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सोमवार, 14 मार्च 2011

विकीलीक और अमेरिकी साम्राज्यवाद-4-


पत्रकारिता पर असर- विकीलीक के आने के बाद पत्रकारिता का भी नक्शा बदलेगा। अब तक किसी गुप्त दस्तावेज के स्रोत को पत्रकार छिपाते थे लेकिन अब ऐसा कम होगा। पत्रकार जिन सरकारी स्रोतों से दस्तावेज हासिल करते थे उनके बारे में रहस्य बनाए रखते थे। यह काम पत्रकार और सरकारी स्रोत के साथ अघोषित समझदारी के आधार पर होता था। पत्रकार अपनी बात कहते थे,लेकिन दस्तावेज नहीं दिखाते थे,स्रोत नहीं बताते थे। हम अभी तक नहीं जानते कि बोफोर्स का रहस्योदघाटन करने वाले पत्रकारों चित्रा सुब्रह्मण्यम और एन.राम. ने बोफोर्स की दलाली वाले दस्तावेज कहां से और कैसे हासिल किए थे। उनके दस्तावेजों का स्रोत कौन था ?
     विकीलीक के प्रधान जूलियन असांजे ने ‘डेमोक्रेसी नाउ’ के रेडियो पर दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि अब पत्रकार को दस्तावेजों को लेकर इतनी एहतियात बरतने की जरूरत वहीं होगी। असांजे ने कहा "We don't see, in the case of a story where an organization has engaged in some kind of abusive conduct and that story is being revealed, that it has a right to know the story before the public, a right to know the story before the victims, because we know that what happens in practice is that that is just extra lead time to spin the story ."
    इस प्रसंग में अमेरिका की चिन्ताएं है कि इराक और अफगानिस्तान और अन्य देशों में अमेरिकी के लिए एजेंट का काम करने वालों के नाम बगैरह यदि विकीलीक उदघाटित कर देता है तो गंभीर संकट खड़ा हो सकता है और अमेरिका के लिए खुफिया तौर पर काम करने वाले लोग मारे जा सकते हैं या पकड़कर जेल भेजे जा सकते हैं अतः उन्होंने विकीलीक से विभिन्न मीडिया प्रतिष्ठानों के जरिए अपील की कि दस्तावेज प्रकाशित करते समय जनहानि न हो इसका ख्याल रखा जाना चाहिए । विकीलीक ने यह ध्यान रखा है। उसने अफगानिस्तान,इराक आदि देशों में काम करने वाले स्थानीय अमेरिकी एजेंटों और मुखबिरों के नाम उजागर नहीं किए हैं। उन केबलों और दस्तावेजों को संपादित कर दिया गया था जहां स्थानीय एजेंट का नाम लिखा था। इस तरह विकीलीक ने अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों का ख्याल रखा।
    उल्लेखनीय है 1971 में अमेरिकी प्रशासन ने टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट को गोपनीय दस्तावेज छापने से आधिकारिक तौर पर रोका गया। अमेरिका में रिवाज है कि कोई सरकारी दस्तावेज छापने के पहले सरकारी राय जानने की कोशिश की जाती है और उस समय सरकार ने वियतनाम युद्ध के दस्तावेजों को छापने से रोकने की काफी कोशिश की और उस समय अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने भी 6-3 से यह फैसला दिया था कि दस्तावेज छापने से रोकना फर्स्ट एमेंडमेंट का उल्लंघन है। लेकिन जजों ने कहा था कि 1950 के जासूसी कानून को इस प्रसंग में लागू किया जा सकता है। लेकिन अदालत ने सरकारी दस्तावेजों के प्रकाशन को रोकने से इंकार कर दिया। कानूनन गोपनीय सरकारी दस्तावेजों को प्रकाशित करना अपराध है। यह कानून शीतयुद्ध के दौरान बनाया गया था। लेकिन अमेरिका में लगातार गोपनीय सरकारी दस्तावेज प्रकाशित होते रहते हैं और कभी भी इस कानून को लागू नहीं किया गया। आमतौर पर अमेरिका के जासूसी कानून में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित सूचनीओं’ और ‘विदेशी सरकार’ से संबंधित लीक छापना अपराध है।
    उल्लेखनीय है पहले कोई भी पत्रकार गोपनीय दस्तावेज सरकारी ऑफिस की चौहद्दी के बाहर लाता था उन्हें सुरक्षित जगह पहुँचाता था,संपादक को दिखाता था फिर चुनकर खबर बनाता था ,लेकिन विकीलीक के मामले में ऐसा नहीं हुआ है। सूचना संप्रेषक सरकारी गोपनीय दस्तावेज को किसी तरह प्राप्त करके सीधे जिप फाइल में सुरक्षित बनाकर ईमेल कर देता है। वह सरकार के सुरक्षा संबंधी किसी भी बाड़े को किसी तरह अतिक्रमित करके यह काम कर लेता है और उसके दस्तावेज सीधे प्रकाशित हो जाते हैं। इस प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कि इंटरनेट,मोबाइल और कम्र्यूटर के विस्तार के साथ ही साथ बड़े पैंमाने पर विभिन्न देशों में सरकार का नागरिकों के जीवन में हस्तक्षेप बढ़ा है। अमेरिका में निजी मामलों में सरकार दखलंदाजी कर रही है। नागरिकों की संदेह के नाम पर ब्लैकलिस्ट बनायी गयी है। खास किस्म के लोगों ,जैसे मानवाधिकार के लिए काम करने वालों पर हमले और नजरदारी बढ़ी है।यह फिनोमिना अमेरिका से लेकर भारत तक देखा जा रहा है। विभिन्न देशों की सरकारें विभिन्न उपायों को लागू करने की कोशिश कर रही हैं जिनसे नागरिक की पूरी जासूसी और निगरानी की जा सके। राष्ट्रीय सुरक्षा ने नाम पर उन लोगों को परेशान किया जा रहा है जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया है। अनेक बार सरकारी गोपनीय दस्तावेजों के प्रकाशन से सरकारी ऑफीसर की भूलें सामने आती हैं,दुर्व्यवहार सामने आता है। संबंधित विभाग में क्या घोटाला चल रहा है यह सामने आता है।
     मसलन विकीलीक से पता चलता है कि अमेरिका के अनेक राजनयिक वस्तुत सीआईए के जासूस हैं। जबकि नियमानुसार राजनयिक का काम जासूसी करना नहीं है। दूतावास में जासूसों की गोपनीय नियुक्ति नहीं की जा सकती ,लेकिन अनेक देशों में अमेरिकी राजनयिक कूटनीति और जासूसी दोनों काम एक साथ कर रहे थे। एक और भी समस्या है कि जो राजनयिक अपने ऊपर वालों से केबल आदि के जरिए गोपनीय विचार-विमर्श करते हैं उनके लिए भी इस केबल एक्सपोजर ने गंभीर संकट पैदा कर दिया है। उनके आपसी विश्वास को हिला दिया है। एक-दूसरे से बात करने वाले अधिकारी नहीं जानते कि उनकी बातचीत कहीं लीक तो नहीं हो जाएगी और लीक होने की स्थिति में संबंधित अधिकारी की नौकरी से लेकर जिंदगी तक कुछ भी खतरे में पड़ सकती है।
विकीलीक को इंटरनेट के जरिए यूजर देख न पाएं इसकी ओर भी विभिन्न सरकारों ने चौकसी बढ़ा दी और पाबंदियां लगा दीं। अमेरिकी प्रशासन, अमेरिकी वायुसेना,पेंटागन, सरकारी ऑफिस और अनेक कॉरपोरट ऑफिसों में विकीलीक देखने पर पाबंदी लगा दी गयी। इसके अलावा चीन,थाइलैंड,आस्ट्रेलिया आदि ने भी पाबंदी लगा दी।
   विकीलीक के एक्सपोजर ने यह बात भी उजागर की है 21वीं सदी में सूचनाओं का रूप वैसा नहीं रहेगा जैसा 20वीं सदी में था। कल तक राजनयिकों की गतिविधियां गोपनीय होती थी लेकिन 21वीं सदी में गोपनीय नहीं रहेगी। जिन संस्थानों को गोपनीय माना जाता है वे भी अब गोपनीय नहीं रह जाएंगी। गोपनीयता को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। खासकर गुप्तचर संस्थाओं के लिए बेहद गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
  विकीलीक के दस्तावेज जिस तरह आए हैं उनसे यह भी साफ है कि कौन जासूस है और कहां और किस पर जासूसी कर रहा है और किस तरह की सूचनाएं संकलित कर रहा है इसे आसानी से जान सकते हैं। सूचनाओं का इंस्टेंट स्थानान्तरण एक गंभीर समस्या है। 
     विकीलीक के एक्सपोजर ने एक बात साफ कर दी है कि सरकारों के पास दस्तावेजों और सूचनाओं को छिपाने की जितनी विकसिक तकनीक और बुद्धि है उससे ज्यादा विकसित तकनीक और बुद्धि विकीलीक के पास है। सरकार के बाहर आम लोगों के पास है। अभी यह शक्ति अमेरिका में रंग दिखा रही है कल को यह भारत में भी रंग दिखा सकती है। किसी भी सरकारी अधिकारी के सभी संवाद और फोन टेप करके सुनायी पड़ सकते हैं। राडिया टेप इसका आदर्श नमूना है। इसके अलावा सूचना एक्सपोज करने की पद्धति का शत्रु राष्ट्र भी इस्तेमाल कर सकता है। इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाओं के नग्नतम अत्याचारों का जिस तरह विकीलीक ने खुलासा किया है उससे 21वीं सदी में संचार की तकनीक का स्वाभाविक झुकाव जनता के हितों का ओर हो गया है। जनता के हितों पर हृमला करने के पहले सरकारें कईबार सोचेंगी।
    विकीलीक ने यह भी समस्या उठा दी है कि जासूस,मुखबिर,हमलावर कौन हैं और पीडित कौन हैं ? नए 3.0 इंटरनेट मानकों के अनुसार आप सूचना के स्थान और समय के बारे में जान सकेंगे। उस स्थान के बारे में भी जान सकेंगे जहां पर प्राइवेट गतिविधि चल रही है। इसका अर्थ है सूचना की दुनिया बुनियादी रूप से बदल गयी है।
    विकीलीक का पहला परिणाम यह है कि युद्ध अब गुप्त नहीं है। युद्ध में क्या हो रहा है ,कितना और किसका नुकसान हो रहा है,किस तरह मानवाधिकारों का हनन हो रहा है और किस तरह खून-खराबा संगठित किया जा रहा है, कौन जासूस हैं और वे क्या कर रहे हैं, कितनी सेना है, कितने टैंक है,कौन कौन से कारपोरेट घराने युद्ध में लिप्त हैं,व्यक्ति के रूप में कौन लोग काम कर रहे हैं, कितने युद्धास्त्र इस्तेमाल किए जा रहे है, आदि बातों के रहस्योदघाटन ने अब युद्ध की गोपनीयता को खत्म कर दिया है।
   

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

मिस्र के जनांदोलन की बदलती तस्वीर



मिस्र के जनांदोलन की तस्वीर और भी ज्यादा जटिल रूप ग्रहण करती जा रही है और राष्ट्रपति हुसैनी मुबारक की राजनीतिक चालें पिटती चली जा रही हैं। सेना और प्रतिवादियों में मुठभेड़ को टालने के लिए लिहाज से मुबारक ने अपने समर्थकों को मैदान में उतारा ,जगह-जगह उनके समर्थकों ने रैलियां की और मुबारक विरोधियों से मुठभेडें कीं, जिनमें आठ लोग मारे गए और सैंकड़ों घायल हुए हैं।
    जब बृहत्तर जनसमूह मुबारक के खिलाफ मैदान में था और सेना ने सीधे कार्रवाई से मना कर दिया तो ऐसे में मुबारक समर्थकों का रैलियां आत्मघाती कदम ही कहलाएगा। इस एक्शन के गलत परिणाम निकले है और कल मिस्र के प्रधानमंत्री ने इन मुठभेड़ों के लिए माफी मांगी है।

    नवनियुक्त प्रधानमंत्री अहमद शफ़ीक़ ने देश में हुई घटनाओं के लिए माफ़ी मांगी है.उल्लेखनीय है राष्ट्रपति समर्थक और विरोधी गुटों की बीच झड़पों में आठ लोग मारे गए हैं और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं. उन्होंने हिंसा की जाँच का वादा किया है.
      प्रधानमंत्री ने कहा, "मैं इस घटना के लिए सबके सामने खुलकर माफ़ी माँगता हूँ इसलिए नहीं कि यह मेरी ग़लती थी या किसी और की. मैं तो इस बात से दुखी हूँ कि मिस्र के ही लोग इस तरह आपस में लड़ रहे हैं. फूट तो परिवारों में भी होते हैं लेकिन कल जो हुआ वह किसी योजना का हिस्सा नहीं था, मैं उम्मीद करता हूँ कि इंशा अल्लाह सब ठीक हो जाएगा।"
     जनांदोलन का ही दबाब है कि मिस्र के शासनाध्यक्ष संविधान में जरूरी परिवर्तन की बात कह रहे हैं।  उपराष्ट्रपति ने टेलीविजन से प्रसारित अपने संदेश में कहा, "हम संवैधानिक और विधायिका संबंधी सुधार लागू करेंगे और हर मुद्दे के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन करेंगे. इसके बाद हम इसकी भी जाँच करेंगे कि ऐसी घटनाएँ क्यों हुई.।"
    मुश्किल यह है कि जनता लोकतंत्र की मांग कर रही है और लोकतंत्र का संविधान में प्रावधान ही नहीं है। लोकतंत्र से कम पर वह कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। मुबारक को हटाने की मांग उनकी पहली मांग है लेकिन असल मांग है मिस्र में लोकतंत्र की स्थापना की जाए। मुबारक और उनके समर्थक यदि संविधान संशोधन करके लोकतंत्र की स्थापना का संकल्प व्यक्त करते हैं तो उसका कुछ असर भी होगा।
           मुबारक और अमेरिका की रणनीति है कि किसी तरह आंदोलनकारी जनता को शांत किया जाए और उन्हें तहरीर स्क्वेयर से वापस घर भेजा जाए। लेकिन आंदोलनकारी वापस जाने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। आंदोलनकारियों को शांत करने के लिहाज से अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अल बरदाई,उपराष्ट्रपति सामी अनान,सेना के मुखियाओं की मदद लेने का फैसला किया है साथ ही कैमिस्ट्री में नोबेल पुरस्कार प्राप्त अहमद जुएल की भी मदद ली जा रही है लेकिन अभी तक कोई अनुकूल परिणाम नहीं मिले हैं। इसका प्रधान कारण है अलबरदाई और अहमद जुएल का मिस्र में आंदोलनकारियों में कोई जनाधार नही है।
    तहरीर चौक पर सेना और टैंकों की घेराबंदी बनी हुई है। चौक पर आंदोलनकारी जमे हुए हैं। आंदोलन के दबाब में मुबारक ने पुराने मंत्रीमंडल को भंग करके जो नया मंत्रीमंडल बनाया है उसमें बड़े पैमाने पर सेना के बड़े अफसरों को रखा गया है इससे एक बात तो यह निकलती है कि अमेरिका मिस्र में आने वाले समय में जनता का शासन नहीं चाहता बल्कि नग्न सैन्यशासन चाहता है क्योंकि ये सारे परिवर्तन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के इशारे पर हो रहे हैं।
     मुबारक और उनके साथी यह हौव्वा खड़ा कर रहे हैं कि मिस्र में ब्रदरहुड नामक फंडामेंटलिस्ट संगठन के सत्ता में आ जाने का खतरा है अतः सेना की मदद बेहद जरूरी है। असल में मिस्र के मौजूदा प्रतिवाद को संगठित किया है लोकतांत्रिक शक्तियों ने,इसमें बड़े पैमाने पर मजदूरों संगठनों की भी भूमिका है। यह सच है  मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन मिस्र का सबसे बड़ा मुबारक विरोधी संगठन है और वह इस प्रतिवाद में शामिल है लेकिन जनता के और भी तबके शामिल हैं प्रतिवाद में।
   मुबारक विरोधियों की मांग है कि सबसे पहले राष्ट्रपति इस्तीफा दें और उसके बाद एक सभी गुटों को मिलाकर एक राष्ट्रीय सरकार का गठन किया जाए और आंदोलनकारियों की मांगों पर विचार किया जाए।
     मिस्र के प्रतिवादी आंदोलन में आम जनता पर व्यापक हमले हुए हैं साथ ही मीडिया पर भी हमले हुए हैं। यहां तक कि विदेशी पत्रकारों को गिरफ्तार और उत्पीडित किया गया है।अब तक24 पत्रकार गिरफ्तार किए गए हैं और 21 पत्रकारों पर हमले हुए हैं। पांच मामलों में पत्रकारों के उपकरण सेना ने जब्त कर लिए हैं। मुबारक प्रशासन का सबसे ज्यादा गुस्सा अल जजीरा टीवी चैनल पर है। सेना ने उसके 3 पत्रकारों को बंद कर दिया है,चार पर हमला हुआ है और एक पत्रकार लापता है। अलजजीरा के अनुसार सेना ने दर्जनों पत्रकारों के कैमरा और दूसरे संचार उपकरण छीनकर नष्ट कर दिए गए हैं।






मंगलवार, 9 नवंबर 2010

ओबामा की भाषा में छिपी परमाणु सच्चाई

   अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के तीन दिन के दौरे का समापन हो चुका है। उन्हें और हमें जो कहना था उसे संयुक्त विज्ञप्ति में कलमबंद किया जा चुका है। सारी बातें कागजों में दर्ज हो चुकी हैं। अब हम अतिथि सत्कार के माहौल से बाहर आकर, जय हो ओबामा जय हो ओबामा के मीडिया निर्मित वातावरण के बाहर आकर उस वास्तविकता को देखें जो ओबामा के मीडिया प्रबंधन के कारण हमें नजर ही नहीं आई।   
      हमारे दर्जनों विशेषज्ञों,कूटनीतिज्ञों और विदेश नीति विशेषज्ञों ने विभिन्न चैनलों पर जमकर इस पक्ष या उस पक्ष के हितों और नीतियों की रंगबिरंगी व्याख्याएं पेश की हैं। हमें इन व्याख्याओं के परे जाकर उस भाषा को सही नजरिए से,यथार्थ की आंखों से पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए जो भारत-अमेरिका की संयुक्त विज्ञप्ति में है। हमें राष्ट्रपति बराक ओबामा के संसद में दिए गए भाषण की भाषा में निहित राजनीतिक समझ पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए। यह काम ठंड़े दिलो-दिमाग से करने की जरूरत है।
बराक ओबामा की यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि भारत जैसा चाहता था ओबामा उसी भाषा में बोले। दूसरी ओर अमेरिका की उपलब्धि है कि वह जो चाहता था उसे मनवाने में वह सफल रहा है। हम पसंदीदा भाषा से खुश हैं। ओबामा इच्छित आर्थिक ,सैन्य और कूटनीतिक समझौते करके खुश हैं।
     संयुक्त विज्ञप्ति के अनुसार बराक ओबामा और मनमोहन सिंह व्यापारिक घरानों के हितों की रक्षा और संवर्द्धन के मामले में एक ही धरातल पर खड़े हैं इस दौरे से अमेरिका-भारत के कारपोरेट घरानों को लाभ होगा, अमेरिका में 70 हजार नए रोजगार पैदा होंगे लेकिन भारत के बेकारों,किसानों और साधारण जरूरतमंद लोगों को कोई लाभ नहीं मिलेगा।
     उलटे भारत के गृहमंत्रालय और अमेरिका के गृहमंत्रालय के बीच में एक नई साँठगाँठ हुई है उससे भारत के नागरिकों की नज़रदारी और जासूसी बढ़ जाएगी। भारत में काउंटर टेररिज्म के नाम पर प्रच्छन्नतः अमेरिकी हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। इस प्रसंग में संयुक्त विज्ञप्ति में जो कहा गया है उसके भारत की जनता की संप्रभुता के लिए घातक परिणाम निकलेंगे। यह सारा खेल काउंटर टेररिज्म के नाम पर होगा।
    विज्ञप्ति में कहा गया है-‘‘Building upon the Counter Terrorism Initiative signed in July 2010, the two leaders announced a new Homeland Security Dialogue between the Ministry of Home Affairs and the Department of Homeland Security and agreed to further deepen operational cooperation, counter-terrorism technology transfers and capacity building.’’ मजेदार बात यह है कि भारत सरकार ने अभी तक न तो संसद को और न राजनीतिक दलों को बुलाकर यह बताया है कि आखिरकार यह जुलाई 2010 का काउंटर टेररिज्म संबंधी समझौता क्या है ? ‘Department of Homeland Security and agreed to further deepen operational cooperation, counter-terrorism technology transfers and capacity building.’ इस पदबंध को गौर से पढ़ें और अमेरिका के द्वारा बंदी बनाकर रखे गए आतंकी अपराधी डेविड हेडली के संदर्भ में अब तक अमेरिका द्वारा भारत के साथ किए गए व्यवहार को देखें तो पता चलेगा कि हम किस मुसीबत में फंसने जा रहे हैं और अमेरिका हमें किस सीमा तक मदद करेगा।
     सब जानते हैं कि 26/11 के मुंबई आतंकी हिंसाकांड में पाक का हाथ था,हेडली भी उस हिंसाचार की योजना में शामिल था ,हमारे यहां उस घटना पर केस चल रहा है, हमें हेडली को अमेरिका को सौंपना चाहिए था लेकिन उसने हमें हेडली नहीं सौंपा। मीडिया में यह भी खबरें हैं कि हेडली अमेरिकी जासूसी एजेंसियों के लिए काम करता था। हेडली हमारे और अमेरिका के बीच में काउंटर टेररिज्म सहयोग के मामले में आदर्श उदाहरण बन सकता था लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हुआ है।
      असल में अमेरिका काउंटर टेररिज्म संबंधी समझौते के तहत भारत के नागरिकों को भी अपनी निगरानी के दायरे और छानबीन की परिधि में ले आना चाहता है। अप्रत्यक्ष तौर पर वह यह काम अभी भी कर रहा है। उसने तमाम किस्म की संचार कंपनियों खासकर इंटरनेट सेवाप्रदाता कंपनियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। गूगल से लेकर माइक्रोसॉफ्ट सभी इस मामले में सीआईए से लेकर एफबीआई के सामने समर्पण कर चुके हैं और काउंटर टेररिज्म के तकनीकी मैकेनिज्म को लागू करने के नाम पर अमेरिकी नागरिकों की जिंदगी में सरकारी दखलंदाजी बढ़ गयी है और अब वही फार्मूला भारत में भी लागू होने जा रहा है। अभी आरएसएस से जुड़े संगठनों के व्यक्तियों पर इसके प्रयोग चल रहे हैं और बाद में यह सिलसिला और बढ़ेगा। दैनंदिन जीवन में काउंटर टेररिज्म के नियमों के दबाब बढ़ेंगे। काउंटर टेररिज्म का अमेरिकी नाटक जनविरोधी और मानवाधिकारों का हनन करने वाला है। अमेरिका में विभिन्न किस्म के मानवाधिकार संगठन इसका जमकर विरोध कर रहे हैं।  

      अमेरिकी राष्ट्रपति परमाणु निरस्त्रीकरण के सवाल पर कितने ईमानदार हैं और सच बोल रहे हैं। इसे जानने के लिए ज्यादा प्रमाणों की जरूरत नहीं है। अमेरिका के नेतृत्व में नाटो सैन्य संगठन ने अपने परमाणु युद्धास्त्रों को बनाए रखने का फैसला किया है। इसके विपरीत भारत-अमेरिका की संयुक्त विज्ञप्ति में संपूर्ण निरस्त्रीकरण की दिशा में काम करने की प्रतिज्ञा की गयी है। सवाल प्रतिज्ञा का नहीं है ,सवाल एक्शन का है।
    अमेरिका के पास सबसे ज्यादा परमाणु युद्धास्त्र हैं और वह उन्हें खत्म करना नहीं चाहता। बल्कि उन्नत बनाने में लगा है। परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए ओबामा साहब राष्ट्रपति पद संभालने के बाद रूस से भी समझौता कर चुके हैं लेकिन सब कुछ कागजों में है। एक्शन में जाने की अमेरिका की मंशा दूर-दूर तक नजर नहीं आती। हाल ही में नाटो के कमाण्डर ने कहा है कि नाटो अपने परमाणु युद्धास्त्रों को सज्जितभाव से बनाए रखेगा।
    ओबामा साहब परमाणु निरस्त्रीकरण के सवाल पर यदि ईमानदार हैं तो कम से कम आरंभिक कदम के तौर पर नाटो के परमाणु निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया को आरंभ करें।  दुनिया के अनेक देशों में नाटो और अमेरिका ने परमाणु युद्धास्त्र लगाए हुए हैं कम से कम उन्हें हटा लें। इससे अमेरिका या विकसित पूंजीवादी मुल्कों की सुरक्षा पर कोई बुरा असर नहीं होगा। हम उम्मीद कर रहे हैं कि अगले महिने पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में नाटो की बैठक में कोई ठोस परिणाम आएगा।
    नाटो के मुखिया की बात मानें तो परमाणु अस्त्रों को अमेरिका न तो कम करने जा रहा है और न हटाने जा रहा है। उल्लेखनीय है कि नाटो के परमाणु युद्धास्त्रों को लेकर नाटो सदस्यों के द्वारा नाटो के परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग की जा रही है। उस मांग को भी अमेरिका और फ्रांस मानने को तैयार नहीं हैं।
अमेरिका के हाल के चुनावों में ओबामा की पार्टी की जो पराजय हुई है उसमें सैन्य उद्योग ओर उससे जुड़े मीडिया घरानों की बड़ी भूमिका रही है। सैन्य उद्योग दुनिया में स्थायी तौर युद्ध का माहौल बनाए रखना चाहता है और ओबामा इस मामले में निरस्त्र हैं। ओबामा परमाणु निरस्त्रीकरण के नाम पर ईरान के खिलाफ नए किस्म की युद्धोन्मादी तैयारियां कर रहे हैं। वे परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए यदि सचमुच में ईमानदार हैं तो उन्हें सबसे पहले नाटो के परमाणु निरस्त्रीकरण के एजेण्डे को हाथ में लेना चाहिए।
     उल्लेखनीय है नाटो सदस्यों जर्मनी,पोलैण्ड,बेलजियम और स्वीडन ने नाटो के परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग की है लेकिन अमेरिका और फ्रांस इसे मानने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर नाटो की परमाणु नाकेबंदियों का बहाना बनाकर रूस भी अपने परमाणु ज़खीरे को कम नहीं करना चाहता। ऐसी अवस्था में परमाणु निरस्त्रीकरण के सवाल पर किए गए वायदों का कागज पर लिखे शब्दों से ज्यादा कोई मूल्य नहीं है। ओबामा सचमुच में परमाणु निरस्त्रीकरण चाहते हैं तो उन्हें यूरोप से परमाणु युद्धास्त्र हटा लेने चाहिए,नाटो को परमाणुरहित बनाना चाहिए और भारत के लिए खतरनाक बने हुए दियागो गार्सिया सैन्य अड्डे से परमाणु अस्त्र हटा लेने चाहिए। हम देखना चाहते हैं कि वे परमाणु निरस्त्रीकरण के मामले पर कितने ईमानदार हैं !   































शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

अमरीका का पुनर्पाठ- अमरीकी नव उदार फासीवाद का पतन अपने दुस्साहस के कारण होगा-राउल वालदेस विवो

इस मसले की तीन बुनियादी परिस्थितियां इस प्रकार हैं :
इराक के खिलाफ हमले का कारण उसका पेट्रोलियम है जो कि उनके अपने पेट्रोलियम से दस गुने से अधिक सस्ता और प्रचुर है। संयुक्त राज्य के एकाधिकारियों का यह पेट्रोलियम चाहिए। साथ ही वे यूरोप और जापान में अपने प्रतिद्वंद्वियों को इससे दूर रखना चाहते हैं।
इसी क्षेत्र में (उदाहरण के लिए बंगलादेश में) भारी मात्रा में प्राकृतिक गैस उपलब्ध है। 21वीं शताब्दी पेट्रोलियम के मुकाबले कम नुकसानदायक तथा सस्ती गैस की शताब्दी होगी। यह माइक्रोचिप्स और बायोटेक्नोलॉजी से जुड़े ज्ञान की शताब्दी होगी।
इस सबके पीछे अमरीका की स्थायी नीति काम कर रही है जिसके तहत वह भू-रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र (फिलिस्तीन सहित) पर जबर्दस्ती बर्चस्व कायम करना चाहता है ताकि जनसंख्या और क्षेत्र की दृष्टि से बड़े देशों : चीन, रूस, भारत, पाकिस्तान तथा ऊर्जा स्रोत वाले देशों जैसे कि सउदी अरेबिया को डराया-धमकाया जा सके।
हम निम्नलिखित मुद्दों की ओर ध्यान खींचना चाहते हैं :
संभवत: हमने समाज वैज्ञानिक तत्व पर पूरा विचार नहीं किया है। पहले विश्वयुध्द के बाद जो कुछ हुआ उसके बारे में मारियाटेगुई पहले ही बता चुके हैं। यूरोप में विषाक्त मानसिक वातावरण पैदा हो गया था जिसमें से फासीवाद का जन्म हुआ।
उग्र दक्षिणपंथियों और मियामी में उनके फासीवादी माफिया की चालबाजी और जादू से बेटे जार्ज बुश की सरकार सत्ता में आई। उसके सलाहकारों के समाज विज्ञान में दुस्साहस शामिल है।
लेनिन ने पूरी ताकत के साथ क्रांतिकारियों में अत्यधिक व्यक्तिपरकता की आलोचना की। ये व्यक्तिवादी लोग द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, वास्तविक और वस्तुपरक स्थितियों को भूल गए और सोचने लगे कि कोई छोटा सा एक समूह ऐतिहासिक परिवर्तन कर सकता है और वह भी अंधाधुंध हिंसा का सहारा लेकर।
पूंजीवाद आज भी इसलिए मौजूद है क्योंकि पूरी दुनिया में अवाम ने इसके स्थान पर अपनी सत्ता कायम करने में देरी कर दी। इस पूंजीवाद के बेकाबू होने का एक संकेत यह है कि उसके हृदय में फिर से प्रतिक्रियावादी किस्म की हलचलें पैदा होने लगी हैं। इनके
हामीदारों को नकारवादी नहीं कहा जा सकता। ये उसके उलट हैं। 19वीं शताब्दी के अंत में रूसी पोपुलिस्ट अनास्था सिखा रहे थे जबकि ये खुद को धार्मिक कट्टरपंथियों, रूढ़िवादियों के रूप में पेश कर रहे हैं। सबसे अधिक विख्यात मामला ओसामा बिन लादेन का है। उसने अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक और क्रांतिकारी ताकतों के खिलाफ अमरीका का साथ दिया था, उसकी मदद से सत्ता में आया। बाद में उसने 11 सितंबर 2001 को वहशियाना हमले कराए। इससे रूढ़िवादी तथा उतनी ही कट्टर लेकिन ईसाई बुश बेटे की ऐंग्लो-सेक्शन सरकार को पूरी दुनिया में सैनिक तानाशाही के लिए मुहिम चलाने का अच्छा बहाना मिल गया। इस बात को कोई भी नहीं मान सकता कि अमरीका के राष्ट्रपति दयालुतापूर्ण चरम-रूढ़िवाद के पक्षधर हैं।
संक्षेप में दुस्साहसवाद वाम और दक्षिण दोनों बिलकुल अलग राजनीतिक और सामाजिक ताकतों से पैदा हो सकती है। तो इसका क्या अर्थ निकाला
जाए?
यह व्यक्तिपरकता का अति प्रयोग है। दूसरे शब्दों में प्रत्येक निर्णय निर्णय करने वाले व्यक्ति पर छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार उसके द्वारा देखा गया सत्य उसी तक सीमित रह जाता है। हीगेल और उसके बाद प्रोटागोरस का कथन है कि मनुष्य सभी चीजों का मापदंड है। इसकी दो व्याख्याएं हैं। एक, प्रतिक्रियावादी, आदर्शवादी जो ज्ञान को व्यक्ति के ज्ञान तक सीमित कर देती है। दूसरी क्रांतिकारी द्वंद्वात्मक और भौतिकवादी व्याख्या है क्योंकि वह मानव जाति को इतिहास के केंद्र में रखती है।
दुस्साहसवादी व्यक्तिपरकता से खुद को जोड़कर अमरीकी पूंजीपतियों के प्रभुत्वशाली हिस्से ने ऐंग्लो-अमरीकी व्यावहारिकता को छोड़ दिया है। यह व्यावहारिकता तर्कसंगत प्रत्यक्षवाद पर आधारित थी। इस प्रत्यक्षवाद ने ही काफी लंबे समय तक बुध्दिवादियों के विरोध में उनका आचरण तय किया। उन्होंने बुध्दिवादियों के इस दावे को दूषित बताया कि तर्क के अनुसार हमारा आत्म वास्तविकता की प्रतिकृति है।
अमरीका का वर्तमान शासक व्यावहारिकता का ही शत्रु नहीं है। वह बुध्दिवाद का भी शत्रु है क्योंकि वह मानता है कि वास्तविकता को उसकी इच्छा के हिसाब से मोड़ा जा सकता है।
यह स्थिति मार्क्सवाद-लेनिनवाद से मेल नहीं खाती। उसके अनुसार दर्शन का प्रमुख लक्ष्य संसार की व्याख्या करना नहीं बल्कि इतिहास के वस्तुपरक प्रयाण के अनुरूप उसका क्रांतिकारी कायाकल्प है। मार्क्सवादी-लेनिनवादी हीगेल के इस विचार को ग्रहण करते हैं कि बाध्दिक प्रक्रिया के रूप में इतिहास मानव स्वतंत्रता अर्थात कम स्वतंत्रता से अधिक स्वतंत्रता की ओर जाने का रिकार्ड है। अवाम की भूमिका की बात कर वे इस विचार को वास्तविक अर्थ देते हैं। हीगेल इससे नफरत करता था।
इसके विपरीत फासीवादियों की कोशिश रहती है इस असंगत संसार में कुछ भी न बदले जिससे कि वे बॉस बने रहें, लोगों को आजादी न हो। 250 धनी लोगों की आय 2.5
अरब लोगों की आय के बराबर बनी रहे और जिससे मानव जाति के लुप्त हो जाने का खतरा बना रहे।
फासीवाद की प्रबल अनिवार्य मनोवैज्ञानिक विशेषता अर्थात उसका दुस्साहस ही हमेशा उसके पतन का कारण बनता है। लेकिन यह विचार सही नहीं है कि उसका पतन अपने आप होगा। सोवियत संघ के विभिन्न नेता लेनिन के मार्ग से भटक गए। उनके द्वारा की गई गलतियों के कारण मानवता ने 20वीं शताब्दी गंवा दी। फासीवाद के पहले मॉडल की पराजय से जो महान अवसर मिला था उसे उन्होंने गंवा दिया और मानव तर्क की सार्वभौमिक जीत होने से रह गई। सवाल 21वीं शताब्दी को गंवा देने का नहीं है। यहां तो हर दिन के नुकसान से धरती पर मानवता के अस्तित्व को खतरा बढ़ता जा रहा है।
फासीवाद बुर्जुआ लोकतंत्र के विपरीत है, हालांकि दोनों का ताल्लुक पूंजीवाद की अधिरचना (सुपर स्ट्रक्चर) से है।
इनमें अंतर कई रूपों में देखा जा सकता है जिसे कम महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। बुर्जुआ लोकतंत्र पूंजी के संचय और विस्तारित पुनरुत्पादन के आर्थिक तंत्र के भीतर उत्पादन के बुनियादी साधनों के मालिकों के वर्चस्व को कायम रखता है। फासीवाद गैर आर्थिक बलप्रयोग का अधिक आश्रय लेता है। बुर्जुआ लोकतंत्र सर्वसम्मति पर आधारित होता है लेकिन बीच-बीच में हिंसा (प्रदर्शनों और हड़तालों आदि का दमन) का सहारा लेता है। फासीवाद हिंसा का निरंतर प्रयोग या उसके प्रयोग का खतरा है।
     बुर्जुआ लोकतंत्र नस्लवाद या विदेशी द्वेष का उन्मूलन तो नहीं करता लेकिन उसके खिलाफ कदम उठा सकता है। फासीवाद बहुत ऊंचे दर्जे का नस्लवाद और विदेशी द्वेष है।
बुर्जुआ लोकतंत्र युध्द कराता है लेकिन उनके बीच में शांति भी कायम करता है। सोवियत संघ रूपी गढ़ के कारण यूरोप की तीन पीढ़ियों ने युध्द नहीं देखा। सोवियत संघ और यूरोप में उसके द्वारा निर्मित समाजवादी शिविर के खत्म हो जाने के बाद यूगोस्लाविया के टूटने के साथ युध्द शुरू हो गया। फासीवाद निरंतर और स्थायी युध्द है। शांति केवल युध्द विराम होती है।
चेग्वेरा द्वारा दी गई जबर्दस्त परिभाषा बार-बार चरितार्थ होती है : जब तक अवाम का डर नहीं होता तब तक बुर्जुआ लोकतंत्र का सहारा लेता है। जब उसे उनका डर लगने लगता है तो वह फासीवाद की ओर चला जाता है।
बुर्जुआ लोकतंत्र को बरकरार रखने वाले शासन बहुत सी बातों का ध्यान रखते हैं। फासीवादी की ओर झुके शासन स्वभाव से ही दुस्साहसी होते हैं। यह दुस्साहस उनके अक्खड़पन, दूसरों के प्रति उनकी नफरत, अपनी वहशी ताकत के ज्यादा अनुमान तथा दूसरों की क्षमता के कम अनुमान से पैदा होता है।
     दुस्साहस और फासीवाद के ताल्लुक का यदि विश्लेषण किया जाए तो यही निष्कर्ष निकलता है कि अपने वहशीपन के पोषण के लिए दोनों झूठ और मसीहा के मनोविज्ञान का सहारा लेते हैं। पहले हिटलर ने जर्मनी के लिए जरूरी 'जगह' तथा 'अयोग्यों' को खत्म करने और 'सुपरमैन' उत्पन्न करने वाली 'नई अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था' के बारे में झूठ बोला।
    आज (ब्लेयर, अजनार और बेरलुस्कोनी जो ब्रिटिश, स्पेनिश और इतालवी अवाम से कट गए हैं के समर्थन से) बुश स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानवाधिकार कायम करने की अपनी दिव्य नियति तथा इराक और अन्य देशों में मौजूद आम विनाश के हथियारों के बारे में झूठ बोल रहा है। ऐसे हथियार कहीं नहीं थे।
फासीवादी अवधारणा के अंतर्गत वित्तीय कुलीन तंत्र के सबसे अधिक प्रतिक्रियावादी तबके की सत्ता की रक्षा के लिए हर चीज में गैर आर्थिक हिंसा का सहारा लिया जाता है। यह अवधारणा किसी राष्ट्र, प्रजाति या धर्म के प्रतिनिधि के रूप में खुद को विशुध्द बताने वाले लोगों की दूसरे राष्ट्रों, प्रजातियों या धर्मों के प्रति नफरत पर आधारित है। यह सभ्यताओं के टकराव का मसला है। जोसे मारती ने इस बारे में कहा है कि यह उपनिवेशवादियों का विश्वासघाती बहाना है।
दुस्साहस विदेशी-द्वेष, नस्लवाद या धार्मिक असहिष्णुता से खुराक लेता है तथा उसमें कमांड और आदेश देने की उन्मादपूर्ण ललक होती है। उसे यह विश्वास होता है कि दूसरों पर आसानी से वर्चस्व कायम किया जा सकता है।
समकालीन इतिहास से कुछ उदाहरण
मूल फासीवादियों का दुस्साहस इस विचारधारा से जुड़ी तीन शक्तियोंनाजी जर्मनी, मुसोलिनी के इटली और सैन्यवादी जापानके आचरण में प्रकट हुआ। जर्मनी ने ग्रेट ब्रिटेन पर हमला करने से पूर्व सोवियत संघ पर हमला किया जहां उसे रोक लिया गया। इटली एबिसिनिया (इथियोपिया) को जीतना चाहता था लेकिन उसके पास आवश्यक सेना नहीं थी। जापान ने ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका के एशियाई उपनिवेशों पर ध्यान केंद्रित कर दिया जिसकी वजह से वह स्तालिनग्राद की निर्णायक लड़ाई में जर्मनी की सहायता के लिए नहीं आ सका। तीन फासीवादी ताकतों की यह निर्णायक पराजय सिध्द हुई।
      व्यावहारिकता का परिचय देते हुए अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट और ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ने सोवियत नेता स्तालिन के साथ संधि की। इनके गंठजोड़ ने जर्मनी, इटली और जापान के फासीवादी गुट को पराजित किया। फासीवाद के विनाश में सोवियत अवाम की प्रमुख भूमिका रही। उसने अपने एक बटा पांच सपूत इसमें बलि चढ़ा दिए। यह संख्या अमरीका और ग्रेट ब्रिटेन की संख्या से कहीं अधिक थी। फासीवाद की दुस्साहसी प्रवृत्ति की उपेक्षा करके यदि स्तालिन हिटलर के साथ युध्द न करने का करार करने की भूल नहीं करते तो जान-माल का इतना नुकसान नहीं होता।
      दोहरा तत्व : सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में समाजवादी के मजबूत होने, तीसरी दुनिया के देशों की स्वतंत्रता प्रक्रिया तथा चीन, वियतनाम और क्यूबा में वास्तविक सामाजिक क्रांतियों के कारण अमरीका को कलह की रणनीति पर आना पड़ा। इसके भीतर वे लोग भी थे जो समाजवाद के विध्वंस तथा उपनिवेशवाद और नव उपनिवेशवाद से मुक्त देशों की स्वतंत्रता की रणनीति के पक्षधर थे। समाजवाद के सोवियत मॉडल तथा सोवियत संघ सहित इसके शासनों के समाप्त हो जाने के बाद ये दोनों रणनीतियां जारी रहीं। इन्हें अंग्रेजी में 'कंटेनमेंट (घेराबंदी)' और 'रोल बैक (पलट देना)' कहा जाता है। रीगन, पिता बुश और क्लिंटन ने पहली रणनीति अपनाई। लेकिन बेटा बुश उस हर चीज को नष्ट करने की रणनीति अपना रहा है जो स्वतंत्र रास्ता अख्तियार कर रही है (फ्रांस और जर्मनी सहित) या सामाजिक प्रगति की ओर जा रही है।
     अमरीकी केंद्र (विश्व अर्थव्यवस्था का एक तिहाई, विश्व व्यापार का 18 प्रतिशत, शेष दुनिया से बड़ा सेना बजट, डालर का सार्वभौमिक मुद्रा बनना, जिस पर यूरो के आने से प्रश्न चिह्न लग गया है, आदि) वाली एक ध्रुवीय दुनिया तो स्थापित हो गई है लेकिन इस बात को लेकर सतर्कता भी है कि दुनिया का फिर बहु धु्रवीय होना तय है जिसका एक धु्रव चीन होगा और साथ ही तीसरी दुनिया के देश विशेषकर क्यूबाई क्रांति के पीछे पड़े हमारे अमरीका के देश फिर से ऐतिहासिक पहल करेंगे। इसकी वजह से नव फासीवाद की समस्याएं तथा इसका जन विरोधी मनोविज्ञान जगजाहिर हो रहा है। सिएटल तथा अन्य कई शहरों में पूंजीवाद का जबर्दस्त विरोध हुआ जिसके केंद्र में अमरीकी अवाम का अत्यधिक सतर्क तबका था। इसकी वजह से अति दक्षिणपंथी अमरीकी तबके में हर तरीके से सत्ता लेने की हड़बड़ी पैदा हो गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि अमरीकी लोग विश्व क्रांति के लिए आरक्षी सेना में शामिल हो सकते हैं। लूट तथा गुलाम बनाने के लिए अपनी ही सरकार द्वारा चलाए जा रहे युध्दों को रोकने के संघर्ष में शामिल हो सकते हैं। बेटे बुश के नेतृत्व में जो दुस्साहसवादी शासन स्थापित हुआ है उसने अमरीकी साम्राज्यवाद के पक्षधर लोगों की भाषा ही बदल दी है। इस भाषा में अधिक ढिठाई आ रही है।
9 अक्टूबर 2001 को वॉल स्ट्रीट जरनल ने लिखा : 'आतंकवाद का जवाब? उपनिवेशवाद।' अमरीकी बैंकरों के महत्वपूर्ण स्वर के रूप में फाइनेंसियल टाइम्स ने 10 अक्टूबर 2001 को लिखा : 'हमें साम्राज्यवाद की जरूरत है।' इसके 19 दिन बाद वाशिंगटन पोस्ट ने दृढ़ता के साथ कहा : 'हमें संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व बैंक जैसी उपनिवेशवाद के बाद की संस्थाओं को नया साम्राज्यवादी आवेग देना चाहिए।' 17 जुलाई 2003 को अमरीकी कांग्रेस को संबोधित करते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने कहा, 'आज अंतर्राष्ट्रीय नीति के तहत इससे खतरनाक सिध्दांत नहीं हो सकता कि अमरीकी शक्ति के खिलाफ प्रतिस्पर्धी शक्तियां हों।'
    लेबर पार्टी के अधिकृत प्रवक्ता रॉबर्ट कॉपर ने लंदन ऑब्जर्वर में और भी साफ तौर पर कहा, 'आज उपनिवेशवाद की पहले से ज्यादा जरूरत है। विश्व में व्यवस्था पैदा करने
तथा उसे संगठित करने के लिए हमें नव साम्राज्यवाद की जरूरत है।' दुस्साहसवादी भावना डब्ल्यू.टी.ओ. के दोनों टावरों के गिरने के बाद अचानक नहीं आई। वह शीत युध्द के शुरू होने से परिपक्व हो रही थी। इसी भावना के अनुरूप अमरीकी संयुक्त सेना कमान के प्रमुख हेनरी शेल्टन ने कहा, 'अमरीका को निरंकुश पूर्ण आधिपत्य कायम करना चाहिए।' शांति, स्वतंत्रता और प्रगति के लिए दुनिया के देशों के लोगों की इच्छा तथा अमरीकी अवाम की लोकतांत्रिक उपलब्धियोंजो कि देश में फासीवादी दृष्टिकोण को लागू करने की दिशा में जबर्दस्त बाधा हैको चुनौती देते हुए सी.आई.ए. के प्रचालन निदेशक क्रोंगर ने हाल ही में कहा : 'आज एक ही नियम मौजूद है और वह यह कि कोई नियम नहीं है।'
नव उदार फासीवाद के पुराने समर्थक तथा कोंडोलीजा राइस के साथी बिगनीव ब्रजेजिंस्की ने पूरी साफगाई के साथ लिखा : 'अमरीका का लक्ष्य अपने दासों को अधीन बनाए रखना, जनता की आज्ञापरायणता और सुरक्षा की गारंटी तथा असभ्यों को एकजुट होने से रोक होना चाहिए।'1
अमरीकी दुस्साहस की सर्वाधिक स्पष्ट मौजूदा मिसालें हैंइराक के खिलाफ युध्द और एफ.टी.टी.ए.।
संयुक्त राष्ट्र संघ से नफरत करने वाले तथा फासीवादी दुस्साहस के पैरोकार सी.आई.ए., पेंटागन और व्हाइट हाउस के दबदबे के कारण ही अमरीकी सरकार ने यह सोचा था कि इराक की बहुसंख्यक शिया जनसंख्या फूलों के साथ अमरीकी सैनिकों का स्वागत करेगी क्योंकि उन्होंने सुन्नियों का दमन सहा है। लेकिन शिया यह देखकर पूरा विरोध कर रहे हैं कि बुश ईरान जैसा शिया शासन यहां कायम नहीं कर सकता। साथ ही कुर्दों के इस्तेमाल से तुर्की के साथ अनसुलझी समस्याएं पैदा हो रही हैं।
अमरीकी दमन कर रहे हैं। बच्चों को मारते समय वे धर्म का भेद नहीं करते। इसी कारण विरोध की भावना बढ़ रही है और वह देशभक्ति का रूप ले रही है। इसमें शिया लोग शामिल हो रहे होंगे। यदि ऐसा नहीं होता तो बगदाद तथा दूसरे शहरों, जहां वे बहुसंख्या में हैं, में विरोध नहीं होता। जिन देशों को खतरा है वे भी विरोध के लिए तैयार हैं। स्वतंत्र, प्रभुत्ता संपन्न समाजवादी क्यूबा, फिदेल, राउल, पार्टी, यू.जे.सी., उसका जन संगठन और उसकी सशस्त्र सेनाएं पूरी जनता के युध्द के लिए तैयार हैं। प्लाया गिरोन की तरह विजय हमारी होगी।
एफ.टी.टी.ए. भी दुस्साहस का चिह्न है जो बुश की हार का कारण बनेगा। कमांडर-इन-चीफ ने कहा है, 'यदि अमरीकी साम्राज्यवाद हमारे अमरीका को निगलता है तो वह उसे पचा नहीं पाएगा।' जैसा कि वेनेजुएला से प्रकट हो रहा है और ब्राजील, अजर्ेंटीना, बोलिविया तथा अन्य बहुत से देशों में गंभीर परिवर्तनों से साफ हो रहा है, दुस्साहस का समय खत्म हो गया है। लेकिन अमरीका के अवाम को इस छलावे से मुक्त होना होगा तथा समकालीन इतिहास के सबसे बड़े दुस्साहसी के भाग्य का फैसला करना होगा।
(डॉ.  राउल वालदेस विवो,
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ क्यूबा के हायर पार्टी स्कूल के रेक्टर)

अनुवाद रामकिशन गुप्ता,नव उदारवाद का फासीवादी चेहरा,फिदेल कास्त्रो,ग्रंथ शिल्पी, नई दिल्ली से साभार।
जनवरी 2004










शनिवार, 7 अगस्त 2010

ओबामा और अमरीकी साम्राज्य-4-

ओबामा की मीडिया रणनीति है सभी विचारधारा के लोग मानसिक तौर पर समर्पण करें। ओबामा जिस रूप में समाज की भूमिका निर्धारित करें उसे नतमस्तक होकर स्वीकार करें। ओबामा का 'आशा' और 'परिवर्तन' का यूटोपिया सारी दुनिया को अमरीकी नीति का कल-पुर्जा बनाना चाहता है। ओबामा चाहते हैं कि जिस तरह वे कृत्रिम अस्मिता को धारण किए हैं वैसे ही बाकी समाज कृत्रिम अस्मिता धारण करे। कृत्रिम अस्मिता के रूप में ही ओबामा ने अपने भाषण्ा में अमरीका में जिन अस्मिताओं की मौजूदगी का बखान किया है निर्मित अस्मिताएं हैं।  धार्मिक अस्मिताएं हैं। इस तरह ओबामा अमरीकी समाज को धार्मिक अस्मिताओं में वर्गीकृत करके देख रहे थे। अमरीका के वर्गीय और जातीय वैविध्य से भरे समाज को ईसाई,मुसलमान,हिन्दू आदि धार्मिक अस्मिताओं में वर्गीकृत करके देखना , इस बात का संकेत है कि अमरीकी राष्ट्रपति आधुनिकता के धार्मिक पैराडाइम के तत्ववादी नजरिए सोचते है।
     ओबामा के भाषण में संदेश था कि 'राष्ट्र' की महज दर्शक की भूमिका नहीं होगी। सभी किस्म की गतिविधियों के नियमन में 'राष्ट्र' की केन्द्रीय भूमिका होगी। इसी भूमिका का निर्वहन करते हुए अमरीकी राष्ट्र अपने विश्व वर्चस्व को बनाए रखेगा। अमरीका की वर्चस्वशाली भूमिका के लिए जो व्यक्ति,विचार,तथ्य, मूल्य, नीति आदि जरूरी हैं उन्हीं का ओबामा की प्रशासनिक टीम आौ कार्यभार वाले दस्तावेज में चयन किया गया है। ये मौजूदा संरचनाओं के समर्थक हैं। ओबामा ने किसी भी भाषण में अमरीकी संरचनाओं में किसी भी किस्म के बुनियादी परिवर्तन का संकेत नहीं दिया है। खतरे का प्रधान बिंदु यही है। बुश प्रशासन की संरचनाओं को बदले बगैर अमरीकी प्रशासन की छवि नहीं सुधारी जा सकती।
        ओबामा ने 'आशा' और 'परिवर्तन' की ओट में अपनी विचारधारा को छिपा लिया है। इन दोनों धारणाओं के बहाने ओबामा और अमरीकी प्रशासन अपनी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं को साकार करना चाहता है। 'आशा' और 'परिवर्तन' के नाम पर स्वयं और अमरीका को प्रच्छन्न बनाकर ओबामा ने अपने प्रशासन को ज्यादा प्रभावी बनाने की कोशिश की है। ठीक यही रणनीति पिछले राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भी अपनायी थी। उन्होंने 'आतंक के खिलाफ जंग' और  'इराक के जनसंहारक अस्त्रों' का हौव्वा खड़ा करके सारी दुनिया में वर्चस्व के नए मानक का निर्माण किया।
    विखंडनवादी नजरिए से पढ़ें तो ओबामा ने संदेश दिया है अमरीकी महान् है ! अपराजेय है ! दुनिया पर शासन के लिए बना है ! अमरीका का प्रतिवाद सहन नहीं होगा। यदि कोई प्रतिवाद होगा तो व्यक्तिगत होगा। सामूहिक नहीं 'आशा' के नाम पर 'मुनाफा' और 'परिवर्तन' के नाम पर 'पावर' (सत्ता) पर पर्दादारी की है। 'आशा' के नाम पर ओबामा आम लोगों की सामान्य अनुभूतियों का दोहन कर रहे हैं और सामान्यजनों के बीच में विचारधारात्मक अंतराल को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
     'आशा' (होप) के बहाने व्यक्ति,राजनीति,नीति और इनके पीछे सक्रिय अन्तर्विरोधों को नष्ट कर देना चाहते हैं। बीस लाख लोगों का संगम यह संदेश देता है कि अमरीका में विचारधारारहित राजनीति का तूफान आया हुआ है। इसका सबको स्वागत करना चाहिए। राजनीति वही अच्छी है जो विचारधाररहित हो। ओबामा यदि 'आशा' का संचार नहीं करते तो यह संभव है कि आम अमरीकी प्रतिवाद करते हुए सड़कों पर उतर आए। आज आम अमरीकी नागरिक आर्थिकमंदी और युध्दजनित आर्थिक तबाही के बावजूद व्यापक प्रतिवाद नहीं कर रहे हैं। तो उसमें ओबामा के विचारधारारहित 'आशा' और 'परिवर्तन' के नारे की बड़ी प्रभावी भूमिका है। यह नारा प्रतिवाद को नष्ट करता है। यह आलसियों और पराश्रितों का नारा है।
    ओबामा का संदेश है मेरे साथ एकजुट हो। एकजुट होगे तो फल मिलेगा। आंतरिक मतभेदों को भूल जाओ। अमरीका महान् है। अन्य किसी के भी निष्कर्षों और विचारों पर ध्यान मत दो। अन्य लोग अमरीका के बारे में क्या कहते हैं उसकी अनदेखी करो। ओबामा के शब्दों में  'अमरीकी जीवनशैली' गर्व की चीज है। जो इसकी आलोचना करते हैं उनकी उपेक्षा करो। हम श्रेष्ठतम हैं,सर्वोपरि हैं।
    ओबामा के भाषण को विखंडनवादी नजरिए से पढ़ा जाए तो इसमें एक भी सारवान नीति की घोषणा नहीं है। उत्तर आधुनिक सर्वजनप्रियता और पापुलिज्म को ध्यान में रखकर यह भाषण लिखा गया है। पापुलिज्म और अमरीकी राष्ट्रवाद के भावबोध को सर्वप्रिय भाषा और सर्वजन सुखाय के मलाई में लपेट के प्रस्तुत किया गया। 'सर्वजन सुखाय और सर्वप्रियता ' का अर्थ है बोलो किंतु प्रतिवाद मत करो। सारवान बातें मत कहो। 'सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय' अर्थहीन नारा है। यह नारा समूचे शपथग्रहण समारोह को निस्सार बनाता है।
     ओबामा का 'आशा' और 'परिवर्तन' का नारा तर्क के अस्वीकार पर टिका है। ओबामा के भाषण में व्यक्त किए गए विचारों को यदि तर्क की कसौटी पर कसने की कोशिश की जाएगी तो तर्कहीनता निकलेगी। ओबामा जो कह रहे हैं और जो करते रहे हैं उसके साथ उनके भाषण का मेल नहीं है। ओबामा उन नीतियों को चुनौती नहीं दे रहे जिनके कारण आज सारी दुनिया भयानक आर्थिकमंदी में फंसी है। इराक-अफगानिस्तान युध्द को ओबामा का घोषित समर्थन रहा है। ओबामा को तालिबान की चिन्ता है किंतु यह चिन्ता कितनी वास्तविक है यह तो इस तथ्य से ही साफ है कि अफगानिस्तान में होने वाली अफीम की खेती से आज बहुराष्ट्रीय कंपनियां लाभ उठा रही हैं और सीआईए के संरक्षण में सारा आपरेशन चल रहा है। यह स्थिति तब है जब अफगानिस्तान में अमरीकी नेतृत्व में नाटो सेना जमी हुई है। तालिबान समर्थकों से अफीम का व्यापार करके अमरीका और सीआईए इस पूरे क्षेत्र में स्थायी तौर पर अस्थिरता और असुरक्षा का वातावरण बनाए रखना चाहता है।
  अमरीका यदि अफगानिस्तान और इराक को लेकर गंभीर है तो उसे अबिलम्ब इस इलाके से अपनी सेनाएं वापस बुला लेनी चाहिए। साथ ही समूचे विश्व से इराक और अफगानिस्तान पर हमले के लिए माफी मांगनी चाहिए। जिन लोगों के हाथ युध्दापराधों से सने हैं उन्हें विश्व अदालत के हवाले किया जाना चाहिए। जो कंपनियां इराक के भ्रष्टाचार और अफगानिस्तान में अफीम की तस्करी में शामिल हैं उन्हें दण्डित किया जाना चाहिए। यदि इस नजरिए से देखें तो ओबामा का भाषण अर्थहीन है।
     अर्थहीन इस अर्थ में भी है कि वह संदर्भरहित था। ओबामा जो बोल रहे थे उसका संदर्भ गायब था। अर्थहीनता हमेशा सार्वभौम भाव में अभिव्यक्त होती है। ओबामा जिस आर्थिक मंदी,युध्द आदि की बातें कर रहे हैं उसे उसके सही संदर्भ से काटकर सार्वभौमत्व का रूप दे रहे थे। उल्लेखनीय अर्थहीन के लिए संदर्भ बेमानी होता है। ओबामा के लिए भी संदर्भ बेमानी है। वह जो कह रहे हैं वह तर्क की दृष्टि से असंभव है। इस अर्थ में ओबामा का भाषण अर्थहीन या एब्सर्ड था।
    ओबामा का खर्चीला शपथग्रहण समारोह आर्थिकमंदी की व्यापक तबाही के संदर्भ में अर्थहीन लगता है। अमरीकी साम्राज्य की अर्थहीनता तब और भी प्रखर रूप में सामने आती है जब ओबामा मार्टिन लूथर किंग को अपना आदर्श प्रतीक बनाकर पेश करते हैं। अमरीकी सभ्यता के आदर्श प्रतीक के बहाने वे जो रूपक बनाना चाहते हैं वह एब्सर्डिटी का चरम है।
      

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...