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शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

भारतीय मुसलमानों की बलिदानी परंपरा

मुसलमानों की देशभक्ति की बात उठते ही भारत-पाक मैच का संदर्भ बार-बार संघी लोग उठाते हैं और कहते हैं देखिए मुसलमान भारत की हार पर बल्ले बल्ले कर रहे हैं। इनको शर्म नहीं आती,ये देशद्रोही हैं,आदि किस्म के कुतर्कों की हम फेसबुक से लेकर मासमीडिया में आएदिन प्रतिक्रिया देखते हैं। हम साफ कहना चाहते हैं कि खेल को राष्ट्रवाद के साथ नहीं जोडा जाना चाहिए। राष्ट्रवाद कैंसर है इसे जिससे भी जोड़ेंगे वह चीज सड़ जाएगी। खेल से जोड़ेंगे खेल नष्ट हो जाएगा। रही बात पाक की जीत पर खुशी मनाने की तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

खेल के दर्शक को हम दर्शक की तरह देखें हिन्दू-मुसलमान के रुप में न देखें। खेल में धर्म,देश,छोटा-बड़ा नहीं होता। खेल तो सिर्फ खेल है।खेल में कोई जीतेगा और कोई हारेगा,कोई खुशी होगा तो कोई निराश होगा, खेल अंततःसर्जनात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। खेल को यदि राष्ट्रवाद से जोड़ा जाएगा या किसी भी किस्म की राजनीति से जोड़ा जाएगा तो उससे सामाजिक सर्जनात्मकता पर बुरा असर पड़ेगा।खेल का मकसद है जोड़ना।जबकि राष्ट्रवाद का मकसद है तोड़ना।भारत-पाक मैच के साथ संघी लोग राष्ट्रवाद को जोड़कर अपनी फूटसंस्कृति को खेल संस्कृति पर आरोपित करने की हमेशा कोशिश करते हैं और इस लक्ष्य में बुरी तरह पराजित होते हैं।इसका प्रधान कारण है खेल की आंतरिक शक्ति। खेल की आंतरिक शक्ति सर्जनात्मक और जोड़ने वाली है।

हमारे बहुत सारे संघी मित्र आए दिन क्रांतिकारियों को माला पहनाते रहते हैं लेकिन इन क्रांतिकारियों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले मुसलमानों को भूल जाते हैं। मसलन् क्रांतिकारी खुदीराम बोस को ही लें।खुदाराम बोस को गिरफ्तारी के पहले एक मुसलिम महिला ने अपने घर में शरण दी थी,यह और कोई नहीं मौलवी अब्दुल वहीद की बहन थी। ये जनाब क्रांतिकारी भूपेन्द्र दत्त के गहरे मित्र थे।यही महिला थी जो फांसी के पहले निडर होकर खुदीराम बोस से मिलने जाया करती थी।जबकि उस समय अंग्रेजी शासन के आतंक के कारण अनेक लोग खुदीराम बोस से मिलने से डरते थे।

मुसलमानों के पक्ष में लिखने का यह मकसद नहीं है कि अन्य तबकों की भूमिका की अनदेखी की जाय,मूल मकसद है मुसलिम विरोधी घृणा से युवाओं को बचाना।एक बार यह घृणा मन में बैठ गयी तो फिर उसे दूर करने में पीढ़ियां गुजर जाएंगी। हमारे कई हिन्दू मित्र मुसलमानों की कुर्बानियों की परंपरा को जानते हुए भी फेसबुक पर आए दिन जहर उगलते रहते हैं,इसलिए भी जरुरी हो गया है कि मुसलमानों के सकारात्मक योगदान के बारे में सही नजरिए से ध्यान खींचा जाय। मुसलमान हमारे समाज का अंतर्ग्रथित हिस्सा हैं। उनकी कुर्बानियों के बिना हम आजाद हिन्दुस्तान की कल्पना नहीं कर सकते।

याद करें रायबरेली के मुसलमान फकीर सैयद अहमद को जिनके नेतृत्व में उत्तर भारत बहावी सम्प्रदाय के अनुयायियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ गांवों से लेकर शहरों तक पहाडों से मौदानों तक आधी शताब्दी तक संघर्ष चलाया। सन् 1871 में एक अन्य बहावी क्रांतिकारी अब्दुल्ला को जस्टिस नार्मन की हत्या के आरोप में फाँसी पर लटकाया गया। सन् 1872 में अंडमान में लार्ड मेयो की हत्या करने वाला बहावी वीर शेर अली था,वह इस हत्या के लिए फाँसी के फंदे पर झूल गया। सन् 1831 में नीलहे साहबों के विरुद्ध पहले विद्रोह के प्रवर्तक रफीक मंडल को कौन भूल सकता है। मुसलमानों में ऐसे अनेक नेता हुए हैं जिन्होंने अपने समुदाय के साम्प्रदायिक और रुढिवादी आग्रहों को तिलांजलि देकर आजादी की जंग में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।सन् 1905 के ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी बंग-भंग आंदोलन के बरीसाल अधिवेशन की अध्यक्षता कलकता के प्रसिद्ध मुसलमान वकील अब्दुल्ला रसूल ने की थी। बंग-भंग के विरुद्ध चले पहले विशाल स्वदेशी आंदोलन में भारी संख्या में मुसलिम बुद्धिजीवियों ने हिन्दुओं के साथ मिलकर संघर्ष किया था।

भारत के मुसलमान देशभक्त होते हैं,यह निर्विवाद सत्य है।इसे जानते हुए भी संघ और उसके लगुए-भगुए संगठन विभ्रम पैदा करते रहते हैं और युवाओं में मुसलिम विरोधी प्रचार करते रहते हैं। मुसलमानों की देशभक्ति की बार-बार स्वाधीनता संग्राम में परीक्षा हुई है और आजादी के बाद बार बार जनांदोलनों के समय परीक्षा हुई है। भारत के मुसलमानों की देशभक्ति ही है कि आज जम्मू-कश्मीर में आतंकी-पृथकतावादी संगठन पाक की अबाध मदद के बावजूद आम मुसलमानों के बीच अलग-थलग पड़े हैं। इस क्षेत्र के आम मुसलमानों का भारत के लोकतंत्र और संविधान मेें अटूट विश्वास है।मुश्किल यह है कि एक तरफ संघ के संगठन मुसलमानों पर देशद्रोही कहकर हमले करते हैं,मुसलमानों के प्रति संशय और संदेह पैदा करते हैं,वहीं दूसरी ओर आतंकी-पृथकतावादी संगठन भी उनको निशाना बनाते हैं। सच्चाई यह है कि जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों ने संघ और आतंकी-पृथकतावादी दोनों के ही नजरिए के खिलाफ संघर्ष किया है और तमाम तकलीफों के बावजूद उदारतावाद की बेहतरीन मिसाल कायम की है।



रविवार, 7 नवंबर 2010

टेलीविजन चैनलों में बराक ओबामा की मानवीयता और हमारी संप्रभुता

(अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा 26/11 के शहीदों को मुंबई के ताज होटल में श्रद्धांजलि भाषण देते हुए)
   अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा जब कल भारत पहुँचे तो उनके कई चेहरे नजर आए। इनमें पहला मानवीय चेहरा नजर आया है। ओबामा के मानवीय पहलू पर टीवी चैनलों ने खूब जोर दिया है। बराक ओबामा ने आते ही 26/11 के शहीदों को श्रद्धांजलि दी और जिस तरह का गंभीर भाषण दिया वह काबिले तारीफ़ है।
     ओबामा किसी भी किस्म के उन्माद से रहित होकर 7 मिनट बोले उससे एक संकेत तो यही गया है कि आतंकवाद के खिलाफ उन्मादी भाषण काम नहीं आते बल्कि वे आग में घी का काम करते हैं। यह बात ओबामा पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के पराभव और हाल में सम्पन्न अमेरिकी चुनावों में अपने दल की पराजय से सीख चुके हैं।
     ओबामा ने बड़े ही ठंड़े दिमाग से 26/11 के शहीदों की याद में उन्होंने जो कुछ कहा वह काफी मूल्यवान है और यह उन लोगों के लिए चेतावनी है जो भारत में आतंकवाद विरोधी मुहिम के नाम पर पाकविरोधी घृणा फैला रहे हैं। आतंकवाद पर ओबामा का ताजहोटल में दिया गया भाषण ठंड़ा और शानदार भाषण है। इस भाषण का पहला संदेश है आतंकवाद से लड़ो पाकिस्तान से नहीं। दूसरा संदेश है आतंकवाद से उन्माद फैलाकर,घृणा फैलाकर नहीं लड़ा जा सकता है। ठंड़े दिमाग से लड़ो।
     अधिकांश टीवी चैनल वाले यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि ओबामा जब 26/11 के बारे में बोलेंगे तो पाक का हवाला जरूर देंगे। उन्होंने 26/11 में पाक की भूमिका का कहीं कोई जिक्र नहीं किया। ऐसा करके ओबामा ने एकदम सही काम किया। वे जानते हैं कि आतंकवाद को उन्माद या घृणा फैलाकर नहीं पछाड़ सकते। हमारे टीवी चैनल 26/11 के बहाने और अन्य मौकों पर पाक विरोधी घृणा का प्रचार करते रहते हैं और कल भी अधिकांश टीवी चैनलों में यही भावना व्यक्त की गई कि ओबामा को कम से कम इस घटना में पाक की घृणित भूमिका की निंदा करनी चाहिए थी ।
      यह सच है पाक 26/11 की घटना का आयोजक था और आज भी सीमापार से आतंकवादी गतिविधियों का संचालन पाक के प्रमुख संस्थान कर रहे हैं। समस्या यह है कि पाक के खिलाफ राय बनायी जाए या आतंकवाद के खिलाफ राय बनायी जाए। इसी संदर्भ में ओबामा ने जोर आतंकवाद के खिलाफ राय बनाने पर दिया है और ऐसा करके उन्होंने ठीक किया है। 
    ओबामा का यह कहना ही काफी है कि हम 26/11 की इमेजों को नहीं भूल सकते । आतंकी हमले के संदर्भ में ओबामा ने बड़े ही सकारात्मक मनोभाव का परिचय दिया है। उन्होंने आतंकियों को हत्यारे की संज्ञा दी है। उन्होंने मुंबई की जनता,होटल के स्टाफ,पुलिस जवानों की बहादुरी आदि की भूरि-भूरि प्रशंसा की और उन लोगों के परिवारीजनों से भी मिले जो इस हमले में मारे गए थे। ओबामा ने कहा “We'll never forget the awful images of 26/11, including the flames from this hotel that lit up the night sky. We'll never forget how the world, including the American people watched and grieved with all of India.”
    जो लोग ओबामा में उन्माद की तलाश कर रहे हैं उन्हें पहले दिन के भाषण से निराशा हाथ लगी है। क्योंकि उनकी इस यात्रा में अमेरिका के बड़े हित दांव पर लगे हैं ,बड़े हितसाधन करने के लिए उन्मादी भाषण मदद नहीं करते। ठंड़े भाषण मदद करते हैं।
    ओबामा की इस यात्रा का लक्ष्य है अमेरिका के व्यापारिक-सैन्य हितों का विस्तार करना।  देखना यह है कि ओबामा की पब्लिक रिलेशन की यह पद्धति कितनी प्रभावी सिद्ध होती है।
     ओबामा के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वे भारत से क्या लेकर जाते हैं। पहलीबार कोई अमेरिका राष्ट्रपति भारत से कुछ मांगने आया है,ओबामा ने बड़ी साफगोई के साथ अपने देश के संकट का जिक्र कर दिया है ,उन्हें भारत से व्यापार करना है और वे चाहते हैं कि अमेरिकी युवाओं को नौकरियां मिलें। भारत में कभी किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने युवाओं के लिए नौकरियां नहीं मांगी हैं,ओबामा ने कल भारत की जितनी प्रशंसा की है उतनी प्रशंसा भी किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने नहीं की हैं।  
    ओबामा की इस साफगोई और मानवीय भावनाओं के पीछे सुरक्षा,संप्रभुता और मातहत बनाने का बड़ा खेल चल रहा है। ओबामा का सामने मानवीय चेहरा मुझे निजी तौर पर अच्छा लग रहा है लेकिन उसके सैन्य और संप्रभुता संबंधी निहितार्थ खतरनाक लग रहे हैं। देखना है कहीं ओबामा की मानवीय इमेज की ओट में भारत की संप्रभुता को नष्ट करने का शैतानी खेल तो नहीं चल रहा ? क्योंकि कल ही ‘टाइम्स नाउ’ चैनल ने एक बड़ा ही सनसनीखेज दस्तावेज जारी किया है जिसमें बताया गया है कि अमेरिका के द्वारा भारत को सैन्य और तकनीकी रूप में मातहत बनाने की साजिशें चल रही हैं।
      पेंटागन और भारत के रक्षा मंत्रालय के बीच में  ‘इंटर ऑपरेविलिटी एग्रीमेंट’ नांमक समझौते पर अंदर ही अंदर वार्ताएं चल रही हैं। अगर यह समझौता हो जाता है तो भारत के लिए बड़ा अहितकारी होगा। चैनल के अनुसार भारत को इस सैन्य समझौते के तहत पेंटागन का मातहत बनाने की कोशिशें की जा रही हैं। चैनल ने यहां तक कहा कि य़ह एक और पाकिस्तान बनाने की योजना है।
     इस दस्तावेज का सनसनीखेज खुलासा ओबामा की यात्रा के पहले दिन करके चैनल ने उस खेल की ओर संकेत किया है जो ओबामा की इस यात्रा की आड़ में चल रहा है। देखना होगा कि ओबामा भारत से जाते हैं तो क्या लेकर जाते हैं और क्या देकर जाते हैं।
     संभावनाएं यही हैं कि ओबामा इस यात्रा से अमेरिका में अपनी खोई हुई साख को बचाना चाहते हैं। वे अमेरिकी जनमानस को यह सदेश देना चाहते हैं कि मैं भारत से अमेरिका के आम नागरिकों के लिए बहुत कुछ लेकर आया हूँ। ओबामा के पहले दिन के कार्यक्रमों पर ‘टाइम्स नाउ’ चैनल की संदेह दृष्टि लगी थी। वहीं अन्य चैनलों जैसे एनडीटीवी ,सीएनएन-आईबीएन आदि ने इस यात्रा के पहले दिन के कवरेज में अमेरिकी सरकार के जनसंपर्क चैनल की तरह काम करते हुए ओबामा की व्यापार और मानवीयता की भावना को खूब उभारा है।






शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

दो पड़ोसियों की लाइफलाइन है दोस्ती


 कल भारत-पाक के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत खत्म हुई तो मीडियावाले विवाद खोज रहे थे, पंगे वाले सवाल उठा रहे थे। बातचीत को व्यर्थ बता रहे थे। प्रेस काँफ्रेस में भारत की विदेश सचिव निरुपमा राव शांतभाव से पत्रकारों के सवालों के जबाव दे रही थीं,राव की बॉडी लैंग्वेज में जो स्वाभाविकता और सहजता थी वह तारीफ के काबिल है।
   कूटनीति की भाषा शरीर की भावभंगिमा के जरिए बहुत कुछ कह देती है। निरुपमा राव की भावभंगिमा ने मीडिया की सनसनी को ठंड़े बस्ते में ड़ाल दिया है। दोनों पड़ोसी देशों में बातें हों यह सभी चाहते हैं,खासकर इन देशों की जनता यही चाहती है।
   विदेश सचिव स्तर की बातचीत के ठीक पहले पूना में ब्लास्ट हुआ जिसमें अनेक लोग मारे गए। आतंकी नहीं चाहते कि भारत-पाक में दोस्ती और संवाद बने। दोनों देशों के संबंध ज्यों ही सामान्य होने शुरु होते हैं कोई न कोई हंगामा खड़ा कर दिया जाता है। मीडिया इस प्रक्रिया में आग में घी का काम करता रहा है। मीडिया और दोस्ती विरोधी देशी ताकतों को( ऐसी ताकतें दोनों देशों में हैं)  यह बात पसंद नहीं है कि भारत-पाक में दोस्ती बनी रहे।
  कायदे से देखा जाए तो इसबार की बैठक सार्थक रही है। लंबे अंतराल के बाद यह बैठक हो पायी है। इस तरह की बैठकें ज्यादा होनी चाहिए । राष्ट्रों की समस्याएं कूटनीतिक वार्ताओं से हल होती है, पंगों से नहीं,घृणा से नहीं। भारत ने पाक को 3 दस्तावेज सौंपे हैं जिनमें पाक से चलने वाली आतंकी गतिविधियों का कच्चा चिट्ठा है और भारत ने इन तीनों दस्तावेजों पर कार्यवाही की मांग की है।

हमें यह ध्यान रखना होगा कि पाक में आईएसआई जैसा खतरनाक खुफिया संगठन है जो अमेरिकी गुप्तचर संस्था के साथ मिलकर काम करता रहा है। भारत और पाकिस्तान में आतंकी ग्रुपों को वह मदद करता रहा है और आज भी कर रहा है। कुछ अर्सा पहले तक अमेरिकी नागरिक रिचर्ड हेडली जैसे जासूस भारत में आतंकियों के लिए काम करते रहे हैं, हमारी सरकार अभी तक अमेरिकी प्रशासन के साथ गरमी के साथ हेडली जैसे खतरनाक व्यक्तियों के बारे में बात नहीं कर पायी है। हेडली को लेकर अमेरिका के प्रति संघ परिवार भी चुप है ,यह चुप्पी बड़ी अर्थपूर्ण है, भारत को अमेरिका को साफ कहना चाहिए कि हेडली को वह हमें सौंपे, हम पाक से आतंकियों को सौंपने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका से हेडली को सौपने की मांग क्यों नहीं करते ? क्या बात है कि आतंकियों के साथ अमेरिकी जासूसी संस्थाओं के संबंध हमें दिखाई नहीं दे रहे। हेडली के मामले में अमेरिकी विदेश विभाग भी फंसा हुआ है,हेडली को अमेरिका ने क्यों भेजा यह अभी भी रहस्य बना हुआ है। हिन्दी में कहावत है चोर को न मारो चोर की मईया को मारो। आतंक की गंगा अमेरिका से आ रही है। यह बात मीडिया वाले भी नहीं बताते और नहीं अमेरिका से ही हेडली को भारत को सौंपने की मांग करते हैं। इसी को कहते हैं मीडिया की अमेरिकी भक्ति और पाक द्वेष।
    भारतीय उपमहाद्वीप में अमेरिका सबसे बड़ा खतरा है न कि पाकिस्तान। आतंकी नरक में पाक को डुबोने वाला अमेरिका है और आतंकवाद के बहाने पाक को अमेरिका हजम कर जाना चाहता है, यदि ऐसा होता है तो भारत के लिए खतरा और भी बढ़ जाएगा। पाक को दोस्ती के मार्ग पर लाना हमारी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। भारत-पाक दोस्ती बनी रहे इससे इस क्षेत्र की जनता को लाभ होगा। जबकि अमेरिकी शस्त्र उद्योग नहीं चाहता कि भारत-पाक में दोस्ती बनी रहे,शस्त्र उद्योग के विचारक और दलाल बार बार मीडिया में आ रहे हैं और वे उन्हीं बातों पर जोर दे रहे हैं जिससे भारत-पाक में और भी कटुता पैदा हो । हमें भारत-पाक में दोस्ती के बिंदुओं को सामने लाना होगा और यही अमेरिकी शस्त्र उद्योग को करारा प्रत्युत्तर होगा। भारत­­ -पाक एक-दूसरे की लाइफलाइन हैं। किसी अवस्था में यह लाइन बंद नहीं होनी चाहिए।   


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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...