विज्ञान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विज्ञान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

आजतक को ऑक्टोपस का निमंत्रण




      ऑक्टोपस पाल के बारे में टीवी वाले अब चुप हैं। वे नहीं बता रहे कि ऑक्टोपस इन दिनों क्या कर रहा है ? किसकी भविष्यवाणी कर रहा है ? जब तक फुटबाल के मैच हो रहे थे, टीवी वालों की बच्चों की तरह उसमें दिलचस्पी थी , टीवी वालों ने और खासकर आजतक टीवी ने तो ऑक्टोपस के भाग्यज्ञान संबंधी वैदुष्य पर लंबी खबरें तक बना डाली थीं। लेकिन वे एक सामान्य चीज नहीं कर पाए कि कम से कम आजतक टीवी का भविष्यफल जरूर पूछ लेते।

     
राष्ट्रमंडल खेलों पर जिस तरह के संकट के बादल मंडरा रहे हैं उसके बारे में कुछ सवाल पूछ लेते। ज्यादा कुछ नहीं तो ऑक्टोपस के जीव के रूप में इतिहास पर चल रही नई खोजें सामने ला सकते थे। ऑक्टोपस अभी मीडिया में बिकाऊ माल है। उसकी खबर आज भी मीडिया की बेहतरीन खबर है। काश आजतक वाले इस ओर ध्यान देते।
   ऑक्टोपस के बारे में ताजा खबर अंटार्कटिका से आई है। वहां पर ऑक्टोपस का अतीत खोज रहे वैज्ञानिकों को ऑक्टोपस जैसे चार नए जीव मिले हैं। इनमें पहले का नाम है वेनोम। अंटाकर्टिका में मिला ऑक्टोपस टाइप जीव अनेक किस्म के जीवों को खा जाता है। वह सांप से लेकर मछली तक सबको खा जाता है। वेनोम पर वैज्ञानिक संभावित पेनकिलर दवा के कच्चे माल के रूप में अनुसंधान कर रहे हैं। वह नरवस सिस्टम में रहता है अतः उसमें दर्द निवारण दवा के लक्षणों की खोज की जा रही है। वैज्ञानिक यह भी जानने की कोशिश कर रहे हैं कि वेनोम किन चीजों का इस्तेमाल करता है जिससे वह एकदम बर्फीले जाम में भी सक्रिय रहता है। 
(ऑक्टोपस के समानधर्माओं के ताजा फोटोग्राफ) 

रविवार, 4 जुलाई 2010

दस साल बाद जेनोम की दुनिया -अरूण माहेश्वरी


(आधुनिक विज्ञान के दादागुरू डार्विन)
               पूरे दस साल पहले की बात है। 26 जून 2000 के दिन जीव विज्ञान के क्षेत्र में खुशियों की एक लहर दौड़ गयी थी जब यह पता चला था कि मानव जेनोम के पूरे नक्शे को तैयार कर लिया गया है। जेनोम के तीन अरब अक्षरों को क्रमवार सजा कर यह दावा किया गया था कि अब आदमी के जीवन की किताब को पढ़ा जा सकेगा। हालांकि तब इसे किताब का एक मसौदा ही कहा गया था, क्योंकि अभी आगे और बहुत कुछ सामने आना बाकी था। तथापि, सरकारी, गैर–सरकारी – सभी स्तरों पर इस दिशा में वर्षों से चल रहा शोध तब एक मुकाम पर पहुंचा था और अमेरिका में सार्वजनिक क्षेत्र के फ्रांसिस कौलिन्स और निजी क्षेत्र के क्रैग वेंटर, दोनों ने एक साथ ही अपने इस अभूतपूर्व काम के एक बड़े पड़ाव तक पहुंच जाने की घोषणा की थी।

           जिनोम का मतलब है आदमी के शरीर की प्रत्येक कोशिका के अंदर की जेनेटिक सामग्री का समग्र रूप। आदमी के शरीर की प्रत्येक कोशिका में 23 डीएनए मोलिक्यूल अर्थात क्रोमोजोम्स होते हैं जिनमें वे दो क्रोमोजोम्स भी शामिल हैं, जो उसे उसके माता–पिता से मिलते हैं। ऐसे प्रत्येक क्रोमाजोम में तीन अरब रासायनिक इकाइयां (बेस पेयर) होती है। इन रासायनिक इकाइयों के क्रमवार नक्शे को ही जेनोम कहते है। आदमी के शरीर में हर प्रकार का परिवर्तन निश्चित तौर पर इस नक्शे में हेर–फेर का कारण बनता है, इसीलिये मानव जेनोम के पूरे होजाने को मानव जिंदगी के रहस्य तक पहुंचने और इस प्रकार शरीर में हर प्रकार के विकार से निपटने की कुंजी के तौर पर देखा जारहा है। जाहिर है कि इससे चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में तो एक प्रकार का आमूल परिवर्तन आजाने की बात तक की जाती है। 

      बहरहाल, दस वर्ष पहले जब मानव जिनोम का नक्शा पूरा हुआ, उस समय नयी–नयी दवाओं, व्यक्ति–व्यक्ति पर लागू होने वाली खास जेनेटिक दवाओं के क्रांतिकारी उद्भव की जो सारी बातें कही गयी थी और ढेर सारी दवा कंपनियों ने इससे अपने लिये बेशुमार मुनाफे का पहाड़ तैयार करने के जो सपने देखने शुरू किये थे, दस वर्ष बीतते न बीतते बहती गंगा में हाथ धोने की ललक से इस दिशा में कूद पड़ने वाली कई निजी कंपनियां अब तक उसमें डूब कर शांत हो चुकी है। 
             सेलेरा कंपनी ने बड़ी भारी उम्मीदों से डा. वेंटर के जिनोम कार्य के लिये धन जुटा कर दिया था, उसने दो साल बाद, 2002 में डा.वेंटर को ही एक भारी घाटे का सौदा मान कर अपनी कंपनी से निकाल बाहर किया। सेलेरा से निकलने के बाद डा.वेंटर अपनी एक नौका में सारी दुनिया की समूद्री यात्रा पर निकल पड़े थे और ‘विश्व समुद्री नमूना संग्रह अभियान’ के अंतर्गत जगह–जगह के समुद्रों से बैक्टेरिया के नमूने इके करने के अलावा उन्होंने एक शोध संस्थान की स्थापना की, जिस संस्थान में एक महीने पहले ही पहली बार पूरी तरह से कृत्रिम जेनोम के जरिये जीव की रचना संभव हुई है।
        मानव जिनोम का पूरा नक्शा तैयार कर लिये जाने के एक दशक बाद, कृत्रिम जिनोम (सिंथेटिक जिनोम) के जरिये जीव की उत्पत्ति को जेनेटिक शोध के क्षेत्र की एक ऐसी असाधारण उपलब्धि कहा जा रहा है, जिसे जीव विज्ञान में गुणात्मक रूप से एक बिल्कुल नये दौर का प्रारंभ–बिंदु, बल्कि जीव विज्ञान मात्र का दूसरा चरण कहां जा सकता है। 
       दस वर्ष पहले जब मानव जिनोम का नक्शा तैयार हुआ उसके साथ मनुष्य के बारे में कुछ ऐसी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई जिन्होंने सिर्फ‍ जीव विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि समाज विज्ञान, नृतत्वशास्त्र और राजनीति शास्त्र के क्षेत्र में भी कई प्रकार की प्रचलित अवधारणाओं और पूर्वाग्रहों को उलट–पुलट कर रख दिया था। 
      मसलन्, समाज विज्ञान के क्षेत्र में मानवीय जेनोम से यह बात निर्विवाद तौर पर साबित होगयी कि पूरी मानव जाति जिसमें गोरे, काले, भूरे सब रंग के लोग शामिल हैं, जीव विज्ञान की दृष्टि से बिल्कुल एक, और समान है। मनुष्य की अलग–अलग नस्लों की बातें कह कर आदमी आदमी में भेद करने के नस्लवाद के अब तक जो तमाम सिद्धांत गढ़े जाते रहे हैं, वे शैतान दिमागों की कपोल कल्पनाओं से अधिक और कुछ नहीं रहे हैं। मानवीय जिनोम की पहचान के बाद आगे के शोध के ताजा नतीजों से यह बात और भी पुष्ट हुई है कि मनुष्यों में रंग और व्यवहार संबंधी सारी विविधताओं से उनकी जेनेटिक संरचना का कोई संबंध नहीं है। इन विविधताओं का गहरा और बुनियादी संबंध आदमी के परिवेश, मौसम, प्राग–ऐतिहासिक बैक्टीरिया और संस्कृति आदि से है। 
         इस शोध से दूसरी, और भी महत्वपूर्ण बात यह साबित हुई है कि जीव विज्ञान के पूरे मामले में किसी बाहरी, सर्वशक्तिमान के लिये कोई जगह नहीं है। जीव के प्राणों को लेकर भौतिकी और रसायनशास्त्र से इतर, ईश्वरीय शक्ति को लेकर जितने प्रकार की दार्शनिक अटकलपच्चियां की जाती रही है, जेनोम प्रकल्प ने उन्हें पूरी तरह से निराधार और बेतुका साबित कर दिया है। 
         जिस प्रकार टेलिस्कोप ने नक्षत्र विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति की, माइक्रोस्कोप ने जीव विज्ञान में तथा स्पेक्ट्रोस्कोप ने रसायन शास्त्र में उसी प्रकार यह जिनोमिक क्रांति कमप्यूटर की ताकत पर निर्भर है। कमप्यूटर भी तो उसके अंदर की लगातार बदलती भौतिक स्थितियों के कुल योग के अलावा कुछ नहीं है, जिन स्थितियों को कम्प्यूटर के प्रोसेसर के अंदर विद्युत आवेगों की तेजी से बदलती आकृतियों से स्वतंत्र रूप में सूचना विज्ञान नामक ज्ञान की एक शाखा के जरिये प्रत्ययों में कल्पित और प्रसंस्करित किया जा सकता है। 
          नये जीव विज्ञान में किसी भी कोशिका के अंदर के रसायन को हार्डवेयर माना जा रहा है। डीएनए में निहित सूचना उसमें पहले से उपस्थित(प्रीलोडेड) साफ्टवेयर की तरह है। कोशिकाओं के अंदर रसायनों की अंतक्र्रिया प्रोसेसिंग और मेमोरी चिप्स की लगातार परिवर्तनशील स्थितियां है। लेकिन गौर करने लायक बात यह है कि जेनोम के बारे में पूरी समझ का विकास आशा से कहीं ज्यादा जटिल और पेचीदा साबित हुआ है। यद्यपि अब तक की किसी भी खोज ने इसके अलावा और कुछ नहीं बताया है कि किसी भी कोशिका को बनाने के लिये जरूरी सारी सूचनाएं डीएनए में निहित होती है। लेकिन इन सबका योगफल दो और दो चार की तरह सीधा और सरल नहीं है। अलग–अलग हिस्सों के कुल योग की तुलना में उनका इका और समग्र रूप कहीं ज्यादा बड़ा होता है। 
        मसलन्, आदमी की तरह के सबसे उन्नत और जटिल समझे जाने वाले प्राणी की कोशिकाओं में जीन्स की संख्या अन्य प्राणियों की तुलना में बहुत ज्यादा नहीं है। सबसे तुच्छ प्राणी मानी जाने वाली एक किरमी में 18हजार जीन्स पाये जाते हैं जबकि सबसे उन्नत प्राणी मनुष्य में इनकी संख्या 31 हजार के करीब है। संख्या के लिहाज से किरमी की तुलना में बहुत अधिक जीन्स न होने पर भी मानवीय जेनोम के चमत्कारी कार्य की वजह यह है कि ये जीन्स अलग–अलग नहीं बल्कि आपस में मिल कर एक नेटवर्क के रूप में काम करते हैं। अरबों रासायनिक इकाइयों की तरह ही जीन्स की आपसी नेटवर्किंग के अरबों रूप हो सकते हैं। यही वजह है कि जल्दबाजी में इनसे कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना विवेकसंगत नहीं है, जो चट मंगनी पट ब्याह की मानसिकता से रातो–रात दवाओं की नयी पौद तैयार करके जेनेटिक विज्ञान को अपने मुनाफे के लिये तत्काल दुह लेने को आकुल लोगों के रास्ते की बाधा बन गया है। 

        बहरहाल, इतना तो साफ है कि लगातार बढ़ रही कम्प्यूटरों की ताकत के चलते वह दिन दूर नहीं, जब व्यक्ति–व्यक्ति के जिनोम को तैयार करके उसके हर क्रोमोजोम की तीन अरब रसायनिक इकाइयों का तुलनात्मक अध्ययन करना पूरी तरह से संभव होगा और इससे चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में संभावनाओं के अकल्पनीय दरवाजे खुलेंगे। पिछले सिर्फ एक दशक के काल में कमप्यूटर की ताकत 30 गुना से ज्यादा बढ़ी है। इसके चलते अब आगे के जिनोम प्रकल्पों पर तुलनात्मक रूप में बेहद कम खर्च पड़ रहा है। अमेरिका में डीएनए का नक्शा तैयार करने में लगे सबसे बड़े केंद्र ब्रोड इंस्टीट्यूट, कैम्ब्रिज, मैस्चुशेट्स के प्रमुख एरिक लेंडर के अनुसार उनके संस्थान में डीएनए को क्रमवार सजाने का खर्च एक दशक पहले के खर्च की तुलना में लाख हिस्से के बराबर रह गया है। आज यह अनुमान किया जाता है कि आने वाले तीन वर्षों में सिर्फ हजार डालर की लागत पर पंद्रह मिनट में एक मानव जिनोम तैयार हो जायेगा। 
         यह जीव विज्ञान के इस दूसरे चरण की शक्ति का ही परिचय है जिसके चलते मनुष्य से सबसे निकटवर्ती माने जाने वाली प्रजाति, नियेनडर्टल मैन के चालीस हजार साल पुराने डीएनए के लगभग एक अरब तीस लाख हिस्सों को सजा कर उनका नक्शा तैयार कर लिया गया है। जिस दिन लिपजिग के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के स्वाते पाबो ने अमेरिकन एशोसियेशन फार द एडवांस साइंस की एक सभा में यह घोषणा की थी कि नियेनडर्टल मैन का जेनोम तैयार होगया है, यह संयोग की बात है कि 12 फरवरी 2009 का वह दिन युगांतकारी प्राणीविज्ञानी चाल्र्स डार्विन का 200वां जन्मदिन था। नियेनडर्टल मैन से आज के मनुष्य के जेनोम का तुलनात्मक अध्ययन कितना महत्वपूर्ण होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। इससे एक प्रकार से मनुष्य के जेनेटिक विकास के पूरे इतिहास की रचना संभव हो पायेगी। डार्विन के निरीक्षणों, संग्रह, अनुशीलन और सैद्धांतिक परिकल्पनाओं में उनकी समूद्री यात्राओं का बड़ा योगदान माना जाता है। अपनी इन यात्राओं के जरिये ही वे जीवित और लुप्त जातियों के संबंधों, उनके भौगोलिक वितरण आदि के बारे में इतना कुछ जान पाये थे जो विकासवाद के उनके सिद्धांत का कारक बना। इसीप्रकार, आज दुनिया की नजर डा.वेंटर द्वारा तैयार किये गये कृत्रिम जिनोम और इसके साथ ही जगह–जगह से संग्रहीत बैक्टीरिया के नमूनों को लेकर किये जाने वाले परीक्षणों पर है। इन सबसे सिफ‍र् चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में नहीं, पूरे मानव समाज के विकास के बारे में ऐसे चौंकाने वाले नतीजे सामने आयेंगे, जिनकी अभी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मानव समाज की गति–प्रकृति पर नजर रखने के लिये ज्ञान–विज्ञान के क्षेत्र की ऐसी सभी युगांतकारी खोजों के बारे में जागरूक रहना जरूरी है। 
      इस बात का भी ख्याल रखने की जरूरत है कि विश्व–पूंजीवाद के चलते विज्ञान की यह महान उपलब्धि दुनिया में विषमता की खाई को और ज्यादा चौड़ा करने का सबब न बने। जिस प्रकार आज की दुनिया में डिजिटल डिवाइड की बात की जाती है, उसी प्रकार आगे किसी जेनोमिक डिवाइड का खतरा पैदा न होने पायें। 

शनिवार, 30 जनवरी 2010

मुक्ति की गारंटी है जनोन्मुखी विज्ञान




 अंधविश्वास से लड़ने के लिए विज्ञान के बुनियादी क्षेत्रों में अनुसंधान और विज्ञानसम्मत चेतना के निर्माण पर जोर दिया जाना चाहिए। कुछ विज्ञान संगठन हैं जो सचमुच में अंधविश्वास से लड़ना चाहते हैं किंतु इसके लिए ये लोग लोकप्रिय विज्ञान का सहारा लेते हैं। प्रसिध्द वैज्ञानिक जे.डी. बर्नाल के शब्दों में 'लोकप्रिय विज्ञान वास्तविक विज्ञान से उतनी ही दूर की चीज है जितनी लोकप्रिय संगीत, शास्त्रीय संगीत से है।'

इस फर्क के बावजूद लोकप्रिय विज्ञान के जरिए टुकड़ों-टुकड़ों में विज्ञान के परिणामों को आम जनता तक पहुंचाने में मदद मिलती है। या जब इन्हें सनसनीखेज ढंग से पुनर्प्रस्तुत किया जाता है तो भी परिणाम आम लोग जान ही जाते हैं। लेकिन यह टुकड़ों-टुकड़ों में होता है और लोग विज्ञान की विधि और भावना से अपरिचित ही रह जाते हैं।

आज विज्ञान और लोकप्रिय विचारों के बीच आदान-प्रदान टूट चुका है। विज्ञान को लेकर वैसी सघन और प्रशिक्षित गुणग्राहकता कहीं नहीं मिलती जैसी क्रिकेट या फुटबाल मैचों को लेकर देखी जाती है। इसकी व्याख्या केवल वैज्ञानिक आनंद में वित्तीय हितों की कमी या इस विषय की अंतर्निहित कठिनाई के जरिए नहीं की जा सकती।

आम लोग महीनों क्रिकेट की बारीकियों को लेकर चर्चाएं करते रहते हैं यहां तक कि सट्टे में पैसा तक दांव पर लगाते हैं। यदि विज्ञान में लोगों की रुचि होती तो एक बड़ा दिलचस्प खेल दिखाई देता और वह यह कि आम लोग किसी समस्या पर प्रोफेसर 'क' के सिध्दांत पर प्रोफेसर 'ख' के सिध्दांत की अपेक्षा दस और एक का दांव लगाते।

अंधविश्वास को हमारे जनमाध्यम सबसे पहले कवरेज देते हैं। खासकर हिंदी मीडिया की स्थिति तो बेहद खराब है। हिंदी में किसी भी दैनिक मीडिया में विज्ञान के स्थायी पेज या स्तंभ नहीं हैं। न विज्ञान संवाददाता हैं, न विज्ञान संपादक हैं, और न विज्ञान पर लिखने वाले वैज्ञानिक लेखक ही हैं। विज्ञान की यदा-कदा खबरें आती हैं तो लगता है चिप्पियां जोड़कर खबर बनाई गई है। अथवा सनसनीखेज ढंग से विज्ञान खबर प्रकाशित होती है। जनमाध्यमों का विज्ञान के प्रति इस तरह का उपेक्षा भाव जनमाध्यमों की सामाजिक भूमिका पर सवालिया निशान लगाता है।

आमतौर पर यह देखा जाता है वैज्ञानिक खबरों को हिंदी का कोई अखबार छापता ही नहीं या छापता है तो छपी हुई चीजें आती हैं। वे पूरी तरह टुकड़ों-टुकड़ों में होती हैं। लोकप्रिय अखबार किसी खोज के बारे में सिर्फ इसलिए छापते हैं क्योंकि वह चौंकाने वाली लगती है और हमारे स्वीकृत दृष्टिकोण में कुछ उलटफेर करती है। अधिक गंभीर अखबार भी यथार्थत: इससे बेहतर कुछ नहीं करते।

 जब वे विज्ञान संबंधी खबर बनाते हैं तो किसी वैज्ञानिक से एक पैराग्राफ उधार मांग लेते हैं और वह विशेषज्ञ न सिर्फ यह मानकर चलता है कि बाकी लोग भी उसके जितने ही जानकार हैं बल्कि जानकार और गैर-जानकार सारे ही लोग इस नई पहेली का कोई मतलब नहीं निकाल पाते जो विज्ञान नाम की समूची पहेली में आ चिपकी है। ऐसी खबरों में कोई बौध्दिक रुचि लेने के बजाय उन्हें एक सरसरी उत्सुकता के साथ ही, पढ़ा जा सकता है। हमारे लिए इन टुकड़ों में से छांटना, छानना और जोड़ना तब तक और भी कठिन होता है जब तक हम यह न देख सकें कि विज्ञान की विकासमान सीमाओं में इस तरह की खबरें क्या जोड़ती हैं।

अधिकतर लोकप्रिय विज्ञान पत्रिकाएं बेहतर होती हैं किंतु इनमें से अधिकांश हिस्सा आश्चर्यजनक कथाओं और व्यावहारिक गुरों से भरा होता है। इनमें यदाकदा ही गंभीर और सटीक लेख प्रकाशित होते हैं। ऐसा एक भी प्रकाशन नहीं है जिसकी अकेली भूमिका समकालीन आर्थिक और राजनीतिक विकास के संदर्भ में विज्ञान की प्रगति को सहज ग्राह्य रूप में पेश करने की हो। लोकप्रिय विज्ञान पर लिखी पुस्तकों की अवस्था इससे भी खराब है। अंधविश्वास के खिलाफ लड़ने के लिए हमें इस स्थिति को बदलना होगा।

हमें विज्ञान और लोकप्रिय विचारों के बीच आदान-प्रदान पर जोर देना होगा। आज विज्ञान और वैज्ञानिक अलगाव की स्थिति में हैं। अलगाव का आलम यह है कि वैज्ञानिक दूसरी दुनिया का हो गया है।

वैज्ञानिक का सामाजिक अलगाव वस्तुत: विज्ञान के सामाजिक अलगाव का द्योतक है। अपने विषय से इतर वह साधारण व्यक्ति लग सकता है, गोल्फ खेल सकता है, अच्छे किस्से सुना सकता है और एक समर्पित पति और पिता भी हो सकता है, लेकिन उसका विषय उसकी अपनी 'दुकान' है, जो उसे समझने वाले चंद लोगों को छोड़कर उसे पूरी तरह आत्मकेंद्रित बना देती है। साहित्यिक संस्कृति के लोगों में विज्ञान के बारे में कुछ भी न जानने का एक आकर्षण होता है, स्वयं वैज्ञानिक भी इस आकर्षण से बच नहीं पाते। उनके बारे में भी यह बात अन्य विज्ञानों पर लागू होती है।

वैज्ञानिक विषयों पर अच्छी सामान्य बातचीत दुर्लभतम अवसरों में से एक होती है और यदि किसी समूह में वैज्ञानिकों की बहुतायत हो तो भी यह बात लागू होती है।आज स्थिति यह है कि संस्कृति और विज्ञान का अलगाव बढ़ गया है। इस अलगाव की शुरुआत विज्ञान की शिक्षा शुरू होने के बाद हुई। यह एक भारी विरोधाभास है। इसके बाद से ही विज्ञान का शौकिया चरित्रा खत्म हुआ और व्यापक जनता की रुचि भी इसमें से जाती रही। अब खुद से विज्ञान के बारे में सोचने की जरूरत किसी को नहीं है, विज्ञान के क्षेत्रा में अब ऐसे ही लोग मिलते हैं जो बस अपने काम से काम रखते हैं।

अंधविश्वास सिर्फ जनता तक सीमित नहीं हैं बल्कि प्रशासन और राजनीति के क्षेत्रा में भी इसका गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। इसी तरह विज्ञान के प्रति अज्ञान सिर्फ जनता तक सीमित नहीं है बल्कि प्रशासन और राजनीति तक इसका क्षेत्रा फैला हुआ है। यह अचानक नहीं है कि लोकचेतना, राजनीति और प्रशासन में विज्ञान इतना तिरस्कृत है।

विज्ञान के प्रति हमारा मौजूदा रवैया हमारी मौजूदा सामाजिक व्यवस्था का अनिवार्य और मौलिक अंग है। समाज की मौजूदा जरूरतें अपनी संतुष्टि के लिए विज्ञान को जाग्रत रखना चाहती हैं, लिहाजा ये जरूरतें कुछ भी हों, कुछ विज्ञान इनके लिए जरूरी है। लेकिन इन जरूरतों की पूर्ति के लिए आया विज्ञान नई जरूरतें पैदा करता है और पुरानी जरूरतों की आलोचना करता है। ऐसा करते हुए समाज में सुधार करने में उससे भी कहीं ज्यादा और भिन्न भूमिका अदा करने लगता है। यही कारण है कि शासक वर्ग यह कोशिश करता है कि विज्ञान और वैज्ञानिक दोनों को सामाजिक अलगाव की अवस्था में रखा जाए और विज्ञान को एक उपयोगी नौकर की तरह इस्तेमाल किया जाए।

विज्ञान का यदि सामाजिक अलगाव खत्म हो जाएगा तो वह सामाजिक परिवर्तन का अस्त्र बन जाएगा, मालिक बन जाएगा। यही वजह है कि वैज्ञानिकों को अपने-अपने पेशों में मगन रहने दिया जाता है। समाज में जिन लोगों का वर्चस्व है वे नहीं चाहते कि विज्ञान आम लोगों तक पहुंचे और आम जनता विज्ञानसम्मत चेतना से संपन्न बने। विज्ञानसम्मत चेतना के माध्यम से ही आम लोगों में आलोचनात्मक ढंग से सोचने और देखने का नजरिया विकसित होता है। जो नजरिया सिर्फ आलोचनात्मक हो और विज्ञानसम्मत न हो तो उसमें अंधविश्वासों को अपदस्थ करने की क्षमता नहीं होती।

विज्ञान को जनप्रिय बनाने के काम में सबसे बड़ी बाधा है धन की। आज अंधविश्वास के कार्यों के लिए जिस तरह बेशुमार धन उपलब्ध है उसकी तुलना में विज्ञान के अनुसंधान कार्यों के लिए धन उपलब्ध नहीं है। राज्य और निजी क्षेत्रा दोनों ही की तरफ से विज्ञान के बुनियादी अनुसंधान के लिए सकल घरेलू उत्पाद का एक फीसदी हिस्सा भी खर्च नहीं होता। जो कुछ खर्च होता है उस पर बाजार की शक्तियों की नजर लगी हुई है।

इसके अलावा फासीवादी ताकतें विज्ञान का अपने हितों और राजनीतिक विस्तार के लिए इस्तेमाल करना चाहती हैं। वे इसका युध्द सामग्री के निर्माण के लिए इस्तेमाल करने के पक्ष में सक्रिय हैं। वहीं दूसरी ओर आम जनता में पौराणिक मिथों, कथाओं और रहस्यवादी अतार्किकता का जमकर प्रचार कर रही हैं। यहां तक कि गणेश दूध पी रहे हैं जैसे चमत्कारों का प्रचार करते रहे हैं। बहुत सारे संत-महंत अपने जादुई चमत्कारों के नाम पर जादूगरी के करतबों और विज्ञान के नुस्खों का प्रयोग कर रहे हैं और आम जनता में अंधविश्वास फैला रहे हैं।

फासीवादी ताकतें पोंगापंथी बातों का दृढ़ सत्यों के साथ घालमेल कर रही हैं। आज यह प्रचार किया जा रहा है कि हिंदू जन्मना श्रेष्ठ होते हैं, उनमें सिर्फ अनुशासन की कमी है यदि वे अनुशासित हो जाएं, कद काठी मजबूत कर लें और संघर्ष के लिए तैयार हो जाएं तो वे अपनी नियति बदल सकते हैं, भारत पर राज कर सकते हैं और सारी दुनिया फिर उनका लोहा मानने के लिए मजबूर होगी। इस तरह के विचारों का विज्ञानसम्मत ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है। बल्कि इस तरह की बातें अंधविश्वास का हिस्सा हैं।

फासीवादी दृष्टिकोण भारतीय परंपरा में हिंदुओं के अलावा किसी अन्य समुदाय के योगदान को स्वीकार ही नहीं करता और बार-बार यह प्रचार किया जा रहा है कि भारतीय परंपरा में मुसलमानों की विध्वंसक भूमिका रही है। वे लुटेरे और हमलावर रहे हैं। इस तरह के तर्क भारतीय संगीत, दर्शन, स्थापत्य, विज्ञान, समाजविज्ञान, राजनीति, ललित कला आदि के क्षेत्रों में मुसलमानों के योगदान को एकसिरे से खारिज करते हैं और परंपरा के बारे में अंधविश्वास का फासीवादी प्रपंच निर्मित करते हैं।

ये लोग विज्ञान के फौजी इस्तेमाल के पक्ष में हैं किंतु सामाजिक जीवन में विज्ञानसम्मत चेतना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के सख्त खिलाफ हैं। सामाजिक जीवन में पोंगापंथ, दंतकथाएं, विज्ञान विरोधी बातें और अंधविश्वास इन्हें पसंद है। आज ये ही ताकतें अंधविश्वास का सबसे ज्यादा प्रचार कर रही हैं। इससे इन्हें अपना सामाजिक-राजनीतिक आधार बढ़ाने में मदद मिली है। इस सबको देखते हुए और भी जरूरी है कि अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष को ज्यादा व्यापक पैमाने पर चलाया जाए।




मंगलवार, 5 जनवरी 2010

सांस्कृतिक गुलामी की हसीन रातें

   हाल ही में राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस के अवसर पर प्रसिध्द वैज्ञानिक और इसरो के भू.पू, अध्यक्ष जी.माधवन नायर ने कहा विज्ञान की खोजों को भारतीय भाषाओं में लाने का प्रयास किया जाना चाहिए। भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी के समानार्थी शब्द बनाए जाएं। जिससे विज्ञान को साधारण जनता तक पहुँचाया जा सके।
 माधवन नायर जी विज्ञान के पठन-पाठन और लेखन का सिस्टम अवैज्ञानिक आधार पर टिका है। भारतीय भाषाओं के माध्यम से न तो विज्ञान पढाया जाता है और नहीं हमारे आज के वैज्ञानिक किसी भारतीय भाषा में लिखते और सोचते हैं। जब तक वैज्ञानिक अपनी मातृभाषा में नहीं लिखेंगे तब तक भारतीय भाषाओं में साधारण जनता तक विज्ञान का जाना संभव नहीं है।देशजभाषा में शब्द भी नहीं बनेंगे। भाषा के शब्द प्रयोग और व्यवहार से बनते हैं। भाषा का निर्माण कोरे खयालों से नहीं होता।    
     हमें इस सवाल पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए कि आखिरकार हमारा वैज्ञानिक अथवा शिक्षित मध्यवर्ग अपनी भाषा से क्यों कट गया ? अभिव्यक्ति के लिए अपनी भाषा से वंचित होने का अर्थ है सांस्कृतिक गुलामी में हसीन रातें गुजारना। हमारे शिक्षित मध्यवर्ग को सांस्कृतिक गुलामी से प्यार है। वह अपनी भाषा ,अपनी संस्कृति और अपने देशज गौरव और परंपरा से प्यार ही नहीं करता। हम तलाश करें कि आखिरकार अमर्त्य सेन, प्रभात पटनायक, मनमोहन सिंह आदि विद्वान अपनी भाषा में क्यों नहीं लिख पाते ? अपनी भाषा से हमारे बौध्दिकों का अलगाव सबसे बड़ी त्रासदी है। यह सांस्कृतिक गुलामी है। यह देशप्रेम नहीं राष्ट्र के प्रति दगाबाजी है।       

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...