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रविवार, 29 अप्रैल 2012

बंगारू लक्ष्मण की सजा से उठे सवाल



        भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को सीबीआई की अदालत ने हथियार खरीद फेक सौदे में घूस लेने के आरोप में 4साल के सश्रम कारावास की 28 अप्रैल 2012 को सजा सुनाकर कई महत्वपूर्ण परिवर्तनों के संकेत दिए हैं। पहली बात यह कि इस मामले ने न्याय का आधार बदल दिया है। हथियारों की वास्तविक खरीद में घूसखोरी में आज तक कोई पकड़ा नहीं गया और न किसी को सजा हुई है ,लेकिन हथियार खरीद के फेक मामले में घूसखोरी पकड़ी गयी और सजा भी हो गई।
     बोफोर्स में दलाली और घूस दोनों दी गयीं,25साल से ज्यादा समय यह मुकदमा देश-विदेश के अनेक अदालतों में खाक छान चुका है ,और अंत में दोषी लोग अभी तक सीना फुलाए घूम रहे हैं। इसका अर्थ यह है न्यायालयों में सच के लिए न्याय की संभावनाएं घट गयी हैं।
     बोफोर्स के मामले में सभी प्रामाणिक सबूत होने के बावजूद दोषी व्यक्ति को सारी दुनिया की पुलिस नहीं पकड़ पायी। यहां तक कि सीबीआई स्वयं यह मामला हार गयी,आयरनी देखिए बंगारू के मामले में सीबीआई अदालत में जजमेंट आता है और बंगारू दोषी पाए जाते हैं।
       सवाल उठता है कि बंगारू लक्ष्मण ने यदि सच में किसी हथियार बनाने वाली कंपनी के लिए घूस ली होती और हथियारों की सप्लाई हुई होती तो क्या वे दोषी पाए जाते ? चूंकि बंगारू के मौजूदा मामले में कोई भी हथियार निर्माता कंपनी शामिल नहीं है तो न्याय अपना सीना फुलाए खड़ा है लेकिन यही भारत के न्यायालय बोफोर्स मामले में निकम्मे साबित हो चुके हैं। यूनियन कारबाइड के मामले में पीडितों को न्याय दिलाने में असफल साबित हुए हैं।
       न्याय भी वर्गीय होता है। बंगारू लक्ष्मण की निजी तौर पर कोई सामाजिक हैसियत नहीं है,वे एक मध्यवर्गीय नेता से ज्यादा हैसियत नहीं रखते।इसलिए आसानी से दोषी सिद्ध कर दिए गए। यदि वे भी किसी बहुराष्ट्रीय हथियार कंपनी के दलाल होते तो संभवतः कुछ नहीं होता। उल्लेखनीय है बिना अपराधी पकड़े बोफोर्स के मामले को सर्वोच्च न्यायालय ने हमेशा के लिए दफन कर दिया है। इसे कहते हैं असली और नकली हथियार निर्माता कंपनी की ताकत का अंतर।
    विचारणीय सवाल यह है कि वास्तव हथियार निर्माता कंपनी के अपराध के मामले में न्यायालय असहाय क्यों महसूस करते हैं ? कांग्रेस और सीबीआई जितना बंगारू लक्ष्मण को सजा मिलने पर हंगामा कर रहे हैं , ये दोनों ही बोफोर्स के मामले में दोषी को पकडवाने में सफल क्यों नहीं हुए ? इस असफलता के लिए उन्होंने देश की जनता से माफी क्यों नहीं मांगी ?
   ध्यान रहे बोफोर्स दलालीकांड सच्चाई है । और बंगारू घूसकांड निर्मित सच्चाई है। निर्मित सच को सच मानकर विभ्रम पैदा किया जा सकता है। लेकिन यथार्थ में नहीं बदला जा सकता। यथार्थ यह है कि बहुराष्ट्रीय हथियार निर्माता कंपनियों के सामने हमारे जज, वकील और तर्कशास्त्र बौने साबित हुए हैं।
      बंगारू लक्ष्मण को सजा मिली, वे ऊपरी अदालत में जाएंगे और होसकता है सजा बहाल रहे, हो सकता वे बरी हो जाएं,भविष्य के बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता। लेकिन एक सवाल बार-बार मन में उठ रहा है कि तहलका की टीम आज तक किसी सच्ची हथियार निर्माता कंपनी की दलाली की पोल खोलने में सफल क्यों नहीं हो पायी ? किसी वास्तव घूसखोर को क्यों नहीं पकड़ पायी ?
    सारा देश जानता है कि भारत सरकार विगत 5 सालों में अब तक 60हजार करोड रूपये से ज्यादा के हथियार खरीद चुकी है। इनकी खरीद में 3 से 10 फीसदी कमीशन भी लोकल एजेंट को मिलता है। कौन किस कंपनी का एजेंट है यह भी सब जानते हैं। यह भी जानते हैं कि कमीशनखोरी भारत के कानून में अपराध है लेकिन विदेशी कंपनियों के विदेशी कानून में यह पारिश्रमिक है। कहने का अर्थ यह है कि हथियारों की खरीद के सौदों में तहलका आदि कोई भी संस्था या मीडिया  ग्रुप ने कभी स्टिंग ऑपरेशन क्यों नहीं किया ? क्यों वे आजतक असली हथियार कंपनी के सौदे में दी गयी घूसखोरी के किसी भी घूसखोर को नहीं पकड़ पाए ?
    दूसरा सवाल यह है कि कल्पित स्टोरी,कल्पित कंपनी, असली घूस और असली घूसघोर के आधार पर क्या हम हथियारों की खरीद-फरोख्त में चल रही व्यापक घूसखोरी को नंगा करके जागरण पैदा कर रहे हैं या घूसखोरी को वैध बनाने का काम कर रहे हैं ?  बंगारू टाइप ऑपरेशन वास्तव में घूसखोरी को वैधता प्रदान करते हैं, नॉर्मल बनाते हैं। बंगारू की सजा या अपराध को मीडिया जितना बताएगा,घूसखोरी-कमीशनखोरी को और भी वैधता प्राप्त होगी।
भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण को दोषी करार देते हुए सीबीआई अदालत ने कहा, हो सकता है कि न्यूज पोर्टेल का स्टिंग करने का तरीका गलत हो लेकिन उद्देश्य गलत नहीं था। ऐसे में स्टिंग की सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है। न्यायाधीश ने स्टिंग की सच्चाई को माना है। लेकिन क्या स्टिंग ऑपरेशन पत्रकारिता है ?एक वर्ग मानता है कि यह पत्रकारिता है,खोजी पत्रकारिता है। हम यह मानते हैं कि स्टिंग ऑपरेशन जासूसी है, इसे पत्रकारिता नहीं कह सकते। यह मूलतः पीत पत्रकारिता के उपकरणों से बना विधा रूप है। स्टिंग ऑपरेशन और जासूसी के आधार पर पत्रकारिता करने के कारण रूपक मडरॉक और उनके बेटे को ब्रिटेन और अमेरिका में तमाम किस्म के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। पत्रकारिता में लक्ष्य जितना पवित्र और महत्वपूर्ण है उसके तरीके भी उतने ही पवित्र और महत्वपूर्ण माने गए हैं। कम से कम तहलका का स्टिंग ऑपरेशन इस आधार पर खरा नहीं उतरता। वह स्टिंग ऑपरेशन है पत्रकारिता नहीं है।
   इसके बावजूद कायदे से भाजपा को बंगारू लक्ष्मण को लेकर अभी तक व्यक्त नजरिए के लिए तहलका की खोजी टीम से सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी चाहिए,क्योंकि भाजपा समर्थित मीडियातंत्र और नेताओं ने तहलका टीम के चरित्र और उत्पीड़न में कोई कमी नहीं की ।
     बंगारू के खिलाफ आया फैसला मीडिया,खासकर खोजी पत्रकारों की बहुत बड़ी जीत है।आज तक मीडिया और स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर  किसी बड़े नेता को सजा नहीं हुई है ,यह पहली घटना है और यह खोजी पत्रकारों की बड़ी विजय है।यह जीत ऐसे समय में आई है जब पत्रकारों की साख पर बार बार अंगुली उठाई जा रही थी।इस फैसले से ईमानदार पत्रकारों को जोखिम उठाने की प्रेरणा मिलेगी।
चिंता की बात यह है कि भाजपा और संघ परिवार  अभी भी बंगारू लक्ष्मण की घूसखोरी को अपराध नहीं मान रहा है,यही वजह है कि उनकी भाजपा की सदस्यता अभी तक खत्म नहीं की गयी है। बंगारू ने अध्यक्ष के नाते घूस ली थी ,व्यक्तिगत रूप में नहीं । वे उस समय भाजपा अध्यक्ष थे।अतः यह उनका व्यक्तिगत मामला नहीं है।
उल्लेखनीय है यह मामला 2001 में तहलकाटीम ने उन्हें 1लाख रूपये घूस लेते हुए कैमरे में पकड़ा था।वे लंदन की एक फर्म से घूस लेते स्टिंग ऑपरेशन में पकड़े गए थे।इस पूरे प्रकरण में तहलका के अनुसार- "बंगारू लक्ष्मण अकेले नहीं हैं. समता पार्टी की तत्कालीन अध्यक्षा जया जेटली भी बिल्कुल उन्हीं परिस्थितियों में रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिज के सरकारी आवास में घूस लेते हुए कैमरे की जद में आईं, उनकी पार्टी के कोषाध्यक्ष आरके जैन भी पैसा लेते हुए पकड़े गए. घूस का दलदल सिर्फ राजनीति महकमे तक ही सीमित नहीं था. सेना और नौकरशाही के तमाम आला अधिकारी भी पैसे लेते हुए नजर आए. लेफ्टिनेंट जनरल मंजीत सिंह अहलूवालिया, मेजर जनरल पीएसके चौधरी, मेजर जनरल मुर्गई, ब्रिगेडियर अनिल सहगल उनमें से कुछेक नाम हैं. रक्षा मंत्रालय के दूसरे सबसे बड़े अधिकारी आईएएस एलएम मेहता भी उसी सूची में हैं।"
तहलका टीम के अनुसार- "स‌रकार ने हम पर सीधा हमला तो नहीं किया लेकिन हमें कानूनी कार्रवाई के एक ऎसे जाल में उलझा दिया जिससे हमारा सांस लेना मुश्किल हो जाए.तहलका में पैसा निवेश करने वाले शंकर शर्मा को बगैर कसूर जेल में डाल दिया गया और कानूनी कार्रवाई की आड़ में उनका धंधा चौपट करने की हर मुमकिन कोशिश की गई. हमने कई बार खुद से पूछा कि तहलका और उसके अंजाम को कौन सी चीज खास बनाती है. जवाब बहुत सीधा है- शायद इसका असाधारण साहस. भ्रष्टाचार को इस कदर निडरता से उजागर करने की कोशिश ने ही शायद तहलका को तहलका जैसा बना दिया.तहलका लोगों के जेहन में रच बस गया।"


शनिवार, 11 सितंबर 2010

मीडिया का फास्टफूड है धर्म का ‘स्टिंग ऑपरेशन’

      ‘आजतक’  टीवी चैनल ने ‘हे राम’ के नाम से कई संतों की पोल खोलने वाला ‘स्टिंग ऑपरेशन’ पर आधारित एक कार्यक्रम कल यानी 10 सितम्बर 2010 को प्राइम टाइम में प्रसारित किया। संतों को नंगा करने वाले ऐसे ही अनेक कार्यक्रम यह चैनल सास-समय पर दिखाता रहता है। इसबार के कार्यक्रम में चार संत मुरारी बापू,सुधांशु महाराज,दाती महाराज (शनि ग्रह वाले) और स्वामी सुमनानंद जी थे।
      इन चारों संतों के बारे में बताया गया कि ये संतई के अलावा विभिन्न किस्म के गैर धार्मिक धंधे करते हैं। भारत का प्रत्येक नागरिक और इनके भक्त यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि सामयिक बड़े संतों में अधिकांश गैर संतई का धंधा करते हैं। मजेदार बात यह है जिन लोगों को इस कार्यक्रम में समर्थन में बोलने के लिए बुलाया गया उनमें बाबा रामदेव और धर्मेन्द्र जी के बारे में तो मैं कह सकता हूँ इनके पास गैर संतई का बड़ा कारोबार है। धर्मेन्द्रजी राममंदिर आंदोलन के गैर संतई के कारपोरेट प्रकल्प का हिस्सा रहे हैं और बाबा रामदेव का जड़ी-बूटी आदि का बडा व्यापारतंत्र और योग के मीडिया प्रोडक्ट का बड़ा धंधा है। सवाल यह है कि क्या गैर संतई के काम करने वाले इन संतों को ‘आजतक’ के संत फार्मूले के आधार पर संत माना जा सकता है ?  
       यह कॉमनसेंस की बात है कि संतों के गैर संतई के धंधों को सब जानते हैं। जिस संत ने संपत्ति जुगाड़ करने ,व्यापार करने,कैसेट बेचने,वीडियो बेचने, आशीर्वाद से काम कराने, इशारे से काम कराने  आदि के कामों में अपने को लगा लिया है उसने संत के प्रचलित मार्ग का त्याग कर दिया है।
      ‘आजतक’ वालों ने जो बातें बतायी हैं वे कॉमनसेंस की बातें हैं इनसे संतों के प्रति घृणा पैदा नहीं होती। ‘आजतक’ वाले भूल गए कि संतों को उनके भक्त बहुत अच्छी तरह जानते हैं। वे जितना जानते हैं उसका चैनलों में एक प्रतिशत भी नहीं दिखाया जाता। संतों के भक्तों का संत के प्रति ज्ञान आज सत्य होते हुए भी निष्क्रिय है ।क्योंकि संतों ने आम जीवन के उपयोगितावाद से अपने को जोड़ लिया है। कारपोरेट ढ़ंग से काम कराने की कला में महारत हासिल कर ली है। यह आदर्श स्थिति है कि संत सिर्फ भक्ति करें,उपासना करें और गैर धार्मिक कार्यों में भाग न लें।
     चैनल वाले भूल गए यह कारपोरेट संस्कृति का जमाना है और धर्म को यदि जिंदा रहना है.संतों को यदि शोहरत हासिल करनी है तो कारपोरेट पद्धति अपनानी होगी और भारत के संतों ने इस बात को पकड़ लिया है। अब पुराने जमाने का धर्म कहीं पर भी नहीं बचा अब पुराने जमाने के संत भी नहीं बचे। पुराने जमाने में न्यूनतम से संत का जीवन चल जाता था आज नहीं चलता।
    पूंजीवाद ने संतों को भी जीने का रास्ता दिखाया है। पहले संतों को जीने मात्र के लिए न्यूनतम पूंजी की जरूरत होती थी और वे प्रचार पर ध्यान नहीं देते थे। क्योंकि उनके पास स्थानीय और परंपरागत संचारतंत्र था। लेकिन नए संत वैसे नहीं हैं। ‘आजतक’ चैनल की मुश्किल यहीं पर है वह आज के जमाने में पुराने संत ,संत की नैतिकता और धर्म को खोज रहा है।  
     मीडिया या टीवी चैनलों में इस तरह के कार्यक्रम मासकल्चर का फास्टफूड हैं। इनसे चैनल के दर्शकों को न सूचना मिलती है और नहीं ज्ञान मिलता है।सिर्फ समययापन में मदद जरूर मिलती है। इस तरह के कार्यक्रम संत-पंडित-पुजारी या धर्म का कुछ भी नुकसान नहीं करते। उनकी प्रतिष्ठा में इससे कोई कमी नहीं आती। उनके भक्तों की संख्या में गिरावट नहीं आती।
  टीवी चैनल वाले यह सोचते हों कि उन्होंने किसी संत या धार्मिक संस्थान को नंगा करके तीर मार लिया या किसी महान यथार्थ का उद्घाटन कर दिया तो वे विभ्रम के शिकार हैं। संत या धर्म को आप मीडिया कवरेज से पछाड़ नहीं सकते। खासकर ‘स्टिंग ऑपरेशन’ से तो एकदम नहीं। ‘स्टिंग ऑपरेशन’ काल्पनिक सत्य पर आधारित होता है। काल्पनिक सत्य को राज्य,कानून,सरकार,न्यायालय और जनता कहीं पर भी जनसमर्थन नहीं मिलता। वह काल्पनिक है और काल्पनिक से सत्य पैदा नहीं होता। काल्पनिक सत्य के लिए अवैध है।
  उल्लेखनीय है मीडिया की साख बनी थी ‘खोजी पत्रकारिता’ से। इसके लिए उसने वास्तव को आधार बनाया और पवित्र तरीके अपनाए। इस तरह की पत्रकारिता के जरिए जो भी सत्य सामने आया उस पर समाज,न्यायालय,सरकार और जनता सभी विश्वास करते हैं। नए जमाने के भारतीय टीवी पत्रकार अब सत्य की खोज में ‘खोजी पत्रकारिता’ नहीं कर रहे हैं। बल्कि असत्य और काल्पनिक के आधार पर ‘स्टिंग ऑपरेशन’ कर रहे हैं। वे कीचड़ से कीचड़ धोना चाहते हैं। ध्यान रहे कीचड़ साफ करने के लिए स्वच्छ पानी चाहिए।  
     हम याद करें बोफोर्स कांड की ‘खोजी पत्रकारिता को और उसकी राजनीतिक परिणतियों को, बोफोर्स की दलाली का सत्य सरकार गिरा चुका है। कहने का अर्थ यह है सत्य का असर होता है काल्पनिक का चाहे वह कितना ही प्रामाणिक हो कोई असर नहीं होता। अथवा बहुत ही सीमित और तात्कालिक असर होता है।
    यह भी ध्यान रहे पाखंड को टीवी कार्यक्रमों या मीडिया कवरेज से पछाड़ा नहीं जा सकता। क्योंकि मीडिया के ढ़ोंग और धर्म के ढ़ोंग में बिरादराना संबंध हैं। जिस तरह मीडिया में चीजें ‘फ्लो’ में पढ़ी जाती हैं और ‘फ्लो’ के अनुसार प्रभाव छोड़ती हैं वैसे ही धर्म की भी गति है। धर्म का भी ‘फ्लो’ है। ‘फ्लो’ को ‘फ्लो’ के जरिए नहीं पछाड़ सकते। तुलनात्मक तौर पर धर्म का ‘फ्लो’ ज्यादा है और वह प्रभावशाली भी है क्योंकि धर्म के ‘फ्लो’ को ग्रहण करके लागू करने वाली सक्रिय संरचनाए हैं। मीडिया के संतों को नंगा करने वाले ‘फ्लो’ का अनुकरण करने वाली सामाजिक संरचनाएं नहीं है। यही वजह है इस तरह के कार्यक्रम कोई सामाजिक असर नहीं छोड़ते।   









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