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बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

बांग्ला बुद्धिजीवियों का असत्य हरमद संकीर्तन


      बांग्ला में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग वाम विरोध के बहाने मिथ्याचार पर उतर आया है। यह सच है माकपा ने अनेक गलतियां की हैं और उन गलतियों का विरोध करना जरूरी है । लेकिन माकपा के खिलाफ विवेकहीन उन्माद पैदा करना बौद्धिक अनाचार है। बांग्ला के जो बुद्धिजीवी ममताभक्ति में माकपा का अंधविरोध कर रहे हैं। उसके तराने गा रहे हैं वे सचेत ढ़ंग से बौद्धिक अपराध कर रहे हैं। यहां हम कुछ ऐसी बातों की ओर ध्यान खींचना चाहते हैं जो ममता बनर्जी के भ्रष्टाचारण और सत्ता के दुरूपयोग की कोटि में आते हैं।
   मसलन ममता बनर्जी और उनके दल का मानना है लालगढ़,सालबनी,गोलटोर, झाडग्राम आदि में माकपा के तथाकथित हरमदवाहिनी के कैंप हैं। यह बात सत्य से मेल नहीं खाती। इसका सबसे बड़ा सबूत है हाल ही में सीआरपीएफ की 50 वीं बटालियन के कमांडेंट द्वारा दिया गया बयान। सीआरपीएफ कमांडेंट शंकरसेन गुप्त ने गृहमंत्री पी.चिदम्बरम् के द्वारा भेजी 'हरमदवाहिनी' (गुण्डावाहिनी) के तथाकथित कैंप की सूची की मौके पर जाकर तहकीकात की और पाया कि जिन जगहों पर 'हरमद' कैंप होने की बात कही गयी है वहां कोई कैंप नहीं हैं। सीआरपीएफ ने सूची में बताए स्थानों की तीन दिनों तक गहरी छानबीन की और पाया कि संबंधित इलाकों में कोई 'हरमद' कैंप नहीं है। यहां तक कि माकपा के लालगढ़ इलाके में अचानक अनेक नेताओं के घरों और माकपा पार्टी दफ्तरों पर भी छापे मारे गए लेकिन कोई अस्त्र-शस्त्र बरामद नहीं हुआ। सीआरपीएफ की छानबीन किसी तरह स्थानीय पुलिस अफसरों से प्रभावित न हो इसके लिए मिदनापुर के एसपी मनोज वर्मा और झाडग्राम के एसपी प्रवीण त्रिपाठी तीन दिन की छुट्टी पर चले गए। इन तीन दिनों में ही संयुक्त सशस्त्रबलों ने गृहमंत्री के द्वारा भेजी 'हरमद' कैंप सूची की चप्पे-चप्पे पर जाकर छानबीन की और पाया कि वहां कोई 'हरमद' कैंप नहीं है। बल्कि कुछ शरणार्थी कैंप जरूर हैं। इस छानबीन के आधार पर केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के कमाण्डेट ने जो बयान दिया है वह एक ही साथ कई काम कर गया है। उल्लेखनीय है सीआरपीएफ को सीधे केन्द्रीय गृहमंत्रालय नियंत्रित करता है और उसके अफसर सीधे उसके प्रति जबाबदेह हैं। सीआरपीएफ कमाण्डेंट शंकरसेन गुप्त के बयान का अर्थ है कि हरमद कैंपों के बारे में गृहमंत्री चिदम्बरम और ममता बनर्जी ने जो बयान दिए हैं वे एकसिरे से गलत और असत्य हैं।
    दूसरा फलितार्थ है बांग्ला मीडिया में अंध माकपा विरोध के नामपर हरमदवाहिनी पर छपी खबरें कपोलकल्पित हैं। यह बांग्ला मीडिया की असत्य रिपोर्टिंग है।  सीआरपीएफ के कमाण्डेंट के बयान से मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और माकपा की साख में सुधार आएगा। तीसरा फलितार्थ यह कि बांग्ला बुद्धिजीवियों के द्वारा जो हरमदभजन चल रहा है वह असत्य है।
   जो बुद्धिजीवी माकपा का विरोध करना चाहते हैं और ममता बनर्जी का साथ देना चाहते हैं उन्हें ऐसा करने का लोकतांत्रिक हक है । लेकिन वे माकपा विरोध के नाम पर असत्य के प्रचारक का काम कर रहे हैं जो पश्चिम बंगाल की जनता और समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के खिलाफ है। बुद्धिजीवी जब असत्य का प्रचार करने लगे,पार्टी के आदेश पर लिखने और बोलने लगे तो वह सत्य को सही रूप में देख ही नहीं पाता। ये बुद्धिजीवी शौक से ममता बनर्जी का साथ दें लेकिन असत्य न बोलें। वे माकपा का विरोध करें लेकिन तृणमूल के भ्रष्टाचारण का हिस्सा न बनें। ये ही वे बुद्धिजीवी हैं जिन्हें माकपा की गलतियां 33 साल तक नजर नहीं आयीं और इनमें से अधिकांश ने वाममोर्चा सरकार की मलाई खाई है लेकिन अचानक इनकी नंदीग्राम-सिंगूर की घटना के बाद तन्द्रा टूटी और कहने लगे कि माकपा में यह गलत है वह गलत है।
     एक विवेकशील और ईमानदार बुद्धिजीवी वह है जो गलती की ओर सही समय पर ध्यान खींचे। वाम बुद्धिजीवी इस दुविधा में चुप रहते हैं कि बोलें या न बोलें। माकपा या वाममोर्चा गलती करे तो उसका खुलकर प्रतिवाद करना चाहिए लेकिन वे ऐसा नहीं करते ,वे मान बैठे हैं कि हम बोलेंगे तो पार्टी निकाल देगी। लेकिन सच यह है कि वे सार्वजनिक तौर पर बोलते तो माकपा और वाममोर्चे की आज यह दुर्दशा न होती। ठीक यही मनोदशा तृणमूल कांग्रेस का अंध समर्थन करने वाले बुद्धिजीवियों की है। वे ममता बनर्जी के अच्छे-बुरे सभी कामों का अंध समर्थन कर रहे हैं। वे ममता बनर्जी की गलत नीतियों पर चुप्पी लगाए हुए हैं और यह आभास दे रहे हैं कि ममता बनर्जी  पक्षपातरहित और ईमानदार है। लेकिन सत्य और यथार्थ इसकी पुष्टि नहीं करता।
   ममताभक्त बांग्ला बुद्धिजीवियों को रेलवे के प्रथमश्रेणी के मुफ्त पास मुहैय्या कराए गए हैं। देश में अन्य भाषाओं के बुद्धिजीवियों को ये पास क्यों नहीं दिए गए ? यह सार्वजनिक संपत्ति के दुरूपयोग और पक्षपातपूर्ण वितरण का प्रमाण है। बांग्ला के ममताभक्त बुद्धिजीवियों में यह नैतिक साहस होना चाहिए कि वे रेलवे के मुफ्त पास वापस कर दें।
   बांग्ला मीडिया में छपी खबरें बताती हैं कि ममता बनर्जी अपने भक्त बुद्धिजीवियों को रेलवे की तथाकथित बोगस कमेटियों में रखकर मासिक मेहनताने के रूप में प्रतिमाह मोटी रकम दे रही हैं।  इन खबरों का ममता बनर्जी और ममताभक्त बांग्ला बुद्धिजीवियों ने कभी खंडन नहीं किया। ममता बनर्जी की मंत्री के नाते इस तरह की हरकतें पक्षपात और भ्रष्टाचरण की कोटि में आती हैं। यह बुद्धिजीवियों को क्रीतदास बनाकर रखने की कोशिश है। इसके अलावा ममता बनर्जी मंत्री बनने के बाद सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही रेल उदघाटन का काम कर रही हैं। बाकी देश में भी रेल पटरियों और स्टेशनों पर समस्याएं हैं सवाल उठता है उन्हें कभी देश के बाकी हिस्सों की याद क्यों नहीं आती ? क्या हिन्दी भाषी प्रान्तों में रेलवे लाइनों के अपग्रेडेशन की जरूरत नहीं है ? क्या रेल मंत्रालय प्रांत मंत्रालय है ? उद्योगमंत्रालय का विकल्प है ? क्या बेकारी दूर करने की रामबाण दवा रेलमंत्रालय के पास है ?

                                  




रविवार, 3 जनवरी 2010

ज्ञानविमुख हिन्दी का चिट्ठाकार - रवि रतलामी



( सुधा सिंह के लेख पर सुंदर पैरोडी भाई रविरतलामी जी ने लिखी है, आनंद लें )


SUNDAY, JANUARY 03, 2010 

आज सुबह सवेरे जबर्दस्त मानसिक हलचल मची और विचार आया -
“और मुझे लग रहा है कि चिठ्ठाचर्चा कुछ समय से जो घर्षण उत्पन्न कर रहा है, उसे देखते हुये उसे तात्कालिक रूप से गाड़ दिया जाना चाहिये। साथ साथ; भांति भांति की चिठ्ठाचर्चायें न हिन्दी की सेवा कर रही हैं न हिन्दी ब्लॉगरी की।”
और, आज का चिट्ठाचर्चा समझिए कि मुर्दाघर में जाने वाला ही था कि जगदीश्वर चतुर्वेदी के पोस्ट पर नजर पड़ी. पोस्ट का शीर्षक है - ज्ञानविमुख हिन्दी का बुद्धिजीवी.
वैसे यह पोस्ट हिन्दी चिट्ठाकारों के लिए भी सटीक बैठता है. इस पोस्ट में जहाँ जहाँ हिन्दी बुद्धिजीवी लिखा है, वहाँ वहाँ हिन्दी चिट्ठाकार रख कर देख लें. एक बढ़िया, धांसू पैरोडी बनेगी. चलिए, आपके लिए यह काम हमीं कर देते हैं. तो, पेश है (जगदीश्वर चतुर्वेदी से क्षमायाचना सहित,) पैरोडी -

ज्ञानविमुख हिन्दी का चिट्ठाकार – (संक्षिप्त, संशोधित अंश)
किसी विद्वान ने लिखा है कि आधुनिक युग में ब्लॉग यश और अमरत्व प्राप्त करने का जरिया हैं। ऐसा उन्होंने ब्लॉग की ताक़त को देखते हुए लिखा था। लेकिन आधुनिक पल्लवग्राही चिट्ठाकार जो ब्लॉग देखे बिना ही ब्लॉग की निंदा आलोचना या प्रशंसा लिख- बोल देते हैं के लिए नियमत लिखना , ज्यादा लिखना , गंभीर लिखना -एक दोष है। गंभीर अकादमिक ब्लॉग लेखन के प्रति इधर बड़े पैमाने पर अरुचि बढ़ी है। सभा, संगोष्ठी, पुरस्कारों , आपसी थूथू-मैंमैं की राजनीति में फंसा हिन्दी का ब्लॉगर बेचारा लिखने के लिए समय कहां से निकाले. ये कोई बंगाल तो है नहीं कि चिट्ठाकार की कोई विशेष ठसक हो।
कई कारणों से हीनताग्रंथि से युक्त चिट्ठाकारों की एक बड़ी संख्या हिन्दी में पनपी है जो हिन्दी का खा-पीकर किसी भी तरह के वर्चस्व के आगे राह के रोड़े बन जाते हैं। यह सिर्फ हिन्दी में हो सकता है कि हिन्दी के चिट्ठाकार होकर भाव-भंगिमा में , विचार में हिन्दी से घृणा करें। जितने उत्साह से अंग्रेजीवालों की केवल हाव-भाव में नकल की जाती है, उनके साथ बैठने-उठने की तत्परता दिखाई जाती है , उतनी तत्परता किसी अन्य भारतीय भाषा के विद्वानों के लिए नहीं दिखाई जाती। यह सामाजिक उत्थान का ही नमूना समझिए।
चिट्ठाकार के लिए साहस बहुत बड़ी चीज है। साहस का केवल यही अर्थ नहीं है कि चीजों को भिन्न रूप में बताया जाए बल्कि साहस का अर्थ है पूरी तरह से समझौताहीन। चिट्ठाकार के लिए एटीट्यूट महत्वपूर्ण है। जो सोचता है उसे लागू करने का साहस हो।
दुर्भाग्य है कि हिन्दी के चिट्ठाकारों में अपने वर्ग की कुण्ठाएँ, चालाकियाँ, दोरंगापन और थोथी नैतिकता का दिखावा बहुत है। बातें चाहे क्रांति की करता हो , व्यक्तित्व दमन और कुण्ठा की साकार प्रतिमूर्ति होकर पहला पत्थर मारने का हक़ नहीं छोड़ता। प्रशंसा करने , उत्साहित करने का भाव तो वह कब का छोड़ चुका है। है तो केवल शाश्वत घृणा का भाव। पर मुक्तिबोध जिसे घृणा की हम्माली कहते हैं उसकी टेक तक न बची है।
और, चिट्ठाकारों में यह आदत होती है कि वे भक्त तैयार करते हैं। सारी लड़ाई ज्ञान के क्षेत्र से बाहर चली जाती है। क्या आपने ऐसे चिट्ठाकार हिन्दी के अलावा भी कहीं देखें हैं।
हिन्दी के चिट्ठाकार की बौद्धिक अपंगता के प्रधान कारण हैं-सत्य से घृणा और ज्ञानविमुखता। इनके कारण ही हिन्दी के इस अनूठे चिट्ठाकार की सामाजिक पोजिशनिंग हिन्दी क्षेत्र के अलावा कहीं नहीं है। दक्षिण भारतीय, बंगाली, उर्दू आदि तथा अन्य विषयों के चिट्ठाकार वैश्विक परिवेश में मिल जाएंगे लेकिन हिन्दी का चिट्ठाकार इस वैश्विक परिवेश में कहीं नहीं मिलेगा। क्योंकि उसके अंदर ज्ञानपिपासा नहीं है। ज्ञान के उत्पादन और पुनरूत्पादन से उसका अलगाव जबर्दस्त है। पिछले कई सालों में यह देखा गया है कि भारत के चिट्ठाकारों का वैश्विक तौर पर विस्तार हुआ है, उसकी अलग से पहचान बनी है। लेकिन कोई ऐसा चिट्ठाकार नहीं जिसकी विश्वस्तर पर इस तरह से नामचीन चिट्ठाकारों से तुलना की जा सके।
यह आश्चर्य की बात नहीं लगती कि बोलनेवाली इतनी बड़ी आबादी, सरकारी इमदाद, हिन्दुस्तान और विश्व में कई जगह पठन-पाठन की व्यवस्था होने के बावजूद यूरोप और अमरीका के देशों में हिन्दी के चिट्ठाकार की कोई पहचान नहीं बनी है।
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ज्ञानविमुख हिन्दी का बुद्धिजीवी


     मार्शल मैकलुहान ने लिखा है कि आधुनिक युग में पुस्तकें यश और अमरत्व प्राप्त करने का जरिया हैं। ऐसा उन्होंने पुस्तक की ताक़त को देखते हुए लिखा था। लेकिन आधुनिक पल्लवग्राही बुद्धिजीवी जो पुस्तक देखे बिना ही पुस्तक की निंदा आलोचना या प्रशंसा लिख- बोल देते हैं के लिए नियमित लिखना , ज्यादा लिखना , गंभीर लिखना -एक दोष है। गंभीर अकादमिक लेखन के प्रति इधर बड़े पैमाने पर अरुचि बढ़ी है। इसी का परिणाम है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में यू जी सी ने प्रोफेसर के लिए कम से कम न्यूनतम दो शोध प्रकाशनों की आवश्यक शर्त लगाई है। लेकिन हिन्दी के बुद्धिजीवी प्रोफेसर शायद इसे अधिकतम मान बैठे हैं। सभा, संगोष्ठी, पुरस्कारों , सरकारी समितियों की राजनीति में फंसा हिन्दी का प्रोफेसर बेचारा लिखने के लिए समय कहां से निकाले , तिस पर निष्ठुर दिल्ली शहर की भागमभाग। ये कोई बंगाल तो है नहीं कि लेखक, शिक्षक की कोई विशेष ठसक हो।
 बुद्धिजीवी के बदले लगभग क्लर्क में तब्दील हुआ शिक्षक इसे अपनी नियति मान लेता है। वह अमर्त्य सेन या एडवर्ड सईद बनने के सपने नहीं देखता। बल्कि दिल्ली में घर, बच्चों की विदेश में पढ़ाई-नौकरी, सट्टा बाजार आदि उसकी चिंता के केन्द्र में होते हैं। ऐसे में एडवर्ड सईद का अभिप्सित बुद्धिजीवी उसका लक्ष्य कैसे बन सकता है। चॉमस्की की तरह निरंतर गंभीर और नए- नए विषयों पर लिखकर जोखिम उठाना उसके वश की नहीं। इन्हीं कई कारणों से हीनताग्रंथि से युक्त बुद्धिजीवियों की एक बड़ी संख्या हिन्दी में पनपी है जो हिन्दी का खा-पीकर किसी भी तरह के वर्चस्व के आगे 'अष्टावक्र' बन जाते हैं। यह सिर्फ हिन्दी में हो सकता है कि हिन्दी के शिक्षक होकर भाव-भंगिमा में , विचार में हिन्दी से घृणा करें। जितने उत्साह से अंग्रेजीवालों की केवल हाव-भाव में नकल की जाती है, उनके साथ बैठने-उठने की तत्परता दिखाई जाती है , उतनी तत्परता किसी अन्य भारतीय भाषा के विद्वानों के लिए नहीं दिखाई जाती। यह सामाजिक उत्थान का ही नमूना समझिए।
 सईद ने कहा था कि एक राजनीतिक और बौद्धिक के बीच अंतर किया जाना चाहिए। राजनीतिज्ञ का प्रधान गुण है समझौते करना जबकि बौद्धिक अपनी अभिव्यक्ति के लिए किसी भी किस्म के समझौते से इंकार करता है। यहीं पर उसके साहस के तत्व को देख सकते हैं। यह राजनीतिज्ञों का गुण है कि बताते रहें कि मैंने क्या किया। बुद्धिजीवी के लिए मुख्य हैं उसके आदर्श। राजनीतिक तौर पर सही का अर्थ है दार्शनिक तौर पर गलत। क्योंकि इसका अर्थ है समझौता। सईद ने कहा समझौता और आज्ञापालन।
  लेकिन बुद्धिजीवी के लिए साहस बहुत बड़ी चीज है। साहस का केवल यही अर्थ नहीं है कि चीजों को भिन्न रूप में बताया जाए बल्कि साहस का अर्थ है पूरी तरह से समझौताहीन। बुद्धिजीवी के लिए एटीट्यूट महत्वपूर्ण है। जो सोचता है उसे लागू करने का साहस हो।
 दुर्भाग्य है कि हिन्दी के मध्यवर्गीय बौद्धिकों में अपने वर्ग की कुण्ठाएँ, चालाकियाँ, दोरंगापन और थोथी नैतिकता का दिखावा बहुत है। बातें चाहे क्रांति की करता हो , व्यक्तित्व दमन और कुण्ठा की साकार प्रतिमूर्ति होकर पहला पत्थर मारने का हक़ नहीं छोड़ता। प्रशंसा करने , उत्साहित करने का भाव तो वह कब का छोड़ चुका है। है तो केवल शाश्वत घृणा का भाव। पर मुक्तिबोध जिसे घृणा की हम्माली कहते हैं उसकी टेक तक न बची है।
 सईद ने कहा था शिक्षकों, लेखकों और बुद्धिजीवियों में यह आदत होती है कि वे भक्त तैयार करते हैं। लेकिन एक शिक्षक के नाते मेरा यही कर्तव्य है कि मैं अपने छात्र को अपना श्रेष्ठतम दूँ और खास अर्थ में इस लायक तैयार करूँ कि वह मेरी आलोचना कर सके। मैं उसे अपने से स्वतंत्र रखता हूँ जैसा चाहे मार्ग चुनें। लेकिन हिन्दी में सही अर्थों में संसार के हर आपद-विपद के लिए तैयार करनेवाले गुरू तो नहीं रहे पर शिष्य बनाने की परंपरा बड़ी मजबूत है। विद्यार्थी की जगह शिष्य और भक्त बनना सीखाते हैं। ज्ञानपिपासु और स्वाभिमान में अनमनीय होने के बजाए विद्यार्थी बौद्धिक कलाबाजियाँ सीखकर गुरू को गुड़ साबित करने लगता है। सारी लड़ाई ज्ञान के क्षेत्र से बाहर चली जाती है। क्या आपने ऐसे बौद्धिक हिन्दी के अलावा भी कहीं देखें हैं।
 हिन्दी के बुद्धिजीवी की बौद्धिक अपंगता के प्रधान कारण हैं-सत्य से घृणा और ज्ञानविमुखता। इनके कारण ही हिन्दी के इस अनूठे बुद्धिजीवी की सामाजिक पोजिशनिंग हिन्दी क्षेत्र के अलावा कहीं नहीं है। दक्षिण भारतीय, बंगाली, उर्दू आदि तथा अन्य  विषयों के बुद्धिजीवी वैश्विक परिवेश में मिल जाएंगे लेकिन हिन्दी का बुद्धिजीवी इस वैश्विक परिवेश में कहीं नहीं मिलेगा। क्योंकि उसके अंदर ज्ञानपिपासा नहीं है। ज्ञान के उत्पादन और पुनरूत्पादन से उसका अलगाव जबर्दस्त है। पिछले दो सौ सालों में यह देखा गया है कि भारत के मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों का वैश्विक तौर पर विस्तार हुआ है, उसकी अलग से पहचान बनी है। लेकिन हिन्दी में प्रेमचंद की तुलना गोर्की और तॉलस्तॉय आदि से की जाती है, इसके अलावा दूसरा कोई रचनाकार नहीं जिसकी विश्वस्तर पर इस तरह से नामचीन लेखकों से तुलना की जा सके। कहने को हर साल हिन्दुस्तान से विदेशी विश्वविद्यालयों में लेखक-बुद्धिजीवी जाते हैं।
 यह आश्चर्य की बात नहीं लगती कि बोलनेवाली इतनी बड़ी आबादी, सरकारी इमदाद, हिन्दुस्तान और विश्व में कई जगह पठन-पाठन की व्यवस्था होने के बावजूद यूरोप और अमरीका के देशों में संस्कृत के विद्वानों जैसे भरत, भारवि आदि को तो लोग जानते हैं पर हिन्दी के बुद्धिजीवी की कोई पहचान नहीं बनी है। 
( फोटो और आलेख -सुधा सिंह )

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

भाजपा में जि‍न्‍ना - जसवंत का गि‍रगि‍ट भाव

भाजपा अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह ने अंतत: जसवंत सिंह को पार्टी से नि‍काल दि‍या, कहा गया उन्‍हें जि‍न्‍ना संबंधी वि‍चारों कारण नि‍काला गया है। सतह पर यही सत्‍य है। किंतु राजनीति‍क सत्‍य यह नहीं है । राजनीति‍क सत्‍य यह है कि‍ जसवंतसिंह के बारे में भाजपा नेतृत्‍व ने काफी पहले ही तय कर लि‍या था कि‍ उनकी वि‍दाई करनी है। इसके पहले कदम के तौर पर उन्‍हें हाल ही में सम्‍पन्‍न हुए लोकसभा चुनाव में राजस्‍थान से टि‍कट न देकर दार्जिलिंग भेजा गया,जहां भाजपा का कोई पोस्‍टर लगाने वाला तक नहीं है। लोकसभा के चुनाव के बाद उन्‍हें संसदीय दल में कोई भी जि‍म्‍मेदार पद नहीं दि‍या गया और यह भी जगजाहि‍र है कि‍ राजस्‍थान के पार्टी नेतृत्‍व के साथ उनकी पटरी नहीं बैठ पा रही थी,वह पहले भी कई बार अपने सार्वजनि‍क व्‍यवहार से भाजपा को मुश्‍कि‍ल में डाल चुके थे,वसुंधरा राजे के साथ उनका पंगा,जगजाहि‍र है।राजस्‍थान की हार के कारण के रूप में वसुंधरा राजे को जि‍म्‍मेदार ठहराकर भाजपा का केन्‍द्रीय नेतृत्‍व चैन की सांस लेना चाहता था, किंतु वसुंधरा राजे के दबाव के कारण भाजपा केन्‍द्रीय नेतृत्‍व को जसवंत सिंह को भी पार्टी की हार के लि‍ए जि‍म्‍मेदार मानना पड़ा और उन्‍हें जि‍न्‍ना के बहाने वि‍दा कर दि‍या गया।
जसवंत सिंह यह अच्‍छी तरह जानते हैं कि‍ अटलजी के बैठ जाने के बाद से उनकी पार्टी में कोई साख नहीं बची थी और वे भी कि‍नाराकशी की सोच रहे थे,कि‍ताब तो बहाना भर है। जसवंत सिंह ने इसे अभि‍व्‍यक्‍ति‍ की स्‍वतंत्रता पर हमला कहा है जो एकसि‍रे से गलत है। जनाब कल तक जि‍स पार्टी में थे वह आए दि‍न धर्मनि‍रपेक्ष लेखकों,पेंटरों,वि‍चारकों इति‍हासकारों पर तरह तरह के हमले करती रही और वे चुपचाप देखते रहे अंत में पुस्‍तक लोकार्पण के मौके पर उन्‍हें कोई भी भाजपा मार्का वि‍द्वान नहीं मि‍ला तो धर्मनि‍रपेक्ष वि‍द्वानों को एकत्रि‍त करके लोकार्पण कराया,इसी को कहते गि‍रगि‍ट भाव। कौन जाने जसवंत सिंह जल्‍दी ही भाजपा में माफी मांगते हुए कब वापस चले जाएं और कहें कि‍ मैंने जो लि‍खा था उसे अब नहीं मानता। आखि‍रकार जब गि‍रगि‍ट की तरह ही रहना है तो रंग बदलते कि‍तनी देर लगती है।

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...