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मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

नवजागरण और शूद्रों की मुक्ति के सवाल


          भारतीय नवजागरण पर जब भी बहस होती है तो दलितों या शूद्रों की मुक्ति के सवालों पर बहस नहीं होती,यह मान लिया गया कि दलितों की मुक्ति का आरंभ बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के आने के बाद होता है। ज्योतिबा फुले दलित मुक्ति के मिशन की नींव रखते हैं,लेकिन इस पर पूरा शास्त्र बाबासाहेब ने ही बनाया।
     दलित मुक्ति का सवाल जहां एक ओर दलितों की मुक्ति से जुड़ा है वहीं दूसरी ओर यह सवाल फुले-आम्बेडकर के सत्ता विमर्श से जुड़ा है। इन दोनों को अंग्रेजों के शासन से कोई गंभीर शिकायत नहीं है। ये दोनों ही तत्कालीन सत्ता से हमदर्दी रखते हैं। सवाल यह है क्या दलितों की मुक्ति पूंजीवाद में संभव है क्या पूंजीवादी सत्ता विमर्श में वैकल्पिक नजरिए से शामिल हुए बगैर दलित के लिए संघर्ष करना संभव है क्या पूंजीवादी सत्ता विमर्श दलितों को मुक्ति देता है
    नवजागरण बुर्जुआ संवृत्ति है।यह आधुनिकता के प्रकल्प का अंग है,इसे क्रांतिकारी प्रकल्प नहीं समझना चाहिए।यदि नवजागरण के परिप्रेक्ष्य में ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर के नजरिए को देखेंगे तो यह मूलतःआधुनिकतावादी आंदोलन है।इसी तरह बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर का समग्र नजरिया बुर्जुआ है और उसकी धुरी है आधुनिकता।पुराने किस्म के दलित की बजाय आधुनिक दलित की खोज और निर्माण उसका केन्द्रीय लक्ष्य है।यह नजरिया दलित को पुराने सामंती शोषण से मुक्त तो करता है लेकिन दलितों में शोषणमुक्त समाज का नजरिया नहीं बनाता।पूंजीवाद से मुक्ति का सपना पैदा नहीं करता।
यही वजह है 20वीं शताब्दी में बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर ही दलित मुक्ति के केन्द्र में है।इस धारणा ने कई स्टीरियोटाइप सरलीकरणों को जन्म दिया है।पहला,दलित मुक्ति का एकमात्र रास्ता वही है जिसको आम्बेडकर व्यक्त करते हैं।दूसरा,शिक्षा से जातिप्रथा नष्ट हो जाती है,तीसरा,दलितमुक्ति के लिए आरक्षण जरूरी है,चौथा,पूंजीवाद के विकास के साथ जातिप्रथा स्वतः नष्ट हो जाएगी,जाति शोषण नष्ट हो जाएगा।पांचवां,महानगरीय जीवन जातिप्रथा खत्म कर देता है। ये पांचों चीजें आधुनिकता के प्रकल्प का हिस्सा है। इन सरलीकरणों के पीछे आस्थाएं ही प्रमुख रूप से काम करती रही हैं।आस्था केन्द्रित होने के कारण नवजागरण और दलित पर बहुत कुछ ऐसा लिखा गया है जिसका यथार्थ से कम संबंध है,इसमें इच्छित लक्ष्यों और इच्छित तर्कों के आधार पर इच्छित सामाजिक यथार्थ की सृष्टि करने में भारत के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग सफल रहा है।
     नवजागरण और शूद्र के अन्तस्संबंध के प्रसंग में सबसे पहली बात यह कि नवजागरण वस्तुतःदलितमुक्ति का प्रकल्प नहीं है।बल्कि यों कहें तो सही होगा कि नवजागरण के दलित मुक्ति के बुनियादी लक्ष्यों से  गहरे अंतर्विरोध हैं।
   जाति कहां है -
        जाति के समान कोई चीज नहीं है जिसके साथ जाति का विनिमय नहीं हो सके। जाति का किसी भी चीज से विनिमय संभव नहीं है,यह व्यवस्था या सिस्टम है,इसको आप पूरा छोड़ें तब ही जाति से मुक्ति संभव है,जाति में से किसी अंश को रख लो,अथवा उस जाति का वह गुण ले लो या निचली जाति से ऊँची जाति में या अ-सवर्ण से सवर्ण जाति में चले जाने से जाति खत्म होने वाली नहीं है।अंशों में विनिमय के जरिए जाति खत्म नहीं होगी।जाति तो जाति है उसका विनिमय नहीं कर सकते।वह बेहद ठोस भौतिक शक्ति है, उसके साथ भेदभावभरी व्यवस्था के साथ विनिमय संभव नहीं है।जाति ठोस है,उसके विचार चंचल हैं,इसलिए जब भी जाति बदलती दिखती है तो असल में जाति नहीं बदलती उसके विचार बदलते हैं,जाति तो जस की तस बनी रहती है।विचारों के विनिमय से जाति नहीं बदलती।विचार बदलते हैं,जाति असल में शोषण का एक रूप है,जो बड़ी बारीकी से हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक जीवन में व्याप्त हो गयी है।हम जब जाति सुधार की बातें करते हैं तो अधिक से अधिक जाति के बुरे विचार को निकाल फेंकने की बातें करते हैं।इससे जाति नष्ट नहीं होती।

    जाति कोई सामाजिक समूह नहीं है,सामाजिक समूह के रूप में जाति को देखेंगे तो सही निष्कर्ष नहीं निकलेंगे।जाति को सामाजिक समूह के रूप में देखेंगे तो हमें अधिक से अधिक उसके ऊपरी ढाँचे को बदलने की इच्छा पैदा होगी,हम ऊपरी ढाँचे को बदल देंगे,लेकिन इससे जाति की आत्मा नहीं बदलेगी।छूआछूत,ऊँच-नीच,निचली जाति,ऊँची जाति, मनु व्यवस्था या अन्य व्यवस्थाएं या संवैधानिक व्यवस्थाएं अपने आपमें जाति को खत्म नहीं कर सकतीं,क्योंकि सभी किस्म के संवैधानिक उपाय जाति के ऊपरी कलेवर को बदलते हैं,उसकी आत्मा को स्पर्श नहीं करते।असल में जाति की आत्मा विनिमयरहित है।जाति के एक विचार को खत्म करेंगे,तो तुरंत दूसरा विचार उसकी हिमायत में उठ खड़ा होगा।हम करीब से उन जातियों को देखें जहां पर जाति का ऊपरी तौर पर खात्मा हो गया है लेकिन उससे समस्या खत्म नहीं हुई है। मसलन्,पश्चिम बंगाल में जातिप्रथा खत्म हो गयी है लेकिन उसकी जगह शोषित-शोषक के नए संबंधों ने जन्म ले लिया है,उन संबंधों को सहज ही घर-घर जाकर देख सकते हैं। कहने का आशय यह कि जाति तो शोषण का पुराना आदिम रूप है,वह हम सबकी आदतों,संस्कारों,चाल-चलन,रीति-रिवाज आदि में घुस आया है,वह सिर्फ समुदाय के रूप में ही मौजूद नहीं है बल्कि उसने दृष्टिकोण में जगह बना ली है।यही वजह है जाति के समान और कोई जगत नहीं है।
      जाति में रहने और जाति के मार्ग पर चलने का अर्थ है कि इसमें पैर जमाकर चल ही नहीं सकते, यह बेहद रपटन भरा मार्ग है।पुराने समाज में जाति के समान कोई चीज मौजूद नहीं है, आज भी जाति के समान कोई चीज नहीं है,जाति से किसी चीज की तुलना नहीं कर सकते,यह अतुलनीय है।इसने जीवन के हर क्षेत्र को अपने दायरे में शामिल कर लिया है।जाति के लिए समाज का हर आईना छोटा है,जाति हमारे विजन में इस कदर घर किए हुए है कि हम उसके बिना कोई चीज देख ही नहीं सकते।जाने-अनजाने जाति हमारे नजरिए  को प्रभावित करती है,वहां से हमारे ज़ेहन में शोषण के लक्षण व्यंजित होते रहते हैं।
    जाति को हमें सिस्टम की तरह देखना चाहिए।सिस्टम की तरह देखेंगे तो इसके आर्थिक आधार को भी देख पाएंगे।जाति कोई मानसिक अवस्था या विचार मात्र नहीं है।कहने के लिए जाति के ही आधार पर हर तरह का कार्य-व्यापार चलता रहा है।लेकिन जाति को आज इसके जरिए किसी चीज का विनिमय नहीं कर सकते।जाति के इस दौर में तीन और क्षेत्र सामने आए हैं वह है राजनीति,न्याय और साहित्य।इन तीनों क्षेत्रों में जाति के आधार पर देखने,विनिमय करने की बड़े पैमाने पर कोशिशें हो रही हैं लेकिन मुश्किल यह है जाति को आधार बनाकर ज्योंही संप्रेषण करेंगे,संप्रेषण खत्म हो जाएगा।इसका प्रधान कारण यही है कि जाति को आधार बनाकर कोई बात नहीं की जा सकती, जाति की किसी से तुलना संभव नहीं है, किसी से विनिमय संभव नहीं है। क्योंकि जाति का जाति के बाहर कोई अर्थ नहीं है,जाति तब तक ही अर्थवान या प्रासंगिक है जब तक जाति के दायरे में रहकर विचार करते हैं। जाति की राजनीति तब तक चमकदार नजर आती है जब तक वह जाति केन्द्रित रहे,उसी तरह दलित साहित्य की केटेगरी तब तक प्रासंगिक है जब तक दलित के लेखन को जाति के आधार पर देखा जाय,उसके बाहर इनकी प्रासंगिकता नहीं है।जाति की इस सीमा को हमेशा ध्यान में रखें।
    जाति की दूसरी बड़ी विशेषता है कि वह अपने में हर चीज को समाहित करने की क्षमता रखती है।जो लोग जाति के आधार पर सोचते हैं वे हर चीज को जाति के आधार पर ही देखते हैं,चाहे राजनीति हो या न्याय हो या साहित्य या कला रूप हों,इन सब पर बातें करते समय हमेशा हर चीज को खींचकर जाति में समाहित कर लेते हैं।जब वे किसी चीज को जाति के आधार पर देखते हैं तो फिर उसमें से इच्छित अंतर्वस्तु भी निकाल लेते हैं। वे इस इच्छित अंतर्वस्तु को यथार्थ में रूपान्तरित नहीं कर पाते। उसके भिन्न अर्थ को देख नहीं पाते।
      जाति की तीसरी सबसे बड़ी विशेषता है उसके अंदर केटेगरी या कोटियों की अनिश्चितता है।मसलन्,जो जाति यूपी में आरक्षित केटेगरी में आती है,जरूरी नहीं है वह बंगाल या अन्य जगह आरक्षित केटेगरी में हो। यही वजह है जाति का भिन्न –भिन्न इलाकों या समुदायों में अलग ढ़ंग का विकास और चरित्र नजर आता है।इससे जाति की काल्पनिकता या विभ्रम सामने आते हैं।
     जाति को केन्द्र में रखकर जितना भी विमर्श निर्मित हुआ है उसके केन्द्र में प्रतीकों की भाषा है। इस भाषा ने जाति को वस्तुओं के संसार में एक वस्तु बना दिया है।फलतःवह अनुमान और अनुकरण पर चलती रही है,और आज भी चल रही है।उसके काल्पनिक और वास्तविक रूप में भेद करना असंभव है। मसलन्, एक ओर शूद्र अतिगरीब मिलेंगे तो दूसरी ओर आईएएस भी मिलेंगे,आप तय नहीं कर सकते कि यथार्थ में शूद्र क्या है सच यह है जाति पर अधिकांश बहस अनुमानाधारित है,जबकि दावे किए जाते हैं कि वह यथार्थ पर आधारित है।दिक्कत तब आती है  जब आप एक ही साथ अतिगरीब शूद्र और आईएएस शूद्र को सामने रखकर देखते हैं।इससे हमारे अनुमान में निहित अ-व्यवस्था का उद्घाटन होता है।
   ज्योंही यथार्थ और विवेकवाद इन दो तत्वों का जाति के मूल्यांकन के प्रसंग में इस्तेमाल करते हैं तो जाति हमें ठोस रूप में स्थिर नजर आने लगती है, इस तरह दिखने लगती है कि उसका किसी भी चीज से विनिमय संभव नहीं है। जाति के सिद्धांत के दायरे में तो जाति प्रासंगिक लगती है लेकिन ज्योंही जाति के सिद्धांतों के बाहर निकलोगे तो जाति अ-प्रासंगिक नजर आने लगेगी।
   सवाल यह है जाति पुराना सिस्टम है,नया आधुनिक सिस्टम पूंजीवाद है।क्या जाति का पूंजीवाद के साथ विनिमय संभव है क्या पूंजीवाद में जातियों का लोप हो जाएगा जी नहीं,पूंजीवाद में जातियों का लोप नहीं हो सकता।उल्टे जातियों के विकास की अनंत संभावनाओं के द्वार पूंजीवाद ने खोले हैं। नवजागरण आने के बाद जातियों की संख्या बढ़ी है, घटी नहीं है।जातियों के नाम पर सुख,सुविधा,कानून आदि सबमें इजाफा हुआ है,जातियों का विभिन्न नई जातियों में नाम परिवर्तन हुआ है लेकिन जाति का लोप नहीं हुआ है। जातियों के लिए नई परिधियां तय कर ली गयी हैं,नए आधार तय कर लिए गए हैं।इससे जाति के सिस्टम में अनिश्चितता और बढ़ी है।मसलन्, आज से सौ साल पहले व्यक्ति को जिस जाति के सदस्य के रूप में जानते थे वह आज उस जाति से निकलकर भिन्न जाति में शामिल हो चुका है।ऐतिहासिक तौर पर जाति के नाम का बदलना बताता है जाति में नाम बदलने,नियम बदलने,स्वयं ही अपने को नष्ट करके नए रूप में पेश करने की विलक्षण क्षमता है।इसके कारण जाति अपने को बार-बार प्रासंगिक और नए मूल्यबोध से जोड़ने में सफल हो जाती है।फलतः वह अपने को नष्ट करने में असफल रहती है।इस नजरिए से देखें तो पाएंगे कि जाति हर बार नया विभ्रम और अनिश्चितता  निर्मित करती है।इसका अर्थ यह भी है जाति खत्म होती नजर नहीं आती बल्कि आर्थिक तौर पर और भी ज्यादा ताकतवर नजर आती है। समग्रता में देखें तो जाति के लिए मूल्य और कानून अपवाद हैं ,विभ्रम यानी इल्युजन बुनियादी नियम है,फलतः जाति हमेशा समाज में बनी रहती है।मसलन्, आप जाति के नाम पर सब कुछ पा सकते हैं ,सब कुछ पाने के बाद भी जाति से आप मुक्त नहीं होते तो हम यही कहेंगे कि जाति के साथ किसी भी चीज का विनिमय संभव नहीं है। मसलन्, जाति के नाम पर शिक्षा,रोजगार,सामाजिक हैसियत आदि सब मिल जाता है,इसके बाद भी जाति नहीं छूटती।इसका अर्थ यह भी है कि जाति सबसे ज्यादा सुव्यवस्थित सिस्टम है जिसे आप नियम, कानून, रोजगार,शिक्षा आदि प्रदान करके भी खत्म नहीं कर सकते।बल्कि उलटे इनसे जाति के और भी पुख्ता हो जाने की संभावनाएं पैदा हो जाती हैं।
   जाति पर बहस के दौरान असमानता,कर्ज और उत्पीड़न इन तीन कोटियों में जाति विमर्श सामने आया है।इन तीनों तत्वों या कोटियों को यदि जाति के परिप्रेक्ष्य में पेश किया जाएगा तो यह तय है ये तीनों तत्व लौट-फिरकर वापस केन्द्र में आ जाएंगे।क्योंकि इन तीनों में अनुकरण पैदा करने की विलक्षण क्षमता है।ये अंतहीन चक्राकार रूप में घूमते रहते हैं।कुछ साल पहले केन्द्र सरकार ने किसानों के कर्ज माफ कर दिए,लग रहा था अब किसान कर्ज मुक्त हो गया है,लेकिन कुछ ही सालों में किसान फिर कर्जगीर हो गया।इन किसानों में दलित जातियों का बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है।इसी तरह दलित के उत्पीड़न को लेकर जितने भी सख्त कानून बना लो,उत्पीड़न पुनःलौटकर आ जाता है। तमाम कानून बनाने के बावजूद दलितों का उत्पीडन खत्म नहीं हुआ है,यही हाल औरतों के उत्पीड़न का है।असल में असमानता,कर्ज और उत्पीड़न ये तीन कोटियां ऐसी हैं जो तमाम कानून बनाए जाने के बाद भी बनी रहती हैं, इनके जरिए यथार्थ के साथ विनिमय नहीं कर सकते। इनके जरिए यथार्थ नहीं बदल सकते,इनके जरिए कोई नई चीज पैदा नहीं कर सकते।

     असमानता,कर्ज और उत्पीड़न इन तीनों के आधार पर जब भी कोई परिप्रेक्ष्य खड़ा किया जाएगा वह अंततःअसफल होगा।मसलन्, यह माना गया कि भूमिहीनों को जमीन बांट देने से गांवों में असमानता घटेगी,भूमिहीन किसान ताकतवर बनेगा,पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर भूमि सुधार कार्यक्रम को लागू किया गया,लेकिन दो दशक के बाद पता चला कि भूमिहीन किसान जमीन के पाने के बावजूद असमानता,अभाव,कर्ज के जंजाल से मुक्त नहीं हो पाया,उसकी पामाली घटने की बजाय बढ़ गयी।उसे जिन चीजों से बचाने के लिए जमीन दी गयी थी उन चीजों से जमीन उसकी रक्षा नहीं कर पायी।

रविवार, 23 अप्रैल 2017

आम्बेडकर और हिन्दूधर्म


       हाल ही में आम्बेडकर के बहाने आरएसएस ने जो प्रचार किया उसमें आम्बेडकर के प्रति आस्था और विश्वास कम और वैचारिक अपहरण का भाव ज्यादा था।आरएसएस और आम्बेडकर के नजरिए में जमीन-आसमान का अंतर ही नहीं बल्कि शत्रुभाव है।दोंनों के लक्ष्य ,विचारधारा और हित अलग हैं। आम्बेडकर का व्यक्तित्व स्वाधीनता संग्राम और परिवर्तनकामी विचारों से बना था,जबकि संघ इस आंदोलन के बाहर था,उसे परिवर्तनकामी विचारों से नफरत है।वह अंग्रेजों की दलाली कर रहा था।
   आम्बेडकर धर्मनिरपेक्ष थे,संघ को धर्मनिरपेक्षता से नफरत है।आम्बेडकर हर स्तर पर समानता के हिमायती थे,संघ हर स्तर पर भेदभाव का पक्षधर है। आम्बेडकर दलितों की मुक्ति चाहते थे,संघ दलितों को दलित बनाए रखना चाहता है।आम्बेडकर को भगवान नहीं इंसान से प्रेम था,संघ को इंसान नहीं भगवान से प्रेम है।आम्बेडकर धर्मनिरपेक्ष भारत चाहते थे,संघ हिन्दू भारत चाहता है।इतने व्यापक भेद के बाद भी संघ के लोग आम्बेडकर को माला इसलिए पहनाते हैं जिससे आम्बेडकर प्रेम का ढोंग हना रहे।संघ में ढोंग और नाटक करने की विलक्षण क्षमता है।यह क्षमता इसे हिंदू धर्म से विरासत में मिली है।हिंदू माने नकली और अवसरवादी भाव में जीने वाला।


शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

मनुष्य के दस गुण और आम्बेडकर -

"(1) पन्न, (2) शील, (3) नेक्खम, (4) दान, (5) वीर्य, (6) खांति (शांति) , (7) सच्च, (8) अधित्थान, (9) मेत्त और (10) उपेक्खा।

पन्न या बुद्धि वह प्रकाश है, जो अविद्या, मोह या अज्ञान के अंधकार को हटाता है। पन्न के लिए यह अपेक्षित है कि व्यक्ति अपने से अधिक बुद्धिमान व्यक्ति से पूछकर अपनी सभी शंकाओं का समाधान कर ले, बुद्धिमान लोगों से संबंध रखे और विभिन्न कलाओं और विज्ञान का अर्जन करे, जो उसकी बुद्धि विकसित होने मे सहायक हों। शील नैतिक मनोवृत्ति अर्थात बुरा न करने और अच्छा करने की मनोवृत्ति, गलत काम करने पर लज्जित होना है। दंड के भय से बुरा काम न करना शील है। शील का अर्थ है, गलत काम करने का भय। नेक्खम संसार के सुखों का परित्याग है।


दान का अर्थ अपनी संपत्ति, रक्त तथा अंग का उसके बदले में किसी चीज की आशा किए बिना, दूसरों के हित व भलाई के लिए अपने जीवन तक को भी उत्सर्ग करना है।

वीर्य का अर्थ है, सम्यक प्रयास। आपने जो कार्य करने का निश्चय कर लिया है, उसे पूरी शक्ति से कभी भी पीछे मुड़कर देखे बिना करना है।

खांति (शांति) का अभिप्राय सहिष्णुता है। इसका सार है कि घृणा का मुकाबला घृणा से नहीं करना चाहिए, क्योंकि घृणा, घृणा से शांत नहीं होती। इसे केवल सहिष्णुता द्वारा ही शांत किया जाता है।

सच्च (सत्य) सच्चाई है। बुद्ध बनने का आकांक्षी कभी भी झूठ नहीं बोलता। उसका वचन सत्य होता है। सत्य के अलावा कुछ नहीं होता।

अधित्थान अपने लक्ष्य तक पहुंचने के दृढ़ संकल्प को कहते हैं।

मेत्त (मैत्री) सभी प्राणियों के प्रति सहानुभूति की भावना है, चाहे कोई शत्रु हो या मित्र, पशु हो या मनुष्य, सभी के प्रति होती है।

उपेक्खा अनासक्ति है, जो उदासीनता से भिन्न होती है। यह मन की वह अवस्था है, जिसमें न तो किसी वस्तु के प्रति रुचि होती है, परिणाम से विचलित व अनुत्तेजित हुए बिना उसकी खोज व प्राप्ति में लगे रहना ही उपेक्खा है।

प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह इन गुणों को अपनी पूर्ण सामर्थ्य के साथ अपने व्यवहार में अपनाए। इन पर आचरण करे। यही कारण है कि इन्हें परिमिता (पूर्णता की स्थिति) कहा जाता है। यही वह सिद्धांत है, जिसे बुद्ध ने संसार में दुःख तथा क्लेश की समाप्ति के लिए अपने बोध व ज्ञान के परिणामस्वरूप प्रतिपादित किया है।"

(बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स,निबंध से)

दस मुख्य कठिनाईयां और आम्बेडकर-

       "प्रथम बाधा अहम् का मोह है, जब तक व्यक्ति पूर्णतया अपने अहम् में रहता है, प्रत्येक भड़कीली चीज का पीछा करता है, जिनके विषय में वह व्यर्थ ही यह सोचता है कि वे उसके हृदय की अभिलाषा की तृप्ति व संतुष्टि कर देंगी, तब तक उसको आर्य मार्ग नहीं मिलता। जब उसकी आंखें इस तथ्य को देखकर खुलती हैं कि वह इस असीम व अनंत का एक बहुत छोटा सा अंश है, तब वह यह अनुभूति करने लगता है कि उसका व्यक्तिगत अस्तित्व कितना नश्वर है, तभी वह इस संकीर्ण मार्ग में प्रवेश कर सकता है।


दूसरी बाधा संदेह तथा अनिर्णय की स्थिति है। जब मनुष्य अस्तित्व के महान रहस्य, व्यक्तित्व की नश्वरता को देखता है तो उसके अपने कार्य में भी संदेह तथा अनिर्णय की स्थिति की संभावना होती है, अमुक कार्य किया जाए या न किया जाए, फिर भी मेरा व्यक्तित्व अस्थाई नश्वर है, ऐसी कोई चीज प्रश्न क्यों बन जाती है, जो उसे अनिर्णायक, संदेही या निष्क्रिय बना देती है, परंतु वह चीज जीवन मंर काम नहीं आएगी। उसे अपने शिक्षक का अनुसरण करने, सत्य को स्वीकार करने तथा संघर्ष की शुरुआत करने का निश्चय कर लेना चाहिए अन्यथा उसे और आगे कुछ नहीं मिलेगा।

तीसरी बाधा संस्कारों तथा धर्मानुष्ठानों की क्षमता पर निर्भर करती है। किसी भी उत्तम संकल्प से वह चाहे जितना दृढ़ हो, किसी चीज की प्राप्ति उस समय तक नहीं होगी, जब तक मनुष्य कर्मकांड से छुटकारा नहीं पाएगा, जब तक वह इस विश्वास से मुक्त नहीं होगा कि कोई बाह्य कार्य, पुरोहिती शक्ति तथा पवित्र धर्मानुष्ठान से उसे हर प्रकार की सहायता मिल सकती है। जब मनुष्य इस बाधा पर काबू पा लेता है, केवल तभी यह कहा जा सकता है कि वह ठीक धारा में आ गया है और अब देर-सवेर विजय प्राप्त कर सकता है।

चौथी बाधा शारीरिक वासनाएं हैं। पांचवीं बाधा दूसरे व्यक्तियों के प्रति द्वेष व वैमनस्य की भावना है छठी भौतिक वस्तुओं से मुक्त भावी जीवन के प्रति इच्छा का दमन है और सातवीं भौतिकता से मुक्त संसार में भावी जीवन के प्रति इच्छा का होना है। आठवी बाधा अभिमान है और नौवीं दंभ है। ये वे कमजोरियां हैं, जिन पर मनुष्य के लिए विजय प्राप्त करना बहुत कठिन है और जिनके लिए विशेष रूप से श्रेष्ठ व्यक्ति उत्तरदायी हैं। यह उन लोगों के लिए निंदा की बात है, जो अपने आप से कम योग्य तथा कम पवित्र हैं।दसवीं बाधा अज्ञानता है। यद्यपि अन्य सब कठिनाइयों व बाधाओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है, फिर भी यह बनी ही रहेगी, बुद्धिमान तथा अच्छे व्यक्ति के शरीर में कांटे के समान चुभती रहेगी। यह मनुष्य की अंतिम तथा सबसे बड़ी शत्रु है।"(बुद्ध अथवा मार्क्स,निबंध से) 

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- धर्म धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र


           बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर का प्रसिद्ध निबंध है ´बुद्ध और कार्ल मार्क्स´,इसमें आम्बेडकर ने बुद्ध के विचारों के बहाने धर्म की 25 सूत्रों में व्याख्या पेश की है। ये सूत्र अब तक विचार विमर्श के केन्द्र में नहीं आए हैं,इन सूत्रों पर वाद-विवाद-संवाद होना चाहिए।

ये 25 सूत्र हैं-´´1. मुक्त समाज के लिए धर्म आवश्यक है।2. प्रत्येक धर्म अंगीकार करने योग्य नहीं होता।3. धर्म का संबंध जीवन के तथ्यों व वास्तविकताओं से होना चाहिए, ईश्वर या परमात्मा या स्वर्ग या पृथ्वी के संबंध में सिद्धांतों तथा अनुमान मात्र निराधार कल्पना से नहीं होना चाहिए।4. ईश्वर को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।5. आत्मा की मुक्ति या मोक्ष को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।6. पशुबलि को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।7. वास्तविक धर्म का वास मनुष्य के हृदय में होता है, शास्त्रों में नहीं।8. धर्म के केंद्र मनुष्य तथा नैतिकता होने चाहिए। यदि नहीं, तो धर्म एक क्रूर अंधविश्वास है।9. नैतिकता के लिए जीवन का आदर्श होना ही पर्याप्त नहीं है। चूंकि ईश्वर नहीं है, अतः इसे जीवन का नियम या कानून होना चाहिए।10. धर्म का कार्य विश्व का पुनर्निर्माण करना तथा उसे प्रसन्न रखना है, उसकी उत्पत्ति या उसके अंत की व्याख्या करना नहीं।11. कि संसार में दुःख स्वार्थों के टकराव के कारण होता है और इसके समाधान का एकमात्र तरीका अष्टांग मार्ग का अनुसरण करना है।12. कि संपत्ति के निजी स्वामित्व से अधिकार व शक्ति एक वर्ग के हाथ में आ जाती है और दूसरे वर्ग को दुःख मिलता है।13. कि समाज के हित के लिए यह आवश्यक है कि इस दुःख का निदान इसके कारण का निरोध करके किया जाए।14. सभी मानव प्राणी समान हैं।15. मनुष्य का मापदंड उसका गुण होता है, जन्म नहीं।16. जो चीज महत्त्वपूर्ण है, वह है उच्च आदर्श, न कि उच्च कुल में जन्म।17. सबके प्रति मैत्री का साहचर्य व भाईचारे का कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिए।18. प्रत्येक व्यक्ति को विद्या प्राप्त करने का अधिकार है। मनुष्य को जीवित रहने के लिए ज्ञान विद्या की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भोजन की।19. अच्छा आचारणविहीन ज्ञान खतरनाक होता है।20. कोई भी चीज भ्रमातीत व अचूक नहीं होती। कोई भी चीज सर्वदा बाध्यकारी नहीं होती। प्रत्येक वस्तु छानबीन तथा परीक्षा के अध्यधीन होती है।21. कोई वस्तु सुनिश्चित तथा अंतिम नहीं होती।22. प्रत्येक वस्तु कारण-कार्य संबंध के नियम के अधीन होती है।23. कोई भी वस्तु स्थाई या सनातन नहीं है। प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील होती है। सदैव वस्तुओं में होने का क्रम चलता रहता है।24. युद्ध यदि सत्य तथा न्याय के लिए न हो, तो वह अनुचित है।25. पराजित के प्रति विजेता के कर्तव्य होते हैं।´´

यानी हर धर्म स्वीकार करने योग्य नहीं होता।धर्म को चुनते समय क्या देखें यह आम्बेडकर ने उपरोक्त 25 सूत्रों में रेखांकित किया है।धर्म कोई बनी-बनायी व्यवस्था नहीं है,बल्कि उसे हर बार नए सिरे से अर्जित करना पड़ता है।धर्म को अर्जित करने के लिए धार्मिक होने की जरूरत नहीं है,बल्कि धर्म को देखने का वैज्ञानिक नजरिया अर्जित करने की जरूरत है। आम्बेडकर ने धर्म के जिन 25सूत्रों का जिक्र किया है उनमें धर्म को शाश्वत न मानने वाली बात बेहद रोचक है।धर्म के जितने भी रूप प्रचलन में हैं वे धर्म को शाश्वत मानकर चलते हैं।जबकि धर्म शाश्वत नहीं बल्कि परिवर्तनशील है।धर्म को परिवर्तनशील मानना अपने आपमें भौतिक जगत की सत्ता को महत्व देना है। धर्म का प्रमुख काम है मनुष्य को प्रसन्न रखना और स्वतंत्र रखना।जो धर्म यह काम करे वह स्वीकार्य है जो यह काम न करे वह अस्वीकार्य है। इन दिनों धर्म के नाम पर प्रतिस्पर्धा और घृणा का जमकर प्रचार हो रहा है।आम्बेडकर ने धर्म की इस भूमिका का निषेध किया है और रेखांकित किया है धर्म का मुख्य कार्य है मैत्री स्थापित करना।

धर्म पूजा या उपासना की चीज नहीं है बल्कि आचरण की चीज है।जो लोग धर्म को पूजा-उपासना की चीज मानते हैं उनके जीवन में धर्म की कोई भूमिका नहीं होती,वे धर्म को प्रचार प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करते हैं।धर्म , प्रचार की नहीं ,आचरण की चीज है।धर्म आचरण में मिलता है।आचरण में ढालने का अर्थ है कि धर्म का कायाकल्प करना।



यह सवाल भी उठा है धर्म के केन्द्र में कौन है ॽ इन दिनों धर्म के केन्द्र में उपदेश हैं,राजनीति है,हिंसा है,अंधविश्वास हैं, मुनाफेखोरी है,संपत्ति संचय करने की प्रवृत्ति है,इन सभी चीजों का धर्म से कोई संबंध नहीं है। धर्म के केन्द्र में मनुष्य को रहना चाहिए।मनुष्य को केन्द्र में रखे बिना धर्म बेहद खतरनाक भूमिका अदा करता है।धर्म के बर्बर होने के चांस बढ़ जाते हैं।धर्मनिरपेक्षता की भी यही मांग है कि धर्म के केन्द्र में मनुष्य को रखा जाय।धर्म को मानवीय रूप दिया जाय। धर्म का ईश्वर या उपासना से कोई संबंध नहीं है।धर्म का मूलाधार तो मनुष्य है,लेकिन अधिकांश लोग धर्म का आधार ईश्वर को मानते हैं।ईश्वर दासता की मनोदशा में बांधता है, जबकि मनुष्य दासता की मनोदशा से मुक्त करता है।धर्म को मानो लेकिन मनुष्य को उसके केन्द्र में प्रतिष्ठित करो।ईश्वर को केन्द्र से अपदस्थ करो।धर्म के केन्द्र में ईश्वर का होना बंधन है।मानसिक गुलामी है।जबकि मनुष्य को धर्म के केन्द्र में रखेंगे तो धर्म की भूमिका और चरित्र बदल जाएगा,धर्म मुक्ति और स्वतंत्रता का रूप ग्रहण कर लेगा।

रविवार, 24 जनवरी 2016

मोहनमंडली का मोहनराग

          

    इन दिनों फेसबुक से लेकर मीडिया तक जिस तरह का हंगामा मोहनमंडली मचाए हुए है वह काबिलेगौर है।सारा नाटक सुभाषचन्द्र बोस के गोपनीय दस्तावेजों के सार्वजनिक किए जाने की आड़ में हो रहा है।इस समूचे प्रसंग को मोहनप्रसंग कहें तो अनुचित न होगा।मोहनमंडली जिस भाव और मंशा के साथ इतिहासनिर्माताओं को प्रदूषित करने के काम में लगी है उससे इतिहास में नए तथ्य और सूचनाएं कम जुड़ेंगे, इतिहास का विकृतिकरण ज्यादा होगा।क्योंकि इनकी पूरी मंशा इतिहास को विकृत करने और इतिहास के प्रति नफरत पैदा करने की है।भारत जैसे लोकतंत्र में साम्प्रदायिक ताकतें इतिहास के प्रति नफरत पैदा करके ही जिंदा रह सकती हैं।जबकि तालिबानी इलाके में इस तरह की ताकतें इतिहास का विध्वंस करती हैं।बाबरी मसजिद विध्वंस एक नमूना मात्र है,उनके पास भविष्य में विध्वंस करने वाली ऐतिहासिक इमारतों की लंबी सूची है।वे सिर्फ उचित माहौल की तलाश में हैं ,ज्योंही अनुकूल माहौल देखेंगे फिर से बाबरीयोजना कहीं पर भी लागू कर सकते हैं। इसका प्रधान कारण है उनका इतिहास के प्रति द्वेषभाव।इसलिए मोहनमंडली में इतिहासप्रेम खोजना चील के घोंसले में मांस का टुकड़ा खोजने के बराबर है।
इतिहास में नफरत पैदा करने के लिए जरूरी है कि पहले इतिहास निर्माता को मारो,हत्या करो।यह काम वे महात्मा गांधी की हत्या करके कर चुके हैं।उनके हत्यारे हाथों से जो बच गए हैं उनको ‘वे हमारे हैं वे हमारे हैं’ का राग अलाप करके मारने में लगे हैं।गांधीजी की हत्या के बाद उनको सबसे पहले दो लोग पसंद आए वे थे विवेकानन्द और भगतसिंह । इन दोनों ही विभूतियों के विचारों को लेकर मोडनमंडली ने जिस तरह का जहर युवाओं में भरा है उसकी कोई कल्पना ही नहीं कर सकता।
     बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मोहनमंडली के इतिहास विध्वंसक अभियान की राष्ट्रीय योजना में कई नए नाम नाम शिखर पर आए हैं इनमें महामना पंडित ,बल्लभभाई पटेल,मदनमोहन मालवीय,बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस प्रमुख हैं। मोडनमंडली की पूरी योजना यह है कि युवापीढ़ी को इन विभूतियों के सकारात्मक वैचारिक मूल्यों से दूर रखा जाए। इनको डिजिटल इमेज मात्र बनाकर पेश किया जाय।वे इन विभूतियों को अपने साम्प्रदायिक राजनीतिक षडयंत्रों और दैनंदिन घृणित धर्मनिरपेक्षताविरोधी वैचारिक अभियान के पैकेज में पेश कर रहे हैं।
    आज जब हम मोहनमंडली के वैचारिक प्रदूषण पर विचार करें तो यह बात ध्यान रखें कि बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद इस मंडली का बुनियादी लक्ष्य रहा है धर्मनिरपेक्ष तानेबाने को नष्ट करना।धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ युवाओं में नफरत के बीज बोना।इस काम में उन्हें कुछ हद तक सफलता भी मिली है,उनकी सफलता के पीछे कई कारण रहे हैं, पहला बड़ा कारण है भारत के कारपोरेट घरानों का हिन्दुत्वप्रेम। दूसरा बड़ा कारण है धर्मनिरपेक्षदलों,खासकर कांग्रेस  का धर्मनिरपेक्षता को लेकर ढ़ुलमुल रवैय्या।कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता को लेकर सख्त वैचारिक रवैय्या अपनाया होता तो आज धर्मनिरपेक्षता इस तरह कलंकित न होती।तीसरा बड़ा कारण मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियां ,जिनके कारण धर्मनिरपेक्ष माहौल कमजोर हुआ और उपभोक्तावाद पुख्ता बना।इन तीन कारणों ने बुनियादी तौर पर आमलोगों को धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से दूर लेजाने में बड़ी भूमिका अदा की है।मोहनमंडली ने बड़े कौशल के साथ इन तीनों कारणों का लाभ उठाया है।
       मोहनमंडली के टुईंया से लोग आए दिन धर्मनिरपेक्षता पर हमले करते रहते हैं,तमाम मीडिया लगातार धर्मनिरपेक्षता विरोधी मुहिम में बाबरी मसजिद विध्वंस के लिए चलाए आंदोलन के समय से सक्रिय है और उसने जितनी बड़ी कु-सेवा सेवा समाज  की है उसकी लोकतंत्र में मिसाल मिलनी असंभव है। धर्मनिरपेक्षताविरोधी मुहिम के कारण समाज में जहां एक ओर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज हुआ है वहीं दूसरी ओर वाम ताकतें कमजोर हुई हैं।वाम ताकतों ने कभी सोचा ही नहीं कि सामान्य धर्मनिरपेक्ष माहौल जब नष्ट होगा तो उन पर इसका किस तरह का नकारात्मक असर होगा।
     बाबरी मसजिद विध्वंस के समय वाम विचारधारा ने वैचारिक तौर पर जिस ऊर्जा का प्रदर्शन किया था उसको यदि कांग्रेस ने सही ढ़ंग से समझा होता तो देश का नक्शा कुछ और होता।लेकिन वोटबैंक राजनीति के चलते कांग्रेस ने नरम हिन्दुत्व का मार्ग पकड़ा और अंततःवे समूचा मैदान मोहनमंडली को खैरात में सौंपकर मैदान से भाग खड़े हुए।यूपी से कांग्रेस का साफ होना सामान्य घटना नहीं है।बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद कांग्रेस के साफ होने का अर्थ है धर्मनिरपेक्ष माहौल का कमजोर होना। मोहनमंडली के धर्मनिरपेक्षताविरोधी प्रचार अभियान को जब तक एकजुट होकर धर्मनिरपेक्ष ताकतें वोट से लेकर विचारधारा के विभिन्न क्षेत्रों तक चुनौती नहीं देतीं तब तक धर्मनिरपेक्षताविरोधी माहौल को तोड़ना बहुत मुश्किल है।
     इस प्रसंग में यह भी ध्यान रहे बसपा और सपा सिर्फ वोटबैंक के मामले में भाजपा को यूपी में पीट सकते हैं,वैचारिक प्रचार के मामले में ये दोनों दल बेहद कमजोर हैं,बाबरी विध्वंस के बाद राज्य में भाजपा हारती रही है लेकिन लोकसभा में लगातार अपनी ताकत में इजाफा करती रही है। भाजपा के वोटबैंक में यूपी में स्थानीय स्तर पर इजाफा भले ही नहीं हुआ, लेकिन संसद के वोट में इजाफा हुआ है,इससे भी बड़ी बात यह है आम लोगों के मन में धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ जहर भरने में मोहनमंडली सफल रही है।यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें हमें सुभाषचन्द्र बोस –आम्बेडकर आदि के प्रति मोहनराग के मर्म को उद्घाटित करने का काम करना चाहिए।

     उल्लेखनीय है मोहनमंडली में राष्ट्रीयनेताओं के प्रति वास्तव अर्थ में कोई श्रद्धा नहीं है। वह सिर्फ श्रद्धा का नाटक कर रहे हैं।मसलन्, सुभाषचन्द्र बोस को ही लें। आरएसएस ने कभी सुभाषचन्द्र बोस के जीते जी उनके विचारों और आदर्शों का समर्थन और स्वागत नहीं किया।यही दशा बाबासाहेब आम्बेडकर की थी। सवाल यह है जब ये दोनों नेता जिंदा थे तब आरएसएस के नेताओं को इनके गुण नजर क्यों नहीं आए ? अचानक बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद ही नजर क्यों आए ?भगतसिंह जब जिंदा थे तब उनके पक्ष में आरएसएस ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया ? क्यों आरएसएस लगातार स्वाधीनता संग्राम से भागता रहा,उसके साथ जुड़े तमाम नेता ब्रिटिश एजेंट का काम करते रहे ? आरएसएस ने ब्रिटिशदौर की भूमिका की आत्मालोचना तक नहीं की है।ऐसी स्थिति में उनके राजनीतिक लक्ष्य को समझने में भूल नहीं करनी चाहिए।

रविवार, 29 नवंबर 2015

आम्बेडकर ने दूसरी शादी क्यों की ?




भारत के संविधान की कच्ची रुपरेखा तैयार करने के बाद बाबासाहब भीमराव आम्बेडकर की तबियत अचानक खराब हो गयी,वे लंबे समय से विश्राम की जरुरत महसूस कर रहे थे लेकिन उनको विश्राम नहीं मिल रहा था।उस समय इलाज के लिए वे बम्बई आए।बुढ़ापे में अपनी देखभाल करने के लिए उनको साथी चाहिए था।जिस अस्पताल में वे इलाज के लिए गए वहां पर कुमारी शारदा कबीर नाम की  महिला काम कर रही थी। उनका व्यवहार और बातचीत आम्बेडकर को पसंद आए और उन्होंने आपसी सहमति से शादी का फैसला ले लिया।

आम्बेडकर को अगस्त1947 से उनको नींद आनी बंद हो गयी थी।एक पत्र में उन्होने लिखा कि उनको 15दिनों से नींद नहीं आ रही।उन पर किसी औषधि का असर नहीं हो रहा। उसी पीड़ा के दौरान उन्होंने सहयोगी के रुप में शारदा कबीर से दूसरी शादी का निर्णय लिय़ा था। अपने मित्र कमलाकांत और भाऊराव गायकवाड को पत्र लिखकर अपने फैसले से अवगत कराया।भाऊराव गायकवाड़ को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा “पहली पत्नी के निधन के उपरान्त पुनःविवाह न करने का मैंने निर्णय किया था। किन्तु अब दूसरा विवाह करने का मैंने निर्णय किया है।जो सुगृहिणी होकर वैद्यकशास्त्र में प्रवीण है,ऐसी पत्नी की मुझे जरुरत है।दलित समाज में ऐसी स्त्री मिलना असंभव होने से मैंने सारस्वत महिला को चुना है।” आम्बेडकर के इस फैसले से उनका एक मित्र परेशान था और उसने उनके बेटे यशवन्त और शारदा कबीर में झगड़ा लगाने की काफी कोशिश की। इस झगड़े के आगे बढ़ने के पहले ही आम्बेडकर ने 15अप्रैल1948 को विवाह करने का फैसला किया।उस समय उन्होंने बेटे को 80हजार रुपये कीमत का एक मकान और नकद 30हजार रुपये दिए।जिससे वह आराम से जीवनयापन कर सके।आम्बेडकर ने जब दूसरा विवाह किया तो वे दो दिन पहले ही 56साल पूरे करके 57वें वर्ष में दाखिल हुए थे.विवाह के उपलक्ष में दोपहर को प्रीतिभोज भी दिया गया।यह शादी दिल्ली के हार्डिज एवेन्यू स्थित उनके निवास पर सम्पन्न हुई।

आम्बेडकर की पत्नी निष्ठा -

  

   आम्बेडकर की पहली शादी के बारे में धनंजय कीर ने लिखा है “शादी के समय भीमराव की आयु सत्रह वर्ष की थी।लड़की की आयु नौ वर्ष की थी।लड़की का ससुराल का नाम रमाबाई रखा गया।लड़की उम्र में छोटी लेकिन स्वभाव से शांत और सुस्वभावी थी।वह गरीब लेकिन सदाचारी घराने की थी।वह अपने पिता की कनिष्ठ लड़की थी। उसके पिता का नाम भिकू धत्रे था।दाभोल के समीप स्थित वनंद गाँव का वह निवासी था। वह दाभोल बंदरगाह में कुली का काम करता था। लड़की के बचपन में ही माँ-बाप चल बसे थे। उसका और उसके भाई-बहनों का पालन-पोषण उनकी चाची और मामा ने किया था।” रमाबाई स्वभाव से सहृदय और कर्तव्यदक्ष थी।वे लंबे समय तक बीमार रहीं और लंबी बीमारी के बाद उनका 27मई1935 को निधन हो गया।
     धनंजय कीर ने लिखा है कि पत्नी के स्वास्थ्य में सुधार हो इसलिए बाबासाहब ने काफी प्रयास किए,लेकिन उनको कोई दवा नहीं लगी। “ वैवाहिक जीवन के प्रारंभिक समय में उन पर भुखमरी,शारीरिक कष्ट,दुःख और दरिद्रता की जो घटनाएं गुजरी थीं,उनका मुकाबला उन्होंने अपने जन्मजात मनोबल से किया”, “जीवन का अधिकतर समय उस साध्वी ने असह्य दरिद्रता ,पति की सुरक्षा के बारे में लगने वाली चिंता में व्यतीत किया था।इसके लिए उस देवी ने उपवास,तप,जप,और अनुष्ठान किए थे।शनिवार को तो वे पूरी तरह से निराहार रहती थीं।सिर्फ पानी और उड़द की दाल पर निर्वास कर वे ईश्वर की आराधना करती थीं।वे पूनम के दिन उपवास करती थीं।अपने पतिराज पर ईश्वर का वरदहस्त रहे,इसलिए वे हमेशा प्रार्थना करती रहती थीं।” रमाबाई की मृत्यु ने आम्बेडकर को अंदर तक दुखी किया। आम्बेडकर अपनी पत्नी के विचारों,धार्मिक भावनाओं और आस्थाओं को पूरा सम्मान देते थे। उनकी मृत्यु पर उन्होंने बाकायदा हिंदू पद्धति के अनुसार उनका अंतिम संस्कार करवाया।उनके बचपन के दोस्त थे शंभू मोरे ,वे महार उपाध्याय थे,उन्होंने हिन्दू रीति से अंतिम संस्कार कराया। पत्नी का अंतिम  संस्कार कराने के लिए बाबासाहब ने मुंडन कराया, भगवा कफनी पहनी । बाबासाहब अपनी पत्नी की मृत्यु से बेहद दुखी हुए थे और श्मशान से लौटकर घर पर एक सप्ताह तक फूट-फूटकर रोए थे।

   बाबासाहब ने पत्नी के मृत्यु से तकरीबन सात साल पहले “बहिष्कृत भारत” में लिखा, “प्रस्तुत लेखक जब विदेश में था,तब रात-दिन जिसने परिवार की देखभाल की और जिसे वह अब भी करनी पड़ती है तथा उसके स्वदेश आने पर उसकी विपन्न दशा में गोबर का बोझ खुद के माथे पर रखकर लाने का काम करने के लिए जिसने आगे पीछे नहीं देखा,उस अत्यंत ममत्व प्रधान ,सुशील,और पूज्य स्त्री के साथ दिन के 24 घंटों में से आधा घंटा भी वह बिता नहीं सका।” 

धर्मनिरपेक्षता,धर्म की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र


           
संसद में इन दिनों भीमराव आम्बेडकर के 125वें जन्मदिन के मौके पर दो दिवसीय बहस हो रही है, इस बहस ने संविधान के सवालों को नए सिरे उठा दिया है।खासकर “धर्मनिरपेक्षता” के सवाल को प्रमुख सवाल बनाकर खड़ा कर दिया है। सत्ताधारी भाजपा को “धर्मनिरपेक्षता” को लेकर पहले से आपत्तियां थीं,लेकिन पहले वे कभी-कभार बोलते थे, लेकिन मोदी सरकार बनने के बाद वे बार-बार “सेकुलर” शब्द पर आपत्ति कर रहे हैं,उसके खिलाफ घृणा अभियान चलाए हुए हैं, लोकसभा चुनाव में प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने सबसे घटिया ढ़ंग से “धर्मनिरपेक्षता” पर हमला किया।

हाल ही में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में भीमराव आम्बेडकर के 125वें जन्मदिन के मौके पर संसद में चल रही बहस में भी “धर्मनिरपेक्षता” को निशाना बनाया, प्रधानमंत्री तो” सेकुलर “ शब्द का इस्तेमाल ही नहीं करते। यही वह संदर्भ है जिसमें संविधान निर्माण के समय “धर्मनिरपेक्षता” पर चली बहस के कुछ पहलुओं का नए सिरे से मूल्यांकन करना बेहद जरुरी है।संविधान के प्रति प्रतिबद्धता जताने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है “देश में 'सेक्युलर' शब्द का सबसे ज़्यादा दुरुपयोग हुआ है और इसे बंद किया जाना चाहिए.” उन्होंने यह भी कहा कि 42वें संविधान संशोधन के जरिए आपातकाल में संविधान के प्रियम्बुल में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को जोड़ा गया। राजनाथ सिंह के बयान में कई मसले निहित हैं। इस प्रसंग में पहली बात यह कि 42वें संविधान संशोधन के सभी काले कानूनों को 44वें संविधान संशोधन के जरिए हमेशा के दफ्न कर दिया गया,उस समय जनता पार्टी की सरकार थी।वह आपातकाल विरोध की आंधी पर सवार होकर आई थी, लेकिन संविधान की प्रस्तावना से “धर्मनिरपेक्षता” और “समाजवाद” को नहीं निकाला गया। क्योंकि ये दोनों धारणाएं प्रासंगिक,संवैधानिक और वैध हैं। संविधान का क ख ग जानने वाला व्यक्ति भी इस तथ्य को जानता है,इसके बावजूद आरएसएस और उनकी भजनमंडली “धर्मनरपेक्षता” और “समाजवाद” के खिलाफ विषवमन करती रही है। लोकतंत्र,धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद हासिल करना हमारे संविधान का मूल लक्ष्य है। इस लक्ष्य से देश को विचलित नहीं किया जा सकता। अब थोड़ा उस पहलू पर विचार करें जो संघियों को परेशान किए हुए हैं।

“धर्मनिरपेक्षता” के प्रसंग में स्व. प्रोफेसर के.टी शाह का जिक्र करना जरुरी है। वे संविधान सभा परिषद के सदस्य थे. उन्होंने दो बार यह कोशिश की थी कि संविधान में “सेकुलर” पदबंध को बुनियादी अधिकारों में शामिल कर लिया जाय, लेकिन उनको सफलता नहीं। अपने दूसरे प्रयास में उनके द्वारा प्रस्तुत संशोधन पर संविधान परिषद में विचार जरुर हुआ, उनके द्वारा प्रस्तावित संशोधन था “ The state in India being secular shall have no concern with any religion ,creed or profession of faith.” शाह का मानना था कि देश में साम्प्रदायिक ताकतें सिर उठा रही हैं और उनके कारण देश को भयानक त्रासदी झेलनी पड़ रही है ऐसी स्थिति में संविधान में राज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के बारे में स्पष्ट ढ़ंग से जरुर लिखा जाना चाहिए. यह अफसोस की बात है कि कानूनमंत्री को उनका संशोधन मान्य नहीं था और उनका संविधान संशोधन परिषद ने खारिज कर दिया।

हाल ही में राजनाथ सिंह एंड कंपनी ने जो बहस आरंभ की है और उसके पहले से संघ के लोग सवाल खड़े करते रहे हैं कि वे भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य नहीं मानते। वे तो हिन्दूराष्ट्र मानते रहे हैं।असल में भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को परिभाषित करने के लिए जरुरी है कि संविधान में वर्णित धर्म की स्वतंत्रता, नागरिकता और राज्य और धर्म के अन्तस्संबंध से जुड़े सवालों नए सिरे से विचार करें।

हमारा संविधान व्यक्ति और समुदाय दोनों ही स्तरों पर धर्म की स्वतंत्रता को सुनिश्चित बनाता है। धर्म की साझा आस्थाओं, रीतियों, और अनुशासनों को स्वतंत्रता देता है। मजेदार बात है कि धर्म की स्वंत्रता मात्र व्यक्ति तक सीमित नहीं है,बल्कि “ सभी व्यक्तियों” तक इसका विस्तार किया गया है। यानी भारत में देश के बाहर से आकर रहने वालों को भी धर्म की स्वतंत्रता है। यही वजह है कि भारत के बाहर से आए ईसाई संत और मिशनरियों को भी धर्म की स्वतंत्रता का संवैधानिक लाभ मिलता है। धर्म की स्वतंत्रता का संविधान में प्रावधान असल में कांग्रेस के 1931 के करांची अधिवेशन में पारित मूलभूत अधिकार संबंधी प्रस्ताव से सीधे लिया गया है,यहां तक कि दोनों की भाषा में भी समानता है। उस समय अनेक हिन्दुत्व समर्थकों ने धर्म के प्रचार की स्वतंत्रता का यह कहकर विरोध किया था कि ईसाई मिशनरियों के द्वारा इसका दुरुपयोग हो सकता है।वे इसके बहाने धर्मान्तरण कर सकते हैं। उनके इन सब तर्कों को संविधान सभा ने नहीं माना।

धर्म की स्वतंत्रता में धर्मचेतना का प्रचार प्रसार शामिल है। लेकिन संविधान निर्माताओं ने इसमें एक राज्य का नियंत्रण भी लगाया ,मसलन्, यदि धर्म के प्रचार से कानून-व्यवस्था में बाधाएं खड़ी हों,नैतिक और स्वास्थ्य संबंधी गड़बड़ी पैदा हो तो धर्म के प्रचार को राज्य रोक सकता है।इसी क्रम में बताया गया कि धार्मिक प्रचार नियमन के दायरे में आता है।जबकि धर्मचेतना के बारे में राज्य को व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार संविधान नहीं देता। इस प्रसंग में राज्य की भूमिका सामाजिक जीवन को सामान्य बनाए रखने की है। लेकिन धर्मचेतना के बारे में व्यक्ति के अधिकार एकदम सुरक्षित माने गए हैं,उसमें राज्य हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसी तरह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 295-98 में धर्म संबंधी अनेक अपराधों का जिक्र किया गया है ।

संविधान के प्रसंग में यह सवाल भी उठा कि “धर्म” क्या है ? इसे कौन परिभाषित करेगा ? संविधान के अनुच्छेद 25(1) में इसे परिभाषित किया गया है । सवाल यह है धर्म को व्यक्ति,धार्मिक संस्था और राज्य कौन परिभाषित करेगा ? इस धारा के प्रसंग में दर्जनों अदालती फैसले आ चुके हैं और न्यायालय संविधान सम्मत निर्देशों के पालन पर अनेकबार राजसत्ता को निर्देश दे चुका है। न्यायालयों ने आम्बेडकर की धारणाओं में भी संशोधन किए हैं। आम्बेडकर ने पर्सनल लॉ के प्रसंग में संविधान सभा में बहस में बोलते हुए कहा था कि हमारे देश में धर्म की अवधारणा जन्म से मृत्यु पर्यन्त फैली हुई है।यहां कोई चीज ऐसी नहीं है जिसे धर्म न कहते हों,हमें यदि पर्सनल लॉ की रक्षा करनी है तो सामाजिक विषयों पर इस गतिरोध से निकलना होगा।यहां संस्कार और आस्था धर्म में गिने जाते हैं,अतः धार्मिक संस्कार-उत्सव तक तो यह ठीक है, लेकिन उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार आदि में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्यापक अधिकार नहीं दिए जा सकते। यही वजह है कि आम्बेडकर ने धार्मिक संस्कारों और समारोहों को तो धर्म के दायरे में रखा।

मनुष्य की अनेक धार्मिक गतिविधियां धर्मनिरपेक्ष गतिविधि के दायरे में आती हैं,यह भी हो सकता है कि धर्म के धर्मनिरपेक्ष आयाम भी हों,ऐसी स्थिति में धर्मनिरपेक्ष धार्मिक गतिविधियों को धर्म का अंग नहीं माना जाना चाहिए। यही बात आस्था और विश्वास के साथ जुड़े सवालों पर भी लागू होती है। संविधान इस मामले में एकदम साफ है कि नागरिक के आस्था और विश्वासों को धार्मिक संस्थाएं नियमित और नियंत्रित नहीं कर सकतीं। पूजा-अर्चना,खानपान और पहनावे के मामले में धार्मिक मान्यताओं को संविधान मानता है लेकिन अन्य मामलों में नहीं।मसलन्,मंदिर में पूजा कैसे होगी,क्या प्रसाद चढ़ाया जाएगा,मंदिर में क्या पहनकर जाएं ,मंदिर में पुजारी किस तरह के वस्त्र पहनेगा,मंदिर कब खुलेगा,कब बंद होगा,मंदिर में उत्सव कब मनाए जाएंगे,भगवान क्या पहनेंगे और कैसे पहनेंगे , कौन से मंत्र पढ़े जाएंगे आदि चीजों का फैसला संबंधित धार्मिक संस्था करेगी,उसमें राज्य दखल नहीं देगा,न्यायालय भी दखल नहीं देगा। लेकिन किसी व्यक्ति के नागरिक अधिकार क्या होंगे यह धर्म तय नहीं करेगा।

उल्लेखनीय है धर्म के दायरे में क्या आता है इसका दायरा संविधान बनाने के बाद से अदालतों की व्याख्याओं के बाद बढ़ा है। यह भी ध्यान रहे कि संविधान धर्म की स्वतंत्रता देता है तो संविधान के अनुच्छेद धारा25(2) के तहत राजसत्ता को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार भी है। इस प्रावधान के तहत ही कई मामलों में मंदिर प्रबंधन आदि के अधिकार राजसत्ता ने अपने हाथ में ले लिए । इसी के आधार पर बड़े पैमाने पर हिन्दू पर्सनल लॉ (शादी,तलाक,गोद लेने का कानू,उत्तराधिकार आदि) में परिवर्तन किए गए। संविधान के अनुच्छेद 25(2) के तहत राजसत्ता को समाजसुधार से संबंधित कानून बनाने का अधिकार भी है। इसके आधार पर ही हिन्दुओं में बहुपत्नीप्रथा समाप्ति के लिए कानून बनाया।जबकि हिन्दूधर्म के अनुसार बहुपत्नी प्रथा वैध थी। मंदिर में हरिजन प्रवेश को वैधता दी गयी।अछूत परंपराओं के खिलाफ कानून बनाए गए।जबकि हिन्दू धर्म में हरिजनों का मंदिर प्रवेश निषिद्ध था,अछूत प्रथा वैध थी।हिन्दुओं के पर्सनल लॉ में लाए गए सुधारों ने सबके लिए समान नागरिक अधिकारों की मांग का बहुत बड़ा आधार निर्मित किया है।

संविधान के तहत राजसत्ता के पास धार्मिक संस्थानों के वित्तीय क्षेत्र को नियंत्रित करने का हक भी है। उल्लेखनीय है मध्यकाल में अनेक राज्यों में राजाओं का मंदिरों के वित्तीय क्षेत्र पर नियंत्रण और स्वामित्व था।



धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का एक छोर धर्म की स्वतंत्रता से जुड़ा है तो दूसरा छोर नागरिकों के अधिकारों और नागरिकता की अवधारणा से जुड़ा है। हमारा संविधान व्यक्ति को आधारभूत सामाजिक इकाई मानकर नागरिकता पर विचार करता है, वह समूह या समुदाय को आधारभूत यूनिट मानकर विचार नहीं करता। हमारे यहां नागरिक का आधार व्यक्ति है,समूह,जाति या समुदाय या धर्म नहीं है। राज्य ने संविधान के तहत व्यक्ति के अधिकारों और जिम्मेदारियों दोनों का खुलासा किया है।इसे हम व्यक्ति और राजसत्ता के अन्तस्संबंध के रुप में देख सकते हैं।

शनिवार, 28 नवंबर 2015

वर्चुअल नायक की औसत वाणी



   
आज मैं यू-ट्यूब के कारण पीएम नरेन्द्र मोदी का संसद में कल दिया गया भाषण सुन पाया। उदयप्रकाश जैसे प्रखर लेखक की राय उनके भाषण की प्रशंसा में पढ़ चुका था इसलिए और भी उत्सुकता थी कि आखिर मोदी ने ऐसा क्या कहा जिसने उदयप्रकाश जैसे लेखक को प्रभावित कर लिया,मुग्ध कर लिया। पहली बात यह कि पीएम मोदी को अपने भाषण में कांग्रेस और उसके नेताओं की भूमिका का नाम लेकर जिक्र करने से परेशानी हो रही थी,उन्होंने अपनी संघी परंपरा का निर्वाह करते हुए संविधान निर्माण में एक भी बार पंडित नेहरु या कांग्रेस पार्टी का नामोल्लेख तक नहीं किया।

पीएम मोदी के लिए संविधान का असल में क्या अर्थ है यह तो वे ही जानें लेकिन यदि उनके कल के भाषण में जो कहा गया है वह यदि संविधान का अर्थ है तो हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि पीएम ने हमें निराश किया है।वे संविधान के मर्म को समझ नहीं पाए हैं,दूसरी बात यह कि जिस व्यक्ति ने भी पीएम का भाषण लिखा था उसे कम से कम अच्छा भाषण लिखना नहीं आता।

पीएम मोदी ने अपने भाषण में “सरलीकरण” और “सामूहिकीकरण” के भाषिक पदबंधों का असल मंतव्य पर पर्दा डालने के लिए कौशलपूर्ण ढ़ंग से इस्तेमाल किया। जैसे “राष्ट्र के महापुरुष” ,”सबने अपनी भावना प्रकट की”,”मैं भी अपनी भावना प्रकट कर रहा हूँ”,,”संविधान की पवित्रता”, “संविधान की सर्वोच्चता”,”, कईयों की तपस्या”,”संविधान की शक्ति”,”गौरवगान”,”उत्तम संविधान”,”संविधान के मूल्य”,”संविधान सदन तक सीमित न रह जाय” आदि। जिन लोगों को उद्धृत किया और नाम लिया ,वे हैं, आम्बेडकर,ग्रेन विले आस्टीन, राधाकृष्णन, गजेन्द्र गडकर, सच्चिदानंद सिंह,अटल बिहारी बाजपेयी,एक सांसद, राजा राममोहन राय,ईश्वरचन्द्र विद्यासागर,राममनोहर लोहिया और उनके बहाने पंडित नेहरु,राजेन्द्र प्रसाद, महात्मा गांधी और अंत में संस्कृत की उन पंक्तियों और नारों का जिक्र किया जो कई सालों से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और संस्थाओं के प्रतीक के रुप में प्रचलन में हैं।भक्ति आंदोलन से लेकर नवजागरण तक का जिक्र किया लेकिन बहुत सारे लोगों को वे अपनी सुविधा और विचारधारात्मक सीमाओं के कारण छोड़ते चले गए।

मोदी के अनुसार संविधान का नया अर्थ- “डिग्नी फॉर इण्डियन, यूनिटी फॉर इण्डिया,” सरकार का एक धर्म “इण्डिया फर्स्ट”, भारत का संविधान प्रथम। इस समूची प्रस्तुति को देखकर आपको आभास ही नहीं होगा कि भारत के संविधान का धर्मनिरपेक्षता,लोकतंत्र और समाजवाद के लक्ष्यों से कोई संबंध है। समूचे भाषण में एक बार “पंथ-निरपेक्षता” पदबंध का पीएम ने इस्तेमाल किया। संक्षेप में कहें तो यह संविधान की नए सिरे से सौगंध लेने के बहाने संविधान से आँखें चुराने वाली बातें ज्यादा नजर आईं। पीएम ने यह बात जरुर कही कि उनकी सरकार संविधान बदलने के बारे में नहीं सोच रही,आरक्षण खत्म करने के बारे में नहीं सोच रही । लेकिन वे आर्थिक विकास की सुस्तदशा,अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों आदि पर चुप रहे।

“अंत में आइडिया ऑफ इण्डिया” का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने जल्दी-जल्दी चक्की चलाते हुए संस्कृत पंक्तियों की ताबड़तोड़ वर्षा कर दी,इस क्रम में वे भूल ही गए कि वे जिन पंक्तियों को वे बोल रहे हैं उनका अर्थ क्या है ? उनका संदर्भ क्या है ? कम से कम रुककर उनके हिन्दी में अर्थ ही बता देते,वे र्थ क्यों नहीं बोल पाए हम समझने में असमर्थ हैं ! मोदी द्वारा उद्धृत संस्कृत की अनेक पंक्तियां सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों और कंपनियों के “मोटो” में हैं !

पीएम मोदी ने आम्बेडकर के साथ मनमाना व्यवहार करते हुए जो कहा है उससे आगे निकलकर हम देखें कि 25नवम्बर 1949 को आम्बेडकर ने क्या था । पता नहीं क्यों सोनिया गांधी और पीएम मोदी दोनों ने आम्बेडकर के व्यक्तिपूजा के खिलाफ कहे कथन का जिक्र करना जरुरी नहीं समझा,क्योंकि इन दोनों नेताओं में व्यक्तिपूजा के कु-संस्कार कूट-कूटकर भरे हुए हैं। इन दोनों नेताओं की मनोदशा को व्यक्तिपूजा पसंद है। दिलचस्प बात है कि दोनों ने एक ही उद्धरण पेश किया।पेश करने का तरीका अलग-अलग था।

अपने इसी भाषण में व्यक्तिपूजा के बारे में आम्बेडकर ने कहा-" जिन महान व्यक्तियों ने आजीवन राष्ट्र की सेवा की,उनके प्रति कृतग्यता रखने में कोई हर्ज़ नहीं।किंतु उस कृतग्यता की भी कुछ सीमा होती है।आयरिश देशभक्त ओकानेल के कथन के अनुसार अपनी आत्मप्रतिष्ठा की बलि देकर कोई भी पुरुष कृतग्य नहीं रह सकता; कोई भी नारी अपना सतीत्व भंग करवाकर कृतग्य नहीं रह सकती; और अपनी अपनी स्वतंत्रता की बलि देकर कोई भी राष्ट्र कृतग्य नहीं रह सकता।अन्य किसी भी देश की अपेक्खा भारत में यह सावधानी बरतना अत्यंत आवश्यक है; क्योंकि भारत की राजनीति में व्यक्तिपूजा का इतना जबर्दस्त असर पड़ता है कि वैसा असर विश्व के किसी भी अन्य देश की राजनीति पर नहीं पड़ता। हो सकता है,धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग दिखा सकती हो,किन्तु राजनीति में भक्ति या व्यक्तिपूजा अधोगति का या अन्त में तानाशाही का निश्चित मार्ग है,यह ध्यान में रखें।"

आम्बेडकर ने अपने भाषण में संविधान लिखने में मदद करने वाले संविधान लेखकों के नामों का जिक्र किया है। संविधान के बारे में बोलते हुए आम्बेडकर ने कहा “ संविधान में बुने गए तत्व विद्यमान पीढ़ी के मत हैं। और मेरा यह विधान शायद अतिरंजित लगे,तो यह स्वीकार किया जाए कि यह मत सदन का है। संविधान कितना भी अच्छा या बुरा हो,तोभी वह अच्छा है या बुरा है, यह आखिरकार में राज्यकर्ताओं के संविधान के इस्तेमाल करने पर ही निर्भर होगा। ” आम्बेडकर ने यह भी कहा “ लोगों को पहली बात यह करनी चाहिए कि अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्य सफल बनाते समय संविधानात्मक साधनों का मार्ग स्वीकार करना चाहिए। असहयोग,कानूनभंग और सत्याग्रह के मार्ग छोड़ दें;क्योंकि संविधानबाह्य मार्ग यानी केवल अराजकता का व्याकरण है।” दिलचस्प बात यह है मोदी ने आज उपरोक्त बातों का अपने भाषण में जिक्र किया,इसमें पहले वाले उद्धरण का मोदी और सोनिया दोनों ने जिक्र किया लेकिन व्यक्तिपूजा की बात को छोड़ दिया।



आम्बेडकर ने अपने भाषण में सबसे महत्वपूर्ण यह कही ,जिसका मोदी-सोनिया ने जिक्र ही नहीं किया,यह बात हम सबके लिए आज भी प्रासंगिक है,आम्बेडकर ने कहा, “भारतीय लोकतंत्र की रक्षा करते समय भारतीयों को तीसरी बात यह करनी चाहिए कि वे राजनीतिक लोकतंत्र से संतुष्ट न रहें।उनको राजनीतिक लोकतंत्र का सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र में रुपान्तरण करना चाहिए।अगर राजनीतिक लोकतंत्र सामाजिक लोकतंत्र पर अधिष्ठित नहीं किया गया ,तो वह टिक ही नहीं सकता; क्योंकि सामाजिक लोकतंत्र स्वतंत्रता,समता और बंधुभाव को जीवन के तत्वों के रुप में पहचानता है।स्वतंत्रता,समता और बंधुभाव एक अखण्ड और अभंग त्रिमूर्ति है। अगर सामाजिक समता न होगी तो स्वतंत्रता का अर्थ मुट्ठीभर लोगोंका आम जनता पर राज्य करना होगा।अगर समता स्वतंत्रताविरहित होगी,तो व्यक्ति के जीवन की स्वयंप्रेरणा नष्ट करेगी।अगर बंधुभाव न होगा तो स्वतंत्रता और समता की वृद्धि सहजता से नहीं होगी।भारतीय जनता को एक बात स्वीकार करनी चाहिए कि भारतीय समाज में दो बातों का अभाव है।ये दो बातें हैं- सामाजिक समता और आर्थिकसमता।” अपने आवेशपूर्ण भाषण में आम्बेडकर ने यह भी कहा “ 26जनवरी1950 को हमें राजनीतिक समता प्राप्त होगी। किन्तु सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता रहेगी। अगर यह विसंगति यथासंभव दूर करने का प्रयास हमने नहीं किया,तो विषमता की आँच लगी हुई है,वे लोग संविधान समिति द्वारा बड़े परिश्रम से बनाए इस राजनीतिक लोकतंत्र की मीनार मिट्टी में मिलाए बिना नहीं रहेंगे।” अपने इसी भाषण में आम्बेडकर ने जातिभेद पर हमला किया था। अफसोस की बात है इस पहलू की ओर पीएम मोदी का ध्यान ही नहीं गया। आम्बेडकर ने 40 मिनट तक अपना भाषण दिया था। संविधान समिति ने 26 नवम्बर को संविधान स्वीकार किया था,इसलिए इस तिथि का महत्व है । आम्बेडकर ने अपने बिगड़े हुए स्वास्थ्य की अवस्था में संविधान निर्माण के काम को पूरा किया था। संविधान का मसौदा किस अवस्था में तैयार हुआ इस पर 5नवम्बर1948 को संविधान समिति के सदस्य टी.टी.कृष्णमाचारी ने संविधान समिति के सामने जो कहा वह बेहद महत्वपूर्ण है,उन्होंने कहा, “ सदन को शायद यह मालूम हुआ होगा कि आपके चुने हुए सात सदस्यों में से एक ने इस्तीफा दे दिया उसकी जगह रिक्त ही रही।एक सदस्य की मृत्यु हुई।उसकी जगह भी रिक्त ही रही।एक अमेरिका गए,उनकी जगह भी वैसे ही खाली पड़ी रही।चौथे सदस्य रियासत संबंधी कामकाज में व्यस्त रहे।इसलिए वे सदस्य होकर भी नहीं के बराबर थे।दो-एक सदस्य दिल्ली से दूरी पर थे।उनका स्वास्थ्य बिगड़ने से वे भी उपस्थित न हो सके।आखिर यह हुआ कि संविधान बनाने का सारा बोझ अकेले डॉ.आम्बेडकर पर ही पड़ा।इस स्थिति में उन्होंने जिस पद्धति से वह काम पूरा किया, उसके लिए हम उनके हमेशा ऋणी रहेंगे।” संविधान समिति की अनेक बैठकों में आम्बेडकर और उनके कार्यवाहक ही सिर्फ उपस्थित रहते थे.इस दृष्टि से संविधान का सारा मसौदा अकेले आम्बेडकर ने बेहद कष्ट की अवस्था में पूरा किया।

रविवार, 31 मई 2015

आरएसएस संगठन नहीं दुकान है

                      
        आरएसएस के नायक और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अध्यक्षता में बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयन्ती को बड़े धूमधाम से मनाने का फैसला लिया गया है। मोटे तौर पर यह फैसला स्वागत योग्य है। हमारे स्वाधीनता सेनानियों के ऊपर सरकार कुछ भी करे हमें स्वागत तो कम से कम करना चाहिए। इस बहाने कुछ चर्चाएं होंगी, गोष्ठियां होंगी, प्रकाशन निकलेंगे,जलसे होंगे ,बाजार में सरकारी खजाने से पैसा निकलकर आएगा। कुछ बाबू,बुद्धिजीवी,राजनेता और स्वयंसेवी संस्थाएं खाएंगी-कमाएंगी,इस लिहाज से मुझे सरकारी जलसे हमेशा अच्छे लगते हैं। यह एक तरह का सरकार की ओर से सांस्कतिक पूंजी निवेश है।

समस्या जलसे की नहीं है, समस्या अम्बेडकर पर माला चढ़ाने और जलसे को लेकर नहीं है, यह तो कोई भी दल कर सकता है, सवाल यह है कि क्या अम्बेडकर के विचारों का आरएसएस और भाजपा पर कोई असर है ? क्या अम्बेडकर के विचारों से संघ के विचार से मेल खाते हैं या फिर अम्बेडकर पर जलसे करना एक खाना पूर्ति है, वोटबैंक राजनीति का अंग है ? हमें यही लगता है कि मोदी सरकार,संघ और भाजपा के लिए अम्बेडकर वोट बैंक राजनीति के प्रचार का अंग है। यह असल में दुकानदार की 'सेल-सेल' की मार्केटिंग रणनीति का अंग है।

उल्लेखनीय है आरएसएस अकेला ऐसा संगठन है जो कभी अपनी आत्मालोचना नहीं करता, अपने वैचारिक दृष्टिकोण को हमेशा सच और अपरिवर्तनीय मानता है। इन दिनों संघ के लोग सत्ता पर कब्जा जमाए बैठे हैं और हेकड़ी का आलम यह है कि टीवी टॉक शो तक में अन्य को बोलने में बाधाएं देते हैं, जानते हैं गलत बोल रहे हैं लेकिन अहंकार में डूबे हुए नेता की तरह प्रवक्ता बोलते रहते हैं। मनमोहन सिंह के अंतिम दो सालों में कांग्रेसी मंत्रियों में यही राजनीतिक अहंकार देखा गया था, आम जनता राजनीतिक अहंकार से नफरत करती है। लेकिन आरएसएस –भाजपा के लोग लगातार इस राजनीतिक अहंकार पर हिन्दुत्व की मालिश कर रहे हैं।

संघियों का मानना है देश में अब तक सबकुछ गलत हुआ है, शिक्षा से लेकर विज्ञान तक भारतीय परंपरा की उपेक्षा हुई है,अतःभारत की उपेक्षित परंपराओं और विश्वासों को नए सिरे से सत्ता के जरिए आम जनता पर थोपने की जरुरत है। वे यह भी मानकर चल रहे हैं कि धर्मनिरपेक्षता जहर है,जबकि अम्बेडकर ने धर्मनिरपेक्षता को भारत,भारतीय संविधान और भारतीय समाज की आत्मा के रुप में पेश किया।

संघ के संगठन लगातार धर्मनिरपेक्षता पर हमले करते रहे हैं। आम जनता में धर्मनिरपेक्षता का मतलब मुस्लिम तुष्टीकरण कहकर साम्प्रदायिक घृणा भरते रहे हैं।इस चक्कर में संघ के विचारक आए दिन यही बताते रहते हैं कि वे तो देश का सुधार करने के लिए सरकार में आए हैं। संस्कृति से लेकर राजनीति तक उनको सुधार की चिन्ता इस कदर सताए हुए है कि वे यह मानने को तैयार ही नहीं है उनके अंदर जो वैचारिक खोट है, उसको भी दूर करने की जरुरत है ।

यह विलक्षण सत्य है कि संघ के विचारों में स्थापना से लेकर आजतक कोई मूलगामी वैचारिक बदलाव नहीं हुआ है। यानी वे यह मानकर चल रहे हैं कि उनकी हिन्दुत्ववादी विचारधारा निष्कलंक और निर्दोष है। वे इन दिनों बल्लभभाई पटेल से लेकर अम्बेडकर तक सबका वैचारिक चीरहरण करने में लगे हैं। इस चक्कर में संघ और उसके नेतागण बार-बार वैचारिक गर्भपात के शिकार भी हुए हैं।

मोदी सरकार के आने के पहले से संघ कई दशकों से समाज में वैचारिक प्रदूषण फैलाने का काम करता रहा है। अम्बेडकर जयन्ती के आयोजन उसी कड़ी का अंग है। साथ ही वे पटेल-अम्बेडकर आदि के जरिए वोटबैंक की राजनीति कर रहे हैं और धर्मनिरपेक्ष विचारों की परंपरा को प्रदूषित करने की कोशिश कर रहे हैं। वे पटेल-अम्बेडकर के पास अपनी विचारधारा में परिवर्तन करने के लिए नहीं जा रहे ,बल्कि वे तो उनकी विचारधारा का विकृतभाष्य रचने के लिए जा रहे हैं। उनके अंदर धर्मनिरपेक्ष बनने की भावना अभी तक नहीं जगी है उलटे वे धर्मनिरपेक्ष नेताओं की विचारधारा को हिन्दुत्ववादी घोषित करने का प्रयास कर रहे हैं।

अम्बेडकर और आरएसएस में जमीन-आसमान का अंतर है। मसलन्, संघ के लोग कई दशकों से गऊ-हत्या बंद हो, का नारा लगा रहे हैं। उनके इस नारे का ही असर था कि भारत की धर्मनिरपेक्ष सरकार ने गऊहत्या पर उनके मत को मान लिया। अम्बेडकर आदि मनीषियों का इस मसले पर भिन्न नजरिया था। इसी तरह अस्पृश्यता के सवाल को अम्बेडकर जिस नजरिए से देखते हैं, संघ वैसे नहीं देखता। संघ के लिए जाति और वर्ण ईश्वरकृत हैं। अम्बेडकर यह नहीं मानते। वे अस्पृश्यता को गुलामी सभी बदतर मानते हैं।

अस्पृश्यता दूर करने के जितने तेज प्रयासों की समाज को ,खासकर हिन्दू समाज को जरुरत है ,उसे संघ महसूस नहीं करता। आज भी देश के बहुत बड़े हिस्से में समाज का एक वर्ग अस्पृश्यता का शिकार है। अस्पृश्य हमेशा अस्पृश्य रहता है। संविधान में तमाम हकों के बाद भी अस्पृश्यता के खिलाफ कोई संघर्ष संघ और उनके जैसे हिन्दू संगठनों ने नहीं चलाया। गऊ के लिए आंदोलन करने वालों को कभी अस्पृश्यता के खिलाफ एक वाक्य बोलते नहीं सुना।

सवाल उठता है कि संघ ने अस्पृश्यता के खिलाफ कोई आंदोलन क्यों नहीं किया ? समाज में जिसे अस्पृश्य घोषित कर दिया गया उसे हमेशा के लिए समाज,संस्थान और संस्कृति से बहिष्कृत कर दिया गया। अस्पृश्यता को तकदीर का खेल,पुनर्जन्म के पाप का परिणाम मानकर वैधता प्रदान की गयी, संयोग की बात है कि एकमात्र अम्बेडकर ने इस पहलु पर सबसे निर्मम ढ़ंग से रोशनी डाली। उन्होंने लिखा कि अस्पृश्यता तो गुलामी से भी बदतर व्यवस्था है। आज भी देश के विभिन्न इलाकों में अछूतों के मुहल्ले हैं और उनमें आना-जाना-रहना एकदम मुश्किल है। कोई भी सामान्य मनुष्य इन बस्तियों में रह नहीं सकता। इन बस्तियों में किसी भी किस्म की नागरिक सुविधाएं दूर-दूर तक नजर नहीं आतीं।

इन दिनों एक मुस्लिम लड़की को घर न मिलने पर मीडिया ने हंगामा खड़ा कर दिया लेकिन अस्पृश्य बस्तियों पर कभी कोई न्यूज आइटम तक नहीं आया। यही मीडिया कभी झांककर नहीं देखता कि सवर्णों की बस्तियों और हाउसिंग सोसायटी में दलितों को घर भाड़े पर मिलने में किस तरह की असुविधा का सामना करना पड़ता है। समाज में अस्पृश्य और पृश्य के रुप में घिनौना वर्गीकरण अभी भी जारी है। कहने का अर्थ है कि अस्पृश्यता को दूर करने के लिए भी यदि सामाजिक स्तर पर प्रयास किए जाएं तो देश में बहुत कुछ परिवर्तन हो सकता है। अस्पृश्यों के प्रति हिंसा, अलगाव,वर्जनाओं, और घृणा को हर स्तर पर चुनौती दी जाय। जो लोग चुनौती दे रहे हैं उनका साथ देने की मनोदशा तैयार करें। संघ की मुश्किल यह है कि वह अस्पृश्ता के उन्मूलन के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है वह तो हिन्दुत्व के लिए वचनवद्ध है। हिन्दुत्व के पैकेज में अस्पृश्यता निवारण के काम नहीं आते।

कुछ अर्सा पहले गुजरात के किसी शहर में ही अस्पृश्यों के लिए अलग श्मशान होने की बात सामने आई थी।यह स्थिति तब की है जब गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी थे। सवाल यह है यदि किसी महापुरुष की जयन्ती मना रहे हो तो कम से कम उसके विचारों को सामने रखकर अपने कर्म-दुष्कर्म और कुकर्म की मीमांसा तो कर लो ! संघ ,भाजपा और उनके लगुए-भगुए कभी महापुरुषों के विचारों कीरोशनी में अपनी आत्मालोचना नहीं करते , सवाल यह है कि वे क्यों नहीं करते ? कभी पलटकर बोलें तो सही कि आखिरकार अम्बेडकर के विचारों से वे इतने दूर क्यों हैं ? अम्बेडकर के कौन से विचार हैं जिनको वे अपने संगठन की विचारधारा में शामिल करना चाहते हैं ?

सवाल यह है कि संघ क्या धर्मनिरपेक्ष महापुरुषों की महिमा का गायन सिर्फ दिल बहलाने,जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए करता है या वह सच में कुछ उनसे सीखना भी चाहता है ? अब तक रवैय्या यह है संघ के लिए भारत के धर्मनिरपेक्ष महापुरुष तो किसी दुकानदार की मौसमी 'सेल -सेल' से ज्यादा महत्व नहीं रखते। जिस तरह दुकानदार हर किस्म का माल बेचता है, लेकिन उसकी किसी माल विशेष से मुहब्बत नहीं होती। उससे जुड़े विचार से मुहब्बत नहीं होती। उसकी तो मुनाफे और बिक्री में दिलचस्पी होती है। यही हास संघ और मोदी सरकार का है।

अधिकतर दुकानदार पुराने विचारों,मूल्यों आदर्शों को अपने जेहन में बनाए रखते हैं। जबकि वे नए युग के अनुरुप आई नयी वस्तु की बिक्री करते हैं, उसका उपभोग भी करते हैं, लेकिन उस वस्तु से जुड़े नए विचारों और आदतों को आत्मसात नहीं करते। यही हाल आरएसएस और उसके शाखामृगों और शाखा नायक का है। वरना विवेकानंद से लेकर महात्मा गांधी तक ,भगतसिंह से लेकर अम्बेडकर तक सबकी संघ के यहां जयन्ती मनायी जाती हैं लेकिन ये सभी जयन्तियां दुकानदार के भाव से मनायी जाती हैं। उत्सवधर्मी भाव से मनायी जाती हैं। जितनी देऱ उत्सव उतनी देर बातें,उसके बाद बातें बंद, इसलिए हम तो कहते हैं संघ एक दुकान है और संघी दुकानदार हैं, ये बेचें कुछ भी ,लेकिन रहेंगे हिन्दुत्ववादी ही।


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