मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

रामचरित मानस विमर्श के नए पैराडाइम की तलाश में -3-

         (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल)
       परंपरा और इतिहास के नाम पर हिन्दी का समूचे विमर्श के केन्द्र में तुलसीदास के मानस को आचार्य शुक्ल ने और कबीर को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आधार बनाया। सवाल किया जाना चाहिए कि क्या दलित-स्त्री-अल्पसंख्यकों के बिना धर्मनिरपेक्ष आलोचना संभव है ?कबीर के नाम पर द्विवेदीजी की आलोचना दलित साहित्य को साहित्य में हजम कर जाने की मानसिकता से संचालित है,वहीं रामचन्द्र शुक्ल- रामविलास शर्मा  यही काम अपने तरीके से करते हैं।
     इन दोनों ही मूल्यांकन दृष्टियों में एक तथ्य समान है और वह है साहित्य एवं आलोचना में पितृसत्तात्मक विचारधारा का वर्चस्व बनाए रखना। शुक्ल-द्विवेदी- रामविलास - नामवर समीक्षा के मानक पितृसत्ताात्मक विचारधारा से न तो संघर्ष करते हैं और न किसी भी किस्म की आलोचना ही पेश करते हैं।रामचन्द्र शुक्ल-रामविलास शर्मा के यहां साहित्य की सामाजिकता की खोज का काम यथार्थ के आग्रह से प्रेरित है,इसमें पितृसत्ताात्मक विचारधारा की पूरी तरह अनदेखी की गयी है,दूसरी ओर हजारीप्रसाद द्विवेदी के यहां परंपरा और इतिहास के मूल्यांकन में विचारधारा के मानवतावादी पक्ष की खोज पर जोर है, यहां पर भी पितृसत्ताात्मक विचारधारा के प्रति उपेक्षा का भाव व्यक्त हुआ है।
     गजानन माधव मुक्तिबोध के द्वारा भक्ति-आंदोलन का जो मूल्यांकन पेश किया गया है वहां एक सरलीकरण का सहारा लेते हुए निर्गुण काव्य धारा को निम्नवर्ण और सगुण काव्य धारा को सवर्ण जाति से जोड़ दिया गया है,साथ ही कृति के तौर पर रामचरित मानस को सवर्ण विचारधारा की अभिव्यक्ति माना गया है।मुक्तिबोध मुगल काल के जमींदार और किसान के अन्तर्विरोधों को देख ही नहीं पाते,जिसकी ओर इरफान हबीब ने ध्यान खींचा है। किसान विद्रोह मध्यकाल में बड़े पैमाने पर हुए जिनका हमारे साहित्यिक उत्पादन के साथ गहरा संबंध है। यह गलत है कि साहित्य में किसान को पहलीबार प्रेमचंद ने प्रतिष्ठित किया बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि साहित्य में किसान पहलीबार भक्ति आंदोलन में दाखिल होता है।
    उत्तरभारत में सतनामियों का संघर्ष सन् 1627 में विद्रोह के रूप में फूटता है।यह पहला किसान विद्रोह है जो अपने को भक्ति आंदोलन से सीधे जोड़ता है। दूसरा सवाल उठता है कि क्या किसी भी कृति को खासकर मध्यकालीन कृति को जाति विशेष या वर्ण-विशेष से जोड़ना सही होगा।इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या कृति का जाति से संबंध होता है ?क्या काव्यधारा को सवर्ण या निम्नपर्ण से जोड़ा जा सकता है ? क्या सृजन को जाति से जोड़ा जा सकता है ? क्या चरित्रों की जाति अथवा सामाजिक हैसियत अथवा विचारों के आधार उसे जाति विशेष के साथ नत्थी किया जा सकता है ?जी नहीं,कृति,फिनोमिना,प्रवृत्ति का जाति या वर्ण या धर्म से रिश्ता नहीं होता। कृति की समाज सापेक्ष और प्राचीनकृतियों (महाकाव्य)की समाज निरपेक्ष दुनिया रही है। कबीर के निर्गुण पंथ में सिर्फ अन्त्यज की नहीं थे बल्कि उच्चवर्ण के कवि भी थे, उसी तरह सगुणभक्ति में सिर्फ सवर्ण ही नहीं थे बल्कि अन्त्यज और गरीब तबके के लोग भी थे। मुक्तिबोध के मत से जो लोग सहमत हैं वे इस पहलु पर भी सोचें कि क्या सगुण भक्ति को उसके पारंपरिक होने के कारण सफलता मिली थी ?क्या उसकी सफलता का कारण यह है कि उसने ब्राह्मणों के खिलाफ कम शत्रुता पैदा की ? यदि ऐसा ही था तो पंजाब के जाट काश्तकार सिखधर्म के झंडे तले क्यों इकट्ठा हुए ? जबकि मथुरा-आगरा के जाट काश्तकार 'सगुण भक्ति' से जुड़े थे और इनमें से अधिकांश अपनी आजीविका,बीज और पशुओं के लिए कर्ज में डूबे हुए थे।
रामचरित मानस के संदर्भ में पहली समस्या यह है कि मानस के जितने भी मूल्यांकन हैं वे महाकाव्य के रूप में उसकी अंतर्वस्तु के विवेचन तक ही सीमित हैं।जबकि महाकाव्य की विधागत विशेषताओं की इस प्रसंग में पूरी तरह अनदेखी हुई है। इस प्रसंग में  पहला सवाल यही उठता है कि क्या किसी कृति की एक ही किस्म की आलोचना परंपरा हो सकती है ? क्या ऐतिहासिक पाठ अथवा एपिक पाठ का इकहरा मूल्यांकन संभव है ? क्या एपिक के रूप में मानस सिर्फ आध्यात्मिक कृति है ? 
     रामभक्ति में डूबे लोगों के लिए रामचरित मानस सब रोगों की दवा है।दुखों के विरेचन का महाख्यान है। कथावाचकों के लिए वक्तृत्व-कला का सबसे बड़ा स्रोत है।मासकल्चर के कारखाने फिल्म और टीवी उद्योग का रामचरित मानस कंठ-हार है।समय-समय पर राम-कथा पर केन्द्रित हिन्दी फिल्में और धारावाहिक आते रहे हैं,इनके प्रसारण से रामायण की कृति के रूप में खपत बढ़ी है,पाठक,दर्शक और श्रोता बढ़े हैं,मानस आज शब्द के रूप में ही नहीं दृश्य और श्रव्य मीडिया में भी बेहद जनप्रिय है।इसके कारण समय-समय पर बाजार में छाई मंदी को दूर करने में भी मदद मिली है,उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री में इजाफा हुआ है।
     हम यह भी कह सकते हैं कि महाकाव्य कृतियां आज भी बाजार को चंगा बनाए रखने का सबसे बड़ा प्रेरक तत्व हैं।उनकी प्रतिष्ठा आज भी सबसे ज्यादा है।उन्हें सांस्कृतिक माल के रूप में ज्यादा स्वीकृति प्राप्त है। तुलसी को जितनी जनप्रियता आधुनिक काल में मिली,''रामचरित मानस'' की जितनी बिक्री आधुनिक काल में हुई,रामकथा का जितना प्रसार आधुनिक काल में हुआ,उतना मध्यकाल में भी नहीं हुआ।
       हिन्दी का साहित्य जगत ''रामचरित मानस'' को साहित्यिक कृति बनाने के लिए कठोर परिश्रम कर रहा था,उसके लिए आभामंडल तैयार करने का काम कर रहा था, तो दूसरी ओर मीडिया  ने अपने तरीके से रामकथा और रामचरित मानस का प्रसार किया,इससे साहित्यकारों के द्वारा बनाया गया आभामंडल छार-छार होकर रह गया।
     छापे की मशीन के आने के साथ मानस को पोथी के दायरे से बाहर निकालकर किताब के रूप में प्रतिष्ठित किया,''रामचरित मानस'' को लोक-साहित्य के दायरे से निकालकर साहित्य के दायरे में प्रतिष्ठित किया, फिल्म, रेडियो,टीवी और ऑडियो उद्योग ने उसे मासकल्चर के क्षेत्र में प्रतिष्ठा दिलायी।आज स्थिति यह है कि 'रामचरित मानस' लोक-साहित्य से लेकर मासकल्चर तक समान रूप से स्वीकृत और प्रतिष्ठित पाठ है।इसके कारण मानस का पापुलर पाठ के रूप में ग्रहण और आस्वाद बढ़ा है।इसके अलावा रामलीला,नाटक और कथावाचकों की परंपरा ने भी इसे जनप्रिय पाठ के रूप में इस्तेमाल किया है।


सोमवार, 5 अप्रैल 2010

रामचरित मानस विमर्श के नए पैराडाइम की तलाश में -2-

             (स्व.रामविलास शर्मा)

         (आलोचक नामवर सिंह)

      हिन्दी आलोचना की नजर में रामचरित मानस एक ऐतिहासिक पाठ है,ऐतिहासिक पाठ के रूप में ही उसे देखने और व्याख्यायित करने की परंपरा है।मजेदार बात यह है कि 'रामचरित मानस' को जो आलोचक ऐतिहासिक पाठ मानते हैं,वे पाठालोचन के सिद्धान्तों का पालन नहीं करते,यह स्थिति कमोबेश सबके यहां है। हम यह भी कह सकते हैं हिन्दी की आलोचना को उत्पादन के प्रति जितना आकर्षण है,उतनी आलोचना निर्माण,आलोचना पद्धति के निर्माण में उतनी दिलचस्पी नहीं है।यही वजह है कि हिन्दी में पाठालोचन का अकादमिक जगत में एक भी स्कूल निर्मित नहीं हो पाया। बल्कि इसके विपरीत अकादमिक आलोचना के प्रति खास तरीके से घृणा पैदा की गयी।जिससे आलोचना अपनी कमियों से ध्यान हटा सके।हिन्दी में अकादमिक आलोचना को सम्मान की बजाय घृणा की नजर से देखा गया। दूसरी ओर अकादमिक जगत ने भी इस स्थिति को दुरूस्त करने के लिए कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया। 
    आलोचना के कठमुल्लेपन का ही यह परिणाम निकला कि जब नामवर सिंह ने  'दूसरी परंपरा' की बात कही तो रामविलासजी भड़क पड़े। यदि कोई व्यक्ति परंपरागत रामचन्द्र शुक्ल-रामविलास शर्मा पंथी आलोचना से इतर नयी साहित्य सैद्धान्तिकी के सहारे किसी कृति को पढ़ना चाहता है तो उसे त्याज्य घोषित कर दिया जाता है। आलोचना की इस मनोदशा में व्याख्या और पुनर्व्याख्या की दृष्टि से भिन्न खास किस्म का सामंतीभाव है जिसमें अन्य किस्म के नजरिए के लिए कोई जगह नहीं है।
      हिन्दी में प्रगतिशील आलोचना में एक स्कूल ऐसे विचारकों का रहा है जिनके प्रतिनिधि रांगेय राघव हैं तो दूसरा ग्रुप रामविलास शर्मा का है,हिन्दी में रांगेय राघव की मूल्यांकन दृष्टि में तुलसी को गरियाने का भाव था,तुलसी को खारिज करने का भाव था,उपहास का भाव था,इसी के प्रत्युत्तर में रामविलास शर्मा ने अपने तुलसी संबंधी नजरिए का विकास किया और 'साहित्य समाज का दर्पण है' और 'साहित्य प्रतिबध्द' होता है ,इन दो धारणाओं के आधार पर तुलसी संबंधी अपने मूल्यांकन की आधारशिला रखी, इस क्रम में हिन्दी में मानस के बारे में प्रचलित अध्यात्मवादी मूल्यांकन और संकीर्णतावादी दृष्टियों का जमकर विरोध किया और तुलसी को लोकवादी और जन-जन के पक्षधर कवि के रूप में प्रतिष्ठित किया। इस क्रम रामविलास शर्मा ने प्रगतिशील लेखक संघ के 1936 और 1938 के घोषणापत्रों में व्यक्त मध्यकालीन साहित्य संबंधी दृष्टिकोण का भी खण्डन किया है।
        आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के आलोचना पैराडाइम को बदलने में रामविलास शर्मा का महत्वपूर्ण योगदान है। दूसरी ओर नामवर सिंह ने 'दूसरी परंपरा की खोज' में कबीर को प्रतिष्ठित करने के बहाने आलोचना के परंपरागत रूझान को परंपरा से ही काटने की कोशिश की,नामवर सिंह इस अर्थ में भिन्न हैं कि उन्होंने आलोचना में लकीर के फकीर बने रहने से इंकार किया।यह मूलत: भिन्नता का मार्ग है।परंपराओं के मूल्यांकन की एकाधिक पद्धतियों को स्वीकार करने का दुस्साहस है,किंतु इसकी भी सीमाएं हैं,इसकी सबसे बड़ी सीमा है द्विवेदीजी के प्रति अनालोचनात्मक भाव।  
      रामविलास शर्मा के यहां परंपरा एक ही है,नामवर सिंह ने साहस करके 'दूसरी परंपरा' तक पहुँचते हैं,किंतु इसमें उन्हें अपने गुरू हजारीप्रसाद द्विवेदी से भिन्न परंपरा दिखाई नहीं देती,वरना यह कैसे हो सकता है कि परंपरा का सारा विवाद शुक्ल -द्विवेदी जी के इर्द-गिर्द ही परिक्रमा कर रहा है।   
      दोनों आलोचकों में कई बुनियादी साम्य हैं,पहला साम्य यह है कि दोनों मिथकीय आधार पर दो काव्य धाराएं मानते हैं,रामभक्ति और कृष्णभक्तिधारा। निर्गुण और सगुण और राम और कृष्णभक्ति काव्य परंपरा के नाम पर स्त्री-दलित विरोधी पैराडाइम तैयार किया गया,इस पैराडाइम की धुरी है पितृसत्तात्मक विचारधारा। इस पैराडाइम को समग्रता में उद्धाटित करने की जरूरत है।
       हिन्दी की पहली और दूसरी परंपरा को तरह-तरह से खाद -पानी देने का काम हिन्दी आलोचना करती रही है।कायदे से हिन्दी में साहित्य,दलित साहित्य और स्त्री साहित्य ये तीन परंपराएं मिलती हैं।इनका स्वतंत्र आधार है साथ ही इनमें संपर्क भी है।रामविलास शर्मा-नामवर सिंह की आलोचना में  दूसरा साम्य यह है कि दोनों स्त्री और दलित काव्य परंपरा को अस्वीकार करते हैं, तीसरा साम्य यह है दोनों ने विचारधारा के रूप में पितृसत्ता की उपेक्षा की है।
     मजेदार बात यह है एक को तुलसी पसंद है तो दूसरे को कबीर, दोनों ने मीराबाई को केन्द्र में नहीं रखा, कबीर को महान् बनाने के नाम पर कबीर को दलित परंपरा के बाहर ले जाकर हजम करने का प्रयास किया गया,कबीर को साहित्य के पैराडाइम पर रखकर परखा गया,जबकि कबीर को दलित साहित्य के पैराडाइम पर रखकर देखा जाना चाहिए। 
     सवाल यह है कि क्या साहित्य की आलोचना का धर्मनिरपेक्ष आधार स्त्री,दलित और पितृसत्ता के बिना तैयार होता है ?जी नहीं, धर्मनिरपेक्ष आलोचना परंपरा के निर्माण के लिए स्त्री,दलित और पितृसत्ता की उपेक्षा संभव नहीं है। इन तीनों से रहित आलोचना को धर्मनिरपेक्ष आलोचना नहीं कहा जा सकता है।
     





रविवार, 4 अप्रैल 2010

रामचरित मानस विमर्श के नए पैराडाइम की तलाश में -1-

      रामचरित मानस लोक-महाकाव्य है। इसके उपयोग और दुरूपयोग की अनंत संभावनाए हैं।लोक-महाकाव्य एकायामी नहीं बल्कि बहुआयामी होता है,इसमें एक नहीं एकाधिक विचारधाराएं होती हैं।  इसका पाठ संपूर्ण और बंद होता है किंतु अर्थ- संरचनाएं खुली होती हैं, इसके पाठ की स्वायत्तता पाठ की व्याख्या की समस्त धारणाओं के लिए आज भी चुनौती बनी हुई है। लोक-महाकाव्य का अर्थ कृति में नहीं सामाजिक के मन में होता है।पाठक के इच्छित-भाव की तुष्टि का यह सबसे बड़ा स्रोत है,इतिहास की रचना में इसका व्यापक इस्तेमाल होता है।साथ ही इच्छित इतिहास के निर्माण के लिए इसका व्यापक स्तर पर  उपयोग और दुरूपयोग होता रहा है। 
 हिन्दी में आलोचना खूब लिखी जाती है,किंतु ज्यादातर आलोचना 'कला के लिए कला' की तरह 'आलोचना के लिए आलोचना ' की तर्ज पर लिखी जाती है,हिन्दी में आलोचना की पद्धति और सैद्धा न्तिकी का शास्त्र हम आज तक नहीं बना पाए हैं। हमारे पास अभी तक एक भी आलोचना की मुकम्मल किताब नहीं है,आलोचना के बारे में सम्मानजनक ढ़ंग से कहने के लिए कुछ निबंध हैं,कुछ समीक्षाएं हैं,कुछ बहस के लिए लिखी गयी वकीलों जैसी दलीलें हैं,जिनमें हमारे आलोचकगण अपने मुवक्किल की पैरवी करते नजर आते हैं। मसलन् हमारे यहां तुलसीदास के बारे में टनों पन्नो लिखे गए हैं, इसके बावजूद लेवीस्त्रास जैसी एक आलोचना की किताब नहीं है।जिसमें तुलसी के मिथकों का खुलासा किया गया हो और सैध्दान्तिकी भी बनायी गयी हो।
      हमारे यहां आलोचना अभी 'केजुअल' कर्म है,मनमाना कार्य है। हिन्दी के आलोचक जब किसी विषय पर लिखते हैं तो 'केजुअल वर्कर' की तरह पेश आते हैं, उन्हें सिलटाने में दिलचस्पी ज्यादा है।वे अभी तक आलोचना को नियमित सैध्दान्तिकी के दर्जे तक नहीं पहुँचा सके हैं। उसका शास्त्र नहीं बना पाए हैं।यही वजह है कि हिन्दी में आलोचना लिखने के लिए अंग्रेजी में लिखी आलोचना के पास जाना होता है, हिन्दी का आलोचना साहित्य हमें किसी भी किस्म की आलोचनात्मक मदद या सलाह नहीं देता।हमें इस समस्या पर गंभीरता से सोचना चाहिए कि आखिरकार ऐसा क्यों हुआ कि हमारी आलोचना अभी तक गंभीर नहीं हो पायी।अंग्रेजी,जर्मन,फ्रेंच,रूसी आदि भाषाओं में आलोचना के महत्वपूर्ण स्कूल मिल जाएंगे,सैध्दान्तिक मॉडल मिल जाएंगे,शोध में सहारे के लिए अच्छे सैध्दान्तिक उध्दरण मिल जाएंगे,किंतु हिन्दी में इन सबका अकाल पड़ा हुआ है। आखिरकार आलोचना के क्षेत्र में हमसे कहां चूक हुई है ?इतनी बड़ी चूक को व्यक्तिगत मामला कहकर टाला नहीं जा सकता।इस दुर्दशा के लिए निश्चित रूप से आलोचकगण जिम्मेदार हैं,किंतु मामले का आलोचक एक छोटा सा हिस्सा है। आलोचना के लिए जिस तरह के संस्थान,अनुसंधान संरचना,माहौल,विवेक, और पध्दति की जरूरत होती है, अकादमिक अनुशासन ,इन्फ्रास्ट्रक्चर ,और शोधार्थी तैयार करने की जरूरत होती है,शोध को गंभीर बनाने और उसका सम्मान करने की जरूरत होती है,उसकी ओर हमने कभी  ध्यान नहीं दिया। जबकि हिन्दी में सबसे ज्यादा अनुसंधान होता है,सबसे ज्यादा पीएचडी लिखी जाती हैं,साहित्य के क्षेत्र में हिन्दी में सबसे ज्यादा शिक्षक हैं,किंतु एक भी ऐसा अनुसंधान केन्द्र नहीं है जहां शोध की पध्दति और उसका शास्त्र सिखाया जाता हो ,और गंभीरता से अनुसंधान कार्य किया जाता हो।
हिन्दी में आलोचना का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की पहली शर्त है कि आलोचना और हिन्दी विभागों को गंभीरता से चेले बनाने,पट्ठे बनाने,पालने,उनकी नियुक्ति कराने के धंधे से मुक्त किया जाए,हिन्दी के विभागों में अकादमिक क्षमता और उसके आधार पर शोध के नए क्षेत्रों को खोला जाए,गंभीरता के साथ शोध की पध्दति और सैध्दान्तिकी के निर्माण की दिशा में प्रयास किए जाएं।
      रामकथा के ऊपर विचार करते हुए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने प्रश्न उठाया है कि 'राम का चरित्र ऊँचा है कि नीचा,लक्ष्मण का चरित्र हमें अच्छा लगता है कि बुरा,यह आलोचना काफी नहीं है।मौन होकर श्रध्दा के साथ विचा करना होगा कि समस्त भारतवर्ष में हजारों साल से इन्हें किस प्रकार ग्रहण किया है।' यानी रामकथा को किस प्रकार ग्रहण किया है।टैगोर ने लिखा है ' राम का चरित्र मनुष्य का चरित्र होने के नाते ही महिमा से मंडित है।' ... 'रामायण उसी नर चन्द्रमा की कथा है देवता की कथा नहीं।' रामायण में 'देवता ने अपने को छोटा करके मनुष्य को छोटा नहीं बनाया,मनुष्य ही अपने गुण से देवता हो उठा है।' इसी क्रम में रामकथा के एक नए आयाम को उद्धाटित करते हुए टैगोर ने लिखा 'रामायण की प्रधान विशेषता है कि उसने घर की बात को ही बड़ा करके दिखाया है।इसमें केवल कवि का परिचय ही नहीं ,भारतवर्ष का परिचय मिलता है।इससे समझ में आएगा कि गृह और गृहधर्म को भारतवर्ष कितना महत्व देता है।हमारे देश में गृहस्थ-आश्रम का जो इतना ऊँचा स्थान था,इस काव्य में उसी को प्रमाणित किया गया है।गृहस्थाश्रम हमारे सामने सुख के लिए सुविधा के लिए न था। गृहस्थाश्रम पूरे समाज को समेटकर रखता था और मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाता था।गृहस्थाश्रम भारतवर्षीय आर्य समाज की भित्ति है।' 
      इसी तरह मुक्तिबोध ने लिखा है, ' तत्कालीन मानव संबंध,विश्व-दृष्टि तथा जीवन-मूल्यों के सर्वोच्च प्रतीक राम की मानवता हमें प्रभावित करती है।' भक्ति- आंदोलन की तरह ही रामचरित मानस की केन्द्रीय अभिव्यक्ति प्रेम और ज्ञान केन्द्रित है। इन दोनों ही तत्वों का सामंतवाद से सीधा अन्तर्विरोध है।ज्ञान और प्रेम का संदेश आधुनिक बोध पैदा करता है।तुलसीदास को रामचरित मानस लिखने की प्रेरणा धर्मग्रंथों या देवोपासना से नहीं मिली थी,बल्कि दरिद्रता,भूख और सामाजिक उत्पीड़न देखकर प्रेरणा मिली थी। आत्म सम्मान के साथ जीना और मनुष्य के आगे हाथ नहीं पसारना तुलसी की चिंताधारा का मुख्यबिंदु है।रामविलास शर्मा के अनुसार तुलसी की दृष्टि में सबसे बड़ा धर्म है दीनों की सेवा,सबसे बड़ा पाप है उनका उत्पीड़न।वे दुखानुभूति का साधारणीकरण करते हैं।
जिस समय हिन्दी भाषी क्षेत्र में आर्यसमाज के नेतृत्व में समाज-सुधार की लहर चल रही थी,उस समय स्वामी दयानंद सरस्वती की धूम मची हुई थी,सनातनियों के तर्कों का खण्डन करने के लिए उन्होंने उस समय एक किताब प्रकाशित की जिसका नाम था ''सत्यार्थप्रकाश'', इस किताब के अंत में स्वामीजी ने अस्पृश्य किताबों की एक सूची जारी की थी,इसमें तुलसीदास की कृति ''रामचरित मानस'' का पहला नम्बर था,यानी आर्यसमाज के नेता ''रामचरित मानस'' को समाज -सुधार में सबसे बड़ी बाधा मानते थे, वहीं दूसरी ओर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को अपनी इतिहास दृष्टि के लिए सबसे बड़े कवि के रूप में तुलसीदास और कृति के रूप में ''रामचरित मानस'' महत्वपूर्ण लगा।प्रगतिशीलों में रामविलास शर्मा को तुलसी सबसे प्रिय हैं,जबकि रांगेय राघव के लिए सबसे अप्रिय लेखक हैं।मुक्तिबोध को तुलसी का रामचरित मानस सवर्णों के वर्चस्व का औजार लगा और भक्ति-आन्दोलन की निम्नवर्णोंन्मुख धारा को पलटने वाली कृति।उन्होंने तुलसी को सवर्णों के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में व्याख्यायित किया ।


शनिवार, 3 अप्रैल 2010

मुक्तिकामी भाषा होती है ब्लॉग की

       आज ब्लॉग नए चरण में दाखिल हो गया है। ब्लॉग पर पाठकों के समूह बन रहे हैं,लेखकों के समूह बन रहे हैं। ये समूह साझा मुद्दों पर साझाभाव से बहस कर रहे हैं। किस तरह की साझा बहस चल रही है इसे आसानी से खोजा जा सकता है। साझा मंचों के जरिए आने वाली सूचनाओं को कैसे व्यवस्थित किया जाए ,उसके टूल की खोज करना आज सबसे बड़ी समस्या है।
     ब्लॉग में ऐसी सामग्री भी आ रही है जिसका सामाजिक दृष्टि से दीर्घकालिक महत्व है। यह भी खोज की जानी चाहिए कि जो सामाजिक समूह बन रहे हैं उनमें व्यवसायिक दृष्टि से कितने समूह बन रहे हैं और गैर-व्यवसायिक समूह कितने हैं। हिन्दी में खासकर संचार कंपनियों को इस ओर ध्यान देना होगा कि वे यह वर्गीकृत करें कि आखिरकार हिन्दी में किस विषय पर क्या लिखा जा रहा है और कौन से ब्लॉग पर किस तरह की सामग्री आ रही है। अभी चिट्ठाजगत अथवा ब्लॉगवाणी में जो वर्गीकरण आ रहा है जिसे यूजर टैग के रुप में देख सकते हैं, यह वर्गीकरण ज्यादा उपयोगी नहीं है।
      ब्लॉग की क्षमता के व्यापारिक प्रमोशन के लिए हो रहे दुरुपयोग की ओर भी कानून निर्माताओं का ध्यान गया है। अनेक रिसर्च संगठन हैं जो अप्रत्यक्ष ढ़ंग से किसी न किसी वस्तु के व्यापार के प्रमोशन के लिए ब्लॉग का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस पर अमेरिकी प्रशासन ने ध्यान देना शुरु किया है और ब्लॉग कानून में बदलाव भी किए हैं। इस दिशा में फेडरल ट्रेड कमीशन ने तात्कालिक कदम उठाए हैं, इसके तहत ब्लॉगिंग से संबंधित कानून में 30 साल बाद 2009 में परिवर्तन किया गया है। जिसके तहत कानून का उल्लंघन करने पर 11 हजार डॉलर तक जुर्माना हो सकता है। अभी तक फेडरल ट्रेड कमीशन के दिशा-निर्देशों को ब्लॉगरों पर लागू नहीं किया जाता था। लेकिन संशोधनों के बाद ब्लॉगर भी इसके दायरे में आ गया है। वस्तुओं की खरीद-फरोख्त में धीरे-धीरे ब्लॉगर राय बनाने का काम करने लगे हैं। ब्लॉगर चाहे तो किसी भी प्रोडक्ट के बारे में राय बना सकता है और उस वस्तु के प्रचारक का प्रच्छन्न ढ़ंग से काम कर सकता है। हिन्दी के कई ब्लॉग लेखक और वेबसाइट पर भी यह धंधा चल निकला है।
       नए अमेरिकी कानून के अनुसार ब्लॉगर को प्रचारित वस्तु के साथ अपने संबंध का खुलासा करना होगा। नई नीति और कानून ट्विटर ,फेसबुक और नेट विज्ञापनों पर भी लागू होंगे। क्योंकि इनका व्यापारिक प्रचार के लिए ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है।
       ब्लॉग की तकनीक सेल्फ यानी आत्म तकनीक है। यूजर का आत्म विभिन्न रुपों में वेब सामग्री के उत्पादन में अभिव्यक्त होता है। यहां हम कुछ क्षण के लिए ब्लॉग के निजी अनुभवों पर विचार करें। खासकर हिन्दी में ब्लॉग का व्यक्तिगत अभिव्यक्ति मंच के रुप में विकास हो रहा है। दूसरा क्षेत्र है अकादमिक ,जिसके तहत साहित्य, तकनीकी ज्ञान आदि पर लिखा जा रहा है। निजी भावों ,विचारों,कष्ट,बीमारी आदि का ब्लॉग में आना एकदम नए किस्म के मनुष्य का सार्वजनिक जीवन में आना है। इस प्रक्रिया में इंटरनेट ने अभिव्यक्ति का सशक्तिकरण किया है।
     ब्लॉग मूलतः आत्म स्वीकारोक्ति की नेट विधा है। आत्म स्वीकारोक्ति में सत्य का महत्व होता है। सत्यकथन का विज्ञान और धर्म से गहरा संबंध है। मिशेल फूको के शब्दों में आत्म की तकनीकी अपने उत्पादन के साधनों के जरिए व्यक्ति पर निजी असर ड़ालती है अथवा खास किस्म के कार्यों के जरिए निज के शरीर, आत्मा,विचार आदि को प्रभावित करती है। ऐसा करते हुए हम आनंद,खुशी, पवित्रता, प्रजनन, विज़डम,परफेक्शन आदि को प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।
     इसी प्रसंग में इंटरनेट अस्मिता के सवाल भी उठे हैं। इंटरनेट अस्मिता में  सर्जनात्मकता पर जोर है। यह प्रतिवादी सर्जनात्मकता है। ब्लॉगरों के द्वारा विभिन्न तरीकों से प्रतिवाद की भाषा में निरंतर लिखा जा रहा है। प्रतिवादी नेटभाषा ज्यादा लचीली, सामंजस्यपूर्ण ,धारदार और संप्रेषणीय है। इसका अपना निजी भाषिक मुहावरा और तेवर है।
    ब्लॉग की मुक्तिकामी भाषा होती है इसमें लिखते ही खुशी मिलती है,भूमिका को अंजाम देने का सुख मिलता है,साथ ही ऑनलाइन उत्पादन क्षमता की अनुभूति पैदा होती है। ब्लॉग ऐसी तकनीक है जो आत्म को रुपान्तरित करती है। आप ज्योंही नेट पर लिखना खत्म करते हैं गैर-समस्यामूलक वास्तव और वर्चुअल के विभाजन के दायरे में आ जाते हैं। ब्लॉग लेखन हमेशा राहत देता है। यह ऐसा लेखन है जो छोटे-बड़े,महान और सामान्य लेखन के ऊँच-नीच के भेद को नहीं मानता। नेट के आने के बाद खासकर ब्लॉग के आने के बाद ऑनलाइन और ऑफलाइन लेखन का संबंध पूरी तरह रुपान्तरित हो जाता है।
    ब्लॉग वस्तुतः उपलब्ध तकनीक का व्यक्तिगत होमपेज तक विस्तार है। इसका 1990 के दशक में विस्तार इसलिए हुआ क्योंकि इसे टेमप्लेटस और वेब प्रकाशन के उपकरण मिल गए। वह निजी अभिव्यक्ति का निर्णायक क्षण था। यह मानवीय अभिव्यक्ति और मीडिया के लोकतांत्रिकीकरण की दिशा में लगाई लंबी छलांग है।यह एक तरह से सार्वजनिक डायरी है। यह ऐसी डायरी है जिसमें सार्वजनिक और निजी के उत्पादक अन्तर्विरोध को सहज ही देखा जा सकता है।
         डायरी को निजी गुप्त अभिव्यक्ति के लिए लिखा जाता था। लेकिन ब्लॉग में आंतरिक आत्मीय अनुभवों और विचारों की अभिव्यक्ति पर जोर है। यह कार्य भिन्न संचार प्रक्रिया के संदर्भ में सम्पन्न होता है। रिसर्च से पता चला है कि अधिकतर ब्लॉगर स्वयं के लिए लिखते हैं। इसका अर्थ यह भी है कि वे सुचिंतित ढ़ंग से अपने लिए बृहत्तर पाठकवर्ग बनाना नहीं चाहते। ब्लॉग के जरिए विचार और अनुभवों के इतने व्यापक फलक पर रखने के सवाल को सिर्फ ब्लागर की इच्छा, सरोकार तक सीमित नहीं किया जा सकता।
      ब्लॉग में जो लिखते हैं वह तत्काल प्रकाशित हो जाता है, इसके कारण उसे आसानी से पत्रिका और डायरी से अलगाया जा सकता है। यह सच है ब्लॉगर अपने लिए लिखता है लेकिन पोस्ट के छपते ही तुरंत ही देख सकते हैं कि कौन पढ़ रहा है और क्या प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है। ब्लॉगर नहीं जानता कि उसका पाठक कौन है लेकिन पाठक का प्रेम और लगाव उसे लिखने के लिए प्रेरित करता है। पाठक का ऐसा लगाव पहले कभी महसूस नहीं हुआ।
       ब्लॉग में जिस तरह के अनुभव, विचार,भावनाएं देखने को मिलती हैं वैसी नेट की अन्य विधाओं जैसे डिश्कशन फोरम,ईमेल आदि में नजर नहीं आतीं। ब्लॉग का चरित्र तात्कालिक और विकासशील है। फलतः इसमें विचारों के परिवर्तन की ज्यादा संभावनाएं होती हैं।
       ब्लॉग ने निजी और सार्वजनिक के सवाल को एकदम नयी दिशा दी है। खासकर इंटरनेट संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में निजी और सार्वजनिक को नयी फरिभाषा दी है। इंटरनेट संस्कृति में व्यक्तिगत अस्मिता नए सामाजिक उत्पादक वातावरण में स्थित है। इसका एक रुप रियलिटी टीवी में भी देख सकते हैं जहां पर प्राइवेट जिंदगी को हम सार्वजनिक वातावरण में देखते हैं। यह एक तरह से निजी,आंतरिक, प्राइवेसी के सार्वजनिक होने और नार्मल होने की प्रक्रिया है।
        नेट अभिव्यक्ति के अधिकांश रुप सार्वजनिक हैं। यह सच है कि आप नेट पर किसी को पढ़ने के लिए निमंत्रण देने नहीं जाते लेकिन पढ़ने वाले बिना बुलाए आते हैं, बगैर पूछे राय देते हैं। बिना बुलाए पाठक का यहां स्वागत है। ब्लॉग निजी अभिव्यक्ति का वैध मुक्त स्थान है।



साहित्यिक प्रमोशन का आंतरिक उपनिवेशवाद

        हिन्दी साहित्यालोचना में मीडिया में व्यक्त नए मूल्यों और मान्यताओं के प्रति संदेह,हिकारत और अस्वीकार का भाव बार-बार व्यक्त हुआ है। इसका आदर्श नमूना है परिवार के विखंडन खासकर संयुक्त परिवार के टूटने पर असंतोष का इजहार। एकल परिवार को अधिकांश आलोचकों के द्वारा सकारात्मक नजरिए से न देख पाना। सार्वजनिक और निजी जीवन में 'तर्क' की बजाय 'अतर्क' के प्रति समर्पण और महिमामंडन। आजादी के बाद की आलोचना की केन्द्रीय कमजोरी है कल्याणकारी राज्य की सही समझ का अभाव। सार्वजनिक और निजी के रूपान्तरण की प्रक्रियाओं का अज्ञान। सच यह है कि कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की सांस्कृतिक भूमिका के बारे में हमने कभी विचार नहीं किया गया। उलटे कल्याणकारी राज्य का महिमामंडन किया। अथवा उसे एकसिरे से खारिज किया।
             प्रशंसा और खारिज करना ये दोनों ही अतिवादी नजरिए की देन हैं। इनका सही समझ के साथ कोई संबंध नहीं है। कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य का अर्थ सब्सीडी, राहत उपायों अथवा सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों का निर्माण करना ही नहीं है। अपितु कल्याणकारी राज्य आंतरिक गुलामी भी पैदा करता है। कल्याणकारी राज्य ने दो बड़े क्षेत्रों के चित्रण पर जोर दिया पहला-परिवार,इसमें भी मध्यवर्गीय परिवार पर जोर रहा है, चित्रण का दूसरा क्षेत्र है राजसत्ता और बाजार । स्वातंत्र्योत्तर अधिकांश साहित्य इन दो क्षेत्रों का ही चित्रण करता है।
       सवाल उठता है कल्याणकारी राज्य हो और आंतरिक गुलामी न हो ? कल्याणकारी राज्य के परिप्रेक्ष्य में साहित्य के प्रति क्या नजरिया होना चाहिए ? साहित्य को प्रदर्शन की चीज बनाया जाए, अथवा आलोचनात्मक वातावरण बनाने का औजार बनाया जाए ? कल्याणकारी राज्य में 'सार्वजनिक' और 'निजी' स्पेयर या वातावरण का क्या रूप होता है ? इसके दौरान किस तरह का साहित्य लिखा जाता है ? किस तरह के मुद्दे बहस के केन्द्र में आते हैं ? साहित्य की धारणा,भूमिका और प्रभाव की प्रक्रिया में किस तरह के परिवर्तन आते हैं ?
     कल्याणकारी राज्य साहित्य को 'सेलीबरेटी',प्रदर्शन,नजारे,तमाशे,बहस आदि की केटेगरी में पहुँचा देता है, कृति और साहित्यकार को सैलीबरेटी बना देता है। अब साहित्य और साहित्यकार के प्रदर्शन और सार्वजनिक वक्तव्य का महत्व होता है किंतु उसका कोई असर नहीं होता।
    लेखक का बयान अथवा कृति को साहित्येतिहास का हिस्सा माना जाता है। उसका सामाजिक -राजनीतिक तौर पर गंभीर असर नहीं होता, लेखक की जनप्रियता बढ़ जाती है। किंतु सामाजिक संरचनाओं पर उसका प्रभाव नहीं होता। साहित्य और लेखक अप्रभावी घटक बनकर रह जाता है। लिखे का सामाजिक रूपान्तरण नहीं हो पाता।
           आप लिखे पर बहस कर सकते हैं किंतु भौतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में उसे रूपान्तरित नहीं कर सकते। अब साहित्य और साहित्यकार दिखाऊ माल बनकर रह जाते हैं। आलोचना का उपयोगितावाद के साथ चोली-दामन का संबंध बन जाता है। अब साहित्यालोचना उपयोगिता के नजरिए से लिखी जाती है,आलोचकगण सामयिक मंचीय जरूरतों के लिहाज से बयान देते हैं। यह एक तरह का साहित्यिक प्रमोशन है। साहित्य प्रमोशन और तद्जनित आलोचना का मासकल्चर के प्रसार के साथ गहरा संबंध है। मासकल्चर का प्रसार जितना होगा साहित्य में प्रायोजित आलोचना का उतना ही प्रचार होगा। प्रायोजित आलोचना मासकल्चर की संतान है।
      भारत में कल्याणकारी राज्य का उदय साम्राज्यवाद के साथ आंतरिक अन्तर्विरोधों के गर्भ से हुआ । राज्य और जनता के संबंधों के बीच में गहरी गुत्थमगुत्था चल रही थी और सार्वजनिक और निजी में तनाव था, राज्य और जनता के बीच पैदा हुए संकट के 'प्रबंधन' तंत्र के रूप में कल्याणकारी राज्य का उदय हुआ। इस संकट के समाधानों को उपभोग और बाजार के तर्कों के बहाने हल करने की कोशिश की। उपभोग और बाजार की प्रबंधन में केन्द्रीय भूमिका रही है। संकट के प्रबंधन की इस पध्दति का लक्ष्य था राज्य निर्देशित सार्वजनिक वातावरण तैयार करना,सार्वजनिक क्षेत्र खड़ा करना, आमजनता को संकट से बचाने के लिए राहत देना, कल्याणकारी राहतों के तौर पर मजदूर संगठनों और सामाजिक आन्दोलनों को राहत देना।

       कल्याणकारी राज्य के आने के साथ सार्वजनिक और निजी के बीच का भेद कम होने लगता है। कल्याणकारी राज्य वस्तुओं की खपत,मांग,आकांक्षा आदि को बढ़ावा देता है ,उपभोक्ता के असंतोष में इजाफा करता है। वस्तुओं के उपभोग में इजाफा और उपभोक्ता असंतोष को विस्तार देता है। वस्तुओं के उपभोग में वृध्दि और नागरिक अधिकारों का क्षय, पत्रकारिता का मासमीडिया में रूपान्तरण, सार्वजनिक वातावरण के प्रति सम्मानभाव, निजता की उपेक्षा, राजनीतिक दलों में नौकरशाहाना रवैयये का विकास, साहित्य में सैलेबरेटी भाव,पूजाभाव,समाज और साहित्य से आलोचना का अलगाव,साहित्य और पाठक के बीच महा-अंतराल कल्याणकारी राज्य की सौगात है। कल्याणकारी राज्य में नौकरशाही सबसे ज्यादा ताकतवर और आम जनता शक्तिहीन होती है। कल्याणकारी राज्य आम जनता को निरस्त्र बनाता है। प्रतिरोधहीन बनाता है। जो लोग सोचते हैं कि आज की तुलना में कल्याणकारी राज्य ठीक था, वे गलत सोचते हैं, कल्याणकारी रास्ते से ही परवर्ती पूंजीवाद का विकास होता है। कल्याणकारी राज्य स्वभावत: बर्बर होता है। आपात्काल को कल्याणकारी राज्य ने ही लागू किया था। आपात्काल में ही हमारे संविधान में बदनाम 44वें संविधान संशोधन के द्वारा संविधान के आमुख में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जोड़े गए थे।

कल्याणकारी नीतियों के कारण जीवन के बुनियादी क्षेत्रों शिक्षा,स्वास्थ्य, परिवार कल्याण,पानी,बिजली आदि क्षेत्रों की समस्त संरचनाएं खोखली हो जाती हैं। इसका असर साहित्य और अन्य कलारूपों पर भी पड़ता है ऐसा साहित्य और आलोचना बड़ी मात्रा में सामने आता है जो कृत्रिम है अथवा निर्मित है अथवा खोखली अवधारणाओं को व्यक्त करता है। अब हम निर्मित आलोचना को ही वास्तव आलोचना समझने लगते हैं। सारी मुश्किलें आलोचना के इसी रूप के गर्भ से पैदा हो रही हैं। उल्लेखनीय है निर्मित साहित्य,निर्मित आलोचना मूलत: स्टीरियोटाइप आलोचना है। इसका समाज की वास्तविकता,साहित्य की वास्तविकता और आम जनता के जीवन की वास्तविकताओं के साथ कोई संबंध नहीं है। मजेदार बात यह है जो आलोचना के पुरस्कत्तर्ाा हैं वे ही निर्मित आलोचना के भी सर्जक हैं।
          कल्याणकारी राज्य प्रतीकात्मक सामाजिकीकरण करता है। व्यवस्था से जोड़े रखता है। कल्याणकारी राज्य के संस्थान प्रतीकात्मक भूमिका निभाते हैं। प्रतीकात्मक भूमिका की ओट में बर्बरता, मूल्यहीनताऔर आंतरिक उपनिवेशवाद का निर्माण किया जाता है। कल्याणकारी राज्य के लक्ष्यों से नाभिनालबध्द आलोचना का लक्ष्य है आलोचनात्मक विवेक से मनुष्य को मुक्त करना ,आलोचना के वातावरण को नष्ट करना और मनुष्य को आंतरिक तौर पर गुलाम बनाना। अब जीवन और व्यवस्था के बीच 'पैसा' और 'पावर' के नियम निर्णायक भूमिका अदा करने लगते हैं। वे जीवन के आंतरिक आयामों में गहरे पैठ बना लेते हैं।
          अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक संरचनाओं के द्वारा सार्वजनिक और निजी को मातहत बनाकर रखने का भाव खत्म हो जाता है। अब प्रशासन के द्वारा तय मूल्य,नियम,मान्यताएं व्याख्याओं आदि का दैनन्दिन जीवन में महत्व खत्म हो जाता है। मजदूरवर्ग और नागरिकों की जीवनमूल्यों ,आंतरिक जिंदगी और व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता खत्म हो जाती है। अब नए किस्म का विरेचन शुरू हो जाता है। अब नागरिक की बजाय उपभोक्ता और ग्राहक महान बन जाता है। अब मूल्याधारित परिवर्तनों की बजाय भेदपूर्ण संचार का संदर्भ भूमिका अदा करने लगता है। सांस्कृतिक संसाधनों में नए सिरे से प्राणसंचार संभव नहीं रहता। अब सांस्कृतिक संसाधन व्यक्तिगत और सामुदायिक की प्रतीकात्मक पहचान का हिस्साभर बनकर रह जाते हैं। प्रतीकात्मक पुनर्रूत्पादन अस्थिर हो जाता है। अस्मिता के लिए खतरा पैदा हो जाता है और सामाजिक संकट की आम फिनोमिना के तौर पर फूट पड़ता प्रवृत्ति है।
          उल्लेखनीय है कल्याणकारी राज्य शीतयुद्ध के परिप्रेक्ष्य में विकसित होता है जिसका हमारे समूचे चिन्तन पर असर पड़ता है। आलोचना से लेकर राजनीति तक सभी क्षेत्रों में शीतयुध्दीय केटेगरी और अवधारणाओं का उत्पादन और पुनर्रूत्पादन बढ़ जाता है। हिन्दी के सन् 1972-73 के बाद के प्रगतिशील साहित्य,नयी कविता, जनवादी साहित्य,आधुनिकतावादी साहित्य पर शीतयुद्ध की अवधारणाओं का गहरा असर साफ तौर पर देखा जा सकता है।
            कल्याणकारी राज्य में आंतरिक उपनिवेशवाद के कारण नए किस्म के अन्तर्विरोध और संकट पैदा होते हैं। नयी उन्नत तकनीक के आने के कारण पेशेवर पहचान बदलती है , निजी जीवन में पैसे की भूमिका निर्णायक हो जाती है। उपभोक्ता की भूमिका बढ जाती है। वर्गसंघर्ष और बुर्जुआ क्रांति के कार्यभारों को कल्याणकारी राज्य स्थगित कर देता है। अब मजदूर संघर्ष नहीं करते बल्कि ज्यादा से ज्यादा अन्य गैर बाजिव समस्याओं में मशगूल रहते हैं। संकट को प्रतीकात्मक तौर पर भौतिक पुनर्रूत्पादन का विरोध करते हुए सम्बोधित किया जाता है। फलत: नए किस्म के मुक्तिसंग्राम शुरू हो जाते हैं। ऐसे संग्राम सामने आ जाते हैं जिनके बारे में पहले कभी सोचा नहीं था । इन तमाम संग्रामों का बुनियादी आधार है आंतरिक गुलामी से मुक्ति। स्त्री मुक्ति, दलित मुक्ति,स्त्री साहित्य,दलित साहित्य ,पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण आदि ऐसे ही नए प्रसंग हैं।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

आत्माभिव्यक्ति का महिमामंडन है ब्लॉगिंग

     ब्लॉग क्या है ? यह सवाल हमारे कई शिक्षक बंधुओं ने पूछा है,वे यह भी जानना चाहते हैं कि ब्लॉग के द्वारा किस तरह की संस्कृति पैदा हो रही है,इस पर भी कुछ रोशनी ड़ाली जाए।
     ब्लॉग सार्वजनिक आत्म अभिव्यक्ति का खुला मंच है। ब्लॉग आत्म की तकनीक है। यह ऐसा मंच है जिस पर आप अभिव्यक्त करने के साथ संवाद और संपर्क भी कर सकते हैं। 
   ब्लॉग आत्माभिव्यक्ति का महिमामंडन है। यह मूलतः व्यक्तिगत संदर्भ में की गई सार्वजनिक अभिव्यक्ति है।  इसमें शैली और अंतर्वस्तु का वैविध्य है। यह डायरी का विलोम है। इसका लेखक विचारों और अनुभवों की आत्मीय अभिव्यक्ति करता है।
      ब्लॉग की दुनिया ने उन लोगों को अभिव्यक्ति का सार्वजनिक मंच दिया है जो व्यक्तिगत कष्ट और पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए तरस रहे थे। निजी पीड़ा की अभिव्यक्ति का यह महासमुद्र है। जो समाज सामंती सोच की सीमाओं का अतिक्रमण कर चुके हैं और सर्वसत्तावादी व्यवस्था में आ चुके हैं वहां पर आज व्यक्तिगत दर्द की अभिव्यक्ति का प्रभावशाली माध्यम है ब्लॉग। ब्लॉग लेखक किस तरह के सांस्कृतिक-राजनीतिक वातावरण में जी रहा है इसे बखूबी ब्लॉग से समझा जा सकता है।
   इंटरनेट के आने के बाद मनुष्य ने अपनी खोई अभिव्यक्ति को प्राप्त किया है। अभिव्यक्ति का सशक्तिकरण हुआ है। ब्लॉग पर जितनी सामग्री बढ़ती जाएगी मनुष्य उतना ही सशक्त होता चला जाएगा।
    ब्लॉग पर सिर्फ सूचना और विचारों का ही आदान-प्रदान नहीं होता बल्कि सामाजिक समूहों में संप्रेषण और गोलबंदी की संभावनाएं बढ़  हैं। दूसरा बढ़ा परिवर्तन यह आता है कि पाठक या नेट यूजर को ब्लॉग शिरकत करने का अवसर देता है। अभी तक निजी अनुभव में सार्वजनिक शिरकत का हमारे पास कोई मीडियम नहीं था,ब्लॉग ने इस अभाव की पूर्ति की है।
     व्यक्ति की अभिव्यक्ति का क्षेत्र सबसे जटिल क्षेत्र रहा है। इसमें विविधता,गांभीर्य और सतहीपन का मिला-जुला खेल चलता रहता है।
    हिन्दी का ब्लॉग जगत शैशवावस्था में है। शैशव का भोलाभाव यहां सहज ही देखा जा सकता है। व्यक्तिगत अनुभवों को लिपिबद्ध करने पर ज्यादा जोर है। विचार ,राजनीति, इंटरनेट तकनीक, कानून,फीचर,ज्योतिष,विज्ञान,साहित्य ,बीमारी आदि विषयों पर ब्लॉग ज्यादा लिखे जा रहे हैं। इन सब विषयों का लेखन देखकर यही कहा जा सकता है कि ब्लॉग लेखन जीवंत बेवाक् लेखन है और चुप्पी के टूटने  का प्रमाण है।  
    वैज्ञानिक यह मानते हैं कि लेखन से व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार आता है। यह बात ब्लॉग लेखकों पर भी लागू होती है। इंटरनेट ने यह संभावना पैदा की है कि आप अपने मन को सार्वजनिक तौर पर व्यक्त कर सकते हैं। यह ब्लॉग लेखक को प्रकाशित भी करता है। कल तक अधिकांश ब्लॉगर लेखक के रुप में अदृश्य थे लेकिन आज दृश्य हैं उन्हें देश-विदेश में पढ़ा जाता है। सैकड़ों अनुभव और कहानियां ब्लॉग लेखन के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में शामिल हो रहे हैं।
   इंटरनेट पर पहले ब्लॉग आया और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का व्यापक विस्फोट हुआ। अब सोशल नेटवर्किंग के जरिए साइबर सामाजिक समुदाय बन रहे हैं और अभिव्यक्त कर रहे हैं। यह एक तरह से सामाजिक शिरकत से जुड़ा पहलू है। नए युग के सार्वजनिक और व्यक्तिगत संचार के नए रुप हैं ईमेल,ब्लॉग,वेबसाइट,साइबर संवाद मंच आदि। इनके माध्यम से ही प्रधानतः संचार कर रहे हैं।
  
    
      
     

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

इंटरनेट का पाखण्डशास्त्र



(वर्चुअल रियलिटी का जनक जरोन लेनियर)                                                   
         भारतीय समाज में तकनीक और विधाओं का प्रयोग हमेशा देर से शुरु होता है। नेट पर जब से ट्विटर आया है  चर्चित व्यक्तित्वों का धीरे-धीरे जमघट बढ़ रहा है। ये लोग अपने व्यापार और व्यक्तित्व का बाजार बनाने के लिए ट्विटर का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। ट्विटर पर आने वाले ज्यादातर वे लोग हैं जो गंभीर संकट में हैं, अलगाव से परेशान हैं अथवा बाजार की उठा-पटक में पिछड़ गए हैं।
     आम तौर पर यह मान लिया जाता है कि जो चर्चित व्यक्तित्व है उसके सामने सुख भोगने के अलावा और कोई काम नहीं है। सच इसके एकदम उलट है। इस युग में सबसे ज्यादा संकटग्रस्त कोई है तो वह चर्चित व्यक्तित्व है। झूठी शानो-शौकत ने उसकी सच्चाई पर मोटा पर्दा ड़ाला हुआ है। उसकी इमेज सत्य से नहीं बनी है बल्कि वह तो मीडिया निर्मित नकली इमेज है। चर्चित व्यक्तित्व पर लिखते समय अथवा उसका लिखा पढ़ते समय अथवा उस पर पढ़ते समय यह ध्यान रखें कि लिखे का कभी एक ही अर्थ नहीं होता। खासकर स्टार या अभिनेता की इमेज बहुआयामी होती है। संचार क्रांति के कारण हम इमेजों की महामारी के शिकार बनकर रह गए हैं।   
   इंटरनेट के आने के साथ बड़े पैमाने पर खुलेपन की बहस चली और दुनिया में तरह-तरह के विचारकों ने इस पर काम किया था। इंटरनेट के खुलेपन के हिमायतियों में एक हैं जरोन लेनियर। लेनियर को वर्चुअल रियलिटी का जनक माना जाता है और उनका संचार की उन्नत तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान भी है।
    लेनियर की हाल ही में एक किताब आयी है जिसका नाम है ‘‘ यू आर नॉट गजट’’,इस किताब में उन्होंने लिखा है मैंने आरंभ में इंटरनेट के फ्री इस्तेमाल की हिमायत की थी और साहित्य,संगीत,कला आदि का आम यूजरों ने इंस्टेंट इस्तेमाल किया था ,जो भी रचना हम तैयार करते थे उसका यूजरों के द्वारा इंस्टेंट इस्तेमाल होता था। आज हमें इस पर नए सिरे से सोचने की जरुरत है।
    लेनियर ने लिखा है कि इंटरनेट पर गुटबाजी हो रही है ,उन्मादी गिरोह सक्रिय हैं, और घटिया किस्म के सामजिक-असामाजिक गुट बन रहे हैं। औसत बुद्धि के लोगों ने नेट पर जमघट लगा लिया है। लेनियर ने लिखा है हमने मुफ्त सॉफ्टवेयर का महिमामंडन किया और व्यक्तिगत सर्जनात्मकता की फ्री सूचना और सामुदायिक सेवाकार्य के नाम पर उपेक्षा की।  लेनियर ने इसके लिए वेब की ‘अनाम’ परंपरा को दोषी ठहराया है।
    ब्लॉग,फोरम और सोशल नेटकर्क आदि ने  ‘अनाम’ की परंपरा और औसत सृजन के बढ़ावा दिया है।इसका आदर्श उदाहरण है विकीपीडिया। लेनियर ने लिखा है कि ‘‘खुली संस्कृति’’ और ‘‘मुफ्त सूचना’’ ने विध्वंसक सामाजिक संपर्कों को जन्म दिया है। इस संपर्क के कारण यह धारणा बलबती हुई है कि लेखकों,पत्रकारों, कलाकारों,पत्रकारों आदि से मुफ्त में सामग्री ली जा सकती है। अब सब कुछ सेल्फ प्रमोशन यानी विज्ञापन बनकर रह गया है।
     आम तौर पर फोकटिया ज्ञान पाने वाले यह भूल ही जाते हैं कि ज्ञान के निर्माण में धन,कल्पना,बुद्धि,विवेक आदि का भी खर्चा होता है और हमें ज्ञान को फ्री में पाने की मानसिकता से बचना चाहिए। उल्लेखनीय है कि जरोन लेनियर ने ही फोकट में ज्ञान बांटने की हिमायत की थी आज उन्हें इसमें कारपोरेट हितों की रक्षा के कारण समस्या नजर आ रही है।
     यह सच है कि इंटरनेट पर गुणवत्तापूर्ण और विश्वसनीय लेखन में गिरावट आयी है और यूजर के पास सही क्या है और गलत क्या है इसका अभाव बार-बार महसूस किया गया है । हिन्दी में अनेक बेवसाइट हैं जो विशुद्ध सनसनी फैलाने और ब्लेकमेलर छुटभैय्या पत्रकार की भाषा और सामग्री का इस्तेमाल करती रहती हैं। हिन्दी में ही क्यों अन्य भाषाओं में भी यही स्थिति है। लेनियर ने स्वयं एक जमाने में बेव पर आने वालों को ‘डिजिटल किसान’ कहा था।
    जिस तरह आम जीवन में हम आए दिन किसान को मुफ्त पानी,मुफ्त बिजली प्रदान करने की वकालत करते हैं ठीक वैसे ही नेट के यूजर के लिए भी मुफ्त ज्ञान और सामग्री देने की मांग कर रहे हैं।
    साफ्टवेयर की शोषक प्रकृति होती है और इसका साक्षात प्रमाण है गूगल। जो लोग सोचते हैं कि सॉफ्टवेयर की तटस्थ प्रकृति होती है वे भोले हैं। तकनीक खासकर संचार और परिवहन की तकनीक की शोषक प्रकृति होती है। यही वजह है कि नेट,मीडिया,परिवहन के क्षेत्र में बड़ी-बड़ी इजारेदारियां पैदा हुई हैं।
     नेट पर दूसरी बड़ी समस्या है बौद्धिक चोरी की। बौद्धिक चोरी को नेट ने वैध बनाया है। फोटोकॉपी से यह सिलसिला आरंभ हुआ था और आज नेट बौद्धिक चोरों का महासमुद्र बन गया है। आप जब किसी किताब की फोटोकॉपी करते हैं तो लेखक के अधिकारों का हनन कर रहे होते हैं और इस तरह लेखक का नुकसान कर रहे होते हैं। बाद में यह सिलसिला ऑडियो-वीडियो की प्रतिलिपि तैयार करने में चल पड़ा। अब हम चोरी करना गलत नहीं मानते बल्कि सही मानते हैं। इसी को कहते हैं शोषकों की कतार में जाने-अनजाने शामिल होना। यह सारा गड़बड़झाला उपभोक्ता को फायदा पहुँचाने के नाम पर चल रहा है।
      बौद्धिक पाइरेसी से सर्जक और निर्माता को गंभीर नुकसान हो रहा है। कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति बौद्धिक चोरी को स्वीकृति नहीं देगा। बौद्धिक चोरी या प्रतिलिपि तैयार करने के कारण सर्जक और निर्माता का नुकसान होता है साथ ही समूचा बौद्धिक वातावरण भी खराब होता है और बौद्धिक गिरावट आती है।
    हम गौर करें कि जीरोक्स मशीन आने के बाद से प्रतिलिपि निर्माण का काम तेज हुआ है और इससे बौद्धिक उत्पादन और पुनर्रुत्पादन में गिरावट आयी है। औसत और निम्न कोटि की बौद्धिकता का उन्माद पैदा हुआ है। इस उन्माद ने एक खास किस्म का बेबकूफों,औसत लेखकों और चमचामार्का बुद्धिजीवियों की सारी दुनिया में लहलहाती फसल तैयार की है। ज्ञान,संवाद,संपर्क ,ज्ञान के प्रति सम्मान और बंधुत्व में तेज गिरावट आयी है। संस्कृति और ज्ञान को फ्रिज कर दिया है आज जरुरत इस बात की है कि इस हिमालय जैसे ठंड़े फ्रिज कर देने वाले संचार क्रांति के वातावरण से कैसे निकलें।     











विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...