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शनिवार, 19 सितंबर 2009

हिंदी की पहली स्‍त्रीवादी लेखि‍का प्रभा खेतान

प्रभा खेतान की मौत को आज एक साल हो गया है। आज ही अचानक उनकी मौत की खबर अरूण माहेश्‍वरी ने दी थी। सोचा था कभी मौका मि‍लेगा तो जरूर लि‍खूँगा। कई बार दोस्‍तों ने भी अनुरोध कि‍या था किंतु लि‍ख ही नहीं पाया। प्रभाजी की मौत मेरी व्‍यक्‍ति‍गत क्षति‍ थी। मेरे साथ उनका बीस सालों से गहरा संबंध था। बीस सालों में उनके सुख-दुख के तमाम क्षणों में शामि‍ल होने का मौका भी मि‍ला था। प्रभाजी से मि‍लने के बाद कोलकाता के हिंदीभाषी समाज का अमानवीय चेहरा भी देखने में आया। आरंभ में प्रभाजी को यहां के तमाम लेखक और तथाकथि‍त बुद्धि‍जीवी बुरी नजर से देखते थे। जबकि‍ आरंभ से ही प्रभाजी ने अपनी लेखि‍का के रूप में पहचान बनानी शुरू कर दी थी।
प्रभाजी कैसे स्‍त्रीवाद के मार्ग पर आयीं और उनके साथ हिंदी के समर्थ लेखकों के कि‍तने गहरे संबंध थे,यह तथ्‍य सभी लोग जानते हैं। लेकि‍न प्रभाखेतान स्‍त्रीवादी कैसे बनी यह संभवत: कम ही लोग जानते हैं। राजेन्‍द्र यादव और उनके जैसे बड़े लेखकों की उनके लेखन के पीछे प्रेरणा थी,स्‍त्रीवाद का मार्ग पकड़ने के बाद प्रभाजी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हिंदी में गर्व के साथ अपने को स्‍त्रीवादी कहना उन्‍हें अच्‍छा लगता था,जबकि‍ आज भी अनेक नामी लेखि‍काएं स्‍त्रीवादी कहने में अपमानि‍त महसूस करती हैं। प्रभाखेतान आजादी के बाद की पहली बड़ी हिंदी लेखि‍का थी जो गर्व के साथ स्‍त्रीवादी कहती थी और कमोबेश स्‍त्रीवाद को व्‍यवहार में जीने की भी कोशि‍श करती थी।
प्रभा खेतान ने स्‍त्रीवाद के सर्वोत्‍तम पक्ष अन्‍य के प्रति‍ संवेदनशीलता को अपनी शक्‍ति‍ बनाया। उनके लि‍ए स्‍त्रीवाद कोई कि‍ताबी सि‍द्धान्‍तमात्र नहीं था। उनके द्वारा 'अन्‍य के प्रति‍ संवेदनशीलता' का जो रूप मैंने व्‍यक्‍ति‍गत तौर पर देखा है वह हिंदी साहि‍त्‍य में वि‍रल है। मसलन् प्रभाजी को यदि‍ यह बोल दि‍या जाए कि‍ फलां लेखक बीमार है उसे मदद की जरूरत है, उसका हॉस्‍पीटल का बि‍ल भुगतान नहीं हुआ है, कोई कैंसर का मरीज है उसे दवा वगैरह के लि‍ए मदद की जरूरत है,प्रभाजी एक पैर से नि‍स्‍वार्थ भाव से मदद करती थीं। यह पूछती ही नहीं थीं कि‍ तुमने इस लेखक के बारे में अथवा इस साधारणजन के बारे में मदद के लि‍ए क्‍यों कहा,वह तुम्‍हारा कौन लगता है,तुम क्‍या जानते हो,हमें इसकी मदद से क्‍या मि‍लेगा इत्‍यादि‍ तमाम कि‍स्‍म के सवाल वे कभी नहीं पूछती थीं।
लेखकों के द्वारा लेखन और पत्रि‍काओं के लि‍ए आए दि‍न मदद के लि‍ए पत्र आते थे और पूछती थीं कि‍ क्‍या करूँ, 'हंस' जैसी पत्रि‍का संकट में है क्‍या करूँ,वे चाहती थीं मदद करना लेकि‍न मुझे अपनी सलाह का हि‍स्‍सा बनाकर यह काम करती थीं। व्‍यक्‍ति‍गत तौर पर मुझसे बेइंति‍हा प्‍यार करती थीं। सप्‍ताह में एक दो दि‍न हम लोगों का मि‍लना,बैठना बातें करना होता था।बाद में सुंदर भोजन के साथ देर रात गए बैठक खत्‍म होती थी। कुछ साल बाद हम दोनों की मंडली में अरूण माहेश्‍वरी और सरला माहेश्‍वरी भी शामि‍ल हुए। अब हम चारों लगातार बैठते और वि‍भि‍न्‍न कि‍स्‍म के वि‍षयों पर बातें करते। अरूण और सरला मार्क्‍सवादी हैं और प्रभाजी स्‍त्रीवादी । अनेक बार मार्क्‍सवाद और सीपीएम से जुड़े सवालों पर तेज बहस भी हो जाती थी इतनी तेज की देखते ही बनता था। लेकि‍न प्रभाजी कभी तेज बहसों की वजह से संबंध नहीं तोड़ती थीं। बल्‍कि‍ हुआ उलटा ये बहसें प्रभाजी के लि‍ए वि‍चारधारात्‍मक आनंद देने का काम करने लगीं और वे लेखन में और भी ज्‍यादा आक्रामक होती चली गयीं। प्रभाजी की पारि‍वारि‍क पृष्‍ठभूमि‍ ,स्‍त्रीवाद और लेखन के बीच तीन-तेरह का रि‍श्‍ता था। इस रि‍श्‍ते को उन्‍होंने बड़े ही सदभाव के साथ नि‍भाया। इस संबंध की खूबी यह थी कि‍ उनके वर्गीय नजरि‍ए के साथ वि‍चारधारात्‍मक प्रति‍बद्धता कभी आड़े नहीं आयी। प्रभाजी मारवाडी परि‍वार के धनि‍यों के साथ सादगी और ठाट के साथ मि‍लती थीं। उनके पास पैसा काफी था लेकि‍न अमीरों में वे पैसे के कारण नहीं लेखन के कारण खासतौर पर स्‍त्रीवादी उपन्‍यास लेखि‍का के रूप में सम्‍मान के साथ स्‍वीकृत थीं।
मारवाडी अमीर उनके लेखन की संपदा,चमक और वैभव के सामने फीके नजर आते थे, उनके इस फीकेपन को वे आनंद भाव से लेती थीं। प्रभाजी की सबसे बडी शक्‍ति‍ उनकी दौलत नहीं लेखन था। लेखक के नाते जि‍स गंभीर संवेदनशीलता की जरूरत होती है उसे उन्‍होंने अपने जीवन का अनि‍वार्य हि‍स्‍सा बना लि‍या था। यह संवेदनशीलता कभी कभी कष्‍ट भी देती थी,इसके बावजूद अपने संवेदनशील स्‍वभाव को उन्‍होंने त्‍यागा नहीं।
प्रभाजी के लेखन का सबसे उज्‍ज्‍वल पक्ष है हिंदी में स्‍त्रीवाद । हिंदी में स्‍त्रीवाद जनप्रि‍य बने और राजेन्‍द्र यादव 'हंस' के जरि‍ए यह काम करें। यह कीड़ा प्रभाजी के दि‍माग की ही उपज था। उल्‍लेखनीय है राजेन्‍द्र यादव जब जमकर कथा साहि‍त्‍य लि‍ख रहे थे तब वे स्‍त्रीवाद के उतने भक्‍त नहीं थे, जि‍तने वे 'हंस' के प्रकाशन के बाद बने। राजेन्‍द्र यादव को स्‍त्रीवाद के मार्ग पर लाने वाली मुख्‍यप्रेरणा प्रभाजी ही थीं। दलि‍तों और स्‍त्रि‍यों के प्रति‍ 'हंस' पत्रि‍का के प्रति‍बद्धभाव को बनाने में प्रभाजी ने मुख्‍यप्रेरक की भूमि‍का अदा थी। संभवत: आज उनके मरने के बाद राजेन्‍द्र यादव प्रभाजी के इस कर्ज को न मानें। लेकि‍न मैं उन तमाम अंतरंग क्षणों का गवाह हूँ जब प्रभाजी ने 'हंस' को आत्‍मनि‍र्भर बनाने में मदद की थी तो उनका कोई नि‍जी स्‍वार्थ नहीं था, एक ही स्‍वार्थ था राजेन्‍द्र यादव जैसा बड़ा लेखक स्‍त्रि‍यों और दलि‍तों के सवाल पर साहि‍त्‍य के मैदान में डटा रहे। हिंदी की महत्‍वपूर्ण साहि‍त्‍यि‍क पत्रि‍का के रूप में 'हंस' को लि‍या जाए और इस आकांक्षा को साकार करने के लि‍ए उन्‍होंने 'हंस' की हर संभव मदद की।
प्रभाजी की आंतरि‍क इच्‍छा थी कि‍ हिंदी में स्‍त्रीवादी लेखन ज्‍यादा से ज्‍यादा हो,वे स्‍वयं भी इस काम को करती थीं ,अन्‍य लोगों को भी प्रेरि‍त करती थीं। मेरी आरंभ में उनसे जब मुलाकात हुई तो उनके पास स्‍त्रीवाद और गंभीर लेखन से संबंधि‍त बहुत कम कि‍ताबें थीं बाद में लगातार बातें करते करते उन्‍होंने अपनी नि‍जी लाइब्रेरी समृद्ध कर डाली। मेरे देखते ही देखते सैंकड़ों कि‍ताबें खरीद डालीं। एक लेखि‍का में नए वि‍चारों को जानने का यह आग्रह अपने आपमें प्रशंसा की चीज है। कलकत्‍ते में अधि‍कांश मारवाडी और हिंदी लेखकों के यहां अत्‍याधुनि‍क वि‍षयों की गि‍नती की दो-चार कि‍ताबें ही मुश्‍कि‍ल से मि‍लेंगी। प्रभाजी के पास तमाम कि‍स्‍म की अत्‍याधुनि‍क कि‍ताबों का जखीरा था। नए वि‍षयों की गंभीर कि‍ताबों से प्रेम और अन्‍य के प्रति‍ संवेदनशीलता ये दोनों ही तत्‍व उन्‍हें अपने वर्गीय दायरे के बाहर जाकर नि‍जी वि‍चारधारात्‍मक संघर्ष के जरि‍ए अर्जित करने पड़े।
मैं जब सन् 1989 में कोलकाता में नौकरी करने आया था तो यहां एक-दो लेखकों को ही जानता था। बाकी शहर नया था। अचानक एक गोष्‍ठी में मुझे युवाओं के बीच बोलने के लि‍ए बुलाया गया मैं गया ,वहां पर प्रभाजी भी थीं। वहीं पर पहली भेंट हुई और यह पक्‍की दोस्‍ती में तब्‍दील हो गयी। उस समय तक वे जनवादी लेखक संघ की सदस्‍य नहीं थीं। मैंने उनसे जब लेखक संघ की सदस्‍यता लेने के बारे में पूछा तो उन्‍होंने कहा कि‍ मैं जानती ही नहीं हूँ कि‍ जनवादी लेखक संघ क्‍या है। मजेदार बात यह है उस समय जनवादी लेखक संघ के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष राजेन्‍द्र यादव हुआ करते थे और वे उनके सबसे करीबी थे। मैंने कहा कि‍ आपको कभी राजेन्‍द्र यादव ने जनवादी लेखक संघ की सदस्‍यता लेने के लि‍ए नहीं कहा,तो उन्‍होंने कहा नहीं। सबसे दि‍लचस्‍प सूचना यह कि‍ सन् 1989 के पहले कोलकाता में जनवादी लेखकसंघ के तत्‍वावधान में एक सात दि‍वसीय राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी हुई थी उसमें देशभर के नामी लेखक आए थे, लेकि‍न प्रभाजी को उस गोष्‍ठी का नि‍मंत्रण पत्र तक नहीं मि‍ला था। वे जनवादी लेखक संघ के कार्यक्रमों की सामान्‍य सूचना पाने वालों की सूची तक में दर्ज नहीं थीं। ऐसा क्‍यों हुआ यह तो जलेस के लोग ही जानें। लेकि‍न मेरे लि‍ए प्रभाजी की यह बात आज भी चुभती रही है कि‍ जलेस के लोग मुझे लेखि‍का ही नहीं मानते। मेरे कहने के बाद वे जनवादी लेखक संघ की सदस्‍य बनीं और अंत तक उससे जुडी रहीं। मेरे साथ कोलकाता जि‍ला की उपाध्‍यक्ष भी रहीं। यह वह प्रस्‍थान बिंदु है जहां से प्रभाजी मार्क्‍सवाद और मार्क्‍सवादि‍यों के सीधे संपर्क में आयीं। इसके बाद उनकी मार्क्‍सवाद और स्‍त्रीवाद को लेकर साझा यात्रा चलती रही और इसका उन्‍होंने अंति‍म दि‍न तक पालन कि‍या। प्रभाजी की ही क्षमता दी थी उन्‍होंने ऐसे समय में मार्क्‍सवादी कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी की खुलकर मदद की जब आमतौर पर बुद्धि‍जीवी माकपा,मार्क्‍सवाद,वामपंथ से नंदीग्राम और दूसरे मसलों की वजह से भाग रहे थे, ऐसे समय में उन्‍होंने माकपा की जो मदद की वह बेमि‍साल है। वे नंदीग्राम सिंगूर के मसले पर माकपा के नजरि‍ए से असहमत थीं लेकि‍न यह भी कहती थीं कि‍ मार्क्‍सवाद के अलावा कोई वि‍कल्‍प नहीं है।नंदीग्राम की फायरिंग की घटना से भयानक उद्वेलि‍त थीं इसके बावजूद उन्‍होंने माकपा का जमकर साथ दि‍या। यह काम वे क्‍यों कर रही थीं, उनका क्‍या स्‍वार्थ था,कोई नहीं जानता। लेकि‍न अन्‍य की मदद में मार्क्‍सवादी संगठन का आना वह भी ऐसे व्‍यक्‍ति‍ के व्‍यवहार में जो पार्टी मेम्‍बर नहीं है,स्‍वयं में उनकी सामाजि‍क बेचैनी का प्रति‍फलन था।
मार्क्‍सवादि‍यों में अरूण माहेश्‍वरी,सरला माहेश्‍वरी और मैं ही उनके एकमात्र दोस्‍तों में थे, बाकी दूर दूर कोई मार्क्‍सवादी उनका दोस्‍त नहीं था,यहां तक कि‍ माकपा के प्रति‍ राजेन्‍द्र यादव का भी रूझान बदल चुका था। इस सबके बावजूद स्‍थानीय स्‍तर पर मार्क्‍सवाद के प्रचार में मदद और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर स्‍त्रीवाद के प्रचार में मदद करना ये दो लक्ष्‍य पूरी नि‍ष्‍ठा के साथ चल रहे थे।
उनके स्‍त्रीवादी नजरि‍ए से सैंकड़ों पाठक प्रभावि‍त हुए हैं। लेखकों में स्‍त्रीवाद को सम्‍मान की नजर से देखा जाने लगा। स्‍त्रीवाद और मार्क्‍सवाद को स्‍थानीय और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सामंजस्‍य के साथ साधने का एक फायदा यह हुआ कि‍ कोलकाता में भी उनके जि‍तने निंदक थे, उनके खि‍लाफ घृणा‍ का प्रचार करने वाले थे उन्‍हें भी प्रभाजी के व्‍यक्‍ति‍त्‍व का लोहा मानना पड़ा। प्रभाजी जानती थीं कि‍ कौन लेखक अथवा व्‍यक्‍ति‍ उनके खि‍लाफ कुत्‍सा प्रचार करता है वह व्‍यक्‍ति‍ जब उनके सामने आता था तो उससे बडे ही प्‍यार से मि‍लती थीं उसका जमकर स्‍वागत सत्‍कार करती थीं। उनके इस व्‍यवहार को देखकर घृणा के प्रचारक पानी-पानी हो जाते थे। इस समूची प्रक्रि‍या का आनंद के क्षणों में वि‍स्‍तार से वर्णन करके भी सुनाती थीं। बाकी फि‍र कभी।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

'हि‍न्‍दी वाला' फेमि‍नि‍ज्‍म से क्‍यों डरता है ?

हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य में औरत है किंतु उसका शास्‍त्र नहीं है। स्‍त्रीशास्‍त्र के बि‍ना औरत नि‍रस्‍त्र है। अनाथ है,पराश्रि‍त है। साहि‍त्‍य की प्रत्‍येक वि‍धा में लि‍खने वाली औरतें हैं,साहि‍त्‍यि‍क पत्रि‍काओं में 'हंस' जैसी शानदार पत्रि‍का है जि‍सके संपादक आए दि‍न स्‍त्री का महि‍मामंडन करते रहते हैं, छायावाद में स्‍त्री की महत्‍ता का उदघाटन करने वाले नामवर सिंह की इसी नाम से शानदार कि‍ताब है। इसके बावजूद 'हि‍न्‍दीवाला' (यहां लेखकों,बुद्धि‍जीवि‍यों,शि‍क्षकों से तात्‍पर्य है) स्‍त्रीवाद को लेकर भडकता क्‍यों है ?
हि‍न्‍दी में स्‍त्री शास्‍त्र नि‍र्मित क्‍यों नहीं हो पाया ? हि‍न्‍दी वाला 'फेमि‍नि‍ज्‍म' अथवा 'स्‍त्रीवाद' पदबंध के प्रयोग से इतना भागता क्‍यों है ? हि‍न्‍दी में कोई फेमि‍नि‍स्‍ट पैदा क्‍यों नहीं हुआ ? हि‍न्‍दी वि‍भागों में अरस्‍तू से लेकर मार्क्‍सवाद तक सभी सि‍द्धान्‍त पढाए जाएंगे लेकि‍न स्‍त्रीवाद नहीं पढाया जाता,ऐसा क्‍या है जो स्‍त्रीवाद का नाम सुनते ही हि‍न्‍दी वाले की हवा नि‍कल जाती है। स्‍त्री के सवाल तब ही क्‍यों उठते हैं जब उस पर जुल्‍म होता है ? हि‍न्‍दी में स्‍त्री लेखि‍काओं की लंबी परंपरा के बावजूद स्‍वतंत्र रूप से 'स्‍त्री साहि‍त्‍य' पदबंध अभी भी लोकप्रि‍य नहीं है, आलोचना और इति‍हास की कि‍ताबों से लेकर दैनन्‍दि‍न साहि‍त्‍य वि‍मर्श में स्‍वतंत्र रूप से 'स्‍त्री साहि‍त्‍य' की केटेगरी को अभी तक स्‍वीकृति‍ नहीं मि‍ली है। हमारी ज्‍यादातर साहि‍त्‍यि‍क पत्रि‍काएं 'स्‍त्री साहि‍त्‍य' केटेगरी को स्‍वतंत्र रूप में महत्‍व नहीं देतीं बल्‍कि‍ साहि‍त्‍य की केटेगरी के तहत 'स्‍त्री साहि‍त्‍य' को समाहि‍त करके चर्चा करते हैं। और वे जब ऐसा करते हैं तो सीधे स्‍त्री की स्‍वतंत्र पहचान का अपहरण करते हैं। जाने-अनजाने स्‍त्री साहि‍त्‍य की प्रति‍ष्‍ठा की बजाय उसकी पहचान को लेकर वि‍भ्रम पैदा करते हैं। हि‍न्‍दी की अधि‍कांश स्‍त्री लेखि‍काएं महि‍ला आन्‍दोलन से दूर हैं और फेमि‍नि‍ज्‍म को एकसि‍रे से अपने नजरि‍ए का हि‍स्‍सा नहीं मानतीं। हि‍न्‍दी के कि‍सी भी प्रति‍ष्‍ठि‍त आलोचक ने स्‍त्रीवादी साहि‍त्‍यालोचना पर एक भी शटद क्‍यों नहीं लि‍खा ?
स्त्री साहित्य के सवाल हाशिए के सवाल नहीं हैं। स्‍त्री जीवन के केन्द्रीय सवाल हैं। स्त्री-विमर्श खाली समय या आनंद के समय का विमर्श नहीं है। हिन्दी में स्त्री साहित्य और उसकी सैध्दान्तिकी अभी भी अकादमिक जगत में प्रवेश नहीं कर पायी है। साहित्यिक पत्रिकाओं के स्त्री विमर्श लेखक जाने-अनजाने मांग और पूर्ति के मायावी तर्कजाल में कैद हैं।
स्त्री साहित्य या स्त्री विमर्श में प्रयुक्त धारणाओं का सही नाम और सही संदर्भ में इस्तेमाल नहीं हो रहा। स्त्री से जुड़ी धारणाओं की मनमानी व्‍याख्‍याएं पेश की जा रही हैं। स्त्री साहित्य के मूल्यांकन के संदर्भ में सबसे बड़ी चुनौती है अवधारणाओं की सही समझ की। हिन्दी साहित्य विमर्श में अवधारणाओं में सोचने की परंपरा का निरंतर ह्रास हो रहा है।
अंग्रेजी साहित्य में स्त्रीवादी साहित्यालोचना बेहद जनप्रिय पदबंध है। किन्तु हिन्दी में यह उतना जनप्रिय नहीं है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि हिन्दी के समीक्षकों को इस पदबंध में कोई आकर्षण नजर नहीं आता। इसके अलावा हिन्दी में साहित्यिक पत्रिकाओं में जो संपादक स्त्री साहित्य के पक्षधर के रूप में नजर आते हैं वे भी इस पदबंध का प्रयोग नहीं करते।
साहित्यालोचना की परंपरा प्रत्येक समाज में बड़ी पुरानी है अत: स्त्रीवादी साहित्यालोचना हमेशा अन्य से ग्रहण करके ही अपना विकास करती है, इसमें अन्य के विचारों के प्रति तिरस्कार का भाव नहीं है। यह अन्य के विचारों को वहां तक आत्मसात् करने के लिए तैयार है जहां तक वे स्त्री के हितों ,भावों,जीवन मूल्यों और यथार्थ को विकसित करने में सहायता करते हैं। स्त्रीवादी साहित्यालोचना की पूर्ववर्ती साहित्यालोचना के स्कूलों से इस अर्थ में भिन्नता है कि वे एकायामी थे। जबकि स्त्रीवादी साहित्यालोचना बहुआयामी है। वैविध्यपूर्ण है।यह समाज के किसी एक संस्थान को सम्बोधित करने की बजाय समाज के विभिन्न संस्थानों को सम्बोधित करती है। स्त्रीवादी साहित्यालोचना ने आलोचना के स्कूलों की गंभीर आलोचना के साथ साथ समाज और साहित्य के प्रति आलोचना में नए तत्वों,अवधारणाओं और समझ का भी विकास किया है।
स्त्रीवादी साहित्यालोचना का लक्ष्य है समाज में पुंसवादी प्रभुत्व की समाप्ति करना। पुंसवादी संस्कृति की संरचना को ध्वस्त करना। संस्‍कृति‍ की संरचनाओं कलाएं ,धर्म ,कानून ,एकल परिवार , पिता और राष्ट्र-राज्य के असीमित अधिकार आते हैं,वे सभी इमेज,संस्थाएं,संस्कार और आदतें आती हैं जो यह बताती हैं कि औरत किसी काम की नहीं होती,अर्थहीन है,अदृश्य है।माया है।
स्त्रीवादी साहित्यालोचना के इस लक्ष्य को हासिल करने का हिन्दुस्तान में क्या तरीका हो सकता है ? इसके बारे में एक जैसी रणनीति अपनाना संभव नहीं है। हिन्दुस्तान में सामाजिक वैविध्य और स्त्रीचेतना के अनेक स्तरों को मद्देनजर रखते हुए संवाद और संघर्ष के रास्ते पर साथ-साथ चलना होगा। इस क्रम में त्याग और ग्रहण की पध्दति अपनानी होगी।
स्त्रीवादी साहित्यालोचना को प्रचलित साहित्यालोचना में कुछ हेरफेर करने बाद निर्मित नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज के प्रति बुनियादी रवैयया बदलना होगा। परंपरागत दृष्टियों को ऊपरी फेरबदल के साथ स्त्रीवादी हितों के पक्ष में रूपान्तरित नहीं किया जा सकता। स्त्रीवादी साहित्यालोचना क्रांतिकारी साहित्यालोचना है उसका लक्ष्य है प्रचलित और प्रभुत्व बनाकर बैठे आलोचना स्कूलों को चुनौती देना, उन्हें अपदस्थ करना। प्रभुत्ववादी विमर्शों को चुनौती देना, उन्हें अपदस्थ करना।सभी किस्म के विमर्शों में स्त्रीवादी नजरिए से हस्तक्षेप करना। स्त्रीवादी साहित्यालोचना की हिमायत करना,उसे विस्तार देने का काम सिर्फ औरतों का ही नहीं है बल्कि इसमें पुरूषों को भी शामिल किया जाना चाहिए। स्त्री का संघर्ष सिर्फ स्त्री का नहीं उसमें पुरूषों की भी समान हिस्सेदारी होनी चाहिए।
स्त्रीवादी साहित्यालोचना में मर्दवादी नजरिए से यदि पुरूष समीक्षक दाखिल होते हैं तो वे स्त्रीवादी साहित्यालोचना का विकास नहीं कर सकते ,ऐसे समीक्षकों को स्त्रीवादी समीक्षक कहना मुश्किल है।हिन्दी में यह फैशन चल निकला है कि अब हरेक मर्दवादी समीक्षक स्त्री विषय पर हाथ भांज रहा है। हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं में इस तरह के फैशनपरस्त या जिज्ञासु आलोचकों में अनेक मर्द संपादक और आलोचक हैं। स्त्रीवादी साहित्यालोचना का विकास मर्द समीक्षकों द्वारा फैशन ,सहानुभूति या जिज्ञासा के आधार पर नहीं किया जा सकता।बल्कि इसके लिए क्रांतिकारी रवैयये की जरूरत है।अभी तक जिन मर्दों ने स्त्रीवादी साहित्यालोचना में योगदान किया है उनका किसी न किसी रूप में क्रांतिकारी संघर्षों, क्रांतिकारी विमर्श,आमूल परिवर्तनकामी आलोचना परंपरा से संबंध रहा है।ये लोग स्त्रीवादी नजरिए के परिवर्तनकामी रूझानों के पक्षधर रहे हैं। वे मानते हैं कि स्त्रीवादी नजरिया प्रत्येक किस्म के उत्पीडन,शोषण,अन्याय आदि का सख्त विरोधी है।जिन पुरूषों ने स्त्रीवादी साहित्यालोचना के पक्ष में लिखा है उनमें प्रतिबध्दता का गहरा भाव रहा है। उन्होंने जिज्ञासावश नहीं लिखा।
हिन्दी में स्त्री आलोचना में जो मर्द दाखिल हो रहे हैं वे फैशन के नाम पर आ रहे हैं ,उनका साहित्य के क्रांतिकारी विमर्श,समाज के क्रांतिकारी संघर्षों और विचारधाराओं से कोई संबंध नहीं है। ऐसे मर्द समीक्षकों को स्त्रीवादी विमर्श अपना अंग नहीं मानता। स्त्रीवादी साहित्यालोचना के अंदर स्त्रियां उन्हीं पुरूषों को स्वीकार करने को तैयार हैं जो स्त्री के अधिकारों और स्त्रीवादी नजरिए के प्रति पूरी तरह प्रतिबध्द हैं ,आमूल सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर हैं। स्त्रीवादी साहित्यालोचना को सैध्दान्तिक तौर पर वे मर्द स्वीकार्य हैं जो सिध्दान्तत: लिंग को आधार बनाकर समीक्षा का विकास कर रहे हों।स्त्री के अनुभवों को स्त्री के नजरिए से देखते हैं।
हिन्दी में स्त्री के सवालों, समस्याओं, अनुभूति आदि को आलोचक मर्दवादी नजरिए से देखते हैं, इस तरह के लेखन की इन दिनों हिन्दी में बाढ़ आई हुई है। आज सारी दुनिया में स्त्रीवादी साहित्यालोचना के योगदान की कोई अनदेखी नहीं कर सकता। किन्तु हिन्दी में साहित्य सैध्दान्तिकी में स्त्रीवादी सैध्दान्तिकी का अध्ययन नहीं कराया जाता। स्त्रीवादी साहित्यालोचना पर विचार करते समय बुनियादी तौर पर यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि लिंग के रूप में पुंसवादी नजरिए की आलोचना का यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि मर्द को स्त्री का शत्रु घोषित कर दिया जाए। पुरूष को शत्रु घोषित करने वाली मानसिकता मूलत: मर्दवाद के प्रत्युत्तर में पैदा हुआ 'स्त्रीवादी आतंकवाद' है। इसके दृष्टिकोण से मर्द केन्द्रीय समस्या है।अत: उसे बिना शर्त्त स्त्री के आगे आत्मसमर्पण कर देना चाहिए। आतंकवादी नजरिया लिंगाधारित ध्रुवीकरण करता है ,यह दृष्टिकोण अंतत: ऐसी स्थिति पैदा करता है कि मर्द या तो स्त्रीवाद की उपेक्षा करे या स्त्रीवाद पर हमला करे। इस दृष्टिकोण के शिकार लोग एक-दूसरे पर हमला बोलते रहते हैं। इससे स्त्री को कोई लाभ नहीं मिलता। 'हंस' के सम्पादकीय इस तरह के नजरिए से भरे पड़े हैं।
असल में 'स्त्रीवादी आतंकवाद' मर्दवाद का विलोम है। यह विभाजनकारी नजरिया है। समग्रता में स्त्रीवादी आतंकवादी नजरिए से स्त्री को कोई लाभ नहीं मिलता, समाज में मर्द के प्रभुत्व में कोई कमी नहीं आती। उलटे स्त्रीवाद के प्रति संशय पैदा करता है, स्त्री के सामाजिक और बौध्दिक स्पेस को संकुचित करता है।
स्त्रीवाद आस्था नही है,बल्कि स्त्री-सत्य की खोज का मार्ग है। अकादमिक जगत में स्त्रीवाद को जब तक पढ़ाया नहीं जाएगा उसका ज्ञानात्मक प्रसार नहीं होगा। शिक्षकों का काम है स्त्रीवाद की शिक्षा देना न कि स्त्रीवाद पैदा करना। स्त्रीवाद के पक्ष में जो लोग लिखते हैं उन्हें अपने लिखे की आलोचना को विनम्रतापूर्वक ग्रहण करना चाहिए और उसकी रोशनी में अपने विचारों को और भी ज्यादा सुसंगत बनाने की कोशिश करनी चाहिए। यह देखा गया है कि जब भी किसी स्त्रीवादी विचारक की आलोचना हुई है उसने इसे स्त्रीवाद पर हमला घोषित किया है। यह रवैयया सही नहीं है।स्त्रीवाद के बारे में की गई आलोचना वैचारिक विकास की प्रक्रिया का अंग है उसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया जाना चाहिए। स्त्रीवादी साहित्यालोचना का अकादमिक जगत में प्रवेश तब ही संभव है जब उसे आस्था के रूप में पेश करने की बजाय नए परि‍वर्तनकामी विचार के रूप में पेश किया जाये।
( mohallalive .com पर भी देखें )

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