रविवार, 16 सितंबर 2012

हिन्दी के 12 कटु सत्य


1.हिन्दीभाषी अभिजन की हिन्दी से दूरी बढ़ी है ।

2.राजभाषा हिन्दी के नाम पर केन्द्र सरकार करोड़ों रूपये खर्च करती है लेकिन उसका भाषायी,सांस्कृतिक,अकादमिक और प्रशासनिक रिटर्न बहुत कम है।

3.इस दिन केन्द्र सरकार के ऑफिसों में मेले-ठेले होते हैं और उनमें यह देखा जाता है कि कर्मचारियों ने साल में कितनी हिन्दी लिखी या उसका व्यवहार किया। हिन्दी अधिकारियों में अधिकतर की इसके विकास में कोई गति नजर नहीं आती।संबंधित ऑफिस के अधिकारी भी हिन्दी के प्रति सरकारी भाव से पेश आते हैं। गोया ,हिन्दी कोई विदेशी भाषा हो।

4.केन्द्र सरकार के ऑफिसों में आधुनिक कम्युनिकेशन सुविधाओं के बावजूद हिन्दी का हिन्दीभाषी राज्यों में भी न्यूनतम इस्तेमाल होता है।

5.हिन्दीभाषी राज्यों में और 10 वीं और 12वीं की परीक्षाओं में अधिकांश हिन्दीभाषी बच्चों के असंतोषजनक अंक आते हैं. हिन्दी भाषा अभी तक उनकी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे है।

6.ज्यादातर मोबाइल में हिन्दी का यूनीकोड़ फॉण्ट तक नहीं है।ज्यादातर शिक्षित हिन्दी भाषी यूनीकोड फॉण्ट मंगल का नाम तक नहीं जानते।ऐसी स्थिति में हिन्दी का विकास कैसे होगा ?

7.राजभाषा संसदीय समिति और उसके देश-विदेश में हिन्दी की निगरानी के लिए किए गए दौरे भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े अपव्ययों में से एक है.

8.विगत 62सालों में हिन्दी में पठन-पाठन,अनुसंधान और मीडिया में हिन्दी का स्तर गिरा है।

9.राजभाषा संसदीय समिति की सालाना रिपोर्ट अपठनीय और बोगस होती हैं।

10.भारत सरकार के किसी भी मंत्रालय में मूल बयान कभी हिन्दी में तैयार नहीं होता। सरकारी दफ्तरों में हिन्दी मूलतः अनुवाद की भाषा मात्र बनकर रह गयी है

11.हिन्दी दिवस के बहाने भाषायी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिला है इससे भाषायी समुदायों में तनाव पैदा हुआ है। हिन्दीभाषीक्षेत्र की अन्य बोलियों और भाषाओं की उपेक्षा हुई है।

12.सारी दुनिया में आधुनिकभाषाओं के विकास में भाषायी पूंजीपतिवर्ग या अभिजनवर्ग की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिन्दी की मुश्किल यह है कि हिन्दीभाषी पूंजीपतिवर्ग का अपनी भाषा से प्रेम ही नहीं है।जबकि यह स्थिति बंगला,मराठी,तमिल.मलयालम,तेलुगू आदि में नहीं है।वहां का पूंजीपति अपनी भाषा के साथ जोड़कर देखता है।हिन्दी में हिन्दीभाषी पूंजीपति का परायी संस्कृति और भाषा से याराना है।

सोमवार, 10 सितंबर 2012

इंफोसिस परेशान है ममता सरकार की दिशाहीन नीतियों से

       हाल ही में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ब्लूमवर्ग मार्केट मैगजीन ने दुनिया में आर्थिक क्षेत्र में प्रभावशाली 50 नेताओं में स्थान दिया है और लिखा है कि भारत में केन्द्र सरकार की नीतियों को प्रभावित करने वाली वह ताकतवर नेत्री है। बिडम्बना यह है कि यही ताकतवर नेत्री राज्य के लिए औद्योगिक घरानों को आकर्षित करने में असमर्थ रही है। बल्कि यह कहें तो ज्यादा सही होगा कि आज ममता सरकार की नीतिहीनता सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आई है। ममता बनर्जी के आने केबाद औद्योगिक विकास एकदम बंद हो गया है।पश्चिम बंगाल के औद्योगिक दुर्दिन खत्म होने का नाम नहीं ले रहे।

हाल की घटनाएं बताती हैं कि ममता सरकार जिस तरह काम कर रही है उससे औद्योगिक समस्याएं हल होने की बजाय उलझती जा रही हैं। मंत्रियों से लेकर नौकरशाह तक सभी को नीतिगत दिशाहीनता ने असहाय बनाकर रख दिया है।मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जब शासन संभाला था आमलोगों में उनको लेकर जबर्दस्त उत्साह था और यह उम्मीद भी जगी थी कि वे कुछ बेहतर और नया करेंगी लेकिन उद्योगपतियों से लेकर राजनेताओं तक,साधारण ग्रामवासी लेकर फैक्ट्री मजदूर तक सबको निराशा हाथ लगी है।

विगत डेढ़ साल में ममता सरकार की साख में गिरावट आई है। इस गिरावट के दो बड़े कारण हैं ,पहला , विगत वाममोर्चा सरकार की सही नीतियों की बजाय गलत नीतियों का अनुसरण करना ।दूसरा ,केन्द्र सरकार की नीतियों के प्रति नकारात्मक नजरिया। इन दोनों कारणों की वजह से आज ममता सरकार देश सबसे निष्क्रिय राज्य सरकार के नाम से जानी जाती है। आमलोग इसे खोखली घोषणाओं और जलसों की सरकार कहते हैं।

यही वह परिदृश्य है जिसमें राज्य के उद्योगमंत्री पार्थ चटर्जी ने विगत सप्ताह इंफोसिस के मुख्यालय जाकर इस कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की। राजनीतिक हलकों में इस बैठक को लेकर कई तरह के सवाल उठे हैं। पहला सवाल यह उठा है कि आखिर राज्य के उद्योगमंत्री को एक कंपनी के मुख्यालय जाने की क्या जरूरत थी ?यदि बात ही करनी थी तो वे अपने कोलकाता स्थित दफ्तर में कंपनी के अधिकारियों को बुलाकर बात कर सकते थे। दूसरा सवाल इंफोसिस के मालिक ने उनसे मुलाकात क्यों नहीं की ?तीसरा सवाल पार्थ चटर्जी ने ऐसा नया क्या प्रस्ताव पेश किया जिसको कंपनी ने नहीं माना ।

यह सवाल भी उठा है कि उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने कंपनी को दिए अपने नए सुझावों को पत्रकारों को क्यों नहीं बताया ? उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी जिस तैयारी और भरोसे के साथ इंफोसिस अधिकारियों के पास गए थे उससे उनकी असफलता सामने आई है और इसके कारण देर-सबेर उनकी कुर्सी जाने का खतरा है। उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी के नए प्रस्तावों को कंपनी ने एकसिरे से खारिज कर दिया है और साथ ही राज्य सरकार के रूख की तीखी आलोचना की, उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी के बार बार तर्क किए जाने पर भी उन्होंने इंफोसिस के दूसरे कैम्पस को खोलने के बारे में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। इंफोसिस के अधिकारियों ने उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी से दो-टूक शब्दों में कहा बताते हैं कि राज्य सरकार का यही रवैय्या रहा तो वे दूसरा कैम्पस चालू नहीं कर पाएंगे और वापस चले जाएंगे । अधिकारियों ने नाराजगी जताई है कि उनके द्वारा खरीदी गयी जमीन के पूरे दाम का भुगतान कर दिए जाने के बाद भी मालिकाने के कागजात कम्पलीट होकर उनके पास नहीं आए हैं। कंपनी चाहती है कि उनके मालिकाने के कागज जल्दी दिलवाए जाएं अन्यथा उनका जमा पैसा ब्याज सहित वापस दिलवाया जाय।उद्योगमंत्री पार्थ चटर्जी के पास उनकी मांगों के बारे में कोई सटीक उत्तर नहीं था।

उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने इंफोसिस के अधिकारियों से अपील की कि वे कुछ समय और दें और राज्य सरकार और कंपनी के अधिकारी मिलकर दिल्ली जाएं और नए विकल्पों की खोज करें।यही वजह है कि इंफोसिस के मुख्यालय से बाहर निकलकर उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने एक सामान्य सा बयान दिया कि इंफोसिस के अधिकारियों ने राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करने का वायदा किया है। सच यह हैकि उन्होंने कोई वायदा नहीं किया बल्कि यह कहा है कि उनके औद्योगिक प्रस्ताव को मानो तो काम करेंगे वरना चले जाएंगे इस पर उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा था कुछ समय और दो और वे इसके लिए राजी हो गए।

उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने इंफोसिस की समस्याओं के समाधान के लिए दिल्ली जाने और केन्द्रीय वित्त और उद्योग मंत्रालय के अधिकारियों से मिलने का सुझाव रखा जिसे इंफोसिस ने मान लिया। जानकार सूत्रों का कहना है कि इंफोसिस के अधिकारी आगामी दिल्ली यात्रा को लेकर किसी नयी आशा की संभावनाएं नहीं देख रहे हैं। इसका प्रधान कारण ममता बनर्जी का केन्द्र सरकार के नीतिगत सुधारों में अडंगा डालनेवाला रवैय्या। मनमोहन सरकार का सभी मंत्रालयों को अप्रत्यक्ष निर्देश है कि प्रधानमंत्री कार्यालय की अनुमति के बिना ममता सरकार के किसी भी प्रस्तावित पर कोई फैसला न किया जाय।

उल्लेखनीय है कि इंफोसिस ने विगत वाममोर्चा सरकार के अंतिम साल में विशेष आर्थिक क्षेत्र योजना के तहत 50 एकड़ जमीन खरीदी थी और तत्कालीन राज्य सरकार ने उनको सेज के तहत मिलने वाली सभी सुविधाएं देने का वायदा भी किया था लेकिन ममता सरकार आने के बाद इंफोसिस के साथ किए गए समझौते को राज्य सरकार ने रद्द कर दिया और इंफोसिस को विशेष आर्थिक क्षेत्र के तहत सुविधाएं देने से मना कर दिया और बाद में सेजनीति को राज्य में लागू न करने का फैसला ही कर डाला और इस सबके कारण एक खास परिस्थिति पैदा हुई हैकि जो कंपनियां सेजनीति के तहत पूंजीनिवेश करने आने वाली थीं या जिनके प्रस्ताव राज्यसरकार के पास पड़े थे वे सभी प्रस्ताव रद्दी की टोकरी में डाल दिए गए।

उल्लेखनीय है कि सेज नीति को केन्द्र सरकार ने तैयार किया है और उसने राज्यों से उस नीति की संगति में राज्यसेज नीति बनाने का अनुरोध भी किया है। पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार ने बड़ी आनाकानी के बाद सेज नीति को लागू किया था,लेकिन ममता सरकार आने के बाद पुनःराज्य विधानसभा में पास की गयीनीति को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया और राज्य फिर से नए औद्योगिक संकट में फंस गया है। पुरानी औद्योगिक नीति में औद्योगिक विकास की गुंजायश कम थी इसलिए केन्द्र सरकार ने सेजनीति बनायी थी और अधिकांश राज्यों ने उस नीति का पालन भी किया था ।

रविवार, 9 सितंबर 2012

फेसबुक और अभिव्यक्ति की लक्ष्मणरेखा


फेसबुक पर अमर्यादित,गाली गलौज, पर्सनल कमेंटस (छींटाकशी) आदि को तुरंत हटादें साथ ही सार्वजनिक तौर पर सावधान करें। न माने तो ब्लॉक कर दें।

-----------------------------------------------------------------------

फेसबुक पर स्वीकृति या साख बनाने के लिए जरूरी है कि नियमित लिखें और सारवान और सामयिक लिखें।प्रतिदिन किसी भी मसले को उठाएं तो उससे जुड़े विभिन्न आयामों को अलग-अलग पोस्ट में दें। इससे एजेण्डा बनेगा। कभी-कभार अपनी कहें ,आमतौर पर निजता के सवालों और निजी उपलब्धियों के बारे में बताने से बचें। यदि आप प्रतिदिन अपनी रचनात्मक उपलब्धियां बताएंगे तो अनेक किस्म के कु-कम्युनिकेशन में कैद होकर रह जाएंगे, इससे मन संतोष भी कम मिलेगा। मन संतोष तब ज्यादा मिलता है जब सामाजिक सरोकारों के सवालों पर लिखते हैं और लोग उस पर तरह तरह की राय देते हैं।

---------------------------------------------------

फेसबुक कम्युनिकेशन के लिए इसकी संचार अवस्था को स्वीकारने और समझने की जरूरत है। मसलन् आपने किसी के स्टेटस पर कोई टिप्पणी दी,जरूरी नहीं है वह व्यक्ति आपके उठाए सवालों का जबाव दे,आपने किसी को फेसबुक चैटिंग के जरिए मैसेज दिया,जरूरी नहीं है वह आपको तुरंत जबाव दे, धैर्य रखें और गुस्सा न करें।

--------------------------------------

फेसबुक ,चैटिंग आदि में अधीरता पागल कर सकती है, ब्लडप्रैशर बढ़ा सकती है। दुश्मनी भी पैदा कर सकती है। मिसअंडरस्टेंडिंग भी पैदा कर सकती है। फेसबुक रीयलटाइम मीडियम है यह धैर्य की मांग करता है। रीयलटाइम में अधीरता,गुस्सा आदि बेहद खतरनाक हैं, इससे उन्माद पैदा होता है। फेसबुक कम्युनिकेशन को सहजभाव से लें और अधीर न हों।इसमें आपका भला है और दूसरे का भी भला है।

---------------------------------------------------

फेसबुक पर यदि कोई व्यक्ति आपकी वॉल पर नापसंद बात लिख जाए तो उसे रहने दें। इससे यह पता चलता है कि आप अन्य को चाहते हैं,पसंद करते हैं।

---------------------------------------------

फेसबुक असल में कबीर की उक्ति का साकार अभिव्यक्ति रूप है। उनका मानना था "काल करै सो आज कर,आज करै सो अब।"यानी जो कुछ कहना अभी कहो।रीयलटाइम में कहो

-----------------------------------------

फेसबुक चूंकि कम्युनिकेशन है अतः वह रहेगा, इसके पहले के कम्युनिकेशन मीडियम भी रहेंगे, यह गलत धारणा है कि पूर्ववर्ती कम्युनिकेशन रूपों या माध्यमों का लोप हो जाएगा। पहले के माध्यमों की भी प्रासंगिकता रहेगी, उपयोगिता रहेगी और फेसबुक की भी। फेसबुक या अन्य रीयलटाइम माध्यम तो इस जगत को जानने में हमारी मदद कर रहे हैं।

----------------------------------------------

फेसबुक में कम्युनिकेशन महत्वपूर्ण है,अन्य चीजें जैसे वंश,जाति,धर्म,उम्र, हैसियत आदि गौण हैं। फेसबुक एक तरह से अभिव्यक्ति की अति तीव्रगति का खेल है। यहां आप मुस्कराते रहिए,लाइक करते रहिए, कोई आपको हाशिए पर नहीं डाल सकता।

--------------------------------------

वर्चुअल तकनीक में अन्य माध्यमों की तुलना में ऑब्शेसन का भाव ज्यादा है। ऑब्शेसन की यह खासियत है कि यह जल्दी अंतरंग जगत को खोल देता है। यही वजह है वर्चुअल माध्यमों के जरिए आदान-प्रदान ,संवाद, खुलेपन की अभिव्यक्ति जल्दी और सहज ढ़ंग से हो जाती है।

----------------------------------------------------

कलाओं में कलाकार का लगाव व्यक्त होता है। लेकिन फेसबुक लेखन में यूजर का कोई लगाव नहीं होता। यहां लोग व्यक्तिगत तौर पर आते हैं और जातें है। लाइक करते हैं,टिप्पणी करते हैं और निर्विकार अंजान भाव से चले जाते हैं। इस तरह का परायापन अन्य माध्यमो में नहीं देखा। फेसबुक पर लिखते समय शब्द और शरीर में अंतराल रहता है। कलासृजन में यह संभव नहीं है।

---------------------------------------------


फेसबुक यूजर का ऑब्शेसन अवसाद पैदा करता है और कलाकार का ऑब्शेसन कला की आत्मा से साक्षात कराता है।

मनुष्य अकेला प्राणी है जिसकी अभिव्यक्ति की इच्छाएं कभी शांत नहीं होतीं। वह इनको शांत करने के लिए नए नए उपाय और मीडियम खोजता रहता है। फेसबुक उस प्रक्रिया में उपजा एक मीडियम है ।पता नहीं कब जल्द ही नया मीडियम आ जाए और हम सब फेसबुक को छोड़कर वहां मिलें।

----------------------------------------------

सभी मानवीय उपकरण मानसिक सुख के लिए बने हैं । फेसबुक का भी यही हाल है इससे आप मानसिक सुख हासिल कर सकते हैं। फेसबुक वस्तुतः अभिव्यक्ति का फास्टफूड है।

----------------------------------------------------

फेसबुक लेखन अ-कलात्मक सपाटलेखन है। आप यहां कला के जितने भी प्रयोग करें संतोष नहीं मिलेगा। फेसबुक का मीडियम के रूप में कला से बैर है।कलात्मक अभिव्यक्ति के लिहाज से फेसबुक बाँझ है।

----------------------------------------------------

फेसबुक पर लिखते समय प्रत्येक यूजर यथाशक्ति कोशिश करता है बेहतरीन लिखे,लेकिन लिखने के बाद महसूस करता है अब अगली पोस्ट ज्यादा बेहतर लिखूँगा। लेकिन बेहतर पोस्ट कभी नहीं बन पाती।

फेसबुक असंतोष को हवा देता है। लोग संतोष के लिए यहां अभिव्यक्त करते हैं लेकिन असंतोष लेकर जाते हैं।


सोमवार, 3 सितंबर 2012

पश्चिम बंगाल में पूंजीनिवेश के मित्रतापूर्ण माहौल की तलाश में रतन टाटा


पश्चिम बंगाल में औद्योगिक पूंजी निवेश में सबसे बड़ी बाधा है नेताओं का पूंजीपति विरोधी राजनीतिक कठमुल्लापन । इस राजनीतिक कठमुल्लेपन को विभिन्न कम्युनिस्ट ग्रुपों और दलों ने विगत चार दशक में समय समय पर हवा दी फलतःराज्य में पूंजीनिवेश बंद हो गया। यहां पर वह नेता जनशत्रु माना जाता है जो औद्योगिक पूंजी निवेश की बातें करता है।

आमजनता की ग्राम्यचेतना के सबसे पिछड़े मूल्यों को बनाए रखकर औद्योगिकीकरण का विरोध करना यहां के नेताओं और सांस्कृतिक नायकों की विशेषता है। विगत वाम मोर्चा सरकारों से लेकर मौजूदा ममता सरकार के आने के बाद भी यह राजनीतिक कठमुल्लापन खत्म नहीं हुआ है।सच यह है कि जनता की पिछड़ी चेतना का दोहन करने और वोट जुटाने के लिए राजनीतिकदलों ,स्वयंसेवी संगठनों और मानवाधिकार संगठनों ने विभिन्न रूपों में राजनीतिक कठमुल्लेपन को हवा दी है।

राजनीतिक कठमुल्लापन स्थानीय मीडिया में भी व्यापक कवरेज और सम्मान प्राप्त करता रहा है।इसके कारण राज्य के बौने नेता अपने को महान नेता समझते हैं। जिन नेताओं ने कभी राज्य में एक भी पैसे का पूंजीनिवेश नहीं कराया वे जनहितकारी होने का दावा करते हैं.उनकी राजनीतिक भाषा में भय और संत्रास व्यक्त होता रहा है .वे अपने को राज्य का उन्नायक मानते हैं .और वे ही राज्य के सांस्कृतिक-राजनीतिक नायक-उपनायक भी हैं।

राज्य के तथाकथित सांस्कृतिक नायकों –उपनायकों की सामान्यभाषा में तथाकथित क्रांति या जनहित की भाषा में पूंजीविरोधी उन्माद को व्यापक अभिव्यक्ति मिली है और मीडिया ने उसका महिमामंडन किया है। यही वो प्रतिकूल परिवेश है जिसकी ओर प्रकारान्तर से प्रसिद्ध उद्योगपति रतन टाटा ने हाल ही में अपनी यात्रा के दौरान प्रकाश डाला। उल्लेखनीय है रतन टाटा विगत दिनों टाटा ग्लोबल व्रेबरीज या टाटा टी कंपनी के शेयरधारकों की आमसभा में बोल रहे थे। रतन टाटा के इस सभा में दिए गए बयान में बहुत गंभीर संकेत छिपे हैं जिनको राजनेताओं-सांस्कृतिककर्मियों को गंभीरता से पढ़ना चाहिए।

रतन टाटा का सीधा संदेश था कि पश्चिम बंगाल राजनीतिक कठमुल्लेपन से मुक्ति हासिल करे। इस संदेश ने ममता बनर्जी सहित सभी नेताओं को दुविधा में डाल दिया है।ममता बनर्जी और उनके सलाहकार समझ ही नहीं पा रहे हैं कि राज्य के औद्योगिक माहौल में आए गतिरोध को कैसे तोड़ा जाए।

आमतौर पर कोई भी बड़ा उद्योगपति जब कोलकाता आता है तो उससे सत्तारूढ़ दल के नेतागण मिलते हैं या वो उनसे मिलता है। पिछलीबार टाटा ग्रुप के नए चेयरमैन सायरस मिस्त्री कोलकाता आए थे तो राज्य के उद्योगमंत्री सहित कई आला अधिकारी उनसे मिले थे। लेकिन इसबार विलक्षण बात हुई कि रतन टाटा और सायरस मिस्त्री कोलकाता आए तो उनसे सत्तारूढ़ दल का कोई नेता मिलने नहीं गया। यह खुशी की बात है कि राज्यपाल ने उनके लिए निजी भोज दिया।

रतन टाटा के लिए इसबार की यात्रा बेहद महत्वपूर्ण रही। उनके संदेश ने राजनीतिक गलियारों में बेचैनी पैदा की है। टाटा टी कंपनी के शेयरधारकों की आमसभा को सम्बोधित करते हुए रतन टाटा ने जो कहा है वह राज्य के सत्तारूढ़दल के लिए एक तरह का खुला निमंत्रण है कि यदि टाटा ग्रुप का राज्य में पूंजी निवेश बढाना है तो सत्तारूढ़ दल को अपने राजनीतिक कठमुल्लेपन को त्यागना होगा।

रतन टाटा ने उम्मीद जतायी कि एकदिन यहां पर ऐसा राजनीतिक वातावरण जरूर पैदा होगा जिसमें पूंजीपति अपने लिए सुरक्षित महसूस करेंगे।जब तक राज्य में पूंजीपतियों के लिए मित्र वातावरण पैदा नहीं होता तब तक असुविधा बनी रहेगी। रतन टाटा ने अपने स्वभाव के अनुकूल भावुक होकर साफ शब्दों में कहा कि पश्चिम बंगाल से उनकी कंपनी भाग नहीं रही है, उनकी कंपनी यहां पर है और रहेगी।विभिन्न क्षेत्रों में टाटा ग्रुप का यहां पर करोड़ों रूपये का पूंजीनिवेश है और आगे इसमें इजाफा होगा।

जब एक शेयरहोल्डर ने राज्य में कार का कारखाना खोलने के बारे में सवाल किया तो रतनटाटा ने बड़ी मार्के की बात कही। टाटा ने कहा कि वे राज्य में कहीं पर भी कार का कारखाना लगाने को तैयार हैं उन्हें राज्य सरकार मित्रभाव से बुलाए। रतनटाटा का मित्रभाव की मांग करना और इस मित्रभाव का पश्चिम बंगाल में अभाव उनको बार बार परेशान करता रहा है। शेयरहोल्डरों की आमसभा में बोलते समय रतन टाटा अपने लिए जब मित्रभाव की मांग कर रहे थे तो वे प्रच्छन्न तरीके से राजनीतिक कठमुल्लेपन से लड़ने के लिए राज्य के नेताओं और संस्कृतिकर्मियों को साफ संदेश दे रहे थे कि वे पहले अपना रवैय्या ठीक करें.पूंजी और पूंजीपतिवर्ग के प्रति द्वेषभाव को त्यागें.

रतनटाटा ने कहा कि हमने यहां पर दुनिया का श्रेष्ठतम कैंसर अस्पताल खोला है।इस अस्पताल में वे सभी सुविधाएं हैं जो दुनिया के किसी भी बेहतरीन अस्पताल में होनी चाहिए। आमसभा में रतन टाटा ने कोलकाता के साथअपने निजी लगाव की बातें भी कहीं।उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल भारत का अभिन्न हिस्सा है और वे भी भारत का अभिन्न अंग हैं। इसीलिए उनकी कंपनियां यहां पर रहेंगी। एकदिन ऐसा भी आएगा जब उनकी कार कंपनी का राज्य में स्वागत किया जाएगा। रतनटाटा ने कहा कि सिंगूर की घटना से वे दुखी महसूस करते हैं।राज्य में उनकी कार कंपनी निवेश करे इसके लिए जरूरी है राज्य के सत्तारूढ़दल के नेता पहल करें और मित्रता का माहौल बनाएं। रतन टाटा ने कहा कि उनके मन में राज्य को लेकर न तो कोई पूर्वाग्रह है और न मतभेद हैं और नहीं इस राज्य को छोड़कर चले जाने की इच्छा है।

सोमवार, 27 अगस्त 2012

अवसरवादी राजनीति के जाल में फंसा बोडो का जातीय संकट

जातीय संघर्ष हो या साम्प्रदायिक दंगे  भारत के अधिकतर नेता जातीय समस्या को कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखते हैं। भारत में जातीय और साम्प्रदायिक दंगे जब भी होते हैं तो अवसरवादी राजनीति और प्रशासनिक निकम्मापन खुलकर सामने आ जाता है।बोडो इलाके में भी इनदिनों यही हो रहा है।राज्य प्रशासन इसे कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में ही देख रहा है ,जो गलत है।

विगत दो माह से बोडोलैंड के इलाके में तनाव है। बोडो समुदाय के अतिवादियों ने गैर बोडो समुदाय के लोगों पर सामूहिक हमले किए हैं। इन हमलों में 80 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। सैंकड़ों लोग घायल हुए हैं और पांच लाख स्थानीय बाशिंदे विस्थापित हुए हैं। हाल ही में बोडो हिंसाचार और विस्थापन के आरोप में बोडो पीपुल्स फ्रंट के विधायक प्रदीप कुमार ब्रह्मा को असम पुलिस ने गिरफ्तार किया है। ब्रह्मा की गिरफ्तारी के बाद इस इलाके में तनाव बढ़ गया है। गिरफ्तारी के तत्काल बाद ही उनके समर्थकों ने रेल यातायात ठप्प करके असम को बाकी देश से काट दिया और अंत में मजबूर होकर सेना को स्थिति संभालने के लिए कर्फ्यू लगाना पड़ा।

बोडो नेता प्रदीप कुमार ब्रह्मा के खिलाफ पुलिस थाने में अनेक केस दर्ज हैं और उनका दल कांग्रेस के साठ सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल है। विलक्षण बात यह है कि प्रदीप ब्रह्मा का बोडो पीपुल्स फ्रंट एक तरफ कांग्रेस सरकार के सत्तारूढ़ मोर्चे में शामिल है वहीं दूसरी ओर उसे भाजपा का भी समर्थन हासिल है। जिस समय दिसपुर के अधिकारियों ने प्रदीप ब्रह्मा को गिरफ्तार किया तो उनसे यही कहा गया कि वे बोडो पीपुल्स फ्रंट के लोगों के प्रति नरमी बरतें क्योंकि कांग्रेस को डर है कि उनकी राज्य सरकार बोडो विधायकों के समर्थन वापस ले लेने से गिर सकती है और यही वह बुनियादी वजह है कि बोडो अतिवादियों ने जब हमले आरंभ किए तो राज्य प्रशासन मूक दर्शक बना रहा और बोडो हिंसाचार की जांच का काम सीबीआई के हवाले कर दिया है। अब प्रदीप कुमार ब्रह्मा के खिलाफ जो केस दर्ज हैं उनको भी सीबीआई को सौंपने की तैयारियां चल रही हैं। सीबीआई के हवाले जातीय दंगों की जांच सौंपकर राज्य प्रशासन नेसाफ कर दिया है कि वह इन दंगों की जांच करने की स्थिति में नहीं है। उल्लेखनीय है प्रदीप ब्रह्मा के खिलाफ सात आपराधिक मामले कोकराझार के विभिन्न थानों में दर्ज कराए गए हैं जिनमें चश्मदीद गवाहों ने बयान तक दिए हैं। बोडो अतिवादियों के हिंसाचार और लाखों लोगों के पलायन को लेकर ज्योंही बोडो विधायक प्रदीप ब्रह्मा को गिरफ्तार किया गया भाजपा ने तत्काल उसकी गिरफ्तारी की निंदा की। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता तरुण विजय ने ब्रह्मा की गिरफ्तारी को लोकतंत्रविरोधी और बदले की कार्रवाई कहा। बोडो इलाके में 80 से ज्यादा निर्दोष लोगों की हत्या करने और पांचलाख से ज्यादा लोगों को शरणार्थी बनाने वाले राजनीतिक संगठन के नेता को भाजपा प्रवक्ता तरुण विजय ने राष्ट्रभक्त भारतीय नागरिक कहा है। भाजपा का मानना है कि प्रदीप ब्रह्मा राष्ट्रभक्त भारतीय है जो एक तरफ बंगलादेशी घुसपैठियों और दूसरी ओर पुलिस के दमनतंत्र का शिकार बना है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार प्रदीप कुमार ब्रह्मा को 22 अगस्त को कोकराझार जिले के फकीरग्राम और दोतमा पुलिस थाने में दरिज केस नं.27/2012U/S ,120(बी)/147/ 148/ 149/ 436/426/379/506 की धाराओं में दर्ज मामलों के संदर्भ में आधी रात को उनके घर से गिरफ्तार किया गया। कोकराझार के चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट सी.चतुर्वेदी के सामने 23अगस्त को जब ब्रह्मा की जमानत याचिका पेश की गई तो चीफ जुडीशियल मजिस्ट्रेट ने उसे खारिज करके ब्रह्मा को 14दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

दूसरी ओर ब्रह्मा के समर्थकों ने 4-5 घंटे तक असम के विभिन्न इलाकों का समूचा रेल यातायत ठप्प कर दिया , खासकर कोकराझार में जगह जगह प्रतिवाद किया और सड़कों और रेलमार्ग को ठप्प कर दिया। इससे असम का पूरे देश से संपर्क कटा रहा। विभिन्न स्थानों पर सभी ट्रेन 5-6 घंटे तक फंसी रहीं,बाद में ब्रह्मा के समर्थकों ने कोकराझार इलाके में अनिश्चितकालीन बंद की घोषणा कर दी।इस समय कोकराझार में एक तरफ कर्फ्यू है दूसरी ओर बोडो पीपुल्स फ्रंट का अनिश्चितकालीन बंद चल रहा है।

एक अन्य घटनाक्रम में विगत शुक्रवार को गोहाटी में प्रेस को सम्बोधित करते हुए दि नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन ने नार्थ ईस्ट के छात्रों और पेशेवर लोगों के देश के बाकी हिस्सों से हाल ही में हुए पलायन के खिलाफ आगामी 6सितम्बर को असम को छोड़कर समूचे नार्थ ईस्ट में एकदिन के बंद का आह्वान किया है। उल्लेखनीय है कि यह संगठन उत्तर-पूर्व के राज्यों में छात्रों का संयुक्त मंच है। इसमें विभिन्न राज्यों में सक्रिय छात्र संगठन शामिल हैं।इनमें अधिकांश अतिवादी राजनीति करने वाले संगठन हैं। इस संगठन ने मांग की है कोकराझार में हाल की हिंसा के शिकार विस्थापितों में सिर्फ उन्हीं विस्थापितों को शरणार्थी शिविरों में मदद दी जाए जो माइग्रेट करके भारत नहीं आए हैं। माइग्रेंट पीडितों को कोई मदद न की जाय। दूसरी ओर बोडो पीपुल्स फ्रंट के नेता और बोडो आदिवासी परिषद के अध्यक्ष हग्रामा मोहीलरी ने एक बयान जारी करके सारी स्थिति को और भी जटिल बना दिया है। उन्होंने मांग की है कि हाल के बोडो हिंसाचार के कारण विस्थापित लोगों में उन्हीं लोगों का पुनर्वास किया जाय जिनके नाम 1971 की मतदाता सूची में हैं और जो इसका प्रमाण दे सकें। जिनके पास प्रमाण नहीं है उनका पुनर्वास न किया जाय। यदि इसके बिना विस्थापितों का पुर्नवास किया जायगा तो बोडो आदिवासी परिषद इसका विरोध करेगी। मोहीलरी ने यह भी कहा कि असम में कांग्रेस-बोडो पीपुल्स फ्रंट का गठबंधन बना रहेगा।मोहीलरी ने मांग की है कि भारत-बंगलादेश सीमा को पूरी तरह सील किया जाय और जो वैध नागरिक हैं सिर्फ उनकी ही पुनर्वास व्यवस्था की जाय।

आगामी 26अगस्त को बोडो पीपुल्स फ्रंट का एक प्रतिनिधिमंडल केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से मिलने दिल्ली जा रहा है और उनको ज्ञापन देकर बोडो इलाके की ताजा स्थिति से अवगत कराएगा। अब सबकी निगाहें शिंदे और बोडो नेताओं की आगामी सप्ताह होने वाली मीटिंग पर लगी हैं। कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि बोडो इलाके में स्थिति सामान्य बनाने के लिए कोई बीच का रास्ता निकल आए और विस्थापितों को पुनःउनके घरों में ले जाकर बसा दिया जाय और बोडो नेताओं के आक्रोश को भी ठंड़ा कर दिया जाय।यही वजह है कि राज्य और केन्द्र के किसी भी बड़े कांग्रेसी नेता ने हाल की बोडो पीपुल्स फ्रंट की हिंसात्मक कार्रवाईयों की निंदा में एक शब्द तक नहीं कहा और भाजपा ने तो सीधे इस संगठन को समर्थन दिया है। ऐसी स्थिति में जल्द ही कोई समाधान निकलता नजर नहीं आ रहा।

सोमवार, 20 अगस्त 2012

फेसबुक और उत्तर-पूर्व के लोगों का पलायन


               
इंटरनेट पर अफवाह लिखने से सामाजिक तनाव पैदा नहीं होता ,सामाजिक तनाव और सामजिक विद्वेष तो पहले से मन में और समाज में मौजूद है इसको इंटरनेट, एसएमएस,वीडियो,एमएमएस की अफवाहों और बोडो जातीय हिंसाचार ने हवा दी है।
भारतीय जीवन में बैठी जातीय दुर्भावनाएं और जातीय घृणा उत्तर-पूर्व के लोगों के पलायन की जड है । मुसलमानों और उत्तर-पूर्व के लोगों के प्रति हमारे समाज में परायाभाव पहले से ही है।यह परायापन विभिन्न माध्यमों के जरिए पोषित होता रहा है। उसकी विस्फोटक अभिव्यक्ति है हाल का पलायन । अफवाहें पलायन का गौण कारण है मूल कारण है सामाजिक विभाजन, सामाजिक घृणा की विचारधाराओं का विभिन्न माध्यमों के जरिए हमारे बीच में किया जा रहा प्रचार। इसका सचेत रूप से प्रतिवाद किया जाना चाहिए।
हाल में अफवाह फैलाने में नेट पर सक्रिय 80बेवसाइट के कंटेंट को अपराधजनक पाया गया है और उनको ब्लॉक करने के आदेश दिए गए हैं। इस समूचे घटनाक्रम से भारत सरकार सबक ले और प्रत्येक बेवसाइट की छानबीन और निगरानी करे,यदि ऐसा नहीं करते तो दोबारा इंटरनेट का शरारती तत्व इस्तेमाल करने से बाज नहीं आएंगे। पीटीआई के अनुसार -
Government is learnt to have ordered blocking of 80 more Internet pages and user-accounts on Sunday on social networking sites including Facebook, Google and Twitter to avoid panic among people of northeastern region living across India.
All these sites were found hosting inflammatory and hateful content, spreading rumours and inciting violence targeting the people from north-east, government sources said.
Yesterday, the government had issued instructions to block 76 Internet sites, which included web-pages and some websites, and had said that bulk of the rumours that triggered panic among people of North-eastern states in Karnataka, Tamil Nadu and Maharashtra were sourced from Pakistan.
“We have found inflammatory and objectionable contents on some pages of Facebook and Google. Some user-accounts at Twitter were also found spreading similar contents. All together, around 80 such pages and accounts have been ordered to be blocked on Sunday,” the sources said.
The rumours about a possible attacks have led to mass exodus of people from northeast from many places including Bangalore, Chennai, Mumbai and Pune.
Home Minister Sushil Kumar Shinde on Sunday asked his Pakistani counterpart Rehman Malik to crackdown on elements based in that country that were using social media networking sites to whip up communal sentiments and spreading hate in India.
According to a report prepared by the Home Ministry, a Pakistan-based hardline group is suspected to have been involved in doctoring images and spreading them across social networking sites to create panic among people of northeastern region living across India.
   पाक के षड़यंत्रकारियों के द्वारा भेजे गए विभाजनकारी एसएमएस ,एमएमएस और नेट वीडियो के द्वारा पैदा हुए बबाल से डरकर संसद में और उसके बाहर अनेक लोग समूचे सोशल साइटस पर पाबंदी लगाने की मांग करने लगे हैं। यह मांग सही नहीं है। असल में ,इंटरनेट के 4 बड़े फायदे हैं,पहला, इसने सूचना का लोकतांत्रिकीकरण किया है। यह सस्ता और मुफ्त मीडियम है। दूसरा, इंटरनेट पर बार बार निजी और सार्वजनिक का भेद नष्ट होता है। तीसरा,यह सार्वजनिक स्तर पर व्यक्ति की इमेज को नए आयाम में ले जाकर खोलता है। चौथा ,यहां पर बिना चुने प्रतिनिधि हर समय मौजूद रहते हैं। इस तरह के लोगों की संप्रेषण क्षमता बहुत ज्यादा होती है। वे नेट पर कभी कभी प्रतीकपुरूष बन जाते हैं। जैसे अन्ना हजारे ।
 भारत में फे,बुक.यू-ट्यूब आदि नए माध्यम हैं और नेट पर षडयंत्रकारियों और अज्ञानिययों का तांता लगा है,ये लोग इस माध्यम के उपयोग-दुरूपयोग को लेकर विभ्रम और धूर्तता के शिकार है। षडयंत्रकारी  धूर्तता से काम ले रहे हैं।जबकि अज्ञानी लोग भोलेपन के मारे हैं। सच यह है कि  मुसलमानों के बर्मा में उत्पीड़न के फेक वीडियो  पाक से नेट पर भेजे गए और उसका हमारे मुसलमानों के मन पर बुरा असर पड़ा।मीडिया रिपोर्ट बताती हैं कि इस तरह के भडकाऊ वीडियो पाक स्थित आतंकी गिरोहों और आईएसआई की भारतीय उपमहाद्वीप में सामाजिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश का हिस्सा हैं। ये वीडियो नेट पर विगत एक माह  से चल रहे थे।सरकार ने कोई पहल नहीं कीष नेट सर्वर कंपनियों ने कोई पहल नहीं की,की। नेट सर्वर मालिकों ने भी भारत सरकार के दिशा निर्देशों का पालन नहीं किया।  आतंकियों ने अपने निर्मित वीडियो में  मुसलमानों के साथ भारत में हो रहे अत्याचारों के निजी वीडियो क्लिपिंग को भी शामिल कर लिया। यह वीडियो तकनीक का विभाजनकारी दुरूपयोग है ।
नई कम्युनिकेशन तकनीक कितनी विश्वसनीय और खतरनाक है कि लोग अपरिचितों के मैसेज पर भरोसा कर रहे हैं। भयाक्रांत हैं।अफवाहों से डरे हुए हैं।हर कम्युनिकेशन विश्वसनीय नहीं होता। कम्युनिकेशन पर सब समय विश्वास न करें। खासकर अपरिचित स्रोत से भेजा कम्युनिकेशन खतरनाक भी हो सकता है। वह आपकी खुशियां छीन सकता है।
    असम और म्यांमार की घटनाओं की फेक इमेजों के जरिए मुसलमानों के खिलाफ घृणा पैदा की गयी। कायदे से इस तरह की फेक इमेजों पर विश्वास न करें। फेसबुक आदि वर्चुअल कम्युनिकेशन में सक्रिय यूजरों से अपील है कि वे जिस व्यक्ति को नहीं जानते उसके संदेश पर विश्वास न करें। जिसे नहीं जानते उसके एसएमएस पर भरोसा न करें और न डरें। सामाजिक घृणा पैदा करने वाले मैसेज,फोटो आदि की तुरंत पुलिस को खबर करें या संबंधित नेटवर्क में शिकायत करें। अपरिचितों के संदेश जोड़ते कम हैं तोड़ते ज्यादा हैं। सावधान रहें,कम्युनिकेट करें और समाज को जोड़ें।
       भारत की अविकसित मानसिकता का संघ परिवार , नई संचार तकनीक ,कम्प्यूटर,इंटरनेट,सोशल साइटस आदि का भी संघ परिवार ,      फेसबुक पर संघ परिवार ने नियोजित ढ़ंग से विचारधारात्मक जहर फैला आरंभ कर दिया है। इस जहर के कुछ रूप हैं। मसलन् आप ज्योंही कोई धर्मनिरपेक्ष , बहुलतावादी ,साम्प्रदायिक सदभाव वाला विचार रखेंगे ये लोग आएंगे और समूची शक्ति के साथ इस्लाम विरोध और मुस्लिमविरोधी घृणा का प्रचार करने लगते हैं । तथ्यहीन और भडकाऊ बातें लिखते हैं। भाजपा-संघपरिवार के अलावा इनलोगों ने तमाम नेताओं के कैरीकेचर और चरित्रहनन वाले फोटो भी पेस्ट किए हैं। साम्यवाद विरोध और धर्मनिरपेक्ष विचारों का विरोध करना इनकी नियमित दिनचर्या है। इस तरह की चीजें भारत के राजनीतिक-सांस्कृतिक वातावरण में जहर घोल रही हैं।
असल में फेसबुक को उदारमंच बनाने के लिए मित्रों को सचेत प्रयास करना होगा। फेसबुक पर उदार विचारों और परिवर्तनकामी विचारों का स्वागत है और जो लोग संकीर्णतावाद,फंडामेंटलिज्म (सभी रंगत का),आतंकवाद और सामाजिक घृणा फैलाने वाले विचारों को लिख रहे हैं उन्हें ब्लॉक करें। हिन्दी में यह बीमारी नासूर की शक्ल अख्तियार करती जा रही है। उत्तर-पूर्वी जनजातियों के लोगों को असम के हिंसाचार को लेकर अफवाह और आतंक की खबरों से घबड़ाने , पूना और बंगलौर शहर छोड़ने की जरूरत नहीं है। इस संदर्भ में इन लोगों को अपने घरवालों को भी भरोसा देना चाहिए ,क्योंकि अफवाहों का बाजार असम और उसके बाहर खासकर महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ शहरों में गर्म है। अफवाह फैलाने वाले समाजभंजक लोग हैं और वे जल्द ही सामने आ जाएंगे कि वे कौन लोग हैं। कर्नाटक -महाराष्ट्र राज्य प्रशासन की यह जिम्मेदारी है कि वह पूना और बंगलौर में रहने वाले नार्थःईस्ट के लोगों में भरोसा पैदा करे। साथ ही संघ परिवार की भी यह जिम्मेदारी है कि वह असम की दुखद घटनाओं के आधार पर अफवाह और पूर्वाग्रहों का प्रचार करने से बाज आए और शांति बनाए रखने में मदद करे।

बोडो इलाके में उग्रवाद और अफवाह से लोकतंत्र घायल


                                
            भारत में अधिकांश राजनेताओं की मुश्किल यह है कि वे बयान देना जानते हैं लेकिन उसके सामाजिक प्रभाव को नहीं जानते। जबकि आतंकियों,उग्रवादियों और साम्प्रदायिक संगठनों के नेताओं को मालूम है कि बयान का क्या असर होता है और उसका किस तरह दुरूपयोग किया जाय। वे अपने बयान के अनुरूप सामाजिक स्थितियों को मोड़ना और सामाजिक अंतर्विरोधों का दुरूपयोग करना अच्छी तरह जानते हैं।इस मामले में मीडिया का भी वे प्रभावशाली ढ़ंग से दुरूपयोग करते हैं जिससे उनकी बातें सही,सटीक और स्वाभाविक लगें। हिंसा और आतंक वैध लगे। यही वजह है कि अशांति के समय राजनेता कमजोर और विभाजनकारी नेता ज्यादा असरदार दिखते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो बोडोलैंड इलाके में बोडो और गैर बोडो समुदायों के बीच हुए हिंसाचार के प्रसंग में उदार की तुलना में उग्रवादी और साम्प्रदायिक राजनीति आक्रामक है।
    असम के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई जब 6 जुलाई की हिंसा के बाद बोल रहे थे तो वे नहीं जानते थे कि उनके बयान का किस तरह बुरा असर होगा। 6 जुलाई2012 को कोकराझार में दो मुस्लिम नेताओं की बोड़ो उग्रवादियों ने हत्या कर दी। इस हत्याकांड को राज्य सरकार को गंभीरता से लेना था लेकिन मुख्यमंत्री तरूण गोगोई से इस हत्याकांड के बाद जब पूछा गया कि राज्य सरकार इस तरह की हिंसा से निबटने के लिए क्या उपाय उठाने जा रही है तो गोगोई ने कहा कि  “हिंसा को रोकने की मैं कोई गारंटी नहीं दे सकता”, उनके बयान ने जातीय घृणा में डूबे हिंसकों के मनोबल बढ़ा दिया।  बाद में 19जुलाई को दो और लोगों की हत्या हुई इसकी प्रतिक्रिया में बोडो उग्रवादियों के 4लोगों की हत्या कर दी गयी।
      आश्चर्य की बात है कि इस हत्याकांड के बाद भी सरकार चौकन्नी नहीं हुई और सोई रही। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि बोडो उग्रवादियों ने निर्दोष लोगों की बस्तियों और गांवों पर हमले बोल दिए और देखते ही देखते इन हमलों की जद में 400 गांव आ गए । हिंसा और आतंक के कारण इन गांवों से दो लाख से ज्यादा लोग पलायन करने के लिए मजबूर हुए । इनलोगों को  120 राहत शिविरों में रखा गया है। इन शिविरों के खर्चे के लिए केन्द्र सरकार ने 300 करोड़ रूपये की सहायता राशि भी घोषित की है। इससे शिविर चलाए जाएंगे, मारे गए लोगों और घायलों को क्षतिपूर्ति के रूप में मुआवजा दिया जाएगा। बोडो उग्रवादियों के हमलों से 80 से ज्यादा लोग मारे गए हैं और सैंकड़ों लोग घायल हुए हैं। प्रधानमंत्री,गृहमंत्री से लेकर सोनिया गांधी और मुख्यमंत्री ने इन कैम्पों का दौरा किया है।  कायदे से प्रभावित इलाकों में राज्य सरकार ,स्वयंसेवी संगठनों और मानवाधिकार संगठनों को हिंसाचार के तुरंत बाद सक्रियता दिखानी चाहिए थी लेकिन वे इन इलाकों में नहीं गए।  यह गंभीर चिन्ता का विषय है।
    इससे भी दुखद बात यह है कि संसद में भाजपा और देश में संघ परिवार ने इस हिंसाकांड को बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों की समस्या से बेवजह जोड़ दिया । ये संगठन तथ्य और सत्य दोनों पर परादा डाल रहे हैं। इससे हिंसक ताकतों को बल मिला है। ये ताकतें बोड़ो इलाके में जातीय विद्वेष और हिंसा का माहौल बनाए रखना चाहती हैं। तत्कालीन गृहमंत्री पी.चिदम्बरम् ने जब राहत शिविरों का मुआयना करके 31जुलाई को प्रेस कॉफ्रेंस में दावा किया कि असम में तुलनात्मक तौर शांति लौट आई है तो वे महज आशा जगाने की कोशिश कर रहे थे। सच यह था कि राहतशिविरों में दो लाख से ज्यादा शरणार्थी पलायन करके आ चुके थे और पहले के जातीय दंगों में पलायन करके आए लोग अभी भी राहतशिविरों में पड़े हुए हैं और उनको वापस घर भेजने में सरकार सफल नहीं हुई है। हाल में जो लोग राहतशिविरों में आए हैं वे कब अपने घर लौटेंगे कोई नहीं जानता। उल्लेखनीय है कि बोडोलैंड इलाके में बोडो जनजाति के लोगों का वर्चस्व है। लेकिन यह इलाका लंबे समय से संथाली,मुसलमान और बंगालियों की रिहायश भी रहा है। ब्रिटिश शासनकाल में बड़े पैमाने पर बिहार और पश्चिम के संथालियों को खेती आदि के कामों के लिए यहां लाकर अंग्रेजों ने बसाया था।
     उल्लेखनीय है कि बोडो इलाके को लेकर 10 फरवरी 2003 में बोडो आंदोलनकारियों के साथ राज्य और केन्द्र सरकार के बीच एक समझौता हुआ था । उस समझौते के तहत बोडोलैंड टेरीटोरियल कौंसिल का गठन किया गया। बोडो उग्रवादियों ने उसके पहले हथियारों का समर्पण किया था और वायदा किया था कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ देंगे। लेकिन वे इस वायदे को बार बार तोड़ते रहे हैं और गैर बोडो लोगों पर हमले करते रहे हैं।
     बोडोलैंड क्षेत्र परिषद में 4जिले हैं कोकराझार,बासका,उदलगोरी और चिराग। इसके अलावा इस इलाके के विकास के लिए केन्द्र सरकार ने 100 करोड़ रूपये भी जारी किए थे। उल्लेखनीय है जिस समय यह समझौता हुआ था उस समय केन्द्र में लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री थे और असम में तरूण गोगोई मुख्यमंत्री थे।  लेकिन बोडोलैंड परिषद के नेताओं ने इस इलाके में विकास पर ध्यान देने की बजाय पंगे वाले मसले पहले उठाए और उन्होंने गैर बोडो लोगों के स्वामित्व वाली जमीन-जायदाद के स्वामित्व को विवादों में डाल दिया। इस विवाद का वे अभी तक कोई मान्य हल नहीं निकाल पाए हैं। फलतःइस इलाके में सब समय तनाव रहता है। इसके कारण बोडो एक ओर हैं संथाली और मुस्लिम बंगाली दूसरी ओर हैं।
    यह जातीय ध्रुवीकरण इसलिए भी है कि इस इलाके में लंबे समय से गैर-बोडो बाशिंदों की संख्या इस इलाके में बोडो बाशिंदों से ज्यादा है। इसमें बंगलादेश से माइग्रेट करके आकर बसे लोगों की संख्या नगण्य है। बोडो इलाके में वे लोग संख्या में ज्यादा हैं जो ब्रिटिशशासन काल से यहां रह रहे हैं। संघ परिवार ने आक्रामक प्रचार अभियान के जरिए सभी माइग्रेट लोगों को बंगलादेशी माइग्रेट मुस्लिम की केटेगरी में डाल दिया है।   
     संघ परिवार मांग कर रहा है बोडो इलाके में रहने वाले सभी माइग्रेट लोगों को बाहर निकाला जाए और दुर्भाग्य से यही मांग बोडो उग्रवादी भी कर रहे हैं। इस तरह बोडो उग्रवादी और संघ परिवार दो भिन्न संगठन होते हुए भी एक ही जैसी मांग उठा रहे हैं,एक जैसी भाषा बोल रहे हैं,एक जैसी अफवाहें फैला रहे हैं, इससे बोडो क्षेत्र में तनाव बढ़ा है। सेना को इस इलाके में उतारने के बावजूद स्थिति सामान्य नहीं बन पायी है और हिंसा जारी है। दूसरी ओर असम के बाहर अफवाहों का बाजार गर्म है। पूना और बंगलौर में उत्तर-पूर्व के निवासियों पर अनेक स्थानों पर हमले हुए हैं। मुंबई और दूसरी जगहों पर मुस्लिम आतंकियों ने सभा के बहाने आम जनता और पुलिस पर हमले किए हैं जिनमें बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हुआ है और दो लोग मारे गए ।
    असम के जातीय तनाव को कम करने के लिए पहली शर्त है कि आतंकियों,अफवाह उड़ाने वालों और उत्तर-पूर्व बनाम भारत का विभाजन करके प्रचार करने वालों, बोडो बनाम गैर बोडो समुदाय के नाम पर वर्गीकरण करके प्रचार करने वालों से सरकार सख्ती से निबटे।
   कौन किस इलाके का पुराना बाशिंदा है कौन नया है, कौन मूल बाशिंदा है और कौन माईग्रेट करके आकर बसा है, इसके बारे में पहले से तयशुदा नियम कानून हैं और उन कानूनों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। हाल ही में कोकराझार और अन्य जिलों से हिंसा के कारण जिन लोगों ने घर छोड़ा है उन्हें पुनः उन इलाकों में बसाया जाय और प्रभावित इकाकों में सेना सख्ती से प्रशासन संभाले। जिन लोगों ने उत्तर-पूर्व के लोगों और अन्य लोगों में एसएमएस,फेसबुक ट्विटर आदि के जरिए अफवाहें फैलायी हैं उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाय।    



विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...