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शुक्रवार, 20 मई 2016

बंगाल और हिन्दी के बुद्धिजीवी-लेखक

      मुझे पश्चिम बंगाल में रहते हुए 27साल गुजर गए।इसबीच यहां बहुत कुछ बदला है लेकिन अफसोस यह है हिन्दी के बुद्धिजीवियों-लेखकों का संस्कार नहीं बदला।पश्चिम बंगाल में हिन्दी के बुद्धिजीवी देश के विभिन्न कोनों से आते रहे हैं।भाषण करते रहे हैं,सम्मान लेते रहे हैं।लेकिन कभी इन बुद्धिजीवियों ने आँखें खोलकर बंगाल के यथार्थ पर नहीं लिखा,जो कुछ लिखा वह किताबी विषयों पर लिखा,मसलन् रैनेसां पर लिखा,लेकिन उसकी जमीनी हकीकत को कभी जानने की कोशिश नहीं की।चूंकि अधिकांश बुद्धिजीवी प्रगतिशील थे अतःवे यहां के जमीनी यथार्थ से आँखें चुराकर भागते रहे हैं।यही हालत पश्चिम बंगाल के बंगाली बुद्धिजीवियों की है।वे नंदीग्राम के बहाने उठे और फिर सो गए।

सवाल यह है पश्चिम बंगाल के यथार्थ को जानने और समझने के लिए जिस जोखिम को उठाने की जरूरत है वह जोखिम लेखक उठाने से क्यों कतराते रहे हैं ॽ जो भी थोडा-बहुत लेखन है वह वाम के पक्ष और विपक्ष में है।वाम की आलोचना पर है। लेकिन वाम के अलावा बंगाल का सामाजिक यथार्थ भी है जिसकी ओर आलोचनात्मक नजरिए से देखने की जरूरत है।यह काम पहले नहीं हुआ अभी भी नहीं हो रहा।सारी समस्याएं यहीं पर हैं। हमारे सरोकार राजनीतिक हार -जीत तक आकर सिमटकर रह गए हैं, कुछ पद-पुरस्कार पाने तक सीमित रह गए हैं।इससे बंगाल के यथार्थ के साथ अलगाव और भी गहरा हुआ है।

मैं निजी तौर पर यथाशक्ति इस दिशा में लिखता रहा हूँ और इसकी मुझे राजनीतिक –सामाजिक कीमत भी चुकानी पड़ी है। एक लेखक के नाते मैंने बंगाल के यथार्थ को नहीं छोड़ा,पार्टी छूटी,पद छूटे,मित्र छूटे ,लेकिन मैंने निडर होकर लिखना नहीं छोड़ा। सवाल यह है बंगाल जब हिन्दीभाषियों को प्रभावित करता है तो यह भी तो देखें कि हिन्दीभाषी लोग और राज्य किस तरह बंगाल को प्रभावित कर रहे हैंॽ बंगाल में किन वर्गों का ह्रास हुआ ॽ किन क्षेत्रों में ह्रास हुआ ॽऔर इस ह्रास के कारण जो समाज पैदा हुआ वह कैसा है ॽ



आज का बंगाल पहले के बंगाल से भिन्न है।आज बंगाल में हिन्दीभाषी क्षेत्र की तमाम विकृतियां और अमानवीय मूल्य पैर पसार चुके हैं।बंगाली जाति पूरी तरह हिन्दीभाषियों की कु-सभ्यता के रूपों से सीख रही है,उनका अनुकरण कर रही है।यह बहुत बड़ा विपर्यय है।इसे बुद्धिजीवी देखना नहीं चाहते।

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

बर्बर बंगाल और कलंकित जनतंत्र


      सुनने में अटपटा लगता है लेकिन सच है कि पश्चिम बंगाल निरंतर बर्बरता की ओर कदम बढ़ा रहा है। गांवों से लेकर कस्बों तक प्रेम करने वाले युवाओं पर संगठित हमले हो रहे हैं। इन संगठित हमलों में संस्था के रुप में सालिसी सभाएं अग्रणी भूमिका अदा कर रही हैं। पश्चिमी बंगाल में वाम जमाने में बनायी गयी सालिसी सभाएं इन दिनों बर्बरता के मामले में चरम पर हैं,सालिसी सभाओं के जरिए गांवों में तमाम किस्म के यंत्रणादायी दण्ड नियमित दिए जा रहे हैं,कल एक तरुण की सभा की पब्लिक सुनवाई में सरेआम हत्या कर दी गयी, बांकुड़ा में कल सालिसी सभा में लड़की के पिता ने लड़के की चाकू मारकर हत्या कर दी,बंगाल में अब तक सालिसी सभा ने हजारों प्रेमियों को बर्बर दण्ड दिए हैं,हम मांग करते हैं ये सभाएं तुरंत खत्म की जाएं, अब तक सैंकडों प्रेमियों को ये सभाएं विभिन्न किस्म के बर्बर दण्ड दे चुकी हैं,लेकिन राजनीतिकदलों के मुँह पर ताला लगा है,वे सालिसी सभाओं के फैसलों के खिलाफ कभी नहीं बोलते।
     उल्लेखनीय है वामशासन में बर्बर यंत्रणा के लिए बनायी गयी ये सालिसी सभाएं वाम के कलंकित कर्म का आदर्श प्रमाण हैं,टीएमसी ने शासन में आने के बाद सालिसी सभाओं को भंग नहीं किया। यह उसने गलत किया। अब समय आ गया है कि सालिसी सभाओं को भंग किया जाय,पश्चिम बंगाल के गांवों में यह तालिबानी सिस्टम का एक रुप है।
     सालिसी सभाओं के जरिए आए दिन प्रेम करने वाले युवाओं से लाखों रुपये जुर्माने के तौर पर वसूले गए हैं। गांव निष्कासन के कारण सैंकड़ों युवा शिकार हुए हैं। दर्जनों युवाओं को मौत के घाट उतारा गया है। इसके बावजूद सालिसी सभाओं के खिलाफ राजनीतिक दलों का मिलकर कोई कदम न उठाना चौंकाने वाली चीज है। मुश्किल यह है कि सालिसी सभाओं के जरिए पहले माकपा हमदर्द  दण्ड देते थे इन दिनों टीएमसी के समर्थक यह काम कर रहे हैं। यही वजह है सालिसी सभाओं के खिलाफ राज्य में कोई आंदोलन तक नजर नहीं आता। सालिसी सभा के किसी फैसले की मीडिया में खबर जब भी आती है तो ध्यान जाता है लेकिन आमतौर पर अधिकांश फैसले मीडिया में खबर नहीं बन पाते। लोकतंत्र की मांग है कि सालिसी सभाओं को तुरंत प्रतिबंधित किया जाय।





बुधवार, 23 सितंबर 2015

भ्रष्टाचार और माकपा



माकपा के पश्चिम बंगाल में निरंतर ह्रास के कारणों की पड़ताल की जानी चाहिए। बिना गंभीर पड़ताल के यह पता लगाना मुश्किल है कि माकपा इस दुर्दशापूर्ण अवस्था में कैसे पहुँची।   माकपा के अंदर और माकपा के बाहर बहुस्तरीय भ्रष्टाचार हमने करीब से देखा है। मैं 2005 तक पार्टी में था,बाद में पार्टी छोड़ दी। मसलन्, राज्य के विश्वविद्यालय सिस्टम में पेशागत सीनियरटी का कोई महत्व नहीं है। वाम जमाने में ऐसा सिस्टम बनाया गया कि उसमें पार्टी वफादार ही सीनियर होता था,उसे ही पदों पर बिठाया गया।विश्वविद्यालय के अंदर लोकतांत्रिकीकरण के नाम पर दलीय आदेश पर विभिन्न पदों पर लोग बिठाए गए और उनका मनमाफिक ढ़ंग से इस्तेमाल किया गया। किसी भी किस्म की सीनियरटी और अकादमिक विद्वत्ता को कभी भी माकपा ने कोई जगह नहीं दी। इस तरह के लोगों  को पश्चिम बंगाल में प्रोफेसर बनाया गया जिन्होंने एक निबंध लिखा,किसी विद्यार्थी को पीएचडी तक नहीं करायी,न स्वयं पीएचडी की। इस तरह की पदोन्नति और नियुक्ति पाने वाले लोगों में भाजपा से लेकर माकपा के लोग शामिल हैं,सभी किस्म की पदोन्नतियों और नियुक्तियों में माकपा का होना या माकपा की सिफारिश का होना ही एकमात्र शर्त थी। इस तरह के लोगों को उपकुलपति बनाया गया जिनका औसत अकादमिक रिकॉर्ड था। स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि यूजीसी के द्वारा प्रस्तावित अनेक नियमों की खुलेआम अवहेलना की गयी। विश्वविद्यालय के स्तर पर बनने वाली तमाम कमेटियों में उन लोगों को संयोजक और सदस्य बनाकर रखा गया जिनको नियमानुसार उसमें नहीं होना चाहिए। मसलन्, 60साल की उम्र पर रिटायर होने के बाद विश्वविद्यालय और विभाग की विभिन्न कमेटियों में वफादारों को बिठाकर रखा गया।यह काम इतने निर्लज्ज ढ़ंग से किया गया कि इसकी मिसाल सारे देश में मिलना संभव नहीं है। मैं यहां सभ्यता के नाते नाम नहीं लिख रहा । मेरे लिए दुखद बात यह भी रही है कि नियम-भंग की घटनाओं को विश्वविद्यालय प्रशासन की जानकारी में लाने के बावजूद कोई सुधार नहीं हुआ,यहां तक कि नियम-भंग में शामिल प्रोफेसरगण भी 60साल के बाद कमेटियों से कहने के बावजूद नहीं हटे। इस तरह माकपा ने लालझंड़े को तो कलंकित किया ही समूची अकादमिक व्यवस्था को भ्रष्ट लोगों से भर दिया।जिसके कारण राज्य में उच्चशिक्षा का समूचा ढ़ांचा बुरी तरह चरमरा गया । 

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

बंगाल की धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली और वाम

    
    आम तौर पर जो लोग कलकत्ता या प.बंगाल में घूमने जाते हैं तो उनको एक भिन्न किस्म का का सामाजिक परिवेश नजर आता है। कहने को पश्चिम बंगाल भारत में है लेकिन भारत से भिन्न भी है। पश्चिम बंगाल की भिन्नता है धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली का वर्चस्व। धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली  का गुण है कि वह राजनीतिक सचेतन, सहज,स्वाभाविक,मानवीय और संवेदनशील होती है।  इसमें 'स्व' के प्रति आलोचनात्मक विवेक प्रबल होता है।
      आजादी के साथ ही पश्चिम बंगाल हिन्दू-मुसलिम सामाजिक विभाजन की आग में जल रहा था। भारत-विभाजन का सबसे तीव्र असर यहां पड़ा था.बड़े पैमाने पर दंगे हुए थे, इन दंगों ने यहां के जनमानस को अंदर तक पीड़ित किया था। उस पीड़ा का समाधान करने में धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बंगाल से हमें यह जीवनशैली सीखनी चाहिए। साम्प्रदायिक मनोदशा से लड़ने का आज भी यह सबसे कारगर अस्त्र है।        
        प.बंगाल में धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली के निर्माण में आम जनता और बुर्जुआदलों के अलावा कम्युनिस्टों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कम्युनिस्टों की भूमिका न बिना धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। यह एक सच है कि  आम जनता में साम्प्रदायिक सद्भाव को प्रधान एजेण्डा बनाने में कम्युनिस्टों की निर्णायक भूमिका रही है। वे साम्प्रदायिक सद्भाव के संदेशवाहक के तौर पर राज्य में अग्रणी कतारों में रहे हैं,आम जनता के जीवन से साम्प्रदायिक भेद कैसे खत्म हुआ होगा यह बात आज की युवा पीढ़ी के लिए समझना बहुत ही मुश्किल है ।
   भारत-विभाजन क्यों और कैसे हुआ यह सवाल आज बेमानी है,कौन इसके लिए जिम्मेदार था,यह सवाल भी बेमानी है। भारत विभाजन के समय कम्युनिस्टों का नजरिया सही नहीं था,वह गलत उसूलों पर आधारित था,इसको बाद में कम्युनिस्ट पार्टी ने भी माना। लेकिन भारत विभाजन के कारण जो साम्प्रदायिक भेदभाव,हिंसाचार और घृणा समाज में फैली थी उसको खत्म करने के मामले में कम्युनिस्टों ने उस दौर में धर्मनिरपेक्ष ताकतों के साथ मिलकर कंधे से कंधा मिलाकर काम किया । उस दौर को लेकर कम्युनिस्टों ने कुछ सबक भी हासिल किए जिनको व्यवहार में लागू किया गया।
    पहला सबक यह था कि आम जनता में जड़ें मजबूत बनानी हैं तो अंतर्राष्ट्रीयतावाद के जंजाल में फंसने की बजाय राष्ट्रीय परंपराओं को समझना होगा, राष्ट्रीयता की भावना को पुख्ता बनाना होगा। कौमी परंपरा की नए सिरे से खोज करनी होगी। देश में और खासकर पश्चिम बंगाल में जनाधार बनाने के लिए कौमी परंपरा का निर्माण करना होगा। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से कम्युनिस्टों का रुपान्तरण आरंभ होता है। पंडित जवाहर लाल नेहरु ने सही लिखा है '' पिछली बातों के लिए अंधी भक्ति बुरी होती है । साथ ही उनके लिए नफ़रत भी उतनी ही बुरी है। उसकी वजह है कि इन दोनों में से किसी पर भविष्य की बुनियाद नहीं रखी जा सकती। वर्तमान का और भविष्य लाजिमी तौर से भूतकाल से जन्म होता है और उन पर उसकी छाप होती है। इसको भूल जाने के मानी हैं इमारत को बुनियाद से काट देना ।उसके मानी हैं इन्सान पर असर रखने वाली एक सबसे बड़ी ताकत को भुला देना। राष्ट्रीयता असल में पिछली तरक्की ,परंपरा और अनुभवों की एक समाज के लिए सामूहिक याद है। '' कम्युनिस्टों ने इस ''सामूहिक याद'' को नए सिरे से अर्जित किया ।
     सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीयता की पुरानी यादों के सहारे समाज का विकास संभव है ? पुरानी सामूहिक यादों ने विरेचन का काम किया। समाज से साम्प्रदायिक विद्वेष को खत्म किया। पुरानी सामूहिक यादों को कम्युनिस्टों सामाजिक दुश्मनी को खत्म करने के औजार के रुप में इस्तेमाल किया। मिश्रित संस्कृति और सभ्यता के रुपों की नए सिरे खोज आरंभ की। उसका ही यह सुफल है कि कोलकाता  साम्प्रदायिक प्रदूषण से मुक्त महानगर बन पाया। आजादी के बाद  देश के बाकी हिस्सों में साम्प्रदायिक ताकतें फली-फूली हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में आरएसएस और उसके सहयोगी को संगठनों को जनाधार नहीं मिला, मुस्लिम लीग जनविहीन हो गयी। आम बंगाली के मन से साम्प्रदायिक विद्वेष क्रमशः खत्म होता चला गया।
     यह वामदलों के प्रयासों का ही सुफल है कि आज समूचा बंगाल साम्प्रदायिकचेतना से मुक्त है।आजादी के बाद साम्प्रदायिक विभाजन की  तमाम कोशिशें हुई हैं लेकिन इस राज्य में वे सभी विफल रही हैं। वामदलों के प्रयास का ही यह सुफल  है कि आम जीवनशैली में धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया तेजगति से चली है। आम जीवन में धर्मनिरपेक्षता एक ताकतवर विचार के रुप में काम करता रहा है। यह स्थिति तब है जबकि देश के विभिन्न इलाकों में साम्प्रदायिकता की आंधी चलती रही है। मसलन्,राममंदिर रथयात्रा,बाबरी मसजिद विध्वंस, इंदिरा गांधी की हत्या और सिख जनसंहार, गुजरात का बर्बर जनसंहार आदि बड़ी घटनाएं पश्चिम बंगाल की मनोदशा को प्रभावित करने में असफल रही हैं। यह साधारण बात नहीं है।
    आमतौर पर पश्चिम बंगाल की जीवनशैली का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना है। धर्मनिरपेक्षता यहां वोटबैंक राजनीति तक सीमित नहीं है बल्कि एक विकसित आधुनिक जीवनशैली है। धर्मनिरपेक्ष आधुनिक जीवनशैली की परिकल्पना को वामदलों ने आम जनता की मदद से साकार किया है। आज सारे देश में जातिगत विद्वेष और जातिगत गोलबंदियां  हैं,लेकिन पश्चिम बंगाल इससे एकदम अछूता है। जाति-उत्पीडन यहां  एकसिरे से नदारत है। धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली जब निर्मित होगी तो जातिवाद कमजोर होगा, जाति की पहचान कमजोर होगी। पश्चिम बंगाल में जाति की पहचान कमजोर हुई है और जातीयता या नैशनेलिटी की पहचान पुख्ता हुई है। राज्य में जब भी भेदकारी ताकतों ने सिर उठाने की कोशिश की है उसका आम जनता ने ''हम सब बंगाली हैं'' की एकजुट धर्मनिरपेक्ष भावना के साथ सामना किया है। वामदलों ने राष्ट्रीयनेताओं की परंपराओं को अपनाया और उनका व्यवहार में पालन किया। इसके चलते वामदलों ने अपने लिए नए सिरे से राष्ट्र की खोज की।
     एक जमाना था जब कम्युनिस्ट हर बात में अंतर्राष्ट्रीयतावादी भावनाओं को व्यक्त करते थे लेकिन आजादी के बाद क्रमशः उनमें यह समझ बनी कि देश के विकास के लिए राष्ट्रीयताबोध का पुख्ता बोध का होना जरुरी है। उन्होंने राष्ट्रीय महापुरुषों की इज्जत करना सीखा और उनकी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया। राष्ट्रीयता और कम्युनिस्ट पार्टी की अंतर्कियाओं को बुर्जुआ परंपराओं और नजरिए ने क्रमशःप्रभावित किया। यह भी कह सकते हैं बंगाली लिबरल परंपराओं ने कम्युनिस्ट कतारों को सीधे प्रभावित किया। इस क्रम में बंगाली समाज की मान्यताओं और परंपराओं के साथ अंतर्क्रियाएं भी आरंभ हुईं,फलतः कम्युनिस्टों ने बंगाली परंपराओं और रिवाजों को समझना और सामंजस्य बिठाना सीखा । खासकर खुले दिमाग की बंगाली और भारतीय मनोदशा ने कम्युनिस्टों में लिबरल आचार-व्यवहार के प्रति आकर्षण पैदा किया।देशज संस्कृति,जातीय परंपरा, खुला दिमाग और विवेकवाद ये चार चीजें कम्युनिस्टों को बंगाली समाज से विरासत में मिलीं और इसका कम्युनिस्टों ने आम जनता में जमकर प्रचार किया इससे समूचे समाज में धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली निर्मित करने में मदद मिली।      

       

सोमवार, 22 सितंबर 2014

जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन के बहाने नए बंगाल की तलाश



पश्चिम बंगाल में विगत कई सालों में जिस तरह की जड़ता,हताशा और पराजय भाव का जन्म हुआ है उसने सभी जागरुक लोगों को चिन्ताग्रस्त किया है। चिन्ताएं इसलिए भी बढ़ी हैं क्योंकि वामदलों की साख घटी है, जनसंघर्षों के प्रति संशय और संदेह का भाव बढ़ा है। मध्यवर्ग में कदाचार और हिंसाचार के प्रति सहिष्णुता बढ़ी है। विश्वविद्यालय-कॉलेजों में व्यापक आतंक और कदाचार बढ़ा है। शिक्षक-बुद्धिजीवी-संस्कृतिकर्मियों की इमेज धूमिल हुई है। उन पर हमले बढ़े हैं। शासकों में अन्याय-हिंसा –भ्रष्टाचार-बर्बरता की नग्न हिमायत ने जन्म लिया है। सभ्य बंगाल अब असभ्य और बर्बर प्रतीत होने लगा है !

सभ्य बंगाली अपने को बंगाली कहने में लज्जित महसूस करने लगे हैं। बंगाल में लंपटई,दबंगई,कु-संगति का आज जितना सम्मान है उतना सभ्यता का सम्मान नहीं रह गया है। बुद्धिजीवियों को कल तक ओपिनियनमेकर माना जाता था लेकिन आज उनकी आवाज को कोई सुन नहीं रहा। कल तक ज्ञानी-गुणी-बुद्धिजीवी-संस्कृतिकर्मी-कलाकार –शिक्षक आदि को गर्व की नजर से देखा जाता था लेकिन आज वह सब गायब हो चुका है। यही वह परिवेश है जिसमें राजनीति में वाम की पराजय हुई और ममता बनर्जी का उदय हुआ और उसके सत्तारुढ़ होते ही असभ्यता का चौतरफा विस्तार हुआ। ममता शासन की एक ही बड़ी देन असभ्यता-असभ्यता-असभ्यता।

ममता ने जिस समय वाम के खिलाफ मोर्चा संभाला था बंगाल असभ्यता के शिखर था। हर क्षेत्र में सभ्यता के मानक नष्ट करने का काम वाम ने किया और इसकी प्रक्रिया आंरंभ होती है ज्योति बसु के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के साथ। मुख्यमंत्री के तौर पर बुद्धदेव भट्टाचार्य का शासन असभ्यता के विकास का शासन है। उसकी स्वाभाविक परिणति ममता विजय में हुई। ममता ने वाम को राजनीति में हरा दिया लेकिन असभ्यता की मीनारों को तोड़ने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि स्वयं असभ्यता की मीनारों पर जाकर बैठ गयी। सभ्य बंगाल में असभ्यता की मीनारें किसने बनायीं और समूचा समाज असभ्यता के नागपाश में कैसे बंध गया यह अपने आपमें दिलचस्प है।

बंगाल में असभ्यता के आख्यान की नींव कांग्रेस ने 1972-77 के फासीवादी दौर में रखी,माओवादियों,कांग्रेस और माकपा ने उसमें पानी डाला,सींचा और पल्लवित किया। ममता ने उसकी समूची फसल को बेचा और खाया। ममता की भाषा,भंगिमा,राजनीति,सांगठनिक जनाधार आदि ने कुल मिलाकर असभ्यता के अनुकूल दिशा में राजकीय संरचनाओं को मोड़ दिया। आज असभ्यता से मुक्ति के नाम पर जो विकल्प आ रहा है वह है भाजपा जो असभ्यता का अजगर है। संक्षेप में देखें तो वाम असभ्यता का बिच्छू था,तृणमूल असभ्यता का साँप और भाजपा असभ्यता का अजगर है। जाहिर है कोई भी सभ्य विकल्प इन सबके परे जाकर ही निकल सकता है। यही वो परिदृश्य है जिसको केन्द्र में रखकर जादवपुर विश्वविद्यालय के मौजूदा छात्र आंदोलन को देखा जाना चाहिए। यह आंदोलन क्षयिष्णु वातावरण में आशा की किरण की तरह है। यह आंदोलन सफल होगा कि नहीं यह तो भविष्य में तय होगा । लेकिन एक बात तय है कि जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों ने स्त्री के अपमान और उत्पीडन के मामले को जिस दृढ़ता और आस्था के साथ उठाया है उसने नए बंगाल के निर्माण की नींव डाल दी है। इस आंदोलन के साथ बंगाल ने असभ्यता के खिलाफ प्रतिवाद की शुरुआत कर दी है। इस आंदोलन की खूबी है कि इसके केन्द्र में स्त्री उत्पीडन का मुद्दा है। सभ्यता के नए आख्यान के निर्माण के लिए यह बिंदु बेहद महत्वपूर्ण है। आंदोलनकारी छात्र सरकार बनाने या गिराने के लिए आंदोलन नहीं कर रहे हैं बल्कि स्त्री के सम्मान ,सुरक्षा और न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। स्त्री का बंगाल की राजनीति में मुद्दे के तौर पर केन्द्र में आना अपने आपमें बहुत ही मूल्यवान परिवर्तन का संकेत है। इस बिंदु से नए सभ्य बंगाल की संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं। जादवपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति आदि को हटाने की मांग तो इस मसले में ईंधन का काम कर रही है। जादवपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति द्वारा स्त्री उत्पीडन की घटना की उपेक्षा करना और उसे गंभीरता से न लेना एकसिरे गलत और निंदनीय कृत्य है। उपकुलपति यह भूल गए कि एक स्त्री के साथ उत्पीडन की घटना सामान्य रुटिन घटना नहीं है।उनका केजुअल और उपेक्षाभाव इस बात को भी दरशाता है कि बौद्धिकों में किस तरह की स्त्रीविरोधी मानसिकता घर कर गयी है। उपकुलपति के रवैय्ये को देखकर यही लगता है बंगाल का बौद्धिक वातावरण बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। यहाँ के बुद्धिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों में स्त्री के सम्मान और सुरक्षा के प्रति कोई सचेतनता नहीं बची है। दो सप्ताह से ज्यादा समय हो चुका है लेकिन बंगाल के तथाकथित बुद्धिजीवीवर्ग की आवाज और प्रतिवाद को हमने कहीं पर भी नहीं देखा। आखिरकार वे चुप क्यों हैं ? उनके सामने वे कौन सी बाधाएं जिनके कारण अपने चारों ओर होनेवाली असभ्यता की घटनाओं को मूकदर्शक की तरह देख रहे हैं और उनको कभी सड़कों पर प्रतिवाद करने का मन नहीं होता ! स्त्री की अवमानना और उत्पीडन की विगत तीन साल में सैंकड़ों घटनाएं हुई हैं लेकिन बुद्धिजीवी लंबी तानकर सोए हुए हुए हैं। बौद्धिकता का इस तरह का बेसुधभाव तो बंगाल ने कभी नहीं देखा !

     आज जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र दोपहर 12बजे आमसभा करने जा रहे हैं और वे अपने आंदोलन की भावी योजना बनाएंगे। हमें उम्मीद है कि वे सही दिशा में कदम उठाएंगे।वे लंबे समय से कक्षाओं का बहिष्कार कर रहे हैं, उन्होंने उपकुलपति का घेराव किया और उनके घेराव को पुलिस हस्तक्षेप के जरिए तोड़ा गया, छात्रों को पुलिसवालों ने निर्ममता से पीटा अनेक छात्र घायल हुए और इसके प्रतिवाद में हजारों छात्रों ने विशाल जुलूस निकाला और राज्यपाल को जाकर ज्ञापन दिया। इस समस्या के सम्मानजनक समाधान की दिशा में राज्य सरकार कोई प्रयत्न करती नजर नहीं आ रही। उलटे शिक्षामंत्री ने सबसे असभ्य बयान दिया है। उन्होंने कहा है जिन छात्रों को वीसी पसंद नहीं है वे जादवपुर विश्वविद्यालय छोड़कर अन्यत्र चले जाएं। हम इस बयान की निंदा करते हैं। साथ ही कहना चाहते हैं विश्वविद्यालय राज्य सरकार के शिक्षामंत्री और वीसी की जागीर नहीं है, यह छात्रों और बंगाल की संपदा है। शिक्षामंत्री भूल रहे हैं कि यदि जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र अपनी मांगों पर अड़ गए तो समूची ममता मंडली को बंगाल के बाहर भाड़े के घर खोजने होंगे। वे यह देख ही नहीं पा रहे हैं कि छात्रों के प्रतिवाद की अग्नि में बंगाल की असभ्यता धू धू करके जल रही है।

सोमवार, 16 जून 2014

मार्क्सवाद की दुखती रग

  कल पुराने मित्र कैसर शमीम साहब से लंबी बातचीत हो रही थी। वे मोदी के चुनाव में जीतकर आने के बाद से बेहद कष्ट में थे और कह रहे थे कि मैं तो सोच ही नहीं पा रहा हूँ कि क्या करुँ ? वे राजनीतिक अवसाद में थे। हमदोनों जेएनयू के दिनों से भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से जुड़े थे। वे जेएनयू में पार्टी में आए थे,मैं मथुरा से ही माकपा से जुडा हुआ था। कैसर साहब ने एक सवाल किया कि आखिरकार माकपा के सदस्य या हमदर्द भाजपा में क्यों जा रहे हैं ? माकपा का आपको पश्चिम बंगाल में क्या भविष्य नजर आता है ?  मैंने उनसे जो बातें कही वे आप सबके लिए भी काम आ सकती हैं इसलिए फेसबुक पर साझा कर रहा हूँ ।
     मैंने कैसर शमीम से कहा कि माकपा को पश्चिम बंगाल में दोबारा पैरों पर खड़ा होना बहुत ही मुश्किल  है। माकपा इस राज्य में समापन की ओर है। इसके कई कारण हैं जिनमें प्रधान कारण है माकपा का लोकतंत्र में हार-जीत के मर्म को न समझ पाना या समझकर अनदेखा करना।
     लोकतंत्र में चुनावी हार-जीत को हमें गंभीरता से लेना चाहिए। जो नेता हार गए हैं या जिन नेताओं के नेतृत्व में पार्टी हारी है वे आम जनता में घृणा के पात्र बन जाते हैं। पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य सिंगूर-नंदीग्राम की घटना के बाद घृणा के पात्र बनगए। उनको चुनाव अभियान का अगुआ बनाकर माकपा ने गलती की थी। यह सिलसिला जारी है।
    समूची जनता माकपा से जितनी नफरत करती थी वह नफरत उसने बुद्ध दा में समाहित कर दी ,यह सच है कि निजी तौर पर बुद्धदा बेहतर व्यक्ति हैं,सुसंस्कृत ईमानदार नेता हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि वे माकपा और वाममोर्चे के मुख्यमंत्री थे फलतः वे अपने प्रशासन के साथ अपनी पार्टी के अदने से कार्यकर्ता की भूलों के लिए भी जबावदेह थे। यही वजह है कि ईमानदार होने बावजूद वे आम जनता में घृणा के प्रतीक बन गए। यही हाल माकपा के राज्यसचिव विमान बसु का है। वे भी माकपा के घृणा प्रतीक बन गए, इसी तरह निचले स्तर पर अनेक नेता हैं जो आम जनता में घृणा के प्रतीक बन गए हैं। इनको पार्टी हटाने में असफल रही है।यही वजह है कि माकपा लगातार जनाधार खो रही है।
    कोई नेता घृणा प्रतीक क्यों बन जाता है ,यह बात तब तक समझ में नहीं आएगी जब तक हम आम जनता की हार-जीत की भावना को न समझें। लोकतंत्र में माकपा अकेला ऐसा दल है जो घृणा प्रतीकों को पार्टी के शिखर पर बिठाए रखता है। यह अकेला ऐसा दल है जिसकी पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीयसमिति में अधिकतर सदस्य वे हैं जो जनता में जाकर कभी चुनाव नहीं लड़े हैं।
   लोकतंत्र में चुनाव न लड़कर लोकतंत्र का संचालन करने की कला सर्वसत्तावादी कला है। इससे नेता का जनता के साथ लगाव के स्तर का पता नहीं चलता। आज वास्तविकता यह है कि माकपा के अधिकांश कमेटियों के मेम्बर या सचिव कहीं से नगरपालिका चुनाव तक जीतकर नहीं आ सकते। ईएमएस नम्बूदिरीपाद या ज्योति बसु इसलिए बड़े दर्जे के नेता थे क्योंकि उनकी जनता मेंजडें थीं।वे जनता में कई बार चुने गए।
     पश्चिम बंगाल और केरल से पार्टी की सर्वोच्च कमेटियों में  अधिकांश नेता चुनाव लड़कर अपनी वैधता को जनता में जाकर पुष्ट करते रहे हैं।
    लोकतंत्र में रहकर यह देखना ही होगा कि माकपा के किस नेता से जनता घृणा कर रही है ? पश्चिम बंगाल के प्रसंग में यह सबसे बड़ी असफलता है कि आम जनता जिन नेताओं से नफरत करती है वे अभी भी पार्टी पदों पर बने हुए हैं। जबकि ऐसे नेताओं को बिना किसी हील-हुज्जत के पार्टी की जिम्मेदारियों से मुक्त करना चाहिए।
     कैसर साहब ने यह भी पूछा था कि क्या वजह है कि माकपा के लोग भाजपा की ओर जा रहे हैं ? मैंने कहा कि इसके कई कारण हैं,इनमें पहला कारण है बंगाली जाति खासकर मध्यवर्गीय बंगाली की मनोदशा। इस वर्ग के लोग परंपरागत तौर पर सत्ताभक्त रहे हैं। उनका किसी विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है। अंग्रेजों के जमाने से सत्ताभक्त बंगालियों की समृद्ध परंपरा रही है और यह परंपरा आजादी के बाद और भी मजबूत हुई है। वामशासन में मध्यवर्गीय बंगाली वाम के साथ था ,लोग कहते थे कि यह वाम विचारधारा का असर है, मैं उस समय भी आपत्ति करता था और आज भी करता हूँ।
    बंगाली मध्यवर्ग मे बहुत छोटा अंश है जो वैचारिक समझ के साथ वाम के साथ है, वरना ज्यादातर मध्यवर्गीय बंगाली सत्ताभक्त हैं । वे वैचारिकदरिद्र हैं। इस वैचारिकदरिद्र बंगाली मध्यवर्ग में ममता सरकार आने के बाद भगदड़ मची और रातों-रात मध्यवर्ग के लोग कल तक ममता को 'लंपटनेत्री' कहते थे ,अब 'देवी' कहने लगे हैं। मोदी की विजय दुंदुभि ने भी उनको प्रभावित किया है और वे लोग भाजपा की ओर जा रहे हैं। भाजपा की मुश्किलें इससे बढ़ेंगी या घटेंगी,यह मुख्य समस्या नहीं है। मुख्य समस्या है कि मध्यवर्ग  के इस चरित्र को किस तरह देखें ?
      मध्यवर्गीय बंगालियों का एक बड़ा हिस्सा अब सीधे माकपा से दामन छुडाने में लगा है। मैं 2005 से माकपा में नहीं हूँ लेकिन मैं अब तक इस संगठन की यथाशक्ति मदद करता रहा हूँ। इसबार के लोकसभा चुनाव में भी चंदा दिया और और अन्य किस्म की मदद की। लेकिन जो लोग माकपा के स्तंभ कहलाते थे वे दूसरे पाले में नजर आए।
    माकपा के नेताओं में यह विवेक ही नहीं है कि वे लोकतांत्रिक भावनाओं, मूल्यों और अनुभूतियों के राजनीतिकमर्म को समझें। मैं विगत 15सालों से लगातार लिख रहा हूँ कि माकपा के नेतृत्व में वे लोग आ गए हैं जिनसे जनता नफरत करती है। मेरी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया क्योंकि वे चुनाव जीत रहे थे। वे जब चुनाव जीत रहे थे तब भी आम जनता में नेताओं का एक तबका घृणा का पात्र था और आज भी है। इनमें विमान बसु और बुद्धदेव का नाम सबसे ऊपर है।
    आम जनता में माकपा के नेताओं के असंवैधानिक क्रियाकलापों के कारण घृणा पैदा हुई है और इस अनुभूति को माकपा किसी तरह कम नहीं कर सकती।
     माकपा के पराभव का एक अन्य कारण है कि माकपा के वोटबैंक में तमाम किस्म के स्थानीय प्रतिक्रियावाद का शरण लेना। वोटबैंक राजनीति के कारण लोकल प्रतिक्रियावाद के खिलाफ कभी संघर्ष नहीं चलाया गया। लोकल प्रतिक्रियावाद के तार बाबा लोकनाथ से लेकर तमाम पुराने समाजसुधार संगठनों के सदस्यों के बीच में फैले हुए हैं। इसमें मुस्लिम प्रतिक्रियावाद भी शामिल है। तमाम किस्म की विचारधाराओं के साथ रमण करने वाली माकपा आजकल इन तमाम किस्म के प्रतिक्रियावादी नायकों के संगठनों के समर्थन के अभाव में अधमरी नजर आ रही है।इसके बावजूद एक तथ्य साफ है कि पश्चिम बंगाल में आम जनता में प्रतिक्रियावाद मजबूत हुआ है। भोंदूपन, अंधविश्वास और प्रतिगामिता में इजाफा हुआ है। इसका राज्य के वामदलों के विचारधारात्मक क्रियाकलापों की असफलता से गहरा संबंध है।
     प्रतिक्रियावाद आसानी से किसी भी विचारधारा में शरण लेकर रह सकता है और मौका पाते ही वो भाग भी सकता है या पलटकर हमला भी कर सकता है। मैं एक वाकया सुनाता हूँ। एक कॉमरेड थे बडे ही क्रांतिकारी थे एसएफआई के महासचिव या ऐसे ही पद पर थे ,राज्यसभा के लिए नामजद किए गए, हठात कुछ महिने बाद पाया गया कि वे भाजपा में  चले गए। मैंने पूछा कि भाईयो यह कैसी मार्क्सवादी शिक्षा है जो सीधे भाजपा तक पहुँचा देती है ? किसी के पास जबाव नहीं था। कहने का आशय यह कि माकपा की लीडरशिप से लेकर नीचे तक अनुदारवाद और कट्टरतावाद बड़ी संख्या में सदस्यों में रहा है। यही अनुदारवाद अब खुलकर भाजपा की ओर जा रहा है।
    एक अन्य चीज वह यह कि अनुदारवाद एक किस्म सामाजिक अविवेकवाद है जिसमें अपराधीकरण की प्रवृत्ति होती है।यह अचानक नहीं है कि माकपा का बड़े पैमाने पर अपराधीकरण हो गया और कोई देखने को तैयार नहीं है।
     मैं जब 1989 में पश्चिम बंगाल आया था तो बड़ी आशाओं के साथ आया था, पार्टी ब्रांच में बात हो रही थी कि कौन कहां काम करेगा, सब मेम्बर अपने तरीके से बता रहे थे कि मैं वहां काम करूँगा,यहाँ काम करुँगा, अधिकतर लोग अपने –अपने मुहल्ले में काम करने के लिए कह रहे थे, मैंने भी कहा कि मैं अपने मुहल्ले में पार्टी से जुड़कर काम करूँगा। उनदिनों कॉं.अनिल विश्वास पार्टी ब्रांच संभालते थे, वे यहां के मुख्यनेताओं में से एक थे, बाद में राज्य सचिव बने, पोलिट ब्यूरो में रखे गए। वे तुरंत बोले कि तुमको मुहल्ले में काम नहीं करने देंगे, मैंने पूछा क्यों ,वे बोले नीचे पार्टी में गुण्डे भरे हैं तुम देखकर दुखी होओगे और पार्टी से मोहभंग हो जाएगा।
   उल्लेखनीय है मेरी  शिक्षा की ब्रांच थी और उसमें सभी मेम्बर नामी लोग थे और लोकल थे,मैं अकेला बाहर से गया था,मेरे लिए अनिल विश्वास का बयान करेंट के झटके की तरह लगा, मैं काफी दिनों विचलित रहा और उन लोगों ने मुझे लोकल स्तर पर पार्टी से दूर रखा।
    कहने का आशय यह कि पार्टी के नेता जानते थे कि निचले स्तर पर किस तरह के अपराधी घुस आए हैं। इस घटना के कुछ दिन बाद कोलकाता एयरपोर्ट पर मेरी प्रकाश कारात से मुलाकात हुई हम दोनों एक ही फ्लाइट से दिल्ली आए, प्रकाश ने पूछा यहां की पार्टी कैसी लग रही है, मैंने अनिल विश्वास वाली बात कही तो वो चौंका लेकिन उसके पास मेरे सवालों का जबाव नहीं था ।मेरा सवाल था कि माकपा ने जान-बूझकर जनपार्टी बनाने के चक्कर में अपराधियों को पार्टी में क्यों रख लिया है ?  
    मेरे कहने का आशय यह है कि माकपा में अनुदारवाद, कट्टरतावाद और अपराधीकरण ये तीनों प्रवृत्तियां लंबे समय से रही हैं और पार्टी नेतृत्व इनसे वाकिफ रहा है। इन तीनों प्रवृत्तियों को पूंजीवाद के खिलाफ घृणा फैलाने की आड़ में संरक्षण मिलता रहा है।
     यह खुला सच है कि पश्चिम बंगाल में माकपा सबसे बड़ा दल रहा है और उसने पूरे राज्य में आम जनता के जीवन के हर क्षेत्र में वर्चस्व बनाकर रखा। राज्यतंत्र को पार्टीतंत्र में रुपान्तरित कर दिया, अब वही माकपा अपने बनाए ताने-बाने और ढाँचे से पीड़ित है क्योंकि सरकार में ममता आ गयी। ममता को विरासत में ऐसा तंत्र मिला जिसमें पार्टीतंत्र की जी-हुजूरी करने की मानसिकता पहले से ही भरी हुई थी।
        पश्चिम बंगाल में भाजपा के वोट बढ़ने का एक और बड़ा कारण है कि पश्चिम बंगाल के मूल निवासी बंगालियों का एक बड़ा हिस्सा जो कल तक माकपा के साथ था वह तेजी से भाजपा की ओर जा रहा है। साथ ही हिन्दीभाषी लोग एकमुश्तभाव से भाजपा की ओर जा चुके हैं। इन दोनों समूहों को भाजपा की ओर मोडने में बहुसंख्यकवाद और हिन्दीवाद ने मदद की है।इसबार के चुनाव में भाजपा ने बहुसंख्यकवाद और हिन्दीवाद का घर –घर मोदी प्रचार अभियान में इस्तेमाल किया है।                    

शनिवार, 17 मई 2014

पश्चिम बंगाल में वाम की पराजय के सबक

वामदलों और खासकर माकपा का बड़ा आरोप यह है कि पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर चुनावों में धांधली, बूथदखल आदि की घटनाएं हुई हैं। उनके कार्यकर्ताओं और पोलिंग एजेण्टों पर हमले हुए हैं,जिसके कारण वे यह चुनाव हारे हैं। इन आरोपों में एक हद तक सच्चाई है। लेकिन कई अन्य चीजें भी हैं जिनको देखने की जरुरत है। मसलन्, वामदलों ने पश्चिम बंगाल में आधे मन से चुनाव लड़ा। कहीं पर कोई नारेबाजी नहीं,पोस्टर-बैनर आदि नहीं। कहीं पर प्रभावशाली दीवार लेखन नहीं । कोई नया नारा नहीं। कार्यकर्ताओं में कोई खास उत्साह नहीं। उनको देखकर यही लग रहा था की माकपा अपनी पराजय मानकर चल रही है और किसी दैवीय चमत्कार की उम्मीद में  चुनाव लड़ रही है। 
    यह सच है कि माकपा पर बेशुमार हमले हुए हैं लेकिन माकपा अपने सदस्यों की रक्षा नहीं कर पा रही है। यदि चुनाव आधे मन से लडना था या चुनावों में भयानक धांधली हुई है तो माकपा ने चुनावों का बहिष्कार क्यों नहीं किया ? जब चुनाव आयोग ने धांधली के आरोप नहीं माने तब तो माकपा चुनावों के बहिष्कार का निर्णय ले ही सकती थी। 
   लोकसभा के चुनाव परिणाम बताते हैं कि वामदलों का हिन्दीभाषियों और मुसलमानों के अलावा बंगालियों में भी जनाधार तेजी से खत्म हो रहा है। हिन्दीभाषी लोग और मुसलमान तो तकरीबन माकपा और वामदलों का साथ छोड चुके हैं। हिन्दीभाषी एकमुश्त भाजपा के साथ जा चुके हैं ,जबकि मुसलमानों में बहुत बड़ा अंश तृणमूल कांग्रेस के साथ जा चुका है।

इस बार के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 34,भाजपा 2 , वाममोर्चा 2 और कांग्रेस को 4 सीटें मिली हैं। माकपा की सबसे बड़ी कमी यह है कि उसने हरामखोर और भ्रष्टनेताओं को अभी तक पार्टी पदों से मुक्त नहीं किया है। जो नेता पार्टी अनुशासन भंग करने और जनता को कष्ट देने के लिए सीधे ज़िम्मेदार हैं उनको दल के पदों से हटाया नहीं गया है। साथ ही पार्टी में लिबरल मूल्यों के प्रति शत्रुताभाव है। 
    माकपा के अधिकांश नेतागण सामंती भावबोध में जीते हैं और सत्ता का सामंती तौर तरीक़ों के ज़रिए संचालन करते रहे हैं और पार्टी का भी उसी तरह संचालन करते रहे है। सामंती भावबोध को जनता नापसंद करती है। इसके अलावा पार्टी पर अपराधीकरण के भी आरोप लगे हैं और इसमें शामिल नेतागण पार्टी में बने हुए हैं । इन सबके कारण पार्टी की जनता की नजरों में कोई इज्जत नहीं रह गयी है। ऐसी स्थिति में माकपा कोई सही आरोप भी लगाती है तो आम जनता उस पर विश्वास नहीं करती। किसी भी दल का जनता का विश्वास खोना बड़ी त्रासदी है।
      ऐसी स्थिति में ममता बनर्जी को वाम के जनाधार तो अपने साथ करने और सारी धांधलियों-हिंसाचार आदि के बावजूद जीत हासिल करने के लिए कोई खास परिश्रम नहीं करना पडा।उसे बेशुमार वोट मिला है। समूचे वोट को चुनावी धाँधली कहकर दरकिनार नहीं कर सकते। माकपा नेताओं की लोकतंत्र भंजक इमेज अभी जनता में घर किए हुए है। ऐसे में माकपा और वाम के निरंतर पराभव को रोकना संभव नहीं है।पश्चिम बंगाल में भाजपा को अभूतपूर्व 17फीसदी वोट मिले हैं जबकि कांग्रेस को 9फीसदी वोट मिले हैं।प.बंगाल में तृणणूल कांग्रेस को 39 फीसदी से ज्यादा वोट मिले हैं जबकि माकपा को 24 फीसदी वोट मिले हैं।





शुक्रवार, 2 मई 2014

कॉमरेड ! लोकतंत्र बिना बलिदान के नहीं बचेगा !



पश्चिम बंगाल गंभीर संकट में है। लोकसभा के तीसरे चरण के मतदान के समय वामदलों का चुनाव को लेकर जो रवैय्या रहा है वह चिंता की बात है। यह सच है कि तीसरे चरण में 9लोकसभा सीटों पर बड़े पैमाने पर जाली वोट डाले गए,मतदान केन्द्रों पर चुनाव एजेंट बिठाने में वामदलों की असुविधा हुई।मतदाताओं को घरों से नहीं निकलने दिया गया। बड़े पैमाने पर हिंसा हुई,कई लोग मारे गए। इसके बावजूद यह सच है कि वामदलों और खासकर माकपा का इसबार के लोकसभा चुनाव को लेकर जो रुख सामने आया है वह किसी भी तरह से स्वागतयोग्य नहीं है।
            ममता सरकार आने के पहले से ही माकपा में राजनीतिक निष्क्रियता आ गयी थी, जिसको केन्द्रीय नेतृत्व ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। ममता सरकार आने के बाद माकपा के सदस्यों और हमदर्दों पर तृणमूल के गुण्डों के हमले बढ़े हैं। ये हमले वामशासन में भी हो रहे थे जिनको रोकने की कभी कोशिश नहीं की गयी और ईंट का जबाव पत्थर से देने के चक्कर में सारे राज्य को एक ऐसी अंधी प्रतिस्पर्धा में झोंक दिया गया जिसमें से यह राज्य अभी तक निकल ही नहीं पाया है।
        ममता सरकार आने के बाद माकपा ने व्यवहार में एक नीति अख्तियार की है कि ममतावाहिनी जहां हिंसा करे वहां से हट जाओ, यदि वह पोलिंग बूथ पर हिंसा करे तो वहाँ से हट जाओ, यदि वह गली-मुहल्ले , बस्ती इलाके या गांव में हिंसा करे तो वहां से हट जाओ। यानी हिंसा देखो और हट जाओ। यह नीति बुनियादी तौर पर माकपा के अंदर पैदा हुए पराजयबोध की देन है।
     इसका पहला साइड इफेक्ट यह है कि कई सौ माकपा सदस्य मारे गए हैं और हजारों लोगों को घर छोड़कर अन्यत्र रहना पड़ रहा है।माकपा सदस्यों में खास किस्म का पलायनबोध पैदा हुआ है।
     हिंसा का प्रतिकार भागकर नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में माकपा ने जो जगह बनायी है वह पलायन करके नहीं बनायी है। माकपा को भागने की बजाय सामना करने और लोकतंत्र की रक्षा के लिए जान देने की भावना से काम लेना होगा।
      लोकतंत्र को बचाना है तो हिंसा का दृढ़ता के साथ सामना करना होगा। विगत दिनों हुए छात्रसंघ चुनावों में एसएफआई ने जिस तरह पलायनवादी रुख अख्तियार किया उससे छात्र आंदोलन की अपूरणीय क्षति हुई है। हिंसा से अपने सदस्यों को बचाने के नाम पर छात्रसंघों को ममतावाहिनी के हवाले कर दिया गया, अधिकांश स्थानों पर वे बिना चुनाव के ही जीत गए।
    यह दुर्भाग्यजनक है कि जिस संगठन के लाखों सदस्य हों वो छात्रसंघ के चुनावों में मैदान से इसलिए हट जाय क्योंकि हिंसा हो रही है।यही हाल ग्राम पंचायतों के चुनावों में हुआ है।
 कॉमरेड, हिंसा को आप पलायन करके नहीं रोक सकते। हिंसा को रोकने के लिए जरुरी है कि उसका डटकर सामना किया जाय। दुखद बात यह है कि पलायन करके भी एसएफआई अपने सदस्यों पर हमले रोक नहीं पायी और अनेक सदस्य मारे गए।
   लोकतंत्र में पीठ पर गोली मत खाओ,सीने पर गोली खाओ। घर में या गली में हिंसकों के हाथों मत मरो, पोलिंग बूथ की रक्षा करते हुए मरो।
   पश्चिम बंगाल की यह नियति है कि यहां यदि वामदलों को लौटना है तो उनको पोलिंग बूथों की रक्षा करते हुए ,यूनियन का चुनाव लड़ते हुए,लोकतंत्र के मुहानों पर जान देनी होगी।
    पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र महज विमर्श का विषय नहीं है बल्कि यह अपराधी गिरोहों की शरणस्थली बन चुका है। लोकतंत्र को बचाना है तो अपराधी गिरोहों से सीधे मुठभेड़ करनी होगी। छिप छिपकर लड़ना और पिटनाबंद करना होगा।
     पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र कॉमरेडों की कुर्बानी मांग रहा है। कुर्बानी के बिना पश्चिम बंगाल को अपराधीकरण से बचाना संभव नहीं है। पश्चिम बंगाल में असाधारण परिस्थितियां हैं। यहां पर सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों के लिए वैध रास्तों पर अपराधी गिरोहों ने कब्जा जमा लिया है।अपराधी गिरोहों को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद करने के लिहाज से कमर कसनी होगी वरना पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र को बचाना संभव ही नहीं होगा।
    अभी भी समय है अगले दो चरणों के मतदान में मतदान केन्द्रों पर जाकर मोर्चा लेने की जरुरत है। कायरों की तरह जीने से बेहतर है कि मतदान केन्द्रों पर जाओ और वोट दो, वोट डलवाओ,काम करो और कोई रोके या डराए तो मतदान केन्द्र पर ही जान दो, मरो,पिटो लेकिन मतदान केन्द्र मत छोड़ो। मतदान केन्द्र आज वोट के साथ कॉमरेडों का बलिदान भी चाहता है। कॉमरेड , लोकतंत्र बिना बलिदान के नहीं बचेगा।   

रविवार, 10 मार्च 2013

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का दिल जीतने में जुटी ममता सरकार


     
       पश्चिम बंगाल का बजट आनेवाला है और राज्य का आर्थिक संकट गहरा हो गया है।नियमानुसार कोई राज्य अधिकतम जितना रूपया उधार ले सकता है उस सीमा तक ममता सरकार उधार ले चुकी है। आज स्थिति यह है कि राज्य को यदि किन्ही कारणों से जरूरत पड़े तो बैंक से लेकर बाजार तक कोई कर्ज नहीं मिल सकता। पिछले साल अक्टूबर2012 में राज्य सरकार के कर्मचारियों आदि की तनख्बाह –पेंशन आदि देने के लिए 45दिन के लिए 4000 हजार करोड़ का कर्ज लिया था। पिछले साल रिजर्व बैंक ने कर्ज के नियमों में दोबार ढ़ील देकर राज्य को 22,423करोड़ रूपये का कर्ज दिया। सन् 2012-13 के बजट दस्तावेज के अनुसार राज्य की कर से होने वाली अनुमानित आय 76,943करोड़ रूपये और व्यय 83,801 करोड़ रूपये आंका गया है। यानी अनुमानित बजट घाटा 6,585करोड़ रूपये का आंका गया है। लेकिन सन् 2013-14 में यह घाटा बढ़ जाने की संभावनाएं हैं। इसके अलावा राज्य पर इस साल कर्ज की रकम 2.26लाख करोड़ हो जाएगी। फलतःभारत के कर्जगीर राज्यों में उसका नाम सबसे ऊपर आ गया है। मार्च 2012 तक पश्चिम बंगाल के ऊपर 2,08,382 करोड़रूपये का कर्ज था मूलधन और ब्याज चुकाने के लिए उसे सालाना 23,199 करोड़ रूपये का भुगतान करना होगा। ममता के शासन में आने के बाद कर वसूली में सुधार आया है लेकिन राज्य सरकार की फिजूलखर्ची कम नहीं हुई है। इसके अलावा छठे वेतन आयोग का राज्य कर्मचारियों का एरियर का पैसा अभी तक नहीं मिला है। इसके कारण राज्य कर्मचारियों में क्षोभ बढ़ता जा रहा है। राज्य कर्मचारियों के ऊपर सरकार का दबाव है कि अपनी वफादारी वाम यूनियनों के प्रति खत्म करें और इंटक(तृणमूल कांग्रेस) के साथ अपने को जोड़ें। इसके अलावा राज्य सरकार 'मनरेगा' योजना को क बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में लागू करने जा रही है। ममता की यह चिन्ता है कि किसी भी तरह राज्य कर्मचारियों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का भरोसा हासिल किया जाय. यही वजह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आनेवाले दिनों में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा संचालित  'मनरेगा' स्कीम को हथियार बनाने जा रही है। टीएमसी नेतृत्व का मानना है कि 'मनरेगा' योजना में दैनिक मजदूरी पानेवाले मजदूरों की दैनिक मजदूरी बढ जाती है तो वे इसे वाम के खिलाफ प्रचार में इस्तेमाल कर सकते हैं और इसी मंशा के तहत  पश्चिम बंगाल के 'मनरेगा' योजना में काम करने वाले मजदूरों की दैनिक पगार को प्रतिदिन 136रूपये से बढ़ाकर 151रूपये कर देने के प्रस्ताव को केन्द्र सरकार ने मान लिया है। 'मनरेगा' के मजदूरों की पगार में की गयी इस वृद्धि को ममता सरकार अपनी ओर से मजदूर हितैषी उपलब्धि के रूप में प्रचारित करने जा रही है। यह पगारवृद्धि एक अप्रैल 2013 से लागू होगी।
    ममता का मानना है यदि 'मनरेगा' को ठीक से लागू कर दिया जाय और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में इसे एक उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जाय तो मजदूरों के बड़े हिस्से को वाममोर्चे से विमुख किया जा सकता है। अब देखना यह है कि क्या 'मनरेगा' के मजदूरों की पगार में की गयी बढोत्तरी से ममता के वोट बैंक में कोई इजाफा होता है या नहीं ?
      उल्लेखनीय है कि वाममोर्चे के शासन के दौरान दो बार 'मनरेगा' मजदूरों की पगार बढ़ायी गयी थी लेकिन वामशासन इस स्कीम को लागू करने में असफल रहा। ममता सरकार में पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री सुब्रत मुखर्जी को यह दायित्व सौंपा गया है कि वे 'मनरेगा' योजना के जरिए ममता का जनाधार बढाएं। पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने अप्रैल2012 के बाद से 'मनरेगा' की मजदूरी बढ़ाने के लिए केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय को 9 पत्र लिखे थे ,इसके पहले केन्द्र सरकार ने 'मनरेगा' मजूरी को एक अप्रैल 2012 से 130रूपये से बढ़ाकर 136 रूपये कर दिया था जिससे ममता सरकार खुश नहीं थी ,इसके बाद से राज्य के पंचायतमंत्री ने मजदूरी बढ़ाने के लिए 9पत्र लिखे। इन पत्रों के जबाव में पिछले सप्ताह केन्द्र सरकार ने उनको सूचित किया कि पश्चिम बंगाल में 'मनरेगा' मजदूरों की मजदूरी 136रूपये से बढ़ाकर 151रूपये की जाती है। इस बढोत्तरी को राजनीतिक हलकों में कांग्रेस के खिलाफ दबाव की राजनीति के रूप में देखा जा रहा है वहीं पर राज्य कांग्रेस अध्यक्ष ने इस तरह के किसी दबाव से साफ इंकार किया है।जबकि इस मजदूरी का कृषि मजदूरों के लिए 2011 के आधार पर निर्धारित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और महंगाईभत्ते की दर से संबंध है। मजूरी कम से कम कितनी दी जाय यह तय है लेकिन अधिकतम की सीमा तय नहीं है। ममता शासन में 'मनरेगा' मजदूरी में 15रूपये की वृद्धि हुई है। लेकिन वामशासन के दौरान सन् जनवरी 2010 में 25 रूपये और जनवरी 2011 में 30रूपये की बढोत्तरी हुई थी।सामान्यतौर पर पश्चिम बंगाल में न्यूनतम दैनिक पगार 67 रूपये सन् 2005-06 में तय की गयी थी।
     उल्लेखनीय है कि 'मनरेगा' स्कीम में काम करने वाले मजदूरों को 9 राज्यों और 3 केन्द्रशासित क्षेत्रों में पश्चिम बंगाल से ज्यादा मजदूरी मिलती है।

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

असत्य- सत्य के भाषायी खेल में फंसी ममता

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी असत्य-सत्य के खेल में फंस गयी हैं। वे मंच पर भाषा में खेलती हैं और बाद में फंसती हैं। भाषाखेल खतरनाक होता है , अमूमन इसमें फंसने का खतरा होता है। ममता जब मंच से बोलती हैं तो यह भूल जाती हैं वे मुख्यमंत्री हैं। ममता यह भी भूल गयी हैं कि वाममोर्चे के अत्याचारों से तंग आकर लोगों ने बड़ी आशाओं के साथ उनको जिताया था और यह सोचा था कि उनके नेतृत्व में राज्य सरकार लोकतांत्रिक मान-मर्यादाओं का पालन करते हुए काम करेगी। राज्य में कानून-व्यवस्था का शासन स्थापित होगा। मस्तानों-दादाओं के राज की विदाई होगी। लेकिन ममता बनर्जी की अराजक कार्यशैली ने इन सपनों को नष्ट किया है। आमलोगों में तेजी से असंतोष पैदा हुआ है। एकवर्ग अभी भी ममता से आस लगाए बैठा है कि वे अपनी कार्यशैली को सुधारें। लेकिन ममता का निरंकुश मन नियंत्रण में काम करने को तैयार नहीं लगता। 

आज से दो साल पहले ममता राज्य के लोगों का सुंदर सपना थीं और इनदिनों वे दुःस्वप्न की तरह लग रही हैं।पहले उनके भाषण को लोग टीवी पर मन लगाकर सुनते थे ,इनदिनों उनका भाषण ज्योंही टीवी पर आता है दर्शक चैनल बदल लेते हैं।

ममता भूल गयी हैं कि मुख्यमंत्री के तंत्र का सारा हिसाब विभिन्न खातों में दर्ज होता है। वे पहले तृणमूल कांग्रेसनेत्री थीं, वे स्वतंत्र थीं मनमाने काम करने के लिए। वे स्वतंत्र थीं मनमाने ढ़ंग से खर्च करने को। लेकिन मुख्यमंत्री के पास यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। मुख्यमंत्री के पास अबाध अधिकार हैं लेकिन इन अधिकारों के उपयोग-दुरूपयोग का हिसाब रहता है। उनकी हर गतिविधि खाते में दर्ज होती है । उनके काम का अन्य संस्थाएं मूल्यांकन करती हैं। यही वह बिन्दु है जहां ममता फंस गयी हैं। वे राज्य सरकार के कामकाज को अपने दल के कामकाज की तरह चला रही हैं। वे भूल कर रही हैं कि दल में वे सर्वेसर्वा हैं लेकिन मुख्यमंत्री के नाते वे जनता की नजरों में,विपक्ष की नजरों में ऑडीटरों की नजरों में कैद हैं।इनलोगों की सख्त जांच-परख के सामने उनके सारे भाषाखेल की परतें जल्द ही खुल जाती हैं।

ममता और उनके दल को यह भी ध्यान रखना होगा कि असत्य के पैर नहीं होते। असत्य हमेशा निराधार होता है। असत्य को यदि मीडिया या आमसभाओं में बार बार दोहराया जाएगा इससे तालियां मिल सकती हैं,कवरेज मिल सकता है लेकिन सत्य की सृष्टि नहीं हो सकती।

असत्य को यदि राजनीति में विरोधी को परास्त करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इसमें येन-केन प्रकारेण सफलता मिल जाती है तो एक अवधि के बाद आमलोग असत्य को समझ जाते हैं और फिर से सत्य की खोज करने लगते हैं। जिस तरह असत्य का आधार नहीं होता उसी तरह सत्य कभी निराधार नहीं होता। असत्य और सत्य का यह खेल अंततःसत्य को प्रतिष्ठित करता है।

ममता सरकार में कुछ मंत्री हैं जो लगातार असभ्यभाषा का बोल रहे हैं। इनमें मदनमित्र,बेचाराम मन्ना,ज्योतिप्रिय मल्लिक आदि प्रमुख हैं। यह अभी तक रहस्य बना हुआ है कि तृणमूल कांग्रेस के अधिकांश कार्यक्रमों में इन तीनों मंत्रियो को ही क्यों बुलाया जाता है ?

ममता के असत्य प्रचार के जबाब में माकपा ने हमले तेज कर दिए हैं। ममता को यह बात समझनी ही होगी कि जनता के मन को सत्य से जीतते हैं असत्य से नहीं। वाममोर्चे के विगतशासन में आमलोग बेहद कष्ट में थे जिसके कारण वाममोर्चा बुरी तरह चुनाव हारा । लेकिन इस जीत को ठोस सत्य का आवरण पहनाने में ममता असफल रही हैं। वे भूल गयीं कि मुख्यमंत्री झूठ नहीं बोल सकता। उसकी निगरानी होती है। उस पर कई अंकुश लगे हैं। ममता अपने अंदर झांककर देखें कि उनसे कहां गलती हो रही है।

ममता ने सत्ता संभालते ही राज्य की अर्थव्यवस्था के बारे में आम लोगों से सत्य नहीं बोला। राज्य की अर्थव्यवस्था के बारे में उनके बताए सारे आंकड़े और दावे सही नहीं हैं। अर्थव्यवस्था के बारे में असत्य कहने से उनकी राजनीतिक साख ही खतरे में पड़ गयी है। उनका मानना है राज्य में अर्थसंकट है और केन्द्र उनकी मदद नहीं कर रहा। विगत वामशासन ने राज्य की अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया और सरकार के पास एक भी पैसा नहीं है।

वामशासन में लंबे समय तक वित्तमंत्री रहे असीमदास गुप्ता ने इस संदर्भ में जो तथ्य पेश किए हैं उनकी रोशनी में ममता के दावों में दम नजर नहीं आता। असीमदास गुप्ता का मानना है राज्य की सकल आय 100366 करोड़ रूपये है और सकल खर्चा है 100375 करोड़ रूपये। यह आंकड़ा ममता सरकार के वित्तमंत्री ने 2012-13 के राज्य बजट में विधानसभा में पेश किया है। इस तथ्य से ममता के दावे का खण्डन होता है।

ममता सरकार की अराजक कार्यशैली के कारण विभिन्न विकास प्रकल्पों के लिए धन का अबाध फ्लो बाधित हुआ है। मसलन् विकास प्रकल्पों के लिए जो धन पहले दिया गया है उसके खर्चे का ब्यौरा जब तक संबंधित विभाग में जमा नहीं होता तब तक अगली किश्त जारी नहीं होती। ऐसी स्थिति में विकास प्रकल्प बंद पड़े हैं। ममता सरकार की अकर्मण्यता है कि विभिन्न विभागों में खर्चे का हिसाब जमा नहीं हो पा रहा । इसमें पुराने वामशासन की कोई भूमिका नहीं है। केन्द्र सरकार की विभिन्न योजनाओं के लिए आवंटित धन की भी यही स्थिति है।

अधिकांश केन्द्रीय योजनाएं ठप्प पड़ी हैं क्योंकि आवंटित धन का राज्य सरकार इस्तेमाल ही नहीं कर पा रही है। मसलन् राज्य के पिछड़े इलाकों के विकास के लिए केन्द्र सरकार ने 8,756 करोड़ रूपये सन् 2011 सत्र के लिए आवंटित किए थे।लेकिन राज्य सरकार इस पैसे का इस्तेमाल ही नहीं कर पायी। इस योजना के 2500 करोड़ रूपये की पहली किश्त सन् 2012 की जनवरी में आई थी लेकिन इनके खर्चे का हिसाब अभी तक केन्द्र सरकार को नहीं भेजा गया है।

असल में इस योजना के लिए आवंटित धन को राज्य सरकार समुचित ढ़ंग से खर्च करने में असफल रही है। पिछली आवंटित राशि के बिल जमा किए बगैर ममता सरकार ने अगली किश्त के तौर पर कुछ माह पहले मात्र 750 करोड़ रूपये की मांग की है। जाहिरातौर पर केन्द्र यह राशि नहीं दे सकता ,क्योंकि पहले जो धन दिया है उसका हिसाब अभी तक सरकार ने नहीं दिया है।




मंगलवार, 15 जनवरी 2013

विकास के नए सपने की तलाश में ममता


           
पन्द्रह जनवरी2013 को ममता सरकार हल्दिया में अपने माथे पर निरूद्योगीकरण के कलंक के टीके को मिटाना चाहती है और नई उद्योगनीति की घोषणा करने वाली है। इस नीति को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इनदिनों बेहद परेशान हैं। उनकी मुश्किल यह है कि उनको एक साथ अपने सांस्कृतिक और माओपंथी मित्रों को खुश करना है तो दूसरी ओर पूंजीपतियों काभी दिल जीतना है।
    हल्दिया में आने वाली नई उद्योगनीति के बारे में ममता के करीबी सूत्रों का कहना है सन् 1994 की वामशासन में बनी नीति की बुनियादी धारणाओं में कोई बदलाव ममता सरकार नहीं करने जा रही है। हो सकता है कपड़ा ,चाय और जूट उद्योग के लिए कुछ नए नीतिगत प्रस्ताव घोषित कर दिए जाएं।
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी बाधा यह है सत्तारूढ़ होने के बाद उनकी मीडिया में रेटिंग तेजी से गिरी है। इन दिनों मीडिया में उनकी साख सबसे नीचे है। मीडिया में साख उठे इसके लिए जरूरी है कि पूंजीपतियों का दिल जीता जाय और राज्य में पूंजी निवेश का माहौल बनाया जाय। बेकार नौजवानों में तेजी से असंतोष बढ़ रहा है। इस असंतोष के कारण राज्य में अपराधों में तेजी आई है। ममता के दल की गुटबाजी और आपसी झगड़े हर जिले में समस्या बन गए हैं और पुलिस सक्रिय हस्तक्षेप नहीं कर पा रही है। इसके कारण राज्य में पूंजीपतियों में पूंजी निवेश का माहौल नहीं बन पा रहा है।  
   पिछले दो सप्ताह में राइटर्स बिल्डिंग में मुख्यमंत्री और उद्योगमंत्री के साथ राज्य के व्यापारियों की कई बैठकें हुई हैं. लेकिन किसी भी बैठक में खुलकर यह बात सामने नहीं आई कि राज्य सरकार नया क्या करने जा रही है। नए को रहस्य बनाकर रखने की नीति पर राज्य के व्यापारी खुश नहीं हैं। व्यापारियों के साथ जिस तरह की ठंड़ी मीटिगें हुई हैं उनके अनुभव के आधार पर फिक्की के एक पदाधिकारी ने कहा कि ममता सरकार में उद्योग जगत को आकर्षित करने की इच्छाशक्ति का अभाव है।
     आगामी 15-17 जनवरी के बीच हल्दिया में व्यापारियों को रिझाने के लिए ‘बंगाल लीडस सम्मिट’ हो रही है। उल्लेखनीय है कि ममता सरकार को आए दो साल गुजर चुके हैं लेकिन राज्य में औद्योगिक हलचल कहीं पर भी नजर नहीं आ रही। ममता बनर्जी ने सत्ता संभालने के साथ जिस गति से काम करने का वायदा किया था उसकी दूर-दूर तक झलक नजर नहीं आ रही। हल्दिया सम्मेलन में 15 जनवरी को उम्मीद की जा रही है कि सरकार नई उद्योग नीति लेकर आएगी।
     ममता के करीबी सूत्रों के अनुसार राज्य के उद्योगमंत्री ने व्यापारियों के संगठनों के सामने उद्योग नीति का जो मसौदा पेश किया था। उसमें व्यापारियों के हितों की एकसिरे से उपेक्षा की गयी थी। इस मसौदे में नई नीति जैसी कोई बात नहीं रखी गयी। राज्य सरकार की बैठकों में चेम्बर ऑफ कॉमर्स और फिक्की के द्वारा दिए गए सुझावों में से अधिकांश सुझावों पर ममता सरकार का ठंडा रूख था।  नई नीति में संभावना है कि राज्य सरकार भूमिबैंक के जरिए उद्योगों के लिए जमीन लेने पर जोर दे। इसके अलावा जमीन की खरीददारी में व्यापारियों की मदद न करने की भी घोषणा आ सकती है। व्यापारियों का मानना है कि राज्य सरकार यदि दर्शक रहेगी तो राज्य में पूंजी निवेश नहीं होगा। राज्य सरकार को सक्रिय एजेंट के रूप में हस्तक्षेप का मन बनाना चाहिए।
  फिक्की के एक पदाधिकारी ने कहा कि इनदिनों जो उद्योगनीति चल रही है उसे वाममोर्चा सरकार ने 1994 में बनाया था और यह नीति राज्य के विकास में कोई खास योगदान नहीं कर पायी।
     पश्चिम बंगाल के व्यापारियों  का मानना है कि राज्य सररकार के मन में रहीं न कहीं पूंजीपति विरोधी भावनाएं गहरे जड़ें जमाए बैठी हैं। इसके कारण राज्य की ओर व्यापारीवर्ग आना नहीं चाहता। ममता की इच्छा है कि राज्य में पूंजीपति वैसे ही निवेश करें जिस तरह वे गुजरात में निवेश करते हैं। वे विकास के मामले में गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी को अपना आदर्श मानती हैं। लेकिन उनकी मुश्किल यह है कि पूंजीपति उन पर भरोसा नहीं करते। इसके विपरीत मोदी पर भारत के पूंजीपति भरोसा करते हैं। मोदी ने कभी भी उद्योगपति विरोधी रूख अख्तियार नहीं किया। चेम्बर ऑफ कॉमर्स के एक प्रतिनिधि का कहना है कि ममता बनर्जी यदि अपने पुराने राजनीतिक मनोभावों को बदल लेती हैं और खुलकर भूमि की खरीद में व्यापारियों की मदद करें और निचले स्तर पर दादाओं पर नियंत्रण स्थापित करती हैं तो राज्य में औद्योगिक माहौल फिर से चंगा हो सकता है। ममता बनर्जी के शासन में आने के बाद से कानून-व्यवस्था की स्थिति में गिरावट आई है। कम से कम इसे तो वे तत्काल रोकें।
   एक अन्य व्यापारी ने कहा कि ममता को एक नए यूटोपिया को खड़ा करने की जरूरत है। राज्य के औद्योगिक विकास के यूटोपिया का होना जरूरी है। पश्चिम बंगाल में किसी भी किस्म की आशाओं के संचार की संभावनाएं दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही हैं। ऐसी स्थिति में हमें नीति से भी ज्यादा जरूरी है आशाओं के नए संकेतों की और ये संकेत राज्य सरकार के मंत्रियों के व्यवहार में झलकने चाहिए। 
     

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

राजारहाट –न्यूटाउन के प्रति ममता की बेरूखी


मुख्यमंत्री ममता बनर्जी धीरे धीरे समझ रही है कि उनके हाथ से समय निकलता जा रहा है। वे अपने सांगठनिक पचड़ों और अपनी पुरानी राजनीतिक मनोदशा के जंजाल से मुक्त होने के बारे में नए सिरे से संगठित होने की कोशिश कर रही हैं। इस कोशिश के क्रम में उन्होंने विगत सोमवार को शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर समिति के अफसरों ,उद्योगपतियों और भवन निर्माताओं के प्रतिनिधियों के साथ मीटिंग की। पश्चिम बंगाल के शहरों में शहरी सुविधाओं का व्यापक अभाव है। राज्य के शहरों से जुड़े इलाकों में सामान्य शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर की न्यूनतम सुविधाओं का अभाव आज एक ठोस वास्तविकता है। मुख्यमंत्री के साथ हुई इस बैठक में शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारियों के अलावा भवन निर्माताओं के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया था। 

भवन निर्माताओं ने मुख्यमंत्री से शहरी लैण्डशिलिंग एक्ट को तुरंत समाप्त करने की मांग रखी और कहा कि देश के अधिकांश शहरों में यह कानून खत्म किया जा चुका है लेकिन कोलकाता में अभी तक यह खत्म नहीं हुआ है। इस कानून के कारण भवन निर्माण के क्षेत्र में तेजी लाने में मुश्किलें आ रही हैं। साथ ही नए पूंजी निवेश का मार्ग भी रूका हुआ है। कई भवननिर्माताओं ने राजारहाट-न्यूटाउन में सिंडीकेट की दादागिरी का मसला भी उठाया और यह कहा कि मुख्यमंत्री के सिंडीकेट के खिलाफ बयान दिए जाने के बाबजूद सिंडीकेट की दादागिरी कम नहीं हुई है। मुख्यमंत्री ने इनलोगों की बातों को गंभीरता से सुना और तुरंत कार्रवाई का वायदा किया। उल्लेखनीय है कि यह मीटिंग हाल में सम्पन्न बंगाल विल्ड कॉन्क्लेव के अग्रिम कदम के तौर पर बुलाई गई थी।

राजारहाट न्यूटाउन के प्रसंग में कई प्रमुख तथ्य हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। पहली सच्चाई यह है कि इस नए शहर में सिंडीकेट का आतंक है। सिंडीकेट के बिना कोई काम नहीं किया जा सकता। सिंडीकेट की दादागिरी ममताशासन आने के बाद पैदा नहीं हुई है बल्कि यह वामशासन के दौर में ही इसका जन्म हुआ था। सिंडीकेट दादाओं ने वामपंथी शासकों से लेकर ममता शासन तक सबको ठेंगा दिखाकर रखा है और इस इलाके में उनकी समानान्तर सत्ता है। इसका समूचे इलाके के विकास पर बुरा असर पड़ा है। ममताशासन को खासतौर पर इस संदर्भ में कुछ अप्रिय फैसले लेने होंगे। सिंडीकेट सरगनाओं के खिलाफ स्थानीय पुलिस प्रशासन को सख्ती से निबटने के आदेश दिए जाने चाहिए। साथ ही इस इलाके में सिंडीकेट के आतंक के खिलाफ राज्य के विभिन्न दलों के नेतागण सिंडीकेट दादाओं के समर्थन की नीति त्यागें।

भारत में राजारहाट एक बेहतरीन नवीन शहर के रूप में विकसित होने वाला अत्याधुनिक शहर है। इसकी शहरी योजना को सभी स्तरों पर प्रशंसा मिली है। यहां तक कि यूएनओ ने भी बेहतरीन नियोजित शहर के रूप में इसकी प्लानिंग को स्वीकृति दी है।

आज राजारहाट की स्थिति बेहद खराब है वहां बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा का अभाव है। अनेकों बहुमंजिला भवन पूरे के पूरे बने खड़े हैं और उनमें कोई ऑफिस तक नहीं खुला है। यही हाल रिहायशी इमारतों का है। वहां पर जो लोग रह रहे हैं उनके पास न्यूनतम बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। यहां तक कि डाकसेवा के पहुँचने की भी व्यवस्था नहीं है। दसियों हाउसिंग सोसायटी बनी खड़ी हैं लेकिन उनमें कोई रहने वाला नहीं है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि ममता सरकार बनने के बाद अचानक इस इलाके में सिण्डीकेट का आतंक चरम पर पहुँच गया और तकरीबन समूचे इलाके में निर्माण कार्य ठप्प हो गया ।

एक अनुमान के अनुसार राजारहाट न्यूटाउन में विभिन्न कंपनियों का तकरीबन 70हजार करोड़ रूये से ज्यादा पैसा लग चुका है और सारा कमकाज जहां का तहां रूका हुआ है। कंपनियां परेशान हैं कि किस तरह इस संकट से निकला जाय। सोमवार की बैठक में बिल्डरों ने अपनी आर्थिक दुर्दशा से भी मुख्यमंत्री को अवगत कराया है। एक बिल्डर ने बताया कि मुख्यमंत्री ने हमलोगों की बातें सुनीं लेकिन कोई ठोस समाधान पेश नहीं किया। उनके सामने जब हुडको के अधिकारियों और पुलिस अफसरों की बैठक के बारे में जिक्र किया गया तो मुख्यमंत्री ने कहा कि वे बात करेंगी।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उद्योगपतियों को बैठक करते समय एक दिक्कत आ रही है कि मुख्यमंत्री कभी भी खुले मन से मीटिंग में शामिल नहीं होतीं। वे अपने एजेण्डे के साथ आती हैं और अपनी बात कहकर चली जाती हैं। इसके कारण उद्योग जगत के साथ राज्य प्रशासन का दुतरफा संवाद नहीं बन पा रहा है। कायदे से बिल्डरों और उद्योगपतियों के साथ बातचीत में उन समस्याओं पर बातें होनी चाहिए जिन समस्याओं को वे लोग उठाते हैं। लेकिन नौकरशाही ने सारा माहौल इस कदर खराब किया हुआ है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ खुलकर विचार विनिमय हो ही नहीं पा रहा है। अकेले में जो उद्योगपति उनसे मिलता है उसकी वे सुनती हैं लेकिन समूह में वे सिर्फ अपनी कहती हैं। राजारहाट-न्यूटाउन को लेकर ममता सरकार ने अब तक जिस बेरूखी का परिचय दिया है उससे उद्योग जगत परेशान है।

सोमवार, 26 नवंबर 2012

ममता का नया आनंदराग जमीन लो और कारखाना खोलो


मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सारी राजनीति मूलतःआनंद, महोत्सव, मेले, ठेले आदि के तानेबाने में बुनी है। ममता की धारणा है आनंद है तो विकास है। आनंद का जितना व्यापक राजनीतिक उपभोग ममता सरकार ने पैदा किया है वैसा अन्य किसी मुख्यमंत्री ने नहीं किया। वे राजनीतिक तनावों को आनंद से धोना चाहती हैं।  9 नवम्बर को उद्योगपतियों के साथ बैठक-डिनर का आयोजन था और 10 को कोलकाता फिल्म महोत्सव का आरंभ होने जा रहा है। जिसमें महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर हीरो शाहरूख खान आदि के उपस्थित रहने की संभावना है। 

ममता सरकार का बुनियादी लक्ष्य है राज्य के उद्योग और संस्कृति उद्योग को चंगा करना। इस लक्ष्य को पाने के लिए वे अपने नए बदले मिजाज में नजर आ रही हैं। वे तनाव के सवालों से कन्नी काट रही हैं। राज्य की राजनीति के स्वस्थ विकास के लिए यह जरूरी है कि मुख्यमंत्री विकास के सवालों पर केन्द्रित करे। विकास के सवालों पर मुख्यमंत्री की सक्रियता आनंदमय वातावरण के जरिए दिखाई दे रही है। कुछ लोगों को इसमें असुविधा हो सकती है। लेकिन राज्य के राजनीतिक वामस्वर को मद्धिम करने के लिहाज से ममता का आनंदराग मददगार साबित हो सकता है। इससे स्थानीयस्तर पर अ-राजनीतिक माहौल बनाने में मदद मिलेगी। साथ ही राज्य सरकार विरोधी मीडिया उन्माद के सामाजिक प्रभाव को कम करने में भी मदद मिलेगी। 9 नवम्बर को उद्योगपतियों की बैठक में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आनंदराग की पूरी छाप देखने को मिली। वे स्वयं आनंद के मूड में थीं और नए बदले मिजाज में थीं। पहलीबार ऐसा हुआ कि ममता को विगतदिनों में घटित तनावपूर्ण घटनाओं से मुक्तभाव में देखा गया। ममता के बदले मिजाज से अनेक उद्योगपति अचम्भे में थे,वे समझ नहीं पा रहे थे कि आखिरकार नए तेवर की ममता को कैसे समझें।

इस बैठक में मौजूद उद्योगपतियों के मन में ममता विरोधी मीडिया उन्माद का दबाव था इसके कारण वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से सीधे सवाल करने से कन्नी काट रहे थे। इससे यह भी पता चलता है कि राज्य सरकार ने ठीक से मीडिया प्रबंधन नहीं किया है। राज्य में मीडिया का राज्य सरकार के प्रति आक्रामक रूख इस संदर्भ में एक बड़ी बाधा बनकर खड़ा हुआ है। मीडिया का राज्य की प्रत्येक घटना को उन्माद की हद तक ले जाकर प्रचारित-प्रसारित करना स्वयं में राज्य के विकास के लिए बड़ी समस्या है।उल्लेखनीय है विगत वाममोर्चा सरकार को भी इस मीडिया उन्माद का सामना करना पड़ा था और उसका राजनीतिक लाभ ममता को मिला था।

पश्चिम बंगाल के बारे में विचार करते समय यह बात सब समय ध्यान में रखी जानी चाहिए कि राज्य के खिलाफ मीडिया हमेशा से आक्रामक मूड में सक्रिय रहा है। मीडिया का आक्रामक रूख मीडिया को तो लाभ पहुँचाता है लेकिन राज्य के विकास में बाधाएं खड़ी करता है। विकासविरोधी और उद्योग विरोधी माहौल बनाने में स्थानीय मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। स्थानीय मीडिया की इस तरह की नकारात्मक भूमिका अन्य राज्यों में नजर नहीं आती। खासकर आनंदबाजार समूह की भूमिका इस संदर्भ में नकारात्मक रही है। राज्य के औद्योगिक विकास के लिए जरूरी है कि मीडिया की राज्यविरोधी भूमिका के परे जाकर देखा जाय। इस प्रसंग में वामदलों ,कांग्रेस और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को मिलकर काम करने की जरूरत है। राज्यविरोधी भूमिका निभाते हुए आनंदबाजार समूह की संपत्ति में इजाफा हुआ है। इसके अलावा राज्य का औद्योगिक और राजनीतिक वातावरण तनावपूर्ण बना है। अराजक राजनीतिक शक्तियों को इससे मदद मिली है। यही वो नया परिप्रेक्ष्य है जिसमें 9 नवम्बर को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उद्योगपतियों तो सम्बोधित किया।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा जो भी उद्योगपति राज्य में उद्योग लगाना चाहते हैं उन्हें राज्य सरकार के भूमि बैंक से सीधे जमीन मिल सकती है। जो अन्यत्र उद्योग लगाना चाहते हैं तो उनके प्रस्ताव पर विशेष तौर पर राज्य सरकार ध्यान देगी। प्रस्ताव के आधार पर भूमिबैंक के बाहर की जमीन के बारे में भी राज्य सरकार खरीद-फरोख्त में मदद कर सकती है।उन्होंने यह भी कहा कि नेताओं-दलालों को घूस देने से परहेज करें। मुख्यमंत्री का यह बयान राज्य के औद्योगिक विकास के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है और इससे उद्योगपतियों का मिजाज बदलेगा। अभी राज्य के पास भूमिबैंक में बड़े पैमाने पर जमीन पड़ी हुई है उस पर कोई बड़ा प्रकल्प नहीं बन पाया है। इसके अलावा जिनलोगों ने उद्योग के नाम पर वामशासन के जमाने में जमीन ली थी और अभी तक काम आरंभ नहीं किया उन सभी उद्योगपतियों को कल-कारखाने खोलने के लिए दबाव पैदा किया जाना चाहिए। पुरानी आवंटित जमीन में एक अच्छी-खासी मात्रा में ऐसी भी जमीन है जिस पर वर्षों से कोई काम आरंभ नहीं हुआ है,ऐसे लोगों से जमीन वापस लेने की प्रक्रिया आरंभ की जानी चाहिए।

राज्य के औद्योगिक विकास की सबसे बड़ी समस्या है स्थानीय राजनीतिक दादाओं का आतंक। इससे निबटने के लिए राज्य सरकार को खास प्रयास करने होंगे। साथ ही पुराने राजनीतिक सोच से बाहर निकलना होगा। पुराना राजनीतिक सोच पूंजीपति को वर्गशत्रु मानकर चलता है। ममता के वाम मित्रों ,खासकर माओवादियों और सांस्कृतिक मित्रों का भी यह मानना है कि पूंजीपति वर्गशत्रु हैं और उनसे ममता सरकार को दूर रहना चाहिए।

शुक्रवार के उद्योगपतियों के जमावड़े में टाटा स्टील प्रोसेसिंग एंड डिस्ट्रीब्यूसन कंपनी लिमिटेड के संदीपन चक्रवर्ती,आईटीसी के कुरूश ग्रांट ,पीयरलेस के एस.के.राय इसके अलावा उद्योगगपति हेमंत कनोरिया,एम.के.जालान ,दीपक जालान,अलका बांगुर, उज्जवल उपाध्याय,आदित्य अग्रवाल, संजीव गोयनका,संजीव गोयनका ,हर्ष नेवटिया आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा एस्सोचैम,फिक्की,बंगाल चेम्बर ऑफ कॉमर्स,सीआईआई,कलकत्ता चैम्बर ऑफ कॉमर्स आदि संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी इस बैठक में भाग लिया। कई उद्योगपतियों से जब इस बैठक के बारे में बातें हुईं तो उनका मानना था कि ममता ने यदि स्थानीय दादाओं के आतंक और धन वसूली को नियंत्रित कर लिया तो इससे औद्योगिक वातावरण को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। इस बैठक की खास बात यह थी कि इसमें उद्योगपतियों के पास मुख्यमंत्री से पूछने के लिए सवाल नहीं थे। उद्योगपतियों ने मुख्यमंत्री से सवाल न करके यह संदेश दिया है कि वे ममता सरकार के काम से मौटे तौर पर संतुष्ट हैं। लेकिन मीडिया में यह कयास लगाए जा रहे हैं कि सवाल पूछने से ममता नाराज हो सकती थीं इसलिए सवाल नहीं किए गए।








सोमवार, 5 नवंबर 2012

उद्योगपति सम्मेलन को लेकर ममता सरकार तनाव में


आगामी 9 नवम्बर को राज्य सरकार की ओर से उद्योगपतियों का एक सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इस सम्मेलन में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की देश के प्रसिद्ध उद्योगपतियों से सामूहिक मुलाकात होगी। उद्योगपतियों के सामने पिछले साल उन्होंने जो वायदे किए थे उनमें से एक भी वायदा पूरा नहीं हुआ है। इसके अलावा किसी भी नए प्रकल्प पर राज्य में काम आरंभ नहीं हुआ है। राज्य प्रशासन को पेशेवर ढ़ंग से चलाने की बजाय दलतंत्र के आधार पर चलाया जा रहा है इससे देश के उद्योगपति परेशान हैं। उद्योगपतियों में ममता सरकार के बंद विरोधी नजरिए को लेकर सकारात्मक भाव है लेकिन वे चाहते हैं कि सरकार इससे आगे जाए और स्थानीय अशांति और राजनीतिक दादागिरी को नियंत्रित करे। कई उद्योगपतियों ने यह भी कहा कि ममता सरकार का बंद विरोधी रवैय्या असल में माकपा विरोध की राजनीति से जुड़ा है। इसके पीछे कोई पॉजिटिव सोच नहीं है। जिन उद्योगपतियों से इस बीच में हमारी बातचीत हुई उनमें से अधिकांश राजनीतिक मिलिटेंसी को लेकर बेहद चिन्तित हैं। इस बीच में कई उद्योगपतियों ने निजी तौर पर राज्यप्रशासन को अपनी भावनाओं से भी अवगत कराया है। 

उद्योग जगत को उम्मीद है 9 नवम्बर को ममता सरकार कोई लोकलुभावन पैकेज लेकर आए। उद्योगपतियों की कई मांगें हैं जिनको इस मौके पर उठाए जाने की संभावना है। उनकी पहली मांग है कि स्थानीय स्तर पर जिला प्रशासन राजनीतिक गुण्डई पर रोक लगाए और ममता सरकार इस समस्या के प्रति कड़े रूख का इजहार करे। उद्योग जगत की दूसरी मांग है स्थानीयनेताओं की हफ्ता वसूली को तुरंत रोका जाए। तीसरी मांग है राज्य प्रशासन प्रकल्प स्वीकृति की प्रक्रिया आसान और त्वरित बनाए और चौथी मांग है कि उद्योगधंधों के लिए जमीन और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करने के लिए ममता बनर्जी स्वयं दिलचस्पी लें।

उल्लेखनीय है पिछले साल ममता सरकार ने उद्योगपतियों से जब मुलाकात की थी तो राज्य में जीत का माहौल था, आम उद्योगपति उम्मीदें लगाए बैठे थे कि नई सरकार शांति स्थापित करने में मदद करेगी। लेकिन ऐसा करने में सरकार असफल रही है। कई बड़ी कंपनियां राज्य छोड़कर जाने का मन बना चुकी हैं और नई कंपनियां पूंजीनिवेश के लिए तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर मिलिटेंसी ने अपराधीकरण की शक्ल ग्रहण कर ली है। उल्लेखनीय है कि मिलिटेंसी और झूठ एकसाथ चलते हैं। मिलिटेंसी हमेशा झूठ का सहारा लेती है। राज्य में विगत कई सालों से इस क्षेत्र में एक नया फिनोमिना सामने आया है वह है मिलिटेंसी के नाम पर गुण्डई।

मिलिटेंसी की खूबी है कि वह हमेशा जन समस्याओं के बहाने सिर उठाती है। जनहितैषी तर्कशास्त्र ,बाहुबल और शस्त्र इसके प्रमुख उपकरण हैं। उद्योग जगत परेशान है कि हल्दिया पोर्ट ट्रस्ट की ताजा समस्या ने गुण्डई में रूपान्तरण कर लिया है। कई उद्योगपतियों ने कहा है कि मिलिटेंसी को ’सब सामान्य है’ के मुहावरे में बांधकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी साख को दांव पर लगा दिया है।

उल्लेखनीय है कि पहले वाम शासन में ट्रेड यूनियन मिलिटेसी के कारण पश्चिम को व्यापक स्तर महत्वपूर्ण उद्योगों से हाथ धोना पड़ा है। आम आदमी यह उम्मीद कर रहा था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस प्रवृत्ति को अपने शासन के दौरान पनपने नहीं देंगी। इस प्रसंग में कुछ मुख्य बातें हैं जो साफ दिखाई दे रही हैं। राज्य प्रशासन का दलतंत्र के रूप में विस्तार हुआ है। पापुलिज्म बनाए रखने के लिए असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और बस्तियों के बाशिंदों का गुण्डावाहिनी के रूप में जमकर दुरूपयोग हो रहा है।

मिलिटेंसी जब भी सिर उठाती है तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली मशीनरी सबसे पहले पंक्चर हो जाती है है। आमतौर पर ट्रेड यूनियन मिलिटेंसी संबंधित उद्योग तक सीमित रहती है लेकिन मौजूदा दौर में यूनियन मिलिटेंसी ने अपराधीकरण की शक्ल अख्तियार कर ली है। राज्य का मौजूदा नेतृत्व खुलकर इस अपराधीकरण को संरक्षण दे रहा है। मसलन् किसी कंपनी ने मजदूरों के खिलाफ एक्शन लिया है तो मजदूर संगठनों को उसका एकजुट होकर प्रतिवाद करना चाहिए। लेकिन इस तरह का रास्ता न अपनाकर हल्दिया में गुण्डई का मार्ग पकडा गया। हल्दिया में घटना का आरंभ हुआ तब हुआ जब एचबीटी कार्गो कंपनी ने अपने यहां काम करने वाले 270 कर्मचारियों को सीधे नौकरी से निकाल दिया। इस प्रसंग में कंपनी का तर्क है कि उसने बंदरगाह के आधुनिकीकरण पर 200 करोड़ रूपये खर्च किए हैं और उसे इन कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं है,साथ यह भी कहाकि कंपनी ने मजदूरों से संबंधित कानूनों का पालन करते हुए ही इन मजदूरों को नौकरी से निकाला है। स्थानीय टीएमसी सांसद ने स्थानीय स्तर प्रतिवाद का नया तरीका अपनाया और पूरे इलाके में आतंक पैदा कर दिया। कंपनी के 3 अधिकारियों का पूरे परिवार के साथ अपहरण कर लिया, बंदरगाह पर काम पर जाने वाले मजदूरों को मारा-पीटा और आतंकित किया। उल्लेखनीय बात यह है कि सत्तारूण तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाले मजदूर संगठन इंटक ने कोई आंदोलन मजदूरों की छंटनी के खिलाफ संगठित नहीं किया बल्कि सीधे कंपनी के खिलाफ गुण्डई शुरू कर दी। उद्योग जगत चाहता है कि मजदूरों और कंपनियों के बीच के विवाद आपसी बातचीत से हल हों या कानूनीमंचों पर हल हों। बाहुबलियो के जरिए इस तरह की समस्याओं के समाधान तलाशने से बचा जाय। उद्योग जगत उम्मीद कर रहा है कि ममता बनर्जी 9 नवम्बर की बैठक में मिलिटेंसी की आलोचना करेंगी और कोशिश करेंगी कि उस बैठक के पहले हल्दिया विवाद के समाधान के लिए कोई मध्यममार्ग निकल आए।


रविवार, 30 सितंबर 2012

व्यापारियों से सीधे मुठभेड़ के मूड़ में ममता


पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अब विकास के सपने नहीं आते। उनका खुदरा व्यापार में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का विरोध उनकी नई मनोदशा की अभिव्यक्ति है। वे इन दिनों विकास की नहीं विकास के विरोध की भाषा बोल रही हैं। विकास के नाम पर जनता का असीम प्यार और समर्थन पाने के बाद ममता का विकास की बजाय बागी की भाषा में बोलना उस असंतुलन को व्यक्त करता है जो पश्चिम बंगाल में पहले से मौजूद है। लोकतंत्र में बागी और विकास में सीधे टकराव है। 

ममता की खूबी है कि उन्होंने वाममोर्चे की नाकामियों और जनविरोधी हरकतों का प्रतिवाद करते हुए बागी और विकास के बीच नकली संतुलन बनाकर जो विभ्रम पैदा किया था वह विगत पांच सालों में खूब चला। लेकिन अब यह विभ्रम टूट रहा है। सत्ता में आने के बाद बागी और विकास का नकली संतुलन टूटा है। राज्य के शासन पर बागी सवार हैं और विकास काफूर हो गया है।

ममता की मुश्किल यह है कि वे बागी के तानबाने में कैद हैं और बागी के नजरिए से राज्य प्रशासन को चलाना चाहती हैं। बागी के नजरिए से शासन चलाने का अर्थ है वस्तुगत प्रशासनिक प्रणाली का अभाव। बागी भाव से शासन चलाएंगे तो हमेशा दलतंत्र हावी रहेगा। पहले दलतंत्र की ममता आलोचना करती थीं लेकिन इन दिनों दलतंत्र की ओर जा रही हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब शासन में आई थीं तो उनसे उम्मीद थी कि वे जिस भाषा में विपक्ष में रहते हुए बोलती थीं उस भाषा और नजरिए को त्यागकर सुशासन की भाषा में बोलेंगी। लेकिन ममता ने अपनी भाषा और राजनीतिक तेवर नहीं बदले। ममता के बागी तेवर और उग्रभाषा उनकी कल तक सबसे बड़ी पूंजी थी लेकिन आज वही सबसे बड़ी बाधा है।

लोकतंत्र में अ-स्वाभाविक भाषा वह है जो अहर्निश अशांतमन और टकराव को व्यक्त करती है।इस तरह की भाषा का सामाजिक अवसाद से गहरा संबंध है। सामाजिक अवसाद बागी भाषा को सहज अभिव्यक्ति देता है। इसके विपरीत लोकतंत्र की स्वाभाविक भाषा वह है जिसमें सामंजस्य का भाव है और अन्य के लिए बराबर की जगह है। बागी की भाषा सामाजिक असमानता और सामाजिक अवसाद की अभिव्यक्ति है। इस तरह की भाषा असमानता को बनाए रखती है । इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भाषा और राजनीतिक तेवरों को पढ़ा जाना चाहिए।

विगत 26सितम्बर को ममता बनर्जी के दल ने राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया है कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का राज्य में निवेश स्वीकार्य नहीं है। यह ऐसा प्रस्ताव है जो राज्य के समूचे विकास को सीधे प्रभावित कर सकता है। मसलन् बड़ा बाजार का कोई व्यापारी यदि खुदरा व्यापार में 5000करोड़ रूपये का निवेश करना चाहेगा तो उसे निवेश की अनुमति नहीं होगी। यह तो सीधे व्यापारियों के व्यापार करने के अधिकार पर हमला है। केन्द्र और राज्य के व्यापार संबंधी कानूनों में कहीं पर भी यह प्रावधान नहीं है कि देशी व्यापारी खुदरा व्यापार के क्षेत्र में किस सीमा तक पूंजी निवेश करेगा। देशी व्यापारी जिस किसी भी क्षेत्र में यहां तक कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी पूंजी का निवेश कर सकता है। समूचे देश में मॉलकल्चर और बिग बाजार की संस्कृति जिस समय आई उस समय ममता के दल ने इसका विरोध नहीं किया था। लेकिन आज सत्ता में आने के बाद वे अचानक खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी पूंजी के प्रवेश का विरोध कर रही हैं। इस तरह का विरोध न्यायसंगत नहीं है और देश के मौजूदा व्यापार कानूनों का सीधे उल्लंघन है। ममता को यह पता है कि खुदरा व्यापार में मॉल कल्चर पुराने खुदरा व्यापार की अपडेटिंग है। लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यह अपडेटिंग पसंद नहीं है। उनका बड़ी पूंजी के खिलाफ गुस्सा इस बात का भी संकेत है कि वे देश की सामयिक वास्तविकता को ठीक से नहीं देख पा रही हैं। खुदरा व्यापार के खिलाफ ममता फिलहाल जो भाषा बोल रही हैं वही भाषा भाजपा और अतिवामपंथी भी बोल रहे हैं।

बागी भाषा अवसाद की भाषा है। राजनेता का अवसाद जब शासन में व्यक्त होता है तो सीधे टकराव की भाषा में व्यक्त होता है।पश्चिम बंगाल में लंबे समय से अवसाद का माहौल है और इस माहौल से कमोबेश सभी रंगत के नेता प्रभावित हैं। पश्चिम बंगाल में अवसाद का जिस तरह का वातावरण है वैसा वातावरण देश के अन्य राज्यों में नहीं है। अवसाद के माहौल को यहां मेले-ठेले और क्रांतिकारी लफ्फाजी के जरिए ढकने की आदत है। सामाजिक अवसाद से ध्यान हटाने के लिए व्यापारियों,पूंजीपतियों और अभिजन के खिलाफ में बोलना एक फैशन है। दिलचस्प बात यह है कि इस राज्य में अवसाद की भाषा बोलने वाले बहादुर और बागी कहलाते हैं। सच यह है कि अवसाद की भाषा कूपमंडूकों की भाषा है। एक ऐसे व्यक्ति की भाषा है जिसके पास कोई सपना नहीं है और जो निठल्ला है। ममता शासन को कायदे से इस बागी भाषा और निठल्लेपन से लड़ना चाहिए। राजनीति में बागी और निठल्ला भाव अंततः नीतिहीनता की ओर ले जाता है ,इस नीतिहीनता का एक और नमूना है हाल ही में राज्य के पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय कानून 2011 में उपकुलपति की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति के चरित्र में किया गया बदलाव। सारे देश में उपकुलपति चयन समिति में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का प्रतिनिधि रहता है लेकिन पश्चिम बंगाल में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रतिनिधि को चयन समिति से निकालकर उसकी जगह राज्य सरकार के प्रतिनिधि को रखा गया है जो कि गलत है। कायदे से राज्यपाल को इस संशोधन बिल को अपनी स्वीकृति नहीं देनी चाहिए,यह देश के अकादमिक नियमों का सीधे उल्लंघन है। इसी तरह ममता सरकार की दिशाहीन नीतियों का ही दुष्परिणाम है कि दानकुनी स्थित सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बालमर लॉरी एंड कंपनी ने अपने ढ़ाई हजार करोड़ रूपये के प्रकल्प को बंद करने का फैसला किया है क्योंकि इस कंपनी को इस इलाके में जगह नहीं मिल रही है और ममता सरकार ने किसानों से जमीन खरीदने से मना कर दिया है। ममता सरकार की अराजक और दिशाहीन नीतियों के कारण हाल में सिंगूर से टाटा मोटर को भागना पड़ा। ममता के शासन में आने के बाद लॉर्सन एंड टुब्रो कंपनी ने 2012 में अपने बिजली प्रकल्प को बंद कर दिया।इसी साल श्याम स्टील ने अपना पुरूलिया स्थित स्टील प्रकल्प बंद करने का फैसला लिया है।बागी भाषा और नीतिहीनता के ये कुछ नमूने हैं। असल में पश्चिम बंगाल के लिए यह त्रासद समय है ,यहां लगातार विकास से जुड़े प्रकल्प बंद हो रहे हैं।






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