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गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

नव्य उदार आर्थिकयुगीन युवा की सच्चाईयां

   
भूमंडलीकरण की केन्द्रीय विशेषता है आत्ममुग्धता ,आत्महनन और आत्म-व्यस्तता ।  सन् 1990-91 के बाद से युवाओं में यह प्रवृत्ति तेजी से पैदा हुई है। इसने उसे सामाजिक सरोकारों से काटा है। पहले यह प्रवृति उच्चवर्ग में थी लेकिन भूमंडलीकरण के बाद से इस प्रवृत्ति ने निचले वर्गों में पैर पसारने आरंभ कर दिए।
     आत्ममुग्ध भाव की विशेषता है आप स्वयं को जानने की कोशिश नहीं करते। वे तमाम क्षमताएं त्याग देते हैं जिसके जरिए आत्म को जानने में मदद मिले। आत्म या खुद को न जानने के कारण व्यक्ति के अंदर अन्य को जानने की इच्छा भी खत्म हो जाती है।फलतः ये युवा अन्य की मदद नहीं कर पाते। वे निजी जीवन में व्यस्त रहते हैं। निज से परे कोई संसार है जिसे जानना चाहिए उसको ये युवा सम्बोधित ही नहीं करते। यह ऐसा युवा है जो अपने अलावा किसी में दिलचस्पी नहीं ले जाता। ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं यह सुनना बंद कर देता है, रुचि लेना बंद कर देता है।
     नए युवा देखने में आकर्षक,नए भाव-भंगिमा वाले हैं वे देखने में सुंदर लगते हैं। आरंभ में ये अन्य को जल्दी प्रभावित भी कर लेते हैं लेकिन ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं ये अपने को समेटना आरंभ कर देते हैं। इन युवाओं में एक बड़ा अंश है जो अपने चारों ओर की दुनिया से एकदम बेखबर है।
    अमेरिका में इस तरह के युवा की एक नागरिकता परीक्षा ली गयी। अमेरिका में अक्टूबर 2009 से अगस्त 2013 के दौरान ली गयी नागरिकता परीक्षा में 30लाख से ज्यादा आप्रवासी युवाओं ने हिस्सा लिया।  इस परीक्षा को 92प्रतिशत युवाओं ने पास किया। इन उत्तीर्ण युवाओं में 29फीसदी को अमेरिका के उपराष्ट्रपति का नाम तक नहीं मालूम था। 43फीसदी नागरिक अधिकारों को परिभाषित करने में असमर्थ रहे,40 फीसदी नहीं जानते थे कि अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान और जर्मनी से युद्ध किया था। 73 फीसदी नहीं जानते थे कि शीतयुद्ध के दौरान साम्यवाद ही मुख्य समस्या थी। 67 प्रतिशत नहीं जानते थे कि वे जिस आर्थिक व्यवस्था में रहते हैं उसे पूंजीवाद कहते हैं।
एक अन्य सर्वे में पता चला कि चार में से एक अमेरिकन को संविधान प्रदत्त पांच स्वाधीनताओं का ज्ञान नहीं था। वे एक से अधिक स्वाधीनता का नाम नहीं जानते थे। जिन लोगों में सर्वे किया गया उनमें से आधे से अधिक लोग  “सिम्पसन कार्टून फैमिली ” के दो चरित्रों के नाम तक नहीं जानते थे। इन सर्वेक्षणों पर विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों की इस दशा के लिए पब्लिक स्कूल सिस्टम जिम्मेदार है। क्योंकि वे ठीक से बच्चों को इतिहास,भूगोल और नागरिकशास्त्र नहीं पढ़ाते। इन लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि इंटरनेट ने ऐसी पीढ़ी पैदा की है जो आत्मलीन,एडिक्ट,चंचलमन और अचेत है। यह भी देखा गया  अनेक लोग अमेरिका में निजी स्वार्थ को देखकर वोट देते हैं न कि देश के स्वार्थ को देखते हैं। अमेरिका के पतन का बड़ा कारण है कि अनेक अमेरिकन देश के बारे में नहीं सोचते ,सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं।  एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा कि जब युवा हमारे संविधान को ही नहीं जानते तो उसकी रक्षा में या संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए वे खड़े कैसे होंगे ?  



शुक्रवार, 2 मई 2014

उत्तर आधुनिकता का पुनर्पाठ


फ़्रेडरिक जेम्सन ने कहा 'उत्तर आधुनिकता परवर्ती पूँजीवाद का सांस्कृतिक तर्क है।' यानी यह न बुरा है और न अच्छा है बल्कि यह तो एक अवस्था है जिसमें सबको रहना है और इसे लेकर सबको राय ज़ाहिर करनी है ।
भारत और यूरोप में उत्तर आधुनिक परिस्थितियों में बुनियादी अंतर है । यूरोप में उत्तर आधुनिकता आई है सत्तर के बाद के वर्षों में वहाँ पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के निर्माण की प्रक्रिया शिखर पर थी जापान के निर्माण का काम ख़त्म हो चुका था । पूँजीवादी विकास शिखर पर था । मुद्रा स्थिर थी ।बाज़ार सामानों से भरे पड़े थे। अमेरिका वियतनाम में करारी हार के कगार पर था । अमेरिकी समाज में ज़बर्दस्त आंदोलन थे । महँगाई थी। विकास एक जगह जाकर ठहर गया था । क़र्ज़ बढ़ रहे थे । डेविडहर्वे के शब्दों में कहें तो पूँजी को डी रेगुलेट किया गया , सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का निजीकरण किया गया। मुद्रा का अवमूल्यन हुआ। मज़दूरों के हकों पर हमले बढे।
इसके विपरीत भारत की स्थिति थी। यहाँ पर बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। पाक से १९७१ में हम युद्ध जीते । शानदार रेल हड़ताल हुई। बड़े पैमाने पर १९७४-७५ में आंदोलन हुए। आपातकाल आया।इंदिरा हारी । इंदिरा की वापसी हुई । लेकिन १९९०-९१ तक आते आते देश गहरे संकट में फँस गया और मनमोहन अर्थशास्त्र का जन्म हुआ। बेकारी और महँगाई के साथ सरकारी ख़ज़ाने में बहुत कम मुद्रा थी।
आपातकाल में उपग्रह छोड़ा गया । राजीवयुग में कम्प्यूटर क्रांति हुई । टीवी का विकास हुआ। सन् १९८० के बाद धीरे धीरे कुछ ऐसा घटा जिसको देखकर लगता था कि लोग इतिहास से बदला लेने पर आमादा हैं । मसलन् ओबीसी आरक्षण, राममंदिर आंदोलन, असम और पंजाब के आंदोलन आदि की एक ही धुन थी कि इतिहास में जो ग़लतियाँ की गयी हैं उनको दुरुस्त करना है । दलितसाहित्य और स्त्री साहित्य में भी इसे लेकर बग़ावत दिखाई दी। वे भी साहित्य में इतिहास के ख़िलाफ़ थे। इतिहास को नहीं मानते थे।
पहले रेगुलेशन पर ज़ोर था ,अब डी रेगुलेशन पर ज़ोर था । पहले लाइसेंस राज था अब लाइसेंस राज का खात्मा कर दिया गया। हर क्षेत्र में डीरेगूलेशन को लागू किया गया ।काम के घंटे बढ़ा दिए गए। पूरे सिस्टम का कम्प्यूटरीकरण आरंभ हुआ । प्रिंटयुग से कम्प्यूटर युग में आ गए। बाज़ार से माॅल के दौर में आ गए। महिलाओं ,अल्पसंख्यकों , किसानों ,मज़दूरों और आदिवासियों पर हमले तेज़ हुए। जातीय घृणा में इज़ाफ़ा हुआ। कल्याणकारी राज्य का चरित्र बदलने का प्रयास किया गया।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कारोबार अंधाधुँध गति से बढ़ा। विश्व व्यापार संगठन के ढाँचे और नियमों से हमने अपने को बाँध लिया और देश में सभी क्षेत्रों में डीरेगूलेशन या विनिमयन को लागू कर दिया। सार्वजनिक संपदा और संसाधनों की खुली लूट हुई और उसे औने-पौने दामों पर निजी क्षेत्र को सौंप दिया गया । एक तरह से सार्वजनिक संपदा और कृषिभूमि के ख़िलाफ़ कारपोरेट युद्ध की घोषणा थी।
समूचे देश में नव-धनाढ्यों की आँधी आ गयी। देखते ही देखते हर शहर में करोड़पति पैदा हो गए । मध्यवर्ग के लोग करोड़पति हो गए। यह नए क़िस्म के फ्लेगजिबिल , फ़्री फ्लोटिंक और सामंजस्यवादी नए क़िस्म के यथार्थ का आगमन था।
मसलन पहले कार वाला अमीर था और अमीर से हम नफरत करते थे ,लेकिन नई वास्तविकता यह है कि हर मध्यवर्गीय व्यक्ति के पास कार है और कार अब अमीरी का प्रतीक नहीं रह गयी है। कलर टीवी अमीरों की चीज़ थी लेकिन अब नहीं है। फ़ोन बड़े लोगों के यहाँ हुआ करता था ,आज सबके हाथ में है।
हर स्तर पर सर्जनात्मक क्रांति हुई है। विज्ञापन से लेकर पुस्तक प्रकाशन तक सर्जनात्मक सौंदर्य की वर्षा हो रही है। नए क़िस्म की ग्लोबल अस्मिता ने पैर फैला दिए हैं। पहले पूँजी का सौंदर्य पर प्रभाव सीमित क्षेत्र तक था । लेकिन नई स्थितियों में पूँजी के वैभव ने आम जीवन पर असर डालना आरंभ कर दिया है । सब्सीडी पर हमले हो रहे हैं।
ग्लोबल स्तर पर चीन का पूँजीवादी बाज़ार के रुप में उदय बहुत बड़ी परिघटना है । इसने बहस के समूचे आधार को ही बदल दिया है । मज़ेदार बात यह है कि हमारा हिंदी का लेखक अभी भी नक्सलबाडी आंदोलन में फँसा है या शीतयुद्ध के मानकों में उलझा पड़ा है।
नए युग की ख़ूबी है तकनीक हमारे संचार ,राजनीति, संस्कृति आदि का निर्धारण कर रही है। समाजवाद का विघटन और कम्युनिस्ट पार्टियों के जनाधार में ज़बर्दस्त गिरावट ने मेहनतकश जनता को असहाय अवस्था में छोड़ दिया है।
महाख्यान का अंत हुआ है। बाज़ार में भयानक प्रतिस्पर्धा जन्म ले चुकी है और इससे राजनीति भी प्रभावित हुई है । अमेरिकी वर्चस्व में गिरावट आई है। चीन का महाशक्ति के रुप में उदय हुआ है । नई परिस्थितियों में राज्य के पास पूँजी निवेश को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं रहा। राज्य जब निवेश को नियंत्रित नहीं कर सकता तो वह सूचना को भी नियंत्रित नहीं कर सकता ।
किसी एक नरेटिव पर लोगों की नज़र नहीं टिकी है बल्कि लोग अलग अलग क़िस्म के नरेटिव में ध्यान लगाए हैं । यही महाख्यान के अंत का अर्थ है ।
नव्य आर्थिक उदारीकरण के दौर में व्यक्ति के निजी हितों को तरजीह दी गयी। सामाजिक हित के सवालों को पीछे छोड़ दिया गया।
फ़्रेडरिक जेम्सन ने उत्तर आधुनिकता को परवर्ती पूँजीवाद का सांस्कृतिक तर्क कहा । लेकिन इसे नव्य आर्थिक उदारीतरण की विचारधारा भी कह सकते हैं। यह कोई आकाश से टपकी धारणा नहीं है बल्कि ऐतिहासिक तौर पर विकसित हुई अवधारणा है ।
बाज़ार से लेकर व्यक्ति तक मेकओवर का ग्लोबल रुप देखने में आ रहा है । इस पर सोचने की ज़रुरत है।
हिंदी में " उत्तर आधुनिकतावाद "नाम सुनकर ही समीक्षक भड़क जाते हैं । मैं तो स्वयं यह ग़ुस्सा अनेकबार देख चुका हूँ। नाम सुनकर राय बनाना और फिर उलटी सीधी राय बनाना यह हिंदी में आम बात है और दुर्भाग्यजनक बात यह है कि यह काम समीक्षकों ने किया है।
समस्या नामकरण की नहीं है समस्या बदले हुए यथार्थ को समझने और उसकी सही समझ बनाने से जुड़ी है। हिंदी समीक्षा अभी शैशव काल में है। यहाँ किसी भी अवधारणा पर कोई गंभीर लेखन नहीं हो रहा । ठोस धारणाओं के निर्माण और विमर्श का काम नहीं हो रहा। जो काम हुआ है वह हमें अवधारणाओं की सही समझ नहीं देता।
मसलन हमने आलोचना में आधुनिकतावाद , रैनेसां, औद्योगिकीकरण , प्रगतिशील साहित्य ,लोकतंत्र, भारत विभाजन ,भूमंडलीकरण आदि को लेकर कोई गंभीर अवधारणात्मक विवेचन का काम नहीं किया है । हमारे यहाँ तात्कालिक या सांगठनिक या मित्रतावश या उत्सवधर्मी आलोचना है इसमें वस्तुगतता का भयानक अभाव है।
साहित्य समीक्षा के अनेक मार्ग हैं । किसी को रैनेसां का मार्ग पसंद है ।किसी को भक्ति आंदोलन का मार्ग पसंद है ।किसी को १९१७ की अक्टूबर क्रांति से प्रभावित मार्ग पसंद है।किसी को प्रतिवाद का नक्सलबाडी मार्ग पसंद है ।कोई आधुनिकता तो कोई दलितसाहित्य या स्त्री साहित्य के मार्ग से गुज़रना चाहता है। किसी को विवेकवादी परंपरा का मार्ग पसंद है किसी को राष्ट्रवादी परंपरा का मार्ग पसंद है।
यानी साहित्य समीक्षा में हम एक नहीं अनेक मार्गों से यात्रा करते हैं । कोई अस्मिता के मार्ग से समीक्षा की यात्रा कर रहा है तो कोई समुदाय या वर्ग के मार्ग से साहित्य समीक्षा के मार्ग पर चल पडा है । इन सभी मार्गों में अंतर्क्रियाएं हैं जिनकी हमें अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
साहित्य की आलोचना के जिस मार्ग से भी यात्रा करें सवाल यह है कि जाना कहाँ है ? किस तरह के साहित्य के ज़रिए जाना चाहते हैं और अंततः क्या करना चाहते हैं ?
साहित्य समीक्षा में रमण करते समय अंतर्क्रियाएं और प्रक्रिया महत्वपूर्ण हैं । यदि अंतर्क्रियाओं और प्रक्रिया की उपेक्षा करेंगे तो यह संभव है कि समीक्षा अविवेकवाद के टीले पर खड़ी मिली ।
मसलन दलित साहित्य या स्त्री साहित्य पर बातें करते समय अन्य साहित्य रुपों और विचारधाराओं के साथ चल रही अंतर्क्रियाओं और प्रक्रिया की अनदेखी न करें। वरना स्त्रीसाहित्य के नाम पर समीक्षा में अविवेकवाद पैदा होगा और इससे स्त्रीसाहित्य का स्वाभाविक विकास और साहित्यबोध बाधित होगा । इससे साहित्यिक अधिनायकवाद पैदा होगा ।
उत्तर आधुनिक नज़रिए से देखें तो पाएँगे कि हम सब असंपूर्ण साहित्य परंपरा में जी रहे हैं। किसी मार्ग विशेष के ज़रिए साहित्य का समग्र नज़रिया बनाना कठिन हो गया है ।
साहित्य में दृष्टियों की अंतर्क्रियाओं को हमें सिद्धांतत: मानना पड़ेगा और अंतर्विषयवर्ती पद्धति से काम लेना होगा।प्रधान और गौण के वर्गीकरण के बाहर निकलकर बहुलतावादी नज़रिए से देखना पड़ेगा ।

उत्तर आधुनिक अवस्था और समाज को जानने के लिए नई संवेदना और नई चेतना की ज़रुरत है। यह ऐसा समाज है जिसमें लोग तमाशा देखते हैं ,हस्तक्षेप नहीं करते।अराजक राजनीतिक आंदोलन पैदा हो जाते हैं ।
समूचे समाज में पूँजीवाद का बोलबाला है। साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ जन्म लिया है। आधुनिकतावादी रुपों के प्रति असंतोष व्यापक तौर पर व्यक्त हो रहा है। रुढिबद्धता, बोरियत और नक़ली आशाओं का संचार में वर्चस्व है। स्थानीय स्तर पर पश्चिमी संस्कृति के प्रति ग़ुस्सा कम और प्रेम ज़्यादा है। मीडिया से लेकर स्थापत्य तक और संस्कृति से लेकर प्रफाॅर्मिंग आर्ट तक बड़े मूलगामी परिवर्तन हुए हैं।

लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संरचनाओं के विकास के साथ तीव्रगामी भूमंडलीय कम्युनिकेशन नेटवर्क का विकास हुआ है ।
आधुनिककाल आने के साथ जो कलारुप विकसित होते हैं वे पुराने कलारुपों को रुपान्तरण के लिए मजबूर करते हैं। कम्युनिकेशन की तकनीक की संगति में भाषा ,कला और साहित्य रुपों का तेज़ी से विकास होता है । सामान्यतौर पर हमने कम्युनिकेशन तकनीक एवं कलाओं के अंतस्संबंध की अनदेखी की है। लेकिन उत्तर आधुनिक अवस्था हमें साहित्य और कम्युनिकेशन तकनीक के अंतस्संबंध पर विचार के लिए मजबूर करती है।
रेल,दूरसंचार ,प्रेस , रेडियो और फ़िल्म के आने के साथ कला एवं साहित्यरुपों में किस तरह के बदलाव आए हमने कभी गंभीरता से उनका विश्लेषण नहीं किया ।
कम्युनिकेशन तकनीक के नए रुपों ने कला और साहित्य में स्टाइल या शैलियों की बाढ़ पैदा की है । स्टाइल में जितने प्रयोग इस दौर में हुए हैं उतने पहले कभी नहीं हुए।
आधुनिककाल में नए प्रयोगों की आधार स्थली है उपन्यास विधा। कम्युनिकेशन तकनीक और आम संचार के रिश्ते में बुनियादी बदलाव आया है ।
आधुनिकता के साथ आमलोगों में "औचक "भाव से चीज़ों को देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
हर क्षेत्र में "नए" की माँग बढ़ी है । "नए" के पदबंध का हर क्षेत्र में उपयोग बढ़ा है ।
ल्योतार के अनुसार उत्तर आधुनिकतावाद का मतलब यथार्थवाद का अंत नहीं है। बल्कि इसका मतलब है कि लेखक को समुदाय के रुप में देखें और समुदाय के रुप में स्वीकृति प्रदान की जाय अथवा उसे बीमार मानकर उसका उपचार किया जाय। हमारे बीच ऐसे अनेक लेखक हैं जिनके पास आधुनिकतावाद या प्रगतिवाद की कोई विरासत नहीं बची है। इसके कारण वे आधुनिकतावाद या प्रगतिवाद की परंपरा या दायरों का अतिक्रमण गए हैं। लेखक के वैचारिक अतिक्रमण को कभी गंभीरता से विश्लेषित नहीं किया गया। इसके कारण न तो कभी लेखक की मदद कर पाए और नहीं समझ ही पाए ,उलटे उसके प्रति संदेह बढ़ा । उस पर हमले किए।
विगत चालीस सालों में यथार्थ के नाम पर जो बहसें चलीं उससे सामयिक यथार्थ को समझने में मदद कम मिली। दूसरी ओर बुर्जुआजी की इतिहास में प्रतिष्ठा बढ़ती चली गयी ।यथार्थवाद के बहाने या यथार्थ रुपान्तरण के बहाने सिस्टम के जो चित्र पेश किए गए उनसे यथार्थ कम और कृत्रिम यथार्थ ज़्यादा सामने आया ।
नए तकनीकी जगत ने इतिहास के हरक्षण को मूल्यवान बना दिया है। एक फ़ोटो के हज़ार फ़ोटो ,हर क्षण के फ़ोटो ,आदि की प्रक्रिया ने इतिहास में हर अनुभव और संवेदना को सुरक्षित करने और दर्ज करने की संभावनाएँ पैदा की हैं। अब भाषा के हर रुप और सभी क़िस्म के वाक्यों के संरक्षण की संभावनाएं पैदा हो गयी हैं। इस क्रम में कम्युनिकेशन की नयी संहिता या कोड भी पैदा हुआ है । आप यदि इस कोड को खोलना जानते हैं तो यथार्थ समझ पाएँगे।
इधर के दौर में "यथार्थ" और "अस्मिता"पर केन्द्रित ख़ूब लिखा गया है । लेकिन यह युग इनके लिए पाठकों या दर्शकों की गारंटी नहीं देता । अब साहित्य में " सौंदर्य क्या है ? पर बात नहीं हो रही बल्कि "कला में क्या कहा जा रहा है " इस पर बातें हो रही हैं। फलतः यथार्थ के सवालों की जमकर उपेक्षा हो रही है और अकादमिक माँग-पूर्ति या उपयोगितावादी या नारेबाज़ी का साहित्य ख़ूब लिखा जा रहा है ।
आम जनता में समस्याओं को लेकर बेचैनी है लेकिन वह रेडीमेड समाधान चाहती है। जनता के अनुभवों में अवसाद ने बड़ी जगह घेर ली है। जनता चाहती है कि सरल ढंग से कहा जाए।इस बीच में जनता की जीवनशैली बदली है और उपभोग की डिक्टेटरशिप ने हमारे जीवन में आधिपत्य स्थापित कर लिया है । मनोरंजन की धारणा बदली है और "ख़ाली समय " की धारणा लोकप्रिय हुई है । "यथार्थ की नब्ज़" से लेखक की पकड़ से छूट गयी है जिसे वह संकीर्ण क़िस्म के ऐतिहासिक विवरण और ब्यौरों के ज़रिए भर रहा है । इसका परिणाम यह निकला है कि वह जो लिख रहा है उसमें सामयिक यथार्थ की कहीं से गंध नहीं मिलती फलत: उसका पाठक और समाज से अलगाव भी बढ़ा है । यह नीत्शे के शब्दों में एक तरह का निहिलिज्म है।
उत्तर आधुनिक दशा हो या आधुनिकता हो वहाँ पर दर्द और आनंद का द्वंद्वात्मक संबंध और अंतर्क्रियाएं साफ़ नज़र आती हैं। आनंद के जितने भी विषय हैं वे व्यक्ति के निजीदर्द से ही पैदा हुए हैं।
उत्तर आधुनिक लेखन में ऐसा बहुत सा लेखन आ रहा है जिसमें समीक्षकों के अनुसार सौंदर्य नहीं है। ऐसा भी लेखन आ रहा है जो "रुपरहित रुप" से गढ़ा हुआ है।
नया फिनोमिना है रुपरहित ,संवेदनारहित प्रस्तुतियों पर ज़ोर और वर्तमान के प्रति अंधप्रेम।
उत्तर आधुनिक अवस्था के कारण लेखक नियमरहित लेखन पर ज़ोर दे रहे हैं। यह वह दौर है जब चीज़ें घट जाने के बाद नियम बनते हैं। हमने क्या किया उसके बाद नियम बनते हैं ।
लेखन में शब्द इवेंट की तरह आ रहे हैं ।ये वे इवेंट हैं जो लेखक के ज़ेहन में बहुत देर से आए हैं। या यों कहें जिनको बहुत देर से साहित्य में व्यंजित होने का मौक़ा मिला है ।
उत्तर आधुनिक लेखन हमेशा बिडम्बनाओं के गर्भ से ख़ासकर भविष्य की बिडम्बनाओं के गर्भ से पैदा होता है ।
ल्योतार का मानना है हमारा काम यथार्थ सप्लाई करना नहीं है। बल्कि ऐसी कल्पनाओं की सृष्टि करना है जो पहले कभी लेखक के मन में नहीं आईं। या कभी पेश नहीं की गयीं । इस प्रसंग में हम दलित और स्त्री साहित्य देख सकते हैं।
उत्तर आधुनिक भाषाखेल को समझें ,इस खेल की ख़ूबी है कि यह रुपान्तरणकारी है। नया नारा है "सीमाएँ तोड़ो अंतराल भरो", लोग विभिन्न रुपों में सीमाएँ तोड़ रहे हैं । यह नारा आलोचना से लेकर विधा तक सबकी सीमाएँ तोड़ी जा रही हैं। साहित्य और सामाजिक यथार्थ के जटिल संबंधों की ओर ध्यान गया है। इन दिनों साहित्य के पाठकों पर वैचारिक या राजनीतिक प्रभाव की व्यापक चर्चा हो रही है ।
परंपरागत समीक्षा ने श्रेष्ठ और बाज़ारू साहित्य का अंतर किया था लेकिन उत्तर आधुनिकों ने इस विभाजन को नहीं माना। "डिफरेंस" और " हाइब्रीडिटी" पर ज़ोर दिया गया। विधाओं में मिश्रण से लेकर पापुलरकल्चर तक के प्रयोगों पर ज़ोर दिया ।
ल्योतार ने लिखा उत्तर आधुनिकतावाद का अर्थ है स्थानीय परिस्थितियों को सीमित संदर्भ में देखा जाय। इसमें व्यक्ति के स्तरों को खोजा जाय ।
बौद्रिलार्द के अनुसार यह युग इमेज और सूचना के उत्पादन का युग है । पहले भौतिक वस्तुओं के उत्पादन पर ज़ोर था । उत्तर आधुनिकता में स्थानीयअवस्था पर ज़ोर है और सार्वभौम का निषेध है।
उत्तर आधुनिक अवस्था में अस्मिता की राजनीति केन्द्र में आ गयी है। रीतिवादी ढंग से इसके रुपों की सृष्टि हुई है। अस्मिता पर बहस कम और सृजन पर ज़ोर ज़्यादा है। अस्मिता के लेखक ठहरकर संवाद नहीं करना चाहते , वे उसके मसलों पर बहस करने की बजाय मनवाने पर ज़ोर ज़्यादा दे रहे हैं। यानी अस्मिता है और मानो। जो नहीं मानता उसको अछूतभाव से देखा जा रहा है। इसने अस्मिता की राजनीति का आतंक पैदा किया है । वस्तुगत तौर पर देखें तो अस्मिता की राजनीति का अस्मिता से ही पंगा है। अस्मिता की उपयोगिता के सवाल बड़े सवाल हो गए हैं ।
संवादहीन अस्मिता विमर्श वस्तुत:अस्मिता का रीतिवाद है। यह अस्मिता के प्रति आलोचनात्मक नज़रिए से वाद-विवाद-संवाद का निषेध करता है। इसकी अस्मिता के जड़ इतिहास में दिलचस्पी है । अस्मिता के गतिशील और रुपान्तरित पक्षों में कोई दिलचस्पी नहीं है। दलित और स्त्री आत्मकथाओं पर चल रही बहसों में हम इसे साफ़तौर पर देख सकते हैं।

साहित्य में सार्वभौम भाषा या साहित्यांदोलन की भाषा के प्रयोग की परंपरा रही है। लेकिन उत्तर आधुनिक लेखकों ने सार्वभौम भाषा का निषेध किया है । इसके विकल्प के तौर पर "निजी (प्राइवेट)भाषा", "निजी शैली" या "निजी मैनरिज्म" पर ज़ोर दिया । सामाजिक जीवन के चित्र सार्वभौम भाषा में पेश करने की बजाय निजी भाषा में पेश किए हैं। आज बड़े पैमाने पर दलित साहित्य या स्त्री साहित्य में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है वह "निजी भाषा" है। विलक्षण बात यह है कि पेशेवर लोगों में यह भाषा आ गयी है । आज लेखक इस तरह से लिख रहा है गोया वह किसी अन्य द्वीप का बाशिंदा हो। वह ऐसी भाषा बोल रहा है जो उसे सबसे भिन्न बनाती है। यह वह भाषा है जिसे विविधता के नाम पर पढ़ें और भूलें।
"निजी भाषा" का आर्थिक निजीकरण की प्रक्रिया से गहरा संबंध है । इसके अलावा "मृतभाषा" के जमकर प्रयोग हो रहे हैं। ख़ासकर नेताओं के भाषणों में यह भाषा ख़ूब इस्तेमाल की जा रही है।
"मृतभाषा" की शुरुआत आपातकाल के साथ होती है। सन् 1977 के बाद यह परवान चढ़ती है और राममंदिर आंदोलन, आरक्षण आंदोलन ,पृथकतावादी आंदोलन और आतंकी आंदोलन में यह मांसल बनती है और सोनिया,माया,मुलायम ,अन्ना हज़ारे आदि इसके नायक हैं। यह भाषणकला से बेहतरीन गद्यभाषा की विदाई की सूचना भी है।
उत्तर आधुनिक अवस्था के आने के साथ "व्यक्तिवाद" और "व्यक्ति" का एक विषय के रुप में साहित्य में अंत हो जाता है । ख़ासकर विगत 40 सालों में आई आत्मकथाओं में इसे आसानी से देखा जा सकता है। दलित और स्त्री की आत्मकथाओं में "व्यक्ति" के तौर पर कम और समूह या समुदाय के सदस्य के रुप पर ज़्यादा ज़ोर है।
आधुनिकता के दौर में व्यक्ति और व्यक्तिवाद एक महत्वपूर्ण फिनोमिना के तौर पर पैदा होता है वहीं पर " मैं" और "निजी अस्मिता" की अभिव्यक्ति पर भी ज़ोर था । उत्तर आधुनिकता के आते ही पुराने व्यक्तिवाद और व्यक्ति का अंत हो जाता है ।

भाषा में समय भी होता है। इसमें सामाजिक समय , मानवीय समय, अतीत ,भविष्य और स्मृति भी समाहित होती है। इसमें निजी अस्मिता भी होती है। ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। भाषा में समय की अनुभूतियाँ भी होती हैं । वाक्य स्थिर नहीं होते। वे "समय" के साथ
चलते हैं। इसलिए भाषा और समय को एक साथ रखकर देखना चाहिए ।
नई उत्तर आधुनिक भाषा में एक पहलू उन्मादी भाषिक अनुभव का भी है। यह ऐसी भाषा है जो लेखक के भौतिक आधार से पूरी तरह कटी है। निजी अस्मिता को नहीं जानती। "मैं" को नहीं जानती। वह लेखन को 'अन्य' के लेखन से जोड़कर नहीं देखती। उसके साथ अंतर्क्रिया नहीं करती। यह संवृत्ति दलित और स्त्री लेखन में है।
जबकि पुराने मध्यकालीन स्त्री और दलितलेखन में यह नहीं है। यह उत्तर आधुनिक लेखक समय पर सवारी करने की कोशिश में है जो कि असंभव कार्य है। वह ऐसे यथार्थ को रच रहा है जिसमें आनंद नहीं है। बल्कि आनंद का विलोम ज़्यादा व्यक्त हुआ है । 

शनिवार, 31 अगस्त 2013

मनमोहन नीतियों का उल्टा खेल

भारत की अर्थव्यवस्था में अनेक समस्याएं हैं, विश्वमंदी का असर है, औद्योगिक उत्पादन कम हुआ है, भ्रष्टाचार चरम पर है,रूपया लुढ़क रहा है।बेकारी और मंहगाई है, इसके बाबजूद हालात बहुत खराब नहीं हैं। बैंकों में पर्याप्त पैसा है। सरकारी कर्मचारियों को नियमित पगार मिल रही है। संकट के बाबजूद साढ़े चार फीसदी विकास दर बनी हुई है। निवेश का माहौल भी है। कोई बैंक दिवालिया नहीं हुई है। 
जीवन की गति और विकास की गति में द्वंद्व और तनाव है लेकिन विकास धीमी गति से जारी है। इस स्थिति का श्रेय नेहरूयुगीन नीतियों के द्वारा निर्मित ठोस आर्थिक आधार को जाता है। मनमोहन सिंह के अनेक प्रयासों के बाबजूद बैंकिंग प्रणाली से लेकर अन्य क्षेत्रों में नियमों की विदाई नहीं की गयी और इसमें मजदूरों-किसानों के संगठनों खासकर वामदलों और कांग्रेस के अंदर सक्रिय नेहरूपंथियों की भी भूमिका रही है।
नव्य उदारवादियों की मांग थी कि अर्थव्यवस्था की सारी खिड़कियां खोल दो।यह मांग वामदलों ने कभी नहीं मानी और कहा था सारी खिड़कियां मत खोलो वरना ग्लोबल हवा में वह जाओगे वैसे भी जितनी खिड़कियां खोल रहे हो उससे भी प्रदूषित हवा ही आएगी और अब यह धारणा सही साबित हुई है।
कल मनमोहन सिंह संसद में मैन्यूफैक्चरिंग पर जोर दे रहे थे, ये ही साहब विगत बीस सालों से सेवाक्षेत्र पर जोर दे रहे थे। कल मनमोहन सिंह सादगी और कम खर्चे की बात कर रहे थे बीस सालों से खूब खर्च करो,बचत कम और खर्चे ज्यादा करो ,का नीतियों के तहत सुझाव दे रहे थे।
उपभोक्तावाद को बेलगाम हवा देने में मनमोहन सिंह की अक्षम्य भूमिका रही है। उनकी नीतियों ने सादगी को समाज में घृणा की चीज बना दिया है। अमीरी और शानोशौकत को आदर्श जीवन शैली बना दिया है। इसका ही दुष्परिणाम है कि आज मनमोहन सिंह कह रहे हैं सोना मत खरीदो। कांग्रेस को मनमोहन सिंह की नीतियों का उपभोक्तावादी और उपभोगवादी पैराडाइम बदलने के प्रयास करने चाहिए। मनमोहन सिंह और आनंद शर्मा ने विपक्ष और न्यायालयों को विकास का शत्रु या बाधक कहा है। असल में अवरूद्ध विकास तो मनमोहन सिंह की नीतियों में ही है। इनलोगों ने उत्पादक शक्तियों और बुनियादी उद्योगों के निर्माण पर कम जोर दिया और सेवाक्षेत्र पर ज्यादा जोर दिया। असंतुलित परिणाम सामने हैं। मनमोहन सिंह से पूछा जाए कि उनके विगत 9साल के शासन में केन्द्र सरकार ने कितने बड़े बुनियादी क्षेत्र में उद्योग स्थापित किए और जिन कारपोरेट घरानों के वे छूट और सहायता देते रहे हैं उनके द्वारा कितने बड़े उद्योग स्थापित किए गए ? मनमोहन सिंह से सवाल है कि उन्होंने क्या भिलाई जैसा कोई कारखाना स्थापित किया ? क्या दूरसंचार जैसा महान नेटवर्क स्थापित किया ? जी नहीं उल्टे दूरसंचार को निजीक्षेत्र को सौंप दिया ,मनमोहन सरकार को संचित पूंजी को खाने वाली सरकार कहा जा सकता है।

मंगलवार, 25 जून 2013

फेसबुक विचार वैतरणीः नव्य उदारीकरण के दुष्परिणाम



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डिजिटल क्रांति ने सीडी-डिस्क-कैसेट आदि के क्षेत्र में जो तबाही मचायी है उसके परिणाम आने लगे हैं। वीडियोकॉन समूह के प्लैनेट एम की बिक्री में गिरावट आई है और राजस्व में उसकी हिस्सेदारी कुछ साल पहले के 40 फीसदी से घटकर बमुश्किल एक चौथाई रह गई है। अगले साल तक यह घटकर 10 फीसदी रह जाएगी। रहेजा समूह के क्रॉसवर्ड के साथ भी यही किस्सा है। उसके राजस्व में संगीत की हिस्सेदारी बमुश्किल दो फीसदी रह गई है।(बिजनेस स्टैंडर्ड)
यानी नव्य उदार संगीत अब बेसुरा हो गया है।
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डिजिटल क्रांति ने सीडी और कैसेट उद्योग को बर्बाद कर दिया है। एचएमवी-ईएमआई रिकॉर्ड लेबल के स्वामी संजीव गोयनका के आरपीजी समूह ने अपने संगीत क्षेत्र के खुदरा कारोबार को बंद कर दिया है।
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उलटे विकास मॉडल का आलम यह है कि शहरों में पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ नहीं बचे हैं। सवाल यह है कि हमारे विकास मॉडल में फुटपाथ क्यों नहीं आते ?
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पिछले दो साल के दौरान भारत में बेरोजगारी 10.2 फीसदी की दर से बढ़ी है। 1 जनवरी 2012 को देश में बेरोजगारों की संख्या 1.08 करोड़ थी जबकि जनवरी 2010 में यह आंकड़ा 98 लाख था।
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कविता या साहित्यविधाओं का जासूसी एजेंसी से संबंध नहीं होता.नजरिए का संबंध होता है।लक्ष्यों का संबंध होता है। कमलेश के लेखन को खांचे बनाकर नहीं देखना चाहिए। समग्रता में देखना चाहिए। मैं तो इतना ही समझ पाया हूँ कमलेश को खांचों में बांटकर देखा जा रहा है। समग्रता में उनके नजरिए,एक्शन ,सृजन,आचरण,जीवनशैली और विचारधारा सबको मिलाकर देखना चाहिए। महज कवि रूप में देखना उपयोगितावाद है और यह अमेरिकीजीवन दर्शन का मूलाधार है।
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खबर है कि विश्व में अमेरिकी जासूसी को नंगा करने वाला एडवर्ड स्नोवदेन हांगकांग छोड़कर मास्को चला गया है। क्या यह नए शीतयुद्ध का आरंभ है ?
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कमलेश की परायीदृष्टि का आदर्श नमूना है यह वाक्य- "भारत में सभ्यता मृत पड़ी हुई है। भारतवर्ष के पढे-लिखे अपने अज्ञान में ही इतने अभिमानी हो रहे हैं कि उन्हें अपने चारों ओर पड़ी हुई यह लाश दृष्टिगोचर नहीं हो होती। " कमलेश पर हिन्दी में जो लोग माला चढ़ा रहे हैं और उनका भारतज्ञान पर फिदा हैं उनको इन वाक्यों को पढ़ना चाहिए और इसके गंभीर निहितार्थों को समझना चाहिए। कमलेश का भारतप्रेम देखें उनको भारत में सभ्यता मृत नजर आ रही है। बलिहारी अमेरिकीदृष्टि की।यह दृष्टिकोण सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का आदर्श नमूना है जिसमें अपनी भाषा,अपनी सभ्यता,संस्कृति आदि मृत लगती है या हेय लगती है। कहने की जरूरत नहीं है कि सीआईए का सांस्कृतिक साम्राज्यवाद से चोली-दामन का रिश्ता है।
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भारत का सबसे शिक्षित राज्य है केरल और इस राज्य में अपराध समूचे भारत में सर्वोच्च पर है। समूचे भारत में अपराधदर 196.7लोग प्रति एकलाख नागरिकों पर है,,जबकि केरल में 455.8 लोग है जो राष्ट्रीय अपराध दर से भी ऊपर है।
भारत की अपराध राजधानी है कोच्ची,वहां पर अपराधदर प्रति लाखपर 817.9है उसके बाद कोलम का स्थान है,यहां की अपराधदर है 637.3.लोग है .
क्या कारण है केरल जैसा शिक्षित,जागरूक,समाजवादीचेतना संपन्न राज्य अपराधदर में भी सबसे ऊपर चला गया ?
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स्काइप ने अमेरिकी प्रशासन की मदद करने वाला साइबर कार्यक्रम विकसित किया है जिसके तहत स्काइप पर होने वाले कम्युनिकेशन पर अमेरिकी प्रशासन जासूसी कर पाएगा।
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भारत सरकार ने अमेरिका की तर्ज पर ही बिना बताए,अदालत की परमीशन के बिना नागरिकों के फोन सुनने,ईमेल पढ़ने,एसएमएस पढ़ने आदि का पूरा सिस्टम खड़ा कर लिया है और भारत में इंटरनेट से लेकर मोबाइल तक का सारा कम्युनिकेशन सरकार की निगरानी के दायरे में रहेगा। कहां सोए हैं मानवाधिकारों के रखवाले संगठन और राजनीतिकदल ?
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हिन्दी के बुढ़ऊ धार्मिक (पूर्व फर्नाण्डीजपंथी सोशलिस्ट) लेखक कमलेश में अचानक पैदा हुई सीआईएचेतना अवचेतन के गर्भ से पैदा नहीं हुई है,यह सचेत सीआईए प्रचार अभियान का हिस्सा है। यह अकस्मात् नहीं है कि इसे रजा फाउण्डेशन की पत्रिका ने छापा है, रजा फाउण्डेशन के कर्ता हैं अशोक बाजपेयी,जो अमेरिकीपरस्त कलाकर्म के लिए हिन्दी में पहले ही यश कमा चुके हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दी अकेली भाषा है जहां आज भी अमेरिकाविरोधी स्वर प्रमुख है और इस चेतना को प्रभावित करने के लिए कमलेश-उदयन बाजपेयी-अशोक बाजपेयी का यह सामूहिक प्रयास है। इसतरह के हमलों का मुँहतोड़ जबाब देने की जरूरत है।
-12-
कुलदीपजी, रामस्वरूप,वह व्यक्ति है जो भारत-चीन आदि के लिए एक साथ जासूसी करता था और रॉ के लिए जासूसी करता था, मुझे याद है वह जब दिल्ली में गिरफ्तार किया गया तो उसके घर से 1 ट्रकभर कर भारत सरकार की गोपनीय फाइलें निकली थीं और वह सरकारी कर्मचारी को एक बोतल,एक औरत और 2हजार रूपये की घूस देकर भारत सरकार के किसी भी मंत्रालय के गोपनीय दस्तावेज सीआईए और चीन आदि देशों को मुहैय्या कराता था और यही रामस्वरूप दिल्ली में केजीवी के खिलाफ पोस्टरबाजी संगठित करता था और सीआईए के प्रचार अभिियान संगठित करता था। मैंने अपने जेएनयू एसएफआई अध्यक्ष के नाते कई पर्चे उस जमाने में इस व्यक्ति के नाम जारी किए थे।
-13-
कमलेश का लेखन चंडूखाने की चिन्ताओं की देन है वहां तथ्य और सत्य ढ़ूंढ़ना सही नहीं होगा।आपने सही जगह रेखांकित किया है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इस पत्रिका के संपादकको संपादकीय विवेक नहीं है ,उसने तथ्यों की जांच किए बिना इस तरह की सूचनाएं प्रकाशित करके लघु पत्रिकाओं की परंपरा को कलंकित किया है। लगता है अशोक बाजपेयी के मालगोदाम में सिर्फ भूसा ही भरा है।
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अमेरिका में रहने के दुख-4-

अमेरिका में हैं और सत्तासुख चाहते हैं तो ईसाइ फंडामेंटलिज्म और अन्य किस्म के फंडामेंटलिज्म के साथ याराना रखना होगा। खासकर अमेरिका स्थित ईसाइ फंडामेंटलिस्टों के सामने नतमस्तक करके रहना होगा।
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अमेरिका में रहने के दुख-3-

अमेरिकी सिस्टम के नेता हैं तो गरीबों का भाषण में जिक्र न आए,चुनाव में बोल सकते हैं लेकिन बाद में गरीब का नाम लेना भी गुनाह है।मजदूरवर्ग पदबंध तो एकदम प्रतिबंधित है।
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अमेरिका में रहने के दुख-2-

यदि अमेरिका के राष्ट्रपति हैं तो देश को एक बड़ा युद्ध सौगात में देकर जाएं जिससे हथियार बनाने वाली कंपनियां खुश रहें और आपके दल का ख्याल रखें। युद्ध नहीं तो राष्ट्रपति पद नहीं।
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अमेरिका में रहने के दुख-1-

यदि आप मुसलमान हैं और आपका नाम मुस्लिम परंपरा से आता है तो तय है अमेरिकी पुलिस-जासूसी एजेंसियां आप पर 24 घंटे निगरानी रखेंगी।
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अमेरिकी मिथ-6-

अमेरिका के बारे में यह मिथ है कि वह स्वतंत्र नागरिकों का देश है। सच यह है कि अमेरिका के नागरिकजीवन पर सरकारी एजेंसियों की कड़ी नजरदारी है और निजी कम्युनिकेशन में हस्तक्षेप भी है।
अमेरिकी मिथ-5-

यह मिथ है कि अमेरिका तो सुखियों-धनियों और स्वस्थ लोगों का देश है। सच यह है कि अमेरिका में बड़ी तादाद में गरीब हैं,मुसीबत के मारे हुए लोग हैं और बड़ी संख्या में बीमारलोग भी हैं।
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अमेरिकी मिथ-4-

अमेरिका के बारे में मिथ है कि वहां पर औरतें बड़ी भली होती हैं। सच यह है कि वहां पर औरतों में पुरूषों के ऊपर हमला करने,ब्लिच आंखों में फेंककर हमला करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है।
अमेरिकी मिथ-3-

अमेरिका के बारे मे मिथ है कि वहां चोर.उचक्के,मस्तान ,मवाली टाइप लोग नहीं होते। सच यह है कि वहां हर शहर में अपराधियों के संगठित गिरोह सक्रिय हैं।
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अमेरिकी मिथ-2-

अमेरिका के बारे में मिथ है कि अमेरिका में स्त्रीपीड़क नहीं हैं.सच इसके विपरीत है स्त्रियों के प्रति उत्पीड़न के मामले में अमेरिका अनेक देशों में अग्रणी है।
अमेरिकी मिथ-1-

अमेरिका के बारे में मिथ है कि वहां सबकुछ शांत और सभ्यता के वातावरण में चल रहा है। यह भी मिथ है कि अमेरिकी लोग बड़े भले,शरीफ और सहिष्णु,मिलनसार होते हैं। यह सच है कि अमेरिका में शरीफ,शांत,सहिष्णुओं की संख्या तेजी से घटी है और अब वे अल्पसंख्यक हैं।
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फेसबुक के बिना कितना कष्ट होता है,कोई रहीम से पूछे-

बिन देखें कल नाहिन, यह अखियान ।
पल-पल कटत कलप सों, अहो सुजान ॥
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फेसबुक मित्रता का फंडा-

रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो न प्रीति ।
काटे चाटे स्वान के, दुहूं भांति विपरीति ॥
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फेसबुक पर पूर्वाग्रह या मन की गांठें रखकर बातें न करें,गांठें स्पष्ट कम्युनिकेशन बाधित करती हैं-

रहिमन खोजे ऊख में, जहां रसनि की खानि ।
जहां गांठ तहं रस नहीं, यही प्रीति में हानि ॥
-22-
नए आधुनिक समाज में चिंता एक बड़ी समस्या है,इस पर रहीम को पढ़ें-

रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत ।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत ॥
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फेसबुक और चैटिंग में जो लोग दुख बांटते हैं उनके लिए रहीम का पद-

रहिमन निज मन की विथा, मन ही राखो गोय ।
सुनि अठिलै है लोग सब, बांटि न लैहे कोय ॥
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रहिमन प्रिति सराहिए, मिले होत रंग दून ।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून ॥ रहीम।।
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टेंशन फ्री रहने नुस्खा-

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह।।
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समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।

चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक।।रहीम।।
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।

जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय।।रहीम।।
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भरोसो जाहि दूसरो सो करो ।। तुलसीदास।।
सुनि ऊधौ मोहिं नैकू न बिसरत वै ब्रजवासी लोग ।।सूरदास।।

-फेसबुक-ईमेल-एसएमएस से खुश होने वालों के लिए सूरदास का यह पद जरूर पढ़ना चाहिए-

ऊधौ कहा करैं लै पाती ।
जौ लौं मदनगुपाल न देखैं, बिरह जरावत छाती ॥
निमिष निमिष मोहि बिरसत नाहीं, सरद जुहाई राती ।
पीर हमारी जानत नाहीं, तुम हौ स्याम सँघाती ॥
यह पाती लै जाहु मधुपुरी, जहँ वै बसैं सुजाती ।
मन जु हमारे उहाँ लै गए, काम कठिन सर घाती ॥
सूरदास प्रभु कहा चहत हैं, कोटिक बात सुहाती ।
एक बेर मुख बहुरि दिखावहु, रहैं चरन रज-राती ॥
-23-
कमलेश की मुश्किल है वे अंग्रेजी में बौद्धिक होना चाहते हैं,लेकिन वे ठीक से इस भाषा में न तो सोच पाते हैं और न लिख ही पाते हैं। उनको यदि मातृभाषा से प्रेम है तो हिन्दी में लिखें और फिर अपने लिखे को पढ़ें कि वे कैसे दिखते हैं,कम से कम एक लेखक का अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल करना असभ्य माना जाता है। कमलेश ने झूठ का लबादा अपने ऊपर डाला हुआ है फलतः वे झूठ के अलावा और कुछ नहीं देख पा रहे हैं।सीआईए की वैचारिकसेवा इस तरह के लोग ज्यादा मुस्तैदी से करते हैं जो झूठ का लबादा ओढे रहते हैं।
-24-
हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 4-

इराक में तथाकथित मानवीय हस्तक्षेप करने के पहले मीडिया में यह प्रौपेगैण्डा किया गया कि इराक के पास जनसंहारक अस्त्र हैं,रासायनिक अस्त्र हैं और जल्द हमला न किया गया तो इराक अमेरिकी शहरों पर हमले कर देगा। बाद में अमेरिकी सेना के इराक में जाने पर कहीं पर भी जनसंहारक अस्त्र नहीं मिले।इससे मीडिया के झूठ पर से पर्दा उठा।
इसबार सीरिया के संदर्भ में यही कहा जा रहा है असद की सत्ता रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रही है ।इस बहाने अमेरिका हस्तक्षेप करने का बहाना बना रहा है।
असद सरकार के खिलाफ विपक्ष को सैन्यमदद अमेरिका और नाटो देश मदद तुरंत बंद करें।उनका इस तरह का काम सीरिया की संप्रभुता पर हमला है.इससे सीरिया में जन-धन आदि की व्यापक क्षति हुई है।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 3-

जानकार लोग कह रहे हैं कि सीरिया में अलकायदा को अमेरिका की ओर से रासायनिक हथियार और अन्य सैन्य सामग्री इफरात में मुहैय्या करायी जा रही है। इससे मध्यपूर्व और दूसरे देशों में अलकायदा की शक्ति और संहारक क्षमता का विकास होगा।भारत उनके निशाने पर आ चुका है लेकिन मनमोहन सरकार को इस मामले में सख्त नजरिया अपनाना चाहिए।वरना भारत के अफगानिस्तान हितों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अलकायदा और तालिबान के साथ पाकस्थित आतंकियों का याराना जगजाहिर है,इसके बाबजूद मनमोहन सरकार ने सीरिया के गृहयुद्ध में अमेरिकी भूमिका की अभी तक जिस तरह अवहेलना की है और हमारे देश का विपक्ष (खासकर वामदल)भी शांत है वह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 2-

सन् 2003 में बुश प्रशासन ने इराक के खिलाफ युद्ध की घोषणा की तो 10साल बाद ओबामा ने सीरिया में विपक्ष को सैन्य मदद की घोषणा करके बुश प्रशासन की युद्धवादी नीति को दोहराया है। सीरिया के गृहयुद्ध में अब तक 80हजार से ज्यादा निरपराध नागरिक मारे गए हैं। एक तरह से समूचे देश को शरणार्थी बना दिया गया है,सीरिया के पड़ोसी देशों में लाखों सीरियाई शरणार्थी की तरह अमानवीय स्थितियों में जी रहे हैं। इस सबके बावजूद अमेरिका की मनमोहन सरकार खुलकर आलोचना नहीं कर रही,इससे हमारे देश की मध्यपूर्व के देशों में साख गिर रही है।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 1-

अमेरिकी प्रशासन ने हाल ही में सीरिया में विपक्ष को हथियारों और अन्य रूप में मदद करने का फैसला किया है और इससे एकबार फिर से पुष्टि हुई है कि अमेरिका हिंसा का उत्पादक देश है।
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अमेरिका की सारी दुनिया में चल रही जासूसी की हरकतों का पिटारा जिस तरह खुला है उसे लेकर कम से कम भारत के इंटरनेट लेखकों,फेसबुक यूजरों और नागरिकों को मिलकर मोर्चा बनाकर सरकार पर दबाब डालना चाहिए। मनमोहन सरकार ने अमेरिकी नजरदारी को जिस तरह ठंड़े बस्ते के हवाले किया है वह हम सबकी कायरता की निशानी है।
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बुधवार, 20 जुलाई 2011

फेसबुक पर सत्ता का कसता शिकंजा


 भारत सरकार ने हाल ही में याहू.गूगल,माइक्रोसॉफ्ट आदि कंपनियों को वह सॉफ्टवेयर प्रदान करने का आदेश दिया है जिसके आधार पर वह उनके सरवर के जरिए नेट पर चल रही भारतीयों की सभी किस्म की गतिविधियों की निगरानी कर सके। उपग्रह संचार ने जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जन्म दिया था उसके साथ सत्ता का अन्तर्विरोध बढ़ता जा रहा है। अमेरिका में भी इंटरनेट और सत्ता के अन्तर्विरोध तीखे हो गए हैं। साइबर कानूनों को कड़ा बनाया जा रहा है। जिससे इंटरनेट पर मुक्त अभिव्यक्ति बाधित होगी। इस काम में इंटरनेट सर्विस प्रदाता कंपनियां सत्ता के चौकीदार की भूमिका अदा कर रही हैं। वे रीयलटाइम में ऑनलाइन पर आने वाले लाखों -करोड़ों संदेशों को विश्लेषित करके सत्ताकेन्द्रों को संप्रेषित कर रहे हैं। पहले किसी को यह समझ में नहीं आया कि इंटरनेट को कैसे नियंत्रित किया जाएगा लेकिन बाद में इसका भी रास्ता निकाल लिया गया । अब इंटरनेट सर्विस प्रदाता कंपनी ही यूजर पर निगरानी करने लगी है।

नये कानून के अनुसार भारत और अमेरिका में इंटरनेट पर ब्लॉग से लेकर फेसबुक तक गुमनाम टिप्पणी लिखना अपराध घोषित होने जा रहा है। प्रशासन चाहता है कि इंटरनेट पर सही नाम से लिखा जाए। ऑनलाइन गुमनामी को खत्म करने के साथ ही इंटरनेट कंपनियों ने एक नया सिस्टम ईजाद किया है जिस पर कनाडा की एक प्राइवेसी वाचडाग संस्था ने लिखा है कि गुमनामी खत्म होते ही प्रत्येक आदमी की 24 घंटे निगरानी करने में मदद मिलेगी।  इंटरनेट पर गुमनाम टिप्पणी लिखने वाले लेखकों की प्रकृति क्या है,वे कौन हैं और क्यों लिखते हैं ,इन सबका पता लगा लिया गया है। ट्विटर,ब्लॉग,इंटरनेट, फेसबुक आदि पर जो लोग अनाम टिप्पणियां लिखते हैं उन्हें अब चिह्नित कर लिया गया है। विज्ञान तत्वशास्त्र के विद्वान डेविड मिसकेविज ने अपने अनुसंधान के जरिए अनाम लोगों की पहचान की है। मिसकेविज ने यह रहस्योदघाटन चर्च की एक घरेलू पत्रिका में प्रकाशित लेख में किया है। मिसकेविज का मानना है इंटरनेट पर ‘अनाम’ मुखौटे वाले सबवर्सिव और अराजकतावादी हैं। ये लोग मनोरंजन उद्योग पर आए दिन हमले करते हैं।ये लोग विकीलीक पर भी बेहद सक्रिय हैं। इसके अलावा फेसबुक के मालिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जिसके तहत यूजर इमेज को कम्प्यूटर पहचान लेगा और उस पर टैग भी लगा देगा। अभी इस तकनीक का प्रयोग अमेरिका में किया जाएगा। फेसबुक के अनुसार अभी वह प्रतिदिन दस करोड़ फोटो पर टैग लगाने का काम कर रहा है। फेस रिकॉगिनीशन प्रोसेस के नाम से यह प्रक्रिया फेसबुक ने आरंभ की है। इस प्रक्रिया का निहितार्थ यह भी है कि फेसबुक पर नकली फोटो के साथ भ्रमण करना अब खतरे से खाली नहीं होगा। प्रत्येक इमेज पर टैग होगा। जब इमेज के साथ कोई टैग लगी है तो आप सहज ही उससे अपने को विच्छिन्न नहीं कर पाएंगे। यह काम फेसबुक का सिस्टम स्वचालित ढ़ंग से करेगा। मसलन किसी नाम के साथ अगर कोई टैग तय हो चुका है तो फिर उसका कोई अन्य दुरूपयोग नहीं कर पाएगा। आप जो भी इमेज पोस्ट करेंगे वह टैग दिखाई जाएगी,आप चाहें तो अपनी टैग में रद्दोबदल कर सकते हैं लेकिन बिना टैग के अब फेसबुक पर कोई इमेज नहीं होगी। इससे फेसबुक नजरदारी बढ़ जाएगी। संबंधित टैग से जुड़ी सूचनाएं स्वतः एक जगह संचित होती जाएंगी।  दूसरी ओर एक सर्वे से यह भी पता चला है कि फेसबुक पर आनंद के विषयों का बोलवाला है। वहां पर गंभीर विषयों पर बहुत कम बातें हो रही हैं। मसलन् फेसबुक और ट्विटर पर इराक-अफगानिस्तान युद्ध ,नव्य आर्थिक उदारीकरण, भूमंडलीकरण,मंदी बेकारी, निरूद्योगीकरण ,अमेरिका की आंतरिक राजनीति और देशज राजनीतिक विवाद एकसिरे से गायब हैं।
     सोशल नेटवर्क के प्रभाव के बारे में हम जितना जानेंगे उतना ही बच्चों और युवाओं को भी बेहतर ढ़ंग से जान पाएंगे। बच्चों और युवाओं का बहुत बड़ा हिस्सा सोशल नेटवर्क पर विभिन्न किस्म के संचार और संपर्क का काम कर रहा है। मसलन अमेरिका में 75 प्रतिशत युवा (18-24 साल की आयु के) सोशल नेटवर्क पर जाते हैं। 65 साल से ऊपर की आयु के मात्र 7 प्रतिशत लोग ही सोशल नेटवर्क पर जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि सोशल नेटवर्क युवाओं का माध्यम है। जबकि 25-34साल आयु के 57 प्रतिशत,35-44 साल के 30 प्रतिशत,45-54 साल के 19 प्रतिशत,55-64 साल के 10 प्रतिशत लोग सोशल नेटवर्क पर जाते हैं।
   विभिन्न सामाजिक नेटवर्क में माइस्पेस पर 50 प्रतिशत,फेसबुक पर 22 प्रतिशत और लिनकेदिन पर 6 फीसदी का प्रोफाइल है। ज्यादातर तरूण अपने परिचितों के साथ ही जुड़ते हैं। 51 फीसदी सोशल नेटवर्क यूजर की दो या उससे ज्यादा ऑनलाइन प्रोफाइल हैं। जबकि 43 प्रतिशत का एक ही प्रोफाइल है।ज्यादातर सोशल नेटवर्क यूजर प्राइवेसी सचेतन हैं। इसके बावजूद यूजरों की वेब पर प्रच्छन्नतःजासूसी जारी है। लेकिन फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्क ऑफिसों में समग्र ऑफिस समय का 1.5 फीसदी समय बचाते हैं। यह बात ' नुक्लिस रिसर्च' के पिछले साल कराए सर्वे में सामने आयी है। एक अन्य संस्था मोर्से के सर्वे में यह तथ्य सामने आया है कि ब्रिटिश कंपनियों को फेसबुक जैसे मंचों के  जरिए काम करने से सालाना 2.2 बिलियन डॉलर का लाभ हुआ है। यह भी पाया गया है कि छोटे स्तर पर ब्लॉगिंग में खर्च होने वाला समय वस्तुतः समय की बर्बादी है। इसके विपरीत फेसबुक में आप निरंतर संपर्क,संवाद और उच्चकोटि की सर्जनात्मकता बनाए रख सकते हैं। फेसबुक में सर्जनात्मक निरंतरता बनाए रखने की क्षमता है। वह इंटरनेट की सभी विधाओं का निर्धारक है। इंटरनेट में क्या होगा ,ऑनलाइन समूह क्या करेंगे,यूजर कैसे रहे ,उसकी प्राइवेसी क्या है,सार्वजनिक क्या है और यूजर को कैसे बोलना चाहिए,कैसे व्यक्त करना चाहिए,भावों-संवेदनाओं और अनुभूतियों को कैसे व्यक्त करें आदि बातों का निर्धारक फेसबुक है। फेसबुक में सभी पूर्ववर्ती मीडिया और नेट विधाओं का समाहार कर लिया है। अनेक अभिव्यक्ति रूपों को सार्वजनिक कर दिया है।




सोमवार, 4 जुलाई 2011

रामगोपाल वर्मा,मारिया और रियलिटी शो


पोर्न फिल्मों में रीयल अभिनेता-अभिनेत्रियां काम करते हैं। इन लोगों को कामुकता और संभोग के वास्तव दृश्यों को फिल्माना होता है। अभी तक यह क्षेत्र हिन्दी में घासलेटी सेक्स फिल्मों तक सीमित था,इसमें काम करने वालों को बॉम्बे के नामी निर्देशक जगह नहीं देते थे। भारत में बनने वाली अधिकांश सेक्स फिल्मों का निर्माण युवा और अभावग्रस्त कलाकारों को लेकर होता रहा है और इन फिल्मों का अवैध रूप में प्रदर्शन और वितरण भी होता रहा है।

केबल संस्कृति और पोर्न संस्कृति के प्रचार ने इन फिल्मी कलाकारों की मांग बढ़ा दी है। सेक्स फिल्मों के उत्पादन और खपत में इजाफा किया है। एक जमाने में मैनस्ट्रीम सिनेमा और टीवी के लिए सेक्स फिल्मों के अभिनेता अभिनेत्रियां अछूत थे। उसी तरह जिस व्यक्ति ने वास्तव जीवन में अपराध किया है वह भी फिल्मी अभिनय के लिए नहीं चुना जाता था। लेकिन इंटरनेट के प्रसार ने पोर्न संस्कृति को नई बुलंदियों पर पहुँचाया है। पोर्न को स्वीकृति दिलायी है। उसकी निजी खपत को वैधता प्रदान की है। बीएसएनएल से लेकर टाटा-बिडला-मित्तल आदि कारपोरेट घरानों के द्वारा संचालित नेट कंपनियों ने पोर्न के प्रसारण को वैधता दी है, और ये कंपनियां सरकारी और गैर सरकारी बैंकों के जरिए पोर्न की नेट के जरिए बिक्री करके धंधा भी कर रही हैं। यानी सरकारी और गैर सरकारी तंत्र ने पोर्न संस्कृति को वैध बनाया है।

आज पोर्न देखना वैध है। यही वह पैराडाइम शिफ्ट है जिसमें रीयलिटी टीवी ने उन तमाम लोगों को चुना है जो एक जमाने में किसी न किसी अपराधकर्म में लिप्त पाए गए और मीडिया कवरेज के केन्द्र में आ गए। इसी प्रसंग में बॉम्बे फिल्म उद्योग ने सबसे पहले जम्मू-कश्मीर के चर्चित सेक्सकांड,जिसमें दर्जनों बड़े अफसर और कई मंत्री शामिल थे, उस सेक्सकांड की शिकार कश्मीर सुंदरी को शामिल करके उस कांड पर फिल्म बनायी ।

हाल ही में इसी पोर्न संस्कृति की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए फिल्म निर्माता-निर्देशक रामगोपाल वर्मा ने अपनी फिल्म के लिए मारिया को अभिनय का निमंत्रण देकर एक नए विवाद को जन्म दिया है। मारिया को सेशन अदालत ने नीरज ग्रोवर मर्डर हत्याकांड में सबूतों को मिटाने के लिए दोषी पाया था ,यह हत्याकांड 7 मई, 2008 को हुआ था। उसे तीन साल की सजा हुई थी,जिसे वह भोग चुकी है। उस केस में मारिया को मीडिया ने व्यापक कवरेज दिया।

मारिया इस हत्याकांड में पकड़े जाने के पहले तक टीवी उद्योग में पैर जमाने और काम पाने के लिए काफी प्रयास करती रही लेकिन सफल नहीं हुई। लेकिन हत्याकांड के बाद जो मीडिया कवरेज आया उसने मारिया को मीडिया का चर्चित माल बना दिया। अब मारिया के सजा भोगने के बाद मुक्त रूप में बाहर आते ही रामगोपाल वर्मा ने उसे अपनी फिल्म के लिए अनुबंधित करने का फैसला किया है।

सुना है स्टार समूह बिग बोस की अगली सीरीज के लिए मारिया को 5 करोड़ रूपये का प्रस्ताव कर चुका है। और भी कई निर्माता हैं जिनकी हठात मारिया में दिलचस्पी बढ़ गयी है। रामगोपाल वर्मा उस हत्याकांड पर फिल्म ही बनाना चाहते हैं। वे मारिया को वास्तव चरित्र के रूप में फिल्मी पर्दे पर रीयलिटी टीवी फॉरमेट में लाना चाहते हैं। हिन्दी फिल्मों में इसके पहले किसी अपराधी को मैनस्ट्रीम सिनेमा के किसी निर्माता-निर्देशक ने रीयल इवेंट फिल्माने के लिए अनुबंधित नहीं किया।

अपराध पर फिल्में बनी हैं लेकिन उसमें कोई वास्तव अपराधी ही काम करे ऐसा नहीं हुआ। कई टीवी रिय़लिटी शो में ऐसे लोगों को अभिनय करते देखा गया है जो किसी न किसी अपराधकर्म में लिप्त होने के कारण मीडिया कवरेज पा गए और उन्हें रीयलिटी टीवी वालों ने प्रदर्शन के लिए चुन लिया।

इस प्रसंग में कई विचारधारात्मक सवाल उठे हैं। इनमें पहला सवाल यह है कि क्या मीडिया कवरेज में व्यक्ति की इमेज का रूपान्तरण होता है ? किस रूप में रूपान्तरण होता है? इस तरह के चरित्र कैसे ब्रॉण्ड बनते हैं ? असल में मीडिया में प्रचार का महत्व है । यह सकारात्मक हो या नकारात्मक प्रचार होना चाहिए। इसके बाद संबंधित व्यक्ति कोई भी हो,पापी हो या पुण्यात्मा हो,वह मीडिया प्रोडक्ट होता है। मीडिया अपने बनाए खिलौनों को ही प्यार करता है। मीडिया के लिए प्रचार ही महान है।

रामगोपाल वर्मा हों या अन्य कोई निर्माता-निर्देशक,वे अपराधियों को सीधे मीडिया प्रोडक्ट के रूप में पेश करके अपराधीकरण का महिमामंडन कर रहे हैं ,ये लोग अपराध और अपराधी को महत्ता देकर अपने को फिल्म परंपरा से निकालकर रियलिटी टीवी परंपरा और पोर्न परंपरा में ले आए हैं।यह फिल्मीस्तान में पोर्नयुग के सीधे प्रभाव की अभिव्यक्ति है।

नीरज ग्रोवर हत्याकांड का केस अभी खत्म नहीं हुआ है।इस केस के आगे भी चलने के चांस हैं। आगे भी मारिया को मीडिया कवरेज मिलेगा। यही मारिया के प्रचार और कलाकर्म की सबसे बड़ी पूंजी है। मीडिया में अपराधी,भला आदमी,शरीफ और कातिल आदि केटेगरी नहीं होती। मीडिया में तो सिर्फ प्रौपेगैण्डा महत्वपूर्ण है। इमेजों का अहर्निश प्रक्षेपण ही महत्वपूर्ण है। इमेज वर्षा नया ब्रॉण्ड बनाती है। मारिया का अहर्निश कवरेज और उसके प्रतिवाद का आंदोलन मारिया को पीत पत्रकारिता का नामी व्यक्तित्व बना रहा है। इससे उसके लिए अभिनय की नई संभावनाओं के द्वार खुल सकते हैं।

बुधवार, 29 जून 2011

ममता सरकार की आर्थिक चुनौतियां


              ममता सरकार ने हाल ही में जो नए आर्थिक कदम उठाए हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण है नव्य उदार आर्थिक नीतियों के प्रति खुला समर्थन। यह समर्थन पिछली सरकार की नीतियों के क्रम में ही आया है। ममता सरकार ने विधानसभा में जो बजट पेश किया है वह कमोबश पुरानी सरकार का बनाया हुआ है। इसमें कोई नई चीज नहीं है। बल्कि कुछ लोग जो नए की उम्मीद कर रहे थे उन्हें निराशा हाथ लगी है। बजट प्रस्तावों में प्रत्येक मद में औसतन 10फीसदी की बढोतरी का वाम जमाने का फार्मूला बरकरार है। नए वित्तमंत्री ने पुराने वित्तमंत्री द्वारा बनाई लक्ष्मणरेखा का अतिक्रमण नहीं किया है। एक नई चीज है राज्य में 17 नए औद्योगिक केन्द्रों का निर्माण। सवाल यह है कि राज्य के अंदर क्या इतने बड़े पैमाने पर औद्योगिक विकास की संभावनाएं हैं ?
वाम शासन ने एक जमाने में इस दिशा में सोचा था लेकिन यह योजना बुरी तरह पिट गयी। ममता सरकार को कायदे से पहले उन तमाम व्यापारिक समझौतों को उठाना चाहिए जो पिछली सरकार ने किए थे। उन प्रकल्पों में काम आरंभ करने के प्रयास करने चाहिए जिनको तृणमूल कांग्रेस के नेताओं-माओवादियों ने धमकी देकर बंद करा दिया था। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है जिंदल ग्रुप का सालबनी इस्पात प्रकल्प। यह प्रकल्प चालू कराने में यदि ममता सरकार सफल होती है जो इससे राज्य में उद्योग जगत का विश्वास लौटेगा साथ ही ममता सरकार को माओवादियों का भी कद छोटा करने का मौका मिलेगा। साथ ही उन कारखानों के निर्माण पर जोर देना चाहिए जहां विवाद नहीं है। विवाद के क्षेत्रों से बचना चाहिए। ममता सरकार की अच्छी बात है कि इसमें नव्य आर्थिक उदारीकरण के पक्षधर और विरोधी दोनों ही वामविरोध के कारण शामिल हैं। इससे नव्य आर्थिक उदारीकरण के खिलाफ चले आ रहे प्रचार अभियान को धराशायी करने में उन्हें मदद मिलेगी। इससे अमेरिका,ब्रिटेन आदि खुश होंगे और यहां पर विदेशी पूंजी निवेश भी बढ़ेगा।
ममता सरकार ने जिस तरह केन्द्र सरकार द्वारा गैस के दामों में 50 रूपये की बढ़ोतरी को अस्वीकार किया और राज्य में गैस पर 16 रूपये कम किए हैं। उससे वामशासन की वैट कम करने की नीति का ही विस्तार हुआ है। वामशासन ने एकबार पेट्रोल-डीजल के दामों पर एक रूपया वैट कम करने का फैसला किया था इसी मार्ग पर चलते हुए राज्य सरकार ने गैस पर 16 रूपये कम करने का फैसला किया है। कायदे से केन्द्र में तृणमूल कांग्रेस को दबाब की कोशिश करनी चाहिए थी,लेकिन केन्द्र सरकार पर दबाब न डालकर ममता सरकार ने संदेश दिया है कि वह डीजल-गैस-कैरोसीन के दामों में की गई बढोतरी के बारे में एकमत है, लेकिन स्थानीय राजनीतिक दबाब और पापुलिज्म के एजेण्डे के चलते 16 रूपये कम कर रही है।  नई बढ़ोतरी से गैस के दामों में नाममात्र की राहत मिलेगी लेकिन इससे फंड के लिए परेशान राज्य को 75 करोड़ रूपये का नुकसान उठाना पड़ेगा।
    ममता सरकार को पापुलिज्म पर अंकुश लगाना होगा। पापुलिज्म के आधार पर भीड़ जुटायी जा सकती है। आंदोलन हो सकता है लेकिन अर्थव्यवस्था को नहीं चलाया जा सकता। आने वाले महिनों में गैस ,डीजल और पेट्रोल के दामों में और भी बढोतरी होगी तब राज्य सरकार क्या करेगी ? ममता सरकार को आर्थिक नीतियों के मामले में तदर्थवाद से बचना चाहिए। इसी तरह पिछली वाम सरकार द्वारा अधिग्रहीत जमीन के मामले में भी पापुलिज्म से बचना होगा। ममता सरकार ने नई भूमिनीति के तहत राजारहाट इलाके में 1,795 एकड़ जमीन के सरकारी अधिग्रहण नोटिसों को वापस ले लिया है। इस संदर्भ में उन्हें यह पक्ष ध्यान में रखना चाहिए कि जिन जमीनों का अधिग्रहण वापस लिया है उससे क्या औद्योगिक घरानों के पूंजी निवेश और चालू योजनाओं पर असर होगा ? ममता सरकार का भूमि अधिग्रहण नोटिस वापस लेना स्वयं में अनेक बुनियादी किस्म की समस्याओं को जन्म देगा ? मसलन् राज्य में उद्योगों के लिए राज्य सरकार ने जो जमीनें विगत वर्षों में किसानों  से अधिग्रहीत की हैं क्या वे सब जमीनें भी किसानों को वापस देदी जाएंगी ? क्या इससे औद्योगिक विकास होगा ? अथवा वामशासन में पैदा हुआ निरूद्योगीकरण और बढ़ेगा ? एक जमाने में वाम मोर्चा यही सोचता था कि किसानों की जमीन उनके पास रहे और वे उसका जैसे चाहें इस्तेमाल करें। लेकिन इससे राज्य लगातार पिछड़ता चला गया,किसानी में गिरावट आयी।
बड़ी संख्या में किसानों ने खेती बंद कर दी है। खेती से उनका गुजर-बसर नहीं हो रहा है। राज्य में विगत 34 सालों में खेती करने वाले किसानों की संख्या में कमी आयी है। ममता सरकार यदि किसानों को जमीनें वापस दिलाकर खेती के काम में ठेलना चाहती है तो इससे किसानों के जीवन में खुशहाली नहीं आएगी।  आज के दौर में किसानी फायदे का सौदा नहीं है।नेशनल सेम्पिल सर्वे के अनुसार राज्य में सन् 1987-88 में 39.6 प्रतिशत भूमिहीन मजदूर परिवार थे जो सन् 1993-94 में बढ़कर 41.6 प्रतिशत और 1999-2000 में 49.8 प्रतिशत हो गए। पश्चिम बंगाल में विभिन्न कारणों से पट्टादार और बर्गादार का जमीन से संबंध टूटा है। तेजी से पट्टादार और बरगादार किसानी छोड रहे हैं। सन् 2001 तक 13 प्रतिशत पट्टादार और 14 प्रतिशत बर्गादार खेती छोड़ चुके थे। दक्षिण 24 परगना में 22 प्रतिशत पट्टादार ,11 प्रतिशत बरगादार ,उत्तर 24 परगना में 17 प्रतिशत पट्टादार , 17 प्रतिशत बरगादार,बर्धमान में 12 प्रतिशत पट्टादार,15 फीसदी बरगादार,उत्तर दिनाजपुर में  23 प्रतिशत पट्टादार और 32 प्रतिशत बर्गादार, दक्षिण दिनाजपुर में 20 प्रतिशत पट्टादार और 31 प्रतिशत बरगादार ,दार्जिलिंग में 15 प्रतिशत पट्टादार और 16 प्रतिशत बरगादार,जलपाईगुड़ी में 17 प्रतिशत पट्टादार और 32 प्रतिशत बरगादार,कूचबिहार में 13 प्रतिशत पट्टादार और 31 फीसदी बरगादार, मालदा में 11 फीसदी पट्टादार 7 फीसदी बरगादार,मुर्शिदाबाद में 16 प्रतिशत पट्टादार और 19 प्रतिशत बरगादार खेती करना छोड़ चुके हैं। यानी जब किसानों में किसानी का रूझान घट रहा तब उन्हें किसानी की ओर धकेलने के प्रयास सफल नहीं हो सकते।

           



शुक्रवार, 17 जून 2011

खुदरा व्यापार में बहुराष्ट्रीय निगमों का खेल-शेखर स्वामी


भारत के खुदरा बाजार पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां खुले तौर पर हमला बोल रही हैं। देशी दुकानदारों का धंधा तबाही की ओर जा रहा है और केन्द्र सरकार खुलेआम बहुराष्ट्रीय निगमों की हिमायत कर रही है।अन्ना हजारे से लेकर विभिन्न राजनीतिक दल इस मसले पर चुप्पी साधे बैठे हैं। हिन्दू समूह के अखबार "बिजनेस लाइन " में शेखर स्वामी ने खुदरा उद्योग की सुंदर मीमांसा की है। हम यह लेख साभार दे रहे हैं-

In the first part of my series yesterday, I had stated that big multi-brand retailers in the West like the Walmarts and Tescos and Carrefours routinely mark up the prices on their entire basket of products by a minimum 2x, and this goes as high as 9x, compared with the retail/wholesale mark-ups in India.

The point that was made was that the efficiency of the channel should be determined by how much they charge the end consumer by way of mark-ups (which is the aggregate of the costs incurred and profits made by the channel). By this measure, I had concluded that the Indian distribution chain comprising wholesalers, distributors, stockists and retailers is among the most cost-effective and efficient in the world.

How can this possibly be?

NO CONSUMER CHOICE

Anyone who has followed business practices and rules will know the following simple truth about markets. The more consolidated a market is, providing less choice to the consumer, the more the retailer can mark up and charge ever higher prices. In reverse, the more fragmented a market is, providing ever more choices in terms of sources to the consumer, the lesser is the mark-up, as the retailers have to charge the least possible amount to be competitive and stay in business. When big multi-brand retail gets into a market, their game plan is to eliminate competition and build market clout. Let us look at two examples. In the US, the retail market size (excluding food service and automotive) was estimated at $3 trillion in 2009. Walmart clocked over $300 billion in US sales, for a remarkable 10 per cent market share. Such consolidated power, acquired over time, is used to squeeze cost on the supplier side, and improve mark-ups on the consumer side.

Walmart aims to be cheaper than other retailers, but its end goal is still to maximise returns to its shareholders. (People interested in learning about Walmart can get the book How Walmart is destroying America and the World… by Bill Quinn.)

UK's Tesco clocked sales of £61 billion ($99 billion) last year, and has a 30 per cent market share of the UK grocery store market, according to Wikipedia. This level of consolidation is unprecedented in the retail world, giving Tesco extraordinary power over both suppliers and consumers. A grocery shopper in the UK has at best a choice of two or three retailers in her vicinity (Tesco or Sainsbury or maybe an Aldi). This means, notwithstanding promotional offers, the price is always a premium, and retailers' power over the consumers' shopping pound is enormous. Their power over the manufacturer is also enormous, but that is another story altogether.

INDIAN SCENARIO

Compare this with India. We have dozens of small retailers in our immediate neighbourhoods vying for our shopping rupee. There is intense competition. Prices and mark-ups tend to be the lowest possible. We have a near-perfect market structure, where thousands of producers are providing goods to tens of thousands of retailers who are serving millions of consumers. No one really has the clout in the market to charge extra mark-ups. This is a ground-up phenomena, created by the energy and entrepreneurship of millions of small businesses. The government has played no role in organising this. The difference in market structure is illustrated in the visuals alongside.

If big multi-brand retail is allowed to enter India, what happened in the West will be repeated here. The story is well documented. A big retail outlet will be launched in an area with big fanfare. There will be lots of promotions and predatory pricing below cost of many essentials for extended periods. (Walmart has an expression for this called “Stomp the comp”, meaning sweep aside the competition.)

Consumers will be attracted by these deals, and will flock to the store. Small retailers cannot sustain loss of business for long. Most of them will fold up against this assault of big retail. It has happened without fail in every market. As the competition is wiped out, the big retailer gains clout over the suppliers and the consumers. They then get pricing power, gain control of the market, and steadily increase the mark-ups over time for maximising profits.

Against the background of the information above which is available in the public domain, one cannot help wonder how FDI in multi brand retail has been recommended by the committee, led by the Chief Economic Advisor to the

The news came out recently that the committee formed under the Chief Economic Advisor to the Government has recommended to the Cabinet that foreign direct investment in multi-brand retail (like Walmart, Tesco, Carrefour and others) should be permitted. As with any committee making such a recommendation, this one has gone on to justify why FDI in multi-brand retail would be beneficial to the country. The committee has talked about investment in supply chain infrastructure that is supposed to reduce wastage. It has stated that employment would go up, and farmers would somehow get a better pricing for their crop.

While the reasons advanced by the Committee are questionable and would hardly stand up to close scrutiny, I would not enter that debate here, since these reasons are not central to the issue. There should be one main question that should be posed to determine if FDI in multi-brand retail is justified — will such multi-brand retail reduce the cost of distribution from the producer (be it farmer or manufacturer) to the end consumer?

In marketing terms, this is known as the channel cost. In layman's terms, we can simply see it as the cost of moving/storing/financing/selling incurred between the point of production and the point of final sale to the consumer. This is the main measure of economic efficiency that we should look at.

Increase in cost

Let me answer this upfront. Multi-brand retailers like the Walmarts and Tescos will increase the cost to the consumer substantially over time, compared with wholesale/retail practices in India. There is plenty of evidence to prove this conclusively.

The increase in cost is not by some small percentage. Multi-brand retail mark-ups are at a minimum 2x, and as high as 9x more, compared with the retail/wholesale mark-ups in India. This cost is built into their model, and it is the premium paid by the average consumer in the West to get their everyday items of consumption.

Let us compare the channel cost of four categories of daily-use products that will be available through multi-brand retail:

Fast moving consumer goods like food, personal care products, toiletries etc;Clothing — textiles and readymade garments;

Over-the-counter pharmaceutical products;

Cookware/kitchenware small appliances.

Consumer goods: The distributor/stockist margin in India ranges from 4 per cent to 8 per cent, and the retailer margin ranges from 8 per cent to 14 per cent. The margin is on manufacturer's prices. They vary depending on company volume, market clout, type of product and so on. The total channel cost incurred by the distribution chain in India thus ranges from 12 per cent to 22 per cent.

In the US and Europe, the Safeways and Krogers and Tescos mark up this category of products by 40 per cent on cost of goods, depending on product type, volume, demand, exclusivity and so forth.

The channel mark up is 2x to 3x more than Indian channel/retail costs. We should not be misled by ‘Sale' prices and ‘loss-leader promotions' that they routinely employ to draw the customers.

Clothing/garments: In the Indian textile business, the combined wholesale plus retail margin ranges from 35-40 per cent on the ex-mill price. In the readymade garments business, the margin at retail in a brand outlet seldom exceeds 30 per cent of ex-factory price. Compare this to a Macy's or Marks & Spencer.

These retailers routinely mark up by 2x to 4.5x, the price at which they procure the garments. Then they offer ‘Sale' discounts of 15-30 per cent. Even comparing the ‘Sale' price, these retailers' mark-ups are 2x higher at the lowest end of the spectrum. Routinely, their mark-ups are thus 5x to 9x of what the retailers in India charge.

OTC Pharmaceuticals: In India, the pharmacies and chemists are better organised as a trade body, and the supply side is highly fragmented. Therefore, they enjoy better retail margins.

Even so, the retail chemist's margin in India is at 20 per cent. Add the distributor/stockist margin of 10 per cent, and the C&F agent's cost of 4 per cent, the total channel cost is a maximum of 34 per cent of ex-factory price. Compare this with a Walgreen's or CVS pharmacy in the US, or a Boot's in the UK. These retailers mark up the OTC products by 2x or 3x or more, and then offer some items on ‘Sale'. These big retailers' mark-ups are 6x more at the minimum, as far as channel costs go, compared to India's pharmacies.

Cookware/kitchenware: India's channel costs for this category are lower. The combined distributor/retailer margin in India for products like pressure cookers and cookware is less than 30 per cent, out of which the retailer retains 10 per cent to 15 per cent only. For the same category of products, retailers such as Walmart, Bloomingdales and Sears in the USA would routinely mark up the merchandise by 100-200 per cent of landed cost. Even ‘On Sale', at the lowest end, the channel mark up is 5x what they are in India.

Indian distribution efficient

All this evidence, available freely, suggests that the Indian distribution system, as it has evolved over the years, is among the most cost-effective and efficient in the world. For sure, our markets and bazaars do not have the polish of a mall in Europe or the US or Japan. But to the average Indian housewife, they offer remarkable value, and help her get along on low incomes. It is this balance that the proposed FDI in retail will upset over time.

Talk of investment in supply chain and back-end logistics only diverts attention from the main issue of total channel cost. The government committee should focus on what is in the best interest of the average Indian, and not be swayed by industry lobbies and pressure from foreign governments. Our markets are highly efficient, driven from the bottom up by the self-interest of millions of small traders and merchants. Let us not interfere with this and fall into the Western trap of multi-brand retail.

Government. Some of the criteria for investment are also inexplicable. For example, the committee has specified a minimum FDI investment of $100 million. That is like asking an Olympic heavy weight lifter to lift a 10 kg weight to qualify! While I respect the senior minds that have looked into this, I would venture to suggest that the role of policy in this matter should be to ensure the common good of the broadest base of the Indian population over an extended period of time measured in decades and not in years.

RECONSIDER POLICY

Policy makers should not rush to please Western governments that are lobbying hard to open up the Indian retail market. Opening FDI in multi-brand retail will ill-serve the Indian retail sector and the hundreds of millions of households struggling to make ends meet.

When the global financial crisis erupted in 2008, India was protected because the banking industry was not exposed to risk. The situation is similar in retail. Let us not bring in the bad oligopolistic structure of Western retail into India, a move which will really be irreversible and hold Indian consumers captive for times to come.

(The author is Group CEO, R. K. SWAMY HANSA and Visiting Faculty, Northwestern University, US. The views are personal.blfeedback@thehindu.co.in, बिजनेस लाइन से साभार,16 एवं 17 जून 2011 को प्रकाशित)

रविवार, 22 मई 2011

पराजय से क्या सही सबक लेगी माकपा ?- कुलदीप कुमार

                                                         
                                                       वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप कुमार

पश्चिम बंगाल और केरल में वाम मोर्चे को मिली चुनावी हार के बाद लगभग वही माहौल है जैसा 1991 में सोवियत यूनियन के विघटन के बाद था. वाम-विरोधियों के उत्साह का ठिकाना नहीं है. उनकी राय में अब वामपंथी राजनीति को ऐसी पटखनी मिल गयी है कि उसका फिर से उठना मुश्किल है. उधर वामपंथी, विशेषकर मार्क्सवादी, यह दिखाने में लगे हैं मानों कुछ हुआ ही न हो. हम हार गए तो क्या, हमें 41 प्रतिशत वोट नहीं मिले क्या? क्या इससे पता नहीं चलता कि हमारा जनाधार बरकरार है? हमारी हार तो सबको दीख रही है, पर जनाधार नहीं दीख रहा. ठीक है, कुछ गलतियां हुई हैं, लेकिन हमारी पार्टी में इतनी शक्ति है, हमारे यहाँ इतना आतंरिक लोकतंत्र है कि हम इन्हें दूर कर लेंगे.

लेकिन क्या चुनाव परिणामों की समीक्षा करने भर से यह सब हो जाएगा? क्या कम्युनिस्ट पार्टियों को कुछ अधिक बुनियादी सवालों पर विचार करने की ज़रुरत नहीं है? क्या उन्हें इस सवाल पर नहीं सोचना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर लेनिनवादी पार्टी संगठन की संगति बैठती है या नहीं? दूसरे, क्या वह अब उपयोगी भी रह गया है या नहीं? चुनाव परिणाम आने के दो दिन बाद ही एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलितब्यूरो की सदस्य बृंदा कारत ने माओ की उक्ति को याद करते हुए कहा कि पार्टी सदस्यों को जनता के बीच इस तरह रहना चाहिए जैसे नदी के जल में मछली रहती है. आशा है कि उनकी पार्टी केवल चुनाव परिणामों की ही नहीं, अपने पिछले तीन दशकों के कामकाज की भी समीक्षा करेगी और देखेगी कि उसके कार्यकर्ता जनता के बीच जल में मछली की तरह रह रहे थे या मगरमच्छ की तरह.
दरअसल कम्युनिस्ट विचारपद्धति की सबसे बड़ी खामी यह है कि कम्युनिस्टों को अभिव्यक्ति और राजनीतिक कर्म की स्वतंत्रता सिर्फ अपने लिए चाहिए. यानी जब वे सत्ता के विरोध में हों. लेकिन स्वयं सत्ता में आने के बाद वे ये स्वतंत्रताएं दूसरों को नहीं देना चाहते. जैसा कि लेनिन ने पार्टी संगठन के अपने सिद्धांतों में स्पष्ट कर दिया था, स्वतंत्रता भी पार्टी हित के अधीन है. चूंकि पार्टी हित और क्रान्ति के हित में कोई फर्क नहीं है, इसलिए क्रान्ति के हित को ध्यान में रखते हुए सभी प्रकार की स्वतंत्रताओं को पार्टी हित के दायरे में ही देखा जाना चाहिए. सीपीआई हो या सीपीएम, क्रांति के लिए काम करने का दावा किसी ने भी नहीं छोड़ा है. यह एक अजीब विसंगति है कि पिछले छह दशकों से संसदीय व्यवस्था के भीतर काम करने और संविधान के दायरे में राज्य सरकारें चलाने के बावजूद दोनों पार्टियों का दावा है कि वे भारत में क्रान्ति लाने के लिए संघर्षरत हैं.
हर चीज़ को पार्टी हित के अधीन करने की लेनिनवादी धारणा का ही नतीजा था कि चौंतीस वर्षों के वामपंथी शासन के दौरान पश्चिम बंगाल में नौकरशाही और सीपीएम के पार्टी संगठन के बीच का फर्क लगभग समाप्त हो गया. पार्टी की स्थानीय कमिटियाँ जीवन के हर क्षेत्र में हस्तक्षेप करने लगीं. हर स्तर पर छोटे-छोटे तानाशाह पनपने लगे. कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघों के चुनाव मज़ाक बन कर रह गए क्योंकि उनमें अक्सर पदाधिकारी और कार्यकारिणी के सदस्य निर्विरोध चुने जाने लगे. विरोध करने वालों को सबक सिखाया जाने लगा. अवसरवादिता, भ्रष्टाचार और आतंक के ज़रिये बात मनवाने की प्रवृत्ति जड़ पकड़ने लगी. जो लोग समझते हैं कि पश्चिम बंगाल में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था और यदि सिंगूर तथा नंदीग्राम की घटनाएं न हुई होतीं तो राज्य में सत्ता-परिवर्तन नहीं होता, वे खासी ग़लतफ़हमी में हैं. लोगों के भीतर आक्रोश की आग बहुत समय से धधक रही थी. सिंगूर और नंदीग्राम की घटनाओं से वह बाहर आ गयी.
वाम मोर्चे की सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि थी भूमि सुधार. लेकिन ये भूमि सुधार उसके कार्यकाल के प्रारम्भिक वर्षों में ही हो गए थे. इनके कारण जीवन में क्या परिवर्तन आया था, इसका अहसास पुरानी पीढ़ी के किसानों को तो था, लेकिन जो किसान आज तीस वर्ष का है उसे नहीं, क्योंकि उसने तो आँख खोलते ही दुनिया को वैसा ही पाया था जैसी वह आज है. इसलिए उसके मन में वाम मोर्चा सरकार के लिए किसी प्रकार की कृतज्ञता नहीं है. वह तो यह देख रहा है कि उसके जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा. टीवी और इंटरनेट के इस युग में केवल शहर में रहने वालों की ही आशाएं-आकांक्षाएं नहीं बढ़ी हैं, गाँव वालों के भी सपनों में भी बदलाव आया है. ऐसे में वे यथास्थिति से संतुष्ट रहने वाले नहीं.
वाम मोर्चा सरकार ने बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर भी ध्यान नहीं दिया जो अपने आप में विस्मयकारी बात है. पश्चिम बंगाल में उसकी एक अन्य बहुत बड़ी उपलब्धि यह भी रही कि राज्य को उसने साम्प्रदायिक हिंसा से मुक्त रखा. लेकिन इसके अतिरिक्त कुछ भी ऐसा नहीं हुआ जिसके लिए राज्य के मुसलमान अल्पसंख्यक उसका शुक्रिया अदा करें. तसलीमा नसरीन को राज्य से खदेड़ कर सरकार ने सोचा कि वह मुसलमानों को रिझा सकेगी, लेकिन इससे केवल उनके बीच पनपने वाले इसलामवादी तत्वों को ही बल मिला. उधर रिजवानुल हक वाले मामले में स्पष्ट हो गया कि राज्य सरकार और प्रशासन एक धनी हिन्दू का पक्ष ले रहे हैं. अल्पसंख्यक वोट इसके बाद भी वाम मोर्चे के पक्ष में कैसे पड़ता?
उधर केरल में सीपीएम के अनुशासन की धज्जियां उड़ गयीं. वहां की राज्य इकाई में वी एस अच्युतानंदन और पिनाराई विजयन के दो गुट हैं जो एक दूसरे को फूटी आँख नहीं देख सकते. केंद्रीय नेतृत्व ने विजयन गुट की तरफदारी करते हुए पांच साल से मुख्यमंत्री के रूप में काम कर रहे अच्युतानंदन के खिलाफ चुनाव से ऐन पहले अविश्वास व्यक्त कर दिया और उनका टिकट काट दिया. जब पार्टी में ज़बरदस्त विरोध हुआ तो ठेठ अवसरवादिता का परिचय देते हुए उन्हें टिकट दे दिया. वहां हालत यह है कि विजयन की छवि एक उदारवादी लेकिन भ्रष्ट नेता की है तो अच्युतानंदन की छवि स्तालिनवादी किन्तु ईमानदार नेता की।
चुनाव परिणामों के विश्लेषण से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा अपनी वर्तमान स्थिति का आकलन और विश्लेषण. सीपीएम ने 1978 में सल्किया प्लेनम आयोजित करके वहां हुए विचार-विमर्श के बाद तय किया था कि अब उसकी प्राथमिकता हिंदी प्रदेशों में पार्टी के विस्तार की होगी. यह प्लेनम पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु के नेतृत्व वाली सरकार के गठन के एक साल बाद हुआ था. इसके बाद ही पार्टी का मुख्यालय कोलकाता से दिल्ली लाया गया. शुरू के एक-दो साल ज्योति बसु ने भी दिल्ली और हिंदी राज्यों के कुछ शहरों में जाकर जनसभाएं संबोधित कीं लेकिन फिर उनका उत्साह ठंडा पड़ गया और वह अपने राज्य में ही उलझ कर रह गए. उस समय सीपीएम पंजाब में काफ़ी मजबूत थी. उत्तर प्रदेश के भी कुछ हिस्सों में उसका अच्छा-खासा असर था. अन्य हिंदी प्रदेशों में भी उसकी थोड़ी-बहुत उपस्थिति थी. लेकिन आज क्या स्थिति है? आज वह हिंदी प्रदेशों से लगभग गायब हो चली है. सीपीआई की हालत भी ऐसी ही है. इसके बावजूद वर्ष 2008 में, जब सीपीएम की अगुवाई में वाम दलों ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस लिया था, वाम दलों का राष्ट्रीय राजनीति में अच्छा-खासा प्रभाव था. इस स्थिति में लौटने में अब उन्हें बहुत समय लगेगा.
सीपीएम के केरल और पश्चिम बंगाल के नेता अपने राज्यों में ही सीमित रहे. केंद्रीय नेतृत्व उन्होंने उन लोगों को सौंप दिया जिनका ज़मीनी आधार नहीं है. व्यक्ति के रूप में ये नेता बहुत प्रतिभाशाली, कर्मठ और सक्षम हो सकते हैं, लेकिन जनता की नब्ज़ पर इनकी उंगली कभी नहीं रही. अब इन राज्यों के नेताओं के सामने दो विकल्प हैं. या तो वे अपने-आपको अपने राज्य में पार्टी को मजबूत बनाने के प्रयास में पूरी तरह से झोंक दें, या फिर केंद्रीय नेतृत्व की ओर भी ध्यान दें. सीपीएम महासचिव प्रकाश कारत ने पिछले दिनों एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में बहुत भोलेपन के साथ कहा है कि पार्टी महासचिव पोलितब्यूरो सदस्यों में से एक होता है और वह सिर्फ पार्टी का प्रवक्ता है. वरना उसमें और दूसरों में कोई फर्क नहीं. लेकिन कम्युनिष पार्टियों के कामकाज से परिचित लोग जानते हैं कि वास्तविकता इससे बिलकुल भिन्न है. पार्टी महासचिव के पद का इस्तेमाल करके ही स्टालिन ने सोवियत संघ में अपना वर्चस्व कायम किया था. महासचिव के हाथ में संगठन के सारे सूत्र होंते हैं. वह पार्टी का ही नहीं, उसके द्वारा लागू की जा रही राजनीतिक लाइन का भी प्रतिनिधित्व करता है. किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी में यह नहीं हुआ कि पार्टी की लाइन बदल जाए पर महासचिव वही रहे. सीपीएम के इतिहास में ही इसके उदाहरण मिल जायेंगे. क्या पी. सुन्दरैया को लोग भूल गए हैं?
एक बात वाम-विरोधियों को भी याद रखनी चाहिए. जब तक समाज में शोषण, भूख, गरीबी और बेरोज़गारी है, वाम राजनीति की प्रासंगिकता बनी रहेगी. उस वाम राजनीति की बागडोर सीपीआई या सीपीएम या माओवादियों के हाथ में ही हो, ऐसा भी ज़रूरी नहीं है. वक़्त की ज़रुरत के मुताबिक़ जनता अपने संघर्ष के हथियार तैयार कर लेती है. लेकिन शोषण और उत्पीडन के खिलाफ संघर्ष कभी भी बंद नहीं होता. उसकी धार कभी तेज़ और कभी कुंद अवश्य हो सकती है. इन दिनों मनमोहन सिंह की सरकार जिस तरह की नव-उदारवादी नीतियाँ अपना रही है, वे केवल अमीरों के प्रति उदार हैं. आम आदमी से उन्हें कोई सरोकार नहीं. ऐसे में वाम राजनीति के लिए स्वयं के पुनराविष्कार का सुनहरी मौक़ा है. देश में उसका प्रभाव तभी फ़ैल सकता है जब आम आदमी अपने जीवन में उसकी उपस्थिति की ज़रुरत महसूस करे और उसके माध्यम से अपने सपनों के साकार होने की संभावना देखे. वाम दल अपनी चुनावी पराजय से सबक सीख कर आगे बढ़ेंगे, तभी राष्ट्रीय राजनीति में सार्थक हस्तक्षेप कर सकेंगे.
( 22 मई के जनसत्ता में प्रकाशित ,जनसत्ता से साभार)

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