और अस्वास्थ्यकर संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति हैं।
      7 hours ago ·  ·  2 people
    • Parshuram Tiwari गलियां असभ्यता की निशानी हैं ...!
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Uttamrao Kshirsagar गालि‍यॉं स्‍वीकार्य नहीं होती...गालि‍यों से भाषा समृद्ध नहीं होती....
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Jagadishwar Chaturvedi गाली हमारी चेतना में बैठी आदिमचेतना की अभिव्यक्ति हैं।ये औरतों के लिए अपमानजनक हैं और बच्चों के लिए हानिकारक।भाषा में गालियों के महत्व का खत्म हो जाना इस बात का संकेत है कि गालियां सभ्यता के दायरे के परे हैं।
      7 hours ago · 
    • Jagadishwar Chaturvedi बंधुवर, अश्लील गालियां, अश्लील मजाक के जरिए परपीड़न होता है।गंदे किस्से,चुटकुले,चालू अश्लील शब्द मानवीयसौंदर्य की गरिमा को कम करते हैं।
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Ashok Kumar Pandey बिल्कुल ठीक बात है। सारी गालियाँ दलित और स्त्रियों के ख़िलाफ़ हैं।
      7 hours ago ·  ·  2 people
    • Vijay Sharma साथियों 'गाली' से मेरा आशय उसने कहा था कि शुरुआत से है,बिज्जी के गद्य से है,या फिर कृशनचंदर के आधे घंटे का खुदा से है। ये रामगोपाल वर्मा-सौरभ शुक्ला वाली बम्बईय्या फिल्मी गाली तो कोई भाषा ही नहीं है। कमसकम गुरुदत्त की शुरुआती या अबरार अल्वी की बात करें। बंगला में इसे कांचा(कच्ची) 'खिश्ती' कहते है। यह तो जबान पे आ जाये तो मुंह फिनाईल से धोना चाहिये-फिर उबला नीम हलक में उतारना चाहिये,फिर बालू की रोट बना कर खाकर सोयें ,दूसरे दिन शायद शरीर स्वच्छ हो..
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Jagadishwar Chaturvedi अशोक जी, मानव इतिहास आदिम शरीरक्रियात्मक मानकों को कूड़े के ढ़ेर पर फेंक चुका है। लेकिन अभी भी हमारे अनेक मित्र गालियों की हिमायत कर रहे हैं।
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Girish Mishra हिंदी एक बहुआयामी भाषा है, जहा पर मामा, काका, नाना, और दादा का फर्क सिर्फ संबोधन से समझ में आ जाता है, गलियों की कोई भाषा नहीं होती, गलिया सभी भाषाओं में उतनी ही सडांध रखती है जितनी शायद हिंदी रखती हो लेकिन साहब खतरा हिंदी से नहीं है खतरा अंग्रेजी के गानों और उनके सिनेमा से है हो यदि आप अनुवाद करे तो शायद बोल भी न पाए. भावी पीढ़ी को यदि बचाना है तो रचनात्मक हिंदी का प्रयोग पहले हम सब घर पर करे और गालियों का प्रयोग बंद करे, बच्चा वो ही सीखता है जो उसे उसका माहोल सिखाता है
      7 hours ago ·  ·  5 people
    • Jagadishwar Chaturvedi विजयजी, मुझे आपकी बात पर प्रसिद्ध रूसी शिक्षाशास्त्री अन्तोन माकारेंको याद आ रहे हैं उनकी शानदार किताब है 'एक पुस्तक माता-पिता के लिए' में लिखा- पुराने जमाने में शायद गाली-गलौज की गंदी भाषा कमजोर शब्दावली तथा मूक-निरक्षरता के लिए सहायक की तरह अपने ही ढ़ंग से काम आतीथीं। स्टैंडर्ड गाली की सहायता से आद्य-भावों को अभिव्यक्त किया जा सकता था, जैसे क्रोध,प्रसन्नता, आश्चर्य,निंदा और ईर्ष्या । लेकिन अधिकांशतः यह किसी भी भावना को व्यक्त नहीं करती थी,बल्कि असम्बद्ध ,मुहावरों और विचारों को जोड़ने के साधन का काम देती थी।
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Jagadishwar Chaturvedi बंधुवर हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि हिन्दी में गालियां कहां से आ रही हैं।गालियों के मामले में हम लोकल और ग्लेबल एक ही साथ होते जा रहे हैं। जाने-अनजाने असभ्यता का विश्व विनिमय कर रहे हैं।
      7 hours ago · 
    • Muneer Ahamed Momin आपने सही कहा जगदीश्वर जी, शब्दों के मामलों में कबीर के इस दोहे को चरितार्थ करने की आवश्यकता है कि -
      शब्द-शब्द सब कोय कहै, शब्द का करो विचार |
      एक शब्द शीतल करै, एक शब्द दे जार ||
      7 hours ago · 
    • Santbetra Ashoka Sehmat hai Sir.

      Santbetra Ashoka
      7 hours ago · 
    • Musafir Baitha galiyon ka ek apna manovigyan hota hai,galiyan sabhya-asabhya hone ki nishani nhin hai.itihas ya vartman ke adhikansh tathakthit sabhya bhi galiyon ki sewa kabhi na kabhi kisi na kisi vidhi le chuke hain/hote hain. is manovigyan ka ek bda hissa dalito-striyo (as above indicated by ashok ji) jaise smaj ke kamjor hisson ke hisse aaye hain.
      6 hours ago · 
    • Arman Neyazi Bahut sahi Janab. Adab wohi hai jismein be adbi nahin.. ek sanghursh chediye main aap ke saath hoon
      6 hours ago · 
    • Musafir Baitha 
      ‎...aur kabir ne hi yh bhi kaha hai (ise aap pta nhin,gali manenge ki kya)-



      pahn pujai to hari mile to main puju pahad,
      ...See More
      6 hours ago · 
    • Vijay Sharma यह भी देखें कि जो पिछड़े और स्त्री गालियों के शिकार है,वे भी खूब गाली देते हैं। कल लक्ष्मण जी कोट कर रहे थे 'जी भर कर गालियां दो,पेट भर कर बद्दुआ...'दुष्यंत। जगदीश्वर जी गाली पूरब आते-आते जैसी होती जाती है,वैसी दिल्ली के पशिचम में नहीं। खासकर बृज की गाली,राजस्थान की गाली,खासकर बीकानेर की गाली। यह भी कहते हैं कि गाली न दें तो क्या सुवाली दें। गोया सुवाली नमकीन होती है,गाली मीठी। ....ललित निबंध
      5 hours ago · 
    • Raakesh Manjul गालियों और अश्लीलता के बीच सीधा सम्बन्ध नहीं है. पर यह भी सही है कि हिन्दी वाले अब वैधानिक तरह से रचनाओ में गलियों का प्रयोग करने लगे है .वह सिनेमा हो या साहित्य अक्सर इन गालियों का प्रयोग मात्र आकर्षित करने के लिए होता है . गालियाँ तो राग दरबारी में भी है ,पर अश्लील नहीं लगती .
      5 hours ago ·  ·  2 people
    • Sagar Jnu bahut zaroori hai sir in gaaliyon k khilaaf aandolan krna...
      5 hours ago · 


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