बुधवार, 11 अप्रैल 2012

सावधान इंटरनेट पर सीआईए आपकी जासूसी कर रहा है


   कल तक इंटरनेट पर आनंद और स्‍वाधीनता के दि‍न थे। अब खतरा सामने आ गया है। अमेरि‍की गुप्‍तचर संस्‍था सीआईए ने अपने पैर इंटरनेट पर रख दि‍ए हैं। सीआईए की नजरदारी का काफी गंभीर अर्थ है। अब सीआईए के 'ई जासूस' आपके ब्‍लॉग पढ़ना चाहते हैं,ट्वि‍टर और फेसबुक में आप क्‍या कर रहे हैं उसे देखना चाहते हैं। यहां तक कि‍ वे यह भी जानना चाहते हैं कि‍ इंटरनेट से आप कौन सी कि‍ताब 'अमाजॉन' से खरीद रहे हैं ,कौन सी कि‍ताब आप इंटरनेट पर पढ़ रहे हैं। इस सबका हि‍साब सीआईए तैयार कर रहा है। अमेरि‍का की एक नि‍वेश कंपनी ' इन -क्‍यू- टेल' ने अपनी पूंजी का बड़ा हि‍स्‍सा इस क्षेत्र में नि‍वेश करने का फैसला लि‍या है। यह फर्म सीआईए की सहयोगी कंपनी है। इस कंपनी ने दृश्‍य तकनीकी संसार में पैसा लगाने का फैसला कि‍या है। यह काम वह अनेक साफटवेयर कंपनि‍यों में पैसा नि‍वेश करके करना चाहती है। इसके बहाने वह पूरे इंटरनेट पर नजरदारी करेगी।
     अमेरि‍का में गुप्‍तचर सेवाओं में एक बड़ा आन्‍दोलन चल रहा है जि‍सके तहत नेट की सूचनाओं को जानने,एकत्रि‍त करने और फि‍र उसे सीआईए,एफबीआई आदि‍ के काम में लगाने के लि‍ए हजारों लोग लगे हैं। अब आपकी इंटरनेट पर लि‍खी प्रत्‍येक चीज उनके नि‍शाने पर है। 
    इस समय इंटरनेट पर मीडि‍या के वि‍भि‍न्‍न माध्‍यमों के जरि‍ए सूचनाओं,कार्यक्रमों आदि‍ के संचार की बाढ़ आयी हुई है। एक अनुमान के अनुसार वेब 2.0 साइट पर जाने वाले लोगों की तादाद प्रति‍दि‍न पांच लाख है। इसी तरह तकरीबन एक मि‍लि‍यन से ज्‍यादा लोग प्रति‍दि‍न ब्‍लॉग,बातचीत,ई व्‍यापार, फ्लि‍कर,यू ट्यूब,आदि‍ का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। सीआईए के गुप्‍तचर अपने 'ई' जासूसों के जरि‍ए यह भी वर्गीकरण कर रहे हैं कि‍ कौन कि‍तना प्रभावशाली संप्रेषण कर रहा है। प्रभावशाली,कम प्रभावशाली और सामान्‍य संप्रेषण के नाम से तीन वर्ग बनाए गए हैं। वे यह भी देख रहे हैं कि‍ यूजर कि‍स तरह की प्रति‍क्रि‍याएं व्‍यक्‍त कर रहा है। यूजर कौन सी पोस्‍ट को फार्वर्ड कर रहा है। नेट लेखक के साथ  यूजर कि‍स तरह का संवाद कर रहा है। जि‍न मसलों पर सोशल नेटवर्क या ब्‍लाक पर चर्चाएं हो रही हैं उनका वि‍श्‍व राजनीति‍ पर क्‍या असर होगा। अगर असर गंभीर होने की संभावनाएं हैं तो सीआईए जासूस चेतावनी देंगे। ये बातें 'इन-क्‍यू टेल' के प्रवक्‍ता डोनाल्‍ड ति‍घे ने कही हैं।  इस कार्य के लि‍ए खास कि‍स्‍म का सॉफ्टवेयर इस्‍तेमाल कि‍या गया है जि‍सके जरि‍ए आपकी सूचनाएं एकत्रि‍त की जा रही हैं। यह सॉफ्टवेयर बताता है कि‍ कि‍सकी पोस्‍ट पॉजि‍टि‍व है, कि‍सकी नेगेटि‍व है। वि‍भि‍न्‍न संचार उपकरण बनाने वाली कंपनि‍यां और संचार बहुराष्‍ट्रीय कंपनि‍यां इस सॉफटवेयर का इस्‍तेमाल कर रही हैं। 'इन-क्‍यू-टेल' कंपनी अपनी इस योजना के आधार पर एक पायलट सर्वे करने जा रही है और यह पायलट सर्वे यदि‍ सफल रहता है तो इसके बड़े ही दूरगामी परि‍णाम होंगे। यह सीधे व्‍यक्‍ति‍ के मौलि‍क अधि‍कारों के साथ मानवाधि‍कारों का हनन है। 'आई-क्‍यू-टेल' कंपनी ने इस काम में अभी 90 लोगों को लगाया हे और आरंभि‍क तौर पर 20 मि‍लि‍यन डालर का नि‍वेश कि‍या है, लेकि‍न यह नि‍वेश बढ़ भी सकता है। इस मामले में वि‍देशी भाषाओं पर भी नजरदारी रहेगी। अभी 9 वि‍देशी भाषाएं इस प्रयोग के लि‍ए चुनी गयी हैं। यह सारा काम 'वि‍जि‍वि‍ल टेक्‍नोलॉजी' कंपनी के जरि‍ए कराया जा रहा है। उसने ही इसका सॉफ्टवेयर बनाया है। यह कंपनी 2008 से इस क्षेत्र में प्रवेश पाने की कोशि‍श कर रही थी और अंत में उसे सफलता मि‍ल ही गयी। यह कंपनी अमरीकी गुप्‍तचर संस्‍था की सहयोगी कंपनी के रूप में काम कर रही हे और इसने वि‍भि‍न्‍न भाषाओं के वि‍शेषज्ञ और सैन्‍य वि‍शेषज्ञ इंजीनि‍यर जुगाड़ कि‍ए हैं। इनका काम है वि‍भि‍न्‍न भाषाओं की नेट संचार सामग्री की जांच-पड़ताल करना। इस समय अरबी,फ्रेंच, उर्दू, फारसी और रूसी पर नजरदारी चल रही है। इस कंपनी ने अपनी 'सूचना व्‍यवस्‍था सुरक्षा इंजीनि‍यरों' की एक वि‍शालकाय फौज तैयार की है इसमें सूचना तकनीक के कुशल लोगों को शामि‍ल कि‍या गया है। इसमें वे लोग भी शामि‍ल कि‍ए गए हैं जो पॉलि‍ग्राफ सुरक्षा में कुशल माने जाते हैं।
    सीआईए परेशान है सोशल नेटवर्किंग साइट की बढ़ती जनप्रि‍यता से। वे लगातार छान फटक रहे हैं कि‍ कौन सी साइट जनप्रि‍य है और उस पर तुरंत अपने 'ई' जासूस लगा देते हैं। ये 'ई' जासूस लगातार बेचैन आत्‍मा की तरह एक साइट से दूसरे साइट की ओर भागते रहते हैं। अमेरि‍का के जासूस परेशान हैं कि‍ नेट के 70 प्रति‍शत यूजर गैर अमेरि‍की हैं। ये अमेरि‍का के बाहर रहते हैं। इनका जाल दुनि‍या के 180 देशों में फैला हुआ है। तकरीबन 200 गैर अंग्रेजी भाषी ब्‍लागर-ट्वि‍टर समूह हैं, ये लोग रीयल टाइम में तूफान मचाए हुए हैं। इन्‍हें सीआईए नजरअंदाज नहीं करना चाहता। उनका मानना है कि‍ यह रीयल टाइम सूचना सुनामी है। हम उन्‍हें अबोध कहकर नजरअंदाज नहीं कर सकते।





                     
    

मंगलवार, 13 मार्च 2012

दलितसाहित्य का नया पैराडाइम और नये सवाल


  ( साहित्य का इतिहासदर्शन विषय पर कोलकाता स्थित प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में "दलित साहित्य का इतिहास दर्शन" विषय पर दिए गए व्याख्यान का एक अंश।यह अंश वागर्थ पत्रिका ने  जनवरी 2012 के अंक में प्रकाशित किया है)         
             दलित साहित्य पर विचार करते समय हमें दलित विमर्श के रूढ़िबद्ध दायरों को तोड़ने की जरूरत है। जाति के दायरे में चलने वाला विमर्श अनेक किस्म की समस्याओं को पैदा करता है। जातिप्रथा के दायरे के बाहर रखकर यदि दलित लेखक सोचता है तो मुक्तलेखन और नई खोजों की ओर जा सकता है। जातिप्रथा से जोड़कर देखता है तो घूम-फिरकर पुराने जातिदंश और उसकी सर्जना में ऊर्जा खपाएगा और इससे दलित साहित्य में रूढ़िबद्धता का खतरा पैदा हो सकता है।
   सवाल उठता है दलित लेखक किस चीज को आधार बनाकर लिखता है। वे जातिप्रथा से जब जोड़कर लिखते हैं तो जाति की विचारधारा के दायरे में अपनी चेतना को बांध लेते हैं लेकिन ज्योंही जीवन के आख्यान को आगे बढ़ाते हैं तो जाति के बाहर चले जाते हैं। मसलन् एक अनपढ़ दलित का शिक्षित बनना स्वयं में रूपान्तरण है। गांव से शहर आना,नौकरी मिलते ही मध्यवर्ग में दाखिल होना,सरकारी पद पर आसीन होना रूपान्तरण है। कायदे से आधुनिक रूपान्तरण की प्रक्रियाओं को मूल्यांकन के केन्द्र में लाना चाहिए। इसमें दलित अपने अतीत की यात्रा कर सकता है और यह भी संभव है कि वह अपने मौजूदा जाति संकटों से भी फौरी तौर पर मुक्त हो जाए।
     जातिप्रथा को आधार बनाकर लिखी गई रचनाएं अंततः जाति प्रथा के शॉर्टकट की तलाश करती हैं और अंत में स्टीरियोटाइप समाधान की शरण में चली जाती हैं।कायदे से दलित लेखन को आत्माभिव्यंजना और अस्मिता की अभिव्यक्ति के लिए जातिप्रथा से भिन्न रास्ते की तलाश करनी चाहिए। जातिप्रथा के दायरे में ऱखकर देखने के कारण भेदभाव, ऊँच-नीच और जातिभेद बने रहते हैं। इनके दायरे के बाहर का सामाजिक संसार सामने नहीं आ पाता।
     इस तरह के सोच के आधार पर लिखने में एक और दिक्कत है कि लेखक के निशाने पर वर्तमान नहीं अतीत होता है। दलित साहित्य लेखक के वर्तमान या सामयिक परिवेश से जुड़े ,सामयिक परिवेश की जटिलताओं का उदघाटन करे और सामयिक परिवेश की लोकतांत्रिक संरचनाओं और पूंजीवादी एथिक्स किस तरह उसके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं ,यह उसका कंसर्न बने तब नए सवालों पर उसका ध्यान जाएगा। आज दलित की पहचान दलित के रूप में न करके नागरिक के रूप में की जानी चाहिए। विमर्श का आधार नागरिक की अस्मिता को बनाया जाना चाहिए। नागरिक की पहचान संविधान प्रदत्त आधुनिक पहचान है। इसके आधार पर ही हम नागरिकचेतना और नागरिक समाज बना सकते हैं।
     हिन्दी में अनेक दलित लेखक हैं जिनकी आत्मकथाएं आ चुकी हैं। दलित आत्मकथाओं की संरचनाएं जातिप्रथा से जुडी हैं लेकिन जातिप्रथा को पुष्ट करना इनका लक्ष्य नहीं है, बल्कि इनसे लेखक के निजी जीवन के वृतान्तों के द्वारा सामाजिकचेतना और सामाजिक ध्रुवीकरण का उदघाटन हुआ है।
   दलित आत्मकथाओं का लक्ष्य है दलितपीड़ा के बहाने सामाजिक प्रतिवाद की चेतना पैदा करना। दलित लेखक जातिचेतना पैदा करने के लिए नहीं लिखते बल्कि प्रतिवादी चेतना पैदा करने के लिए लिखते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में दलित आत्मकथा मूलतः प्रतिवादी आख्यान का नया विधा रूप है। यह परंपरागत आख्यान से बुनियादी तौर पर भिन्न है। परंपरागत आख्यान का बुनियादी लक्ष्य था आनंद। नए दलित आख्यान का लक्ष्य है बेचैनी और असहमति। दलित आख्यान मूलत प्रतिवादी आख्यान है और इस तरह के आख्यान को वे पाठक हजम नहीं कर सकते जो मनोरंजन या समय काटने के लिए कहानी-उपन्यास पढ़ते हैं। परंपरागत आख्यान निजी मन को सम्बोधित है वहीं दलित आख्यान निजी मन को नहीं समाज को सम्बोधित है। सामाजिक विवाद और बहसों को जन्म देता है। मानवाधिकारों और नागरिक के अधिकारों की ओर ध्यान खींचता है।
    दलित आत्मकथाओं के आगमन के बाद गांवों में फैले जातिभेद की ओर आम लोगों का ध्यान गया है। दलित अस्मिता के बहुस्तरीय रूपों का उदघाटन हुआ है। आमतौर पर दलित आलोचक दलित के आत्म और दलित के सामुदायिक इन दो किस्म की अस्मिताओं को खोजते हैं और इन दो को ही आधार बनाकर समीक्षाएं भी लिखी जा रही हैं। मुश्किल यह है कि दलित में इन दोनों अस्मिताओं के अलावा और भी कई अस्मिताएं हैं।
    मसलन ओमप्रकाश बाल्मीकि की दलित और दलित समुदाय की अस्मिता के अलावा जेण्डर की अस्मिता है, पिता,भाई,पुरूष की अस्मिता है। भाषायी अस्मिता है ,पेशेवर अस्मिता है। एक ही आत्मकथा में एकाधिक अस्मिताएं गुथी होती हैं और ये परिवर्तनीय हैं। आरंभ हुआ था दलित से और अंत में रूपान्तरण हुआ है दलित लेखक की अस्मिता में। कहने का अर्थ यह है कि दलितलेखक की अस्मिता परिवर्तनीय है ,स्थिर या जड़ नहीं है। अस्मिताओं में मात्र दलित अस्मिता को देखना और अन्य अस्मिताओं की अनदेखी करने से साहित्यिक असंतुलन पैदा होता है।
   आत्मकथा का आरंभ जरूर दलित अस्मिता और दलित समुदाय से होता है लेकिन इसे लिखते समय लेखक का संदर्भ क्या है ? अस्मिता हमेशा संदर्भ से परिभाषित होती है। संदर्भ का वर्तमान से संबंध होता है। ओमप्रकाश बाल्मीकि की आत्मकथा जब लिखी गयी तो उसका संदर्भ किससे तय होगा ? अतीत के संदर्भ से या वर्तमान के संदर्भ से ? अस्मिता का सामाजिक नियम वर्तमान से जुड़ा है अतीत से नहीं।
   दलित समीक्षकों की मुश्किल यह है कि वे दलित आत्मकथा के सामाजिक रूपान्तरण के पहलुओं पर कम ध्यान दे रहे हैं। अतीत के शोषणकारी रूपों के चित्रण पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। सवाल उठता है क्या दलित साहित्य की सामाजिक रूपान्तरणकारी भूमिका है? दलित साहित्य की सामाजिक रूपान्तरणकारी भूमिका है तो फिर प्रतिवाद की प्रक्रिया के साथ सामाजिक रूपान्तरण पर ध्यान क्यों नहीं जाता ?
     समाज में संस्थानों की जातिबंधन में बांधे रखने और जातिबंधनों से मुक्त करने की द्विस्तरीय भूमिका होती है। उसी तरह पावर स्ट्रगल में भी सामाजिक शक्ति संतुलन बदल सकता है। शहर में जाति संतुलन और गांव में जाति संतुलन एक जैसा नहीं होता। शहर में रहकर जातिभेद ढ़ीले पड़ते हैं। शहरीकरण से जातिप्रथा की पुरानी दीवारें गिरती हैं। ऐसी स्थिति में लेखक का शहर में रहकर आत्मकथा के जातिबंधन और जाति उत्पीड़न की ओर जाना और फिर वहीं जाकर थम जाना एक निर्मित साहित्य संरचना और एक खास किस्म के रीतिवादी रूझान की ओर ध्यान खींचता है। अनेक आत्मकथाओं में दलित की स्थिति पर जोर ज्यादा है दलित के रूपान्तरण की प्रक्रिया के उदघाटन पर जोर कम है।
    वस्तुतः दलित आत्मकथाओं को समीक्षकों ने सामयिक दौर में एक दलित की सामाजिक स्थितियों के राजनीतिक बयान के रूप में विश्लेषित किया है। इस तरह के लेखन ने दलित साहित्य को प्रतिष्ठित करने और स्वीकृति दिलाने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। साहित्य विमर्श के सवालों को बदला है।
    दलित आत्मकथाओं के उभार का गहरा संबंध दलित राजनीतिक उभार के साथ है। ये दोनों अपने तरीके से दलित को प्रधान एजेण्डा बनाते हैं। उसके साथ हो रहे भेदभाव, अन्याय,अपमान और पीड़ा को अभिव्यक्ति देते हैं।
   दलित लेखक का निजी मूलतः सामाजिक और राजनीतिक होता है। दलित लेखक का आख्यान निज से आरंभ जरूर होता है लेकिन निजी के दायरे में रहता नहीं है।वह हमेशा सामाजिक-राजनीतिक दायरे में विचरण करता है।  उसमें निजता का वैसा कोई तत्व नहीं होता जो आमतौर पर सवर्ण आत्मकथाओं में होता है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो वह व्यक्ति के बहाने समुदाय के प्रतिवाद का साहित्य है। यह साहित्य में व्यक्ति की प्रतिष्ठा की बजाय समुदाय की प्रतिष्ठा का द्योतक है।
    समुदाय के आने के साथ मध्ययुगीनता की वापसी का भी खतरा है। समुदाय के बहाने जाति-वर्ण के रूप अपने साथ मध्ययुगीनता को वापस ला सकते हैं। आधुनिक समाज में आधुनिक किस्म के समुदाय हों जैसे राजनीतिक दल, विचारधारात्मक गुट,क्लब,सभा-सोसायटी आदि। नए सामुदायिक मोर्चे ही सामाजिक रूपान्तरण को सामने लाते हैं। दलित लेखकों की आत्मकथाओं में इन आधुनिक समुदायों के दर्शन भी होते हैं। इस अर्थ में ये लेखक समुदाय के साथ जुड़ी मध्ययुगीनता के दायरे का अतिक्रमण कर  जाते हैं।  
       आधुनिककाल के आगमन के साथ साहित्य में ईश्वर की जगह मनुष्य आया,कालांतर में क्रमशः राष्ट्र,राष्ट्रीयता ,वर्ग  और लिंग आया और अब दलित साहित्य के साथ समुदाय की प्रतिष्ठा हुई है। अब व्यक्ति पर नहीं समुदाय और लिंग के सवालों पर बहसें हो रही हैं।  हम यह मानकर चल रहे थे कि समुदाय चला गया और साहित्य में व्यक्ति और उसकी निजता का दौर आ गया लेकिन दलित साहित्य के साथ समुदाय की वापसी हुई है। साहित्य और समुदाय के नए अन्तस्संबंधों पर हमने अभी विचार नहीं किया है। अभी तक साहित्य और समाज के अन्तस्संबंधों पर विचार किया है। लेकिन नई परिस्थितियां समुदाय और साहित्य के अन्तस्संबंधों पर टिकी हैं। अब हमें साहित्य और समाज के अन्तस्संबंध पर नहीं समुदाय और साहित्य के अन्तस्संबंध पर विचार करना चाहिए।
      मध्यकाल में धर्म और साहित्य,भारतेन्दु युग में मनुष्य और समाज,राष्ट्र और साहित्य,जातीयता और साहित्य,महावीरप्रसाद द्विवेदी युग में साहित्य और समाज,प्रगतिशील आंदोलन के युग (1936-1953) में वर्ग और साहित्य के अन्तस्संबंध पर खूब बहसें हुई हैं। 1960 के बाद लोकतंत्र और साहित्य के अन्तस्संबंध के सवाल केन्द्र में हैं।
     सन् 1977 से समुदाय और साहित्य का अन्तस्संबंध केन्द्र में आया है। इस संबंध पर विचार करते हुए यह तथ्य रेखांकित किया गया है कि औरतें और दलित पेशिव नहीं हैं। बल्कि वे सामाजिक संरचनाओं के परिवर्तन के साथ बदलते रहे हैं। इस विमर्श में दलित और स्त्री का एक अर्थ नहीं है। बल्कि वे अनेकार्थी होकर सामने आते हैं। समुदाय के रूप में चरित्रों की भूमिका पर विचार करते समय यह ध्यान रहे कि समुदाय के चरित्र बहुस्तरीय भावों और संवेदनाओं को प्रभावित करते हैं। समाज की एकाधिक संरचनाओं पर सीधे असर छोड़ते हैं। विभिन्न संदर्भ में उनका अर्थ बदल जाता है।
      दलित पात्रों पर केन्द्रित रचनाओं में कहानी सवर्ण वर्चस्व और दलित मातहत के अन्तर्विरोध के साथ आरंभ होती है।लेकिन समाहार हमेशा मातहत अवस्था के अंत में होता है। इस तरह की प्रस्तुतियों की सारी बहस पाठ की व्याख्या पर टिकी है। इसमें सवर्णों और दलितों के संपर्क और व्यवहार की जटिलताओं को लेखकगण पेश करते हैं। इस तरह की रचनाओं में दलितों-सवर्णों के सामाजिक रीति-रिवाज ,नियमों और व्यवहारों को खासतौर पर उभारा गया है। यह भी दर्शाया गया है कि दलित समुदाय किस तरह सवर्णों से भिन्न ढ़ंग से जी रहा है। इसमें दो चीजें साफ उभर कर आई हैं दलित सत्य और चिर-परिचित दलित यथार्थ। यह काम दलित लेखकों ने पूर्वाग्रहरहित होकर किया है। इस तरह की प्रस्तुतियों में दलितों और सवर्णों की स्टीरियोटाइप इमेज और स्टीरियोटाइप सोच सामने आया है।
      यह भी एक सच है कि दलित जब भी लिख रहे हैं तो वे सवर्ण के वातावरण का चित्रण करते हुए सवर्ण परिवेश में ही लिख रहे हैं। उसी वातावरण में वे दलित जीवन में आ रहे परिवर्तनों को पेश कर रहे हैं। सवर्ण वातावरण में दलित कैसे सोचता है.उसकी मंशाएं क्या है,वह अपने भावों,विचारों और इमेज का प्रचार-प्रसार कैसे करता है और किसतरह सुचिंतित ढ़ंग से पाठक को सम्बोधित करता है। इन चीजों को देखना चाहिए। वे ऐसी भाषा का भी इस्तेमाल करते हैं जिसमें छूत-अछूत,छोटे-बड़े,शूद्र और सवर्ण आदि का बोध होता है। वे जब दलित को शूद्र के फ्रेमवर्क में रखकर पेश करते हैं तो फिर शूद्र के अधिकारों के सवाल उठ खड़े होते हैं। इस क्रम में दलित की जाति संरचना,परिवार का रूप, आंतरिक द्वंद्व,इतिहास ,शहर-गांव ,परिवार आदि के अन्तर्विरोध चले आते हैं। दलित लेखकों का तर्क है कि वे इस फॉरमेट में इसलिए लिख रहे हैं जिससे लोग दलित यथार्थ को जानें। दलित पीड़ा के अनुभवों को जानें। लेकिन उनके लेखन का यह तरीका प्राच्यवादी है।
      दलितलेखक यह भी कहते हैं कि सवर्णों ने हमारे समाज और उसके यथार्थ पर कभी नहीं लिखा। वे खाली नाममात्र को प्रतीकात्मक रूप में दलित का उल्लेख करते रहे हैं। इसके विपरीत दलित आत्मकथाओं में दलित जीवन के बारें में अनेक सूचनाएं होती हैं। भूगोल रहता है।सामाजिक संरचनाओं के रूप रहते हैं। आचार-व्यवहार के रूप आदतें, आचरण और मनोदशाओं का चित्रण रहता है। इस समूचे आख्यान रूप को दलित लेखकों ने दलित सूचना संसार के रूप में पेश किया है। वे इसे दलित यथार्थ की वस्तुगत प्रस्तुति भी कहते हैं।
     दलित लेखकों ने जिन तथ्यों को पेश किया है उसके खिलाफ बहस की बहुत कम गुंजाइश है। लेखन की प्रक्रिया में सूचनाओं को देने की प्रक्रिया जब आरंभ हो जाती है या यों कहें कि आत्मकथा में यथार्थ सृजन की प्रक्रिया जब आरंभ हो जाती है तो कौन सी सूचना सच है और कौन सी काल्पनिक यह कहना कठिन है। दलित चूंकि अमानवीय परिवेश में रहता है अतः उसकी चेतना पर सवर्ण संरचनाओं का गहरा दबाव होता है वह जो पाठ लिखता है उस पर सवर्ण वातावरण का दबाव हावी रहता है।   
     दलित लेखक आत्मकथा में व्यक्ति रूप में अपनी बातें रखते हुए सामने आता है। दलितसमूह के रूप में नहीं। यह ऐसा व्यक्ति है जिसका दलितसमूह से भेद करना मुश्किल है। लेकिन यह अंततः व्यक्ति है ,साथ ही समुदाय का प्रतिनिधि भी है। दलित व्यक्ति के विवरण, कष्ट ,पीड़ा और परिवर्तन को हम ओमप्रकाश बाल्मीकि की कृति 'जूठन' (1997) में देख सकते हैं। यह किताब 1994 के आसपास लिखनी आरंभ हुई। यह हिन्दी की सबसे चर्चित आत्मकथा है। इस किताब को देखकर यह भी लगता है कि लेखक आत्मकथा के बहाने अपने जीवन और दलित समाज की अनेक सूचनाओं को दलित यथार्थ के साथ मिलाकर शामिल करता चला जा रहा है। वह उन सूचनाओं को क्रमशःपेश करता है।
      ओमप्रकाश बाल्मीकि ने दलित जीवन के दमघोंटू अमानवीय वातावरण का चित्रण किया है। अपने निजी जीवन के चित्रण के जरिए उन्होंने दलित समाज के सामाजिक यथार्थ और सांस्कृतिक अवस्था को पेश किया है। इसमें अनेक जगह सरलीकरण भी चले आए हैं। दलित व्यक्ति से आरंभ हुई आत्मकथा दलित समूह को एक सुसंगत इकाई के रूप में देखती है। इस प्रक्रिया में दलितों के जीवन में व्याप्त उत्पीड़न,भेदभाव,उपेक्षा आदि का व्यापक चित्रण हुआ है। दलितों के जीवन में व्याप्त मानवीय सकारात्मक पहलुओं की चर्चा कम हुई है।
      दलितों की आत्मकथाएं एक तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि सामाजिक परिवर्तन के साथ दलितों का जीवन भी बदलता रहा है। यह बदला हुआ जीवन सामान्य और आशानुरूप है । पूंजीवादी परिवर्तनों से दलित समाज भी बदल रहा है।
    दलितों के नारकीय जीवन के दृश्यों की आत्मकथाओं में भरमार है। लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि पूंजीवादी संस्कृति के आचार-व्यवहार,मूल्य,खान-पान,सभा-सोसायटी आदि किस तरह दलितों को प्रभावित कर रहे हैं? यह ठीक है कि इन आत्मकथाओं में नारकीय यथार्थ पहलीबार सामने आता है लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है जिसे नोटिस लिया जाना चाहिए। नए किस्म के पूंजीवादी संपर्क,संबंध और संचार रूपों के कारण क्या बदलाव आ रहे हैं उनके बारे में मूल्यांकन कर्ताओं का ध्यान जाना चाहिए। 
   दलित समाज सामंती,पूंजीवादी और पितृसत्तात्मक इन तीन व्यवस्थाओं के दबाव में घिरा हुआ है। इसके कारण इस समाज के सामने इन तीनों से ही लड़ने की समस्या है। सवाल यह है कि दमघोंटू अमानवीय जीवन स्थितियों का चित्रण करने के बाद क्या दलित लेखक इन स्थितियों से मुक्त हो रहे हैं ? आधुनिक दलित परिवार कैसे थे और आज कैसी अवस्था में हैं ? आधुनिक दलित परिवार में आधुनिकता के रूपों के प्रवेश के बाद किस तरह के मूल्य,संस्कार,आदतें आदि पैदा हो रहे हैं ? क्या नए आधुनिक परिवर्तनों के प्रति दलितों में उतनी गहरी समझ है जितनी गहरी समझ उनमें पुराने दलित समाज को लेकर है।
     दलित समाज में आज दो तरह के समाज हैं। आधुनिक शिक्षित दलित और पुराना दमघोंटू अमानवीय माहौल में रहने वाला दलित । हमें इन दोनों के नए सवालों की दलित नजरिए से पड़ताल करनी चाहिए।
    आज दलित लेखक के नए सवाल सामने है ,मसलन् ,नए उभरते पूंजीवादी दलित परिवार की संरचनाएं किस तरह की हैं ?इसके प्रधान अंतर्विरोध क्या हैं ? दलित परिवारों का आंतरिक चित्रण दलित लेखन में अभिव्यंजित क्यों नहीं हो रहा ?   महानगरीय और नगरीय जिंदगी के पूंजीवादी वातावरण,नौकरी,शिक्षा,आधुनिक बस्तियों आदि में रहने वाले दलितों के जीवन को कैसे देखें ? क्या आधुनिक पूंजीवादी दलित परिवार और पुराने दमघोंटू वातावरण वाले दलित परिवारों में बुनियादी बदलाव आया है ? आधुनिक दलित की चेतना और विचारधारा और पुराने दलित की चेतना और विचारधारा में क्या अंतर है? पूंजीवादी मूल्यों और समानतावादी आम्बेडकर के विचारों में से किस तरह के विचारों को दलित लेखक ज्यादा जी रहे हैं ? दलित लेखकों का पूंजीवाद,अमेरिकी साम्राज्यवाद,बहुराष्ट्रीय निगमों, उपभोक्तावाद, नव्य-आर्थिक उदारीकरण के प्रति क्या नजरिया है ?
    दलित साहित्य में और खासकर आत्मकथाओं में जो चीज सबसे महत्पूर्ण है वह है दलित लेखकों का सामाजिक रूपान्तरण। साहित्य में 'रूपान्तरण' वाले पहलू पर कम ध्यान दिया गया है। जिस तरह दलित लेखकों के दलित समाज के सामाजिक यथार्थ का महत्व है ,वैसे ही इस रूपान्तरित दलित लेखक की अवस्था का भी महत्व है और यह इस बात का संकेत है कि दलितों में तेजी से मध्यवर्ग पैदा हो रहा है।
    दलित मध्यवर्ग की चिंताएं ,समस्याएं और अभिरूचियां एकदम वही हैं जो आम मध्यवर्ग की हैं। आम मध्यवर्ग के पास अपनी पहचान के अनेक मुखौटे हैं , क्या दलित मध्यवर्ग के पास में भी कई मुखौटे हैं ? पूंजीवादी आचार-व्यवहार और शहरीकरण के कारण किस तरह के बदलाव दलित लेखक की जिंदगी में आ रहे हैं? क्या उन बदलावों के आधार पर कोई सामान्यीकरण दलित मध्यवर्ग के बारे में बनाया जा सकता है ? क्या दलित मध्यवर्ग में जातिभेद की समस्या है ? क्या विभिन्न दलित जाति के मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवारों में जातिभेद हैं ? जिन दलित परिवारों का आधुनिकीकरण नहीं हुआ है वे मध्यवर्ग में आने के बाबजूद,महानगरों में रहने के बावजूद विभिन्न दलित जातियों के साथ भेदभाव से पेश आते हैं। इसका अर्थ यह है कि पूंजीवाद ने दलितों को मध्यवर्ग में तो पहुँचा दिया है लेकिन दलित जातियों में प्रचलित आंतरिक जाति-भेदभाव अभी भी बना हुआ है। इस काम में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था कोई मदद नहीं करती। लिबरल शिक्षा व्यवस्था में पुरानी जातिगत अस्मिता को खत्म करने की क्षमता ही नहीं है।वह उसे नौकरी लायक बना देती है, लेकिन आधुनिक नहीं बनाती।नागरिक नहीं बनाती।पुरानी अस्मिता से मुक्त नहीं करती।   
     दलित अनुभूति बेहद जटिल और संश्लिष्ट होती है। इसमें मानवीय अनुभूति के सामान्य और जाति के विशिष्ट परिवेशगत लक्षण होते हैं। इसमें जातीय और लोकल जाति अनुभूति के सम्मिक्षण लक्षण भी हैं।
     एक जमाना था दलित अनुभूति सत्ता के प्रतिवाद का हिस्सा थी,कालान्तर में सत्ता और प्रतिष्ठानों का प्रतिवाद करते हुए स्वयं सांस्थानिक अनुभूति बन गयी। दलितों में पुराने संस्थानों के प्रति प्रतिवाद और उनको अस्वीकार करने का प्रबल भाव था। आज उसे पाने का प्रबल भाव है। इसके कारण दलित विमर्श जाने-अनजाने सत्ता विमर्श के पैकेज का हिस्सा बन गया है। आरक्षण वस्तुतः सत्ता विमर्श और सामंजस्य,सहयोग और समानता की सत्तापंथी समझ की अभिव्यक्ति है।
     आरंभ में दलितों के पास अपनी धारणाएं नहीं थीं ,इसके कारण वे अवधारणाओं का यह कहकर निषेध करते थे कि अवधारणाएं सवर्ण व्यवस्था की देन हैं। लेकिन आज दलित साहित्य है,अनुभूति है,अवधारणाएं हैं। अकादमिक जगत में दलित विमर्श,दलित साहित्य,दलित अध्ययन आदि पर केन्द्रित कोर्स हैं,विभाग हैं,अध्ययन केन्द्र हैं। कलतक दलित संस्थानविहीन था आज संस्थान है। इससे दलित की संस्थानों में शिरकत बढ़ी है।
    अवधारणाओं में अनुभूति को बांधने का पहले दलित निषेध करते थे, लेकिन बाद में अवधारणाएं बनाने का काम करने लगे, पहले साहित्य सिद्धांतों का निषेध करते थे और कहते थे कि साहित्यशास्त्र तो वर्णवादी है,पुंसवादी है। सिद्धांत ,आलोचना, अकादमिक जगत आदि के बारे में वे घृणा से बातें करते थे। आज वे दलित सौन्दर्यशास्त्र, सिद्धांत, अवधारणाएं आदि बना रहे हैं। पहले आत्मवैधता को बड़ा मानते थे अब सामूहिक अकादमिक वैधता को सुंदर मान रहे हैं।
     दलित साहित्य स्वयं में एक राजनीतिक अर्थ से भरी केटेगरी है। दलित को लेकर होने वाला कोई भी विमर्श,विवाद,आलोचना राजनीति की उपेक्षा करके संभव नहीं है। खासकर दलित राजनीति के 1977 के बाद आए उभार की अनदेखी किए बिना संभव नहीं है। जिस तरह प्रगतिशील साहित्य का विमर्श कम्युनिस्ट राजनीति और मार्क्सवाद के बिना तैयार नहीं होता वैसे ही दलित विमर्श सामयिक दलित राजनीतिक एजेण्डे ,ज्योबा फुले-आम्बेडकर के बिना नहीं बनता। असल में इन दोनों ने यह चीज रोमैंटिक आंदोलन से ली है। जिस तरह रोमैंटिक आंदोलन का फ्रांस की राज्य क्रांति की राजनीति से संबंध जुड़ा है, वैसे ही प्रगतिशील आंदोलन और दलित साहित्य भी सामयिक राजनीति से जुड़ा है।
       रोमैंटिक साहित्य में लेखक केन्द्रित लेखन है वैसे ही दलित साहित्य में भी है। साहित्य में सामाजिक शक्ति संतुलन के पहलू को सबसे पहले रोमैंटिक कवियों ने महत्व दिया वहीं से दलित लेखकों ने सामाजिक शक्ति संतुलन अपने पक्ष में करने की कला सीखी। वे जो कुछ लिखते हैं उसमें सामाजिक शक्ति संतुलन का चित्रण जरूर रहता है। आत्मकथा से लेकर कहानियों तक सब में दलित अपनी सामाजिक अवस्था का वर्णन करने के लिए सबसे ज्यादा स्पेस खर्च कर रहे हैं। सत्ता,दलित समाज,व्यक्ति और दलित समाज,दलित समुदाय और सवर्ण समुदाय,सवर्ण और सत्ता आदि के अन्तस्संबंधों पर खूब लिखा जा रहा है।
      दलित लेखक अपनी रचनाओं में दलित के शोषण मात्र का चित्रण नहीं कर रहे बल्कि दैनंदिन शोषण में सत्ता किस तरह भूमिका निभाती है उसकी ओर भी ध्यान खींच रहे हैं।
दलित लेखन के माध्यम से सहज ही विमर्श के नए ग्लोबल पैटर्न को भी समझ सकते हैं। जिस तरह अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दलित और नस्ल के सवाल एकसाथ उठाए जा रहे हैं और अमेरिकी सीनेट से लेकर यूएनओ के मंचों तक भारत के दलितों की समस्याओं पर बहस हो रही है उससे दलित विमर्श और दलित सृजन के ग्लोबल फलक और लिंक को समझने में मदद मिल सकती है। दलित लोकल है लेकिन विचारों और अभिव्यक्ति की शैली में ग्लोबल है।
   दलित का व्यक्तिगत और सामाजिक भिन्न होता है। दलित का जो व्यक्तिगत है वही उसका सामाजिक भी है। मसलन् साहित्य में दलित जीवन के अनेक पहलू कभी किसी भी बड़े लेखक ने चित्रित नहीं किए। प्रेमचंद ने कृषिशोषण का पहलू उजागर किया लेकिन दलितों के जीवन की व्यक्तिगत बातें अज्ञानता के कारण लिखने में असमर्थ रहे। मसलन् दलित क्या खाते हैं,कैसे रहते हैं, कैसे मरे हुए पशुओं के चमड़े का प्रयोग करते हैं,मरे पशुओं के बीच किस तरह रहते हैं, किस तरह स्कूल में परेशानियां झेलते हैं,जाति सूचक नाम किस तरह परेशानी पैदा करते हैं,शारीरिक शोषण,यौन शोषण,जीने का हक,पैदा करने का हक,घरेलू हिंसा आदि के रूप क्या हैं। इन सबके बारे में दलित लेखकों ने सबसे पहले रोशनी डाली। अपने निजी को सार्वजनिक किया। यहां तक कि मध्यकालीन दलित लेखक भी इस निज को सार्वजनिक नहीं कर पाए थे, लेकिन आधुनिक दलित लेखक ने यह काम किया है। दलित लेखकों ने जितने निजी प्रसंग उठाए हैं वे सबके सब व्यवस्था से जुड़े हैं और व्यवस्था से जुड़े होने के कारण ये राजनीतिक हैं। इसी अर्थ में दलित लेखन राजनीतिक है।
    दलित लेखन में जिन सामाजिक कष्टों का वर्णन मिलता है उनमें लेखकों ने कष्टों के लिए वर्णव्यवस्था और उसके साथ जुड़ी सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं को दोषी ठहराया है। इस क्रम में जहां एक ओर लेखक ने अपने निजी भावों और कष्टों को अभिव्यक्ति दी है वहीं दूसरी ओर अपनी दुरवस्था के लिए मानव निर्मित परिस्थितियों और सामाजिक समूहों के व्यवहार को दोषी ठहराया है।
   दलित लेखन या विमर्श कुछ भी नाम दें इसमें लेखक का रचा पाठ जहां एक ओर उसके निज की अभिव्यक्ति है वहीं दूसरी ओर वह प्रत्यक्षतःअन्य सामाजिक-राजनीतिक विमर्शों से भी जुड़ा है। अतः उनके लेखन में उठी किसी समस्या का समाधान व्यक्तिगत नहीं हो सकता। जो भी समाधान होगा वो सामाजिक-राजनीतिक और सामुदायिक संरचनाओं से जुड़ा होगा।
     विभिन्न दलित लेखकों की रचनाएं ऊपर से एक-दूसरे से अलग हैं लेकिन वे एक समग्र विमर्श तैयार करती हैं। सतह पर देखने पर लगेगा कि यह तो ओमप्रकाश बाल्मीकि की रचना है,यह शरणकुमार लिम्बाले की रचना है और यह किसी अन्य दलित लेखक की रचना है लेकिन ये सभी रचनाएं मिलकर दलित विमर्श निर्मित कर रही हैं और एक-दूसरे के साथ संवाद भी कर रही हैं। ये रचनाएं अलग-अलग लेखक की लिखी होने के बाबजूद ऐसा लगता है कि इनमें एक यूनिटी है, एकता है। इन रचनाओं को पढ़कर तत्काल ही व्याख्या की जरूरत महसूस होती है। असल में ये रचनाएं दलित जीवन के उस पहलू को सामने लाती हैं जिसे साहित्यकार नहीं जानता था।आलोचना ने कभी जिन पर विचार नहीं किया था।पाठक ने कभी जिसके बारे में विस्तार से पढ़ा और जाना ही नहीं था। यह मूलतः दलित का अदृश्य यथार्थ है।  
     दलित लेखन में निहित विभिन्न किस्म के विमर्शों के बीच जटिल संबंध है। मसलन दलित परिवार,दलित संस्कृति,दलितों में स्त्री-पुरूष संबंध,अभिभावक-संतान के संबंध,मातृसत्ता और दलित,पितृसत्ता और दलित आदि के सवालों पर दलित और गैर दलित समाज में विचारों का किस तरह आदान-प्रदान होता रहा है और किस तरह दलितों ने अपने लोकल और सार्वभौम चरित्रों को रचा है। कहने का तात्पर्य यह है कि दलित पात्र ,संस्थान और दलित यथार्थ के बीच में किस तरह की अंतर्क्रियाएं हो रही हैं,इत्यादि सवालों पर विचार करने की जरूरत है।
    दलित लेखन की विशेषता है कि वह दो स्तरों पर सक्रिय होता है पहला, वह दलित जीवन के उस यथार्थ को सामने लाता है जिसे आम लोग नहीं जानते,दूसरा वह पहले से प्रचलित जाति और वर्ण के संस्कारों,मान्यताओं और मूल्यों को चुनौती देता है। जाति और वर्ण के बारे में जो पहले कहा गया है उसे निशाना बनाता है। इन दो कार्यों के जरिए दलित लेखक एक नए किस्म के साहित्य और विचारधारा को जन्म देता है। वह विमर्श और चित्रण में उन चीजों को लेआता है जिन्हें पहले कभी नहीं कहा और रचा गया था।
      कुछ लोग हैं जो प्रेमचंद की रचनाओं में व्यक्त दलित चित्रण को पेश करते हुए कहते हैं कि देखो प्रेमचंद ने दलित यथार्थ रचा है। इसके आधार पर वे चाहते हैं कि यह मान लिया जाय कि गैर दलित लेखकों ने बेहतर दलित यथार्थ की सृष्टि की है। यह सच है कि प्रेमचंद के यहां दलित यथार्थ के चित्र हैं लेकिन  इससे दलित लेखन की महत्ता कम नहीं होती।
     दलित लेखक बड़े कौशल से दो काम करते हैं वे दलितयथार्थ के साथ दलित विचारों से पाठक का परिचय कराते हैं। प्रेमचन्द के यहां दलित यथार्थ है लेकिन दलित विचारधारा नहीं है। दलित साहित्य के लिए दलित यथार्थ और विचारधारा दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। इनके बिना दलित साहित्य का समग्र ढ़ांचा नहीं बनता।  
    दलित लेखक जब दलित सवालों को उठाते हैं तो वे उस बिंदु से नहीं बोलते जो पहले ही कहा जा चुका है बल्कि उस बिंदु से आरंभ करते हैं जो नहीं बोला गया है। साहित्य में दलित तो है लेकिन दलित की आवाज कहीं सुनाई नहीं देती। दलित के चित्र तो हैं लेकिन आवाज नहीं है।
    आमतौर पर विमर्श में जो पहले कहा गया है उसे लिपिबद्ध कर दिया जाता है लेकिन दलित विमर्श में ज्यादातर वे चीजें सामने आई हैं जो पहले नहीं उठायी गयीं। इनमें दलित की चुप्पियों को सुना जा सकता है।
     अनेकबार दलित विमर्श पढ़ते हुए दमनात्मक अनुभूतियों का भी सामना करना पड़ता है। यह लगता है दलित लेखक चाहता है कि उसकी बात को ध्यान से सुना जाए औऱ उस पर विचार किया जाए। दलित रचनाओं की एक और खूबी है कि उनमें हठात यथार्थ का ऐसा अंश सामने आता है जिसके बारे में पहले से कोई अनुमान नहीं था। कभी किसी ने ऐसी बात लिखी नहीं थी। यह हठात् पैदा हुआ यथार्थ वस्तुतः ऐसा सच है जिसकी पुनरावृत्ति संभव नहीं है। इसे आप जान नहीं सकते थे।भूल नहीं सकते हैं। रूपान्तरित नहीं कर सकते। सीधे खारिज नहीं कर सकते। इसे छिपा भी नहीं सकते। इस तरह की यथार्थ प्रस्तुति के सामने आते ही आपको स्टैंड लेना होगा, अपने स्टैंड को आप स्थगित नहीं कर सकते। यह ऐसा यथार्थ है जो परेशान करता है,पक्ष लेने के लिए मजबूर करता है।
दलित लेखकों ने आत्मकथा के बहाने जिस नारकीय जीवन का चित्रण किया है उसकी विशेषता है कि किस तरह एक दलित अपनी जीजिविषा और संघर्ष क्षमता के बल पर अपनी जिदगी बदलता है और पशुवत जीवन से कैसे मानवीय जीवन की ओर रूपान्तरित करता है। किस तरह मानवीय जीवन और नारकीय जीवन में अंतर होता है। दया पवार की कृति 'अछूत' में चित्रित  एक यथार्थ चित्र देखें,लिखा है-
  " ढोर मरने के बाद महारबाड़ा में एक चेतना दौड़ जाती। उसमें भी बैल यदि कगार से फिसलकर मर गया तो आनंद दुगुना। ऐसा बैल अधिक ताजा समझा जाता। जंगल में कहाँ ढोर मरा है,इसकी ख़बर महारबाड़ा पहुँचने में देर न लगती। आज के टेलेक्स से भी तेज गति से ख़बरें पहुँचतीं। आकाश में चील-गिद्ध विमान -जैसे एक ही दिशा में मँडराने लगते तो महारों को मालूम हो जाता कि खाना कहाँ पड़ा  है। गिद्धों द्वारा खाने की बरबादी न हो,इसके लिए भाग-दौड़ मचती।गिद्ध भी कितने ! आसानी सेपाँच-पचास का झुण्ड षपंख फड़फड़ाते। मुँह से मचाक्-मचाक् की आवाजें निकालते।अण्णाभाऊ साठे ने एक कथा में इन गिद्धों से मखमली जैकेट पहने साहूकार-पुत्र की उपमा दी है। पत्थर मारने पर थोड़ी दूर उड़ जाते परन्तु बेशर्मों-से फिर खाने की दिशा में सरकते। शायद उन्हें महार लोगों पर बड़ा क्रोध भी आता होगा। उनके मुँह से महार लोग कौर छीन लेते थे ! गिद्धों की हिंस्र आँखें,उनकी धारदार चोंच ! मुझे लगता है,वे सब मेरा ही पीछा कर रहे हैं।"
" कई दिनों से महारबाड़ा में इस तरह का खाना ही नहीं मिला। मुँह का स्वाद ही चला गया" -ऐसा कहते हुए बूढ़े लोग काफ़ी खुश दिखायी देते। घर में जो भी बर्तन होता- घमेला,परातें- वह लेकर लोग भागते। चमड़ी छिलने तक भी सब्र न करते। उसमें महिलाओं की धूम अलग। हमारी उम्र के लड़के दूसरे कारणों से ही खुश हो जाते।मोटी चमड़ी के साथ ही पतली चमड़ी की एक परत होती। उससे डफली,ढोल बना सकते थे। पतीली का ऊपरी घेरा या खाली डिब्बा इसके लिए पर्याप्त था। खाली डिब्बे को तानकर बैठाया जाता और धूप में सुखा देते। एक-दो दिन के बाद चर्वाद्य-सी आवाज निकलने लगती।" ( अछूत, पृ.64-65)
     उपरोक्त विवरण बताता है कि अछूतों का जीवन किस तरह पशुओं के जीवन से घुला-मिला रहा है।इसमें अभिव्यक्त अमानवीय स्थितियों का चित्रण दलितों को समाज के बाकी लोगों से अलग करता है। यह पूरा वर्णन नजारे की तरह लगता है। इससे यह भी लगता है दलित अर्द्ध मनुष्य के समूहों में जीते रहे हैं। यह पूरा वर्णन पढ़ने वाले को वाणीरहित कर देता है। इस तरह के वर्णन से यह भी पता चलता है हम दलितों के बारे में कितना कम जानते हैं।
  चूंकि हमें दलितों की वास्तविक जिंदगी की समझ नहीं है इसलिए उसे लेकर समाज और साहित्य में कोई संवाद भी नहीं है। यह वर्णन हमारे समाज में सक्रिय संस्थानों की भी स्थिति की ओर ध्यान खींचता है। किस तरह सामाजिक संस्थानों ने दलितों को अमानवीय,हीन और घृणित अवस्था में कैद किया हुआ है। यह मूलतःगुलाम अवस्था है।
     दलितों को गुलामप्रथा के अलावा और किसी परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा जा सकता। अनेक गैर दलित लेखकों के यहाँ दलितों के शोषण ,कृषिदासता, भूमिहीन कृषक आदि के चित्र मिलते हैं लेकिन दलितों की अमानवीय और अर्द्ध -मनुष्य जीवन स्थितियों का जो वर्णन दलित लेखकों के यहां मिलता है वह गैर दलित लेखकों यहां नहीं मिलता। इसका कारण क्या है ? असल में गैर दलित लेखकों ने दलित को कभी अंदर से जानने की कोशिश ही नहीं की। वे हमेशा उसे दर्शक की नजर से देखते रहे हैं। दलित के जीवन का उनके लिए नजारे या एक सीन से ज्यादा महत्व नहीं है। जब चीजों को दर्शक की नजर से देखकर लिखते हैं तो यह देखने वाले पर निर्भर करता है कि वह क्या देखे और क्या लिखे। वह सीन में शामिल नहीं होता।
दया पवार और अन्य दलित लेखकों ने जिस अमानवीय दलित जीवन को चित्रित किया है वह यथार्थवाद के पैमानों से समझ में नहीं आएगा। हमारे अनेक प्रगतिशील आलोचक प्रेमचंद आदि गैर दलित लेखकों के बारे में यथार्थवाद के मानकों और साहित्य सिद्धांतों के आधार पर लिखते रहे हैं। दलित का यथार्थ बुनियादी तौर पर भिन्न है और यह भिन्न समय में अवस्थित है। इसे समझने के लिए दलित दृष्टिकोण और मानविज्ञानी (एथनोग्राफिक) परिप्रेक्ष्य की सही समझ का होना जरूरी है।
    यथार्थवाद के मानकों का आधार है 'मनुष्य' और 'वर्ग' ,जबकि दलित इन दोनों के बाहर एथनोग्राफिक वर्तमान में निवास करता है। दलित के लेखन में 'वर्तमान समय' महत्वपूर्ण है, यथार्थवाद में ' समय' महत्वपूर्ण है। यथार्थवाद का विमर्श ऐतिहासिक काल में चलता है।
    दलितसाहित्य विमर्श वर्तमानकाल में चलता है। दलित लेखकों ने जिस अमानवीय अवस्था का वर्णन किया है वह उनका भोगा हुआ यथार्थ है जबकि गैरदलित लेखक का यह दूर से देखा-सुना यथार्थ है। दलितलेखक यथार्थ का हिस्सा है,गैर -दलितलेखक दलितयथार्थ के बाहर है। दलितलेखक दलितयथार्थ का सर्जक है,कर्ता है। गैर दलित लेखक दर्शक है,गवाह है,साक्षी है।
     दलित लेखकों ने दलित पर विचार करते हुए भारतीय संस्कृति,सभ्यता, जातिप्रथा, धर्म आदि के समस्त सुंदर तानेबाने को उधेड़ा है। वे बार बार यह बताना चाहते हैं कि उन्हें अधिकारों से वंचित करके रखा गया। अमानवीय परिस्थितियों में रखा गया। दलितलेखक ज्योंही दलितयथार्थ को वर्तमानकाल में ले आता है तो समाज को नजारे की कैद से मुक्त कर देता है। नजारे की कैद के कारण दलित के बारे में गैर दलित लेखकों में दलित यथार्थ की खूब पुनरावृत्ति हुई है। पुरानी समाज व्यवस्था की संकीर्णताओं,शोषण आदि की स्टीरियोटाइप प्रस्तुतियां खूब हुई हैं। इस तरह की प्रस्तुतियों को प्रेमचंद,निराला,जगदीश चन्द्र आदि का रचनाओं में साफतौर पर देखा जा सकता है।
        दलित लेखक जब दलित जीवन पर लिखते हैं तो वे अपने को औपनिवेशिकता के फ्रेम के बाहर ले जाते हैं। वे दलितों के नकारात्मक लक्षणों पर खूब जोर देते हैं। दलितों के जीवन की नकारात्मक स्थितियों का बार बार आना ,अमानवीय स्थितियों का बार बार आना उनकी दोयमदर्जे के नागरिक की अवस्था को बनाए रखने की साजिशों और सोच को नंगा करता है। इससे दलित के खिलाफ बने हुए वर्चस्व चक्र को चुनौती मिलती है।  जातिप्रथा कमजोर होती है। दलितों के प्रति गुलाम मानसिकता नष्ट होती है। मूल बात यह कि दलित लेखन में वर्चस्व और अमानवीय जीवन स्थितियों  का संदर्भ प्रमुख है।
   दलित के बारे में स्वाधीनता संग्राम में महात्मा गांधी,भीमराव आम्बेडकर आदि के जितने भी प्रयास,संघर्ष और विचारधारात्मक बहसें हुई हैं उन सबके केन्द्र में स्वाधीनता संग्राम है। स्वाधीनता संग्राम के प्रभाव के कारण ही दलितों की मुक्ति के सवाल सामने आते हैं। स्वाधीनता संग्राम के कारण ही दलितयथार्थ केन्द्र में आता है। वर्चस्व से मुक्त होने की दलित आकांक्षा अभिव्यक्त होती है। औपनिवेशिकता विरोधी संघर्ष दलित को वर्चस्व से मुक्ति का स्वप्न पैदा करता है। दलित जितना अंदर से औपनिवेशिक विचारधारा के प्रभाव से मुक्त होता गया उतना ही ज्यादा दलितयथार्थ सामने लाता गया। दलितयथार्थ के सामयिक विस्फोट का प्रधान कारण है दलित लेखकों का औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी विचारधारा से मुक्त होना।
    दलित विमर्श पर विचार करते समय यह तथ्य भी ध्यान में रहे कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य के उदय और लेखन की परिस्थितियां भिन्न होने के बावजूद अनेक साझा समस्याएं हैं ,इनमें जाति उत्पीड़न साझा समस्या है।
    दलित लेखन की साझा विरासत है इसका प्रतिवादी स्वर। दलित लेखन ने उन तमाम संस्कारों,आदतों और मूल्यों को अपने लेखन में निशाना बनाया है जो वे सैंकड़ों सालों से झेल रहे हैं। फलतःइन रचनाओं में दमन का इतिहास चला आया है। दलित लेखकों की प्रस्तुतियों में सामयिक दबाबों से मुक्त टिकाऊ प्रस्तुतियां सामने आई हैं। लेखक के नजरिए में सामयिक दबाव हैं लेकिन प्रस्तुतियों या चित्रण में सामयिक चंचलता गायब है। सामयिक टेंशन गायब है।
     दलित पाठ मूलतः वर्चस्व विरोधी और सामाजिक शक्ति संबंधों की अभिव्यक्ति है। इस पाठ में अनेक उप-पाठ हैं और उप-तनाव हैं। मसलन् जाति उत्पीड़न प्रधान पाठ है, लेकिन दलित परिवार,दलित कामुकता,दलित शरीर ,शिक्षा,दलित की नौकरी,कार्यस्थल पर दलित,मेला,महानगर और मध्यवर्ग में दलित आदि को लेकर अनेक उप-पाठ भी मिलते हैं।
मसलन्, कामुकता का प्रसंग देखें, 'अछूत' का एक दृश्य पढ़ें- " चौथी कक्षा की बात है। मराठे की एक हट्टी-कट्टी लड़की मेरी कक्षा में पढ़ती थी। उसे पहला मासिक-धर्म आया और उसका पहला लहँगा खून से सन गया। तब मैंने खोज की -यह लड़की अब औरत बन गयी है।" ( पृ.45) यह दृश्य किताब में अचानक आ टपकता है। इसके बाद कामुकता का एक और उप-पाठ दाखिल होता है- " बंबई में कावाखाने में रहते समय लड़कों के बहलाने में आकर दरवाजों की दरारों से कई बार छिप-छिपकर छोटी आयु में ही संभोग के कई दृश्य मैंने देखे हैं।" इसके बाद एक घटना का लेखक जिक्र करता है।
'' एक घटना तो अच्छी तरह याद है। मेरे मौसेरे चाचा थे। उनका नाम था शिवा। शादी हुई और बीबी मर गयी। विधुरता के दिन काट रहे थे। सड़कों पर कसरत के खेल दिखाने वाली एक काली हुड़दंगी औरत उन्होंने घर में रख रखी थी ।वैसे यह औरत बड़ी अजीब थी। पुरूषों की तरह पैंट-शर्ट पहनती थी। लंबे बालों को जूड़े में बाँधती थी चाचा को कावाखाने में मिलने आती,वह भी साइकिल पर बैठकर।...  जब कावाखाने के स्त्री-पुरूष काम पर चले जाते ,तब शिवा चाचा उसे कमरे में ले आता। ... यह औरत चाचा के सामने गाय के समान कैसे शांत-लीन हो जाती है !वे नंगे हो जाते।पसीने से लथपथ। दीवाल का आईना ज़मीन पर कोण बनाकर रखते। औरतों की जांघ के बीच बाल होते हैं, इस बात का मुझे कई दिनों तक आश्चर्य होता रहा...! "(पृ.45)
   दया पवार ने एक अन्य प्रसंग का जिक्र किया है ,एक बिठाभाई नामक महिला के बारे में लिखा है," मुझ पर जान देती थी।अच्छी-अच्छी चीजें खाने को देती।सिनेमा-नाटक दिखाती।मुझे बहुत मजा आता।मैंने उसके साथ रॉक्सी में 'खजांची' पिक्चर देखी थी,आज भी मुझे यह याद है। घर में कोई न रहने वह मुझे अपने ऊपर बैठाती। पलंग पर चित सोती। मुझे जाँघे दबाने को कहती। ऐसे समय वह साड़ी ऊपर सरका लेती। उसके केले के पेड़ के गूदे सी जाघें दबाते समय मेरे मन में एक अजीब-सी बैचैनी उठती।वैसे मेकी उम्र बहुत छोटी थी।परन्तु यह सब देखकर भीतर बड़ी उथल-पुथल मचती।" ( 47)
एक अन्य जगह समलैंगिक कामुकता का प्रसंग आता है,लिखा है ,"तालुके के स्कूल में सोते वक्त एक घटना घटी। आज भी ऐसा लगता है,ज्यों मेरे शरीर पर छिपकली रेंग रही है। गाँव का गोरा-चिट्टा मराठे का लड़का मेरे पास ही सोता था। एक रात अचानक मैं नींद से जागा। वह लड़का मेरे लिंग से कुछ हरकत कर रहा था। अलबत्ता उस दिन मेरी चड्डी गीली हो गयी।मुझे भी मजा आया। पर बाद में मुझे झिझक होती। कुछ गलत,गन्दा काम मेरे हाथों हो रहा है-यह सोचकर बैचैन हो उठता। इसके बाद मैंने अपने सोने की जगह बदल दी।"(76)
इस तरह के प्रसंगों को कैसे पढ़ा जाए ? इसे अवचेतन के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। असल में दलित और स्त्री रचनाओं में कामुकता और जातिभेद के बीच में साझा संदर्भ तत्व है शरीर। शरीर के बहाने कामुकता और शरीर के बहाने ही दलित दाखिल होता है। दलित का शरीर विमर्श मूलतः दलित के सामाजिक इतिहास को खोलने में मदद करता है। शरीर मर्द का हो या स्त्री का उसका बार-बार आना और नए विमर्श की ओर लेजाना,अपने आपमें नयी बात है।
    दलित के सभी विमर्श शरीर की विभिन्न प्रस्तुतियों और विभिन्न सामाजिक अवस्थाओं की प्रस्तुतियों को सामने लाते हैं। दलित शरीर के बिना उसकी सामाजिक हकीकत सामने नहीं आती। उपरोक्त प्रसंग कामुकता के हैं लेकिन इन सभी प्रसंगों में कामुकता के बारे में औरतें कम और मर्द ज्यादा बोल रहा है। यही स्थिति शरणकुमार लिंबाले की कृति ' देवता आदमी' (1994)कहानी संकलन में शामिल कहानियों में भी देखी जा सकती है। इस संकलन में एक कहानी है 'भीतर-बाहर बलात्कार' ,इसमें पीड़िता का नाम है बायडी,उसके साथ बलात्कार की घटना होती और पूरी कहानी में अन्य लोग उस घटना के बारे में बताते हैं,बायडी ने काफी मुश्किल से अपनी बात रखते हुए कहा, '' जी,हाँ, मेंबर ने मुझपर बलात्कार किया। मैं बहुत रोई ,पैंरों पड़ी,लेकिन उसने मुझे नहीं छोड़ा। ' मैंने तुम्हें काम पर लगाया है।मुंसिपैलिटी की जगह पर झोपड़ी बनाने की इजाजत दी है। इसका कुछ अहसान मानती है कि नहीं ?'  कहते हुए उसने मुझे डाँटा ,तब मंचुप बैठ गई।" (137)
    इस तरह के विवरण और ब्यौरे इस बात की सूचना देते हैं कि भारतीय समाज में जातिभेद और उत्पीड़न को छिपाने की चतुर कोशिशें होती रही हैं। इन संदर्भों से यह बात भी निकलती है कि दलित उत्पीड़न के मामलों में ,खासकर शारीरिक शोषण के मामलों में औरतें कम और मर्द ज्यादा बोलते रहे हैं। मध्यकाल और कालांतर में आधुनिककाल में भी दलित औरतों के शारीरिक शोषण को छिपाने की तमाम कोशिशें हुई हैं। इधर की रचनाओं में शारीरिक शोषण का खुलासा होने से दलित और कामुकता का अन्तर्ग्रथित संबंध सामने आया है। इस तरह की प्रस्तुतियों में अवचेतन में स्थित हीनताबोध उभरकर सामने आया है। यह दलित मूल्यांकन के लिए सबसे कठिन चुनौती भी है।    

















शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

आलोचना के कॉमनसेंस के प्रतिवाद में

हिंदी आलोचना में इनदिनों एकदम सन्नाटा है। इस सन्नाटे का प्रधान कारण है आलोचना सैद्धांतिकी, समसामयिक वास्तविकता और सही मुद्दे की समझ का अभाव। यह स्थिति सामाजिक यथार्थ और आलोचना सिद्धांतों के साथ अलगाव से पैदा हुई है। लेखक-आलोचक लिख रहे हैं लेकिन वे क्या लिख रहे हैं,क्यों लिख रहे हैं और जो लिख रहे हैं उसके साथ सामाजिक सच्चाई के साथ कोई मेल भी है या नहीं इस पर वे थोड़ा देर ठहरकर सोचने या सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। एक खासकिस्म की मानसिक व्याधी में लेखक और आलोचक दोनों फंस गए हैं। वे अपनी कह रहे हैं अन्य की सुन नहीं रहे हैं। वे सिर्फ अनुकूल को देख रहे हैं।

दूसरी बड़ी समस्या यह है कि आलोचकों ने अपडेटिंग बंद कर दी है। अधिकांश आलोचना निबंधों में आलोचना सैद्धांतिकी के नए प्रयोग नजर नहीं आते। लोग लिखने के नाम पर लिख रहे हैं।यह आलोचना में आया तदर्थभाव है। सारी दुनिया में आलोचना में जो लिखा-पढ़ा जा रहा है उसके साथ संवाद-विवाद,ग्रहण और अस्वीकार बंद है।सवाल उठता है हमारे आलोचक और लेखक यह क्यों कर रहे हैं ? वे किसी मसले पर बहस कर रहे हैं तो बहस के नाम पर बहस कर रहे हैं। वे किसी साहित्य सैद्धांतिकी के मानकों के आधार पर बहस नहीं कर रहे।

मैं यहां सुविधा के लिए स्त्रीसाहित्य के प्रसंग में कुछ नई बातों की ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ। हमारे यहां स्त्री को विलक्षण और औचक भाव से देखा जाता है। यहां तक कि अकादमिक जगत में भी उन्हें दूसरे लोक का प्राणी मानकर व्यवहार किया जाता है। साहित्य की स्नातक और उससे ऊपर की कक्षाओं में 'फेमिनिज्म' या स्त्रीवादी साहित्य सिद्धांत नहीं पढ़ाए जाते। अकादमिक जगत में हम स्त्री के बारे में बातकरते हैं लेकिन उसके शास्त्र को पढ़ाने से परहेज करते हैं। युवा लड़कियां भी फेमिनिस्ट कहलाना पसंद नहीं करतीं। क्या फेमिनिज्म के बिना औरत की स्वायत्त सत्ता संभव है ? क्या फेमिनिस्ट कहलाना गलत है ? हिंदी में फेमिनिज्म गाली है। यह हमारे स्त्रीविरोधी सोच की अभिव्यंजना है।

आज औरतों के पास जितने अधिकार हैं उन्हें दिलाने में फेमिनिज्म और महिला आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन अधिकतर औरतें और आलोचक ,फेमिनिज्म के इस कर्ज के प्रति कृतज्ञता से पेश नहीं आते। वे स्त्री की उन परिस्थितियों को अस्वीकार नहीं करते जिनमें औरतें कष्ट और अपमान में रह रही हैं, और अपनी वास्तव स्त्रीचेतना से वंचित है। इस क्रम में औरतें समाज में हाशिए पर चली गयी हैं। अधिकतर औरतें अदृश्य रहना चाहती हैं। वे परिवार के निर्माण में अपनी भूमिका निभाना चाहती हैं लेकिन सामाजिक वातावरण में अपनी भूमिका नहीं निभाना चाहतीं। उनके व्यक्तित्व से नागरिक आयाम एकसिरे से गायब है। यह भी कह सकते हैं औरत की घरेलू अस्मिता ने उसकी नागरिकअस्मिता का अपहरण कर लिया है।

फेमिनिज्म की खूबी है कि वह औरत के आसपास बने हुए परंपरागत माहौल को खत्म करता है।उसके अंदर नागरिक अधिकारों की चेतना पैदा करता है। खासकर लोकतंत्र में फेमिनिज्म तो स्त्रीरक्षा का प्रभावशाली हथियार है। उल्लेखनीय है विभिन्न रंगत का फेमिनिज्म प्रचलन में है स्त्री अपनी सुविधा और समझ के आधार पर चुन सकती है कि वह किस तरह के फेमिनिस्ट नजरिए का पालन करे। फेमिनिज्म के बिना स्त्री अपनी अस्मिता का निर्माण नहीं कर सकती। स्त्री के लिए फेमिनिज्म एक नजरिया है और सामाजिक विकास की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है। हिन्दी की आयरनी है कि हमारे यहां स्त्री साहित्य है लेकिन फेमिनिस्ट कोई नहीं है। उलटे फेमिनिज्म से नफरत करनेवाले लेखक- लेखिकाएं -आलोचक मिल जाएंगे।

लोकतंत्र में स्त्रीअधिकार की आधारशिला है उसका स्वायत्त अस्तित्व।स्त्री को जब तक स्वायत्तता नहीं मिलती,स्वायत्त वातावरण नहीं मिलता। सारी कवायद बेकार है। स्त्री का अस्तित्व और स्वायत्तता ये उसके दो बुनियादी हक हैं। अभी औरत को हम महज सेवा करने वाली और बच्चा पैदा करने वाली के रूप में ही देखते हैं। हिन्दी की आलोचना में स्त्री को मातहत मानने का भाव जड़ें जमाए हुए है। स्त्री-पुरूष संबंधों में लोकतंत्र नहीं आया है। लेखिका और आलोचक के बीच के रिश्ते में भी लोकतंत्र दाखिल नहीं हुआ है। इन सब स्थानों पर पितृसत्ता का कब्जा बरकरार है। स्त्री को हम पुरूष की पूरक मानते हैं। उसकी स्वायत्त सत्ता को नहीं मानते।कुछ लोग स्त्री की स्वायत्त सत्ता मानते हैं तो उसे नागरिकचेतना और नागरिक अधिकारों के साथ जोड़ नहीं पाए हैं। स्त्री महज स्त्री नहीं है। वह नागरिक है। स्त्री को स्त्री की पहचान के साथ नागरिक की पहचान के रूप में देखने की आवश्यकता है। वह जेण्डर भी है और नागरिक भी है। लोकतंत्र में नागरिक की पहचान हासिल करना प्रधान लक्ष्य है।

इसके अलावा विभिन्न संस्थानों को भी लोकतंत्र का पाठ नए सिरे से पढ़ाने की आवश्यकता है। जिससे वे नागरिकअधिकारों और नागरिकचेतना के प्रति परिपक्वता से पेश आएं। नागरिक परिपक्वता पैदा करने के लिए नागरिक कानूनों की नए सिरे से पड़ताल की जानी चाहिए। जजों से लेकर सांसदो-विधायकों को नागरिकता का गहन प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। वे जानें कि नागरिक अधिकारों का मतलब क्या है ? सीमाएं क्या हैं ? प्राकृतिक नियम विधान और कानूनी नियम विधान की सीमाएं क्या हैं ? इस दिशा में पहले कदम के तौर पर स्त्री की इच्छा और अधिकारों का हम सम्मान करना सीखें, उस पर थोपना बंद करें।

स्त्री-पुरूष ये दोनों समाज में स्वायत्त इकाई हैं। इस बात को बुनियादी तौर पर मानें। लोकतंत्र का आरंभ नागरिक संबंधों से होता है और नागरिक संबंधों को नागरिक अधिकारों के जरिए संरक्षण प्राप्त है। ये नागरिक अधिकार पुरूष की तरह स्त्री को भी प्राप्त हैं। स्त्री-पुरूष के बीच में प्रेम रहे। दोनों एक-दूसरे की संवेदना,अनुभूति,शरीर और मूल्यों का सम्मान करें।

हमारे देश में लोकतंत्र है, संविधान में हक भी मिले हैं। लेकिन स्त्री-पुरूष एक-दूसरे का सम्मान नहीं करते। नागरिकता का उदय तब होता है ,जब हम सम्मान करते हैं। भिन्नता को स्वीकार करते हैं। भिन्न किस्म की धार्मिक ,राजनीतिक और सांस्कृतिक भावनाओं को स्वीकार करते हैं। नागरिक भावबोध पैदा करने लिए हमें स्त्री-पुरूष के प्राकृतिक अंतर को भी मानना पड़ेगा। इन दोनों की स्वायत्तता को भी मानना पड़ेगा।

लोकतंत्र में हक मिलते नहीं हैं।उनको हासिल करना पड़ता है। यह स्त्रीविवेक पर निर्भर करता है कि वह अपने अधिकारों के प्रति कितनी सजग है। स्त्री की सजगता के आधार पर यह भी देख सकते हैं कि वह अपने को दासता से किस हद तक मुक्त करना चाहती है। इसके लिए स्त्री को लिंग के दायरे से बाहर निकलकर नागरिक के दायरे में आना होगा। लिंगबोध का नागरिकबोध में रूपान्तरण करना होगा।

लिंगबोध ,स्त्रीदासता बनाए रखता है। जबकि नागरिकता का दायरा इस दासता से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। इससे स्त्री को अपनी प्राकृतिक पहचान को नागरिक अस्मिता में रूपान्तरित करने में मदद मिलती है। स्त्री जब तक स्त्री की इमेज में बंधी रहेगी उसे नागरिक समाज और नागरिक अधिकारों के साथ सामंजस्य बिठाने में असुविधा होगी। यह भी संभव है स्त्री अपनी प्राकृतिक जिंदगी को पूरी तरह त्यागे बिना नागरिक जिंदगी में प्रवेश करे। जिस तरह स्त्री के लिए वस्त्र जरूरी हैं वैसे ही नागरिक अधिकार भी जरूरी हैं। इसके लिए जरूरी है कि स्त्री-पुरूष में प्रेम हो। प्रेम के बिना सब बेकार है। यहां तक कि नागरिक अधिकार भी अर्थहीन हैं। परंपरा और धर्म भी अर्थहीन है। स्त्री की स्वायत्तता बचे इसके लिए स्त्री-पुरूष में प्रेम जरूरी है। स्त्रियों में आपसी प्रेम जरूरी है।

स्त्री के प्रति रवैय्या बदले इसके लिए जरूरी है कि हम उसे देखने का तरीका बदलें। स्त्रीचेतना का सामाजिक स्रोत हैं संस्थान। स्त्री के बारे में जब भी किसी विषय पर बात की जाए उसे संस्थान के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। स्त्रीचेतना का निर्धारण स्त्री कम और सामाजिक संस्थान ज्यादा करते हैं। मसलन् ,मध्यकाल में स्त्री पर विचार करना है तो मध्यकालीन संस्थानों से जोड़कर देखें। आधुनिक औरत पर बात करनी है तो आधुनिक संस्थानों की भूमिका के संदर्भ में विश्लेषित करें। संस्थान के चरित्र उदघाटन के बिना स्त्री अस्मिता का रहस्योदघाटन संभव नहीं है।

सवाल उठता है संस्थान किसे कहते हैं ? उनका काम क्या है ? संस्थान की केन्द्रीय भूमिका है शिरकत पैदा करने की। जैसे न्यायालय,संसद,विधानसभा आदि ये संस्थान हैं। इनमें कोई भी शिरकत कर सकता है। स्त्रीसाहित्य को संस्थानों की शिरकत वाली भूमिका से जोड़ने की जरूरत है। उसे संस्थान बनाने की जरूरत है। आज हमारे यहां साहित्य या स्त्रीसाहित्य को संस्थान के रूप में विश्लेषित नहीं करते बल्कि महज कम्युनिकेशन के रूप में विश्लेषित करते हैं। संस्थान के रूप में विश्लेषित करते तो फेमिनिज्म के प्रति अछूतभाव न होता।

सामान्यतौर पर स्त्री पर बात करते समय ,उसके लिखे पर बात करते समय हम स्त्री को लिंग की तरह नहीं देखते,उसकी राय को लिंग की राय के रूप में ग्रहण नहीं करते।बल्कि व्यक्तिगत राय के रूप में देखते हैं। इस तरह देखने का दुष्परिणाम यह निकला है कि स्त्री को,उसके विचारों को हाशिए पर डाल देते हैं। उसके स्वायत्त अस्तित्व और उसकी उपलब्धियों या सामाजिक भूमिका को सीमित करके पुंस वर्चस्व के अधीन बना देते हैं।

उल्लेखनीय है लिंगरहित पहचान की जितनी भी धारणाएं या संबंध हमारे समाज में प्रचलन में हैं उनके आधार पर स्त्री की सही समझ नहीं बनती। मसलन्, स्त्री को मनुष्य, निजी,व्यक्ति, बीबी,बहू,बेटी,बहन आदि के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इस तरह के सारे पदबंध स्त्री की लिंग की पहचान को छिपाते हैं,या उसकी उपेक्षा करते हैं। स्त्री को न्यूनतम स्पेस देते हैं। साथ ही इनमें किसी न किसी रूप में पुंसवादी संदर्भ निहित है और वह निर्णायक भूमिका अदा करता है। ये सभी पदबंध पुरूषसंहिता में निर्मित हैं। कायदे से हमें मर्द के सॉचे में ढ़लकर आई अवधारणाओं और स्त्री के साँचे में ढलकर आई अवधारणाओं में अंतर करना चाहिए।

बुनियादी बात यह है कि स्त्री को आज फेमिनिज्म के साथ अपना अलगाव या अछूतभाव खत्म करना होगा। पाठ्यक्रमों में फेमिनिज्म को सम्मानजनक दर्जा देना होगा।स्त्री को स्त्रीअस्मिता के बाहर ले जाकर नागरिक की पहचान के रूप में स्थापित करना होगा। नागरिक अधिकार ही हैं जो अस्मिता के अधिकारों को विस्तार देते हैं। ये बातें दलित अस्मिता की राजनीति पर भी लागू होती हैं।

एक अन्य सवाल है कि लेखक को कैसे पढ़ें ? इन दिनों लेखक को पढ़ने की पद्धति बदल गयी है। लेकिन हिन्दी में अधिकांश आलोचक अभी भी पुरानी शैली में पढते हैं। पाठ में अनेक जटिलताएं होती हैं। इसकी परिभाषा को लेकर भी व्यापक मतभेद हैं। इसके बावजूद सवाल यह है कि पाठ किसे कहते हैं ? पाठ अनेक संकेतों का समूह है। इको का मानना है शब्द ही पाठ है और पाठ ही शब्द है। लेकिन इनका असुरक्षित इतिहास है।पाठ के शब्दसंसार पर प्रतिक्रिया देने का अर्थ है नए अर्थ की खोज करना। सवाल यह नहीं है कि रचना को आप कृति कहते हैं या पाठ कहते हैं। सवाल यह है उसका क्या निश्चित अर्थ होता है ? क्या उसमें अनेक संभावित अर्थ होते हैं ? अथवा कोई अर्थ ही नहीं होता ?

इनदिनों पाठक के पास अपने समाज,संस्कृति,राजनीति आदि की व्यापक जानकारी है और वह इसके आधार पर विभिन्न पाठों को नए सिरे से खोलता है। पाठ के संदर्भ में बुनियादी मसला क्या है ? यहां पर स्त्री का पाठ बुनियादी मसला है। अतः पाठ को स्त्री के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। उसी संदर्भ में पाठ के अर्थ की खोज की जानी चाहिए। साथ ही यह भी देखना चाहिए कि कौन पढ़ रहा है ? स्त्री पढ़ रही है या मर्द पढ़ रहा है ? इससे यह भी पता चलेगा कि पाठ का अर्थ कौन ग्रहण कर रहा है ? कौन रोक रहा है ? कौन प्रतिवाद कर रहा है ? या कौन अर्थ को समायोजित कर रहा है। यानी पाठक की अस्मिता का पाठ के मूल्यांकन में महत्व होता है। अपनी अस्मिता के आधार पर ही वह अर्थ की खोज करता है।

पाठ का पाठक पर विखंडित असर पड़ता है जिसके आधार पर वह राय बनाता है। पाठ का पाठक पर असर ही नहीं पड़ता बल्कि मूल्यों और विचारधारा का भी असर पड़ता है। इसका भी असर पड़ेगा कि आखिरकार पाठक निजी तौर पर स्त्री,लिंग,सेक्स, कामुकता, नस्ल,रक्तसंबंध,वर्ग ,जातीयता आदि के बारे में किस तरह के मूल्यों को जानता और महसूस करता है। उसमें वह किन मूल्यों को घातक मानता है। यह भी संभव है किसी कृति या फिल्म में ऐसे मूल्यों का चित्रण किया गया हो जिनका पाठक की मूल्य संरचना के साथ अन्तर्विरोध हो, विवाद हो,पंगा हो,ऐसे में वह पाठ से असहमत भी हो सकता है। उल्लेखनीय है फिल्म का पाठ नहीं संकेत की धारणा के आधार पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए। यह भी देखें संकेत को किन तत्वों के साथ सजाकर पेश किया है।

मसलन् आप किसी शिक्षक के पढ़ाने को ले सकते हैं। कक्षा में विभिन्न किस्म के छात्र होते हैं। इनकी मनोदशा भी भिन्न किस्म की होती है। वे पाठ और शिक्षक को एक ही तरह से ग्रहण नहीं करते। उनके ग्रहण का आधार होता है ,उनकी अपनी चेतना और रीडिंग आदतें होती हैं। जिस छात्र की किताब पढ़ने की आदत नहीं है और नोटस से काम चला लेता है ,उसके लिए वह शिक्षक मूल्यवान है जो नोटस लिखाता है या नोटस देता है। लेकिन जो छात्र किताब पढ़ने में दिलचस्पी रखता है उसके लिए वह शिक्षक मूल्यवान है जो किताब के सवालों को विभिन्न तरीकों से खोलकर पढ़ाता है। यानी छात्र की अस्मिता और चेतना यहां मूलतः निर्धारण का काम कर रही है।

एस .हाल ने रेखांकित किया है पाठ की रीडिंग में शरीर की अवस्थिति की बड़ी भूमिका होती है। मसलन् कब,कहां,किस समय,किस अवस्था में शरीर है। इसका पाठ की रीडिंग पर सीधा असर पड़ेगा। इसी प्रसंग में मिशेल फूको ने व्यक्ति के शरीर के नियमन और अनुशासित करने की प्रक्रियाओं को विस्तार से बताया है कि आधुनिककाल आने के बाद व्यक्ति के शरीर को किस तरह नए किस्म के अनुशासन ,आदतों,संस्कार और नियमों में बांधा गया।

एस. हाल का मानना है अस्मिता आंतरिक तत्वों से बनती है, बाह्य रिप्रजेंटेशन से नहीं। प्रत्येक व्यक्ति अपना आख्यान एवं प्रस्तुति स्वयं बनाता है। जिसमें उसका समाज झांकता है। वह समाज के सांस्कृतिक तत्वों के जरिए ही अस्मिता बनाता है फलतः व्यक्ति की अस्मिता सांस्कृतिक निर्मित होती है। उसमें बहुस्तरीय सामयिक विषय तैरते रहते हैं। जो चीज उसके सांस्कृतिक संदर्भ में आ जाती है उसका वह रूपान्तरण कर लेता है।

पाठ की व्याख्या की कई परंपराएं हैं। खासकर रैनेसां के साथ पाठ की सार्वभौम व्याख्याओं का जन्म होता है। सार्वभौम तुलनाओं का किया जाता है। सार्वभौम तुलना का अर्थ है कि प्रत्येक चीज,बात,व्यक्ति,घटना,विचार आदि अन्य से जुड़ा है। यानी अन्य तत्व उस तत्व की अभिव्यंजना है या अन्य किसी चीज की अंतर्वस्तु है। जब आप दो चीजों में तुलना करेंगे, एक-दूसरे के साथ जोड़कर देखेंगे तो व्याख्या के अनियंत्रित होने की संभावनाएं भी रहेगी।यहां अर्थ से अर्थ की ओर रूपान्तरण होगा। समानता से समानता की ओर स्थानान्तरण होगा। इस छोर का उस छोर के साथ संपर्क बनेगा। यानी एक से दूसरे की ओर स्थान्तरण होगा। यहां कोई कदम सुनिश्चित नहीं हो सकता। हिन्दी में अभी तक रैनेसांकालीन आलोचना पद्धति प्रचलन में है। इस पद्धति में अर्थ और तुलना दोनों के ही असीमित रूपों के उदय की संभावना निहित है। रैनेसांकालीन आलोचना की सीमा यह है कि वह किसी चीज की अनुपस्थिति या रूपान्तरणकारी अर्थ के बारे में नहीं बताती। यही वजह है हमारे यहां भारतेन्दु से लेकर छायावाद तक रैनेसांकालीन आलोचना को अपने रूपान्तरण के अर्थ का पता नहीं है। वे तो यह देखते हैं कि हर चीज एक-दूसरे से जुड़ी है और उसके आधार पर ही आलोचना के सारे मानक बने हैं।

रैनेसां जब आया तो स्थिति यह थी कि व्याख्याओं का ढ़ेर लग गया।गद्य की बाढ़ आ गयी। वस्तु,घटना, व्यक्ति,संवृत्ति,प्रवृत्ति आदि के बारे में हम ज्यादा जानने लगे। हम ज्यादा जानते हैं इसका अर्थ नहीं है कि हम सब कुछ जानते हैं। यही हाल रैनेसाकालीन लेखकों का था। वे जिन चीजों को जानते थे ,साथ में उनके कुछ आधार को भी जानते थे। वे जिस संदर्भ में लिख रहे थे उसकी क्षमता भी जानते थे। नयी आधुनिक व्यवस्था के संदर्भ में वे असीमित जान सकते थे। लेकिन प्रक्रियाएं सीमित ही थीं,उनका असीमित ज्ञान संभव नहीं था।

रैनेसां में आलोचना की जो पद्धति अपनायी गयी उसमें अर्थ की जडों को जानने का भाव है। उसके आधार पर व्याख्या करने की प्रवृत्ति मिलती है। लेकिन एक अवस्था या समय गुजर जाने के बाद लेखक और आलोचक यथास्थितिवाद में बंध जाता है,रूढ़िवाद में बंध जाता है और फिर उससे निकलने की छटपटाहट आरंभ हो जाती है। अभिव्यक्ति के फॉर्म और अंतर्वस्तु को बदलने की छटपटाहट आरंभ हो जाती है। फलतः एक ही समय में अनेक किस्म की प्रवृत्तियां और शैलियां सक्रिय नजर आती हैं। अब हर किस्म का संदर्भ और हर चीज से संबंध प्रासंगिक नजर आता है। प्रत्येक वस्तु के साथ संबंध स्वीकार्य हो जाता है।

मसलन्, भारतेन्दु के साहित्य के साथ सन् 1857 का संपर्क ,संबंध और असर मान लिया गया। नयी पूंजीवादी सभ्यता के विभिन्न रूपों के साथ संपर्क-संबंध भी मान लिया गया।प्रेस से संबंध मान लिया, धार्मिक-समाजसुधार आंदोलन,पुनरूत्थानवाद,ब्रजभाषा,खड़ीबोली हिन्दी,उर्दू,पुराने भक्ति आंदोलन आदि जो भी चीजें मिलती गयीं उससे संबंध जोड़ते चले गए। इनमें से प्रत्येक चीज को अन्य के साथ जोड़ा,अभिव्यक्ति रूपों के साथ जोड़ा। एक अभिव्यक्ति रूप को दूसरे के साथ जोड़ा। यानी प्रत्येक अंतर्वस्तु को अन्य अंतर्वस्तु की अभिव्यक्ति माना। ग्लोबल अंतर्वस्तु का भी विकास होता रहा।

रैनेसांकाल से आरंभ हुई अनंत समीक्षा की संभावनाओं ने अवधारणा और अर्थ की अनंत संभावनाओं के द्वार खोले हैं। इसे आलोचना की भाषा में विस्थापन कहते हैं। जब आप आलोचना करते हैं तो अनुगमन करते हैं ,विस्थापन करते हैं। देरिदा ने "ऑफ ग्रामोटॉलॉजी "में लिखा ,पाठ तो मशीन है उसमें अनंत विस्थापन निहित हैं।इसकी प्रकृति वसीयत के मर्म को समेटे होती है। यानी इसमें वसीयती भाव है । यही वजह है इतिहास,परंपरा आदि की खोज का काम आधुनिककाल में ज्यादा हुआ है। लेखक अपने को भक्ति आंदोलन,रैनेसां आदि के वारिस के रूप में पेश करने लगे हैं।

यह ऐसा दौर है जिसमें पाठ का आनंद लें या कष्ट उठाएं,उससे आगे निकलें,या उसे छोड़ें।प्रत्येक क्षण का अध्ययन करें। प्रत्येक संकेत या पाठ या प्रवृत्ति के उदय की प्रक्रिया पढ़ने लायक होती है साथ ही वो एक समय के बाद खो जाती है या नष्ट हो जाती है। वह अपने समय से संबंध बनाती है और एक अवस्था के बाद संबंध विच्छिन्न कर लेती है। देरिदा के नजरिए से यही बुनियादी तौर पर "ड्रिफ्ट" है।

पाठ की आलोचना में मंशा की अवधारणा की महत्वपूर्ण भूमिका है। अम्ब्रेतो इको ने इसी संदर्भ में लिखा है पाठ के पीछे निहित आत्मगत मंशा को जब अस्वीकार कर दिया जाता है तो पाठक की पाठ के प्रति वफादारी खत्म हो जाती है। फलतः उसकी भाषा बहुस्तरीय खेलों का आधार बन जाती है।यही वजह है पाठ में अंतिम अर्थ को शामिल नहीं किया जा सकता। यहां कोई रूपान्तरणकारी संकेतित अर्थ नहीं रह जाता। प्रत्येक संकेतक अन्य संकेतक के साथ युक्त नजर आता है। कोई भी चीज प्रासंगिकता के दायरे के बाहर नजर नहीं आती। आलोचना का काम है पाठ में अंतर्निहित अर्थ की खोज करना । उसे भिन्न लक्ष्य के साथ पेश करना। इस क्रम में आलोचना कॉमनसेंस के दायरे का अतिक्रमण कर जाती है।









रविवार, 11 दिसंबर 2011

डिजिटल युग में लघुपत्रिकाओं की चुनौतियां


    डिजिटल की दुनिया ने हमारे रचना संसार के सभी उपकरणों पर कब्जा जमा लिया है। लघुपत्रिका अथवा साहित्यिक पत्रकारिता जब शुरू हुई थी तो हमने यह सोचा ही नहीं था कि ये पत्रिकाएं क्या करने जा रही हैं। हमारी पत्रकारिता और पत्रकारिता के इतिहासकारों ने कभी गंभीरता से मीडिया तकनीक के चरित्र की गंभीरता से मीमांसा नहीं की। हम अभी तक नहीं जानते कि आखिरकार ऐसा क्या घटा जिसके कारण लघु पत्रिकाएं अभी भी निकल रही हैं।
      आर्थिक दृष्टि से लघु पत्रिका निकालना घाटे का सौदा साबित हुआ है। लघु पत्रिका प्रकाशन अभी भी निजी प्रकाशन है। इस अर्थ में लघु पत्रिका प्रकाशन को निजी क्षेत्र की गैर-कारपोरेट उपलब्धि कहा जा सकता है। संभवत: निजी क्षेत्र में इतनी सफलता अन्य किसी रचनात्मक प्रयास को नहीं मिली। लघु पत्रिकाओं के प्रकाशन को वस्तुत: गैर-व्यावसायिक पेशेवर प्रकाशन कहना ज्यादा सही होगा। समाज में अभी भी अनेक लोग हैं जो लघुपत्रिका को व्यवसाय के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसे लघुपत्रिका आंदोलन कहना पसंद करते हैं। वे क्यों इसे लघुपत्रिका आंदोलन कहते हैं ,यह बात किसी भी तर्क से प्रकाशन की मीडिया कसौटी पर खरी नहीं उतरती।
   लघु पत्रिका प्रकाशन की अपनी दुनिया वहीं है जो प्रकाशन की दुनिया है। फ़र्क इसके चरित्र और भूमिका को लेकर है। आप जितना बेहतर और वैज्ञानिक ढ़ंग से प्रिंट टैक्नोलॉजी के इतिहास से वाकिफ होंगे। उतने ही बेहतर ढ़ंग से लघुपत्रिका प्रकाशन को समझ सकते हैं। लघु पत्रिकाओं की आवश्यकता हमारे यहां आज भी है, कल भी थी, भविष्य में भी होगी। लघुपत्रिका का सबसे बड़ा गुण है कि इसने संपादक और लेखक की अस्मिता को सुरक्षित रखा है। हमें जानना चाहिए कि कैसे संपादक की सत्ता और लेखक की पहचान का प्रतिष्ठानी प्रेस अथवा व्यावसायिक प्रेस में लोप हो गया ?
    आज प्रतिष्ठानी प्रेस में संपादक है ,लेखक हैं ,किंतु उनकी कलम और बुद्धि पर नियंत्रण किसी और का है,विज्ञापन कंपनियों का है। संपादक लेखक,स्तंभकार और संवाददाता  की सत्ता को विज्ञापन एजेंसियों ने रूपान्तरित कर दिया है। आज विज्ञापन एजेंसियां तय करती हैं कि किस तरह की खबरें होंगी, किस साइज में खबरें होंगी, किन विषयों पर संपादकीय सामग्री होगी ? किस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इस समूची प्रक्रिया के व्यवसायिक समाचारपत्र और पत्रिका जगत पर क्या असर हुए हैं, इसके बारे में हमने कभी गंभीरता के साथ विचार नहीं किया। हमने कभी यह सोचा ही नहीं कि जब पहलीबार समाचारपत्र आया तो उसने क्या किया और जब समाचारपत्र में विज्ञापन दाखिल हो गया तो क्या बदलाव आने शुरू हुए, लघु पत्रिका प्रकाशन भी इस प्रक्रिया से प्रभावित हुआ है। इन सबको लेकर हमारे पास कुछ अनुभव हैं, कुछ संस्मरण हैं। कुछ किंदन्तियां हैं। किंतु भारत के कम्युनिकेशन तकनीक के इतिहास और उसके परिणामों की कभी गंभीरता से पड़ताल नहीं की। लंबे समय तक हम साहित्य के एक हिस्से के तौर पर लघुपत्रिकाओं अथवा साहित्यिक पत्रिकाओं को देखते रहे, उनमें प्रकाशित सामग्री का हमने मीडिया सैध्दान्तिकी अथवा आलोचना के नजरिए से कभी मूल्यांकन ही नहीं किया। यहां तक कि एक स्वतंत्र मीडिया रूप के तौर पर पत्रिकाओं की सत्ता को हमने कभी स्वीकार नहीं किया।
  आज जब हम बातें कर रहे हैं तो स्थिति में कोई मूलगामी किस्म का परिवर्तन नहीं आया है। सिर्फ एक परिवर्तन आया है हमने पत्र-पत्रिकाओं के इतिहास को साहित्य के इतिहास से अलग करके स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता के इतिहास के रूप में पढ़ाना शुरू कर दिया है। पत्र-पत्रिकाओं को स्वतंत्र रूप से पढ़ाने से मामला हल नहीं हो जाता, बल्कि और भी पेचीदा हो उठा है।
    समाचारपत्र का इतिहास हो या लघुपत्रिका का इतिहास हो, इसकी सही समझ तब ही बनेगी जब हम कम्युनिकेशन तकनीक के इतिहास से वाकिफ होंगे। हमारी मुश्किल अभी यहीं पर बनी हुई है, हमें साहित्य से प्रेम है, पत्रिकाओं से प्रेम है, किंतु तकनीक से प्रेम नहीं है। अगर हमारा तकनीक से प्रेम होता तो हम उसके इतिहास को जानने की कोशिश करते।
    हिन्दी में संपादक - लेखकों का एक तबका तैयार हुआ है जो धंधेखोरों की तरह लघुपत्रिका आंदोलन के नाम पर टटुपूंजिया दुकानदारी कर रहा है। इसके बावजूद ये स्वनाम-धन्य विद्वान यह मानकर चल रहे हैं कि लघुपत्रिकाओं के सबसे बड़े हितचिन्तक वे हैं। जबकि सच यह है कि ऐसे संपादकों की बाजार में कोई साख नहीं है। वे अपनी किताबों की बिक्री तक नहीं कर पाते। अपनी पत्रिका को बेच तक नहीं पाते। हमें यह देखना होगा कि लघुपत्रिकाएं क्या साहित्यिक अभिरूचि पैदा करने का काम कर रही हैं अथवा कुछ और काम कर रही हैं ? क्या हमारी लघु पत्रिकाओं ने कभी इस तथ्य पर गौर किया कि कैसे विगत तीस सालों में भारत के पत्रिका प्रकाशन में विस्फोट हुआ है।
   आज पत्रिका प्रकाशन सबसे प्रभावी व्यवसाय है। एक जमाना था जब सारिका,दिनमान, धर्मयुग आदि को विभिन्न बहाने बनाकर बंद किया गया था, किंतु आज स्थिति यह है कि पत्रिका प्रकाशन अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है। आज बाजार में सभी भाषाओं में पत्रिकाओं की बाढ़ आई हुई है। बड़े पैमाने पर पत्रिकाएं बिक रही हैं। अपना बाजार बना रही हैं। लघुपत्रिका का प्रकाशन अभी कम मात्रा में होता है। हंस,पहल,उद्भावना,आलोचना जैसी पत्रिकाएं पांच-सात हजार का आंकड़ा पार नहीं कर पायी हैं। जबकि छोटे से कस्बे से निकलने वाली धार्मिक पत्रिका लाखों की तादाद में बिक रही हैं। हमें बेचने की कला को धार्मिक पत्रिकाओं से सीखना चाहिए। बड़े प्रतिष्ठानी प्रेस ने धार्मिक पत्रिकाओं से यह गुण सीखा है और आज बाजार में हर विषय की एकाधिक पत्रिकाएं मिल जाएंगी ,जिनकी साधारण तौर पर इनकी बिक्री हमारी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं से कई गुना ज्यादा है। धार्मिक पत्रिकाओं से सीखने की बात मैं इसलिए कर रहा हूँ कि आप पत्रिका निकालना यदि चाहते हैं तो दूसरों से सीख लें।
   लघुपत्रिका की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह अपने पाठक की अभिरूचियों को नहीं जानती, अपने पाठक को नहीं जानती, वह सिर्फ साहित्य ,विचारधारा और साहित्यकार को जानती है, उसमें भी वह संकुचित भाव से चयन करती है। यह तो कुल मिलाकर कंगाली में आटा गीला वाली कहावत चरितार्थ हो गयी।
    हमारी लघु पत्रिकाओं का समूचा नजरिया विधा केन्द्रित सामग्री प्रस्तुति पर ही केन्द्रित रहा है। हमने विधा केन्द्रित पैमाना 19वीं  शताब्दी में चुना था, वह पैमाना आज भी बरकरार है, उसमें परिवर्तन की जरूरत हमने महसूस नहीं की। हम यह भूल ही गए कि पाठक की भी अभिरूचियां होती हैं। पाठक का भी नजरिया होता है, हम संपादक की रूचि जानते हैं, लेखक का नजरिया जानते हैं किंतु लघु पत्रिकाओं को पढ़कर आप पाठक को नहीं जान सकते। हमें इस सवाल पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए कि क्या गैर-पेशेवर ढ़ंग से लघु पत्रिका प्रकाशन संभव है ? क्या उसका कोई भविष्य है।
   हमें पाठक की अभिरूचि और साहित्य की स्वायत्तता को केन्द्र में रखकर लघुपत्रिका प्रकाशन करना चाहिए। साथ ही इस पहलू पर भी गौर करना चाहिए कि साहित्य की परिभाषा बदल गयी है ? आज साहित्य की वही परिभाषा नहीं रह गई है जो आज से पचास या पच्चीस साल पहले थी। लघु पत्रिका का संसार साहित्य के बदले हुए स्वरूप को परिभाषित किए बिना आगे चला जा रहा है। इस संदर्भ में आलोचना पत्रिका के पुनर्प्रकाशन को प्रस्थान बिंदु के रूप में विश्लेषित करने की जरूरत है। आलोचना पत्रिका का जब पुनर्प्रकाशित हुई तो उसका पहला अंक फासीवाद पर आया। सवाल किया जाना चाहिए कि इस अंक से पहले भी अनेक राजनीतिक फिनोमिना आए किंतु उन पर कभी आलोचना पत्रिका के संपादक का ध्यान नहीं गया। मेरा इशारा आपात्काल की तरफ है, आलोचना पत्रिका के द्वारा आपात्काल के बारे में एकदम चुप्पी और साम्प्रदायिकता पर  विशेष अंक इसका क्या अर्थ है ? इस प्रसंग को इसलिए सामने पेश कर रह हूँ कि आप यह जान लें कि विगत पच्चीस वर्षों लघु पत्रिकाएं आम तौर पर उन विषयों पर सामग्री देती रही हैं जो सत्ता प्रतिष्ठानों ने हमारे लिए तैयार किए हैं।
    लघुपत्रिका का विमर्श सत्ता विमर्श नहीं है। लघुपत्रिकाएं  पिछलग्गू विमर्श का मंच नहीं हैं। ये पत्रिकाएं मौलिक सृजन का मंच हैं। साम्प्रदायिकता का सवाल हो या धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न हो अथवा ग्लोबलाईजेशन का प्रश्न हो हमारी पत्रिकाएं सत्ता विमर्श को ही परोसती रही हैं। सत्ता विमर्श कैसे परोसा जाता है इसका आदर्श नमूना है लघु पत्रिकाओं में चलताऊ ढ़ंग से सामयिक प्रश्नों पर छपने वाली टिप्पणियां। लघु पत्रिका का चरित्र सत्ता के चरित्र से भिन्न होता है, यह बात सबसे पहले भारतेन्दु ने समझी किंतु हमारे नए संपादकगण अभी तक नहीं समझ पाए हैं। लघुपत्रिका की हमारी अवधारणा में भी गंभीर समस्याएं हैं। लघु पत्रिकाओं में कारपोरेट जगत की पत्रिकाओं की समस्त बीमारियां घर कर गयी हैं। जिस तरह कारपोरेट घरानों की पत्रिकाओं में पक्षपात होता है,खासकर रचना के चयन को लेकर, लेखक के चयन को लेकर, जिस तरह कारपोरेट पत्रिकाओं के लिए विज्ञापनदाता महत्वपूर्ण और निर्णायक होता है। उसके आधार पर पक्षपात होता है ,ठीक वैसे ही लघु पत्रिकाओं में भी पक्षपात का गुण विचारधारा विशेष के प्रति आग्रह के रुप में कैंसर की तरह घर कर चुका है।
     लघुपत्रिकाओं को दो कमजोरियों से मुक्त करने की जरूरत है , पहला है 'विचारधारात्मक पक्षपात', दूसरा है ' निर्भरता'। ये दोनों ही तत्व लघुपत्रिकाओं के स्वाभाविक विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं।  दूसरी प्रधान समस्या है जो लघुपत्रिका की धारणा से जुड़ी है। अभी हम जिस लघुपत्रिका को निकाल रहे हैं उसके केन्द्र में संस्कृति है। संस्कृति को ही संदर्भ बनाकर हम साहित्य का चयन करते हैं। जबकि सारी दुनिया में संस्कृति के संदर्भ के आधार पर चयन नहीं हो रहा, बल्कि अभिरूचि और जीवनशैली के आधार पर सामग्री चयन हो रहा है।
    यदि लघुपत्रिकाएं साहित्य,राजनीति, अर्थनीति, विज्ञान आदि पर केन्द्रित सामग्री प्रकाशित करती हैं तो उन्हें इस संदर्भ में पेशेवर और विशेषज्ञता को ख्याल में रखना चाहिए। हिन्दी के लेखकों का आलम यह है कि वे सभी विषयों के ऊपर लिख सकते हैं और वेकिसी भी क्षेत्र की विशेष जानकारी हासिल नहीं करना चाहते। मौलिक लेखन के नाम पर प्रतिष्ठित लघुपत्रिकाओं में जिस तरह की घटिया और स्तरहीन सामग्री प्रकाशित होती है इसने पाठकों को लघुपत्रिकाओं से दूर किया है। आज स्थिति यह है कि विशेषज्ञान के बिना काम चलने वाला नहीं है। विशेषज्ञता हासिल किए बिना आप स्वीकृति नहीं पा सकते।
   आखिरी समस्या सबसे गंभीर समस्या है जिस  पर गौर किया जाना चाहिए। आज हम डिजिटल के युग में आ गए हैं। हमें पत्रिका को डिजिटल रूप में प्रकाशित करना चाहिए, सीडी और वेबसाइट पत्रिका के रूप में प्रकाशित करना चाहिए।  डिजिटल प्रकाशन पत्रिका प्रकाशन से सस्ता और व्यापक है। इसकी पहुँच दूर-दूर तक है। आप चाहें तो अपनी वेब पत्रिका के लिए सस्ते विज्ञापन भी ले सकते हैं। हमें यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि मौजूदा दौर लाइब्रेरी का नहीं है, डिजिटल लाइब्रेरी का है।          

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...