सोमवार, 14 जून 2010

तमाशबीनों के देश में लुटेरे-3-

          एक जमाना था रंगभेद को सबसे बड़ा भेदभाव का रूप माना जाता था नए किस्म का का रंगभेद है झुग्गी-झोंपड़ी ,कच्ची बस्तियां और मुस्लिमों के प्रति घृणा। तमाम किस्म के उदारवादियों में झोंपडी वालों और मुसलमानों के प्रति भेददृष्टि के दर्शन साफ होते हैं। यह भेददृष्टि कारपोरेट मीडिया और मुंबईया सिनेमा में साफ अभिव्यंजित हो रही है।
    समूचे देश में जिस तरह विगत तीन दशकों में कच्ची बस्तियों का व्यापक रूप में विस्तार हुआ है उससे यह तत्व साफतौर पर देख सकते हैं कि महानगरों और शहरों में जितने लोग पक्की बस्तियों में, घरों में रहते हैं, उतने ही या कहीं पर उससे ज्यादा लोग महानगर की झोंपड़पट्टियों में रह रहे हैं। उठता है क्या बस्ती वाले को हम सर्वहारा कह सकते हैं ? क्या यह समुदाय क्रांति कर सकता है ? 
     ये वे लोग हैं जिनके पास परंपरागत जाति-धार्मिक पहचान नहीं है, किसी भी किस्म की परंपरागत जीवनशैली इनके पास नहीं है। स्लावोज जीजेक के शब्दों में इनके पास किसी भी किस्म की पहचान नहीं है। ये सभी किस्म के आधारभूत बंधनों से मुक्त हैं। ये मुक्त स्पेस में यहां से वहां ढ़ुलकते रहते हैं। ये राज्य और पुलिस के नियमन के पूरी तरह बाहर हैं। इन्हें  जबरिया ढ़ंग से समूह में बांध दिया गया है। ये जबरिया एक साथ रहने के लिए अभिशप्त हैं। इनकी परिस्थितियां ऐसी हैं कि अब इनके यहां कोई घटना घटित नहीं होती।
        आमतौर पर यह कहा जाता है कि समूचे समाज पर राज्य का नियंत्रण है। लेकिन बस्तियों में रहने वालों पर राज्य का कोई नियंत्रण नहीं है।  ये राज्य नियंत्रण के दायरे या नक्शे के बाहर हैं। कच्ची बस्तियां समस्त किस्म के अवैध कारोबार का हिस्सा  हैं। समानान्तर अर्थव्यवस्था,संगठित अपराध, धार्मिक समूहों आदि का बुनियादी आधार हैं। ये सभी क्षेत्र मूलतः कानून के दायरे के बाहर  हैं।
    कच्ची बस्तियों का वातावरण गैर-सर्वहारा समूहों की शहरी क्रीडास्थली है। इन इलाकों में रहने वाली जनता प्रत्येक वस्तु और सुविधा से वंचित है। यह संरचनाविहीन जनता है। इस जनता को संगठित करना और राजनीतिक चेतना संपन्न बनाना सबसे बड़ी राजनीतिक जरूरत है। यह जनता जिस विचारधारा के साथ संगठित हो जाएगी उसे राजनीतिक प्रतिष्ठा दिला सकती है। 
     वेनेजुएला में अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रपति चावेज का शहरी झोंपड़पट्टियों में रहने वाली जनता को संगठित कर लेना सबसे बड़ी शक्ति साबित हुआ है। भारत में माकपा का पश्चिम बंगाल में जनाधार और दीर्घकालिक आधार तैयार करने में झोपड़पट्टी में रहने वालों का सबसे बड़ा योगदान रहा है। इनके ही आधार पर लंबे समय से बुर्जुआ राजनीति का वाममोर्चा प्रतिवाद करता रहा है।
     दूसरी महत्पूर्ण बात यह है कि झोपड़पट्टियों में रहने वाली आबादी में से हिंसा करने वाले गिरोह तैयार होकर आते  रहे हैं। इन बस्तियों में रहने वालों की आय का बड़ा स्रोत असामाजिक कार्रवाईयां रही हैं। हिंसा को जनप्रिय बनाने और वैध बनाने में इन बस्तियों की बड़ी भूमिका है।  
     हिंसा को झोंपड़पट्टी वालों ने साझा संस्कृति में तब्दील किया है। भारत में मुंबई के दंगों से लेकर गुजरात के दंगों तक और 1984 के सिख दंगो में सबसे ज्यादा हथियारबंद गिरोह झोंपड़पट्टियों से ही निकलकर आए थे। 
     दूसरी ओर हिंसा का ज्ञान के स्तर पर,राजनीतिक स्तर पर महिमामंड़न बढ़ा है। हिंसा का समाजीकरण बढ़ा है। आज हमारी आम बोलचाला की भाषा में हिंसक भाषा आ बैठी है। इस स्थिति में आग में घी देने का काम कारपोट घराने कर रहे हैं। वे अपने मुनाफों के अंधाधुंध विस्तार के लिए ,अपने निजी स्पेस के निर्माण के लिए आम जनता की संपत्तियों को लूट रहे हैं, सरकारी संपत्तियों और सुविधाओं को लूट रहे हैं। इसके कारण उनके पास बेशुमार संपत्ति का संचय हो गया है।
     आज साधारण आदमी के पास किसी भी किस्म का प्राइवेट वातावरण नहीं है। वह जिस प्राइवेट वातावरण में रहता है उसमें अहर्निश भय बना हुआ है। इस भय के कारण वह अपनी विशिष्ट पहचान खो चुका है। अब राजनीति में विचारधारा के आधार पर जनता को संगठित नहीं किया जाता है बल्कि विशेषज्ञों के द्वारा जनता के प्रबंधन और प्रशासन पर जोर दिया जा रहा है। 
      अराजनीतिक ढ़ंग से समाज की सुरक्षा और विकास की बातें की जा रही हैं। अराजनीतिकरण के आधार पर प्रशासन का प्रमुख आधार तैयार किया जा रहा है। समूचे वातावरण को भय में तब्दील कर दिया गया है। हमेशा तबाही का डर लगा रहता है। भय की पूंजी ही ग्लोबल पूंजीवाद की प्रधान संपदा है। 
      आम जनता में थर्म का ह्रास हुआ है धर्म की जगह धार्मिक तत्ववाद ने ले ली है। धार्मिक फंडामेंटलिज्म को आज आम जनता की अफीम में रूपान्तरित कर दिया गया है। धार्मिक फंड़ामेंटलिज्म के प्रभुत्व को आज कोई भी चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। जगह-जगह धार्मिक फंड़ामेंटलिज्म ने सामाजिक दायरों को संकुचित किया है। ये सारी चीजें मिलकर हमारी मनोदशा बना रही हैं।
        समाज में ‘पशु मनुष्य’ और ‘अमानवीय मनुष्य’ ये दो किस्म के लोग ज्यादा दिख रहे हैं। सामान्य जीवन में खाओ-पीओ-मौज करो का नारा देकर जो धारणा बनाई जा रही है उससे ‘पशु मनुष्य’ की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। खाओ-पाओ-मौज करो का सिद्धान्त पशु का सिद्धान्त है। आज आदमी आनंद और मनोरंजन के चक्कर में व्यस्त है और मौत आदि से डरता है। यह मनोदशा पशु की है। इसे मानवीय मनोदशा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। मनुष्य का सत्य प्रेम ही उसे पशुता से मुक्ति दिलाता है। सत्य घटनाएं ही उसे पशुता से ऊपर उठाती हैं। मीडिया सत्य की बजाय भय पैदा करने के मार्ग पर चला गया है।                     
      आज समाज में निजीकरण बगैर हिंसा के संभव नहीं है। निजता पर बढ़ता हुआ जोर हमें ज्यादा से ज्यादा हिंसा की ओर ठेल रहा है। ज्यादा धन कमाने के चक्कर में हिंसक उपकरणों का प्रयोग करने लगे हैं। प्राइवेसी के सवाल मूलतः संपत्ति संचय से जुड़े सवाल हैं। संपत्ति संचय के जिन रूपों को हम इन दिनों देख रहे हैं वे हैं बौद्धिक संपदा अधिकार, डिजिटल अधिकार, इंटरनेट से मुफ्त सामग्री संकलन का अधिकार,नेट से मुफ्त संगीत पाने का अधिकार आदि। ये सभी आधुनिक किस्म के संपदा संचय के अधिकार हैं।
     पूंजीवाद हमेशा सामाजिक परिस्थितियों के निर्माण पर ध्यान देता है। वह बाजार को वस्तुगत और विरेचन के रूप में पेश करता है। बाजार के पीछे सक्रिय अदृश्य हाथों को चालाकी भरे तर्कों के आधार पर पेश करता है। वह यह भी आभास देता है कि निजी अहं में कैद व्यक्ति साझा सामाजिक लक्ष्यों के लिए काम करता है।साथ ही यह भावना बनाए रखता है कि रेडीकल किस्म के परिवर्तन होने वाले हैं।
       निजी संपत्ति के अधिकारों के रूप में डिजिटल जगत में प्रधान अंतर्विरोध पैदा हो रहे हैं। निजी संपदा का अर्थ है मुनाफा कमाना। जब कोई संपदा अथवा वस्तु मुनाफा देने लगे तो वह निजी संपदा बन जाती है। जिन वस्तुओं का भारत के लोग सदियों से इस्तेमाल करते रहे हैं और जिनका जन्म भारत में हुआ है उन वस्तुओं के पेटेण्ट अधिकार बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने नाम कराकर व्यापार कर रही हैं। पेटेण्ट का अधिकार निजी संपदा का सबसे बड़ा अधिकार बन गया है। बायोजेनेटिक कंपनियां ये काम खूब कर रही हैं।
    पूंजीपतिवर्ग किस तरह का व्यवहार रहा है इसे समझने के लिए माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट का 3 फरवरी 1976 का खुला पत्र आदर्श उदाहरण है। बिल गेट ने अभिरूचियों के शौकीनों के नाम लिखे खुले पत्र में लिखा है कि सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में निजी संपदा का वर्चस्व है। बिल गेट ने लिखा है कि ‘‘अभिरूचियों के अधिकांश शौकीन यह जानते हैं कि वे सॉफ्टवेयर चुराते हैं ..ज्यादातर सीधे चुराते हैं। आप जो काम कर रहे हो उसे चोरी कहते हैं।’’ बिल गेट का मानना है ज्ञान उसकी संपत्ति है, भाषा उसकी संपत्ति है। लेखन के प्रकार उसकी संपत्ति है। निजी संपत्ति के नाम पर सॉफ्टवेयर का दोहन सरासर बेईमानी है,अनैतिक है।
       आयरनी यह है कि जो कारपोरेट घराने जनता की संपदा की खुली लूट कर रहे हैं वे ही आज हमारे बीच में सबसे बड़े जनसेवक के रूप में पेश किए जा रहे हैं। मसलन् बिल गेट को गरीबी और बीमारियों के खिलाफ संघर्ष करने वाले महान व्यक्ति के रूप में,रूपक मडरॉक को महान पर्यावरणवादी के रूप में पेश किया जा रहा है। 
    राजनीतिक एक्शन और उपभोग के बीच साझा मोर्चा बन गया है। लुटेरे अमीर जनसेवक और राजनीतिज्ञों को इनके हितों के संरक्षक के रूप में पेश किया जा रहा है।
       आम जनता को पूंजीवादी वातावरण में डुबो दिया गया है। यही वातावरण आम जनता के लिए अफीम है। नए पूंजीवादी वातावरण के रूप में गगनचुम्बी इमारतें , चमकीली सड़कें, मॉल,तरह-तरह की उपभोक्ता वस्तुएं,इलैक्ट्रोनिक वस्तुएं,डिजिटल माल आदि को पेश किया जा रहा है।            
  

              

‘लाइव इंडिया टीवी ’ पर ‘वैज्ञानिक सनसनी’ का खेल

कल दोपहर टीवी चैनलों में अंधविश्वास की दोपहर थी। सभी चैनलों में सेक्स स्कैण्डल में फंसे स्वामी नित्यानंद की तथाकथित अग्नि परीक्षा का कवरेज प्रधान खबरों में था।  दूसरी ओर ‘लाइव इंडिया’ टीवी चैनल ने कल अचानक दोपहर में एक कार्यक्रम के जरिए अंधविश्वास पर धावा बोल दिया।
       टीवी चैनलों पर अंधविश्वास का बढ़ता हुआ ‘फ्लो’ इस बात का प्रमाण है कि समाज में अंधविश्वास अब स्वैच्छिक कुटीर उद्योग नहीं रहा बल्कि संगठित कारपोरेट उद्योग की शक्ल ले चुका है। मनोरंजन उद्योग या संस्कृति उद्योग ने उसे अपने सांस्कृतिक ‘फ्लो’ और विज्ञापन के जरिए मुनाफा कमाने का जरिया बना लिया है।   
      ‘लाइव इंडिया’ के द्वारा 13 जून 2010 को विज्ञानसम्मतचेतना के प्रचार-प्रसार के नाम पर जो कार्यक्रम पेश किया उसमें बार-बार बाबाओ के द्वारा जनता को गुमराह करने और ठगने वाली चमत्कारिक घटनाओं को निशाना बनाया गया और सही ढ़ंग से कई चमत्कारों की पोल खोली गयी। समूचे कार्यक्रम का ढ़ांचा अंधविश्वासों पर प्रश्न चिन्ह लगाता था। इस तरह के कार्यक्रम की सीमित उपयोगिता है। यह कार्यक्रम ऐसे समय में आया था जब स्टार न्यूज वाले एक दिन पहले शनि पर केन्द्रित कार्यक्रम पेश कर चुके थे। दूसरी ओर स्वामी नित्यानंद की अग्निपरीक्षा का कवरेज विभिन्न चैनलों में दिखाया जा रहा था।
       ‘लाइव इंडिया’ टीवी चैनल के इस चमत्कार-अंधविश्वास विरोधी कार्यक्रम को चैनल के एक कार्यक्रम के रूप में देखने से चीजें समझने में असुविधा हो सकती है। टीवी पर अंधविश्वासों की प्रस्तुति के बारे में यह ध्यान रहे कि चैनल के कार्यक्रमों के समग्र ‘फ्लो’ के संदर्भ में किसी कार्यक्रम के प्रभाव को देखा जाना चाहिए। ‘लाइव इंडिया’ की मुश्किलों का सिलसिला यहीं से शुरू होता है।
    मजेदार बात यह है कि ज्योंही इस चैनल ने चमत्कारों के खिलाफ कार्यक्रम खत्म किया उसके तत्काल बाद ज्योतिष फलादेश का कार्यक्रम दिखाना आरंभ कर दिया और अपने कार्यक्रम की महत्ता और प्रभाव को नष्ट कर दिया।
     अंधविश्वास और चमत्कार हजारों सालों से चले आ रहे हैं और इनका विशाल सामाजिक-वैचारिक आधार है। आम लोग चमत्कारों-अंधविश्वासों को लेकर भरोसे में जी रहे हैं। आम लोग के भरोसे को सनसनी फैलाकर या वैचारिक घालमेल करके या तदर्थ उपायों से जीतना संभव नहीं है। इस तरह के सभी हथकंड़े अंधविश्वासों को मानने वाले लोगों का दिल जीतने में मदद नहीं करते।
     ‘लाइव इंडिया’ टीवी का पूरा फॉरमेट सनसनी वाला है। सनसनी के जरिए विवेक पैदा नहीं होता ,इससे सिर्फ ध्यानाकर्षित करने में मदद मिलती है। ध्यानाकर्षित करने की कला रेटिंग बढ़ाने की कला है। ज्ञान की रेटिंग सनसनीखेज प्रस्तुति से नहीं बढ़ती । सनसनीखेज प्रस्तुति से मनोरंजन होता है। वैज्ञानिकचेतना पैदा नहीं होती। सनसनी की कला ‘सेल’ की कला है।      
    इस कार्यक्रम में वैज्ञानिक अमिताभ ने सही कहा कि हम वैज्ञानिक अज्ञात को ज्ञात से जानते हैं। व्याख्यायित करते हैं। ये बाबा लोग ज्ञात को अज्ञात के जरिए व्याख्यायित करते हैं। डा़ नायर ने कहा चैनलों के जरिए अंधविश्वास फैलाना सामाजिक अपराध है और संविधान के अनुच्छेद 51 की भावनाओं का उल्लंघन है। हमारे समाज की मुश्किल यह है कि 16वीं सदी की मानसिकता का 21वीं सदी की तकनीक के साथ घालमेल हो रहा है।
        चैनलों पर अंधविश्वास-चमत्कार विरोधी कार्यक्रमों के सकारात्मक प्रभाव के लिए जरूरी है चैनल का विवेकसम्मत फॉरमेट हो। चैनल की दबे-कुचले लोगों के प्रति प्रतिबद्धता के रूप में साख हो। खासकर कमजोर मन के लोगों,बच्चों और औरतों के प्रति प्रतिबद्धता हो। क्योंकि इन समूहों को अंधविश्वास जल्दी निशाना बनाते हैं।   

   



रविवार, 13 जून 2010

तमाशबीनों के देश में लुटेरे-2-

       
    हमें बार-बार यही बताया जा रहा है कि हम पूंजीवाद का समर्थन करें। हमें सहनशील बनने की सीखें प्रदान की जा रही हैं।  कहा जा रहा है हम तटस्थ रहें, विवादों, संघर्षों,मांगोंके लिए होने वाले सामूहिक संघर्षों से दूर रहें, सामूहिक संघर्ष बुरे होते हैं। आम आदमी को तकलीफ देते हैं। 
    जो लोग समाज में तटस्थता का अहर्निश प्रचार कर रहे हैं ,वस्तुतः पूंजीवाद से तटस्थता का प्रचार कर रहे  हैं। मीडिया में जनसंघर्षों और मानवाधिकार हनन का विकृत प्रचार मूलतः पूंजीवाद की ही सेवा है। यह पूंजीवादी समाज के अन्यायपूर्ण चेहरे को ढंकने की कोशिश है।
   पूंजीवाद ने हमारे सामाजिक जीवन को किस तरह हजम कर लिया है उसका साक्षात प्रमाण है भीषण गर्मी का प्रकोप। अंधाधुंध ,विषम और अनियोजित पूंजीवादी विकास के कारण पर्यावरण संतुलन गड़बड़ा गया है। इस क्रम में हम गर्मी झेल रहे हैं लेकिन पूंजीवाद के बारे में हम कोई भी चर्चा नहीं कर रहे। बल्कि मीडिया निर्मित नजारे की संस्कृति ने मौसम को पूंजीवाद निरपेक्ष और भगवान की कृपा बना दिया है। गर्मी की भीषण तबाही हमारे अंदर किसी भी किस्म की सामाजिक बेचैनी पैदा नहीं कर रही है। पूंजीवादी प्रचार का ही प्रभाव है कि मौसम में आए बदलाव हमें पूंजीवादरहित होकर नजर आ रहे हैं।
     माओवादियों की खूंखार हरकतें गरीबी की देन नजर आ रही हैं। माओवाद के खिलाफ कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि हमें उनके खिलाफ राजनीतिक जंग लड़नी चाहिए। उन्हें जनता में अलग-थलग करना चाहिए। हमें उनके खिलाफ जनता को गोलबंद करना चाहिए।
     सवाल किया जाना चाहिए कि पूंजीवादी प्रचार माध्यम विगत 60 सालों से क्या कर रहे थे ? पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा 35 सालों से क्या कर रहा था ? माओवादियों को राजनीतिक तौर पर परास्त क्यों नहीं कर पाया ? कांग्रेस और माओवाद का हल्ला करने वाला कारपोरेट मीडिया माओवादियों के प्रति आम जनता में घृणा पैदा क्यों नहीं कर पाया ? क्या जब माओवादी हिंसा कर रहे हों ऐसे में जनता में राजनीतिक प्रचार किया जा सकता है ? क्या माओवाद का विकल्प जनता को समझाया जा सकता है ? राजनीतिक प्रचार के लिए शांति का माहौल प्राथमिक शर्त है और माओवादी अपने एक्शन से शांति के वातावरण को ही निशाना बनाते हैं,सामान्य वातावरण को ही निशाना बनाते हैं, वे जिस वातावरण की सृष्टि करते हैं उसमें राज्य मशीनरी के सख्त हस्तक्षेप के बिना कोई और विकल्प संभव नहीं है। राज्य की मशीनरी ही माओवादी अथवा आतंकी हिंसा का दमन कर सकती है।
    जब एक बार शांति का वातावरण नष्ट हो जाता है तो उसे दुरूस्त करने में बड़ा समय लगता है। माओवादी और उनके समर्थक बुद्धिजीवी माओवादियों की शांति का वातावरण नष्ट कर देने वाली हरकतों से ध्यान हटाने के लिए पुलिस दमन,आदिवासी उत्पीड़न, आदिवासियों का आर्थिक-सामाजिक पिछड़ापन,बहुराष्ट्रीय निगमों के हाथों आदिवासियों की प्राकृतिक भौतिक संपदा को राज्य के द्वारा बेचे जाने,आदिवासियों के विस्थापन आदि को बहाने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
     माओवादी राजनीति या आतंकी राजनीति का सबसे बड़ा योगदान है सामान्य राजनीतिक वातावरण का विनाश। वे जहां पर भी जाते हैं सामान्य वातावरण को बुनियादी तौर पर नष्ट करते हैं। शांति के वातावरण को नष्ट करते हैं। शांति का वातावरण नष्ट करके वे भय और निष्क्रियता की सृष्टि करते हैं। इसके आधार पर वे यह दावा पेश करते हैं कि जनता उनके साथ है। सच यह है कि आदिवासी बहुल इलाकों से कांग्रेस, माकपा, भाजपा आदि दलों के लोग चुनाव के जरिए विशाल बहुमत के आधार पर चुनकर आते रहे हैं। माओवादियों के प्रभाव वाले इलाकों में उनकी चुनाव बहिष्कार की अपील का कोई असर नहीं पड़ता।      
     मीडिया के प्रचार ने कारपोरेट पूंजी निवेश का जिस तरह पारायण किया है और परम पवित्र बनाया है और इसके विध्वांसत्मक  आयाम पर जिस तरह पर्दादारी की है, उसे गायब किया है, उससे दर्शकीय नजरिया बनाने में मदद मिली है। प्रचार के जरिए हर चीज का जबाब बाजार में खोजा जा रहा है,हमसे सिर्फ देखने और भोग करने की अपील की जा रही है।  
    बाजार,पूंजी निवेश, परवर्ती पूंजीवाद आदि को वस्तुगत बनाने के चक्कर में मीडिया यह भूल ही गया कि वह जनता को सूचना संपन्न नहीं सूचना विपन्न बना रहा है। हमसे यह छिपाया है कि पूंजीवाद आखिरकार किन परिस्थितियों में काम करता है।
      नव्य उदारतावाद और साम्राज्यवाद के विरोध को अब अमेरिकी विरोध की बृहत्तर केटेगरी में बांध दिया गया है। जबकि सच यह है कि साम्राज्यवाद के विरोध का अर्थ अंध अमेरिकी विरोध नहीं है।
  कारपोरेट मीडिया में पूंजीवाद की आलोचना का लोप हो गया है। पहले संस्कृति में असन्तोष अथवा अस्वाभाविकता को महसूस करते थे ,सामयिक परिवर्तन यह है कि असन्तोष और अस्वाभाविकता संस्कृति से प्रकृति की ओर स्थानान्तरित हो गया है।  पहले प्रकृति नेचुरल थी आज प्रकृति भी नेचुरल नहीं रह गयी है।
     

तमाशबीनों के देश में लुटेरे-1-

          आज भारत तमाशबीनों का देश है। इसमें नागरिक नहीं तमाशबीन निवास करते हैं। तमाशबीनों की तरह आज हम सब एक-दूसरे को देख रहे हैं। पूरे समाज को देख रहे हैं। माओवादियों ने दांतेवाडा में बम के धमाके किए,निर्दोष लोग मारे गए, हम तमाशा देखते रहे। हाल ही में अहमदाबाद में दंगे हुए हम तमाशा देखते रहे। पश्चिमी मिदनापुर में माओवादियों की शैतानी हरकतों से रेल पटरी से उतरी हम तमाशा देखते रहे। कहीं कोई छेड़छाड़ की घटना हुई हम तमाशा देखते रहे। मंहगाई आसमान छू रही है हम तमाशा देखते रहे। नेता-अफसर लूट मचा रहे हैं हम तमाशा देखते रहे। भोपाल गैस त्रासदी के पीडितों  के खिलाफ अदालत का फैसला आया हम टीवी के सामने बैठे त्रासदी का राग भोपाली देख रहे हैं। कहीं पर कोई महाजुलूस नहीं, देश में और मध्यप्रदेश में कोई हड़ताल नहीं। ये तमाशे और नज़ारे हमारे जीवन में मीडिया के जरिए पहुँच रहे हैं। मीडिया ने हमें खबरों का नहीं तमाशों और नज़ारों का अभ्यस्त बना दिया है।
      अब हम किसी के दोस्त नहीं रहे। रिश्तेदार-नातेदार नहीं रहे। परिचित मात्र हैं। तमाशबीन हैं। तमाशबीन की तरह एक-दूसरे के जीवन में तांक-झांक करते रहते हैं। हम कब तमाशबीन में रूपान्तरित हो गए ? तमाशबीन होने से क्या होता है ? तमाशबीनों की बृहत्तर जमात में आज जो कुछ घटित हो रहा है उसे सामान्य बात कहकर टाला नहीं जा सकता ?     
       तमाशबीन की तरह देखना आधुनिक पूंजीवादी समाज का लक्षण है। यह ऐसा समाज है जहां प्रतीक (साइन) की जगह हम व्यंजित को देखते हैं। मौलिक की नकल करते हैं। यथार्थ के प्रतिनिधि बनने का दावा कर रहे हैं।
       हम जो कुछ देख रहे हैं वह सब कल्पना है,विभ्रम है। कल्पना एक जमाने में आनंद देती थी इन दिनों भय पैदा करती है। सत्य दुर्लभ होता जा रहा है और कल्पना का विस्तार हो रहा है। पूंजीवादी समाज में जितना कल्पना का विस्तार होता है उसी मात्र में भय का विस्तार होता है। भय और कल्पना की इस अन्तर्क्रिया ने समूची सामाजिक चेतना को आच्छादित कर लिया है। फलतः सत्य छोटा हो गया है और कल्पना बड़ी हो गयी हैं।
      आज भारत  में उत्पादन के आधुनिक साधनों का वर्चस्व है। उत्पादन के आधुनिक उपकरणों का वर्चस्व ही है जो हम सबको तमाशबीन बना रहा है। इसके कारण ही बड़े पैमाने पर नजारे देखने को मिलते हैं। अब हम जो कुछ देखते हैं वह सब इमेजों में देखते हैं,इमेजों के जरिए समाज समझते और ग्रहण करते हैं। अब व्यक्ति का नहीं इमेजों का प्रतिनिधित्व सामने आता है। जिन इमेजों को देखते हैं उनका सामान्च जीवन से अब कोई संबंध नहीं होता,फलतःजीवन की एकीकृत धारणा भी नहीं बना पाते। जीवन में चीजों के बीच अन्तस्संबंध नहीं बना पाते। यथार्थ हमेशा अधखुला नजर आता है। यथार्थ अपनी आंतरिक एकता से कटा नजर आता है। जिस दुनिया को देखते हैं वह छद्म होती है। जिन वस्तुओं को देखते हैं वे उलझनें पैदा करती हैं। जब इमेजों के संसार में विशिष्टिकृत इमेजों को रच लेते हैं तो इमेजों का स्वायत्त संसार पूर्णता प्राप्त कर लेता है। जिंदगीरहित चीजें स्वायत्त विचरण करने लगती हैं।
     मौजूदा समाज में इमेजों को देखना और उनमें ही जीना सामान्य बात हो गयी हो गयी है। नज़ारे ही प्रमुखता अर्जित कर लेते हैं। इमेज और उनके नजारे ही एकता के सूत्र बन जाते हैं। अब हम नज़ारों को देखते हैं,नज़ारे हमें देखते हैं। एक-दूसरे को देखना ही एकीकरण का मंत्र बन जाता है। नज़ारे ही समाज को जोड़ने का उपकरण बन जाते हैं। समाज में जहां जाओ सब एक-दूसरे को घूर रहे हैं। अब घूरना ही चेतना की निर्धारक तत्व बन जाता है। घूरना आज छद्मचेतना का प्रभावशाली आधार है। वंचित और समर्थ सभी एक-दूसरे को घूर रहे हैं। नज़ारों और घूरने के आधार पर ही हमारी चेतना भी बन रही है।
    हम जब इमेज देखते हैं तो सिर्फ इमेजों को ही नहीं देखते बल्कि इमेजों के जरिए जनता के बीच के सामाजिक संबंधों को देखते हैं। जनता के सामाजिक संबंधों के बीच में सेतु का काम इमेज करती हैं।
    इमेजों को विज़न के दुरूपयोग के जरिए नहीं समझा जा सकता। बल्कि इमेजों का उत्पादन जनोत्पादन की तकनीक के गर्भ से होता है। हम जिन इमेजों को मीडिया के विभिन्न रूपों के माध्यम से देखते हैं वे सभी सामाजिक वर्चस्व वाले मॉडल का प्रतिनिधित्व करती हैं। अब हमारे सामने तयशुदा चीजें पैदा करके रख दी गयी हैं और हमें अब इनमें से ही चुनना है। यह तय है कि किसमें से चुनना है,कितना चुनना है और क्यों चुनना है। यह सब पहले से ही निर्धारित है। नागरिकों को उपलब्ध उत्पादन संबंधों में से ही चुनना होता है। हम जो चुनते हैं वह अवास्तविक होता है, काल्पनिक होता है। जो चुनते हैं वह वास्तव सामाजिक यथार्थ में कुछ भी नया नहीं जोड़ता। इसमें हम सिर्फ जो उपलब्ध कराया जा रहा है उसमें से ही चुनते हैं। उपभोग करते हैं। विचार,प्रचार,विज्ञापन,मनोरंजनआदि का उपभोग करते हुए सामाजिक वर्चस्व का ही उपभोग करते हैं। फलतः सामाजिक वर्चस्व का हिस्सा मात्र बनकर रह जाते हैं। हम जिन नज़ारों को देखते हैं वे रूप और अन्तर्वस्तु में मौजूदा व्यवस्था की वैधता को ही हमारे ज़ेहन में उतारते हैं। मौजूदा व्यवस्था के लक्ष्य और परिस्थितियों की वैधता को पुष्ट करते रहते हैं। नज़ारे हमारे मन में व्यवस्था के लक्ष्य और परिस्थितियों के प्रति स्थायी वैधता पैदा करते हैं।
    सामान्य जीवन में संसार की एकीकृत अवस्था के साथ संबंध टूट जाता है। समग्र विश्व और अंश के बीच संबंध टूट जाता है। यथार्थ और इमेज का संबंध टूट जाता है। नज़ारे के दर्शकों की भाषा शासकीय उत्पादन की भाषा बन जाती है। य़ासकों की भाषा में नज़ारों का उत्पादन किया जाता है और फिर सारा समाज शासकों की भाषा में ही चीजें देखने और बोलने लगता है। हम जिन प्रतीकों में बोलते हैं,जिसमुहावरे में बोलते हैं वे सभी सत्ता के द्वारा पैदा किए हैं।
      प्रतिवाद की भाषा का अपहरण करने की मीडिया कोशिश के रूप में हाल ही में एयर इंडिया के कर्मचारियों की ूनियन पर पाबंदी लगाए जाने और बड़ी तादाद में कर्मचारियों के नेताओं की बर्खास्तगी की खबर को देख सकते हैं। बर्खास्तगी के पहले एयर इंडिया के कर्मचारियों की हड़ताल को इस तरह पेश किया गया गोया ये लोग जनविरोधी हैं, इन्हें हड़ताल पर जाने का हक नहीं है। इन्हें अपनी मांगों को हासिल करने के लिए आंन्दोलन का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। स प्रचार अभियान का सीधा असर हुआ और दिल्ली हाईकोर्ट ने एयर इंडिया के कर्मचारियों की हड़ताल को अबैध करार दे दिया।
   ज्यों ही हड़ताल अवैध करार हुई कर्मचारी काम पर लौट आए और उनके काम पर लौटते ही कर्मचारियों की दोनों यूनियनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया और आज स्थिति यह है कि 48 से ज्यादा कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया गया है। कर्मचारियों के सस्पेंशन और यूनियनों पर पाबंदी की खबरों को जस तरह का कवरेज मिलना चाहिए वह नहीं मिला,समूचे मीडिया में प्रतिवाद करने वालों का उपहास करने, उन्हें अपमानित करने,उन्हें सामाजिक तौर पर अलग-थलग ड़ालने की यचंत कोशिशें हो रही हैं। मीडिया में ‘पूंजीवाद’ पदबंध का प्रयोग अघोषित सेंसरशिप के कारण नहीं हो रहा है।
    अमेरिका का विरोध करने ,साम्राज्यवाद का विरोध करने वालों की भाषा का लोप हो गया है। पूंजीवाद, अमेरिका,साम्राज्यवाद आदि पदबंधों को लेकर प्रगतिशील भावबोध और अर्थ संप्रेषित पैदा किया जा रहा है। पूंजीवाद,नव्य-उदारतावाद आदि के प्रति जनता को सक्रिय करने वालों को प्रगतिशील कहा जा रहा है। पूंजीवाद को श्रेष्ठतम समाज के रूप में चित्रित किया जा रहा है।
    







शनि का मिथ और यथार्थ

(शनि पर शोध करता उपग्रह कासिनी, क्या ज्योतिषी बताएंगे उनके यहां शनि पर कौन काम कर रहा है ? )
        शनि को लेकर पोंगापंडितों ने तरह-तरह के मिथ बनाए हुए हैं और इन मिथों की रक्षा में वे तरह-तरह के तर्क देते रहते हैं। शनि से बचने के उपाय सुझाते रहते हैं। स्टार न्यूज के एक कार्यक्रम में एक ज्योतिषी ने कहा कि शनि का फल सबके लिए एक जैसा नहीं होता। कुंडली में अवस्था के अनुसार शनि का फल होता है।
      शनि के सामाजिक और व्यक्तिगत प्रभाव के बारे में जितने भी दावे ज्योतिषियों के द्वारा किए जा रहे हैं वे सभी गलत हैं और सफेद झूठ है। ज्योतिष में ग्रहों के नाम पर फलादेश का सफेद झूठ तब पैदा हुआ जब हम विज्ञानसम्मतचेतना से दूर थे। आज हम विज्ञानसम्मतचेतना के करीब हैं । ऐसी अवस्था में ग्रहों के प्राचीन काल्पनिक प्रभाव से चिपके रहना गलत है ।  
   (शनि के बादल की इमेज)
     शनि इस ब्रह्माण्ड में एक स्वतंत्र ग्रह है,उसकी स्वायत्त कक्षा है । भारत के ज्योतिषी यह बताने में असमर्थ रहे हैं कि शनि की पृथ्वी से कितनी दूरी है ? शनि का प्रभाव कैसे पड़ता है ? शनि के बारे में हमारी परंपरागत जानकारी अवैज्ञानिक है। हमें इस अवैज्ञानिक जानकारी से मुक्ति का प्रयास करना चाहिए।
   शनि एक ग्रह है। यह सच है। लेकिन इसका पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों पर प्रभाव  होता है यह धारणा गलत है। बुनियादी तौर पर किसी भी ग्रह का मनुष्य के भविष्य या भाग्य के साथ कोई संबंध नहीं है।
     शनि काला है न गोरा है,राक्षस है न शैतान है, वह तो ग्रह है। उसकी कोई मूर्ति नहीं है। शनि के नाम पर जो शनिदेवता प्रचलन में हैं वह पोंगापंथ की सृष्टि है। जिस दिन मनुष्य ने ग्रहों को देवता बनाया, उनकी पूजा आरंभ की,उनके बारे में तरह-तरह के मिथों की सृष्टि की उसी दिन से मनुष्य ने ग्रहों को अंधविश्वास और भविष्य निर्माण और विध्वंस के गोरखधंधे का हिस्सा बना दिया। उसके बाद से हमने ग्रहों के सत्य को जानना बंद कर दिया।
     शनि का सत्य क्या है ? शनि इस ब्रह्माण्ड का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। शनि में अनेक वलय बने हैं। अनेक वलय या रिंग के कारण शनि दूर से देखने में बेहद खूबसूरत लगता है। शनि के अलावा गुरू,नेपच्यून, यूरानस ग्रह में ही रिंग या वलय हैं। स्टार न्यूज ने लिखा शनि की दूरी है एक अरब 32 करोड़ किलोमीटर, यह गलत है। नासा के अनुसार शनि की पृथ्वी से दूरी है 120,540 किलोमीटर। शनि ,सूर्य की परिक्रमा करता रहता है। सूर्य से शनि की परिक्रमा करते हुए दूरी 1,514,500,000 किलोमीटर से लेकर 1,352,550,000 किलोमीटर के बीच में रहती है।
    
(शनि के बारे में एक स्केच)
     शनि के बारे में यह मिथ है कि उसकी गति धीमी है,सच यह है कि शनि तेज गति से सूर्य की परिक्रमा करता है,ग्रहों में शनि से ज्यादा तेज गति सिर्फ गुरू की है। ब्रह्माण्ड का शनि  एक चक्कर 10 घंटे 39 मिनट में पूरा करता है। यानी इतने समय का उसका एक दिन होता है। जबकि पृथ्वी को चक्कर पूरा करने में 24 घंटे लगते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि शनि पर बड़े पैमाने पर गैस भंडार हैं। लेकिन उन्हें सतह पर देखना संभव नहीं है। इसके अलावा पानी,अमोनिया,लोहा,मिथाइन आदि के भंडार हैं। शनि पर हाइड्रोजन और हीलियम गैसें भी हैं। 
     वैज्ञानिकों को अभी तक शनि पर किसी भी किस्म के जीवन के संकेत नहीं मिले हैं। शनि पर मौसम में अनेक किस्म का अंतर मिलता है शनि की  सर्वोच्च शिखर पर तापमान माइनस 175 डिग्री सेलसियस तक रहता है। शनि पर पृथ्वी की तुलना में वजन बढ़ जाता है, 100 पॉण्ड वजन बढ़कर 107 पॉण्ड हो जाता है। शनि में कई रिंग या वलय हैं। सात बड़े रिंग हैं। ये वलय शनि से काफी दूर हैं। सात बड़े रिंग के अलावा सैंकड़ों छोटे वलय भी हैं। शनि पर वलय का पता 16वीं सदी में इटली के वैज्ञानिक गैलीलियो ने किया था।
    शनि के प्रभाव के बारे में यदि ज्योतिषी बातें करते हैं तो शनि के  उपग्रहों के प्रभाव के बारे में बातें क्यों नहीं करते ? कभी ज्योतिषियों ने शनि के उपग्रहों का विस्तार से वर्णन क्यों नहीं किया ? शनि की मैगनेटिक धरती हमारी पृथ्वी से 10 गुना ज्यादा शक्तिशाली है। सन् 1973 में अमेरिका ने शनि और गुरू की वैज्ञानिक खोज का काम आरंभ किया था।




विज्ञान से भागे हुए ज्योतिषी

(शनि ग्रह पर खोज करता कासिनी अंतरिक्ष यान जिसने शनि के तथ्य बताए )                       
         हमारे ब्लॉग की एक सुंदर विदुषी और हठी यूजर हैं,वे ज्योतिषी भी हैं और तरह-तरह से ब्लॉगिंग में ज्योतिष का प्रचार करती रहती हैं उनका नाम है संगीता पुरी। उन्होंने कुछ बातें   स्टार न्यूज और दीपक चौरसिया की शनि सेवा’ नामक पोस्ट पर टिप्पणी के रूप में कही हैं। संगीता जी ने ज्योतिष के पक्ष में एक लिंक भेजा है उसमें जो बातें लिखी हैं वे सभी फलादेश की कोटि में आती हैं। यह सब प्राचीन फलित ज्योतिष की किताबों में उपलब्ध है।
 ( क्या शनि का यह नजारा पहले किसी ज्योतिषी की कल्पना में था ? )   
       आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारत के किसी भी संस्कृत विश्वविद्यालय में आधुनिक वेधशाला नहीं है और नहीं आधुनिक अनुसंधान की किसी भी तरह की व्यवस्था है। आप ज्योतिषी हैं यह अच्छी बात है लेकिन किसी भी ज्योतिषी ने अभी तक कोई आधिकारिक रिसर्च ग्रहों पर नहीं की है। पुराने ज्योतिषी ग्रहों के बारे में अनुमान से जानते थे उनके सारे अनुमान गलत साबित हुए हैं। सिर्फ पृथ्वी से विभिन्न ग्रहों की दूरी को ही लें तो पता चल जाएगा कि पुराने ज्योतिषी सही हैं या आधुनिक विज्ञान सही है। आशा है इंटरनेट पर उपलब्ध ग्रहों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी को कृपया पढ़ने की कृपा करेंगी। सिर्फ अंग्रेजी में नाम मात्र लिख दें हजारों पन्नों की जानकारी घर बैठे मुफ्त में मिल जाएगी,आज जितनी जानकारी ग्रहों के बारे में विज्ञान की कृपा सें उपलब्ध है उसकी तुलना में एक प्रतिशत जानकारी भी प्राचीन और आधुनिक ज्योतिषी उपलब्ध नहीं करा पाए हैं।
 (शनि की आधुनिक इमेज)    
      आज विज्ञान से हमें पता चला है कि किस ग्रह पर किस रास्ते से जाएं,जाने में कितना समय लगेगा,कितनी दूरी पर ग्रह स्थित है, जाने-आने में कितना खर्चा आएगा, वैज्ञानिक खोज रहे हैं कि ग्रहों पर जीवन है या नहीं,इस संदर्भ में क्या संभावनाएं हैं, ये बातें हम पहले नहीं जानते थे। विज्ञान यह भी बताता है कि ग्रहों को खोज निकालने का तरीका क्या है,ग्रहों का अनुसंधान क्यों किया जा रहा है। इन सारी चीजों को पारदर्शी ढ़ंग से विज्ञान के जानकारों से कोई भी व्यक्ति सहज ही जान सकता है।  
           
(गैलीलियो के द्वारा निर्मित शनि की इमेज, क्या ज्योतिषी बताएंगे कि वे जिस शनि की इमेज का फलादेश में धंधा करते हैं वह इमेज सबसे पहले किसने बनायी और क्यों बनायी )
भारत में ज्योतिषी ग्रहों के प्रभाव के जितने दावे करते रहते हैं वे सब गलत हैं। सवाल उठता है अंतरिक्ष अनुसंधान के यंत्रों के बिना ग्रहों को कैसे जान पाएंगे ? संगीता जी ने जो भी जानकारी दी है वह फलादेश है, फलादेश विज्ञान नही होता। विज्ञान को दृश्य से वैधता प्राप्त करनी होती है। जो चीज दिखती नहीं है वह प्रामाणिक नहीं है।विज्ञान नहीं है।
     असल में ज्योतिषी लोग आधुनिक रिसर्च का अर्थ ही नहीं समझते। ऐसे में ज्योतिष और विज्ञान के बीच संवाद में व्यापक अंतराल बना हुआ है। ज्योतिषी लोग सैंकड़ों साल पहले रिसर्च करना बंद कर चुके थे। वे वैज्ञानिक सत्य को वराहमिहिर के जमाने में ही अस्वीकार करने की परंपरा बना दी गयी थी।  तब से वैज्ञानिक ढ़ंग से ग्रहों को देखने का काम ज्योतिषी छोड़ चुके हैं। ज्योतिष के अधिकांश विद्वान बुनियादी वैज्ञानिक तथ्यों को भी नहीं मानते। मसलन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है या पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रही है,इस समस्या पर ज्योतिष और विज्ञान दो भिन्न धरातल पर हैं। ज्योतिषी जबाब दें वे किसके साथ हैं विज्ञान के या परंपरागत पोंगापंथ के। ज्योतिषी यह भी बताएं कि ग्रहों का प्रभाव होता है तो यह बात उन्होंने कैसे खोजी ? इस खोज पर कितना खर्चा आया ? पद्धति क्या थी ?  ग्रहों का प्रभाव होता है तो सभी ग्रहों का प्रभाव होता होगा ? ऐसी अवस्था में सिर्फ नौ ग्रहों के प्रभाव की ही चर्चा क्यों ? बाकी ग्रहों को फलादेश से बाहर क्यों रखा गया ?   


शनिवार, 12 जून 2010

तिथि खबर नहीं होती दीपक चौरसिया



(शनि वलय का अंतरिक्ष यान से प्राप्त चित्र )        
   स्टार न्यूज चैनल जिस मीडिया ग्रुप का हिस्सा है वह बहुराष्ट्रीय मीडिया घराना है रूपक मडरॉक का। मडरॉक के घराने का सारी दुनिया में कंजरवेटिव विचारधारा के प्रचार-प्रसार का शानदार रिकार्ड रहा है। इस घराने की मीडिया नीति का लक्ष्य है प्रतिगामी विचारधारा और नव्य-उदार आर्थिक उदारीकरण का प्रचार करना। सारी दुनिया में प्रगतिशील विचारधारा और वैज्ञानिक चिन्तन के विरोध में मडरॉक घराना अग्रिम कतारों में रहा है। सारी दुनिया में मीडिया के प्रतिगामी फ्लो ( बाजारू मनोरंजन और घटिया समाचार के संदर्भ में) को बनाए रखने और समाचार मूल्य को नष्ट करने में मडरॉक घराने के न्यूज कारपोरेशन की केन्द्रीय भूमिका रही है। इस विचारधारा के साथ भारत के स्टार ग्रुप के चैनलों का याराना है।
 (तूफान के बाद शनि का दृश्य)     
    भारत में स्टार न्यूज ग्रुप विचारधारा क्या है यह बात स्टार न्यूज चैनल के शनि अमावास्या जैसे कार्यक्रम के प्राइम टाइम प्रसारण से समझ में आ जाती है। स्टार चैनल के संवाददाताओं और समाचार संपादक का मीडिया संबंधी बोध इतना खराब है कि उसने समाचार और गैर-समाचार का अंतर ही खत्म कर दिया है। समाचार और मूल्यवान समाचार का फ़र्क ही खत्म कर दिया है।
    शनि अमावास्या वाले कार्यक्रम में जो कैप्सन टीवी पर पट्टियों पर दर्शाए गए थे वे स्वयं में इस बात का प्रमाण है कि स्टार वालों की विचारधारा क्या है ?नमूना देखें - ‘चार साल बाद बना है शनि अमावास्या का संयोग’, ‘शनिवार को अमावास्या पड़े तो इसका विशेष महत्व है’, ‘सौरमंडल का सबसे खूबसूरत ग्रह है शनि’, ‘अब 2013 में बनेगा ऐसा संयोग’ आदि। ये कैप्सन इस बात का प्रमाण हैं कि स्टार न्यूज की समाचार मूल्य को लेकर कितनी घटिया समझ है।
 (अंतरिक्ष यान के द्वारा भेजा गया शनि ग्रह का चित्र)   
     तिथि अथवा दिन को कभी खबर नहीं बनाया जा सकता। यदि ऐसा ही करना है तो स्टारन्यूज को अपने को समाचार चैनल की बजाय धार्मिक चैनल में तब्दील कर लेना चाहिए। सवाल यह है कि तिथियां क्या होती हैं ? क्या उन्हें कहीं देख सकते हैं ? जरा स्टार न्यूज वाले बताएं तिथि कहां होती है ? क्या उसे आकाश में देख सकते हैं ? तिथियों को देख नहीं सकते,जिसे देखा नहीं जा सकता वह विज्ञान नहीं हो सकता, तिथि पण्डित के पंचांग में है। भारतीय ज्योतिषशास्त्री इस बेबकूफी पर बहुत पहले पिट चुके हैं।
     
(शनि ग्रह ऐसा है)
     स्टार न्यूज का शनि अमावास्या पर कार्यक्रम इस बात का भी संकेत है कि चैनल की रेटिंग गिर रही है। स्टार की भाषा में उनका शनि खराब चल रहा है। चैनल के लिए दर्शक जुगाड़ करने के लिए मीडिया वाले भविष्यफल भी बताते हैं।
    स्टार न्यूज की शनि चर्चा का लक्ष्य शनि ग्रह के बारे में किसी सूचना और ज्ञान का प्रसार करना  नहीं था बल्कि शनिभक्तों को आकर्षित करना प्रधान लक्ष्य था। दूसरी बात यह कि शनि के बारे में ज्योतिषियों के बयानों को जिस तरह दिखाया गया उससे यह भी आभास मिलता है कि ज्ञान-विज्ञान और पोंगापंथ में कोई अंतर नहीं है। स्टार वाले पोंगापंडितों से जिस तरह बातें कर रहे थे और पोंगापंडित जिस तरह वैज्ञानिकों और तर्कशास्त्रियों पर हमले कर रहे थे और अपमानजनक भाषा बोल रहे थे वह स्टार न्यूज चैनल की आंतरिक संपादकीय अराजकता और पक्षधरता का नमूना है। एंकर दीपक चौरसिया ने पोंगापंडितों को वैज्ञानिकों पर व्यक्तिगत आक्षेप करने दिए,कायदे से उसे पोंगापंडितों को रोकना चाहिए था।
          स्टार न्यूज पर बैठे पोंगापंडितों ने शनि के बारे में बातें करते हुए कुतर्क की सभी हदें तोड़ दीं। महिला ज्योतिषियों का हाल तो बेहद बुरा था। ज्योतिषी जो बोल रहे थे वे यह मानकर बोल रहे थे कि वे तर्कपूर्ण बातें कह रहे हैं,दरअसल सभी पोंगापंडित ज्योतिषी थे और शास्त्र के नाम पर गप्प हांक रहे थे।  वे भूल ही गए कि मुँह से निकला प्रत्येक वाक्य तर्क नहीं होता। चैनल में बोली गयी प्रत्येक बात सच नहीं होती। वे जिस भाषा को बोल रहे थे वह भाषा भी ज्योतिषशास्त्र की भाषा नहीं थी, ऊपर से तुर्रा यह कि प्रत्येक ज्योतिषी तर्क दे रहा था कि हम सरल भाषा में ज्योतिष को बता रहे हैं। वे नहीं जानते कि भारत में शनि पर किसने ,कब और क्या काम किया ?
     ज्योतिष में उसकी विशेष भाषा का भी महत्व है। ज्योतिष के पक्ष में पोंगापंडितों ने सबसे भद्दा तर्क यह दिया कि न्यूटन ने ज्योतिष की सत्ता को माना था। अतःकार्यक्रम में आए वैज्ञानिकों को ज्योतिष का विरोध करने का कोई हक नहीं है। एक ज्योतिषी तो असभ्यता की हदें लांघते हुए कहने लगा क्या आप न्यूटन से बड़े वैज्ञानिक हैं, न्यूटन ने मान लिया है तो तुम भी मान लो।  
    ये पोंगापंडित नहीं जानते कि किस तरह के तर्क भारत के ज्योतिषियों ने फलित ज्योतिषियों और पोंगापंडितों के बारे में दिए हैं। यहां सिर्फ ज्योतिषशास्त्र के प्रसिद्ध सिद्धान्तशास्त्री भास्कराचार्य का मत दे रहा हूँ।भास्कराचार्य ने लिखा- ‘‘नक्षत्रसूचिनं दृष्टवा सचेनंस्नानमाचरेत्। दशदिन कृत पापं हन्त सिद्धान्तवेत्ताः।’’ यानी नक्षत्रसूची ज्योतिषी को देखते ही पाप लगता है और उसे देखते ही तत्काल स्नान करना चाहिए। दूसरी ओर सिद्धांतवेत्ता यानी गणितज्ञ को देखकर 10 दिन तक के किए पाप नष्ट हो जाते हैं।
    हम उम्मीद करते हैं कि स्टार न्यूज वाले पापी पोंगापंडितों से अपने को दूर रखेंगे।







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