शनिवार, 6 मार्च 2010

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर विशेष- औरत को बांटने वाली शक्तियां



महिलाओं का सन् 1947 के विभाजन ने जो अ-राजनीतिकरण किया उसी का कालान्तर में हिन्दुत्ववादी संगठनों ने जुझारू साम्प्रदायिक विचारधारा के साथ इस्तेमाल किया। यह विडम्बना ही कही जाएगी कि जिस समय औरतें अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही थीं,राजनीतिक स्पेस तैयार करने में लगी थीं, औरतों के व्यापक हितों से जुड़े सवाल उठा रही थीं,अपना जनाधार व्यापक बनाने की कोशिश कर रही थीं। औरतों के लिए राजनीतिक माहौल अनुकूल बन रहा था,ठीक उसी समय औरतों को साम्प्रदायिक विभाजन और साम्प्रदायिक हिंसा का सबसे ज्यादा सामना करना पड़ा। 
    
    यही वह दौर है जिसमें औरत को अगड़े और पिछड़े के आधार पर, हिन्दू और मुसलमान के आधार पर विभाजित करके पेष किया गया। जेण्डर के रूप में औरत की समग्र पहचान को तोड़ा गया। अब एक ऐसी औरत सामने आयी जिसे दंगाई औरत भी कह सकते हैं। दंगा करती औरत, आग लगाती औरत ,पूरी तरह साम्प्रदायिक औजारों से लैस औरत। इस औरत की छवि भारत में पहले कभी नहीं देखी गई थी।

औरत की जेण्डर के रूप में पहचान को अस्वीकार करने वाली समस्त धारणाएं अंतत: मर्दवादी विचारधारा की शरण में जाती हैं। इसे मर्दवाद का प्रच्छन्न लक्षण कहना गलत नहीं होगा।औरत के इस विभाजनकारी रूप ने जेण्डर के रूप में महिला की राजनीतिक और सामाजिक पहचान को जबर्दस्त क्षतिग्रस्त किया है। महिला आन्दोलन की राजनीतिक षक्ति को कमजोर किया है। विचारधारा के क्षेत्र में पुंसवाद के खिलाफ संघर्ष को कमजोर किया और सामाजिक कट्टरता को पुख्ता बनाया है।
    
    औरत की धारणा को लेकर साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों में पुरूष-संदर्भ अभी भी वर्चस्व बनाए हुए है। औरत अभी भी साहित्य में बेटी,बहन,बीबी,बहू ,माँ,दादी,चाची,फूफी, मामी आदि रूपों में ही आ रही है। औरत को हमारे साहित्यकारऔर राजनीतिज्ञ परिवार के रिश्ते के बिना देख नहीं पाते ,पुरुष -संदर्भ के बिना देख नहीं पाते। कहीं-कही औरत की आर्थिक यूनिट के रूप में छवि नजर आती है।
    इस प्रसंग में हिन्दी आलोचना के बारे में सबसे पहली आपत्ति यह है कि उसमें स्त्री का एक अनुशासन (डिसिपिलीन) के रूप अभी तक अध्ययन ही नहीं किया गया। सच यह भी है कि हिन्दी में बहुत कम विषय हैं -कविता और इतिहास को छोड़कर -जिनका अनुशासन के रूप में अध्ययन-अध्यापन किया गया है।
      कायदे से ज्ञान के अनुशासन के रूप में औरत के अध्ययन-अध्यापन पर जोर दिया जाना चाहिए। हम अनुशासन के रूप अध्ययन पर जोर क्यों दे रहे हैं ? इसका प्रधान कारण है कि जब आप किसी विषय का अनुशासन के रूप में अध्ययन करते हैं तो विषय का दायरा परिभाषित करते हैं। तब ही उसका अध्ययन कर पाते हैं। जब उसके लिए विशिष्ट पध्दति चुनते हैं तो विश्लेषण के माध्यम से भाषा और अवधारणात्मक औजारों का निर्माण करते हैं। बिना यह किए आप जेण्डर या औरत को परिभाषित नहीं कर सकते।

स्त्री के सामाजिक यथार्थ को रूपायित करने के लिए स्त्री-पुरूष की सही इमेज या अवस्था की सटीक समझ परमावश्यक है। औरत की सही समझ के अभाव में समूचा विवेचन अमूर्त्त हो जाता है, प्रभावहीन हो जाता है ,औरत अमूर्त्त या अदृश्य हो जाती है। औरत की अदृश्य स्थिति के कारण विकृत विश्लेषण जन्म लेता है, और जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं वे अप्रामाणिक और अधूरे होते हैं। यह स्थिति आज भी हमारे साहित्य में मौजूद है।

     साहित्य में वर्णित ज्यादातर लेखन स्त्री के प्रति अमूर्त्त समझ को व्यक्त करता है। इसका प्रधान कारण है जेण्डर की सही सैध्दान्तिकी के ज्ञान का अभाव। असल में जेण्डर तय गतिशील अभ्यासों का प्रतिनिधित्व है। स्त्री के जब राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात की जाती है और उसे समस्या के समाधान के रूप में पेश किया जाता है तो उसके राजनीतिक क्षेत्र में कम प्रतिनिधित्व की बात को उठाया जाता है।ऐसी अवस्था में जेण्डर एक वैध राजनीतिक केटेगरी के रूप में उभरकर सामने आती है।

    यह इस बात का भी संकेत है कि औरतों का सामाजिक प्रतिनिधित्व घट रहा है।समाज में स्त्री का जो स्थान है उसके प्रति सवाल उठ खड़े हुए हैं। औरतों की आर्थिक,सामाजिक और राजनीतिक अवस्था संतोषजनक नहीं है। औरत के चर्चा में आने या बने रहने का अर्थ है कि औरत के मसले अभी सुलझ नहीं पाए हैं। औरत के मसले क्यों उलझते हैं क्योंकि आम लोगों में उसकी वास्तविकता का ज्ञान नहीं होता। औरत के प्रति पूर्वाग्रह काम करते रहते हैं। औरत के प्रति समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों को खत्म करने के लिए औरत की जेण्डर के रूप में पहचान को समग्रता में विश्लेषित किया जाना चाहिए। इस कार्य में अर्थशास्त्र और राजनीति में जेण्डर विमर्श की सही समझ का होना जरूरी है।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर खास- भारतीय औरत का राजनीतिक मर्म



                                                                                  
जेण्डर सामाजिक निर्मिति है। जेण्डर के प्रयोग को लेकर हिन्दी में समानधर्मा सही शब्द औरत या महिला है। जबकि लिंग के पर्याय के रूप में दोनों लिंग -स्त्री और पुरूष- का बोध होता है। लिंग के रूप में जन्म प्रकृत्या होता है। किन्तु जेण्डर के रूप में औरत का निर्माण किया जाता है। कोई भी स्त्री जन्म से औरत के गुण लेकर पैदा नहीं होती। बल्कि उसके निर्माण में परिवार,शिक्षा, संस्कृति, राजनीति,अर्थशास्त्र आदि की केन्द्रीय भूमिका होती है।


   सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में औरत की पहचान के मानक भी बदले हैं। आज औरत की पहचान का जो मानक प्रचलन में है वह दो सौ साल पहले नहीं था।अत: औरत के बारे में बात करते समय ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का होना प्राथमिक शर्त्त है। ऐतिहासिक नजरिए के बिना औरत को समझना मुश्किल है। औरत सिर्फ सामयिक ही नहीं है। वह सिर्फ अतीत भी नहीं है। उसे काल में बांधना सही नहीं होगा । उसकी पहचान को ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। वह जितनी दिखती है उससे ज्यादा छिपी रहती है। वह प्रक्रिया है यही वजह है सबसे ज्यादा लोचदार है। किसी के साथ और किसी भी स्थिति में सामंजस्य बिठा लेती है। वह कब बदलेगी,उसका नया रूप कैसा होगा,नये रूप में वह समाज के साथ किस रूप में पेश आएगी इत्यादि सवालों के तयशुदा उत्तर हमेशा गलत साबित हुए हैं। 
मसलन् यह सवाल किया जा सकता है कि भारत के स्वाधीनता संग्राम में औरतों ने व्यापक स्तर पर हिस्सा लिया और राजीतिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कुर्बानी भी झेली। किन्तु यही औरत आजादी के बाद घर की चौहद्दी में वापस क्यों लौट गई ? ऐसा क्यों हुआ कि जिस औरत ने सामाजिक-राजनीति जीवन में अपने लिए व्यापक जगह तैयार की थी और राजनीति-सामाजिक मसलों पर दृढ़ रवैय्या अपनाया था , उसका समाज में पूरी तरह राजनीतिक प्रक्रियाओं में रूपान्तरण क्यों नहीं हुआ ? हमारे स्वाधीनता संग्राम ने औरत को राजनीतिक शिरकत का मौका दिया, गांधी और नेहरू जैसे नेताओं के नेतृत्व में आन्दोलन का अवसर दिया, सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में महिला सैन्य दल भी बना, महिला संगठनों के जुझारू दल भी बने किन्तु आजादी मिलने के बाद यह संघर्षशील औरत अचानक गायब हो गई। यह औरत कहां गुम हो गई ? इसके बारे में अभी तक ठीक से कुछ भी पता नहीं है ।
          आजादी के बाद सत्ता को औरत के राजनीतिक-सामाजिक रूप की बजाय उसका घर की चारदीवारी में सक्रिय रूप ही ज्यादा पसंद था। इस औरत के गायब हो जाने का दूसरा  प्रधान कारण था हमारी स्वाधीनता का पुंसवादी चरित्र। औरतें स्वाधीनता संग्राम हो या क्रांतिकारी कतारें हों सब जगहों पर नेतृत्व और फैसलेकुन कमेटियों का हिस्सा थीं। उसे राजनीतिक शिरकत के लिए घर से बाहर निकाला गया था ,उसका ब्रिटिश शासकों के खिलाफ दबाव के औजार की तरह इस्तेमाल किया गया। उसके साम्राज्यवाद विरोधी भावबोध को स्त्री की स्वाधीनताकामी चेतना में रूपान्तरित नहीं किया गया। उसे देश की आजादी के लिए मर मिटने के लिए तैयार किया गया। देश की पहचान के साथ जोड़ा गया। ऐसा करते समय हम यह भूल गए कि देश या राष्ट्र पुंसवाद का प्रतीक होता है। हमारे आजाद भारत के नए नक्शे में औरत में परंपरागत औरत को ही रखा गया। यही वजह है कि जब स्वाधीन भारत का जन्म हुआ तो देश नया था,मर्द नया था,मध्यवर्ग नया था,मजदूरवर्ग नया था, किन्तु औरत का वही पुराना रूप था जिससे निकलकर उसने देश की मुक्ति की कामना की थी ?
         यह सवाल महिला संगठनों से भी पूछा जाना चाहिए कि ऐसा कैसे हुआ कि स्वाधीनता संग्राम की आग में तपकर जो औरत सामने आयी थी वह अचानक गैर-राजनीतिक कैसे बन गयी ? महिला संगठनों ने आजादी के तुरंत बाद औरत को राजनीतिक तौर पर जगाए रखने का काम क्यों नहीं किया ? आजादी के तुरंत बाद कांग्रेसियों ,सोशलिस्टों और कम्युनिस्टों ने स्त्री जागरण की उपेक्षा क्यों की ?
जो औरत 15 अगस्त 1947 तक राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी के लिए महत्वपूर्ण मानी गयी वही औरत आजादी के बाद राजनीति के  परिदृश्य से गायब क्यों हो गई ? क्या सिर्फ राजनीतिक शिरकत से औरत की चेतना बदल जाती है ? हमारे स्वाधीनता-संग्राम ने क्या स्त्री -चेतना को बदला था ? क्या भारत -विभाजन के दौरान हुए साम्प्रदायिक कत्लेआम का औरत की चेतना के अ-राजनीतिकरण में अवदान है ? क्या भारत विभाजन ने अ-राजनीति की राजनीति की वैचारिक जमीन तैयार की थी ?क्या इसके कारण स्त्री -चेतना का साम्प्रदायिकीकरण हुआ था ? इन सवालों का अभी तक संतोषजनक उत्तर नहीं मिला है।
     यह सच है कि साम्प्रदायिक राजनीति का जो सिलसिला आजादी के आन्दोलन के दौरान शुरू हुआ उससे महिलाओं की राजनीतिक चेतना पर भी बुरा असर हुआ और भारत विभाजन में जिस तरह लाखों औरतों को नारकीय यंत्रणाएं झेलनी पड़ीं,कत्लेआम और शोषण का सामना करना पड़ा उसके कारण महिलाचेतना और महिलाओं की राजनीतिक शिरकत को गहरा धक्का लगा। महिलाओं का अ-राजनीतिकरण हुआ।
जिस समय सन् 1980 के बाद महिला आन्दोलन तेजी से आगे बढ़ रहा था। उसी समय बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि आंदोलन के बहाने शुरू हुई साम्प्रदायिक लहर ने महिलाओं को भी प्रभावित किया। पहलीबार महिलाओं के साम्प्रदायिक राजनीतिक संगठन सामने आए, साम्प्रदायिक हिंसाचार में औरतों को सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए साम्प्रदायिक हिन्दू संगठनों ने प्रयास शुरू किए। दंगों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी देखी गई।

                       










शुक्रवार, 5 मार्च 2010

सांस्कृतिक हिंसाचार है पोर्न संस्कृति

    सेक्स उद्योग का अमेरिका धुरी है। सेक्स उद्योग बुनियादी तौर पर चाम का काम है। इसे चमड़ा उद्योग भी कहते हैं। यह सामान्य धारणा है कि पोर्न से समाज को खतरा है।जबकि कुछ ऐसे भी विचारक हैं जो यह मानते हैं कि पोर्न से समाज को कोई खतरा नहीं है। आज पोर्न के व्यापार में मीडिया और सूचना जगत की बहुराष्ट्रीय कंपनियां मोर्चा संभाले हुए हैं। प्रत्यक्षत: बड़ा पूंजीपति इस धंधे की कमान संभाले हुए है। इस स्थिति से यह बात साफ तौर पर समझी जा सकती है कि सेक्स बाजार की किसे जरूरत है।

     पचास साल पहले तक छोटी पूंजी के प्रकाशक ही इस धंधे में थे। किन्तु द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से स्थिति में धीरे-धीरे परिवर्तन आया है। खासकर 1970 के बाद पोर्न को अमेरिका के बड़े पूंजीपति ने अपने व्यापार का हिस्सा बनाना शुरू किया और आज इस धंधे पर उसका एकच्छत्र राज्य है। स्थिति यहां तक बदल चुकी है कि इंटरनेट जैसे शक्तिशाली माध्यम के जरिए पोर्न उद्योग का राज्य के प्रसारण तंत्र के साथ भी याराना हो गया है।

   कल तक पोर्न अवैध था। जिसे पाने के लिए गुपचुप प्रयास करने होते थे,आज किन्तु आज यह स्थिति नहीं है। आज पोर्न आपके घर में वैध रूप में बीएसएनएल के ब्रॉडबैण्ड के माध्यम से आधिकारिक प्रवेश पा चुका है। यानी कहने के लिए पोर्न 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के लिए अभी भी प्रतिबंधित है। किन्तु घर में आ चुका है। आपकी गली-कूंचे के कैफे में आ चुका है। पोर्न का व्यवसाय इंटरनेट का सबसे बड़ा व्यवसाय है।
       
    यूरोप में 19वीं शताब्दी में पोर्न का मुद्रण की मासकल्चर  के रूप में उदय हुआ। औद्योगिक क्रांति के बाद पूंजीवादी राज्य आने के बाद पोर्न का सबसे ज्यादा उत्पादन हुआ। पोर्नोग्राफिक साहित्य के आने के बाद नए किस्म के राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक विचारों के निर्माण और प्रसार में मदद मिली।

    कहने का अर्थ यह है कि उस समय पोर्न का राजनीतिक पक्ष भी हुआ करता था। किन्तु आज स्थिति यह है कि पोर्न का राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष तो दूर की बात है कलात्मक पक्ष भी नजर नहीं आता। परवर्ती पूंजीवाद के दौर में जो पोर्न आ रहा है वह आनंद,मनोरंजन और मुनाफे के लिए तैयार किया जा रहा है। पोर्न के प्रसार ने पोर्न के प्रति रवैयया बदला है। पोर्न का एक जमाने में जो कलात्मक मूल्य था,आज वह मूल्य नहीं है।
    
     सन् 1960 के बाद से पोर्न के बारे में आलोचनात्मक नजरिया व्यक्त होना शुरू होता है। पोर्न को सांस्कृतिक हिंसाचार कहा गया। पोर्न को घरेलू हिंसा और बलात्कार के संदर्भ में विश्लेषित किया गया। स्त्रीवादी विचारकों का मानना है कि पोर्न में कामुक हमलों,कामुक उत्पीडन और स्त्री शोषण का व्यापक रूप में चित्रण किया जाता है ,इसके परिणामस्वरूप कामुक संस्कृति विस्तार पा रही है, औरतों पर हमले और जुल्म की वारदातें बढ़ी हैं। पोर्न ने स्त्री के सम्मान को नष्ट किया है। उसे अमानवीय बनाया है। प्रतिगामी हिंसाचार और कामुक हिंसाचार को वैधता प्रदान की है। उसके प्रति सहिष्णु माहौल बनाया है।
      
    हेलिनी लॉगिनी का मानना है कि पोर्नोग्राफी में स्त्री और पुरूष को आनंद लेते दिखाया जाता है। किन्तु इस तरह की प्रस्तुतियों में स्त्र कम मानवीय होती है। स्त्री के समस्त कार्य-व्यापार को अमानवीय रूप में पेश किया जाता है।

    पोर्न यह संदेश देता है कि स्त्री के साथ किसी भी किस्म के नैतिक मूल्यों को सम्मान दिए वगैर व्यवहार किया जा सकता है। हमें सवाल उठाना चाहिए कि पोर्न में गलत क्या है ? वे स्त्री को असम्मानित करते हैं।

   पोर्न अपनी प्रकृति के अनुसार यह बतात है कि स्त्री पुरूष के मातहत है। पुरूष की फैण्टेसी को संतुष्ट करने का साधन है। कैथरीन मेककीनन और ए.डोरिन का मानना है कि पोर्न स्त्री की प्रत्यक्ष गुलामी है। यह स्त्री के प्रति दिया गया असम्मानजनक बयान है जो सुचिन्तित रूप से स्त्री के प्रति भेदभाव को बढावा देता है। जब औरत पुरूष पर कामुक दुर्व्यवहार का आरोप लगाती है तो लोग उस पर विश्वास नहीं करते,ऐसे लोगों को पोर्न देखना चाहिए।   
     
    पोर्न एक तरह से स्त्री की उस क्षमता पर ही सवालिया निशान लगात है कि वह अपने साथ किए जा रहे भेदभावपूर्ण बर्ताव के खिलाफ न्याय पा सकती है। पोर्नोग्राफी का निर्माण एवं प्रसार लिंगभेद और स्त्री शोषण को वैधता प्रदान करता है। मैककिनोन का मानना है पोर्नोग्राफी स्त्री पर किया गया प्रत्यक्ष हमला है। मर्द के द्वारा पोर्न का इस्तेमाल उसे यह  शिक्षा देता है कि औरत समर्पण के लिए बनी है।
    

सेक्स उद्योग और सैन्य मिशन

     सारी दुनिया में सेक्स उद्योग में आई लंबी छलांग के दो सबसे प्रमुख कारण हैं पहला है युध्द और दूसरा है उन्नत सूचना एवं संचार तकनीकी। आज वेश्यावृत्ति और पोर्न दोनों का ही औद्योगिकीकरण हो चुका है। विश्व स्तर पर वेश्यालयों के कानूनी संरक्षण,वेश्यावृत्ति को कानूनी स्वीकृति दिलाने का आन्दोलन तेजी से चल रहा है इस मामले में सबसे आगे विकसित पूंजीवादी मुल्क हैं।

   विकसित पूंजीवादी मुल्कों में वेश्यावृत्ति पेशा है। वेश्याएं सरकार को टैक्स अदा करती हैं। सन् 2001 में जर्मनी में वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता दे दी गयी। अब वेश्यावृत्ति वहां पर अनैतिक धंध नहीं रह गया है। बल्कि नैतिक और कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त धंधा है। वेश्याएं शरीर बेचने के बदले सरकार को टैक्स देती हैं। अब वेश्याओं को पुलिस परेशान नहीं करती।प्रति वेश्या प्रतिमाह 180 डॉलर टैक्स देना होता है।
    
     एक अनुमान के अनुसार वेश्यावृत्ति के धंधे में प्रतिवर्ष 40 लाख नयी लड़कियां और दस लाख बच्चे आ रहे हैं। वेश्यावृत्ति वस्तुत: गुलामी है। इसका लक्ष्य है शारीरिक और कामुक शोषण, इस शोषण का अर्थ है कामुक उत्तेजना,कामुक शांति और वित्तीय लाभ।नयी विश्व व्यवस्था ने कानूनों एवं नियमों में ढिलाई एवं परिवर्तन का जो दबाव पैदा किया है उसके कारण सेक्स और पोर्न संबंधी कानूनों में भी बदलावा आया है। सेक्स और पोर्न संबंधी कानून ज्यादा उदार बने हैं,इसके कारण सेक्स उद्योग और पोर्न उद्योग के प्रति अलगाव और अनैतिक भाव नष्ट हुआ है।

    अब पोर्न और सेक्स उद्योग सम्मानित उद्योग हैं। इस उद्योग में काम करने वाले समाज में आज सम्मानित हैं। पोर्न एवं सेक्स उद्योग की वैधता के कारण स्त्री और बच्चों का शारीरिक शोषण और भी बढ़ा है। हमारे समाज में जो लोग भूमंडलीकरण के अमानवीय चरित्र की उपेक्षा करके उसकी अंधी हिमायत में लगे हैं उन्हें फिलीपीन्स के अनुभवों से सबक हासिल करना चाहिए।

      फिलीपींस में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष,विश्व बैंक आदि के इशारों पर स्त्रीमुक्ति का जो रास्ता अख्तियार किया गया वह वह स्त्री को आत्मनिर्भर नागरिक नहीं बनाता ,बल्कि सेक्स बाजार में ठेलता है।लेबर एक्सपोर्ट के नाम पर साठ और सत्तर के दशक में बड़े पैमाने पर फिलीपीनी औरतों का निर्यात किया गया।सत्तर के दशक में मध्य-पूर्व में निर्माण उद्योग के लिए मर्दो का निर्यात किया गया। सत्तर और अस्सी के शक में फिलीपींस के बाहर काम करने वाली अधिकांश औरतें ही थीं। वियनाम युध्द के बाद वेश्यावृत्ति का विश्वबाजार तेजी से विकसित होता है।

    अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस आदि देशों की सेनाओं ने जिन देशों में हस्तक्षेप किया,जिन इलाकों में अपने सैनिक अड़डे बनाए उनके आसपास के देशों में वेश्यावृत्ति तेजी से फैली। यही स्थिति संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व में चलने वाले शांति मिशन अभियानों की है। शांति मिशन अभियानों में शामिल सैनिकों को औरतों और बच्चों की तस्करी करते रंगे हाथों पकड़ा गया है। सोमालिया,मोगादिसु,साइप्रस,कम्बोडिया, सर्बियाबोसनियाकोसोवो आदि इलाकों में शांति सैनिक औरतों की तस्करी करते पकड़े गए हैं।

    कम्बोडिया में 1992-93 के शांतिमिशन के समय वेश्यावृत्ति कई गुना बढ़ गयी।25 फीसदी से ज्यादा सैनिक एचआईवी पॉजिटिव होकर लौटे। सोमालिया में फ्रेंच सैनिकों ने वेश्यावृत्ति में कई गुना इजाफा कर दिया।

    सन् 2002 में संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा इटली के शहर तूरिन में '' प्रोस्टयूशन ,सेक्स ट्रेफिकिंग एण्ड पीसकीपिंग'' शीर्षक से अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार आयोजित किया गया। जिसमें यह तथ्य सामने आया कि शांति मिशन के कार्य जब चरम पर होते हैं तब ही वेश्यावृत्ति और अन्य देशों के लिए औरतों कह बिक्री अचानक बढ़ जाती है।यह स्थिति निकोशिया, फामुगुस्ता, बुडापेस्ट, कोसोवो, डिली-डारविन, नोमपेन्ह-बैंकाक, होंडुररास, अल-सल्वाडोर, ग्वाटेमाला,सोमालिया  आदि देशों में देखी गयी है।

   आज स्थिति यह है कि भूमंडलीय विचारकों के दबाव के कारण भूमंडलीय आतंकवाद,जनसंहारक अस्त्र, सर्वसत्तावादी या आततायी राज्य, शक्ति संतुलन, भूमंडलीकरण आदि विषयों पर चतरफा काम हो रहा है।ये विषय सर्वोच्च प्राथमिकता की कोटि में हैं। किन्तु ' सेक्स ट्रेफिकिंग ' सर्वोच्च वरीयता की सूची के बाहर है। उसे 'वूमेन्स स्टैडीज', 'थर्ड वर्ल्ड डवलपमेंट', 'एरिया स्टैडीज' आदि क्षेत्रों के हवाले करके हाशिए पर फेंक दिया गया है। जबकि इसे वरीयता क्रम में ऊपर रहना चाहिए। इस तरह से 'सेक्स ट्रेफिकिंग' से बौध्दिकों का अलगाव बढ़ा है। वे इसे एक विच्छिन्न विषय या घटना मात्र समझते हैं। विकासमूलक अर्थव्यवस्था की समस्या के रूप में देखते हैं।

     सवाल उठता है कि क्या इस तरह हाशिए पर रखकर इस समस्या का सही अध्ययन संभव है ? इस विषय पर जो मूल्यांकन मिलते हैं उनमें सेक्स ट्रेफिकिंग के विवरण ज्यादा होते हैं। इस तरह के मूल्यांकनों में मूलत: निम्न बातों पर जोर रहता है,जैसे, ग्राहक मनोरंजन के लिए औरतों का शोषण कर रहे हैं। दलाल मुनाफे के लिए शोषण कर रहे हैं। जो औरतें बेची जा रही हैं वे उत्पीडित हैं। इस तरह मूल्यांकन इस समस्या के समाधान की रणनीति बनाने में मदद नहीं करते।इनसे समाधान की कोई बुनियादी रणनीति नहीं निकलती।
         
     जहां वेश्यावृत्ति वैध है वहां सरकार धन कमाती है,किन्तु जहां अवैध है वहां भ्रष्ट अधिकारी और अपराधी गिरोह चांदी काटते हैं।वेश्यावृत्ति के कारोबार में व्यापार का मुनाफा इस बात पर निर्भर करता है कि नयी औरतों का फ्लो कितना है। नयी औरतें कितनी आ रही हैं।विदेशी औरते कितनी आ रही हैं।दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के महिला संगठनों की 1991 में एक काँफ्रेंस हुई जिसमें अनुमान लगाया गया कि सत्तर के बाद से सारी दुनिया में तीन करोड़ औरतें बेची गयी हैं।जापान से सालाना एक लाख औरतें जहाजों में भरकर लाकर सेक्स उद्योग के हाथ बेची जाती हैं। ये औरतें 'वार' और वेश्यालयों में काम करती हैं।र्मा ,नेपाल,थाईलैण्ड, बांग्लादेश,भारत और पाकिस्तान से सालाना तीन लाख से ज्यादा औरतें बिक्री होती हैं।
           
   सन् 1960 और 1970 के दशक में आईएमएफ और विश्वबैंक ने पर्यटन पर ज्यादा जोर दिया। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर जोर दिया।होटल और रिसोर्ट बनाने को प्राथमिकता दी।जिससे विदेशी पूंजी को आकर्षित किया जा सके।इस पर्यटन का एक आकर्षक हिस्सा सेक्स पैकेज हुआ करता था।जिसमें हवाईभाड़ा,होटल का भाड़ा,औरत या मर्द जो भी चाहिए,उसका भाड़ा,कार आदि का खर्चा शामिल हुआ करता था।वियतनाम युद्ध के कारण अकेले सैगोन में पांच लाख वेश्याएं थीं।जबकि युद्ध के पहले सैगोन की कुल आबादी ही पांच लाख की थी।

    वियतनाम युद्ध के कारण फिलीपींस,कोरिया,कम्बोडिया,थाईलैण्ड आदि देशों में वेश्यावृत्ति कई गुना बढ़ गयी।इसी तरह ओकीनावा में अमेरिकी सैन्य अड्डा बनने के बाद नए किस्म के विश्राम और आनंद के केन्द्रों का व्यापक पैमाने पर आसपास के इलाकों में निर्माण कियागया। इन सभी देशों में वेश्यावृत्ति को वैध बनाने के लिए कानून पास किए गएंसत्तर के दशक में मनीला और बैंकाक वेश्यावृत्ति के दो बड़े केन्द्र बनकार उभरे।उसके बाद नेपाल का विकास हुआ।इन तीन केन्द्रों ने सेक्स पर्यटन को तेजी से बढ़ावा दिया।सिर्फ  सेक्स पर्यटन के कारण ही इन केन्द्रों  की अरबों डालर की सालाना आय थी।मसलन् थाईलैण्ड में प्रतिवर्ष 50 लाख पर्यटक आते हैं।इनमें 75 फीसदी पुरूष होते हैं। सेक्स उद्योग के नए क्षेत्रों में कर मुक्त इलाके,औद्योगिक क्षेत्र ,पूंजी विकास केन्द्र औरतों क बिक्री के बड़े केन्द्र के रूप में उभरकर सामने आए हैं।
     

सेक्स का औद्योगिकीकरण

मौजूदा दौर की विशेषता है सेक्स का औद्योगिकीकरण। आज सेक्स उद्योग है। पोर्न उसका एक महत्वपूर्ण तत्व है। पोर्न एवं उन्नत सूचना तकनीकी के अन्तस्संबंध ने   उसे सेक्स उद्योग बना दिया है।

    भूमंडलीकरण के कारण नव्य-उदारतावादी आर्थिक नीतियों के आधार पर नयी विश्व व्यवस्था का निर्माण किया गया है। इस व्यवस्था में निरंतर स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेंट पर जोर है। उसी के आधार पर रीस्ट्रक्चरिंग हो रही है।  इस समूची प्रक्रिया का लक्ष्य है ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना। इसके लिए जरूरी है कि जनता की स्वीकृति हासिल की जाए।
   
   जनता की सहमति के बगैर यदि रीस्ट्रक्चरिंग की जाती है है तो तनाव पैदा होगा,झगड़े होंगे और अराजकता फैलेगी। इस सबसे निबटने के लिए बल प्रयोग करना होगा। यही व बिन्दु है जिसे केन्द्र में रखकर नव्य उदारतावादी नीतियों की सारी रणनीति काम कर रही है। अब जोर व्यक्तिवादी विचारधारा पर है।प्रतिस्पर्धी रूपों पर है।

   व्यवसायिकता और बाजारीकरण पर जोर दिया जा रहा है।ये सारी चीजें मिलकर संरचनात्मक असमानता पैदा कर रही हैं।निरंतर शोषण,गरीबी, हताशा, डेसपरेशन आदि पैदा कर रही हैं। इस स्थिति से ध्यान हटाने के लिए समूचा मनोरंजन उद्योग, इच्छा उद्योग और  सेक्स उद्योग सक्रिय है। वह असल मुद्दों या समस्या से ध्यान हटाने या गलत दिशा देने का काम कर रहा है।

       नव्य-उदारतावाद सामान्य लोगों को यह बताने में व्यस्त है कि नव्य विश्व व्यवस्था लोगों को संतुष्ट करने की कोशिश कर रही है। वह व्यक्ति के उपभोग, व्यक्तिगत चयन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है। यह धारणा भी प्रसारित की जा रही है कि माल और व्यक्ति का विनिमय हो सकता है। निजी उद्योग का लक्ष्य सार्वजनिक भलाई करना है। कारपोरेट सक्षमता विकसित करने के लिए वस्तुकरण जरूरी है।
    
     तीसरी दुनिया के देशों में श्रम का नव औपनिवेशीकरण हो रहा है।नस्लवाद और सेक्सवाद को सहज,स्वाभाविक और सहनीय बनाया जा रहा है।नस्लवाद ,सेक्सवाद ,नव्य उपनिवेशवाद मूलत: नयी विश्व व्यवस्था के एजेण्ट के रूप में सक्रिय हैं। सामाजिक मुक्ति के नाम पर बहुराष्ट्रीय मीडिया एवं सूचना कंपनियों ने इच्छाओं और सहजजात वृत्तियों पर हमला बोला है।इच्छाओं के आधार पर ही राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक लाभ, कामुक शांति,,वेश्यावृत्ति , जिस्म फरोशी तार्किक परिणति के रूप में सामने आई है।
      
      ऐतिहासिक नजरिए से वेश्यावृत्ति के बारे में विचार करें तो यह पेशा संभवत: दुनिया के सबसे पुराने पेशों में से एक है।बेबीलोन के मंदिरों से लेकर भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा वेश्यावृत्ति का आदिम रूप है। सेक्स के सभी विचारधारा के इतिहासकार इस पर एकमत हैं कि वेश्यावृत्ति की शुरूआत मंदिरों अथवा मंदिर क्षेत्र से हुई।
    
    कालान्तर में रजवाडों की राजनीतिक हमलावर कार्रवाईयों ने इसे नयी ऊँचाईयों पर पहुँचाया। गुलाम व्यवस्था में गुलामों के मालिक गुलाम वेश्याएं पालते थे। अनेक गुलाम मालिकों ने वेश्यालय भी खोले। असल में जो औरतें गुलाम थीं उनसे वेश्यावृत्ति करायी जाती थी। वेश्याएं संपदा और शक्ति की प्रतीक मानी जाती थीं।  वेश्यावृत्ति के विस्तार ने अन्य व्यक्ति के लिए संपदा और सामाजिक हैसियत की सृष्टि की।इसी क्रम में बच्चों की बिक्री का मामला भी सामने आया।बच्चों को श्रम के लिए बेचा जाता था।

    सामाजिक विकास के क्रम में स्त्री के लिए कानून बनाए गए,उसे सम्मानित नजरिए से देखा जाने लगा। फलत: स्त्री शुचिता को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।खासकर बेटी की शुचिता को सम्मानित नजरिए से देखा गया।पवित्र बेटी परिवार की संपत्ति मानी गयी। कालान्तर में वेश्यावृत्ति ने अपना रूपान्तरण किया और मर्द की सामाजिक और शारीरिक जरूरतों की पूर्त्ति के रूप में अपना विकास किया। इसी क्रम में स्त्रियों के बीच में छोटे-बड़े के भेदभाव ,ऊँच-नीच आदि की केटेगरी का उदय हुआ। स्त्री को नैतिकता आधार पर वर्गीकृत किया गया। ये सारे अंतर स्त्री की कामुक उपलब्धता पर आधारित थे।इसमें सबसे ऊपर विवाहिता को दर्जा दिया गया,इसके बाद शादी लायक पवित्र कन्या ,इन दोनों के बीच उपपत्नी,सबसे नीचे अविवाहित देवदासी और गुलाम औरत को स्थान दिया गया।
      
वेश्यावृत्ति के पेशे में वे औरतें ठेली गयीं जो शोषित थीं। गुलाम थीं। कामुक संपत्ति थी जिनका सामाजिक उपहार के रूप में आदान-प्रदान होता था। जिन्हें तरह-तरह के काम दिलाने के बहानों से फुसलाया जाता था। सामन्ती दौर में स्त्री के विनिमय या उपहार स्वरूप देने की प्रथा ने स्त्री के शोषण को एक आकर्षक वैध व्यवस्था बनाया।
                 

गुरुवार, 4 मार्च 2010

लोकतंत्र में निर्जन एकांत नहीं होता मकबूल फिदा हुसैन

एफ एम हुसैन साहब बहुत बड़े चित्रकार हैं,भारतीय चित्रकला परंपरा में उनका गौरवपूर्ण स्थान है। भारतीय कला के उन्होंने अनेक नए मानक बनाए और तोड़े है। उनकी कला में भारत की आत्मा निवास करती है। कलाकार के रंगों के साथ उसके देश का अभिन्न संबंध होता है। उनकी कला का धर्मनिरपेक्ष आयाम भारतीय कलाकारों,बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों को आलोड़ित करता रहा है।
     
हुसैन साहब कई सालों से स्वेच्छा से विदेश में थे, यह सच है कि संघ परिवार से जुड़े संगठनों ने उनके खिलाफ जेहाद छेड़ा हुआ है,नियोजित ढ़ंग से उनके खिलाफ मुकदमे दायर किए गए हैं। उनके चित्रों की प्रदर्शनियों पर संघ परिवार हमले करता रहा है। इस सबके खिलाफ देश के चित्रकारों और संस्कृतिकर्मियों ने उनका खुलकर साथ दिया है। इसके बावजूद संघ के हमले थमे नहीं हैं और हुसैन साहब विदेश चले गए और कई सालों से वहीं रह रहे हैं।

आज अखबार से पता चला कि उन्होंने भारत छोड़ने का फैसला ले लिया है। हुसैन साहब विश्व में कहां रहें यह उनका फैसला होगा,लेकिन भारत पर लांछन लगाकर कतार जाना सही नहीं है।
      
हुसैन साहब की मुश्किल यह है कि वे अपने लिए निर्जन एकांत खोज रहे हैं। भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र की धुरी शांति नहीं लाठी है। लोकतंत्र में जनतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल वही कर सकता है जो जूझने में सक्षम हो, लोकतंत्र में अधिकारों के इस्तेमाल की शक्ति उसी के पास है जो अपने हक बचा सकता हो,लोकतंत्र में हक स्वत:नहीं मिलते उन्हें अर्जित करना होता है।संघर्ष करके अर्जित करना होता है।

लोकतांत्रिक हक सत्ता की कृपा से नहीं मिलते व्यक्ति के निजी संघर्ष से मिलते हैं। हुसैन साहब चाहते हैं कि उनके खिलाफ कोई कुछ न बोले, संघ भी न बोले। सरकार उन्हें संरक्षण दे। शैतान गायब हो जाएं और वे शांति से चित्र बनाएं,आराम से घूमें फिरें,चूँकि यह सब भारत में नहीं है अत: बतर्ज हुसैन साहब भारत ने उन्हें भगा दिया।
   
हुसैन साहब की निर्जन एकांत की आशा का भारत के प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र में पूर्ण होना संभव नहीं है। हुसैन साहब जानते हैं कि कतार में भारत जैसा लोकतंत्र नहीं है और वहां पर मानवाधिकारों का वैसे पालन भी नहीं किया जाता जैसा भारत में होता है। भारत जैसी स्वतंत्र और पेशेवर न्यायपालिका भी कतार में नहीं है। हां ,वहां के राजा के पास बेशुमार दौलत है और वे अपने किसी भी अतिथि को कुछ भी दे सकते हैं। खासकर हुसैन जैसे महान कलाकार को तो कुछ भी दिया जा सकता है।

हुसैन महान है उसका दुख भी महान है। उसकी शांति भी महान है। लेकिन इन सबसे महान भारत का लोकतंत्र है। लोकतंत्र में अधिकार समाज और व्यक्ति के हैं तो कष्ट भी समाज और व्यक्ति के साझा हैं। लोकतंत्र में साझा नियति को भोगना अनिवार्य है।

हुसैन साहब ने अपने दुख ,उत्पीड़न और अपमान को लोकतंत्र के साझा दुख और अपमान से बड़ा करके और निहित स्वार्थीभाव से देखा है और अपने व्यक्तिगत सुख और शांति को पाने के लिए लोकतंत्र को तिलांजलि दे दी। धिक्कार है ऐसी खुदगर्जी को।

हुसैन साहब भारत में संघ परिवार के बंदे सिर्फ आपको ही परेशान नहीं कर रहे उनसे सारा देश परेशान है,ऐसी अवस्था में क्या समूचे भारत को कतार भेज दें ? क्या साम्प्रदायिक और आतंकी ताकतों से जंग का यही रास्ता बचा है कि बिस्तर बाँधकर विदेश चले जाएं ? क्या आपने एकबार भी नहीं सोचा कि आजादी के दौर में विदेश से भारतीय आते थे देश को आजाद कराने के लिए , इनमें सैंकड़ों ऐसे बेहतरीन इंसान थे जिन्होंने अपना शानदार कैरियर देश को आजादी दिलाने के लिए त्याग दिया। हुसैन साहब जानते हैं महात्मा गाँधी का कैरियर आपसे कम नहीं था। मैं ऐसे सैंकड़ों महान हस्तियों का जिक्र कर सकता हूँ जो शांति के लिए देश छोड़कर नहीं गए।
   
हुसैन साहब आप आम लोगों को निजी शांति के नाम पर खतरनाक संदेश दे रहे हैं। निज की शांति के लिए लोकतांत्रिक देश त्यागो, विकल्प के रुप में चाहे किसी राजतंत्र या सर्वसत्तावादी तंत्र की शरण ले लो। कलाकार का इस तरह खुदगर्ज होना पतन का संकेत है। लेखक-कलाकार -बुद्धिजीवी अपने लिए नहीं दूसरों के लिए,लोकतंत्र के लिए जीता है । उसे दूसरों ने,समाज ने बनाया होता है।

हुसैन साहब आपकी महानता निजी करामात की पैदाइश नहीं है आप पर इस देश का बहुत कुछ खर्च हुआ है और वह हमें सूद सहित आपसे वापस चाहिए। भारत की माटी का कर्ज आप पर है उसे चुकाने के लिए आपके रंग भी कम पड़ जाएंगे, कतार के शासन को यदि एम एफ हुसैन चाहिए तो अब तक जो कुछ हुसैन को बनाने पर खर्च हुआ है वह हमें कतार के शासक लौटाएं ? हुसैन साहब आपका जैसा महान कलाकार भारत में ही तैयार हो सकता है कतार में नहीं । यदि कोई वैसा कलाकार कतार में होता तो आप कतार में न होते।

हुसैन साहब आपका हिन्दू कठमुल्लों के डर से भागकर देश त्याग देना किसी भी तर्क से गले नहीं उतर रहा। आप महान हैं वैसे ही आपका भारत को त्यागना भी 21वीं सदी सबसे बड़ी बेवकूफी है। अक्लमंद लोग लोकतंत्र में मरते हैं, लोकतंत्र और स्वतंत्रता के लिए कुर्बानियां देते हैं। अपने निजी स्वार्थ को लोकतंत्र के स्वार्थ के मातहत रखते हैं। लोकतंत्र में दुख के साथ जीने में भी सुख है। लोकतंत्रविहीन देश में सुख के साथ जीना नरक में जीने के बराबर है।

हुसैन साहब लोकतंत्र में हारकर भी मैदान नहीं छोड़ा जाता। आपने मैदान छोड़कर लोकतंत्र के रणछोर की सूची में अपना नाम लिखा लिया है।  
  
   
        
    
  
  

सेक्स उद्योग के सामने सब बौने

     परवर्ती पूंजीवाद के दो प्रभावी अस्त्र हैं सेक्स उद्योग और शस्त्र उद्योग। जो शास्त्र से न मरे उसे सेक्स से मारो,और जब सेक्स से भी न मरे तो शस्त्र से मारो। इन दोनों ही किस्म के यथार्थ के बारे में सारे शास्त्रों के अनुमान और तर्क असमर्थ महसूस करते हैं।
    सामान्य तौर पर यह सोचा जा रहा था कि अस्सी के दशक में आयी आर्थिक मंदी से सेक्सबाजार कुछ ठंडा पड़ेगा। किन्तु हुआ इसके विपरीत। कानूनी पेचबंदियों के बाद अमेरिका में राष्ट्रपति रीगन और राष्ट्रपति सीनियर बुश ने सोचा था कि अमेरिका का पोर्न बाजार ठंडा पड़ गया है किन्तु कुछ ही अर्से बाद देखा गया कि कम्युनिकेशन की अत्याधुनिक तकनीकों को इजाद कर लिया गया और ठंड़ा सा दिखने वाला पोर्न बाजार नए सिरे से आक्रामक हो उठा।

डिजिटल तकनीक ओर उपग्रह प्रसारणों के गर्भ से पोर्न पहले से ज्यादा आक्रामक होकर सामने आया। वेश्यावृत्ति का धंधा कम होने की बजाय तेजी से फैला है। आखिरकार क्या बात है कि भू.पू.समाजवादी देशों में जहां सेक्स बाजार खत्म कर दिया गया था। स्त्रीशोषण के सभी रूपों को खत्म कर दिया गया था, समाज में स्वस्थ संस्कृति और स्वस्थ मीडिया संस्कृति थी। आर्थिक,राजनीतिक और सांस्कृतिक शोषण के सभी रूपों को खत्म कर दिया गया था। इतना कुछ करने के बावजूद भू.पू. समाजवादी राष्ट्रों में सेक्सबाजार का पुन: स्थापित हो जाना इस बात का संकेत है कि कामदेव के आगे सभी बौने हैं। कामशास्त्र के सामने सारे शास्त्र कुण्ठित हैं।

शोषण के सबसे प्रभावी अस्त्र के रूप में आज भी सेक्सबाजार दुनिया का सबसे ताकतवर बाजार है। सारे कानून और सत्ता के दबाव उसके सामने असमर्थ महसूस कर रहे हैं। आधुनिक आधुनिक काल आने के बाद और औद्योगिक क्रांति के सन् अस्सी के पहले तक सेक्स बाजार का हिस्सा था,आज किन्तु वह सेक्स उद्योग है। सेक्स शरीर था,बाजार बना ओर अब उद्योग बन गया है। पहले सेक्स वर्कर क कोठे पर देख सकते थे। कभी-कभार बाजार या जलसों में भी देख सकते थे। सिनेमा के आने के बाद कोठे के दृश्य आने लगे। पोर्न साहित्य ने शारीरिक क्रियाओं और शारीरिक अंगों के दृश्यों की बाढ़ पैदा कर दी। पोर्न फिल्मों ने कामुकता के कलात्मक और राजनीतिक नजरिए की विदाई कर दी। और इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने पोर्न और सेक्स को उद्योग बना दिया।
      इण्टरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट में बताया गया है कि एशियाई आर्थिक संकट के बावजूद सेक्स उद्योग थमा नहीं। सामाजिक और आर्थिक शक्तियां सेक्स उद्योग को तेजी से आगे ले जा रही हैं। वेश्यावृत्ति का दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में इस गति से विकास हुआ है कि उसने आज व्यवसायिक क्षेत्र का दर्जा हासिल कर लिया है। आज वह इस क्षेत्र के देशों की रोजगार और राष्ट्रीय आय में अच्छा-खासा अवदान कर रहा है। इस क्षेत्र के देशों में व्यक्तिगत आय में अस्सी के बाद के वर्षो में तेजी से गिरावट आयी है। मैन्यूफेक्चरिंग क्षेत्र में औरतों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा है।
        प्रावदा ( 5 दिसम्बर 2005) अखबार लिखता है कि आज सारी दुनिया में अनुमानत: 12.3 मिलियन लोग हैं जो गुलामी में जी रहे हैं। निजी कंपनियों में 9.8 मिलियन कर्मचारी हैं। 2.5 मिलियन से ज्यादा लोग ऐसे हैं जो किसी न किसी दबाव के कारण गुलामी में जी रहे हैं। के जरिए विश्व स्तर पर  सालाना आमदनी 30 विलियन डालर क आंकड़ा पार गयी है। इसके बावजद दोषी लोगों को अभी तक दण्डित नहीं कर पाए हैं।
    आईएलओ की रिपोर्ट के आधार पर प्रावदा लिखता है कि इन गुलामों में से बीस फीसदी के करीब लोगों का राज्य और सैन्यबल इस्तेमाल करते हैं। 11 फीसदी आधुनिक गुलामों का वेश्यावृत्ति और अन्य सेक्सउद्योग में इस्तेमाल किया जाता है। 64 फीसदी गुलाम परंपरागत और वैध उद्योगों  के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। बाकी पांच फीसदी के बारे में बताना मुश्किल है कि वे किस तरह के कामों में लगे हैं।

गुलामी और जोर-जबर्दस्ती काम कराने की प्रक्रिया आज भी समाज में जारी है। सारी दुनिया में किसी न किसी रूप में ये प्रक्रिया चल रही है। एशिया ,अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में गुलामी का सबसे कारण है कर्ज। भूमंडलीकरण ओर माइग्रेशन समसामयिक गुलामी के रूप हैं। ये मूलत: नियोजित अपराधी गतिविधियों , कर्ज में डूबो देने वाले कारोबार जैसे कृषि,भवननिर्माण ,सिलाई और खाद्य उपस्करण उद्योग। अपराधी गिरोह बच्चों की खरीद-फरोख्त केकाम को सुनियोजित ढ़ंग से अंजाम दे रहे हैं।

सेक्स गुलामी के बड़े पैमाने पर लोग शिकार हो रहे हैं। अपराधी गिरोह औरतों को ज्यादा पैसा दिलाने के लालच में औरतों का विदेशों के लिए निर्यात कर रहे हैं। पर्यटन उद्योग में औरतों का देह-व्यापार के क्षेत्र में इस्तेमाल हो रहा है।युवा लडकियों और तरूणियों की ज्यादा मांग है।क्योंकि उनमें समर्पणभाव ज्यादा होता है। थाईलैण्ड में पडोसी देशों की औरतें देह-व्यापार के धंधे में ज्यादा हैं।खासकर बर्मा,लाओस,कम्बोडिया की लड़कियां वेश्यावृत्ति के पेशे में हैं।

इसी तरह वियतनाम की औरतें और बच्चे कम्बोडिया में देह-व्यापार में ज्यादा हैं।इसी तरह जबरिया शादी और जबरिया काम के नाम पर चीन, आस्ट्रेलिया, हांगकांग, जापान,दक्षिण कोरिया आदि देशों में इण्डोनेशिया और फिलीपीन्स की लड़कियां सबसे ज्यादा सेक्स उद्योग में हैं।

जापान भी अपराधी कारोबार  का बड़ा केन्द्र है। जापान में दक्षिण-पूर्व एशिया,लैटिन अमेरिका और पूर्वी यूरोपीय देशों की लड़किया देह-व्यापार के धंधे में सबसे ज्यादा हैं। जापान में सेक्स उद्योग व्यावसायिक उद्योग के दायरे में आता है। इसका काम है सेक्स सेवाएं प्रदान करना। इस पूरे उद्योग को ताकतवर अपराधी गिरोह चलाते हैं। समाजवादी सोवियत संघ के पतन और विघटन के बाद वहां के देशों में भी देह-व्यापार तेजी से फैला है।

भू.पू. समाजवादी देशों से अब तक पांच लाख से ज्यादा लड़कियां दुनियाभर के देशों में सेक्स उद्योग में सप्लाई की गई हैं। इन तथ्यों को रखने का प्रधान कारण यह है कि देह-व्यापार में स्थानान्तरित करके लायी गयी लड़कियां बड़ी संख्या में हैं।

भारत में देह-व्यापार में सक्रिय लड़कियों में सबसे बड़ी तादाद बंगलादेश और नेपाल से आई लड़कियों की है। यानी देह-व्यापार का धंधा माइग्रेशन पर टिका है। माइग्रेशन के कई कारण हैं । इनमें सबसे बड़ा कारण है गरीबी, स्थानीय स्तर पर आजीविका का अभाव,कम परिश्रम से ज्यादा धन कमाने की लालसा,जबरिया श्रम और विकास के नाम पर हो रहा विस्थापन। 
       


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