मैत्रेयी पुष्पा बड़ी लेखिका हैं। उनका लिखा वजनदार होता है। लेकिन जिस तरह से उन्होंने 'देशकाल' पर एक लेख में प्रतिक्रिया दी है। वह स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने जो बातें कही हैं, वह औरत ,स्त्री विमर्श ,स्त्रीभाषा और स्त्रीवाद के संदर्भ में पुंसवादी हैं। संयम, बंदिश, उपदेश, भविष्य,इतिहास,मूल्य,मान-मर्यादा,परंपरा,रीति-रिवाज , सुकून, स्थास्थ्य, अकलमंदी, बुद्धिमानी इत्यादि पदबंध औरत के सामने आकर दम तोड़ देते हैं। औरत की दुनिया अनुभूति की दुनिया है। उसके यहाँ सारे फैसले अनुभूति के आधार पर ही लिए जाते हैं। अनुभूति की कसौटी पर ही वह सारी दुनिया को कसकर देखती है।
ज्ञान,विवेक,मूल्य,मान-मर्यादा आदि पदबंधों से औरत को कोई लेना देना नहीं है। ये पुंसवादी विमर्श और स्त्री को पुंसवादी घेरे में बांधने वाले पदबंध हैं। जिस विज्ञापन की भाषा का मैत्रेयी जी ने अपने लेख में जिक्र किया है वह विज्ञापन है और विज्ञापन की भाषा उसकी शब्दरचना में नहीं होती। उसके अन्तर्निहित संदेश में होती है। यहां संदेश या सूचना गोली की है, आनंद की नहीं। मैत्रेयी जी की उपदेश और शापग्रस्त भाषा समूचे लेख में छायी हुई है। यह भाषा स्त्री को अब तक दण्डित करती रही है। मैत्रेयी जी का मानना है ''नई तकनीक ने बहुत सारी सुविधाएं दीं-मोबाइल फोन, रसोई के साधन, सफाई के लिए डिटर्जेंट। सचमुच यह औरत की दुनिया में क्रांति है।'' यानी औरत को कैसी होना चाहिए और क्या करना चाहिए ,औरत की तथाकथित क्रांतिकारी दुनिया क्या है ? उपरोक्त पंक्तियां बहुत साफ हैं,किसी व्याख्या की जरूरत नहीं है। एक बडी लेखिका के मुँह से इस कदर मर्द भाषा तकलीफ देती है। यह स्त्री के असम्मान की भाषा है। यह ऐसी भाषा है जिसका स्त्री के यथार्थ से कोई लेना देना नहीं है। वे जिस गोली और उसकी भाषा को लेकर परेशान हैं,काश वह गोली प्रत्येक औरत के पास होती।
औरतें अनचाहे गर्भ के कारण आज भी सबसे ज्यादा तकलीफ उठाती हैं। यहां तक कि प्रतिवर्ष हजारों औरतें मर जाती हैं। लाखों औरतों को गर्भपात के चक्कर में अनेक नीम हकीमों के हाथों स्थायी बीमारियों को अपने शरीर में लेकर घर लौटना होता है। औरत प्यार करे, कैसे करे, प्यार करे या नहीं करे,बच्चा धारण करे या न करे,बॉयफ्रेंड रखे या न रखे, हम कौन हैं जो उसे सलाह दे रहे हैं। हमारा सलाह देना ही स्त्री के जीवन में हस्तक्षेप है। हम उसकी स्वायत्तता और स्वतंत्रता को शक की निगाह से क्यों देखते हैं। औरत को स्वतंत्रता खैरात में नहीं मिली है,यह किसी की दया का परिणाम भी नहीं है। दिन-प्रतिदिन की कुर्बानियों के बाद औरत को स्वतंत्रता की थोडी सी संभावनाएं दिख रही हैं उन्हें भी हम सहन नहीं कर पा रहे हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा है ' हाईटेक शताब्दी की युवतियों की ट्रेजैडी यही है'। औरतों के बारे में खासकर हाईटेक औरतों के बारे में यह स्टीरियोटाईप समझ मैत्रेयीजी को कहां से मिली ? क्या उनकी जैसी बड़ी लेखिका जिसकी औरत के मन पर विद्वत्ता की हद तक पकड़ है। उल्लिखित निष्कर्ष सही है।यह एकदम तथ्यहीन है। पहली बात यह कि हाईटेक औरत स्वच्छंद,उच्छृंखल और गर्भपात की शिकार नहीं है। यह निष्कर्ष हाइटेक औरत के तथ्य और सत्य से मेल नहीं खाता। हाइटेक औरतें कैसी होती हैं और क्या करती हैं,कैसे शाम गुजारती हैं,कैसा और कितना परिश्रम करती हैं,वे कितना अपने लिए समय निकाल पाती हैं,यह सब कुछ देखने के लिए थोड़ा सा समय निकालकर बंगलौर या हैदराबाद अथवा अमेरिका के किसी हाईटेक हब में चले जाएं तो शायद ऐसा नहीं सोचेंगे।
असल में मैत्रेयी जी का औरत पर विश्वास ही नहीं है। विश्वास के अभाव के कारण ही वे हाईटेक औरत को संदेह की नजर से देखती हैं। मैत्रेयी जी प्रच्छन्नत: यही कह रही हैं कि हाईटेक औरतों के पास सेक्स करने के अलावा और कोई काम नहीं है। सेक्स करने के लिए हाईटेक होने जरूरत नहीं है। सेक्स तो बगैर हाईटेक हुए ही सदियों से चला आ रहा है। इससे भी बड़ी समस्या है कि वे नैतिकता के पैमाने पर रखकर औरत की गतिविधियों को देख रही हैं। नैतिकता औरत की सबसे मजबूत बेड़ी है। इसे जितना जल्दी औरतें तोड़ दें उतना ही अच्छा है। गर्भनिरोधक गोलियां परिवार नियोजन के अनेक उपायों में से एक उपाय है। इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। परिवार नियोजन के उपायों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल परंपरागत औरतें करती हैं। गर्भनिरोधक गोलियां हों अथवा गर्भ गिराने वाली गोलियां हों इन सबने औरत को कष्ट दिए हैं। लेकिन औरत के जीवन की सबसे बड़ी विपत्ति से मुक्ति दिलाने में मदद की है। औरत को 'संयम','स्वतंत्रता', 'गुलामी' आदि कुछ भी नहीं चाहिए उसे सिर्फ अपने मन की करने दो, औरत पर विश्वास करो।वह गलती करेगी तो दुरूस्त भी कर लेगी। लेकिन संदेह और अविश्वास की नजर से औरत को नहीं देखा जाना चाहिए। औरत खरगोश नहीं है। उसके पास अपना विवेक है हमें उस पर विश्वास करना चाहिए। औरत को हमारा समाज अविश्वास और संदेह के कारण खोता रहा है। अविश्वास के आधार पर औरत से संवाद संभव नहीं है। अविश्वास और संदेह करने वालों को औरत अपने मन के पास फटकने नहीं देती। गर्भनिरोधक गोलियॉं या परिवार नियोजन के उपाय औरत पर मनुष्य की आस्था को पुख्ता बनाते हैं। हमें औरतों को 'पुरूषों को चलाने' की चालाकियों के बुढ़िया पुराण के नजरिए से भी नहीं देखना चाहिए।
औरत है ,उसका स्वतंत्र अस्तित्व है। स्वायत्त संसार है। उसे उपदेश की नहीं हमारे विश्वास की जरूरत है,वह कुछ भी करे हमें उस पर विश्वास करना चाहिए। वह हमारी है। हम अविश्वास और संदेह व्यक्त करके उसे परायी न बनाएं। औरत के प्रति पराएभाव ने उसे समाज का हिस्सा ही नहीं बनने दिया।औरत के प्रति संशय की नहीं विश्वास की जरूरत है।वह भोली,मासूम,नादान,चालाक कुछ भी नहीं है वह तो औरत है उसके पास मन है, दिल है और दुनिया को बदलने की आकांक्षा है हमें सिर्फ अपना विश्वास उसे देना है उपदेश नहीं।हम सिर्फ यही कहें स्त्री कुछ भी करे हम उसके साथ हैं। औरत को आज के दौर में हमारा विश्वास चाहिए। उस पर अविश्वास करने वाली बातें उसे आहत करती हैं। हमें इससे बचना चाहिए।
जगदीश्वर चतुर्वेदी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर। पता- jcramram@gmail.com
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शुक्रवार, 18 सितंबर 2009
बुधवार, 16 सितंबर 2009
लेखक अब डर गए हैं: चन्द्रबली सिंह
हाल ही में कोटा से प्रकाशित पत्रिका 'अभिव्यक्ति' का नया अंक देखने को मिला। इस अंक में हिंदी के सबसे बडे लेखक और आलोचक चन्द्रबली सिंह का एक शानदार साक्षात्कार छपा है। चन्द्रबली सिंह का व्यक्तित्व और कृतित्व हिंदी लेखकों से छिपा नहीं है। वे हिंदी के शिखरपुरूष स्व.रामविलास शर्मा से लेकर जीवित शिखर पुरूष नामवर सिंह के ज्ञानगुरू हैं। हिंदी की वैज्ञानिक आलोचना के निर्माण में उनका बहुमूल्य योगदान रहा है। उनकी मेधा के सामने रामविलास शर्मा से लेकर नामवर सिंह तक सभी नतमस्तक होते रहे हैं। चन्द्रबली जी हिंदी के ज्ञानगुरू हैं। हिंदी के लेखक जब भी गंभीर संकट में फंसे हैं उनके पास गए हैं और उनके द्वारा दिशा निर्देश पाते रहे हैं। चन्द्रबली सिंह प्रगतिशील लेखक संघ से लेकर जनवादी लेखक संघ तक सभी में शिखर नेतृत्व का हिस्सा रहे हैं। पिछले पैंसठ साल से भी ज्यादा समय से प्रगतिशील आलोचना को दिशा देते रहे हैं। इन दिनों चन्द्रबली सिंह अस्वस्थ हैं और बनारस में अपने घर पर ही बिस्तर पर पडे आराम कर रहे हैं। 'अभिव्यक्ति' के संपादक 'शिवराम' ने उनका साक्षात्कार प्रकाशित करके हिंदी की बडी सेवा की है। स्वयं शिवराम भी राजस्थान में सबसे ज्यादा सक्रिय परिवर्तनकामी लोकतांत्रिक नजरिए के लेखक हैं।
अपने साक्षात्कार में चन्द्रबली सिंह ने जो कहा है वह हिंदी के लेखक संगठनों की उदासीनता और बेगानेपन के खिलाफ तल्ख टिप्पणी है। चन्द्रबली जी ने लेखक संगठनों के बारे में कहा है '' लेखक संगठन जो काम कर रहे हैं,बहुत संतोषजनक तो नहीं है,उनका अस्तित्व औपचारिक हो गया है। '' हिंदी लेखक संगठनों के बारे में यह टिप्पणी ऐसे समय में आयी है जब हिंदी के लेखक सबसे ज्यादा असहाय महसूस कर रहे हैं। लेखक संगठनों की निष्क्रियता, विचारधारात्मक उदासीनता और स्थानीय गुटबंदियां चरमोत्कर्ष पर हैं। अब लेखक संगठन प्रतीकात्मक रूप में काम कर रहे हैं। लेखक संगठन प्रतीक क्यों बनकर रह गए हैं ? औपचारिक संगठन बनकर क्यों रह गए हैं ,उनके अंदर कोई वैचारिक और सर्जनात्मक सरगर्मी नजर क्यों नहीं आती ? हिन्दी में तीन बडे लेखक संगठन हैं,प्रगतिशील लेखक संगठन,जनवादी लेखक संगठन,जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा। इनके अलावा और अनेक स्थानीय स्तर के लेखक संगठन हैं। लेकिन तीन बडे संगठनों में किसी भी किस्म का समन्वय नहीं है। इन संगठनों की कार्यप्रणली में इनके साथ जुडे राजनीतिक दलों की राजनीतिक संकीर्णताएं घुस आयी हैं। इस प्रसंग में चन्द्रबली सिंह ने कहा '' कुछ को ऑर्डिनेशन राजनीतिक तौर पर हुआ है,पर उनकी राजनीति से जुड़े जो सांस्कृतिक संगठन हैं उनमें कोई समन्वय नहीं हुआ है। जहॉं तक कि साहित्यिक मतभेदों का सवाल है वह तो हर बौद्धिक संगठन में होना चाहिए।... लेखकों का संगठन राजनैतिक संगठन की तर्ज पर नहीं चल सकता।'' आगे बड़ी ही प्रासंगिक दिक्कत की ओर ध्यान खींचते हुए चन्द्रबली जी ने कहा '' राजनैतिक पार्टी में तो डेमोक्रेटिक सेन्ट्रलिज्म के नाम पर जो तय हो गया,वह हो गया। पर लेखक संगठनों में तो यह नहीं हो सकता कि फतवा दे दें कि जो ऊपर तय हो गया तो हो गया। दिक्कत तो है। सम्प्रति कोई ऐसी संस्था नहीं है कि समन्वय की ओर बढ़ सके। हम तो यह महसूस करते हैं कि इन संगठनों में जो नेतृत्व है वह नेतृत्व भी जो विचार-विमर्श करना चाहिए,वह नहीं करता है।पार्टी को इतनी फुर्सत नहीं है कि इन समस्याओं की ओर ध्यान दें।
चन्द्रबली सिंह ने एक रहस्योद्घाटन किया है कि लेखक संगठनों की समन्वय समिति बने यह प्रस्ताव नामवर सिंह ने दिया था ,चन्द्रबली जी भी उससे संभवत: सहमत थे। लेकिन पता नहीं क्यों यह प्रस्ताव अमल में अभी तक नहीं आ पाया है। चन्द्रबलीजी ने कहा है, '' मैंने समन्वय समिति का,नामवर ने जो प्रस्ताव रखा था कि यदि एक न हों तो समन्वय समिति हो जाए।पार्टियॉं जो हैं उनमें तो समन्वय समिति बनी ही है। पर लेखक संगठन व्यवहार में यह स्वीकार नहीं करते हैं कि वे पार्टियों से जुडे हैं। समन्वय की प्रक्रिया शुरू करने के लिए जब तक दबाव नहीं बनाया जाएगा तब तक यह सम्भव नहीं है। बिना दबाव के यह हो नहीं पाएगा।'' पुराने जमाने और आज के जमाने के लेखक संगठनों की बहसों की तुलना करते हुए चन्द्रबली जी ने कहा '' ऐसा लगता नहीं है कि जैसी पहले मोर्चाबंदी हुई थी एक जमाने में,वैसी अब होती हो। वैसी अब दिखाई नहीं देती।वैसा वैचारिक संघर्ष दिखाई नहीं देता। गड्ड-मड्ड की स्थिति है। खास तौर से जो पत्र- पत्रिकाएँ निकलती हैं उनमें उस तरह की स्पष्टता और मोर्चाबंदी नजर नहीं आती। कभी -कभी ऐसा लगता है कि लेखक मंच पर भी व्यक्तियों के साथ आता है। उसके सारे गुण और दोष इन संगठनों में वह ग्रहण करता है। लीडरशिप के नाम पर लेखकों में एक सैक्टेरियन दृष्टिकोण पनपता है।पतनशील प्रवृत्तियों से कोई संघर्ष नहीं है। ये प्रवृत्तियॉं मौजूद रहती हैं।'' चन्द्रबली सिंह ने एक बडी ही मार्के की बात कही है। '' मैं तो यहाँ जलेस से कहता हूँ ,जिसमें ज्यादातर कवि ही हैं। वे कविता सुना जाते हैं। उनसे कहता हूँ कि अपनी कविताऍं,जनता के बीच में जाओ,उन्हें सुनाओ।फिर देखो क्या प्रतिक्रिया होती है। जनता समझती है या नहीं।पाब्लो नेरूदा जैसा कवि जनता के बीच जाकर कविता सुनाता था। जनता को उसकी कविताऍं याद हैं। जनता को जितना मूर्ख हम समझते हैं वह उतनी मूर्ख नहीं है। यदि वह तुलसी और कबीर को समझ सकती है तो तुम्हें भी तो समझ सकती है।बशर्ते उसकी भाषा में भावों को व्यक्त किया जाए।'' समीक्षा के वर्तमान मठाधीश प्रगतिशील लेखकों की उपेक्षा करते हैं। इस पर चन्द्रबली जी ने कहा '' कहते तो हैं अपने को प्रगतिशील और जनवादी पर कहीं न कहीं कलावादियों का प्रभाव उन पर है। आज के शीर्षस्थ जो आलोचक हैं,नामवरसिंह ,उनके जो प्रतिमान हैं,वे सारे प्रतिमान लेते हैं,विजयनारायण देव साही से।'' चन्द्रबली जी ने बडी ही मार्के की एक अन्य बात कही है '' लेखक अब डर गए हैं।'' लेखकों में यह डर कहां से आया ? प्रगतिशील लेखकों का वैचारिक जुझारूपन कहॉं गायब हो गया,आज वे अपने सपनों और विचारों के लिए तल्खी के साथ लिखते क्यों नहीं हैं ? लेखक अपने विचारों के प्रति जब तक जुझारू नहीं होगा तब तक स्थिति बदलने वाली नहीं है। लेखकों को अपना डर त्यागना होगा,अपने लेखन और व्यक्तित्व को निहितस्वार्थों के दायरे के बाहर लाकर वैचारिक संघर्ष करना होगा। बुद्धिजीवियों को दलीय विचारधारा के फ्रेम के बाहर निकलकर मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में अपने विचारधारात्मक सवालों को नए सिरे से खोलना होबा। हिंदी के बुद्धिजीवियों में एक तरु डर है तो दूसरी औ व्यवहारवाद भी गहरी जडें जमाए बैठा है। हम अपने लेखन से किसी को नाराज नहीं करना चाहते। लेखक के नाते हमें यह याद रखना होगा, कि लेखक का काम दिल बहलाना नपहीं है। लेखन की दिल बहलाने वाली भूमिका में अगर हमारा लेखन चला जाता है तो जसने-अनजाने दरबारी सभ्यता और संस्कृति का गुलाम बनकर रह जाएगा। दिल बहलाने वाले साहित्य में जीवन की गंध,दुख,दर्द और प्रतिवाद के स्वर व्यक्त नहीं होते। दिल बहलाने का काम लेखक का नहीं है। दिल बहलाने के लिए खिलौने बाजार में मिलते हैं। हम बाजार जाएं अपने लिए दिल बहलाने का सामान खरीद लाएं और घर बैठे आनंद लें। लेखक का काम आम लोगों को बेचैन करना और स्वयं भी बेचैन रहना,अपना डर निकालना साथ समाज का भी डर निकालना। लेखक किसी एक का नहीं होता वह सबका होता है कठोरता,निर्भीकता और ममता से भरा होता है।
( 16 सितम्बर 2009 को 'मोहल्ला लाइव डॉट कॉम ' और 'भड़ास ब्लाग'पर भी प्रकाशित )
अपने साक्षात्कार में चन्द्रबली सिंह ने जो कहा है वह हिंदी के लेखक संगठनों की उदासीनता और बेगानेपन के खिलाफ तल्ख टिप्पणी है। चन्द्रबली जी ने लेखक संगठनों के बारे में कहा है '' लेखक संगठन जो काम कर रहे हैं,बहुत संतोषजनक तो नहीं है,उनका अस्तित्व औपचारिक हो गया है। '' हिंदी लेखक संगठनों के बारे में यह टिप्पणी ऐसे समय में आयी है जब हिंदी के लेखक सबसे ज्यादा असहाय महसूस कर रहे हैं। लेखक संगठनों की निष्क्रियता, विचारधारात्मक उदासीनता और स्थानीय गुटबंदियां चरमोत्कर्ष पर हैं। अब लेखक संगठन प्रतीकात्मक रूप में काम कर रहे हैं। लेखक संगठन प्रतीक क्यों बनकर रह गए हैं ? औपचारिक संगठन बनकर क्यों रह गए हैं ,उनके अंदर कोई वैचारिक और सर्जनात्मक सरगर्मी नजर क्यों नहीं आती ? हिन्दी में तीन बडे लेखक संगठन हैं,प्रगतिशील लेखक संगठन,जनवादी लेखक संगठन,जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा। इनके अलावा और अनेक स्थानीय स्तर के लेखक संगठन हैं। लेकिन तीन बडे संगठनों में किसी भी किस्म का समन्वय नहीं है। इन संगठनों की कार्यप्रणली में इनके साथ जुडे राजनीतिक दलों की राजनीतिक संकीर्णताएं घुस आयी हैं। इस प्रसंग में चन्द्रबली सिंह ने कहा '' कुछ को ऑर्डिनेशन राजनीतिक तौर पर हुआ है,पर उनकी राजनीति से जुड़े जो सांस्कृतिक संगठन हैं उनमें कोई समन्वय नहीं हुआ है। जहॉं तक कि साहित्यिक मतभेदों का सवाल है वह तो हर बौद्धिक संगठन में होना चाहिए।... लेखकों का संगठन राजनैतिक संगठन की तर्ज पर नहीं चल सकता।'' आगे बड़ी ही प्रासंगिक दिक्कत की ओर ध्यान खींचते हुए चन्द्रबली जी ने कहा '' राजनैतिक पार्टी में तो डेमोक्रेटिक सेन्ट्रलिज्म के नाम पर जो तय हो गया,वह हो गया। पर लेखक संगठनों में तो यह नहीं हो सकता कि फतवा दे दें कि जो ऊपर तय हो गया तो हो गया। दिक्कत तो है। सम्प्रति कोई ऐसी संस्था नहीं है कि समन्वय की ओर बढ़ सके। हम तो यह महसूस करते हैं कि इन संगठनों में जो नेतृत्व है वह नेतृत्व भी जो विचार-विमर्श करना चाहिए,वह नहीं करता है।पार्टी को इतनी फुर्सत नहीं है कि इन समस्याओं की ओर ध्यान दें।
चन्द्रबली सिंह ने एक रहस्योद्घाटन किया है कि लेखक संगठनों की समन्वय समिति बने यह प्रस्ताव नामवर सिंह ने दिया था ,चन्द्रबली जी भी उससे संभवत: सहमत थे। लेकिन पता नहीं क्यों यह प्रस्ताव अमल में अभी तक नहीं आ पाया है। चन्द्रबलीजी ने कहा है, '' मैंने समन्वय समिति का,नामवर ने जो प्रस्ताव रखा था कि यदि एक न हों तो समन्वय समिति हो जाए।पार्टियॉं जो हैं उनमें तो समन्वय समिति बनी ही है। पर लेखक संगठन व्यवहार में यह स्वीकार नहीं करते हैं कि वे पार्टियों से जुडे हैं। समन्वय की प्रक्रिया शुरू करने के लिए जब तक दबाव नहीं बनाया जाएगा तब तक यह सम्भव नहीं है। बिना दबाव के यह हो नहीं पाएगा।'' पुराने जमाने और आज के जमाने के लेखक संगठनों की बहसों की तुलना करते हुए चन्द्रबली जी ने कहा '' ऐसा लगता नहीं है कि जैसी पहले मोर्चाबंदी हुई थी एक जमाने में,वैसी अब होती हो। वैसी अब दिखाई नहीं देती।वैसा वैचारिक संघर्ष दिखाई नहीं देता। गड्ड-मड्ड की स्थिति है। खास तौर से जो पत्र- पत्रिकाएँ निकलती हैं उनमें उस तरह की स्पष्टता और मोर्चाबंदी नजर नहीं आती। कभी -कभी ऐसा लगता है कि लेखक मंच पर भी व्यक्तियों के साथ आता है। उसके सारे गुण और दोष इन संगठनों में वह ग्रहण करता है। लीडरशिप के नाम पर लेखकों में एक सैक्टेरियन दृष्टिकोण पनपता है।पतनशील प्रवृत्तियों से कोई संघर्ष नहीं है। ये प्रवृत्तियॉं मौजूद रहती हैं।'' चन्द्रबली सिंह ने एक बडी ही मार्के की बात कही है। '' मैं तो यहाँ जलेस से कहता हूँ ,जिसमें ज्यादातर कवि ही हैं। वे कविता सुना जाते हैं। उनसे कहता हूँ कि अपनी कविताऍं,जनता के बीच में जाओ,उन्हें सुनाओ।फिर देखो क्या प्रतिक्रिया होती है। जनता समझती है या नहीं।पाब्लो नेरूदा जैसा कवि जनता के बीच जाकर कविता सुनाता था। जनता को उसकी कविताऍं याद हैं। जनता को जितना मूर्ख हम समझते हैं वह उतनी मूर्ख नहीं है। यदि वह तुलसी और कबीर को समझ सकती है तो तुम्हें भी तो समझ सकती है।बशर्ते उसकी भाषा में भावों को व्यक्त किया जाए।'' समीक्षा के वर्तमान मठाधीश प्रगतिशील लेखकों की उपेक्षा करते हैं। इस पर चन्द्रबली जी ने कहा '' कहते तो हैं अपने को प्रगतिशील और जनवादी पर कहीं न कहीं कलावादियों का प्रभाव उन पर है। आज के शीर्षस्थ जो आलोचक हैं,नामवरसिंह ,उनके जो प्रतिमान हैं,वे सारे प्रतिमान लेते हैं,विजयनारायण देव साही से।'' चन्द्रबली जी ने बडी ही मार्के की एक अन्य बात कही है '' लेखक अब डर गए हैं।'' लेखकों में यह डर कहां से आया ? प्रगतिशील लेखकों का वैचारिक जुझारूपन कहॉं गायब हो गया,आज वे अपने सपनों और विचारों के लिए तल्खी के साथ लिखते क्यों नहीं हैं ? लेखक अपने विचारों के प्रति जब तक जुझारू नहीं होगा तब तक स्थिति बदलने वाली नहीं है। लेखकों को अपना डर त्यागना होगा,अपने लेखन और व्यक्तित्व को निहितस्वार्थों के दायरे के बाहर लाकर वैचारिक संघर्ष करना होगा। बुद्धिजीवियों को दलीय विचारधारा के फ्रेम के बाहर निकलकर मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में अपने विचारधारात्मक सवालों को नए सिरे से खोलना होबा। हिंदी के बुद्धिजीवियों में एक तरु डर है तो दूसरी औ व्यवहारवाद भी गहरी जडें जमाए बैठा है। हम अपने लेखन से किसी को नाराज नहीं करना चाहते। लेखक के नाते हमें यह याद रखना होगा, कि लेखक का काम दिल बहलाना नपहीं है। लेखन की दिल बहलाने वाली भूमिका में अगर हमारा लेखन चला जाता है तो जसने-अनजाने दरबारी सभ्यता और संस्कृति का गुलाम बनकर रह जाएगा। दिल बहलाने वाले साहित्य में जीवन की गंध,दुख,दर्द और प्रतिवाद के स्वर व्यक्त नहीं होते। दिल बहलाने का काम लेखक का नहीं है। दिल बहलाने के लिए खिलौने बाजार में मिलते हैं। हम बाजार जाएं अपने लिए दिल बहलाने का सामान खरीद लाएं और घर बैठे आनंद लें। लेखक का काम आम लोगों को बेचैन करना और स्वयं भी बेचैन रहना,अपना डर निकालना साथ समाज का भी डर निकालना। लेखक किसी एक का नहीं होता वह सबका होता है कठोरता,निर्भीकता और ममता से भरा होता है।
( 16 सितम्बर 2009 को 'मोहल्ला लाइव डॉट कॉम ' और 'भड़ास ब्लाग'पर भी प्रकाशित )
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