मंगलवार, 8 मार्च 2011

तुर्कमेन समाज में महिला दिवस के अनुभव -सुधासिंह



    8 मार्च 2011 को विश्व महिला दिवस सारी दुनिया में मनाया जाता है। मैं यहां तुर्कमेनिस्तान की राजधानी अस्काबाद में विश्वभाषा संस्थान में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हूँ, नया विभाग खुला है, मेरी यह दूसरी विदेश यात्रा है,पांच महिने गुजर चुके हैं यहां पर। महिला दिवस पर इस देश का माहौल देखकर आश्चर्य हो रहा है और उसी अनुभव को मैं साझा करना चाहती हूँ। यह देश पहले समाजवादी सोवियत संघ का हिस्सा था। इन दिनों संप्रभु राष्ट्र है। बेहद सम्पन्न हैं यहां के लोग।
करीब पांच छः रोज पहले मेरी तुर्कमेन दोस्त शमशाद ने वायदा किया है कि वो इस दिन मुझसे मिलने आएगी और मुझे एक सरप्राइज गिफ़्ट( मेरी एक पेंटिंग) देगी। मुझे हठात् 8 मार्च का प्रसंग ध्यान नहीं आया तो उसने याद दिलाया कि मंगलवार को 8 मार्च है। तब तक मुझे उम्मीद नहीं थी कि 8 मार्च का दिन तुर्कमेनिस्तान में इस तरह बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। 6 मार्च से ही राष्ट्रीय चैनलों पर बार-बार बधाई संदेश दिखाया जा रहा है। महिला दिवस मुबारक हो। राष्ट्रपति ने सभी महिलाओं और देशवासियों को इस दिन की बधाई दी है। कल 8 मार्च को राष्ट्रीय अवकाश है।
आज 7 मार्च से ही सारे दिन 'यास्लिक' नाम के राष्ट्रीय चैनल पर महिलाओं के लिए तरह तरह के कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। इसमें सक्रिय सरकारी भागीदारी है। मैंने महिला दिवस पर ऐसा कोई दृश्य अन्य किसी चैनल पर नहीं देखा , इस कारण सुखद आश्चर्य हुआ।
     वैसे भी तुर्कमेनिस्तान उत्सवप्रिय देश है। उत्सवधर्मिता यहां के लोगों की रग़-रग़ में है, थोड़ा शर्माकर सुंदर तरीके से कहते भी हैं कि हमारे देश में उत्सव बहुत हैं। पर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर इस तरह का उत्सवपूर्ण आयोजन देखना बहुत ही प्रीतिकर है। आम तौर पर अन्य अंतर्राष्ट्रीय चैनल बहस और रिपोर्टें दिखाते हैं, महिलाओं की स्थिति का वैश्विक आकलन प्रस्तुत करते हैं उनमें उत्सवधर्मिता और उल्लास कहीं ग़ायब हो जाता है। मैं ये नहीं कह रही कि बहसों और आंकड़ों की जरुरत नहीं। इनकी जरूरत है, कांगो में बलात्कार का युद्ध के अस्त्र के रुप में इस्तेमाल, मध्य पूर्व के देशों में महिलाओं द्वारा हाल के जनांदोलनों में भागीदारी पर और इस तरह के अन्य मसलों पर बहस की जरूरत है।
      लेकिन उत्सव की तरह इस दिन को मनाए जाने का अपना रचनात्मक और प्रतीकात्मक महत्व है। आज के कार्यक्रम की विशेषता है कि पूरा कार्यक्रम पुरुषों द्वारा पेश किया जा रहा है। इनमें किशोर हैं , युवा हैं और वृद्ध भी। वे ही काव्य-पाठ कर रहे हैं, नाच रहे हैं, वाद्य बजा रहे हैं। जबकि अमूमन किसी भी अन्य कार्यक्रमों में महिलाओं की बराबर भागीदारी होती है। वे गाती हैं, वाद्य भी बजाती हैं, नृत्य और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश करती हैं। पर आज हर उम्र की महिला को कार्यक्रम का केवल आनंद लेते देखा जा सकता है। उनके सम्मान में कार्यक्रम पेश किया जा रहा है मेल जेंडर के द्वारा। पुरुष मंडली नाच-गा कर महिला समाज की मेहरबानियों का बखान कर अपना आभार प्रकट कर रही है। स्त्री के अवदानों के प्रति यह एक कृतज्ञ समाज की सही भंगिमा है। बहस और रिपोर्टें भी हैं, चर्चाएं भी,महिलाओं की प्रतिक्रिया भी। सब समानुपातिक।
  समाजवादी समाज के ढ़ांचे के अंदर विकसित स्त्रीवादी सरोकारों को यहां देखा जा सकता है। यहां औरतों को सरकारी स्तर पर कई तरह की सुविधाएं हासिल हैं। कामकाजी महिलाओं के लिए विशेष रूप से प्रावधान है कि पूरी नौकरी के दौरान दो बार वे गर्भधारण के दौरान मिलने वाली सरकारी सहूलियतें ले सकती हैं। जच्चा –बच्चा दोनों के लिए ही नौकरीपेशा और गैर नौकरीपेशा महिलाओं के लिए सरकारी सुविधाएं दी जाती हैं। मां और शिशु को मासिक तौर पर दो वर्षों तक धन दिया जाता है साथ ही बच्चे की पढ़ाई –लिखाई का खर्चा भी मिलता है। पूरी नौकरी के दौरान यदि महिला ने दो बार गर्भ धारण किया है तो वह समय उसकी नौकरी में तरक्की में बाधा नहीं होता। यही नहीं वह चाहे तो गर्भधारण के समय को नौकरी की पूरी अवधि में से घटाकर पूरे पेंशन के साथ रिटायरमेंट ले सकती है।
  यह एक उदार मुस्लिम बहुल समाज है। धर्म को लेकर कहीं से भी कट्टरता का प्रदर्शन दिखाई नहीं देता। खान-पान, पहनावा, आचार-व्यवहार सबमें उदारता दिखाई देती है। मैंने यहां लगभग 6 महीनों में लोगों को जोर-जोर से बोलते या झगड़ा करते नहीं सुना। मेरे पड़ोस में रहनेवाली महिलाओं में भी मैंने कभी कोई कटु प्रसंग नहीं देखा। लड़की पैदा होने पर मां-बाप निश्चिंत होते हैं। लड़की स्वयं लड़का पसंद करती है। लड़की वाले शादी से पहले एक बार भी लड़के का घर देखने नहीं जाते। लड़के के घरवाले ही आते हैं और प्रस्ताव देते हैं।
     वैवाहिक संबंधों के न चल पाने की स्थिति में तलाक यहां स्टीग्मा नहीं है। तलाक की स्थिति में घर पर स्त्री का ही अधिकार होता है, उसे घर नहीं छोड़ना पड़ता। सबसे महत्वपूर्ण यह कि यहां स्त्रियां जितने भी सर्विस सेक्टर हैं उनमें बड़ी संख्या में काम करती हैं। केयरटेकर, बाज़ार में दुकानदारी, विदेशों से सामान आयात करके व्यापार, मिलों-कारखानों और दस्तकारी के कामों विशेषकर कालीन बनाने और यहां के राष्ट्रीय पोशाक – 'कोईनेक' (कशीदाकारी)की कढ़ाई, सिलाई सभी कामों में स्त्रियों की ही भागीदारी है। अपवाद रूप में भी पुरुष दिखाई नहीं देते।
    यहां 'मॉल' हैं उनमें पूरे दुकान की जिम्मेदारी स्त्रियों पर ही है। सेल्सगर्ल से लेकर कैश काउंटर तक वे ही हैं। 'बिज़नेस वूमन' की अवधारणा यहां आम है। पुरुष भवनों के निर्माण कार्य में या ऑफिसों में काम करते हैं। बाज़ार का पूरा अर्थतंत्र स्त्री के हवाले है। इस श्रम के अलावा इन स्त्रियों का घरेलू श्रम भी जुड़ा हुआ है। सदियों से चले आ रहे पितृसत्ताक विचारों के घुन ने इस समाज को भी खाया है। इतनी बड़ी संख्या में हर तरह के कामों में भागीदारी के बावजूद राजनीति और व्यापारिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण जगहों पर महिलाओं की भागीदारी समुचित नहीं है।
भारत में इतनी बड़ी संख्या में बाज़ार की संचालक शक्ति के रूप में स्त्री को देखना मुश्किल है। वे दिखाई देती हैं उपभोक्ता के रूप में। विशेषकर शहरों में तो यही दृश्य है। घर और बाहर के कामों का पितृसत्ता के नियमों के अनुसार सख़्त बंटवारा स्त्री को व्यक्तित्व के विकास के बहुत सारे अवसरों से तो बाधित करता ही है बहुत सी रुढ़ियों की समाप्ति की प्रक्रिया को भी विलंबित करता है।
मैं अभी तक तय नहीं कर पाई हूं कि अपनी उस छात्रा-मित्र द्वारा दी गई शिवरात्रि की बधाई का क्या प्रत्युत्तर दूं , उसी दिन शमशाद ने याद दिलाया था कि क्यों वह 8 मार्च को ही सरप्राइज देना चाहती है। पार्वती की कठिन 12 बरसों की तपस्या के बाद शिव प्रसन्न हुए थे और पार्वती से विवाह किया था। 'शिवरात्रि' के दिन कन्याएं इच्छित वर पाने के लिए और सुहागिनें सात जन्मों तक वर्तमान पति को पाने के लिए व्रत करती हैं।
   भारतीय स्त्रीवाद की विडंबना है कि यहां शिवरात्रि और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस एक ही पैराडाइम में मौजूद हैं। भारत में महिला आंदोलन अभी तक इस दिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित नहीं करा पाया है लेकिन पूर्व समाजवादी समाज के मुस्लिम बहुल देश तुर्मेनिस्तान में राष्ट्रीय अवकाश है।शरीयत की जगह आधुनिक संविधान है,कानून है। यहां औरत के लिए जिस तरह के अधिकार,सामाजिक सम्मान और सामाजिक सुरक्षाएं उपलब्ध हैं ,उन्हें देखकर यही इच्छा होती है कि काश !भारत की औरतों के पास इस तरह के अधिकार होते । (नई रोशनी ब्लॉग से साभार )



अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष- भारतीय औरत के राजनीतिक मर्म की तलाश में


     
                                                                                   जेण्डर सामाजिक निर्मिति है। जेण्डर के प्रयोग को लेकर हिन्दी में समानधर्मा सही शब्द औरत या महिला है। जबकि लिंग के पर्याय के रूप में दोनों लिंग -स्त्री और पुरूष- का बोध होता है। लिंग के रूप में जन्म प्रकृत्या होता है। किन्तु जेण्डर के रूप में औरत का निर्माण किया जाता है। कोई भी स्त्री जन्म से औरत के गुण लेकर पैदा नहीं होती। बल्कि उसके निर्माण में परिवार,शिक्षा, संस्कृति, राजनीति,अर्थशास्त्र आदि की केन्द्रीय भूमिका होती है।
   सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में औरत की पहचान के मानक भी बदले हैं। आज औरत की पहचान का जो मानक प्रचलन में है वह दो सौ साल पहले नहीं था।अत: औरत के बारे में बात करते समय ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का होना प्राथमिक शर्त्त है। ऐतिहासिक नजरिए के बिना औरत को समझना मुश्किल है। औरत सिर्फ सामयिक ही नहीं है। वह सिर्फ अतीत भी नहीं है। उसे काल में बांधना सही नहीं होगा । उसकी पहचान को ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। वह जितनी दिखती है उससे ज्यादा छिपी रहती है। वह प्रक्रिया है यही वजह है सबसे ज्यादा लोचदार है। किसी के साथ और किसी भी स्थिति में सामंजस्य बिठा लेती है। वह कब बदलेगी,उसका नया रूप कैसा होगा,नये रूप में वह समाज के साथ किस रूप में पेश आएगी इत्यादि सवालों के तयशुदा उत्तर हमेशा गलत साबित हुए हैं। 
मसलन् यह सवाल किया जा सकता है कि भारत के स्वाधीनता संग्राम में औरतों ने व्यापक स्तर पर हिस्सा लिया और राजीतिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कुर्बानी भी झेली। किन्तु यही औरत आजादी के बाद घर की चौहद्दी में वापस क्यों लौट गई ? ऐसा क्यों हुआ कि जिस औरत ने सामाजिक-राजनीति जीवन में अपने लिए व्यापक जगह तैयार की थी और राजनीति-सामाजिक मसलों पर दृढ़ रवैय्या अपनाया था , उसका समाज में पूरी तरह राजनीतिक प्रक्रियाओं में रूपान्तरण क्यों नहीं हुआ ? हमारे स्वाधीनता संग्राम ने औरत को राजनीतिक शिरकत का मौका दिया, गांधी और नेहरू जैसे नेताओं के नेतृत्व में आन्दोलन का अवसर दिया, सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में महिला सैन्य दल भी बना, महिला संगठनों के जुझारू दल भी बने किन्तु आजादी मिलने के बाद यह संघर्षशील औरत अचानक गायब हो गई। यह औरत कहां गुम हो गई ? इसके बारे में अभी तक ठीक से कुछ भी पता नहीं है ।
          आजादी के बाद सत्ता को औरत के राजनीतिक-सामाजिक रूप की बजाय उसका घर की चारदीवारी में सक्रिय रूप ही ज्यादा पसंद था। इस औरत के गायब हो जाने का दूसरा  प्रधान कारण था हमारी स्वाधीनता का पुंसवादी चरित्र। औरतें स्वाधीनता संग्राम हो या क्रांतिकारी कतारें हों सब जगहों पर नेतृत्व और फैसलेकुन कमेटियों का हिस्सा थीं। उसे राजनीतिक शिरकत के लिए घर से बाहर निकाला गया था ,उसका ब्रिटिश शासकों के खिलाफ दबाव के औजार की तरह इस्तेमाल किया गया। उसके साम्राज्यवाद विरोधी भावबोध को स्त्री की स्वाधीनताकामी चेतना में रूपान्तरित नहीं किया गया। उसे देश की आजादी के लिए मर मिटने के लिए तैयार किया गया। देश की पहचान के साथ जोड़ा गया। ऐसा करते समय हम यह भूल गए कि देश या राष्ट्र पुंसवाद का प्रतीक होता है। हमारे आजाद भारत के नए नक्शे में औरत में परंपरागत औरत को ही रखा गया। यही वजह है कि जब स्वाधीन भारत का जन्म हुआ तो देश नया था,मर्द नया था,मध्यवर्ग नया था,मजदूरवर्ग नया था, किन्तु औरत का वही पुराना रूप था जिससे निकलकर उसने देश की मुक्ति की कामना की थी ?
         यह सवाल महिला संगठनों से भी पूछा जाना चाहिए कि ऐसा कैसे हुआ कि स्वाधीनता संग्राम की आग में तपकर जो औरत सामने आयी थी वह अचानक गैर-राजनीतिक कैसे बन गयी ? महिला संगठनों ने आजादी के तुरंत बाद औरत को राजनीतिक तौर पर जगाए रखने का काम क्यों नहीं किया ? आजादी के तुरंत बाद कांग्रेसियों ,सोशलिस्टों और कम्युनिस्टों ने स्त्री जागरण की उपेक्षा क्यों की ?
जो औरत 15 अगस्त 1947 तक राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी के लिए महत्वपूर्ण मानी गयी वही औरत आजादी के बाद राजनीति के  परिदृश्य से गायब क्यों हो गई ? क्या सिर्फ राजनीतिक शिरकत से औरत की चेतना बदल जाती है ? हमारे स्वाधीनता-संग्राम ने क्या स्त्री -चेतना को बदला था ? क्या भारत -विभाजन के दौरान हुए साम्प्रदायिक कत्लेआम का औरत की चेतना के अ-राजनीतिकरण में अवदान है ? क्या भारत विभाजन ने अ-राजनीति की राजनीति की वैचारिक जमीन तैयार की थी ?क्या इसके कारण स्त्री -चेतना का साम्प्रदायिकीकरण हुआ था ? इन सवालों का अभी तक संतोषजनक उत्तर नहीं मिला है।
     यह सच है कि साम्प्रदायिक राजनीति का जो सिलसिला आजादी के आन्दोलन के दौरान शुरू हुआ उससे महिलाओं की राजनीतिक चेतना पर भी बुरा असर हुआ और भारत विभाजन में जिस तरह लाखों औरतों को नारकीय यंत्रणाएं झेलनी पड़ीं,कत्लेआम और शोषण का सामना करना पड़ा उसके कारण महिलाचेतना और महिलाओं की राजनीतिक शिरकत को गहरा धक्का लगा। महिलाओं का अ-राजनीतिकरण हुआ।
जिस समय सन् 1980 के बाद महिला आन्दोलन तेजी से आगे बढ़ रहा था। उसी समय बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि आंदोलन के बहाने शुरू हुई साम्प्रदायिक लहर ने महिलाओं को भी प्रभावित किया। पहलीबार महिलाओं के साम्प्रदायिक राजनीतिक संगठन सामने आए, साम्प्रदायिक हिंसाचार में औरतों को सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए साम्प्रदायिक हिन्दू संगठनों ने प्रयास शुरू किए। दंगों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी देखी गई।
 महिलाओं का सन् 1947 के विभाजन ने जो अ-राजनीतिकरण किया उसी का कालान्तर में हिन्दुत्ववादी संगठनों ने जुझारू साम्प्रदायिक विचारधारा के साथ इस्तेमाल किया। यह विडम्ब्ना ही कही जाएगी कि जिस समय औरतें अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही थीं,राजनीतिक स्पेस तैयार करने में लगी थीं, औरतों के व्यापक हितों से जुड़े सवाल उठा रही थीं,अपना जनाधार व्यापक बनाने की कोशिश कर रही थीं। औरतों के लिए राजनीतिक माहौल अनुकूल बन रहा था,ठीक उसी समय औरतों को साम्प्रदायिक विभाजन और साम्प्रदायिक हिंसा का सबसे ज्यादा सामना करना पड़ा। 
    यही वह दौर है जिसमें औरत को अगड़े और पिछड़े के आधार पर, हिन्दू और मुसलमान के आधार पर विभाजित करके पेष किया गया। जेण्डर के रूप में औरत की समग्र पहचान को तोड़ा गया। अब एक ऐसी औरत सामने आयी जिसे दंगाई औरत भी कह सकते हैं। दंगा करती औरत, आग लगाती औरत ,पूरी तरह साम्प्रदायिक औजारों से लैस औरत। इस औरत की छवि भारत में पहले कभी नहीं देखी गई थी।
 औरत की जेण्डर के रूप में पहचान को अस्वीकार करने वाली समस्त धारणाएं अंतत: मर्दवादी विचारधारा की शरण में जाती हैं। इसे मर्दवाद का प्रच्छन्न लक्षण कहना गलत नहीं होगा।औरत के इस विभाजनकारी रूप ने जेण्डर के रूप में महिला की राजनीतिक और सामाजिक पहचान को जबर्दस्त क्षतिग्रस्त किया है। महिला आन्दोलन की राजनीतिक षक्ति को कमजोर किया है। विचारधारा के क्षेत्र में पुंसवाद के खिलाफ संघर्ष को कमजोर किया और सामाजिक कट्टरता को पुख्ता बनाया है।
   औरत की धारणा को लेकर साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों में पुरूष-संदर्भ अभी भी वर्चस्व बनाए हुए है। औरत अभी भी साहित्य में बेटी,बहन,बीबी,बहू ,माँ,दादी,चाची,फूफी, मामी आदि रूपों में ही आ रही है। औरत को हमारे साहित्यकारऔर राजनीतिज्ञ परिवार के रिश्ते के बिना देख नहीं पाते ,पुरुष -संदर्भ के बिना देख नहीं पाते। कहीं-कही औरत की आर्थिक यूनिट के रूप में छवि नजर आती है।
    इस प्रसंग में हिन्दी आलोचना के बारे में सबसे पहली आपत्ति यह है कि उसमें स्त्री का एक अनुशासन (डिसिपिलीन) के रूप अभी तक अध्ययन ही नहीं किया गया। सच यह भी है कि हिन्दी में बहुत कम विषय हैं -कविता और इतिहास को छोड़कर -जिनका अनुशासन के रूप में अध्ययन-अध्यापन किया गया है।
      कायदे से ज्ञान के अनुशासन के रूप में औरत के अध्ययन-अध्यापन पर जोर दिया जाना चाहिए। हम अनुशासन के रूप अध्ययन पर जोर क्यों दे रहे हैं ? इसका प्रधान कारण है कि जब आप किसी विषय का अनुशासन के रूप में अध्ययन करते हैं तो विषय का दायरा परिभाषित करते हैं। तब ही उसका अध्ययन कर पाते हैं। जब उसके लिए विशिष्ट पध्दति चुनते हैं तो विश्लेषण के माध्यम से भाषा और अवधारणात्मक औजारों का निर्माण करते हैं। बिना यह किए आप जेण्डर या औरत को परिभाषित नहीं कर सकते।
 स्त्री के सामाजिक यथार्थ को रूपायित करने के लिए स्त्री-पुरूष की सही इमेज या अवस्था की सटीक समझ परमावश्यक है। औरत की सही समझ के अभाव में समूचा विवेचन अमूर्त्त हो जाता है, प्रभावहीन हो जाता है ,औरत अमूर्त्त या अदृश्य हो जाती है। औरत की अदृश्य स्थिति के कारण विकृत विश्लेषण जन्म लेता है, और जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं वे अप्रामाणिक और अधूरे होते हैं। यह स्थिति आज भी हमारे साहित्य में मौजूद है।
 साहित्य में वर्णित ज्यादातर लेखन स्त्री के प्रति अमूर्त्त समझ को व्यक्त करता है। इसका प्रधान कारण है जेण्डर की सही सैध्दान्तिकी के ज्ञान का अभाव। असल में जेण्डर तय गतिशील अभ्यासों का प्रतिनिधित्व है। स्त्री के जब राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात की जाती है और उसे समस्या के समाधान के रूप में पेश किया जाता है तो उसके राजनीतिक क्षेत्र में कम प्रतिनिधित्व की बात को उठाया जाता है।ऐसी अवस्था में जेण्डर एक वैध राजनीतिक केटेगरी के रूप में उभरकर सामने आती है।यह इस बात का भी संकेत है कि औरतों का सामाजिक प्रतिनिधित्व घट रहा है।समाज में स्त्री का जो स्थान है उसके प्रति सवाल उठ खड़े हुए हैं। औरतों की आर्थिक,सामाजिक और राजनीतिक अवस्था संतोषजनक नहीं है। औरत के चर्चा में आने या बने रहने का अर्थ है कि औरत के मसले अभी सुलझ नहीं पाए हैं। औरत के मसले क्यों उलझते हैं क्योंकि आम लोगों में उसकी वास्तविकता का ज्ञान नहीं होता। औरत के प्रति पूर्वाग्रह काम करते रहते हैं। औरत के प्रति समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों को खत्म करने के लिए औरत की जेण्डर के रूप में पहचान को समग्रता में विश्लेषित किया जाना चाहिए। इस कार्य में अर्थशास्त्र और राजनीति में जेण्डर विमर्श की सही समझ का होना जरूरी है।


                      
                       




सोमवार, 7 मार्च 2011

फेसबुक पर सर्वहारा कवि शील की कविता और सभ्यता


           शील जी हिन्दी की प्रगतिशील काव्यधारा के अग्रणी कतार के लेखक हैं। उनके कर्म,विचार,सृजन और आंदोलन में फांक नहीं है। ऐसा एकीकृत समग्र व्यक्तित्व हिन्दी में विरल घटना है। हिन्दी के अनेक प्रगतिशील लेखकों जैसे नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल,शमशेर ,त्रिलोचन आदि में आजादी के बाद के दौर में अनेक किस्म के विचलन देखे गए। कर्म,विचार और सृजन में फांक भी देखी गयी,लेकिन शील जी इस व्याधि से मुक्त अविचलभाव से मार्क्सवाद,कम्युनिस्ट आंदोलन,प्रगतिशील-जनवादी साहित्य की एकनिष्ठ भाव से सेवा करते रहते रहे।
    शील जी का व्यक्तित्व सामाजिक आग्रहों और गरीबों की मुक्ति के संकल्पों से बना था। उनके व्यक्तित्व की अनेक खूबियों को मुझे करीब से देखने का भी सौभाग्य मिला था। शील जी ने मजदूरों-किसानों और प्रतिशील साहित्य के प्रति कमिटमेंट को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने संकलन ' लावा और फूल' (1967) के समर्पण में लिखा है, "देश की  उन असंख्य बलिदानी माताओं की तरह,माँ तूने भी अपने लाल को देश की स्वतंत्रता के लिए न्यौछाबर कर दिया था। 1930 में में गान्धी बाबा की पुकार पर में जेल गया ।यह अंग्रेज परस्त जमींदार को अच्छा न लगा। लेकिन मां ! तुझे पुत्र विछोह की असीम पीड़ा के साथ गर्व भी था कि तेरा लाल देश की स्वतंत्रता के लिए जेल गया है। यह बात भी,अंगरेज परस्त जमींदार को अच्छी न लगी। मेरे छूटने के चौबीस घंटे पूर्व उसने यह अफ़वाह फैलाकर ( कि तेरा लाल,मन्नू जेल के दंगे में गोली से मार दिया गया) तेरे प्राण ले लिए। मां,तेरी पीड़ा,जमींदार का जुल्म,और मेरी ममता-सब कुछ मेरे देखते-देखते उनकी आँखों से वह निकली। और वे भी तेरी ही तरह सदा के लिए मुझसे दूर हो गए।माँ बता कि तेरे और पिता जी के सिवा अपना यह कृतित्व,किसे समर्पित करूं,यह तो तुम दोनों की आहुति का ही परिणाम है। और तुम्हें ही समर्पित है।"
    शीलजी का अपनी माँ की कुर्बानियों और पीड़ाओं को काव्य संकलन के समर्पण वक्तव्य में इस तरह याद करना अपने आपमें विरल बात है। हिन्दी के लेखकों को माँ की पीड़ा और कुर्बानियों का ध्यान कम आता है,सार्वजनिक तौर पर उसका उल्लेख वे कभी नहीं करते। इस नजरिए से देखें तो 1967 में यह बात जो शीलजी ने लिखी,नयी बात थी और इससे कविमन की पीड़ा,मानवीयता,रिश्तों के प्रति कृतज्ञता,वफादारी आदि का बोध भी व्यक्त होता है।
    हिन्दी की अकादमिक समीक्षा की आयरनी है कि वह जीवन के ज्वलंत सवालों से कन्नी काटती रही है। यह बात शीलजी की उपेक्षा के संदर्भ में भी कही जा सकती है। लेखक के लिए किस तरह की पीड़ा रही है,इसका अंदाजा आज के मीडिया युग में लगाना संभव नहीं है।  अपने काव्य संकलन ' लावा और फूल' के प्रकाशन के लिए लेखक को मुहिम चलानी पड़ा,कोई छापने के लिए तैयार नहीं था।
     उल्लेखनीय है शील जी के प्रथम काव्यसंकलन 'अंगडाई' (1944)के साथ एक प्रकाशक ने बड़ी बुरी की, उसने उस संकलन के कवर पर एक नंगी औरत का फोटो छाप दिया था। इससे भी बुरी बात यह हुई कि इस संकलन को किसी भी प्रगतिशील समीक्षक ने नोटिस ही नहीं लिया। वे उन दिनों पंत की ग्राम्या और अंचल की लाल चूनर को लेकर व्यस्त थे।
   'लावा और फूल'  की भूमिका में शील जी ने एक बड़ी महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान खींचा है। लिखा है, " अखबारों का प्रभाव एक अध्ययनशील विद्यार्थी को प्रभावित कर सकता है,उकसा सकता है किन्तु उसमें कर्म का उपक्रम पैदा नहीं कर सकता। उसकी सबसे बड़ी योग्यता ,उसकी अनुभूति की अपरोक्षता और तीव्रता में होती है।जो केवल पुस्तकीज्ञान से नहीं पैदा हो सकती। रोटी और प्रेम के राग बिना साक्षात के नहीं गाए जाते। जिन्होंने जीविकोपार्जन की मुसीबतों,अपमानों का अनुभव नहीं किया,भोक्तावर्ग में बने रहकर दूर-दूर से अवलोकन मात्र किया है। वे शोषितमात्र पर दया ही कर सकते हैं:-उसकी आवाज में बोल नहीं सकते।"
    शील जी ने सवाल किया है कि "नयी कविता में नए यथार्थ की स्वीकृति है,पर यह नया यथार्थ किस सभ्यता का यथार्थ है ? नयी कविता का कवि किस सभ्यता की सेवा कर रहा है ? नए कवि की नई कविता में किस सभ्यता के चरण पड़ रहे हैं ? क्योंकि सभ्यता,मनुष्य के समाज के सदस्य होने के ज्ञान को कर्म में परणित करती है। सभ्यता परिष्कृत सामाजिक चेतना के लिए उन्मेषपूर्ण अवस्थाएं जन्मती है। वह सभ्यता अधिक समय तक नहीं बदलती जो बदली हुई दुनिया के लिए कोई नयी वस्तु देने में असमर्थ होती है।''
         शील जी ने यह भी लिखा '' पूँजीवादी सभ्यता की प्रजननशक्ति समाप्त हो चुकी है। पूँजीवादी सभ्यता पितृसत्तात्मक सभ्यता है। पूँजीवादी सभ्यता में श्रम और नारी ,दोनों ही अनुपस्थित होकर ईश्वर के अधीन रखे जाते हैं। हमारे देश में तो पितृसत्ता के अभिशापस्वरूप ,कन्या-दान कर दी जाती है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण की सभ्यता, श्रम और नारी के मुक्ति की सभ्यता -समाजवादी सभ्यता है,यह न मातृ सत्तात्मक है,पितृसत्तात्मक।"
यहां शील जी की वे काव्यपंक्तियां प्रस्तुत हैं जो मैंने अपने फेसबुक वॉल पर दी हैं। इन काव्यअंशों में जीवन के यथार्थ को कवि ने समाजवादी नजरिए से रूपायित किया है।   
 शील जी ने 1964 में लिखा था- "समाजवाद की घोषणा और मेरा गाँव ! मुझे हंसी आती है/मैं अनुभव करता हूँ/मेरे देश का कांग्रेसी लोकतंत्र /मेरे गांव की तरह अनाथ है/"

शील की एक कविता है 'तुम्हारा न्याय' उसका अंश देखें- "तुम्हारा न्याय/बेलगाम तंग कसे घोड़े की तरह/ दुलत्ती झा़ड़ रहा है/तुम्हारे सभासदःअपराधों की अपच से मोटे हो गए हैं/ भेडिए बतखों के साथ बलात्कार करते हैं /सामाजिक प्रश्नों के हल तुम्हें विघटन में दिखाई देते हैं/ गॉव केचुए काटते रहे/गलियाँ प्रस्तावों की सुगंध लेती रहें/भूमि प्रबन्धक समिति अंगूठों की स्याही देखते रहे/और उत्पीड़न की देह-तुम्हें फूल फल देती रहे।"

भ्रष्टाचार के खिलाफ 30अगस्त 1965 को शील जी ने एक कविता लिखी थी जो आज भी प्रासंगिक है,लिखा- "मर्ज़ लाइलाज है/दाँत न दिखाओ/सोख्ते की मलाई खाओ ! सन्तति निग्रह रस की मालिश करो !बहादुर बनो !कोई क्या कर सकता है !भ्रष्टाचार जिंदाबाद !सोख्ते की सरकार जिंदाबाद।"

शील की कविता एकजमाने में इप्टा की शान थी और उनकी लिखी रचनाएं मुम्बई के पृथ्वी थियेटर में गूंजती थीं। लिखा- "आंधियां उठ रहीं भूख की आग की/फिर क़हर के फरिश्तों में है गूफ्तगू/ काम देगी न फसलों की जल्वागिरी/हम ख़यालो मनोरथ के हांक दो ! बदचलन मुंसिफ़ों के उठादो चलन !हाँकदो- हाँकदो चौमुखी हाँक दो !"

शील जी ने लिखा- "हमें मिटाने की हलचल है/मन्दिर-मसजिद के भीतर/नागपाश लेकर बैठे हैं/युग के जड़ शोषक ईश्वर/"

शील जी नागार्जुन-केदारनाथ अग्रवाल-त्रिलोचन के समकालीन थे,लिखा- "ये शब्दों के बीज/तुम्हारी गर्भवती आस्था की तह में/फूट पड़ेंगे/अंकुर देंगे/आलोडित होने दो अपने मन की पीड़ा/और सपचने दो जठरानल/संयम के संराधक तुम ! /शिव की साध पचाकर देखो ! / ये शब्दों के बीज तुम्हारे पुत्र बनेंगे/"


शील जी ने लिखा- साथियो ! "अंधराष्ट्रवाद /पूंजीपतियों का रिसाला है/ जो खोखली राष्ट्रीयताओं के लिए/कुर्बानियों की चादर ओढ़े/पिला रहा है तुम्हें अफ़यून के घूंट/"

प्रगतिशील कवि शील ने लिखा- "साथियो ईश्वर और नफ़रत,इन्हीं पूजीपतियों की विरासत है,साथियो पूंजीपतियों का उसूल,घृणा का गुब्बारा है,जो मशीन पै ढलता है।"
प्रगतिशील कवि शील ने लिखा- "साथियो होश में हो ! वक्त आराम का नहीं,कलम की नोंक से अवाम के फफोलों को कुरेदो ?लहू गर्म करो ?दिलों के दर्द में सियासत की हरारत भर दो ?अदब को सरमाया की गर्दिश से निकालो? "

एक कविता अंश देखें - "कागज के पुल से-फार्मूला लादे/योजनाओं के गधे जा रहे हैं/ आप मुस्करा रहे हैं/जैसे आप,नसबंदी से बच जाएंगे/और आपकी पत्नी लूप लगाने से/"

चे ग्वेरा की मौत पर फिदेल कास्त्रो-3-


      स्रोत के मुताबिक 'हमारे पास सबसे अच्छी खबर यह है कि ग्वेरा जीवित हैं और हम इससे सहमत हैं कि वे पूरी तरह से घिर चुके हैं।' वैसे इस स्रोत ने अपनी इस मान्यता के आधार को नहीं बताया है। इसी स्रोत के मुताबिक, सेनाओं द्वारा कम्युनिस्ट गुरिल्लाओं को एक छोटी सी घाटी में दो पहाड़ियों के बीच घेर लिया गया है।वैसे इस जानकारी की पुष्टि नहीं हो पाई है।
इस घाटी के दोनों निकासों को जंगल में युध्द के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित की गई बोलेवियाई सेना द्वारा अवरुध्द कर दिया गया है। इस सेना में अधिकतर सैनिकों को अमरीकी (यू.एस.) सैन्य प्रशिक्षकों द्वारा प्रशिक्षित किया गया है और फौज के कई लोग तो वियतनाम युध्द में भी भागीदारी कर चुके हैं। यहां दर्ज करने लायक बात यह है कि इस घाटी के पार्श्व और आधार दोनों ही बहुत घने हैं। लेकिन ऊंचाई वाले हिस्से किसी भी तरह के आसन्न युध्द के लिए अवरोध से मुक्त हैं।इसी स्रोत के अनुसार, 'सेना का खोजी दस्ता इस सप्ताह की शुरुआत से ही सकारात्मक ढंग से खोजबीन शुरू कर चुका है।'
यह 29 तारीख का डिस्पैच है, जो एक ऐसे कठिन क्षेत्र के बारे में बताता है जहां जंगली घाटीएक किस्म की तंग घाटी, दर्रा है और पहाड़ियों के बीच या ऊंचाई के स्थानों के बीच जहां बिलकुल भी वनस्पति नहीं है। यह एक ऐसी जगह है जहां से निकलने की अनिवार्यता है, वहीं दूसरी ओर इस घाटी से निकलने के सारे रास्ते बंद थे। क्योंकि घेराबंदी में फंसे हुए गुरिल्लाओं को निकलने या उनके किसी भी संचालन या भूस्थिति में बदलाव के लिए जंगलों या वनस्पतियों का होना अनिवार्य होता है।
यह डिस्पैच विशिष्ट भूमिका रखता है, क्योंकि यह एक भूक्षेत्र के बयान के साथ शुरू होता है। आगे प्राप्त हुए सभी डिस्पैचों में इसी भूक्षेत्र का जिक्र हुआ है। लेकिन इस डिस्पैच में जिन परिस्थितियों का जिक्र किया गया है, वह स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि गुरिल्ला बल का नेतृत्व कमांडर अर्नेस्टो चे ग्वेरा कर रहे थे।
एक खबर यह भी है कि गुरिल्लाओं में एक भगोड़ा भी था। एक दूसरे स्रोत से यह डिस्पैच 30 सितंबर को प्राप्त हुआ था। इसके अनुसार :इस तेल क्षेत्र से प्राप्त होने वाली खबरों के मुताबिक कास्त्रोवादी कम्युनिस्ट क्रांतिकारी नेता अर्नेस्टो 'चे' ग्वेरा गंभीर रूप से बीमार हैं और भारी सुरक्षा के बीच अन्य गुरिल्लाओं द्वारा स्टेचर पर ले जाए जा रहे थे।
यह खबर भूतपूर्व बोलेवियाई गुरिल्ला अंतोनियो रोड्रिग्ज फ्लोरोस से प्राप्त हुई है।अंतोनियो रियो ग्रांडा के फौजी शिविर में इस शर्त के बाद आधिकारिक रूप से आत्म समर्पण कर चुके हैं कि समर्पण के बाद उनके जीवन की रक्षा की जाएगी। इन सभी ने बोलेविया की सरकार के खिलाफ हथियार उठाए थे। 25 से 30 सितंबर के बीच एक भगोड़ा सामने आयाऔर शायद संकट एक समान तीव्रता के साथ ही आता है, भगोड़े ने शत्रुओं को सभी जानकारी उपलब्ध कराने का प्रस्ताव किया। स्वाभाविक रूप से इन सूचनाओं में शत्रुओं को रुचि हो सकती थी। बिना किसी नैतिक संकोच के, या बिना किसी संशय के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया होगा। शत्रुओं के साथ भगोड़े के सहयोग का प्रस्ताव तुरंत स्वीकार किया गया होगा क्योंकि एक भगोड़ा अनैतिक क्रांतिकारी या छद्म क्रांतिकारी की तरह ही होता है। वह क्रांति से खेलना चाहता है। यह बिलकुल विवादहीन है कि यदि गुरिल्लाओं के बीच कोई भगोड़ा हो तो यह कोई असामान्य बात नहीं होती। यहां तक कि हमारी ही क्रांति के दौरान भगोड़ों की ढेरों घटनाएं देखने में आईं। यह सामान्य घटना से भिन्न बात नहीं है।
एक ऐसा समय भी था, जब लोग गुरिल्ला संघर्ष में सहभागी होना चाहते थे, और उन लोगों ने गुरिल्ला संघर्ष में भाग भी लिया। वे गुरिल्ला शिविरों में संघर्ष में भागीदारी के लिए भारी संख्या में आए भी। वास्तव में उस समय स्थिति ऐसी थी कि जितने लोगों के पास हथियार थे, उससे भी अधिक लोग गुरिल्ला संघर्ष में भागीदार होना चाहते थे। इन सभी लोगों में जो लोग हमारे साथ शामिल हुए उनमें से कई लोगों ने बाद में बेहतरीन भूमिका निभाई। वे शानदार सिपाही हैं, शानदार क्रांतिकारी हैं। हमारी गुरिल्ला सेना के पास कोई 'भर्ती कार्यालय' या कोई इस तरह की चीज नहीं होती है। हमारी समस्या उन लोगों के प्रति होती है, जो हमारे संघर्ष में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन हमारे पास उनके लिए हथियार नहीं होते हैं। लेकिन हमारी विद्रोही सेना के 95 प्रतिशत से अधिक लड़ाके अपने हथियार अपने साथ ही लाए थे। दूसरों को भी हमारे पास व्यवस्थित तरीके से भेजा था। हमारी सेना आम लोगों से बनी थी, और यही लोग संघर्ष में शामिल हुए।
लेकिन, बेशक जो लोग हमसे प्रभावित होकर हमारे संघर्ष में शामिल हुए थे, उन्हें गुरिल्ला युध्द का न तो कोई पूर्व अनुभव था, न ही इस संघर्ष के साथ जुड़े हुए बलिदानों के प्रति उनकी स्पष्ट राय थी। और जब वे हमारे साथ लंबे समय तक रहे, पहाड़ों पर चढे अौर परेशानियों का सामना किया, तब वे इस संघर्ष के साथ जुड़ी तकलीफों के चलते उससे बड़े ही कायराना अंदाज में अलग हो गए। एक भगोड़ा हमेशा एक देशद्रोही ही होता है। यदि वह शत्रुओं के पास चला जाता है तो वह उन्हें न केवल सभी चीजों के बारे में सूचना देता है, बल्कि गुरिल्लाओं के विषय में भी सारे विवरणों को जाहिर कर देता है।
एक डिस्पैच चे की बीमारी के बारे में बताता है। इसका तात्पर्य यह होना चाहिए कि चे वहां अल्पकालिक रूप से बीमारी से ग्रस्त हो गए थे। प्रकाशित हो चुकी डायरी के एक हिस्से के मुताबिक (फोटोप्रतियों के द्वारा) पहली सितंबर को यह टिप्पणी दर्ज है : 'सितंबर के पतझड़ की बुरी स्थिति के अलावा कुछ दुर्घटनाओं के बाद हम खच्चरों पर सवार होकर जल्द ही नीचे उतरे। डाक्टर अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाया है, लेकिन मैं ठीक हो चुका हूं और अच्छी तरह से चल-फिर सकता हूं और खच्चरों को हांक सकता हूं।' इसके अलावा भी उन्होंने कई अन्य चीजों का उल्लेख किया है।
यह पहली सितंबर की बात है, जिसमें उन्होंने बताया है कि वह किस तरह ठीक हुए और उसके बाद वह अच्छा महसूस कर रहे हैं। अपनी मृत्यु से दो दिन पहले की तारीख में उन्होंने दर्ज किया है कि वह एक स्वस्थ व्यक्ति की भांति बातचीत करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो यह सच नहीं है कि वे उस समय बीमार थे।
लेकिन स्वाभाविक रूप से भगोड़े या भेदिए ने कई अन्य बातों के अलावा उनके बीमार होने से पहले की स्थिति के बारे में ही बताया। इस सबके अलावा शत्रु इस घात में था कि वह (भगोड़ा या भेदिया) क्षेत्र के उस स्थान को बिलकुल ठीक उस स्थान को चिह्नित करे, जहां गुरिल्ला दस्ता मौजूद हो। यह तथ्य ही इस बात का स्पष्टीकरण देता है कि 29 सितंबर को क्या इस क्षेत्र में शत्रुओं की फौजों का बाहुल्य हुआ।
भगोड़े के विषय में सार्वजनिक रूप से सूचना 30 सितंबर को प्रकाशित हुई। संभव यही है कि वह भेदिया तीन-चार दिन पहले से शत्रुओं के पास हो, और उसी समय से फौजों को रवाना करने की कार्रवाई शुरू हो चुकी हो। कोई भी दमनकारी फौज जब किसी किस्म की संभावनाओं का अवसर पाती है, अपनी फौजें ही रवाना करती है; बेशक, अकसर उन लोगों की यह कोशिश निष्फल ही साबित होती है, बिना किसी परिणाम के ही होती है। लेकिन गैर-प्रश्नांकित रूप से इस बार उनके लिए भारी संभावनाओं का अवसर था, क्योंकि वे बिलकुल उस क्षेत्र में पहुंच गए थे जहां गुरिल्ला दस्ते मौजूद थे। इसलिए शत्रुओं ने इस क्षेत्र में भारी संख्या में फौजों को ले जाना शुरू कर दिया था, और उन्होंने यह इस उच्च आशा के साथ किया था कि वे गुरिल्लाओं के विरुध्द भारी रणनीतिक विजय दर्ज करने में कामयाब हो जाएंगे।
9 अक्टूबर को न्यूयार्क टाइम्स में एक विचित्र लेख प्रकाशित हुआ यानी संघर्ष की पूर्व संध्या पर। यह लेख रविवार यानी 8 अक्टूबर के संस्करण में प्रकाशित हुआ यह संघर्ष की सुबह थी। इस लेख का शीर्षक था, 'चे ग्वेरा'स लास्ट स्टैंड?' इसके अनुसार :कामिरी, बोलेवियाब्लीक कुल दे साक जैसे स्थान, जहां इंडस नदी अमेजन की घाटी में गिरती है, वहां से चे ग्वेरा जैसे आदमी के लिए कहीं और जाना बहुत मुश्किल है।
इस धूल भरी घाटी में रोज सुबह सूरज धधकना शुरू होता है, कच्ची मिट्टी और भूरी-काली झाड़ियों को जलाता रहता है। यहां की स्थितियों में दीर्घजीवी पहाड़ी पतंगे और मच्छर, मकड़ियां, डंकदार मक्खियां विद्यमान हैं। यह एक ऐसी घाटी है, जहां हर वक्त मौत का सन्नाटा पसरा रहता है।
यह लेख इस क्षेत्र की भूस्थिति का भी कुछ-कुछ विवरण देता है :गर्मी, धूल-मिट्टी और यहां के कीट-पतंगों के काटने से यहां मानव शरीर की त्वचा की दुर्गति हो जाती है। खतरनाक वनस्पतियां और सूखी और कंटीली झाड़ियां मानव की गुप्त गतिविधियों के लिए आदर्श स्थान हो सकता है। लेकिन नदी, घाटी और हमलों के बीच यह असंभाव्य है।
सैन्य रिपोर्टों के अनुसार क्यूबाई मेजर और उनके साथ के अन्य थके हुए 16 गुरिल्ला साथी इस घाटी में फंस चुके हैं। पिछले दो सप्ताहों से सेना ने अपना घेरा बहुत अधिक कस दिया है। बोलेवियाई सेना का विश्वास है कि मेजर ग्वेरा यहां से जीवित नहीं निकल पाएंगे।
कामिरी के सैन्य अड्डे से 120 किलोमीटर दूर उत्तर-पश्चिम में स्थित इस घाटी में अनेक मायनों में मेजर ग्वेरा और उनके गुरिल्ला साथियों की स्थिति नारकीय हो चुकी है। ध्यान रहे कि कामिरी वह स्थान है, जो सशस्त्र क्रांति का प्रतीक बन चुका है।
इसके आगे भी बहुत कुछ लिखा गया है। दूसरे शब्दों में, फौजी टुकड़ियों के आगे बढ़ने की जानकारी देने वाले 29 सितंबर के डिस्पैच का विवरण इस बात को पुष्ट करता है कि इस सारे मामले की खबर एक भेदिए द्वारा ही पहुंची, यही डिस्पैच 30 सितंबर को समाचारपत्रों में प्रकाशित हुआ, और इसे ही विदेशी प्रेस में प्रातिनिधिक रूप से दोहराया गया। इन सबका गहरा गठबंधन सैन्य अधिकारियों (नेतृत्व) और उन सबसे था, जो घाटी, जंगलों और उन स्थानों से भलीभांति परिचित थे, साथ ही यह भी जानते थे कि घाटी में कहां छिपने के लिए स्थान नहीं है।
भविष्य की सफलता का पूर्वाभास, एक आशा वहां के वातावरण में विद्यमान थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अपेक्षित परिणाम हमेशा वास्तविकता में तब्दील ही होते हैं। किसी भूभाग की जानकारी हुए बिना, घाटी के आकार-प्रकार की जानकारी के बिना, इसकी लंबाई, चौड़ाई की जानकारी के बिना, घटनाक्रमों की पूरी शृंखला के बारे में कुछ भी कहना असंभव ही होता है। जाहिर है कि इन जानकारियों के बिना किसी वास्तविक उद्देश्य के बारे में पूर्ण विश्वास के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यह तो आशाओं के समुद्र में डुबकी लगाने के समान ही होगा। वैसे भी दमनकारी फौजों की ओर से हमेशा ही कहा जाता है कि गुरिल्ला फौजें पूरी तरह से घिर गई हैं।
उदाहरण के लिए, दमनकारी फौजें हमेशा ही कहती हैं कि गुरिल्ला फौजें पूरी तरह से घिर चुकी हैं। लेकिन इस बार सच यही था। हम अपने पीछे जहां समुद्र पा रहे थे, तो आगे मैदान और धान के खेत थे। हमारा मानना है कि हमारी गतिविधियों का क्षेत्र 10 किलोमीटर चौड़ा और लगभग 20 किलोमीटर लंबा था। साथ ही साथ बहुत ही अल्प दूरी से लोग हम पर छापामारी कर रहे थे। 1957 के पूरे साल से लेकर 1958 के मध्यमान तक, उनका प्रत्येक हमला हमारे विरुध्द ही होता था। यहां तक आखिरी हमले में भी भारी पैमाने पर फौजें शामिल थीं और कार्रवाई का क्षेत्र 10 किलोमीटर चौड़ा और 20 किलोमाटर लंबा ही था। लेकिन यह एक ऐसा क्षेत्र था जिसे हम बहुत अच्छी तरह से जानते थे। और उस वक्त हमारे साथ 300 आदमी थे।
लेकिन सामान्य तौर पर कहा जा रहा है कि गुरिल्ला फौजें पूरी तरह से घिरी प्रतीत होती थीं। गुरिल्ला दल को विभिन्न सैन्य फौजों द्वारा घेर लिया गया था। लेकिन रणनीतिक घेराबंदी बहुत खतरनाक होती है। इसमें गुरिल्ला इकाइयों को शत्रु सैनिकों द्वारा घेर लिया जाता है। लेकिन इन भयावह परिस्थितियों में भी कई बार पूर्वोक्त किस्म की घेराबंदी को तोड़ा भी गया है। इसी कारण घाटी की स्थिति, जिसके बारे में वे लोग बातचीत कर रहे हैं, के बारे में कोई नहीं कह सकता या अपनी राय नहीं व्यक्त कर सकता कि गुरिल्ला दल उस क्षेत्र में कितने खतरे में थे।
लेकिन समस्त परिस्थितियां स्पष्ट रूप से इंगित करती हैं क्योंकि बाद में उन्होंने फिर इस क्षेत्र के बारे में बताया है और इस विषय में उन लोगों की दृढ़ निश्चयता में वृध्दिकारक बेतार संदेशों को भी शामिल किया जा सकता है। जाहिर सी बात है कि शत्रुओं ने किसी स्थान पर अपनी सारी शक्ति का संकेद्रण कर लिया था। इसका यह मतलब कतई नहीं हो सकता कि इन परिस्थितियों में संघर्ष का जन्म होना अवश्यंभावी ही था, या गुरिल्लाओं द्वारा समर्पण किया ही जाता। इन सारे विवरण से मात्र उन परिस्थितियों के बारे में पता चलता है, जिसमें वह उस समय थे। साथ ही साथ फौजों के उस क्षेत्र की ओर संचालन का पता चलता है, जो अब युध्दक्षेत्र में तब्दील होने जा रहा था।
इसका मतलब है कि संघर्षयुध्द के लगभग दो सप्ताह पूर्व ही वहां एक किस्म का सुखाभास विद्यमान था और इसी भावना के अंतर्गत फौजों को उस क्षेत्र की ओर भेजा गया। वास्तव में यह क्षेत्र क्या है? हम नहीं जानते हैं। क्या अन्य दुर्गमताएं या प्राकृतिक अवरोध वहां विद्यमान हैं? हम नहीं जानते। क्या वहां वनस्पतियों से ढके हुए समानांतर मैदान हैं, या नहीं हैं या दुर्लंघ्य पहाड़ियां हैं कि नहीं? हम नहीं जानते। लेकिन यह स्पष्ट है कि फौजी टुकड़ियां उस क्षेत्र विशेष में भारी पैमाने पर पहुंचीं। भेदिए या भगोड़े की सूचना के अनुसार शत्रुओं की फौजों ने गुरिल्लाओं को बिलकुल ठीक उस स्थान पर घेरा था, जहां उनकी उपस्थिति थी। पुन: प्राप्त होने वाले डिस्पैचों की ओर आते हैं। ये डिस्पैच बताते हैं कि उस क्षेत्र में संघर्ष की शुरुआत हुई। इस क्षेत्र के बारे में बताया गया कि यह बहुत उबड़-खाबड़ भूभाग है, जहां चलना-फिरना भी बहुत मुश्किल है। घाटी में घने जंगल हैं, गहरे गङ्ढे हैं, गुफाएं हैं और जल-प्रपात हैं। 6 और 7 अक्टूबर को लिखे गए डायरी के पन्नों से भी इस क्षेत्र के बारे में कुछ सूचना प्राप्त होती है। उदाहरणस्वरूप, 6 अक्टूबर को लिखी गई इबारत के अनुसार : 'स्काउटिंग पेट्रोल (खोजी दस्ता) ने नजदीक ही एक घर खोजा है, लेकिन यह भी....' फोटोकापी किए हुए डायरी के ये पृष्ठ पठनीय नहीं हैं। चे का हस्तलेख छोटा और ऐसा होता है जिसे पढ़ना आसान नहीं होता है। फिर फोटो प्रतिलिपि तो बहुत हद तक अस्पष्ट है।
डायरी के अनुसार : '....तंग घाटी बहुत आगे तक प्रसारित है। इसके अंत में पानी है। हम....।' आगे का हिस्सा फिर अस्पष्ट है। '....और अंत में हम सबने खाना पकाया....।' फिर एक पंक्ति गायब है। इसके बाद, 'एक चट्टान के नीचे, जो एक छत की तरह थी....कि मैं....'
इसी के अनुसार : 'दिन की चमकीली रोशनी में तंग स्थानों, खोहों का सहारा लेते हुए इस स्थान को पार किया।' और फिर इसके बाद की कुछ पंक्तियां फिर गायब हैं।
आगे : 'खाना पकाने की तैयारियां करने में ही एक लंबा वक्त लग गया। हमने तय किया कि सुबह होते ही इस तंग स्थान (चट्टान) से चले जाएंगे और इसके बाद आगे के लिए खोजबीन करेंगे। तब....हम फैसला करेंगे कि आगे किस दिशा की ओर हम जाएंगे।'
आगे : 'क्रूज डेल सुर रेडियो ने एक साक्षात्कार में सूचना दी....आदमी.... ओरलांडों बहुत ही छोटा है।' यद्यपि यह बहुत बुध्दिमत्तापूर्वक कहा जा रहा है। इसके अलावा इसमें एक बोलेवियाई का जिक्र है कि उसने स्वयं को वहां की सत्ता के अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। इस (भगोड़े या भेदिए) के बारे में पहले ही कहा जा चुका है। बाद में कहा गया कि उन्होंने इस व्यक्ति को बंदी बताया था। बहुत कुछ है, जो स्पष्ट नहीं है। उस तरह तो बिलकुल ही नहीं जैसी स्थिति अन्य मामलों में है।
आगे : 'चिली के रेडियो पर भी एक खबर प्रसारित हुई....यह कि इस क्षेत्र में 1,800 सैन्य टुकड़ियां विद्यमान हैं।'(क्रमशः)
(अपराजेय योद्धा चे ग्वेरा, फिदेल कास्त्रो,अनुवाद-जितेन्द्र गुप्ता,2011,ग्रंथ शिल्पी,नई दिल्ली से साभार)


रविवार, 6 मार्च 2011

आलोचक हैं आलोचना नदारत


आज आलोचक हैं किंतु आलोचना नदारत है। अध्यक्षता करने वाले उद्धाटन करने वाले विद्वान हैं किंतु चीजों को उद्धाटित करने वाले विचारों का दूर-दूर तक पता नहीं है। कहने के लिए आलोचना के नाम पर टनों लिखा जा रहा है किंतु आलोचकीय विचार और आलोचना पध्दति का अभी तक निर्माण नहीं कर पाए। आलोचना का यह शून्य आखिरकार कब और क्यों पैदा हुआ ?

आलोचना शून्य तब पैदा होता है जब आलोचक ग्रहण करना बंद कर देता है। सामाजिक संरचनाओं पर से उसकी पकड़ छूट जाती है। हिन्दी आलोचक की मुश्किलें यहीं से शुरू होती हैं। उसे मालूम ही नहीं है कि स्वातंत्र्योत्तर समाज का ढांचा किन आधारों पर टिका है। वह सीधे कृति के संदर्भ से शुरू होता है और संदर्भ के जरिए अभीप्सित व्याख्या पेश करता है। यह आलोचना नहीं है बल्कि छात्रोपयोगी व्याख्या है,इसे ही वह अपने आलोचकीय कर्म की इतिश्री मानता है।

साहित्य शिक्षा की मांग और पूर्ति का बहुत गहरा संबंध हिन्दी आलोचना से है। हिन्दी आलोचना का सारा दारोमदार शिक्षा की जरूरतों की पूर्त्ति से जुड़ा है। आलोचना का काम शिक्षा की जरूरतें पूरी करना नहीं है। हिन्दी में रामचन्द्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी,नंददुलारे बाजपेयी, रामविलास शर्मा से लेकर आज तक के नवोदित आलोचकों तक में अधिकांश आलोचना किताबें शिक्षा की मांग- पूर्ति के सिद्धान्त के अनुसार लिखी गयी हैं।आलोचना को हमने गैसपेपर का परिष्कृत रूप दे दिया है। आलोचना की दूसरी मुश्किल यह है कि उसके पास इच्छित समाज, इच्छित अवधारणा ,इच्छित लक्ष्य और इच्छित प्रभाव का बना -बनाया ढांचा उपलब्ध है। आलोचना ने अभी तक आलोचक की इच्छा के दायरे के बाहर जाकर सोचा ही नहीं है। आलोचक का अपनी इच्छा के दायरे में बंद होकर सोचना इस बात का प्रतीक है कि आलोचक कुछ भी नया अथवा मौलिक लिखना नहीं चाहता। तयशुदा के दायरे के बाहर निकलना नहीं चाहता।

आलोचना की तीसरी बुनियादी मुश्किल है कि उसने सार्वजनिक और निजी को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में नए सिरे से कभी परिभाषित ही नहीं किया। सार्वजनिक और निजी परिवेश के सवालों को लेकर उसने कोई बहस नहीं की। आधुनिक आलोचना के नाम पर हमने जितना आत्मसात् किया है उससे कई गुना ज्यादा बहिष्कृत है। आलोचना में बहिष्कार के तत्व का फिनोमिना के तौर पर विकास हुआ है। बहिष्कार का तत्व आधुनिकता का अंश है इसे आधुनिक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। बहिष्कार के आधार पर हमने पहले मार्क्सवाद को आधार बनाया और मार्क्सवाद के आधार पर गैर मार्क्सवादी दृष्टियों का बहिष्कार किया, उनके प्रति घृणा का प्रचार किया और अंत में मार्क्सवाद से भी दामन छुड़ा लिया। प्रगतिवाद में जो मार्क्सवादी थे एक अर्सा बाद उन्होंने आलोचना में मार्क्सवाद को तिलांजलि दे दी।

हमारी आलोचना का मूलाधार अनालोचनात्मक है। इसे व्याख्यानों और कक्षा में शिक्षकों के व्याख्यानों के जरिए प्रचार-प्रसार मिला है। अनालोचनात्मक पद्धति का मूलाधार है भाषण। हिन्दी में भाषण ही आलोचना है और आलोचना ही भाषण है। हिन्दी आलोचक इस अर्थ में आदर्श है कि उसके लेखन और वाचन में अंतर नहीं है। वह जो लिखता है वही बोलता है। बाद में साक्षात्कार को ही आलोचना बना लिया। जबकि भाषणकला, साक्षात्कार और आलोचना में बुनियादी विधागत अंतर है। साहित्य के मूल्यांकन के आधार के तौर पर जब भाषण को विकसित किया गया तो हम यह भूल गए कि इससे साहित्य की अवधारणा और भूमिका भी बदल जाएगी। आलोचना की भूमिका भी बदल जाएगी। अब साहित्य सबके लिए खुला होगा। साहित्य अब व्याख्या के लिए खुला होगा।

लोकतंत्र में साहित्य का दायरा बदलता है,नये विधारूप दाखिल होते हैं। साहित्य अब आनंद और उपभोग का हिस्सा बन जाता है। अब साहित्य स्वनिर्भर है। इसके कारण आलोचना में जिस तरह के 'तनाव' और 'एम्बीगुटी' होती है वह गायब है। अब लेखक की पूर्व पाठीय मंशाएं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। उनके आधार पर ही कृति की वाचिक व्याख्याएं हो रही है। इसके कारण साहित्य में निहित 'तनाव' और 'एम्बीगुटी' का लोप हो गया है।साहित्य के 'तनाव' और 'एम्बीगुटी' की व्याख्याएं ही थीं जिनके आधार पर साहित्य समृद्ध हुआ ,आलोचना समृद्ध हुई । अब साहित्य को 'मंशा के छद्म' के आधार पर विश्लेषित किया जा रहा है। हमने आलोचना के मानकों के आधार पर साहित्यिक कृतियों और कृतिकारों का मूल्यांकन करने की बजाय लेखक की मंशा के आधार पर मूल्यांकन पर ध्यान ज्यादा दिया है।

आजादी के बाद साहित्य और दर्शन के बीच संवाद,संपर्क और विनिमय बंद हो गया है। अब साहित्य का राजनीतिक आंदोलनों से आदान प्रदान,संपर्क और संवाद ज्यादा होता है। राजनीतिक तात्कालिकता और साहित्यिक विमर्शों के बीच गहरा अन्तस्संबंध है। शीतयुद्ध,नेहरूयुग,अंग्रेजी हटाओ-हिन्दी लाओ,आपात्काल, लोकतंत्र ,स्त्री आंदोलन, दलित आंदोलन के साथ अन्तस्संबंधों को रेखांकित करते हुए आलोचना विकसित हुई है। इस क्रम में साहित्य की आलोचना कम और राजनीतिक संवृत्तियों और आंदोलनों की व्याख्या ज्यादा हुई है। इसके कारण आलोचना का अवमूल्यन हुआ है।

इसी क्रम में आलोचकों ने साहित्य और आंदोलन के अन्तस्संबंध का सरलीकृत फार्मूला बना लिया है। तात्कालिक राजनीतिक कार्यभारों को साहित्य के कार्यभार बना दिया है। तात्कालिक राजनीतिक कार्यभारों के आधार पर ही साहित्य की व्याख्या और पुनर्व्याख्या हो रही है। साहित्य में 'खोज' और 'मूल्यांकन' के काम की जगह 'प्रयोजनमूलक साहित्य' 'प्रयोजनमूलक हिन्दी' और 'प्रयोजनमूलक आलोचना' का पठन-पाठन और लेखन हो रहा है।

अब साहित्य की शिक्षा का लक्ष्य है प्रतियोगिता परीक्षाओं में पास होने में मदद करना। फैलोशिप प्राप्त करने में मदद करना। साहित्य के अध्ययन -अध्यापन का लक्ष्य आलोचनात्मक विवेक अथवा आलोचनात्मक मूल्यांकन का नजरिया पैदा करना नहीं है। फलत: हमारे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हो जाते हैं,स्कॉलरशिप पा जाते हैं, नौकरी पा जाते हैं किंतु साहित्यिक विचारों और अवधारणाओं से अनभिज्ञ होते हैं।साहित्य की आलोचनात्मक जांच-पड़ताल तकरीबन बंद है। फलत: पाठ के प्रासंगिक अर्थ की व्याख्या का लोप हो गया है। अब विद्यार्थी को रेडीमेड उत्तर और व्याख्याओं को पढ़ाने पर ज्यादा जोर है। रेडीमेड उत्तर इस युग का साहित्यिक अधिनायकवाद है। इसने साहित्य के विकास और आलोचनात्मक प्रसार को बाधित किया है। इसने पाठ के अर्थ को सीमित किया है। पाठ के साथ जुड़े सामयिक राजनीतिक एटीट्यूट और अर्थभेदों के अध्ययन और मूल्यांकन को पढ़ने-पढ़ाने की पध्दति का लोप हुआ है। अब अच्छा शिक्षक वही है जो पाठ के स्थिर अर्थ को पढ़ा दे। इसने साहित्य की व्याख्या में आने वाले भेदों को खत्म कर दिया है।

आधुनिक आलोचक भगवान के तंत्र और तर्कशास्त्र से मुक्त है। मध्यकाल में किसी भी चीज के घटित होने के लिए भगवान को जिम्मेदार ठहराया गया, किंतु आधुनिककाल में भगवान की जगह 'कारण' को बिठा दिया गया। अब प्रत्येक घटना,साहित्यरूप,आंदोलन , व्यक्ति,अस्मिता आदि के 'कारण' की खोज पर जोर दिया गया। मध्यकाल को जानने अथवा समझने का अर्थ था मध्यकाल के कारणों को जानना। 'कारण' समाज में था किंतु समाज को खोले बिना हमने कारण के प्रयोग की कला विकसित कर ली। यह मूलत: संस्कृत काव्यशास्त्र की कला है। मध्यकालीन कला है। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि साहित्य और आलोचना में अध्यात्मवाद की जड़ें बरकरार रहीं। साहित्यकारों के जीवन में ईश्वर की सत्ता बनी रही। लेखकों में अध्यात्मवाद का विकास हुआ। साहित्यकार का धर्मभीरू भाव बना रहा। स्वातंत्र्योत्तर आधुनिक आलोचना ने लेखक के धर्मभीरू और अध्यात्मवादी तंत्र को कभी निशाना नहीं बनाया।

आज जब हम आलोचना और साहित्य के बारे में बातें कर रहे हैं तो मूल परिदृश्य बदल चुका है। विगत साठ सालों में अनेक बदलाव आए हैं। नए बदलाव ये हैं,पहला, आज व्यापक स्तर पर हिन्दी साहित्य का पठन-पाठन हो रहा है। पठन-पाठन में शिक्षा संस्थानों की बड़ी भूमिका है। संस्थानों के कारण ही हिन्दी की अस्मिता,पहचान और अनुशासन के रूप में भूमिका तय हुई है। आज हिन्दी को लेकर कोई भी विवाद उठता है तो सिर्फ साहित्यिक अथवा प्रोफेशनल विवाद नहीं होता। बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विवाद बन जाता है। इस तरह के विवाद सार्वजनिक तौर पर ध्यान आकर्षित करते हैं।दूसरा, हिन्दी साहित्य में कालविभाजन का अंत हो गया है। अब साहित्य में सामाजिक,लिंगीय और एथनिक आधारों के आधारों पर वर्गीकरण किए जा रहे हैं। अब किसी प्रवृत्ति विशेष का वर्चस्व नहीं रहा। तीसरा ,साहित्य और साहित्यकार अब बाजार और सत्ता के मूल्यांकन के आधार पर पहचाना जाता है। इसका साहित्य विमर्शों पर भी असर पड़ा है। फलत: आत्मगत मूल्यांकन ज्यादा हुआ है अकादमिक मूल्यांकन कम हुआ है। जो लेखक बाजार और सत्ता के गलियारों में सफल है वही अकादमिक जगत में भी सफल है।चौथा , पेशेवर नजरिए से साहित्य का मूल्यांकन कम हुआ है। साहित्य सैद्धान्तिकी के वैविध्यपूर्ण प्रयोगों की तरफ ध्यान ही नहीं दे पाए हैं। फलतःपेशेवर आलोचना का अभाव अभी भी बना हुआ है । हमारे यहां पेशेवर लेखक हैं किंतु पेशेवर आलोचक नहीं हैं। ऐसी आलोचना नहीं है जिसमें अकादमिक अनुशासन हो।

हिन्दी साहित्यालोचना में मीडिया में व्यक्त नए मूल्यों और मान्यताओं के प्रति संदेह,हिकारत और अस्वीकार का भाव बार-बार व्यक्त हुआ है। इसका आदर्श नमूना है परिवार के विखंडन खासकर संयुक्त परिवार के टूटने पर असंतोष का इजहार। एकल परिवार को अधिकांश आलोचकों के द्वारा सकारात्मक नजरिए से न देख पाना। सार्वजनिक और निजी जीवन में 'तर्क' की बजाय 'अतर्क' के प्रति समर्पण और महिमामंडन। आजादी के बाद की आलोचना की केन्द्रीय कमजोरी है कल्याणकारी राज्य की सही समझ का अभाव। सार्वजनिक और निजी के रूपान्तरण की प्रक्रियाओं का अज्ञान। सच यह है कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की सांस्कृतिक भूमिका के बारे में हमने कभी विचार नहीं किया गया। उलटे कल्याणकारी राज्य का महिमामंडन किया है अथवा खारिज किया है।

'प्रशंसा' और 'खारिज करना' ये दोनों ही अतिवादी नजरिए की देन हैं। इनका सही समझ के साथ कोई संबंध नहीं है। कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य का अर्थ सब्सीडी, राहत उपायों अथवा सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों का निर्माण करना ही नहीं है। अपितु कल्याणकारी राज्य आंतरिक गुलामी भी पैदा करता है। कल्याणकारी राज्य ने दो बड़े क्षेत्रों के चित्रण पर जोर दिया पहला-परिवार,इसमें भी मध्यवर्गीय परिवार पर जोर रहा है, चित्रण का दूसरा क्षेत्र है राजसत्ता और बाजार। स्वातंत्र्योत्तर अधिकांश साहित्य इन दो क्षेत्रों का ही चित्रण करता है।

कल्याणकारी राज्य साहित्य को 'सैलीब्रिटी', प्रदर्शन, नजारे, तमाशे,बहस आदि की केटेगरी में पहुँचा देता है, कृति और साहित्यकार को सैलीबरेटी बना देता है। अब साहित्य और साहित्यकार के प्रदर्शन और सार्वजनिक वक्तव्य का महत्व होता है किंतु उसका कोई असर नहीं होता।लेखक के बयान अथवा कृति को साहित्येतिहास का हिस्सा माना जाता है। लेकिन उसका सामाजिक -राजनीतिक तौर पर गंभीर असर नहीं होता, लेखक की जनप्रियता बढ़ जाती है। किंतु सामाजिक संरचनाओं पर उसका प्रभाव नहीं होता। साहित्य और लेखक अप्रभावी घटक बनकर रह जाता है। लिखे का सामाजिक रूपान्तरण नहीं हो पाता। इस प्रक्रिया में कल्याणकारी राज्य आलोचक को बंधुआ बना लेता है। आप लिखे पर बहस कर सकते हैं किंतु भौतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में उसे रूपान्तरित नहीं कर सकते। अब साहित्य और साहित्यकार दिखाऊ माल बनकर रह जाते हैं। अब साहित्यालोचना उपयोगिता के नजरिए से लिखी जाती है,आलोचकगण सामयिक मंचीय जरूरतों के लिहाज से बयान देते हैं। यह एक तरह का साहित्यिक प्रमोशन है। साहित्य प्रमोशन और तद्जनित आलोचना का मासकल्चर के प्रसार के साथ गहरा संबंध है। मासकल्चर का प्रसार जितना होगा साहित्य में प्रायोजित आलोचना का उतना ही प्रचार होगा। प्रायोजित आलोचना मासकल्चर की संतान है।







शनिवार, 5 मार्च 2011

यादों के साये - एलिस फ़ैज़


यह बात लगभग नामुमकिन है कि किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में औपचारिक आदर-भाव के साथ बात की जाये जो चौबीस साल तक रगे-जां की तरह साथ रहा हैएक ऐसा व्यक्ति जो मेरा पति है।
फ़ैज़ पर लिखते समय जाती बातें और साथ झेले हुए अनुभव विचित्र आकर्षण की तरह दामने-दिल को खींचते हैं। लेकिन जब यह चुनने का प्रश्न उठे कि क्या लिखूं तो वही बातें चुननी चाहिए, जो दूसरों के जीवन पर अपने प्रभाव की मुहर लगा सकें, दूसरों के दिलों को यूं छू लें कि उनका स्पर्श मुस्कान और मुक्त हंसी को जन्म दे सके,... यही नहीं, बल्कि जो बातें आंसुओं के सीमांचल तक पहुंचा दें।
मैं विगत दिनों की ओर देखती हूं... मेरी निगाहें अनिवार्यत: बंदीगृह के दरवाजे से होकर विगत तक पहुंचती हैं। जेल के ये साल हमारे सम्मिलित जीवन में एक अवरोधाक अंतराल की तरह नज़र आते हैं। मगर इन बरसों ने हम दोनों को वह कुछ दिया है जो किसी तरह भी हम हासिल नहीं कर सकते थे; चंद साल, जिनमें घुटनियों चलती हुई एक बच्ची छोटी-सी लड़की बन गयी; जिनमें एक लड़की धाीरे-धाीरे नौजवान महिला बन गयी; जिसमें जीवन के एक अचानक मोड़ की तरह 'किसी' के सर के बालों पर सफ़ेदी छाने लगी, और किसी चेहरे पर झुर्रियां आहिस्ता-आहिस्ता अपना जाल बुनती रहीं। जेल के दरवाज़े अवरोधस्वरूप हमारे बीच में थे; लेकिन उन दरवाज़ों में दाख़िल होते हुए, उनसे निकलते हुए जंज़ीरों की झनकार और तालों में कुंजियों के घूमने की आवाज़ के साथ जंज़ीरों-बेड़ियों से बंधे ये दिन अपने पीछे-पीछे हर्ष और आनंद से भरे-पूरे क्षण लेकर आये : अविश्वसनीय रूप से मानो आंचल में फूलों का उपहार लिये, ये क्षण। ... मैं उन दिनों के ग़म बल्कि ग़मों की बात नहीं करूंगी। क्योंकि मौत (और ग़म) ने अपनी इच्छाएं हम दोनों को सौंपी हैं।... मैं तो ख़ुशी के क्षणों की याद ताज़ा करना चाहती हूं, ताकि सूरज की रौशनी से ये बीते हुए क्षण जगमगा उठें... हालांकि मैं जानती हूं कि साये भी उतने ही प्यारे होते हैं।
जब मार्च की एक सुब्ह को फ़ैज़ ने मुझे और सोते हुए बच्चों को ख़ुदा हाफ़िज़ कहा तो मेरे सामने सबसे पहला और संगीन मस्अला यह था कि चार सौ रुपये मासिक की आमदनी से घर को कैसे चलाया जायेगा। न चाहते हुए भी उदास दिल से हमने शफ़ीउल्ला के अलावा दूसरे पुराने नौकरों को अलग कर दिया; शफ़ीउल्ला, जो अब भी हमारे साथ हैं। सहज-स्वभाव, अपनापे की मूर्ति, फ़ैज़ की सौतेली बहन हमारे साथ रहने के लिए आ गयी, ताकि वह बदले हुए हालात में ज़िंदगी बसर करने में मेरी मदद कर सके।


पहली चोट हमारे बच्चों पर पड़ी। क्वीन मेरी कॉलेज से उनका नाम कटवाकर केन्याज़ मिशन स्कूल में दाख़िल कराना पड़ा। मुझे तो इस बात का अंदाज़ा बाद में हुआ कि यह फैसला हमारी बच्चियों के लिए कितना लाभकर सिध्द हुआ। मुनीज़ा अक्सर मुझे बुरा-भला कहती : 'जब अब्बा यहां थे तो मेरे पास एक आया थी। स्कूल में झूले थे, चकरघिन्नी थी, तरह-तरह के खेल थे...!' अपनी नयी परिस्थिति में उसे फ़र्श पर बैठना पड़ता था। लेकिन प्रार्थना-पध्दति के नये रूपों ने उसमें एक अजीब-सा बौध्दिक मानसिक उत्साह पैदा कर दिया था...मेरी ननद की आपत्तिायों के बावजूद वह रात को सोने से पहले अपने घुटनों पर झुककर, सज्दे के लिए आधाी झुकी-सी भाव-मुद्रा में, 'आस्मानी बाप' (परमेश्वर) की स्तुति बिगड़ी हुई और किंचित हास्यास्पद-सी उर्दू में करती। एक रात जब वह अपने स्रष्टा से विनती करने में लीन थी और हम उसे सुलाने के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे, उसने कहा'अौर आस्मानी बाप..तुम जो हैदराबाद जेल में हो, जल्दी से वापस आ जाओ!' जब हमने अपनी घुटी हुई हंसी पर काबू पा लिया और मुनीज़ा की शेष प्रार्थना सुन ली, तो उसे बिस्तर में लिटा दिया। फिर उसे (अर्ध्दनिद्रा की दशा में) यह कहते हुए सुना : 'बाजी...बहुत जल्द सब कुछ ठीक हो जायेगा!'
जेल में मुलाक़ात की इजाज़त मुद्दतों की प्रतीक्षा के बाद मिलती है, और हर मुलाक़ात की याद (अगली मुलाक़ात तक) हम सीने में लगाये रहते। अगली मुलाक़ात तक हर पिछली मुलाक़ात की एक-एक निगाह, एक-एक शब्द, अंग-परिचालन की एक-एक गति को हृदय और मस्तिष्क में परम निधि के समान सुरक्षित रखते। ये मुलाक़ातें दो-तीन महीने में एक बार होतीं। ... हर मुलाक़ात के लिए हमें सिंधा मरुभूमि के विस्तारों को पार करना पड़ता। ये यात्राएं थका देने वाली थीं। और फिर उस थकन पर ख़र्चों का बोझ। जेलर हर मुलाक़ात की निगरानी करता। ख़ास तौर पर मेरी मुलाक़ात की निगरानी; क्योंकि मुझे 'संभावित' जानकारियों का माधयम समझा जाता था। हम मुलाक़ात के उन क्षणों को हलकी-फुलकी घटनाओं और मित्रों के संदेशों से मधुरतम बनाते; ताकि उनका बोझ सुखानुभूति के तले दब जाये।
मुझे अच्छी तरह याद है कि एक मुलाक़ात के मौक़े पर जब मैं एक कहानी सुना रही थी, हमारा जेलर उस कहानी की दिलचस्पियों में यों गुम हो गया कि जब संतरी और जेलर की डयूटी का वक्त पूरा हो गया, तो उसने दूसरे जेलर से कहा : 'भाई, थोड़ी देर ठहर जाओ। मैं इस कहानी का अंजाम तो सुन लूं!'
मित्रों ने मुझसे अक्सर पूछा कि भला किसी ग़ैर की मौजूदगी में बातें कैसे होती होंगी! दो दिलों की मुलाक़ात के दरमियान किसी तीसरे की मौजूदगी! हर बात सुनता हुआ आदमी! सच पूछिए तो हमें अक्सर किसी और की मौजूदगी का एहसास ही कब होता था! हां, कभी-कभी 'दरमियान का पर्दा' अपनी मौजूदगी से मुलाक़ात को तंग कर देता था, और जैसे, शुरू-शुरू में जेलर साहब मेरे और फ़ैज़ के दरमियान बैठने पर इसरार फ़र्माते थे।
फ़ैज़ की गिरफ्तारी और उनके अवैध एकांत कारावास (मैं अवैधा इसलिए कह रही हूं कि एक नियत अवधि से अधिक किसी व्यक्ति को एकांत कारावास की यातना में बांधा रखना अवैधा है) के तीन महीने बाद मैं अपनी दोनों बच्चियों के साथ उनसे मिलने लायलपुर जेल गयी। हमें सुपरिन्टेंडेंट के कमरे में पहुंचा दिया गया। उसने मेरा नाम पूछा। मैंने बता दिया। फिर उसने हम तीनों को देखा। मुझे अब यह महसूस होता है कि शायद उस क्षण हम बहुत अकेले, मायूस, चिंताकुल और बुझे-बुझे नज़र आ रहे थे,
मानो हमारे चेहरे हमारी मानसिक भावस्थिति के आईने बन गये हों। सुपरिन्टेंडेंट ने मुझसे पूछा'आपकी यही दो बच्चियां हैं?' मैंने उसे बताया कि 'यही बच्चियां हमारी पूंजी हैं हमारी ज़िंदगी का हासिलज़रब ।' उसने झिझकते हुए सवाल किया'क़ोई लड़का नहीं है?' मैंने नकार में गर्दन हिलायी।... उसने एक आह भरी...एक लंबी आह! फिर मेरी तरफ़ देखा और कहा'क़ैसे अफ़सोस की बात है! कैसी अफ़सोसनाक बात!...' उसके लहजे से मुझे यह एहसास हुआ जैसे अब किसी बेटे की मां बनना मेरे मुक़द्दर में नहीं, जैसे...मेरा सुहाग लुट चुका हो!
और जब फ़ैज़ कमरे में दाख़िल हुए तो दोनों बच्चियां दौड़ती हुई उनकी गोद में समा गयीं। मुनीज़ा ने जैसे बुड़बुड़ाते हुए कहा'अब्बू! 'वो' कहते थे कि आपके हाथ और पैर काट डाले जायेंगे!' 'वो' कौन थे, यह मुझे कभी नहीं मालूम हो सका। लेकिन उस क्षण जब हमारी (मेरी और फ़ैज़ की) निगाहें एक-दूसरे से मिलीं तो हमें मालूम हुआ कि बेयक़ीनी (भविष्य के प्रति निराशा) के अनुभव और भय के बीच हम ही अकेले नहीं गुज़र रहे थे।
हैदराबाद तक हमारे सफ़र का मतलब थाअधिाक मुलाक़ातें। उन मौक़ों पर हम (स्वर्गीय) सुहरवर्दी के साथ ठहरते, जो मुलज़िम की क़ानूनी पैरवी कर रहे थे। सलीमा और मुनीज़ा सुहरवर्दी साहब से जैसे बेसाख्ता प्यार करने लगीं, और उनसे निकट आती गयीं। सुहरवर्दी मरहूम बच्चियों के लिए नृत्य-संगीत की धुन पर 'वाल्ट्ज़' करतेग़ोल घेरे में नृत्य। एक दिन सलीमा ने अपने सर को झटकते हुए कहा'आज मैं नहीं नाचूंगी।' लेकिन मुनीज़ा फ़ौरन उछल कर खड़ी हो गयी। सुहरावर्दी साहब ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, और पुरानी दुनिया के शिष्टाचार का मूर्त नमूना बनकर, जैसे नृत्य की फ़र्माइश करते हुए किंचित झुके। मुनीज़ा ने एक युवा महिला की तरह झुककर उस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। सुहरावर्दी साहब का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा और वह दोनों कमरे में एक आहिस्ता और मध्दम-से फ़्रांसीसी अंदाज़ के शाहाना नृत्य में तन्मय हो गये। बाद में सुहरवर्दी साहब ने गाड़ी में सिंधु नदी तक चलने का प्रस्ताव पेश किया। और फिर दरिया की मौजों पर कश्ती चलाते हुए उन्होंने हमें एक पंजाबी लोकगीत सुनाया, जो लड़कियों को पहले से याद था। यह सब कुछ कितना आनंदप्रद था! लेकिन जब हम यह सोचते कि यह कुशाग्रबुध्दि और प्रतिभाशाली व्यक्ति कल सुब्ह न्याय की प्राप्ति के लिए जेल की चारदीवारी के अंदर अपना संघर्ष शुरू कर देगा, तो हर बात अर्थहीन और अप्रासंगिक मालूम होने लगती।
'दरबारे-वतन में जब इक दिन...'
यह फ़ैज़ की अत्यधिक प्रिय और लोकप्रिय क़व्वालियों में से है। मुझे हैदराबाद की एक ईद याद है जब अधिकतर बंदियों के परिवार एक ही स्थान पर इकट्ठा हो गये थे। शोख़ रंगों के रंगारंग और भड़कीले कपड़े पहने हुए इतने बच्चे वहां जमा थे जिन्हें देखने वाला यह भी भूल जाता कि बिना किसी अपवाद के उन सबके बाप ऐसे अभियोगों में पकड़े गये थे जिनके आधार पर सरकारी वकील मृत्युदंड तक की मांग कर सकता था।
ईद की उस पार्टी में यह क़व्वाली जिस जोश, चाव और तेज़ धुन में गायी गयी, उसकी कल्पना भी एक मुश्किल काम है।... और जब क़व्वाली ख़त्म हुई तो उस वक्त तक तमाम बच्चे, बीवियां और माएं सभी इस क़व्वाली में शरीक हो चुकी थीं। सबके होंठों पर यही बोल थे :
'दरबारे-वतन में जब इक दिन सब जानेवाले जायेंगे'
हम सबने निहायत पुर-तक़ल्लुफ़ दावत का प्रबंध किया। और जब हम 'घर' यानी डाकबंगले वापस पहुंचे तो बच्चियों ने कहा'ऐसा खाना तो हमने बहुत दिनों से नहीं खाया था! है ना, अम्मी?'
खाने की बात पर मुझे एक दिलचस्प वाक़िआ याद आया। यह उन दिनों का वाक़िआ है जब फ़ैज़ को सज़ा दी जा चुकी थी, और वह अपनी कैद की मीआद मंटगोमरी जेल में पूरी कर रहे थे। मुनीज़ा और सलीमा ने अपने अब्बू को ख़त में लिखा 'हम आ रहे हैं। आप दोपहर के खाने के लिए कोई अच्छी चीज़ ज़रूर पकाइयेगा!' हमें एक साथ दोपहर का खाना खाने की इजाज़त दे दी गयी थी। जब हम लोग मंटगोमरी जेल पहुंचे तो नाइब सुपरिन्टेन्डेन्ट लोधी साहब ने मुनीज़ा से कहा 'तुम्हारे अब्बू ने यक़ीनन तुम्हारे लिए कोई ख़ास चीज़ पकायी होगी।'
'आपको कैसे मालूम हुआ?' मुनीज़ा ने पूछा।
'मैंने तुम्हारे ख़त में पढ़ा था।' लोधी साहब ने जवाब दिया।
जेल के अधिकारीगण निश्चय ही चिट्ठी-पत्री की जांच करते थे। मुनीज़ा उठकर खड़ी हो गयी और बोली'तो क्या तुम मेरे ख़त पढ़ते हो?'
'हां।' लोधी साहब बोले।
'उफ़! बदतमीज़ कहीं के!'
मैं नहीं कह सकती कि यह वाक्य सुनकर लोधी साहब पर क्या बीती। लेकिन मुझे यह अच्छी तरह याद है कि उनके चेहरे पर उस वक्त क़ैसे भाव छा गये थे। चेहरे का रंग उड़ गया था। बेचारे लोधी साहब!
जब 1959 के शुरू महीनों में मार्शल ला के अंतर्गत फ़ैज़ फिर जेल के मेहमान बने तो लाहौर जेल से वह लाहौर क़िले में भेज दिये गये। मैंने उनसे मुलाक़ात के लिए प्रार्थना-पत्र दिया। सी.आई.डी. के अधिकारियों ने जानबूझकर झूठ से काम लिया। उन्होंने इस बात से अपनी अनभिज्ञता प्रकट की कि फ़ैज़ लाहौर जेल से क़िले में ले आये गये हैं। चुनांचे (इस जानबूझकर बोले गये झूठ की वजह से) मैं लाहौर जेल गयी और वहां पता चला कि फ़ैज़ तो वहां से जा चुके हैं। और जब मैंने मुलाक़ात के लिए दोबारा प्रार्थना-पत्र दिया तो मैं गुस्से के मारे सचमुच उबल पड़ी थी। आख़िरकार मैं अपनी बूढ़ी सास के साथ लाहौर क़िले पहुंची। फ़ैज़ को उनकी कोठरी से बुलाया गया। उन्हें देखते ही मुझे अंदाज़ा हुआ कि या तो उन्हें शेव करने की इजाज़त नहीं दी गयी या उन्होंने ख़ुद ही दाढ़ी बनाने का कष्ट नहीं उठाया। उनके चेहरे से पता चलता था कि उनके पिछले चौबीस घंटे ख़ुशगवार हर्गिज़ न थे।
मैंने पूछा'तुमने नाश्ता किया है?'
फ़ैज़ ने मुस्कराते हुए जवाब दिया 'हां।'
'क्या?' यह था मेरा दूसरा सवाल।
'ओ..! एक बन, एक प्याली चाय!' फ़ैज़ ने जवाब दिया।
'बन्' का शब्द सुनते ही मैं जैसे बारूद बन गयी। जैसे किसी ने बंदूक की लबलबी पर हाथ रख दिया हो। मेरे स्वभाव में यह परिवर्तन क्योंकर हुआ? इसका जवाब मुझे भी कभी न मिल सका। लेकिन शायद उस वक्त 'बन्' एक अर्थपूर्ण चिन्ह बन गया था। एक संकेत उन तमाम अन्यायों, दुख-दर्द,अपमान, धोखा-फ़रेब और झूठ का था, जिनका मैं गत कई महीने से शिकार थी।
मैं क्रोध से उत्तेजित होकर जेलर की तरफ़ पलटी और चीख़ उठी : 'तुमने मेरे शौहर को बन् दिया!... सिर्फ़ बन्!' जेलर का मुंह खुला। मगर मैंने उसे एक शब्द भी कहने का मौक़ा न दिया। मैं फिर बरस पड़ी : 'तुम क्या जानो! उन्होंने अपनी ज़िदंगी में कभी बन् नहीं खाया। तुमने बन् ही तो कहा था? बन्! बन्!'
बेचारा ग़रीब आदमी कुछ न बोला। लेकिन अपने आवेशपूर्ण भाषण के बाद मैंने एक अजीब-सी शांति अनुभव की। ऐसा संतोष जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता। उस क्रोधावेश से भरे समय के एक घंटे बाद जब मैं घर गयी तो मैंने अंडों, मक्खन, डबल रोटी से एक टोकरी भरी और जेलर के नाम एक पुर्ज़ा लिखकर भेज दिया कि 'नाश्ता इस क़िस्म की चीज़ को कहा जाता है।'
बाद में 'बन्' के वाक़िए पर हम दोनों बेतहाश हंसा करते थे, ऐसी हंसी जो ख़त्म होने को ही न आती थी। क्योंकि, लाहौर के क़िले की-सी काल-कोठरी में कैद आदमी के लिए 'बन्' का महत्व ही क्या था!... लेकिन शायद उस समय उस 'बन्' का महत्व उस लंबे और थका देनेवाले एकाकीवास और खोखलेपन से जुड़ गया था जो भविष्य के पर्दे में छुपा हुआ था।
मेरी सास ने मुझे बाद में बताया कि मेरे पुरजोश भाषण को सुनकर वह यह समझी थीं कि फ़ैज़ को शायद क़िले में यातना दी गयी थी जिस पर मैं बिगड़ रही थी।
फ़ैज़ से (विभिन्न जेलों में) मिलने के लिए हमें अक्सर रेलगाड़ी में सफ़र करना पड़ता था। हम लोग तीसरे या दरमियाने दर्जे में सफ़र करते थे। इसलिए बच्चियों को साथ के यात्रियों से बात भी ज़रा ज़ियादा ही करनी पड़ती थी। (ऊंचे क्लासों के मुसाफ़िर-तौबा! कसे रा बा-कसे कारे न बाशद!1) सलीमा से जब कोई पूछता कि उसके माता-पिता कौन हैं और क्या करते हैं, तो वह झिझक जाती थी। एक ऐसे मौक़े पर मैंने उसे यह कहते सुना (उसका चेहरा सुर्ख़ हो गया था-क्योंकि उसे सफ़ेद झूठ से नफ़रत थी)'अब्बू हैदराबाद में काम करते हैं!' मुनीज़ा उसकी तरफ़ मुड़ी और गुस्से में उसके हाथ पर हाथ मारती हुई बोली-'चल! झूठी कहीं की! वह जेल में हैं!'
कुछ दिन हुए मुझे एक कापी मिली, जिसमें जेल से फ़ैज़ की वापसी के बाद तक के वाक़िआत हैं। इतने दिनों की ग़ैरहाज़िरी के बाद हमें एक बार फिर फ़ैज़ को अपनी घरेलू ज़िंदगी का हिस्सा बनाना था हमारी घरेलू ज़िंदगी, जो पितृसत्तात्मक व्यवस्था के स्थान पर एक विशुध्द और सुदृढ़ मातृसत्तात्मक व्यवस्था बन गयी थी! हम इस कापी को 'एकता-योजना' (वन यूनिट प्लैन) कहते थे और हममें से हरेक का नाम पाकिस्तान के किसी भूतपूर्व प्रांत के नाम पर था। इस 'एकता' में एक भानजा भी शामिल था। हमारा काम और ज़िम्मेदारी यह थी कि पुरानी और नयी आदतों में और घर के नये सदस्यों के साथ आपसी मतभेदों का फ़ैसला करें घरेलू ज़िदंगी को बेहतर और सुखद बनाने के लिए।
हम हर सप्ताह एक मीटिंग करते थे। शिकायतें पेश होती थीं, और उनके हल ढूंढे जाते थे।
अब मैं इस कापी पर नज़र डालती हूं तो ऐसे वाक्य और याद दिहानियां नज़र आती हैं :
'मैं कुछ सहेलियों को चाय पर बुलाना चाहती हूं। क्या इसकी गुंजाइश निकल सकती है?'
'हमें घर पर सालगिरह (बर्षगांठ) की पार्टी करनी चाहिए।'
'अब्बू को बालरूम डांसिंग सीखने की मश्क़ ज़रूर करनी चाहिए।'
'नसीर को अपनी अल्मारी के ख़ाने ख़ुद साफ़ करने चाहिए।'
'अब्बू को एक दिन में तीस से ज़ियादा सिगरेट नहीं फूंकने चाहिए। अगर वह नहीं मानेंगे तो मैं यह शिकायत कापी पर पांच मर्तबा लिखूंगी।'
'घर पर जब कोई दावत हो तो बड़ों के साथ बच्चों को भी बुलाया जाये।'
कभी-कभी 'सीमाप्रांत' की तरह मुनीज़ा आंदोलनकर्त्ता बन जाती और शोर मचाती। उसकी ज़िंदगी में यह नया अनुशासन शांति के साथ नहीं आया। फ़ैज़ 'सिंधा' थे, क्योंकि सलीमा कहती थी 'अब्बू तो सिंधा से ही तअल्लुक़ रखते हैं।' और मैं 'बलूचिस्तान' थी, शायद इसलिए कि कभी-कभी मैं दूसरों के लिए असुविधाा का कारण बन जाती। हमारे आर्थिक साधान सीमित थे, और मांगें बढ़ती जा रही थीं। और हमें बहुत-सी अच्छी चीज़ों की सीमा बांधानी पड़ती थी(अासान उर्दू में 'राशनबंदी') और यह सीमाबंदी उस वक्त तक आवश्यक थी जब तक फ़ैज़ जेल से लौटकर दोबारा काम शुरू न कर देते। लेकिन जल्द ही हमारा लोकतंत्रा सफल हो गया। और कुछ ही अर्से बाद हमारा घर ऐसे ढंग पर चल रहा था जैसे घर का सरपरस्त इस घर से बाहर कभी गया ही न हो।
उर्दू से अनुवाद : शमशेर बहादुर सिंह
(नयापथ के फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ विशेषांक से साभार,लेखिका फ़ैज़ की पत्नी हैं)







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