सोमवार, 21 जनवरी 2013

मीडिया उन्माद ,कांग्रेस और फेसबुक


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राजनीति में भावुकता कैंची है,वह इधर -उधर दोनों ओर काटती है। यह लाभ कम नुकसान ज्यादा करती है। भावुकता के आधार पर जुटाया समर्थन किस तरह रसातल में ले जा सकता है। इसे राजीवगांधी की इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुई जीत के बाद कांग्रेस के पराभव के साथ देख सकते हैं। यही हाल बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ भाजपा के ह्रास के रूप में भी देख सकते हैं।

भाजपा और कांग्रेस दोनों भावुकता का दुरूपयोग करती रही हैं और इसबार राहुल गांधी ने भावुक भाषण देकर कांग्रेस में प्राणसंचार करने की असफल कोशिश की है।

भावुक भाषण कभी संगठन में प्राण नहीं फूंकते, उनसे टीवी में जान आती है।

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राहुल गांधी ने अपने भाषण में 'उम्मीद' पर जोर दिया 'पावर' यानी सत्ता को निशाना बनाया। उनके भाषण का यह फॉरमेट ओबामा के राष्ट्रपति चुनाव की पहली पारी में दिए गए भाषण की बुनियादी समझ से परिचालित है।

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राहुल गांधी को नेताओं की तलाश है,राजकुमार भूल गए कि यह दौर नेता के अंत का दौर है। परवर्ती पूंजीवाद में नेता नहीं बचता,दलाल रह जाते हैं या औसतदर्जे के नेता रह जाते हैं। आज नेताओं का अभाव सभी दलों में है। राहुल ने कहा-

'' हमें ऐसे चालीस-पचास नेता तैयार करने हैं, जो देश और प्रदेश को चला सकें। हर प्रदेश में 5 से 10 ऐसे नेता हों जो सीएम बन सकें। हर जिले में यह बात हो। जब भी कोई पूछे कि कांग्रेस क्या करती है तो जवाब मिलना चाहिए कि भविष्य के लिए सेकुलर नेता तैयार करती है। जमीन से जुड़े नेता तैयार करती है। ऐसे नेता तैयार करती है, जिन्हें देखकर हिंदुस्तान के लोग उनके पीछे खड़े होने के लिए तैयार हो जाएं। इसके लिए संगठन की जरूरत हैं। ऐसा सिस्टम बन सकता है, जिसे आप बनाएंगे और चलाएंगे।''

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राहुल गांधी के भाषण में आए सरलीकरण-

"मैं सबकुछ नहीं जानता। दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो सबकुछ जानता हो। "

''हमें इस पावर का इस्तेमाल लोगों के सशक्तिकरण के लिए करना चाहिए।''

"अगर आप पावरफुल होते हैं, तो आपको बहुत संभलकर रहने की जरूरत है। "

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राहुल गांधी किस तरह की भूमिका में ले जाना चाहते हैं और किस तरह की तुलनाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं,इससे उनकी और कांग्रेस पार्टी की भूमिका का भावी कार्यक्रम समझ में आ जाएगा। वे जज बनना चाहते हैं। वे जनता नहीं बनना चाहते,जनसेवक नहीं बनना चाहते।



"कचहरी में दो लोग होते हैं जज और वकील। मैं जज का काम करूंगा। वकील का काम नहीं करूंगा।"

न्यायप्रियता और जज में अंतर होता है। यह सत्ता का अहंकार है।

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सत्ता हर कोई हासिल करना चाहता है, वह 'जहर' की तरह है।(राहुल गांधी) के इस बयान के बाद टीवी पर भारी प्रौपेगैण्डा चल रहा है। यह मीडिया केन्द्रित नकली या प्रायोजित प्रशंसा है। प्रायोजित प्रशंसा लोकतंत्र में मीडिया जहर है।

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कांग्रेस चिन्तन शिविर में राजनीतिक-सांगठनिक कमजोरी को "स्ट्रक्चरल वीकनेस "कहा गया। यह भाषा का बदला हुआ रूप है जिसके जरिए कांग्रेस राजनीतिक दुर्बलता को कम करके पेश कर रही है। जिन इलाकों में कांग्रेस कमजोर है उसको सांगठनिक तौर पर कैसे दूर करेगी,इसके बारे में कोई दिशा निर्देश सामने नहीं आए हैं।

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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आज जयपुर के चिन्तन शिविर में भावुक और अन्तर्विरोधपूर्ण भाषण दिया। पहला अंतर्विरोध-

"मैं जब बच्चा था तो मुझे बैडमिंटन बहुत पसंद था। यह खेल इस जटिल दुनिया में मुझे बैलेंस देता था। मैं अपनी दादी के घर में दो पुलिस वालों के साथ बैडमिंटन खेलता था। वे मेरी दादी की सुरक्षा का जिम्मा संभालते थे। वे मेरे दोस्त हो गए थे। एक दिन उन्होंने मेरी दादी को मार दिया और मेरे जीवन का बैलेंस छीन लिया।"

यह पैराग्राफ क्या संदेश देता है ? दोस्त कभी भी दुश्मन हो सकता है ।

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मीडियावाले कह रहे हैं कि राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने 2014 के अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का संकेत दे दिया है। उल्लेखनीय है कि मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने थे तब सोनिया अध्यक्ष थीं लेकिन प्रधानमंत्री नहीं बन पायीं,राहुल को यदि अध्यक्ष भी बना दिए जाए तो भी प्रधानमंत्री के पद पर कांग्रेसी उनको ही बिठाएंगे यह कहना मुश्किल है।

कांग्रेस अंततः संघ परिवार और अमेरिका के फैसले को मानता है,सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री न बन पाने और मनमोहन के बन जाने में इन दोनों की बड़ी भूमिका थी।

प्रधानमंत्री का पद उसको ही मिलेगा जिस पर अमेरिकी मोहर लगी होगी .।

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कांग्रेस नेताओं की सोशलमीडिया पर सोनिया गांधी के भाषण पर आई प्रतिक्रियाएं देखकर भावी रणनीति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है ।आनेवाले समय में कांग्रेस सोशलमीडिया के नियमंन की दिशा में जा सकती है ?--11-

टीवी चैनलों की आरामतलबी का आलम यह है कि कांग्रेस के चिन्तनशिविर से कोई खबर लीक नहीं हो रही है। कांग्रेस को अपने चिन्तनशिविर को पारदर्शी बनाना चाहिए और उसकी लाइव प्रसारण व्यवस्था करनी चाहिए जिससे पता चले कि कांग्रेस के अंदर क्या चिन्तन हो रहा।

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राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया।वे संगठन में दूसरे नम्बर पर आ गए हैं।

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मीडिया चैनल और कांग्रेसी नेताओं की बेबकूफीभरी युगलबंदी देखें- दोनों कह रहे हैं कि राहुल को बड़ी भूमिका दी जाय,यह खबर विगत दो साल से समय समय पर टीवी में चलायी जा रही है। मीडिया राहुल के बारे में इस तरह की गप्प को बार बार क्यों उछालता है ?

राहुल बड़ी भूमिका में आएं तब ही खबर दें। अघटित घटना की खबर को खबर नहीं कहते।

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कांग्रेसी नीतियों की असफलता का ताजा प्रमाण देखें- आधारभूत ढांचा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी जीएमआर और जीवीके पूंजी जुटाने की असमर्थता की वजह से बड़ी सड़क परियोजनाओं से बाहर निकल रही हैं। यह बात यह बात भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने आज कही।

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कांग्रेस आनेवाले चुनाव में खाद्य विधेयक को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक अस्त्र बनाने जा रही है। लेकिन इस अस्त्र से कांग्रेस को कोई खास लाभ नहीं होगा। इस विधेयक को लाने के पीछे प्रधान कारण सब्सीडी को घटाना, लेकिन यह काम नहीं हो पाएगा। उलटे सबसे पहले खाद्य सब्सिडी का खर्च बढ़ेगा और मौजूदा सरकारी आकलन के मुताबिक पहले साल में यह 1.2 लाख करोड़ रुपये होगा, जो तीसरे साल 1.5 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच सकता है अगर एमएसपी में बढ़ोतरी होती रहे और इसे जारी करने की कीमत स्थिर रहे। अगर हम इस विधेयक में कुपोषण समाप्त करने, भंडारण व अनाज की ढुलाई के लिए बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च को जोड़ें तो यह आसानी से सालाना 2 लाख करोड़ रुपये को पार कर जाएगा।

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सरकार ने खाद्य तेलों के आयात पर शुल्क गणना के लिए निर्धारित शुल्क मूल्य व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। अब खाद्य तेलों के आयात पर उनके शुल्क मूल्य की गणना अंतरराष्ट्रीय कीमत के आधार पर होगी। इससे खाने के तेलों के दामों में उछाल आएगा। यानी सूखी रोटी खाओ कांग्रेस के गुन गाओ।

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कांग्रेस गरीबी का समारोह कैसे करती है इसे देखें-कांग्रेस के 'चिंतन शिविर' से एक दिन पहले संसदीय स्थायी समिति ने आज खाद्य सुरक्षा विधेयक पर बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट पेश की। इस विधेयक में देश की 75 फीसदी ग्रामीण और 50 फीसदी शहरी आबादी को बिना किसी विभेद के एकसमान 5 किलोग्राम अनाज मुहैया कराने का कानूनी अधिकार देने का प्राïवधान किया गया है। यह अनाज फ्लैट रेट (अपरिवर्तित दर) पर वितरित किया जाएगा। इसमें चावल की दर 3 रुपये, गेहूं की 2 रुपये और मोटे अनाजों की 1 रुपये प्रति किलोग्राम होगी।

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कांग्रेस का तीन दिनों तक चलने वाला चिंतन शिविर आज यानी शुक्रवार से जयपुर में शुरू हो रहा है। यह चिंतन शिविर ऐसे समय हो रहा है जब कांग्रेस की नीतियों का खोखलापन तेजी से सामने आ रहा है। हर मोर्चे पर सरकार और उसकी नीतियां विफल रही हैं। नव्य आर्थिक उदारीकरण का पूरा प्रपंच चरमराने लगा है। क्या आत्मसमीक्षा भी होगी इस शिविर में ?

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टीवी चैनलों ने सरकारी भांड़ का दायित्व अपने ऊपर ले लिया है वे पेट्रोल आदि के दामों में बढोत्तरी के संबंध में पहले से ही खबर लगाते हैं और लगातार इस तरह के लोगों के विचार पेश करते रहते हैं जो किसी न किसी रूप में दाम बढ़ाए जाने को वैधता प्रदान करते हैं। भांडों का काम है सरकार के भोंपू की तरह काम करना। इस तरह की टीवी पत्रकारिता वस्तुगत होने का दावा नहीं कर सकती।

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एनडीटीवी इंटिया पर आज रवीशकुमार के टॉकशो पर सभी वक्ता कह रहे हैं कि 2014 में लोकसभा चुनाव के समय 20 करोड़ लोग वोटर इंटरनेट से जुड़े होंगे। ये 20करोड़ जागरूक वोटर होंगे।

हमारी राय में सोशलमीडिया की राजनीतिक भूमिका को यह अतिरंजित रूप में देखना होगा। वोटर अपनी राय जमीनी हकीकत और अपने पुराने विश्वासों के आधार पर बनाता और व्यक्त करता है।

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रवीशकुमार कह रहे हैं कि सोशलमीडिया की भाषा भिड़ने की भाषा है। रवीशकुमार को यह बात समझनी होगी कि सोशलमीडिया की भाषा पर्सुशसन की भाषा है।

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एनडीटीवीइंडिया में अभी एक टॉकशो चल रहा है सोशलमीडिया की भूमिका पर। भाजपा के अरविंद गुप्ता ने कहा है कि सोसलमीडिया पर राइटविंग के मंच के रूप में उनके मीडियम को जाना जाता है।

असल में सोशलमीडिया पर मात्र कम्युनिकेशन होता है वहां कोई विचारधारात्मक कम्युनिकेशन नहीं होता।

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टीवी चैनलों में पाकविरोधी उन्माद इनदिनों चरमोत्कर्ष पर है । भाजपा और उसके सहजिया सम्प्रदाय के नेता और संगठन भारत के दो सैनिकों की पाक द्वारा हत्या किए जाने के बाद से आर-पार की जंग जारी रखो,पाक से कडाई से पेश आओ,का नारा लगाकर मीडिया में उन्मादी प्रचार कर रहे हैं।

इन उन्मादी नेताओं और मीडिया के दबाव में मनमोहन सरकार भी आ गयी है।

सवाल यह है कि यूरोप से हमने दोस्ती करना क्यों नहीं सीखा, जिनदेशों ने सारी दुनिया पर 2-2 विश्वयुद्ध थोपे,करोड़ों लोगों की हत्या की उन देशों के साथ सभी देशों के मित्रतापूर्ण संबंध हैं।

करोडों लोगों की हत्या करने वाले हिटलर के देश के साथ कभी किसी ने यह नहीं कहा कि हम जर्मनी की टीम के साथ नहीं खेलेंगे।जर्मनी के गायकों को नहीं सुनेंगे।

भारत में हाल की घटनाओं पर जिस तरह की घटिया उन्मादी प्रतिक्रिया टीवी चैनलों ने दी है वह निंदनीय है और मानवाधिकार के विश्व परिप्रेक्ष्य के खिलाफ है।

हमें सोवियत संघ से सीखना चाहिए जिसके द्वितीय विश्वयुद्ध में करोडों लोग मारे गए लेकिन कभी किसी नेता ने यह मांग नहीं की सोवियत संघ का जर्मनों के साथ मित्रतापूर्ण संबंध नहीं होगा।

हमें वियतनाम से सीखना चाहिए जिसको अमेरिका ने पूरी तरह कई दशक तक बमों से रौंदा लेकिन वियतनाम जब अमेरिकी प्रभुत्व से मुक्त हो गया तो अमेरिका के साथ गहरी मित्रता करके उसने नई मिसाल कायम की है और वियतनाम में आज सबसे ज्यादा अमेरिकी कंपनियां काम कर रही हैं। हमें पड़ोसी देशों के प्रति उन्माद पैदा करने की राजनीति को बंद करना चाहिए।

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भारतीय चैनलों के द्वारा पाक-भारत संबंधों को बिगाड़ने के लिए सचेत कोशिशें हो रही हैं।

इस तरह के टॉकशो आयोजित किए जा रहे हैं जिनसे पाक के प्रति घृणा पैदा की जा सके। भारतीय सीमा पर पाक का बार बार उल्लंघन और हमारे दो सैनिकों का पाकसैनिकों द्वारा कत्ल निंदनीय कृत्य है। इसकी निंदा की जानी चाहिए। लेकिन इस घटना की आड़ में भारत-पाक संबंधों को बिगाडकर हमारे चैनल जनविरोधी हरकत कर रहे हैं। खासकर पाकविरोधी भावनाओं को व्यापक कवरेज दे रहे हैं। पाकविरोधी उन्मादी प्रचार टीवी चैनलों की मासकल्चर संस्कृति का वैचारिक खाद्य है। इससे सावधान रहने की जरूरत है।

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विपक्ष की नेत्री सुषमा स्वराज से पाक के साथ बढे हुए तनाव पर अभी बातें की हैं। लेकिन इससे क्या भाजपा के पाकविरोधी घृणा अभियान को वे शांत कर पाएंगे ?

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हाल ही में कलकत्ता में विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब बोल रहे थे तो वे वैज्ञानिकों को सम्बोधित कम और कांग्रेसियों को सम्बोधित करते ज्यादा दिख रहे थे। वे कांग्रेस के प्रचारक के रूप में बोल रहे थे। प्रधानमंत्री का विज्ञान कांग्रेस में दिया गया भाषण राजनीतिक प्रचार से ज्यादा महत्व नहीं रखता। वे जो कहते हैं वह कपूर की तरह कुछ क्षण दिखता है फिर गायब हो जाता है। संभवतः वे अकेले प्रधानमंत्री हैं जिनके किसी भी भाषण की कोई भी बात आम आदमी से लेकर बुद्धिजीवियों तक किसी को भी याद नहीं है। प्रधानमंत्री का प्रचारक होना सामान्य बात है लेकिन मनमोहन सिंह इस मामले में विरल हैं क्योंकि वे नव्य उदारनीतियों के नीति निर्माता-प्रचारक के रूप में काम करते रहे हैं। वे मूलतः वर्चुअल हैं। आप उनको पकड सकते हैं लेकिन घेर नहीं सकते। गलती पकड सकते हैं लेकिन दोषी नहीं ठहरा सकते।



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विपक्ष जब भी घेरने की कोशिश करता है वे हाथ से निकल जाते हैं। हाल ही में दामिनी दिल्ली बलात्कार कांड के प्रसंग में मीडिया उन्माद के जरिए मनमोहन सरकार को घेरने की असफल कोशिश की गई लेकिन वे साफ बच निकले। सवाल यह है कि मनमोहन सरकार को घेरने में विपक्ष आज तक सफल क्यों नहीं हुआ ?



मनमोहन सरकार और कांग्रेस पार्टी ने एक नयी रणनीति बनाई है जिसके तहत वे पापुलिज्म और लोकप्रिय जनदबाब का प्रत्युत्तर प्रशासनिक एक्शन के जरिए दे रहे हैं। मसलन् जब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया तो उन्होंने सीधे एक्शन लिया। कॉमनवेल्थ कांड से लेकर दामिनी कांड तक जो भी समस्या आई उसके प्रशासनिक समाधान तलाशने की सक्रिय कोशिश की और इससे भी ज्यादा अपनी कोशिश का मीडिया में जमकर प्रचार किया।



मनमोहन सरकार का मानना है पापुलर को मानो,आलोचनात्मक राय दो । राजनीतिक दबाब को प्रशासनिक –न्यायिक समाधान दो। इस अर्थ में वे लगातार संरचनात्मक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। संरचनात्मक सुधार वस्तुतःनव्य आर्थिक उदारीकरण का हिस्सा हैं। नव्य उदारवादी दृष्टिकोण के अनुसार नयी समस्याएं पुराने कानूनी फ्रेमवर्क में हल नहीं हो सकतीं, मनमोहन सरकार ने इसे सभी मंत्रालयों की कार्यप्रणाली का अंग बना दिया है। इस पद्धति का अनुकरण करने के कारण उनकी जब आलोचना आरंभ होती है तब वे सामने होते हैं लेकिन प्रशानिक एक्शन जब आने लगते हैं तो मनमोहन सरकार के खिलाफ गुस्सा गायब हो जाता है और फिर आमलोगों से लेकर मीडिया तक समस्या और समाधान पर ही बहस आकर टिक जाती है। इसके कारण राजनीति में पैदा हुए उन्माद और भावुकता को हाशिए पर डालने में उनको सफलता मिली है।



मनमोहन सिंह जब से प्रधानमंत्री बने हैं। वे मीडिया और विशेषज्ञों की आलोचना के केन्द्र में नहीं आते। उन्हें प्रधानमंत्री बने 8 साल से ज्यादा समय हो गया है। मीडिया में ममता बनर्जी,शरद पवार ,प्रफुल्ल पटेल ,डी.राजा ,कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं ,कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों आदि की आलोचना दिखेगी लेकिन मनमोहन सिंह की आलोचना नहीं मिलेगी। आकाश छूती मंहगाई है लेकिन प्रधानमंत्री पर न तो मीडिया हमला कर रहा है और न विपक्ष। असल में मनमोहन सिंह डिजिटल हो गए हैं। उनका डिजिटल इमेज में रूपान्तरण कर दिया गया है। डिजिटल इमेज और राजनीतिक व्यक्तित्व की इमेज में यही अंतर होता है। राजनीतिक इमेज को पकड़ सकते हैं लेकिन डिजिटल इमेज को पकड़ नहीं सकते।



मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व अनेक गुणों से परिपूर्ण है। वे बेहद विनम्र हैं, सुसंस्कृत है, शिक्षित हैं। नव्य -उदार नीतियों के विशेषज्ञ हैं। मीडिया में उनके बारे में न्यूनतम बातें छपती हैं। संभवतः मीडिया में उन्हें सबसे कम कवरेज वाले प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा।



नई डिजिटल इमेज एक ही साथ मिथकीय और ऐतिहासिक होती है। अतीतपंथी और भविष्योन्मुखी होती है। तकनीकीपरक और धार्मिक होती है। मनमोहन सिंह ने अपने प्रचार में बार-बार समृद्ध भारत और समर्थ भारत की बात करते हैं। बार-बार विकासदर को उछाला है। भारत को समृद्धि के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। खासकर पूंजीपति,ह्वाइट कॉलर और मध्यवर्ग के साथ जोड़ा है। इस क्रम में उन्होंने मजदूरों-किसानों की राजनीति को हाशिए पर ड़ालने में सफलता अर्जित की है।



मनमोहन कोड की विशेषता है कि उसने गरीबी के यथार्थ विमर्श को वायवीय बनाया है। गरीबी और अभाव को गैर-बुनियादी विमर्शों के जरिए अपदस्थ किया है। मनमोहन कोड ने गरीबी और अभाव को अप्रत्यक्ष दानव में रूपान्तरित किया है। जिसके बारे में आप सिर्फ कभी-कभार सुन सकते हैं। मनमोहनकोड के लिए गरीबी और अभाव कभी महान समस्या नहीं रहे। मनमोहन कोड ने देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे खतरनाक शत्रु के रूप में माओवाद को प्रतिष्ठित किया है। जबकि माओवाद भारत विभाजन या सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं है।



मनमोहन कोड की काल्पनिक सृष्टि है माओवाद और आतंकी हिन्दू। यह जादुई-मिथकीय शत्रु है। मनमोहन कोड के अनुयायी और प्रचारक माओवाद के बारे में तरह-तरह की दंतकथाएं, किंवदन्तियां आदि प्रचारित कर रहे हैं। मीडिया में माओवाद एक मिथकीय महामानव है। इसी तर्ज पर आरएसएस के नाम पर बहुत सारे आतंकी हिन्दू महामानव पैदा कर दिए गए हैं। ये सारे मनमोहन कोड से सृजित वर्चुअल सामाजिक शत्रु हैं। ये आधे मानव और आधे दानव हैं।



माओवाद और हिन्दू आतंकवाद की रोचक डिजिटल कहानियां आए दिन सम्प्रेषित की जा रही हैं। इन्हें सामाजिक विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। आप जरा गौर से माओवादी नेता किशनजी की कपड़ा मुँह पर ढ़ंके इमेज और हिन्दू आतंकी के रूप में पकड़े गए संतों को ध्यान से देखें तो इनमें आप आधे मनुष्य और आधे प्राचीन मनुष्य की इमेज के दर्शन पाएंगे।



कारपोरेट मीडिया माओवादी और हिन्दू आतंकी की ऐसी इमेज पेश कर रहा है गोया कोई फोरेंसिक रिपोर्ट पेश कर रहा हो। वे इनके शरीर की ऐसी इमेज पेश कर रहे हैं जिससे ये आधे मनुष्य और आधे शैतान लगें। इससे वे खतरे और भय का विचारधारात्मक प्रभाव पैदा कर रहे हैं।



मनमोहन सिंह मीडिया में उतने नजर नहीं आते जितना इन दिनों डिजिटल दानवों (माओवाद और हिन्दू आतंकी) को पेश किया जा रहा है। हमें इस कोड को खोलना चाहिए। यह तकरीबन वैसे ही है जैसे अमेरिका ने तालिबान और विन लादेन की इमेजों के प्रचार-प्रसार के जरिए सारी दुनिया को तथाकथित आतंकवाद विरोधी मुहिम में झोंक दिया और तबाही पैदा की । सामाजिक अस्थिरता पैदा की । घृणा का वातावरण पैदा किया । ठीक यही काम मनमोहन कोड अपने डिजिटल शत्रुओं के प्रचार-प्रसार के नाम पर कर रहा है। हमें जागरूक रहने की जरूरत है।


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