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शनिवार, 18 सितंबर 2010

खोया आलोचक मिला सेलिब्रिटी नामवर सिंह

        हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह लंबे समय से ‘गायब’ हैं। कोई नहीं बता रहा वे कहां चले गए। वैसे व्यक्ति नामवर सिंह साक्षात इस धराधाम में हैं और मजे में हैं। गड़बड़ी यह हुई है कि ‘आलोचक नामवर सिंह’ गायब हो गए हैं। उनका गायब होना एक बड़ी खबर होना चाहिए था। लेकिन हिन्दी वाले हैं कि उनके आलोचक के रूप में गायब हो जाने को गंभीरता से नहीं ले रहे।
     नामवर सिंह हम सबके पूज्य हैं। आराध्य हैं। हमें उनसे प्रेरणा मिलती है। उनका एक -एक कथन आलोचना में हीरे की कण की तरह होता है। लेकिन लंबे समय से वे आलोचना से गायब हो गए हैं। यह बात दीगर है कि उनके नाम पर कुछ डमी नामवर बाजार में उपलब्ध हैं।
    ‘आलोचक नामवर सिंह’ हम सबके बुजुर्ग हैं और बुजुर्गों का हम सब आदर करते हैं और उनकी बातें भी मानते हैं। हम सब पहले भी उनकी बातें मानते थे। वे जैसा कहते थे वैसा ही करते थे इन दिनों भी वे जैसा कह रहे हैं हम वैसा ही कर रहे हैं। वे जो कुछ कहते हैं उसे आंख बंद करके मान लेते हैं। वे जिसका लोकार्पण करते और दस-पांच मिनट बोल दें,उसकी किताब हाथों-हाथ बिक जाती है और जिस व्यक्ति को हजारीप्रसाद द्विवेदी के बाद का सबसे बड़ा आलोचक बना दें तो उसकी किताब का झटके में द्वितीय संस्करण आ जाता है। प्रथम संस्करण के प्रकाशन के साथ ही राजकमल प्रकाशन उसे एक लाख का इनाम दे देता है।
    यही हाल अलका सरावगी का भी हुआ उसके उपन्यास की गुरूवर ने इतनी प्रशंसा की कि उसे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल गया। कहने का अर्थ है नामवर सिंह की प्रशंसा का दाम है और उनकी प्रशंसा की बाजार में हमेशा रेटिंग ऊँची रही है। वे अब प्रशंसा करते है। आलोचना नहीं।
    नामवर सिंह हिन्दी के एकमात्र ऐसे आलोचक हैं कि जिनका लोहा सभी मानते हैं और उनके जितने भी परिचित हैं,शिष्य हैं वे सब उनके फेन हैं। मैं भी उनका फेन हूँ। शिष्य भी हूँ। मेरी मुश्किल यह है मैंने आलोचक नामवर सिंह से पढ़ा था। मैंने सैलीबरेटी नामवर सिंह से नहीं पढ़ा था।
    मुझे आज ही एक दोस्त ने पूछा था कि आलोचक नामवर सिंह कब से गायब हैं ? मुझे यह सवाल प्रासंगिक लगा और मैंने आलोचक नामवर सिंह की खोज आरंभ कर दी तो मुझे सौभाग्य से यह पता चला कि आलोचक नामवर सिंह आपातकाल में ही गायब हो गए।
      आपातकाल के बाद किसी ने आलोचक नामवर सिंह को नहीं देखा है। आपातकाल में लुप्त हुए नामवर सिंह को अभी तक लोग खोज रहे हैं लेकिन उन्हें वे नहीं मिले हैं। किसी को कुलाधिपति नामवर सिंह मिले हैं, किसी को अमिताभ बच्चन के रूप में मिले हैं,किसी को लोकार्पण वाले नामवर सिंह मिले हैं। किसी को प्रशस्तियां पढ़ने वाले नामवर सिंह मिले हैं किसी को पुराने के प्रेमी नामवर सिंह मिले हैं, किसी को साक्षात्कार देने वाले नामवरसिंह मिले हैं,किसी को राजकमल प्रकाशन वाले नामवर सिंह मिले हैं, किसी को गुरूवर नामवर सिंह मिले हैं, किसी को आशीर्वाद देकर काम कराने वाले नामवर सिंह मिले हैं।
        मैं बेबकूफों की तरह आलोचक नामवर सिंह को खोज रहा था और अपने सभी लक्ष्यों की प्राप्ति में असफल साबित हुआ। मैंने 30 से ज्यादा एक से एक सुंदर विषय पर किताबें लिखीं है और हिन्दी माध्यम समीक्षा और साहित्य समीक्षा का मान ऊँचा किया। लेकिन आश्चर्य की बात है कि आलोचक नामवर सिंह की मेरे ऊपर नजर तक नहीं पड़ी। उन्होंने मेरी किताबों को स्पर्श योग्य भी नहीं समझा।
     मैं बार-बार सोचता था कि एकबार आलोचक नामवर सिंह मेरी दस साल पहले आई  स्त्रीवादी आलोचना की किताब ‘स्त्रीवादी साहित्य विमर्श’ को जरूर पढ़ेंगे। लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि आलोचक नामवर सिंह ने मेरी किताब नहीं देखी,यह बात दीगर है कि मेरी सारी किताबें अंतर्वस्तु के बल पर ,बिना किसी समीक्षक की सिफारिश या प्रशंसा के लगातार बिक रही हैं और मेरी अधिकांश किताबों की सरकारी खरीद भी नहीं हुई है। मामला यहीं तक नहीं थमा है आलोचक नामवर सिंह को एडवर्ड सईद,बौद्रिलार्द, मेकलुहान,नॉम चोमस्की, बोर्दिओ आदि पर केन्द्रित किताबें भी नजर नहीं आयीं।
      उन्हें हिन्दी की लुप्तप्राय कविताओं का संकलन ‘स्त्री काव्यधारा’ दिखाई नहीं दिया। इसमें हिन्दी की स्त्री लेखिकाओं की वे कविताएं हैं जो नामवर सिंह और उनके अनेक भक्तों ने भी नहीं पढ़ी हैं। इनमें से अधिकांश लेखिकाओं का हिन्दी साहित्य के इतिहास में किसी ने जिक्र तक नहीं किया।
      आलोचक नामवर सिंह ने उस किताब पर भी कुछ नहीं बोला जिसमें 70 से ज्यादा हिन्दी लेखिकाओं के वे दुर्लभ निबंध हैं जो हिन्दी आलोचना और इतिहास में चर्चा के योग्य नहीं समझे गए। आलोचक नामवर सिंह का इस तरह मेरी किताबों को एक नजर भी न देखना मेरे लिए चिन्ता की बात है। यही वो संदर्भ है जहां से हमें यह सवाल उनसे पूछना है कि आखिरकार पुरूषोत्तम अग्रवाल की आलोचना किताब में ऐसा क्या है जिसके कारण आप बार-बार उसकी प्रशंसा के लिए बाध्य होते हैं और मेरी आलोचना की किताब आपको नजर नहीं आती ?
      अलका सरावगी में ऐसा क्या खास है कि उसके उपन्यास की प्रशंसा में आप प्रशंसा के सभी मानक तोड़ देते हैं लेकिन उदयप्रकाश की रचनाओं की प्रशंसा के लायक शब्द नहीं होते ?
   हमें लगता है आलोचक नामवर सिंह अब हमारे बीच नहीं है। अब हम जिस नामवर सिंह को देखते रहते हैं। वह प्रशंसा करने वाला व्यक्ति है। यह ऐसा व्यक्ति है जिसने आपातकाल में अपना आलोचनात्मक विवेक खोया तो फिर उसे दोबारा अर्जित नहीं कर पाया। अब वह आलोचक कम और प्रशंसा करने वाला व्यक्ति है। यह आलोचना नहीं करता बल्कि मार्केटिंग करता है।
    आलोचक नामवर सिंह की जगह सेलिब्रिटी नामवर सिंह का उदय ‘दूसरी परंपरा की खोज’ के प्रकाशन से होता है। उसके बाद वे हमेशा सेलिब्रिटी भाव में रहते हैं। उनके सेवाभावी शिष्य भी सैलीबरेटी भाव में रहते हैं। सेलिब्रिटी भाव के निर्माण के लिए मीडिया में उपस्थिति जरूरी है। इस ओर सेलिब्रिटी नामवर सिंह ने बड़ी मेहनत की है। इतनी मेहनत उन्होंने आलोचक नामवर बनने के लिए की होती तो साहित्य का भला होता लेकिन सेलिब्रिटी नामवर सिंह से मीडिया उपकृत हुआ। थोक किताबों के बिक्रेता उपकृत हुए। राजकमल प्रकाशन उपकृत हुआ।
       उल्लेखनीय है आलोचक नामवर सिंह का सेलिब्रिटी नामवर सिंह में रूपान्तरण मुझे अपने छात्र जीवन में करीब से देखने को मिला था। सेलीब्रिटी नामवर सिंह की इमेज उनके अ-जनतांत्रिक कार्यकलापों से भरी पड़ी है। आलोचक के पास विवेक होता है ,सामाजिक जिम्मेदारी होती है। लेकिन सैलीबरेटी इनसे वंचित होता है। जिस तरह आलोचक नामवर सिंह का इतिहास है उसी तरह सैलीबरेटी नामवर सिंह का भी इतिहास है। यह इतिहास आलोचक नामवर सिंह का एकदम विलोम है।
   सेलीब्रिटी नामवर सिंह की यह खूबी है कि वह किसी भी चीज पर विश्वास नहीं करता। वह जो कुछ है उसे सीधे जानता है. वह किसी अन्य के बहाने जानने की बजाय सीधे जानना पसंद करता है उसे किसी अन्य की राय पर नहीं अपनी राय और बुद्धि पर भरोसा है। वह दर्शकीय और संशयवादी भावबोध में रहता है।
     सेलिब्रिटी नामवर सिंह प्रॉपरसेंस में विश्वास नहीं करता। प्रॉपरसेंस में नहीं सोचता। उसके लिए भक्ति और आस्था प्रधान है। जो इसे करने में असमर्थ हैं वह उन्हें अस्वीकार करता है। जो उन पर आस्था रखते हैं उनके प्रति वह संवेदनशील भी है। उनकी सीधे खबर भी रखते हैं। सेलिब्रिटी नामवर सिंह ‘तर्क’ और सकारात्मक ज्ञान के आधार पर नहीं सोचता और नहीं बोलता । जिन पर वह विश्वास नहीं करता उनके बारे में चुप रहता है या नकारात्मक टिप्पणियां करता है। ज्यादातर समय चुप ही रहता है।
   सेलीब्रिटी नामवर सिंह का आस्था में अटूट विश्वास ही है जो उनके व्यक्तित्व में अनिश्चितता और भ्रम बनाता है। नामवर सिंह से आप किसी भी काम के लिए कहें इसके लिए कोई गारंटी नहीं है कि वह हो ही जाएगा। वे काम की गारंटी का वायदा नहीं करते वे आस्था की गारंटी का वायदा जरूर करते हैं। आपसे वे उम्मीद करते हैं आस्था बनाए रखो।
    जबसे आलोचक नामवर सिंह का सेलिब्रिटी नामवर सिंह में रूपान्तरण हुआ है तब से ऐतिहासिक दृष्टिकोण की मौत हो गयी है। अब चीजों,व्यक्तियों,कृतियों,रचनाकारों आदि के बारे में आए दिन अनैतिहासिक बयानबाजी करते रहते हैं। पहले वे दिमाग खोलने का काम करते थे अब दिमाग को नियंत्रित करने का काम करते हैं। पहले वे आलोचक की भूमिका निभाते थे अब नैतिकतावादी प्रिफॉर्मेंस पर जोर देने लगे हैं।
    पहले उनका सामाजिक तौर पर जनता के साथ एलायंस था लेकिन आपात्काल से उनका सत्ता के साथ एलायंस बना है। पहले वे जनता के मोर्चे में थे अब सत्ता के मोर्चे में हैं। पहले वे आलोचनात्मक विवेक पैदा करते थे,अब मिथ बनाते हैं। व्यक्तियों और आलोचकों के मिथ बनाते हैं। मसलन ‘यह महान है’ , ‘वह गधा है’ आदि।
       सेलिब्रिटी नामवर सिंह ने आस्था को शिक्षा,साहित्य,आलोचना से ऊपर स्थान दिया है। आस्था के आधार पर वे इन दिनों साहित्यिक हायरार्की बना रहे हैं। वे अब आलोचना नहीं करते मेनीपुलेशन करते हैं। पर्सुएट करते हैं, फुसलाते हैं। पटाते हैं। इसी चीज को कोई जब उनके साथ भक्त करे तो उसे अपना बना लेते हैं। उन्हें फुसलाना और पटाना पसंद है। साहित्य,विवेक और शिक्षा नहीं है। उनके सामयिक विमर्श का आधार है पर्सुएशन। यह विज्ञापन की कला है। आलोचना की नहीं।       
   





















रविवार, 18 अप्रैल 2010

सानिया तुम महान हो तुमने धर्म को पछाड़ दिया

           (सानिया मिर्जा)
       औरत का इमेजों के जरिए वस्तुकरण सबसे खतरनाक होता है। यह औरत की मानवीय अस्मिता पर बर्बर हमला है। कारपोरेट मीडिया और उसके चाकर मीडिया गुरू आए दिन मीडिया के अंदर स्त्री का वस्तुकरण करते रहते हैं आम तौर पर ऑडिएंस को भी इस वस्तुकरण में मजा आता है। औरत के वस्तुकरण का सबसे ताजा किस्सा है सानिया-शोहेब की शादी का मीडिया ड्रामा और शादी का वस्तुकरण।
   ज्यादातर खबरिया चैनल यह भूल गए कि वे जो कर रहे हैं वह घनघोर स्त्री विरोधी एक्शन है। सानिया की शादी की खबरें देने की आड़ में मुनाफा कमाने और रेटिंग बढ़ाने के लिए कारपोरेट मीडिया स्त्री विरोधी वातावरण बनाने में अहर्निश लगा रहा । जो लोग यह सोचते हैं कि वे सानिया की शादी की सिर्फ खबर दे रहे थे ,वे झूठे हैं,यह शादी की खबर नहीं औरत के वस्तुकरण और शादी के वस्तुकरण की खबर थी।
   सानिया की शादी का वस्तुकरण कारपोरेट मीडिया की सबसे घृणिततम हरकत है। यह औरत के वस्तुकरण और उपभोक्तावाद का नग्न महिमामंडन है। क्या कारपोरेट मीडिया को इस सामजिक अपराध के लिए माफ किया जा सकता है ?
     सानिया की शादी असल में हॉलीवुड संस्कृति का उत्सव है। सानिया की शादी के साथ कारपोरेट मीडिया ने भारतीय घरों में हॉलीवुड विवाह संस्कृति को एक ही झटके में संप्रेषित कर दिया है। हॉलीवुड की विवाह संस्कृति का हमारे घरों में आना सबसे बुरी खबर है। गंभीरता के साथ सानिया की शादी से पैदा हुई विवाह संस्कृति को देखें।
   पहली बात यह है कि सानिया की एक अस्मिता नहीं है। वह अपने अंदर कई अस्मिताओं को समेटे हुए है। मसलन् सानिया मुसलमान है,स्त्री है,भारतीय है, खिलाडि़न है, हैदराबादी है,सैलीबरेटी है। इसमें से सानिया की प्रधान अस्मिता है सैलीबरेटी की। सैलीबरेटी कैसे शादी करते हैं यह तथ्य बार-बार संप्रेषित किया गया है। सैलीबरेटी की शादी का सानिया मॉडल हॉलीवुड से लिया गया है।
   सैलीबरेटी के लिए शादी एक सामाजिक रस्म नहीं है बल्कि ‘घटना’ है। कारपोरेट मीडिया ने शादी को घटना की तरह सम्पन्न किया है। सानिया के द्वारा पहले एक सगाई  की गयी फिर उसे तोड़ा गया,यह सगाई दो परिवारों की सहमति,सानिया के बालसखा से तय हुई थी, शादी जब करते हैं तो जड़ों या मूल की ओर जाते हैं। लेकिन शोहेब का मामला एकदम भिन्न है। यहां जड़ों के बीच संबंध नहीं हुआ है बल्कि दो सैलीबरेटी मिले हैं और शादी कर रहे थे,इस शादी की सारी व्यूह रचना का सूत्रधार विज्ञापन और मीडिया जगत था। सानिया-शोहेब में मार्केटिंग ही प्रेम और शादी का आधार है।
     हॉलीवुड में सैलीबरेटी लोगों की शादी शॉप ऑपेरा की तरह चलती है सानिया की शादी भी वैसे ही संपन्न हुई है। शादी एक निजी पीरिवारिक कार्य-व्यापार है, यह सार्वजनिक उत्सव नहीं है।
    सानिया की शादी शुरु से आखिर तक सार्वजनिक बनायी गयी,दोनों परिवार जानते थे कि शोहेब शादीशुदा हैं और इस सबको वाकायदा नाटकीय अंदाज में सुनियोजित स्क्रिप्ट के जरिए संपन्न किया गया,मीडिया में सानिया की शादी का तयशुदा रणनीति के तहत उन्माद पैदा किया गया। सानिया की शादी को एक आदर्श मॉडल बनाया गया। शादी में सादगी की बजाय वैभव प्रदर्शन,मंहगे कपड़े, कीमती गहने,फाइवस्टार होटल में शादी और फिजूलखर्ची को महिमामंडित किया गया। सानिया कैसे सजी ,किस ड्रेस डिजायनर ने किस तरह के कपड़े बनाए और कितने कीमती तोहफे उपहार में दिए गए इत्यादि चीजों के मीडिया प्रदर्शन पर खास ध्यान दिया गया।
    भारत में ऐश्वर्या राय की शादी के बाद यह दूसरी सैलीबरेटी स्टाइल की हॉलीवुड मार्का शादी है। भारत में सैलीबरेटी लोग जब भी शादी करते थे तो वह नितांत वैयक्तिक और पारिवारिक कार्य-व्यापार रहा है। उनके लिए शादी घटना नहीं रही है। लेकिन अब शादी में हॉलीवुड घुस आया है।
      ध्यान दें अभिषेक बच्चन ने करिश्मा कपूर के साथ सगाई की उसे घटना बनाया ,बाद में यह सगाई टूट गयी ,और ऐश्वर्या राय के साथ सैलीबरेटी पद्धति से अभिषेक ने शादी की। यही पैटर्न सानिया मिर्जा की शादी का है इसका लक्ष्य था ऐश्वर्या राय की मार्केटिंग करना। उल्लेखनीय है ऐश्वर्या राय-अभिषेक बच्चन के पहले वैभव प्रदर्शन का ऐसा वल्गर रूप किसी भी बड़े अभिनेता की शादी में नहीं देखा गया। ऐसा वल्गर प्रदर्शन सहारा ग्रुप के सुब्रतरॉय के परिवार की शादी में देखा गया था जिसमें दौलत का वल्गर प्रदर्शन करते हुए 300 करोड़ों रुपये खर्च किए गए थे,और ये जनाब सानिया को आशीर्वाद देने पहुँचे थे।
   शादी को जब घटना बनाया जाता है तो शादी गौण हो जाती है और संबंधित व्यक्ति की मार्केटिंग प्रधान बन जाती है। इस प्रक्रिया में वर-वधू एक माल और वस्तु में तब्दील हो जाते हैं। वे अब मनुष्य नहीं रहते बल्कि वस्तु बन जाते हैं और वस्तु की बिक्री के सारे नियम,वस्तु प्रदर्शन के सारे एथिक्स उन पर लागू किए जाते हैं। इस प्रक्रिया में सानिया की शादी में इस्लामिक रीति-रिवाज गौण बन गए और मासकल्चर का वल्गर प्रदर्शन प्रधान तत्व बन गया। इस प्रकिया में इस्लाम को भी मासकल्चर में डुबकी लगानी पड़ी। लग ही नहीं रहा था कि इस्लाम में शादी का सादगी का कोई महत्व है। मासकल्चर के आगे,वस्तुकरण के आगे इस्लाम बेहद कमजोर नजर आ रहा था,मासकल्चर के सामने इस्लामिक संस्कृति बौनी नजर आ रही थी,यह सानिया की शादी का सकारात्मक तत्व है कि उसने इस्लाम धर्म को कमजोर दिखाया और मासकल्चर को महान दिखाया। यह प्रतीकात्मक रुप में इस्लाक की पराजय है और पूंजीवादी वस्तुकरण की जीत है। इस अर्थ में सानिया ने एक बड़ी विचारधारात्मक जंग जीती है। उसने अपनी इमेज के जरिए मासकल्चर की नई औरत को जन्म दिया है जो धर्म के आगे नतमस्तक नहीं हुई उलटे इस्लाम धर्म को उसने पछाड़ दिया।  
     शादी का सैलीबरेटी रुप युवाओं को भयानक खतरों की ओर ठेलता है। शादी के प्रदर्शनप्रिय रुपों को मानने पर जोर देता है शादी को और भी खर्चीला बना देता है। शादी के वस्तुकरण का कारपोरेट मीडिया में औरत के वस्तुकरण की बृहत्तर प्रक्रिया के साथ गहरा संबंध है।     
   आज कारपोरेट मीडिया में स्त्री के हाव-भाव,भंगिमा,शरीर ,साज-सज्जा आदि को मासकल्चर का प्रधान रुप बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है, औरत के शरीर का महिमामंडन चल रहा है। औरत की ज्ञानक्षमता और मानवीय इमेज की उपेक्षा की जा रही है। इस प्रक्रिया में औरत का वस्तुकरण हो रहा है। हमारे सभी विज्ञापन ,सीरियल, टीवी एंकर स्त्रियां आदि औरत की भाव-भंगिमा, स्टाइल, लुक आदि पर जोर दे रहे हैं।
    औरत के लुक वगैरह का प्रस्तुति के केन्द्र में आना स्त्री का वस्तुकरण है। अब हम शरीर को उसके चेहरे की भाव-भंगिमाओं के आधार पर देखने लगे हैं। मीडिया में दिखने वाली औरत की बुद्धि कभी भी दिमाग में स्ट्राइक नहीं करती,जो चीज स्ट्राइक करती है वह है औरत का लुक। सोचने की बात यह है कि लुक इतना महत्वपूर्ण कैसे हो गया ? यही वह बृहत्तर मीडिया फ्लो है जो सानिया की इमेज का सर्जक है और उसकी शक्ति और फेकनेस का आधार भी है। इस इमेज के सामने धर्म बौना है। सानिया तुम महान हो तुमने धर्म को पछाड़ दिया।   






शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

टाइगर वुड की क्षमाप्रार्थना का मीडियाखेल

    ( टाइगर वुड लाइव टेलीकास्ट के समय) 


गोल्फ के महान खिलाड़ी और मीडिया सैलीबरेटी टाइगर वुड ने कल एक लाइव टीवी प्रसारण में अपने अपराध के लिए पत्नी,बच्चे और समर्थकों से माफी मांगी है। वुड का अपराध था कि उसके अनेक औरतों के साथ अवैध संबंध थे और मीडिया में यह तथ्य पारदर्शिता के साथ दिखाया गया।

वुड के अनेक औरतों के साथ अवैध संबंध थे यह ऐसी खबर थी जिस पर वुड की बीबी से लेकर मीडिया उपभोक्ताओं तक किसी को भी विश्वास नहीं था , अवैध संबंधों के खुलासा होने के पहले तक यही मिथ प्रचलन में था कि वुड घरेलू मर्द है, गृहस्थी के मूल्यों का प्रतीक है। मीडिया के एक ही एक्सपोजर ने  वुड को अच्छे मर्द से बुरे मर्द में बदल दिया।  
   कल जब टाइगर वुड पश्चाताप और क्षमा प्रार्थी के रुप में अपना प्रायश्चितनामा पढ़ रहा था तो उसे सभी ने संदेह की नजर से देखा है। टेलीविजन के लाइव प्रसारण और उसकी बॉडी लैंग्वेज की व्याख्या करते हुए ज्यॉफ्री बीटी ने  गार्जियन’ में लिखा कि उसकी प्रस्तुति में कई तत्व थे उसमें दुख की अभिव्यक्ति थी, जिम्मेदारी का भाव था, माफीनामा था और अपनी खोई प्रतिष्ठा को पाने का भाव भी था।
     वुड का माफीनामा सुनियोजित और पूरी तैयारी के साथ पूर्वाभ्यास कराकर दिलाया गया था। यह माफीनामा एक सैलीबरेटी मर्द का माफीनामा था। वुड जब बोल रहा था तो उसका अभिव्यक्ति पर पूरा नियंत्रण था। उसका धीरे धीरे बोलना यह छद्म आभास भी दे रहा था कि उसे हृदय से दुख है। यह टूटे हृदय की अभिव्यक्ति है। वह गहरे अवसाद में है। बोलने की धीमी गति यह आभास दे रही थी कि यह वुड का ईमानदार माफीपत्र है। वुड का अपने व्यवहार पर पूरा नियंत्रण था।  वुड के खड़े होने का अंदाज ,बोलने का अंदाज और सीने पर हाथ रखने का तरीका और अंत में धीमी गति से चलना और सामने की पंक्ति में बैठी अपनी माँ और करीबी लोगों से गले मिलना। ये सारे हावभाव बता रहे थे कि टाइगर वुड दुखी है। लेकिन उसका माफीपत्र ईमानदारी के साथ जनता के बीच दिया बयान नहीं है। प्रस्तुति में यह भी मान लिया गया कि लोगों ने उसे माफ कर दिया है। क्योंकि किसी ने सवाल नहीं किया।    

टाइगर वुड की प्रस्तुति का अहम पहलू था वह क्षण जब वह माफी मांग रहा था तो कैमरे की तरफ मुँह करके भावहीन मुद्रा में माफी मांग रहा था। यह एक थेथर मर्द का भाव था , मीडिया के अनुसार भावहीनता अथवा अतिरंजित प्रस्तुति दोनों ही किस्म की प्रस्तुतियों स्वाभाविकता नहीं होती। स्वाभाविकता के अभाव में माफीपत्र कृत्रिम अभिव्यक्ति है। इस माफीपत्र में एक नाटकीयता भी थी जिसे जनसंपर्क और विज्ञापन कंपनियों के लिए डाला गया था वह था बौद्ध धर्म का संदर्भ। वुड ने अपने बौद्ध होने की बात तयशुदा रणनीति के तहत कही जिससे वह अपने अपराध के लिए कम से कम धर्म के सामने मुक्त हो सके।
   वुड का माफीपत्र इस बात का संकेत है कि वुड की बीबी और बच्चों ने उसे माफ नहीं किया है। वुड ने बडी चालाकी के साथ अपराध को व्यवहार की भूल बनाकर पेश किया है। बहुस्त्रीगमन असल में आदत है और आदतें रातों-रात नहीं जातीं ,नहीं आतीं। वुड के माफीनामे में सीधे सैलीबरेटी का भाव था।

सैलीबरेटी की सार्वजनिक अभिव्यक्तियां और प्रस्तुतियां नकली होती हैं। सैलीबरेटी छद्म होता है, फेक होता है। टाइगर वुड का ईमानदार माफीनामा तब ही आएगा जब वह पेशेवर गोल्फ खेलना बंद कर देगा। बौद्ध धर्म के जरिए समाजसेवा करने लगे। इसके लिए वुड को गोल्फ और मीडिया सैलीबरेटी की पहचान के बाहर आना होगा। यह प्रक्रिया बेहद कठिन है।

   उल्लेखनीय है माफी के लिए ईमानदार होना जरुरी है। सैलीबरेटी ईमानदार कम होते हैं। सैलीबरेटी की क्षमा प्रार्थना में प्रामाणिकता का होना जरुरी है। क्षमाप्रार्थना ऐसी जिस पर विश्वास किया जा सके। वुड की क्षमाप्रार्थना भरोसा पैदा नहीं करती। सैलीबरेटी की क्षमाप्रार्थना का सार्वजनिक रुप में प्रसारण विश्वास पैदा नहीं करता। यह वैसे ही जैसे सैलीबरेटी राजनेता अपनी गलती और अपराध के लिए जब माफी मांगते हैं या खेद व्यक्त करते हैं तो विश्वास नहीं होता। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का मोनिका लेविंस्की सेक्सकांड से माफी मांगना। राजीव गांधी,सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह का 1984 के दंगों पर माफी मांगना,बाबरी मस्जिद गिराए जाने पर लालकृष्ण आडवाणी का दुख व्यक्त करना आदि ईमानदार अभिव्यक्ति की कोटि में नहीं आते। ये सब सैलीबरेटी व्यक्तियों की कृत्रिम अभिव्यक्ति की कोटि में आते हैं। क्योंकि जो वायदा इन लोगों ने किया वह भरोसा पैदा नहीं करता। सैलीबरेटी के माफीनामे के लेखक क्षमापत्र लिखने की कला में सिद्धहस्त होते हैं।   
उल्लेखनीय है हाल ही में टोयोटा कार कंपनी के मालिक अकीयो टोयोटा का सारी दुनिया में टीवी के जरिए क्षमासंदेश देखा गया, अकीयो के क्षमा चाहने वाले भाव में ईमानदारी थी। टीवी पर अकीयो के चेहरे पर दुख का भाव था साथ ही टोटोटा कार की तकनीकी खामी के लिए अकीयो ने निजी जिम्मेदारी स्वीकार की और सारी दुनिया से अपनी कार को वापस लेने का फैसला भी किया। उसने टोयोटा के डिजायन की गड़बड़ी की स्वयं जिम्मेदारी ली और इसे अमेरिकी कांग्रेस के सामने भी जाकर स्वीकार करने का वचन दिया। ये सारे लक्षण अकीयो की ईमानदार अभिव्यक्ति का नमूना हैं। टाइगर वुड को अपने व्यवहार से यह प्रमाणित करना होगा कि वह सचमुच में  अपने द्वारा किए अपराध पर शर्मिंदा है। इस दिशा में पहला कदम है गोल्फ खेल का त्याग।
टीवी पर क्षमापत्र 14 मिनट तक पढ़ा गया। दर्शकों में चुनिंदा 40 लोग थे, जिनमें वुड की मॉ भी थी, वुड ने अपने व्यवहार को ‘सेल्फिश’ और ‘फुलिश’ की संज्ञा दी है, जो गलत है। यह सामाजिक अपराध है। सामाजिक अपराध का प्रक्षालन सिर्फ समाजसेवा और गोल्फ का परित्याग है। सैलीबरेटी की बजाय सामान्यजन की तरह रहना ही बौद्धधर्म का संदेश है। बौद्ध धर्म का दूसरा संदेश यह है कि पाप या अपराध के लिए सार्वजनिक माफी की नहीं सार्वजनिक व्यवहार बदलने की जरुरत है। क्या टाइगर वुड ऐसा कर पाएंगे ?
     




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