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शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

इलाहाबाद कुंभ,आस्था,टीवी चैनल और फेसबुक

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कुंभमेले को टीवी चैनलों ने आस्था का मेला कहा। इसे आस्था का मेला कहना गलत है। आस्था से फासिज्म की बू आती है। कुंभ आस्था का मेला नहीं है। आस्था के रूप में इस मेले को चित्रित करने का अर्थ है मेले के समस्त उदार चरित्र को अस्वीकार करना। आस्था में उदारता के लिए कोई जगह नहीं होती। आस्था का टीवी एजेण्डा और प्रचार अभियान अंततः फासिस्ट ताकतों की सेवा में ले जाता है।

आस्था को प्रचारित करेंगे तो उससे घृणा निकलेगी। चैनलवाले भूल गए आस्था से आस्था पैदा नहीं होती। घृणा पैदा होती है।

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अनेक धार्मिकलोग हमें पवित्रता का संदेश देते हैं लेकिन पवित्रता अब अतीत की वस्तु बन चुकी है। कोई वस्तु,विचार,मानवीय व्यवहार शुचिता या पवित्रता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

पवित्रता के लिए लड़ी गयी जंग वस्तुतः अतीत के लिए लड़ी जा रही जंग है। पवित्रता की जंग अतीत में ठेलती है। जब अतीत में जाते हैं वहां पर भी पाते हैं हम पवित्र नहीं थे। क्योकि अतीत कभी भी पवित्र नहीं रहा। पवित्रता के झगड़े पीछे ले जाते हैं।

यही वजह है कि आधुनिककाल में धर्मगुरूओं ने पवित्रता के सवाल को बस्तों में बंद कर दिया है और उसकी जगह स्वच्छता और सफाई के सवाल आ गए हैं.

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प्रत्येक धर्म हमको सत्य की शिक्षा देता है ,लेकिन सत्य क्या है इसके प्रमाण नहीं देता। आमलोग भगवान पदबंध का धर्मनिरपेक्षभाव से इस्तेमाल करते हैं। ईश्वर या भगवान के पदबंध का जो लोग इस्तेमाल करते हैं वे उसके बारे में कोई आलोचना सुनना पसंद नहीं करते।

इसका अर्थ यह है कि ईश्वर या भगवान उनके लिए सहिष्णुता का प्रतीक है। और वे भगवान के बहाने सहिष्णुता मैसेज देना चाहते हैं। यह भगवान की मॉडर्न भूमिका है।

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कुंभ में नहाना या जाना आस्था का सवाल नहीं है। कुंभ में या नदी में लोग नहाने जाते हैं अपनी आदत और इच्छा के अनुसार। कुंभस्नान आस्था नहीं मानवीय आदत है,स्वभाव है। यह किसी पुण्य-पाप से प्रेरित नहीं है। यह शुद्ध आनंद है। कुंभयात्री किसी कट्टरपंथी विचार से प्रेरित होकर संगम में गोते नहीं लगाते। ये लोग संतों-महंतों को कठमुल्लेपन से प्रेरित होकर नहीं देखते बल्कि इनके प्रति उदारभावबोध से पेश आते हैं। इस अर्थ में ही कुंभमेला आस्था का मेला नहीं है। यह धर्मनिरपेक्ष उदारभावों का मेला है।

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इलाहाबाद कुंभ धार्मिक पर्व नहीं है। बल्कि धर्मनिरपेक्षपर्व है। कुंभ में धर्मचेतना नहीं धर्मनिरपेक्षचेतना के रूपों के दर्शन ज्यादा मिलेंगे। यहां धार्मिक ज्ञानवार्ता की बजाय संगमस्नान,देवताओं के दर्शन आदि का महत्व ज्यादा है। धार्मिकग्रंथों का गौण हो जाना और धार्मिक प्रतीकों में जनता का मगन हो जाना वस्तुतः धर्म के धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया का अंग है।

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कुंभ में डुबकी लगाने वाले या मंदिर जानेवाले ज्यादातर आधुनिक लोग धर्म की सतही बातें जानते और मानते हैं। धार्मिकज्ञानात्मकचेतना की बजाय उनमें धार्मिकरूपात्मकचेतना ज्यादा होती है।

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भारत में गैर कट्टरपंथी धार्मिक संतों-महंतों ने विगत दो सौ साल में पैदा हुए मानवीय विचारों और मान्यताओं को अपने चिन्तन-मनन का हिस्सा बनाया है और नई तकनीक और समारोहधर्मिता को भी अपना लिया है। इसे धर्म पर लोकतांत्रिक प्रभाव भी कह सकते हैं। इन संतों ने धर्म का आधुनिकीकरण भी किया है। आजकल संत नेट और मोबाइल कनेक्टेड हैं। नियमित टीवी शो भी करते हैं।

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कोई भी धर्म या सम्प्रदाय हमें बुनियादी धार्मिक विश्वासों और मान्यताओं की पुष्टि करने का प्रामाणिक मार्ग नहीं बताता। हर बार नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की मान्यताओं और रूढ़ियों की आलोचना करती है।

शनिवार, 20 नवंबर 2010

टेलीविजन एंकरों का तालिबानी प्रौपेगैण्डा

     टेलीविजन में तालिबानी तांडव चल रहा है। भारत के विभिन्न समाचार चैनल टीवी समाचारों के सभी किस्म के एथिक्स और कानूनों को त्यागकर तालिबानी हथकंड़ों पर उतर आए हैं। वे सरकारी रिपोर्ट और पुलिस की चार्जशीट को खोजी खबर बनाकर पेश कर रहे हैं । और सनसनीखेज टीवी पत्रकारिता कर रहे हैं।
    हिन्दू आतंकवाद से लेकर हाल के भ्रष्टाचार के घोटालों के उद्घाटन तक टीवी चैनलों ने एक भी ऐसी खबर नहीं दी है जो उन्होंने स्वतंत्र रूप से जुगाड़ की हो,अपनी खोजीटीम लगाकर एकत्रित की हो। इसके बावजूद वे सत्य के तथाकथित ढ़िंढोरची बने हुए हैं। हमारे टीवी एकर नहीं जानते कि वे इस तरह टीवी को तालिबानी टीवी में तब्दील कर रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया में दीर्घकाल में टेलीविजन की विश्वसनीयता ही खत्म हो जाएगी।
     टेलीविजन का तालिबानी हथकंडा है खबर के नाम पर आतंक ,भय और दबाब पैदा करना। सरकार को पंगु बनाना। सरकारी मशीनरी की निर्रथकता को ढ़ोल बजाना। चैनलों में यह भाव नजर आ रहा है कि ‘मेरी मानो वरना नंगा कर दूँगा’।
      संचारमंत्रालय से लेकर आदर्श घोटाले तक,कॉमनवेल्थ से लेकर कर्नाटक के येदुरप्पा घोटाले तक टेलीविजन का काम आतंक पैदा करने का रहा है। इसने खबरें कम और राजनीतिक भय ज्यादा पैदा किया है। इन सभी प्रसंगों में सत्य का एक भी नया अंश चैनल रिपोर्टर जुगाड़ नहीं कर पाए हैं।
     चैनल एंकर कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा के आधार पर अपनी तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी रिपोर्ट को तैयार करते हैं और फिर उसका जमकर 24 घंटे ,48 घंटे, 72 घंटे प्रौपेगैण्डा करते हैं। वे तथाकथित पुलिस फाइल से सामग्री जुगाड़ करके लाते हैं,भ्रष्टाचार के मामले में वे सीएजी की रिपोर्ट को लेकर आए हैं। वे अपनी टीवी रिपोर्ट पर चर्चित व्यक्तियों को बातचीत के लिए बुलाकर पूछते हैं कि हमारे फलां-फलां सवाल हैं ,आप लोगों की क्या राय है ? क्या किया जाए ?
      टॉक शो में बैठे ‘ज्ञानी-गुणी’ लोग तत्काल रेडीमेड उत्तर देते हैं। यह करो वह करो। इसे पकड़ो,उसे गिरफ्तार करो। इसे बर्खास्त करो,उसे खोज निकालो। तत्काल दंड दो। हम जो कहते हैं उसे मानो। यदि नहीं मानोगे तो हम और भी हल्ला करेंगे। इसके कारण टीवी चैनलों ने तालिबानी आतंक का वातावरण बनाया हुआ है। इसके खिलाफ सरकार को खड़ा होना चाहिए। लोकतंत्र पसंद ताकतों को आवाज बुलंद करना चाहिए। सत्य के साथ खड़ा होना चाहिए। टीवी चैनलों के आतंक के सामने उसे समर्पण नहीं करना चाहिए।
    अभी तक का अनुभव बताता है सरकार भी चैनलों से डरने लगी है। कायदे से सरकार का डर होना चाहिए था। लेकिन चैनलों ने उलटा वातावरण बनाया है। अब चैनलों से सरकार डर रही है,नेता डरे हैं, राजनीतिक दल डरे हैं, समाज डरा हुआ है। न्यायाधीश डरे हुए हैं। सिर्फ अंसंवैधानिक सत्ता केन्द्र और माफिया गिरोहों को चैनलों से नहीं डर नहीं लगता। बाकी सब लोग डरे हुए हैं।
     इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो टीवी चैनल भय और आतंक का वातावरण बनाकर माफिया और कानून भंजकों के लिए विचारधारात्मक वातावरण का निर्माण करने का काम कर रहे हैं। चैनल वाले भय की सेवा कर रहे हैं,लोकतंत्र की नहीं। लोकतंत्र में भय का वातावरण नहीं होता। दबाब का वातावरण नहीं होता।
      टीवी में किसी खबर के आने का मतलब है संबंधित व्यक्ति की सामाजिक हत्या। वे यह काम बड़े सुनियोजित ढ़ंग से कर रहे हैं। इसका न्यायालयों से लेकर राजनेताओं तक प्रभाव पड़ रहा है। तथाकथित पब्लिक पर्सेप्शन बनाने के नाम पर टीवी वाले किसी भी व्यक्ति या मसले के बारे में खबर उछालते हैं और उसके बाद तत्काल एक्शन की मांग करते हैं। 
    मजेदार बात यह है एंकरों से लेकर समाचार संपादकों को संबंधित मसले की जटिलताओं की कोई जानकारी नहीं होती। वे मसले की सरलता से बाकिफ होते हैं और जटिलता से अनजान होते हैं। मसले को सरल बनाने के चक्कर में वे जटिल और संश्लिष्ट को फालतू समझने लगते हैं । इसके बाद अपने ही बुने जाल में फंस जाते हैं।  उनकी किसी भी मसले को लेकर कोई भी गहरी तैयारी नहीं होती और वे भोंपू की तरह अपनी बेबकूफियों को सत्य का अंश बताकर प्रचारित करते हैं। वे उतना ही जानते हैं जितना कागज पर उनके सामने होता है या किसी ने सूचना दे दी होती है। वे अपने विवेक, पेशेवर कौशल और तथ्यों की दूर तक गहराई में जाकर छानबीन नहीं करते। वे रहस्योदघाटन के नाम पर अप्रासंगिक बातों और तथ्यों को उठाते हैं और उनका प्रचार करते हैं।
     टीवी समाचार संपादकों की किस तरह की खोखली तैयारी होती है इसका आदर्श उदाहरण है 19 नवम्बर 2010 को ‘टाइम्स नाउ’ चैनल के समाचार संपादक-एंकर अर्णव गोस्वामी का दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल के साथ लिया गया साक्षात्कार।
    इस साक्षात्कार में मंत्री कपिल सिब्बल ने समाचार संपादक को जिस तरह धोया और नंगा किया वह काबिलेतारीफ तो है ही ,साथ ही टीवी पत्रकारिता के खोखलेपन का द्योतक भी है।
    मसलन मंत्री महोदय ने एक सवाल एंकर से किया कि आप यह बताएं कि स्पैक्ट्रम के दाम कौन तय करेगा ?  शेष तक इस सामान्य से सवाल का जबाब एंकर के पास नहीं था,वह जानता था लेकिन बोला नहीं ,क्योंकि उसके तमाम भ्रष्टाचार विरोधी प्रचार अभियान की इस एक सवाल के आधार पर ही हवा निकल जाने का खतरा था।
     मंत्री ने समाचार संपादक की जिस निर्ममता के साथ धुलाई की वह देखने लायक थी और उससे यह यभी पता चल रहा था कि अर्णव गोस्वामी के पास सत्य का एक सरकारी अंश है जिसे वह सत्य का महान अंश बनाकर पेश कर रहे हैं।
    हमारी समस्या यहां भ्रष्टाचार में कौन दोषी है और कौन निर्दोष है, यह पडताल करना नहीं है। हमारा लक्ष्य है कि टीवी समाचार चैनलों की पत्रकारिता पद्धति के बारे में सवाल उठाना। 2जी स्पैक्ट्रम मामला हो या आदर्श सोसायटी का मामला हो दोषी का निर्णय कानून करेगा। कानून की अपनी प्रक्रिया है और उसकी अपनी गति है। चैनलों को इस प्रक्रिया और गति से कोई लेना-देना नहीं है वे तो प्रौपेगैण्डा में लगे रहते हैं। वे खबर नहीं पेश कर रहे बल्कि व्यक्तियों और संगठनों को निशाना बना रहे हैं। इस प्रसंग में उन्होंने अपराध रिपोर्टिंग के घटिया ङथकंड़े अपनाने आरंभ कर दिए हैं।
    मसलन ,चैनल वालों का मानना है सीएजी रिपोर्ट में जो लिखा है वह परमसत्य है । अब सिर्फ एक काम करना है कि उसे मान लो। वे सीएजी रिपोर्ट में कोई चूक भी हो सकती है ? तथ्यों की उपेक्षा हो सकती है ? गलत निर्णय हो सकता है ? यह सब मानकर नहीं चल रहे बल्कि यह मानकर चल रहे हैं कि सीएजी रिपोर्ट में जो लिखा है वह सत्य है और तथ्य पर आधारित है।
       वे सीएजी रिपोर्ट की प्रक्रिया को भी पूरा नहीं होने देना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि किसी भी तरह सीएजी रिपोर्ट के जो अंश उनके हाथ लगे हैं वे प्रमाण मान लिए जाएं और दंड की घोषणा कर दी जाए। सब जानते हैं कि सीएजी रिपोर्ट संसद में रखे जाने के पहले अपनी महत्ता हासिल नहीं करती। संसद में रखे जाने के बाद यह रिपोर्ट छानबीन के लिए पब्लिक एकाउंट कमेटी के पास जाती है और वह कमेटी इसकी छानबीन करती है और फिर लौटकर संसद के सामने रिपोर्ट पेश की जाती है। वे इस प्रक्रिया में जाने के पहले ही भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार का हल्ला कर रहे हैं।
    आज टीवी चैनलों के दबाब के चलते संसदीय प्रक्रिया और संसद दोनों ही दांव पर लगे हैं। विपक्ष ने संसद में काम ठप्प कर दिया है। वे टीवी चैनलों में बैठकर विजुअल्स के जरिए अपने प्रतिवाद को बनाए रखना चाहते हैं,वे जनता में जाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई जनांदोलन खड़ा करना नहीं चाहते। जनांदोलन खड़ा करने में जो परिश्रम लगता है ,पैसा खर्च होता है उसकी तुलना में चंद टीवी एकरों के जरिए हंगामा बनाए रखना। संसद और न्यायपालिका पर दबाब बनाए रखना ज्यादा सहज रास्ता है।
    टीवी की जल्दी परिणाम निकालो की भावना ने सांसदों और न्यायपालिका में भी जल्दी परिणाम पाने का भाव पैदा किया है। इसके लोकतंत्र के खिलाफ गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इस प्रक्रिया के खिलाफ हम सतर्क नहीं हुए तो लोकतंत्र नष्ट भी हो सकता है।  जल्दी परिणाम पाने के चक्कर में हम रीयलटाइम मीडिया संचार की चपेट में आकर समाज मर भी सकता है। सत्य की मौत हो सकती है। ऐसी अनेक घटनाएं घटी हैं जिनमें रीयलटाइम टीवी संचार के दबाब में फैसले लिए गए और बाद में मालूम पड़ा सारा मामला ही झूठा था। दिल्ली की एक उच्चमाध्यमिक शिक्षिका पर एक चैनल की घटिया रिपोर्ट को सत्य के रहस्योदघाटन के नाम पर इतना उछाला गया कि दिल्ली सरकार ने उस शिक्षिका को टीवी फुटेज के आधार पर बर्खास्त कर दिया। बाद में वह महिला मानसिक संतुलन खो बैठी,बाद में पता चला कि टीवी चैनल की सारी रिपोर्ट झूठी थी। आजकल वह महिला मानसिक रोगी की तरह अपना इलाज करा रही है और वह किसी काम को करने की स्थिति में नहीं हैं।
   टीवी चैनल खबर दें,लेकिन प्रामाणिक खबर दें। वे भय पैदा न करें। दबाब की राजनीति न करें।  वे खबर देने के बाद जिस आतंक और दबाब की सृष्टि करते हैं उसमें तालिबानी भाव छिपा है। एक और उदाहरण लें तो बात शायद समझ में आए। हाल ही में हरियाणा के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को उच्च अदालत ने सेक्सुअल उत्पीड़न के मामले में जमानत दे दी है। ये जनाब रिटायर्ड हैं और मामला काफी संगीन है,उन्हें सजा बोली गयी है और यह पुलिस अधिकारी 20 सालों से पीड़िता के परिवार को सताता रहा है। अदालत उस पर विचार कर रही है। कानूनी प्रावधान है कि सेक्सुअल उत्पीड़न के मामले में जमानत मिल सकती है। लेकिन चैनलों को आपत्ति है कि जमानत क्यों मिली।
     समाचार टीवी चैनल दबाब पैदा कर रहे हैं कि अदालतें कानून के अनुसार नहीं टीवी कवरेज के अनुसार चलें। विवादित मसले का फैसला जज नहीं एंकर सुनाएंगे। जजों का काम है सिर्फ एंकरों के द्वारा दिए गए फैसले की पुष्टि करना। ये टीवी चैनलों की जागरूकता पैदा करने वाली भूमिका नहीं है यह तालिबानी भूमिका है।
    टीवी वाले चाहते हैं कि देश को मुक्तराज्य के रूप में उन्हें सौंप दिया जाए। वे जिसे चाहें दोषी बताएं,जैसा चाहें दंड दें। संसद से लेकर न्यायालय सभी उनका अनुसरण करें। हमारा मानना है चैनलों का यह रास्ता टीवी पत्रकारिता के सभी एथिक्स और मानदंडों की खुली अवहेलना है। यह टीवी का तालिबानी रास्ता है।     
           








गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

टेलीविजन में नैतिक भ्रष्टाचार का रिंग-डांस

    अरूंधति राय के हाल में कश्मीर पर दिए गए बयान पर कारपोरेट मीडिया से लेकर भाजपा तक सबने मीडिया में जबर्दस्त हंगामा मचाया है। कुछ लोगों ने तो उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग तक कर डाली और मजेदार बात यह है कि यह मांग इतनी प्रासंगिक हो उठी कि चैनल वाले आंखें बंद करके अरूंधती राय के पीछे ही पड़ गए।
        अरूंधति राय ने कश्मीर के मसले पर क्या कहा है ? देश के हालात पर उनकी क्या राय है ? भारत के शासकवर्ग का उनका क्या विश्लेषण है ? अलगाववाद, माओवाद, आदिवासी, कारपोरेट लूट,कश्मीर का आजादी आंदोलन और वहां के हालात आदि विषयों पर उनके क्या विचार हैं ,इस पर हम थोड़ा विस्तार के साथ बाद में विचार करेंगे। सबसे पहले हम एक बात रेखांकित करना चाहते हैं कि अरूंधती राय लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाली स्वतंत्रचेता लेखिका हैं। वे राष्ट्रद्रोही नहीं हैं।
    अरूंधती राय को जो लोग कश्मीर के संदर्भ में उनके बयान को लेकर राष्ट्रद्रोही बनाने में व्यस्त हैं। वे बुनियादी तौर पर लेखक-बुद्धिजीवी की सामाजिक भूमिका और सामाजिक जिम्मेदारियों से अनभिज्ञ हैं अथवा जानबूझकर अनभिज्ञता का नाटक कर रहे हैं। 
        अरूंधती राय प्रगतिशील-लोकतांत्रिक विचारों की लेखिका हैं। हमें उनके बहुत से सारे विषयों पर विचार पसंद नहीं हैं। उनमें कश्मीर भी शामिल है। लेकिन इसके बाबजूद उनका लेखक का सम्मानजनक दर्जा कम नहीं हो जाता।
    मीडिया ने खासकर कारपोरेट टेलीविजन ने उनके हाल के कश्मीर संबंधित बयान पर जिस तरह की घटिया हरकत की है। उसकी जितनी आलोचना की जाए कम है। यहां मैं नमूने के तौर पर ‘टाइम्स नाउ’ के द्वारा 26 अक्टूबर 2010 को रात के प्राइमटाइम कार्यक्रम का जिक्र करना चाहूँगा।
   ‘टाइम्स नाउ’ के अर्णव वंद्योपाध्याय बहुत सुंदर टीवी पत्रकार हैं। पेशेवर कौशल में माहिर हैं। लेकिन मीडिया में संकार्णतावादी विचारों के प्रचार प्रसार में सदा सक्रिय रहते हैं। उनके अंदर एक तथाकथित टीवी रेटिंग भक्त है जो उन्हें संकीर्णतावादी विचारों की ओर ठेलता रहता है। इस कार्यक्रम के आरंभ में ‘टाइम्स नाउ’ ने एक रिपोर्ट दिखाई जिसमें कश्मीर में मारे गए जवानों के परिवारीजनों के बयानों को अरूंधती राय के बयानों के बरक्स रखकर प्रस्तुत किया गया। यह प्रस्तुति का यह सबसे घटिया तरीका है। यह निकृष्टतम राष्ट्रवाद है ।
    टीवी में जब आप टॉक शो कर रहे हैं तो अचानक रिपोर्ट वगैरह के जरिए विचारधारात्मक मेनीपुलेशन नहीं कर सकते। विचारधारात्मक मेनीपुलेशन बुनियादी तौर पर विचार-विमर्श को पूर्वाग्रहों से घेरता है। दर्शक के मन को पूर्वाग्रह ग्रस्त बनाता है। मैं नियमित कई घंटे टीवी देखता हूँ और इस चैनल को पहले दिन से देख रहा हूँ।
   ‘टाइम्स नाउ’ का कश्मीर समस्या पर कभी संतुलित रवैय्या नहीं रहा है। कश्मीर समस्या को यह चैनल एक ही आंख से देखता रहा है। वह आंख है प्रतिक्रियावाद की,घटिया राष्ट्रवाद की। कश्मीर समस्या के शिकार लोगों के प्रति इस चैनल की कोई सहानुभूति नहीं है। कश्मीर में लोग किस अवस्था में जी रहे हैं और उनकी वास्तव अनुभूतियां क्या हैं ? वे किस तरह के राजनीतिक विचारों को व्यक्त कर रहे हैं, इसकी वस्तुगत रिपोर्टिंग में इस चैनल की कोई दिलचस्पी नहीं है इसके विपरीत भारत सरकार और तथाकथित राष्ट्रवादियों के भोंपू की तरह यह चैनल काम करता रहा है। साथ ही  कश्मीर समस्या पर सरकारी सेंसरशिप के औजार का काम भी करता रहा है।
    टीवी चैनलों की संकीर्णतावादी मानसिकता का आलम यह है कि वे अपनी रेटिंग के चक्कर में राष्ट्रवाद का खूब ढ़ोल पीटते हैं। वास्तव अर्थों में उनका राष्ट्र और राष्ट्रवाद से कोई लेना-देना नहीं है। मीडिया का राष्ट्र और राष्ट्रवाद है विज्ञापन। देशभक्ति है विज्ञापन। विज्ञापन के अलावा उनका कोई धर्म नहीं है।
    कारपोरेट मीडिया के पास चुने हुए वक्ता हैं और इनके सुनिश्चित विचार हैं। कुछ नामी पत्रकार हैं,कुछ पूर्व सरकारी सैन्य,पुलिस अफसर हैं,राजनयिक हैं और कुछ चर्चित चेहरे हैं, कुछ वकील हैं और चंद राजनेता हैं।कुल मिलाकर डेढ़ दर्जन लोग हैं, यही इन चैनलों की कुल जमा बौद्धिक पूंजी है।
    इस कार्यक्रम की नमूने के तौर पर एक बेबकूफी देखें- मधुकिश्वर ने इस कार्यक्रम में कहा कि अरूंधती राय नारसिस्टिक हैं । अंतर्राष्ट्रीय कवरेज पाने के लिए इस तरह के बयान देती हैं। इससे उन्हें विश्व में अनेक अकादमिक व्याख्यान देने का मौका मिलेगा। मधुजी ने यह भी कहा अरूंधती 21वीं शताब्दी की कैथरीन मेयो हैं। तथ्य की दृष्टि से ये सारी बातें गलत हैं।
   संयोजक के नाते अर्णव गोस्वामी का सारा जोर अरूंधती को कठघरे में खड़ा करने पर था। अर्णव का इस तरह का रवैय्या संयोजक के एथिक्स के खिलाफ है। वे भूल गए कि संयोजक का पक्ष नहीं होता। लेकिन अर्णव गोस्वामी का पक्ष होता है। उनकी प्रत्येक विषय पर राय होती है और उसको वे बार-बार दोहराते हैं और वक्ताओं से ज्यादा समय खाते हैं। उनका इस तरह समय और कार्यक्रम को मेनीपुलेट करना घटिया किस्म की टीवी पत्रकारिता का आदर्श नमूना है।
    अर्णव गोस्वामी की चिन्ता का मूलस्वर यही था कि अरूंधती राय राष्ट्रद्रोही है। बस अब सरकार को जल्दी से कार्रवाई करनी चाहिए। और प्रमाण के तौर पर उनके पास राष्ट्रवाद के कुछ घटिया फुटेज थे। इस तरह की प्रस्तुति को निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं कहते।
     कार्यक्रम के आरंभ में जिस तरह की घटिया राष्ट्रवादी रिपोर्ट दिखाई गयी उससे तय हो गया कि आखिरकार चैनल क्या चाहता है । किसी सेमीनार में व्यक्त किए गए विचारों के आधार पर, किसी रचना में व्यक्त किए गए विचारों के आधार पर यदि राष्ट्रद्रोह का फैसला होगा तो समाज में स्वतंत्रचेता बुद्धिजीवी नहीं होंगे। सिर्फ गुलाम बुद्धिजीवी होंगे। सेमीनार में व्यक्त किए गए विचार चाहे वे किसी भी मांग पर हों। किसी भी विचारधारा से प्रेरित हों ,उनसे राष्ट्रद्रोह का आधार नहीं बनता।
    दूसरी बात यह है कि यदि लेखकों-बुद्धिजीवियों को सरकारी नीति का प्रतिवाद करने के कारण राष्ट्रद्रोह के दायरे में रखा जाएगा तो उन लेखकों और बुद्धिजीवियों का क्या करेंगे जो अंग्रेजों के जमाने में ब्रिटिश शासकों और उनकी नीतियों का खुलकर विरोध कर रहे थे। उन अंग्रेज लेखकों और बुद्धिजीवियों को क्या कहेंगे जो ब्रिटिश शासकों का उस जमाने में विरोध कर रहे थे। क्या है महान रोमैण्टिक कवि शैली को राष्ट्रद्रोही कहेंगे ?  
    अमेरिका-ब्रिटेन आदि देशों के उन बुद्धिजीवियों के साथ क्या किया जाए जो इराक युद्ध के सवाल पर अपने देश में सरकारी नीति के खिलाफ प्रतिवाद पुरूष बने हुए हैं। लाखों लोगों को सड़कों पर इराक युद्ध के खिलाफ उतार चुके हैं।
   क्या नॉम चोम्स्की को बुश का विरोध करने के कारण,अमेरिका को बर्बर कहने के कारण राष्ट्रद्रोही कह सकते हैं ? क्या चोम्स्की के विचारों का इराक की जनता पर असर नहीं पड़ रहा ? क्या वहां लोग प्रतिवाद नहीं कर रहे ?
   चोम्स्की यहूदी हैं और यहूदीवाद के भी कट्टर आलोचक हैं, इस्राइल के भी कटु आलोचक हैं। वे हम सबके आदर्श हैं। लेखक का कोई राष्ट्र नहीं होता,राष्ट्रवाद नहीं होता। धर्म नहीं होता। वह समूची मानवता का होता है और सत्य का पुजारी होता है। सत्य के अलावा वह कोई चीज स्वीकार नहीं करता। उसके अंदर राष्ट्रप्रेम नहीं सत्यप्रेम होता है। वह किसी का भोंपू नहीं होता वह महान रूसी लेखक शोलोखोव के शब्दों में हृदय के आदेश पर बोलता,सोचता और लिखता है। 
     समाज ,संस्कृति ,राजनीति और मीडिया में राष्ट्रवाद का प्रचार करना समाज में ज़हर फैलाने के बराबर है। एक जमाने में प्रेमचंद ,रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि लेखकों ने राष्ट्रवाद की तीखी आलोचना की थी।
    इन दिनों हमारे देश में राष्ट्रवाद कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। यह हमारे बौद्धिक पतन की निशानी है। राष्ट्रवाद बुराई है। इसे मीडिया द्वारा सामाजिक अच्छाई के रूप में पेश किया जा रहा है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे बुराई के रूप में देखा था। जिसे मीडिया इन दिनों राष्ट्र -राष्ट्र कहकर गौरवान्वित कर रहा है उसके बारे में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है, ‘राष्ट्र विकलांग मानवता पर लंबे समय से फलता-फूलता रहा है।’  यह भी लिखा है ‘ राष्ट्र का विचार ,मानव द्वारा आविष्कृत,बेहोशी की सबसे शक्तिशाली दवा है।’’ रवीन्द्र नाथ ने एक और महत्वपूर्ण बात कही है जो इस संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है,लिखा है -
राष्ट्र ‘ सत्य और अच्छाई की आवाज की तरफ कभी ध्यान नहीं देता। यह नैतिक भ्रष्टाचार का रिंग-डांस (चक्काकार नृत्य) करता रहता है।’’
     लेखक के विचारों को आप कानून की तराजू में रखकर तौलेंगे तो बांट कम पड़ जाएंगे। कानून उनके लिए है जो समाज के अनुशासन में नहीं रहते। लेखक समाज के अनुशासन की धुरी है। समाज कैसा है ? किस तरह की चेतना से गुजर रहा है यह बात हमें लेखकीय चेतना से ही पता चलती है। लेखक -बुद्धिजीवी यदि गुलाम हो जाएंगे तो समाज ठहर जाएगा। उसका विकास नहीं होगा। समाज नपुंसक हो जाएगा। लेखक-बुद्धिजीवी समाज की प्राणवायु हैं। इनका हमें सम्मान करने की आदत ड़ालनी चाहिए। इनके प्रति,इनके विचारों के प्रति, जितनी सहिष्णुता होगी समाज उतना ही ताकतवर होगा।
   समाज के विकास में राष्ट्रवाद सबसे बड़ी बाधा है। भारत में बढ़ता हुआ राष्ट्रवाद ,सामाजिक संकट की सूचना है ,हमें इसका प्रत्येक स्तर पर प्रतिवाद करना चाहिए। हम यहां अरूंधती राय का कश्मीर पर विवादास्पद बयान दे रहे हैं ,यह हमने ‘काफिला’ वेबसाइट से साभार लिया है। यह उस चर्चित सेमीनार की समूची कार्रवाई की रिपोर्टिंग का हिस्सा है,जिसमें कश्मीर पर अरूंधती राय का नजरिया व्यक्त हुआ है ,यह राष्ट्रद्रोह नहीं है। यह उनकी राय है। अरूंधती राय के बयान का सार-संक्षेप देखें-
    Arundhati Roy, writer, began her speech by asking those who wanted to throw shoes to her to do so now. She said that about a week or ten days ago at a tribunal in Ranchi on Operation Green Hunt, a TV journalist asked her whether Kashmir was an integral part of India. Her reply was that it has never been an integral part of India and the Indian government recognised it as a disputed territory and took it to the UN on its own accord. In 1947 we were told that India became a sovereign democracy. But it became a country as per the imagination of its colonizer, and continued to be a colonizer even after the British left the country. Indian state forcibly or deceitfully annexed the North-East, Goa, Junagarh, Telangana, etc. The government accuses the Naxalites of waging a protracted war against the state. But the truth is, it is the Indian state which has waged a protracted war against the people which it calls its own. Who are the people it has waged war against? The people of North-East, Kashmir, Punjab, etc. This is an upper caste Hindu state waging a continuing struggle against the people.
  Arundhati narrated her experience of Kashmir during the days of the Amaranth land issue in 2008, Kashmir needs azadi from India as much as India needs azadi from Kashmir. By India needs Azadi what she meant was the people of India for whose liberation the freedom of the Kashmiri people was a must. Any of us who have visited Kashmir know how militarized it is. Every time there is an election, the government asks as to why a referendum is needed, since the people of Kashmir have voted, and they have voted for India. She further brought to the notice of the audience that a convention of this kind was historic in the capital city of this hollow superpower that is India. It is also important to know where one stands on this issue. The British colonial empire too once considered Indians to be unfit for self-rule. The same argument is being used today by the powers-that-be to deny azadi to Kashmir. It is the same Indian ruling class which once preached non-alignment, but is now bowing before US imperialism and the MNCs. We need to continue this exercise of debate, and at the same time be aware that we are up against a serious adversary. We must realize that the bows and arrows in the hands of the adivasis or stones of the Kashmiris alone are not enough. We need to make serious and meaningful alliances. There has to be an alliance between all the struggling people and what will connect them will be the idea of justice. We need to be aware of the fact that not every movement or slogan is for justice.
  Arundhati wished that the people fighting for azadi in Kashmir will not be let down by their leaders. She urged that those who are fighting for a just society must align with all the struggles of the powerless and the oppressed. Kashmiri people have an experience of over 60 years of struggle, but cautioned against isolation from other oppressed people. She extended her support for the struggle for azadi, but also appealed for a debate on the meaning of azadi among the Kashmiris. She asked everyone in Kashmir to have a deep discussion on what they are fighting for. And it has to come from within the Kashmiris and not from the so-called critics of azadi as a divisive ploy of the enemy. On the question of Kashmiri pundits, she said that much of the stories of atrocities on pundits have been concocted to sow misunderstanding and distrust among people, though what happened to some of them is tragic and unfortunate. Justice is to be fought and upheld for everybody, whether a minority of religion, caste, or nationality. It is not enough to ask for justice if the next person does not have it. People in Kashmir have said that Kashmiri pundits are welcome back, and this is a commendable gesture.
 Arundhati concluded by saluting the struggle of the young people, women, children who are out on the streets facing the brutal Indian army. The first great art which the Indian state has mastered is to wait and wait and hope that people’s energies will go down. Killing them is the next. It is up to the people of Kashmir to take their struggle further in solidarity with other people’s movements. At the same time, the people in Nagaland must reflect on themselves why is it that a Naga Battalion is sent to kill people in Kashmir and Chhattisgarh. A direct confrontation with the state is not enough. It is necessary to know ones enemy and make alliances locally, as well as internationally.







बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

बाबा रामदेव के टीवी लाइव शो और उसकी विचारधारा

      बाबा रामदेव के टेलीविजन पर योगशिविर लगाए जाने के बाद अनेक योगियों के टीवी शो आने लगे हैं। तकरीबन प्रत्येक चैनल योग पर कोई न कोई आइटम या कार्यक्रम पेश करता है। टीवी की आमदनी के लिए योग शो का कार्यक्रम पैकेज में रहना जरूरी है। योग शो की लाखों की ऑडिएंस है। लाखों की ऑडिएंस का अर्थ है चैनल के लिए सोने की खान। टीवी से अंधाधुंध योगवर्षा का सामाजिक असर दिखने लगा है। 
   डाक्टरों ने अपने यहां योग से उपचार की व्यवस्थाएं कर ली हैं,वे दवाओं के अलावा योग-प्राणायाम करने का सुझाव देते हैं। स्कूलों में फिजिकल एजुकेशन के पाठ्यक्रम में योग-प्राणायाम को शामिल कर लिया गया है। सेना में भी योग को जगह मिल गयी है। कारपोरेट कंपनियां भी इस विधि का इस्तेमाल कर रही हैं। अब जेलों में योगशिविर लगेंगे। मंत्रियों,एम पी,एमएलए,पंचायत सदस्यों,वकीलों,जजों,डाक्टरों आदि के शिविर लग चुके हैं।   
    बाबा रामदेव के योग शो की खूबी है उनके आसन और उनके हिन्दुत्ववादी और चिकित्सा विज्ञान विरोधी,बहुराष्ट्रीय कंपनी विरोधी राजनीतिक वक्तव्य जो कभी भी टेलीविजन चैनलों की खबरों में जगह नहीं बना पाए।  बाबा रामदेव ने जिन राजनीतिक मसलों को उठाया है और अपनी राय दी है उसे चैनलों ने कभी समाचारों में कवरेज नहीं दिया है।
      बाबा के टीवी शो में हमें भारत की स्वास्थ्य दशा के साथ सांस्कृतिक -राजनीतिक दुर्दशा का आख्यान भी सुनने को मिलता है। पश्चिमी जीवनशैली के दुष्परिणामों के बारे में भी सुनने को मिलेता है। इन सबको बड़े ही कौशल के साथ बाबा रामदेव आसन -प्राणायाम के साथ रीमिक्स कर देते हैं।
    पहले वे प्राणायाम -आसन बताते हैं, फिर अनुकरण करने के लिए कहते हैं, और भोक्ता जब तक अनुकरण करता है तब तक वे किसी न किसी मसले पर वक्तव्य देते रहते हैं। वे अपने संदेश को प्राणायाम और आसन की क्रिया के बीच में संप्रेषित करते हैं। यह काम वे वृत्तचित्र की संरचना में करते हैं।
    बाबा रामदेव के योग की टीवी पर सफलता ने टीवी के मेडीकलाइजेशन की प्रक्रिया को बल पहुँचाया है। अब टीवी पर स्वास्थ्य संबंधी सैंकड़ों कार्यक्रम प्रतिदिन आते हैं। कुछ चैनल तो सिर्फ स्वास्थ्य के कार्यक्रम ही प्रसारित करते हैं। विभिन्न भाषाओं में स्वास्थ्य सेवाओं पर धारावाहिकों का भी प्रसारण हो चुका है।
       मीडिया में हेल्थ संबंधित स्टोरियों के आने से हेल्थ का जनसंपर्क बढ़ा है। इससे यह भी पता चला है कि हेल्थ के समाचार,कार्यक्रम,धारावाहिक दिखाए जाएं तो उनके लिए लाखों की ऑडिएंस मिल सकती है। हेल्थ पहले इस तरह मीडिया में बड़ा विषय नहीं था। अब तो हेल्थ के अनेक चैनलों,पत्रिकाओं और अखबारों में स्थायी कॉलम हैं।
        आज हेल्थ पर अनेक वेबसाइट हैं जो तत्काल सूचनाएं देती हैं। यहां तक कि हेल्थ संबंधित सैलिब्रिटी गॉसिप आने लगी हैं। समूचे टेलीविजन नेटवर्क ने हेल्थ को जिस तरह मुद्दा बनाया है उसमें जीवनशैली ,रूपचर्चा ,धर्म और मनोदशा रूपान्तरण के विषय  केन्द्र में आ गए हैं। बाबा रामदेव के लाइव कवरेज को इसके फ्लो में पढ़ा जाना चाहिए।
    बाबा अपने लाइव टेलीकास्ट में योग के आसनों की प्रस्तुति करते समय एक अवधि के बाद स्टीरियोटाइप हो गए हैं। साथ एक ही किस्म की पद्धति को अपनाते हैं,अंतर सिर्फ आता है उनके भाषण की थीम में। भाषण की थीम बदलकर ही वे कुछ नया पैदा करते हैं वरना उनके लाइव टेलीकास्ट कार्यक्रम तो टेली शॉपिंग के विज्ञापन जैसे होते हैं।
    टेली शॉपिंग में जिस तरह कोई नया पात्र माल की तारीफों के पुल बांधता है और उसके उपयोग की विधि बताता है। ठीक वैसे ही बाबा रामदेव भी करते हैं। अंतर है उनके भाषण के विषयों का। इसके अलावा उनके लाइव शो में स्थान का अंतर भी रहता है। कभी इस शहर में तो कभी उस शहर से उनका लाइव टीवी शो प्रसारित होता है,इससे उन्हें नए ग्राहक मिलते हैं।
    विभिन्न शहर ,बदली ऑडिएंस और बदले हुए भाषण के विषय के जरिए वे अपने टीवी शो में आकर्षण पैदा करने की कोशिश करते हैं। वे अपने भाषणों में नए-नए विषयों का समावेश करके ऑडिएंस में विचारधारात्मक प्रभाव भी पैदा करने की कोशिश करते हैं। लेकिन योग-प्राणायाम के कार्यक्रम में योग-प्राणायाम प्रमुख है,भाषण प्रमुख नहीं है। वह अतिरिक्त है। इसकी सांस्कृतिक भूमिका है। उन विषयों को टीवी पर बनाए रखने में सांस्कृतिक-राजनीतिक भूमिका है जिन्हें हम हिन्दुत्व के विषय के रूप में जानते हैं।
       बाबा के शो वही लोग देखते हैं जिन्हें योग से लगाव है या योग सीखना है। अथवा ऐसे भी लोग देखते हैं जिनकी हिन्दुत्व के एजेण्डे में रूचि है। बाबा का बार-बार टीवी शो करना इस बात का संकेत है कि हेल्थ के बाजार में जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा है। इसमें बाबा योग के लिए जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बाबा अपने योग मालों के लिए ग्राहक जुटाने की कोशिश कर रहे हैं।
     बाबा के अधिकांश टीवी शो खुले वातावरण में होते हैं। वे कभी हॉलघर में कार्यक्रम नहीं करते। खुला आकाश ,मैदान और पीछे योग का चित्र या आयोजन स्थल का बैनर। मंच पर बाबा के द्वारा प्रस्तुत योग-प्राणायाम ,हिन्दुत्व और जीवनशैली के विषयों पर लंबे-लंबे भाषण।
    बाबा के कार्यक्रमों में आए दिन ऐसे मरीजों को पेश किया जाता है जो यह बताते हैं कि वे फलां बीमारी से परेशान हैं, उन्हें दवा कोई असर नहीं कर रही है। कुछ ऐसे भी मरीज आते हैं जो यह बताते हैं कि योग-प्राणायाम असर कर गया है,बीमारी में सुधार है। बाबा के कार्यक्रमों में इस तरह के बयानों के प्रसारण का लक्ष्य है आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से आम लोगों को विमुख करना।
    संबंधित व्यक्ति को दवा क्यों नहीं लग पायी ,इसके अनेक कारण हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि वह सही डाक्टर से न मिला हो,दवा की मात्रा ठीक से न लेता हो। उसके खान-पान में अनियमितता हो आदि,लेकिन बाबा इस तरह के मरीजों की प्रतिक्रियाओं को मेडीकल सिस्टम की असफलता के प्रमाण के रूप में दुरूपयोग करते हैं।
    बाबा का इस तरह की प्रतिक्रियाओं को दिखाना योग उद्योग और फार्मास्युटिकल उद्योग के बृहत्तर नव्य उदारतावादी एजेण्डे की संगति में आता है। वे अपने योग कारपोरेट एजेण्डे के साथ इसे मिलाकर पेश करते हैं और योग उद्योग के बाजार हितों को विस्तार देने का काम करते हैं।
    बाबा के ये कार्यक्रम आम लोगों में मेडीकल चिकित्सा के खिलाफ जबर्दस्त असर छोड़ रहे हैं। साधारण लोगों में एक अच्छा खासा वर्ग तैयार हो गया है जो यह मानता है कि योग-प्राणायाम से सब बीमारियां ठीक हो जाएंगी। इस तरह के लाइव शो के जरिए बाबा बड़े पैमाने पर प्रत्येक कार्यक्रम और शिविर के जरिए दौलत बटोरने में सफल रहे हैं।
     बाबा रामदेव की टीवी प्रस्तुतियों में मेडीकल प्रोफेशन की असफलताओं का व्यापक कवरेज रहता है। लेकिन वे अच्छी तरह जानते हैं कि हजारों डाक्टर हैं जो अपने मरीज की अपनी क्षमता और क्षेत्र से बाहर जाकर मदद करते हैं। प्रतिदिन 8-14 घंटे काम करते हैं। प्रतिदिन लाखों मरीजों का सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में इलाज करते हैं। जबकि इन अस्पतालों में पर्याप्त सुविधाएं तक नहीं हैं। हमारे शहरों-कस्बों में समर्पित डाक्टरों की लंबी -चौड़ी फौज है जो मरीजों के इलाज में बड़ी तत्परता से काम करती है। अपवादस्वरूप मामलों को छोड़ दें तो मेडीकल पेशे से जुड़े लोग आम लोगों की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ते। यह भी सच है कि इन डाक्टरों में निजी क्षेत्र के पैसा कमाऊ डाक्टर भी आ गए हैं जो सिर्फ ऊँची फीस के बिना इलाज नहीं करते। लेकिन इस तरह के डाक्टरों का प्रतिशत कम है। ज्यादातर डाक्टर आज भी सामान्य फीस पर ही इलाज करते हैं। सामान्य तौर पर डाक्टर जैसे बताए उसे यदि मरीज मान ले तो उसे किसी भी नीम-हकीम और योगी की जरूरत नहीं होगी।
      बाबा रामदेव अपने शिविर में आने वाले किसी भी व्यक्ति से पैसे की बात करते नजर नहीं आते। वे शिविर में भाग ले रहे किसी व्यक्ति से यह नहीं पूछते कि यहां आने में कितना पैसा खर्च हुआ ? कैंप की फीस कितनी दी ? वे यह सवाल भी नहीं पूछते कि बाबा की दवाएं लेते हो तो उनका दाम क्या है ? वे यह भी जानने की कोशिश नहीं करते कि शिविर में भाग लेने वाले कितने लोग हैं जिनकी बीमारी पर योग-प्राणायाम का कोई असर नहीं हो रहा है अथवा नकारात्मक असर हो रहा है।
    बाबा यह मानकर चल रहे हैं कि उनके शिविर में भाग लेने वाले की पॉकेट से कुछ भी खर्च नहीं हो रहा,वे यह भी मानकर चल रहे हैं कि उनके यहां आने वाले पर योग का सीधे सकारात्मक असर हो रहा है। वे यह भी मानकर चल रहे हैं कि जो व्यक्ति शिविर से जा रहा है वह प्रतिदिन योग-प्राणायाम करता है। जबकि इनमें से कोई भी बात सच नहीं है।
     बाबा के शिविर में भाग लेने वालों से मोटी रकम फीस के रूप में ली जाती है। बाबा की आयुर्वेदिक दवाएं महंगी होती हैं। बाबा का तथाकथित वैद्य झोला छाप डाक्टर होता है।  इनमें से अधिकांश के पास सही डिग्री भी है या नहीं किसी को नहीं मालूम। बाबा के शिविर से लौटकर खुछ दिन बाद बड़ी संख्या में लोग योग-प्राणायाम करना छोड़ देते हैं। योग-प्राणायाम छोड़ देने वालों का मानना है कि किसी इलाज को अनंतकाल तक नहीं किया जा सकता।
    बाबा अपने कार्यक्रमों के जरिए एक और संदेश देते हैं कि अस्पताल या डाक्टर के पास जाने से बचो। घर में केयर करो। निजी केयर करो। वे अपने कार्यक्रमों के जरिए मेडीकल व्यवस्था के प्रति संशय और मोहभंग पैदा करने का काम करते हैं। वे बार-बार महंगी दवाएं,डाक्टर,ऑपरेशन,अस्पताल आदि के बेशुमार खर्च आदि को निशाना बनाते हैं। साथ ही फार्मास्युटिकल कंपनियों पर कभी-कभार टिप्पणियां करते हैं।
    बाबा अपने लाइव शो में जब किसी मरीज को पेश करते हैं और उससे पूछते हैं क्या बीमारी पर योग का क्या असर हुआ तो मरीज जो कुछ बताता है उसका दर्शकों पर व्यापक असर होता है। यह कहानी आसपास के लोगों में फैल जाती है। उसे योग के पक्ष में प्रमाण के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।  दर्शक आम तौर पर आपस में उस घटना का जिक्र करते हैं और अंत में वह घटना एक गॉसिप में तब्दील हो जाती है। व्यापक चर्चा में गॉसिप का रूपान्तरण बाबा के लिए और नए ग्राहक और आस्थावान सदस्य देता है।
   बाबा अपने शिविर में चुनकर विभिन्न रोग के शिकार लोगों को पेश करते हैं,साथ में उस रोग और उसके मेडीकल उपचार पर होने वाले बेशुमार खर्चे और परेशानियों का आख्यान बनाते हैं। यही उनकी बाजार रणनीति है।  
           














शनिवार, 11 सितंबर 2010

मीडिया का फास्टफूड है धर्म का ‘स्टिंग ऑपरेशन’

      ‘आजतक’  टीवी चैनल ने ‘हे राम’ के नाम से कई संतों की पोल खोलने वाला ‘स्टिंग ऑपरेशन’ पर आधारित एक कार्यक्रम कल यानी 10 सितम्बर 2010 को प्राइम टाइम में प्रसारित किया। संतों को नंगा करने वाले ऐसे ही अनेक कार्यक्रम यह चैनल सास-समय पर दिखाता रहता है। इसबार के कार्यक्रम में चार संत मुरारी बापू,सुधांशु महाराज,दाती महाराज (शनि ग्रह वाले) और स्वामी सुमनानंद जी थे।
      इन चारों संतों के बारे में बताया गया कि ये संतई के अलावा विभिन्न किस्म के गैर धार्मिक धंधे करते हैं। भारत का प्रत्येक नागरिक और इनके भक्त यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि सामयिक बड़े संतों में अधिकांश गैर संतई का धंधा करते हैं। मजेदार बात यह है जिन लोगों को इस कार्यक्रम में समर्थन में बोलने के लिए बुलाया गया उनमें बाबा रामदेव और धर्मेन्द्र जी के बारे में तो मैं कह सकता हूँ इनके पास गैर संतई का बड़ा कारोबार है। धर्मेन्द्रजी राममंदिर आंदोलन के गैर संतई के कारपोरेट प्रकल्प का हिस्सा रहे हैं और बाबा रामदेव का जड़ी-बूटी आदि का बडा व्यापारतंत्र और योग के मीडिया प्रोडक्ट का बड़ा धंधा है। सवाल यह है कि क्या गैर संतई के काम करने वाले इन संतों को ‘आजतक’ के संत फार्मूले के आधार पर संत माना जा सकता है ?  
       यह कॉमनसेंस की बात है कि संतों के गैर संतई के धंधों को सब जानते हैं। जिस संत ने संपत्ति जुगाड़ करने ,व्यापार करने,कैसेट बेचने,वीडियो बेचने, आशीर्वाद से काम कराने, इशारे से काम कराने  आदि के कामों में अपने को लगा लिया है उसने संत के प्रचलित मार्ग का त्याग कर दिया है।
      ‘आजतक’ वालों ने जो बातें बतायी हैं वे कॉमनसेंस की बातें हैं इनसे संतों के प्रति घृणा पैदा नहीं होती। ‘आजतक’ वाले भूल गए कि संतों को उनके भक्त बहुत अच्छी तरह जानते हैं। वे जितना जानते हैं उसका चैनलों में एक प्रतिशत भी नहीं दिखाया जाता। संतों के भक्तों का संत के प्रति ज्ञान आज सत्य होते हुए भी निष्क्रिय है ।क्योंकि संतों ने आम जीवन के उपयोगितावाद से अपने को जोड़ लिया है। कारपोरेट ढ़ंग से काम कराने की कला में महारत हासिल कर ली है। यह आदर्श स्थिति है कि संत सिर्फ भक्ति करें,उपासना करें और गैर धार्मिक कार्यों में भाग न लें।
     चैनल वाले भूल गए यह कारपोरेट संस्कृति का जमाना है और धर्म को यदि जिंदा रहना है.संतों को यदि शोहरत हासिल करनी है तो कारपोरेट पद्धति अपनानी होगी और भारत के संतों ने इस बात को पकड़ लिया है। अब पुराने जमाने का धर्म कहीं पर भी नहीं बचा अब पुराने जमाने के संत भी नहीं बचे। पुराने जमाने में न्यूनतम से संत का जीवन चल जाता था आज नहीं चलता।
    पूंजीवाद ने संतों को भी जीने का रास्ता दिखाया है। पहले संतों को जीने मात्र के लिए न्यूनतम पूंजी की जरूरत होती थी और वे प्रचार पर ध्यान नहीं देते थे। क्योंकि उनके पास स्थानीय और परंपरागत संचारतंत्र था। लेकिन नए संत वैसे नहीं हैं। ‘आजतक’ चैनल की मुश्किल यहीं पर है वह आज के जमाने में पुराने संत ,संत की नैतिकता और धर्म को खोज रहा है।  
     मीडिया या टीवी चैनलों में इस तरह के कार्यक्रम मासकल्चर का फास्टफूड हैं। इनसे चैनल के दर्शकों को न सूचना मिलती है और नहीं ज्ञान मिलता है।सिर्फ समययापन में मदद जरूर मिलती है। इस तरह के कार्यक्रम संत-पंडित-पुजारी या धर्म का कुछ भी नुकसान नहीं करते। उनकी प्रतिष्ठा में इससे कोई कमी नहीं आती। उनके भक्तों की संख्या में गिरावट नहीं आती।
  टीवी चैनल वाले यह सोचते हों कि उन्होंने किसी संत या धार्मिक संस्थान को नंगा करके तीर मार लिया या किसी महान यथार्थ का उद्घाटन कर दिया तो वे विभ्रम के शिकार हैं। संत या धर्म को आप मीडिया कवरेज से पछाड़ नहीं सकते। खासकर ‘स्टिंग ऑपरेशन’ से तो एकदम नहीं। ‘स्टिंग ऑपरेशन’ काल्पनिक सत्य पर आधारित होता है। काल्पनिक सत्य को राज्य,कानून,सरकार,न्यायालय और जनता कहीं पर भी जनसमर्थन नहीं मिलता। वह काल्पनिक है और काल्पनिक से सत्य पैदा नहीं होता। काल्पनिक सत्य के लिए अवैध है।
  उल्लेखनीय है मीडिया की साख बनी थी ‘खोजी पत्रकारिता’ से। इसके लिए उसने वास्तव को आधार बनाया और पवित्र तरीके अपनाए। इस तरह की पत्रकारिता के जरिए जो भी सत्य सामने आया उस पर समाज,न्यायालय,सरकार और जनता सभी विश्वास करते हैं। नए जमाने के भारतीय टीवी पत्रकार अब सत्य की खोज में ‘खोजी पत्रकारिता’ नहीं कर रहे हैं। बल्कि असत्य और काल्पनिक के आधार पर ‘स्टिंग ऑपरेशन’ कर रहे हैं। वे कीचड़ से कीचड़ धोना चाहते हैं। ध्यान रहे कीचड़ साफ करने के लिए स्वच्छ पानी चाहिए।  
     हम याद करें बोफोर्स कांड की ‘खोजी पत्रकारिता को और उसकी राजनीतिक परिणतियों को, बोफोर्स की दलाली का सत्य सरकार गिरा चुका है। कहने का अर्थ यह है सत्य का असर होता है काल्पनिक का चाहे वह कितना ही प्रामाणिक हो कोई असर नहीं होता। अथवा बहुत ही सीमित और तात्कालिक असर होता है।
    यह भी ध्यान रहे पाखंड को टीवी कार्यक्रमों या मीडिया कवरेज से पछाड़ा नहीं जा सकता। क्योंकि मीडिया के ढ़ोंग और धर्म के ढ़ोंग में बिरादराना संबंध हैं। जिस तरह मीडिया में चीजें ‘फ्लो’ में पढ़ी जाती हैं और ‘फ्लो’ के अनुसार प्रभाव छोड़ती हैं वैसे ही धर्म की भी गति है। धर्म का भी ‘फ्लो’ है। ‘फ्लो’ को ‘फ्लो’ के जरिए नहीं पछाड़ सकते। तुलनात्मक तौर पर धर्म का ‘फ्लो’ ज्यादा है और वह प्रभावशाली भी है क्योंकि धर्म के ‘फ्लो’ को ग्रहण करके लागू करने वाली सक्रिय संरचनाए हैं। मीडिया के संतों को नंगा करने वाले ‘फ्लो’ का अनुकरण करने वाली सामाजिक संरचनाएं नहीं है। यही वजह है इस तरह के कार्यक्रम कोई सामाजिक असर नहीं छोड़ते।   









बुधवार, 8 सितंबर 2010

आजतक चैनल और मंत्री दिनेश त्रिवेदी का असभ्य प्रदर्शन

    आजतक चैनल ने टीवी पत्रकारिता के सभी मानक तोड़ दिए हैं। इस चैनल के समाचार संपादक से लेकर मालिकों तक और संवाददाताओं से लेकर विज्ञापनदाताओं तक यह संदेश गंभीरता से जाना चाहिए कि यह चैनल हिन्दी टीवी पत्रकारिता का सबसे असभ्य चैनल है। समाचार में गालियां देना,खबर में संवाददाता या समाचार संपादक का निजी नजरिया व्यक्त करना । तर्कहीन और विवेकहीन ढ़ंग से टीवी रिपोर्ट पेश करना रोजमर्रा की बात हो गयी है।
    आजतक की समाचार प्रस्तुतियों की विशेषता है मानवाधिकार हनन करना। विभिन्न सामाजिक समूहों,पेशेवर समूहों,व्यक्तियों, औरतों,बच्चों,धार्मिक समूहों आदि पर केन्द्रित खबरें ,समाचार मूल्य के बुनियादी मानकों को ताकपर और मानवाधिकार हनन के परिप्रेक्ष्य में पेश की जा रही हैं।  यह चैनल अपनी प्रस्तुतियों से साधारण जनता और विभिन्न सामाजिक समूहों और पेशे के लोगों के मानवाधिकारों का हनन करने में लगा है। इस चैनल का मूल लक्ष्य है विज्ञापन से ज्यादा से ज्यादा धन कमाना और घटिया पत्रकारिता करना ।
  यह सच है कि आजतक को हिन्दी खबरिया चैनलों में खूब देखा जाता है,इससे भी बड़ा सच है कि इस चैनल की टीवी पत्रकारिता में कोई साख नहीं है। पेशेवर फूहड़ता इसकी प्रस्तुतियों में भरी पड़ी है। आप किसी भी दिन के कार्यक्रम देखें आपको गहरी निराशा हाथ लगेगी।
    आजतक की गैर-पेशेवर और मानवाधिकार हनन की तस्वीर पेश करने के लिए एक ही खबर को उदाहरण के रूप में रखना चाहता हूँ। कल की खबरों में दिल्ली और राजस्थान के डाक्टरों की हड़ताल पर केन्द्रित खबर थी। यह खबर कोई भी हिन्दीवाला देख ले तो उसका सिर शर्म से झुक जाएगा। एंकर थे हिन्दी टीवी के तथाकथित जानेमाने पत्रकार,मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि इस तरह की असभ्य पत्रकारिता और इतनी गंदी भाषा मैंने अंग्रेजी और बांग्ला समाचार चैनलों में नहीं सुनी।
    आजतक के एंकर,संवाददाता और समाचार संपादक को लगता है गंदी भाषा बोलने का खास प्रशिक्षण दिया जाता है। अपमानजनक भाषा बोलना आजतक चैनल का प्रधानधर्म है। मैं हिन्दी साहित्य पढ़ाता हूँ और विगत 20-22 सालों से मीडिया भी पढ़ाता हूँ,मेरी दर्जनों किताबें हैं,प्रतिदिन कई घंटे टीवी भी देखता हूँ लेकिन भाषायी असभ्यता का इन दिनों जैसा नंगा नाच आजतक चैनल पर हो रहा है उससे हिन्दी मीडिया की गरिमा को ठेस लगी है। हम चाहते हैं कि आजतक चैनल मानवाधिकार विरोधी,अशालीन और गैर-पेशेवर भाषा का समाचार प्रस्तुतियों में प्रयोग तुरंत बंद करे।
     भाषायी असभ्यता देखिए- कल दिल्ली और राजस्थान के डाक्टरों की हड़ताल पर जो कवरेज था ,रात 10 बजे प्राइम टाइम में , उसमें डाक्टरों के बारे में जो कहा गया वह दण्डनीय अपराध है। टीवी के ‘महान एंकर’ ने कहा ‘ ये डाक्टर नहीं कंस हैं’। एक रिपोर्टर ने राजस्थान से जो समाचार भेजा उसमें डाक्टरों के लिए कहा गया ‘जल्लाद ’।
       हम आजतक वालों से पूछना चाहेंगे वे किस स्कूल से मीडिया की शिक्षा लेकर आए हैं? क्या थोड़ा भी ज्ञान नहीं है कि इस तरह की भाषा न बोली जाए। अपमानजनक भाषा, सम्मान को ठेस पहुँचाने वाली भाषा,इज्जत उतारने वाली भाषा, गैर पेशेवर भाषा का प्रयोग टीवी हिंसाचार की कोटि में आता है। इस भाषा का आजतक में निरंतर प्रयोग बढ़ रहा है।
      दूसरी बात यह कि वाचिक हिंसा ,कायिक हिंसा से भी ज्यादा खतरनाक और घातक होती है। उससे व्यक्ति,समुदाय या वर्गविशेष को गहरी चोट लगती है। व्यक्ति, समुदाय, पेशे समुदाय, वर्गविशेष आदि को आघात लगता है। और इस तरह की भाषा का प्रयोग मानवाधिकार हनन की कोटि में आता है। भारत के कानूनों के अनुसार दण्डनीय अपराध है। अरे भाई आप खबरें दें गालियां क्यों देते हैं,अपमानजनक भाषा क्यों बोलते हैं ।
       आजतक वालों को यह समझना चाहिए कि उनके पास शक्तिशाली मीडिया है जिसका वे दुरूपयोग कर रहे हैं। वे खबरें कम ,अपमानजनक खबरें ज्यादा प्रचारित कर रहे हैं। मसलन डाक्टरों की हड़ताल को ही लें। टीवी या मीडिया या आम नागरिक को डाक्टरों की हड़ताल को डाक्टरों के नजरिए से देखना चाहिए। डाक्टरों पर आए दिन हमले हो रहे हैं,डाक्टरी पेशे में जो लोग हैं वे बेइंतिहा मेहनत करके समाज की सेवा करते हैं। खासकर अस्पतालों में काम करने वाले डाक्टरों की सेवाएं अतुलनीय हैं। इसकी तुलना में उनके पास कम से कम संसाधन हैं और अस्पताल में उनकी सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है।
    यदि किसी मरीज को कोई खास शिकायत हुई, या वह मर गया तो मरीज के नाते-रिश्तेदार-दोस्त सीधे गाली-गलौज, मारपीट और तोड़फोड़ पर उतर आते हैं। डाक्टरों के साथ इस तरह के व्यवहार की किसी भी कीमत पर हिमायत नहीं की जा सकती। दिल्ली और राजस्थान में हुई डाक्टर हड़ताल के संदर्भ में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि डाक्टरों के द्वारा बार-बार शिकायत किए जाने बाबजूद अस्पतालों में सुरक्षा नहीं बढ़ाई गयी है। दोषियों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं हुआ है।
     डाक्टरों को पेशेवर और नागरिक होने के नाते भारत के संविधान के तहत हड़ताल का अधिकार है। किसी भी व्यक्ति,संस्था ,मीडिया और सरकार को हड़ताल का हक छीनने की अनुमति नहीं दी जा सकती। डाक्टरों के बारे में उनकी समस्याओं के बारे में मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में सोचने और खबर देने की जरूरत है।
  उल्लेखनीय है एनडीटीवी पर स्वास्थ्य राज्य मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने कहा कि हड़ताली डाक्टरों को एमसीआई को ‘डि-रजिस्टर्ड’ कर देना चाहिए।
  अरे मंत्री साहब समस्या तो आपके निकम्मेपन और सरकार द्वारा सुरक्षा व्यवस्था और संसाधन मुहैय्या न कराने से पैदा हुई है। आपने अभी तक दिल्ली के डाक्टरों और अस्पतालों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान क्यों नहीं की ? कायदे से तो इस निकम्मेपन के लिए मंत्री को बर्खास्त कर देना चाहिए। जिसके निकम्मेपन के कारण डाक्टरों को मजबूरी में हड़ताल का सहारा लेना पड़ा।   
    इन दिनों आधिकांश हिन्दी चैनलों में मानवाधिकार हनन का परिप्रेक्ष्य हावी है। मानवाधिकार हनन की हिमायत में प्रस्तुत खबरें मीडिया की समाजसेवा के दायरे में नहीं आतीं बल्कि कारपोरेट सेवा के दायरे में आती हैं।  यह अब आजतक चैनल को तय करना है कि उसे समाजसेवा करनी है या कारपोरेट सेवा करनी है।
     कारपोरेट सेवा,मानवाधिकार अपहरण और गैर-पेशवर प्रस्तुतियों के बीच अन्योन्याश्रित संबंध है। इन दिनों इस संबंध को हिन्दी के अधिकांश चैनल निभा रहे हैं।

शनिवार, 17 जुलाई 2010

‘हेडलाइन टुडे’ पर हमला और फासीवादी संचार फ्लो

    अंग्रेजी टीवी चैनल ’हेडलाइन टुडे’ ने 15जुलाई 2010 को एक स्टिंग ऑपरेशन करके यह बताया कि आरएसएस का आतंकवाद या हिन्दू उग्रवाद से गहरा संबंध है। इस संबंध में भाजपा के एक भू.पू. सांसद के विचारों को कैमरे में कैद करके स्टिंग ऑपरेशन किया गया और उसकी प्रतिक्रियास्वरूप आरएसएस ने आजतक / हेडलाइन टुडे के ऑफिस पर हमला बोल दिया। अधिकांश दलों ने चैनल के दफ्तर पर हमले की निदा की है। एक दल ने संघ से माफी मांगने को कहा है तो कुछ ने पाबंदी की मांग की है।
         इस समस्या के कई आयाम हैं। पहला आयाम है टीवी चैनल या मीडिया के प्रति आरएसएस का हमलावर रवैय्या। संघ के लोग समय-समय पर मीडिया पर हमले करके मीडिया का मुँह बंद करने और आतंकित करने की कोशिश करते रहे हैं। वे पहले भी अनेक मीडिया कंपनियों पर हमले कर चुके हैं। संघ के प्रति आलोचनात्मक रूख रखने वाले मीडिया के प्रति हमलावर रूख नई बात नहीं है। संघ के द्वारा नियमित ऐसे हमले किसी न किसी बहाने होते रहते हैं। इंटरनेट की बेवसाइटों पर इनके हमलों की व्यापक सूचनाएं उपलब्ध हैं।

    इस मसले का दूसरा आयाम ‘हेडलाइन टुडे’ और धर्मनिरपेक्ष दलों और भाजपा से जुड़ा है। हम सब जानते हैं कि ‘हेडलाइन टुडे’ के लोग पेशेवर लोग हैं। वे भोले और गैर-पेशेवर नहीं हैं। वे फोकट में काम नहीं करते, फोकट में खबर भी नहीं देते। खबर उनका धंधा है। संघ के बारे में उन्होंने कोई नई बात नहीं दिखाई है।
    केन्द्र सरकार के खुफिया विभाग वाले जानते हैं कि संघ क्या है,केन्द्र में जिन दलों की सरकार है वे भी जानते हैं कि संघ एक फासिस्ट संगठन है। लेकिन मुश्किल यह है कि संघ के द्वारा जिस पार्टी का संचालन होता है वह है भाजपा। भाजपा को लोकतांत्रिक विपक्ष का दर्जा हासिल है। क्या कांग्रेस की इस हमले के पीछे मुख्य विपक्षीदल भाजपा को राजनीतिक तौर पर बर्बाद करने की मंशा काम कर रही है ?
        कांग्रेस और दूसरे दलों को यह बात सोचनी चाहिए कि क्या किसी भी व्यक्ति को लोकतंत्र में महज फासीवादी विचार रखने के कारण जेल में ड़ाला जा सकता है ? क्या स्टिंग ऑपरेशन खबर है ? आखिरकार ‘ हेडलाइन टुडे ’ ने ऐसी कौन सी नई बात कही है जिस पर इतना बबाल मच रहा है ? क्या संघ के लोग नहीं जानते कि उनके विचार क्या हैं ? क्या वे ‘ स्टिंग  ऑपरेशन’ में व्यक्त विचारों को नहीं जानते थे ? वे जानते हैं कि उनके भू.पू.सांसद के क्या विचार हैं । फिर ‘हेडलाइन टुडे’ पर हमला क्यों ? धरना ,प्रदर्शन.प्रतिवाद क्यों ?
    संघ को अगर किसी पर आपत्ति हो सकती थी तो उस सांसद के विचारों पर होनी चाहिए थी, उस सांसद के घर जाकर प्रदर्शन करना चाहिए था। टीवी टुडे वालों का इसमें कोई कसूर नहीं है उन्होंने तो स्टिंग ऑपरेशन के जरिए संघ के पूर्व सांसद के विचारों को चैनल पर सार्वजनिक मात्र किया है। यह महज फासीवादी विचारों का प्रसारण है।
     इस स्टिंग ऑपरेशन में कोई खबर नहीं थी। यहां तो मात्र एक व्यक्ति के विचार सुनाए गए थे। इस तरह के विचारों में डूबे हुए सैंकड़ों-हजारों बंदे संघ के पास हैं। संघ के प्रकाशनों में नियमित ऐसी बातें और विचार प्रकाशित होते रहते हैं जिनसे पत्रकारिता के मानकों का आए दिन उल्लंघन होता है। इन विचारों को आसानी से राष्ट्रविरोधी विचारों की कोटि में रखा जा सकता है लेकिन कांग्रेस की केन्द्र सरकार से लेकर न्यायपालिका के जजों तक किसी को भी इनके बारे में संज्ञान लेने की फुर्सत नहीं है।
      ‘हेडलाइन टुडे’ पर संघ के कार्यकर्ताओ के हमले की जितनी निंदा की जाए कम है। लेकिन ‘हेडलाइन टुडे’ के मीडिया विशेषज्ञों को यह जानना चाहिए कि उन्होंने संघ के एक पूर्व सांसद के उग्र हिन्दूवाद संबंधी विचारों का प्रसारण करके संघ की विचारधारात्मक सेवा की है। संघ इस तरह के प्रसारणों से कमजोर नहीं होगा बल्कि उसकी आक्रामकता में इजाफा होगा।
      संघ के फासीवादी विचारों का किसी भी रूप में प्रचार अंततः संघ की सेवा है। चैनल वाले इस मामले में बिन लादेन के पैटर्न का अनुगमन कर रहे हैं। जिस तरह बिन लादेन के आतंकी विचारों के वीडियो कैसेट जारी किए जाते हैं ,ठीक उसी पैटर्न पर किसी न किसी बहाने भारत के चैनल वाले संघ के आतंकी विचारों का वीडियो बनाकर जारी कर रहे हैं। फ़र्क यह है बिन लादेन के आतंकी विचार स्वयं उसके होते हैं। यहां थोड़ा विकेन्द्रीकरण है और संघ के मौजूदा और भू.पू. प्रचारकों और कार्यकर्ताओं के विचारों का प्रचार के लिए चैनल इस्तेमाल कर रहे हैं।
    आतंकी या फंडामेटलिस्ट विचार जब मासमीडिया के जरिए किसी भी रूप में प्रसारित किए जाएंगे तो वे सनसनी,खबर,प्रमाण,सत्य आदि नहीं रह जाते बल्कि प्रौपेगैण्डा में तब्दील हो जाते हैं। विचारधारात्मक प्रचार में अपने के रूपान्तरित कर लेते हैं और संक्रमित करते हैं। आतंकी संगठन चाहते हैं कि उनके विचार संक्रमित हों, फैलें, प्रसारित हों। इस तरह के विचारों का प्रसारण संबंधित संगठन की साख में इजाफा करता है। यह बात अनेक बड़े मीडिया विशेषज्ञों ने रेखांकित की है।
       ‘हेडलाइन टुडे’ वालों की चाहे जो मंशा रही हो लेकिन उन्होंने फासीवादी विचारों को प्रसारित किया है। आतंकी विचारों का प्रसारण आतंकवाद की सेवा है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘स्टिंग ऑपरेशन’ पत्रकारिता नहीं है ,यह किसी भी मानक के आधार पर स्वस्थ पत्रकारिता नहीं है। इसकी किसी भी रूप में वैधता नहीं है। ऐसी स्थिति में संघ के बारे में ‘हेडलाइन टुडे’ का तथाकथित भंडाफोड़ महज एक सनसनीखेज प्रस्तुति है। यह विचारधारात्मक संघर्ष नहीं है। यदि मीडिया के फासीवादी संचार फ्लो के परिप्रेक्ष्य में देखें तो इस तरह की प्रस्तुतियां बेहतर ढ़ंग से समझ में आ सकती हैं।
    मीडिया में फासीवादी संचार फ्लो का मतलब है समाचार की जगह निर्मित खबर, काल्पनिक खबर,संदर्भरहित खबर,स्रोतरहित खबर, अफवाह या प्रचार की खबर, संवाददाता, फोटोग्राफर,संपादक के नाम के बिना खबर आदि कुछ नमूने हैं जो फासीवादी समाचार फ्लो का निर्माण करते हैं। क्या ’आजतक’ और ‘हेडलाइन टुडे’ इस फासीवादी संचार फ्लो का अनुकरण नहीं कर रहे ? क्या स्रोत.संदर्भ,सत्य की समाचार से विदाई में ये चैनल अग्रणी नहीं हैं ?
     उल्लेखनीय है फासीवाद के विचारधारात्मक आधार को ऐसी खबरें ज्यादा मदद करती हैं जो फासीवादी संचार मॉडल पर आधारित होती हैं। यही बुनियादी बिंदु है जहां से खड़े होकर मीडिया समाचार प्रस्तुतियों और ‘हेडलाइन टुडे’ के तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन को देखना चाहिए।       

















शनिवार, 10 जुलाई 2010

आजतक टीवी चैनल की संपादकीय अनैतिकता और समाचार का अंत


     भारत के हिन्दी टीवी समाचार चैनलों ने जो रास्ता पकड़ा है वह इस बात का संकेत है कि टीवी चैनलों में समाचार और संपादन के मानकों की विदाई हो गयी है। संपादन और समाचार प्रस्तुति के नाम पर बेईमानी हो रही है। ऐसी अनैतिक संपादनकला का प्रदर्शन हो रहा है जिसे देखकर किसी की भी आंखें शर्म से झुक जाएं। मसलन् आजतक टीवी चैनल को ही लें, उसने तो टीवी संपादनकला के नए मानक ही गढ़ लिए हैं। 
     यह चैनल कहीं से किसी भी स्रोत से खबर ले लेता है और अपने ब्यूरो के नाम से प्रसारित कर देता है। यह खेल प्रतिदिन हो रहा है। उदाहरण के लिए ऑक्टोपस नामक समुद्री जंतु पर उसने आधा घंटे की दो दिन पहले खबर दिखाई और शेष तक नहीं बताया कि आखिर उसे यह खबर कैसे मिली ? समाचार का कायदे से स्रोत बताया जाना चाहिए। यह चैनल कहीं से भी फोटोग्राफ लेकर दिखा देता है फोटोग्राफर का नाम नहीं बताता। खबर के स्रोत,फोटोग्राफर का नाम आदि बातें ऐसी हैं जो साफ दिखती हैं। लेकिन समस्या इससे भी गंभीर है ,इस चैनल को सर्वश्रेष्ठ समाचार चैनल का कई सालों से इनाम भी मिलता रहा है। हमें इस कारपोरेट मेनीपुलेशन पर शर्म क्यों नहीं आती ?  हमारे प्रबुद्ध संपादक अखबारों में इस संपादकीय पतन पर कुछ क्यों नहीं बोलते ?  अब एक अन्य प्रसंग पर सोचें कि आखिरकार टीवी में समाचार का अंत क्यों हुआ ?समाचार के नाम पर क्या गुलगपाड़ा मचा हुआ है ?इसे थोड़ा बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें।

      नव्य-उदारतावाद के मौजूदा दौर में समाचार की बजाय जंक समाचार ज्यादा आ रहे हैं। ये वे समाचार हैं जो देखने में चटपटे किंतु सारहीन होते है। इनका सामाजिक मूल्य बहुत कम होता है, इस तरह के समाचारों का टीवी कवरेज से लेकर प्रिंट मीडिया तक फैल जाना इस बात का संकेत है कि मौजूदा दौर समाचार का नहीं जंक समाचार का युग है। इसके अलावा जो सारवान समाचार दिखाए जा रहे हैं उनमें खास किस्म का मनमानापन झलकता है। मसलन् हमेशा आधी-अधूरी कहानी बतायी जाती है। भ्रमित करने वाली शीर्ष पंक्तियां बनायी जाती हैं। तथ्यों में सुधार चुनिंदा ढ़ंग से किया जाता है। जिस कहानी में किसी तरह का तथ्य अपुष्ट प्रमाणों को समाचार कहानी बनाकर पेश किया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय खबरों में ऐसी स्टोरियों और तथ्यों से बचा जाता है जो अमेरिकी राष्ट्रपति बुश के लिए ठीक न हों। अथवा उनके बारे में नकारात्मक प्रभाव पैदा करने वाली हों। आज समाचार के नाम सिर्फ मनोरंजन की खबर होती है,आकर्षक चेहरे की खबर होती हैं। 'चेहरा' आज टीवी खबरों में बड़ा कारक तत्व बनकर सामने आया है खासकर महिला समाचारवाचिका अथवा एंकर के रुप में सुंदर चेहरे की लड़की ज्यादा पसंद की जा रही है। स्थिति यह हो गई है कि एंकर के रुप में अमिताभ बच्चन से लेकर  जॉनी लीवर तक को सहज ही देखा जा सकता है। यह आकर्षक चेहरे,सैलीब्रेटी चेहरे और सुंदरता की परेड है। इससे टीकी एंकर की परंपरा ही बदल गयी है। यही स्थिति खेलों की है। अब खेल के कार्यक्रमों में खेल संवाददाता नहीं बल्कि स्वयं खिलाडी ही अपना मूल्यांकन करते रहते हैं,खिलाड़ी खिलाडी के बारे में बताता रहता है,इससे खेल पत्रकारिता का भी चरित्र बदला है। सवाल उठता है कि जब खिलाडी ही व्याख्याकार हो जाएगा,जब फिल्म के बारे में निर्देशक और अभिनेता ही मूल्यांकन करने लगेंगे तो ऐसा मूल्यांकन विश्लेषण और वस्तुगतता से रहित होगा। इस तरह की प्रस्तुतियों में आत्मगत तत्व हावी रहेगा। बल्कि यह भी कह सकते हैं कि समाचारों में सुंदरता और आत्मगत भाव की परेड हो रही है।
    टीवी वाचक के चेहरे हाव-भाव ज्यादा महत्वपूर्ण हो उठे हैं। साथ समाचार का गप्प, सनसनी और निर्मित विवादों में रुपान्तरण कर दिया गया है। इस तरह की खबरें जनता की बुध्दि पर हमला हैं,उसका अपमान है,ये यथार्थ जीवन के संदर्भ की उपेक्षा करती हैं, बर्नस्टीन के शब्दों में '' अच्छी पत्रकारिता जनता को चुनौती देती है,वह उसका विवेकहीन ढ़ंग से शोषण नहीं करती।'' आज स्थिति इतनी खराब हो गयी है कि सरकारी सूत्रों से हासिल सूचनाओं और ब्यौरों को बगैर किसी तहकीकात के सीधे पेश कर दिया जाता है। इस संदर्भ में विश्व विख्यात पत्रकार वॉब बुडवर्ड के शब्दों का स्मरण करना प्रासंगिक होगा। बुडवर्ड ने लिखा है  कायदे से सरकारी स्रोत से निकली खबर की संवाददाता को अपनी खोज के जरिए पुष्टि करनी चाहिए। इससे जनतंत्र का विकास होता है किंतु जब संवाददाता सिर्फ सरकारी स्रोत के आधार पर ही खबर देने लगे तो इससे सर्वसत्तावादी समाज का निर्माण होता है,इस परिप्रेक्ष्य में यदि खबरों को देखें तो पता चलेगा कि खबरें जनतंत्र का नहीं सर्वसत्ताावादी समाज का निर्माण कर रही हैं। वाटरगेट कांड से लेकर इराक युध्द तक वुडवर्ड ने बड़े पैमाने पर रहस्योद्धाटन किए हैं। वुडवर्ड कहता है  हमें उस केन्द्रीय कारक की तलाश करनी चाहिए जिसके कारण सरकार उस तरह की सूचनाएं दे रही है। जनतंत्र में प्रेस दूसरा स्रोत मुहैयया कराता है। उसके आधार पर नागरिक तय कर सकते हैं कि क्या सही है। कौन सी स्टोरी सही है। बॉव वुडवर्ड को इस दौर का सबसे बेहतरीन संवादाता माना जाता है।
      आज हमारे शहरी लोग टीवी चैनलों से खबरें प्राप्त करते हैं,ये वे चैनल हैं जिन पर बड़े इजारेदार घरानों का कब्जा है,इनमें से ज्यादातर कंजरवेटिव विचारधारा का अहर्निश प्रचार करते रहते हैं। ये समाचार चैनल अंधानुकरण में अमेरिकी समाचार चैनलों के रास्ते पर चल निकले हैं। इसके कारण खबर का अर्थ अब मनोरंजन हो गया है। इसे पत्रकारिता जगत की पेशेवर कुश्ती भी कह सकते हैं। प्रथम मध्य-पूर्व युध्द के पहले तक टीवी खबरों के जरिए ज्यादा धन की आमदनी नहीं होती थी। किंतु प्रथम मध्य-पूर्व युध्द ने यह साबित किया कि टीवी खबरों में बड़ा धन है। यही वह दौर है जिसमें टीवी खबरों की रेटिंग की ओर सीएनएन जैसा चैनल मुखातिब हुआ और इसके बाद तो टीवी समाचार रेटिंग का सिलसिला ही चल निकला।
     रेटिंग के इस नए दौर में देशप्रेम,विज्ञान,दर्शन से ज्यादा सेक्स,स्कैण्डल और सनसनीखेज खबरों की रेटिंग में तेजी से बढ़ोतरी हुई है।  अब अमेरिकी राष्ट्रपति की देशभक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण था राष्ट्रपति का अवैध सेक्स स्कैण्डल ,वह ज्यादा लुभावना था। समाचार के पतन या रुपान्तरण का सबसे खतरनाक पक्ष यह है इसमें प्रौपेगैण्डा को खबर बना दिया गया है। प्रथम इराक युध्द से यह सिलसिला चला है और अब यह एक आम नियम बन गया है। टीवी समाचारों का विभिन्ना दल वैचारिक प्रचार अभियान के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। आज किसी एक कवर स्टोरी को बनाना सस्ता सौदा है क्योंकि उससे अन्य स्टोरी को छिपाना है। अब एक ही टॉपिक पर पूरा कार्यक्रम आने लगा है। प्रथम मध्यपूर्व युध्द से सीएनएन ने यह सिलसिला शुरू किया और बाद में सभी चैनलों ने इसे अपना लिया है। आज सभी समाचार चैनलों में एक ही कवर स्टोरी के आधार पर आधा घंटा,एक घंटा,कभी-कभी पूरा दिन,चौबीस घंटे, साठ घंटे तक एक ही कवर स्टोरी कब्जा जमाए रहती है। इसके कारण अन्य खबरों को प्रसारित ही नहीं किया जाता। इसका अर्थ यह है कि समाचार चैनल एक से अधिक स्टोरी के लिए धन खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं। अथवा तयशुदा ढ़ंग से अन्य स्टोरियों को छिपाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि एक समय में एक ही टॉपिक पर खबरें रहेंगी। कभी-कभार ही एकाधिक स्टोरी रहती है। समाचारों के अलावा चुनाव के समय चुनाव सर्वेक्षण,ओपिनियन पोल आदि भी आते हैं। चुनाव के समय ये खबरों का बड़ा हिस्सा घेर लेते है। चुनाव सर्वेक्षणों में आमतौर पर बेमेल सवाल किए जाते हैं। जैसे ,स्थिर सरकार चाहिए अथवा अस्थिर प्रशासन चाहिए। इस तरह का सवाल करते हुए वे दर्शकों को ज्यादा तथ्य प्रदान नहीं करते। इसके बावजूद यह चाहते हैं कि दर्शक अपना निष्कर्ष बता दे।  ओपिनियन के नाम पर दर्शकों से पूछा जाता है कि आपको कौन सा मुद्दा सही लगता है,प्रासंगिक लगता है, समस्या को लेकर आपकी भावनाएं क्या कहती हैं,किंतु नयी प्रवृत्तिा यह है कि वे भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं ? यह भी सवाल किया जाता है कि आप फलां -फलां दल को क्यों समर्थन देते हैं, यह एकदम अप्रासंगिक सवाल है। चुनाव सर्वेक्षणों के जरिए मीडिया एब्सर्ड को तार्किक बनाता है और यह आभास देता है कि वह जो कह रहा है उसी पर विश्वास करो। 

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...