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गुरुवार, 17 मई 2012

फेसबुक का लक्ष्य है सामाजिक खुलापन ,अंतहीन साझेदारी और संपर्क

फेसबुक के सर्जक मार्क जुकेरबर्ग ने सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन के सामने एस- 1 के तहत सन् 2012 के आरंभ में जो बयान दिया है उसमें उसने कहा है कि फेसबुक का लक्ष्य है विश्व में ज्यादा खुलापन और संपर्क पैदा करना । यानी ज्यादा खुला और कनेक्टेड संसार निर्मित करना फेसबुक का लक्ष्य है। फेसबुक ने अपने इस लक्ष्य के लिए लगातार अपनी तकनीकी और फेसबुक सुविधाओं में निरंतर सुधार करके अपडेटिंग और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज किया है। फेसबुक का दूसरा बड़ा लक्ष्य है अंतहीन साझेदारी। विचार से लेकर वीडियो तक सभी चीजों की सीमाहीन साझेदारी का ऐसा सुंदर मंच मानव सभ्यता में पहले कभी नहीं दिखा । इस क्रम में अनेक मामलों में कॉपीराइट के अनेक नियम भी टूटे हैं।

फेसबुक ने मात्र 8सालों में 75करोड़ लोगों को अपने से जोड़ लिया है। किसी अकेले मीडियम का इतनी बड़ी संख्या में जुड़ना स्वयं में बहुत बड़ी बात है।इतने कम समय में टीवी ने भी यह सफलता नहीं पाई थी। आज फेसबुक पर प्रतिमाह व्यक्ति 7 घंटे खर्च करता है।सन् 2009 में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 4घंटे खर्च करता था। मनुष्यों को एक साथ जोड़ने वाला कोई और प्लेटफॉर्म नहीं है।

फेसबुक पर नाराजगी जताने या उसके यूजरों पर नाराज होने से फेसबुक कम्युनिकेशन की समस्या हल होने वाली नहीं है। इंटरनेट में आज सभी किस्म के कम्युनिकेशन समाहित हो चुके हैं। फोन से लेकर डाकूमेंटस तक,रेडियो से लेकर वीडियो तक।

पहले लोग सोच रहे थे बेव और इंटरनेट की दुनिया महान है लेकिन फेसबुक ने अब इस सबको चुनौती दे दी है। फेसबुक पर हम सब वैसे ही विचरण कर रहे हैं जैसे भाड़े की जमीन पर किसान खेती करता है।वह जितनी मेहनत करता है उतनी बेहतर फसल पैदा होती है। ठीक वैसे ही हम फेसबुक पर हम जितनी मेहनत करेंगे फेसबुक को उतना ही सुंदर बना सकते हैं। प्लेटफॉर्म किसी और का है, लेकिन हम सब उसके किराएदार हैं । कल तक फेसबुक पर विचरण करने को समय की बर्बादी कहा जाता था,लेकिन आज ऐसा नहीं है।जबकि आज कहा जा रहा है कि यह सबसे सस्ता माध्यम है। यह भी कहा जा रहा है कि फेसबुक से समाज के बुनियादी मूल्यों और प्राइवेसी को खतरा है। असल में फेसबुक आक्रामक और प्रभावशाली मीडियम है, इससे खतरे कम हैं फायदे ज्यादा हैं।

फेसबुक ने 8 साल में 75करोड़ लोगों को जोड़ा है,लेकिन इंटरनेट जिस गति से लोगों से जुड़ रहा है उसके अनुसार इतने लोग जोड़ने में उसे 30 साल लगेंगे।पूंजीवाद के इतिहास में कम्युनिकेशन और संपर्क की फेसबुक महानतम उपलब्धि है। इस उपलब्धि को हम सभी बेहतर सभ्य भाषा में इस्तेमाल करें तो ज्यादा स्थायी दोस्त बना सकते हैं।

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

सावधान इंटरनेट पर सीआईए आपकी जासूसी कर रहा है


   कल तक इंटरनेट पर आनंद और स्‍वाधीनता के दि‍न थे। अब खतरा सामने आ गया है। अमेरि‍की गुप्‍तचर संस्‍था सीआईए ने अपने पैर इंटरनेट पर रख दि‍ए हैं। सीआईए की नजरदारी का काफी गंभीर अर्थ है। अब सीआईए के 'ई जासूस' आपके ब्‍लॉग पढ़ना चाहते हैं,ट्वि‍टर और फेसबुक में आप क्‍या कर रहे हैं उसे देखना चाहते हैं। यहां तक कि‍ वे यह भी जानना चाहते हैं कि‍ इंटरनेट से आप कौन सी कि‍ताब 'अमाजॉन' से खरीद रहे हैं ,कौन सी कि‍ताब आप इंटरनेट पर पढ़ रहे हैं। इस सबका हि‍साब सीआईए तैयार कर रहा है। अमेरि‍का की एक नि‍वेश कंपनी ' इन -क्‍यू- टेल' ने अपनी पूंजी का बड़ा हि‍स्‍सा इस क्षेत्र में नि‍वेश करने का फैसला लि‍या है। यह फर्म सीआईए की सहयोगी कंपनी है। इस कंपनी ने दृश्‍य तकनीकी संसार में पैसा लगाने का फैसला कि‍या है। यह काम वह अनेक साफटवेयर कंपनि‍यों में पैसा नि‍वेश करके करना चाहती है। इसके बहाने वह पूरे इंटरनेट पर नजरदारी करेगी।
     अमेरि‍का में गुप्‍तचर सेवाओं में एक बड़ा आन्‍दोलन चल रहा है जि‍सके तहत नेट की सूचनाओं को जानने,एकत्रि‍त करने और फि‍र उसे सीआईए,एफबीआई आदि‍ के काम में लगाने के लि‍ए हजारों लोग लगे हैं। अब आपकी इंटरनेट पर लि‍खी प्रत्‍येक चीज उनके नि‍शाने पर है। 
    इस समय इंटरनेट पर मीडि‍या के वि‍भि‍न्‍न माध्‍यमों के जरि‍ए सूचनाओं,कार्यक्रमों आदि‍ के संचार की बाढ़ आयी हुई है। एक अनुमान के अनुसार वेब 2.0 साइट पर जाने वाले लोगों की तादाद प्रति‍दि‍न पांच लाख है। इसी तरह तकरीबन एक मि‍लि‍यन से ज्‍यादा लोग प्रति‍दि‍न ब्‍लॉग,बातचीत,ई व्‍यापार, फ्लि‍कर,यू ट्यूब,आदि‍ का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। सीआईए के गुप्‍तचर अपने '' जासूसों के जरि‍ए यह भी वर्गीकरण कर रहे हैं कि‍ कौन कि‍तना प्रभावशाली संप्रेषण कर रहा है। प्रभावशाली,कम प्रभावशाली और सामान्‍य संप्रेषण के नाम से तीन वर्ग बनाए गए हैं। वे यह भी देख रहे हैं कि‍ यूजर कि‍स तरह की प्रति‍क्रि‍याएं व्‍यक्‍त कर रहा है। यूजर कौन सी पोस्‍ट को फार्वर्ड कर रहा है। नेट लेखक के साथ  यूजर कि‍स तरह का संवाद कर रहा है। जि‍न मसलों पर सोशल नेटवर्क या ब्‍लाक पर चर्चाएं हो रही हैं उनका वि‍श्‍व राजनीति‍ पर क्‍या असर होगा। अगर असर गंभीर होने की संभावनाएं हैं तो सीआईए जासूस चेतावनी देंगे। ये बातें 'इन-क्‍यू टेल' के प्रवक्‍ता डोनाल्‍ड ति‍घे ने कही हैं।  इस कार्य के लि‍ए खास कि‍स्‍म का सॉफ्टवेयर इस्‍तेमाल कि‍या गया है जि‍सके जरि‍ए आपकी सूचनाएं एकत्रि‍त की जा रही हैं। यह सॉफ्टवेयर बताता है कि‍ कि‍सकी पोस्‍ट पॉजि‍टि‍व है, कि‍सकी नेगेटि‍व है। वि‍भि‍न्‍न संचार उपकरण बनाने वाली कंपनि‍यां और संचार बहुराष्‍ट्रीय कंपनि‍यां इस सॉफटवेयर का इस्‍तेमाल कर रही हैं। 'इन-क्‍यू-टेल' कंपनी अपनी इस योजना के आधार पर एक पायलट सर्वे करने जा रही है और यह पायलट सर्वे यदि‍ सफल रहता है तो इसके बड़े ही दूरगामी परि‍णाम होंगे। यह सीधे व्‍यक्‍ति‍ के मौलि‍क अधि‍कारों के साथ मानवाधि‍कारों का हनन है। 'आई-क्‍यू-टेल' कंपनी ने इस काम में अभी 90 लोगों को लगाया हे और आरंभि‍क तौर पर 20 मि‍लि‍यन डालर का नि‍वेश कि‍या है, लेकि‍न यह नि‍वेश बढ़ भी सकता है। इस मामले में वि‍देशी भाषाओं पर भी नजरदारी रहेगी। अभी 9 वि‍देशी भाषाएं इस प्रयोग के लि‍ए चुनी गयी हैं। यह सारा काम 'वि‍जि‍वि‍ल टेक्‍नोलॉजी' कंपनी के जरि‍ए कराया जा रहा है। उसने ही इसका सॉफ्टवेयर बनाया है। यह कंपनी 2008 से इस क्षेत्र में प्रवेश पाने की कोशि‍श कर रही थी और अंत में उसे सफलता मि‍ल ही गयी। यह कंपनी अमरीकी गुप्‍तचर संस्‍था की सहयोगी कंपनी के रूप में काम कर रही हे और इसने वि‍भि‍न्‍न भाषाओं के वि‍शेषज्ञ और सैन्‍य वि‍शेषज्ञ इंजीनि‍यर जुगाड़ कि‍ए हैं। इनका काम है वि‍भि‍न्‍न भाषाओं की नेट संचार सामग्री की जांच-पड़ताल करना। इस समय अरबी,फ्रेंच, उर्दू, फारसी और रूसी पर नजरदारी चल रही है। इस कंपनी ने अपनी 'सूचना व्‍यवस्‍था सुरक्षा इंजीनि‍यरों' की एक वि‍शालकाय फौज तैयार की है इसमें सूचना तकनीक के कुशल लोगों को शामि‍ल कि‍या गया है। इसमें वे लोग भी शामि‍ल कि‍ए गए हैं जो पॉलि‍ग्राफ सुरक्षा में कुशल माने जाते हैं।
    सीआईए परेशान है सोशल नेटवर्किंग साइट की बढ़ती जनप्रि‍यता से। वे लगातार छान फटक रहे हैं कि‍ कौन सी साइट जनप्रि‍य है और उस पर तुरंत अपने '' जासूस लगा देते हैं। ये '' जासूस लगातार बेचैन आत्‍मा की तरह एक साइट से दूसरे साइट की ओर भागते रहते हैं। अमेरि‍का के जासूस परेशान हैं कि‍ नेट के 70 प्रति‍शत यूजर गैर अमेरि‍की हैं। ये अमेरि‍का के बाहर रहते हैं। इनका जाल दुनि‍या के 180 देशों में फैला हुआ है। तकरीबन 200 गैर अंग्रेजी भाषी ब्‍लागर-ट्वि‍टर समूह हैं, ये लोग रीयल टाइम में तूफान मचाए हुए हैं। इन्‍हें सीआईए नजरअंदाज नहीं करना चाहता। उनका मानना है कि‍ यह रीयल टाइम सूचना सुनामी है। हम उन्‍हें अबोध कहकर नजरअंदाज नहीं कर सकते।





                     
    

सोमवार, 10 मई 2010

याहू ने ईमेल के प्रसंग में नेट यूजर की प्राईवेसी का मुकदमा जीता

           याहू कंपनी ने एक महत्वपूर्ण मुकदमे  में कोलोराडो फेडरल सरकार को एक कानूनी जंग में हरा दिया है। यह मुकदमा यूजरों खासकर ईमेल करने वालों की प्राइवेसी की रक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण था। भारत के ईमेल यूजरों के लिए भी इसकी महत्ता है। 
      कोलोराडो का सरकारी वकील तर्क दे रहा था कि छह महिने से ज्यादा पुराने ईमेल ,ई सामग्री के दायरे में नहीं आते। अतः संबंधित व्यक्ति के छह महिने पुराने ईमेल दे देने चाहिए। सरकार को एक केस के सिलसिले में किसी व्यक्ति के छह महिने पुराने ईमेल की जरुरत थी और वह यह ईमेल बगैर किसी ई कानून और प्राईवेसी कानून का पालन किए बगैर हासिल करना चाहती थी।   
       अमेरिका में किसी के ईमेल हासिल करने के लिए संवैधानिक वारंट की जरुरत होती है। याहू का तर्क था कि सरकारी वकील बगैर संवैधानिक वारंट के ईमेल हासिल करना चाहता है जो कानूनन गलत है।
      सरकारी वकील का कहना था कि 1986 का कानून अमेरिका की सरकार को यह अधिकार देता है कि सरकार को अगर जरुरत है तो किसी व्यक्ति के ईमेल वह नेट सर्विस प्रदाता कंपनी से हासिल कर सकती है। यदि वह ईमेल छह महिने और उससे ज्यादा पुराना है तो बगैर कारणवारंट के प्राप्त कर सकती है। बाद में सरकारी वकील अपनी राय से पीछे हट गया और कहा कि छह महिने से कम अवधि के ईमेल प्राप्त कर सकते हैं लेकिन वे ईमेल स्वयं ईमेल करने वाले को ही अदालत में पढ़ने होंगे।  
     याहू के पक्ष का गूगल,माइक्रोसॉफ्ट तथा अनेक स्वयंसेवी नेट संस्थाओं ने समर्थन किया था। उल्लेखनीय है अमेरिका में सारे सारी दुनिया के ईमेल नेट कंपनियों के द्वारा स्टोर किए जाते हैं।
    अमेरिका में सरकार के पास किसी भी व्यक्ति के ईमेल प्राप्त करने का हक है चाहे वह व्यक्ति शक के घेरे के बाहर हो। सिर्फ सरकार को यह बताना होगा कि ईमेल का किसी आपराधिक मामले में जरुरी इस्तेमाल हो सकता है।
    झंझट तब आरंभ हुआ जब कोलोराडो के मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया है कि छह महिने के जो ईमेल यूजर के पास हैं और डाउनलोड हो सकते हों वे पेश किए जाएं। याहू ने मजिस्ट्रेट के आदेश को मानने से इंकार किया और कहा कि सन् 1986 के स्टोर्ड कम्युनिकेशन एक्ट के अनुसार सरकार को ईमेल हासिल करने के लिए कारण बताना होगा और संवैधानिक वारंट हासिल करना होगा उसके बाद ही ईमेल दिए जा सकते हैं। सारी बहस के बाद सरकार और याहू इस बात पर एकमत हो गए कि 180 दिन के अंदर के बगैर खुले या खुले ईमेल हासिल करने के लिए अदालत को कारण बताना होगा। ऐसी स्थिति में बिना वारंट के भी ईमेल दिए जा सकते हैं।    




शुक्रवार, 7 मई 2010

माइक्रोसॉफ्ट ने घुटने टेके भारत कब जागेगा

     यूरोपीय आयोग की सिफारिश के आधार पर माइक्रोसॉफ्ट ने फैसला लिया है कि वह सर्च के डाटा को 6 माह के बाद नष्ट कर देगा। माइक्रोसॉफ्ट ने यह फैसला यूरोपीय यूनियन के द्वारा सन् 2008 में बनाए वर्किंग ग्रुप की सिफारिशों के आधार पर लिया है।
      अभी तक यह होता था कि माइक्रोसॉफ्ट के सर्च ईंजन में जाने वालों के  आईपी एड्रेस माइक्रोसॉफ्ट के पास रहते थे और वह इनका चोरी छिपे दुरुपयोग कर रहा था इसे निजी सूचनाओ के दुरुपयोग की केटेगरी में देखा गया।
     माइक्रोसॉफ्ट ने अपने सर्च ईंजन के डाटा पिछले दिनों चीन सरकार को भी उपलब्ध कराए हैं जिसके आधार पर चीन सरकार का विरोध करने वालों  और तिब्बत की आजादी के लिए संघर्ष करने वालों को बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी हुई है।  ईमेल और दूसरे ‘ई’ संचार के उपकरणों की स्थान विशेष के संदर्भ में निशानदेही करने साथ चीन में अनेक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता पकड़े गए हैं।
     यूरोप में भी माइक्रोसॉफ्ट अपने सर्च ईंजन के डाटा का राजनीतिक हिसाब-किताब बराबर करने और व्यवसायिक लाभ के लिए दुरुपयोग कर रहा था। यूरोपीय यूनियन ने सन् 2008 में ‘आर्टिकल 29 वर्किंग ग्रुप ’ नामक संगठन का गठन किया और इसमें समूचे यूरोप के डाटा संरक्षण के काम से जुड़े कई अफसरों को भी शामिल किया गया।
     ‘आर्टिकल 29 वर्किंग ग्रुप’ ने याहू,गूगल और माइक्रोसॉफ्ट ने अधिकारियों के साथ विस्तार के साथ बातचीत की और यह फैसला लिया कि इन कंपनियों को यूरोप के प्राइवेसी कानूनों का पालन करना होगा।  बाद में ‘आर्टिकल 29 वर्किंग ग्रुप ’ के आदेश पर यह तय पाया गया कि ये तीनों कंपनियां अपने सर्च ईंजन के ऑनलाइन डाटा को 6 माह के बाद नष्ट कर देंगी।
      इस आदेश के बाद माइक्रोसॉफ्ट ने अपने सर्च ईंजन बिंग को नए ढ़ंग से नियोजित किया है। अभी तक याहू और गूगल ने इस दिशा में क्या कदम उठाए हैं यह साफ नहीं है। उल्लेखनीय है कि इलैक्ट्रोनिक प्राइवेसी इनफोर्मेशन सेंटर ने यूरोपीय यूनियन के देशों से अनुरोध किया था कि वे प्राइवेसी कानूनों का ख्याल रखें और सर्च ईंजन के मालिकों पर दबाब ड़ालें कि वे यूरोपीय देशों के प्राइवेसी कानूनों का पालन करें।
      माइक्रोसॉफ्ट का यूरोपीय कानूनों के सामने झुकना इस बात का संकेत है कि सरकारें यदि चाहें तो जनता की ‘ई’ प्राइवेसी की रक्षा कर सकती हैं। क्या भारत सरकार इस दिशा में कदम उठाएगी और भारत के प्राईवेसी कानूनों को मानने के लिए इंटरनेट कंपनियों को मजबूर करेगी ?             





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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...