बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

दिल्ली विश्व पुस्तकमेला के शिरकत विरोधी आयाम



विश्व पुस्तक मेला (१४ -२२फरवरी २०१५) पर लेखकों -पाठकों की निगाहें टिकी हैं ! कुछ के लिए यह इवेंट है !कुछ के लिए लोकार्पण उत्सव है!कुछ के लिए प्रकाशन का अवसर है !   विश्व पुस्तक मेला स्वभावत: शिरकत विरोधी है। यह प्रकाशकों , पाठकों और लेखकों की शिरकत सीमित करता है।  यह मान लिया गया है कि यह भी एक इवेंट है और उसी रुप में आयोजित कर दो ! लेखक संगठनों का विश्व पुस्तक मेला की समस्याओं की ओर कभी  ध्यान ही नहीं गया और लेखकों ने निजी तौर पर भी पहल करके कुछ भी लिखने की ज़रुरत महसूस नहीं । यहाँ तक कि हिन्दी के लोकार्पण नरेशों ( नामवर सिंह आदि) का भी ध्यान नहीं गया। 
        विश्व पुस्तक मेला का ढाँचा इस तरह का है जिसमें प्रकाशकों को शिरकत का मौक़ा कम मिलता है। इसमें शिरकत करने वाले प्रकाशकों को खर्च ज्यादा करना पड़ता है और मेला मात्र ७ दिन चलता है जिसके कारण इसमें जो लागत खर्च होती है वह भी छोटे दुकानदार झेल नहीं पाते। क़ायदे से मेले में स्टाल लगाने का ख़र्चा न्यूनतम रखा जाय और मेला दो सप्ताह चले।
     मसलन् कोलकाता पुस्तक मेला तुलनात्मक तौर पर कम खर्चीला पड़ता है और मेला १५ दिन तक चलता है।इसके अलावा  कोलकाता पुस्तक मेला में कोई प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता। इसके विपरीत विश्व पुस्तक मेला में प्रवेश शुल्क लिया जाता है। क़ायदे से स्टाल का शुल्क तुरंत कम किया जाय जिससे ज्यादा प्रकाशक पुस्तक मेला में शामिल कर सकें ,मेले की अवधि एक सप्ताह से बढ़ाकर दो सप्ताह की जाय और प्रवेश शुल्क ख़त्म किया जाय । इससे पुस्तक मेले मे पुस्तक प्रेमियों की शिरकत बढ़ाने में मदद मिलेगी।
      इसके अलावा भारत की विभिन्न भाषा की पत्रिकाओं के स्टॉल और लेखक- सांस्कृतिक संगठनों के स्टॉल लगाने के लिए विशेष रुप से प्रोत्साहन दिया जाय ।इनको मुफ़्त में स्थान मुहैय्या  कराया जाय।इससे लेखकों - संपादकों को साहित्यिक पत्रिकाओं को आम जनता में प्रचारित प्रसारित करने का मौक़ा मिलेगा। चूँकि प्रधानमंत्री सारे देश में पुस्तकालय अभियान चलाने का फ़ैसला कर चुके हैं अत: देश के विभिन्न बडे पुस्तकालयों के प्रदर्शनी स्टॉल लगाए जाएँ। 

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