बुधवार, 3 मार्च 2010

अकेलेपन का रेगिस्तान है पोर्न फैंटेसी

पोर्न यथार्थ नहीं है। बल्कि फैंटेसी है। ऐसी फैंटेसी जो मर्द और स्त्री दोनों को नष्ट करती है। संबंध भी नष्ट करती है। इस फैंटेसी से बचने के लिए जरूरी है कि वास्तविक सामाजिक सबंधों में जीने का प्रयास किया जाए। आप अपना ज्यादातर समय इंटरनेट की बजाय वास्तव जीवन में गुजारें,रचनात्मक कार्यों में गुजारें। यदि इंटरनेट पर ही रहना हो तो कोशिश हो कि पोर्न से बचें।

पोर्न का पुरूष पर यह भी प्रभाव होता है कि स्वयं को ही सेक्स के लिए दोषी मान लेता है ,सेक्स की व्यस्तता के लिए दोषी मान लेता है। जबकि सच यह है कि सेक्स और पोर्न को समाज पर पूंजीपतिवर्ग के अपने मुनाफों के लिए थोपा है। ग्राहकों की मोटी रकम सेक्स उद्योग के पास चली जाती है।

आज सेक्स उद्योग की कमाई हॉलीवुड की कमाई से भी ज्यादा है। सेक्स उद्योग का दूसरा सामाजिक प्रभाव यह होता है कि वह व्यक्ति का मुक्तिकामी और विवेकवादी गतिविधियों की तरफ से ध्यान हटाता है।वास्तव जीवन के आत्मीय संबंधों से दूर ले जाता है।स्त्री-पुरूष संबंधों को क्षतिग्रस्त करता है, इन संबंधों को अमानवीय बनाता है। इससे बचने का एकमात्र उपाय है कि सेक्स संबंधी सूचनाएं, समस्याओं आदि पर खुलकर चर्चा हो, सेक्स उद्योग के सभी रूपों या आयामों के बारे में सामान्य लोगों और बच्चों को शिक्षित किया जाए।सामाजिक संबंधों में प्रगाढ़ आत्मीयता पैदा की जाए।
       
पोर्न के करीब वे लोग ज्यादा आते हैं जो अकेलेपन के शिकार हैं , आत्मीयता की तलाश या करीबीपन के अभाव में जी रहे हैं। आत्मीयता और भावात्मक करीबीपन सबको चाहिए। मानवीय अस्तित्व इस पर टिका हुआ है।यदि पूंजीवादी समाज के कार्य व्यापार पर नजर डालें तो पाएंगे कि उसने मनुष्य को अलगाव का शिकार बनाया है।समाज में बेगानापन बढाया है।भावात्मकता को नष्ट किया है और औपचारिक संबंध बनाए हैं। संबंधों की अनौपचारिकता और मानवीय संवेदनशीलता नष्ट की है। सारी मुश्किलें यहीं से शुरू होती हैं।

आज आत्मीयता या करीबीपन के केन्द्र और सामाजिक यूनिटें बिखर गयी हैं। वहीं दूसरी ओर आत्मीयता और करीबीपन को लेकर जनमाध्यमों ने एक मिथ रचा है जिसका समाज पर गहरा असर है। मिथ यह है कि आत्मीयता का अर्थ है सेक्स अथवा कामुक भावनाएं।

करीबीपन या आत्मीयता का अभाव व्यक्ति के अंदर उतावलापन पैदा करता है। इस अवस्था में सबसे ज्यादा आदमी सेक्स की ओर भागता है। फलत: व्यक्ति सेक्स को ही करीबीपन समझने लगता है। जबकि वातविकता यह है कि आत्मीय संबंध बनाने के लिए सेक्स की जरूरत नहीं होती। सेक्स के बगैर प्रगाढ आत्मीय संबंध ज्यादा बनते हैं। खासकर स्त्री-पुरूष के बीच आत्मीयता तब ज्यादा अच्छी और मजबूत होती है जब उसमें गहरी संवेदनात्मकता हो।

शुद्ध बौद्धिकता या कामरेडशिप या भाईचारे के आधार पर करीबीपन पैदा नहीं होता। करीबीपन पैदा होता है गहरी संवेदना के जरिए। पूंजीवादी विचारक यह प्रचार कर रहे हैं कि अकेलेपन का समाधान सेक्स है। सेक्सुअल संबंध हैं। कामुक मनोरंजन है। जबकि सच यह है कि अकेलेपन से मुक्ति का समाधान सेक्स नहीं सक्रिय सामाजिक संबंध और गतिविधियां हैं। 

अकेलेपन के विकल्प के तौर पर यदि सेक्स की ओर रूझान बढ़ता है तो समस्याएं घटने की बजाय बढ़ सकती हैं। अकेलापन,हताशा और जीवन के प्रति प्रतिगामी विचारों में इजाफा ही होगा। शर्म, हताशा , अकेलापन,आत्मीयता का अभाव सेक्स के प्रति स्वस्थ नजरिया विकसित नहीं होने देता।आज सेक्स उद्योग में वेश्यावृत्ति,पोर्नोग्राफी फिल्म, पोर्नोग्राफी पत्रिकाएं, सेक्स वेबसाइट,फोन सेक्स, आदि मुनाफाधारित व्यवसाय शामिल हैं। ये सब वे व्यापार हैं जो उत्तेजनात्मक कामुक अनुभूतियों का व्यापार करते हैं।
 

संबंधों का अन्त है पोर्न संस्कृति

        पोर्न  आज सहज सुलभ है। पोर्न से बचना संभव नहीं है। पोर्न जिस तरह समूचे दृश्य संसार को घेरा है ,उतनी तेजी से किसी विधा ने नहीं घेरा। पोर्न के सवाल हमें परेषान करते हैं। राज्य के हस्तक्षेप की मांग करते हैं।सामाजिक हस्तक्षेप की मांग करते हैं। पोर्न का सामाजिक विमर्श में आना इस बात का संकेत है कि समाज परवर्ती पूंजीवाद के सांस्कृतिक विमर्ष में दाखिल हो चुका है। खासकर इंटरनेट के आने के बाद पोर्न सहजभाव से उपलब्ध है,पोर्न विमर् भी सहजभाव से उपलब्ध है। पोर्न से बचने का सॉफ्टवेयर भी सहज उपलब्ध है।
आज पोर्न रीफों का मनोरंजन है। विज्ञापन,फिल्म,मोबाइल,पत्रिका,इटरनेट आदि सभी माध्यमों के जरिए पोर्न हम तक पहुँच रहा है। एक सर्वे के अनुसार ब्रिटेन में सन् 2000 तक तकरीबन 33 फीसदी इंटरनेट यूजर पोर्न का इस्तेमाल कर रहे थे।  अमेरिका में पोर्न उद्योग  का कारोबार 15 विलियन डालर सालाना आंका गया है। वर्श में फिल्मों की टिकट और ललित कलाएं खरीदने से ज्यादा लोग पोर्न पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं।  अमेरिका में अकेले लॉस एंजिल्स में सालाना दस हजार हार्डकोर पोर्न फिल्में तैयार हो रही हैं।जबकि हॉलीवुड साल में मात्र 400 फिल्में बना पाता है।
           पोर्न व्यवसाय का दायरा बहुत बड़ा है।इसकी धीरे-धीरे सामाजिक स्वीकृति बढ़ रही है। आज यह फैन का रूप धारण कर चुका है। पोर्न के संदर्भ में पहला सवाल यह उठता है कि पोर्न को औरतें ज्यादा देखती हैं या मर्द ? सर्वे बताते हैं पोर्न पुरू ज्यादा देखते हैं , पोर्न सबकी क्षति करता है। यह सामयिक पूंजीवादी फैन है। यह अपने तरह का खास सम्मान दिलाता है।

एडवर्ड मारियट ने 'मैन एण्ड पोर्न ' (गार्दियन,8नबम्वर2003) में लिखा कि  पोर्न आज ज्यादा स्वीकृत धंधा है, ज्यादा फैशनेबिल ज्यादा आरामदायक है,सबसे बड़ा व्यापार है, आज स्थिति यह है कि इसका सभ्य समाज के आनंद रूपों में स्वीकृत स्थान है।

पोर्न को हम वर्षों से देख रहे हैं कि किन्तु हमने कभी इसका विश्लेषण नहीं किया कि किस तरह इसने स्त्री का दर्जा गिराया है।यह समयानुकूल पूंजीवादी फैशन है।यह सिर्फ औरत ही नहीं सारे समाज को पतन के गर्त में मिलाया है। यह बात बार-बार कही जा रह है कि पश्चिम में औरतें खूब पोर्न देख रही हैं किन्तु सच यह है कि पोर्न मर्द ज्यादा देख रहे हैं। यह मूलत: मर्द विधा है।
पोर्न की ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में परिभाषा है  सन् 1864 से ''वेश्या के अपने संरक्षक के प्रति जीवन, हाव-भाव'' पोर्न है। बाद में चेम्बर ने लिखा '' कामुक उत्तेजना पैदा करने वाली सामग्री'' को पोर्न कहते हैं।इसका साझा थीम है पावर और समर्पण।जिसका आधार है वेश्या। जबकि ''कामुकता''(इरोटिका) में पोर्न की तुलना में नियंत्रण और वर्चस्व कम होता है।

पोर्न मनुष्य की बुनियादी जिज्ञासाओं को शांत करती है।जो पोर्न के आदी हो जाते हैं,वे अन्य किसी के साथ मिल नहीं पाते। पोर्न मर्द के बारे में झूठी धारणाएं पैदा करती है।स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में झूठी धारणा बनाती है। उत्तेजना पैदा करने के नाम पर पोर्न मर्द का शोषण करती है। स्त्री के प्रति घृणा पैदा करती है। मर्द और दोनों के बीच आत्मीयता का झूठा वायदा करती है। संक्रमण काल में सिर्फ हस्तमैथुन का विकल्प पेश करती है।पुरूष जब अकेला होता है, कामुक तौर पर कुण्ठित हो तब वह पोर्न देखता है।

पोर्न की लत शराब की लत की तरह है जो सहज ही छूटती नहीं है। अनेक मर्तबा पति अपनी पत्नी को साथ में बिठाकर पोर्न देखने के लिए दबाव डालता है और यह तर्क देता है इससे कामोत्तेजना बढ़ेगी सेक्स में मजा आएगा,बाद में स्वयं के मैथुन दृश्यों को कैमरे से उतारता है और सोचता है कि वह तो पोर्न से बाहर है किन्तु सच यह है कि इससे ज्यादा अमानवीय चीज कुछ भी नहीं हो सकती।

पोर्न का मूल लक्ष्य है अन्य व्यक्ति को अमानवीय बनाना,संबंध को अमानवीय बनाना,आत्मीयता को अमानवीय बनाना। इसके अलावा जो लोग पोर्न देखकर अपनी पत्नी से प्यार करना चाहते हैं, ऐसी पत्नियों के लिए पोर्न दर्दनाक अनुभव है। वे इसमें एकसिरे से आनंद नहीं ले पाती हैं।

जो लोग पोर्न का इस्तेमाल करते हैं वे अंदर से मर चुके होते हैं। वे अपने इस मरे हुए के दर्द से ध्यान हटाने के लिए पोर्न का इस्तेमाल करते हैं। पोर्न एक तरह से बच्चे का मनोविज्ञान भी है जहां बच्चा माता-पिता के नियंत्रण से मुक्त होकर जीना चाहता है। पुरू के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो मर्द पोर्न ज्यादा देखते हैं वे अंदर से खोखले हो जाते हैं,संबंध बनाने में असमर्थ होते हैं। पोर्न मर्द को जबूर करती है कि वह खोखले संबंध बनाए।
पोर्न की लत अवसाद की सृष्टि करती है।पोर्न मर्द को मुक्ति नहीं देता , बल्कि लत पैदा करता है ,लत का गुलाम बनाता है। इसके अलावा कामुक हिंसाचार में भी इसकी भूमिका है।पोर्न से बचने का आसान तरीका है कि आप अपने कम्प्यूटर को जबावदेह बनाएं, अन्य आपके कम्प्यूटर को देख सके कि आप क्या देख रहे हैं।पारिवारिक संबंधों में मधुरता हो,बच्चों से प्यार हो, तो पोर्न से बचा जा सकता है।


‘यादों से रची यात्रा’ से उठे सवाल -अरुण माहेश्वरी

                                                                 
           पूरन चंद जोशी की नयी किताब यादों से रची यात्राकिसी उपन्यास की तरह एक सांस में पढ़ गया। सभ्यता के भविष्य को लेकर गहरे सात्विक आवेग से भरी यह एक बेहद विचारोत्तेजक किताब है। मनुष्यता का भविष्य समाजवाद में है, इसमें उन्हें कोई शक नहीं है। पूंजीवाद उन्हें कत्तई काम्य नहीं है। समाजवाद या बर्बरताके सत्य को वे पूरे मन से स्वीकारते हैं। वे समाज में समता चाहते हैं और साथ ही मूलभूत मानवतावादी मूल्यों की भी प्राणपण से रक्षा करना चाहते हैं। 

समाजवाद और मानवअधिकारों में कोई अन्तर्विरोध नहीं, बनिश्बत एक दूसरे के पूरक है, इसीलिये दोनों के एक साथ निर्वाह को ही स्वाभाविक भी मानते हैं। सभ्यता का रास्ता समाजवाद की ओर जाता है, इसमें उनका पूरा विश्वास है। इतिहास का अंतिम पड़ावहोने के दावे के साथ अमेरिका की धरती से जो उदार जनतंत्र के झंडाबरदार निकलें, उनका तो दो कदम चलते ही दम फूलने लगा है। यह उदार जनतंत्र कुछ जरूरी प्रश्नों को उठाने के बावजूद पूंजीवाद के क्षितिज के बाहर सोचने में असमर्थ है और इसीलिये सभ्यता की मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं दे सकता, इसे वे भलीभांति समझते हैं।

त्रासदी यह है कि समाजवाद भी अपने प्रयोग की पहली भूमि पर विफल हो गया। रूस की कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक पार्टी) के नेतृत्व में वैज्ञानिक समाजवाद की विचारधारा के आधार पर रूस में जिस समाजवाद की स्थापना हुई, वह अर्थनीतिशास्त्रऔर मानवतावाद की कई कसौटियों पर खरा न उतर पाने के कारण टिक नहीं पाया, नाना प्रकार की विकृतियों का शिकार हुआ। और, इसमें सबसे बड़ी परेशानी का सबब यह है कि सोवियत संघ में पनपने वाली विकृतियों को समय रहते पहचानने में बुद्धिजीवियों का एक खास, मार्क्सवाद की वैज्ञानिक विचारधारा से लैस कम्युनिस्ट तबका क्यों बुरी तरह चूक गया? मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों की इस कमी का कारण क्या था और इससे उबरने का उपाय क्या हो सकता है, श्री जोशी की पुस्तक की बेचैनी का सबसे प्रमुख विषय यही है। अपनी इसी तलाश को वे विकल्प की तलाशकहते हैं। जोशीजी ने इस सिलसिले में खास तौर पर हिंदी के मार्क्सवादी लेखकों और बुद्धिजीवियों को, जिन्हें सोवियत जमाने में रूस जाने और वहां रहने तक के अवसर मिले, अनेक प्रश्नों से बींधा है और साथ ही जिन चंद लोगों ने अपनी अंतर्दृष्टि का परिचय देते हुए सोवियत समाज में पनप रही विद्रूपताओं को देखा, अपने परिचय के ऐसे कम्युनिस्ट और गैरकम्युनिस्ट लोगों के अनुभवों का जीवंत चित्र खींचते हुए उनकी भरपूर सराहना भी की है।

तथापि, यह भी साफ जाहिर है कि समाजवाद पर आस्था के बावजूद श्री जोशी कम्युनिस्ट नहीं है। वे मूलत: एक मानवतावादी है। कम्युनिस्ट वर्ग संघर्ष को इतिहास की चालिका शक्ति मानते हैं। कम्युनिस्टों के लिये वर्ग संघर्ष इतिहास का एक अन्तर्निहित नियम होने के बावजूद सर्वहारा के वर्ग संघर्ष का अर्थ इस सत्य के आगे की चीज है। वह कोई ऐतिहासिक परिघटना अथवा इतिहास का ब्यौरा भर नहीं है। यह ऐसा वर्ग संघर्ष है जिसका लक्ष्य वर्ग संघर्ष का ही अंत और एक ऐसी समाजव्यवस्था का उदय है जो किसी भी प्रकार के शोषण को नहीं जानती। वे सर्वहारा क्रांति से निर्मित उत्पीड़कों और उत्पीडि़तों से रहित समाजव्यवस्था में ही मनुष्य की गरिमा देखते है। आर्थिक परनिर्भरता मानव गरिमा के विरुद्ध है और इसीलिये माक्र्स की शब्दावली में आर्थिक ताकतों की अंधशक्तिको तोड़ कर वे ऐसी उच्चतर शक्ति को समाज का नियामक बनाना चाहते हैं जो मानव गरिमा के अनुरूप हो। जबकि मानवतावादी जोशीजी के लिये वर्ग संघर्ष नहीं, मनुष्य की मुक्ति और गरिमा का रास्ता सभ्यता द्वारा अर्जित कुछ सार्वदेशिक मानव मूल्यों के संचय का, भारत में गांधी और नेहरू का समन्वयवाद का रास्ता है। 

समाजवाद की स्थापना के मामले में कम्युनिस्ट किसी ऐतिहासिक नियतिवाद पर विश्वास नहीं करते। वे यह मानते हैं कि समाजवाद सभ्यता के इतिहास की एक अनिवार्यता होने पर भी अपने आप अवतरित होने वाली सच्चाई नहीं है। इसे लाने के लिये मजदूर वर्ग के नेतृत्व में समाजवादी क्रांति जरूरी है। कम्युनिस्ट पार्टी इसी मजदूर वर्ग के सबसे सचेत हिस्से, इसके हरावल दस्ते का प्रतिनिधित्व करती है, क्रांति के लिये जरूरी सम्यक रणनीति और कार्यनीति को निर्धारित करती है। इसीलिये पार्टी की अधीनता, उसका अनुशासन किसी भी कम्युनिस्ट की मजबूरी नहीं, उसका आत्मचयन है।

कम्युनिस्ट पार्टी, उसका समूचा ढांचा, उसका अनुशासन और खास तौर पर बुद्धिजीवियोंद्वारा स्वीकार ली जाने वाली उसकी अधीनता यही वे बिंदु है, जो जोशी जी की इस पुस्तक की सारी परेशानियों के मूल में है।

पाठकों को अपनी इन्हीं परेशानियों के घेरे में लेते हुए जोशी जी उन्हें अपने निजी अनुभवों और विचारों की एक लंबी चित्ताकर्षकयात्रा पर ले चलते हैं। सोवियत संघ की यात्राओं के समृद्ध अनुभवों, सभ्यता के संकट के बरक्स समाजवादी विकल्प के पहले प्रयोग की भूमि के प्रति रवीन्द्रनाथ, बर्टेंड रसेल, जवाहरलाल नेहरू आदि की तरह के कई मनीषियों के आंतरिक आग्रह, विस्मय और संशय की रोशनी में सोवियत संघ के बारे में  अपने जमाने में सामने आये ख्रुश्चेवउद्घाटनों, बे्रजनेव काल के गतिरोध संबंधी तथ्यों का ब्यौरा देते हुए जोशी जी कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों पर अनेक सवालों की बौछार करते हैं कि आखिर किस गरज से उन्होंने समाजवाद के इस पहले प्रयोग के अंदर की कमजोरियों और विकृतियों को देख कर भी नहीं देखा; क्यों समाजवाद की विकृतियों की निर्मम आलोचना करने का अपना बौद्धिक धर्मनिभाने के बजाय उन विकृतियों के लिये ही लगभग बचकाने प्रकार के तर्कों को जुटाते रहे?

उनका निष्कर्ष यह है कि बुद्धिजीवियों की ऐसी दुर्दशा और किसी वजह से नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी की अधीनता को स्वीकारने की वजह से हुई। धूर्जटि प्रसाद मुखर्जी के हवाले से कहते हैं : क्या बुद्धिजीवी के राजनीति में प्रवेश और हस्तक्षेप की यह जरूरी शर्त है कि वह किसी राजनैतिक पार्टी का सदस्य बने और उसका अनुशासन स्वीकार करे। ऐसा भी तो संभव है कि वह सदस्य न बने या उसके अनुशासन में न बंध कर भी उसके बुनियादी सिद्धांतों को ही नहीं उसके कार्यक्रम और नीतियों को स्वीकार करे।

अनुभव बताता है कि पार्टीबद्ध, अनुशासनबद्ध बुद्धिजीवी अंत में एक स्वतंत्र बुद्धिजीवी नहीं पार्टी का प्रवचनकार और व्याख्याता बन कर बुद्धिजीवी के रूप में समाप्त हो जाता है। कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन और उसका अनुशसान तो और भी कठोर है, जो बुद्धिजीवी को स्वतंत्र चिंतन की दिशा में नहीं, कम्प्लायेंस और कन्फॉर्मिटी और अंत में सबमिशनके रास्ते पर धकेलता है।

आज की तमाम परिस्थितियों में जोशी जी के इस कथन ने कितने स्वतंत्रजनोंको गदगद किया होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। कोलकाता से निकलने वाली पत्रिका वागर्थने तो अपने ताजा अंक के द्वितीय मुखपृष्ठ पर इस उद्धरण को किसी आप्तकथन की तरह प्रकाशित किया है।
इस बारे में जोशी जी से हमारा एक छोटा सा अनुरोध है कि वे सिर्फ‍ यह बतायें कि एक शोषणविहीन समाज की स्थापना के लिये कम्युनिस्ट पार्टी की जरूरत भी है या नहीं? इसी एक प्रश्न के जवाब से स्वत: बाकी सारे सवालों का जवाब मिल जायेगा। ध्यान देने की बात है कि अपनी इसी पुस्तक में उन्होंने ऐतिहासिक नियतिवाद की तरह के किसी भी विचार से खुद को सचेत रूप में अलग किया है।
जहां तक कम्युनिस्ट पार्टी के सांगठनिक ढांचे, समयसमय पर तय होने वाली उसकी कार्यनीतियों का सवाल है, वे किसी ईश्वरीय विधान से तय नहीं हुए हैं; यह एक लगातार विकासमान प्रक्रिया है; और इसीलिये बहस और विवादों से परे नहीं है।
और जहां तक इतिहास की गति को पकड़ने में बुद्धिजीवियों की असमर्थता का सवाल है, इसका ठेका अकेले कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों ने ही नहीं ले रखा है। बौद्धिक कर्म का पूरा इतिहास ऐसी तमाम कमजोरियों, भूलों और असंख्य मूर्खताओं से ही तो पटा हुआ है! इतिहास और वर्तमान, दोनों में ही किसे ग्रहण करे और किसे त्यागे, इसकी स्वतंत्रता सबके पास है और सभी अपनीअपनी जरूरतों और प्राथमिकताओं (सही कहे तो अपने स्वार्थों) के अनुरूप यह काम करते रहते हैं। देखने की बात यह है कि किसका स्वार्थ किस बात से जुड़ा है?
इस संदर्भ में पूंजीके पहले खंड की भूमिका में माक्र्स की यह बेहद सारगर्भित टिप्पणी देखने लायक है, जिसमें जर्मन अर्थशास्त्रियों की विडंबनां का चित्र खींचते हुए वे कहते हैं:
जिस समय ये लोग राजनीतिक अर्थशास्त्र का वस्तुगत अध्ययन कर सकते थे, उस समय जर्मनी में आधुनिक आर्थिक परिस्थितियां वास्तव में मौजूद नहीं थीं। और जब ये परिस्थितियां वहां पैदा हुईं, तो हालत ऐसी थी कि पूंजीवादी क्षितिज की सीमाओं में रहते हुए उनकी वास्तविक ओर निष्पक्ष छानबीन करना असंभव होगया। जिस हद तक राजनीतिक अर्थशास्त्र इस क्षितिज की सीमाओं के भीतर रहता है, अर्थात् जिस हद तक पूंजीवादी व्यवस्था को सामाजिक उत्पादन के विकास की एक अस्थायी ऐतिहासिक मंजिल नहीं, बल्कि उसका एकदम अंतिम रूप समझा जाता है, उस हद तक राजनीतिक अर्थशास्त्र केवल उसी समय तक विज्ञान बना रह सकता है, जब तक कि वर्गसंघर्ष सुषुप्तावस्था में है या जब तक कि वह केवल इक्कीदुक्की और अलगअलग परिघटनाओं के रूप में प्रकट होता है।
फ्रांस और इंग्लैंड में बुर्जु‍आ वर्ग ने राजनीतिक सत्ता पर अधिकार कर लिया था। उस समय से ही वर्गसंघर्ष व्यावहारिक तथा सैद्धांतिक दोनों दृष्टियों से अधिकाधिक बेलाग और डरावना रूप धारण करता गया। इसने वैज्ञानिक बुर्जु‍आ अर्थशास्त्र की मौत की घंटी बजा दी। उस वक्त से ही सवाल यह नहीं रह गया कि अमुक प्रमेय सही है या नहीं, बल्कि सवाल यह हो गया कि वह पूंजी के लिए हितकर है या हानिकारक, उपयोगी है या अनुपयोगी, राजनीतिक दृष्टि से खतरनाक है या नहीं। निष्पक्ष छानबीन करने वालों की जगह किराये के पहलवानों ने ले ली; सच्ची वैज्ञानिक खोज का स्थान दुर्भावना तथा पक्षमंडन के कुत्सित इरादे ने ग्रहण कर लिया।
...जर्मनी में उत्पादन की पूंजीवादी प्रणाली उस वक्त सामने आयी, जब उसका विरोधी स्वरूप इंगलैंड और ांस में वर्गों के भीषण संघर्ष में अपने को पहले ही प्रकट कर चुका था। इसके अलावा इसी बीच जर्मन सर्वहारा वर्ग ने जर्मन बुर्जु‍आ वर्ग की अपेक्षा कहीं अधिक स्पष्ट वर्गचेतना प्राप्त कर ली थी। इस प्रकार, जब आखिर वह घड़ी आयी कि जर्मनी में राजनीतिक अर्थशास्त्र का बुर्जु‍आ विज्ञान संभव प्रतीत हुआ, ठीक उसी समय वह वास्तव में फिर असंभव होगया।

मंगलवार, 2 मार्च 2010

संघ के हिन्दू संस्कृति के खोखले खेल

संघ जिस हिन्दू संस्कृति की बात करता है वह मूलत: हिन्दू संस्कृति नहीं है। साम्प्रदायिक संस्कृति है। इसकी ही जीरोक्स कापियां प्रचलन में हैं। संघ वालों ने ब्रिटिशशासकों के द्वारा बतायी हिन्दू संस्कृति का अनुकरण करके हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा बनायी ,अब वे लोग अमरीका के भक्त हो गए हैं और अमरीकी सांस्कृतिक कारखाने में तैयार अस्मिता की धारणा को उछाल रहे हैं।

     उल्लेखनीय है भारत में अस्मिता की राजनीति के जनक ब्रिटिशशासक थे। उनके विचारकों ने अस्मिता के विमर्श की शुरूआत की, वे ही लोग थे जिन्होंने अस्मिता के अवैज्ञानिक आधार को निर्मित किया। आज के दौर में भी अस्मिता का सारा विश्वव्यापी प्रपंच साम्राज्यवाद के कारखानों में ही तैयार किया जा रहा है और वे उसकी जीरोक्स कापी से काम चला रहे हैं।

     साम्राज्यवाद को असल नहीं नकल से प्यार होता है। कृत्रिम अथवा बनाबटी से प्यार होता है। वे जबभी किसी धारणा,अवधारणा अथवा संस्कृति के रूप  की बात करते हैं तो पहले उसकी इच्छित छवि और धारणा बनाते हैं और उसके बाद उसे सारी दुनिया पर थोप देते हैं। ''पांच करोड़ की गुजराती अस्मिता'' मूलत: संस्कृति उद्योग के अस्मिता के कारखाने का उत्पादन है। मीडिया का सांस्कृतिक उत्पादन है। इसे असल गुजराती अस्मिता समझना भूल होगी। यह नकल की नकल है। परम सुंदर है,हाइपररीयल है।
       मोदी का गुजरात अब संघ का गढ़ है। यह गांधी का राज्य नहीं रहा। गुजरात में अब घटनाएं नहीं होतीं बल्कि हिंसा होती  है। अब गुजरात का इतिहास हिंसा के जरिए निर्मित हो रहा है। ऑक्टोवियो पाज ने एक बार कहा था  अमरीका का जन्म इतिहास से पलायन के लिए हुआ है। यूटोपिया का निर्माण इतिहास से पलायन कराता है। यही बात संघ परिवार के बारे में कही जा सकती है कि संघ परिवार का जन्म इतिहास से पलायन के लिए हुआ है। जहां-जहां भाजपा का शासन आया है और खासकर गुजरात में तो इतिहास को एकदम खदेड़ दिया गया है।
       हम जब संस्कृति पदबंध का प्रयोग करते हैं तो इसमें किसी भी किस्म के प्रतिबंध की बात शामिल नहीं होती। संस्कृति में प्रतिबंध शामिल नहीं होता। किंतु ''पांच करोड़ की गुजराती अस्मिता'' में जिस संस्कृति का आख्यान शामिल है वहां प्रतिबंध ही प्रतिबंध हैं। संस्कृति के लिए स्वतंत्रता चाहिए,सहिष्णुता चाहिए।    

     हमने संस्कृति को 'अच्छी' और 'बुरी' के नाम से वर्गीकृत, प्रदूषित और सीमित कर दिया है। संस्कृति में किसी भी किस्म की बाधाएं नहीं होतीं। किंतु संघ परिवार की हिन्दू संस्कृति प्रतिबंधों से भरी है। संस्कृति में चुनने की आजादी होती है। संघ की संस्कृति में चुनने की आजादी नहीं है। वहां पर जो तय कर दिया गया है उसे हर हालत में मानना होगा। अस्वीकार करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। संस्कृति में स्वतंत्रता होती है और प्रत्येक किस्म की व्यवस्था को अपना अस्तित्व बनाए रखने की आजादी होती है। संघ परिवार इन सब बातों को नहीं मानता। वैसे ही जैसे अमरीका नहीं मानता। अमरीका की भी यही समस्या है वह सभी किस्म की व्यवस्थाओं के अस्तित्व को मानने को तैयार नहीं है।
बौद्रिलार्द ने ''अमरीका'' नामक किताब में यही लिखा कि अमरीका का जन्म ही इतिहास से पलायन के लिए हुआ। यही वजह है कि अमरीका का कोई इतिहास नहीं है। वह सिर्फ उनका ही प्रतिनिधित्व करता है जो उसके यूटोपिया में शरण लेना चाहें।

बहुत सारे लोग हैं जो अमरीका के सपने में खोए रहते हैं।निहित आकांक्षाओं में तल्लीन रहते हैं। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि 90 फीसदी लोग तो यूटोपिया में ही जीते हैं और सपने देखते रहते हैं।

अधिकांश सरकारें अपने तरीके से यूटोपिया पैदा करने की कोशिशें कर रही हैं। ठीक उसी रास्ते पर संघ परिवार ने गुजराती अस्मिता के यूटोपिया को उछाला है और इसकी प्रयोगशाला गुजरात को बनाया है।

इसके पहले राम के यूटोपिया का सारे देश में इस्तेमाल किया गया। अब संघ ने नई रणनीति के तहत प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग किस्म के यूटोपिया बनाने शुरू कर दिए हैं। इनमें उसे काफी हद तक सफलता मिली है। लोगों और राज्यों को विभाजित करने में सफलता मिली है। राम के यूटोपिया की सफलता के बाद संघ परिवार ने छोटे राज्यों के यूटोपिया को प्रचारित किया और आज हमारे बीच में उत्तराखंड,छत्तीसगढ़ और झारखंड उपलब्धि के तौर पर मौजूद हैं। इसके बाद गुजरात का प्रयोग चल रहा है और इससे अन्य राज्यों को भी प्रेरणा मिल रही है। गुजराती अस्मिता का प्रयोग विगत दस सालों में काफी जनप्रिय रहा है और  आशाओं के अनुरूप परिणाम निकले हैं। संघ का यूटोपिया खोखला यूटोपिया है वह जिस लक्ष्य का वायदा करता है उस तक कभी नहीं पहुँचता और इसका साक्षात् प्रमाण है राममंदिर आन्दोलन, तीन नए राज्यों का गठन। इन राज्यों के गठन के बावजूद भी इनकी समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। बल्कि वास्तविकता यह है कि समस्याएं और भी ज्यादा जटिल हुई हैं। संघ का यूटोपिया लोगों को अंधानुकरण के रास्ते पर ले जाता है ,लोगों में यथार्थ समस्याओं से पलायन की भावना पैदा करता है। 
      


                  


संघ जानता है पश्चिम बंगाल और गुजरात का अंतर-3-

कम्युनिस्ट विचारधारा ने निष्क्रिय दर्शक और अनुगामी जनता के निर्माण की कला पूंजीवाद से सीखी है। यह मूलत: पूंजीवादी कला है इसका मार्क्सवाद से कोई लेना-देना नहीं है। सोवियत संघ ,चीन आदि समाजवादी देशों ने इस कला को प्रथम विश्वयुद्ध के पूंजीवादी प्रचार अभियान के अनुभवों से सीखा था। पूंजीवाद ने इसी कला को विज्ञापन और जनसंपर्क की कला में तब्दील कर दिया, जबकि समाजवादी सोवियत संघ आदि देशों ने क्रांतिकारी अनुगामिता में रूपान्तरित कर दिया। पश्चिम बंगाल में सक्रिय वाम संगठन बड़े ही कौशल के साथ जनसंपर्क और विज्ञापन की प्रचार रणनीतियों का अनुगामी बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
       
जनसंपर्क और विज्ञापन की रणनीतियों के आधार पर किया गया प्रचार अभियान जनता को अपनी ओर आकर्षित करने में तब ही सफल होता है जब उस प्रचार अभियान को नीचे ले जाने वाली संरचनाएं  उपलब्ध हों। वाम के पास ऐसी सांगठनिक संरचनाएं हैं जो प्रतिदिन अहर्निश विचारों की मार्केटिंग करती रहती हैं। ग्राहक पर कड़ी नजर रखती हैं, उसका प्रोफाइल रखती हैं, उसके मूवमेंट पर नजर रखती हैं। विज्ञापन रणनीति का मूल मंत्र है आक्रामकता। आक्रामक प्रचार और येनकेन प्रकारेण ध्यान खींचना,बांधे रखना। ये सारे मंत्र वाम के पास हैं।
      
मार्केटिंग का सबसे बढ़िया तरीका है माल को हर हाल में बेचना, सबको बेचना, पक्के ग्राहक बनाना, ऐसे ग्राहक बनाना जो खरीदें किंतु सोचें नहीं, भोग करें किंतु भागें नहीं। जो भागना चाहे उसे पाने की कोशिश करो। साम,दाम,दंड,भेद का इस्तेमाल करो। पटाओ और अनुयायी बनाओ। कोई भी आंदोलन हो ,कितना भी बड़ा आंदोलन हो, कितना ही बड़ा जनोन्माद पैदा हो, कितनी ही बड़ी गलती हो, जनता को फुसलाना और अनुगामी बनाना,उसके दिलोदिमाग को हर हालत में काबू में करना ही वाम की रणनीति रही है। वाम कभी विपक्ष के सामने नहीं झुकता किंतु जनता के बीच साम,दामदंड,भेद की कला का इस्तेमाल करता है। यह समूची विज्ञापन,जनसंपर्क और मार्क्सवादी सांगठनिक संरचनाओं के सहमेल से बनी रणनीति है।

विज्ञापन और जनसंपर्क की कला पालतू बनाने की कला है, यह आलोचनात्मक मनुष्य नहीं बनाती, बल्कि  धूर्त्त मनुष्य बनाती है। ऐसा मनुष्य बनाती है जो कभी भी अपना ब्राँड बदल लेता है बगैर किसी कारण के ब्राँड बदल लेता है। बगैर किसी कारण के जब कोई ब्राँड बदल लेता है तो पहले वाला ब्राँण्ड अपने ग्राहक को पुन: पाने की कोशिश करता है ,प्रलोभन देता है, कमीशन देता है, अतिरिक्त माल भी देता है। वह सिर्फ यही चाहता है कि उसका पुराना ग्राहक लौट आए।
 ब्रॉण्ड कल्चर के आधार पर माकपा ने अपने नेताओं की इमेज निर्मित की है। इस प्रक्रिया में सब कुछ तय है, भाषण भी तय है, फूल भी तय हैं, जनता भी तय है। आखिरकार ब्राँण्ड प्रमोशन के आधार पर जुटायी गयी जनता सिर्फ अनुगामी होती है। यही अनुगामी जनता वाम की ताकत है। यह मूलत :अनालोचनात्मक जनता है। यह वाम की गलतियों का लंबे समय तक प्रतिवाद नहीं करती थी, (सन् 2007 के बाद इसने प्रतिवाद करना आरंभ किया है) ब्राँण्ड संस्कृति की यही ताकत है। ब्राँण्ड का भोक्ता अनालोचनात्मक होता है। अनालोचनात्मक जनता वैसे ही इफरात में उपलब्ध है इसके लिए थोड़ा कौशलभर चाहिए वह किसी के साथ जा सकती है। मुश्किलें यहीं पर हैं, जनता को सिर्फ भोगना है। भोक्ता की तरह व्यवहार करना है। वाम की शक्ति और दुर्गति का प्रधान कारण है ,अनुगामी और भोक्ता जनता। 

संघ जानता है पश्चिम बंगाल और गुजरात का अंतर-2-



जिस तरह किसी संत-मंहत और सन्यासी के हजारों-करोड़ों भक्त भारत में मिलेंगे, उसके पीछे खड़ी अनुगामी भक्त मंडली मिलेगी,ठीक वैसी ही अनुगामी जनता पश्चिम बंगाल में तैयार करने में लाल को सांगठनिक सफलता मिली है। 

भक्त जनता भारत में हमेशा से महान रही है। भक्त को हमारे यहां के भक्ति आंदोलन के कवियों ने भगवान से भी बड़ा दरजा दिया है। हमने कभी भक्त के दोषों की नहीं भक्त की भक्ति को महान बताया है और उसके सभी दोषों को माफ किया है। भक्त बनाने के इस सांस्कृतिक- धार्मिक मॉडल को रैनेसां में सबसे पहले नए सांचे में ढाला गया ,नए किस्म की भक्ति परंपरा के सांचे में ढाला गया, इस कार्य में भक्ति का नवीकरण हुआ अनुगामी भाव का भी नवीकरण हुआ। भक्त,भक्ति और एकजुटता के आलोक में जो नयी नेटवर्किंग रैनेसां के प्रभाववश तैयार हुई उसके साथ आधुनिक संगठन संरचनाओं,संस्थानों आदि के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई।
     

कालान्तर में आजादी के बाद धीरे-धीरे रैनेसां के दौर में उपजी नये किस्म की भक्तिभावना को सचेत रूप से राजनीति में क्रमश: शामिल किया गया और माक्र्सवाद की नयी विचारधारा के आलोक में उसे पेश किया गया। मार्क्सवाद के साथ रैनेसां के मेलबंधन के रास्ते तलाशे गए, रैनेसां को माक्र्सवादी संगठन की विचारधारा के साथ जोड़ा गया, रैनेसां के अनुगामी बनाने के मंत्र को तेजी से आत्मसात किया गया। यही वह प्रस्थान-बिंदु है जहां से पश्चिम बंगाल का कम्युनिस्ट आंदोलन अपनी असली ऊर्जा लेता रहा है। रैनेसां के अंदर भक्ति का पुराना मंत्र शामिल था,कुछ संशोधनों के साथ। किंतु इसमें एक धागा था जो समूची बंगाली जाति को बांधे था वह धागा था भक्ति का। आधुनिक भक्ति का। समाजसुधार संगठनों के पीछे चलो, उनके अनुयायी बनो,चाहे जो करो।
   

''अनुयायी बनो चाहे जो करो'' यह नारा रैनेसांयुगीन सुधारवादी धार्मिक संगठनों ने बंगाल में दिया  था। कम्युनिस्टों ने ठीक इसी नारे को आत्मसात करके पश्चिम बंगाल में धीरे-धीरे अपनी सांगठनिक संरचनाओं का निर्माण किया है।

 रैनेसांकालीन भक्ति पुराने भक्ति-आंदोलन से बुनियादी तौर पर भिन्न है। पुरानी भक्ति ''चाहे जो करो'' की अनुमति नहीं देती, चाहे जो करो वाले लोग पुरानी भक्ति में नहीं मिलेंगे, वहां भक्ति की संरचनाएं भी नहीं मिलेंगी। पुरानी भक्ति राजनीतिमुक्त थी। राजनीति से परे थी। 

इसके विपरीत रैनेसांकालीन भक्ति ने पुरानी भक्ति से विचार पर जोर देने वाला तत्व और आंखें बंद करके उपासना करने का भाव लिया, आधुनिक पूंजीवाद से स्वतंत्रता और अनुगामी भावबोध लिया। इस प्रक्रिया में ही  यह नारा निकला ''भक्त बनो और कुछ भी करो।'' पुराना भक्ति आंदोलन कंठीबंद ,चेलापंथी नहीं था। वहां भक्ति और सिर्फ भक्ति थी, वहां स्वतंत्रताबोध नहीं था।
   
नया रैनेसां कंठीबंद भक्तों की पूरी जमात तैयार करने में लग गया। उदीयमान पूंजीवाद ,साम्राज्यवाद आदि के सबसे बड़े अनुगामी और विरोधी इसी रैनेसां के गर्भ से पैदा हुए। नई पूंजीवादी संरचनाओं के सर्जक इसी आंदोलन के गर्भ से पैदा हुए। नए पूंजीवादी विचारों के प्रचारक इसी रैनेसां के आन्दोलन के द्वारा तैयार किए गए। ये वे लोग थे जो पुराने उजड़े सामंती परिवारों से आए थे। इन लोगों ने आरंभ में एकल परिवार पर कम परिवार पर ज्यादा जोर दिया, स्त्री के महिमामंडन का महाख्यान तैयार किया, आधुनिकता का महाख्यान तैयार किया, यही वह वर्ग है जो कालान्तर में लाल का महाख्यान तैयार करने में लग गया, लाल को इस अर्थ में रैनेसां से बहुत कुछ सीखने को मिला, बहुत कुछ ऐसा भी था जो आधुनिक पूंजीवादी था।
       
जिस स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी के प्रथम जयघोष का श्रेय रैनेसां के बंगाली बुद्धिजीवियों को जाता है उनकी विरासत के साथ वाम ने अपने को जोड़ा। उनसे स्वतंत्रता और अनुगामिता को ग्रहण किया और उसे अपनी सांगठनिक पूंजी में तब्दील किया। कालान्तर में सन् 1977 में सत्ता में आने के बाद लाल ने एक नया तत्व अपनी रणनीति में जोड़ा जिसे सोवियत संघ,चीन आदि के अनुभवों से सीखा गया, इसके तहत जनता को निष्क्रिय दर्शक बनाने की कला का कौशलपूर्ण ढ़ंग से विकास किया गया। वाम ने विगत तैंतीस साल के शासन में इस कला का क्रमश: विकास किया,निष्क्रिय दर्शक जनता को रैनेसां की अनुगामिता के सहमेल के साथ दिलो-दिमाग में सांगठनिक संरचनाओं के जरिए जेहन में उतारा गया है। यह बेहद मुश्किल और जटिल काम है।

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संघ जानता है पश्चिम बंगाल और गुजरात का अंतर-1-

नरेन्द्र मोदी पर हाल ही में मैंने जो लेख लिखे हैं उन पर टिप्पणी करते हुए हमारे अनेक पाठक दोस्तों ने मांग की है कि मैं पश्चिम बंगाल के बारे में विस्तार से क्यों नहीं लिखता ? वे यह भी मांग कर रहे हैं कि मेरा वाम के साथ कनेक्शन है इसलिए वाम की आलोचना नहीं लिखता। इनमें से कोई भी बात सच नहीं है। प्रमाण मेरे पास नहीं बाजार में हैं, मैंने वाम की गलतियों पर सबसे तेज लिखा है लेकिन वाम अगर सही काम कर रहा है तो बेवजह आलोचना नहीं की है। मैं अपने जागरुक पाठक दोस्तों से वायदा करता हूँ कि आपको विस्तार के साथ बंगाल के सच से भी अवगत कराऊँगा। यहां सिर्फ बंगाल और गुजरात के अंतर पर प्रतिवाद की संस्कृति के संदर्भ में रोशनी ड़ाल रहा हूँ। बंगाल में ऐसे बुद्धिजीवी भी हैं जो बंगाल और गुजरात की मोदी और बुद्धदेव की नंदीग्राम की बर्बर घटना के बाद तुलना कर रहे हैं।
      जो लोग गुजरात के साथ पश्चिम बंगाल की तुलना कर रहे हैं,मोदी के साथ बुद्धदेव की तुलना कर रहे हैं वे थोड़ा गंभीरता के साथ सोचें कि क्या गुजरात में एक भी विशाल बौद्धिक प्रतिवाद विगत पांच सालों में हो पाया है जैसा नंदीग्राम अथवा तसलीमा के मसले पर पश्चिम बंगाल में हुआ है। कम से कम पश्चिम बंगाल में सांस्कृतिक संरचनाएं अभी भ्रष्ट नहीं हुई हैं। गुजरात में विगत पांच सालों में ''पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता'' ने समस्त बौद्धिक ऊर्जा और गरिमा को नष्ट कर दिया है। गुजरात में कहीं पर भी व्यापक बौद्धिक प्रतिरोध नजर नहीं आता। लोग डरे हैं। शक्तिहीन हैं। प्रतिवाद करने में असमर्थ हैं। प्रतिवाद करने वालों को उत्पीड़ित किया जाता है। आज गुजरात में सांस्कृतिक प्रतिवाद संगठित करने का सामान्य माहौल नहीं है।
    ध्यान रहे सांस्कृतिक और बौद्धिक सर्जना और प्रतिवाद का माहौल जब एक बार नष्ट कर दिया जाता है तो उसे दुबारा निर्मित करने में बहुत परिश्रम लगता है। गुजरात की उपलब्धि मोदी की सरकार नहीं है, सरकारें तो आती-जाती रहती हैं। गुजरात के दंगे भी उतने परेशान नहीं करते जितना यह बात परेशान करने वाली है कि गुजरात में संस्कृति,कला,साहित्य आदि किसी भी किस्म के बौध्दिक प्रतिरोध और सर्जना की अभिव्यक्ति संभव नहीं है। लेखकों,कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों को परेशान किया जा रहा है, विस्थापित किया जा रहा है, सृजन से रोका जा रहा है। यह सारा संवैधानिक तौर पर चुनी सरकार के बैनर तले हो रहा है। इसे ही वास्तव अर्थों में फासीवाद कहते हैं। सवाल किया जाना चाहिए सभ्यता,संस्कृति,कला आदि को पूरी तरह नष्ट करके किस तरह की गुजराती अस्मिता मोदी और संघ परिवार निर्मित करना चाहता है ? क्या अस्मिता के लिए संस्कृति जरूरत नहीं है ? जी हां, वास्तविकता यही है कि इन दिनों जो लोग अथवा संगठन अस्मिता के नगाड़े बजा रहे हैं उन्हें सिर्फ अस्मिता के कोलाहल,हंगामे और सत्ता पसंद है, उन्हें संस्कृति पसंद नहीं है। वे आए दिन जरा-जरा सी बातों,नामसूचक शब्दों,जातिसूचक शब्दों पर इस कदर अपने भाव व्यक्त करते हैं कि उन्हें प्रेमचंद,एमएफ हुसैन ,नामवरसिंह, माधुरी दीक्षित,आमिरखान जैसे व्यक्तित्वों का अपमान करने में शर्म नहीं आती। अस्मिता की राजनीति आज स्वार्थ, उपयोगितावाद, कैरियरिज्म और संस्कृतिविहीनता के पथ पर चल पड़ी है। इसने सर्वसत्तावादी राजनीति का दामन पकड़ लिया है। सर्वसत्तावाद और फासीवाद एक-दूसरे के साथ भारत में अन्तर्क्रियाएं कर रहे हैं और संस्कृति पर हमले कर रहे हैं। सर्वसत्तावाद के हमलों को संस्कृतिकर्मियों ने समाजवादी समाजों में भी झेला है और फासीवाद के दौर में भी झेला है।
मोदी का गुजराती अस्मिता का नारा फासीवादी नारा है। यह प्रत्यक्ष हिंसाचार की संस्कृति और राजनीति का नारा है। मीडिया को घटिया चीजों से प्यार होता है और वह उनके उत्पादन और पुनर्रूत्पादन में अहर्निश व्यस्त रहता है। मीडिया को अपनी रेटिंग की चिन्ता होती है। उसे विवेक, संस्कृति, समाज आदि किसी की भी चिन्ता नहीं होती। यदि रेटिंग में छलांग मोदी के बहाने लग सकती है तो मोदी को उछालो और यदि गुजराती अस्मिता के बहाने लग सकती है तो उसे उछालो।

मीडिया की रेटिंग हमेशा सबसे घटिया किस्म की चीजों अथवा सास्कृतिक गंदगी के प्रदर्शन पर बढ़ती है। सांस्कृतिक गंदगी सबका ध्यान खींचती है और मोदी हमारी सांस्कृतिक- राजनीतिक गंदगी का चमकता सितारा है। ऐसे ही अनेक नायक मीडिया के पास हैं जो समय-समय पर पर्दे पर आते रहते हैं। दर्शकों को वे चीजें और बातें ज्यादा ज्यादा आकर्षित करती हैं जिन्हें समझने के लिए बुद्धि खर्च न करनी पड़े। जिनकी देखभाल न करनी पड़े। हमें वे ही चीजें देखने में अच्छी लगती हैं जिन्हें देखकर थोड़ा सा मजा आ जाए और बात खत्म। क्षणिक आनंद हमारा मूल लक्ष्य है। इस क्षणिक आनंद वाली मानसिकता ने हमारी राजनीति को भी घेर लिया है। राजनीति में जो चल रहा है उसके प्रति भी हमारा क्षणिक सरोकार है। चुनाव हुए हम भूल गए। घटना हुई हम भूल गए। वोट डाला और भूल गए। क्षणिक अनुभूति वस्तुत: खोखली अनुभूति होती है।
  
सवाल उठता है क्या ''पांच करोड़ की गुजराती अस्मिता'' जैसी कोई चीज है ? असल में ऐसी कोई वास्तविकता नहीं है।  फिर मोदी को सफलता क्यों मिली कि लोग उसके इस नारे में विश्वास करने लगे ? इस प्रसंग में यह तथ्य ध्यान में रखें कि मौजूदा दौर शब्दों का अपने यथार्थ से संबंध कट चुका है। आज सभी किस्म की धारणाएं और अवधारणाएं सामान्यीकरण और सरलीकरण के जरिए पहुँच रही हैं। इसके कारण वास्तव का हमारी जिन्दगी से अहसास ही खत्म हो गया है, हम जिसका अहसास करते हैं वह वास्तव नहीं कृत्रिम होता है। कृत्रिम भावनाओं,कृत्रिम धारणाओं और कृत्रिम राजनीति को देखते-देखते हम इस कदर अभ्यस्त हो गए हैं कि असली क्या है इसे भूल गए हैं। हमारे इर्द-गिर्द कृत्रिम का ही अनुकरण हो रहा है। संघ परिवार की अस्मिता की राजनीति कृत्रिम राजनीति है,उसका देश और गुजरात की वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है।


                 



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