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गुरुवार, 25 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाड़ा - अंधविश्वास और मार्क्सवाद

              अंधविश्वास सामाजिक कैंसर है। अंधविश्वास ने सत्ता और संपत्ति के हितों को सामाजिक स्वीकृति दिलाने में अग्रणी भूमिका अदा की है। आधुनिक विमर्श का माहौल बनाने के लिए अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता बेहद जरूरी है। आमतौर पर साधारण जनता के जीवन में अंधविश्वास घुले-मिले होते हैं।

अंधविश्वासों को संस्कार और एटीटयूट्स का रूप देने में सत्ता और सत्ताधारी वर्गों को सैकड़ों वर्ष लगे हैं। अंधविश्वासों की शुरुआत कब से हुई इसका आरंभ वर्ष तय करना मुश्किल है। फिर भी ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि सामाजिक विकास के क्रम में जब राजसत्ता का निर्माण कार्य शुरू हुआ था उस समय साधारण लोग किसी से डरते नहीं थे। किसी भी किस्म का अनुशासन मानने के लिए तैयार नहीं थे, राजा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते थे। सत्ता के दंड का भय नहीं था। यही वह ऐतिहासिक संदर्भ है जब अंधविश्वासों की सृष्टि की गई।

आरंभिक दौर में अंधविश्वासों को संस्कार और जीवन मूल्य से स्वतंत्र रूप में रखकर देखा जाता था। कालांतर में अंधविश्वासों ने सामाजिक जीवन में अपनी जड़ें इस कदर मजबूत कर लीं कि अंधविश्वासों को हम सच मानने लगे।

अंधविश्वास का दायरा बहुत बड़ा है। इसके दायरे में सामाजिक मान्यताएं, सामाजिक आचार-व्यवहार से लेकर कला, ललित कला, साहित्य, राजनीति, व्यापार तक आता है। इसके कारण सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया बाधित हुई है।

भारत में विगत दो हजार वर्षों में किसी भी किस्म की सामाजिक क्रांति नहीं हुई। हम लोगों ने कभी भी इस सवाल पर सोचा नहीं कि हमारे समाज में विगत दो हजार वर्षों में सामाजिक क्रांति क्यों नहीं हुई? तमाम किस्म की कुर्बानियों के बावजूद आधुनिक भारत में कोई सामाजिक क्रांति क्यों नहीं हुई? यदि गंभीरता से भारतीय समाज पर नजर डालें तो पाएंगे कि भारत में सामाजिक क्रांति न होने के जिन कारणों की ओर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ध्यान खींचा था उनकी तरह हमारे समाज ने पूरी तरह ध्यान नहीं दिया।

हजारीप्रसाद द्विवेदी का मानना था कि भारत में सामाजिक क्रांति न होने के तीन प्रमुख कारण हैं। पहला, अंधविश्वास, दूसरा, पुनर्जन्म की धारणा और तीसरा कर्मफल का सिध्दांत। हमारी समूची चेतना इन तीन सिद्धांतों से परिचालित रही है। अंधविश्वास के कारण ही रूढ़ियों ने जन्म लिया। साहित्य एवं कलारूपों में रूढ़ियां और सामाजिक जीवन में रूढ़ियां अंधविश्वास की ही देन हैं।
आधुनिककाल आने के बाद साहित्य से रूढ़ियों का खात्मा हुआ बल्कि सामाजिक जीवन में रूढ़ियां बनी रहीं , अंधविश्वासों के खिलाफ सामाजिक संघर्ष लड़ा नहीं गया। वहीं दूसरी ओर, पूंजीवाद ने बड़े कौशल के साथ अंधविश्वास को अपनी मासकल्चर, विज्ञापन रणनीति और मार्केटिंग का अंग बनाकर नई शक्ल दे दी।

आज बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने बाजार के विकास के लिए जिन दो तत्वों का प्रचार रणनीति में सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रही हैं वह है धार्मिक संप्रेषण की पध्दति और दूसरा है अंधविश्वास। इन दो के जरिए जहां एक ओर उपभोक्तावाद का तेजी से विकास हो रहा है वहीं दूसरी ओर अंधविश्वासों के प्रति भी आस्था बढ़ रही है।

जो लोग सामाजिक परिवर्तन करना चाहते हैं उन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों की धार्मिक संप्रेषण की रणनीति और अंधविश्वास की जुगलबंदी को तोड़ना होगा। उन तमाम क्षेत्रों में हमले तेज करने होंगे जिनसे इन दो तत्वों को संजीवनी मिलती है। इसके अलावा पुनर्जन्म और कर्मफल के सिध्दांत के प्रति आम जनता में आलोचनात्मक रवैय्या पैदा करना होगा। आज अंधविश्वास संस्कृति उद्योग का अनिवार्य तत्व बन गया है। संभवत: कुछ लोगों को यह बात समझ में न आए और कुछ लोगों की भावनाएं भी आहत हों। किंतु इस डर से अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता पैदा करने के काम को छोड़ा नहीं जा सकता।

प्रश्न उठता है अंधविश्वास क्या है? इसे किन तत्वों से मदद मिलती है? इसका सामाजिक आधार कौन सा है? इससे किस तरह का समाज निर्मित होता है? किस तरह के कला रूप जन्म लेते हैं? और इसका विकल्प क्या है? ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो पाएंगे कि अंधविश्वास की धारणा का बुनियादी सारतत्व एक जैसा रहा है। मिस्र, यूनान और भारत में अंधविश्वासों की शुरुआत तकरीबन एक ही तरह हुई।

अंधविश्वास की बुनियादी विशेषता है अंधानुकरण, वैज्ञानिक विवेक का त्याग और स्वतंत्र चिंतन का विरोध। सामाजिक जीवन में इसका लक्ष्य था आम लोगों को अपने श्रेष्ठजनों के किसी भी आदेश के पालन का अभ्यस्त बनाया जाए। दूसरा , वे उन्हीं पर भरोसा करना सीखें जो हर मामले में समान भाव से धार्मिक विधि-विधानों का पालन करते हों। कलाओं की दुनिया में इसने नयनाभिराम चित्रों और मधुर गीतों की सृष्टि की। नयनाभिराम चित्रों और मधुर गीत-संगीत को मंदिरों में मानदंड के रूप में स्थापित किया गया। कला के क्षेत्र में किसी को यह इजाजत नहीं थी कि उनमें परिवर्तन करे। इसके कारण कलाओं के रूप सैकड़ों वर्षों तक अपरिवर्तित रहे। किसी ने यह साहस नहीं दिखाया कि कलाओं और मधुर गीतों में परिवर्तन करे। ये कलारूप सैकड़ों वर्षों से एक जैसे हैं। मिस्र के कलारूप इस अंधानुकरण के आदर्श उदाहरण हैं। विगत दस हजार साल से उनकी शैली में किसी तरह का परिवर्तन नहीं हुआ है। इस दौरान वे न तो बेहतर बन पाए और न बदतर ही बन पाए।
इसी तरह अंधविश्वास को जनप्रिय बनाने में झूठ खासकर इष्टकर झूठ की बहुत बड़ी भूमिका रही है। एक ऐसा झूठ, उदात्त झूठ जिसके सहारे संपूर्ण समुदाय को, संभव हो सके तो शासकों को भी स्वीकार करने के लिए राजी किया जा सके।

इस तरह के झूठ के आदर्श उदाहरण हैं हमारे रीति-रिवाज और संस्कार जिनकी प्रशंसा करते हुए हमारे शास्त्र थकते नहीं हैं। रीति-रिवाज और संस्कारों की प्रशंसा के क्रम में सबसे ज्यादा हमला स्वतंत्र चिंतन पर किया गया, उन लोगों पर हमले किए गए जो स्वतंत्र चिंतन के हिमायती थे। जो प्रत्येक बात पर शंका करते थे। प्रश्न करते थे।
आज हम रोम की महानता के गुण गाते हैं किंतु यह भूल जाते हैं कि रोम की महानता का आधार अंधविश्वास था। रोम की महानता के बारे में पोलिबियस ने लिखा कि मैं साहसपूर्वक यह बात कहूंगा कि संसार के शेष लोग जिस चीज का उपहास करते हैं, वह रोम की महानता का आधार है और उस चीज का नाम अंधविश्वास है। इस तत्व का उसके निजी और सार्वजनिक जीवन के सभी अंगों में समावेश कराया गया है और इसने ऐसी खूबी से उनकी कल्पनाशक्ति को आक्रांत कर लिया है कि उस खूबी को बेहतर नहीं बनाया जा सकता। संभवत: बहुत से लोग इसकी विशेषता समझ नहीं पाएंगे, लेकिन मेरा मत है कि ऐसा लोगों को प्रभावित करने के लिए किया गया है। यदि किसी ऐसे राज्य की संभावना होती, जिसके सभी नागरिक तत्वज्ञ होते तो इस तरह की चीज से हम बचे रह सकते थे। लेकिन सभी राज्यों में जनता अस्थिर है, निरंकुश भावनाओं, अकारण क्रोध और हिंसक आवेगों से ग्रस्त है। इसलिए केवल यही किया जा सकता है कि जनता को अदृश्य के भय से, और इसी किस्म के पाखंडों से काबू में रखा जाए। यह अकारण नहीं, बल्कि सुविचारित चाल थी कि पुराने जमाने के लोगों ने जनता के दिमाग में देवताओं और मृत्यु के बाद के जीवन की बातें बैठाईं। हमारी मूर्खता और विवेकहीनता यह है कि हम इस प्रकार की भ्रांतियों को दूर करना चाहते हैं।
इसके अलावा जिस विधा का निर्माण किया गया वह है चमत्कारवर्णन और दंतकथा। चमत्कारवर्णन और दंतकथाओं ने अंधविश्वासों को आम जनता के जीवन में उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। किसी भी दर्शनवेत्ता और धर्मशास्त्री के उपदेशों के द्वारा पुरुषों और औरतों के समूहों को श्रध्दा, भक्ति और विश्वास की ओर नहीं मोड़ा जा सकता था। इनको प्रभावित करने के लिए अंधविश्वास का लाभ उठाना पड़ता था। यह कार्य चमत्कारवर्णन और दंतकथाओं के बिना संभव नहीं था। कालांतर में इसने नागरिक जीवन की प्राचीन व्यवस्था और साथ ही, वास्तविक सृष्टि संबंधी स्थापनाओं में मिथकशास्त्र के रूप में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर लिया।
कौटिल्य का अंधविश्वास में विश्वास नहीं था किंतु उन्होंने राज्य के कौशल के तौर पर अर्थशास्त्र में अंधविश्वास की चर्चा की है। उनका न तो राजा के दैवी अधिकार और उसकी सर्वज्ञता की सच्चाई में विश्वास था और न वे यह चाहते थे कि स्वयं शासक इस तरह की वाहियात बात को सच मानें। वे सुझाव देते हैं कि राज्य को अपनी आंतरिक और बाह्य स्थितियों को सुदृढ़ करने के लिए सामान्य लोगों की अंधमान्यताओं का लाभ उठाना चाहिए।

कौटिल्य अर्थशास्त्र में अनेक ऐसे सुझाव देते हैं जो अंधविश्वासों पर आधारित हैं। संयोग से जिन उपायों को सुझाया गया है वे थोड़े फेरबदल के साथ अब भी लागू किए जाते हैं। कौटिल्य ने कुछ ऐसे साधनों को अपनाने की सलाह दी जो बहुत ही भद्दे थे और जिनका दोहरा उद्देश्य था। वे न केवल जनता के बीच अंधविश्वासमूलक भय उत्पन्न करते थे, बल्कि अंधविश्वास के विरोध में यथार्थ और ठोस कदम उठाने वाले प्रचारकों का शारीरिक रूप से सफाया करने की ओर भी लक्षित थे।

अंधविश्वास के साथ-साथ पुनर्जन्म और कर्मफल की प्राप्ति की धारणा का भी व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इसका साहित्य पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार साहित्य में काव्य-रूढ़ियों का चलन शुरू हुआ।

यह मान लिया गया कि जो कुछ हो रहा है उसका उचित कारण है ज़िस कार्य में असामंजस्य है, वह अवश्य भविष्य में करने वाले को दंड देने का साधन बनेगा। इस विचार ने भारतीय साहित्य में सामंजस्यवादी दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा की है। समाज की विषमताओं और अनमेल परिस्थितियों को कभी विद्रोही दृष्टि से नहीं देखा गया।

यह मान लिया गया नाटक दुखांत नहीं होना चाहिए। असंतोष और विद्रोह के अभाव में कवि की बुध्दि अधिकाधिक सूक्तियों और चमत्कारों में उलझती गई। साहित्य में सिर्फ रस और रस में भी सिर्फ श्रृंगार रस की रचनाओं का बाहुल्य इस मार्ग के अनुसरण का स्वाभाविक परिणाम था।
उल्लेखनीय है रस की अवधारणा की उत्पत्ति का समय तकरीबन वही है जब अंधविश्वास, पुनर्जन्म और कर्मफल की प्राप्ति के सिध्दांत का जन्म हुआ। रसों में हमारे प्राचीन लेखकों ने सिर्फ श्रृंगार रस पर ही मुख्यत: जोर दिया और अन्य रसों की उपेक्षा की।

तात्पर्य यह है कि अंधविश्वास के साथ आनंदमूलक मनोरंजन, कामुकता, स्त्री के सौंदर्यमूलक हाव-भावों का गहरा संबंध है। यह संबंध मध्यकाल से विकसित हुआ और आधुनिक काल तक चला आया है। अंधविश्वास के समूचे कार्य-व्यापार को यदि इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि समाज में कलाओं में नकल की प्रवृत्ति वस्तुत: अंधविश्वास के प्रति सहिष्णु भाव पैदा करती है।
नकल की प्रवृत्ति को पूंजीवाद का प्रधान गुण माना जाता है। इस अर्थ में पूंजीवाद अपने विकास के साथ-साथ सामंती और पूर्व सामंती कला रूपों और मूल्यबोध को बरकरार रखता है।कलाओं में अंधानुकरण आधुनिक काल में नकल में रूपांतरित कर लेता है। इससे जहां कभी न खत्म होने वाले मनोरंजन की सृष्टि करने में मदद मिलती है वहीं दूसरी ओर अंधानुकरण के एटीटयूट्स, रवैए और संस्कार का विकास होता है। कलाओं से यथार्थ गायब हो जाता है। उसकी जगह काल्पनिक यथार्थ या आभासी यथार्थ ले लेता है।

इसी तरह अंधविश्वास या नकल की संस्कृति का परजीवीपन और पेटूपन की संस्कृति से गहरा संबंध है। इसका स्वतंत्राता के विचार से विरोध है, यह उन तमाम विचारों को अस्वीकार करती है जो नकल या अंधानुकरण के विरोधी हैं।

पूंजीवाद अपनी सामान्य प्रकृति के अनुसार अंधविश्वासों को भी वस्तु के रूप में बदल देता है, उन्हें संस्थागत रूप दे देता है। अंधविश्वासों को कामुकता एवं रोमांस के साथ प्रस्तुत करता है और यह कार्य फिल्म, टी.वी. और वीडियो फिल्मों के संगठित औद्योगिक माल के उत्पादन के रूप में करता है।

कामुकता, पोर्नोग्राफी, अतिलयात्मक गीत और संगीत तथा नकल के आधार पर निर्मित कलाएं जितनी ज्यादा बनेंगी उतना ही ज्यादा अंधविश्वास भी बढ़ेगा। उतनी ही ज्यादा सामाजिक असुरक्षा, भेदभाव और तनाव की सृष्टि होगी। इसका प्रधान कारण यह है कि आज अंधविश्वास को मासकल्चर ने अपना सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना लिया है।

अंधविश्वास की रणनीति और धार्मिक संप्रेषण की शैलियों को अपनाकर विज्ञापन, फिल्म और टी.वी. उद्योग तेजी से अपना विकास कर रहा है। पहले अंधविश्वास के माध्यम से राज्य अपने लिए जहां एक ओर धन जुटाता था वहीं दूसरी ओर जनता के दिलो-दिमाग पर शासन करता था। आज भी इस स्थिति में बुनियादी फर्क नहीं आया है। सिर्फ तरीका बदला है और इस कार्य में परंपरागत अंधविश्वास प्रचारकों के अलावा जो नया तत्व आकर जुड़ा वह है पूंजीपति वर्ग, बाजार और संस्कृति उद्योग।

अब अंधानुकरण की प्रवृत्ति का बाजार की शक्तियां खुलकर अपने मुनाफों के विस्तार के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। अंधानुकरण के लिए जरूरी है कि स्टीरियोटाइप प्रस्तुतियों पर जोर दिया जाए। इनमें खर्च कम और मुनाफा ज्यादा होता है और प्रस्तुतियां जल्दी ही समझ में आ जाती हैं। इस तरह की प्रस्तुतियां यथार्थ के निषेध और स्वतंत्र सृजन या मौलिक सृजन के निषेध को व्यक्त करती हैं।

वे ऐसे उन्माद, आनंद और मनोरंजन की सृष्टि करती हैं जो प्रभेदों का सृजन करता है। ध्यान रहे, प्रभेद वहीं पैदा होते हैं जहां भय हो, अंधविश्वास हो या जहां एक-दूसरे को धोखा देकर हराने का प्रयत्न किया जाता है। वहां परस्पर व्यवहार में सहज भाव नहीं होता।

अंधविश्वास मूलत: ऐसी स्वाधीनता की हिमायत करते हैं जो मनुष्य को पीड़ित करती है। यह संबंधहीन स्वाधीनता है। यह बुनियादी तौर पर नकारात्मक स्वाधीनता है। अंधविश्वास तरह-तरह के धार्मिक उपकरणों को जमा करने और धार्मिक उपकरणों के माध्यम से अंधविश्वासों से राहत पाने का रास्ता सुझाते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में, 'मानव जीवन में जहां अभाव है वहीं उपकरण जमा होते हैं। ... इस अभाव और उपकरण के पक्ष मेंर् ईष्या है, द्वेष है, वहां दीवार है, पहरेदार है, वहां व्यक्ति अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है और दूसरों पर आघात करना चाहता है।'

अंधविश्वास, पुनर्जन्म और कर्मफल के सिध्दांत से मुक्ति पाने के लिए जरूरी है कि तर्क और विमर्श के पुराने पैराडाइम को बदलें। पुराने पैराडाइम से जुड़े होने के कारण हम प्रभावी ढंग से अंधविश्वास का विरोध नहीं कर पा रहे हैं। तर्क के पैराडाइम को बदलते ही हम विकल्प की दिशा में बढ़ जाएंगे। पैराडाइम को बदलते ही विचारों में मूलगामी परिवर्तन आने लगेगा।

आम तौर पर हमारे बहुत से बुध्दिजीवी पुराने पैराडाइम को बनाए रखकर तर्कों में परिवर्तन कर लेते हैं। ध्यान रहे, अंधविश्वास को तर्क और विवेक से अपदस्थ नहीं किया जा सकता। जब तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर नया पैराडाइम निर्मित नहीं किया जाता तब तक अंधविश्वास को अपदस्थ करना मुश्किल है।

अंधविश्वास का जबाव तर्क नहीं विज्ञान है। जो लोक तर्क में विश्वास करते हैं वे पैराडाइम बदलते ही असली शक्ल में सामने आ जाते हैं। ध्यान रहे, जब पैराडाइम बदलते हैं तो उसके साथ ही, सारी दुनिया भी बदल जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि पैराडाइम बदलते ही हमारा विश्व दृष्टिकोण बदल जाता है, नए का जन्म होता है, वैज्ञानिक चेतना के विकास की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं। यही वह बिंदु है जिस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

अंधविश्वास का जबाव तर्क से देंगे तो अंतत: पराजय हाथ लगेगी यदि पैराडाइम बदलकर विज्ञानसम्मत चेतना से इसका जबाव देंगे तो अंधविश्वास को अपदस्थ कर पाएंगे। हमारे रैनेसां के चिंतकों ने अंधविश्वास का प्रत्युत्तर तर्क से देने की चेष्टा की और इसका अंतत: परिणाम यह निकला कि हम आज अंधविश्वास से संघर्ष में बहुत पीछे चले गए हैं। तर्क को आज अंधविश्वास ने आत्मसात कर लिया है। अंधविश्वास का तर्क से बैर नहीं है उसकी लड़ाई तो विज्ञानसम्मत चेतना के साथ है।

अंधविश्वास के कारण बौध्दिक अधकचरापन पैदा होता है। इन दिनों विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना के बजाय मिथकीय चेतना पर जोर दिया जा रहा है। आज विज्ञान को सत्य की खोज के काम से हटाकर व्यावहारिक उपयोग, उद्योग और युध्द के साजो-सामान के निर्माण में लगा दिया गया है। यहां तक कि धर्म और विज्ञान में सहसंबंध स्थापित करने की कोशिशें चल रही हैं। अब विज्ञान को पूंजीवाद ने महज एक चिंतन का रूप या शुध्द विज्ञान बना दिया है या उपयोगी रूप तक सीमित कर दिया है।

एक जमाना था विज्ञान पर विश्वास था। किंतु एक अर्से के बाद विज्ञान के प्रति संशय का भाव पैदा हुआ। शुरू में विज्ञान के प्रति प्रशंसाभाव था। बाद में मोहभंग हुआ और विज्ञान के प्रति संशय भाव पैदा हुआ। आज पूंजीवादी वैज्ञानिक निराश और हताश हैं कि क्या करें? वे पीछे मुड़ नहीं सकते। आगे किस तरह बढ़ना है? बढ़ गए तो कहां पहुचेंगे? आज विज्ञान के पूंजीवादी पक्षधर परेशान हैं कि विज्ञान के इतने विराट जुलूस को कहां ले जाएं? इसके कारण विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना के प्रति अविश्वास और गहरा हुआ है।

आम लोगों से लेकर बुध्दिजीवियों तक संशयवाद बढ़ा है। इसके कारण पुन: एकसिरे से अंधविश्वास और आध्यात्मिकता की बाढ़ आ गई है। कुछ लोग मानव स्वभाव की उन्नतिशीलता को लेकर कुछ भी होता न देखकर हताशा में डूबे जा रहे हैं और विज्ञान को तिलांजलि दे रहे हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो पहले से ही यह मानकर चल रहे हैं कि विज्ञान की सामाजिक परिणतियों पर कोई भी विचार-विमर्श हानिकर होने को बाध्य है।

कुछ ऐसे लोग भी हैं जो विज्ञान के व्यावहारिक उपयोग के अलावा और किसी भूमिका पर सोचने के लिए तैयार नहीं हैं। कुछ लोगों के लिए विज्ञान का विनाश के अलावा और किसी काम में उपयोग संभव नहीं है। कुछ के लिए यह संपत्तिा और मुनाफों के अंबार खड़ा कर देने का साधन मात्रा है। यह सही है कि पूंजीवाद समाजों में विज्ञान का सही उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। यह भी सच है कि वैज्ञानिक वेतनभोगी कर्मचारी होकर रह गए हैं।

आज वैज्ञानिक या तो किसी विश्वविद्यालय में काम करता है या किसी उद्योग या संस्था में काम करता है। निजी साधनों से वैज्ञानिक अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिक अब दुर्लभ हो गए हैं। जाहिरा तौर पर वैज्ञानिक जहां काम करता है वहां के हितों की उसे सबसे पहले पूर्ति करनी होगी। यही ्रूबदु है जहां पर हमें विज्ञान की सामाजिक भूमिका पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि विज्ञान बंदी है और वैज्ञानिक खरीदा जा चुका है तब अंधविश्वास के खिलाफ विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना की भूमिका शून्य के बराबर होगी।

कार्ल मार्क्स पखवाडा- धर्म धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र


           बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर का प्रसिद्ध निबंध है ´बुद्ध और कार्ल मार्क्स´,इसमें आम्बेडकर ने बुद्ध के विचारों के बहाने धर्म की 25 सूत्रों में व्याख्या पेश की है। ये सूत्र अब तक विचार विमर्श के केन्द्र में नहीं आए हैं,इन सूत्रों पर वाद-विवाद-संवाद होना चाहिए।

ये 25 सूत्र हैं-´´1. मुक्त समाज के लिए धर्म आवश्यक है।2. प्रत्येक धर्म अंगीकार करने योग्य नहीं होता।3. धर्म का संबंध जीवन के तथ्यों व वास्तविकताओं से होना चाहिए, ईश्वर या परमात्मा या स्वर्ग या पृथ्वी के संबंध में सिद्धांतों तथा अनुमान मात्र निराधार कल्पना से नहीं होना चाहिए।4. ईश्वर को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।5. आत्मा की मुक्ति या मोक्ष को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।6. पशुबलि को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।7. वास्तविक धर्म का वास मनुष्य के हृदय में होता है, शास्त्रों में नहीं।8. धर्म के केंद्र मनुष्य तथा नैतिकता होने चाहिए। यदि नहीं, तो धर्म एक क्रूर अंधविश्वास है।9. नैतिकता के लिए जीवन का आदर्श होना ही पर्याप्त नहीं है। चूंकि ईश्वर नहीं है, अतः इसे जीवन का नियम या कानून होना चाहिए।10. धर्म का कार्य विश्व का पुनर्निर्माण करना तथा उसे प्रसन्न रखना है, उसकी उत्पत्ति या उसके अंत की व्याख्या करना नहीं।11. कि संसार में दुःख स्वार्थों के टकराव के कारण होता है और इसके समाधान का एकमात्र तरीका अष्टांग मार्ग का अनुसरण करना है।12. कि संपत्ति के निजी स्वामित्व से अधिकार व शक्ति एक वर्ग के हाथ में आ जाती है और दूसरे वर्ग को दुःख मिलता है।13. कि समाज के हित के लिए यह आवश्यक है कि इस दुःख का निदान इसके कारण का निरोध करके किया जाए।14. सभी मानव प्राणी समान हैं।15. मनुष्य का मापदंड उसका गुण होता है, जन्म नहीं।16. जो चीज महत्त्वपूर्ण है, वह है उच्च आदर्श, न कि उच्च कुल में जन्म।17. सबके प्रति मैत्री का साहचर्य व भाईचारे का कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिए।18. प्रत्येक व्यक्ति को विद्या प्राप्त करने का अधिकार है। मनुष्य को जीवित रहने के लिए ज्ञान विद्या की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भोजन की।19. अच्छा आचारणविहीन ज्ञान खतरनाक होता है।20. कोई भी चीज भ्रमातीत व अचूक नहीं होती। कोई भी चीज सर्वदा बाध्यकारी नहीं होती। प्रत्येक वस्तु छानबीन तथा परीक्षा के अध्यधीन होती है।21. कोई वस्तु सुनिश्चित तथा अंतिम नहीं होती।22. प्रत्येक वस्तु कारण-कार्य संबंध के नियम के अधीन होती है।23. कोई भी वस्तु स्थाई या सनातन नहीं है। प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील होती है। सदैव वस्तुओं में होने का क्रम चलता रहता है।24. युद्ध यदि सत्य तथा न्याय के लिए न हो, तो वह अनुचित है।25. पराजित के प्रति विजेता के कर्तव्य होते हैं।´´

यानी हर धर्म स्वीकार करने योग्य नहीं होता।धर्म को चुनते समय क्या देखें यह आम्बेडकर ने उपरोक्त 25 सूत्रों में रेखांकित किया है।धर्म कोई बनी-बनायी व्यवस्था नहीं है,बल्कि उसे हर बार नए सिरे से अर्जित करना पड़ता है।धर्म को अर्जित करने के लिए धार्मिक होने की जरूरत नहीं है,बल्कि धर्म को देखने का वैज्ञानिक नजरिया अर्जित करने की जरूरत है। आम्बेडकर ने धर्म के जिन 25सूत्रों का जिक्र किया है उनमें धर्म को शाश्वत न मानने वाली बात बेहद रोचक है।धर्म के जितने भी रूप प्रचलन में हैं वे धर्म को शाश्वत मानकर चलते हैं।जबकि धर्म शाश्वत नहीं बल्कि परिवर्तनशील है।धर्म को परिवर्तनशील मानना अपने आपमें भौतिक जगत की सत्ता को महत्व देना है। धर्म का प्रमुख काम है मनुष्य को प्रसन्न रखना और स्वतंत्र रखना।जो धर्म यह काम करे वह स्वीकार्य है जो यह काम न करे वह अस्वीकार्य है। इन दिनों धर्म के नाम पर प्रतिस्पर्धा और घृणा का जमकर प्रचार हो रहा है।आम्बेडकर ने धर्म की इस भूमिका का निषेध किया है और रेखांकित किया है धर्म का मुख्य कार्य है मैत्री स्थापित करना।

धर्म पूजा या उपासना की चीज नहीं है बल्कि आचरण की चीज है।जो लोग धर्म को पूजा-उपासना की चीज मानते हैं उनके जीवन में धर्म की कोई भूमिका नहीं होती,वे धर्म को प्रचार प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करते हैं।धर्म , प्रचार की नहीं ,आचरण की चीज है।धर्म आचरण में मिलता है।आचरण में ढालने का अर्थ है कि धर्म का कायाकल्प करना।



यह सवाल भी उठा है धर्म के केन्द्र में कौन है ॽ इन दिनों धर्म के केन्द्र में उपदेश हैं,राजनीति है,हिंसा है,अंधविश्वास हैं, मुनाफेखोरी है,संपत्ति संचय करने की प्रवृत्ति है,इन सभी चीजों का धर्म से कोई संबंध नहीं है। धर्म के केन्द्र में मनुष्य को रहना चाहिए।मनुष्य को केन्द्र में रखे बिना धर्म बेहद खतरनाक भूमिका अदा करता है।धर्म के बर्बर होने के चांस बढ़ जाते हैं।धर्मनिरपेक्षता की भी यही मांग है कि धर्म के केन्द्र में मनुष्य को रखा जाय।धर्म को मानवीय रूप दिया जाय। धर्म का ईश्वर या उपासना से कोई संबंध नहीं है।धर्म का मूलाधार तो मनुष्य है,लेकिन अधिकांश लोग धर्म का आधार ईश्वर को मानते हैं।ईश्वर दासता की मनोदशा में बांधता है, जबकि मनुष्य दासता की मनोदशा से मुक्त करता है।धर्म को मानो लेकिन मनुष्य को उसके केन्द्र में प्रतिष्ठित करो।ईश्वर को केन्द्र से अपदस्थ करो।धर्म के केन्द्र में ईश्वर का होना बंधन है।मानसिक गुलामी है।जबकि मनुष्य को धर्म के केन्द्र में रखेंगे तो धर्म की भूमिका और चरित्र बदल जाएगा,धर्म मुक्ति और स्वतंत्रता का रूप ग्रहण कर लेगा।

बुधवार, 24 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- नव्य उदार यथार्थ और मार्क्सवादी असफलताएं


             
मार्क्सवादी आलोचक फ्रेडरिक जेम्सन ने मौजूदा दौर के संदर्भ में मार्क्सवाद की पांच थीसिस प्रतिपादित की हैं। इनमें दूसरी थीसिस में उन्होंने उन खतरों की ओर ध्यान खींचा है जो मार्क्सवाद के लिए आ सकते हैं या आए हैं और जिनसे मार्क्सवादी आंदोलन को धक्का लगा है। उत्तर आधुनिक परिस्थितियों के आने के साथ मार्क्सवादी चिंतन को नव्य उदार आर्थिक नीतियों और उसके गर्भ से पैदा हुए बाजार ने सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है।नव्य उदारतावाद के खिलाफ विचारधारात्मक संघर्ष में मार्क्सवादी आम लोगों का दिल जीतने ,उन्हें इसके परिणामों के बारे में समझाने में असमर्थ रहे। इस समस्या के दो स्तर थे, पहला स्तर स्वयं मार्क्सवादियों के लिए था वे खुद समझ ही नहीं पाए कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों का क्या परिणाम निकलेगा। उनका इन नीतियों के प्रति तदर्थ रवैय्या था। जब वे स्वयं दुविधाग्रस्त थे तो वे अन्य को कैसे समझाते ? इससे संकट और भी गहरा हो गया।
दूसरी समस्या यह आयी कि नव्य उदार परिवर्तनों के गर्भ से जो परिवर्तन पैदा हुए उनसे मार्क्सवादी लाभ नहीं उठा पाए। वे उस यथार्थ को पकड़ ही नहीं पाए जो नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से जन्मा है। उन्हें यह सामान्य सी बात समझ में नहीं आई कि कम्यूटर आज के मनुष्य की अपरिहार्य जरूरत है। भारत में लंबे समय तक अनेक मार्क्सवादी कम्प्यूटरीकरण के पक्ष में नहीं थे। लंबे अर्से के बाद उन्होंने हथियार डाले। इस चक्कर में मजदूरवर्ग को उन्होंने पिछड़ी कठमुल्ला चेतना के हवाले कर दिया। पश्चिम बंगाल और केरल कम्प्यूटर क्रांति में पिछड गए और बाकी देश आगे निकल गया। समूचा सोवियत संघ और पुराना समाजवादी देशों का समूह इस परिवर्तन को नहीं समझने के कारण तबाह हो गया। सोचिए 18 साल तक सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने पार्टी कॉमरेड वैज्ञानिकों को काफ्रेंस में कम्प्यूटर की उपयोगिता पर बहस करने की अनुमति नहीं दी।
उत्तर आधुनिकतावाद के संदर्भ में मार्क्सवादियों की सफलताएं कम हैं असफलताएं ज्यादा हैं। सबसे बड़ी असफलता है नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से पैदा हुई असुरक्षा, अव्यवस्था,विस्थापन और भय को संगठनबद्ध न कर पाना। नव्य उदार दौर में मजदूरवर्ग के क्षय को वे रोक नहीं पाए और असंगठित मजदूरवर्ग की तबाही को अपने संगठनों के जरिए एकजुट नहीं कर पाए। आज महानगरों में लाखों असंगठित मजदूर हैं जो किसी भी वाम संगठन में संगठित नहीं हैं।
मजदूरवर्ग के अंदर नव्य उदारतावाद ने जो भय पैदा किया उसे भी प्रभावशाली ढ़ंग से मार्क्सवादी लिपिबद्ध नहीं कर पाए। इसका व्यापक दुष्परिणाम निकला है,मजदूरों की आवाज सामान्य वातावरण से गायब हो गयी है। दूसरी ओर नव्य उदारपंथी एजेण्डा वाम संगठनों में आ घुसा है। वे इससे बचने की युक्ति वे नहीं जानते।
इसी प्रसंग में फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा, तर्कमूलक संघर्ष (जैसा कि यह सीधी वैचारिक लड़ाई के विरुध्द है) अपने विकल्पों की साख समाप्त करके और थीमैटिक प्रसंगों की एक पूरी श्रृंखला को अनुल्लेखनीय घोषित करके सफलता हासिल करता है। यह राष्ट्रीकरण, विनियमन, घाटा व्यय, कीन्सवाद, नियोजन, राष्ट्रीय उद्योगों की सुरक्षा, सुरक्षा नेट, तथा अंतत: स्वयं कल्याणकारी राज्य जैसी पूर्ववर्ती गंभीर संभावनाओं को निर्णायक रूप में अवैध घोषित करने के लिए क्षुद्रीकरण, निष्कपटता, भौतिकस्वार्थ, 'अनुभव', राजनीतिक भय ऐतिहासिक सबक को 'आधार' मानने का आग्रह करता है। कल्याणकारी राज्य को समाजवाद बताना बाजारवाद का उदारवादियों (अमरीकी प्रयोग में जैसा कि 'न्यू डील लिबरल्स' में किया गया है) तथा वामपंथियों दोनों पर दोहरी जीत दिलाता है। इस प्रकार आज वामपंथ ऐसी स्थिति में आ गया है जब उसे बड़ी सरकारों या कल्याणकारी राज्यों का समर्थन करना पड़ रहा है। सामाजिक प्रजातंत्र की समीक्षा करने की जो वामपंथियों की विस्तृत और परिष्कृत परंपरा रही है, उसके लिए यह कार्य खासकर वामपंथियों को इतिहास की द्वंद्वात्मक समझ जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं होने के कारण बेहद लज्जित करने वाला है।
मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने आगे लिखा है इसी बीच मनोराज्य (यूटोपिया) से जुड़ी चिंताएं जो इस भय से उत्पन्न होती हैं कि हमारी वर्तमान पहचान, हमारी आदतें और आकांक्षा पूर्ति के तरीकों का निर्माण करने वाली चीज कतिपय नई सामाजिक व्यवस्था में समाप्त हो जाएगी तथा सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आज कुछ समय पहले की तुलना में अधिक संभव है। स्पष्टतया दुनिया के आधे से अधिक भाग में और न केवल प्रभावशाली वर्गों में आज निस्सहाय लोगों के जीवन में परिवर्तन की आशा का स्थान 'नष्ट हो जाने के भय' ने ले लिया है। इस प्रकार की मनोराज्य-विरोधी (एंटी-यूटोपियन) चिंताओं को दूर करना अनिवार्य है जो कि सांस्कृतिक निदान और उपचार के रूप में किया जाना चाहिए न कि बाजार के सामान्य बहस और अलंकार की इस या उस विशेषता से सहमति जताकर इससे बचना चाहिए।
मानव-स्वभाव मूल रूप से अच्छा और सहयोगी है या फिर बुरा और आक्रामक। यदि यह सर्वसत्तात्मक राज्य (लेवियाथन) को नहीं तो कम से कम बाजार को वश में रखने की अपेक्षा करता है, ये सारे तर्क वास्तव में मानवतावादी और विचारधारात्मक हैं (जैसा कि अल्थूसर ने कहा है) और इसके स्थान पर रैडिकल परिवर्तन और सामूहिक परियोजना का परिप्रेक्ष्य लाना चाहिए। साथ ही वामपंथियों को बड़ी सरकारों या फिर कल्याणकारी राज्यों का आक्रामक रूप से बचाव करना चाहिए तथा मुक्त बाजार के ऐतिहासिक ध्वंसात्मक रिकार्ड को देखते हुए बाजारवाद पर लगातार प्रहार करते रहना चाहिए ।
मार्क्सवादी के लिए साम्यवाद या कम्युनिस्ट पार्टी पूजा की चीज नहीं है। मार्क्सवादी के लिए वैज्ञानिक ढ़ंग से इस समाज को समझना और उस परिवर्तन के तर्क को समझना जरूरी होता है जिसके कारण परिवर्तन घट रहे हैं। पुराने साम्राज्यवाद के दौर में पूंजीवाद का केन्द्र था इंग्लैण्ड,बाद में द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर में अमेरिका केन्द्र बना।नव्य उदारतावाद के आरंभ में अमेरिका ही पूंजीवाद का गोमुख था। लेकिन नव्य उदारतावाद के अगले चरण में यानी मौजूदा दौर में पूंजीवाद का केन्द्र चीन है,अमेरिका नहीं। कारपोरेट और लंपट पूंजीवाद की इसमें सभी खूबियां हैं। सब कुछ हजम कर जाने का इसमें भाव है। विश्व बाजार में छा जाने ,सब कुछ बनाने और सस्ता उपलब्ध कराने का नजरिया है। इस समाविष्टकारी भाव से सारी दुनिया में देशज उद्योगों के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है।
एक जमाना था चीन में कम से कम चीजें पैदा होती थीं। सारा देश पांच किस्म के कपड़े पहनता था। सारा देश साइकिल पर चलता था। लेकिन विगत 30 सालों में उसने सब कुछ बदल दिया है। उत्पादन और जिन्सों के उत्पादन में तो उसने क्रांति की है। किसी वस्तु को सस्ते में बनाना,बाजार में इफ़रात में उपलब्ध कराना और बाजार को घेरे रखना। बड़ी पूंजी को आकर्षित करना,श्रम और श्रमिक को सस्ते माल में लब्दील करना। मैन्यूफेक्चरिंग की ताकत को ऐसे समय में स्थापित करना जब सारी दुनिया मैन्यूफैक्चरिंग छोड़कर सेवाक्षेत्र की ओर आंखें बंद करके भाग रही थी।अपने आप में महान उपलब्धि है।
उत्पादन और खूब उत्पादन का नारा लगाकर चीन ने उत्पादन और उत्पादकों की महत्ता स्थापित की है। तंत्रगत संकटों को उसने अभिनव परिवर्तनों और प्रौद्योगिक क्रांति के जरिए संभाला है। विकास की तेजगति को बरकरार रखा है। साथ ही उत्पादन की गति को बनाए रखकर कारपोरेट पूंजीवाद को नए सिरे से पुनर्गठित किया है। इन परिवर्तनों को उत्तर मार्क्सवाद के आधार पर ही परखा जा सकता है। चीन और अमेरिका के नव्य उदार आर्थिक परिवर्तन पुराने मार्क्सवाद से नहीं उत्तर मार्क्सवाद से ही समझ में आ सकते हैं।
नव्य उदार परिवर्तनों का विश्व में सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है। लेकिन यहां पर हम वामपंथ पर जो प्रभाव पड़ा है उसकी समीक्षा तक ही फिलहाल सीमित रखेंगे। वामपंथ पर नव्य उदारतावाद के प्रभाव को हम इस रूप में देख तकते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां अब अपने बुनियादी मसलों पर विचारधारात्मक संघर्ष नहीं कर रही हैं बल्कि उन मसलों पर संघर्ष कर रही हैं जो पूंजीवादी मसले हैं। पूंजीवादी विचारधारा के द्वारा निर्मित मसले हैं।
इन दिनों कम्युनिस्टों का संघर्ष समाजवाद के लिए नहीं चल रहा बल्कि कल्याणकारी राज्य को बचाने के लिए चल रहा है। भारत से लेकर अमेरिका तक सभी जगह कम्युनिस्ट पार्टियां कल्याणकारी राज्य को बचाने के एजेण्डे में फंस गयी हैं।कल्याणकारी राज्य आंतरिक गुलामी का परिवेश तैयार करता है।
नव्य उदारतावाद के आने के साथ ही अनेक समाजवादी देशों ने समाजवाद को त्यागकर कारपोरेट पूंजीवाद का मार्ग पकड़ लिया। यह काम अकारण सभी किस्म के मार्क्सवादी मूल्यों और मान्यताओं को त्यागकर किया गया। भारत में आज कम्युनिस्ट पार्टियां कल्याणकारी राज्य के एजेण्डे को लेकर ही हल्ला मचा रही हैं। जबकि पूंजीपतिवर्ग ने कल्याणकारी पूंजीवाद के मार्ग को तिलांजलि दे दी है और नव्य उदार आर्थिक कारपोरेट पूंजीवादी विकास का मार्ग ग्रहण कर लिया है। अनेक अवसरों पर कम्युनिस्टों में भी वे तमाम विकृतियां देखने को मिलती हैं जो कल तक पूंजीवादी दलों में हुआ करती थीं। वे पूंजीवादी विकृतियों को समझने और उनके खिलाफ अनवरत संघर्ष चलाने में असमर्थ रहे हैं।
पहले लोग बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के सवालों को पसंद करते थे। उनके लिए कुर्बानी देने के लिए तैयार रहते थे। लेकिन नव्य उदार प्रचार अभियान के कारण आम आदमी बुनियादी सामाजिक परिवर्तनो से डरने लगा है। जोखिम उठाने से डरने लगा है। बहस करने से बचने लगा है। वह इस या उसकी हां में हां मिलाकर सामंजस्य बिठाकर यथास्थितिवाद के सामने समर्पण कर चुका है। अब हमारे बीच में बुनियादी मसलों पर बहसें कम हो रही हैं,कचरा विषयो पर बहसें ज्यादा हो रही हैं।
मसलन हाल ही में उठे 2जी घोटाले को ही लें। मीडिया और संसद बहस कर रही है पूर्व संचारमंत्री ए.राजा ने 1 लाख 75 हजार करोड़ का देश को चूना लगा दिया। नियम तोड़े। घूस ली बगैरह-बगैरह। इस प्रसंग में आम लोग,मीडिया और सांसद यह बात नहीं कर रहे कि आखिरकार ये रेडियो तरंगें किसकी हैं ? क्या इन्हें बेचा जा सकता था ? क्या रेडियो तरंगे कारपोरेट पूंजी की सेवा के लिए आवंटित की जाती हैं ? रेडियो तरंगे राष्ट्र की संपदा हैं और इन्हें हमारा देश अंतर्राष्ट्रीय संचार समझौते के तहत अंतर्राष्ट्रीय संस्था के जरिए आवंटन के माध्यम से प्राप्त करता है। इन्हें बेचा नहीं जा सकता। क्योंकि ये राष्ट्र की संपत्ति हैं। वैसे ही जैसे भारत के ऊपर का आकाश भारत का है उसे बेचा नहीं जा सकता। समुद्र को बेचा नहीं जा सकता। संसद भवन बेचा नहीं जा सकता।ताजमहल बेचा नहीं जा सकता। बजट घाटे को कम करने के नाम पर रेडियो तरंगों का कारपोरेट घरानों को आवंटन देशद्रोह है,देशभक्ति नहीं है। सवाल उठता है देशद्रोह बड़ा अपराध है या भ्रष्टाचार ?कायदे से रेडियो तरंगे बेची नहीं जानी चाहिए। लेकिन संसद में कभी भी किसी भी दल के सांसदों ने रेडियो तरंगों के निजी हाथों बेचे जाने का विरोध नहीं किया,आज भी वे विरोध नहीं कर रहे बल्कि यह कह रहे हैं कि नए सिरे से इनका आवंटन बाजार दर पर करवा दो और राष्ट्र को 1लाख 75 हजार करोड़ रूपये दिलवा दो। उनकी रूचि राष्ट्र को पैसा दिलवाने में हैं तरंगों को राष्ट्र के खाते में बचाने में नहीं है। यहीं पर उत्तर आधुनिक समाज की आयरनी छिपी है। हम जानते ही नही हैं कि राष्ट्र हित क्या हैं ? कारपोरेट हितों को राष्ट्रहित समझ रहे हैं और यही नव्य उदार प्रौपेगैण्डा की जीत है।बजट घाटे को कम करना देशसेवा है चाहे रेडियो तरंगें बेचनी पड़ें। धन्य हैं ये देशभक्त जो देश की संपदा (रेडियो तरंगें) बेचकर देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं। यह नव्य उदार प्रौपेगैण्डा की जीत है । आज मीडिया में सारे राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी बहस के उन मसलों पर उलझे हैं जो बाजार के मसले हैं,सतही मसले हैं। बहस-मुबाहिसे में बाजार का लक्ष्य प्रधान हो गया है और बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के सवाल बहस से गायब हो गए हैं। उपभोग के सवालों पर बहस कर रहे हैं ,उत्पादन के सवालों पर नहीं। भ्रष्टाचार पर बहस कर रहे हैं भूख पर नहीं। नरेगा के कार्यान्वयन पर उलझे हैं गांव की गरीबी पर नहीं। यह विचारधारात्मक अवमूल्यन है।

कार्ल मार्क्स पखवाडा- सूचना समाज की नयी भाषा को पहचानो

         सोवियत संघ के पराभव के बाद सारी दुनिया में मार्क्सवादी चिंतकों को करारे वैचारिक सदमे और अनिश्चितता से गुजरना पड़ा है। सूचना समाज किस तरह वैचारिक विपर्यय पैदा कर सकता है इसके बारे में कभी विचार ही नहीं किया गया। अधिकांश समाजवादी विचारक इसे सामान्य और एक रूटिन परिवर्तन मानकर चल रहे थे। वे यह भी देखने में असमर्थ रहे कि परवर्ती पूंजीवादी मॉडल को लागू किए जाने के बाद मार्क्सवाद का भी रूप बदलेगा। पुराने किस्म का मार्क्सवाद चलने वाला नहीं है। लेकिन अनेक विचारकों के यह बात गले नहीं उतर रही है। एक तरफ मीडिया में समाजवाद विरोधी उन्माद और दूसरी ओर सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की धड़कनों का हाथ में न आना, यही वह बिडम्वना थी जिसने मार्क्सवादियों को हतप्रभ अवस्था में पहुँचा दिया। सूचना समाज में मार्क्सवाद की प्रकृति और भूमिका एकदम बदल गयी है। राजनीतिक प्रतिवाद की शक्ल बदल गयी है। लोगों को जोड़ने और उनसे संवाद करने और संपर्क करने के तरीके बदल गए। सूचना समाज आने के पहले राजनीतिक मुहावरे,पदबंध आदि संचार के हथकंड़े के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे। सूचना समाज के जन्म के साथ ही राजनीतिक पदबंधों और मुहावरों की जगह सांस्कृतिक पदबंधों और मुहावरों ने ले ली। अब सारी चीजें वस्तुओं और उपभोक्तावादी तत्वों के जरिए व्याख्यायित होने लगीं। साहित्य से लेकर राजनीति तक सब जगह उपभोक्तावाद की भाषा और मुहावरे चले आए। मसलन पहले नामवर सिंह की तुलना आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के साथ की जाती थी नए दौर में उनकी तुलना अमिताभबच्चन से होने लगी। प्रसिद्ध आलोचक सुधीश पचौरी ने उन्हें हिन्दी के अमिताभ बच्चन के नाम से पुकारा। कहने का अर्थ यह है कि सूचना समाज अपने साथ नया यथार्थ और नयी भाषा लेकर आया है और इस नए यथार्थ को पढ़ने के लिए नए किस्म की सैद्धांतिकी की भी जरूरत है। इसी प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक फ्रेडरिक जेम्सन ने मार्क्सवाद की पांचवी थीसिस में लिखा ‘‘राजनीतिक तथा आर्थिक दोनों क्षेत्रों के लिए संस्कृति का बढ़ता हुआ महत्व इन क्षेत्रों के सोद्देश्यमूलक अलगाव या विभेदीकरण का परिणाम नहीं, बल्कि स्वयं जिन्सीकरण (कोमोडिफिकेशन) की अपेक्षाकृत अधिक विश्वव्यापी संतृप्ति और प्रवेश है। जिन्सीकरण अब उस सांस्कृतिक क्षेत्र के उन विशाल क्षेत्रों को अपना उपनिवेश बनाने में सक्षम हो गया है, जो क्षेत्र अब तक इससे बचे थे और सचमुच इसके विरुध्द या इसके तर्क से असहमत थे। यह तथ्य कि संस्कृति आज अधिकांशतया व्यवसाय में बदल गई है, इसका परिणाम यह हुआ है कि अधिकांश चीजें जो पहले विशिष्ट रूप से आर्थिक और वाणिज्यिक समझी जाती थी, वे भी अब सांस्कृतिक बन गई हैं, यह ऐसी व्याख्या है जिसमें इमेज सोसायटी या उपभोक्तावाद के विभिन्न निदानों को शामिल करने की आवश्यकता है।’’
‘‘इस प्रकार के विश्लेषण, मसलन जिन्सीकरण (कामोडिफिकेशन) की अवधारणा संरचनात्मक और गैर-उपदेशात्मक, में अपेक्षाकृत अधिक सामान्य रूप में मार्क्सवाद को सैध्दांतिक बढ़त हासिल है। नैतिक मनोवेग राजनीतिक कार्रवाई उत्पन्न करता है लेकिन यह बहुत ही क्षणिक होती है जो शीघ्र ही पुनर्समाहित और पुनर्शमित हो जाती है। यह अपने विशिष्ट विषयों को अन्य आंदोलनों के साथ बांटने के लिए शायद ही प्रवृत्त होती है। लेकिन केवल इस प्रकार के संलयन और निर्माण द्वारा ही राजनीतिक आंदोलनों का विकास और विस्तार संभव है। सचमुच मैं इस मुद्दे को दूसरी तरह से कहना चाहूंगा कि उपदेशपरक राजनीति में वहीं विकसित होने की प्रवृत्ति होती है जहां संरचनात्मक संज्ञान और समाज का मानचित्रण (मैपिंग) अवरुध्द होता है। समाजवाद के असफल होने का बोध होने पर उत्पन्न आक्रोश को आज के संजातीय और धार्मिक प्रभुत्व के रूप में, उस शून्य को नए अभिप्रेरकों से भरने के एक हताश अंध प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।’’
‘‘जहां तक उपभोक्तावाद का संबंध है, यह आशा की जा सकती है कि यदि इसके स्थान पर जान बूझकर कुछ और बिलकुल भिन्न चीज चुनना हो तो यह ऐतिहासिक रूप में उतना ही महत्वपूर्ण सिध्द होगा जितना कि मानव समाज को एक जीवन शैली के रूप में उपभोक्तावाद के अनुभवों से गुजरना। लेकिन विश्व के अधिकांश के लिए उपभोक्तावाद के व्यसन वस्तुनिष्ठ रूप में उपलब्ध नहीं होंगे, तब यह संभव प्रतीत होता है कि 1960 के दशक की रैडिकल थ्योरी का दूरदर्शितापूर्ण निदान : कि पूजीवाद स्वयं ठीक उसी रूप में एक क्रांतिकारी शक्ति है जिस रूप में यह नई आवश्यकताओं और इच्छाओं को जन्म देता है लेकिन जिनकी पूर्ति यह नहीं कर सकता है : नई विश्व व्यवस्था के विश्व स्तर पर प्राप्त होगा।’’
‘‘सैध्दांतिक स्तर पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में स्थायी संरचनात्मक बेरोजगारी, वित्तीय सट्टेबाजी और अनियंत्रणीय पूंजी संचलन, इमेज सोसाइटी के ज्वलंत मुद्दे व्यापक रूप में उस स्तर पर एक दूसरे से अंतर्संबंधित हैं जिसे उनकी अंतर्वस्तु, उनके अमूर्तन का अभाव (ठीक उसके विपरीत जिसे किसी अन्य काल में उनका 'आत्मनिर्वासन' (एलीनेशन) कहा जाता) कहा जा सकता है। जब हम विश्वीकरण एवं सूचनाकरण (इनफार्मेटाइजेशन) जैसे मुद्दों को जोड़ने का प्रयास करते हैं तो द्वंद्वात्मकता का और भी विरोधाभासी स्तर मिलता है। जब नए विश्व नेटवर्कों (वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों) की राजनीतिक और विचारधारात्मक संभावनाओं को आज के विश्व तंत्र की स्वायत्तता के लोप तथा किसी राष्ट्र या क्षेत्र की अपनी स्वायत्तता और अस्तित्व प्राप्त करने की असंभावना या स्वयं को विश्व बाजार से अलग करने की असंभावना के साथ जोड़ा जाता है तो प्रतीयमानत: जबरदस्त असमंजस की स्थिति उत्पन्न होती है। किसी एक विचार को अपना लेने मात्र से बुध्दिजीवी इस गलियारे से रास्ता नहीं निकाल सकते। वास्तव में संरचनात्मक विरोधाभासों के परिपक्व होने से ही नई संभावनाओं का विहान होता है। पुनश्च: जैसा कि हीगेल ने कहा होता; हम कम से कम इस असमंजस को 'नकारात्मक से चिपके रहकर' बरकरार रख सकते हैं, उस स्थान को जीवित रखकर जहां से नव्य की अप्रत्याशित रूप से उत्पत्ति की आशा की जा सकती है।’’

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- धर्म और मार्क्स –


     आधुनिककाल में धर्म का उपभोक्तावाद और पूंजीप्रेम सबसे बड़ा ईंधन है। इन दोनों के बिना धर्म जी नहीं सकता। धर्म वैचारिक और भौतिक दोनों ही स्तरों पर उपभोक्तावाद और पूंजी की मदद करता है यही वजह है धर्म की जड़ें उन वर्गों में ज्यादा गहरी हैं जहां उपभोक्तावाद और पूंजीप्रेम खूब फल-फूल रहा है।जिस तरह धर्म जनता के लिए ´आत्मिक शराब है´ठीक उसी तरह उपभोक्तावाद और पूंजीप्रेम लत है। दोनों में मातहत बनाने की प्रवृत्ति है।
      धर्म कोई विचार मात्र नहीं है,उसकी सामाजिक जड़ें हैं,धर्म की समाजिक जड़ों को सामाजिक संघर्षों में जनता की शिरकत बढ़ाकर ही काट सकते हैं।धर्म के खिलाफ संघर्ष यदि मात्र वैचारिक होगा तो वह भाववादी संघर्ष होगा,धर्म भाववाद नहीं है,वह तो भौतिक शक्ति है।उसे अमूर्त्त विचारधारात्मक उपदेशों के जरिए नष्ट नहीं किया जा सकता। एक मार्क्सवादी को यह पता होना चाहिए कि धर्म का मुकाबला कैसे करें इस मामले में उनको बुर्जुआ भौतिकवादियों से अलगाना चाहिए।बुर्जुआ भौतिकवादियों के लिए ´धर्म का नाश हो´,´अनीश्वरवाद चिरंजीवी हो´´नास्तिकता अमर रहे´ का नारा प्रमुख है,वे आमतौर पर अनीश्वरवाद का ही जमकर प्रचार करते हैं,इस तरह के नजरिए की लेनिन ने  तीखी आलोचना की है और उसे ´छिछला दृष्टिकोण´ कहा है।
    लेनिन के शब्दों में यह बुर्जुआ जागृति का ´संकीर्ण नजरिया है। इससे धर्म की जड़ों के बारे में पूरी जानकारी नहीं मिलती।इस तरह की धर्म की व्याख्याएं भाववादी हैं,इनका भौतिकवाद से कोई लेना-देना नहीं है।लेनिन ने धर्म के बारे में लिखा है ´आधुनिक पूंजीवादी देशों में इसकी जड़ें मुख्यतःसामाजिक हैं। पूंजी की अंधी ताकत का भय-अंधी इसलिए क्योंकि व्यापक जनसमुदाय इसका पूर्वानुमान नहीं कर सकता-एक ऐसी शक्ति जो सर्वहारा और छोटे मालिकों के जीवन के हर चरण में प्रहार का खतरा पैदा करती तथा ´औचक´,´अनपेक्षित´,´आकस्मिक´,तबाही ,बर्बादी,गरीबी,वेश्यावृत्ति,भुखमरी का हमला करती है.आधुनिक धर्म की जड़ यहां है।इसे भौतिकवादियों को सर्वप्रथम अपने दिमाग में रखना चाहिए.

     जनता के दिमाग से धर्म को मिटाने के लिए जरूरी है उसे जनसंघर्षों के लिए तैयार किया जाए,जनता खुद धर्म की जड़ें खोदना सीखे,संगठित हो,सचेत रूप में पूंजी के शासन के तमाम रूपों से लड़ना सीखे।जबतक वह ऐसा नहीं करती तबतक जनता के मन से धर्म को मिटाना संभव नहीं है।

कार्ल मार्क्स पखवाडा- अफीम का व्यापार

            कार्ल मार्क्स का प्रसिद्ध निबंध है "अफ़ीम का व्यापार" ,यह न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून में 25सितम्बर 1858 को छपा था।इस निबंध में मार्क्स ने भारत-चीन में अफीम के व्यापार के साथ ब्रिटिश शासन के अन्तस्संबंध पर प्रकाश डाला है।

मार्क्स ने लिखा है-" विषय के इस पहलू पर विचार करते हुए हम ईसाई मत तथा सभ्यता की दुहाई देने वाली ब्रिटिश सरकार के एक निन्दनीय आत्मविरोधी स्वरूप का उल्लेख किये बिना नहीं रह सकते।एक साम्राज्य की सरकार होने के नाते वह दिखावा तो यह करती है कि उसे अवैध अफ़ीम व्यापार से कोई सरोकार नहीं,और उसका निषेध करने वाली सन्धियों पर हस्ताक्षर भी कर देती है।परन्तु भारत की सरकार के नाते वह बंगाल में जबरदस्ती अफ़ीम की काश्त करवाती है,जिससे उस देश की उत्पादक शक्तियों को बहुत बड़ा नुकसान पहुँचता है.पोस्त की काश्त करने के लिए वह भारतीय रैयतों के एक भाग को बाध्य करती है,तो दूसरे भाग को पेशगी पैसे देकर उसमें फंसाती है।वह इस विनाशकारी द्रव्य को बड़े पैमाने पर तैयार करने का एकाधिकार अपने हाथ में रखे हुए है।उसने सरकारी गुप्तचरों की फ़ौज इस काम पर लगा रखी है कि वे पोस्त की काश्त करने,उसे निश्चित स्थानों पर पहुँचाने,उसे चीनी उपभोक्ताओं की रूचि के अनुसार गाढ़ा और तैयार करने,उसे पेटियों में बन्द करने,जो लुक-छिपकर आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जायी जा सके,और अन्त में उसे कलकत्ते में पहुंचाने की निगरानी करें जहां सरकारी माल के तौर पर अफीम की नीलामी की जाती है और सरकारी अफ़सर उसे सट्टेबाजों के सुपुर्द कर देते हैं,उनसे यह अवैध व्यापारियों के हाथों पहुँचती है जो उसे चीन ले जाते हैं।"

मार्क्स ने अंत में लिखा" वास्तव में,ब्रिटिश सरकार के भारतीय वित्त न केवल चीन के साथ अफ़ीम व्यापार पर ,बल्कि उस व्यापार के अवैध स्वरूप पर आश्रित बना दिये गये हैं। "


"अफ़ीम का व्यापार "( न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून ,20सितम्बर,1858)नामक एक अन्य निबंध में मार्क्स ने मान्टगोमरी मर्टिन का उद्धरण दिया है,यह बहुत ही महत्व का है।मोन्टगोमरी ने लिखा , "अफ़ीम व्यापार की तुलना में दास व्यापार अधिक दयालु था।हम अफ्रीकियों के शरीर का नाश नहीं करते थे,क्योंकि उन्हें जीवित रखने में हमारा हित था।हम उनके आचार को भ्रष्ट नहीं करते थे,उनके मनों को कलुषित नहीं करते थे।परन्तु अफीम बेचनेवाला उन अभागे पापियों की नैतिकता को भ्रष्ट,दूषित तथा मटियामेट करने के बाद उनके शरीर का भी हनन करता है।हर घड़ी एक ऐसे दैत्य के सामने नये नये लोगो की बलि चढ़ाई जा रही है,जो कभी भी तृप्त नहीं होता,और उसके मन्दिर में भेंट चढ़ाने के लिए हत्यारे अंग्रेज और आत्म-हत्या करनेवाले चीनी एक दूसरे से होड़ कर रहे हैं।"

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

जाति समाज नहीं नागरिक समाज बनाओ

        भारत में समाज के चरित्र को लेकर विभ्रम इन दिनों गहराता जा रहा है,समाज को विभाजित इकाईयों में देखने की हमारी आदत बनी हुई है,साथ ही पुराने वर्गीकरण दिमाग में काम करते रहते हैं,पुराने नाम और पुरानी अंतर्वस्तु का आग्रह आम बात है।वर्गीय केटेगरी में सोचने और देखने से बचने लगे हैं। इस प्रसंग में मुझे पी.वी.अनेन्कव के नाम मार्क्स का 28दिसम्बर 1846 को लिखा पत्र याद आ रहा है।यह पत्र अनेक आधुनिक समस्याओं पर रोशनी डालता है। मसलन् ,समाज क्या है ,मशीन क्या है,प्रतियोगिता क्या है,किस तरह सोचें या देखें आदि प्रश्नों को मार्क्स ने बहुत सुंदर ढ़ंग से हल किया है।

मार्क्स ने लिखा ´समाज है क्या,उसका रूप चाहे जो हो ॽमनुष्यों की आपसी क्रिया का फल(उत्पाद)। क्या मनुष्य को खुद इस या उस प्रकार का समाज चुनने की आजादी हैॽकिसी हालत में नहीं। मनुष्य की उत्पादक शक्तियों की खास किस्म को आप मान लें आप खास किस्म के वाणिज्य और उपभोग देखेंगे। उत्पादन,वाणिज्य और उपभोग के विकास की विशेष अवस्थाओं की आप अवधारणा करें और आपको उसी के अनुरूप सामाजिक गठन,उसी के अनुरूप परिवारों,व्यवस्थाओं या वर्गों का संगठन,एक शब्द में उसी के अनुरूप नागरिक समाज मिलेगा।एक विशेष नागरिक समाज की अवधारणा करें और आप विशेष राजनीतिक स्थितियाँ पायेंगे जो नागरिक समाज का आधिकारिक इज़हार मात्र हैं।´

भारत के प्रसंग में देखें यहां पर उत्पादन, वाणिज्य और उपभोग के पूंजीवादी रूप और संरचनाएं काम कर रही हैं।समाज का मौजूदा ढांचा पूंजीवादी नियमों से संचालित है,इन्हीं के तहत सामाजिक संरचनाएं काम कर रही हैं और इनसे समूचा समाज संचालित है।लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जाति का समूचा विमर्श सामंती फ्रेमवर्क में चल रहा है।सभी किस्म की घटनाओं को,खासकर उत्पीडन,शोषण, दमन आदि की घटनाओं को हम जाति के फ्रेमवर्क,जातिगत अवधारणाओं आदि में रखकर देख रहे हैं।इस फ्रेमवर्क के बाहर निकलकर देखने से डरते हैं।मसलन्,किसी दलित का अपमान हुआ या बलात्कार हुआ तो उसे जाति अपमान या जातिगत बलात्कार के रूप में देखते हैं,जबकि यह पूंजीवादी व्यवस्था में घटित घटना है और उसे सीधे बलात्कार की केटेगरी में रखकर देखा जाना चाहिए।दलित शोषण का जो रूप नजर आ रहा है उसे पूंजीवादी शोषण के रूप में देखा जाना चाहिए,लेकिन हम पूंजीवादी फ्रेमवर्क में देखने की बजाय सामंती केटेगरी में रखकर ही देखते हैं।

वास्तविकता यह है कि समाज का संचालन सामंती नियमों और कानूनों से नहीं पूंजीवादी नियमों और कानूनों के जरिए संविधान और भारतीय दण्ड संहिता के आधार पर हो रहा है। लेकिन हम संविधान प्रदत्त अवधारणाओं में नहीं सोचते।इस सबका परिणाम यह निकला है कि भारत में नागरिक समाज की अवधारणा विकसित ही नहीं हो पायी है।अभी भी हम दलित समाज के फ्रेमवर्क में रखकर ही चीजों को देख रहे हैं।चाहते हैं दलितमुक्ति लेकिन लेकिन दलित समाज के फ्रेम में! नागरिक समाज और संविधान के व्यापक फलक पर रखकर चीजों को देखना ही नहीं चाहते।चाहते हैं संवैधानिक हक लेकिन पुरानी अवधारणाओं में ही जीवित रहना चाहते हैं ! संविधान प्रदत्त हकों को हासिल करने के लिए संविधान निर्मित अवधारणाओं में सोचें,संविधान निर्मित समूह,संगठन आदि बनाएं।दलित समाज की जगह नागरिक समाज बनाने कोशिश नजर नहीं आती,जगह-जगह जाति संगठन पैदा हो गए हैं,हर व्यक्ति जाति के आधार पर हक मांग रहा है। जाति समाज की आलोचना करते ही हल्ला करने लगते हैं,हमले करने लगते,जाति-जाति चिल्लाने लगते हैं,जाति का शोर अंततःनागरिक समाज की चेतना के विकास में अवरोध पैदा करता है।हमारे समाज का कुल निचोड़ जाति नहीं है।जाति की जगह अब पूंजीवादी नए वर्गों ने ले ली है और नए वर्गों के नए अंतर्विरोध हैं,नए अंतर्विरोध नए नजरिए की मांग करते हैं,पुराने नजरिए से नए अंतर्विरोधों को हल नहीं किया जा सकता।पुराने नजरिए से नए अंतर्विरोध हल करने की सभी कोशिशें अंततः असफल होंगी।इससे नया समाज पैदा नहीं होगा।भारत के आधुनिक समाज के विकास के लिए नागरिक समाज चाहिए,न कि जाति समाज।





बुधवार, 10 अगस्त 2016

मार्क्स के बहाने गाली पर बातें ः गाली प्रकृतवाद है यथार्थवाद नहीं

      साहित्य में गालियों पर जब बहस हो रही है तो हम इस सवाल पर सोचें कि आलोचना में कभी किसी बड़े आलोचक ने आलोचना में गाली का इस्तेमाल क्यों नहीं किया ॽ जबकि आलोचना भी तो इसी समाज में लिखी जा रही है और आलोचक भी इसी समाज से आता है ! वह उन मसलों पर भी गालियां नहीं लिखता जिन पर बोलते हुए आए दिन गालियां खाता है ! मैंने कम से कम ऐसे किसी आलोचक को नहीं पढ़ा जो आलोचना लिखते समय लेखक,आलोचक,पात्र या परिस्थितियों को गाली दे।हिन्दी में अ-कविता के पहले साहित्य में गालियों का चलन नहीं था।अ-कविता वालों ने चमद वर्षों बाद गाली का मार्ग छोड़ दिया ,पता करो क्यों ॽ क्यों अन्य कवियों ने उनका अनुकरण नहीं किया ॽ

भारत में रचना में कामसूत्र सैंकड़ों साल रमता रहा है। समूचा संस्कृत साहित्य श्रृंगार रस में 18सौ वर्षों तक डूबा रहा,लेकिन गालियां नहीं लिखी गयीं। शरीर,शारीरिक क्रियाएं,संभोग,वियोग,दुख,सुख सब है, लेकिन गालियां नहीं हैं।सवाल यह है क्या मध्यकाल या प्राचीनकाल में समाज में गालियां नहीं थीं ॽ क्या गालियां आधुनिकाल काल के समाज की देन हैं ॽ आखिरकार गालियां आई कहां से ॽ

भारत साहित्य परंपरा में कोई चीज अछूत नहीं थी,न स्त्री अछूत थी और न उसका सौंदर्य टेबू था,न उसका प्रेम दुर्लभ था! साहित्य अनेक किस्म के रोमांस से भरा पड़ा है,संभोग विमर्श से भी भरा पड़ा है,यहां तक कि शिव-पार्वती के संभोग का वर्णन भी है।पौराणिक कथाओं में भगवान,ऋषि,गन्धर्व आदि के कथानकों के जरिए सैंकड़ों पुराने टेबू तोड़े गए हैं और नए टेबू बनाए गए हैं लेकिन गालियां लिखने का चलन नहीं था।

फेसबुक पर कुछ लोग हिमायत कर रहे हैं कि गालियां भी साहित्य है, वह जायज है,तो उनके लिए या फिर गालियों के लेखक के लिए वह तात्कालिक तौर पर जायज हो सकता है लेकिन साहित्यबोध के विकास में साहित्य के स्तर को ऊँचा उठाने के लिहाज से गालियों का चित्रण करने वाला साहित्य कभी समाज और साहित्य पर अपनी छाप नहीं छोड़ पाया है।जिन लेखक-लेखिकाओं ने कभी गालियों का प्रयोग किया है वे जल्द ही गालियों से दामन छुड़ाकर सभ्यता की शरण में लौटे हैं।

मसलन् सवाल यह है ´तमस´ और ´झूठा सच´ जैसे उपन्यास क्लासिकल असर पैदा करते हैं या विभाजन पर लिखी वे रचनाएं जिनमें गालियां हैं ॽ गालियाँ रचना को सुंदर नहीं बनातीं।यह तर्क गलत है कि पात्र बोलते हैं इसलिए लेखक लिखने को मजबूर है।सवाल यह है लेखक चुनता क्या है ॽ लेखक यदि प्रकृतवादी नजरिए से देखेगा तो उसे जो दिखेगा उसका बिना चयन के चित्रण करेगा लेकिन यथार्थवादी नजरिए से देखेगा तो यथार्थ में से चुनेगा।कार्ल मार्क्स ने एमिल जोला और बाल्जाक की रचनाओं का जिस आधार पर मूल्यांकन किया है उससे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। एमिल जोला ने ´नाना´उपन्यास में समाज में जो कुछ देखा उस सबका चित्रण किया ,कोई चीज उससे छूटी नहीं।संभवतःवह बेटे से मां को सेक्स करते चित्रित कर देता है। जोला का तर्क था उसने जो देखा वही लिखा,लेकिन मार्क्स ने इस बात को स्वीकार नहीं किया,लेखक के पास चयन का नजरिया होना ही चाहिए।

हमारे बीच में अनेक लेखक हैं जिनके पास चयन का नजरिया नहीं है,वे जो देखते हैं वही रच रहे हैं,उनके पात्र जिस भाषा को बोल रहे हैं, वे उसी भाषा को लिख रहे हैं।चयन के नजरिए के अभाव में लिखी रचनाएं प्रकृतवाद के दायरे में आती हैं,वे यथार्थवादी रचनाएं नहीं हैं।यथार्थवादी लेखक तो यथार्थ में से चुनता है।हमारे जो मित्र गालियों के पक्ष में लिख रहे हैं हम उनसे कहना चाहते हैं वे जरा इतिहास में जाएं और प्रकृवाद बनाम यथार्थवाद की बहस पढ़ें,मार्क्स-एंगेल्स को भी पढ़ें,आखिरकार मार्क्स ने क्यों बालजाक को यथार्थवाद का चितेरा कहा और जोला को नहीं,जबकि यथार्थ तो जोला के यहाँ भी था।

कार्ल मार्क्स पखवाडा- सोशलमीडिया,अभिव्यक्ति की आजादी और मार्क्स

          फेसबुक आदि सोशल मीडिया में अभिव्यक्ति की आजादी का जब से विस्तार हुआ है,तब से अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले भी तेज हुए हैं,बोलने वाले जितने चतुर और तेज दिख रहे हैं,उन पर नियंत्रण लगाने वाले और भी चतुर हो गए हैं, सोशलमीडिया के दुरूपयोग की घटनाएं बढ़ी हैं, दूसरी ओर राज्य की साइबर निगरानी बढ़ी है।नागरिक की निजता खत्म हो चुकी है।आज यूरोप और उत्तर अमेरिका पूरी तरह साइबर निगरानी में चले गए हैं।इस तरह की निगरानी पहले कभी नहीं थी।राज्य के खिलाफ बोलना अपराध घोषित हो गया है। ईमेल से लेकर सोशलमीडिया तक मोबाइल से लेकर एसएमएस तक निगरानी हो रही है।यह सीधे अभिव्यक्ति की आजादी के क्षय की सूचना है।दिलचस्प बात यह है कि हम सब इस पर एकदम चुप हैं।आखिर हम अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों और साइबर निगरानी के सवालों पर फेसबुक आदि में बहस क्यों नहीं करते ॽअभिव्यक्ति की आजादी के सवाल पर मार्क्स ने जो बातें कही थीं उनमें से अनेक बातें आज भी साइबरयुग में भी मूल्यवान हैं।

कार्ल मार्क्स ने कहा की प्रेस की स्वतंत्रता के लिए जरूरी है पत्रकार स्वयं जाने, ज्ञान अर्जित करे।स्व-ज्ञान, बिना आत्म-स्वीकृति के संभव नहीं है।हम जो बात नहीं जानते उस पर न लिखें,पहले जानें फिर लिखें।लेखन में यदि कोई गलती हो जाए तो उसे सीधे स्वीकार करें।लिखते समय भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग करने से बचें,जिन भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करते हैं,कभी यह भी सोच लें कि उनका असली अर्थ क्या है। लिखने के नाम पर भारी-भरकम शब्दों में लिखने की आदत से बचें।जिस समय मार्क्स ने यह लेख लिखा उनकी उम्र मात्र 24साल थी,उन्होंने अपने जन्मदिन पर यह लेख Rheinische Zeitung´(No. 125, Supplement ,May 5 1842)प्रूशिया के समाचारपत्रों के प्रसंग में सेंसरशिप के सवालों पर विचार करते हुए "By a Rhinelander." नाम से लिखा था। यह लेख बहुत सराहा गया।जिस समय यह लेख लिखा गया उस समय भी प्रेस में वे तमाम प्रवृत्तियां थीं जो इन दिनों नजर आती है,धंधेखोरी,चालबाजियां,सनसनी आदि।

मार्क्स ने सवाल उठाया कि प्रेस की क्या जनता में दिलचस्पी है ॽ हम इसी सवाल को इस तरह उठाना चाहते हैं कि साइबर लेखकों यूजरों की क्या भारत की जनता में दिलचस्पी है ॽयदि साइबर लेखकों -यूजरों की भारत की जनता में दिलचस्पी है तो भारत सरकार निश्चित तौर पर उनके लिखे पर ध्यान देगी,लेकिन यदि साइबर लेखकों की भारत की जनता में दिलचस्पी नहीं है तो भारत सरकार उन पर ध्यान नहीं देगी,उनकी स्वतंत्रता की रक्षा पर ध्यान नहीं देगी।हम तो यही कहना चाहेंगे कि भारत की जनता,सरकार आदि से जुड़े सवालों पर जमकर लिखो,गंभीर से गंभीर विषयों पर बहस चलाओ लेकिन तैयारी करके,सतही ढ़ंग से नहीं।सतही,सनसनीखेज,गाली-गलौज,अपमान,ब्लैकमेलिंग की भाषा में साइबर लेखन,मीडिया प्रस्तुतियां बंद होनी चाहिए।

मार्क्स ने लिखा आप पत्रकार लोग जो लिखते हैं वह जनता में भूमिका अदा करे,जनता को सचेत करे।उसमें विवेक बोले,अनसुनी आवाजें सुनाई दें। मार्क्स ने लिखा कि पत्रकार में बच्चों जैसा संवेदनात्मक-व्यवहारिक गुण होना चाहिए।जिस तरह बच्चा अपनी सहज संवेदनात्मक भाषा के जरिए जगत से जुड़ता है उसी तरह की भाषा का उन्हें प्रयोग करना चाहिए।पत्रकार की संवेदनात्मक क्षमता बच्चों जैसी होनी चाहिए।बच्चों का पहला गुण है कि वे हर चीज को संवेदना के धरातल पर परखते हैं।नाक और मुँह के जरिए परखते हैं।अखबार का भी यही गुण होना चाहिए कि उसे भी हम बच्चों जैसी संवेदनात्मक अनुभूति की तरह महसूस करें।यानी जब सामान्य आदमी सहज ही अपनी संवेदनाएं अखबार के साथ जोड़ सके तो समझो अखबार सार्थक है।अखबार अपने मूल्य स्वयं बनाए,यानी अपनी साख स्वयं बनाए।

इस लेख में ही मार्क्स ने राजसत्ता के राजनीतिक मर्म का सवाल उठाया है,उन्होंने लिखा है राज्य को राजनीतिक मर्म से रहित नहीं होना चाहिए।राज्य की राजनीतिक स्प्रिट होनी चाहिए।मार्क्स जिस समय लिख रहे थे उस समय प्रूशिया राज्य की कोई राजनीतिक स्प्रिट नहीं थी,जिसकी उन्होंने आलोचना की। राज्य के यदि राजनीतिक हित होगे तो वो उस दिशा में सोचेगा।

भारत में राज्य के राजनीतिक हित हैं,राजनीतिक स्प्रिट है।धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक स्प्रिट इसका मूलाधार है।लेकिन मुश्किल यह है कि दलीय नेतृत्व की प्रकृति के कारण इस स्प्रिट के साथ घालमेल होता रहता है।मसलन् इन दिनों मोदी जी की सरकार है तो अखबारवालों की नजर हिन्दुत्व पर केन्द्रित है,जो कि गलत है।मोदीजी पीएम हैं,भाजपा सत्ता में है,लेकिन राज्य की राजनीतिक स्प्रिट का मूल स्रोत संविधान है,दल नहीं। शासकदल को तो संविधान की संगति में ही राजनीति करनी है,जहां वह संगति विकसित कर लेता है सहज काम करता है,जहां संगति विकसित नहीं कर पाता असहज काम करता है। मुश्किल यह है कि मीडियावाले संविधानजनित राजनीतिक स्प्रिट को भूल जाते हैं और शासकदल जनित स्प्रिट को प्रमुखता देने लगते हैं और यही से सारी मुसीबतें खड़ी हो रही हैं।

दलीयबोध से प्रेरित होकर जब खबरें लिखी जाएंगी तो असुविधा होगी।टकराव होगा।दलीयबोध अलगाव पैदा करता है।इन दिनों खबरें दर्शक भाव से लिखी जा रही हैं।दर्शक भाव सबसे खराब भाव है। मार्क्स ने प्रूशिया के सदन की कार्यवाही की रिपोर्टिंग के प्रसंग में जो सवाल उठाए हैं वे सवाल हमारी संसद के दोनों सदनों की मीडिया में आने वाली रिपोर्टिंग के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हैं।संसद में होने वाली समस्त गतिविधि सार्वजनिक तथ्य है।इसे दर्शक की नजर से पेश करें या ऐतिहासिक दृष्टि से पेश करें ॽ मार्क्स ऐतिहासिक दर्शक के नजरिए से प्रस्तुत करने पर जोर देते हैं।

मोदीजी के सत्ता में आने के बाद से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने पर जोर है,इसके लिए ´जिम्मेदारी´ और ´सीमा´पदबंध का बार बार वित्तमंत्री अरूण जेटली और अन्य मंत्री इस्तेमाल कर चुके हैं।वे ´जिम्मेदारी´और ´सीमा´के दायरे में बांधकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को देख रहे हैं और इस आधार पर कानूनी प्रावधानों की रोशनी में रिपोर्टिंग करने पर जोर दे रहे हैं।दिलचस्प बात यह है कि उनके साथ कारपोरेट मीडिया का बहुत बड़ा अंश साथ में खड़ा है। ये लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यापक परिप्रेक्ष्य में,संविधान के परिप्रेक्ष्य में रखकर नहीं देख रहे।







मंगलवार, 9 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- इतिहास निर्माता कौन ॽ

        इन दिनों हमारे राजनेता और उनके भोंपू और टीवी चैनल आए दिन यह प्रचार कर रहे हैं कि पीएम नरेन्द्र मोदीजी देश का नया इतिहास बना रहे हैं! उनके पहले कांग्रेस के नेतागण यह कहते रहे हैं नेहरू ने इतिहास रचा !सवाल यह है क्या इतिहास का निर्माण नेता करते हैं ॽ क्या इतिहास की सृष्टि किसी विचारधारा विशेष के जरिए होती है ॽइस तरह के तर्क बुर्जुआनेता और विचारक लंबे समय से देते रहे हैं।

इस तरह के तर्कों का उत्तर देते हुए कार्ल मार्क्स ने ´लूई बोनापार्ट की अठारहवीं ब्रूमेर´ में लिखा ´मानव-जन अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं,पर अपने मनचाहे ढ़ंग से नहीं।वे उसे अपन मनचाही परिस्थितियों में नहीं,अपितु ऐसी परिस्थितियों में बनाते हैं जो उन्हें अतीत से प्राप्त और अतीत द्वारा सम्प्रेषित होती हैं और जिनका उन्हें सीधे-सीधे सामना करना पड़ता है।सभी मृत पीढ़ियों की परम्परा जीवित मानव के मस्तिष्क पर एक दुःस्वप्न के समान सवार रहती है।और ठीक ऐसे समय,जब ऐसा लगता है कि वे अपने को तथा अपने इर्द-गिर्द की सभी चाजों को क्रान्तिकारी रूप से बदल रहे हैं,और ऐसी किसी ऐसीवस्तु का सृजनकर रहे हैं जिसका आज अस्तित्व न था,क्रांतिकारी संकट के ठीक ऐसे अवसरों पर वे अतीत के प्रेतों को अपनी सेवा के लिए उत्कण्ठापूर्वक बुलावा दे बैठते हैं और उनसे अतीत के नाम,अतीत के रणनाद और अतीत के परिधान मांगते हैं ताकि विश्व इतिहास की नवीन रंगभूमि को इस चिरप्रतिष्ठापित वेश में और इस मंगनी की भाषा में सजाकर पेश करें।´

मार्क्स का यह कथन इस अर्थ में मूल्यवान है कि हमेशा संकट की अवस्था में हमने समाज में अतीत को ताण्डव करते हुए देखा है। खासकर बुर्जुआवर्ग ,जिसमें मध्यवर्ग भी शामिल है, उसकी यह सामान्य विशेषता है कि वह संकट की घड़ी में हमेशा ´अतीत के प्रेतों को अपनी सेवा के लिए उत्कण्ठापूर्वक बुलावा´ दे बैठता है। संकट की निर्णायक घड़ी में ही अतीत के नाम,अतीत के रणनाद,और अतीत के परिधान सामने आते हैं। हमें कोशिश करनी चाहिए कि संकट की घड़ी में अतीत के प्रेतों की शरण में न जाएं।अतीत के प्रेतों की वापसी का अर्थ है वर्तमान के संकटों से ध्यान हटाना असफलताओं से ध्यान हटाना। समाज में जब भी संकट की घड़ी आई है या कोई निर्णायक फैसले की घड़ी आती है तो हठात् बुर्जुआजी और मध्यवर्ग अतीत के प्रेत याद आने लगते हैं।हम सब जानते हैं पूंजीवादी व्यवस्था में संकट कभी पीछा नहीं छोड़ते,फलतःबुर्जुआजी अतीत के प्रेतों का भी कभी साथ नहीं छोड़ता,अतीत के प्रेत वस्तुतःउसके लिए वैचारिक रक्षा कवच का काम करते हैं।



कार्ल मार्क्स ने लिखा है ´पूंजीवादी समाज यद्यपि वीरत्व शून्य है´,यह कथन बेहद मारक है,यह उस प्रचार की पोल खोल देता है जिसके जरिए आए दिन बुर्जुआ नेताओं और नायकों की वीरता गुणगान किया जाता है।मार्क्स ने लिखा ´पूंजीवादी समाज यद्यपि वीरत्व शून्य है,फिर भी उसे अस्तित्व में लाने के लिए वीरत्व,त्याग,आतंक,गृहयुद्ध और जनसंघर्षों की आवश्यकता पड़ी थी।´

कार्ल मार्क्स पखवाडा- ´मार्क्सवाद´ पदबंध कैसे आया ॽ


       कार्ल मार्क्स का नाम और विचार भारत के लिए नया नहीं है।भारत में लंबे समय से मार्क्सवाद जनप्रिय रहा है।लेकिन विगत नव्य-आर्थिक उदारीकरण और समाजवादी सरकारों के पराभव के बाद के विगत 25-26 सालों में इसकी लोकप्रियता कम हुई है।लेकिन अभी भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण समूह है जो मार्क्सवाद को मानता और जानता है।लेकिन नए जनमाध्यमों के रूप में सोशलमीडिया में जो युवावर्ग या अन्य समुदाय के लोग सक्रिय हैं उनमें बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो मार्क्सवाद को नहीं जानते लेकिन उनके पास मार्क्सवाद विरोधी प्रचार निरंतर पहुँच रहा है।हम विनम्रता के साथ कहना चाहते हैं मार्क्सवाद विरोधी प्रचार वस्तुतः मानवता विरोधी है,मानवाधिकार विरोधी प्रचार है।

मार्क्सवाद का लक्ष्य है मानवता और मानवाधिकारों की रक्षा करना उनका प्रचार-प्रसार करना।हमारे बीच में ऐसे भी संशयवादी लोग हैं जो मानवता की बातें सुनते ही आग बबूला हो जाते हैं और नमूने के तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी शासित सरकारों के मानवताविरोधी कामों का हवाला देकर मार्क्सवाद को खारिज करते रहते हैं,मार्क्सवाद के प्रति घृणा फैलाते रहते हैं।हम साफ कहना चाहते हैं कि कम्युनिस्ट शासित सरकारों का मार्क्स के विज़न के साथ कोई संबंध नहीं है।

मार्क्सवाद पर जब बातें हों तो कार्ल मार्क्स और एंगेल्स के लेखन को केन्द्र में रखकर बातें होनी चाहिए। हमें अखबारी कतरनों,कम्युनिस्ट नेताओं,पूर्व समाजवादी सरकारों आदि के कारनामों की कसौटी पर मार्क्सवाद को परखने से बचना चाहिए। कार्ल मार्क्स पर जब बातें हों तो हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि ´मार्क्सिज्म´पदबंध से स्वयं मार्क्स अपरिचित थे।संक्षेप में वाकया यह है कि जब मार्क्स के दामाद पॉल लाफ़ार्ज ने मार्क्स को यह कहा कि आपने जो लिखा है उससे सिद्धांत के तौर पर ´मार्क्सिज्म´ निकलता है।मार्क्स ने तत्काल कहा कि मेरे लेखन से यदि मार्क्सिज्म जैसी सैद्धांतिक व्यवस्था निकलती है तो मैं इसे नहीं मानता।कार्ल मार्क्स जिस समय यह सब लिख रहे थे तब तक उनके विश्व दृष्टिकोण का सुंगत ढ़ंग से विकास नहीं हो पाया था।लेकिन लाफार्ज पहले विद्वान थे जिन्होने ´मार्क्सिज्म´पदबंध का प्रयोग किया गया।इसके बाद जी.प्लेखानोव ने पहलीबार द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की व्याख्या के क्रम में ´मार्क्सवाद समग्र विश्वदृष्टि´ पदबंध का इस्तेमाल किया।मार्क्स के नजरिए का मूल संबंध सर्वहारा के नजरिए से राजनीतिक अर्थशास्त्र की मीमांसा से जुड़ा हुआ है।इसके अलावा इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा के विकास को उन्होंने प्राथमिकता के साथ विश्लेषित किया।इस क्रम में सम-सामयिक और पुरानी भाववादी विचारधाराओं की आलोचना विकसित की।मार्क्स ने राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना के लिए इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा का बुनियादी तौर पर इस्तेमाल किया।



हम इस पखवाड़े भर चलने वाले आयोजन में समाज, इतिहास, राजनीति,संस्कृति,कला,न्याय,दर्शन आदि के क्षेत्र में जो अवैज्ञानिक विचारधाराएं प्रचलन में हैं उनकी हम क्रमशः पड़ताल करेंगे।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...