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शुक्रवार, 18 मार्च 2011

केदारनाथ अग्रवाल जन्म शताब्दी के मौके पर विशेष- फगुआ के दो व्यंग्य



मैना-

गुम्बज के ऊपर बैठी है,कौंसिल घर की मैना।

सुंदर सुख की मधुर धूप है,सेंक रही है डैना।।

तापस वेश नहीं है उसका ,वह है अब महारानी।

त्याग-तपस्या का फल पाकर, जी में बहुत अघानी।।

कहता है केदार सुनो जी ! मैना है निर्द्वंद्व।

सत्य-अहिंसा आदर्शों के, गाती है प्रिय छंद।।
 जनरक्षा-
आजादी है:जनता-रक्षा का हौआ एक बनाओ। 
सभी जनों को हड़ताली कह,जल्दी जेल पठाओ।। 
टाटा,बिड़ला,डालमिया को,भुज-बंधन में भेंटों। 
गोली,आंसू -गैस मारकर,मजदूरों को मेटो।। 
कहता है केदार सुनो जी ! तुम भी बेचो त्याग। 
भेष बदलकर जी भर खेलो,आजादी का फाग।।


गुरुवार, 17 मार्च 2011

केदारनाथ अग्रवाल जन्म शताब्दी के मौके पर उनकी छह कविताएं

छह छोटी कविताएँ

[१]

चली गयी है कोई श्यामा
आँख बचाकर, नदी नहाकर
काँप रहा है अब तक व्याकुल
विकल नील जल।

[
२]
इकला चाँद
असंख्यों तारे,
नील गगन के
खुले किवाड़े.
कोई हमको
कहीं पुकारे
हम आयेंगे
बाँह पसारे।

[
३]
न इश्क
न हुस्न
गये हैं दोनों बाहर
अवमूल्यन में
कर्ज़ चुकाने

[
४]
छूट गयी 'बस'
रह गया मैं
पाँव पर खड़ा,
चाकू-सा
खुला दिन
मेरी देह में गड़ा।

[
५]
हे मेरी तुम !
पेड़
न फूले--
नहीं हँसे
खड़े हुए हैं मौन डसे ।

[
६]
हे मेरी तुम !
कुछ न हुआ, अब
बूढ़ा हुआ सुआ ।
पखने हुए भुआ ।
देखो,
काल ढुका ;
मन सहमा;
तन काँपा, और झुका ।

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सोमवार, 15 नवंबर 2010

केदारनाथ अग्रवाल जन्म शताब्दी के मौके पर विशेष- लेखक के विश्वदृष्टिकोण की महत्ता

                   (जन्म 1 अप्रैल 1911-मृत्यु 22 जून 2000)
      केदारनाथ अग्रवाल के बारे में हिन्दी के प्रगतिशील आलोचकों ने खूब लिखा है। हिन्दी के बड़े लेखकों में एक फिनोमिना है वे महानगरीय हलचलों से दूर रहे हैं। महागनरीय जोड़तोड़ उन्हें रास नहीं आयी है। इन लेखकों में सबसे बड़ा नाम है केदारनाथ अग्रवाल का। इस साल उनका जन्म शताब्दी वर्ष चल रहा है ।  उनके विचारों की रोशनी में हमें विश्व साहित्य में इनदिनों उठे कुछ बुनियादी सवालों पर विचार करना चाहिए।
    केदारनाथ अग्रवाल के विचारों का दायरा व्यापक है उसे मात्र प्रगतिशील आंदोलन के दायरे में बंद करके नहीं रखा जा सकता। उनके नजरिए में एक ओर प्रगतिशील लेखकों की रूढ़िबद्ध मान्यताओं के प्रति आलोचनात्मक स्वर है तो दूसरी ओर कलावादी नजरिए के प्रति भी आलोचनात्मक नजरिए के दर्शन होते हैं। उनके नजरिए का एक तीसरा स्तर है जिसमें वे साहित्य को निजी अनुभवों के दायरे में कैद करने वाले नजरिए से मुठभेड़ करते हैं। इन तीनों ही स्तरों पर वे विश्वदृष्टिकोण के आधार पर संघर्ष करते हैं। केदारजी ने साहित्य में विश्वदृष्टिकोण को प्रतिष्ठित किया है और यही किसी भी लेखक के मूल्यांकन का प्रस्थान बिंदु हो सकता है।   
साहित्य में निजी अनुभवों पर जोर देने की प्रवृत्ति इन दिनों जोरों से चल रही है। इस प्रवृत्ति के दायरे में स्त्री और दलित साहित्य के अनेक लेखक आते हैं। इसके बहाने साहित्य में ‘मैं’ की आंधी चल रही है। ‘मैं’ की आंधी पर ही सवार होकर आत्मकथाओं का तांता लगा हुआ है। इस तरह के लेखन की एक सीमा तक प्रासंगिकता है। लेकिन इससे समाज और साहित्य के जटिल संबंधों में छिपी संश्लिष्टता का उदघाटन करने में मदद कम मिलती है।
   लेखक का ‘मैं’ यदि लिखने के बाद भी ‘हम’ में रूपान्तरित नहीं होता तो यह उसके नजरिए की सबसे बड़ी सीमा है। ‘मैं’ का ‘हम’ में रूपान्तरण करने के बाद ही साहित्य में मौलिकता आती है। इसके अलावा प्रत्येक लेखक के पास देश-दुनिया और निजी संसार को देखने का दार्शनिक नजरिया  भी होना चाहिए।
    इन दिनों लेखकों का एक ऐसा समूह पैदा हुआ है जिनके पास अनुभव हैं लेकिन जीवन देखने का दार्शनिक नजरिया नहीं है। बिना दार्शनिक नजरिए के लेखक अपाहिज होता है।     
      इसी प्रसंग में केदारनाथ अग्रवाल ने अपने मैं,हम,समाज,निजी और दार्शनिक नजरिए के बीच के अंतस्संबंधों पर रोशनी डालते हुए लिखा-  ‘‘ में मात्र निजी व्यक्तित्व का रचयिता नहीं रहा और न मैंने आज तक अपने-ही अपने को कविताओं में रचा है। मैं समाज और देश से ऊपर उठकर कोई ऊँचा आदमी नहीं बना और न मैंने ऐसा कुछ बनने का प्रयास ही किया। हाँ, यह अवश्य है कि एक दार्शनिक दृष्टि से, मैं, जग और जीवन से घटनाक्रम को देखता और समझता रहा हूँ और उनका मानवीय मूल्यांकन उसी के बल पर करता रहा हूँ। ऐसी रही है मेरी प्रगतिशीलता -इसी से बनी है मेरी मानसिकता-यही मानसिकता कविताओं में व्यक्त हुई है। इसीलिए यह कविताएँ न क्षणिक अनुभूति की प्रामाणिकता की पुत्रियाँ हैं ,न अकेलेपन की निजता की राजकुमारियाँ।’’
इन दिनों मौलिकता के साथ एक नई साहित्यिक बीमारी आ गई है निजता की। निजता को ही मौलिकता मानने का चलन भी चल पड़ा है। इस पर टिप्पणी करते हुए केदारनाथ अग्रवाल ने लिखा है ‘‘मौलिकता भी निजता का रूपायन करने वाली नहीं होती। जो रचनाकार ऐसा समझते हैं ,वह मौलिकता,युग और यथार्थ को तजकर,केवल मनोवैज्ञानिक लोक में प्रविष्ट हो जाती है,वह अमानवीय होती है और उसकी भाषाई अभिव्यक्ति भी सम्प्रेषणविहीन होती है। ऐसी मौलिकता से साहित्य का मौलिक सृजन नहीं होता।’’
    केदारजी ने यह भी लिखा कविता केवल आत्म-बोध या आत्म-तुष्टि का साधन नहीं होती। यह कृतिकार की आत्मा को,भीतर से बाहर लाकर,विशाल मानवता का स्वरूप प्रदान करती है। वही वैयक्तिक ‘आत्मानन्द’ की परिधि से निकलकर लोक मांगलिक ‘आनन्द’ की प्रदाता होती है। ’’
प्रगतिशील कविता को महज राजनीतिक प्रचार नहीं होना चाहिए। उसे मात्र राजनीतिक बयान नहीं होना चाहिए। कविता को राजनीति में रिड्यूज करके देखने वालों की कमी नहीं है। अनेक रूढ़िबद्ध प्रगतिशील लेखक कविता को राजनीति में रिड्यूज करने का प्रयास करते रहे हैं । उसी तरह इन दिनों साहित्य को मात्र अनुभूति में रिड्यूज करके देखने की परंपरा भी चल पड़ी है। कविता या साहित्य मात्र अनुभूति नहीं है।
   कविता या साहित्य बकौल केदारजी ‘एक संश्लिष्ट इकाई’ है। समाज की मौजूदा स्थिति पर उनकी ‘पैटर्न’ कविता बेहद सुंदर ढ़ंग से रोशनी ड़ालती है। लिखा है- ‘‘ ‘पैटर्न’ / वही है/ पैसेवाला/ब्याह हो या चुनाव। पैसे के / अभाव में/ न ब्याह हुआ अच्छा/ न चुनाव। बड़ा बोलबाला है / पैसे -ही पैसेका/ घर और देश में । पैसे पर टिका-टिका/पैसे का प्रजातंत्र/ जगह-जगह जीता है-/सिर धुनता /धुआँ-धुआँ पीता है।’’
     टेलीविजन के आने के बाद लोकतंत्र में बक-बक बढ़ जाती है। लोग कहते हैं यह बोलने की आजादी का सुंदर नमूना है। लोकतंत्र में भाषण और सिर्फ भाषण का जलवा चल रहा है। वे चाहते हैं जीवन की ज्वलंत समस्याओं को भाषणों या टॉक शो के जरिए हल कर लिया जाए। इस रवैय्ये की आलोचना करते हुए केदारनाथ अग्रवाल ने ‘देश में लगी आग को‘ नामक कविता में लिखा है।
   लिखा है- ‘‘ देश में लगी आग को/ लफ्फाजी नेता /शब्दों से बुझाते हैं/वाग्धारा से /ऊसर को उर्वर / और देश को / आत्म-निर्भर बनाते हैं/ लोकतंत्र का शासन /भाषण-तंत्र से चलाते हैं।’’
    लोकतंत्र में किसी भी मामले पर हंगामा होने पर आयोग बना देने की परपाटी है। इस आयोग संस्कृति पर केदारजी ने ‘अंडे पर अंडा’ शीर्षक कविता लिखी है। बानगी देखें- अंडे पर अंड़ा/ और/अंडे पर अंडा/देती है/जैसे मुर्गी/रोज-ब रोज/ सरकार भी /देती है उसी तरह/आयोग पर आयोग/रोज-ब-रोज।  

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

कवि चतुष्टयी जन्मशती पर- विभूतिनारायण राय का साम्राज्यवादी आख्यान

                     (स्व.बाबा नागार्जुन)       

     बाबा नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल,अज्ञेय और शमशेर का यह जन्मशती वर्ष है। यह समारोह ऐसे समय में आरंभ हुआ है जब देश भयानक मंदी की मार और नव्य-उदार आर्थिक नीतियों की मार से गुजर रहा है। सवाल उठता है क्या इसे तिलांजलि देकर कवि चतुष्टयी की जन्मशती मनायी जा सकती है ? लेकिन हिन्दी के कई प्रतिष्ठित लेखकों -आलोचकों और संस्थानों ने साम्राज्यवाद और सत्ता के प्रति आलोचनात्मक रूख को तिलांजलि देकर इस आयोजन का आरंभ कर दिया है।  
   बाबा नागार्जुन को मंदी और नव्य-उदारीकरण के संदर्भ में पढ़ना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। मैंने करीब एक दशक से बाबा को  नहीं पढ़ा था,कभी पढ़ा भी तो चलताऊ ढ़ंग से पढ़ा और रख दिया,लेकिन इस बीच में उनकी जो भी किताबें बाजार में दिखीं खरीदता चला गया और इस सप्ताह उन्हें मन लगाकर पढ़ गया।
   बाबा नागार्जुन से मुझे कईबार व्यक्तिगत तौर पर जेएनयू में पढ़ते समय मिलने और बातें करने का मौका मिला था। उनसे मेरी पहली मुलाकात 1981 में हुई जब मैंने उनकी आपात्कालीन कविताओं पर एम.फिल् करने का फैसला किया था। केदारनाथ सिंह गाइड थे। उसके बाद तो कईबार मिला और उनके साथ लंबी बैठकें भी कीं।
      बाबा नागार्जुन सहज,सरल,पारदर्शी और धुनी व्यक्तित्व के धनी थे। प्रतिवादी लोकतंत्र उनके स्वभाव में रचा-बसा था। उनकी कविता लोकतंत्र की तरह पारदर्शी और आवरणहीन है। उन्हें प्रतिवादी लोकतंत्र का बिंदास लेखक भी कह सकते हैं। प्रतिवादी लोकतंत्र की प्राणवायु में जीने वाला ऐसा दूसरा लेखक हिन्दी में नहीं हुआ। नामवर सिंह को नागार्जुन का व्यंग्य खास लगता है मुझे उनका प्रतिवादी लोकतंत्र के प्रति लगाव खास लगता है।
     नागार्जुन के व्यक्तित्व और कविता की यह खूबी थी कि वे जैसा सोचते थे वैसा ही जीते भी थे। आज हिन्दी के अधिकांश लब्ध प्रतिष्ठित लेखक इससे एकदम उलट हैं। सोचते कुछ हैं जीते कुछ हैं। आज के हिन्दी लेखकों के कर्म और विचार में जो महा-अंतराल आया है वह हमारे लिए चिन्ता की बात है। कवि चतुष्टयी की जन्मशती पर कम से कम हिन्दी के स्वनामधन्य बड़े लेखक इस सवाल पर सोचें कि उनके कर्म और विचार में महा-अंतराल क्यों आया है ? उनके हाथ से सामयिक यथार्थ क्यों छूट गया है ?
     कवि चतुष्टयी जन्मशती पर बड़े-बड़े प्रतिष्ठानी जलसों की खबरें आ रही हैं । इन जलसों के बहाने सत्य को असत्य में तब्दील करने की कोशिशें आरंभ हो गयी हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि यह काम प्रगतिशील आंदोलन के पुरोधाओं की आंखों के समाने हो रहा है वे असत्य का जयगान सुन रहे हैं। यह हिन्दी के प्रतिवादी कवियों का अपमान है। मैं यहां सिर्फ एक झलकी दिखाना चाहता हूँ।
   हाल ही में वर्धा स्थित महात्मा गांधी विश्वविद्यालय ने एक बड़ा ही भव्य कार्यक्रम शमशेर, अज्ञेय, केदार और नागार्जुन के जन्मशती पर आयोजित किया था। इसमें जो विचार वक्ताओं ने रखे हैं ,उन पर विस्तार से चर्चा करने की जरूरत है। हमारे प्रगतिशील लेखक किस संसार की छवि बना रहे हैं और सत्ताभक्त साहित्य प्रशासक विभूतिभूषण राय किस नजरिए से संसार की छवि बना रहे हैं,इसे देखना बड़ा ही दिलचस्प होगा।
   मैंने कभी राय साहब को देखा नहीं है। मिलने का भी सौभाग्य नहीं मिला। लेकिन जो रिपोर्ट इस सेमीनार की सामने है उस पर कहे बिना नहीं रह सकता। एक वाक्य में कहूं तो विभूतिनारायण राय ने बाबा नागार्जुन और अन्य प्रतिवादी कवियों की आत्मा को अपने बयान से कष्ट पहुंचाया है। राय साहब ने कहा है -
"बीसवीं शताब्दी को यदि एक वाक्य में परिभाषित करना हो तो मैं उसे हाशिए की शताब्दी कहना चाहूंगा। इस सदी में उपनिवेशवाद का अंत हुआ, लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ स्थापित हुईं और सदियों से समाज के हाशिए पर रहने वाले लोग- जैसे दलित, आदिवासी और स्त्रियाँ- पहली बार मनुष्य का जीवन जीने का अवसर पा सके। इससे पहले हाशिए पर अटके लोगों के मानवाधिकार समाज के प्रभु वर्ग द्वारा अपहृत कर लिए गये थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना हुई और विश्व मानवाधिकारों के चार्टर की घोषणा हुई तो मानव सभ्यता को जो उपहार मिला वह किसी भी धार्मिक पुस्तक से नहीं मिल पाया था।"( http://hindustaniacademy.blogspot.com)
    इस साधुभाषा का हिन्दी के प्रतिवादी कवियों के सोच से क्या संबंध है ? राय साहब इतने भोले कैसे हैं कि उन्हें समाजवादी व्यवस्था का उदय और पराभव नजर नहीं आया, उन्हें दो-दो विश्वयुद्ध नजर नहीं आए और उन्हें अमेरिकी साम्राज्यवाद का आतंकी नव्य उदार चेहरा नजर नहीं आया, आखिरकार विभूति बाबू किसकी चारण वंदना कर रहे हैं ? उन्होंने जैसा भाषण दिया है वैसा भाषण अमेरिका के ह्वाइट हाउस के कर्मचारी रोज देते हैं। हिन्दी के प्रगतिशील लेखक यह कैसे भूल सकते हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवाद नाम का पूरा विचारधारात्मक तंत्र है जिसके जबड़े में हम सब फंसे हैं। राय साहब के साहबी बयान से तय हो चुका है कि अब ज्ञान-गंगा किधर बहेगी।
   हम सोचें कि क्या किसी लेखक को अमेरिकी साम्राज्यवाद के गुनाहों पर इस साधुभाषा के बहाने पर्दा डालने की अनुमति दी जा सकती है ? क्या नागार्जुन,केदार और शमशेर की साम्राज्यवाद विरोधी चेतना और अज्ञेय की अमेरिकी साम्राज्यपरस्त समझ में पटरी बिठायी जा सकती है ? जी हां ,यह काम इस साधुभाषा के बहाने किया जा रहा है।
     मजेदार बात यह है कि नागार्जुन,केदार और शमशेर और अज्ञेय को आप एक साथ कैसे रख सकते हैं ? कभी उनका नजरिया नहीं मिला तो अब उनकी एक साथ जन्मशती कैसे मना सकते हैं ? जब इस तरह का घल्लूघारा होगा तो समाजवाद और साम्राज्यवाद का क्या करोगे ? काग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के साथ अज्ञेय के रिश्ते का क्या करोगो ? जन्मशती के नाम पर इस तरह की विचारधाराहीनता सिर्फ अब हिन्दी के सत्ताभक्तों के यहां ही संभव है यही वजह है कि विभूति बाबू ह्वाइट हाउस के कर्मचारी की भाषा बोल रहे हैं।  
    दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हिन्दी के मंच,गोष्ठी या सेमीनार अमेरिकी साम्राज्यवाद की भाषा के मंच नहीं रहे हैं। विभूति बाबू ने इस बयान के साथ ही सत्ता के गलियारों में अपनी पकड़ और भी पुख्ता कर ली है। इस मौके पर मुझे नागार्जुन की एक कविता याद आ रही है,उसका शीर्षक है "इतना ही काफी है"। नागार्जुन ने लिखा है -
" बोल थे नेह -पगे बोल,
यह भी बहुत है! इतना ही काफी है!"

         





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