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गुरुवार, 12 मई 2016

गालिब के रंग-

             
ग़ालिब सदा किराये के मकानों में रहे, अपना मकान न बनवा सके। ऐसा मकान ज़्यादा पसंद करते थे, जिसमें बैठकख़ाना और अन्त:पुर अलग-अलग हों और उनके दरवाज़े भी अलग हों, जिससे यार-दोस्त बेझिझक आ-जा सकें।
5 अक्टूबर को (18 सितम्बर को दिल्ली पर अंग्रेज़ों का दुबारा से अधिकार हो गया था) कुछ गोरे, सिपाहियों के मना करने पर भी, दीवार फाँदकर मिर्ज़ा के मुहल्ले में आ गए और मिर्ज़ा के घर में घुसे। उन्होंने माल-असबाब को हाथ नहीं लगाया, पर मिर्ज़ा, आरिफ़ के दो बच्चों और चन्द लोगों को पकड़कर ले गए और कुतुबउद्दीन सौदागर की हवेली में कर्नल ब्राउन के सामने पेश किया। उनकी हास्यप्रियता और एक मित्र की सिफ़ारिश ने रक्षा की। बात यह हुई जब गोरे मिर्ज़ा को गिरफ़्तार करके ले गए, तो अंग्रेज़ सार्जेण्ट ने इनकी अनोखी सज-धज देखकर पूछा-‘क्या तुम मुसलमान हो?’ मिर्ज़ा ने हँसकर जवाब दिया कि, ‘मुसलमान तो हूँ पर आधा।’ वह इनके जवाब से चकित हुआ। पूछा-‘आधा मुसलमान हो, कैसे?’ मिर्ज़ा बोले, ‘साहब, शरीब पीता हूँ; हेम (सूअर) नहीं खाता।’



जब कर्नल के सामने पेश किए गए, तो इन्होंने महारानी विक्टोरिया से अपने पत्र-व्यवहार की बात बताई और अपनी वफ़ादारी का विश्वास दिलाया। कर्नल ने पूछा, ‘तुम दिल्ली की लड़ाई के समय पहाड़ी पर क्यों नहीं आये, जहाँ अंग्रेज़ी फ़ौज़ें और उनके मददगार जमा हो रहे थे?’ मिर्ज़ा ने कहा, ‘तिलंगे दरवाज़े से बाहर आदमी को निकलने नहीं देते थे। मैं क्यों कर आता? अगर कोई फ़रेब करके, कोई बात करके निकल जाता, जब पहाड़ी के क़रीब गोली की रेंज में पहुँचता तो पहरे वाला गोली मार देता। यह भी माना की तिलंगे बाहर जाने देते, गोरा पहरेदार भी गोली न मारता पर मेरी सूरत देखिए और मेरा हाल मालूम कीजिए। बूढ़ा हूँ, पाँव से अपाहिज, कानों से बहरा, न लड़ाई के लायक़, न मश्विरत के क़ाबिल। हाँ, दुआ करता हूँ सो वहाँ भी दुआ करता रहा।’ कर्नल साहब हँसे और मिर्ज़ा को उनके नौकरों और घरवालों के साथ घर जाने की इजाज़त दे दी।

1857 के ग़दर के अनेक चित्र मिर्ज़ा 'ग़ालिब' के पत्रों में तथा इनकी पुस्तक ‘दस्तंबू’ में मिलते हैं। इस समय इनकी मनोवृत्ति अस्थिर थी। वह निर्णय नहीं कर पाते थे कि किस पक्ष में रहें। सोचते थे कि पता नहीं ऊँट किस करवट बैठे? इसीलिए क़िले से भी थोड़ा सम्बन्ध बनाये रखते थे। ‘दस्तंबू’ में उन घटनाओं का ज़िक्र है जो ग़दर के समय इनके आगे गुज़री थीं। उधर फ़साद शुरू होते ही मिर्ज़ा की बीबी ने उनसे बिना पूछे अपने सारे ज़ेवर और क़ीमती कपड़े मियाँ काले साहब के मकान पर भेज दिए ताकि वहाँ सुरक्षित रहेंगे। पर बात उलटी हुई। काले साहब का मकान भी लुटा और उसके साथ ही ग़ालिब का सामान भी लुट गया। चूँकि इस समय राज मुसलमानों का था, इसीलिए अंग्रेज़ों ने दिल्ली विजय के बाद उन पर विशेष ध्यान दिया और उनको ख़ूब सताया। बहुत से लोग प्राण-भय से भाग गए। इनमें मिर्ज़ा के भी अनेक मित्र थे। इसीलिए ग़दर के दिनों में उनकी हालत बहुत ख़राब हो गई। घर से बाहर बहुत कम निकलते थे। खाने-पीने की भी मुश्किल थी। ऐसे वक़्त उनके कई हिन्दू मित्रों ने उनकी मदद की। मुंशी हरगोपाल ‘तुफ़्ता’ मेरठ से बराबर रुपये भेजते रहे, लाला महेशदास इनकी मदिरा का प्रबन्ध करते रहे। मुंशी हीरा सिंह दर्द, पं. शिवराम एवं उनके पुत्र बालमुकुन्द ने भी इनकी मदद की। मिर्ज़ा ने अपने पत्रों में इनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की है।

जब असदउल्ला ख़ाँ 'ग़ालिब' सिर्फ़ 13 वर्ष के थे, इनका विवाह लोहारू के नवाब 'अहमदबख़्श ख़ाँ' (जिनकी बहन से इनके चचा का ब्याह हुआ था) के छोटे भाई 'मिर्ज़ा इलाहीबख़्श ख़ाँ ‘मारूफ़’ की बेटी 'उमराव बेगम' के साथ 9 अगस्त, 1810 ई. को सम्पन्न हुआ था। उमराव बेगम 11 वर्ष की थीं। इस तरह लोहारू राजवंश से इनका सम्बन्ध और दृढ़ हो गया। पहले भी वह बीच-बीच में दिल्ली जाते रहते थे, पर शादी के 2-3 वर्ष बाद तो दिल्ली के ही हो गए। वह स्वयं ‘उर्दू-ए-मोअल्ला’ (इनका एक ख़त) में इस घटना का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं कि-

"7 रज्जब 1225 हिजरी को मेरे वास्ते हुक्म दवा में हब्स[ सादिर[ हुआ। एक बेड़ी (यानी बीवी) मेरे पाँव में डाल दी और दिल्ली शहर को ज़िन्दान मुक़र्रर किया और मुझे इस ज़िन्दाँ में डाल दिया।"

मुल्ला अब्दुस्समद 1810-1811 ई. में अकबराबाद आए थे और दो वर्ष के शिक्षण के बाद असदउल्ला ख़ाँ (ग़ालिब) उन्हीं के साथ आगरा से दिल्ली गए। दिल्ली में यद्यपि वह अलग घर लेकर रहे, पर इतना तो निश्चित है कि ससुराल की तुलना में इनकी अपनी सामाजिक स्थिति बहुत हलकी थी। इनके ससुर इलाहीबख़्श ख़ाँ को राजकुमारों का ऐश्वर्य प्राप्त था। यौवन काल में इलाहीबख़्श की जीवन विधि को देखकर लोग उन्हें ‘शहज़ाद-ए-गुलफ़ाम’ कहा करते थे। इससे अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि, उनकी बेटी का पालन-पोषण किस लाड़-प्यार के साथ हुआ होगा। असदउल्ला ख़ाँ (ग़ालिब) शक्ल और सूरत से बड़ा आकर्षक व्यक्तित्व रखते थे। उनके पिता-दादा फ़ौज में उच्चाधिकारी रह चुके थे। इसीलिए ससुर को आशा रही होगी कि, असदउल्ला ख़ाँ भी आला रुतबे तक पहुँचेंगे एवं बेटी ससुराल में सुखी रहेगी, पर ऐसा हो न सका। आख़िर तक यह शेरो-शायरी में ही पड़े रहे और उमराव बेगम, पिता के घर बाहुल्य के बीच पली लड़की को ससुराल में सब सुख सपने जैसे हो गए।

ग़ालिब अथवा मिर्ज़ा असदउल्ला बेग़ ख़ान (अंग्रेज़ी:Ghalib अथवा Mirza Asadullah Baig Khan, उर्दू: غالب अथवा مرزا اسدللا بےغ خان) (जन्म- 27 दिसम्बर, 1797 ई. आगरा - 15 फ़रवरी, 1869 ई. दिल्ली) जिन्हें सारी दुनिया 'मिर्ज़ा ग़ालिब' के नाम से जानती है, उर्दू-फ़ारसी के प्रख्यात कवि रहे हैं। इनके दादा 'मिर्ज़ा क़ौक़न बेग ख़ाँ' समरकन्द से भारत आए थे। बाद में वे लाहौर में 'मुइनउल मुल्क' के यहाँ नौकर के रूप में कार्य करने लगे। मिर्ज़ा क़ौक़न बेग ख़ाँ के बड़े बेटे 'अब्दुल्ला बेग ख़ाँ से मिर्ज़ा ग़ालिब हुए। अब्दुल्ला बेग ख़ाँ, नवाब आसफ़उद्दौला की फ़ौज में शामिल हुए और फिर हैदराबाद से होते हुए अलवर के राजा 'बख़्तावर सिंह' के यहाँ लग गए। लेकिन जब मिर्ज़ा ग़ालिब महज 5 वर्ष के थे, तब एक लड़ाई में उनके पिता शहीद हो गए। मिर्ज़ा ग़ालिब को तब उनके चचा जान 'नसरुउल्ला बेग ख़ान' ने संभाला। पर ग़ालिब के बचपन में अभी और दुःख व तकलीफें शामिल होनी बाकी थीं। जब वे 9 साल के थे, तब चचा जान भी चल बसे। मिर्ज़ा ग़ालिब का सम्पूर्ण जीवन ही दु:खों से भरा हुआ था। आर्थिक तंगी ने कभी भी इनका पीछा नहीं छोड़ा था। क़र्ज़ में हमेशा घिरे रहे, लेकिन अपनी शानो-शौक़त में कभी कमी नहीं आने देते थे। इनके सात बच्चों में से एक भी जीवित नहीं रहा। जिस पेंशन के सहारे इन्हें व इनके घर को एक सहारा प्राप्त था, वह भी बन्द कर दी गई थी।





मंगलवार, 17 नवंबर 2015

स्वतंत्रता और विवेकवाद के नायक स्वामी विरजानंद सरस्वती


          स्वामी विरजानंद सरस्वती का भारत के स्वाधीनता संग्राम में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। खासकर19वीं सदी में हिन्दीभाषी क्षेत्र में जिनलोगों ने आम जनता में विवेकवाद की मशाल जलाए रखी उनमें स्वामीजी प्रमुख हैं। स्वामीजी की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे अवतारवाद और मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करते थे। वे दशनामी संन्यासी थे और उनका शंकराचार्य द्वारा स्थापित संन्यासी सम्प्रदाय से संबंध था। उनके गुरु पूर्णानंद भी शंकर के मतावलम्बी थे। वे वेदान्त के प्रगतिशील अग्रदूतों में गिने जाते हैं।

सन्1857 के स्वाधीनता संग्राम में स्वामी विरजानंद सरस्वती की महत्वपूर्ण भूमिका थी,मथुरा –हरिद्वार और आसपास के इलाकों की पंचायतों के जरिए स्थानीय लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ गोलबन्द करने में उनकी केन्द्रीय भूमिका थी। दिलचस्प बात यह है कि स्वामी विरजानंद के गुरु पूर्णानंद,उनके गुरु स्वामी ओमानंद भी 1857 के संग्राम में शरीक हुए। असल में स्वामी ओमानंद और स्वामी पूर्णानंद ने 1857 के संग्राम में भाग लेने का ब्लूप्रिंट तैयार किया और स्वामी विरजानंद ने उसे लागू किया। दिलचस्प बात यह है कि 1857 में स्वामी ओमानंद 160 साल के थे और स्वामी पूर्णानंद 110साल के थे और स्वामी विरजानंद उस समय लगभग 79वर्ष के थे।यह वह दौर था जब मथुरा और उसके आसपास के इलाकों में जबर्दस्त वैचारिक संघर्ष चल रहा था जिसका मथुरा और हिन्दीभाषी क्षेत्र की विवेकवादी परंपरा के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है। मसलन्, सन्1845 के आसपास मौलवी इस्माइल ने “रद्दे हनूद”( हिंदूमत का खंडन) किताब लिखी,चौबे बद्रीदास ने “रद्दे मुसलमान”(मुस्लिम मत का खंडन) लिखी।सन्1856 में अब्दुल्ला ने “तोहद-तुल हिंद” (भारत की सौगात)लिखी।इस किताब में हिंदू देवी-देवताओं की आलोचना की गयी है।इंद्रमणि ने इसके उत्तर में “तोहफुलइस्लाम” (इस्लाम का उपहार) लिखी।इस धारा से भिन्न विरजानंद सरस्वती की परंपरा थी जिसमें हिन्दुओं-मुसलमानों की एकता पर जोर दिया गया था।

स्वामी विरजानंद सरस्वती की बचपन में शीतला के कारण एक ऑख चली गयी,लड़कपन में उनके माता-पिता न रहे। उनकी भौजाई उन्हें बहुत सताती थीं।आखिरकार तंग आकर वे घर (कर्तारपुर,पंजाब)से हरिद्वार की ओर चले गए।उस समय वे मात्र बारह वर्ष के थे। यहीं पर उन्होंने संस्कृत व्याकरण का असाधारण ज्ञान प्राप्त किया। उनके शिष्यों में अन्यतम हैं दयानंद सरस्वती। स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने पूना प्रवचन के दौरान अपने गुरु के बारे में कहा था कि “ वे दोनों आँखों से अँधे थे और उन्हें वेदशूल का रोग था।” .. “ उनकी वेद शास्त्रादि ग्रंथों में रुचि थी” , “भागवतादि पुराणों का वे तिरस्कार करते थे”, कल्पना करें मथुरा में रहकर भागवत का तिरस्कार करना कितना बड़ा जोखिम था।

सन् 1856 में मथुरा के पास जंगल में पंचायत हुई। उसमें मीर मुश्ताक मिरासी नाम के सज्जन उपस्थित थे। उन्होंने उर्दू में उस पंचायत का हाल लिखा है और उसमें विरजानंद के भाषण का सारांश दिया है।यह एक तथ्य है कि 1857 के संग्राम की तैयारी में अन्य लोगों के अलावा साधु-संतों-फकीरों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। मीर मुश्ताक ने लिखा है, “ जब महात्मा विरजानंद को पालकी में बिठा कर लाया गया उस वक्त हिंदू-मुसलमान फ़कीरों ने उनकी खुशी में शंख,घड़नावल,नागफणी,निकाडा,तुरही,नरसिंघे बजाए थे और खुदापरस्ती और वतनपरस्ती के गीत गाए थे।यह नावीना साधु गैर-इल्म के समझने की ताकत रखता था और खुदा का जलवे-जुलाल इसकी ज़बान से ज़ाहिर होता था।मैंने भी अपनी रुह के तक़ाजे के मुताबिक़ 5फूल इनके सामने पेश किए और उनकी कदमबोसी की और खुदा से दुआ माँगी कि खुदा,ऐसी नेक रुहों को ख़लक़त की भलाई के लिए हमेशा पैदा कीजिए।” यह पंचायत चार दिन चली। एक दिन आदम से लेकर हजरत मोहम्मद तक “सवाने अमरी” सुनाई गई। एक दिन राम,कृष्ण,बुद्ध,महावीर आदि पर भाषण हुए।और एक दिन स्वामी विरजानंद और साईं मियाँ महमूदन शाह के व्याख्यान हुए। इस सभा में नाना साहब,अजीमुल्ला और बहादुर शाह के पुत्र एक पुत्र भी मौजूद थे। स्वामी विरजानंद सरस्वती ने इस सभा में जो कुछ कहा उसका सारांश मीर मुश्ताक़ मिरासी ने पेश किया है। यह भाषण एक ऐतिहासिक दस्तावेज है।

स्वामी विरजानंद सरस्वती ने कहा, “ आज़ादी जन्नत है और गुलामी दोज़ख है।अपने मुल्क की हुकूमत ग़ैरमुल्क की हुकूमत के मुकाबले में हज़ार दर्जे बेहतर है। दूसरों की गुलामी हमेशा बेइज्जती और बेशरमी का बायस है।हमें किसी कौम से और किसी मुल्क से कोई नफ़रत नहीं है। हम तो ख़लके –खुदा बहबूदे के लिए खुदा से रोज़ दुआ माँगते हैं मगर हुकमराह कौम ख़ासकर फिरंगी जिस मुल्क में हकुमत करते हैं उस मुल्क के बाशिंदों के साथ इन्सानियत का बरताव नहीं करते और कितनी ही अच्छाई की तारीफ करें मगर उस मुल्क के बाशिंदों के साथ मवेशियों से गिरा हुआ बरताव करते हैं। खुदा की खलकत में सब इन्सान भाई-भाई हैं मगर ग़ैर-मुल्की हुकमराह क़ौम इन्हें भाई न समझ कर गुलाम समझती है। किसी भी मज़हब की किताब में ऐसा हुक्म नहीं है कि अश् रफुल्मख़लूकात के साथ दग़ा की जावे और अल्लाह के हुक्म के खिलाफवरजी की जावे। इस वास्ते मातहत लोगों का न कोई ईमान है न कोई शान है। फिरंगियों में बहुत-सी अच्छी बात है मगर सियासी मसले में आकर वह अपने कौल-फेल को न समझकर फौरन बदल जाते हैं और अच्छाई और नेक सलाह को फौरन ठुकरा देते हैं। इस(की) असिल वजूहात यह है कि हमारे मुल्क को वह अपना वतन नहीं समझते हैं। हमारे मुल्क का बच्चा-बच्चा उनकी ख़ैरख़वाही का दम भरे फिर भी अपने वतन के कुत्ते को इन्सानों से अच्छा समझते हैं। यह सब कर्मा (?) का बायस है, इन्हें अपने ही वतन से मोहब्बत है,इसलिए मैं सब बाशिंदगान हिंद से इलतजा करता हूँ कि जितना वह अपने मज़हब से मुहब्बत करते हैं उतना ही इस मुल्क के हर इन्सान का फ़र्ज़ है कि वह वतनपरस्त बने और मुल्क के हर बाशिंदे को भाई-भाई जैसी मोहब्बत करे,तब तुम्हारे दिलों के अंदर वतनपरस्ती आ जाएगी,तो इस मुल्क की गुलामी यहाँ से खुद-ब-खुद जुदा हो जाएगी।हिंद के रहने वाले सब आपस में हिंदी भाई हैं और बहादुरशाह हमारा शाहंशाह है।” यह समूचा प्रसंग विश्लेषित करते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है कि इस “भाषण में कहीं पर भी अँग्रेजों को काफिर या म्लेच्छ कहकर उनके विरुद्ध मज़हबी जोश उभारने का प्रयत्न नहीं है।एशियाइयों और खासकर ‘हिंदुस्तान’ के ‘काले’ आदमियों के प्रति अँग्रेज जब-तब नस्लपंथी घृणा प्रकट करते रहते थे,उसकी प्रतिक्रियास्वरुप गोरों के प्रति घृणा का भाव नहीं है।सारी बातें विदेशियों की दासता से मुक्त करने की भावना से प्रेरित हैं।परोक्ष रुप से वक्ता के मन में विश्वबंधुत्व और सर्वमानवता के हित के भाव विद्यमान हैं।”








गुरुवार, 19 मई 2011

1857 के एलाननामे और हुक्मनामे -इंकबाल हुसैन



1857 की जंगे-आजादी का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि यह जंग हथियारों के अलावा एलाननामों और हुक्मनामों के द्वारा भी लड़ी गई थी, जो स्वतंत्रता सेनानियों ने उर्दू और हिंदी भाषा में प्रकाशित किए थे। यह जंग भारतीय फौजों ने शुरू की थी, बाद में उनके साथ अवाम और खवास विभिन्न कारणों से सभी शामिल हो गए थे। स्वतंत्रता संग्रामियों ने आम भारतीयों के अंदर राष्ट्रीय और धार्मिक एकता पैदा करने के लिए आवश्यकतानुसार बहुत सारे एलाननामे जारी किए थे। अफसोस है कि एलाननामों की मूल कापियां नहीं के बराबर मिलती हैं। 1858 तक ये मौजूद थीं जिन्हें अंगरेज हुकूमत ने स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ किए मुकदमों में सबूत के तौर पर अंगरेजी में अनुवाद करवा कर पेश किया था जो राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली, इलाहाबाद, यूपी में सुरक्षित हैं। मैंने गोरखपुर के सैयद हामिद अली साहब के पुस्तकालय में मौजूद एलाननामों की मूल कापियां प्राप्त की हैं। इनमें अधिकतर उर्दू में हैंतीन एलाननामे उर्दू और हिंदी और कई फारसी में हैं। इन एलाननामों को हम तीन विभिन्न दौर में बांट सकते हैं। पहले दौर के एलाननामों में जोशो-वलवला के साथ जनता को संबोधित किया गया है, अंगरेजों की बुराइयां बताई गई हैं और हिंदू-मुसलिम एकता का महत्व बताया गया है। दूसरे दौर के एलाननामों में हिंदू-मुसलिम की एकता पर जोर, एक दूसरे के धर्म की रक्षा, अंगरेजों का पूर्ण सफाया, नई हुकूमत के बनने के बाद अच्छी व्यवस्था, धर्म की आजादी, बेहतर खेती-बाड़ी और आर्थिक बंदोबस्त आदि के वादे हैं। तीसरे दौर के एलाननामों से मालूम होता है कि स्वतंत्रता सेनानी बचाव के लिए जंग लड़ रहे थे। इनमें अवाम-खवास सबसे अपील की गई है कि वह दिलोजान से अंगरेजों के विरोध में एकजुट हों। जंग में विशेष सफलता पाने वालों को पुरस्कार देने के वादे भी किए गए हैं। भारतीयों को इस बात से भी खबरदार कराया गया है कि अगर अंगरेज दोबारा सत्ता में आ गए तो भारतीयों का क्या हाल होगा। 

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अधिकतर एलाननामे उर्दू में हैं। अगर हम उन्नीसवीं सदी के मध्य में प्रकाशित होने वाले अखबारों का जायजा लें तो मालूम होगा कि उनमें से ज्यादातर हिंदुस्तानी भाषा और फारसी लिपि में छप रहे थे। अब उसे उर्दू जबान के नाम से जानी-पहचानी जाती है। ये उर्दू के अखबारों के मालिक ज्यादातर हिंदू थे, वही उनके संपादक और प्रकाशक थे। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उस वक्त उर्दू भाषा एक मिली-जुली राष्ट्रीय भाषा की हैसियत से अपनी जगह बना चुकी थी जिसकी उन्नति में हिंदू और मुसलमान बराबर के भागीदार थे। 1857-58 के स्वतंत्रता सेनानियों के द्वारा जारी किए गए एलाननामों से इसकी और जानकारी मिलती है। पहली जंगे-आजादी के एलाननामों से न केवल स्वतंत्रता सेनानियों की भावनाओं का पता लगता है बल्कि हमें समस्याओं का भी पता चलता है कि वे इतनी बड़ी जंग में क्यों कूद पड़े थे, उन्होंने जनता से क्या-क्या वादे किए थे और वे अंगरेजों के चंगुल से आजाद कराने के बाद देश को किस प्रकार चलाना चाहते थे। एलाननामों से यह भी मालूम होता है कि स्वतंत्रता सेनानी जिनमें अंगरेजी फौज के बागी सिपाही थे, अंगरेजों के आर्थिक शोषण, रंग-भेद, असामान्य टैक्स, खेती-बाड़ी पॉलिसी, बेरोजगारी और भारतीय कल-कारखानों के सर्वग्रासी विनाश को पिछली एक सदी से बर्दाश्त करते चले आ रहे थे। इस गरीबी के बावजूद वे शांत थे और सब्र कर रहे थे। लेकिन उनके सब्र का पैमाना उस वक्त टूट गया जब अंगरेजी शासन के प्रोत्साहन में ईसाई मिशनरीज द्वारा धर्मांतरण का प्रयास किया गया। यह एक ऐसा कारण था जिसने उन वफादार फौजियों को भी अंगरेजों के खिलाफ हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया, जो भारत में अंगरेजी शासन के उद्भव और विकास में एक सदी से लगे हुए थे। 10 मई 1857 को मेरठ में बंगावत का आरंभ करके फौजियों की टोली दिल्ली पहुंची और 11 मई 1857 को उनका पहला एलाननामा पेश किया गया, 'सब हिंदू-मुसलमान, रिआया और मुलाजिम हिंदुस्तानियों को अफसरान फौजें-अंगरेजी मुकीम दिल्ली और मेरठ की तरफ दरयाफ्त होवें कि अब सब फिरंगियों (अंगरेज) ने ऐसा किया है कि अव्वल सब फौज हिंदुस्तानी को बेधर्म करके फिर सब रिआया को बजोरे-तदब्बुर क्रिस्टान (ईसाई) कर लें चुनांचे हम सबने फकत दीन (धर्म) के वास्ते मय-रिआया के इत्तिफाक करके एक-एक काफिर (अंगरेजों) को जिंदा न छोड़ा और बादशाहते-दिल्ली इस अहद पर कायम है कि फौज कंपनी के फिरंगियों को कत्ल करे।

ये एलाननामा बंगाल आर्मी के फौजियों ने जारी किया था जिसमें अधिकतम ऊंची जाति के हिंदू थे। इसमें यह भी कहा गया था, 'अब लाजिम यह है कि जिसको क्रिस्टान होना दुश्वार होवे, रिआया और फौज हर मकाम की एकदम होकर हिम्मत करे और तुख्म इन काफिरों (अंगरेजों) का बाकी न रखें।'

एलाननामे में हिंदू और मुसलमानों के मजहब की रक्षा और अंगरेजों के खिलाफ नफरत और गुस्सा यूं ही नहीं था। उस समय के एक पादरी शेयरिंग के खयाल देखें, 'तमाम मुल्क मिशनरीज की सरगर्मियों से सख्त खौफजदा हो चुका था। हिंदू अपने धर्म और मुसलमान अपने मजहब के लिए परेशान थे।'

यहां यह बात गौर करने की है कि एलाननामे में अंगरेजों को काफिर बताया गया है। महाराजा पेशवा नाना साहब, रानी झांसी, खान बहादुर खान, बिरजिस कदर, बहादुरशाह, शाहजादा फिरोज शाह और मौलवी लियाकत अली के एलाननामों में सभी अंगरेजों को नसारा (ईसाई) और काफिर ही कहा गया है। नाना साहब ने ये भी लिखा है, 'काफिर अंगरेजों ने इस हद तक मजलिम, बदमाशियां, नाइनसाफियां की हैं जिनकी वजह से ईश्वर ने इन काफिरों को सजा देने और उखाड़ फेंकने और हिंदू-मुसलमान शासन को दोबारा कायम करने के लिए, मुल्क के तहफ्फज (रक्षा) के लिए मुझे मुअय्यन (तय) किया है।'

एलाननामों के अंदाज से यह समझा जा सकता है कि सेनानी हिंदू धर्म और इसलाम की रक्षा को बहुत आवश्यक समझ रहे थे। इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए उन्होंने धर्मयुध्द छेड़ दिया था। और उस वक्त एक आम राय यह भी थी कि धर्म तो सिर्फ दो ही हैं, 'धर्म तो दूई हैं, हिंदू का धर्म और मुसलमान का ईमान।'|

स्वतंत्रता सेनानी हिंदू धर्मों के बारे में जो भावना रखते थे वह उनके इस नारे से भी समझा जा सकता है, 'एक पिता के दुई पुत्र, एक हिंदू एक तुर्कउनका चोली-दामन का साथ।' दुर्गा दास बंदोपाध्याय अंगरेजी फौज में मुलाजिम थे। वह एक नारे का वर्णन करते हैं जिसे सेनानियों ने बरेली में लगाया था, 'हिंदू-मुसलमान एक, राम-रहीम एक, श्रीकृष्ण-अल्लाह एक।'~ यह धर्मिक एकता एक दिन की पैदावार या 1857 के हालात के कारण नहीं थी, बल्कि यह हिंदू और मुसलमानों के हिंदुस्तान में सदियों की एकता और एक दूसरे की विचारधाराओं को समझ लेने के बाद पैदा हुई थी। रामबख्श (जनरल ऑफ डिवीजन) मंशा राम, ब्रिगेड मेजर ने स्वतंत्रता सेनानियों के कैंप से महाराजा जंग बहादुर नेपाल के नाम अपनी अर्जी में लिखा था कि उन्होंने और उनके पूर्वजों ने एक सदी तक अंगरेजों की मुलाजमत ईमानदारी के साथ की थी जिसके कारण वह इस देश के मालिक बन गए, लेकिन उन्होंने हमारी धार्मिक भावनाओं का खयाल न करते हुए ऐसे कारतूस बनाए जिनमें सूअर और गाय की चर्बी की मिलावट थी जिससे वह हमारा धर्म खराब करना चाहते थे, 'इससे पहले कभी हिंदुस्तान में बहुत से बादशाह गुजरे हैं लेकिन किसी ने कभी हमारा धर्म और ईमान खराब करने की कोशिश नहीं की। अगर किसी हिंदू या मुसलमान का मजहब ही खतम हो जाए तो फिर दुनिया में क्या रह जाएगा।' यही वे भावनाएं थीं जिनके कारण बागी फौजी बिना किसी भेदभाव के अपने-अपने धर्म की रक्षा के लिए अंगरेजों के आमने-सामने हुए थे। वे यह मानते थे कि अंगरेज जिस मजहब को मानते हैं वह झूठा है। वह तीन ईश्वरों में विश्वास करने वाले थे जबकि हिंदू और मुसलिम एक-एक ईश्वर के मानने वाले थे। इसीलिए हिंदुस्तान में हिंदू, मुसलमान, आतिश-परस्त और यहूदी उनके मजहब को सच मजहब नहीं मानते थे। स्वतंत्रता सेनानियों ने पहली जंगे-आजादी के दौरान इसी पर कायम रहते हुए हुकूमत से जंग किया। 

1857 के एलाननामों से यह भी मालूम होता है कि बागी फौजियों को जनता का समर्थन प्राप्त था। जनता को विश्वास था कि अंगरेजों के शासन में हिंदुस्तानियों की जान, माल और आबरू सुरक्षित नहीं थी। वह अंगरेजों की धोखेबाजी और शातिराना चालों को खूब समझ रहे थे।

एलाननामों के द्वारा स्वतंत्रता के सिपाहियों ने जनता को यकीन दिलाया था कि हिंदुस्तानियों की हुकूमत में पूरी धार्मिक आजादी होगी जैसे कि पहले थी। हर आदमी अपने दीन-धर्म पर कायम रहेगा, हर किसी की इज्जत-आबरू कायम रहेगी और किसी बेगुनाह का कत्ल नहीं किया जाएगा। किसी का माल जोर-जबरदस्ती से हासिल नहीं किया जाएगा। शाहजादा फिरोज शाह ने अपने एलाननामे में यह विश्वास दिलाया था कि बादशाही के बाद देश के हर वर्ग को व्यवसाय, नौकरी में आसानी होगी और जमींदारों को भी अंगरेजों के अत्याचार से राहत मिलेगी।
कुछ एलाननामे, जैसे मौलवी लियाकत अली का एलाननामा फारसी शब्दों और कुरआन की आयतों से भरा हुआ है। इस एलाननामा का आरंभ खुदा के नाम से और पैगंबर मुहम्मद की प्रशंसा से होता है।

एक विशेष एलाननामा पत्रिका फतहुल-इसलाम 1857 की जंगे-आजादी का एक अमूल्य दस्तावेज है। इस पत्रिका को निकालने वाले का नाम नहीं मिलता लेकिन पत्रिका के विषय और दूसरे विवरण से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसे मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने जो 'फैजाबाद के मौलवी' के नाम से भी प्रसिध्द थे, निकाला था। इस पत्रिका में अंगरेजों के जुल्म की दास्तान लिखने के बाद अवाम से जिहाद करने की अपील की गई है। इस पत्रिका की भाषा सामान्य है। इसमें अरबी और फारसी के शब्द कम हैं। पत्रिका में सेनानियों को युध्द के तरीके सिखाने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा इस एलाननामे में नेतृत्व के बारे में समझाया गया है जो दिलचस्प है, 'अक्ल और दीन (धर्म) की शर्म भी यही कहती है कि मलेका विक्टोरिया काफिरा और दीन की दुश्मन, अंगरेजों की ताबेदारी से मुसलमान अमीर (बादशाह) की ताबेदारी और बादशाह के ताबेदार राजा की ताबेदारी करोड़ों दर्ज अफ्जल (उत्तम) है... और सब हिंदू दिलो-जान से इसलाम और बादशाह के खैर-खाह थे। तो अब भी वही हिंदू और वही मुसलमान हैं और वही किताब है। अपने दीन पर वह रहें और अपने दीन पर हम रहेंगे। हम उनकी मुहाफिजत (सुरक्षा) करेंगे वो हमारी मदद और मुहाफिजत करेंगे। ईसाइयों ने हिंदू और मुसलमान दोनों को ईसाई करना चाहा था, अल्लाह ने बचा लिया। उल्टे वो आप ही खराब हो गए।'

इस पत्रिका के अंत में अंगरेजों से किसी भी प्रकार का संबंध न रखने को कहा गया है और यह निवेदन किया गया है, 'सारे हिंदू और मुसलमान उनकी किसी किस्म की नौकरी न करें।'

1857 में दिल्ली से बहुत से फरमाननामे, एलाननामे और हुक्मनामे जारी हुए थे जो अधिकतर उर्दू ही में थे और कुछ फारसी में। ये दस्तावेज राष्ट्रीय अभिलेखगार नई दिल्ली में सुरक्षित हैं। इस लेख में कुछ दस्तावेजों को बतौर हवाला पेश किया जा रहा है। 1857 में दिल्ली पर स्वतंत्रता सेनानियों के काबिज होने के बाद नई आजाद हुकूमत विभिन्न समस्याओं से दो-चार हुई थी। अमनो-अमान खतम हो चुका था। दिल्ली और उसके आसपास के थानों से रिपोर्ट आनी बंद हो चुकी थी। बहादुरशाह ने अपने हुक्मनामा (19 मई 1857) के द्वारा थानेदारों को रोज रिपोर्ट भेजने की ताकीद की, कि वो अपने-अपने थानों पर मौजूद रहें और शहर में अमनो-अमान बहाल करें। रोजाना गश्त लगाएं और शहर में होने वाली सारी घटनाओं की रिपोर्ट कोतवाल को भेजते रहें। हुक्म की खिलाफवर्जी पर सख्त सजा देने का इशारा किया गया था।
बहादुरशाह के सतर्क रहने के बावजूद भी दिल्ली की जनता और विशेष रूप से व्यापारी वर्ग लूटमार की घटनाओं से परेशान थे। 13 मई को बहादुरशाह ने चांदनी चौक का दौरा करके लोगों की हिम्मत बढ़ाई थी जिसकी वजह से दुकानें खुलनी शुरू हुई थीं लेकिन दुकानदारों ने जल्द ही दुकानें बंद कर दीं। बहादुरशाह ने 11 जून के फरमान में शहर के कोतवाल को हिदायत दी थी कि वो एलान कर दें कि दुकानदार अपनी-अपनी दुकानें खोल लें। उनकी सुरक्षा की पूरी व्यवस्था की जाए, चौकीदारों के द्वारा दिन-रात अवाम की खबरगीरी की जाए। बहादुरशाह के प्रयास और हुक्म के बावजूद शहर के हालात में कोई बेहतरी नहीं हुई। दुकानदार डरे-सहमे रहे। उन्होंने बादशाह से इसकी शिकायत की। बहादुरशाह ने 9 अगस्त 1857 को फौज के तीनों विभागों के अफसरों के नाम यह जारी करवाया कि अगर यही स्थिति रही तो शहर कैसे खुशहाल रह सकेगा, लोग भी तकलीफ उठाएंगे।
स्वतंत्रता सेनानियों ने अंगरेजों को दिल्ली से बाहर कर दिया था लेकिन वे दिल्ली से दूर भी नहीं थे। उनको यह आशा थी कि आने वाली बकरीद के अवसर पर वह दिल्ली के हिंदू-मुसलमानों के बीच गौकुशी की समस्या पर फूट डालने और शांति भंग कराने में सफल हो जाएंगे। बहादुरशाह ने हालात की नजाकत को समझते हुए जनरल बख्त खां को हुक्म दिया था कि गौकुशी पर पाबंदी का हुक्म जारी करें। बख्त खां ने 28 जुलाई से 31 जुलाई 1857 तक कई एलाननामे और हुक्मनामे जारी किए जिनमें गौकुशी, गाय की खरीदो-फरोख्त और उसके गोश्त को दिल्ली लाने पर पूर्ण पाबंदी के हुक्म थे। हुक्म की खिलाफवर्जी करने वालों को मौत की सजा तजबीज की गई थी। सख्त एहतिहयात और निगरानी के कारण बकरीद का त्योहार ठीक से गुजर गया। लेकिन अंगरेजों का खतरा बना रहा। उन्होंने दिल्ली के पास पहाड़ी पर अपनी फौजी चौकी कायम कर ली थी। बहादुरशाह जफर ने उस पहाड़ी पर कब्जा करने के लिए कई हुक्मनामे जारी किए थे। 10 दिसंबर 1857 के हुक्मनामे में फौज के अफसरों को लिखा था, 'हिंदू को गाय और मुसलमान को सूअर का लिहाज करके और दीन-धर्म को समझकर चलना चाहिए। मेरी मर्जी और जिंदगी तुमको मंजूर हो तो देखते ही देखते पलटनें और तोपखाना तैयार करके ऊपर कश्मीरी दरवाजे पर हाजिर होकर इन बदमाश अंगरेजों पर धावा बोलो। इसमें एक लम्हे का भी तामुल और तगाफुल (लापरवाही, देरी) न करो.... तुम इस तख्त की शर्म रखो और जो दीन और इमान पर आए हो तो इसका लिहाज करो।'
1857 के उर्दू एलाननामों का एक विशेष बिंदु यह भी है कि उनमें हिंदी शब्द लगातार प्रयोग में लाए गए हैं, जैसेशरीर, रीत, रांड, धर्मसती, पवित्र, देश, मानुस, मास, लुका-छिपा धावा और दाता इत्यादि। इससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि 1857 तक उर्दू-हिंदी जबान का कोई झगड़ा नहीं था लेकिन 1857 की पहली जंगे-आजादी ने अंगरेजों को चौंका जरूर दिया था। उन्होंने देखा कि किस तरह हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के धर्म की रक्षा के लिए एक हो गए थे और दुनिया की बड़ी शक्ति को अपनी बेमिसाल एकता से करारा जवाब दिया था। अंगरेजी राज के भविष्य की हिफाजत के लिहाज से उनके लिए हिंदू-मुसलिम एकता बहुत खतरनाक थी। इसलिए उसे तोड़ने के लिए उन्होंने मिलजुल कर प्रयास शुरू कर दिया।

उर्दू से अनुवाद : इंजहार अहम नदीम



शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

अठारह सौ सत्तावन का विद्रोह और तवाइफें-लता सिंह


इतिहास, मुकाबले का एक खास मैदान बनकर सामने आता है। यह उन तबकों के लिए खास तौर पर सच है जो समाज के हाशिए पर रहे हैं। इस तरह, इसकी कोशिशें की जाती रही हैं कि लंबे अर्से से अदृश्य बनाकर रख दिए गए आम लोगों की आवाज को, इतिहास में उभारकर सामने लाया जाए। शायद, महिलाओं की आवाजें सुनने के लिए तो अतीत का बाकायदा उत्खनन ही करना पड़ेगा। इस तरह का श्रम तब तो खास तौर पर जरूरी हो जाता है, जब उन नाचने-गाने वाली तवाइफों की भूमिका का सवाल आता है, जो 1857 के विद्रोह के साथ जुड़ी रही थीं।
समाज और इतिहास से निर्वासित
याद रहे कि किस्सा उन महिलाओं का है जिन्हें 'भोंडा', 'अश्लील', 'जरूरत से ज्यादा मुखर', 'नैतिक रूप से पतित', 'कामुक' आदि-आदि बताया जाता था। ये ऐसी महिलाएं थीं, जिन्हें सार्वजनिक दायरे तक कहीं ज्यादा पहुंच हासिल थी और जो अपेक्षाकृत स्वतंत्र थीं। इस तरह वे अचल सामाजिक संरचनाओं के बाहर थीं और जाति, वर्ग और लिंग की सुस्थापित संबंध व्यवस्थाओं या एक तयशुदा दायरे के साथ बंधी हुई नहीं थीं।
इसी का नतीजा था कि उन्हें 'भीतरघाती' माना जाता था और समझा जाता था कि उनसे स्थापित व्यवस्था के लिए खतरा है। सच तो यह है कि इतिहास के विषय में रूप में इन महिलाओं को देखने भर से, मध्यवर्ग की 'सम्मानित' व्यवस्था 'अस्थिर' हो जाती है। शायद इसीलिए 1857 के विद्रोह के विवरणों में तवाइफें प्राय: अदृश्य ही हो गई हैं। राष्ट्रवादी इतिहास लेखन में एक सम्मानित 'राष्ट्र' के अपने ढांचे से उन्हें पूरी तरह से बाहर ही रखकर, उनकी इस रचनात्मक भूमिका को या तो नकार ही दिया है या फिर मिटा दिया है।
आखिरकार, महिलाओं का सार्वजनिक मनोरंजनकर्ताओं और पुरुषों की लालसा के केंद्र के रूप में सामने आना, अंगरेजी में शिक्षित अभिजात वर्ग के हित में नहीं पड़ता था। उन्हें तो इन तवाइफों के प्रति-आदर्श के तौर पर, सुगृहिणी की छवि ही ज्यादा प्रिय थी। इसीलिए, तवाइफों को 'वेश्या' के रूप में कलंकित स्टीरियोटाइप किया जाता था।
इस टिप्पणी में हम कला का प्रदर्शन करने वाली महिलाओं के समुदायों में से एक, तवाइफों की भूमिका का जिक्र करेंगे। यह ऐसा समुदाय है जो नाचने-गाने के पेशे में लगा हुआ था। तवाइफ शब्द ने बेशक वक्त गुजरने के साथ जन-मानस में एक नैतिकवादी अर्थध्वनि प्राप्त कर ली है। सच तो यह है कि 'वेश्या' के साथ खड़े किए जाने की वजह से इन महिला कलाकारों को खामोश हो जाने पर मजबूर कर दिया गया। जब भी उन्होंने अपनी आवाज उठाई, उन्हें उदार मिथकों के सहारे अपना पुराविष्कार करना पड़ा, ताकि अपने स्वाभिमान को पुख्ता कर सकें, जिसे उनके 'पतित' और 'खतरनाक' औरत होने का बार-बार जिक्र किए जाने ने कमजोर किया था। दुर्भाग्य से इन महिलाओं के लेखन में से शायद ही कुछ बच पाया होगा, जबकि उन्हें अपने समय की सबसे शिक्षित महिलाएं माना जाता था। जाहिर है कि इनके मामले में विद्वानों और इतिहासकारों की चुप्पी ने, इन महिलाओं की चुप्पी को और गहरा किया है। इस तरह, एक पूरे के पूरे पेशे को ही ऐतिहासिक स्मृति से मिटा दिया गया है, जिसके साथ अनेक सार्वजनिक दायरे में सक्रिय महिलाएं जुड़ी हुई थीं। विडंबना यह है कि नारीवादी विद्वानों तक के लेखन में भी ये महिलाएं अदृश्य ही बनी रही हैं।
उपनिवेशविरोधी संघर्ष में भूमिका
1857 के विद्रोह में तवाइफों की भूमिका की पड़ताल करते हुए इस टिप्पणी में औपनिवेशिक इतिहास के इन 'निर्बंध' तत्वों की जगह फिर से खोजने और साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में उनकी जगह और भूमिका को फिर से स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। इसमें शक नहीं कि इससे विद्रोह के इतिहास लेखन में एक महत्वपूर्ण पहलू जुड़ेगा। यह इतिहास लेखन इन महिलाओं को अदृश्य बनाए जाने की कोशिशों का शिकार है। इस विद्रोह के 'साधारण विद्रोहियों' का अध्ययन, विद्रोह में पुरुषों की हिस्सेदारी पर ही केंद्रित बना रहा है। रानी लक्ष्मीबाई जैसे अपवादों को छोड़कर विद्रोह के संबंध में पूरी की पूरी चर्चा में, उसमें साधारण महिलाओं की भागीदारी पर शायद ही कोई रोशनी पड़ती होगी। इसके चलते, तवाइफों की भूमिका का अध्ययन ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसा इसलिए और भी ज्यादा है कि ऐसे ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं जो दिखाते हैं इन तवाइफों में से कुछ ने राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, हालांकि इतिहास लेखन की मुख्यधारा में इनकी राजनीतिक आवाज को अदृश्य ही कर दिया गया है।
इस टिप्पणी में हम 1857 के दौरान, कानपुर में ऐसी ही एक तवाइफ, अजीजुन की भूमिका की चर्चा करेंगे। कानपुर इस विद्रोही धावे के मुख्य केंद्रों में से एक था। विद्रोहियों ने कानपुर की छावनी पर धावा बोला था और आगे चलकर उस पर कब्जा कर लिया था। 27 जून 1857 को विद्रोहियों ने सतीचौरा घाट पर सार्वजनिक रूप से 300 से ऊपर अंगरेज औरतों, मर्द और बच्चों को मौत के घाट उतारा था। इसके बाद 15 जुलाई को बीबीघर में सुरक्षित औरतों और बच्चों के एक ग्रुप को मौत के घाट उतारा गया था।
कानपुर में विद्रोह की कथा की पुनर्रचना करने में एक बड़ी कठिनाई सामग्री के स्रोतों की कमी रही है। वास्तव में यहां विद्रोह के संबंध में प्राथमिक स्रोत के रूप में मुख्यत: औपनिवेशिक विवरण ही बचे हैं। इन प्राथमिक स्रोतों में विद्रोह के बीच से बच रहे अंगरेजों द्वारा लिखे गए समकालीन विवरण, अंगरेजों के वफादारों की डायरियां और सरकारी रिपोर्टों के तौर पर ब्रिटिश अधिकारियों के वक्तव्य आदि मुख्य हैं। सामान्य अपेक्षा के विपरीत, इन औपनिवेशिक विवरणों को ही हमें पढ़ना होगा।
अजीजुन की कहानी
बहरहाल, इस प्राथमिक स्रोत सामग्री से गुजरते हुए एक बात जो खास तौर पर हैरानी की लगती है, वह यह है कि मुख्यधारा के इतिहास लेखन में इस तरह की औरतों को अदृश्य करने के तमाम प्रयासों के बावजूद, विद्रोह के अधिकांश औपनिवेशिक विवरणों में अजीजुन का नाम देखने को मिलता है। यहां तक कि उसका जिक्र वीडी सावरकर के तथाकथित राष्ट्रवादी लेखन में और एस.बी. चौधुरी जैसे राष्ट्रवादी इतिहासकारों की कृतियों तक में देखने को मिलता है। इस तमाम लेखन में उसकी भूमिका के लिए और खास तौर पर 'राष्ट्र की स्वतंत्रता' के लिए उसके संघर्ष के लिए, अजीजुन को सराहा गया है।
विद्रोह के अधिकांश विवरणों में विद्रोहियों के साथ अजीजुन के लड़ने का जिक्र आता है। उसके संबंध में बताया जाता है कि वह पुरुष वेश में घोड़े पर सवार होकर और तमगों से सजकर और पिस्तौलों से लैस होकर निकलती थी। ऐसा लगता है कि कानपुर में जिस रोज नाना साहेब की शुरुआती जीत की खुशी में झंडा फहराया गया था, वह उसी दिन जुलूस में शामिल हुई थी। कानपुर में अजीजुन का नाम लोगों की स्मृति में आज भी जिंदा है। अभी पिछले ही दिनों एक अखबार की रिपोर्ट में बताया गया था कि किस प्रकार कानपुर के लोगों ने एक सड़क का नाम अजीजुन के नाम पर रखने की मांग की है।
अजीजुन कानपुर में लुरकी माहिल में, ओमारू बेगम की कोठी में रहती थी। उसकी मां एक तवाइफ थी, जो लखनऊ में रहती थी। ऐसा माना जाता है कि 1832 में जन्मी अजीजुन के सिर से मां का साया काफी कम उम्र में ही उठ गया था और लखनऊ के शतरंजी महल में एक तवाइफ के घर पर ही उसका पालन-पोषण हुआ था। ऐसा माना जाता है कि अजीजुन, उस जमाने में संस्कृति के प्रमुख केंद्र माने जाने वाले लखनऊ शहर को छोड़कर, जहां तवाइफों की कद्र करने वाले बहुत थे, कानपुर में आ बसी थी। यह स्पष्ट नहीं है कि वह लखनऊ को छोड़कर कानपुर क्यों गई थी, जो बुनियादी तौर पर बाजारों का और फौजी छावनी का शहर था।
प्राथमिक स्रोत सामग्री के अभाव में हम अन्य साहित्यिक कृतियों के सहारे कुछ अनुमान ही लगा सकते हैं। ऐसी ही एक रचना, रुसवा की कृति उमराव जान है। उमराव जान भी एक तवाइफ है, जो लखनऊ से कानपुर आने के बाद, अपने अनुभव सुनाती है। उमराव इसका जिक्र करती है कि किस तरह कानपुर में वह नाच-गाने के अपने प्रदर्शन में व्यस्त थी और अच्छा पैसा कमा रही थी। बेशक, वह इसका भी जिक्र करती है कि किस तरह उसे कानपुर के लोगों का बोलचाल का तरीका पसंद नहीं था और लखनऊ की यादें उसका पीछा नहीं छोड़ती थीं। फिर भी वह इससे खुश थी कि कानपुर में आकर वह खुद मुख्तार हो गई थी, जबकि लखनऊ में ऐसा संभव नहीं था और उसे किसी खानम के नीचे पेशा करना पड़ता, जो तवाइफों के श्रेणी विभाजन में उससे ऊपर होती। इससे ऐसा लगता है कि अजीजुन के कानपुर आने का एक संभावित कारण यह रहा हो सकता है कि उसके मन में स्वतंत्रता की जबरदस्त इच्छा थी। ऐसा लगता है कि वह किसी के संरक्षण में नहीं रहना चाहती थी, जिसका पता उसके व्यक्तित्व से चलता था, जिसकी अभिव्यक्ति 1857 के विद्रोह में उसकी भूमिका में हुई थी।
लड़ाइयों में सिपाहियों के साथ
अजीजुन का सैकेंड कैवेलरी के सिपाहियों से बहुत नजदीकी रिश्ता था, जो अकसर उसके घर आया-जाया करते थे। सैकेंड कैवेलरी के सिपाही शम्सुद्दीन खान के साथ खास तौर पर उसके घनिष्ठ संबंध थे, जिसने विद्रोह में एक सक्रिय भूमिका अदा की थी। विद्रोहियों की बैठकें उसके घर पर हुआ करती थीं। शम्सुद्दीन अकसर अजीजुन के घर आया-जाया करता था। कानपुर में विद्रोह से संबंधित ज्यादातर विवरणों में इसका जिक्र आता है कि वहां विद्रोह शुरू होने से दो दिन पहले, शम्सुद्दीन खुद अजीजुन के घर गया था और उसने अजीजुन को बताया था कि एक-दो दिन में नाना साहब शासन संभाल लेंगे और उसके बाद उसका घर सोने की मोहरों से भर जाएगा। अजीजुन का घर सिपाहियों का मिलन स्थान भी था। अजीजुन ने औरतों का एक दल भी बनाया था जो हिम्मत के साथ हथियारबंद सिपाहियों को बढ़ावा देता हुआ घूमता था, उनके घावों की मरहम-पट्टी करता था और उनके बीच हथियार और गोला-बारूद बांटता था। अजीजुन ने एक तोपखाने को अपने दल का मुख्यालय बनाया था। यह तोपखाना, व्हीलर जिस जगह जमा हुआ था उसके उत्तर की ओर, रैकट कोर्ट और चैपल ऑफ ईंज के बीच में स्थित था। घेरे के पहले दिन से ही इस तोपखाने की तरफ से व्हीलर के फौजी जमावड़े पर गोलियां और गोले दागे जाते रहे थे। व्हीलर की फौजों के घेरे के करीब-करीब पूरे दौर में अजीजुन सिपाहियों के बीच ही बनी रही थी। एक प्रत्यक्षदर्शी द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार वह भारी गोलाबारी के बावजूद, पिस्तौलों से लैस बराबर अपने संगियों के साथ बनी रही थी। सैकेंड रेजीमेंट के कैवेलरी के सिपाही ही उसके संगी थी।
ऐसा लगता है नाना साहब और अजीमुल्ला खान, दोनों ही अजीजुन को पहचानते थे। ऐन मुमकिन है कि उसे विद्रोह की योजना की जानकारी रही हो और वह कानपुर में विद्रोह के प्रमुख षडयंत्रकारियों में से रही हो। इस तरह की भी अटकलें लगाई जाती रही हैं कि बीबीघर में ब्रिटिश औरतों और बच्चों को मौत के घाट उतारने के 'षडयंत्र' में भी उसकी भूमिका रही थी। लेकिन, विद्रोह के अधिकांश विवरणों में बीबीघर की घटना के सिलसिले में हुसैनी नाम की एक और तवाइफ का नाम ज्यादा प्रमुखता से आता है। हुसैनी पर ही इसका संदेह किया जाता रहा है कि उसी ने बीबीघर में औरतों और बच्चों की हत्या किए जाने के आदेश दिए थे।
विद्रोह में अजीजुन जैसी औरतों की भूमिका की सैकड़ों कहानियां मिलेंगी। लेकिन, इनमें से ज्यादातर कहानियां दर्ज हुए बिना ही रह गई हैं। मिसाल के तौर पर लखनऊ में विद्रोह के 'गुप्त' और 'उदार आर्थिक मददगारों' के रूप में उनकी भूमिका दर्ज की गई थी। ब्रिटिश अधिकारियों को मालूम था कि उसके कोठे विद्रोहियों के मिलन-स्थल बने हुए थे, जहां विद्रोह के मंसूबे बनाए जाते थे। इसी का नतीजा था कि कोठों को राजनीतिक षडयंत्र के ठिकानों के तौर पर संदेह की नजरों से देखा जाने लगा था। वास्तव में 1857 के विद्रोह में तवाइफों की भूमिका का अंदाजा, इनमें से कुछ महिलाओं के खिलाफ ब्रिटिश अधिकारियों की दंडात्मक कार्रवाई की भीषणता से लगाया जा सकता है। इन कार्रवाइयों में बड़े पैमाने पर उनकी संपत्तियों की जब्ती भी शामिल थी। लखनऊ में, जो कि तवाइफों का एक प्रमुख केंद्र था, 1857 के विद्रोह में प्रमाणित हिस्सेदारी के लिए, जिन लोगों की संपत्तियां जब्त की जा रही थीं, उनकी सूचियों में अनेक तवाइफों के नाम भी शामिल थे। रुस्वा की कथा उमराव जान में भी इसका जिक्र है कि किस तरह विद्रोह के बाद उमराव को लखनऊ छोड़कर जाना पड़ा था और किस तरह उसकी कोठी को लुटवाया गया था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अठारह सौ सत्तावन के विद्रोह में तवाइफों की भूमिका को हम किस तरह समझ सकते हैं? इसमें एक महत्वपूर्ण कारक नवाबों के साथ उनका घनिष्ठ रूप से जुड़ा होना हो सकता है। नवाब ही तवाइफों के सबसे बड़े संरक्षक हुआ करते थे। नवाब अकसर अंगरेजों के
खिलाफ थे, क्योंकि औपनिवेशिक शासन ने उनकी सत्ता को कमजोर कर दिया था। फिर भी, विद्रोह में तवाइफों की हिस्सेदारी को सिर्फ नवाबों के साथ उनके घनिष्ठ रिश्तों के आधार पर व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस तरह का तर्क इन औरतों की किसी भी प्रकार की स्वतंत्र भूमिका या राजनीतिक आवाज को ही वंचित करने वाला तर्क है। यह समझना मुश्किल नहीं है कि चाहे नवाबों के संरक्षण में ही क्यों न रही हों, तवाइफों के लिए विद्रोह में हिस्सा लेने की कोई मजबूरी नहीं थी। मिसाल के तौर पर अजीजुन चाहती तो विद्रोह से दूर ही बनी रह सकती थी, क्योंकि विद्रोह में हिस्सेदारी वैसे भी काफी जोखिम भरी कार्रवाई थी। इतना ही नहीं, विद्रोह में हिस्सेदारी के लिए उसे किसी तरह से मजबूर किए जाने या उस पर किसी तरह का दबाव होने के, कोई लक्षण तो नहीं नजर आते हैं। वास्तव में अजीजुन तो उस दौर में किसी के भी संरक्षण में थी ही नहीं। वह तो कानपुर में रहती थी और स्वतंत्र रूप से अपना कोठा चलाती थी। इसलिए, 1857 के विद्रोह में तवाइफों की हिस्सेदारी के कारण समझने के लिए, हमें उसके ऐतिहासिक संदर्भ की पड़ताल करनी होगी।
अंगरेजों ने जब भारतीय उप-महाद्वीप में स्थानीय शासकों को हटाकर उनकी जगह लेनी शुरू की, उससे पहले तक यहां मौजूद हिंदू और मुसलिम, दोनों ही तरह के शासकों के दरबारों में तवाइफों की प्रभावशाली (महिला) अभिजन के रूप में पहुंच थी। उन्हें 'उन्नत' दरबारी संस्कृति के संरक्षकों और उसकी अदायगी करने वालों के रूप में देखा जाता था, जिनकी हिंदुस्तानी संगीत और कत्थक नृत्य शैली के विकास में सक्रिय भूमिका थी। उन्हें कवियों, विद्वानों, धर्मज्ञों और सबसे बढ़कर प्रतिभाशाली संगीतकारों और नर्तकियों के संरक्षकों के रूप में देखा जाता था। उन्हें दरबार में और समाज में भी, भारी सम्मान हासिल था और उनके साथ जुड़ाव से उन लोगों की प्रतिष्ठा ही बढ़ती थी, जिन्हें उनके सांस्कृतिक प्रदर्शनों में आमंत्रित किया जाता था।
बहरहाल, ब्रिटिश सत्ता के आने के साथ, तवाइफों की सांस्कृतिक सत्ता घट गई थी। अंगरेजी राज का नतीजा यह हुआ था कि उन्हें शाही दरबारों से हासिल संरक्षण में भारी कमी आ गई थी, जबकि यही उनकी सत्ता का मुख्य आधार था। ब्रिटिश शासन उनके कलात्मक और रचनात्मक पहलू की अनदेखी करता था और उसने तवाइफों के कोठों और चकलाघरों को एक करके देखना शुरू कर दिया था। इतना ही नहीं, औपनिवेशिक दौर में तवाइफों की सांस्कृतिक पहचान पर प्रतिकूल असर पड़ रहा था। यूरोपीय सैनिक जिन यौन रोगों से पीड़ित थे, उनके फैलाव पर नियंत्रण हासिल करने के लिए ब्रिटेन ने 1864 में संचारी रोग कानून जैसे जो चिकित्सकीय कानून बनाए थे, उनमें तवाइफों को वेश्याओं के खाने में ही डाल दिया गया था। इसका अर्थ यह था कि वेश्याओं के लिए जो नियमन, नियंत्रण और जांच की व्यवस्थाएं कायम की गई थीं, तवाइफों को भी उनके दायरे में घसीट लिया गया।
असंतोष और राजनीतिक भूमिका
दरबारी संरक्षण छिन जाने, इस तरह के नियमनों और आगे चलकर 1857 के विद्रोह में भूमिका के लिए उनसे वसूल किए गए जुर्मानों आदि से, तवाइफों की हैसियत को भारी धक्का लगा था। यह एक भव्य सांस्कृतिक संस्था के धीरे-धीरे पतित होने का संकेतक बन गया और यह संस्था एक साधारण वेश्यावृत्ति में घटकर रह गई। औपनिवेशिक सरकार ने तवाइफों को नवाबों द्वारा दी गई ज्यादातर जागीरों को अपने हाथों में ले लिया। इतना ही नहीं, उसने तवाइफों से जोड़कर, परंपरागत रईसों को 'दुराचारी' और 'अनैतिक' के रूप में प्रचारित करने की कोशिश की थी। यह दूसरी बात है कि जब इन्हीं औरतों को यूरोपीय छावनियों में वेश्याओं के रूप में इस्तेमाल करने का सवाल आया या उनसे आयकर बटोरने का सवाल आया, तो पूरी तरह से व्यवहारवादी बनकर अंगरेजों ने सारे नैतिक आवरण उतारकर रख दिए और इन स्वार्थों को पूरा करने के लिए जरूरी कानून बनाने में कोई कोताही नहीं की। वास्तव में यह तो एक तरह से सरकारी नीति का हिस्सा ही बन गया था कि कोठे की औरतों में से जो 'स्वस्थ' और 'सुंदर' हों, उन्हें छांटकर अलग किया जाए और मनमर्जी से, यूरोपीय सैनिकों की सहूलियत के हिसाब से, छावनियों में उन्हें लाया जाए। इसने उनके पेशे को अमानुषिक बनाया और उनकी सांस्कृतिक भूमिका उनसे छीन ली। इससे भी बढ़कर उन्हें पुरुषों को सहज उपलब्ध बना दिया और इन औरतों के लिए सिपाहियों से संचारी यौन रोग लगने का खतरा और बढ़ गया। सारे विशेषाधिकारों से वंचित कर दी गई तवाइफें अपने शरीर पर, अपनी संपत्ति पर और अपनी 'नैतिकता' पर हमले के खिलाफ लड़ रही थीं। दूसरे शब्दों में, तब से लेकर आज तक अपनी वैधता के लिए और एक पेशेवर समूह के रूप में कुछ ठोस लाभ हासिल करने के लिए, उनकी लड़ाई चल ही रही है।
फिर भी, 1857 के विद्रोह में तवाइफों की भूमिका की व्याख्या करते हुए, ब्रिटिश शासन के प्रति उनके आक्रोश को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर भी नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना उनकी राजनीतिक भूमिका को ही अनदेखा करना होगा। इसकी जगह पर, रेखांकित करने वाली बात यह है कि अंगरेजी हुकूमत के प्रति तवाइफों के वही मनोभाव थे, जो मनोभाव 1857 के विद्रोह में शामिल हुए दूसरे बहुत से लोगों के थे। वास्तव में, उस समय के समाज में प्रतिभाशाली और शिक्षित महिलाओं की अपनी-अपनी हैसियत के चलते तवाइफें समसामयिक राजनीति, कानून आदि से भली भांति परिचित थीं और स्थानीय सत्ताधारी अभिजन के साथ उनके संपर्क थे। इसके अलावा, वे जहां रहती थीं उन शहरी ठिकानों के इतिहास का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था। इसने तवाइफों को राजनीतिक रूप से जागरूक बनाया था। मिसाला के तौर पर तवाइफें अच्छी तरह यह समझती थीं कि ब्रिटिश हुकूमत ने जानबूझ कर उनके कोठों की सचाइयों को तोड़ा-मरोड़ा था ताकि

नवाबी संस्कृति को बदनाम किया जा सके, और इसके पीछे मंशा यह थी कि 1856 में अवध के हड़पे जाने को सही ठहराया जाए।
इस टिप्पणी में हमने तवाइफ की सार्वजनिकराजनीतिक भूमिका की पड़ताल करने की कोशिश की है। इसके लिए हमने तवाइफ के व्यक्तित्व को, केंद्रीय रूप से राजनीतिक मंच पर रखकर देखने का प्रयास किया है, जिससे उसे अब तक वंचित करके रखा जाता रहा है। 'सम्माननीय' की अपनी तलाश में राष्ट्रवादी लेखन उसे आंखों से ओझल करके चलता आया है। वास्तव में अजीजुन जैसी औरतों की जिंदगी, जो राष्ट्रवादी इतिहासकारों के लिए सारभूत प्रेरणादायी दो नारी छवियों'सम्मानित मां' और 'सम्मानित पत्नी'में किसी भी खाने में फिट नहीं बैठती है, 1857 के विद्रोह पर प्रभुत्वशाली पूंजीवादी राष्ट्रवादी रुख को ही संकट में डालने पर आमादा नजर आती है। अजीजुन का यह बागी किस्सा 'भारत माता' के उस रूपक को छिन्न-भिन्न कर देता है, जो उपनिवेशविरोधी (मध्यवर्गीय) राष्ट्रवादी सोच पर हावी रहा है।


मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

1857 के स्वाधीनता संग्राम में दलितों की भूमिका-बद्रीनारायण


आंदोलनों का एक बेहतर परिणाम यह हुआ है कि साहित्य और संस्कृति में दलितों की भूमिका को हम अब धीरे-धीरे मानने को तैयार हो रहे हैं, लेकिन इतिहास में उनकी भूमिका को स्वीकारने में हमें अभी भी कठिनाई हो रही है। इसका मुख्य कारण है कि हमने अपने अंत:मन और ज्ञान-जगत में दलितों की एक छवि बना रखी है, जिसमें हम उन्हें निरीह, निम्न और निष्क्रिय रूप में देखते हैं। हम मानते रहे हैं कि ये सिर्फ प्रताड़ित होने वाले समुदाय हैं, इनमें प्रतिरोध की चेतना रही ही नहीं है, अगर रही भी है तो अपने मालिकों के साथ प्रतिरोध की नकल करने, उनका अनुसरण करने और उनका साथ देने के रूप में रही है। इस संदर्भ में दीपांकर गुप्ता द्वारा संपादित पुस्तक कास्ट इन क्वेस्ट में प्रकाशित जी. के. कारंत के आलेख 'रिप्लिकेशन ऑर डिसेंट' में देखा जा सकता है जिसमें उन्होंने कर्नाटक की अछूत दलित जातियों के अध्ययन के माध्यम से यह साबित करने की कोशिश की है कि किस प्रकार अनुकृति भी निम्न समुदाय के लिए प्रतिरोध का ही एक रूप है। दलित सेनानियों द्वारा अपने मालिक के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में शामिल होना कहीं से भी उनकी लड़ाई को सिर्फ मालिकों के लिए की जाने वाली लड़ाई के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
इसका कारण यह है कि हम यह मानते हैं कि इतिहास की गति स्वार्थों की टकराहट से ही संचालित होती है। तभी तो 1857 के संघर्ष को हम सिर्फ सामंतों और राजाओं के व्यक्तिगत हितों के अंगरेजों से हुए टकराव के रूप में देखते हैं। यह एक डिटर्मिनेटिव एप्रोच है जिनमें हम यह भूल जाते हैं कि मानव-मन हितों और स्वार्थों से इतर भी कुछ होता है। अगर दलितों का स्वार्थ अंगरेजों से टकरा रहा था तो उन्हें कुछ नहीं करना था, ऐसा मानते हैं। हम यह भी भूल जाते हैं कि दलितों के दिल में भी भाव होता है, उच्छ्वास होता है। वे अपने से ही नहीं, अपने आसपास से भी संचालित होते हैं।
चूंकि हमने पहले ही मान लिया है कि दलित समाज निरीह रहा है तो वह संघर्ष कैसे
कर सकता है। जबकि हम भूल जाते हैं कि इतिहास के विभिन्न कालखंड दलित नायकों के संघर्ष-कालखंड रहे हैं। आठवीं शताब्दी से लगभग बारहवीं, तेरहवीं शताब्दी तक प्राचीन काल का राजत्व कमजोर हो रहा था और मध्यकाल की राजशाही वजूद में पूरी तरह आ नहीं पाई थी, यह एक संक्रमण का दौर था। इस दौर में दलित जाति के अनेक दुस्साहसिक नायक हमारी लोकगाथाओं के नायक बने। कुंवर विजयमल जो जाति का दुसाध माना जाता है, दीनाभद्री मुसहर लड़ाके थे, चुहरमल, सहलेश इत्यादि भी दलित जाति के नायक थे। इन लोकगाथाओं को पढ़ें तो जाहिर होता है कि इन जातियों में वीर और दुस्साहसी लोग थे जिन्होंने अपने राज तक कायम किए। नृतत्ववैज्ञानिक कुमार सुरेश सिंह ने लिखा है कि तेरहवीं शताब्दी में अयोध्या का राजा निम्न जाति का था, शायद डोम जाति का, मध्य उत्तर प्रदेश और अवध के पासी राजाओंडालदेव, बलदेव, बिजली पासी, सुहेलदेव इत्यादि के बारे में अंगरेज नृतत्वशास्त्रियों के लेखन और सेंसस गजेटियर्स में भी जिक्र आते हैं। कर्नल नील जिन्होंने 1857 के विद्रोह के आसपास एक दमनकारी सैन्य अधिकारी के रूप में छवि बनाई थी, ने अपने अत्यंत रोचक संस्मरण में लिखा है कि किस प्रकार उस समय अंगरेजी सेना के लिए पासी वीर एक चुनौती बन गए थे, यह ठीक है कि अंगरेज अधिकारी अपनी शब्दावली में नायक न कहकर अपराधी ही कहेगा, लेकिन हमें ऐसी व्याख्याओं से निकलना ही चाहिए। इस आलेख में यह भूमिका मैं इसलिए बना रहा हूं कि दलितों के बारे में बन गई रूढ़ हो चुकी छवि को तोड़ना चाहता हूं। कोल्फ इच डर्क एक डच इतिहासकार हैं जिन्होंने बताया कि उत्तर भारत में किस प्रकार मध्यकाल और प्रारंभिक उपनिवेशिक काल में सैन्य कर्म न केवल सवर्ण जातियों में बल्कि निम्न जातियों में एक प्रमुख नौकरी के रूप में उभरा था। न केवल यादव, क्षत्रिय जैसी धनी सामंती जातियां बल्कि पासी, दुसाध, डोम, मेहतर, मुसहर, कहार, नीची जातियों के लोग भी खाली समय में सैन्य अभ्यास करके, कुश्ती-पहलवानी करके तत्कालीन बिखरी हुई और केंद्रीयकृत राजसत्ताओं की सेना के लिए अपने को तैयार रखते थे जो पूरे भोजपुर और अवध में नौकरी का महत्वपूर्ण माध्यम था, ऐसा अनेक ऐतिहासिक साक्ष्यों से साबित हुआ है। अगर हम कोल्फ की बात मान लें तो हमें यह मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि 'नौकरनुमा निरीह जातियों' के मध्य भी एक नौकरीशुदा सैनिक वर्ग था जो 1857 के विद्रोह में शिरकत कर सकता था। एक दूसरे इतिहासकार निकोलस डर्कस ने अपनी नई पुस्तक में जातियों के बारे में लिखा है कि भारत में अंगरेजी सत्ता के मजबूत होने के पहले जातीय स्मृतियां काफी कुछ लचीली थीं। 1861 में 1857 के विद्रोह के बाद जब अंग्रेजों ने महसूस किया कि भारतीय समाज में बड़ा तबका उनके खिलाफ लड़ा है तो उनकी सूची बनाने, उनकी प्रवृत्तियों को जानने व समझने के लिए कोलोनियल डिटरमिनेशन प्रोजेक्ट शुरू किया गया जिसके अंतर्गत सेंसर और गजेटियर का निर्माण हुआ जिसके आधार पर इन जातियों को नियंत्रित करने के
लिए अनेक एक्ट बनाए गए। कोलोनियल डिटरमिनेशन प्रोजेक्ट का एक असर यह हुआ है कि
अब जातीय स्मृतियां निश्चित हो गईं, वे एक बार लिखित होकर प्रिंट में छप गईं। क्रिमिनल ट्राई पैक्ट इन्हीं प्रक्रियाओं का परिणाम था। इसके तहत 198 दलित जातियों को चिह्नित किया गया, इन्हें तीन नाम दिए गएएक्स क्रिमिनल ट्राइब्स, डीनोटिफाइड ट्राइब्स, नोमेडिक ट्राइब्स। 1860 में इसे इंडियन पैनल कोड में बदल दिया गया 1857 के संघर्ष के बाद जहां ऊंची जातियों के अनेक लोग राय साहब, राय जमींदार, महाराजा, राजा, जागीरदार की उपाधि लेने में व्यस्त थे वहीं दलितों के ऊपर क्रिमिनल ट्राइब एक्ट लगाया जा रहा था। यह एक्ट उपनिवेशिक इतिहास के विभिन्न कालखंडों में लागू किया गया जो इस प्रकार है : 1871, 1896, 1901-02, 1909, 1911, 1913-14, 1919 और 1924। यह जानना बहुत रोचक है कि 1857 के तुरंत बाद क्रिमिनल एक्ट बनाने की क्या आवश्यकता पड़ी और इन दलित जातियों को चिह्नित करने की क्या जरूरत पड़ी? वस्तुत: 1857 के विद्रोह के बाद अंगरेजी शासन ने अपनी गवर्नेंस और कंट्रोल एक्टिविटीस की कमियों को पहचाना था और भारतीय समाज में इस विद्रोह से सबक लेकर इसे नियंत्रित करने के लिए नई रणनीति बनाई और उन्हें क्रिमिनल जाति बना दिया जो उनके प्रशासन के लिए चुनौती थे। ये वे लोग थे जो औपनिवेशिक नियमों को नहीं मानते थे और उन्हें बार-बार तोड़ते थे।
यूं भी 1857 का विद्रोह मात्र सेनाओं, सैनिकों, राजाओं का विद्रोह नहीं था। रुद्रांग्शु मुखर्जी, गौतमभद्र, पिंच जैसे अनेक इतिहासकार मानते हैं कि इस विद्रोह में किसानों ने बड़े पैमाने पर शिरकत की, जिन गांवों के सैनिक जिनकी संख्या लाखों में थी, शहीद हुए थे, वे गांव इस विद्रोह से जुड़ गए। डच इतिहासकार डच कोल्फ की बात मानें तो अनेक निचली जातियों का भी साहसी सैनिकनुमा संवर्ग इस विद्रोह से जुड़ा हुआ था।
आज दलित इतिहासकार अपने नायकों की पहचान कर रहे हैं जिनका संबंध 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष से रहा था। इस प्ररिप्रेक्ष्य में मातादीन भंगी का उल्लेख मिलता है जिन्होंने अपने मन-मस्तिष्क में उपजे सवालों से 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में सैनिक विद्रोह का बिगुल बजाया। वस्तुत: इतिहास में चर्चित नायकों के प्रेरणास्रोत बने ये दलित नायक। राष्ट्रभक्ति और देशभक्ति की भावना के अतिरिक्त यह ऐसा आंदोलन था जिसमें जनमानस की भागीदारी रही। यह संघर्ष ऐसे समय में हुआ जब तत्कालीन नरेश अपनी सिंहासन रक्षा हेतु संघर्षरत थे। दलित सर्वहारा किसान का किसी नरेश से कोई सरोकार न था, ऐसे में मातादीन भंगी ने पानी पीने के लिए दो नंबर पल्टन के सिपाही मंगल पांडे से पीतल का लोटा मांगा, इस दुस्साहसिक कार्य हेतु मंगल पांडे की फटकार पर मातादीन भंगी ने चिढ़ाते हुए कहा कि 'बहुत जल्द ही तुम्हारी पंडिताई (ब्राह्मणपना) निकल जाएगी, जब तुम दांत से सुअर और गाय की चर्बी से बने कारतूस काटकर बंदूक में भरकर चलाओगे।' इस घटना के बारे में कैप्टन राइट ने एक पत्र मेजर बोन्टीन के नाम 22 जनवरी 1857 को लिखा था। मातादीन नए कारतूस बनाने वाली दमदम की फैक्ट्री में नौकर था इसलिए उसकी बात मान ली गई। यह बात आग की तरह फैल गई। तत्कालीन परिस्थितियों में जब एक अछूत जाति की आवाज भी भोजन करते समय एक ब्राह्मण पसंद नहीं करता था, ऐसे समय में उससे पानी पीने के लिए लोटा मांगना एक साहसिक कार्य था। इस घटना के पश्चात अंगरेज अफसर ने मातादीन भंगी को फांसी पर लटका दिया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का सेहरा भले ही मंगल पांडेय और रानी लक्ष्मीबाई को दिया गया हो लेकिन उनके पीछे प्रेरणास्रोत बने मातादीन भंगी और झलकारी बाई।
जी.डब्ल्यू. फारेस्ट ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि सिपाहियों के स्वैच्छिक विद्रोह और झांसी पर पूर्ण विजय के बाद जब अधिकांश सेना दिल्ली की ओर चली गई तब रानी लक्ष्मीबाई सैनिकों के इस काम में स्वेच्छा से शामिल नहीं थीं। इस दौरान लक्ष्मीबाई अंगरेजों से दूरस्थ संबंध रखती थीं और अपने हक के लिए समझौते का प्रयास कर रही थीं। इस समय विद्रोही सैनिक के रूप में झलकारी बाई के पति पूरन कोरी और भाऊबक्शी कोरियों की सेना लेकर अंगरेजों का संहार कर रहे थे। संघर्ष की विशालता को देखते हुए रानी लक्ष्मीबाई अंगरेजों के संपर्क में आ रही थीं। लेकिन झलकारी बाई और उनके पति चिंतित थे कि कहीं रानी अंगरेजों की गिरफ्त में न आ जाएं। ऐसी नाजुक स्थिति में झलकारी बाई ने सूझबूझ का परिचय देते हुए अपने विश्वसनीय सैनिकों के साथ रानी लक्ष्मीबाई को असुरक्षित किले से बाहर निकालकर सुरक्षित स्थान पर भेजने में मदद की। युध्द के समय में झलकारी बाई ने बड़ी सूझबूझ का परिचय देते हुए स्वयं भंडारी गेट से उन्नाव गेट तक युध्द का संचालन किया। उनके पति पूरन कोरी और भाऊबक्शी भी युध्द में व्यस्त थे। झलकारी बाई का चेहरा और व्यक्तित्व काफी कुछ रानी लक्ष्मीबाई से मिलता था। इसका फायदा उठाकर किले में वह रानी लक्ष्मीबाई बनकर युध्द करती रही ताकि वे दूर सुरक्षित स्थान पर पहुंच जाएं। उनके पति पूरन कोरी अपनी मातृभूति की रक्षा करते हुए शहीद हो गए। यह पता चलते ही झलकारी बाई और भी बहादुरी से लड़ने लगी और अंगरेजों सेना के पैर उखाड़ दिए। महारानी लक्ष्मीबाई के प्रति सच्ची मित्रता, देशप्रेम और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपने कर्तव्य का पालन करते हुए वह शहीद हो गई। त्याग और बलिदान के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर अपने को अमर कर गई।
लोचन मल्लाह की कानपुर में 1857 के संग्राम में अहम भूमिका रही। यहां अंग्रेज अफसर नाना साहब को अपनी हितैषी समझते थे। कानपुर के कलेक्टर भी नाना साहब को अपना मित्र ही मानते थे। नाना साहब अपने को भी पत्रों द्वारा अंगरेजी सेना के हितैषी ही साबित कर रहे थे। यहां तक कि माफी मांगते हुए महारानी विक्टोरिया और अंगरेज अफसरों को पत्र भी लिखा था ताकि वे उनके विश्वासपात्र बने रहें। नाना साहब 26 जून 1857 को रातभर उनके घेरे में रहे। रात में 3 बजे अंग्रेज गंगा तट पर लोचन मल्लाह की व्यवस्था देखने गए। लोचन मल्लाह ने 40 नावों की व्यवस्था की थी ताकि अंगेजों को इलाहाबाद पहुंचाया जा सके। नाना साहब की देखरेख में अनेक अफसरों और उनकी पत्नियों को गंगा तट पर लाया गया। ईवार्ट सैन्य अधिकारी पालकी में बैठकर आ रहा था
लेकिन विद्रोही सैनिकों को इसकी भनक लग गई और उन्होंने पालकी से खींचकर उसकी हत्या कर दी। विद्रोही सैनिक इस दौरान कानपुर आ चुके थे। गंगा घाट पर कानुपर क्रांति के सेनानायक टीकासिंह, अजीमुल्लाह और तात्या टोपे सभी खड़े थे। इसी दौरान नाना साहब का एक घुड़सवार आया और उसने व्हीलर को विदाई के लिए नाना साहब का संदेश दिया। इशारा पाकर लोचन मल्लाह ने अपने साथियों से नाव छोड़ देने को कहा। सभी मल्लाह गंगा में कूद गए। अंगरेजों ने उन पर गोलियां चलाईं। पुन: लोचन मल्लाह ने दूसरी नाव पर क्रांतिकारियों को लेकर अंगरेजों का पीछा किया। इस दौरान लोचन की मदद से 80 अंगरेज स्त्री, पुरुष और बच्चे कानपुर लाए गए। बच्चों और स्त्रियों को अलग कर क्रांतिकारियों ने 14 अंगरेजों को फांसी पर लटका दिया।
डी.सी. डिंकर ने अपनी पुस्तक स्वतंत्रता संग्राम में अछूतों का योगदान' में वीरांगना महाबीरी देवी का उल्लेख किया है। यह भंगी जाति की तेज-तर्रार महिला थी। महाबीरी ने अपनी जाति की महिलाओं को एकत्र कर संगठन बनाया और मुजफ्फरनगर में अंग्रेजों से मोर्चा लिया। 22 महिलाओं को टोली में बल्लम-गड़ासों से लैस होकर अंगरेजों पर हमला कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। अपने ऊपर अचानक अनपढ़ और निम्न जाति समाज की महिलाओं द्वारा हमला किए जाने पर अंगरेज अफसर हतप्रभ रहे, क्योंकि यह विद्रोह किसी राजा के नेतृत्व में नहीं था बल्कि यह आम जनता का विद्रोह था। ये सभी महिलाएं आंदोलन में शहीद हो गईं।
नन्हीबाई का योगदान भी स्वतंत्रता आंदोलन में स्मरणीय है, क्योंकि वह जिस समाज से थी उस समाज से हम स्वतंत्रता आंदोलन में संघर्ष के लिए सोच भी नहीं सकते थे। भक्तन जाति के लोग वैष्णव संप्रदाय को मानने वाले थे। पर उनकी कन्याओं की शादी नहीं होती थी। उनकी शादी किसी साधु के साथ करकर उन्हें वेश्यावृत्ति में उतार दिया जाता था। यह समाज भी ब्राह्मणी व्यवस्था का शिकार था। नन्हीबाई ने भी इसी भगतन परिवार में एक वेश्या की कोख से जन्म लिया। महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी नन्हीबाई को जोधपुर के राजा के साथ देखकर यह टिप्पणी की कि 'सिहों के सिंहासन पर इन कुतियों से कुत्ते ही पैदा होंगे' सुनकर अपमान और क्रोध का घूंट पीकर रह गई। कालांतर में नन्हीबाई ने समाज-सेवा का व्रत लिया और अपनी अपार धन-संपदा को देश की सेवा में लगा दिया। हालांकि नन्हीबाई पर दयांनद सरस्वती को मारने का आरोप लगा था। नन्हीबाई ने लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज के साथ-साथ अनेक संस्थानों को अपनी संपत्ति बेचकर दान दिया, अंगरेजों से उनकी बहस होती ही रहती थी। वे क्रांतिकारियों को मदद करना अपना धर्म समझती थीं क्योंकि एक वेश्या होने के नाते स्वतंत्रता के मायने बखूबी जानती थीं। यहां उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद के मछली शहर में रहने वाले बांके चमार का उल्लेख करना भी नितांत आवश्यक है। इन्होंने प्रमुख बागी नेता हरिपाल सिंह के साथ रहकर स्वतंत्रता आंदोलन में अनेक अफसरों को मौत के घाट उतारकर दलित समाज में वीरता और बहादुरी और दलित क्रांतिकारी होने का सबूत पेश किया। इन पर अंगरेजों ने पांच हजार रुपए का पुरस्कार घोषित किया था। अंततोगत्वा इन्हें भी फांसी पर लटकाया गया।
इतिहास की खोज, इतिहास रचना और इतिहास का निर्माण एक सतत विकासमान प्रक्रिया है। अंबेडकर के समय अर्थात 1920 से 1956 तक राष्ट्र की मुक्ति के संग्राम में दलितों की मुक्ति की बात होती थी, यह वहीं तक सीमित नहीं थी। नए शोधों, अभिलेखीय दस्तावेजों के नए पाठ, औपनिवेशक दस्तावेजों के उच्छेदवादी पुनर्पाठ से इतिहास में दलितों का प्रवेश कर दरवाजा चौड़ा ही हुआ है। अंबेडकर के समय सन् 1857 के बाद का जो दलितवादी मूल्यांकन रहा था वह आज काफी कुछ बदल चुका है। अगर अंबेडकर आज जीवित होते तो इतिहास में दलितों की भूमिका पर वैसा ही पाठ करते जैसा कि डी.सी. डिंकर, एम.आर. विद्रोही, एस. संजीवन नाथ, के. नाथ जैसे दलित लेखक कर रहे हैं। न व्यवस्थाएं रुकती हैं न समाज रुका रहता है और न इतिहास। अत: आज जो लोग अंबेडकरवादी आग्रहों से दलितों की भूमिका का मूल्यांकन करना चाह रहे हैं, उन्हें इन नए पाठों को भी देखना चाहिए। और सन 1857 के उस संग्राम में जिसमें उत्तर भारत में अनेक गांव शामिल थे, जिसकी तरफ इशारा अत्यंत पुरानी इतिहास पुस्तक में सुंदरलाल ने किया है और बताया है कि किस प्रकार फूल और चपाती गांव-गांव में घुमाकर यह साबित किया जाता था कि यह गांव स्वतंत्रता संग्राम में शामिल है। उन लोगों में रहने वाले शोषित दलितों के उन स्वतंत्र क्षणों को समझा जाए जहां उन्होंने अनेक बार अपने खुद की पहल पर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। ऐसा नहीं था कि राजा विद्रोह करे तभी प्रजा करे, प्रजा विद्रोह में राजा से आगे चली जाती है। इतिहास यूं ही कार्यकारण संबंधों के डिटर्मिनिस्टिक आग्रहों से नहीं चलता। इसमें अनेक स्वर होते हैं, अनेक गतिविधियां, अनेक अनुगूंजें, सिर्फ उन्हें देखने, सुनने, समझने की संवेदनशीलता होनी चाहिए।







बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

ब्रिटिश शासन और भारत में विद्रोह- कार्ल मार्क्स


वियना से तार द्वारा आने वाले समाचार बताते हैं कि तुर्की, सारडीनिया और स्विट्जरलैंड की समस्याओं का शांतिपूर्ण ढंग से हल हो जाना वहां पर निश्चित समझा जाता है।कल रात कॉमन्स सभा में भारत पर बहस सदा की तरह नीरस ढंग से जारी रही। मि. ब्लैकेट ने आरोप लगाया कि सर चार्ल्स वुड और सर जे. हौग के वक्तव्यों में झूठी आशावादिता की झलक दिखलाई देती है। मंत्रिमंडल और डायरेक्टरों के बहुत से हिमायतियों ने अपनी शक्ति भर इस आरोप का खंडन किया, और फिर अचूक मि. ह्यूम ने बहस का सार पेश करते हुए मंत्रियों से मांग की कि अपना बिल वे वापिस ले लें। बहस स्थगित हो गई।
हिंदुस्तान एशियाई आकार का इटली है : एल्प्स की जगह वहां हिमालय है, लोंबार्डी के मैदान की जगह वहां बंगाल का सम-प्रदेश है, ऐपिनाइन के स्थान पर दकन है, और सिसिली के द्वीप की जगह लंका का द्वीप है। भूमि से उपजने वाली वस्तुओं में वहां भी वैसी ही संपन्नतापूर्ण विविधता है और राजनीतिक व्यवस्था की दृष्टि से वहां भी वैसा ही विभाजन है। समय-समय पर विजेता की तलवार इटली को जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के जातीय समूहों में बांटती रही है, उसी प्रकार हम पाते हैं कि, जब उस पर मुसलमानों, मुगलों, अथवा अंगरेजों का दबाव नहीं होता तो हिंदुस्तान भी उतने ही स्वतंत्र और विरोधी राज्यों में बंट जाता है जितने कि उसमें शहर, या यहां तक कि गांव होते हैं। फिर भी, सामाजिक दृष्टिकोण से, हिंदुस्तान पूर्व का इटली नहीं, बल्कि आयरलैंड है। इटली और आयरलैंड के, विलासिता के संसार और पीडा के संसार के, इस विचित्र सम्मिश्रण का आभास हिंदुस्तान के धर्म की प्राचीन परंपराओं में पहले से मौजूद है। वह धर्म एक ही साथ विपुल वासनाओं का और अपने को यातनाएं देने वाले वैराग्य का धर्म है। उसमें लिंगम भी है, जगन्नाथ का रथ भी। यह योगी और भोगी दोनों ही का धर्म है।
मैं उन लोगों की राय से सहमत नहीं हूं जो हिंदुस्तान के किसी स्वर्ण युग में विश्वास करते हैं; लेकिन, अपने मत की पुष्टि के लिए, सर चार्ल्स वुड की भांति, कुली खां की दुहाई मैं नहीं देता। लेकिन उदाहरण के लिए, औरंगजेब के काल को लीजिए; या उस युग को जिसमें उत्तर में मुगल और दक्षिण में पुर्तगाली प्रकट हुए थे; अथवा मुसलिम आक्रमण और दक्षिण भारत में सप्त राज्यों के काल को लीजिए; अथवा, यदि आप चाहें तो, और भी प्राचीन काल में जाइए स्वयं ब्राह्मण के उस पौराणिक इतिहास को लीजिए जो कहता है कि हिंदुस्तानियों की दु:ख-गाथा उस काल से भी पहले शुरू हो गई थी जिसमें कि, ईसाइयों के विश्वास के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति हुई थी।
लेकिन, इस बात में कोई संदेह नहीं हो सकता कि हिंदुस्तान पर जो मुसीबतें अंगरेजों ने ढाई हैं वे हिंदुस्तान ने इससे पहले जितनी मुसीबतें उठाई थीं, उनसे मूलत: भिन्न और अधिक तीव्र किस्म की हैं। मेरा संकेत उस यूरोपीय निरंकुशशाही की ओर नहीं है जिसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने एशिया की अपनी निरंकुशशाही के ऊपर लाद दिया है और जिसके मेल से एक ऐसी भयानक वस्तु पैदा हो गई है कि उसके सामने सालसेट के मंदिर के दैवी दैत्य भी फीके पड़ जाते हैं। यह ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की कोई अपनी विशेषता नहीं है, बल्कि डचों की महज नकल है। यहां तक कि यदि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के तौर-तरीकों का हम वर्णन करना चाहें तो उस वक्तव्य को शब्दश: दोहरा देना ही काफी होगा जो जावा के अंगरेज गवर्नर सर स्टैमफोर्ड रैफल्स ने पुरानी डच ईस्ट इंडिया कंपनी के संबंध में दिया था : डच कंपनी का एक मात्र उद्देश्य लूटना था और अपनी प्रजा की परवाह या उसका खयाल वह उससे भी कम करती थी जितनी कि पश्चिमी भारत के बागानों का गोरा मालिक अपनी जागीर में काम करने वाले गुलामों के दल का किया करता था, क्योंकि बागानों के मालिक ने अपनी मानव संपत्ति को पैसे खर्च करके खरीदा था, लेकिन कंपनी ने उसके लिए एक फूटी कौडी तक खर्च नहीं की थी। इसलिए, जनता से उसकी आखिरी कौड़ी तक छीन लेने के लिए, उसकी श्रमशक्ति की अंतिम बूंद तक चूस लेने के लिए कंपनी ने निरंकुशशाही के तमाम मौजूदा यंत्रों का इस्तेमाल किया था; और, इस तरह, राजनीतिज्ञों की पूरी अभ्यस्त चालबाजी और व्यापारियों की सर्व-भक्षी स्वार्थलिप्सा के साथ उसे चला कर स्वेच्छाचारी और अर्ध्द-बर्बर सरकार के दुर्गुणों को उसने पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया था।
हिंदुस्तान में जितने भी गृहयुध्द छिड़े हैं, आक्रमण हुए हैं, क्रातियां हुई हैं, देश को विदेशियों द्वारा जीता गया है, अकाल पड़े हैंवे सब चीजें ऊपर से देखने में चाहे जितनी विचित्र रूप
से जटिल, जल्दी-जल्दी होने वाली और सत्यानाशी मालूम होती हों, लेकिन वे उसकी सतह से नीचे नहीं गई हैं। पर इंगलैंड ने भारतीय समाज के पूरे ढांचे को ही तोड ड़ाला है और उसके पुनर्निर्माण के कोई लक्षण अभी तक दिखलाई नहीं दे रहे हैं। उसके पुराने संसार के इस तरह उससे छिन जाने और किसी नए संसार के प्राप्त न होने से हिंदुस्तानियों के वर्तमान दु:खों में एक विशेष प्रकार की उदासी जुड़ जाती है, और, ब्रिटेन के शासन के नीचे, हिंदुस्तान अपनी समस्त प्राचीन परंपराओं और अपने संपूर्ण पिछले इतिहास से कट जाता है।
एशिया में अनादि काल से आम तौर पर सरकार के केवल तीन विभाग होते आए हैं : वित्त का, अथवा देश के अंदर लूट का विभाग; युध्द का अथवा बाहर की लूट का विभाग; और अंत में सार्वजनिक निर्माण का विभाग। जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण विशेषकर इस कारण कि सहारा से लेकर अरब, ईरान, भारत और तार्तारी होते हुए एशिया के सबसे ऊंचे पठारों तक विशाल रेगिस्तानी इलाके फैले हुए हैंपूर्व में खेती का आधार मानव द्वारा निर्मित नहरें और जल संग्रह की व्यवस्था के द्वारा सिंचाई हो रही है। मिस्र और भारत की ही तरह मेसोपोटामिया, ईरान, आदि में भी बाग बनाकर पानी को रोकने और फिर उससे जमीन को उपजाऊ बनाने की प्रथा है; नहरों में पानी पहुंचाते रहने के लिए ऊंचे स्तर से लाभ उठाया जाता है। पानी के मिलजुल कर और किफायत के साथ खर्च करने की इस बुनियादी आवश्यकता ने पश्चिम में निजी उद्योग को स्वेच्छा से सहयोग का रास्ता अपनाने के लिए बाध्य कर दिया था, जैसा कि फ्लैंडर्स और इटली में देखने में आया था। पूर्व में, जहां सभ्यता का स्तर बहुत नीचा और भूमि का विस्तार बहुत विशाल था और इसलिए जहां सहयोगी संगठन का स्वेच्छा से बनना कठिन था, इस काम को पूरा करने के लिए सरकार की केंद्रीय शक्ति के हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी। इसलिए सभी एशियाई सरकारों पर एक आर्थिक जिम्मेदारी आ पड़ीसार्वजनिक निर्माण कार्य की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी। भूमि को उपजाऊ बनाने की यह कृत्रिम व्यवस्था, जो एक केंद्रीय सरकार पर निर्भर करती थी, और सिंचाई और आबपाशी के काम की उपेक्षा होते ही तुरंत चौपट हो जाती थी, इस विचित्र लगने वाले तथ्य का भी स्पष्टीकरण कर देती है कि पाल्मीरा, पेत्रा, यमन के भग्नावशेषों और मिस्र, ईरान और हिंदुस्तान के बड़े-बड़े सूबे जैसे वे विशाल क्षेत्र, जो कभी खेती से गुलजार रहते थे, आज हमें उजाड़ और रेगिस्तान बन गए क्यों दिखाई देते हैं। इससे यह बात भी साफ हो जाती है कि यदि एक भी विनाशकारी युध्द आ जाता है तो सदियों के लिए देश को वह किस प्रकार जनविहीन बना देता है और उसकी पूरी सभ्यता का अंत कर देता है।
अंग्रेजों ने पूर्वी भारत में अपने पूर्वाधिकारियों से वित्त और युध्द के विभागों को तो ले लिया है, लेकिन सार्वजनिक निर्माण विभाग की ओर उन्होंने पूर्ण उपेक्षा दिखलाई है। फलस्वरूप, एक ऐसी खेती, जिसे स्वतंत्र व्यवसाय और निर्बाध व्यापार के मुक्त व्यापार वाले ब्रिटिश सिध्दांत के आधार पर नहीं चलाया जा सकता था, पतन के गढ़े में पहुंच गई  है। लेकिन एशियाई साम्राज्यों में हम इस बात को देखने के काफी आदी हैं कि एक सरकार के मातहत खेती की हालत बिगडती है और किसी दूसरी सरकार के मातहत वह फिर सुधर जाती है। वहां पर फसलें अच्छी या बुरी सरकारों के अनुसार होती हैं जैसे कि यूरोप में वे अच्छे या बुरे मौसम पर निर्भर करती हैं। इस तरह, उत्पीड़न और खेती की उपेक्षा बुरी बातें होते हुए भी ऐसी नहीं थीं कि उन्हें भारतीय समाज को ब्रिटिश हस्तक्षेपकारियों द्वारा पहुंचाई गई अंतिम चोट मान लिया जातायदि, उनके साथ-साथ, एक और भी बिलकुल ही भिन्न महत्व की बात न जुड़ी होती, एक ऐसी बात जो पूरी एशियाई दुनिया के इतिहास में एक बिलकुल नई चीज थी। लेकिन, भारत के अतीत का राजनीतिक स्वरूप चाहे कितना ही अधिक बदलता हुआ दिखलाई देता हो, प्राचीन से प्राचीन काल से लेकर 19वीं शताब्दी के पहले दशक तक उसकी सामाजिक स्थिति अपरिवर्तित ही बनी रही हैं। नियमित रूप से असंख्य कातने वालों और बुनकरों को पैदा करने वाला करघा और चर्खा ही उस समाज के ढांचे की धुरी थे। अनादि काल से यूरोप भारतीय कारीगरों के हाथ के बनाए हुए बढ़िया कपड़ों को मंगाता था और उनके बदले में अपनी मूल्यवान धातुओं को भेजता था; और, इस प्रकार, वहां के सुनार के लिए वह कच्चा माल जुटा देता था। सुनार भारतीय समाज का एक आवश्यक अंग होता है। बनाव-शृंगार के प्रति भारत का मोह इतना प्रबल है कि उसके निम्नतम वर्ग तक के लोग, वे लोग जो लगभग नंगे बदन घूमते हैं, आम तौर पर कानों में सोने की एक जोडी बालियां और गले में किसी न किसी का सोने का एक जेवर अवश्य पहने रहते हैं। हाथों और पैरों की उंगलियों में छल्ले पहनने का भी आम रिवाज है। औरतें और बच्चे भी अकसर सोने या चांदी के भारी-भारी कड़े हाथों और पैरों में पहनते हैं और घरों में सोने या चांदी की देवमूर्तियां पाई जाती हैं। ब्रिटिश आक्रमणकारी ने आकर भारतीय करघे को तोड़ दिया और चर्खे को नष्ट कर डाला। इंगलैंड ने भारतीय कपड़े को यूरोप के बाजार से खदेड़ना शुरू किया; फिर उसने हिंदुस्तान में सूत भेजना शुरू किया; और अंत में उसने कपड़े की मातृभूमि को ही अपने कपड़ों से पाट दिया। 1818 और 1836 के बीच ग्रेट ब्रिटेन से भारत आने वाले सूत का परिमाण 5,200 गुना बढ़ गया। 1824 में मुश्किल से 10 लाख गज अंगरेजी मलमल भारत आती थी, लेकिन 1837 में उसकी मात्रा 6 करोड़ 40 लाख गज से भी अधिक पहुंच गई। लेकिन, इसी के साथ-साथ, ढाका की आबादी 1,50,000 से घटकर 20,000 ही रह गई। भारत के जो शहर अपने कपड़ों के लिए प्रसिध्द थे, उनका इस तरह अवनत हो जाना ही इसका सबसे भयानक परिणाम नहीं था। अंगरेजी भाप और विज्ञान ने सारे हिंदुस्तान में खेती और उद्योग की एकता को नष्ट कर दिया।
पूर्व की सभी कौमों की तरह, हिंदुस्तानी एक ओर तो अपने महान सार्वजनिक निर्माण कार्यों को, जो उनकी खेती और व्यापार के मुख्य आधार थे, केंद्रीय सरकार के हाथों में छोड़े रहते थे; दूसरी तरफ, सारे देश में वे उन छोटे-छोटे केंद्रों में बिखरे रहते थे जिन्हें खेती और उद्योग-धंधों की घरेलू एकता ने कायम कर रखा था। इन दो परिस्थितियों ने एक विशेष प्रकार की सामाजिक व्यवस्था को, उस तथाकथित ग्रामीण व्यवस्था को जन्म दिया था जो अनादि काल से चली आ रही है। इस व्यवस्था ने इनमें से प्रत्येक छोटे संघ (केंद्र) को एक स्वतंत्र संगठन और खास तरह का जीवन प्रदान कर रखा था। इस व्यवस्था का अनोखा रूप कैसा था इसे नीचे दिए गए वर्णन से जाना जा सकता है। यह वर्णन भारत के मामलों पर ब्रिटेन की कॉमन्स सभा की एक पुरानी सरकारी रिपोर्ट से लिया गया है : भौगोलिक दृष्टि से, गांव देहात का एक ऐसा हिस्सा होता है जिसमें कुछ सौ या हजार एकड़ उपजाऊ और ऊसर जमीन होती है; राजनीतिक दृष्टि से, वह एक शहर या कसबे के समान होता है। ठीक से व्यवस्थित होने पर उसमें निम्न प्रकार के अफसर और कर्मचारी होते हैं : पटेल, अर्थात मुखिया, जो आम तौर पर गांव के मामलों की देखभाल करता है, उसके निवासियों के आपसी झगड़ों का निपटारा करता है, पुलिस की देख-रेख करता है, और अपने गांव के अंदर मालगुजारी वसूल करने का काम करता है। यह काम ऐसा है जिसके लिए उसका व्यक्तिगत प्रभाव और परिस्थितियों और लोगों की समस्याओं के संबंध में उसकी सूक्ष्म जानकारी उसे खास तौर से सबसे अधिक उपयुक्त व्यक्ति बना देती है। कातिब (पटवारी) खेती का हिसाब-किताब रखता है और उससे संबंधित हर चीज को अपने कागजों में दर्ज करता है। तालियर (चौकीदार) और तोती (दूसरी तरफ का चौकीदार)इनमें से तालियर का काम अपराधों और जुर्मों का पता लगाना और एक गांव से दूसरे गांव जाने वाले यात्रियों को वहां तक पहुंचाना और उनकी रक्षा करना होता है; तोती का काम गांव के अंदरूनी मामलों से अधिक जुड़ा हुआ मालूम होता है, अन्य कामों के साथ-साथ वह फसलों की चौकीदारी करता है और उन्हें मापने में मदद देता है। सीमा-कर्मचारी, जो गांव की सीमाओं की रक्षा करता है, अथवा कोई विवाद उठने पर उसके संबंध में गवाही देता है। तालाबों और सोतों का सुपरिंटेंडेंट खेती के लिए पानी बांटता है। ब्राह्मण गांव की ओर से पूजा करता है। स्कूल मास्टर रेत के ऊपर गांव के बच्चों को पढ़ना और लिखना सिखाता हुआ दिखलाई देता है। पत्र वाला ब्राह्मण, अथवा ज्योतिषी आदि भी होता है। ये अधिकारी और कर्मचारी ही आम तौर से गांव का प्रबंध करते हैं। लेकिन देश के कुछ भागों में इस प्रबंधव्यवस्था का विस्तार इतना नहीं होता; ऊपर बताए गए कर्तव्यों और कार्यों में से कुछ एक ही व्यक्ति को करने पड़ते हैं। दूसरे भागों में इन अधिकारियों और कर्मचारियों की तादाद ऊपर गिनाए गए व्यक्तियों से भी अधिक होती है। इसी सरल म्युनिसिपल शासन के अंतर्गत इस देश के निवासी न जाने कब से रहते आए हैं। गांवों की सीमाएं शायद ही कभी बदली गई हों; और यद्यपि गांव स्वयं कभी-कभी युध्द, अकाल अथवा महामारी से तबाह और बर्बाद तक हो गए हैं, लेकिन उनके वही नाम, वही सीमाएं, वही हित, और यहां तक कि वही परिवार युगों-
युगों तक कायम रहे हैं। राज्यों के टूटने और छिन्न-विच्छिन्न हो जाने के संबंध में निवासियों ने कभी कोई चिंता नहीं की। जब तक गांव पूरा का पूरा बना रहता है, वे इस बात की परवाह नहीं करते कि वह किस सत्ता के हाथ में चला जाता है, या उस पर किस बादशाह की हुकूमत कायम होती है। गांव की अंदरूनी आर्थिक व्यवस्था अपरिवर्तित ही बनी रहती है। पटेल अब भी गांव का मुखिया बना रहता है, और अब भी वही छोटे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की तरह गांव से मालगुजारी वसूल करने अथवा जमीन को उठाने का काम करता रहता है।
सामाजिक संगठन के ये छोटे-छोटे एक ही तरह के रूप अब अधिकतर मिट गए हैं, और मिटते जा रहे हैं। टैक्स इकट्ठा करने वाले अंगरेज अफसरों और अंगरेज सिपाहियों के पाशविक हस्तक्षेप के कारण वे इतने नहीं मिटे हैं जितने कि अंगरेजी भाप और अंगरेजी मुक्त व्यापार की कारगुजारियों के कारण। गांवों में रहने-सहने वाले उन परिवारों का आधार घरेलू उद्योग थे। हाथ से सूत बुनने, हाथ से सूत कातने और हाथ से ही खेती करने के उस अनोखे संयोग से उन्हें आत्मनिर्भरता की शक्ति प्राप्त होती थी। अंगरेजों के हस्तक्षेप ने सूत कातने वाले को लंकाशायर में और बुनकर को बंगाल में रख कर, या हिंदुस्तानी सूत कातने वाले और बुनकर दोनों का सफाया करकेउनके आर्थिक आधार को नष्ट करकेइन छोटी-छोटी अर्ध्द बर्बर, अर्ध्द सभ्य बस्तियों को छिन्न-विछिन्न कर दिया है और इस तरह उसने एशिया की महानतम और सच कहा जाए तो एकमात्र सामाजिक क्रांति कर डाली है।
यह ठीक है कि उन असंख्य उद्योगशील पितृसत्तात्मक और निरीह सामाजिक संगठनों का इस तरह टूटना और टुकडाें-टुकड़ों में बिखर जाना विपत्तियों के सागर में पड़ जाना, और साथ ही साथ उनके व्यक्तिगत सदस्यों द्वारा अपनी प्राचीन सभ्यता और जीविका कमाने के पुश्तैनी साधनों को खो बैठना निस्संदेह ऐसी चीजें हैं जिनसे मानव-भावना अवसाद में डूब जाती है; लेकिन, हमें यह न भूलना चाहिए कि, ये काव्यमय ग्रामीण बस्तियां ही, ऊपर से वे चाहे कितनी ही निर्दोष दिखलाई देती हों, पूर्व की निरंकुशशाही का सदा ठोस आधार रही हैं, कि मनुष्य के मस्तिष्क को उन्होंने संकुचित से संकुचित सीमाओं में बांधे रखा है जिससे वह अंधविश्वासों का असहाय साधन बन गया है, परंपररागत रूढियों का गुलाम बन गया है और उसकी समस्त गरिमा और ऐतिहासिक ओज उससे छिन गया है। उस बर्बर अहमन्यता को हमें नहीं भूलना चाहिए जो, अपना सारा ध्यान जमीन के किसी छोटे से टुकड़े पर लगाए हुए, साम्राज्यों को टूटते-मिटते, अवर्णनीय अत्याचारों को होते, बड़े-बड़े शहरों की जनसंख्या का कत्लेआम होते चुपचाप देखती रही। इन चीजों की तरफ देखकर उसने ऐसे मुंह फिरा लिया है जैसे कि वे कोई प्राकृतिक घटनाएं हों। वह स्वयं भी हर उस आक्रमणकारी का असहाय शिकार बनती रही है जिसने उसकी तरफ किंचित भी दृष्टिपात करने की परवाह की है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दूसरी तरफ, इसी प्रतिष्ठाहीन, गतिहीन और सर्वथा जड़ जीवन ने, उस तरह के निष्क्रिय अस्तित्व ने, अपने से बिलकुल भिन्न, विनाश की अनियंत्रित, उद्देश्यहीन, असीमित शक्तियों को भी जगा दिया था, और मनुष्य-हत्या तक को हिंदुस्तान की एक धार्मिक प्रथा बना दिया था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन छोटी-छोटी बस्तियों को जात-पांत के भेदभावों और दासता की प्रथा ने दूषित कर रखा है, कि मनुष्य को परिस्थितियों का सर्वसत्ताशाली स्वामी बनाने के बजाए उन्होंने उसे बाह्य परिस्थितियों का दास बना दिया है, कि अपने आप विकसित होने वाली एक सामाजिक सत्ता को उसने एक कभी न बदलने वाला स्वाभाविक प्रारब्ध का रूप दे दिया है और, इस प्रकार उसने एक ऐसी प्रकृति-पूजा को प्रतिष्ठित कर दिया है जिसमें मनुष्य अपनी मनुष्यता खोता जा रहा है। इस मनुष्य का अध:पतन इस बात से भी स्पष्ट हो रहा था कि प्रकृति का सर्वसत्ताशाली स्वामी मनुष्य घुटने टेककर बानर हनुमान और गऊ शबला की पूजा करने लगा था।
यह सच है कि हिंदुस्तान में इंग्लैंड ने निकृष्टतम उद्देश्यों से प्रेरित होकर सामाजिक क्रांति की थी और उपने उद्देश्यों को साधने का उसका तरीका भी बहुत मूर्खतापूर्ण था। लेकिन सवाल यह नहीं है। सवाल यह है कि क्या एशिया की सामाजिक अवस्था में एक बुनियादी क्रांति के बिना मानव-जाति अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती है? यदि नहीं, तो मानना पड़ेगा कि इंगलैंड के चाहे जो गुनाह रहे हों, उस क्रांति को लाने में वह इतिहास का एक अचेतन साधन था।
(25 जून 1853 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, संख्या 3804, में प्रकाशित हुआ।)





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