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सोमवार, 29 अगस्त 2016

लोकतंत्र में ´भारतीय अवसरवाद´बनाम ´पाक अवसरवाद´का घिनौना खेल

           कश्मीर के राजनेताओं में ´भारतीय अवसरवाद´ और ´पाक अवसरवाद´ये दो फिनोमिना पाए जाते हैं। इन दोनों का समय-समय पर सभी स्थानीय दल और बड़े नेता इस्तेमाल करते रहे हैं।कश्मीर के पूर्व राजा से लेकर शेख अब्दुल्ला तक,फारूख अब्दुल्ला से लेकर महबूबा मुफ्ती तक इन दोनों फिनोमिना को वहां की जनता और इतिहास ने देखा है।पूर्व मुख्यमंत्री मोहम्मद मुफ्ती सईद की मृत्यु के बाद महबूबा मुफ्ती को मुखयमंत्री बनाने में भाजपा ने जो देरी की उसका बड़ा कारण था उनके मन में छिपा ´पाक अवसरवाद´,जिसे भाजपा और स्वयं पीएम नरेन्द्र मोदी नापसंद करते थे।

महबूबा को मुख्यमंत्री बनाने के पहले उनसे भारत के प्रति निष्ठा के राजनीतिक वचन लिए गए उसके बाद उनको मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गयी। ये राजनीतिक वचन क्या थे,मीडिया उनके बारे में अनभिज्ञ है।लेकिन भारत के प्रति निष्ठा की शपथ तो लेनी थी ,लेकिन महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपना वास्तविक रंग दिखाना शुरू कर दिया।

सच यह है कि हुर्रियत के विभिन्न संगठनों और विभिन्न नामों से सक्रिय पृथकतावादी संगठनों की गतिविधियों में विगत दो सालों में तेजी आई है । भारत विरोधी माहौल सघन हुआ है। भारत विरोधी माहौल को सघन बनाने में पीएम नरेन्द्र मोदी की नीतियों राजनीतिक कलाकारी की केन्द्रीय भूमिका रही है।

आज से दो साल पहले का जो कश्मीर था और आज जो कश्मीर है वह एकदम भिन्न है।नेताओं की भाषा और भंगिमा के साथ पाक समर्थित आंदोलनकारियों की भाषा और भंगिमा भी बदली हुई है। यहां तक कि आम जनता का रूख भी बदला हुआ है।पहले की तुलना में पाक समर्थित संगठन आज आम जनता में ज्यादा सक्रिय हैं और उनका कश्मीर की जनता के एक वर्ग के अंदर के अंदर प्रभाव विस्तार नजर आ रहा है।

भाजपा-पीडीपी का संयुक्त मोर्चा जम्मू-कश्मीर में किस तरह चुनाव जीतकर आया है इसे कश्मीर का बच्चा-बच्चा जानता है।यदि अनभिज्ञ हैं तो इस राज्य के बाहर के लोग।मैंने हाल ही मई में कश्मीर में 15 दिनों तक कई जिलों का व्यापक दौरा किया और विभिन्न तबके के लोगों से मुलाकात की,इनमें विभिन्न रंगत के राजनीतिकदलों के जमीनी कार्यकर्ता भी थे।लेह से कश्मीर तक एक ही बात सबने कही कि भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पानी की तरह पैसा बहाकर लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ा। इतना पैसा भाजपा ने पहले कभी नहीं बहाया। विभिन्न दलों के द्वारा बड़े पैमाने पर वोट खरीदे गए और स्थानीय स्तर पर सक्रिय पृथकतावादी नेताओं को लाखों रूपये खिलाकर वोट जुगाड़ किए गए। भाजपा-पीडीपी ने प्रति वोट 1500रूपये बांटा।जबकि कांग्रेस-नेशनल कॉफ्रेस ने प्रति वोट 1000रूपये बांटे। जनता को भ्रष्ट करके वोट हासिल करने की इस प्रक्रिया को चुनाव आयोग भी रोक नहीं पाया,राष्ट्रीय मीडिया उद्घाटित नहीं कर पाया।हम मुगालते में रहे कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र जीत गया। पैसों के वितरण के खेल में एक मुश्त मोटी रकम पृथकतावादी नेताओं की जेब में भी गयी। आम जनता की इस घिनौनी साजिश के हम सब मूक-दर्शक बने रहे।खरीद-फरोख्त के आधार पर जुटायी गयी इस जनता के बल पर राष्ट्रीय एकता और अखंड़ता को बचाने की कोशिश की कल्पना करना दिवा-स्वप्न देखने के बराबर है। आम जनता को पैसों के बल पर गोलबंद करके लोकतंत्र को बचाने का यह काम भाजपा-पीडीपी-कांग्रेस-नेशनल कॉफ्रेंस आदि ने मिलकर किया।यह बड़े पैमाने पर जनता को भ्रष्ट बनाने,उसकी गरीबी और राजनीतिकचेतना के अभाव के दुरूपयोग की ऐसी खतरनाक कहानी है जिसकी स्क्रिप्ट और किसी ने नहीं बल्कि प्रमुख चारों राजनीतिक दलों ने लिखी,लेकिन इसके असल सूत्रधार हैं पीएम नरेन्द्र मोदी।पैसों के बल पर चुनाव जीतने की कला में वे अव्वल हैं। घाटी में उन्होंने जो खतरनाक खेल शुरू किया उसने आम जनता में उनकी लोकतांत्रिक निष्ठाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आज घाटी में पीएम नरेन्द्र मोदी की साख सबसे निचले स्तर पर है। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से भारत की राजनीति के शिखर पुरूष और कश्मीरी जनता के बीच के मौजूदा अलगाव को सहज ही देख सकते हैं।यही वह प्रस्थान बिंदु है जिसे आधार बनाकर कश्मीर की जनता में भारत के नेतृत्व की मूल्यहीन राजनीति का पृथकतावादियों ने जमकर प्रचार किया और अपनी साख बढ़ाने में कामयाबी हासिल की। बुरहान वानी की सैन्यबलों के हाथों हत्या के बाद पैदा हुए आक्रोश की यही वह पृष्ठभूमि भी है। जम्मू-कश्मीर के चुनावों में पैसों के खेल को हमने कभी गंभीरता से नहीं लिया।यही पैसों का खेल आज देश की एकता और अखंड़ता के लिए सबसे बड़ा संकट है।एकबार जब वहां की आम जनता को पैसे खिलाकर भ्रष्टाचार का चस्का लगा दिया गया तो फिर इसका पाक समर्थित संगठनों ने अपने तरीकों से इस्तेमाल किया है।बड़े पैमाने पर पाक से पैसा वहां पहुँचा है।अब वहां पैसा प्रमुख है, देश गौण है। इस काम में पृथकतावादियों के द्वारा संचालित मसजिदों,स्कूलों-कॉलेजों आदि के संचालन में लगे विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के नेटवर्क ने भी सक्रिय भूमिका निभायी है।

दिलचस्प बात यह है कि मोदी सरकार आने के बाद कश्मीर में सक्रिय किसी भी स्वयंसेवी संगठन को भाजपा-आरएसएस ने निशाने पर नहीं लिया है।इनमें ऐसे भी संगठन हैं जिनको लाखों-करोड़ों रूपयों की विभिन्न तरीकों से मदद देश-विदेश से मिल रही है और जिनका संचालन प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से पृथकतावादी नेताओं के हाथ में है। सवाल यह है कश्मीर में सक्रिय स्वयंसेवी संगठनों और पूंजी के खिलाडियों की भूमिका पर मोदी सरकार एकदम निष्क्रिय क्यों है ॽ यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसके तहत पाक अधिकृत कश्मीरी शरणार्थियों की मदद के नाम पर मोदी सरकार ने हाल ही में दो हजार करोड़ रूपये का फंड आवंटित किया है।यह फंड आवंटित नहीं किया जाता तो बेहतर होता।यह तो पैसे से खरीदने की घटिया योजना है,जो अंततःमुसीबतों को लेकर आएगी।







शनिवार, 27 अगस्त 2016

राष्ट्रवाद के अन्तर्विरोधों में फंसा अशांत कश्मीर

         कश्मीर को देखने के लिए राष्ट्रवाद की नहीं लोकतांत्रिक नजरिए की जरूरत है।भाजपा ऊपर से नाम संविधान का ले रही है लेकिन कश्मीर की समस्या को राष्ट्रवादी नजरिए से हल करना चाहती है। राष्ट्रवाद के पास जातीय समस्या का कोई समाधान नहीं है।दिलचस्प बात यह है कि भाजपा-आरएसएस हिन्दू राष्ट्रवाद के पैमाने से समाधान खोज रहे हैं वहीं आतंकी संगठन कश्मीरी राष्ट्रवाद के जरिए समाधान खोज रहे हैं लेकिन ये दोनों ही नजरिए अंततःहिंसा और अशांति की ओर जाते हैं। सारी दुनिया का अनुभव है कि उत्तर –औपनिवेशिक दौर में राष्ट्रवाद आत्मघाती मार्ग है।

कश्मीर की जनता के इस समय दो शत्रु हैं पहला है कश्मीरी राष्ट्रवाद और दूसरा है हिन्दू राष्ट्रवाद।राष्ट्रवाद बुनियादी तौर पर हिंसा और घृणा की विचारधारा है।इसका चाहे जो इस्तेमाल करे उसे अंततःहिंसा की गोद में उसे शरण लेनी पड़ती है। राष्ट्रवाद को उन्मादी नारे और हथियारों के अलावा और कोई चीज नजर नहीं आती।कश्मीर की आजादी के नाम पर जो लोग लड़ रहे हैं वे आजादी के नाम पर कश्मीर को जहन्नुम के हवाले कर देना चाहते हैं।जमीनी हकीकत यह है कि अधिकतर युवाओं को कश्मीरी की आजादी का सही अर्थ तक नहीं मालूम ,यही हाल नेताओं का है।

विगत 70 सालों में हजारों मीटिंगें हुई हैं लेकिन कश्मीर की आजादी का अर्थ समझाते हुए कभी किसी दल ने कोई दस्तावेज आज तक भारत की जनता के सामने,संसद में पेश नहीं किया।कश्मीर की आजादी को कश्मीरी राष्ट्रवाद के हिंसक और अंतर्विरोधी फ्रेमवर्क में रखकर ही हमेशा पेश किया गया, इसके बहाने कश्मीर के अंदर जो धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ताकते हैं उनके खिलाफ माहौल बनाने की लगातार कोशिशें हुई हैं।दिलचस्प बात यह है कि कश्मीरी राष्ट्रवादियों और हिन्दू राष्ट्रवादियों का संयुक्त मोर्चा मौजूदा राज्य सरकार को संचालित कर रहा है और सारी समस्या की जड़ यही मोर्चा है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी के नारे ´जम्हूरियत कश्मीरियत और इंसानियत´में भी कश्मीरी राष्ट्रवाद को कश्मीरियत के नाम पर शामिल कर लिया गया है और मौजूदा प्रधानमंत्री उस नारे को बार-बार दोहरा रहे हैं,जबकि समस्या इसी समझ में है।कश्मीर की समस्या को यदि मोदीजी राष्ट्रवाद के फ्रेमवर्क से देखेंगे तो समाधान कम और टकराव ज्यादा पैदा होंगे, अटलजी के फ्रेमवर्क से देखेंगे तो वहां से भी हिंसक रास्ते ही खुलते हैं।इस दौर में जब भी जातीयता और राष्ट्रवाद को आधार बनाकर राजनीतिक समस्याओं के समाधान खोजे गए हिंसा और टकराव ही पैदा हुआ।खालिस्तान के दौर में ´पंजाबियत´का हश्र हम हिंसा में रूपान्तरित होते देख चुके हैं।

कश्मीर को लोकतंत्र चाहिए ´कश्मीरियत´नहीं।कश्मीर को ´नागरिक´ भावबोध चाहिए ´कश्मीरी´भावबोध नहीं।जो लोग´कश्मीरियत´के परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं वे पुराने अ-प्रासंगिक परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं।कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है,इसमें वह इलाका भी आता है जो पाक अधिकृत कश्मीर के नाम से जाना जाता है। कश्मीर की स्थानीय राजनीति में धर्मनिरपेक्ष ताकतें भी कश्मीरियत को भुनाती रही हैं,इससे भी समस्याएं पैदा हुई हैं।

मूल प्रश्न यह है कि कश्मीर को लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य से देखें या राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य से ।राष्ट्रवाद का परिप्रेक्ष्य ,चाहे वह देशभक्त हो या विभाजनकारी,अंततःजनता को अंधी भीड़ में तब्दील करता है। लोकतंत्र का परिप्रेक्ष्य कश्मीरी जनता के स्वायत्त और आत्मनिर्भर संसार को सृजित करता है।कश्मीर की समस्या पर संविधान के दायरे में कोई भी बातचीत होगी तो लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में ही होगी।हमारा संविधान राष्ट्रवाद को मंजूरी नहीं देता।राष्ट्रवाद का परिप्रेक्ष्य अ-संवैधानिक है।

कश्मीर पर जब भी बातें होती हैं तो हिन्दू बनाम मुसलमान,पाक बनाम भारत,आतंकी बनाम राष्ट्रवादी,मुसलिम बहुसंख्यक बनाम हिन्दू अल्पसंख्यक या कश्मीरी पंडित आदि वर्गीकरण में रखकर देखते हैं।फलतः कश्मीर के बाशिंदों को हम नागरिक के रूप में देख ही नहीं पाते।बार-बार यही कहा जाता है कश्मीर में तो बहुसंख्यक मुसलमान हैं ,फलतः वहां आतंकी-पृथकतावादी संगठनों का राजनीतिक रूतबा है। कायदे से हमें इस तरह के विभाजनकारी वर्गीकरण में रखकर कश्मीर को,वहां की जनता को नहीं देखना चाहिए.कश्मीर में भी भारत के अन्य इलाके की तरह मनुष्य रहते हैं,वे हमारे देश के नागरिक हैं,उनको धर्म ,जातीयता और राष्ट्रवाद के नाम पर वर्गीकृत करके नहीं देखें।

कश्मीर की जनता को भीड़ में तब्दील करने में राष्ट्रवादी नजरिए की बड़ी भूमिका है।राष्ट्रवादी-आतंकी नजरिए का परिणाम है कि वहां पर आज जनता भीड़ की तरह आगे चल रही है और नेता उसके पीछे चल रहे हैं।लोकतंत्र में नेता जनता का नेतृत्व करते हैं लेकिन राष्ट्रवादी फ्रेमवर्क में भीड़ नेताओं का नेतृत्व करती है।यही वह आयरनी है जिससे निकलने की जरूरत है।



कश्मीर के निवासियों को हम अपने ही देश का नागरिक समझें,उनके दुख-दर्द को अपना दुख-दर्द समझें,पराए के रूप में देखना बंद करें।कश्मीर को पराए के रूप में देखने के कारण ही आज हालात यह हैं कि हमारी संसद भी ठीक से नहीं जानती कि कश्मीरियों की फिलहाल असल समस्याएं क्या हैं।हाल ही में संसद में कश्मीर के मौजूदा हालत पर जो बहस हुई उसमें विभिन्न दलों के नेताओं ने भाषण दिए,उन भाषणों में कश्मीरी जनता की अनुभूतियां,दुख-दर्द गायब थे,सिर्फ नारे थे,रेटोरिक था,लेकिन मर्मस्पर्शी भावबोध गायब था।इससे पता चलता है राजनीतिक नेतृत्व कश्मीर की जमीनी हकीकत से एकदम अनभिज्ञ है।

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