सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

सिनेमाभाषा के नायक हैं अमिताभ


अमूमन अभिताभ बच्चन की अभिनयकला पर कम उनके संवाद शैली पर ज्यादा बातें होती हैं। इसी तरह कंटेंट में एंग्री यंगमैन प्रमुख है। एंग्री यंगमैन से लेकर कौन बनेगा करोड़पति तक अमिताभ की साझा इमेज की धुरी है रीयल हिन्दी भाषा। एंग्री यंगमैन की इमेज को उन्होंने विगत 20 सालों में सचेत रूप से बदला है और कन्वेंशनल पात्रों की भूमिका निभायी है। कन्वेंशनल चरित्रों वे संरक्षक-अभिभावक के रूप में सामने आए।यह एंग्रीयंग मैन की बागी इमेज से एकदम उलट इमेज है। वहीं पर कौन बनेगा करोड़पति में उनका व्यक्तित्व इन दोनों से भिन्न नजर आता। इसमें अमिताभ बच्चन उदार मित्र के रूप में सामने आते हैं यह ऐसा उदार व्यक्ति है जिसके लिबरल विचारों और हाव-भाव को सहजता के साथ महसूस कर सकते हैं।एंग्री यंगमैन को पीड़ितजन,कन्वेंशनल को परंपरागत लोग और कौन बनेगा करोड़पति की इमेज को युवा और औरतें बेहद पसंद करते हैं।कौन बनेगा करोड़पति में वे एंग्रीमैन एवं कन्वेंशनल चरित्र की इमेजों से भिन्न नजर आते हैं। 

असल में इन तीनों में साझा तत्व है उनकी बेहतर संवादशैली और हिन्दी भाषा पर अद्भुत मास्टरी।हिन्दी भाषा और संवादशैली के बिना अमिताभ बच्चन की कोई निजी पहचान नहीं बनती। अमिताभ ने अन्य भारतीय भाषाओं में भी फिल्में की हैं लेकिन पहचान हिन्दी फिल्मों से बनी है।

अमिताभ को एक आइकॉन के रूप में देखेंगे तो वे इस क्रम में वे तीन काम करते हैं प्रथम, वे एक आइकॉन के रूप में अपनी इमेज बनाते हैं,इसमें वे अपने अभिनय के जरिए श्रोता-दर्शक से एकीकरण करते हैं ,उसकी अनुभूतियों को स्पर्श करते हैं। दर्शक जब उनको देखता है तो उसके दिमाग में पहले से उनकी इमेज रहती है। दूसरा काम वे यह करते हैं कि अपने को प्रतीक या साइन बनाते हैं।

अमिताभ बच्चन आज साख के प्रतीक हैं,भरोसे के प्रतीक हैं। इमेज बनाने के क्रम में अमिताभ ने अपने शरीर को सामान्य रखा है। शरीर का खास किस्म का गठन बनाने की कभी कोशिश नहीं की। इस क्रम में यथार्थ में जैसे दिखते हैं वैसा ही शरीर वे अभिनय में भी रखते हैं। अतः उनके एक्शन,भाव-भंगिमाएं और विचार बहुत ही आसानी से दर्शक को सम्प्रेषित हो जाते हैं ।  इस प्रक्रिया वे दर्शक के लिए प्रेरक बन जाते हैं। तीसरा, इस तरह की प्रस्तुति की आंतरिक विशेषता है कि अभिनय में जो चीजें नजर आती हैं उनका निषेध भी साथ ही साथ सम्प्रेषित होता जाता है। या यों कह् वे अपना विचारधारात्मक विलोम भी बनाते हैं।इसके कारण अभिनय सुंदर लगता है।फलतः अमिताभ तो अच्छा लगता है लेकिन चरित्र नहीं।

असल में दृश्यभाषा कोड रहित होती है। इटली के प्रमुख सिनेमा आलोचक पीर पाब्लो पासोलिनी का मानना है कि सिनेमा ,यथार्थ की भाषा पर निर्भर करता है।यह मनुष्य के एक्शन की भाषा है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो अमिताभ स्क्रीन पर जो भाषा बोलते हैं वह यथार्थ पात्र का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा है। यह भाषा सिनेमाकला के विभिन्न अंगों के जरिए व्यक्त होती है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो अमिताभ बच्चन ने अपने व्यक्तित्व में सिनेमा की भाषा को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है। सिनेमा की भाषा यथार्थ की भाषा होती है। इसमें भाषिक कोटियों की निर्णायक भूमिका होती है। वे सिनेमा में भाषा के नायक हैं।

फेसबुक और नवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के अनुत्तरित सवाल


नौवां विश्व हिन्दी सम्मेलन को समग्रता में देखें तो यह हिन्दी का 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला है। इससे हिन्दीसेवा कम हुई। नौकरशाही,कांग्रेस और संघ परिवार के कारिंदालेखकों -हिन्दीसैनिकों एवं सांसदों की मौजमस्ती ज्यादा हुई। 

कायदे से राजभाषा संसदीय समिति को इस सम्मेलन की गहराई में जाकर जांच करनी चाहिए और खोजी पत्रकारों को इस सम्मेलन की अंदरूनी अपव्यय गाथा को खोलना चाहिए।

हिन्दी के नाम पर यह अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है। औसतन प्रत्येक प्रतिभागी पर 3-5लाख रूपये का खर्चा आया है ।इसके आयोजन पर करोड़ों रूपये पानी की तरह बहाए गए हैं। वह भी एक ऐसे देश में जिसमें हिन्दी का व्यवहार कुछ हजारलोग करते हैं।

हिन्दी का यह 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला है।इस घोटाले में शामिल लोग बार बार और जल्दी जल्दी इस तरह के सम्मेलन(घोटाले) की मांग कर रहे हैं। साहित्य में प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में यह सांस्थानिक भ्रष्टाचार है। इसका नव्य आर्थिक उदारीकरण से गहरा संबंध है।

डीडी न्यूज पर अभी ( 7अक्टूबर 12) रिपोर्ट दिखाई गई उसमें विचार विमर्श के सत्रों और विभिन्न विद्वानों के विचारों की झलकियां तक दिखाना जरूरी नहीं समझा गया। सारा जोर नेताओं और गैर-अकादमिक पहलुओं को पेश करने पर था। डीडी न्यूज ने इतनी खराब रिपोर्ट पेश करके विश्व हिन्दी सम्मेलन के लेखकों की लेखकीय हैसियत का एक तरह से ज्ञान कराया है। कहां सोए हैं जोहानसवर्ग के हिन्दी सैनिक ? रीयलटाइम के युग में इतने दिन बाद रिपोर्ट का मतलब क्या है ?

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जोहानसवर्ग में हिन्दी के नाम पर जो कुछ हुआ उसमें नया कुछ नहीं है।हिन्दीवाले जैसे हैं वैसा ही उन्होंने वहां व्यवहार किया।सरकार जैसी है और जो व्यवहार यहां हिन्दी से करती है वही वहां पर किया।

इसके बावजूद हिन्दी सम्मेलन के नाम पर जिस तरह का अहंकार वहां से लौटे हिन्दीसैनिकों के चेहरे पर दिखा ,वह हिन्दी के लिए ही नहीं सरकार के लिए भी बुरी सूचना है। मनमोहन सरकार करोड़ों रूपये खर्च करके हिन्दी के श्रेष्ठ लेखकों और उनके श्रेष्ठ विचारों को सम्मेलन की ओर खींचने में असफल रही है।किसी भी सत्र में न तो कोई नया विचार पेश किया गया और न ही कोई नया शोधपत्र ही सामने आया।

क्या हिन्दी के प्रोफेसर कुछ इतिहास-विज्ञान आदि के भारत में हो रहे सम्मेलनों से कुछ सीखेंगे ? या फिर अपने उत्सवधर्मी हिन्दीसैनिक के बाने में ही सजे-धजे रहेंगे ? मजेदार बात यह है कि सम्मेलन में पढ़े गए आलेखों के चयन का भी कोई अकादमिक आधार नहीं था। जो जैसा लिखकर ले गए उनको वैसा ही पढ़वा दिया।इस तरह के गैर-अकादमिक सेमीनार और उनमें गैर-अकादमिक स्तरहीन आलेख पाठ सिर्फ हिन्दी में ही संभव हैं।

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हाल ही में जोहानसवर्ग में नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में अनेक हिन्दी प्रोफेसरों-पत्रकारों और लेखकों ने हिस्सा लिया था लेकिन अभी तक किसी भी जगह इंटरनेट,ब्लॉग.अखबार आदि में समग्रता में इस सम्मेलन पर किसी भी हिन्दी सैनिक ( सम्मेलन में शामिल लेखक) की कोई विस्तृत रिपोर्ट नहीं छपी है जिससे यह जान सकें कि आखिरकार कितने सारवान सत्र हुए और किसने क्या कहा। हिन्दी के नाम पर आए दिन अखबारों में छपने वाले तथाकथित हिन्दी प्रोफेसरनुमा समीक्षकों की भी लिखी कोई विस्तृत रिपोर्ट नजर से नहीं गुजरी है।

सम्मेलन में भाग लेकर लौटे हिन्दी सैनिकों के हिन्दीप्रेम का अंदाजा इससे भी लगा सकते हैं कि विदेश मंत्रालय, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान और केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की बेवसाइट भी इस संदर्भ में सुनी पड़ी हैं।

करोड़ों रूपये इस सम्मेलन पर खर्च करने के बावजूद भी इसके प्रामाणिक दस्तावेज,रिपोर्ट ,आलेख आदि के बारे में एक व्यापक रिपोर्ट का न होना हिन्दी के लिए क्या शुभ संकेत है ?

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जनसत्ता संपादक ओम थानवी ने फेसबुक पर लिखा-

पता चला है कि द. अफ़्रीका में हाल ही संपन्न विश्व हिंदी सम्मलेन में महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से बारह (12) लोग गए। इनमें कुलपति विभूतिनारायण राय के अलावा विश्वविद्यालय के प्रो-वीसी आदि विभिन्न ओहदेदार शामिल थे। मैंने कल अशोक वाजपेयी जी से पूछा कि आपके कार्यकाल में कितने लोग गए थे? जवाब मिला: "एक भी नहीं। यह विदेश मंत्रालय का आयोजन है। हिंदी के नाम पर पाखण्ड ऊपर से। हम

क्यों भेजें लोग, वह भी उनका अपना काम छुड़ा कर?" यह भी पता चला कि जोहानिसबर्ग में वर्धा विश्वविद्यालय के प्रो-वीसी (डॉ अरविंदाक्षन, जो अध्येता के रूप में जाने जाते हैं) को वर्धा से गए बाकी सहयोगियों के साथ महज़ चार पन्ने का सम्मलेन-बुलेटिन निकालने का काम सौंपा गया; पत्र-वाचन छोड़िए, उन्हें सम्मलेन के एक भी सत्र में शिरकत तक की मोहलत नहीं दी गयी! दिलचस्प बात यह है कि बुलेटिन का काम पहले के दोनों सम्मेलनों में (ठेके पर) अशोक चक्रधर करते थे!

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बंगला ,तमिल,मलयालम आदि में लेखकों एवं संस्कृतिकर्मियों के विश्व सम्मेलन गैर सरकारी खर्चे से होते हैं। इन भाषाओं के लेखक कभी केन्द्र या राज्य सरकार से आर्थिक मदद नहीं मांगते। लेकिन हिन्दी लेखक विश्व हिन्दी सम्मेलन करने के लिए सरकारी मदद के मोहताज हैं।

हिन्दी का यह दुर्भाग्य है कि हिन्दी को अपने सम्मेलन करने के लिए सरकारी मदद की जरूरत पड़ती है। सरकारी मदद से साहित्यसेवा नहीं हो सकती,बल्कि सरकार सेवा और मंत्रीभक्ति हो सकती है।

जोहांनसबर्ग में हिन्दी के वीरपुंगवों की हैसियत कैसी रही है इसका साक्षात प्रमाण है कि वहां पर सरकारी कांग्रेसी सांसदों और सरकारी लेखकों ने मंच घेरा हुआ था। कोई भी हिन्दी का वीरपुंगव लेखक अपने भाषण की यू-ट्यूब नेट पर नहीं दे पाया है। सरकार ने भी इसकी कार्यवाही को विस्तार के साथ ऑडियो-वीडियो रूप में इंटरनेट पर नहीं दिया है।आलेख लेखकों के लेख भी नजर नहीं आ रहे हैं। क्या आपको कोई सामग्री नेट पर नजर आई ?

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जोहांनसबर्ग में हिन्दी 9वें विश्व सम्मेलन के मौके पर 700 धुरंधर एकत्रित हुए थे, लेकिन रोचक बात यह है कि इस सम्मेलन में हरबार की तरह किसी भी मसले पर विचारोत्तेजक बहस नहीं हुई। उत्सवधर्मी ढ़ंग से सब कुछ सिलट गया।

अखबारों की रिपोर्ट बताती हैं कि सम्मेलन में भागलेने वाले अधिकांश प्रमुख वक्ता लोकल अनौपचारिक तकरीर करते रहे। आमतौर पर सम्मेलन वैचारिक विवादों को जन्म देते हैं,लेकिन विश्व हिन्दी सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह अब तक किसी भी साहित्यिक विवाद को जन्म नहीं दे पाया है।जबकि समय-समय पर सभी रंगत के नामी-गिरामी विद्वान इसमें शामिल हुए हैं। यह भी कह सकते हैं सरकारी तम्बू में विचारों की टकराहट के लिए कोई जगह नहीं होती।

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जोहांनसबर्ग में 9वां विश्व हिन्दी सम्मेलन समाप्त हो गया है एक औपचारिक प्रस्ताव पास करके कि हिन्दी को यूएनओ की भाषा बनाया जाय। सवाल यह है कि इस तरह का प्रस्ताव भारत की संसद से पास कराकर उस दिशा में सरकार को प्रयास करना चाहिए। हिन्दी सम्मेलन के बहाने हिन्दी की राजनीति और धंधेखोरी नहीं की जानी चाहिए। यदि सरकार गंभीर है तो वो यूएनओ को अनुरोध करे और तदनुरूप व्यवस्था करे। जहां तक हमें याद है यूएनओ के लोग एक मर्तबा रजामंदी भी व्यक्त कर चुके हैं उन्होंने यही कहा था कि उसके लिए सालाना 100करोड़ का खर्चा आएगा।भारत सरकार यह खर्चा करे तो यूएनओ में हिन्दी में भाषण की व्यवस्था भी हो जाएगी।

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हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को सरकारी भाषा बनाने का प्रस्ताव इस अर्थ में भी अंधभाषावादी एजेण्डा है क्योंकि इससे भाषा के कम्युनिकेशन विस्तार में कोई खास मदद नहीं मिलेगी।हमारे सभी दूतावास और संयुक्त राष्ट्र संघ के जेनेवा स्थित दूतावास में तो साल में एक-दो पत्र तक हिन्दी में नहीं लिखे जाते। यह राजनीतिक नाटक विशुद्ध रूप से भाषा की प्रतिक्रियावादी राजनीति का अभिन्न हिस्सा है।

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हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं के भारत में विश्वस्तरीय अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था न कर पाने वाली भारत सरकार और उसके संस्थानों और उनके साथ जुड़े तथाकथित हिन्दीसेवियों का पहला दायित्व यह है कि वे अपने देश में सभी भातीय भाषाओं के पठन-पाठन की विश्वस्तरीय व्वस्था का निर्माण करें। हिन्दी का उत्थान संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने से नहीं होगा।हिन्दी का उत्थान तो भारत में हिन्दी के पठन-पाठन का स्तर ऊँचा करके होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को कम्युनिकेशन की भाषा बनाने का नारा अंधभाषावाद है। सामान्यभाषा में कहें तो यह अपव्यय है।

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नौवां विश्व हिन्दी सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका में चल रहा है इसमें 700 हिन्दी विद्वान गए हैं इन विद्वानों से एक ही विनम्र अनुरोध है कि वे कम से कम अपने देश के शिक्षित युवाओं से यह पूछ लें कि क्या वे हिन्दी पढ़ना चाहते हैं?

भारत सरकार की भाषानीति का यह दुष्परिणाम है कि अधिकतर शिक्षित युवा हिन्दी पढ़ना नहीं चाहते। त्रासदी यह है कि जो विद्वान और भारत सरकार मिलकर अपने देश के युवाओं में भारतीय भाषाओं के प्रति प्रेम नहीं जगा पाए ,हिन्दी के पठन-पाठन के लिए अनुराग नहीं पैदा कर पाए वे हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने की मांग कर रहे हैं।

भारत में आज भी आधी से ज्यादा आबादी हिन्दी लिखना-पढ़ना नहीं जानती। ऐसे में हिन्दी सम्मेलन की आड़ में यह अंध हिन्दीभाषावाद है।

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नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की विदेश मंत्रालय द्वारा सम्मेलन के पहले की गयी प्रेस कांफ्रेस एक नमूना है कि भारत सरकार हिन्दी को अंग्रेजी के बाद स्थान देती है। प्रेस क़ॉफ्रेंस का आरंभ अंग्रेजी से हुआ।इस तरह से क्या हिन्दी विश्वभाषा बनेगी ?

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यह एक खुला सच है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन कांग्रेस और संघ परिवार की हिन्दीवादी राजनीति का खुला मिश्रित मंच है। यह नोट करने की बात है कि इसके संचालन में ये दोनों संगठन प्रतिस्पर्धा करते रहे हैं। दोनों ही संगठनों की हिन्दी के विकास में कम और हिन्दी की राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी रही है। आयोजन से लेकर इसमें भागलेने वाले विद्वानों के चयन या शिरकत तक में इस राजनीतिक ध्रुवीकरण की बड़ी भूमिका है। सवाल यह है कि हिन्दी के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को क्या इस तरह की प्रतिस्पर्धा से बचा सकते हैं ? क्या हिन्दी को केन्द्र सरकार के द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने से प्रचार-प्रसार का मौका मिलेगा। यदि ऐसा ही था तो केन्द्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में आज तक कोई नोट या सर्कुलर पहले हिन्दी में क्यों नहीं लिखा जाता। कायदे से पहले सर्कुलर हिन्दी में लिखा जाय बाद में अन्य भाषाओं में उसका अनुवाद हो।लेकिन हो उलटा रहा है। केन्द्र सरकार ने हिन्दी को अनुवाद की भाषा बना दिया है। भाषा का अनुवाद से विकास नहीं होता।यदि ऐसा ही था संस्कृत साहित्य और भाषा को तो सबसे समृद्ध होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ में भी वह अनुवाद की ही भाषा होगी।

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नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के मौके पर जो लोग यह मांग करने जा रहे हैं कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा बनाया जाय उनमें कांग्रेस के नेता बढ़त बनाए हुए हैं कांग्रेस के नेताओं से एक ही सवाल है कि कम से कम वे एक विदेशमंत्री,वित्तमंत्री और गृहमंत्री ऐसा चुनें जो नियमित संसद में हिन्दी में भाषण देना जानता हो। हमने तो अपने मौजूदा विदेशमंत्री को कभी हिन्दी में बोलते नहीं देखा है ऐसे में विदेश मंत्रालय और विश्व हिन्दी सम्मेलन की हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने की मांग प्रतिक्रियावादी और फासिस्ट मांग है। कांग्रेस के लोग इसके बहाने घटिया भाषा राजनीति खेल रहे हैं और इसे उदघाटित किया चाहिए।

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नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शामिल विद्वानों , कांग्रेस के नेताओं और हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने की मांग करने वालों से एक ही सवाल है कि उनके बच्चे किस माध्यम से और किन विषयों की शिक्षा प्राप्त रहे हैं? जहांतक मेरा अनुभव है अधिकांश के बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ते हैं।

कांग्रेसी नीतियों ने हिन्दी पढ़ने-पढ़ाने वालों के प्रति खासकिस्म की घृणादृष्टि को नव्य आर्थिक उदारीकरण के दौर में युवाओं में विकसित किया है। उनमें अत्याधुनिक माध्यमों के जरिए अंग्रेजीप्रेम पैदा किया गया । भारत में विगत 60सालों में दर्जनों भाषा और बोलियां मर गयी हैं और हमारे हिन्दी विद्वान हिन्दी के नाम पर केन्द्र सरकार की भाषाविरोधी नीतियों पर पर्दा डालने का काम कर रहे हैं।

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नौवें हिन्दी सम्मेलन में जो लोग अनुवाद के जरिए हिन्दी के विकास की बातें सोच रहे हैं। वे गलत सोच रहे हैं। मसलन् अंग्रेजी भाषा की रचनाएं हिन्दी में आएंगी तो इससे अंग्रेजी साहित्य का प्रचार-प्रसार होगा हिन्दी का नहीं।

सवाल यह है कि हिन्दी की रचनाओं और रचनाकारों की भारतीय भाषाओं से लेकर अंग्रेजी भाषा में कितनी किताबें हिन्दी के प्रकाशक छापते हैं या भारत के अंग्रेजी प्रकाशक छापते हैं ? वे साल में हिन्दी की कितनी किताबें हिन्दी से इतर भाषाओं में अनुवाद करके छाप रहे हैं। यदि इस नजरिए से देखें तो हिन्दी कहीं भी नजर नहीं आती।

जरा गौर करें अमेरिका-ब्रिटेन,फ्रांस आदि से अनुदित किताबों में विगत साठ साल में कितनी हिन्दी लेखकों की किताबें प्रकाशित हुई हैं ? इस नजरिए से विश्व हिन्दी सम्मेलन सत्य पर परदा डालने का काम कर रहा है। भाषा में असत्य प्रेम फासिज्म की कला है।

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भारत सरकार का विदेश मंत्रालय और उसके मातहत काम करने वाला संगठन आईसीसीआर जो विदेशों में शिक्षकों को पढ़ाने के लिए भेजता है। यह संगठन और इससे जुड़े विभिन्न देशों में कार्यरत दूतावास विदेशों में हिन्दी पढ़ाने वालों के प्रति दोयमदर्जे का घृणास्पद व्यवहार करते हैं।वे इन शिक्षकों को विदेशों में वे सुविधाएं तक नहीं देते जो सुविधाएं भारत में विभिन्न विश्वविद्यालयों में दी जाती हैं। ऐसी स्थिति में विदेश मंत्रालय का हिन्दी को विश्वभाषा बनाने का दावा विशुद्ध अंधभाषावाद है और भाषा के प्रति कांग्रेस सरकार के फासिस्ट नजरिए को ही व्यक्त करता है।

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नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के मौके पर मनमोहन सिंह की सरकार और उनके विदेश मंत्रालय का हिन्दी के प्रति विद्वेषपूर्ण रूख को देखने के लिए कुछ अर्सा पहले लिए गए एक फैसले का जिक्र करना ही काफी होगा। आईसीसीआर के तहत विदेशों में हिन्दी के 19प्रोफेसर पद थे । इनमें से 6 प्रोफेसर पद खत्म कर दिए गए हैं। उनकी जगह 6 स्कूल शिक्षक के पद बनाए गए हैं। मजेदार बात यह है कि हिन्दुस्तान में हिन्दी की राजनीति करने वाले मठाधीशों ने इस फैसले के खिलाफ एक शब्द तक नहीं बोला। कायदे से हिन्दी के प्रोफेसर पदों में इजाफा किया जाना चाहिए लेकिन मनमोहन सरकार के हिन्दी विद्वेष के कारण हुआ उलटा और 6 प्रोफेसर पद खत्म कर दिए गए। इस कटौती के खिलाफ विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने वाले 700 डेलीगेट से लेकर नामधारी आयोजकों ने एक शब्द आलोचना में नहीं बोला। कहने का अर्थ है कि कांग्रेस और उनका विदेश विभाग नियमित ढ़ंग से हिन्दी विरोधी फैसले ले रहा है और हम सब चुपचाप देख रहे हैं। आश्चर्य तो तब हुआ कि हिन्दी के समाचारपत्रों तक में इस कटौती की खबर नहीं छपी।

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जोहांनसबर्ग में हिन्दी का नौवां विश्व सम्मेलन हो रहा है। क्या दक्षिण अफ्रीका के लोकल अखबारों में कहीं आपने कवरेज देखा ?पता चले तो शेयर करें।भारत के हिन्दी के तकरीबन सभी बड़े अखबारों और अंग्रेजी के समाचारपत्रों में यह सम्मेलन गायब है। कमाल की कवरेज तैयारियां की हैं आयोजकों ने , वे यहां से हिन्दी और अन्य प्रमुखभाषाओं के संवाददाता ले गए हैं क्या ?

(फेसबुक पर लिखी टिप्पणियां)

रविवार, 30 सितंबर 2012

व्यापारियों से सीधे मुठभेड़ के मूड़ में ममता


पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अब विकास के सपने नहीं आते। उनका खुदरा व्यापार में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का विरोध उनकी नई मनोदशा की अभिव्यक्ति है। वे इन दिनों विकास की नहीं विकास के विरोध की भाषा बोल रही हैं। विकास के नाम पर जनता का असीम प्यार और समर्थन पाने के बाद ममता का विकास की बजाय बागी की भाषा में बोलना उस असंतुलन को व्यक्त करता है जो पश्चिम बंगाल में पहले से मौजूद है। लोकतंत्र में बागी और विकास में सीधे टकराव है। 

ममता की खूबी है कि उन्होंने वाममोर्चे की नाकामियों और जनविरोधी हरकतों का प्रतिवाद करते हुए बागी और विकास के बीच नकली संतुलन बनाकर जो विभ्रम पैदा किया था वह विगत पांच सालों में खूब चला। लेकिन अब यह विभ्रम टूट रहा है। सत्ता में आने के बाद बागी और विकास का नकली संतुलन टूटा है। राज्य के शासन पर बागी सवार हैं और विकास काफूर हो गया है।

ममता की मुश्किल यह है कि वे बागी के तानबाने में कैद हैं और बागी के नजरिए से राज्य प्रशासन को चलाना चाहती हैं। बागी के नजरिए से शासन चलाने का अर्थ है वस्तुगत प्रशासनिक प्रणाली का अभाव। बागी भाव से शासन चलाएंगे तो हमेशा दलतंत्र हावी रहेगा। पहले दलतंत्र की ममता आलोचना करती थीं लेकिन इन दिनों दलतंत्र की ओर जा रही हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब शासन में आई थीं तो उनसे उम्मीद थी कि वे जिस भाषा में विपक्ष में रहते हुए बोलती थीं उस भाषा और नजरिए को त्यागकर सुशासन की भाषा में बोलेंगी। लेकिन ममता ने अपनी भाषा और राजनीतिक तेवर नहीं बदले। ममता के बागी तेवर और उग्रभाषा उनकी कल तक सबसे बड़ी पूंजी थी लेकिन आज वही सबसे बड़ी बाधा है।

लोकतंत्र में अ-स्वाभाविक भाषा वह है जो अहर्निश अशांतमन और टकराव को व्यक्त करती है।इस तरह की भाषा का सामाजिक अवसाद से गहरा संबंध है। सामाजिक अवसाद बागी भाषा को सहज अभिव्यक्ति देता है। इसके विपरीत लोकतंत्र की स्वाभाविक भाषा वह है जिसमें सामंजस्य का भाव है और अन्य के लिए बराबर की जगह है। बागी की भाषा सामाजिक असमानता और सामाजिक अवसाद की अभिव्यक्ति है। इस तरह की भाषा असमानता को बनाए रखती है । इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भाषा और राजनीतिक तेवरों को पढ़ा जाना चाहिए।

विगत 26सितम्बर को ममता बनर्जी के दल ने राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया है कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का राज्य में निवेश स्वीकार्य नहीं है। यह ऐसा प्रस्ताव है जो राज्य के समूचे विकास को सीधे प्रभावित कर सकता है। मसलन् बड़ा बाजार का कोई व्यापारी यदि खुदरा व्यापार में 5000करोड़ रूपये का निवेश करना चाहेगा तो उसे निवेश की अनुमति नहीं होगी। यह तो सीधे व्यापारियों के व्यापार करने के अधिकार पर हमला है। केन्द्र और राज्य के व्यापार संबंधी कानूनों में कहीं पर भी यह प्रावधान नहीं है कि देशी व्यापारी खुदरा व्यापार के क्षेत्र में किस सीमा तक पूंजी निवेश करेगा। देशी व्यापारी जिस किसी भी क्षेत्र में यहां तक कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी पूंजी का निवेश कर सकता है। समूचे देश में मॉलकल्चर और बिग बाजार की संस्कृति जिस समय आई उस समय ममता के दल ने इसका विरोध नहीं किया था। लेकिन आज सत्ता में आने के बाद वे अचानक खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी पूंजी के प्रवेश का विरोध कर रही हैं। इस तरह का विरोध न्यायसंगत नहीं है और देश के मौजूदा व्यापार कानूनों का सीधे उल्लंघन है। ममता को यह पता है कि खुदरा व्यापार में मॉल कल्चर पुराने खुदरा व्यापार की अपडेटिंग है। लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यह अपडेटिंग पसंद नहीं है। उनका बड़ी पूंजी के खिलाफ गुस्सा इस बात का भी संकेत है कि वे देश की सामयिक वास्तविकता को ठीक से नहीं देख पा रही हैं। खुदरा व्यापार के खिलाफ ममता फिलहाल जो भाषा बोल रही हैं वही भाषा भाजपा और अतिवामपंथी भी बोल रहे हैं।

बागी भाषा अवसाद की भाषा है। राजनेता का अवसाद जब शासन में व्यक्त होता है तो सीधे टकराव की भाषा में व्यक्त होता है।पश्चिम बंगाल में लंबे समय से अवसाद का माहौल है और इस माहौल से कमोबेश सभी रंगत के नेता प्रभावित हैं। पश्चिम बंगाल में अवसाद का जिस तरह का वातावरण है वैसा वातावरण देश के अन्य राज्यों में नहीं है। अवसाद के माहौल को यहां मेले-ठेले और क्रांतिकारी लफ्फाजी के जरिए ढकने की आदत है। सामाजिक अवसाद से ध्यान हटाने के लिए व्यापारियों,पूंजीपतियों और अभिजन के खिलाफ में बोलना एक फैशन है। दिलचस्प बात यह है कि इस राज्य में अवसाद की भाषा बोलने वाले बहादुर और बागी कहलाते हैं। सच यह है कि अवसाद की भाषा कूपमंडूकों की भाषा है। एक ऐसे व्यक्ति की भाषा है जिसके पास कोई सपना नहीं है और जो निठल्ला है। ममता शासन को कायदे से इस बागी भाषा और निठल्लेपन से लड़ना चाहिए। राजनीति में बागी और निठल्ला भाव अंततः नीतिहीनता की ओर ले जाता है ,इस नीतिहीनता का एक और नमूना है हाल ही में राज्य के पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय कानून 2011 में उपकुलपति की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति के चरित्र में किया गया बदलाव। सारे देश में उपकुलपति चयन समिति में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का प्रतिनिधि रहता है लेकिन पश्चिम बंगाल में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रतिनिधि को चयन समिति से निकालकर उसकी जगह राज्य सरकार के प्रतिनिधि को रखा गया है जो कि गलत है। कायदे से राज्यपाल को इस संशोधन बिल को अपनी स्वीकृति नहीं देनी चाहिए,यह देश के अकादमिक नियमों का सीधे उल्लंघन है। इसी तरह ममता सरकार की दिशाहीन नीतियों का ही दुष्परिणाम है कि दानकुनी स्थित सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बालमर लॉरी एंड कंपनी ने अपने ढ़ाई हजार करोड़ रूपये के प्रकल्प को बंद करने का फैसला किया है क्योंकि इस कंपनी को इस इलाके में जगह नहीं मिल रही है और ममता सरकार ने किसानों से जमीन खरीदने से मना कर दिया है। ममता सरकार की अराजक और दिशाहीन नीतियों के कारण हाल में सिंगूर से टाटा मोटर को भागना पड़ा। ममता के शासन में आने के बाद लॉर्सन एंड टुब्रो कंपनी ने 2012 में अपने बिजली प्रकल्प को बंद कर दिया।इसी साल श्याम स्टील ने अपना पुरूलिया स्थित स्टील प्रकल्प बंद करने का फैसला लिया है।बागी भाषा और नीतिहीनता के ये कुछ नमूने हैं। असल में पश्चिम बंगाल के लिए यह त्रासद समय है ,यहां लगातार विकास से जुड़े प्रकल्प बंद हो रहे हैं।






मंगलवार, 25 सितंबर 2012

राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण ममता अकेली पड़ी

    ममता बनर्जी और सोनिया गांधी में कल तक मित्रता थी इनदिनों दोनों नेत्रियों में छत्तीस का आंकड़ा है। ममता की राजनीतिक अदूरदर्शिता को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कल तक ममता बनर्जी पापुलिज्म की बेताज बादशाह थीं लेकिन आज वे संकट में हैं। राज्य में मुख्यमंत्री बनने के एक साल के अंदर उन्होंने सबसे पहले प्रणव मुखर्जी का विश्वास खोया,हाल में मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी का साथ खोया और जल्द ही उनको कांग्रेस का राज्य में साथ भी खोना पडेगा ।इसके अलावा देश-विदेश के उद्योगपतियों की नजरों में ममता बनर्जी की साख गिरी है। ममता यह मानकर चल रही थी कि वे जल्द ही तिकड़मों के जरिए भारत की राजनीति में बड़ा स्थान बना लेंगी। लेकिन अब यह सपना पूरा होता नजर नहीं आ रहा। मनमोहन सरकार से समर्थन वापसी के बाद ममता और भी अकेली हो गयी हैं।

पिछले सप्ताह कोलकाता के टाउनहॉल में टीएमसी सांसदों-विधायकों और मंत्रियों की बैठक में एक दर्जन सांसदों ने भरी सभा में साफ कहा कि मनमोहन सरकार से समर्थन वापस नहीं लेना चाहिए। इस पर ममता बनर्जी ने कहा कि समर्थन वापस लेते ही केन्द्र सरकार गिर जाएगी और उनको भरोसा है कि समाजवादी पार्टी उनका साथ देगी। लेकिन दिल्ली में घटनाक्रम जिस गति से चला उसने ममता बनर्जी को अदूरदर्शी नेता साबित किया है। जिन एक दर्जन टीएमसी सांसदों ने मनमोहन सरकार को समर्थन जारी रखने की मांग की थी उनका कहना था कि केन्द्र सरकार की मदद से चलने वाले सभी प्रकल्प इस फैसले से प्रभावित होंगे।साथ ही हर महिने रिजर्व बैंक से जो ओवरड्राफ्ट राज्य सरकार ले रही है उस पर भी असर पड़ सकता है।

दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के जिन मंत्रियों ने मनमोहन सिंह सरकार से इस्तीफा दिया है वे निजी तौर पर शांति महसूस कर रहे है। टीएमसी के एक पूर्व केन्द्रीयमंत्री का कहना था हमलोग जब से दिल्ली मंत्रीमंडल में शामिल हुए हैं हमारे ऊपर ममता दीदी की सख्त निगरानी थी और सभी मंत्रियों को ज्यादातर समय दिल्ली की बजाय कोलकाता में रहने का निर्देश था इसके कारण सभी मंत्री तनाव में रहते थे। मंत्रीमंडल से इस्तीफा देने वाले एक दूसरे मंत्री ने कहा कम से कम अब दिल्ली के बेगानेपन से वे बच गए हैं।सभी पूर्व मंत्रियों को उस समय असुविधा हुई जब वे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को समर्थन वापसी का पत्र देने पहुँचे। वे राष्ट्रपति के सामने निरुत्तर खड़े थे। तकरीबन यही स्थिति प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलते समय भी थी।

सवाल यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसबार ममता बनर्जी से एकबार भी बात क्यों नहीं की ? पिछले सप्ताह जिस तरह तेजी से घटनाक्रम चला है उसमें ममता बनर्जी ने एकबार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से फोन पर बात की थी और ममता को उम्मीद थी कि सोनिया गांधी उनको मनाने की कोशिश करेंगी,लेकिन ममता को सोनिया गांधी की बातें सुनकर तेज झटका लगा। सोनिया गांधी के करीबी सूत्र बताते हैं कि सोनिया गांधी ने ममता से साफ कहा कि सरकार में निकम्मेपन को अब बर्दाश्त करना संभव नहीं है। टीएमसी के मंत्री दिल्ली के मंत्रालय ऑफिसों में आते ही नहीं हैं और इसे अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। तीन साल हो गए टीएमसी के अधिकांश मंत्रियों को दिल्ली में मंत्रालय के ऑफिस आने की फुर्सत नहीं है ,इससे अच्छा है आपके मंत्री इस्तीफा दे दें। कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि ममता बनर्जी ने अपने मंत्रियों को आरंभ से ही यह निर्देश दे रखा था कि दिल्ली में कम रहो कोलकाता या अपने चुनावक्षेत्र में ज्यादा रहो।सोनिया गांधी ने ममता को दो-टूक शब्दों में यह भी कहा बताते हैं कि केन्द्र सरकार के फैसले बदले नहीं जाएंगे और टीएमसी की अड़ंगेबाजी से सरकार की साख में बट्टा लगा है। सूत्रों का कहना है कि ममता बनर्जी को सोनिया गांधी के इस सख्त रवैय्ये से कड़ा झटका लगा है।

उल्लेखनीय है कि ममता बनर्जी यह दावा करती थीं कि वे जो चाहेंगी सोनिया गांधी से मनवा लेंगी। लेकिन विगत एकसाल में जब से उनकी प्रणव मुखर्जी से अनबन हुई और बातचीत बंद हुई तब से कांग्रेस के सभी केन्द्रीय नेताओं को कही कहा गया कि ममता से दूर रहो ।इस समूची प्रक्रिया में यूपीए-2 सरकार की जड़ता टूटी है और नए किस्म के राजनीतिक समीकरण की संभावनाएं पैदा हुई हैं। ममता का राजनीतिक कद छोटा करने में प्रणव मुखर्जी के फार्मूले पर ही अंततःमनमोहन सरकार को आना पड़ा और अर्थव्यवस्था के बारे में कठोर फैसले लेने पड़े हैं। उल्लेखनीय है दिल्ली में टीएमसी के समर्थन वापसी की स्थितियों से निबटने की सारी तैयारियां मनमोहन सरकार के फैसला लेने के पहले ही कर ली गयी थीं।

कांग्रेस आलाकमान का मानना है कि ममता ने समर्थन वापसी की घोषणा करके असल में भाजपा और एनडीए के हितों को साधने की कोशिश की है। भाजपा के सुर में सुर मिलाते हुए ममता ने विगत सप्ताह प्रेस कॉफ्रेंस में कांग्रेस के खिलाफ जिस भाषा का इस्तेमाल किया वह भाजपा की भाषा है।ममता की प्रेस कॉफ्रेस के तत्काल बाद भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता रविशंकर ने सही कहा कि हमें खुशी है कि ममता अब वही कह रही हैं जो अब तक भाजपा बोलती आई है।

ममता बनर्जी केद्वारा कांग्रेस के साथ समझौता तोड़ने का कई मोर्चों पर असर होगा। पहला असर यह होगा कि मनमोहन सरकार बिना किसी अडंगेबाजी के नीतिगत फैसले ले पाएगी। इसके अलावा पश्चिम बंगाल में आने वाले पंचायत चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस आमने-सामने होंगे और इससे वामदलों को लाभ मिल सकता है।




रविवार, 23 सितंबर 2012

अस्मिता ,वर्चस्व और अमेरिकी जेल व्यवस्था

अमेरिका ने अपने देश में इस तरह की संस्कृति निर्मित की है जिसमें पुलिस और न्याय की हिंसा सामान्य और वैध लगती है। जिस तरह हमारे देश में आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज करना आमलोगों को वैध लगता है वैसे ही अमेरिकी समाज में भी पुलिस की हिंसा और आतंक को मीडिया प्रचार ने वैध बनाया है। सामान्य नागरिकों पर की गई पुलिस हिंसा को आजकल अमेरिका में लोग नॉर्मल एक्ट की तरह लेते हैं। एक जमाना था कि साधारण सी पुलिस कार्रवाई पर सारा देश हुंकार भर उठता था लेकिन लेकिन इन दिनों ऐसा कुछ भी नहीं होता।

आमलोगों में पुलिस के खिलाफ प्रतिवाद की भावना के लोप में मीडिया के रीगनयुगीन मॉडल की केन्द्रीय भूमिका है।यह प्रचार किया गया कि जो पुलिस के खिलाफ प्रचार या प्रतिवाद करते हैं वे क्रिमिनल हैं। यह भावना पैदा की गयी है कि पुलिस के खिलाफ वे ही लोग ज्यादा हल्ला मचाते हैं जो गलत धंधा करते हैं। ये ही लोग कानून तोड़ते हैं, नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं , गुण्डागर्दी करते हैं या हिंसा करते हैं ,आदि।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी मीडिया सिद्धांतकार बौद्रिलार्द के अनुसार रीगनयुगीन अमेरिकी परिप्रेक्ष्य में सीनिरियो या परिदृश्य महत्वपूर्ण है। अब सब कुछ सीनिरियो के कमिटमेंट और प्रस्तुति पर निर्भर है। अपराध हुआ है फोटो दिखाओ,कैमरे में कैद करो,टीवी पर प्रसारित करो। किसी व्यक्ति का गिरफ्तार होना और फिर उसका टीवी फोटो या सीन में प्रसारण ही महत्वपूर्ण मान लिया गया है। सीनिरियो के लिए कमिटमेंट असल में रीगन युग में जन्म लेता है। रीगन स्वयं फिल्म अभिनेता थे और कैलीफोर्निया के थे। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद मीडिया में मूलगामी परिवर्तन यह आया कि सीनिरियो की प्रस्तुति महत्वपूर्ण मान ली गयी। खासकर विज्ञापन से लेकर टीवी तक सीनिरियो का महत्व बढ़ गया। विज्ञापन और टीवी दृश्यों के जरिए ही इमेजों के निर्माण,विध्वंस ,नियंत्रण और मेनीपुलेशन की पूरी दुनिया में बाढ़ आ गयी।

रीगन ने अपनी फिल्मी इमेज को अमेरिका की फिल्मी इमेज के निर्माण में सफलता के साथ इस्तेमाल किया। सामान्य जिंदगी जीने के लिए ब्लैकमेलिंग का मूलभूत गुण के रूप में इस्तेमाल किया। मीडिया प्रस्तुतियों में कहा गया सामान्य जिंदगी जीना चाहते हो तो ब्लैकमेलिंग करो। सहजजीना चाहते हो तो व्यक्तिगत हितों को तरजीह दो सामाजिक हितों की उपेक्षा करो।

अमेरिका आज जिस संकट में घिरा है उसका समाधान तब तक संभव नहीं लगता तब वह सामूहिक समाधान की धारणा को महत्ता नहीं देता। रीगनशासन ने इमेज को महान बनाया। कमाते हो तो अच्छे हो,इसमें यह महत्वहीन हो गया कि कैसे कमाते हो। अब प्रिफॉर्मेस पर जोर था। विज्ञापन ने लुक को महत्ता दी। इमेज प्रचारित रहे, चाहे जो करो। लुक के आधार निजी और सामाजिक बीमारियों को भी छिपा लिया गया। रीगन को कैंसर था लेकिन कैंसर जैसी बीमारी को भी लुक की ओट में छिपा लिया गया। यानी नई रणनीति में बीमारी भी लुक का हिस्सा बना दी गयी।

अब राजनीतिक खामियां या व्वस्था की खामियां या बेबकूफियां महत्वहीन हो गयीं, महत्वपूर्ण थी तो बस अमेरिका की इमेज। सुंदर,चमकीले,साफ-सुथरे,न्यायप्रिय,बहुलतावादी अमेरिका की इमेज की अहर्निश वर्षा ने अमेरिकी समाज के स्याह इलाकों को सामने आने ही नहीं दिया। इन स्याह इलाकों में से एक है अमेरिकी जेलप्रणाली।

अमेरिका की रीगनयुग से मीडिया में जिस तरह की इमेज वर्षा होती रही है उसके आधार पर अमेरिकी समाज और उसके तानेबाने को समझना मुश्किल है। मीडिया निर्मित इमेजों के आधार पर अमेरिका के राजनीतिक सत्य को नहीं जान सकते। यही हाल इन दिनों भारत का है। हमारी समस्त सरकारें खास किस्म के स्थायी शासन का भरोसा देती रही हैं। राजनीतिक स्थायित्व के ऊपर जोर देने के कारण भूलों, भ्रष्टाचार और असफलताओं को सरकार के लिए विध्वंसक नहीं माना जाता। अब भूलों और गलतनीतियों के कारण सरकारों का पतन नहीं होता। अब नेताओं पर जनता गर्व नहीं करती और नेता भी अपने फैसलों पर गर्व नहीं करते। यह वह परिदृश्य है जिसे रीगनयुग ने निर्मित किया और इस पैराडाइम में हम अभी भी जी रहे हैं।

अमेरिकी समाज में पुलिस और न्यायपालिका के खिलाफ नागरिकों के प्रतिवाद को मीडिया से एकदम धो-पोंछकर साफ कर दिया गया है। नई सूचना तकनीक के रूप में इंटरनेट और मोबाइल के आने के बाद से समूचे समाज की नजरदारी बढ़ा दी गयी है। अमेरिकी शासक जितना अपने देश के बाहर आतंकित और असुरक्षित हैं अपने देश में भी उतने ही आतंकित और असुरक्षित हैं। बाहर वे सीधे सेना,सूचना और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और बहुराष्ट्रीय निगमों के जरिए हमला करते हैं देश में पुलिस नजरदारी और गिरफ्तारी के जरिए नागरिक अधिकारों पर हमले करते हैं।

अमेरिकी समाज में कारपोरेट घरानों की लूट और मनमानी के खिलाफ प्रतिवाद संभव नहीं है साथ ही पुलिस हिंसाचार और अत्याचार के विरोध में भी प्रतिवाद करना संभव नहीं है।आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में जेलबंदियों में आधे के करीब लोग नशीले पदार्थो की तस्करी या अवैध सेवन संबंधी मामलों में गिरफ्तार किए गए हैं। " नेशनल ड्रग कंट्रोल पॉलिसी" संगठन के द्वारा जारी सन् 2009 की रिपोर्ट में अमेरिका के 10 महानगरों में किए गए एक सर्वे में कहा गया है कि इन शहरों में गिरफ्तार किए गए 87 फीसदी लोग अवैध नशीले पदार्थों के सेवन के शिकार पाए गए हैं। तरूणों में वैध नशीली दवाओं का प्रयोग अच्छी-खासी मात्रा में होता है।

सवाल यह उठता है कि अमेरिकी समाज में अवैध नशीले पदार्थों के सेवन का इतना व्यापक सामाजिक आधार क्यों और कैसे बना ? असल में ,शीतयुद्धीय राजनीति के तहत रीगन प्रशासन ने ड्रगवार के नाम से जो नीति अख्तियार की उसने अमेरिका के बाहर और अंदर आमलोगों को नशीले पदार्थों की लत का शिकार बनाया और यह काम बड़े सुनियोजित ढ़ंग से किया गया। ड्रगवार से लैटिन अमेरिका के साथ अमेरिका के अंदर का युवावर्ग भी बड़ी संख्या में प्रभावित हुआ।

ड्रगवार के कारण नशे की लत और अपराधकर्म में तेजी से इजाफा। विदेशों में ड्रगवार को माफिया गिरोहों, भाड़े के सैनिकों और अमेरिकी सैन्यहितों के विस्तार के साथ लागू किया गया और देश के अंदर युवाओं में नशे की लत,पॉपकल्चर,पॉप म्यूजिक और अपराधकर्म का त्रिकोणीय फार्मूला लागू किया गया इसके नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पुलिस प्रणाली और जेल व्यवस्था का विस्तार किया गया। जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को जेलों में बंद रखकर जहां एक ओर गुलामी को बढ़ावा दिया गया वहीं दूसरी ओर ड्रगवार के जरिए जन नियंत्रण के लक्ष्य को भी हासिल किया गया। नॉम चोम्स्की ने “डिटरिंग डेमोक्रेसी” नामक किताब में लिखा है कि नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों के कारण संगठित अपराधकर्म को बढ़ावा मिला। यह माना जाता है कि अमेरिका की करव्यवस्था में आधे से ज्यादा कर तो ड्र्ग ट्रेड से ही आता है। नशीले पदार्थ वैध बिकें या अवैध बिकें वे असल में नशीले पदार्थ ही हैं। उल्लेखनीय है अमेरिका में तम्बाकू वैध है , मरिजुआना वैध नहीं है।क्योंकि मरिजुआना को कहीं पर भी पैदा किया जा सकता है। मरिजुआना की बिक्री करना मुश्किल है। जबकि तम्बाकू के साथ ऐसा नहीं है। यही वजह है अमेरिका की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी मरीजुआना पीती है.इधर के तीन दशकों में अमेरिकी युवाओं में मरिजुआना को छोड़कर अन्य ज्यादा नशीले पदार्थों के सेवन की ओर उन्मुख हुए हैं। इसके कारण समाज में अनेक किस्म की गंभीर बीमारियां भी फैली हैं। तम्बाकू और शराब के सेवन से मरने वाले युवाओं की संख्या का अनुपात जेलों में बंद कैदियों की संख्या से भी ज्यादा है। नशेड़ियों को सजा और जुर्माने के जरिए भी प्रशासन को बड़ी मात्रा में धन मिलता है।

चोम्स्की ने लिखा है कि सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिकी विश्व नीति में तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ हिंसाचार और जोर-जबर्दस्ती प्रभुत्व में लेने का मनोभाव व्यक्त हुआ है। घरेलू स्तर पर आम जनता को विभिन्न तरीकों से नियंत्रण में रखने और धमकाने के साथ तुरंत गिरफ्तार करके सजा दिलाने के मैथड का जमकर दुरूपयोग किया गया है।

बंदीजनों को अमेरिकी समाज में सामान्य नागरिक से भिन्न नजर से देखा जाता है। सामान्य नागरिक को अमेरिकी प्रशासन ने “हम” और बंदीजन को “तुम” की कोटि में रखकर विभाजित किया है। इसमें “हम” के पास नागरिक अधिकार हैं,”तुम” के पास नागरिक अधिकार नहीं हैं। “तुम” केटेगरी के लोगों को नियंत्रण में रखने लिए अमेरिका के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा कानून-व्यवस्था के ढाँचे पर खर्च होता है। यही स्थिति अमेरिका के बाहर है अमेरिका ने पाकिस्तान इराक,अफगानिस्तान, लीबिया आदि में विकास पर कम और सैन्य साजो -सामान खरीदने के लिए सहायता ज्यादा दी है।

अमेरिका ने ड्रगवार के बहाने देश के बाहर पराए मुल्कों यानी लैटिन अमेरिकी देशों की जनता की सेना से ठुकाई की, देश की जनता की पुलिस से ठुकाई करायी। देश के बाहर प्रतिक्रांतिकारी ताकतों को संगठित किया और देश में माफिया गिरोहों को संगठित किया।

कैदी नागरिक होता है। कैदी को अ-नागरिक मानकर किया गया बर्ताब सीधे मानवाधिकार का उल्लंघन है। अमेरिकी समाज में किसी भी अपराध में सजा पाए व्यक्ति को मतदान देने के नागरिक अधिकार से वंचित कर दिया जाता है और इस कारण लाखों अमेरिकी बाशिंदे नागरिक अधिकारों से वंचित हैं और दोयमदर्जे के नागरिक की हैसियत से जी रहे हैं। कोई व्यक्ति अपराध करने के कारण जब नागरिक अधिकार से वंचित किया जाता है तो यह उसके लिए दोहरी सजा है और यह सजा फांसी की सजा से भी बदतर है। नागरिक अधिकारों को किसी बहाने नहीं छीना जा सकता। इस समूचे पहलू को अस्मिता और मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में समझें तो बेहतर ढ़ंग से देख पाएंगे।

मैं क्या हूँ यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि मैं समाज में जिंदा हूँ और एक मनुष्य के रूप में जब मेरी उपस्थिति है तो यह मेरी मनुष्य के रूप में उपस्थिति है और मनुष्य के अलावा जितनी भी अस्मिताएं या पहचान के रूप है वे अप्रासंगिक हैं। व्यक्ति की पहचान को स्थान के आधार पर तय करना ठीक नहीं है। मैं घर पर रहूँ या जेल में। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।इससे मेरी पहचान तय नहीं हो सकती। ज्योंही आप किसी व्यक्ति की पहचान को उसके जेल में रहने के कारण निर्धारित करते हैं आप पाते हैं कि इस तरह संबंधित व्यक्ति की ही नहीं उसके परिवारीजनों,नाते-रिश्तेदारों और जाति या समुदाय या धार्मिक समूह की भीपहचान तय करने लगते हैं। अतः स्थान विशेष के आधार पर व्यक्ति और समुदाय की पहचान निर्धारित नहीं की जानी चाहिए। जेल के आधार पर जब किसी व्यक्ति की पहचान तय करते हैं तो उस व्यक्ति के अंदर स्थायी तौर पर अपराधबोध और कुंठा भर देते हैं। जेलबंदी का जिस पर लेबिल लगा होता है उसे हमेशा दागी अपराधी के रूप में देखा जाता है।

सवाल यह है कि अस्मिता के जब विभिन्न रूप बदलते हैं तो उनको अवस्था विशेष से जोड़कर देखा जाता है। मसलन् एक अविवाहित लड़की की अस्मिता विवाह करते ही बदलती है,वह विवाहिता कहलाने लगती है,माँ बनते ही वह माँ की अस्मिता हासिल कर लेती है। एक ही लड़की एक ही साथ लड़की,पत्नी,माँ आदि की अस्मिताओं से गुजरती है। यानी व्यक्ति की अस्मिता उसकी अवस्था के अनुसार बदलती रहती है,ऐसी अवस्था में एक जेलबंदी की अस्मिता को स्थायी तौर पर दागी अपराधी के रूप में देखना सही नहीं है। वह जब तक जेल में था वह अपराधी था। लेकिन जब वह सजा काट चुका वह अपराधी नहीं रहा।

अमेरिका में अपराधी व्यक्ति पर लगा दाग उसका,उसके परिवार का और उसके समुदाय का कभी पीछा नहीं छोड़ता और इस तरह व्यक्ति अहर्निश अपराधबोध से ग्रस्त कुंठा और हताशा में जीता है। यह अपराध और अपराधी के प्रति साम्राज्यवादी नजरिया है। जरूरत है इस नजरिए को बदलने की।

मैं अभी प्रोफेसर हूँ और नागरिक भी हूँ। बुनियादी पहचान मेरी नागरिक की है।नागरिक की पहचान के परिप्रेक्ष्य में ही मेरी पहचान के बाकी रूपों को परिभाषित किया जाना चाहिए। लेकिन 60 साल बाद नौकरी से अवकाश ग्रहण कर लूँगा तब में प्रोफेसर नहीं रहूँगा। मेरी प्रोफेसर की पहचान कक्षा में उपस्थिति के समय प्रमुख होगी और नागरिक की पहचान गौण होगी। लेकिन कक्षा के बाहर में नागरिक हूँ, पिता हूँ,चतुर्वेदी हूँ,पति हूँ आदि। इनमें से पहचान का प्रत्येक रूप किसी न किसी सामाजिक अवस्था से जुड़ा है।मैंने ज्योतिष से आचार्य भी किया है तो मैं जब किसी का फलादेश बता रहा होता हूं तो मेरी पहचान एक ज्योतिषी के रूप में होगी न कि एक प्रोफेसर के रूप में। इसी तरह एक कैदी जब तक जेल में है वह कैदी है साथ में नागरिक भी है।

आधुनिक युग में नागरिक अस्मिता के बिना अन्य किसी पहचान का कोई मूल्य नहीं है।आधुनिक समाज में नागरिक होना ही आधुनिक होना है। नागरिक के अधिकारों,मान्यताओं और मूल्यों की रोशनी में हमें पहचान के सभी रूपों को परिभाषित करना चाहिए। नागरिक की पहचान सभी किस्म की अस्मिता या पहचान का मूलाधार है। पहचान के जितने भी रूप हैं वे नागरिक की पहचान के साथ मिलकर ही अपनी स्थिति निर्धारित करते हैं। नागरिक नहीं तो आधुनिक नहीं।अमेरिकी न्याय की यह आयरनी है कि नागरिक को जब किसी अपराध में सजा मिलती है तो उसको मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है।

आमतौर पर संकीर्णतावादी और फंडामेंटलिस्ट विचारधारा के लोग यह मांग करते देखे जाते हैं कि अपराधियों को कठोर से कठोर सजा दी जाय। इन लोगों का मानना है कठोर सजा देने से अपराधी फिर से अपराध नहीं करता। लेकिन यह धारणा व्यवहार में सच साबित नहीं हुई है। अमेरिका में कठोर सजाएं सुनाए जाने के बाद भी अपराधों में गिरावट नहीं आई है।इस तरह के विचारक आमतौर पर अपराध को नैतिकता से जोड़कर देखते हैं और बढ़ते अपराधों को नैतिक ह्रास का लक्षण बताते हैं। सच यह नहीं है। बल्कि ऐसा करके वे नैतिकता के क्षय का भय पैदा करते हैं और कठोरतम दण्ड के प्रावधान की मांग करते हैं। अपराधी के लिए कठोर दंड़ और नैतिकता के क्षय का भय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ये दोनों कंजरवेटिव और फासिस्ट विचारधाराओं से जुड़ा नजरिया है।

कठोर दंड की मांग अंततःराजनीति में अधिनायकवाद को जन्म देती है।अमेरिकी सत्ता की मनमानी से आज सारी दुनिया परेशान है।वहां सत्ता पर कारपोरेट तानाशाही का कब्जा है। अपराध और कठोरदंड से भय के कारण लोकतंत्र बाधित हुआ है और सर्वसत्तावादी विचारधाराएं मजबूत हुई हैं। कारपोरेट अधिनायकवाद का मार्ग प्रशस्त हुआ है । ये लोग आए दिन न्याय के अधिनायकवादी समाधान सुझाते रहते हैं और इसके बहाने हाशिए के लोगों पर वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश करते हैं।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो अमेरिकी जेल प्रणाली 200साल पुरानी है। इसमें दो तरह के प्रयोग किए किए गए। पहला प्रयोग गरीबों को दंडित करने के लिहाज से कारागार बनाकर आरंभ किया गया। 18वीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में यह प्रणाली आरंभ की गयी।आरंभ में अस्थायी बंदीघर के रूप में जेल का इस्तेमाल किया जाता था।जब तक कोई बंदी मुकदमे से बरी नहीं हो जाता उसे बंदी कराए रखने के लिए जेलों का इस्तेमाल करते थे और उसे बंदी रखते थे।इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि अमीरलोग तो जुर्माना देकर छूट जाते थे लेकिन गरीबों को जुर्माना न भरने के कारण जेलों में बंद रखा जाता था।गरीबों को जेलों में तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थीं और अनेक मामलों में सार्वजनिक तौर पर दंडित किया जाता था।यह पूरी प्रणाली अनेक उपनिवेशों में भी लागू की गयी।उनदिनों सार्वजनिक तौर पर दंडित करने का प्रावधान था।

पूंजीवाद के आगमन के समय बड़े पैमाने पर समूचे यूरोप में चोरियां हो रही थीं, छोटे छोटे चोरों को सुधारने के लिहाज से 1557 से बड़े पैमाने पर खाली घरों में सुधारघर बनाए गए और चोरों को इनमें बंदी बनाकर रखा जाता था। खासकर ब्रिटेन में इस तरह के सुधारघर थे।इनमें बंद लोगों से जबरिया श्रम कराया जाता था और यह प्रयोग काफी सफल रहा।कालांतर में इस तरह के संस्थान समूचे ब्रिटेन और यूरोप में फैल गए।लेकिन उस जमाने में सुधारघरों मे जो बंदी थे वे छोटे-मोटे अपराधों में बंदी हुआ करते थे और ये गरीब लोग थे।इन बंदियों को यातनाएं दी जाती थीं,दण्डित किया जाता था और अन्यत्र भी भेज दिया जाता था। इस तरह के बंदीघर या सुधारघर का विचार सबसे पहले इंग्लिश समाजसुधारक जॉन हार्वर्ड के दिमाग में आया और इस तरह के सुधारघर सबसे पहले ब्रिटिश उपनिवेश अमेरिका में बनाए गए।बाद में ब्रिटेन में बने।

उस जमाने में शारीरिक दंड़ और फांसी दोनों का ही विलियम पेन ने जमकर विरोध किया और कहा कि इन दोनों किस्म के दण्ड देने से बेहतर है लंबी सजाएं देना।अमेरिकी क्रांति के दौरान भी जेलों में शारीरिक यातनाएं देने का जमकर विरोध हुआ और ब्रिटिश औपनिवेशिक न्याय प्रणाली की जमकर आलोचना की गयी। इस तरह की आलोचना करने वालों में डा. बेंजामिन रश का नाम सबसे ऊपर आता है।रश साहब पेनसिलवेनिया में सर्जन थे और अमेरिकी स्वाधीन क्रांति के अमर जनगायक भी थे। उनके लिखे दो चर्चित पर्चे हैं। इन दोनों पर्चों ने अमेरिका में जेलसुधार की प्रक्रिया को जन्मदिया और विगत 200सालों में वह विभिन्न पड़ावों से गुजरती हुई मौजूदा प्रणाली तक पहुंची है।बाद में कैदी को जेल में पृथक कमरे में बंद रखने,एक निश्चित स्थान तक आने-जाने, उस पर नजर रखने के प्रावधान किए गए।

उस समय जेलप्रणाली का प्रधान लक्ष्य था कैदी के लिए एकांत, श्रम, और अहर्निश नजरदारी। ऐतिहासिक नजरिए से देखें तो अमेरिकी जेलप्रणाली ने आरंभ में जो मॉडल अपनाया उसका लक्ष्य था वर्गीय नियंत्रण और नस्लीय नियंत्रण। सन् 1814 के न्यूयार्क जेल के रिकॉर्ड बताते हैं कि जेल में बंद 29फीसदी लोग काले थे। सन् 1833 की रिपोर्ट बताती है कि जिन राज्यों में जनसंख्या में 1नीग्रो और 30गोरेलोग रहते थे,वहीं पर इन राज्यों की जेलों में 1काला और 4गौरवर्ण के कैदी बंद थे।दक्षिणी राज्यों में 19वीं सदी में जेलों में बंद कैदियों की संख्या 75प्रतिशत के करीब थी। इन राज्यों में आमतौर पर कैदियों को निजी लोगों को ठेके पर दे दिया जाता था।इसके कारण दक्षिणी राज्यों में खुलेआम गुलामप्रथा फलीफूली। इसे ठेकेदारी प्रथा भी कहते हैं।अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में काले लोगों के खिलाफ जिस नग्नतम रूप में अमानवीय व्यवहार किया जाता था वह उस दौर में एक मिसाल माना जाता है।मसलन् सामान्य से अपराध के मामले में उस जमाने में पुलिस वाला नीग्रो को पकड़कर ले जाता था और फिर उसे लंबी सजा देकर बंद कर दिया जाता था, इस तरह नीग्रो जाति पर बर्बर जुल्म ढाए गए उनको गुलामी के लिए मजबूर किया गया। यही वजह है अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में गुलामगिरी के खिलाफ सबसे तेज प्रतिक्रिया हुई। अमेरिकी जेलों में बंद कैदियों को सुनियोजित ढ़ंग से नशे की लत डाली जाती थी। उनको कोकीन,हेरोइन,अफीम आदि सप्लाई दी जाती थी। इस दुष्परिणाम यह होता था कि वे जब जेलों से बाहर निकलते थे तो नशे के आदी हो चुके होते थे और बाहर निकलकर फिर से अपराधकर्म में लिप्त हो जाते थे और फिर से लौटकर जेल में पहुँच जाते थे।

अमेरिकी जेलप्रणाली में दूसरा बड़ा प्रयोग 1929-30 की मंदी के समय किया गया। इस प्रयोग के दौरान यह पाया गया कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय जेलों में कैदी कम थे और उसके पहले और बाद में कैदियों की संख्या ज्यादा थी।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में अमेरिका में नशीले पदार्थों के सेवन और उससे जुड़े अपराधों की बाढ़ आती है। फलतः इसदौर की जेलप्रणाली में नशीले पदार्थों के सेवन को आधार बनाकर चिन्तन आरंभ हुआ। सन् 1929 के आसपास आई मंदी के दौर में देखा गया कि तेजी से बेकारी बढ़ी है और अपराध भी बढ़े हैं। अपराधों का सिलसिला बंद हुआ है द्वितीय विश्वयुद्ध आने के साथ।युद्ध के दौरान अपराध का आंकड़ा तेजी से कम हो जाता है। लेकिन ज्योंही युद्ध खत्म होता है अपराधियों और बेकारों की संख्या में तेजी से उछाल आता है।यही वह दौर है जब दंड की टिकाऊ प्रणाली की हिमायत की जाती है।बेकारीऔर मंदी के कारण अपराधियों की संख्या में आया उछाल आंकड़ों से भी पुष्ट होता है।

सन् 1999 में अमेरिकी जेलों में प्रति एक लाख लोगों में 476लोग बंदी थे।यह संख्या 1929 की मंदी में जेलों में बंद लोगों की संख्या से तीन गुना ज्यादा है।अमेरिकी फेडरल जेलों में बंद लोगों की संख्या 1999 से 2000 में 9फीसदी बढ़ी है ।यानी अमेरिका के समस्त राज्यों की जेलों में 1990 में प्रति एक लाख की आबादी में 458लोग जेल में बंद थे जो 2000 में बढ़कर 702 हो गए।

सन् 2000 में फेडरल जेलों में बीस लाख लोग जेलों में बंद थे।ताजा आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका के विभिन्न राज्यों में जेलों में कैदियों की संख्या बेशुमार है। इन जेलों में जेलों की क्षमता से 33 फीसदी ज्यादा कैदी बंद हैं। जून 2003 में न्याय सांख्यिकी विभाग के द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार विगत 4सालों ( 1999-2003)में जेलों में बंदियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।जेलों में बंद कैदियों में औरतों की भी बड़ी तादाद है। इन चार सालों में कुल जेलबंदियों में 5.0प्रतिशत औरतों की संख्या बढ़ी है। खासकर टैक्सास और कैलीफोर्निया में बंदियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।जबकि 9राज्यों में बंदियों की संख्या में गिरावट दर्ज की गयी है। अमेरिकी जेलों में बंदी लोगों का प्रोफाइल बताता हैकि कैदियों में 60फीसदी अल्पसंख्यक हैं।इनकी उम्र 20साल से नीचे है।अमेरिका की समग्र जेल बंदी संख्या सन् 2003 में 6.9 मिलियन यानी 70लाख दर्ज की गयी थी ।

नई अमेरिकी जेल प्रणाली और न्याय प्रणाली कठोर दण्ड देने की नीति पर आधारित है और इसके अनुकूल परिणाम नहीं निकले हैं। बंदियों पर किए गए अनुसंधान बताते हैं बंदियों को कड़े दण्ड देने की नीति के कारण अपराधों में कोई कमी नहीं आई है। इसके विपरीत कठोर दण्ड देने से हिंसक और आक्रामक व्यवहार में इजाफा हुआ है। अपराधियों को कठोर देने से उनमें आक्रामकता बढ़ी है और वे और भी हिंसक हो उठे हैं। जेलों में इन बंदियों के आक्रामक व्यवहार का अन्य कैदियों पर भी बुरा असर देखा गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि अपराधी को दुरूस्त करने के लिए दण्ड देकर सुधारने की बजाय सामाजिक व्यवहार और सामाजिक शिक्षा से दुरूस्त करने पर जोर दिया जाना चाहिए। लेकिन अमेरिकी न्यायप्रणाली में इसके लिए कोई जगह ही नहीं है।

अमेरिका में बढ़े अपराध और जेलों में स्थान के अभाव के कारण अमेरिकी प्रशासन ने एक पद्धति इजाद की और उन अपराधों को रेखांकित किया है जिनमें कम से कम सजा दी जाए। कम सजा के प्रावधान का समाज पर क्या असर हुआ उसका मूल्यांकन करने के लिए एक कमीशन बनाया गया जिसने 20साल के अनुभवों को समेटते हुए अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में बताया गया कि कम अवधि की सजा पाने वाले कैदियों की संख्या में 155फीसदी इजाफा हुआ है। 52 फीसदी जजों ने माना कि न्यूनतम सजा देने के मामले में विषमता देखी गयी है। 62फीसदी जजों ने कहा कि सभी किस्म के मामलों में न्यूनतम सजा देने का औसत प्रतिशत बहुत ज्यादा रहा है। ये राय सन् 2010 की है।

अमेरिका में एक फिनोमिना यह भी देखने में आया है कि समुदाय विशेष के लोगों को चिह्नित करके अपराधी की केटेगरी में बदनाम कर दिया जाता है। जिस व्यक्ति को एकबार जेल हो जाती है उसके बाद उसका परिवार और सामाजिक समुदाय हमेशा अपराधी के नाम से जाना जाता है फलतःएक तरह की सामूहिक यंत्रणा से संबंधित नागरिक को गुजरना पड़ता है।

मसलन, न्यूयार्क को ही लें,पूर्वी न्यूयार्क के इलाके में रहने वाले लोगों में अपराध एक कॉमन फिनोमिना बना दिया गया है। इन बस्तियों में ऐसे परिवार ज्यादा रहते हैं जिनका कोई न कोई सदस्य किसी न किसी समय जेल में रहा है या जाने वाला है। यह फिनोमिना अकेले न्यूयार्क शहर में ही नहीं है अन्य अमेरिकी शहरों में भी इस फिनोमिना को देख सकते हैं।

अमेरिका की समस्त जेलों ( संघ और केन्द्र की ) में आधे से ज्यादा बंदी काले लोग हैं। गोरे बंदियों की तुलना में काले बंदियों की संख्या सात गुना ज्यादा है। सन् 1996 तक के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका की समग्र काली आबादी के 30फीसदी लड़के कभी न कभी जेल में बंद जरूर रहे हैं। गोरी औरतों से 421फीसदी ज्यादा काली औरतें नशीले पदार्थों के सेवन के चक्कर में जेलों में बंद रही हैं। बंद औरतों में तीन-चौथाई औरतों के बच्चे हैं। 15लाख से ज्यादा बंदी औरतों के छोटे-छोटे बच्चे हैं। जेलों में बंद आधी से ज्यादा काली औरतें अपने बच्चों को जेल में रहते हुए कभी नहीं देख पाएंगी।

अमेरिकी न्यायप्रणाली में अपराध के कारण अपराधी के साथ-साथ पूरा परिवार टूट जाता है। यही वजह है कि अमेरिका में पितारहित बच्चों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। अमेरिकी सिस्टम की दूसरी पीड़ादायक बात यह है कि जिन लोगों को एकबार जेल हो जाती है उनका मतदान का अधिकार खत्म हो जाता है। सरकारी घर पाने का अधिकार खत्म हो जाता है,बैंक से कर्ज नहीं मिलता,विकास योजनाओं के लाभों से इनको वंचित कर दिया जाता है। इन स्थितियों में जब कोई बंदी सजा काटकर सामाजिक जीवन में वापस लौटकर एक भले शहरी की जिंदगी गुजारना चाहे तो उसके लिए कोई संभावना ही नहीं बचती। बल्कि उसे पहले से भी कठिन सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह एक तरह से अमेरिकी प्रणाली में नस्लवादी शोषण और उत्पीड़न का अंतहीन चक्र है जिसमें काले लोगों को जीना पड़ता है। यह भी कह सकते हैं कि अमेरिकी समाज में जेल यात्रा कर आए व्यक्ति के लिए नए सिरे से भले आदमी की जिन्दगी जीने की अमेरिकी सत्ता कोई संभावनाएं ही नहीं छोड़ती।

अमेरिकी समाज में काले और हिस्पनिक समुदाय के अघिकांश लोग घेटो में रहते हैं। एकदम दमघोंटू अभावग्रस्त माहौल में रहते हैं। हर शहर में इनके लिए दमघोंटू घेटो बस्तियां बनी हैं जो शहर के भीतरी इलाकों में बसी हैं। इन घेटो बस्तियों में रहने वालों की जीवनशैली बेहद खराब है। उल्लेखनीय है अमेरिकी जेलों में बंद लोगों में आधी संख्या उनकी है जो नशीले पदार्थों के सेवन के जुर्म में पकड़े गए हैं। उल्लेखनीय है घेटो में रहने वालों की शिक्षा पर कम और जेलों के रखरखाब पर ज्यादा खर्चा किया जा रहा है। रेण्ड कारपोरेशन के द्वारा कराए एक सर्वे से पता चला है कि नशीले पदार्थों के सेवन के लिए दिए गए कठोर दंड की व्यवस्था ने समाज में असुविधाएं ज्यादा पैदा की हैं। कठोर दंड देने से लोग और ज्यादा बिगड़े हैं, पीड़ितों के परिवार में तबाही मची हुई है।

कायदे से देखें तो अमेरिका में जेल-औद्योगिक समूह का निर्माण हो चुका है। आमलोग खेतों-खलिहानों में काम करने की बजाय जेल की चौकीदारी ज्यादा पसंद करते हैं। अमेरिकी सामाजिक सेवाओं की तरह जेल व्यवस्था का भी निजीकरण कर दिया गया है। जेल बनाना और उनको चलाना बहुत बढ़िया मुनाफे का धंधा है। लगातार नए-नए जेलों का प्रत्येक शहर में निर्माण हो रहा हैऔर ये स्थानीय निजी जेल भी अमेरिकी जनगणना के रिकॉर्ड का हिस्सा है।

मसलन् विगत 30सालों में न्यूयार्क में घेटो वाले इलाकों में 30 नए बहुमंजिला जेल बनाए गए हैं। इन जेलों के रखरखाब पर आम करदाता जनता का पैसा खर्च होता है। मसलन् 1997 में प्रति कैदी 8डालर खर्चा आता था जो 1999 में बढ़कर 30 डॉलर हो गया। एक अनुमान के अनुसार जेल में बंदी व्यक्ति पर सालाना पन्द्रह फीसदी खर्चा बढ़ा है। चूंकि जेल और कैदी अब कारपोरेट मुनाफावृद्धि का हिस्सा हैं अतः अब गिरफ्तारियां और सजाएं भी खूब हो रही हैं। जितनी ज्यादा लोगों को गिरफ्तारी और सजा उतना ही ज्यादा मुनाफा। जेल-उद्योग में लगे कारपोरेट घरानों के दबाब के चलते ही अमेरिका की अधिकांश सरकारी जेलों को भी निजी हाथों में सौंप दिया गया है। सन् 1990 के बाद से अमेरिका के तकरीबन सभी राज्यों ने कानून बनाकर सरकारी जेलों को निजी हाथों में सौंप दिया है। विभिन्न जेलों के साथ विभिन्न वस्तुओं की उत्पादक बड़ी कंपनियों का समझौता है और बंदियों के बनाए सामान को ये कंपनियां खरीदकर बाजार में बेचती हैं। अथवा वे अपना माल कैदियों से बनवाते हैं।

सन् 1980 से सन् 2000 के बीच में जेलबंदियों ने तकरीबन 2विलियन डॉलर का सामान बनाया । मसलन् साबुन,कम्प्यूटर पुर्जे,ऑफिस फर्नीचर,गोल्फ वॉल,कपड़े,चटाई आदि बनानेवाले बंदी को 1.10 डॉलर प्रतिघंटे मजदूरी मिलती है। जबकि सामान्य नियम के तौर पर एक मजदूर को जेल के बाहर 10 डॉलर प्रतिघंटा देना होता है। अतः बाहर काम कराना महंगा पड़ता है ,यही वजह है कि कंपनियां बंदियों से सस्ती दर पर काम कराती हैं। यह एक तरह की गुलाम प्रथा है।

अमेरिकी जेलों में सस्ते श्रम को कारपोरेट घराने व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे और बंदियों से वस्तुतः गुलामों की तरह काम ले रहे हैं,साथ ही इनका सामाजिक जीवन भी दोयमदर्जे के नागरिक जैसा है। शोषण की स्थिति यह है कि एयरलाइंस कंपनियों से लेकर हीरो होण्डा कंपनी तक के कामों में ये बंदी जुटे रहते हैं। एक जमाने में ओहिओ राज्य में ट्रांसवर्ल्ड एयरलाइंस जेल में बंद कैदी को फोन से टिकट बुक करने का 5डॉलर प्रतिघंटा देती थी। इसी तरह हीरो होण्डा अपने एसेम्बली लाइन काम के लिए जेलकैदी को 2.05डॉलर प्रतिघंटा देती थी, इसके खिलाफ मजदूर यूनियनों ने जमकर प्रतिवाद किया था और उसके बाद यह योजना बंद कर दी गयी।

अमेरिकी न्यायप्रणाली की न्यायप्रियता की आमतौर पर मीडिया में बड़ी प्रशंसा की जाती है और उसके अन्यायपूर्ण पहलुओं की अनदेखी की जाती है। अमेरिकी न्यायप्रणाली में गोरी नस्ल का वर्चस्व है और गैर-गौरवर्ण के नागरिकों को आएदिन अन्याय झेलना पड़ता है। अमेरिकी न्याप्रणाली में नस्लभेदीय रूझानों की कभी मीडिया और सार्वजनिक जीवन में चर्चा नजर नहीं आती।अमेरिकी न्यायप्रणाली का लक्ष्य है अफ्रीकी –अमेरिकियों को नियंत्रण में रखना।

पूंजीवादी व्यवस्था की यह सामान्य विशेषता है कि वह जहां पर अपना पैर पसारती है वहीं पर सामाजिक मनुष्य की मौत हो जाती है। एकाकीपन, अलगाव,एकांत,अजनबियत आदि को इतनी जल्दी प्रसार मिलता है कि नागरिक समझ नहीं पाता कि आखिर यह सब कैसे हो रहा है। सामाजिक की मौत ही वह प्रस्थान बिन्दु है जहां से राज्य आसानी से नागरिक पर अपना अधिकार जमा लेता है और शासकवर्ग उसे अपनी विचारधारा के घेरे में ले लेता है। एक अध्ययन के अनुसार अमेरिकी जेलों में बंद अमेरिकी नागरिकों की संख्या विलक्षण रूप से बहुत ज्यादा है। अध्ययन बताता है कि विश्व की 5फीसदी आबादी अमेरिका में रहती है और उसके 25फीसदी लोग जेलों में बंद हैं। जेलबंदियों के मामले में भी अमेरिका का दुनिया में फीसदी और संख्या के लिहाज से सर्वोच्च स्थान है।

अमेरिकी जेलों में बंद लोगों का प्रोफाइल बताता है कि बंदी बनाने के मामले में भी अमेरिका में नस्लभेद है। मसलन् युवा अफ्रीकी-अमेरिकन कैदियों की संख्या गोरे कैदियों की संख्या से ज्यादा है। स्थिति यहां तक खराब है कि जेलखाने गुलामी के लिए पट्टे पर दिए जाते हैं। अमेरिका में यह मिथ प्रचारित है कि काले लोग बलात्कारी होते हैं और गोरी औरतें मानती हैं उनको गुलाम बनाए रखना ,मारदेना और काले लोगों पर सख्त निगरानी आदि जायज हैं।

अमेरिका के नागरिकों की पश्चिमी यूरोप के नागरिकों की तुलना में आय 5 से 8 गुना ज्यादा है। जबकि अहिंसक अपराधों के मामले में अमेरिका में जापान की तुलना में सत्रह गुना ज्यादा अपराध होते हैं। सन् 1970 की तुलना में अमेरिका के राज्यों में अपराधों में 500 गुना इजाफा हुआ है। अपराधों की हालत यह है अहिंसक अपराधों में लंबी सजाएं भोगने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है और जेलों में जगह नहीं है।

मिशेल फूको ने “डिसप्लिन एंड पनिश”( 1975) में विस्तार से यह बात रेखांकित की है कि जेल प्रणाली से अपराधों में कमी नहीं आई है बल्कि अपराधी ज्योंही जमानत पर छूटते थे वे पहला केस खत्म होने के पहले फिर जेल में आ जाते थे।जो लोग जेलों में बंदी हुआ करते थे उनसे काम कराया जाता था और उनको श्रम के गुण और ईमानदारी का पाठ भी पढ़ाया जाता था।

मिशेल फूको ने अपनी किताब में विस्तार के साथ फ्रांसीसी जेलों की दशा और सामाजिक स्थिति का सुंदर वर्णन किया है। जेलप्रणाली के सुधार के वर्षों में जेल में श्रम कराने और उस श्रम से बनी वस्तुओं को बाजार में बेचकर मुनाफा कमाने की परंपरा आरंभ हो गयी थी।अब जेल और फैक्ट्री एक हो गए थे। बेंथम ने विस्तार के साथ इस पहलू पर ध्यान खींचा है।जेरेमी बेंथम ने लिखा है कि जेल और फैक्ट्री दोनों को एकांत में संगठित किया जाता था और दोनों पर अहर्निश नजरदारी रखी जाती थी। इससे व्यक्ति को बांटने और श्रम कराने में मदद मिलती थी। उन दिनों जेलों में कैदियों के सुधार पर कम और उनसे मुनाफे के लिए श्रम ज्यादा कराया जाता था। फलतः इससे कैदी सुधरे कम लेकिन उन्होंने मुनाफा ज्यादा पैदा किया।

बेंथम ने उदार दण्ड प्रणाली का एक तरह से मॉडल पेश किया।जिसमें अपराधी को वैध एकाकी शोषण के लिए तैयार किया जाता था।इसके विपरीत कार्ल मार्क्स ने ’’पवित्र परिवार’’ नामक पुस्तक में लिखा अपराध के लिए एकाकी व्यक्ति को सजा नहीं दी जानी चाहिए बल्कि अपराध के अ-सामाजिक स्रोत को नष्ट किया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को मनुष्य की तरह विकास करने का अवसर दिया जाना चाहिए।यदि व्यक्ति को वातावरण बनाता है तो वातावरण को मानवीय होना चाहिए। यदि मनुष्य स्वभावतः सामाजिक है तो वह समाज की सही प्रकृति का विकास करेगा। उसकी शक्ति की प्रकृति को एकाकी व्यक्ति के आधार पर नहीं बल्कि समाज की शक्ति के आधार पर परखा जाना चाहिए।कालांतर में पूंजी(भाग-1) में मार्क्स ने लिखा कि अधिकांश अपराधी अति जनसंख्या वाले निचले तबकों से आते हैं और ये वे लोग हैं बेकार हैं।मार्क्स ने यह भी लिखा है कि बेकारों की संख्या जितनी घटती जाती है अपराधियों की समाज में संख्या उसी अनुपात में घटती जाती है। यानी बेकारी घटने का अर्थ है बेकारों की फौज और अपराधियों की संख्या मॆं गिरावट।

मार्क्स ने रेखांकित किया है कि अपराध को व्यक्तिगत की बजाय सामाजिक आधार पर देखा जाना चाहिए।यह एक तरह से वर्चस्वशाली ताकतों के सामाजिक वर्चस्व की अभिव्यक्ति भी है। अपराध को जन्म देने वाली परिस्थितियों को बनाए रखकर वर्चस्वशाली ताकतें अपने सामाजिक-आर्थिक वर्चस्व को बनाए रखती हैं।




रविवार, 16 सितंबर 2012

मनमोहन के फैसले ने ममता की घबराहट बढ़ायी


                 
      पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केन्द्र सरकार को 72घंटे का अल्टीमेटम दिया है और कहा है डीजल के बढ़े दाम और खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी निवेश का फैसला वापस ले। लेकिन मनमोहन सिंह सरकार अपने ये दोनों फैसले वापस नहीं लेने जा रही है। सबकी आंखें ममता के अगले कदम पर टिकी हैं।
    ममता का तर्क है कि सरकार ने हमसे सलाह नहीं ली, हमारे मंत्री ने मीटिंग में हिस्सा नहीं लिया।अतःहम इस फैसले को नहीं मानते। केन्द्र सरकार के फैसले की घोषणा के तत्काल बाद तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेताओं की ममता के साथ अनौपचारिक बैठक हुई।इसमें पार्थ चटर्जी-सुब्रत मुखर्जी आदि ने ममता की राय से असहमति व्यक्ति की।
     तृणमूल सरकार में वरिष्ठमंत्री ने नाम न बताए जाने की शर्त पर कहा यह फैसला यूपीए-2 सरकार का सामूहिक फैसला है। इस फैसले से यूपीए-2के सभी दल बंधे हैं। मंत्रीमंडल किसी दल विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वह तो सारे देश का प्रतिनिधित्व करता है। सभी सत्तारूढ़ दल मंत्रीमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी से बंधे हैं। कोई मंत्री मंत्रीमंडल की बैठक में शामिल हो या न हो वह मंत्रीमंडल के सामूहिक फैसलों से बंधा है। शुक्रवार की रात को ही इस मंत्री ने ममता को उनके घर जाकर अपनी राय से अवगत करा दिया और कहा कि वे यूपीए छोड़ने का फैसला न लें।
     असल में  राजनीति में एक होता है सत्ताखेल और दूसरा होता है सत्तामोह। सत्ताखेल में वे नेता सफल होते हैं  जो दूरदृष्टि रखते हैं और दीर्घकालिक बृहत्तर जनहितों का ख्याल रखते हैं।पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सारे राजनीतिक दांवपेंच सत्तामोह की देन हैं।सत्तामोह विवेकहीन बनाता है।
    पापुलिज्म ,नकली प्रतिवाद और उत्सवधर्मिता में बांधे रखता है।सत्तामोह में बंधे लोग नकली प्रतिवाद के लिए सड़कों पर हंगामे करते हैं ,मीडिया में खूब हो-हल्ला करते हैं।वामदलों में भी यह बीमारी है। सत्तामोहित नेता गैर-जिम्मेदार होता है और सामाजिक जबाबदेही से भागता है। ।
इनदिनों जो  नकली प्रतिवाद ममता और उनका दल कर रहा है यह प्रतिवाद नहीं है यह प्रतिवाद का ऑब्शेसन है। प्रतिवाद का ऑब्शेसन वामदलों में भी है और ममता में भी है। प्रतिवाद का ऑब्शेसन अंततः अ-राजनीतिकरण करता है और नीतिविहीन बनाता है। प्रतिवाद का ऑब्शेसन लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था के विकास को अवरूद्ध करता है। आमलोगों में राजनीति और राजनेताओं के प्रति अनास्था पैदा करता है।
       ममता का 72 घंटे का अल्टीमेटम एब्सर्ड पापुलिज्म की देन है। यह सामूहिक जिम्मेदारी से पलायन है। सामूहिक जिम्मेदारी से पलायन के कारण ही ममता बनर्जी विगत दो महिनों से यूपीए-2 की सरकार में हाशिए पर आ गयी हैं। एक जमाना था उनसे प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी बात करते थे।लेकिन राष्ट्रपति चुनाव के बाद से ममता बनर्जी को उनकी राजनीतिक हैसियत का एहसास करा दिया गया है। विगत बृहस्पति और शुक्रवार को मंत्रीमंडलीय उपसमिति के बैठकों से तृणमूल कांग्रेस के मंत्री नदारत थे। ममता बनर्जी ने राजनीतिक जिम्मेदारी से भागने का एक सुगम रास्ता अख्तियार किया है कि केन्द्रीय मंत्रीमंडल के बैठकों में उनके दल के मंत्री हिस्सा ही नहीं लेते और इसके बाद ममता बनर्जी मीडिया में हल्ला करती हैं कि उनसे पूछा नहीं गया,उनकी राय नहीं ली गयी, उन्हें मंत्रीमंडल का फैसला सुनकर अचम्भा हुआ है,इसके बाद वे धमकियां देती हैं।यह नाटक विगत 3सालों से चल रहा है और मनमोहन सिंह इसे झेलते रहे हैं। इसे ममता ने अपनी राजनीतिक ताकत के रूप में प्रचारित किया है और मीडिया ने भी ममता को ताकतवर महिला के रूप में खूब उछाला है। लेकिन विगत बृहस्पतिवार और शुक्रवार के मंत्रीमंडलीय समिति के फैसलों ने ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत की सीमाओं को एकसिरे से उजागर कर दिया है। ममता की समझ है कि उनका दल यदि सरकार से समर्थन वापस ले लेता है तो सरकार गिर जायगी । लेकिन राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि ममता बनर्जी के समर्थन वापस लेने से सरकार नहीं गिरने वाली। तृणमूल कांग्रेस यदि समर्थन वापस लेता है तो वैसे स्थिति में मुलायम सिंह यादव और अन्यदलों का समर्थन मिलना पक्का है।इस संदर्भ में पहले से ही राजनीतिक तैयारियां कर ली गयी हैं और बदले में समर्थक दलों के नेताओं से भी विस्तार के साथ बातें हो गयी हैं।
    केन्द्र सरकार के बयान के अनुसार रिटेल में विदेशी पूंजी निवेश के सवाल पर विगत शुक्रवार को जो फैसला लिया गया वह विगत 24नवम्बर 2011 को ही मंत्रीमंडलीय समिति ने पास कर दिया था सिर्फ उसके कार्यान्वयन को स्थगित रखा गया था। कार्यान्वयन के संदर्भ में 7दिसम्बर 2011 को  विभिन्न राज्य सरकारों और मजदूर, किसान,दुकानदार,छोटे व्यापारी आदि के संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक हुई थी जिसमें दिल्ली,असम, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, आंध्र,राजस्थान,हरियाणा,मणिपुर, जम्मू-कश्मीर, केन्द्र शासित क्षेत्र दमन-दीउ,दादरा और नागर हवेली के प्रतिनिधियों ने रिटेल में विदेशी पूंजी निवेश का समर्थन किया था जबकि बिहार, कर्नाटक, उडीसा,केरल,मध्यप्रदेश,त्रिपुरा ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था। पश्चिम बंगाल सरकार ने अपना प्रतिनिधि इस बैठक में नहीं भेजा और नहीं बाद में इस पर अपनी कोई राय दी। इस बीच विभिन्न राज्यों के साथ सलाह-मशविरे के बाद यह तय पाया गया कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश को राज्य सरकारें लागू करें या न करें यह उनका फैसला होगा। यानी ममता बनर्जी के लिए रास्ता खुला रखा गया है कि वे अब यह तय करें कि इसके बावजूद वे मंत्रीमंडल में रहना चाहती हैं या नहीं। इस स्थिति में ममता बनर्जी के दल में आंतरिक अन्तर्विरोध तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस के केन्द्र में जो मंत्री हैं वे चाहते हैं कि उनका दल सरकार का समर्थन जारी रखे। जबकि ममता बनर्जी चाहती हैं कि मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया जाय और बाहर से सरकार का समर्थन किया जाय। पार्थ चटर्जी-सौगत राय-सुब्रत मुखर्जी आदि का मानना है कि मनमोहन सरकार से समर्थन वापस न लिया जाय और न ही सरकार के काम में अडंगे डाले जाएं इस सबसे तृणमूल कांग्रेस की अड़ंगेबाज पार्टी की इमेज बन रही है।
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ऑडीटर,पत्रकार ,स्टैनोग्राफर और कोलगेट मीडिया कवरेज

कोलगेट कांड पर मीडिया लबालब भरा है।कोई भी अखबार उठाओ या चैनल देखो चारों ओर कोलगेट की वर्षा हो रही है।इस तरह की समाचार वर्षा हाल-फिलहाल के दिनों में किसी भी खबर की नहीं देखी गयी। कोलगेट कांड में सच क्या है यह सब लोग जानते हैं। इसमें धांधली हुई है। यह धांधली मुख्यमंत्रियों ने की या केन्द्रीय मंत्री ने की या प्रधानमंत्री ने की ,लेकिन धांधली तो हुई है। धांधली आवंटन के पहले हुई या बाद में हुई यह सवाल भी बेमानी है।लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि धांधली हुई है। एक कंपनी ने की या चार ने की लेकिन धांधली तो हुई है। धांधली पर कोई विवाद नहीं है। सभी दल मानते हैं कि कोलगेट में कुछ न कुछ गड़बड़ है।पहले कांग्रेस मानने को तैयार नहीं थी लेकिन अब वह भी मान रही है कि कुछ न कुछ गड़बड़ है। दो सांसदों की शिकायत पर सीबीआई जांच कर रही है,कई कंपनियों के खिलाफ नियमों के उल्लंघन को लेकर एफआईआर दायर की गयी हैं।विपक्ष का कोलगेट कांड पर गुस्सा और प्रतिवाद जायज है।

इस सबसे अलग हटकर हमें यहां पर इस विषय पर विचार करना है कि आखिरकार मीडिया में कोलगेट रिपोर्टिंग का स्रोत क्या है ?क्या यह पत्रकारों के परिश्रम का खेल है ? क्या यह खोजी पत्रकारिता की देन है ? या फिर यह सरकारी स्रोत की लीक रिपोर्ट पर आधारित है ? कोलगेट कांड को किसी पत्रकार ने उजागर नहीं किया । यह सीएजी ( कंट्रोलर ऑफ ऑडीटर जनरल) रिपोर्ट पर आधारित है। सीएजी रिपोर्ट कैसे बाहर आय़ी,संसद में बहस किए जाने के पहले ही कैसे लीक हुई,बिना संसद में पास हुए और पीएसी के बिना तहकीकात किए किस तरह इसे वैध माना जाय,ये सारे सवाल अभी अनुत्तरित हैं।

लेकिन कुछ संवैधानिक व्यवस्थाएं हैं जिनका इस प्रसंग में जिक्र करना समीचीन होगा। मसलन् सीएजी की रिपोर्ट गोपनीय होती है।वह पहले संसद में पेश की जाती है उसके बाद संसद की मुहर लगने के बाद पब्लिक एकाउंट कमेटी के पास जाती है और फिर वहां से जांच पूरी होने के बाद सरकार को एक्शन के लिए भेजी जाती है। कोई भी सीएजी रिपोर्ट स्वयं में तब तक मान्य नहीं है जब तक उसके तथ्यों और सूचनाओं की पीएसी जांच न कर ले। सीएजी की रिपोर्ट का पीएसी (पब्लिक एकाउंट कमेटी) द्वारा जांच किया जाना अनिवार्य है और उसके बाद ही सरकार उस पर कार्रवाई करने को बाध्य है। कोलगेट कांड सीएजी रिपोर्ट के संदर्भ में अभी तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। यह रिपोर्ट संसद में पेश किए जाने के पहले ही लीक कर दी गयी। किसने लीक की,क्यों लीक की और सीएजी ने इस रिपोर्ट के लीक किए जाने की अभी तक जांच क्यों नहीं करायी,यह सवाल अभी तक अनुत्तरित है। विपक्ष भी सीएजी रिपोर्ट पर संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के पहले ही एक्शन चाहता है। प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगा गया है।

इसी प्रसंग में कांग्रेसनेता दिग्विजय सिंह ने हैडलाइन टुडे टीवी चैनल में एक साक्षात्कार में सवाल किया है कि सीएजी की रिपोर्ट जब तक संसद में पेश नहीं हो जाती तब तक सीएजी के महानिदेशक की यह जिम्मेदारी है कि वह उस रिपोर्ट की गोपनीयता बनाए रखें,लेकिन महानिदेशक विनोद राय ने सचेत तरीके से सीएजी रिपोर्ट को मीडिया में लीक किया और बाद में वह रिपोर्ट संसद में पेश की गयी। आश्चर्य की बात है विनोद राय ने रिपोर्ट लीक किए जाने की अभी तक जांच कराए जाने की मांग नहीं की है। संसद में रिपोर्ट पेश करने के पहले मीडिया को रिपोर्ट लीक हो जाने के लिए विनोद राय को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। सवाल यह है कि केन्द्र सरकार ने या पीएमओ ने अपनी पहल पर इस पहलू की जांच क्यों नहीं करायी ?कांग्रेस को जांच कराने से किसने रोका था ?

एक अन्य पहलू है जिस पर गौर करें और यह कवरेज से संबंधित है। कोलगेट कांड का कवरेज किसी संवाददाता की देन नहीं है।यह तो सीएजी रिपोर्ट की देन है और बिना छानबीन के सीएजी के बताए तथ्यों या सूचनाओं का प्रचार है। यह मूलतःनिष्पन्न खबर की कटपेस्ट कला है।इसमें सत्य कितना है और असत्य कितना यह कोई नहीं जानता। लेकिन कांग्रेस के आरोप में दम है कि सीएजी ने अपनी जांच के संवैधानिक दायरे का अतिक्रमण किया है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि कोयला खानों के उपयोग की कानूनी समूची और वैज्ञानिक प्रक्रिया की रिपोर्टिंग में एकसिरे से अनदेखी हुई है।इस प्रसंग में सरकार के मंत्रियों को ही बीच बीच में बोलना पड़ा है।लेकिन मीडिया की इस प्रक्रिया को जानने और बताने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मीडिया यह भी देखना नहीं चाहता कि जिनलोगों को आवंटन हुआ है वे किस दशा और दिशा में काम कर रहे हैं।

विवादास्पद कोयलाखानों की जमीनी सच्चाई को किसी भी पत्रकार ने उदघाटित करने की कोशिश नहीं की । मीडिया तो सीधे सीएजी रिपोर्ट में जो लिखा है उसे ब्रह्म वाक्य मानकर चल रहा है अथवा नेताओं के बाइटस को प्रमाण मान रहा है।नेताओं के बाइटस प्रमाण नहीं प्रचार हैं। असल में मीडिया ने इस घोटाले को सनसनीखेज बनाकर रख दिया है। घोटाले को सनसनीखेज बनाने से अंततःलुटेरों को फायदा होता है। सनसनीखेज प्रस्तुति सत्य को आंखों से ओझल कर देती है।बोफोर्स इस तरह की प्रस्तुतियों का आदर्श उदाहरण है।मूल अभियुक्त देश से सकुशल चले गए और राजीव गांधी और अमिताभ-अजिताभ बच्चन पर मीडिया निशाने लगाता रहा और 25साल बाद पता चला कि ये तीनों लोग निर्दोष हैं।बोफोर्स मामले में इन तीनों का अंततः निर्दोष साबित होना मीडिया कवरेज की सनसनीखेज प्रस्तुतियों की पराजय थी। सनसनीखेज प्रस्तुति देखने में अच्छी लगती है पढ़ने में अपील करती है। लेकिन असल में फेक होती है।

उल्लेखनीय है फेक स्टोरियों से एक जमाने में राममंदिर का उन्माद पैदा किया गया,तथ्यों को गढ़ा गया,जनता को गुमराह किया गया। प्रेस कौंसिल ने भी बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हिन्दी के चार बड़े अखबारों की इस आंदोलन के संदर्भ में जो भूमिका रही थी उसकी तीखी आलोचना की ।

कोलगेट के दस्तावेज या उससे जुड़ी खबरों का सीएजी की रिपोर्ट लीक होने के पहले क्षेत्रीय मीडिया से लेकर नेशनल मीडिया में अनुपस्थित रहना,इस बात का संकेत है कि पत्रकार अब खबरें खोजने नहीं जाते बल्कि बनी-बनायी खबरें उनके पास चली आती हैं।सीएजी रिपोर्ट पर सिलेसिलेबार आया कवरेज इस बात को पुष्ट करता है।

यही हाल कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा के मामले में आए कवरेज के समय भी देखा गया ,उस समय लोकपाल की रिपोर्ट के आधार पर दनादन खबरें आईं। कायदे से जहां घटना घट रही है वहां पत्रकार को होना चाहिए और इसके बाद तथ्य संकलन करके लिखना चाहिए। इनदिनों मीडियावाले सीधे किसी सरकारी स्रोत की तलाश में रहते हैं।सरकारी स्रोत जब पत्रकारिता के प्रमाण बन जाते हैं तो मीडिया अपनी स्वतंत्र भूमिका,भाषा और विवेक खो देता है।

कोलगेट से जुड़ी सभी स्टोरियां इसलिए फेक हैं,निष्पन्न हैं, रेडीमेड हैं,वर्चुअल हैं, क्योंकि वे सीएजी की रिपोर्ट से हैं या सीबीआई की एफआईआर से ली गयी हैं। ये रिपोर्ट किसी पत्रकार के खोजी परिश्रम का कमाल नहीं हैं ।यह तो हमारे ऑडीटरों की देन है।ऑडीटर को पत्रकार नहीं कहते।ऑडीटर की रिपोर्ट के आधार पर निर्मित कवरेज में पत्रकार कम ऑडीटर ज्यादा बोलता रहा है।

सवाल यह है कि क्या पत्रकार को ऑडीटर के जरिए अपदस्थ कर सकते हैं ? क्या पत्रकार और ऑडीटर के काम करने का तरीका एक है ? यदि सीएजी रिपोर्ट ही कवरेज के केन्द्र में है तो मीडिया में किसी भी चैनल ने या प्रिंट मीडिया ने देश के ख्यातिलब्ध ऑडीटरों की राय क्यों नहीं ली ? ऑडिट का क्या नियम है और कहां मेनीपुलेशन है इसे ऑडीटर ही बता सकता है कोई पत्रकार नहीं। इस अर्थ में कोलगेट कवरेज एकदम फेक है। इस तरह का कवरेज देकर मीडिया ने फेक को महान बनाया है।

सवाल यह भी है कि कोलगेट जब घट रहा था तब मीडिया कहां सोया था ? सीएजी रिपोर्ट लीक होने के पहले किसी भी पत्रकार को या टीवी समाचार संपादक को इस घोटाले के दर्शन क्यों नहीं हुए ? जबकि लूट तो पहले से चल रही थी,किसी भी भाजपा या विपक्ष के सांसद ने यह मसला सीएजी रिपोर्ट के पहले मीडिया के सामने पेश क्यों नहीं किया और जब सीएजी रिपोर्ट आ गयी तो संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने तक इंतजार क्यों नहीं किया ?

भारत के मीडिया की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह किसी भी घोटाले की तह तक जाने में असमर्थ रहा है और उसने सत्य को सामने रखने का साहस नहीं दिखाया है। इसके विपरीत मीडिया ने लगातार राजनीतिक प्रौपेगैंडा के अस्त्र का काम किया है। बोफोर्स कांड से लेकर राममंदिर आंदोलन तक के अब तक के कवरेज की त्रासदी यह है कि रिपोर्टर अपनी स्वतंत्र सत्ता-महत्ता को त्यागकर प्रौपेगैंडा करने लगता है या फिर रिपोर्टर न होकर स्टैनोग्राफर हो जाता है। कोलगेट कांड पर पत्रकार अभी तक सीएजी के स्टैनोग्राफर का ही काम करते रहे हैं । कायदे से पत्रकार को स्टैनोग्राफर नहीं होना चाहिए। उसे घटना की अपने नजरिए से जांच करनी चाहिए और घटना जब घट रही हो या घटने के बाद घटनास्थल पर जाकर जांच करनी चाहिए और संबंधित सभी पक्षों को यथोचित कवरेज भी देना चाहिए।

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