गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

मासमीडिया में अपने-अपने राम

       आधुनिक-काल के पहले रामचरित मानस लोकधुन,लोक-मन और लोक-पाठ का हिस्सा था।आधुनिक काल में मुद्रण की तकनीक ने उसे किताब बनाया,रामचरित मानस के किताब बनते ही उसे अंध-लोकवादी रूझानों से मुक्ति मिली।वह धर्मनिरपेक्ष -विमर्श का हिस्सा बना। बहुआयामी उपयोग की संभावनाओं का जन्म हुआ। 
     किताब में आने के बाद 'रामचरित मानस' बाजार का हिस्सा बनता है, उसके पीछे छिपे पूजा-भाव,धार्मिक भाव की विदाई होती है।पहले वह ज्ञानोत्पादन का साधन था,अब अर्थोत्पादन का स्रोत था। हिन्दी के इतिहासकारों और आलोचकों की मुश्किल यह है कि   वे यह देखने में असमर्थ रहे हैं कि छापे की मशीन आने के पहले ''रामचरित मानस'' एक पोथी था,चंद लोगों की बपौती था,किंतु किताब के रूप में छप जाने के बाद अब वह किसी की बपौती नहीं रह गया। 
     पोथी से किताब बनने के बाद रामचरित मानस को जनप्रियता की नई बुलंदियों को स्पर्श करने का अवसर मिला,पहले वह भक्त और कवियों के लिए उपयोग और प्रेरणा की चीज था,किंतु अब वह सबके लिए उपयोग की चीज था,कहने का तात्पर्य यह कि रामचरित मानस का किताब में आना एक ऐतिहासिक परिघटना है, किताब में आने के बाद ही इसका व्यापक जनप्रिय आधार तैयार होता है।
     किताब के पहले का 'रामचरित मानस' विमर्श और किताब में आने के बाद का विमर्श एक नहीं है,साथ ही ''रामचरित मानस'' भी एक नहीं है। पहले वह मात्र पाठ था,संस्कृति का अंग था,किंतु छापे की मशीन के आने के बाद वह संस्कृति उद्योग का हिस्सा बनता है। संस्कृति से संस्कृति -उद्योग में रूपान्तरण की प्रक्रिया को प्रेस, फिल्म,रेडियो, माइक्रोफोन आदि ने एक नए आयाम में ले जाकर उसे स्थापित कर दिया।
      खासकर माइक्रोफ्रोन के इस्तेमाल के कारण ''रामचरित मानस'' का एक नया पाठ तैयार हुआ है, नए किस्म के वैचारिक प्रभाव की सृष्टि हुई है।वाचिक परंपरा से लिखित और कालान्तर में इलैक्ट्रोनिक परंपरा में ''रामचरित मानस'' के रूपान्तरण ने उसके पाठ को ही नहीं बदला , उसके भाव और इंफेसिस एरिया को भी बदला है,साहित्य के पाठक के लिए जो बिंदु आकर्षण के केन्द्र में हैं,वे बिंदु कथावाचक के लिए संभवत: आकर्षण नहीं रखते, फिल्म और ऑडियो उद्योग का रामचरित मानस के जिन पक्षों के प्रति आग्रह है ,वह आग्रह सीरियल निर्माताओं के लिए अप्रासंगिक है।विज्ञापन में तुलसीदास का जो रूप प्रचार में है और बाजार के लिए ''रामचरित मानस'' कितनी बड़ी ताकत है इसकी ओर हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया। तुलसीदास साहित्य की ही शक्ति नहीं है,बल्कि आधुनिक बाजार और राजनीतिकी भी ताकत है।
     किताब में ''रामचरित मानस'' के रुपान्तरण के बाद सबसे पहली प्रतिक्रिया यह हुई कि रामचरित मानस के साथ अपने को जोड़ने की, स्वयं की पहचान बनाने,इमेज बनाने,अस्मिता बनाने का रिवाज जोरों से चल निकला, नयी पदावली में कहें तो ''रामचरित मानस'' ने आधुनिक हिन्दी समाज को अपनी अस्मिता का अस्त्र दे दिया। हिन्दीभाषी लोग जहां भी गए अथवा देश में जहां भी रहते थे,वहां अखंड रामायण पाठ की नयी परंपरा अपने साथ लेकर गए,मजदूर बस्तियों से लेकर मध्यवर्गीय बस्तियों में रामायण का अखण्ड पाठ संस्कृति से वंचितों को सांस्कृतिक पहचान देता रहा है।इसी के समानान्तर रामलीला मंडलियों और रामलीला कमेटियों के माध्यम से मध्यवर्गीय लोगों की इमेज चमकाने , साख और दबदबा बढ़ाने का फिनोमिना भी चल निकला। कहने का तात्पर्य यह है कम्युनिकेशन और मीडिया की तकनीकी ने रामचरित मानस को सीधे अस्मिता की राजनीति के हवाले कर दिया।पहले ''रामचरित मानस'' स्मृति का हिस्सा था,किंतु अब अस्मिता का हिस्सा है,माध्यम तकनीक का हिस्सा है।पहले भक्ति का अस्त्र था,आज बाजार को चंगा रखने का औजार है,पहले विचार और सृजन की दुनिया का प्रेरणा स्रोत था,आज अर्थव्यवस्था का हिस्सा है।
    विचारणीय सवाल यह है कि रामलीला और अखंड रामायण पाठ के कारण बाजार की अर्थव्यवस्था और स्थानीय अर्थव्यवस्था को कितना लाभ पहुँचा है ?मुद्रण उद्योग ने ''रामचरित मानस'' से कितना फायदा उठाया है ? पर्यटन उद्योग को कितना लाभ मिला है ? रामसेवा में लगे संतों के अखाड़ों ने कितनी पूंजी कमायी है ? 
       आधुनिककाल में ''रामचरित मानस'' धार्मिकता की धुरी बनकर आया है,धार्मिकता में जब धर्म या कृति का रूपान्तरण होता है तो उसके अनेक आयाम सामने आते हैं, उसका एक आयाम वैचारिक है जो पाठ में है,जबकि साहित्यकार और गैर साहित्यकार के लिए पाठ के बाहर है,दूसरा आयाम जीवनशैली से जुड़ा है जो बाजार तय कर रहा है,तीसरा आयाम सांस्कृतिक आस्वाद या अभिरूचि से जुड़ा है जिसे संस्कृति उद्योग तय कर रहा है, चौथा आयाम अर्थव्यवस्था से जुड़ा जिसे बाजार की शक्तियां तय कर रही हैं।पांचवां आयाम संप्रेषण से जुड़ा है जिसे मीडिया रूप तय कर रहे हैं,छठा आयाम वर्चुअल यथार्थ से जुड़ा है जिसे अत्याधुनिक वर्चुअल तकनीक, कम्प्यूटर  आदितयकर रहा है।इसके कारण तेरे-मेरे राम अलग-अलग हैं।
    रामचरित मानस का पाठ इतना व्यापक और लचीला है कि इसका किसी भी किस्म के वैचारिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। मसलन् आर्यसमाजियों को यदि इससे नफरत है तो प्रगतिशीलों में भी इसे खारिज करने वाले और प्रतिक्रियावादी पाठ के रूप में इसकी आलोचना करने वाले बड़ी तादाद में हैं। 
     उसी तरह ''रामचरित मानस'' यदि परंपरावादियों की सांस्कृतिक पहचान का अस्त्र है तो दूसरी ओर रामविलास शर्मा जैसे प्रगतिशील आलोचकों के लिए  ''रामचरित मानस'' प्रगतिशील पाठ है। वहीं रामानन्द सागर से लेकर रवीन्द्र जैन तक ,श्याम बेनेगल से लेकर रामकिंकर उपाघ्याय तक रामचरित मानस का अर्थ और उपयोग एक नहीं है, इनकी मंशाएं  और उपयोग अलग -अलग हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि ''रामचरित मानस'' का अर्थ और कार्य-व्यापार का संबंध 'मंशा' 'मीडिया' और 'विचारधारा' से जुड़ा है।






बुधवार, 7 अप्रैल 2010

इंटरनेट तटस्थता को करारा झटका

     इंटरनेट की स्वतंत्रता को अब तक सर्वसत्तावादी समाजों में ही राजनीतिक दबाब झेलने पड़ रहे थे लेकिन कल अमेरिका में वाशिंगटन डीसी की निचली अदालत ने करारा झटका दिया है। इंटरनेट के संदर्भ में अमेरिका की अदालतों और प्रशासन के रुझान का सारी दुनिया के लिए बड़ा महत्व है। कल ‘कॉमकास्ट’ के मामले में निचली अदालत ने कहा है कि अमेरिका के फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन के पास मौजूदा कानूनों के तहत इंटरनेट के संचालन और नियंत्रण के पर्याप्त अधिकार नहीं हैं। इसके कारण यह संस्था किसी अवांछित बेवसाइट या बेव सेवा संचालक के ट्रैफिक का प्रसारण या संचार नियमित और नियंत्रित नहीं कर सकती।
    निचली अदालत के इस फैसले से नेट तटस्थता के निर्माण के लिए फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन के द्वारा किए गए प्रयासों को करारा झटका लगा है। अदालत ने कॉमकास्ट के पक्ष में अपना फैसला सुनाया है। उल्लेखनीय है कि इंटरनेट सेवा देने वाली कॉमकॉस्ट ने सन् 2007 में बिट टोरेंट नामक कंपनी के नेट ट्रैफिक को बाधित किया था और नेट संचार रोक दिया था। कॉमकॉस्ट के इस फैसले के खिलाफ फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन ने कदम उठाए थे और फैसला भी दिया था,इस फैसले को कॉमकास्ट ने चुनौती दी थी,निचली अदालत में लंबी कानूनी जंग के बाद यह फैसला आया है।
   इस फैसले का यह असर हो सकता है कि फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन इंटरनेट की तटस्थता को बनाए रखने के बारे में जो प्रयास कर रहा है वे सफल न हो पाएं। कमीशन ऐसे प्रावधान तैयार करने में लगा हुआ है जिससे नेट कंपनियां किसी भी किस्म के नेट संचार को बाधित नहीं कर सकती थीं।यूजर की प्राइवेसी का उदघाटन नहीं कर सकती थीं, लेकिन अदालत के इस फैसले ने नेट कंपनियों को नेट संचार को रोकने और मनमानी करने का एक तरह से खुला लाईसेंस दे दिया है। यह नेट की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वालों के लिए करारा झटका है। कमीशन यह प्रयास कर रहा है कि नेट कंपनियों के फैसलों से नेट की तटस्थता प्रभावित न हो। यह माना जा रहा है कि हाल ही में फेडरल कमीशन ने जो ब्राडबैण्ड योजना तैयार की है उसे भी लागू करना आसान नहीं होगा। इसका अर्थ यह भी है कि फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन अब किसी भी नेट सेवा कंपनी की मनमानी रोक नहीं सकेगा। यानी कंपनियां सरकारी नियंत्रण के बाहर अपनी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र होंगी। इसका अर्थ यह भी है कि नेट उपभोक्ता की प्राइवेसी अब असुरक्षित है। कंपनियां प्राइवेसी के मामले में कुछ भी कर सकती हैं। 
   उल्लेखनीय है चीन में नेट कंपनियों ने प्राइवेसी का उल्लंघन करते हुए चीन प्रशासन के खिलाफ संघर्ष करने वालों की सभी सूचनाएं, ईमेल और पते वगैरह दे दिए जिसके आधार पर सैंकड़ों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को चीन प्रशासन ने गिरफ्तार कर लिया। 
    अमेरिका में बड़े पैमाने पर कारपोरेट घरानों के नियंत्रण से इंटरनेट को मुक्त कराने का आंदोलन चल रहा है हमें भी इस संघर्ष में उनका साथ देना चाहिए। हमें भी अपने नेटबंधुओं को नेट स्वतंत्रता के पक्ष में गोलबंद करना चाहिए।


मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

कागजरहित आईपेड केन्द्रित शिक्षा का वर्चुअल आयाम


        इन दिनों मीडिया से इंटरनेट तक आई पेड की धूम मची है । यह भी हवा बनाई जा रही है कि आईपेड के आने के साथ ही कागजरहित शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन आएंगे। आई पेड की संभावनाओं में एक नयी छलांग विश्वविद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में आ सकती है। तीन विश्वविद्यालयों ने तय किया है कि वे अपने विद्यार्थियों और शिक्षकों को आईपेड देंगे।
      ये विश्वविद्यालय हैं - सेटोन हिल यूनीवर्सिटी,जॉर्ज फॉक्स यूनीवर्सिटी और एविलेनी क्रिश्चियन यूनीवर्सिटी । ये तीनों विश्वविद्यालय यह प्रयोग करना चाहते हैं कि आखिरकार इस तकनीक का शिक्षा में क्या परिणाम आता है। वे देखना चाहते हैं कि कक्षा की पढ़ाई में आई पेड किस रुप में तब्दीलियां लाता है।
     इन तीनों विश्वविद्यालयों के अधिकारियों का मानना है कि आईपेड, किताब को पूरी तरह अप्रासंगिक बना देगा। बच्चों को किताबों  का बोझाभरा बस्ता नहीं ढ़ोना पड़ेगा। आईपेड में बच्चों की किताबें रहेंगी और वे उनके जरिए बेहतर शिक्षा पाएंगे। अगर यह प्रयोग सफल रहता है तो निश्चित रुप में शिक्षा में एक नए वातावरण की सृष्टि होगी।
    असल में शिक्षा में बुनियादी बदलाव आने का भी सपना परोसा जा रहा है। उपकरणों के माध्यम से शिक्षा में मदद मिलती है लेकिन शिक्षा में इजाफा नहीं होता यदि ऐसा होता तो अमेरिका के दो-तिहाई विश्वविद्यालयों में तीसरी दुनिया के देशों की खासी भीड़ जमा नहीं हो जाती। अमेरिका के आम छात्रों में उच्चशिक्षा में न जाने का रुझान बढ़ा है। यह सारी प्रक्रिया संचार क्रांति के स्वर्ण युग में घटी है।   
    अभी आईपेड शिक्षा में सफल हो पाएगा इसमें सन्देह है। क्योंकि  ई पाठ्यपुस्तकों का अभाव है। स्वयं अमेरिका में कोई भी प्रकाशक ई पाठ्यपुस्तक तैयार करने के काम में पैसा लगाना नहीं चाहता। दूसरी समस्या यह है कि ई बुक के पांच बड़े प्रकाशक हैं जिनके यहां ई बुक हैं और उसमें कथा और गैरकथा साहित्य ही है और किसी ने अभी तक पाठ्यपुस्तकें नहीं छापी हैं। जिन 5 ई बुक प्रकाशकों से ई बुक ली जा सकती हैं उनके पास मात्र 10 हजार किताबें हैं। ये किताबें भाड़े पर ही प्राप्त की जा सकती हैं। चूंकि इन तीनों विश्वविद्यालयों में अभी यह प्रयोग के रुप में आईपेड का पढ़ने पढ़ाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है तो हम तो यही चाहेंगे कि यह प्रयोग सफल हो ।
    अंत में यही कहेंगे संचार क्रांति से नहीं क्रांति से अशिक्षा दूर होगी। समाजवादी देशों से लेकर केरल तक शिक्षा में लंबी छलांग संचार क्रांति के बिना ही हो पायी है। अमेरिका के पास ही छोटा सा देश हे क्यूबा ,उसकी शिक्षा के क्षेत्र में सफलताएं अचम्भित करने वाली हैं। उल्लेखनीय है क्यूबा अभी ब्रॉडबैण्ड युग में प्रवेश करने की तैयारी कर रहा है।
     कहने का तात्पर्य यह है कि संचार तकनीक के उपकरण शिक्षा को सजा सकते हैं ,शिक्षित समाज का निर्माण नहीं कर सकते। शिक्षित समाज से तात्पर्य है अच्छे मनुष्य का निर्माण। हमें सोचना चाहिए अमेरिकी शिक्षा में ऐसा क्या है जिसके कारण वहां शिक्षा ,राजनीति और समाज मे फंड़ामेंटलिज्म बढ़ा है। खासकर संचार क्रांति के दौर में अमेरिकी समाज ज्यादा फंडामेंटलिस्ट बना है। खासकर ईसाई फंडामेंटलिज्म का व्यापक विस्तार हुआ है। अमेरिका के बाहर अमेरिकी प्रशासन और बहुराष्ट्रीय निगमों ,खासकर संचार कंपनियों ने सभी रंगत के फंडामेंटलिस्टों की फंडिंग की है।          







विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...