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गुरुवार, 10 जनवरी 2013

मीडिया की पेज थ्री संस्कृति में कैद माकपा


   मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद राजनीतिक तौर पर सबको लाभ हुआ है। भाजपा से लेकर नीतीश कुमार तक सभी जाने-अनजाने लाभान्वित हुए हैं। लेकिन माकपा को मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मानो ग्रहण ही लग गया है। खासकर यूपीए-2 के शासन में आने के बाद से वामदलों की राजनीतिक पहलकदमी में तेजी से गिरावट आई है। आज संसदीय क्षितिज से लेकर सड़कों तक माकपा की आवाज कहीं पर भी सुनाई नहीं देती। माकपा और वामदलों की इस तरह राजनीतिक अनुपस्थिति भय पैदा कर रही है। यह विचार करने लायक बात है कि एक जमाने में वामदलों का सभी राष्ट्रीय सवालों पर विपक्ष में महत्वपूर्ण योगदान था और सारा देश देखता था कि आखिरकार फलां मसले पर वामदल क्या कहते हैं ? लेकिन इनदिनों वामदलों को जैसे लगवा मार गया है। 

यूपीए-2 के शासन में आने के साथ वामदलों की निष्क्रियता क्यों बढ़ी है ? और वामदलों में इस निष्क्रियता को तोड़ने में कोई सरगर्मी नजर क्यों नहीं आती इसके बारे में कहीं पर कोई हलचल नजर नहीं आती। इसके कारणों की गंभीरता से तलाश की जानी चाहिए।

माकपा में आई राजनीतिक पस्ती का प्रधान कारण है माकपा का पेज 3 मार्का मार्क्सवादी नेतृत्व । पेज 3थ्री कल्चर से प्रभावित होकर जिस लीडरशिप को शीर्षपदों पर बिठाया गया है उस लीडरशिप को हिन्दुस्तान की धड़कनों का ज्ञान नहीं है। ये वे लोग हैं जो राष्ट्र को ठीक से नहीं जानते। ये अपने अपने इलाके क्षत्रप हैं। इनमें कुछ की लोकल जड़ें हैं। लेकिन देश इनके लिए आज भी बेगाना है। देश के प्रति बेगानापन और देश की जनता के यथार्थ अलगाव के कारण माकपा ने अपनी राजनीतिक पहलकदमी खो दी है।

टीवी पर आपको सभी दल राजनीतिक एक्शन करते नजर आएंगे लेकिन माकपा के नेता नजर नहीं आएंगे। विगत तीन सालों में माकपा नेताओं ने संसदीय गतिविधियों में भाजपा के साथ जिस तरह का फ्लोर मैनेजमेंट किया है उससे उनका राजनीतिक अवमूल्यन हुआ है। संसद में निजी पहल को छोड़कर भाजपा की राजनीतिक पहल का हिस्सा बनकर माकपा ने सत्ताधारी वर्गों की सेवा की है।

माकपा में राजनीतिक निष्क्रियता का एक बड़ा कारण है राज्यस्तर पर माकपा का बूढ़ा नेतृत्व। खासकर केरल और पश्चिम बंगाल में स्थितियां बेहद खराब हैं। पश्चिम बंगाल में जो नेतागण थक गए थे उनको पार्टी के कामों से मुक्ति नहीं दी गयी, जिन नेताओं को राज्य की आम जनता एकदम नापसंद करती है उनको जनसंगठनों से लेकर पार्टी पदों तक से मुक्त नहीं किया गया।

मसलन् ,पश्चिम बंगाल में राज्य विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद कम से कम बुद्धदेव भट्टाचार्य,विमान बसु को पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय समिति से निकाल देना चाहिए था लेकिन माकपा का केन्द्रीय नेतृत्व ऐसा नहीं कर पाया। बुद्धदेव भट्टाचार्य के व्यक्तिगत तौर पर जितने भी गुण हों लेकिन उनकी राजनीतिक असफलताएं उससे बड़ी हैं। इसी तरह सांगठनिक स्तर पर विमान बसु की सांगठनिक असफलताएं भी जबावदेही की मांग करती हैं। विमान बसु के कार्यकाल में पार्टी में बड़े पैमाने पर अ-मार्क्सवादी संस्कृति का विकास हुआ है और फलतः पूरी कम्युनिस्ट पार्टी पेजथ्री कल्चर और गुटबाजी में फंसकर रह गयी है।

माकपा के नेता विपक्ष की जंग टीवी चैनलों और मीडिया प्रबंधन के जरिए लडना चाहते हैं। पार्टी नेताओं ने संघर्ष और कुर्बानी का रास्ता त्यागकर टीवी टॉकशो और प्रेस कॉफ्रेस का रास्ता अपना लिया है और वे यह मानकर चल रहे हैं कि अपने तर्कशास्त्र के जरिए ममता बनर्जी और उनके दल तृणमूल कांग्रेस को आम जनता से अलग-थलग कर देंगे।

टीवी चैनलों से प्रचार किया जा सकता है लेकिन संगठन नहीं बना सकते। टीवी चैनलों के जरिए विज्ञापन जुटाकर पार्टी कोष में बढ़ोत्तरी की जा सकती है लेकिन इससे आम जनता से संपर्क-संबंध बहाल नहीं किए जा सकते। माकपा की बुनियादी कमजोरी है कि वह मीडिया इमेज की शिकार है।

माकपा अब आंदोलन नहीं करती बल्कि टीवी बाइटस बनाने के लिए एक्शन करती है। किसी भी एक्शन का बाइटस तक सीमित रहना और फिर नई बाइट्स के लिए टॉकशो या टीवी कैमरामैन की तलाश ही इनदिनों माकपा नेताओं की बड़ी गतिविधि है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि बैंकों में 10 लाख कर्मचारी हड़ताल पर चले गए लेकिन उनके लिए कोई दीर्,कालिक संघर्ष का मार्ग वामदल नहीं सुझा पाए हैं। वामदलों की राजनीतिक असफलता देखें कि वे संसद में बैंकिंग संशोधन बिल के विरोध में अन्य राजनीतिक दलों को अपने साथ नहीं ला पाए ,यहां तक कि जिस भाजपा का वे विगत तीन सालों से संसद में हर मसले पर साथ दे रहे थे उसने भी बैंकिंग संशोधन बिल पर माकपा के साथ जाने की बजाय मनमोहन सरकार का समर्थन करना जरूरी समझा। बैंक कर्मचारियों की मांगों पर वामदलों के साथ अन्य दलों का न आना वामदलों की अब तक सबसे बड़ी असफलता है। पहले कभी इस तरह बैंक कर्मचारियों की मांगों पर वामदल अलग-थलग नहीं पड़े थे जिस तरह इसबार अलग-थलग पड़े हैं। इसके अलावा प्रमोशन में आरक्षण के सवाल पर वामदलों का रूख चिंता पैदा करने वाला है।

वामदलों और खासकर माकपा को यदि एक जंगजू कम्युनिस्ट पार्टी की इमेज पुनःअर्जित करनी है तो उसे पेजथ्री कल्चर के बाहर आना होगा वरना कम्युनिस्ट पार्टी का अन्यदलों से भेद ही खत्म हो जाएगा।











शनिवार, 23 जुलाई 2011

मैं तो एक मुश्ते गुबार हूं...- बटुकेश्वर दत्त


सरदार की गुनगुनाहट आज भी मेरे कानों से टकरा रही है- मैं तो एक मुश्ते-गुबार हूं... धोकर निचोड़े गए कपड़ों को झटके दे देकर जैसे वह धूप में फैला रहा हो और पूरी तन्मयता के साथ गुनगुना रहा हो।कानपुर स्थित सुरेश दादा के मेस की दूसरी मंजिल की छत पर किशोर सरदार के कपड़े धोने का दृश्य अब भी उसी तरह अम्लान है-कंधे सहित सिर पर लिपटा केश-गुच्छ, कमर में एक कच्छा छोड़कर पूरा नंगा बदन, जल की धार पर वह लगातार कपड़े पटक रहा है। साबुन के शुभ्र फेन उड़-उड़कर इधर-उधर फैल रहे हैं। मैं बगल में बैठा अन्य कपड़ों पर साबुन घिस रहा हूं और सरदार बार-बार वही एक पंक्ति दुहराये जा रहा है-मैं तो...

सन् उन्नीस सौ चौबीस के शुरू का कोई महीना। मैं उन दिनों कानपुर के बंगाली मिडिल स्कूल का विद्यार्थी और पारिवारिक अनुशासन की आंखें बचाकर क्रांतिकारी दल की शाखा का एक सक्रिय कार्यकर्त्ता। श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के समाचार पत्र 'प्रताप' से सम्बध्द, दल के प्रमुख नेता श्री सुरेशचंद्र के निर्देशानुसार एक शाम उनसे मिलने कम्पनी बाग गया। क्यों और किसलिए बुलाया गया था, यह पूछना दलीय अनुशासन के विरुध्द था और आदेश पर आंख मूंदकर चलना ही हमारे विप्लवी जीवन का प्रथम पाठ। इसलिए हर तरह की परिस्थिति के प्रति अपने को तैयार कर समय से वहां पहुंचा। सुरेश दादा नहीं थे। बाग के एक छोर से दूसरे तक मेरी चंचल निगाहें ढूंढ़ गयीं, पर कहीं पर भी वह नजर नहीं आया। मुझे आश्चर्य हुआ क्रांतिकारियों के कार्यक्रम में इस तरह की भूल पहले कभी देखने को नहीं मिली थी। घनघोर अंधेरी रात में भी मूसलाधार वर्षा सिर पर झेलते हुए, सीआईडी की निगाहें बचाता निर्दिष्ट कार्य के लिए ठीक जगह निर्धारित समय पर हाजिरी बजाने में इसके पहले मुझसे कभी भूल नहीं हुई थी। फिर आज प्रमुख क्रांतिकारी नेता के निर्देश और कार्य में यह अंतर क्यों?

इसी उधेड़बुन में पड़ा था कि मेरी आंखें एक घनी, कांटेदार झाड़ी से जाकर उलझ गयीं। क्या ही अजीब, रोंगटे खड़े कर देने के साथ-साथ हंसाने वाला दृश्य! झाड़ी केऊपर एक सफेद पगड़ी का सिरा लगातार दायें से बायें और बायें से दायें मोर की पखी की तरह डोल रहा था। मैं नजर गड़ाये उसे देखता रहा। बीच-बीच में वह स्थिर हो जाता और फिर घड़ी के पेंडुलम की तरह अपनी चाल पकड़ लेता। बाग के निस्तब्ध वातावरण में, जबकि संध्या का रक्तिम प्रकाश रात के अंधेरे में अपना मुंह छिपाने की तैयारी कर रहा हो, कांटेदार झाड़ी के ऊपर से सफेद पगड़ी का वह हिलता सिरा इशारे से जैसे मुझे अपने पास बुला रहा था। मैं आगे बढ़ा। झाड़ी के समीप पहुंचते ही उस सफेद पगड़ी का अधिकारी साढ़े पांच फुट से भी लंबा एक सिख युवक मेरी आहट पर उछलकर खड़ा हो गया। उसकी काली चमकती आंखों में शंका की भावना और लम्बी लटकती दोनों भुजाओं पर कमीज के चढ़े आस्तीन, दृढ़ मुट्ठियों में बंद लंबी उंगलियां, दोनों गालों पर दाढ़ी की हल्की रेखा, सिर पर पगड़ी में कैद केश-गुच्छ, जिसकी कुछ लटें बाहर झूल रहीं थीं। मेरे सामने वह सिख युवक चैलेंज का भाव चेहरे पर लिए खड़ा था और मैं उसकी तात्कालिक मुद्रा के प्रति उदासीन, कि तभी बगल में निश्चल गिरिराज की भांति बैठे विप्लवी सुरेश दादा पर ध्यान गया। मुझे देखकर उनके चेहरे पर चिर-परिचित मुस्कराहट खेल गयी और सरदार शांत पड़ा। उसकी दृढ़ मुट्ठियों की उंगलियां सहज और शिथिल हुई। मुझ नवागंतुक को देखते ही जो चमक और खून उसकी आंखों में उतर आया था, सुरेश दादा की मुस्कराहट से जैसे पूरे चेहरे पर लालिमा बन फैल गया और मुझे लगा अपनी अनावश्यक दृढ़ता के लिए वह कुछ झेप-सा रहा है। सुरेश दादा ने हंसते हुए हम दोनों को आमने-सामने बैठाया और उस तरुण सरदार से मेरा परिचय कराया नाम- बलवंत सिंह पंजाब के नेशलनल कालेज में बीए के छात्रा हैं। प्रमुख क्रांतिकारी नेता रासबिहारी बोस निकटतम सहयोगी शचींद्रनाथ सान्याल 'बंदी जीवन' के लेखक एवं बाद में काकौरी षड़यंत्रा के प्रमुख अभियुक्त उस समय उत्तरी भारत में क्रांतिकारी दल के प्रमुख संगठनकर्त्ता थे। पंजाब नेशनल कालेज के अध्यापक श्री जयचंद्र विद्यालंकार की मार्फत शचींद्र दादा से उस सिख नवयुवक का परिचय हुआ और वह क्रमश:विप्लवी संगठन में खिंच आया। उसकी क्रांतिकारी विचारधारा देखते हुए परिवार के लोग छात्रावस्था में ही उसका विवाह कर देने का निर्णय कर चुके थे, लेकिन क्रांतिपथ के पथिक उस तरुण को अपने विवाह का प्रस्ताव मंजूर नहीं था और उसी से मुक्ति पाने के लिए तमाम पारिवारिक आत्मीयता एवं परिवार के लोगों से संबंध-विच्छेद कर वह लाहौर से सुरेश दादा के आश्रय में कानपुर भाग आया था। रूसी विप्लवियों का प्रभाव उसकी स्मृतियों में था और उन्हीं की तरह उसने भी शपथ ले रखी थी कि जीवन में न किसी से प्रेम करेगा, न किसी का प्रेम-पात्र बनेगा, न विवाह करेगा, न किसी का विवाह रचायेगा। उससे संबंधित ये तमाम बातें मुझे धीरे-धीरे बाद में मालूम हुईं जब अपने पहले परिचय के बाद प्रत्येक दिन, प्रत्येक घड़ी हम एक-दूसरे के करीब आते गए। और उसी वर्ष यानी 1924 में ही! जीवनदायनी गंगा का प्रलयंकारी प्लावन! दोनों तटों पर बसे कानपुर शहर के साथ-साथ अनगिनत गांव उस प्लावन के शिकार हुए थे। प्लावन के शिकार ग्रामवासियों ने वृक्ष की ऊंची डाल पर आश्रय लिया। बहते हुए लोगों को सहारा देने के लिए गंगा पुल पर मोटी-मोटी रस्सियां बांधकर लटकायी गयीं थीं, ताकि धारा के साथ बहते हुए लोग उन रस्सियों को पकड़कर अपने प्राण बचा सकें। शहर में बाढ़ पीड़ितों की सेवा के लिए कैम्प डाले गएं। 'तरुण संघ' नाम की एक संस्था काम कर रही थी और हमें भी सेवा दल में काम करने की पुकार मिली। बाढ़ से क्षतिग्रस्त लोगों की सेवा में मैं जुट गया। बलवंत सिंह साथ था। घर के अनुशासन की उपेक्षा कर किसी सार्वजनिक सेवा कार्य के लिए घर छोड़ दिन-रात काम करने का मेरा वह पहला मौका था। बलवंत का नाता घर से पहले ही टूट चुका था, इसलिए उसे किसी तरह के पारिवारिक अनुशासन की चिंता थी नहीं। सेवा कार्य में जुट जाना उसके लिए अनायास था जबकि उसी काम के लिए मेरे किशोर मन ने घर के विरुध्द पहली दफा विद्रोह का रास्ता अपनाया।

हम दोनों की डयूटी प्राय: एक साथ ही पड़ती। रात में हम दोनों गंगा के अंधेरे तट पर खड़े होकर हाथों में जलती लालटेन लिए शून्य में अविराम हिलाया करते ताकि प्लावन की तीक्ष्ण धारा में बहते हुए मनुष्य-मवेशी अंधेरी रात में किनारे का संकेत पा सकें और जब कभी मवेशियों का कोई झुंड उस रोशनी के सहारे हमारे पैरों के पास पहुंच जाता, हम उसे बाहर निकालते, फिर उसे रखने की व्यवस्था की जाती थी।

दिन के समय हम दोनों मल्लाहों के साथ निकलते और बाढ़ग्रस्त निराश्रित परिवारों को उनकी बची हुई सामग्री के साथ नाव पर लादकर गंगा तट के कैम्पों में पहुंचाते किशोर सरदार का हृदय यह सब देख-देखकर पसीजता रहता और उसकी आंखों में उस वक्त एक अव्यक्त-सी करुणा समायी होती थी। शहर के पास ही कल्याणपुर के बाढ़ पीड़ित कैम्प का वह दृश्य आज भी मेरी आंखो में सुरक्षित है। बाढ़ की प्रलंयकारी लीला में सबकुछ गंवा कर हताश, भूखे-असहाय लोगों का वह हुजूम! उनकी हृदय वेधी चीख पुकार से पूरा इलाका गूंज रहा था। भोजन की प्रतीक्षा करते स्त्री-पुरुष अलग-अलग कतारों में पत्तल के सामने बैठे थे कि तभी गर्म पूड़ियों की टोकरी दोनों हाथों से ऊपर उठाये तरुण सरदार दिखाई पड़ा। सिर पर सफेद रेशमी पगड़ी, बदन में साधारण कपड़े की कमीज जिसकी दोनों आस्तीनें ऊपर चढ़ी थीं। मुझसे आंखें मिलते ही उसके होठों पर स्वत: स्फूर्त मुस्कान एवं आंखों में चमक कौंध उठी, लेकिन बातचीत का समय कहां।वह उत्साह एवं उमंग के साथ भूख से बेचैन लोगों की कतार की तरफ बढ़ गया।

बाढ़ पीड़ितों की सहायता-सेवा के उस दौर ने हम दोनों को एक-दूसरे के करीब लाने में काफी मदद की। उस दिन क्षुधित, सर्वहारा जनों के बीच पूड़ियां बांटने का सरदार का अंदाज, काम के प्रति उसकी लगन एवं निष्ठा आज भी मैं नहीं भूल पा रहा हूं। पूड़ियां परोसने वाले उसके हाथों ने बाद के क्रांतिकारी जीवन में उसी निष्ठा के साथ पिस्तौल या बम भी चलाये। उस रोज किसे मालुम था कि परवर्ती क्रांतिकारी जीवन में हमें अति साधारण भोजन भी नियमित रूप से नसीब न होगा या यह कि पूड़ियां परोसने वाले उन हाथों पर सूखी रोटी और नमक ही शेष जीवन के आधार होगें।

उन दिनों हम दोनों के किशोर जीवन में एक-दूसरे के प्रति आकर्षण भाव के साथ-साथ जो सबसे बड़ा आकर्षण था, वह शहर (कानपुर) के पास कनालफाल के समीप गंगा के तट पर बैठ उसकी सुषमा को अनवरत निरखते रहना और बीच-बीच में किसी विषय, किसी बात या योजना पर परस्पर विचार-विमर्श करना। इसी सिलसिले में अकसर हम क्रांतिकारी जीवन के आने वाले दिनों की कल्पना में तल्लीन हो जाया करते। प्रसिध्द क्रांतिकारी जीवनियों या क्रांति से संबंधित साहित्य का पाठ हम यहीं बैठकर किया करते। एक ओर गंगा की अश्वेत जलधारा गरज के साथ लगातार आगे की ओर बढ़ती और दूसरी ओर क्रांतिकारी साहित्य का प्रभाव हमारी किशोर रंगों में खून की रफ्तार बढ़ा जाता। पानी का प्रचंड वेग एवं उसकी अथक गतिशीलता की छाप हमारे ऊपर सर्वाधिक पड़ी और शायद इसीलिए गंगा के तट का आकर्षण हम दोनों के मन में सदैव बना रहा।

एक शाम हम गंगा के तट पर बैठे अपनी क्रांति संबंधी कल्पनाओं को अमली जामा पहनाने के तरीकों पर विचार-विमर्श कर रहे थे कि अचानक ही आकाश काले बादलों से पटने लगा। गंगा पार की बस्तियां धुधली पड़ने लगीं, हवा का वेग बढ़ गया और थोड़ी ही देर में बादलों की भीषण गड़गड़ाहट से लगा आसमान फट जायेगा। क्षण भर में ही प्रकृति ने भयंकर रूप धारण कर लिया था। इससे पहले कि हम उठकर वहां से शहर की ओर चल देते, बूंदाबांदी शुरू हो गयी थी और शहर के फूलबाग स्थिति 'एडवर्ड मेमोरियल हॉल' पहुंचते-पहुंचते जमकर वर्षा होने लगी थी। यहां आकर हमें मालूम हुआ कि साथ की बहुमूल्य पुस्तक 'हीरो एंड हीरोइन ऑफ रशिया' तो हम जल्दबाजी में गंगा किनारे ही छोड़ आए हैं। रूस पर जारतन्त्र के विरुध्द रूसी युवक-युवतियों के सशस्त्र संग्राम की वह इतिहास-पुस्तक दुर्लभ होने के कारण हमारे लिए बहुत ज्यादा मूल्यवान थी, लेकिन उस घने अंधकार में वर्षा के साथ प्रचंड वायु का वेग सम्भालता हुआ दो मील का रास्ता तय करके उसे लाये कौन। मेरे जाने की बात सरदार को नागवार सी लगी। शरीर में वह मुझसे निश्चित रूप से तगड़ा था और अपने उसी तगड़ेपन की दलील देकर उस वक्त उसने मुझे जाने से रोक दिया और खुद लम्बी डग भरता हुआ अंधेरे में गुम हो गया।उसे जाते हुए कुछ ही क्षण गुजरे होंगे कि मेरी भावुकता ने मुझे झिंझोड़ा और मैं भी उस बीहड़ अंधकार में सरदार के पीछे हो गया। घने अंधकार में बेतहाशा भागते मेरे पैरों को अपने भागने का अहसास तब हुआ जब वे बीच सड़क पर बैठे सरदार से टकराये। सिर की रेशमी पगड़ी आधी खुलकर कीचड़ में सनी थी, एक हाथ से पुस्तक एवं दूसरे से अपने पैर का अंगूठा थामे वह लथपथ पड़ा था। पैर के अंगूठे का नाखून उखड़ गया था। पगड़ी चीरकर मैंने पट्टी बांधी और उसे सहारा देकर सुरेश दा के मेस भीगते हुए वापस आया। उससे अलग अपने घर लौटकर मेरा मन सरदार के दुख से बेचैन था। मैं वहां से रूई-पट्टी, जैम्बक की डिबिया लेकर उसी मूसलाधार वर्षा में सरदार के पास पहुंचा, उसके अंगूठे का खून साफ कर उस पर मरहम पट्टी की और रात भर उसके पास बैठा रहा। सुबह होते ही घर के अनुशासन की सुधि आयी। उस दिन परिवार से मिलने वाली तमाम यंत्राणाएं मैं धैर्यपूर्वक सह गया सिर्फ इस तसल्ली पर कि अपने प्रिय मित्र के प्रति अपना छोटा-सा कर्त्तव्य निभाया। और सरदार का वह स्नेहयुक्त आवेश- 'पीओ, देर न करो। तुम्हें पीना ही पडेग़ा। दूध वाले की दुकान के सामने गर्म दूध से भरा गिलास लिए वह मुझे आदेश दे रहा है। दूध से उन दिनों अरुचि नहीं थी लेकिन भरपेट भोजन के बाद पक्का आधा सेर दूध चढ़ा जाना मेरे पेट के लिए मुश्किल था। आज भी दिल्ली और आगरा स्थित दूध की दुकानों के दृश्य मेरी आंखों के सामने आ जाते हैं। उन्हीं दुकानों के मालिक बाद में हमारी उपस्थिति दिल्ली और आगरा में सिध्द करने के लिए हमारे मुकदमों में आए थे।

दरअसल, भोजन के बाद गर्मागर्म दूध का गिलास चढ़ा जाने का पाठ मुझे सरदार ने ही दिया। जब कभी पैसा पास होता वह दूध पीने के विलास से नहीं चूकता था। जहां रोटी का लुकमा भी निश्चित न हो वहां दुग्धपान विलास की ही श्रेणी में आएगा न? और उसे सिर्फ तीन पाव गर्मागर्म दूध से ही संतोष नहीं था बल्कि गिलास के दूध पर कम-से-कम डेढ़ छटांक मोटी मलाई का टुकड़ा भी अलग से पड़ना चाहिए। मलाई न रहने पर घी का तडका (छोंक) वह गर्म दूध में दे लेता था। शरीर में खून बढ़ाने का उसका यही उपयुक्त नुस्खा था। दूध के प्रति एक असीम आसक्ति उसके मन में थी। स्वास्थ्य के प्रति वह कभी उदासीन न रहा, हालांकि बाद के पार्टी जीवन में नियमित रूप से हमें भोजन भी नसीब नहीं हुआ। विप्लवी जीवन की अनिश्चित परिस्थिति एवं जीवन-धारण के लिए सीमित साधन और व्यवस्था के अभाव में भी वह शरीर और स्वास्थ्य के प्रति हमेशा सचेत रहा। यद्यपि जीवन के प्रति उसके मन में जबरदस्त आसक्ति थी, तथापि उसका कहना था कि जीवन जब अधिक सुंदर और प्रिय मालूम पड़ने लगे, तभी अपने आदर्श के लिए उसे बलिदान करना चाहिए।

संस्मरण की इस कड़ी के रूप में एक और दृश्य मेरी आंखों के सामने अब भी कौंध जाता है...

कानपुर स्टेशन का जन-प्लावित प्लेटफार्म, 'जो बोले सो निहाल.... सत्श्री ..अ...का....ल...' के गगनभेदी नारे से दिग-दिगंत गूंज उठा है। गुरु के बाग के सत्याग्रही सिख मोर्चा डालने के लिए पंजाब जा रहे हैं। उन दिनों हर स्टेशन पर, जहां ट्रेन रुकती थी, अधीर जनता सत्याग्रहियों के दर्शनार्थ टूट पड़ती थी। प्रत्येक स्टेशन पर वीर सत्याग्रहियों को भोजन कराने के लिए लंगर खोले गए थे। कानपुर स्टेशन पर भी ऐसी ही व्यवस्था थी और सत्याग्रहियों की एक झलक लेने के लिए जनता उमड़ पड़ी थी। फूलों और फूल-मालाओं की वर्षा! मैं भी स्टेशन गया था। अपार जनसमूह के बेग को ठेलकर सत्याग्रहियों के डिब्बों तक न पहुंच पाने की मजबूरी में ओवर-ब्रिज पर जाकर खड़ा हो गया और असंख्य सिरों से पटे प्लेटफार्म का दृश्य वहीं से देखने में तल्लीन था कि भीड़ को चीरती मेरी दृष्टि अपने सरदार मित्र पर पड़ी वही रेशमी पगड़ी और सफेद कमीज दोनों आस्तीनें बांह पर चढ़ी हुईं । एक हाथ में शरबत की बाल्टी और दूसरे में लंबा-सा गिलास। अपने कंधों से भीड़ को ठेलता हुआ वह सत्याग्रहियों के हाथों में शरबत के गिलास पकड़ा रहा था। भीड़ की खींचातानी में पगड़ी सिर से खिसककर कंधें पर लटक आई है जिसकी चिंता उसे नहीं थी। कम-से-कम समय में ज्यादा-से-ज्यादा सत्याग्रहियों की प्यास बुझा पाने की व्यग्रता उसके चेहरे, आंख और चाल में स्पष्ट देखी जा सकती थी। ट्रेन के एक सिरे से दूसरे सिरे तक उसकी विश्रामहीन भाग-दौड़! मेरे प्रिय साथी सरदार का यह एक और रूप था।

थोड़ी देर ठहरने के बाद ट्रेन चल पड़ी। फिर एक बार सत्श्री अकाल के नारे से आकाश गूंजा और कोलाहल मुखरित स्टेशन का प्लेटफार्म खाली होना शुरू हो गया। भीड़ पिघलने लगी। जो सत्याग्रहियों को देखने, उनसे मिलने-मिलाने आए थे, बाहर कीओर खिसकने लगे और बच गया हाथों में गिलास-बाल्टी लिए मेरा वह सरदार मित्र! मैं ओवर-ब्रिज से उतर उसकी बगल में खड़ा हुआ पर उसे जैसे किसी बात की सुध नहीं थी। ट्रेन जाने की दिशा में मंत्रमुग्ध आंखों में उदासी लिए अब भी वह खाली पटरी देखे जा रहा था। अपने कंधे पर मेरे हाथ का दबाव महसूस कर मुड़ा और मुस्कराकर एक हाथ से मेरे पंजे को दबाया बोटू ...। उसकी आंखों में कोई अदृश्य निर्णय कौंध उठा था उस घड़ी।

उस दिन लगभग गुमसुम और उदास वह जनशून्य स्टेशन से मेरे साथ बाहर हुआ था और फिर वह दिन भी आया जब दल के आदेशों पर उसे कानपुर, 'प्रताप', सुरेश दादा और मुझे छोड़कर एक छोटे स्कूल का हेडमास्टर बनकर अन्यत्र जाना पड़ा। विप्लव दल के नियमानुसार कुतूहलवश जरूरत से ज्यादा किसी का परिचय प्राप्त करना हमारे लिए मना था और सरदार शायद सब दिन ऐसा अनुभव करता रहा था कि कोई रहस्य वह अपने एकमात्र एवं अनन्य साथी मुझसे छिपाता रहा है, वरना कानपुर से विदाई लेने के दिन ही क्या खुलता। शिक्षक का पद ग्रहण करने जाते वक्त मुझसे मिलने आया था और हमारी आत्मीय घनिष्टता के बावजूद दल की मर्यादा रखने के लिए अब वह जिस रहस्य को छिपाये हुए था, विदाई के क्षण उसे व्यक्त किये बगैर न रह सका। जिस तरुण बलवंत सिंह के स्नेहपाश में मैं अब तक बंधा था, वही सरदार भगत सिंह के रूप में मुझसे विदा ले गया।

यही उसका असली परिचय था लोगों ने उसे बाद में विप्लवी सरदार भगत सिंह के रूप में जाना, लेकिन मेरे लिए तो वह सब दिन मानवीय गुण-सम्पन्न, भाव में गम्भीर भावुकता से ओतप्रोत बलवंत सिंह बना रहा। बाद की हमारी मैत्री परवर्ती क्रांतिकाल में एक-दूसरे के साथ सहयोगी की भूमिका, उसकी फांसी से लेकर मेरे जलावतन तक का प्रसंग इस कड़ी की अगली कहानी है।

सन् उन्नीस सौ सत्ताईस-अट्ठाईस का समय हमारे राष्ट्रीय जीवन में क्रांति के साथ-साथ संकट का काल भी कहा जा सकता है क्योंकि उन्हीं दिनों हमारी आजादी की लड़ाई का स्रोत एक नये रास्ते की ओर प्रवाहित हुआ। उस वक्त तक देशवासी क्रांतिकारी आंदोलन और उसकी विचारधाराओं से ज्यादा परिचित नहीं थे और अंग्रेज सरकार क्रांतिकारियों को साधारण खूनियों तथा डकैतों की श्रेणी में डालकर देश की जनता को सब दिन गुमराह करने का प्रयत्न करती रही थी। ब्रिटिश सरकार का यह कहना था कि विप्लवी देश में संत्रास एवं अराजकता फैलाना चाहते हैं जबकि विप्लवी देश में परिवर्तन के प्रति आग्रही थे। जनसाधारण को विप्लवी के प्रति जागरुक बनाकरआर्थिक परिवर्तनों द्वारा शोषणविहीन समाज की स्थापना ही उनका लक्ष्य था। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए यह जरूरी था कि क्रांतिकारियों की ओर से देशवासियों के सम्मुख एक निश्चित कार्यक्रम पेश किया जाए और देश के नेताओं को असेंबली भवन के भीतर वैधानिक कार्यक्रमों के दांव-पेच से मुक्त कर जनांदोलन के प्रति उत्साहित किया जाए, दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में अंग्रेज सरकार की ओर से भारत के लिए स्वायत्ता शासन की मांग बार-बार ठुकरा दी गयी थी। जन नेताओं के लाख विरोध के बावजूद यहां की जनता के मानवीय अधिकारों को विलुप्त करने के लिए केंद्रीय धारा सभा से टे्रड डिस्प्यूट बिल स्वीकृत करा लिया गया था। कानून स्वीकृत हो जाने के फलस्वरूप देश के करोड़ों भूखे-मेहनतकश लोग अपनी आर्थिक दशा सुधारने के प्रारंभिक स्वत्व एवं एकमात्र उपाय हड़ताल से वंचित कर दिए गए थे। 
     केंद्रीय विधानसभा में हमारे जन-प्रतिनिधियों के उस अपमान और उस अमानुषिक बर्बरतापूर्ण कानून द्वारा देश की करोडों ज़नता पर जो हमला हुआ था उसी के विरोध में भारतीय क्रांतिकारी संस्था 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' द्वारा केंद्रीय असेंबली के सभाकक्ष में बम डालकर गोरी हुकूमत को एक चेतावनी देने के सुझाव पर आगरा हेड क्वार्टर में आलोचना गोष्ठी की बैठक चल रही थी। असेंबली में बम डालकर आत्मसमर्पण करना एवं बाद में मुकदमे के दौरान अभियुक्त के कटघरे में खड़े होकर भारतीय क्रांतिकारी दल की ओर से विप्लवियों के विचारों, आदर्शों एवं उद्देश्यों का दिग्गर्शन कराने के लिए एक विशद राजनीतिक वक्तव्य देने की सूझ सरदार भगत सिंह के मस्तिष्क की ही उपज थी। लेकिन इसे निभाये कौन? यानी केंद्रीय असेंबली में बमफेंकने जैसा जोखिम भरा कार्य कौन करे? इसे पूरा करने का सीधा एवं साफ अर्थ था मृत्यु! लाख सावधानी के बावजूद असेंबली भवन के फर्श पर बम फटने के साथ किसी की मृत्यु की सम्भावना स्पष्ट थी और उसके बाद वहां नियुक्त सुरक्षा पुलिस या सार्जेंट द्वारा बम फेंकने वाले को तुरंत मौत के घाट उतार देना भी लगभग निश्चित ही था। बावजूद इसके कि हम सभी क्रांतिकारी देश को स्वतंत्र कराने की बलिदानी भावना से प्रेरित हो, प्रियजनों से नाता तोड़, किसी भी क्षण मृत्यु का आलिंगन करने का संकल्प ले, सिर पर कफन बांध, गृह-त्यागी बनकर निकल पड़े थे, फिर भी विचार गोष्ठी में बैठकर अपनी-अपनी सुरक्षा पर नजर गड़ाये दूसरे साथी को निश्चित मौत का फरमान सुनाना किसी के लिए भी संभव न था। ऐसा कोई व्यवहार किसी के भी मन को संदिग्ध बना सकता था। सरदार ने सहर्ष आगे बढ़कर निश्चित मौत से खेलने का बीड़ा उठाया, साथ-साथ मैंने भी। वर्षों पहले कानपुर में गंगा के किनारे बैठे-बैठे जिन अनागत दिनों की कल्पनाएं हम बार-बार किया करते थे, कि एक साथ ही दोनों देश की स्वतंत्राता के लिए आत्माहुति देंगे, उसे साकार करने का समय आ गया था...

हम दोनों- सरदार और मैं- बम के साथ आगरे से दिल्ली पहुंचे। लगभग महीने भर तक दिल्ली में ही टिके रहे। मैं हाफ पैंट, कमीज और जूता पहनता था और सरदार फ्लैट हैट लगाने लगे थे। प्रत्येक संध्या बम को अखबार में ढंककर कोट की नीचे वाली जेब में रखे हम साथ-साथ असेंबली भवन जाते, वहां का वातावरण परखते, पहरे पर संतरियों की गतिविधि देखते और अनुमान लगाते-कैसे अपने उद्देश्यों में सफल हो सकेंगें।

इसी बीच एक दिन सरदार ने साथ-साथ फोटो खिंचवाने की बात रखी। कुछ देर तो मैं टालता रहा, लेकिन सरदार जब जिद पर उतर आए तब मुझे भी झुकना पड़ा, और वही एकमात्रा तस्वीर हम दोनों की आखिरी यादगार बनकर रह गयी।

फिर आया वह दिन जिसके लिए हम आगरे से चलकर दिल्ली आए थे और लगातार महीने भर तक बिना नागा असेंबली भवन के अगल-बगल चक्कर लगाते रहे थे। यानी 8 अप्रैल, 1928। दिन के ग्यारह बजे स्थान केंद्रीय असेंबली हॉल जिसे अब संसद कहा जाता है। ट्रेड डिस्प्यूट बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल पर जनमत जानने के लिए प्रस्ताव स्वीकृत हो गया था। अध्यक्ष की कुर्सी पर सरदार बल्लभ भाई पटेल विराजमान थे। ट्रेजरी बेंचों पर सर जेम्स क्रेरर एवं सर जार्ज शुस्टर। विशिष्ट व्यक्ति के रूप में वायसराय की सीट पर, दर्शक दीर्घा में, सर जान साइमन। 
      सरकारी बैंचों के सामने विरोधी सीट पर पंडित मोतीलाल नेहरू, पंडित मदनमोहन मालवीय एवं डा. मुंजे आदि। बम हम दोनों ही की जेब में थे। ऊपर से पीछे की खाली बैंचों को लक्ष्य करके हमने बम फेंके। जोरों का धमाका हुआ, लेकिन चूंकि किसी को मारने का इरादा तो था नहीं, इसीलिए कमजोर बम बनाये गए थे ताकि धमाके पैदा करने के अलावा और किसी तरह का भयंकर, घातक या मारक प्रभाव उससे पैदा न हो सके। 'इंकलाब जिंदाबाद' एवं 'साम्राज्यवादी शासकों के बहरें (राष्ट्रीय मांगों के प्रति) कानों को खोलने के लिए जोरदार आवाज की जरूरत है' के नारों एवं फटे बम के धुएं से हॉल भर गया और भगदड़ मच गयी। डर के मारे सर जेम्स क्रेरर बैंचों के नीचे जा छिपे। बम के साथ फेंके गए लाल रंग के छपे पर्चें धुएं की सतह पर हॉल में इधर-उधर तैर रहे थे। 
        उस पर्चें में गोरी हुकूमत की आंखें खोलने के लिए भारतीय क्रांतिकारी दल के उद्देश्यों का स्पष्ट हवाला दिया गया था-'दो नगण्य इकाइयां (सरदार भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्ता) को कुचलने से राष्ट्र नहीं दबेगा... सरकार इस बात को समझे कि पब्लिक सेफ्टी तथा ट्रेड डिस्प्यूट बिल एवं लाला लाजपत राय की निर्मम हत्या के विरुध्द जनमानस का विरोध प्रदर्शित करने के अतिरिक्त हम इतिहास को भी यह साक्ष्य देना चाहतेहैं कि व्यक्तियों का दमन करना आसान है, लेकिन विचारधाराओं का दमन नहीं किया जा सकता। विशाल साम्राज्य नष्ट हो जाते हैं लेकिन विचारधारा नष्ट नहीं होतीं। बोरबोन और जार का पतन हो गया, किंतु क्रांतिकारी आगे बढ़ते गए, हमें, जिनको मनुष्य जीवन से प्रेम है और जो एक बड़े ही गौरवमय भविष्य की कल्पना करते हैं, व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्राता के लिए बाध्य होकर मानव-रक्त बहाना पड़ रहा है यह आवश्यक है क्योंकि जो मनुष्यता के लिए शहीद होते हैं, उनके त्याग से क्रांति की वह वेदी बनती है जहां से मानव द्वारा मानव के शोषण का अंत हो सकेगा-इंकलाब जिंदाबाद'।

अपनी पूर्व योजनाओं के अनुसार एवं मार्शल लॉ जारी न हो या बम फेंकने के अपराध में निर्दोष व्यक्ति न पकड़ लिए जायें, हम दोनों ही ने आत्मसमर्पण कर दिया। तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन ने उस घटना का तात्पर्य अच्छी तरह समझा और बम विस्फोट के बाद ही व्यवस्थापिका सभाओं के संयुक्त अधिवेशन में भाषण के समय चर्चा करते हुए बताया कि बमों का यह प्रकार किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि एक संस्था (अंग्रेजी शासन) पर किया गया है।

हम दोनों को दिल्ली के दो अलग-अलग थाना में रखा गया। मुकदमे शुरू हुए फिर हमारा स्थानान्तरण दिल्ली जेल में हुआ जहां एक साथ सटी दो अलग-अलग कोठरियों में हमें रखा गया। बीच में खड़ी अभेद्य दीवार। नियाज अली हमारा जेल वार्डन था जिसे एक अरसे तक हम हाड़-मांस का न होकर पत्थर का बना समझते रहे। नियाज अली ने कभी मुझे और सरदार को एक साथ न होने दिया। स्पर्शानुभूति की बात तो दूर रही, उसने कभी हम दोनों को एक-दूसरे का चेहरा तक नहीं देखने दिया, उन दो-चार दिनों को छोड़कर जबकि इकट्ठे हमें अदालत ले जाया जाता था। दिल्ली की उस विशेष अदालत में न्यायाधीश के सामने प्रविष्ट होते समय अपने-अपने हाथ-पांवों में पड़ी बेड़ियां की झंकार के साथ हम 'क्रांति चिरंजीवी हो' का नारा लगाते। पूरा न्यायालय गूंज उठता था, और तभी से यह नारा राष्ट्रीय जीवन में व्याप्त हो गया। बम विस्फोट के साथ पहले-पहल सरदार के मुंह से निकली 'इंकलाब जिंदाबाद' की घोषणा जैसे पूरे राष्ट्रीय जनजीवन में व्याप्त हो गयी।

मुकदमे के दौरान न्यायाधीश महोदय ने सरदार से 'क्रांति' शब्द की व्याख्या करने को कहा तो सरदार ने बताया- 'क्रांति या विप्लव खून-खच्चर ही का रास्ता नहीं, और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिशोध का कोई स्थान है। बम और पिस्तौल ही क्रांति का धर्म हो, ऐसा भी नहीं है। क्रांति से हमारा मतलब है कि वर्तमान समाज और शासन व्यवस्था जो स्पष्टत: अन्याय एवं अत्याचारों पर आधारित है, परिवर्तित हो। आप पूर्ण परिवर्तन के द्वारा ऐसी व्यवस्था की स्थापना करें जिसमें सर्वसाधारण की सत्ता कायम हो सके।'

आसिफ अली साहब ने हमारी ओर से वकालत की थी और हमारे गवाह बने थे डॉ. मुंजे एवं पंडित मदनमोहन मालवीय। न्यायालय ने हम दोनों को आजीवन काले पानी की सजा दी। 1930 में 'लाहौर षडयंत्र केस' के अंत में जब मैं सदा के लिए सरदार से बिछुड़कर मुलतान जेल भेज दिया गया, तब सरदार ने मेरी बहन को एक पत्र लिखा था जो आज भी मेरे जीवन की अमूल्य निधि है। 17 जुलाई, 1930 को लाहौर सेंट्रल जेल से लिखा गया वह पत्र सरदार के व्यथातुर हृदय की अभिव्यक्ति हैं-'बटुक की जुदाई आज मेरे लिए असह्य हो रही है। इस बिछोह से मैं एकदम स्तब्ध सा हो गया हूं... एक-एक पल मेरे लिए असह्य भार बन गया है। सचमुच, अपने भाई एवं परिजनों से भी ज्यादा प्रिय उस मित्र से अलग हो जाना आज मेरे लिए अत्यन्त ही कठिन गुजर रहा है...हमें सबकुछ धैर्यपूर्वक सहन करना है और आपसे भी हिम्मत के साथ परिस्थिति का सामना करने का अनुरोध करूंगा ।'

'लाहौर षडयंत्र केस' में जब सरदार को फांसी की सजा का फैसला सुनाया गया तब अपने एक पत्र में उसने मुझे लिखा:

'प्रिय बटुक,

दीर्घकाल तक हम लोगों का विचार-प्रहसन चलने के बाद अब उस पर यवनिका पात हुआ। न्यायाधीशों ने सजाएं घोषित कर दी हैं और उन सजाओं की इत्तला हमें भेज दी गयी है। मुझे फांसी की सजा मिली है।
तुम्हें मालूम है कि मैं लाहौर जेल की उन्हीं फांसी की कोठरियों में हूं, जहां चंद रोज पहले तुम मेरे साथ थे। इन फांसी की कोठरियों में कुल पैंतालीस मृत्यु-दंड प्राप्त बंदी हैं जो प्रतिक्षण अपनी अंतिम घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे अभागे बन्दी फांसी के फंदे से छूट पाने के लिए दिन-रात भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं। उनमें से अधिकांश अपने कृत्यकर्म के लिए अत्यंत ही अनुलप्त हैं और इन अभागे बन्दियों के बीच मैं ही एक ऐसा व्यक्ति हूं, भगवान के बदले अपने आदर्शों में ही जिसकी अविचल आस्था है, एवं जिस आस्था के लिए मैं मृत्यु का आलिंगन करने जा रहा हूं, इसके लिए संतुष्ट हूं। तुमसे मेरा बिछोह अत्यंत ही पीड़ादायक है, लेकिन इससे कुछ विशेष उद्देश्यों की पूर्ति होगी। मैं फांसी के तख्ते पर अपना प्राण विसर्जित कर दुनिया को दिखाऊंगा कि क्रांतिकारी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खुशी-खुशी आत्म-बलिदान कर सकता है। मैं तो मर जाऊंगा, लेकिन तुम आजीवन कारावास की सजा भुगतने के लिए जीवित रहोगे और मेरा दृढ़विश्वास है कि तुम यह सिध्द कर सकोगे कि विप्लवी अपने उद्देश्यों के लिए आजीवन तिल-तिल कर यंत्राणाएं सहन कर सकता है। मृत्यु दंड पाने से तुम बचे हो और मिलने वाली यंत्राणाओं को सहन करते हुए दिखा सकोगे कि फांसी का फंदा, जिसके आलिंगन के लिए मैं तैयार बैठा हूं, यंत्रणाओं से बच निकलने का एक उपाय नहीं है। जीवित रहकर विप्लवी जीवन भर मुसीबतें झेलने की दृढ़ता रखते हैं। 
                                          तुम्हारा-भगत सिंह'

सरदार अपने विचारों या व्यवहारों में कट्टरपंथी कभी नहीं रहे मस्तक पर सिख धर्म के द्योतक लंबे बाल, कंघा, कच्छा और कड़ा लेकर वह कानपुर आए थे, लेकिन बाद के दिनों में परिस्थिति के अनुसार उन्होंने खुद को दूसरे रूप में ढाल दिया। लंबे-लंबे बाल कटवाकर नीचे से ऊपर तक सूट एवं हैट से लैस उन्होंने अंग्रेज साहबों का रूप धारण किया। हिंसा एवं अहिंसा की उधेड़बुन में उनके विचार उलझे हुए नहीं थे, न ही उनके मन में कभी किसी के प्रति हिंसा या द्वेष पनपा। राजनीतिक बंदियों को युध्दबंदी (प्रिजनर ऑफ बार) की स्वीकृति दिलाने एवं तदनुसार उनके सम्मानपूर्वक व्यवहार की मांग पर बंदियों द्वारा सामूहिक अनशन का संग्राम आरम्भ करना तथा उसी संग्राम के द्वारा देश की मुरझाई हुई चेतना में फिर से स्पंदन जगाने की कल्पना सरदार ने ही की थी और उसी संग्राम के फलस्वरूप पूरे देश में एक अभूतपूर्व परिस्थिति उत्पन्न हुई एवं बाद में 1930 का जनांदोलन जिससे प्रेरित हुआ। खुद सरदार ने जेल के भीतर 14 जून, 1929 से प्रारंभ करके लगातार 127 दिनों तक भूख की अनन्त ज्वाला में घुलते हुए मौत की प्रतीक्षा की थी...

गंभीर मननशीलता, राजनीतिक दूरदर्शिता एवं आत्मबल पर अटूट विश्वास सरदार के अन्य गुण थे। दूसरे देश के क्रांतिकारी आंदोलनों के साथ पराधीन भारतवर्ष की राजनीतिक परिस्थिति का तुलनात्मक विचार सरदार के चिंतन का एक विशिष्ट पक्ष था। बलिष्ठ हाथों में पिस्तौल लेकर जिस प्रकार लक्ष्य- भेद करने में वह माहिर थे, उसी प्रकार उनकी सुंदर उंगलियां लेखनी चलाने में माहिर थीं।
     'प्रताप' में काम करते समय डैन ब्रीन लिखित 'माई फाइट फार आइरिश फ्रीडम' का बड़ा ही सुंदर अनुवाद उन्होंने किया था। दिल्ली के साप्ताहिक 'अर्जुन' के सम्पादकीय में भी वह लेखनी चलाते रहे। उन्हीं दिनों पंजाब के विद्रोही किसान आंदोलन, कूका विद्रोह और बब्बर अकाली आंदोलन पर लिखी उनकी पांडुलिपियां मैंने पढ़ी थीं। फांसी के पहले पंजाब के तत्कालीन गवर्नर के पास उन्होंने अपने साथ फांसी की सजा से दंडित अन्य साथियों को फांसी के फंदे से लटकाने के बजाय युध्दबंदियों की भांति गोली से उड़ा दिए जाने के लिए जो आवेदन पत्र भेजा था। उसकी शैली एवं दलील दोनों ही अपने ढंग की अकेली चीज थीं यानी सरदार न सिर्फ एक क्रांतिकारी भर ही थे बल्कि इसके साथ-साथ एक दूरदर्शी राजनेता, सफल अनुवादक, पत्रकार एवं चिंतक का अद्भुत सम्मिश्रण उनके व्यक्तित्व में मौजूद था। 
      अपने ध्येय के लिए जीवन की आहुति चढ़ा देने की प्रबल प्रेरणा एवं आकांक्षा से ही सब दिन प्रेरित हुए और निश्चित मृत्यु की ओर बढ़ते गए। अनासक्त हृदय का कोई व्यक्ति ही इस प्रकार संसार की स्थूल वासनाओं से मुक्त होकर मृत्यु को सहर्ष गले लगा सकता है। स्वामी विवेकानंद की वाणी, सरदार के संदर्भ में, मुझे हमेशा याद आती रहती है-'यदि तुम्हारा मन अनासक्त है। तो तुम्हारी भक्ति भी अपरिसीम है। संसार की कोई भी ताकत तुम्हारी गति का प्रतिरोध नहीं कर सकती'। और इसमें संदेह नहीं कि अंग्रेज शासकों की विशाल राक्षसी शक्ति भी सरदार की जीवन गति का प्रतिरोध कर पाने में सब दिन असमर्थ रही। 7 अक्टूबर, 1930 को फांसी की सजा सुनाई गयी थी और 23 मार्च, 1931 की शाम उन्हें फांसी दे दी गयी। वह सब दिन कहा करते थे मातृभूमि की बलिवेदी पर कौन पहले जायेगा, कौन पीछे, नहीं मालूम लेकिन चाहे जो कोई पहले जाए उसके लिए हम आंसू नहीं बहायेंगे बल्कि उसके अधूरे कार्यों को पूरा करने की कोशिश करेंगे। हमारा बलिदान यों ही नहीं जायेगा बटुक! यह और बात है कि आने वाले परिणामों को देखने के लिए हम संसार में नहीं रहें...

सरदार सचमुच आजादी देखने के लिए नहीं रहे, लेकिन उनका बलिदान भी यों ही नहीं गया। आज सोचता हूं तो लगता है जैसे स्पष्ट दृष्टि में आने वाला समय बिल्कुल ही स्पष्ट और साफ होकर कैद था- शहादत के बाद चाहे जितना समय लगे, देश आजाद होगा और जरूर होगा।





























गुरुवार, 21 जुलाई 2011

लाहौर नेशनल कॉलेज में भगत सिंह -छबीलदास


भगत सिंह जहां एक जोशीला इंकलाबी था वह एक बहुत अच्छा विद्यार्थी भी था। उसके अध्यापक होने के नाते मैं यह बात दावे से कह सकता हूं कि उसे पढ़ाने में बहुत आनन्द आता था। भगत सिंह को पढ़ने का बेहद शौक था। जब किसी भी किताब का नाम उसके सामने लिया गया तो उसने फौरन उसे पढ़ने की फरमाइश की। वैसे तो भगत सिंह ने न जाने इतिहास की कितनी ही किताबें पढ़ डाली होंगी लेकिन मुझे अभी तक याद है कि उसे जो किताब सबसे ज्यादा पसंद थी वह 'क्राइ फॉर जस्टिस' थी। भगत सिंह ने लाल पेंसिल से इस किताब के बहुत हिस्सों पर निशान लगाए थे। इनसे पता चलता था कि उसके हृदय में बेइन्साफी के खिलाफ लड़ने की भावना किस तरह कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह पुस्तक लाजपतराय भवन लाहौर में हमारे घर में वर्षों तक रही। स्वयं मेरे बच्चों विजय, सन्तोष और मनोरमा ने कई बार इस किताब को लेकर मुझसे ढेरों सवाल पूछे। मेरे बच्चे भी यह जानना चाहते थे कि भगत सिंह को कौन-सी किताब पसंद थी और क्यों ? 

भगत सिंह को पढ़ने की आदत तो इतनी प्रबल थी कि जिस दिन उसे फांसी लगाई गई उस दिन भी वह अपने नियमानुसार किताब पढ़ने में मगन था। तो स्वयं उन दिनों जेल में था लेकिन जेल ही से मिलने वाली रिपोर्टों से पता चलता था कि जिस दिन भगत सिंह को फांसी लगनी थी उस दिन उसके चेहरे पर परेशानी और गम की कोई झलक दिखाई नहीं पड़ती थी। जब वार्डन ने उससे आकर तैयार होने को कहा कि जेल के नियमों के अनुसार हर कैदी को बाकायदा नहा-धोकर कपड़े बदलवाकर और उसकी कोई अंतिम इच्छा हो तो उसे पूरी करके फांसी के तख्ते पर ले जाया जाता है, कहते हैं भगत सिंह ने हंसते-हंसते यही कहा था कि भाई पहले मुझे अपनी किताब तो पूरी कर लेने दो। भगत सिंह उस समय लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। एक नौजवान जो जानता था कि कुछ ही घंटे बाद उसे फांसी के तख्ते पर लटकाया जाना है अगर अपनी कोई प्रिय पुस्तक पढ़ने में मगन रहे तो उससे यही अन्दाजा लगाया जा सकता है कि वह सचमुच एक अनोखे इरादे का व्यक्ति होगा। 

मैंने नेशनल कॉलेज में और बाहर भी भगत सिंह को हमेशा हंसते हुए देखा। लेकिन उस हंसी के पीछे भी उसका पक्का इरादा और अपने मकसद को पूरा करने की भावना झलकती थी। लगता था कि भगत सिंह को जीवन के सांसारिक बंधनों से गहरी चिढ़ थी इसलिए उसने कभी शादी करवाने की हामी नहीं भरी। बहुत साल बाद भगत सिंह की माताजी उसके विषय में बातचीत करते हुए बताती थीं कि वह हमेशा हंसकर यही कहता था- बेबे तुम परेशान न हुआ करो, तुम्हारे लिए एक अनोखी दुल्हन ब्याह कर लाऊंगा। भगत सिंह का मतलब हिंदुस्तान की आजादी से था। जब भगत सिंह की मां श्रीमती विद्यावती फांसी लगने से कुछ दिन पहले अपने बेटे से मिलने गईं तब भी वह जोरों से हंस रहा था और मां को दिलासा दिलाने के लिए बार-बार यही कहता कि भारत को जल्दी ही आजादी मिलेगी और उसे तो खुशी होनी चाहिए कि उसका बेटा किसी मकसद के लिए मरने जा रहा है। लोग तो बीमारियों से भी मरते हैं। लेकिन कितने खुश किस्मत ऐसे हैं जिन्हें देशभक्ति और वतनपरस्ती के इल्जाम में फांसी का तख्ता नसीब होता है। 

भगत सिंह को विश्वास था कि शादी का बंधन इंकलाब के रास्ते में बहुत भारी रुकावट है। मुझे याद है एक बार लाहौर में दरिया रावी में मैं और भगत सिंह कश्ती की सैर कर रहे थे, मेरी तरह भगत सिंह को भी दरिया में कश्ती की सैर का बहुत शौक था। उस वक्त शाम का अंधेरा होने ही वाला था। भगत सिंह ने हंसते हुए मुझसे पूछा-'गुरुजी सुना है आप शादी कर रहे हैं? क्या यह खबर ठीक है' जब मैंने कहा, 'हां' तो भगत सिंह एकदम से कहने लगा 'फिर इंकलाब कैसे आएगा? आप घर गृहस्थी में पड़ जाएंगे या मुझ जैसे नौजवानों को इंकलाब का सबक पढ़ायेंगे? मैंने महसूस किया भगत सिंह को मेरी शादी करने का फैसला पसंद नहीं आया। 

मैंने भगत सिंह को बताया कि मैं जिस लड़की से शादी कर रहा हूं वह कोई मामूली लड़की नहीं है बल्कि स्वयं एक आदर्शवादी और क्रांतिकारी विचारों के व्यक्ति की बेटी है। मुझे प्रसन्नता है कि स्वतंत्रता संग्राम में लड़ने के लिए मुझे एक सहयोगी और मिल गया है। मेरा वह जवाब सुनकर भगत सिंह हंसने लगा लेकिन मुझे उस समय ही यह एहसास हो गया था कि भगत सिंह को मेरे जवाब से सन्तोष नहीं हुआ था। वह यही सोच रहा था कि उसके गुरुजी ने अपनी जिंदगी का यह गलत फैसला किया था। 

लेकिन मेरी पत्नी सीता देवी ने जिस तरह सक्रियता से स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, बार-बार जेल यात्रा की और आजादी मिल जाने के बाद भी उन्होंने महिलाओं व मजदूरों के अधिकारों के संघर्ष को अपना मकसद बनाये रखा था, उसने हमेशा मुझे यही एहसास दिया कि चाहे भगत सिंह को मेरा फैसला कितना भी नापसंद था लेकिन मेरा फैसला गलत नहीं था।

हमारे सौभाग्य में जिन दिनों देश भर में महात्मा गांधी तथा स्वराज्य आंदोलन की लहर मची हुई थी, उन्हीं दिनों विदेशी विशेषत: आयरलैंड तथा सोवियत रूस से धड़ाधड़ राजनीतिक लिटरेचर, किताबें, टेक्स्ट, अखबारों और मैग्जीनों का आना शुरू हो गया था। आयरिश लिटरेचर तो केवल यही नारा लगाता था कि किसी भी देश अथवा जाति को आजादी प्राप्त करने के लिए बन्दूकों, पिस्तौलों, बमों तथा हवाई जहाजों की भारी जरूरत होती है। भारत में अंग्रेजी शासन अपनी फौजों तथा छावनियों से सशस्त्रा सैनिकों तथा टैंकों द्वारा स्थापित हुआ है और अब तक चल रहा है। बाइबिल में स्पष्ट घोषणा दी गयी है कि 'इफ यू हैव फेथ इन द सोर्ड, बाई द सोर्ड यू शैल बी पनिश्ड' अर्थात् यदि तुम तलवारों और बंदूकों द्वारा किसी को गुलाम बनाते हो तो समय और अवसर आने पर वही लोग तुमसे अधिक तेजतर शस्त्रों व बंदूकों से तुम्हें अपने हाथ से धकेल कर बाहर करेंगे। अत: यदि सचमुच ही भारत की जनता अपनी दासता का जुआ अपनी गरदन से उतार फेंकना चाहती है तो किसी न किसी ढंग से अणु शस्त्र प्राप्त करे। वे साधन बेग-बारो-स्टील अर्थात् कहीं से मांगकर, उधार लेकर अथवा जबर्दस्ती कहीं से चुराकर अथवा लूटकर प्राप्त करे ।

हमारा दूसरा पड़ोसी देश जो हमें धड़ाधड़ अपना साहित्य भेज रहा था वह था सोवियत रूस जिसने 1917 में देश के किसानों तथा मजदूरों के बलबूते पर अपने देश में किसानों और मजदूरों का शासन स्थापित कर लिया था और सदियों की तानाशाही के जुए को अपनी गर्दन से उतार फेंका। नौजवान भारत सभा के एक दल ने आयरिश ढंग को अपनाकर और अस्त्र जमा करके अपना काम शुरू कर दिया। भारत की सेंट्रल असेंबली के अधिवेशन में बम फेंककर बहरे कान को सुनाने के लिए ऊंची आवाज की जरूरत होती है वाले पोस्टर भी फेंके थे। फिर उन्होंने हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के समीप ही मद्रास से लौटते हुए वायसराय की ट्रेन पर बम चलाने का प्रोग्राम भी पूरा किया। फिर पंजाब के बड़े-बड़े शहरों जैसे लाहौर, अमृतसर, गुंजरांवाला, लायलपुर और रावलपिंडी आदि में एक ही दिन एक ही समय में बम चलाने का कार्य पूरा किया। राजधानी दिल्ली के चांदनी चौक बाजार में लार्ड हार्डिंग वायसराय के जलूस वाले हाथी पर भी बम चला दिया जिसमें हाथी का महावत तथा उसका लड़का तत्काल ही दम तोड़ गए। लेडी हार्डिंग की गर्दन पर छह इंच गहरा जख्म लगा और लार्ड हार्डिगं स्वयं बेहोश हो गए। बंगला में कुछ पोस्टर भी फेंके जिसमें लिखा था कि हम अंग्रेज हुकूमत को सचेत करना चाहते हैं कि अंग्रेजी शासन के विरोधी तथा शत्रु केवल बंगाल एवं कलकत्ता में ही नहीं बसते। अब वे भारत में जिस भाग में भी कदम रखेंगे वहीं अपने शत्रु तथा जानलेवा मौजूद पायेंगे। 

आजादी का साहित्य तैयार करने वालों तथा नौजवान भारत सभा में कांगड़े वाले लेखक रामचंद्र और मिंटगुमरी के मेहता सत्यपाल इत्यादि सम्मिलित थे। जिन्होंने दो-दो पैसे वाले टैक्स्ट उर्दू भाषा में हजारों की संख्या में छापकर पंजाब के गांव-गांव व कोने-कोने में बांटना और बेचना शुरू कर दिया। हमारा सबसे प्रथम टैक्स्ट भारतमाता के दर्शन अर्थात् हम स्वराज्य क्यों चाहते हैं था। टैक्स्टों के प्रकाशन का प्रोत्साहन फ्रांस की राज्य क्रांति के जन्मदाता वाल्टेयर से लिया गया था। मैंने अपने टैक्स्ट के दूसरे पृष्ठ पर प्रकाशन के शीर्षक में वाल्टेयर का वह ऐतिहासिक वाक्य लिखा कि दस-दस, बीस-बीस जिल्दों वाली हजारों पृष्ठों की मोटी-मोटी किताबों को भला कौन खरीद सकता है और उसे पढ़ और समझ भी कौन सकता है। सच्ची बात तो यह है कि यह गरीब से गरीब किसान और मजदूरों की झोंपडियों तक पहुंच सकने वाले पैसे दो-दो पैसे वाले टैक्स्ट ही होते हैं जिनसे सल्तनतों के तख्ते उलट जाया करते हैं। प्रेस का मालिक मेरा एक मुसलमान दोस्त था। यह वाक्य पढ़कर वह मुझसे पूछने लगे कि आप भी अंग्रेजी राज्य का तख्ता उलटना चाहते हैं? 

मैंने जवाब दिया जनाब यह वाक्य मेरा नहीं है बल्कि एक फ्रेंच विद्वान तथा फिलॉसफर वाल्टेयर का है। आप तो मुसलमान हैं और आपने फारसी की वह मिसाल नहीं सुनी है कि नकले कुफ्र-कफ्र न बासद अर्थात् कुफ्र के शब्दों को दोहराना कुफ्र नहीं होता। हमारी कचहरियों में ऐसे भी मुकदमे पेश होते हैं जहां एक आदमी जज के सामने पेश होकर कहता है कि अमुख आदमी ने मुझे बहुत ही गंदी गाली दी है और जज के सामने वह आदमी उस गंदी गाली के शब्दों को दोहरा देता है तो वह उसे अपराध नहीं समझता। प्रेस का वह मालिक मेरी बात सुनकर हंस पड़ा और मेरे टैक्स्ट की पांडुलिपि अपने हाथ मैं लेकर बोला जनाब में इसे अवश्य ही छाप दूंगा। इसके बाद तो वह टैक्स्ट तथा मेरे लिखे हुए दर्जनों टैक्स्ट हजारों की संख्या में छपते रहे और चलते रहे।

जब ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी लगाने का फैसला किया तो उस वक्त मैं मुल्तान जेल में था। लेकिन जिस दिन यानी 23 मार्च को भगत सिंह को फांसी लगाई गई तो जेल से रिहा होकर देहरादून अपनी पत्नी और बच्ची विजय को मिलने गया हुआ था। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी का समाचार मेरे जैसे बहुत से लोगों के लिए बेहद दुख का समाचार था। सारे पंजाब में सनसनी और दुख की लहर फैल गई थी। उस दिन शायद कुछ टोडियों को छोड़कर किसी घर में चूल्हा नहीं जला था। सारा पंजाब मातम में डूबा हुआ था। औरतें सिसक-सिसक कर रो रहीं थीं। अंग्रेज सरकार ने इस भय से कि अगर उन्होंने इन तीनों शहीदों की लाशें उनके रिश्तेदारों के हवाले कर दीं तो कहीं पंजाब में और उसके साथ ही सारे हिंदुस्तान में तूफान खड़ा हो जाए, इन तीनों की लाशों को रात के अंधेरे में सतलुज नदी के किनारे फिरोजपुर के नजदीक एक स्थान पर मिट्टी का तेल डालकर जला दिया। जो क्रांतिकारी जीते हुए ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए भारी आतंक और चुनौती बने हुए थे उनकी लाशों से जैसे पूरा ब्रिटिश साम्राज्यवाद भयभीत था।
   यह प्रश्न भी वाद-विवाद का रहा है कि गांधीजी की अहिंसा और असहयोग आंदोलनों में लाहौर तथा पंजाब के लोगों की प्रतिक्रिया कैसी रही ? पंजाब मुस्लिम, हिंदू और सिख संप्रदायों में विभाजित था। मुसलमान पचास प्रतिशत से ज्यादा थे। उनका कांग्रेस और कांग्रेसियों के साथ कोई नाता नहीं था। हिंदू संप्रदाय सनातन धर्म और आर्यसमाजियों में बंटा हुआ था। आर्यसमाज भी गुरुकुल पार्टी और कॉलिज पार्टी में बंटी हुई थी। हर संस्था की अपनी-अपनी समस्याएं थीं। इसलिए कोई भी पूरी तरह से आंदोलन की ओर आकर्षित नहीं हुआ। सिखों में भी एक वफादार ग्रुप था जो हमेशा ब्रिटिश सेना को जवान सप्लाई करने में गर्व अनुभव करता था। बंगाल, यू.पी. और दक्षिणी भारत के मुकाबले में पंजाब में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की प्रतिक्रिया बहुत कम और कमजोर रही। पंजाब सांप्रदायिक रूप से विभाजित था। और लोग आपस में खींचातानी करते रहते हैं।
   पंजाब में कांग्रेस शक्तिशाली नहीं थी। विशेष रूप से शहरी इलाकों में कांग्रेस का प्रभाव कम था। गांवों में सिखों की एक संख्या कांग्रेस में शामिल हुई लेकिन उसकाकारण उनमें राजनैतिक चेतना उत्पंन होना नहीं बल्कि गुरुद्वारों में सुधार लाने की इच्छा थी। शहरी इलाकों में नाम की कांग्रेस कमेटियां तो बनी थीं लेकिन गांवों में वह भी नहीं थीं। पंजाब में लोग सार्वजनिक मीटिंगों में शामिल होते थे जब कोई बड़े लीडर किसी अन्य राज्य से लाहौर तथा पंजाब के किसी शहर में आते थे। लेकिन उनकी हिदायतों की कोई व्यावहारिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दी।
   'क्राई फॉर जस्टिस' के अलावा भगत सिंह की प्रिय पुस्तकें थीं डॉन ब्रीन लिखित 'माई फाइट फॉर आयरिश फ्रीडम' और 'हीरोस और हीरोइन्स आफ रशिया'। भगत सिंह ने मुझे भी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में शामिल होने के लिए कहा। मैंने उसे कहा 'मैंने सर्वेंट्स आफ पीपुल्स सोसायटी के आजीवन सदस्य बनते हुए जो प्रतिज्ञा की है उसके अंतर्गत मैं हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में शामिल नहीं हो सकता।' मैंने उससे कहा कि मैंने आपकी संस्था के और नियम पढ़े हैं। मैं जानता हूं कि आपके तीन नियम हैं, शस्त्रा और असलह को जमा करना, उसका उचित अवसर पर इस्तेमाल करना और सारे देश में साम्राज्यवाद विरोधी प्रोपेगैंडा करना। मैंने भगत सिंह से पूछा था कि क्या तुम जानते हो कि मैं आजकल क्या काम कर रहा हूं? मैं आजकल किताबें और पैम्पलेट लिख रहा हूं और जगह-जगह लेक्चर दे रहा हूं।
   यह सुनकर भगत सिंह ने कहा, 'गुरुजी मैं संतुष्ट हूं।' मैंने भगत सिंह से कहा। 'मैं तुम्हें आश्वासन दिलाता हूं कि तुम्हारी हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में औपचारिक रूप से प्रवेश किए बिना भी मैं ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरूध्द अपने प्रोपेगैंडा को दुगना कर दूंगा ताकि लोग तुम्हारी संस्था और तुम्हारी कार्रवाही को सही मानें।'
   नेहरू म्यूजियम नई दिल्ली के लिए ली गई एक इन्टरव्यू में मुझसे पूछा गया कि मेरे यह छात्रा जिनमें भगत सिंह भी शामिल था मुझसे एक अध्यापक होने के नाते प्रेरणा लेते होंगे?
   मैंने तब भी अपने उत्तर में कहा था कि हर अध्यापक अपने शिष्यों को किसी न किसी तरह से प्रेरणा जरूर देता है और प्रभावित करता है। लेकिन विद्यार्थी भी अपने अध्यापकों को प्रभावित करते हैं और प्रेरणा देते हैं। मैं यह बात बहुत प्रसन्नता और दावे के साथ कहता हूं कि भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, भगवतीचरण तथा नेशनल कॉलेज में मेरे अन्य विद्यार्थियों ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
   जहां तक भगत सिंह का स्वभाव है उसकी प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत स्वयं उसका अपना परिवार था। उसके पिता सरदार किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह महान देशभक्त थे जिन्होंने अपना सारा जीवन भारत की स्वतंत्राता के लिए अर्पण कर दिया और बहुत मुसीबतें उठायीं। भगत सिंह अपने चाचा सरदार अजीत सिंह के बहुत भारी प्रशंसक थे और औरसंख्या कांग्रेस में शामिल हुई लेकिन उसका उन्हें अपना आदर्श मानकर उनकी इज्जत करते थे।

क्रांतिकारी भगत सिंह को तो बस देश की आजादी की ही लग्न थी। क्रांति ही उसका धर्म था और वह किसी और देवी देवता में विश्वास नहीं रखता था। भगत सिंह मुझसे हर राजनैतिक विषय पर बातचीत करता था। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की गतिविधियों की बातें वह मुझसे नहीं करता था। क्योंकि वह सभी गुप्त कार्रवाहियां थीं। जो आर्मीयों के सदस्यों के बीच की बातें थीं। मैं हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का सदस्य नहीं था। जब भी हम असहयोग आंदोलन की प्रगति और गांधी के विषय में बातचीत करते तो भगत सिंह उत्तेजित होकर गांधीजी की आलोचना करता। गांधीजी के प्रति भगत सिंह का रवैय्या सुभाषचंद्र बोस की तरह था। सुभाषचंद्र बोस ने गांधी जी से कहा था-''बापू, आइये हम वही भाषा सीखें जो अंग्रेज समझते हैं। अहिंसा और जुर्म सहने की फिलोस्फी अंग्रेजों की समझ में नहीं आ सकती। उनका साम्राज्य ताकत के सहारे टिका हुआ है। हमारे पास भी अगर वैसे ही हथियार हों तो नि:सन्देह हमारी विजय होगी। अंग्रेज चार करोड़ हैं और हम चालीस करोड़ हैं।'' भगत सिंह भी इसी तरह का दृष्टिकोण रखता था।
भगत सिंह के साथ मेरी अंतिम भेंट जनवरी के प्रथम सप्ताह 1929 में कलकत्ता में हुई। वह अप्रैल 1929 को गिरफ्तार कर लिया गया था। भगत सिंह ने अपने केश कटवा दिए थे। वह कोट-पैंट और हैट पहनता था। मैं भी कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने गया हुआ था। भगत सिंह से मेरी मुलाकात कांग्रेस अधिवेशन में नहीं बल्कि एक दोस्त के घर हुई थी। उनका नाम सेठ छज्जूराम था। सेठ छज्जूराम एक बिजनेस मैन थे। उनके घर पंजाब के बहुत लोग आकर ठहरते भी थे। भगत सिंह वहीं ठहरा हुआ था। मैं पोर्टिको में खड़ा था। भगत सिंह तेजी से आया और सीढ़ियों के रास्ते ऊपर चला गया।
   उस समय मेरी भगत सिंह से बातचीत नहीं हुई। हमने एक दूसरे की ओर देखा। उसने मुझे नमस्ते की और वह गायब हो गया।
   उसके बाद भगवतीचरण मेरे पास आए और कहने लगे 'गुरुजी, आपने भगत सिंह को देख लिया है। कृपया यह रहस्य किसी को न बतायें कि आपने उसे कलकत्ता में देखा था।' मुझे समझ में आ गया कि क्या बात थी। भगवतीचरण, भगत सिंह से पढ़ाई में एक साल सीनियर था।
   लाहौर में भगत सिंह, सुखदेव और भगवतीचरण अक्सर मेरे कमरे में आया करते थे। साथ ही गुसलखाना था जिसमें वे नहाते थे। वे अपने कोट-और दूसरे कपड़े गुसलखाने के बाहर ही टांग देते थे। मैंने अक्सर उनकी कपड़ों की जेबों में पिस्तौलों को रखे देखा था। मुझे बहुत से लोगों से पता चला कि हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की शाखाएं बंगाल,बिहार और उत्तरप्रदेश में थीं। दिल्ली और महाराष्ट्र में भी उनका प्रभाव था ।राजगुरू तो महाराष्ट्र के रहने वाले थे।








सोमवार, 4 अप्रैल 2011

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -6-यशपाल


लाहौर से फरार हो जाने पर भगतसिंह ने दिल्ली, आगरा, कानपुर, पटना और कलकत्ते तक बार-बार चक्कर लगाकर भिन्न-भिन्न प्रांतों के क्रांतिकारियों को एक सूत्र में बांधने की चेष्टा की। स्थिति सभी प्रांतों में खराब ही थी। स्थिति खराब होने का मुख्य कारण था, साधनों और संगठन की कमी। गुप्त क्रांतिकारी आंदोलन की सब से बड़ी कठिनाई यह थी कि उसका उद्देश्य तो सार्वजनिक था परंतु उसे जनता से दूर रह कर जनता की सहायता के बिना चलना पड़ रहा था। अपने दल के लोगों अथवा सहानुभूति रखने वाले उंगलियों पर गिने जा सकने योग्य व्यक्तियों को छोड़ कर क्रांतिकारी अपनी आवश्यकता और स्थिति का भेद किसी को नहीं दे सकते थे। काकोरी की डकैती असफल हो जानेऔर इस मामले में बहुत से लोगों के मुखबिर भी हो जाने के कारण इस समय क्रांतिकारी सर्वसाधारण लोगों से सहानुभूति की आशा कम ही रख सकते थे।
      युक्त प्रांत में उन दिनों बहतु निरुत्साह था। सशस्त्र क्रांति के बढ़ने की कोई आशा थी तो केवल काकोरी के बंदियों को छुड़ा सकने से। इसके लिए अनेक योजनाएं बार-बार बनतीं और प्रयोग में आए बिना ही रह जातीं। इस अवस्था से ऊबकर काकोरी दल के नेता शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ने जेल से संदेश भेजा था।बिस्मिल की बड़ी इच्छा थी कि एक बार किसी तरह जेल से निकल कर विदेशी सरकार से दो-दो हाथ कर पाते परंतु दल में इतनी शक्ति नहीं थीं; ये योजनाएं कपोल कल्पनाएं ही रह गई।भगत सिंह, सुखदेव, विजय और शिव वर्मा के प्रयत्नों से उत्तर भारत के प्रांतों के क्रांतिकारी प्रतिनिधियों की एक बैठक की योजना दिल्ली में की गई थी। यह बैठक 9-10 सिंतबर, 1928 को फीरोजशाह कोटला के खंडहरों में हुई थी। इस बैठक में पंजाब से  सुखदेव और भगत सिंह, राजपूताना से कुंदनलाल, युक्तप्रांत से शिव वर्मा, ब्रह्मदत्ता मिश्र, जयदेव, विजय कुमार सिन्हा, सुरेंद्रनाथ पांडे और बिहार से फणींद्रनाथ घोष और मनमोहन बनर्जी आए थे। आजाद इस बैठक में नहीं आ पाए थे। भगत सिंह और शिव वर्मा उनसे मिल चुके थे। आजाद ने आश्वासन दे दिया था कि बहुमत से जो कुछ निश्चय होगा, उसे वे स्वीकार कर लेंगे।
      अब तक भिन्न-भिन्न प्रांतों में क्रांतिकारी दलों के अपने-अपने पृथक नाम थे। बंगाल-बिहार के 'अनुशीलन' और 'युगांतर' समितियां, युक्त प्रांत में 'हिंदुस्तान प्रजातंत्र सेना' और 'बनारस रिवोल्यूशनरी पार्टी'। दिल्ली की बैठक में भगत सिंह और सुखदेव ने सभी प्रांतों से प्रतिनिधि लेकर एक केंद्रीय-समिति बनाई जाने और पूरे संगठन का नाम 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (हिंदुस्तानी समाजवादी प्रजातंत्रा सेना) रखे जाने का प्रस्ताव रखा।
      सोशलिस्ट शब्द जोड़े जाने का सुझाव भगत सिंह और सुखदेव ने ही दिया था परंतु युक्तप्रांत के शिव वर्मा और विजयकुमार सिन्हा का भी सबल अनुमोदन इनके साथ था। यह लोग कानपुर के संगठित मजदूर आंदोलन द्वारा प्रभावित हो चुके थे और कानपुर की मजदूर सभा से भी अपना संपर्क बना चुके थे। उन लोगों पर सन् 1925 के 'कानपुर बोल्शेविक षडयंत्र' का भी प्रभाव जरूर पड़ा होगा। सबसे बड़ी बात तो थी सन् 1928 में जगह-जगह हड़तालों द्वारा मजदूरों की चेतना और शक्ति का प्रदर्शन। एच.एस.आर.ए. के साथी मजदूर श्रेणी की क्रांतिकारी शक्ति से परिचित होने लगे थे।
      क्रांतिकारियों की बहुत सी शक्ति मुकद्दमों में बन गए मुखबिरों और पुलिस केथे। काकोरी की डकैती असफल हो जाने मामूली अफसरों के वध में ही नष्ट होती रही थी। दिल्ली में निश्चय किया गया कि अब केवल ऐसे ही मामलों को हाथ में लिया जायेगा जिनका सार्वजनिक राजनैतिक महत्व हो सके। इस उद्देश्य से सब से पहले चुना गया साइमन कमीशन को। इस कमीशन के आने पर बम्बई में मजदूरों की जो व्यापक हड़ताल हुई थी, उससे अपना सहयोग प्रकट करना दल आवश्यक समझता था।
      दिल्ली की बैठक में यह भी स्पष्ट रूप से निश्चिय कर लिया गया कि भविष्य में हमारा कार्यक्रम किसी एक व्यक्तिगत नेतृत्व में नहीं चलेगा। दल के सब हथियार और प्राप्त होने वाला धन केंद्रीय समिति के हाथ में रहेंगे। कोई भी कार्य करने से पहले सात आदमियों की केंद्रीय समिति में उस पर विचार किया जायेगा।
      इस बैठक में विजय कुमार सिन्हा और भगत सिंह पर अंतरप्रांतीय संबंध बनाए रखने का उत्तारदायित्व दिया गया। सुखदेव को पंजाब, शिव वर्मा को युक्तप्रांत, कुंदनलाल को राजपूताना, फणींद्रनाथ को बिहार का प्रतिनिधि संगठनकर्त्ता स्वीकार किया गया। हथियारों और कोष की कमी के कारण यह निश्चय किया गया कि हथियार और कोष पूर्णत: केंद्रीय-समिति के हाथ में रहें। कोष वास्तव में कुछ था ही नहीं। हथियार भी कम ही थे, इसलिए यह तय पाया कि जिस प्रांत में जब आवश्यकता हो हथियार भेज दिए जायें और फिर लौटा कर केंद्रीय समिति में दे दिए जाएं।
      इससे पूर्व के दल में से चंद्रशेखर आजाद ही ऐसे व्यक्ति थे जो ज्येष्ठ होने का दंभ छोड़ कर नए लोगों के साथ नये ढंग से काम करने के लिए तैयार थे। आजाद के अतिरिक्त उस समय नये लोगों में से शस्त्राों का उपयोग भी कोई दूसरा व्यक्ति ठीक से नहीं जानता था; इसलिए सशस्त्रा या सैनिक कार्य का नेता उन्हीं को बनाकर एच.एस.आर.ए. का 'कमांडर-इन-चीफ' निश्चिय किया गया था।
      लाहौर में नौजवान भारत सभा को यह निर्देश दिया गया था कि नगर में साइमन कमीशन के आने पर जहां तक हो सके सभी राजनैतिक दलों को मिलाकर विकट से विकट प्रदर्शन किया जाये। नौजवान भारत सभा की पुकार थी कि-''अंग्रेज सरकार को हमारे भाग्य निर्णय का अधिकार नहीं है। वे कमीशन भेजने वाले कौन होते हैं?'' लाहौर में साइमन कमीशन के बहिष्कार के प्रदर्शन का नेतृत्व सभा ही कर रही थी। सब ओर मुकम्मिल हड़ताल, काले झंडे और नंगे सिरों की बाढ़-सी नजर आती थी। इतने बड़े प्रदर्शन से प्रभावित हो कर कांग्रेस के नेताओं को प्रदर्शन में आगे चलना ही पड़ा।
   वृध्द पंजाब केसरी लाला लाजपत राय को भीड़ के धक्कों से बचाये और धूप में उनके सिर पर छतरी संभाले नौजवान उन्हें स्टेशन तक ले गए। भीड़ के आगे नौजवानभारत सभा के लोग थे। उन्होंने पुलिस की धमकियों के बावजूद कमीशन के लिए रास्ता देने से इनकार कर दिया। वे कमीशन को काले झंडे दिखा देने और 'साइमन गो बैक' की पुकार उनके कानों तक पहुंचा देने पर तुले हुए थे। पुलिस ने लाठी चार्ज किया। सभा के लोगों से जहां तक बन पड़ा जनता को पीछे हटने से रोके रहे। जनता के हृदय में अंग्रेजी सरकार के प्रति प्रबल घृणा उत्पन्न कर सकने का यह अच्छा अवसर था।
   लालाजी को घेरे इस मोर्चें को टूटते न देखकर समीप खड़े पुलिस सुपरिटेंडेंट स्काट ने इस टोली पर हमला करने की आज्ञा दी। डी.एस.पी. सांडर्स स्वयं छोटी लाठी हाथ में लेकर सिपाहियों के साथ इस टोली पर टूट पडा। उसकी एक लाठी से लालाजी के सिर पर तनी हुई छतरी टूट कर उनके कंधे पर भी चोट आ गयी।
   'मोरी दरवाजे' की विराट सार्वजनिक सभा में सुखदेव और मैं भीड़ के पीछे खड़े थे। हम लोगों से कुछ ही कदम दूर डिप्टी पुलिस सुपरिटेंडेंट नील खड़ा था। लालाजी ने अपनी ओजपूर्ण वक्तृता में सुबह की घटना की निंदा करते हुए कहा-''जो सरकार निहत्थी प्रजा पर इस तरह के जालिमाना हमले करती है, उसे तहजीबयाफ्ता (सभ्य) सरकार नहीं कहा जा सकता और ऐसी सरकार कायम नहीं रह सकती। मैं आज चैलेंज देता हूं कि इस सरकार की पुलिस ने मुझ पर जो बार किया है। वह एक दिन इस सरकार को ले डूबेगा।'' अंग्रेज अफसरों को लक्ष्य कर लालाजी ने अपनी बात अंग्रेजी में दोहराई-'' प् कमबसंतम जींज जीम इसवूे ेजतनबा ंज उम ूपसस इम जीम सेंज दंपसे पद जीम बविपिद व िजीम ठतपजपेी तनसम पद प्दकपंण्'' 
    17 नवंबर, 1928 को लालाजी का देहांत हो गया। जनता में विदेशी शासन विरोधी भावना और लालाजी के लिए आदर का प्रवाह उमड़ रहा था। लालाजी की अर्थी के जुलूस में लाख-डेढ़ लाख आदमी रहे होंगे। डॉक्टर गोपीचंदजी भार्गव तो विलख-विलख कर रोये। लाहौर में ऐसा कोई भी हिंदू-मुसलमान न होगा जिसने मातम न मनाया हो। लाहौर के सभी स्वयं-सेवक दलों ने शव-यात्राा के प्रबंध में साथ दिया था परंतु हम लोगों की सेवा समिति पर बोझ अधिक था। प्राय: दस बजे सुबह अर्थी की यात्राा लालाजी के बंगले से आरंभ हुई और चार मील दूर रावी नदी के तट पर पहुंचते-पहुंचते संध्या के पांच बज गए। अर्थी पर फूलों का बोंझ इतना था कि बीसियों आदमी उसे उठा कर चल रहे थे और दस-पांच कदम पर आदमी बदलते जाते थे।
      संध्या का अंधेरा हो गया था परंतु विराट चिता के समाप्त होने में अभी घंटों की देर थी। भीड़ प्राय: छंट चुकी थी। डाक्टर भार्गव आंसू बहाते हुए बोले कि वे चिता कोअकेला नहीं छोड़ना चाहते। उन्हें आशंका थी कि कोई चिता का अपमान न कर जाय। मैंने उन्हें सांत्वना दी कि मैं रात यहीं रह जाऊंगा।
      भगवती भाई ने मुझ से पूछा, यहां सख्त सर्दी में गीली रेत पर कैसे रह जाओगे? वे यह भी देख रहे थे कि मैं कितना थका हुआ था।
      ''अब तो कह चुका हूं।'' लाचारी दिखाई।  
      ''अच्छा।'' कहकर वे चले गए। मैं अकेला ही चिता से कुछ दूर बैठा रहा। हल्की-हल्की चांदनी फैल रही थी। रावी की तीखी ठंडी हवा चलने लगी थी। चिता से हल्का सेंक भी आ रहा था। आंखों में नींद भर रही थी।
      प्राय: एक घंटे के बाद अचानक अपने नाम की पुकार सुनी। आवाज पहिचानी, भगवती भाई थे। वे दूर रेती के पार खड़े पुकार रहे थे। पास जाकर देखा कि वे टांगे पर एक खाट और बिस्तर ले आए हैं और एक कटोरदान में कुछ खाने के लिए भी।
      हम लोगों ने चिता से कुछ दूर खाट पर बिस्तरा लगाया और दोनों एक साथ सो गए। सुबह सूर्य की किरणों से नींद खुली। नींद ऐसी आई थी कि करवट भी नहीं बदली। भगवती भाई के साथ खाट पर सोने से करवट लेने की गुंजाइश भी नहीं थी। फारारी के दिनों में हम लोगों को हफ्तों जाड़ों में एक कम्बल लेकर इसी प्रकार सोना पड़ा परंतु तब खाट भी नहीं थी।

17 दिसम्बर, 1928 को अपराहन में राजगुरु और भगत सिंह ने गोलियां मारकर सांडर्स को नरक रवाना कर दिया। साथ ही एच.एस.आर.ए. ने हत्या की जिम्मेदारी स्वीकार की और दीवारों पर इस्तहार लगाकर कहा गया 'नौकरशाही सावधान! सांडर्स की मृत्यु से लाला लाजपत राय की हत्या का बदला ले लिया गया।
      सबसे कठिन समस्या थी भगत सिंह को लाहौर से बार निकालने की। यह कल्पना कर लेना कठिन नहीं था कि जिस भगत सिंह के विषय में पुलिस को याें ही सदा संदेह बना रहता था, उसकी लम्बी फरारी और सांडर्स-वध की घटना के बाद पुलिस उसकी खोज में कितनी परेशान होगी। भगत सिंह केश कटा कर वेश तो बदल चुका था लेकिन इससे चेहरे में कितना परिवर्तन आ सकता था? फर्न पर गोली चलाते समय उसे तीन-चार सिपाहियों ने अच्छी तरह देखा भी था। भगत सिंह के पुराने रूप से लाहौर की खुफिया पुलिस खूब परिचित थी ही। दाढ़ी उसने साफ करा दी थी जरूर परंतु उसकी दाढ़ी बहुत घनी तो कभी थी भी नहीं।
      सुखदेव लगभग रात के आठ बजे आया। उन दिनों भाभी संस्कृत पढ़ा करती थीं। पड़ोस की एक और महिला के साथ मिल कर उन्होंने एक अध्यापक नियुक्त कर लिया था। भाभी को एक ओर बुला कर सुखदेव ने प्रश्न किया- ''कहीं बाहर जा सकती हो?''
      ''कहां?...क्या काम है? ''
      ''इस घटना के एक आदमी को बचा कर लाहौर से निकालना है। उसकी मेम साहब बन कर साथ जाना होगा,... खतरा है। सोच लो, गोली चल सकती है।'' सुखदेव भाभी की ओर घूरता रहा।
      ''कौन आदमी है?'' भाभी ने जानना चाहा।
      ''कोई भी हो।'' जैसी की सुखदेव की आदत थी।
      ''चली जाऊंगी।''
      ''वह रात में यहां ही रहेगा।...इस पढ़ाई को समाप्त कर दो।''
      ''अच्छा।''
      कुछ देर बाद सुखदेव के साथ एक लंबा सा जवान ओवरकोट, हैट पहने एक नौकर के साथ आ गया। भाभी ने उन्हें कमरे में बैठा दिया, स्वयं भी बैठी और सुखदेव की ओर देखती रहीं। अपरिचित आदमी की ओर क्या देखतीं?
      सुखदेव ने उस आदमी की ओर संकेत कर भाभी से पूछा-''इसे पहचानती हो!''
      भाभी ने देखा; जरा ध्यान से देखा-''भगत?''
      भगत सिंह और सुखदेव हंस पड़े।
      सुबह तड़के पांच-छह बजे कलकत्ता मेल से चलने की बात थी। भगत सिंह ओवरकोट का कालर उठाये, हैट माथे पर खींचे और अपना चेहरा गोद में लिए 'शची' के सिर की आड़ में किये रेलवे प्लेटफार्म पर पहुंचा। भगवती भाई का लड़का शचींद्र कुमार वोहरा, जो अब इंजीनियर है उस समय तीन बरस का था। भाभी भी यथाशक्ति चेहरे पर पाउडर मले और अपने सब से ऊंची एड़ी के जूते से खट-खट करती साथ थीं। भगत सिंह की जेब में भरा हुआ पिस्तौल था। राजगुरु नौकर के वेश में साथ था। उस की कमर पर भी भरा हुआ पिस्तौल बंधा था। पुलिस को संदेह हो जाता तो गोली जरूर चलती... शची और भाभी दोनों का क्या होता?(क्रमशः)




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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

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